আল-জামি` আল-কামিল
7061 - عن أم سليمان قالت: دخلتُ على عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسألها عن لحوم الأضاحي؟ فقالت: قد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عنها ثمّ رخَّص فيها، قدِمَ عليُّ بن أبي طالب من سفر فأتتْه فاطمةُ بلحمٍ من ضحاياها فقال: أولم ينه عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: إنه قد رخص فيها. قالت: فدخل عليٌّ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله عن ذلك فقال له:"كُلْها من ذي الحجة إلى ذي الحجة".
حسن: رواه الإمام أحمد (26415) عن يعقوب (هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري)، ثني أبي، عن محمد بن إسحاق قال: حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن سليمان بن أبي سليمان، عن أمه أم سليمان موكلاهما كان ثقة - قالت فذكرته.
وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، وبقية رجاله ثقات غير سليمان بن أبي سليمان وأمه فقد وُثّقا كما في هذا الإسناد.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 27)، رواه أحمد والطَّبرانيّ في الأوسط وقال: لم ترو أم سليمان غير هذا الحديث قلت: وُثِّقَتْ كما نقل في المسند وبقية رجال أحمد ثقات" اهـ.
قلت: ورواه الإمام أحمد أيضًا (25218)، والطحاوي في شرح المعاني (4/ 187) من طريق اللّيث (هو ابن سعد)، ثني الحارث بن يعقوب الأنصاريّ، عن يزيد بن أبي يزيد الأنصاريّ، عن امرأته أنها سألت عائشة عن لحوم الأضاحي …" الحديث بنحوه.
صحَّحه ابن حبَّان (5933) من وجه آخر عن عمرو بن الحارث، عن أبيه، عن يزيد مولى سلمة بن الأكوع أن امرأته أم سليم.
ورجاله ثقات غير يزيد بن أبي يزيد وهو مولى سلمة بن الأكوع كما في إسناد ابن حبَّان، وذكره في ثقاته (5/ 535) لكنه قال:"يزيد بن أبي عبيد مولى سلمة بن الأكوع روى عنه يحيى القطان والناس.
وعمرو بن الحارث ووالده الحارث بن يعقوب المصري كلاهما ثقة فاضل، وأم سليم هي امرأة سليمان بن أبي سليمان السابقة وقد وُثِّقت، فهذا الإسناد لا بأس به في المتابعات ويزيد الإسناد السابق قُوة.
উম্মু সুলাইমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে কুরবানীর গোশত সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগুলো (কুরবানীর গোশত জমা করে রাখা) থেকে নিষেধ করতেন, অতঃপর তিনি সে বিষয়ে অনুমতি দিয়েছেন। (একবার) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সফর থেকে ফিরলেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কুরবানীর কিছু গোশত নিয়ে তাঁর কাছে আসলেন। তিনি (আলী) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এগুলো থেকে নিষেধ করেননি? তিনি (ফাতিমা) বললেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো এতে অনুমতি দিয়েছেন। তিনি (উম্মু সুলাইমান) বলেন: এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যিলহাজ্জ মাস থেকে পরবর্তী যিলহাজ্জ মাস পর্যন্ত তা খাও।"
7062 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل لحوم الضحايا بعد ثلاثة أيام ثمّ قال بعد:"كلوا وتصدَّقوا وتزودوا وادخروا".
صحيح: رواه مالك في الضحايا (6) عن أبي الزُّبير المكيّ، عن جابر بن عبد الله فذكره. رواه
مسلم في الأضاحي (29: 1972) من طريق مالك به.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর গোশত তিন দিনের পরে খাওয়া থেকে বারণ করেছিলেন। এরপর তিনি বললেন: "তোমরা খাও, সাদাকা করো, পাথেয়স্বরূপ রাখো এবং জমা করে রাখো।"
7063 - عن ابن خباب أن أبا سعيد بن مالك الخدريّ قدم من سفر، فقدّم إليه أهله من لحوم الضحايا، فقال: ما أنا بآكله حتَّى أسأل، فانطلق إلى أخيه لأمه وكان بدريا - قتادة بن النعمان، فسأله فقال: إنه حدث بعدك أمرٌ نقضٌ لما كانوا يُنهون عنه من أكل لحوم الأضحى بعد ثلاثة أيام.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (3997) عن عبد الله بن يوسف، ثنا اللّيث، حَدَّثَنِي يحيى بن سعد، عن القاسم بن محمد، عن ابن خباب (واسمه عبد الله) فذكره.
ورواه في الأضاحي (5568) من وجه آخر عن يحيى بن سعيد به نحوه.
تنبيه: رُوي الحديث من وجه آخر عن أبي سعيد وفيه قلب في المتن، وهو ما رواه النسائيّ (4428)، والإمام أحمد (11176)، وصحّحه ابن حبَّان (5926) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد (هو القطان)، عن سعد بن إسحاق قال: حدثتني زينب، عن أبي سعيد الخدريّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لحوم الأضاحي فوق ثلاثة أيام، فقدم قتادة بن النعمان - وكان أخا لأبي سعيد لأمه وكان بدريا - فقدموا إليه فقال: أليس قد نهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال أبو سعيد: إنه قد حدث فيه أمرٌ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا أن نأكله فوق ثلاثة أيام ثمّ رخص لنا أن نأكله وندّخره.
ورجاله ثقات غير زينب وهي ابنة كعب بن عجرة زوج أبي سعيد الخدريّ وهي مقبولة كما في التقريب يعني حيث تتابع، وقد تربعت على أصل القصة، لكن وقع في حديثها قلب في المتن؛ حيث جعل راوي الحديث أبا سعيد، والممتنع من الأكل قتادة بن النعمان وهو مخالف لما في الصَّحيح. ولعل ذلك يعود إلى زينب بنت كعب.
قلت: ويؤيد ما في الصَّحيح الرواية الآتية:
আবু সাঈদ ইবনে মালিক আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক সফর থেকে ফিরে এলেন। তখন তার পরিবার তার সামনে কুরবানীর গোশত পেশ করল। তিনি বললেন: আমি প্রশ্ন না করা পর্যন্ত এটি খাব না। অতঃপর তিনি তার বৈমাত্রেয় ভাই—যিনি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী ছিলেন—কাতাদাহ ইবনুন নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন এবং তাকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি (কাতাদাহ) বললেন: আপনার অনুপস্থিতিতে একটি নতুন নির্দেশ এসেছে, যা কুরবানীর গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করার পূর্ববর্তী নির্দেশটিকে রহিত করেছে।
7064 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد نهانا أن نأكل لحوم نسكنا فوق ثلاث، قال: فخرجتُ في سفرٍ، ثمّ قدمتُ على أهليّ، وذلك بعد الأضحى بأيام، قال: فأتتني صاحبتي بسِلْقٍ قد جعلت فيه قَدِيدًا، فقلتُ لها: أنِّى لكِ هذا القديد؟ فقالت: من ضحايانا. قال: فقلتُ لها: أولَمْ ينهنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أن نأكلها فوق ثلاث؟ قال: فقالت: إنه قد رخَّص للناس بعد ذلك. قال: فلم أُصَدِّقْها حتَّى بَعثتُ إلى أخي قتادة بن النعمان - وكان بدريا - أسأله عن ذلك، قال: فبعث إليَّ أنْ كُلْ طعامَك فقد صدقتْ، قد أرخص رسول الله صلى الله عليه وسلم للمسلمين في ذلك.
حسن: رواه أحمد (16214) عن يعقوب (هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري)، ثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي محمد بن عليّ بن حسين أبو جعفر، وأبي إسحاقُ بنُ يسار، عن
عبد الله بن خبَّاب مولى بني عدي بن النجار، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.
وإسناده حسن لأجل تصريح محمد بن إسحاق.
قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 26):"رواه أحمد ورجاله ثقات" وقال:"حديث أبي سعيد في الصَّحيح، وإنما أخرجته لحديث امرأته".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আমাদের কুরবানীর পশুর গোশত তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছিলেন। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি সফরে বের হলাম এবং (ঈদুল) আযহার কয়েক দিন পর আমার পরিবারের কাছে ফিরে আসলাম। তিনি বলেন: তখন আমার স্ত্রী আমাকে এক থালা 'সিল্ক' (শাকবিশেষ) নিয়ে আসলেন, যার মধ্যে সে কিছু শুটকি গোশত (কাদীদ) রেখেছিল। আমি তাকে বললাম: এই শুটকি গোশত তুমি কোথা থেকে পেলে? সে বলল: আমাদের কুরবানী থেকে। তিনি বললেন: আমি তাকে বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আমাদেরকে তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেননি? তিনি বলেন: তখন সে বলল: এরপরে তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের জন্য অনুমতি (রুখসত) দিয়েছেন। তিনি বললেন: আমি তাকে বিশ্বাস করলাম না, যতক্ষণ না আমি আমার ভাই কাতাদাহ ইবনু নু’মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে—যিনি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী ছিলেন—লোক পাঠালাম। আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (কাতাদাহ) আমার কাছে খবর পাঠালেন যে, তুমি তোমার খাবার খাও। সে (তোমার স্ত্রী) সত্য বলেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের জন্য এ বিষয়ে অনুমতি দিয়েছেন।
7065 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أهل المدينة، لا تأكلوا لحوم الأضاحي فوق ثلاث" فشكوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لهم عيالًا وحَشَمًا وخدمًا فقال:"كلوا وأطْعموا واحبِسوا - أو ادّخِروا -".
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (33: 1973) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عبد الأعلى، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.
وعن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا عبد الأعلى، حَدَّثَنَا سعيد (هو الجريري)، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.
فزاد في إسناد ابن المثنى رجلًا، وهو قتادة، ولم يذكر في بعض روايات الصَّحيح، كما نبه على ذلك الجيّاني في التقيد (3/ 892).
ورواه النسائيّ (4434) من وجه آخر عن ابن سيرين، عن أبي سعيد الخدريّ بلفظ: نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن إمساك الأضحية فوق ثلاثة أيام ثمّ قال:"كلوا وأطعموا" وإسناده صحيح إنْ سمعه ابن سيرين من أبي سعيد فقد أرسل عن جماعة من الصّحابة.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে মদীনার অধিবাসীরা, তোমরা কুরবানীর মাংস তিন দিনের বেশি খাবে না।" অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করল যে তাদের পরিবার-পরিজন, চাকর-নওকর ও খাদেম রয়েছে। তখন তিনি বললেন: "তোমরা খাও, অন্যকে খাওয়াও এবং সংরক্ষণ করো - অথবা সঞ্চয় করো -।"
7066 - عن بُريدة بن حصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نهيتكم عن زيارة القبور فزوروها، ونهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فأمسكوا ما بدا لكم، ونهيتُكم عن النبيذ إِلَّا في سقاء، فاشربوا في الأسقية كلِّها، ولا تشربوا مسكرًا".
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (37: 1977) من طريق محمد بن فضيل، عن أبي سنان ضرار بن مُرّة، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
বুরয়দা ইবনু হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। আর আমি তোমাদেরকে তিন দিনের অধিক কুরবানীর গোশত রাখতে নিষেধ করেছিলাম, এখন যতদিন তোমাদের ইচ্ছা হয় তোমরা তা জমা করে রাখতে পারো। আর আমি তোমাদেরকে শুধুমাত্র মশক (চামড়ার থলে) ছাড়া অন্য পাত্রে নবীয (খেজুর ভিজানো পানীয়) খেতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা সব ধরনের পাত্রেই পান করতে পারো, কিন্তু নেশাকর কোনো পানীয় পান করবে না।"
7067 - عن بريدة بن الحصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كنتُ نهيتُكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث ليتسع ذو الطَّوْل على من لا طَوْل له، فكلوا ما بدا لكم وأطعِمُوا وادّخروا".
صحيح: رواه الترمذيّ (1510) من طريق أبي عاصم النبيل (هو الضَّحَّاك بن مخلد) -، والإمام أحمد (23016) عن مؤمّل - كلاهما عن سفيان الثوريّ، عن علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه فذكره. والسياق للترمذيّ، وهو عند أحمد مطوَّلًا بذكر زيارة القبور، والأوعية أيضًا، ووقع عنده"عن ابن بريدة" غير مسمى.
رواه مسلم أيضًا عقب حديث أبي سنان السابق لكنه لم يسق متنه وقال:"فذكر بمعني حديث أبي سنان ووقع عنده:"عن ابن بريدة".
বুরীদাহ ইবনুল হুসায়েব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কুরবানীর গোশত তিন দিনের বেশি (জমিয়ে রাখতে) নিষেধ করেছিলাম, যাতে সচ্ছল ব্যক্তিরা অসচ্ছলদের জন্য প্রশস্ততা সৃষ্টি করতে পারে। অতএব, এখন তোমরা যা খুশি খাও, অন্যদের খাওয়াও এবং সঞ্চয়ও করো।"
7068 - عن ثوبان قال: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم ضحيته ثمّ قال:"يا ثوبان، أصْلِحْ لحمَ هذه" فلم أزلْ أطعمه منها حتَّى قدم المدينة.
وزاد في رواية: في حجّة الوداع.
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (35: 1975) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا معن بن عيسى، حَدَّثَنَا معاوية بن صالح، عن أبي الزاهرية، عن جُبير بن نُفير، عن ثوبان فذكره.
والزيادة في رواية الزَّبيديّ، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه به.
থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কুরবানী যবেহ করলেন, অতঃপর তিনি বললেন, "হে থাওবান, এর গোশত প্রস্তুত করো।" এরপর আমি তাঁকে তা থেকে খাওয়াতে থাকলাম, যতক্ষণ না তিনি মদিনায় আগমন করলেন।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: বিদায় হজ্বের সময়।
7069 - عن نبيشة الهُذلي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّا كنا نهيناكم عن لحومها أن تأكلوها فوق ثلاث لكي تسعكم، فقد جاء الله بالسَّعة، فكلوا وادَّخروا واتَّجروا ألا وإن هذه الأيام أيام أكْلٍ وشُرْبٍ وذكر الله عز وجل".
صحيح: رواه أبو داود (2813)، وابن ماجة (3160)، وأحمد (20723، 20729) كلّهم من طريق خالد الحذاء، عن أبي المليح بن أسامة، عن نُبيشة فذكره. والسياق لأبي داود.
واختصره ابن ماجة، وزاد أحمد في الموضع الأوّل حديث العتيرة والفرع من أوله، وفي الموضع الآخر من أخيره. وإسناده صحيح.
وأخرج مسلم في الصيام (1141) من هذا الوجه قوله:"أيام التشريق أيام أكل وشرب".
ثمّ رواه من طريق إسماعيل ابن علية، عن خالد الحذَّاء، حَدَّثَنِي أبو قلابة عن أبي المليح، عن نُبيشة. قال خالد: فلقيتُ أبا المليح فسألته فحدثني به.
নুবাইশা আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা তোমাদেরকে তার মাংস (কুরবানীর মাংস) তিন দিনের বেশি খেতে নিষেধ করেছিলাম, যাতে তা তোমাদের মধ্যে (সবার জন্য) যথেষ্ট হয়। কিন্তু আল্লাহ এখন প্রশস্ততা এনে দিয়েছেন। সুতরাং তোমরা খাও, সঞ্চয় করে রাখো এবং ব্যবসা করো। জেনে রেখো, নিশ্চয়ই এই দিনগুলো হলো পানাহার এবং মহান আল্লাহ্র যিকির করার দিন।"
7070 - عن نبيشة قال: نادي رجل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: إنا كنا نعتِر عتيرة في الجاهليّة في رجب فما تأمرنا؟ قال:"اذبحوا الله في أي شهر كان، وبرُّوا الله عز وجل وأطعموا". قال: إنا كنا نُفرِع فرَعًا في الجاهليّة فما تأمرنا؟ قال:"في كل سائمة فرع تغذوه ماشيتُك حتَّى إذا استحمل للحجيج ذبحته فتصدقت بلحمه".
قال خالد: أحسبه قال:"على ابن السبيل؛ فإن ذلك خير".
قال خالد: قلت لأبي قلابة: كم السائمة؟ قال: مائة.
صحيح: رواه أبو داود (2830)، والنسائي (4231)، وابن ماجة (3167)، والإمام أحمد (20723)، والحاكم (4/ 235) من طرق عن خالد (هو ابن مهران الحذاء)، عن أبي المليح، عن نُبيشة
فذكره. والسياق لأبي داود، وزاد أحمد في آخره حديث الرخصة في أكل الأضاحي فوق ثلاث.
وفي رواية للنسائي (4232) عن خالد قال: حَدَّثَنِي أبو قلابة، عن أبي المليح، فلقيت أبا المليح فسألته فحدّثني عن نبيشة الهذلي. وأبو قلابة هو عبد الله بن زيد الجرمي. والحديث إسناده صحيح ونبيشة الهذلي صحابي مُقِلٌّ. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
নুবাইশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডেকে বললেন: আমরা জাহেলী যুগে রজব মাসে 'আতীরাহ' (বলিদান) করতাম, আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর জন্য যেকোনো মাসেই (পশু) যবেহ করো এবং আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লার প্রতি সদ্ব্যবহার করো ও (অন্যকে) খাওয়াও।" সে বলল: আমরা জাহেলী যুগে 'ফারাʿ' (প্রথম জন্ম নেওয়া উট বা ছাগলছানা উৎসর্গ) করতাম, আপনি আমাদের কী নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "প্রত্যেক 'সাইমা'র (মুক্ত চারণভূমিতে বিচরণকারী পশুর) জন্য একটি 'ফারাʿ' রয়েছে, যাকে তোমার গবাদি পশুরা প্রতিপালন করবে যতক্ষণ না তা বোঝা বহনের (আরোহণের) উপযুক্ত হয়ে যায়, অতঃপর তুমি তা যবেহ করে তার গোশত সদকা করে দেবে।" খালিদ বললেন: আমার মনে হয়, তিনি (নবী) বলেছেন: "পথিকদের জন্য; কারণ তা উত্তম।" খালিদ বললেন: আমি আবূ কিলাবাহকে জিজ্ঞেস করলাম: 'সাইমা'র সংখ্যা কত? তিনি বললেন: এক শত।
7071 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قالوا: يا رسول الله، الفرع؟ قال:"حق، فإن تركته حتَّى يكون بكرًا فتحمل عليه في سبيل الله، أو تعطيَه أرملة خير من أن تذبحه فيلصَق لحمُه بوبره فتكفيء إناءك وتُوَلِّه ناقتَك" قالوا: يا رسول الله، فالعتيرة؟ قال:"العتيرة حق".
حسن: رواه أبو داود (3842)، والنسائي (4225)، والإمام أحمد (6713)، والحاكم (4/ 236) كلّهم من طريق أبي داود بن قيس قال: سمعت عمرو بن شعيب يحدث عن أبيه عن جده عبد الله بن عمرو فذكره. وسياق المتن للنسائي ونحوه للحاكم، ولكنه لم يذكر العتيرة، وزاد أبو داود وأحمد في أوله حديث العقيقة.
تنبيه: وقع إسناد النسائيّ في المطبوع هكذا قال: سمعت عمرو بن شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو عن أبيه، وزيد بن أسلم قالوا فذكره، وسقط منه"عن أبيه" الثانية، وهي مثبتة كما في تحفة الأشراف (6/ 313) والمراد به الصحابي عبد الله بن عمرو.
وأمّا من طريق زيد بن أسلم فهو مرسل.
وأمّا إسناد عبد الله بن عمرو فهو حسن لأجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقوله:"حتى يكون بكرا" البَكْر بالفتح: الفتي من الإبل بمنزلة الغلام من الناس. وزاد في لفظ أبي داود وأحمد:"حتى يكون بكْرا شغزبا ابن مخاض أو ابن لبون".
قال الخطّابي: هكذا رواه أبو داود وهو غلط والصواب:"حتَّى يكون بكرا زُخربا" وهو الغليظ، كذا رواه أبو داود وغيره.
قال: ويشبه أن يكون حرف الزاي قد أُبدل بالسين لقرب مخارجهما، وأبدل الخاء غينا لقرب مخرجهما فصار"سغربا" فصحَّفه بعض الرواة فقال:"شغزبا" اهـ.
وابن مخاض: ما أتى عليه عام ودخل في الثانية.
وابن لبون: ما أتى عليه سنتان ودخل في الثالثة.
وقوله:"فيلصق لحمه بوبره" أي: يلصق لحم الفرع أي ولد الناقة بوبره لكونه قليلًا غير سمين.
وقوله:"فتكفيء إناءك" أي: تكب إناءك لأنه لا يبقى لك لبن تحلبه فيه.
وقوله:"وتوله ناقتك" بتشديد اللام قال الخطّابي: أي تفجعها بولدها، وأصله من الوَلَه وهو
ذهاب العقل من فقدان الولد" اهـ.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! 'ফার' (নবজাতক উটের বাচ্চা কুরবানী করা) সম্পর্কে কী হুকুম? তিনি বললেন: "এটি (এর বিধান) সত্য। তবে তুমি যদি তাকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না সে যুবক উট হয় এবং তুমি তাকে আল্লাহর পথে (যুদ্ধাস্ত্র) বহনকারী হিসেবে ব্যবহার কর, অথবা কোনো বিধবাকে দান করে দাও—তাহলে তা জবেহ করার চেয়ে উত্তম। (তুমি তাকে জবেহ করলে) যখন তার গোশত তার পশমের সাথে লেগে থাকে (অর্থাৎ সে দুর্বল ও ক্ষীণকায়), আর (দুধের অভাবে) তুমি তোমার পাত্র উল্টে দাও এবং তোমার উটনীকে তার সন্তানের শোকে বিমর্ষ করে দাও।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আর 'আতীরাহ্' (রজব মাসের পশু কুরবানী) সম্পর্কে কী হুকুম? তিনি বললেন: "আতীরাহ্ (এর বিধান) সত্য।"
7072 - عن عائشة قالت: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نعُقَّ عن الجارية شاة، وعن الغلام شاتين، وأمرنا بالفرع من كل خمس شياه شاة.
حسن: رواه أحمد (25250)، وابن أبي شيبة (24789) كلاهما عن عفّان، عن حمّاد، حَدَّثَنَا عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن يوسف بن ماهك، عن حفصة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن خُثيم غير أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات. عفّان هو ابن مسلم الصفار، وحماد هو ابن سلمة، وحفصة بنت عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق.
لكن اختلف في قوله:"من كل خمس" على حمّاد، فرواه عنه عفّان هكذا، وتابعه أيضًا عبد الصمد بن عبد الوارث العنبري.
رواه عنه الإمام أحمد (26134)، وإسحاق بن راهويه (1032) وخالفهما موسى بن إسماعيل التبوذكي، فرواه عن حمّاد بإسناده فقال:"من كل خمسين".
أخرجه أبو داود (2833) مختصرًا بلفظ: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم من خمسين شاةً شاةٌ، ولم يذكر الفَرَع، ولا ذكر العقيقة.
وكذلك رواه ابن جريج عن ابن خُثيم واختلف عليه:
فرواه عبد الرزّاق (7997) ومن طريقه البيهقيّ (9/ 312) قال: أخبرنا ابن جريج، أخبرني عبد الله بن عثمان بن خُثيم بإسناده عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالفرعة من كل خمسين بواحدة.
قال البيهقيّ: كذا في كتابي، وفي رواية حجَّاج بن محمد وغيره عن ابن جريج:"في كل خمس واحدة".
قلت: هو لفظ إسحاق بن راهويه في مسنده (1034) عن عبد الرزّاق، نا ابن جريج به، ثمّ فسَّره إسحاق بقوله:"من كل خمس شياه واحدة".
وأمّا رواية حجَّاج بن محمد (هو المصيصي) فأخرجها الحاكم (4/ 235 - 236) وقال: صحيح الإسناد.
ورواه أبو يعلى الموصلي (4509) من طريق يحيى بن سُليم، عن ابن خُثيم بإسناده، عن عائشة: أنها سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر بالفَرَعة من الغنم من خمسة واحدة. ويحيى بن سليم هو الطائفي وإن كان في حفظه مقال إِلَّا أنه كان أتقن لحديث ابن خُثيم لأنها كانت عنده في كتاب، كما قال الإمام أحمد في العلل (3150).
فتبيّن بهذا أن الأكثر قالوا:"خمس" ومن قال:"خمسين" فيحتمل أن يكون تصحيفا من بعض الرواة أو النساخ. والله أعلم.
وفي الباب عن أبي رَزين لقيط بن عامر العقيلي قال: قلتُ: يا رسول الله، إنا كنا نذبح ذبائح
في الجاهلية في رجب فنأكل ونُطْعِم من جاءنا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا بأس به" قال وكيع بن عُدس: فلا أدعه.
رواه النسائي (4233)، وأحمد (16202)، وصحّحه ابن حبان (5891) من طريق أبي عوانة (هو الوضاح بن عبد الله اليشكري)، عن يعلى بن عطاء، عن وكيع بن عُدس، عن عمّه أبي رزين فذكره.
ورجاله ثقات سوي وكيع بن عُدس - ويقال: ابن حدس بالحاء - العقيلي الطائفي لم يوثقه أحد غير ابن حبان ذكره في الثقات على قاعدته، ولا يُعرف له راويا غير يعلى بن عطاء، فهو إلى الجهالة أقرب، وقد قال الذهبي في الميزان:"لا يعرف".
وفي الباب عن الحارث بن عمرو أنه لقي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، فقلت: بأبي أنت يا رسول الله، استغفر لي. قال:"غفر الله لكم". قال: وهو على ناقته العضباء. قال: فاشتددت له من الشّق الآخر أرجو أن يخصّني دون القوم. فقلت: استغفر لي. قال: غفر الله لكم. قال رجل: يا رسول الله، الفرائع والعتائر؟ قال:"من شاء فرَّع، ومن شاء لم يفرع، ومن شاء عتر، ومن شاء لم يعتر، في الغنم أضحية". ثم قال:"ألا إنّ دماءكم وأموالكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا".
رواه الإمام أحمد (15972) واللفظ له. ورواه النسائي (4226، 4227)، والطبراني في الكبير (3350)، والحاكم (4/ 236) مختصرًا - كلّهم من طرق عن يحيى بن زرارة بن كُريم بن الحارث بن عمرو الباهليّ، قال: سمعت أبي يذكر أنه سمع جدّه الحارث بن عمرو يحدِّث، فذكر الحديث.
ويحيى بن زرارة لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول". قلت: وهو كذلك لأنه توبع.
فقد رواه الطبرانيّ في الكبير (3351)، والحاكم (4/ 232)، والبيهقي (5/ 28) كلّهم من طريق عبد الوارث، عن عتبة بن عبد الملك السّهميّ، عن زرارة، بإسناده، نحوه.
وأخرجه الطبراني أيضًا (3352) من وجه آخر عن سهل بن حصين الباهلي، عن زرارة بن كُريم، عن الحارث بن عمرو السّهميّ أنه أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، وهو على ناقته العضباء، وكان الحارث رجلًا جسيمًا، فنزل إليه الحارث، فدنا منه حتى حاذي وجهه بركبة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأهوى نبي الله يمسح وجه الحارث، فما زالت نضرة على وجه الحارث حتى هلك. فقال له الحارث: يا نبي الله، ادعُ الله لي:"اللهم اغفر لنا" فذكر نحو حديث عبد الوارث" انتهى.
قال الحاكم:"حديث صحيح لم يخرجاه".
قلت: وفي الإسناد زرارة بن كُريم لم يوثقه غير ابن حبان وهو معروف في توثيق من لم يُعرف فيه جرح.
وقيل: إن له رؤية ولا يصح كما رجّح ابن حجر في الإصابة. وقال ابن حبان: من قال إن له
صحبة فقد وهم. انظر للمزيد: المنة الكبرى (4/ 550).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে আদেশ দিয়েছেন যেন আমরা বালিকার পক্ষ থেকে একটি ছাগল এবং বালকের পক্ষ থেকে দু’টি ছাগল দিয়ে আকীকা করি। আর তিনি আমাদেরকে প্রতি পাঁচটি ছাগলের বিনিময়ে একটি (ফারা’) কুরবানী করার নির্দেশ দিয়েছেন।
7073 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا فرع ولا عتيرة.
والفرع: أوّلُ النتاج كانوا يذبحونه لطواغيتهم، والعتيرة في رجب.
متفق عليه: رواه البخاري في العقيقة (5473)، ومسلم في الأضاحي (38: 1976) كلاهما من طريق معمر، أخبرنا الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
قوله:"والفرع: أول النتاج ...." الخ قال الخطابي: أحسب التفسير فيه من قول الزهري، وأيّده الحافظ في الفتح (9/ 597).
قلت: وفي تفسير الفرع نظر فإن أبا داود رواه بسند صحيح عن الزهري عن سعيد (هو ابن المسيب) قال: الفرع أول النتاج، كان يُنتج لهم فيذبحونه.
وفي رواية للنسائي (4223) من طريق شعبة، عن معمر وسفيان (هو ابن حسين) عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال أحدهما: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الفرع والعتيرة وقال الآخر:"لا فرع ولا عتيرة".
سبق أن معمرا رواه بلفظ:"لا فرع ولا عتيرة" وهذا يعني أن الذي رواه بلفظ:"نهى" هو سفيان بن الحسين الواسطي وإن كان ثقة إلا أنه ضُعّف في الزهري. قال ابن عدي:"هو في غير الزهري صالح الحديث، وفي الزهري يروي أشياء خالف الناس".
وعليه فالمحفوظ لفظ الصحيحين:"لا فرع ولا عتِيرة".
وقوله:"لا فرع" الفرع بالفاء والراء المفتوحتين وجمعها فراع، وفُسِّر كما جاء في آخر الحديث أنه أول نتاج الإبل أو الغنم، كان أهل الجاهلية يذبحونه لأصنامهم.
وقيل: كان الرجل في الجاهلية إذا تمّت إبلُه مائة قدّم بكرًا فنحره لصنمه.
وقوله:"ولا عتيرة" العَتيرة بفتح المهملة وكسر المثناة بوزن عظيمة وفسرت في الحديث بأنها الشاة تذبح في شهر رجب.
وقال أبو عبيد: العتيرة هي الرجبية ذبيحة كانوا يذبحونها في الجاهلية في رجب يتقربون بها لأصنامهم. وقال غيره: العتيرة نذر كانوا ينذرونه، من بلغ ماله كذا أن يذبح من كل عشرة منها رأسا في رجب.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ফার' নেই এবং কোনো 'আতী-রাহও নেই।"
আর ফার' হলো: প্রথম প্রসূত শাবক, যা তারা তাদের তাগুতদের (উপাস্যদের) জন্য যবেহ করত। আর 'আতী-রাহ হলো রজব মাসে (যবেহ করা পশু)।
7074 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا فرعةً ولا عتيرةً".
صحيح: رواه ابن ماجه (3169) عن محمد بن أبي عمر العدني، ثنا سفيان بن عيينة، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره. وقال ابن ماجه عقبه:"هذا من فرائد العدني".
قلت: وإسناده صحيح، وابن أبي عمر العدني شيخ ابن ماجه صاحب المسند مشهور بالرواية عن سفيان بن عيينة.
وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 59):"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات".
فقه الحديث:
اختلف أهل العلم في الجمع بين هذين الحديثين والأحاديث التي قبلهما القاضية بجواز العتيرة أو الأمر بهما.
فجمع بعضهم بحمل الأحاديث المذكورة على الندب، وحديث أبي هريرة وابن عمر على عدم الوجوب، فقوله:"لا فرع ولا عتيرة" أي لا فرع واجب ولا عتيرة واجبة، وإليه ذهب إسحاق بن راهويه فقال عقب روايته حديث عائشة: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالفرع من خمس واحدة" قال:"لا فرع ولا عتيرة" نقول:"لا واجب". اهـ.
وهو مذهب الشافعي وبعض أصحابه قال النووي في شرح مسلم (13/ 137):"والصحيح عند أصحابنا وهو نص الشافعي استحباب الفرع والعتيرة، وأجابوا عن حديث"لا فرع ولا عتيرة" بثلاثة أوجه:
أحدها: جواب الشافعي السابق أن المراد نفي الوجوب.
والثاني: أن المراد نفي ما كانوا يذبحون لأصنامهم.
والثالث: أنهما ليسا كالأضحية في الاستحباب، أو في ثواب إراقة الدم، فأما تفرقة اللحم على المساكين فبر وصدقة، وقد نص الشافعي في سنن حرملة أنها إن تيسرت كل شهر كان حسنا هذا تلخيص حكمها في مذهبنا" اهـ.
وذهب جمهور العلماء إلى إبطال الفرع والعتيرة، وأن الأحاديث الواردة في مشروعيتها قد نسخت بحديث أبي هريرة في النهي عنهما، وإن لم يعلم التاريخ غير أن قواعد الترجيح تقتضي ذلك؛ لأن النهي لا يكون إلا عن شيء كان يفعل، ولم يقل أحد إنه نهى عنهما ثم أذن في فعلهما، وإنما كان آخر الأمرين النهي عن فعلهما. وقد حكى القاضي عياض عن جماهير العلماء نسخ الأمر بالفرع والعتيرة نقله عنه النووي في شرح مسلم (13/ 137).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কোনো ফার‘আ নেই এবং কোনো ‘আতীরাও নেই।”
7075 - عن سمرة بن جندب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل غلام رَهينة بعقيقته، تذبح عنه يوم سابعه، ويحلق ويسمّى".
صحيح: رواه أبو داود (2838)، والترمذي (1522)، والنسائي (4220)، وابن ماجه (3165) والإمام أحمد (20083) كلهم من طرق عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
وإسناده صحيح، والحسن هو البصري، قد سمع عن سمرة بن جندب هذا الحديث لما رواه البخاري في صحيحه عقب حديث أبي هريرة (5472) عن عبد الله بن أبي الأسود، حدثنا قريش بن أنس، عن حبيب بن الشهيد قال:"أمرني ابنُ سيرين أن أسأل الحسن ممن سمع حديث العقيقة فقال: من سمرة بن جندب.
ولأجل هذا ذهب البخاري وشيخه علي بن المديني إلى أن رواية الحسن عن سمرة كلها محمولة على الاتصال.
وقوله:"يسمى" وقيل:"يُدمى" والصحيح"يسمى" كما قال أبو داود وغيره. انظر للمزيد: المنة الكبرى (4/ 525).
ظاهر الحديث يدل على أن يوم الولادة يحب، وعلى هذا فيذبح في اليوم السادس مما بعده.
وقال بعض أهل العلم: لا يحسب يوم الولادة فتذبح في اليوم السابع مما بعده. هكذا قال مالك
إلا أن يولد قبل الفجر من ليلة ذلك اليوم. ومن أخّر عن اليوم السابع فلأبويه أن يعق عنه متى شاءا.
ورُويَ عن عائشة: يعق عنه في الأسبوع الثاني أو الثالث. وبه قال الشافعي، وأحمد ولم يزدْ مالك على الأسبوع الثاني. وقال غيرهم: من فاته اليوم السابع فليذبح متى ما تيسر.
وأما ما رُوِيَ عن بريدة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"العقيقة تُذبح لسبع، أو أربع عشرة، أو إحدى وعشرين" فهو ضعيف. رواه الطبراني في الأوسط (4879)، وفي الصغير (723)، والبيهقي (9/ 303) كلهم من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، عن إسماعيل بن مسلم، عن قتادة، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال الطبراني عقبه:"لم يرو هذا الحديث عن قتادة إلا إسماعيل بن مسلم" وزاد في الصغير:"تفرد به الخفاف".
قلت: وإسماعيل بن مسلم هو المكي متفق على ضعفه.
وبه أعله الهيثمي في المجمع (4/ 59).
قلت: وفي معناه أحاديث أخرى ولا يصح منها شيء.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রতিটি শিশু তার আকীকার বিনিময়ে বন্ধক থাকে। তার পক্ষ থেকে সপ্তম দিনে তা জবাই করা হবে, এবং তার চুল মুণ্ডন করা হবে ও নাম রাখা হবে।
7076 - عن سلمان بن عامر الضبي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"مع الغلام عقيقةٌ، فأهريقوا عنه دمًا، وأميطوا عنه الأذى".
صحيح: رواه البخاري في كتاب العقيقة (5471) عن أبي النعمان، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن محمد، عن سلمان بن عامر قال:"مع الغلام عقيقة".
هكذا رواه موقوفا على سلمان بن عامر، ثم رواه معلقا بصيغة الجزم (5472) فقال: قال أصبغ: أخبرني ابن وهب، عن جرير بن حازم، عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، ثنا سلمان بن عامر الضبي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: مع الغلام عقيقة، فأهريقوا عنه دما وأميطوا عنه الأذى".
وقول البخاري: قال: أصبغ: يشير إلى أنه لم يسمع منه مع أنه من شيوخه فاختلف العلماء هل هو موصول أم مقطوع؟ :
فذهب ابن الصلاح وغيره إلى أنه موصول.
وذهب ابن حزم إلى أنه منقطع. فمن قال: أخرجه البخاري اعتمد على رأي ابن الصلاح، ومن قال: أخرجه معلقا اعتمد على رأي ابن حزم.
وللحديث طرق أخرى ذكرتها في المنة الكبرى (4/ 516).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن مع الغلام عقيقة فأهريقوا عنه دما، وأميطوا عنه الأذى" فهو خطأ، والصواب أنه عن سلمان بن عامر الضبي كما مضى.
رواه البزار - كشف الأستار - (1236) من طريق إسرائيل - والحاكم (4/ 238) من طريق جرير بن حازم - كلاهما عن عبد الله بن المختار، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره. ولفظهما سواء، وزاد الحاكم: قال جرير: سئل الحسن عن الأذى فقال: هو الشعر.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وعزاه الهيثمي في المجمع (4/ 58) للبزار وقال:"رجاله رجال الصحيح".
قلت: وتصحيح الحاكم له بناءًا على ظاهر السند ولكن أصحاب ابن سيرين الثقات كأيوب، وحبيب بن الشهيد، ويونس بن عبيد، وقتادة وغيرهم كلهم رروه عن محمد بن سيرين، عن سلمان بن عامر الضبي كما مضى.
ولذلك قال الدارقطني في الغرائب كما في أطراف الغرائب والأفراد للمقدسي (5405):"تفرد به عبد الله بن المختار عنه، عن أبي هريرة، والمحفوظ عن سلمان بن عامر الضبي" اهـ.
تنبيه: وقع في إسناد طبعة المستدرك سقط، وهو مثبت في"إتحاف المهرة لابن حجر" (15/ 541).
সালমান ইবন আমির আদ-দাব্বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "শিশুপুত্রের পক্ষ থেকে আকীকা (কুরবানি) রয়েছে। সুতরাং তোমরা তার পক্ষ থেকে রক্ত প্রবাহিত করো এবং তার থেকে কষ্টদায়ক জিনিস দূর করো।"
7077 - عن عبد الله بن عمرو قال: سُئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن العقيقة فقال:"لا يحب الله عز وجل العقوقَ" وكأنه كره الاسم. قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إنما نسألك أحدُنا يُولد له؟ قال:"من أحب أن ينسك عن وَلَده فلينسكْ عنه؛ عن الغلام شاتان مُكافأتان، وعن الجارية شاة".
قال أبو داود: سألت زيد بن أسلم عن المكافأتان؟ قال: الشاتان المشبهتان تُذبحان جميعا.
حسن: رواه أبو داود (2842)، والنسائي (4212)، والإمام أحمد (6713، 6822)، والحاكم (4/ 238) من طرق عن داود بن قيس الفرّاء، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده فذكره. واللفظ للنسائي، وهو عند أبي داود وأحمد في الموضع الأول فيه السؤال عن الفرع والعتيرة. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وأما ما روي عن رجل من بني ضمرة، عن أبيه أنه قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن العقيقة؟ فقال:"لا أحب العقوق" - وكأنه إنما كره الاسم -. وقال:"مَنْ وُلِد له ولدٌ، فأحب أن ينسُكَ عن ولده فليفعلْ". ففيه جهالة الرجل الذي من بني ضمرة، وأبوه الظاهر أنه صحابي فلا تضر جهالته.
رواه مالك في العقيقة (1) عن زيد بن أسلم، عن رجل من بني ضمرة به.
ومن طريق مالك رواه أحمد (23134)، والبيهقي (9/ 300) ثم قال البيهقي على إثره:"وهذا إذا انضمّ إلى الأول (يعني حديث عبد الله بن عمرو السابق) قَوِيَا".
وقوله صلى الله عليه وسلم:"لا أحب العقوق" اختلف أهل العلم في توجيهه، فقيل: إنما كره الاسم فقط لا مشروعية العقيقة؛ لاشتراك العقوق، والعقيقة في أصل العقّ، وقد ورد هذا التفسير في الحديث نفسه.
قال الخطابي في معالم السنن: قوله:"لا يحب الله العقوق" ليس فيه توهين لأمر العقيقة، ولا إسقاط وجوبها، وإنما استبشع الاسم، وأحب أن يسميه بأحسن منه، فليسمِّها: النسِكة أو الذبيحة". وقيل غير ذلك انظر: تحفة المودود ص (99).
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আকীকা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলা 'আল-উকুক' (পিতামাতার অবাধ্যতা/সম্পর্ক ছিন্ন করা) পছন্দ করেন না।" যেন তিনি (আকীকা) নামটি অপছন্দ করলেন। (উপস্থিত সাহাবীগণ/জিজ্ঞাসাকারী) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বললেন: "আমরা তো আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি—যদি আমাদের কারো সন্তান জন্ম নেয় (তখন করণীয় কী)?" তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি তার সন্তানের পক্ষ থেকে যবেহ (নুসুক) করতে পছন্দ করে, সে যেন তার পক্ষ থেকে তা করে নেয়; ছেলের পক্ষ থেকে দুটি 'মুকআফ্আতান' (পরস্পর সমজাতীয়) ছাগল, আর মেয়ের পক্ষ থেকে একটি ছাগল।"
আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি যায়েদ ইবনে আসলামকে ‘আল-মুকআফ্আতান’ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: (এর অর্থ) দুটি সদৃশ (পরস্পর অনুরূপ) ছাগল, যা একত্রে যবেহ করা হবে।
7078 - عن عائشة قالت: كانوا في الجاهلية إذا عقّوا عن الصبي خضبوا قُطْنةً بدم
العقيقة، فإذا حلقوا رأس الصبي وضعوها على رأسه فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اجعلوا مكان الدم خلوقًا".
صحيح: رواه ابن حبان (5308) من طريق حجاج (هو ابن محمد المصيصي الأعور) - ، والبزار - كشف الأستار (1239) من طريق روح بن عبادة - كلاهما عن ابن جريج، أخبرني يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن عمرة (هي بنت عبد الرحمن)، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহিলিয়াতের যুগে তারা যখন কোনো শিশুর পক্ষ থেকে আকীকা করত, তখন তারা আকীকার রক্ত দ্বারা তুলা রঞ্জিত করত। অতঃপর যখন তারা শিশুর মাথা মুণ্ডন করত, তখন তারা ঐ তুলা তার মাথার উপর রেখে দিত। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "রক্তের পরিবর্তে খলূক (সুগন্ধি) ব্যবহার করো।"
7079 - عن بريدة بن الحصيب قال: كنا في الجاهلية إذا وُلِد لأحدنا غلام ذبح شاةً ولطخ رأسه بدمها، فلما جاء الله بالإسلام كنا نذبح شاة ونحلق رأسه ونلطخه بزعفران.
حسن: رواه أبو داود (2843) - ومن طريقه البيهقي (9/ 302 - 303) - والحاكم (4/ 238) كلهم من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسين بن واقد وهو المروزي القاضي حسن الحديث، وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين.
وأما ما روي عن يزيد بن عبْد المزني أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يُعَقُّ عن الغلام، ولا يُمسُّ رأسُه بدَمٍ". فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (3166) عن يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدثنا عبد الله بن وهب، قال: حدثني عمرو بن الحارث، عن أيوب بن موسى أنه حدثه أن يزيد بن عبد المزني حدّثه، فذكره.
ورجاله ثقات غير يزيد بن عبْد المزني، فلم يرو عنه إلا أيوب بن موسى القرشي الأموي، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين (5/ 543) على قاعدته في توثيق المجاهيل.
وقد زاد بعضهم بعد يزيد بن عبد"عن أبيه".
كذلك رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1108)، والطحاوي في مشكله (1052) ومداره على يزيد بن عبد وهو مجهول، وكذلك لم تثبت صحية لأبيه كما في الإصابة (9488) في القسم الرابع، فهو مجهول أيضا إذ لم يرو عنه إلا ابنه.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা জাহেলিয়াতের যুগে ছিলাম, যখন আমাদের কারো ছেলে সন্তান জন্ম নিত, তখন আমরা একটি বকরী যবেহ করতাম এবং সেটির রক্ত দিয়ে বাচ্চার মাথা মাখিয়ে দিতাম। অতঃপর যখন আল্লাহ তাআলা ইসলাম নিয়ে আসলেন, তখন আমরা একটি বকরী যবেহ করতাম, তার মাথা মুণ্ডন করতাম এবং তা জাফরান দ্বারা মাখিয়ে দিতাম।
7080 - عن ابن أبي مُلَيْكة قال: نُفِس لعبد الرحمن بن أبي بكر غلامٌ، فقيل لعائشة: يا أم المؤمنين، عُقِّي عنه جَزورًا، فقالت: معاذ الله، ولكن ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"شاتان مكافأتان".
حسن: رواه الطحاوي في شرح المشكل (1042)، والبيهقي (9/ 301) من طريق عبد الجبار بن ورْد المكي قال: سمعت ابن أبي مليكة قال فذكره.
وإسناده حسن؛ من أجل عبد الجبار بن الورْد فإنه صدوق حسن الحديث.
وروى عبد الرزاق في مصنفه (7956) عن ابن جريج، قال: أخبرنا يوسف بن ماهك قال: دخلتُ أنا وابنُ مليكة (كذا) على حفصة بنت عبد الرحمن بن أبي بكر، وولدت للمنذر بن الزبير غلاما، فقلتُ: هلّا عققتِ جزورا على ابنك؟ فقالت: معاذ الله كانت عمتي عائشة تقول: على الغلام شاتان، وعلى الجارية شاة. وإسناده صحيح.
قال ابن القيم في تحفة المودود ص (136 - 137): وقد اختلف الفقهاء هل يقوم غير الغنم مقامها في العقيقة؟ .
قال ابن المنذر: واختلفوا في العقيقة بغير الغنم، فروينا عن أنس بن مالك: أنه كان يعق عن ولده الجزور.
وعن أبي بكرة أنه نحر عن ابنه عبد الرحمن جزورا، فأطعم أهل البصرة. ثم ساق عن الحسن قال: كان أنس بن مالك يعق عن ولده الجزور، ثم ذكر من حديث يحيى بن يحيى: أنبأنا هشيم، عن عيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه: أن أبا بكرة وُلِد له ابنه عبد الرحمن، وكان أول مولود وُلد في البصرة، فنحر عنه جزورا، فأطعم أهل البصرة، وأنكر بعضهم ذلك، وقال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بشاتين عن الغلام، وعن الجارية بشاة. ولا يجوز أن يعق بغير ذلك … قال ابن المنذر: ولعل حجة من رأى أن العقيقة تجزئ بالإبل والبقر قول النبي صلى الله عليه وسلم:"مع الغلام عقيقته فأهريقوا عنه دما"، ولم يذكر دما دون دم فما ذُبحَ عن المولود على ظاهر هذا الخبر يجزئ.
قال: ويجوز أن يقول قائل: إنَّ هذا مجمل وقول النبي صلى الله عليه وسلم:"عن الغلام شاتان وعن الجارية شاة مُفَسَّرٌ، والمفسَّر أولى من المجمل.
وقال مالك: الضأنُ في العقيقة أحبُّ إليّ من البقر، والغنمُ أحبُّ إلي من الإبل، والبقرُ والإبلُ في الهدي أحبُّ إلي من الغنم، والإبلُ في الهدي أحبُّ إلي من البقرِ.
قلت: ثمة ملاحظة أخرى في تفضيل الغنم على الإبل وبالعكس، وهي مصلحة الطاعمين، فإذا كانوا كثيرين فالجزور أفضل، وإذا كانوا قليلين فالشاة أفضل مع مراعاة رغبتهم في نوع اللحوم.
ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবদুর রহমান ইবনু আবী বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি পুত্রসন্তান জন্ম গ্রহণ করল। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলা হলো: হে উম্মুল মু'মিনীন, আপনি তার পক্ষ থেকে একটি উট আক্বীকা করে দিন। তিনি বললেন: আল্লাহ্ আশ্রয় দিন! বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা বলেছেন (তা হলো): "দুটি সমমানের ছাগল।"