আল-জামি` আল-কামিল
708 - عن عمران بن حصين، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تزال طائفةٌ من أمّتي على الحقّ ظاهرين على من ناوأهم حتّى يأتي أمرُ اللَّه، وينزل عيسى ابنُ مريم".
صحيح: رواه الإمام أحمد (19851) عن بهز: حدّثنا حمّاد بن سلمة: حدّثنا قتادة، عن مطرّف، عن عمران بن حصين، فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه أبو داود (2484)، والإمام أحمد (19920)، وصحّحه الحاكم (2/ 71، 4/ 450) كلّهم من وجه آخر عن حماد بن سلمة بإسناده وقالوا فيه بدل قوله:"حتّى يأتي أمر اللَّه وينزل عيسى ابن مريم":"حتّى يقاتل آخرهم المسيح الدّجال". هو عيسى ابن مريم؛ لأنّه ينزل في آخر الزّمان، ويكون مقرّرًا لشريعة محمد، ومجدّدًا لها، لأنه لا نبي بعد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، لأنّه خاتم النبيين، فيكون عيسى ابن مريم من أمّته، هو الذي يقاتل الدّجال ويهلكهـ.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে সর্বদা একটি দল হকের (সত্যের) ওপর প্রতিষ্ঠিত থাকবে এবং এবং যারা তাদের বিরোধিতা করবে তাদের উপর বিজয়ী থাকবে, যতক্ষণ না আল্লাহর নির্দেশ আসে এবং ঈসা ইবনে মারইয়াম অবতরণ করেন।"
709 - عن سفينة مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"خطبنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"ألا إنّه لم يكن نبيٌّ قبلي إلّا قد حذَّر الدَّجال أمَّتَه، وهو أعوَرُ عينه اليسرى، بعينه اليُمْنى ظَفَرَةٌ غَلِيظَةٌ، مكتوبٌ بين عينيه كافرٌ، يخرج معه واديان: أحدهما جَنّة، والآخرُ نارٌ، فناره جَنّة وجنَّتُه نار، معه ملكان من الملائكة يُشبهان نبيَّين من الأنبياء، لو شئتُ سمّيتُهما بأسمائهما وأسماء آبائهما، واحدٌ منهما عن يمينه والآخر عن شماله وذلك فتنةٌ، فيقول الدّجالُ: ألستُ بربِّكم؟ ألستُ أُحيي وأميت؟ فيقول له أحد الملكين: كذبتَ، ما يسمعه أحدٌ من النّاس إلّا صاحبُه فيقول له: صدقتَ فيسمعه النّاس فيظنّون إنما يصدِّق الدجال وذلك فتنة، ثم يسير حتى يأتي المدينة فلا يؤذن له فيها فيقول: هذه قريةُ ذلك الرّجل، ثم يسير حتى يأتي الشّام فيهلكه اللَّه عز وجل عند عَقَبة أَفِيقٍ".
حسن: رواه الإمام أحمد (21929)، والطبرانيّ في الكبير (7/ 98).
كما رواه أيضًا كلٌّ من ابن أبي شيبة (15/ 137 - 138)، وأبو داود الطّيالسيّ في"مسنده" (1202)، وابن عدي في"الكامل" (2/ 846) كلّهم من حديث حشرج بن نُباتة، عن سعيد بن جمهان، عن سفينة، فذكره.
وزاد بعضُ أهل العلم بعد قوله:"حتى يأتي الشّام":"فينزل عيسى عليه السلام، فيقتله عند عقبة أَفيق". وعزوه إلى ابن أبي شيبة، وعندي نسختان مطوعتان، مطبوعة الدار السلفية في الهند، ومطبوعة دار الفكر بتحقيق الأستاذ سعيد اللّحام، ولم أجد فيهما هذه الزّيادة، فلعلّها في نسخ خطية أخرى، واللَّه أعلم.
وأما الإسناد ففيه حشرج بن نُباتة، وقد أشار بعض أهل العلم إلى أن في روايته عن سعيد بن جمهان تقع فيه الغرائب والمناكير.
قال البخاريّ:"حشرج بن نُباتة، عن سعيد بن جمهان، عن سفينة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر وعمر وعثمان: هؤلاء الخلفاء من بعدي. وهذا لم يتابع عليه، لأنّ عمر وعليًّا قالا: لم يستخلف النبيّ صلى الله عليه وسلم".
قال ابن عدي: وهذا الذي أنكره البخاريّ على حشرج هذا الحديث قد روي بغير هذا الإسناد. ثم نقل عن ابن معين وأحمد وغيرهما توثيق حشرج، وذكر حديث الباب وقال:"وهذه الأحاديث لحشرج عن سعيد بن جمهان، عن سفينة قد قمت بعذره في الحديث الذي أنكره البخاري عليه، وأوردت بابًا آخر لذلك الحديث ولذلك المتن، وغير ذلك الحديث لا بأس به فيه".
ثم قال أيضًا:"ولحشرج غير ما ذكرت من الحديث، وأحاديثه حسان، وإفرادات وغرائب، وقد قمتُ بعذره فيما أنكروه عليه، وهو عندي لا بأس به، وبرواياته على أنّ أحمد ويحيى قد وثّقاه"."الكامل" (2/ 846 - 847).
والحديث مع حسن إسناده وقع فيه بعض الكلمات الغريبة والمنكرة، ولعلّ حشرج بن نُباتة أخطأ فيها.
منها قوله:"معه ملكان من الملائكة" لم يرد هذا في حديث صحيح آخر.
ومنها قوله:"عند عقبة أفيق". وهي عقبة معروفة بحوران في طريق نحو الأردن، وهي عقبة طويلة نحو ميلين. والصّحيح أنّه يقتله عيسى ابن مريم بباب لُدٍّ كما في حديث النّواس بن سمعان وغيره.
ولذا قال الحافظ ابن كثير في"النهاية في الفتن والملاحم" (19/ 164):
"إسناده لا بأس به، ولكن في متنه غرابة ونكارة".
وقال الهيثمي في"المجمع" (7/ 340):"رواه أحمد والطبرانيّ، ورجاله ثقات، وفي بعضهم كلام لا يضر".
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন: “শোনো! আমার পূর্বে এমন কোনো নবী আসেননি, যিনি তাঁর উম্মতকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করেননি। সে বাম চোখে কানা হবে, আর তার ডান চোখে একটি মোটা মাংসপিণ্ড থাকবে। তার দুই চোখের মাঝখানে ‘কাফির’ (অবিশ্বাস্য) শব্দটি লেখা থাকবে। তার সাথে দুটি উপত্যকা বের হবে: একটি জান্নাত এবং অন্যটি জাহান্নাম। কিন্তু তার জাহান্নাম হবে জান্নাত এবং তার জান্নাত হবে জাহান্নাম। তার সাথে দুজন ফেরেশতা থাকবে, যারা দুজন নবীর মতো দেখতে হবে। আমি চাইলে তাদের নাম ও তাদের পিতাদের নাম উল্লেখ করতে পারতাম। তাদের একজন তার ডান দিকে এবং অন্যজন তার বাম দিকে থাকবে। আর এটিই হলো ফিতনা। দাজ্জাল তখন বলবে: ‘আমি কি তোমাদের রব নই? আমি কি জীবন দেই না এবং মৃত্যু ঘটাই না?’ তখন ফেরেশতাদ্বয়ের একজন তাকে বলবে: ‘তুমি মিথ্যা বলছো।’ এই কথাটি তার সঙ্গী ছাড়া অন্য কোনো মানুষ শুনতে পাবে না। (তখন দাজ্জালের সঙ্গী ফেরেশতা তাকে) বলবে: ‘তুমি সত্য বলেছ।’ তখন লোকেরা এই কথাটি শুনতে পাবে এবং তারা মনে করবে যে সে দাজ্জালকেই সত্যায়ন করছে। আর এটিই হলো ফিতনা। অতঃপর সে (দাজ্জাল) চলতে থাকবে এবং মদিনায় আসবে, কিন্তু সেখানে তাকে প্রবেশ করতে দেওয়া হবে না। তখন সে বলবে: ‘এই হলো সেই ব্যক্তির (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) শহর।’ এরপর সে চলতে চলতে শামের (সিরিয়ার) দিকে আসবে, অতঃপর আল্লাহ্ তা'আলা তাকে আফীক্ব উপত্যকার গিরিপথে ধ্বংস করবেন।”
710 - عن عبد اللَّه بن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُريتُ عند الكعبة مما يلي المقام رجلًا آدم، سبط الرّأس، واضعًا يديه على رجلين يسكب رأسه أو يقطر ماءً، فسألتُ: من هذا؟ قالوا: عيسى ابن مريم أو المسيح ابن مريم".
صحيح: رواه نُعيم بن حمّاد في"كتاب الفتن" (1336) عن الوليد بن مسلم، عن حنظلة، سمع سالمًا، سمع ابن عمر يقول: فذكره.
وحنظلة هو ابن أبي سفيان بن عبد الرحمن بن صفوان بن أمية الجمحيّ المكيّ من رجال الجماعة.
إلّا أنّ الوليد بن مسلم وهو القرشيّ وصف بالتدليس والتسوية إلّا أنّ الشّيخين مشّاه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কাবা শরীফের নিকট মাকামের কাছাকাছি একজন শ্যামলা বর্ণের ব্যক্তিকে দেখতে পেলাম, তাঁর মাথার চুল ছিল সোজা ও ঝোলানো। তিনি তাঁর দু'হাত দু'জন পুরুষের কাঁধে রেখেছিলেন। তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরছিল বা টপকে পড়ছিল। তখন আমি জিজ্ঞাসা করলাম: ইনি কে? তারা বলল: ইনি ঈসা ইবনে মারইয়াম অথবা মাসীহ ইবনে মারইয়াম।"
711 - عن أبي أُمامة الباهليّ، قال:"خطبنا رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم فكان أكثر خطبته حديثًا حدّثناهُ عن الدّجال وحذرناه. . . فقالت أمُّ شريك بنت أبي العَكَر: يا رسولُ اللَّه فأين العرب يومئذ؟ قال:"هم يومئذ قليل وجلّهم بيت المقدس، وإمامهم رجل صالح فبينما إمامهم قد تقدَّم يصلي بهم الصُّبح إذْ نزل عليهم عيسى ابن مريم الصُّبح، فرجع ذلك الإمام يَنْكُص يَمشي القهقرى ليتقدَّم عيسى يُصلي بالنّاس، فيضع عيسى بده بين كتفيه ثم يقول له: تقدّم فصلِّ فإنّها لك أقيمت، فيصلي بهم إمامهم، فإذا انصرف قال عيسى عليه السلام: افتحوا الباب فيفتح ووراءه الدجال معه سبعون ألف يهودي كلّهم ذو سيف محلى وساج، فإذا نظر إليه الدّجال ذاب كما يذوب الملح في الماء وينطلق هاربًا ويقول عيسى عليه السلام: إنّ لي فيك ضربةً لن تسبقني بها فيدركهـ عند باب اللُّدِّ الشّرقي فيقتله، فيهزم اللَّه اليهود فلا يبقى شيء مما خلق اللَّه يتوارى به يهودي إلا أنطق اللَّه ذلك الشيء لا حجر ولا شجر ولا حائط ولا دابة -إلّا الغَرْقَدَة فإنّها من شجرهم لا تنطق- إلّا قال: يا عبد اللَّه المسلم هذا يهودي فتعال اقتله".
حسن: رواه ابن ماجه (4077) عن علي بن محمد، قال: حدّثنا عبد الرحمن المحاربيّ، عن إسماعيل بن رافع، عن أبي زرعة السيبانيّ يحيى بن أبي عمرو، عن أبي أمامة الباهليّ، فذكر الحديث بطوله - وهو مذكور في موضعه.
هكذا في نسخة ابن ماجه:"يحيى بن أبي عمرو، عن أبي أمامة". وقد سقط بينهما عمرو بن عبد اللَّه الحضرميّ" كما بيّن ذلك المزّي وغيره.
وكذلك رواه نعيم بن حمّاد في كتاب"الفتن" (1330) إلّا أنه اختصره.
وفيه إسماعيل بن رافع الأنصاريّ المدنيّ أبو رافع أهل العلم مطبقون على تضعيفه حتى قال ابن
حبان:"كان رجلًا صالحًا إلّا أنّه يقلّب الأخبار حتّى صار الغالب على حديثه المناكير التي يسبق إلى القلب أنه كان المتعمّد لها"."المجروحين" (42).
ولكن تابعه ضمرة بن ربيعة، عن السّيبانيّ، ومن طريقه رواه تمام في فوائده (1731)، وأبو داود (4322) ولم يسق لفظ الحديث، وإنّما أحال على حديث النّواس بن سمعان.
وكما تابعه أيضًا عطاء الخراسانيّ عن السيبانيّ. ومن طريقه رواه الحاكم (4/ 536 - 537) وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه بهذه السياقة".
قلت: وهو ليس على شرط مسلم، فإنّ عمرو بن عبد اللَّه الحضرميّ الحمصي لم يُخرج له مسلمٌ شيئًا، وإنّما أخرج له أبو داود، وابن ماجه فقط.
وعمرو بن عبد اللَّه الحضرميّ هذا وثّقه العجليّ، فقال:"شاميٌّ تابعيٌّ ثقة". وذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 179) وقال يعقوب بن سفيان في"المعرفة" (2/ 437):"شاميٌّ ثقة".
وفي الباب ما رُوي عن عثمان بن أبي العاص في حديث طويل وفيه:
"وينزل عيسى ابن مريم عند صلاة الفجر، فيقول له أميرهم: يا روحَ اللَّه تقدّم صلِّ. فيقول: هذه الأمة أمراء بعضهم على بعض، فيتقدّم أميرهم فيصلي، فإذا قضى صلاته أخذ عيسى حريته فيذهب نحو الدجال. . .".
رواه الإمام أحمد (17900)، والطبراني في"الكبير" (8392)، وابن أبي شيبة (15/ 136) كلّهم من حديث حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي نضرة، قال:"أتينا عثمان بن أبي العاص في يوم الجمعة لنعرض عليه مصحفًا لنا على مصحفه، فلما حضرت الجمعة أمرنا فاغتسلنا، ثم أُتينا بطب فتطيبنا، ثم جئنا المسجد، فجلسنا إلى رجل فحدّثنا عن الدّجال، ثم جاء عثمان بن أبي العاص، فقمنا إليه فجلسنا، فقال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث بطوله.
ورواه الحاكم (4/ 478) من وجه آخر عن سعيد بن هبيرة، ثنا حماد بن زيد، عن أيوب السّختيانيّ وعلي بن زيد بن جدعان، عن أبي نضرة، بإسناده وقال:
"صحيح الإسناد على شرط مسلم بذكر أيوب السختيانيّ ولم يخرجاه".
وقال الذهبيّ: ابن هبيرة واهٍ.
قلت: وفي الإسناد علي بن زيد بن جدعان وهو ضعيف، ولا تنفع متابعة أيوب؛ لأنّ في طريقه إليه سعيد بن هبيرة وهو واهٍ كما قال الذهبيّ.
وفي الباب عن ابن مسعود مرفوعًا قال:"لقيتُ ليلة أُسري بي إبراهيم وموسى وعيسى. . ." إلى أن قال:"فردوا الأمر إلى عيسى، فقال: أما وَجْبَتُها فلا يعلمها أحدٌ إلّا اللَّه، وذلك فيما عهد إليَّ ربّي عز وجل أنّ الدجّال خارجٌ، ومعي قضيبان، فإذا رآني ذاب كما يذوب الرّصاص". فذكر الحديث بطوله.
رواه الإمام أحمد (3556) عن هُشيم، أخبرنا العوّام عن جبلة بن سُحيم، عن مؤثر بن عفازة، عن ابن مسعود، فذكر الحديث.
ورواه ابن ماجه (4081)، وصحّحه الحاكم (4/ 488 - 489) كلاهما من حديث يزيد بن هارون، أنبأ العوّام بن حوشب، بإسناده موقوفًا على ابن مسعود.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: مع اختلافه في الرفع والوقف، فيه مؤثر بن عفازة لم أقف على من وثّقه غير أنّ ابن حبان ذكره في"الثقات" (5/ 463) ولم يذكر من روى عنه سوى جبلة بن سحيم، فهو في عداد المجهولين، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول". أي إذا توبع وإلّا فليّن الحديث.
وأورده في"الفتح" (13/ 89) مستشهدًا به وسكت عنه، فلعله اعتمد على تصحيح الحاكم له، أو رأى أن الحديث له شواهد، واللَّه تعالى أعلم.
وفي الباب أيضًا عن عبد الرحمن بن جبير بن نُفير، عن أبيه، قال:"لما اشتد جزع أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على من قُتل يوم مؤتة. قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:
"ليدركنّ الدّجّالُ قومًا مثلكم أو خيرًا منكم". ثلاث مرّات. وقال:"ولن يُخزي اللَّه أمّةً أنا أولُها، وعيسى ابن مريم آخرها".
رواه الحاكم (3/ 41) وقال:"صحيح على شرط الشّيخين". وتعقبه الذهبي فقال:"ذا مرسل، سمعه عيسى بن يونس عن صفوان، وهو خبر منكر".
وفي الباب أيضًا ما روي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"أنا أولُ من يدخل الجنة يوم القيامة، وأشفع، وسيدرك رجالٌ من أمّتي عيسى ابن مريم، ويشهدون قتال الدّجّال".
رواه الحاكم في المستدرك (4/ 544 - 545) وسكت عليه، وتعقبه الذهبي فقال:"منكر، وعبّاد ضعيف".
وفي الباب أيضًا عن واثلة بن الأسقع قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تقومُ السّاعةُ حتى تكون عشر آيات: خسف بالمشرق، وخسف بالمغرب، وخسف في جزيرة العرب، والدّجال، والدّخان، ونزول عيسى ابن مريم، ويأجوج ومأجوج، والدّابة، وطلوع الشّمس من مغربها، ونارٌ تخرج من قعر عدن تسوق النّاسَ إلى المحشر تحشرُ الذَّرَّ والنّمل".
رواه الطبرانيّ في"الكبير" (22/ 79 - 80) عن مطلب بن شعيب الأزديّ، ثنا عمران بن هارون الرّمليّ، ثنا صدقة بن المنتصر، حدّثني يحيى بن أبي عمرو السّيبانيّ، قال: حدثني عمرو بن عبد اللَّه الحضرميّ، قال: حدثني واثلة بن الأسقع، قال: سمعت رسول اللَّه يقول (فذكره).
قال الهيثمي في"المجمع" (7/ 328) بعد أن عزاه للطبرانيّ:"وفيه عمران بن هارون وهو ضعيف".
ولكن رواه الحاكم في المستدرك (4/ 428) من وجه آخر عن عمران بن أبي عمران الصوفيّ،
ثنا صدقة بن المنتصر، بإسناده، مثله.
قال:"هذا حديث صحيح الإسناد".
قلت: عمران بن أبي عمران الصوفي هل هو الرّملي أو غيره، لم يتبيّن لي: فإن كان الرملي فهو ضعيف جدًّا، ترجمه الذهبي في"الميزان" فقال:"عمران بن أبي عمران الرملي، عن بقية بن الوليد، أتي بخبر كذب وهو آفته".
وفي الباب عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لم يُسَلَّطْ على قتل الدّجال إلّا عيسى ابن مريم عليه السلام".
رواه أبو داود الطّيالسيّ في"مسنده" (2626) عن موسى بن مُطير، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وموسى بن مُطير، وأبوه مُطير ضعيفان.
قال ابن حبان في"المجروحين" (914):"من أهل الكوفة، يروي عن أبيه، روى عنه أبو يوسف، والوليد بن قاسم، كان صاحب عجائب ومناكير، لا يشك المستمع لها أنها موضوعة، إذا كان هذا الشأن صناعته".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن نافع بن كيسان مرفوعًا:"ينزل عيسى ابن مريم عليه السلام عند باب دمشق الشّرقي في ثوبين دمشقيين، كأنّما ينحدر من رأسه حَبُّ الجُمان".
رواه عبد الملك بن حبيب في أشراط الساعة (31) عن إبراهيم بن المنذر الحزاميّ، عن الوليد ابن مسلم، عن عبد الرحمن بن أيوب بن نافع بن كيسان، عن جدّه، فذكر الحديث.
وقال الحافظ في"الإصابة" (3/ 547):"وأخرج ابن عائذ، عن الوليد بن مسلم، عمّن سمع عبد الرحمن بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن أيوب بن نافع، عن كيسان، عن أبيه، عن جدّه نافع بن كيسان صاحب النبيّ صلى الله عليه وسلم رفعه:"ينزل عيسى ابن مريم عند باب دمشق الشرقيّ".
وقال: أخرجه تمام في"فوائده" من طريق ابن عائذ، وتابعه محمد بن وهب بن عطية، عن عبد الرحمن بن زمعة، مثله. أخرجه ابن شاهين من طريقه.
وذكر له طرقًا أخرى، ولم أقف على الحديث في"فوائد تمام" وفي الإسناد من لم أقف على تراجمهم، والطرق الأخرى التي ذكرها الحافظ فيها مجاهيل ومستورون.
وفي الباب ما رُوي عن ثعلبة بن عِبَاد العبدي من أهل البصرة قال:"شهدتُ يومًا خُطبةً لسمرة ابن جندب فذكر في خطبته حديثًا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. . . فذكر الخطبة بطولها، ومما جاء فيها:"وأيمُ اللَّه لقد رأيتُ منذ قمت أصلي ما أنتم لاقون في أمر دنياكم وأَخَرتكم، وإنه واللَّه لا تقوم الساعة حتى يخرج ثلاثون كذّابًا آخرهم الأعورُ الدّجّال، ممسوح العين اليسرى كأنها عين أبي تِحيى -لشيخ حينئذ من الأنصار بينه وبين حجرة عائشة- وإنّه متى يخرج -أو قال: متى ما يخرج- فإنّه سوف يزعم أنّه اللَّه، فمن آمن به وصدّقه واتّبعه لم ينفعه صالِحٌ من عمله سلَفَ، ومن كفر به
وكذّبه لم يعاقب بشيء من عمله -وقال حسن الأشيب: بسَيِّئ من عمله- سَلَفَ، وإنّه سيظهر -أو قال سوف يظهر- على الأرض كلّها إلّا الحرمَ وبيتَ المقدس، وإنّه يحْصُر المؤمنين في بيت المقدس، فيُزَلْزلون زلزالًا شديدًا، ثم يهلكه اللَّهُ وجنودَه، حتى إنّ جِذْمَ الحائط -أو قال أصل الحائط، وقال حسن الأشيب: وأصلَ الشّجرة- لينادي أو قال يقول: يا مؤمن أو قال: يا مسلم هذا يهودي أو قال: هذا كافر تعالَ فاقتله. قال: ولن يكون ذلك كذلك حتى تروا أمورًا يتفاقم شأنها في أنفسكم، وتَسَّاءَلُون بينكم: هل كان نبيُّكم ذكر لكم منها ذكرًا؟ وحتّى تزولَ جبالٌ على مراتبها، ثم على أَثَرِ ذلك القَبْض".
قال: ثم شهدتُ خطبةً لسَمرة ذكر فيها هذا الحديثَ، فما قدَّم كلمةً ولا أخَّرها عن موضعها.
رواه الإمام أحمد (20178) واللّفظ له، كما رواه أيضًا كل من أبي داود (1184)، والترمذيّ (562)، والنسائيّ (1484)، وابن ماجه (1264) مطوّلًا ومختصرًا، وصحّحه ابن خزيمة (1397)، وابن حبان (2852)، والحاكم (1/ 329 - 331)، والحافظ ابن حجر في ترجمة أبي تِحيى في الإصابة (4/ 26) كلّهم من طريق الأسود بن قيس، قال: حدثني ثعلبة بن عبّاد العبديّ، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: هذا وهم منه، فإنه ليس على شرط أحدهما لأنّ فيه ثعلبة بن عبّاد من رجال السنن فقط. ثم هو لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"ثقاته" (4/ 9). ولم يذكر من روى عنه سوى الأسود بن قيس فهو"مجهول" فلعل من صحّحه نظر إلى شواهده، واللَّه تعالى أعلم.
وقوله:"ثم يهلكه اللَّه وجنوده" أي يهلكهـ عيسى ابن مريم، ونسب الفعل إلى اللَّه مثل قوله تعالى: {وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ رَمَى} [سورة الأنفال:
আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। তাঁর ভাষণের অধিকাংশই ছিল দাজ্জাল সম্পর্কে যা তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করেন এবং দাজ্জাল সম্পর্কে তিনি সতর্ক করেন। ... তখন উম্মু শারীক বিনত আবিল আকর জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সেই দিন আরবেরা কোথায় থাকবে?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেদিন তাদের সংখ্যা হবে কম এবং তাদের অধিকাংশই থাকবে বাইতুল মাকদিসে। তাদের ইমাম হবেন একজন নেককার লোক। তাদের ইমাম যখন ফজরের সালাতে ইমামতি করার জন্য এগিয়ে যাবেন, ঠিক সেই মুহূর্তে তাদের সামনে ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ) অবতরণ করবেন। তখন সেই ইমাম পেছনে সরে আসতে থাকবেন, যেন ঈসা (আঃ) মানুষের ইমামতি করেন। তখন ঈসা (আঃ) তার (ইমামের) দুই কাঁধের মাঝখানে হাত রাখবেন এবং বলবেন: 'আপনি এগিয়ে যান এবং সালাত আদায় করুন, কারণ এটি (সালাত) আপনার জন্যই দাঁড় করানো হয়েছে।' ফলে তাদের ইমাম তাদের নিয়ে সালাত আদায় করবেন। সালাত শেষে যখন তিনি ফিরবেন, তখন ঈসা (আঃ) বলবেন: 'দরজা খোলো।' তখন দরজা খুলে দেওয়া হবে। দরজার পেছনেই থাকবে দাজ্জাল, তার সাথে থাকবে সত্তর হাজার ইহুদি, যাদের সকলের হাতে থাকবে খচিত তরবারি এবং (মাথায়) চাদর। দাজ্জাল যখন তাঁকে (ঈসা আঃ-কে) দেখবে, তখন সে পানিতে লবণ গলে যাওয়ার মতো গলে যাবে এবং পালাতে শুরু করবে। তখন ঈসা (আঃ) বলবেন: 'তোমার উপর আমার এমন একটি আঘাত রয়েছে যা থেকে তুমি কখনোই পালাতে পারবে না।' অতঃপর তিনি তাকে (দাজ্জালকে) লূদ-এর পূর্ব ফটকে ধরে ফেলবেন এবং হত্যা করবেন। এরপর আল্লাহ তা'আলা ইহুদিদের পরাজিত করবেন। তখন আল্লাহর সৃষ্ট কোনো জিনিসই বাকি থাকবে না, যার পেছনে কোনো ইহুদি আত্মগোপন করবে আর আল্লাহ সেটিকে কথা বলার ক্ষমতা দেবেন না—পাথর, গাছ, দেয়াল বা কোনো প্রাণী কেউই নয়—তবে গারকাদ গাছ ছাড়া। কারণ এটি তাদের (ইহুদিদের) গাছ, এটি কথা বলবে না—(অন্য সবকিছুই) বলবে: 'হে আল্লাহর মুসলিম বান্দা! এই যে একজন ইহুদি, এসো এবং তাকে হত্যা করো।'"
712 - عن النّواس بن سمعان، قال: ذكر رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم الدّجّال ذات غداة، فخفَّض فيه ورفَّع حتّى ظننّاه في طائفة النّخل. فما ذكر فيه:"إنّ عيسى عليه السلام يدركهـ باب لدٍّ فيقتله".
صحيح: رواه مسلم في الفتن (2937) في حديث طويل سبق ذكره في أوّل الباب.
ولُدّ: مدينة تقع غرب القدس تبعد عنها 26 ميلًا تقريبًا.
وفي الباب ما يستشهد به، وهو ما رواه مجمع بن جارية يقول: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يقتل ابن مريم الدّجال بباب لُدّ".
رواه الترمذيّ (2244) عن قتيبة حدّثنا اللّيث، عن ابن شهاب، أنّه سمع عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن ثعلبة الأنصاريّ يحدّث عن عبد الرحمن بن يزيد الأنصاريّ -من بني عمرو بن عوف- قال: سمعت عمّي مجمع بن جارية الأنصاريّ، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (3/ 420)، وصحّحه ابن حبان (6811) كلاهما من طريق اللّيث بن سعد، بإسناده، مثله.
قال الترمذيّ:"صحيح". وفي نسخة:"حسن صحيح".
قلت: بل فيه عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن ثعلبة الأنصاريّ المدنيّ، وقيل: عبد اللَّه بن عبد اللَّه لا يعرف من هو؟ .
قال المزيّ في"تهذيبه":"اختلف فيه على الزّهريّ، وعلى أصحابه اختلافًا كثيرًا".
وقال الذهبيّ في"الميزان":"لا ذكر له في تاريخ البخاريّ، ولا ابن أبي حاتم، ولا روي عنه سوى الزّهريّ، وفي علّة الحديث أقوال عدّة". انتهى.
وقال الحافظ:"شيخ الزهريّ لا يعرف، واختلف في إسناد حديثه".
قلت: ولكن لا بأس بالاستشهاد به لما ثبت في حديث النواس بن سمعان بأن المسيح ابن مريم يقتل الدّجال في باب لُدّ؛ ولعلّ الترمذيّ لذلك صحّحه أو حسّنه.
আন-নাওয়াস ইবনু সামআন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক সকালে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাজ্জালের আলোচনা করলেন। তিনি (তার ভয়াবহতার বিষয়টি) কখনো কমিয়ে এবং কখনো বাড়িয়ে এমনভাবে আলোচনা করলেন যে আমরা মনে করলাম, সে বুঝি খেজুর গাছের সারির মধ্যেই কোথাও আছে। অতঃপর তিনি এই কথা উল্লেখ করলেন: "নিশ্চয় ঈসা (আঃ) তাকে লূদ নামক ফটকের কাছে পাবেন এবং তাকে হত্যা করবেন।"
(অন্য একটি সাক্ষ্য হিসেবে) মুজামা‘ ইবনু জারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মারইয়াম পুত্র [ঈসা (আঃ)] দাজ্জালকে লূদের ফটকে হত্যা করবেন।"
713 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّي لأرجو إن طال بي عمر أن ألقى عيسى ابن مريم، فإن عجل بي موت، فمن لقيه منكم فليقرئه مني السّلام".
صحيح: رواه الإمام أحمد (7970) عن محمد بن جعفر: حدّثنا شعبة، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
وإسناده صحيح، ولكن اختلف فيه على شعبة، فرفعه محمد بن جعفر في هذه الرواية، ووقفه يزيد ابن هارون في الرواية التي عقبها (7971) عن شعبة على أبي هريرة. والحكم للمرفوع لما فيه من الزيادة، وشعبة كثير التّردّد في الرّفع والوقف، فإن رفع فلم يرفعه إلا ليقين، وأما وقفه نهر للاحتياط.
قال الهيثميّ في"المجمع" (8/ 205):"رواه أحمد مرفوعًا وموقوفًا، ورجالهما رجال الصحيح".
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি অবশ্যই আশা করি যে যদি আমার জীবন দীর্ঘ হয়, তবে আমি ঈসা ইবনে মারইয়ামের সাথে সাক্ষাৎ করব। কিন্তু যদি আমার আগেই মৃত্যু এসে যায়, তবে তোমাদের মধ্যে যে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করবে, সে যেন আমার পক্ষ থেকে তাঁকে সালাম পৌঁছে দেয়।"
714 - عن أنس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أدرك منكم عيسى ابن مريم فليقرأه مني السّلام".
حسن: رواه الحاكم (4/ 545) عن محمد بن المظفّر الحافظ: ثنا عبد اللَّه بن سليمان: ثنا محمد بن مصفى الحمصيّ: ثنا إسماعيل، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أنس، فذكره.
قال الحاكم:"إسماعيل هذا أظنّه ابن عياش ولم يحتجا به". وجزم الذّهبي أنّه ابنُ عياش.
والذي يظهر أنه إسماعيل بن إبراهيم بن مِقْسم الأسديّ المعروف بابن علية، فقد ذكر المزيُّ في"تهذيبه" من شيوخه أيوبَ السَّختِيانيّ.
وإسناده حسن من أجل الكلام في محمد بن مُصَفَّى غير أنّه حسن الحديث.
تنبيه: تحرّف في أصل المستدرك إلى"محمود".
وأمّا ما رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (4898)، وفي الصغير (1/ 256 ، 257) عن أبي هريرة مرفوعًا:"ألا إن عيسى ابن مريم ليس بيني وبينه نبيٌّ ولا رسولٌ، ألا إنّه خليفتي في أمّتي من بعدي، ألا إنّه يقتل الدّجال ويكسر الصليب، ويضع الجزية، وتضع الحربُ أوزارها، ألا من أدركهـ منكم فليقرأ عليه السلام". فهو ضعيف. فيه محمد بن عقبة السّدوسيّ.
قال عبد الرحمن بن أبي حاتم:"سألت أبي عنه فقال: ضعيف الحديث، كتبتُ عنه، ثم تركت حديثه، فليس أحدِّثُ عنه. وترك أبو زرعة حديثه ولم يقرأه علينا، وقال: لا أحدِّث عنه".
ومع هذا كلّه أدخله ابن حبان في ثقاته (9/ 100) واللَّه المستعان.
قلت: إلّا أنّ مضمون الحديث تشهد له الأحاديث الصّحيحة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যারা ঈসা ইবনে মারইয়ামকে পাবে, সে যেন আমার পক্ষ থেকে তাঁকে সালাম পৌঁছে দেয়।"
715 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى النّاس بعيسى ابن مريم في الدّنيا والآخرة، والأنبياء إخوة لعِلَّاتٍ، أمّهاتهم شتّى ودينهم واحد".
متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3443) عن محمد بن سنان، حدّثنا فليح بن سليمان، حدثنا هلال بن علي، عن عبد الرحمن بن أبي عمرة، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
ورواه مسلم في الفضائل (2365) من وجه آخر عن همّام بن منبه، عن أبي هريرة وزاد في آخره:"فليس بيننا نبيٌّ".
ورواه الشّيخان البخاريّ (3443)، ومسلم كلاهما من حديث الزّهريّ، قال: أخبرني أبو سلمة ابن عبد الرحمن، أنّ أبا هريرة، قال (فذكر الحديث).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুনিয়া ও আখিরাতে আমিই ঈসা ইবন মারইয়ামের সবচেয়ে নিকটবর্তী (বা অধিক হকদার) মানুষ। আর নবীগণ হলেন বৈমাত্রেয় ভাইয়ের মতো, তাদের মায়েরা ভিন্ন, কিন্তু তাদের দীন (ধর্ম) এক।"
716 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده ليُهلنَّ ابنُ مريم بفَجِّ الرّوحاء، حاجًّا أو معتمرًا أو ليثنينهما".
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1252) من حديث سفيان بن عيينة، حدثني الزهريّ، عن حنظلة الأسلميّ، قال: سمعتُ أبا هريرة يحدّث، فذكره.
وفجُّ الرّوحاء: كان في كان في طريق النبيّ صلى الله عليه وسلم من المدينة إلى بدر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার হাতে আমার জীবন, সেই সত্তার শপথ! মারইয়ামের পুত্র (ঈসা) অবশ্যই ফাজ্জুর-রাওহা নামক স্থানে হজ্জকারী হিসেবে অথবা উমরাহকারী হিসেবে ইহরাম বাঁধবেন, অথবা তিনি দুটোই পালন করবেন।"
717 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ينزل عيسى ابن مريم، فيقتل الخنزير، ويمحي الصّليب، وتجمع له الصّلاة، ويُعطى المال حتى لا يُقبل، ويضع الجزية، وينزل الرّوحاء فيحجُّ منها أو يعتمر أو يجمعهما".
صحيح: رواه الإمام أحمد (7903) عن يزيد: أخبرنا سفيان، عن الزهريّ، عن حنظلة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث مثله.
قال: وتلا أبو هريرة: {وَإِنْ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ إِلَّا لَيُؤْمِنَنَّ بِهِ قَبْلَ مَوْتِهِ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكُونُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا} [سورة النساء: 159]، فزعم حنظلة أنّ أبا هريرة قال:"يؤمن به قبل موته: عيسى" فلا أدري هذا كله حديث النبيّ صلى الله عليه وسلم أو شيءٌ قاله أبو هريرة؟". انتهى.
قلت: الضّمير في قوله تعالى: {قَبْلَ مَوْتِهِ} يعود على عيسى عليه السلام وهو الذي قال به محقّقو الصّحابة مثل ابن عباس وغيرهم، وهو الذي ذهب إليه أبو هريرة. أما هل هو مرفوع أم موقوف عليه، فالظّاهر من الرّوايات أنه موقوف عليه، ولم يثبت أنه مرفوع إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وقد رُوي عن كثير بن عبد اللَّه بن عوف، عن أبيه، عن جدّه، أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يمرُّ عيسى ابن مريم حاجًّا أو معتمرًا أو يجمع اللَّه له ذلك".
رواه عبد الملك بن حبيب الأندلسي في"أشراط السّاعة" (38) عن ابن أبي أويس، عن كثير، بإسناده مثله. ومن هذا الوجه رواه أيضّا الطبرانيّ في"الكبير" (17/ 16 - 17) في سياق أطول منه، كما رواه أيضًا من وجه آخر عن كثير، به.
وإسناده ضعيف جدًّا، فإنّ كثير بن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف المزنيّ المدني، أهل العلم مطبقون على تضعيفه حتى قال ابن حبان:"روى عن أبيه عن جدّه نسخة موضوعة لا يحل ذكرها في الكتب، ولا الرواية عنه إلّا على جهة التّعجّب". وبه ضعّفه الهيثميّ في"المجمع" (6/ 86).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ঈসা ইবনে মারইয়াম (আঃ) অবতরণ করবেন। তিনি শূকর হত্যা করবেন, ক্রুশ নিশ্চিহ্ন করবেন, তাঁর জন্য সালাত একত্রিত করা হবে (বা সালাতের জামাআত অনুষ্ঠিত হবে), এবং (প্রচুর) সম্পদ দেওয়া হবে যা কেউ গ্রহণ করবে না। তিনি জিযইয়া (কর) উঠিয়ে দেবেন। তিনি রূহায় অবতরণ করবেন এবং সেখান থেকে হজ্জ অথবা উমরাহ অথবা উভয়টিই পালন করবেন।”
(আবূ হুরায়রা) বললেন: তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: “আর আহলে কিতাবদের মধ্যে এমন কেউই নেই, যে তার মৃত্যুর আগে তার প্রতি ঈমান আনবে না। আর কিয়ামতের দিন তিনি (ঈসা) তাদের ওপর সাক্ষী হবেন।” [সূরা আন-নিসা: ১৫৯] হানযালা (বর্ণনাকারী) মনে করেন যে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: “তাঁর মৃত্যুর আগে তাঁর প্রতি ঈমান আনবে” অর্থাৎ ঈসা (আঃ)-এর প্রতি। (হানযালা বললেন,) আমি জানি না— এই সবটুকু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস, নাকি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজের কোনো কথা।
718 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليهبطنّ عيسى ابنُ مريم حكمًا عدلًا، وإمامًا مُقسطًا، وليسلكنّ فجًّا حاجًّا أو معتمرًا أو بِنِيَّتِهما، وليأتينّ قبري حتى يسلّم عليَّ ولأردنَّ عليه". يقول أبو هريرة: أي بني أخي إن رأيتموه فقولوا: أبو هريرة يقرئك السّلام.
حسن: رواه الحاكم (2/ 595) عن أبي الطيب محمد بن أحمد الحيريّ، ثنا محمد بن عبد الوهّاب، ثنا يعلى بن عبيد، ثنا محمد بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن عطاء مولى أمّ صبية -وتحرّف فيه إلى أمّ حبيبة- قال: سمعت أبا هريرة، فذكر الحديث.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السّياقة".
قلت: ليس كما قال، فإن فيه عطاء مولى أمّ حبيبة مجهول.
قال الذهبي في"الميزان":"لا يعرف تفرد عنه المقبريّ".
وأما ابن حبان فذكره في"الثقات" (5/ 202).
وفي الإسناد أيضًا علّة أخرى وهي عنعنة محمّد بن إسحاق، وهو مدلس.
وقد رواه أيضًا عبد الملك بن حبيب الأندلسيّ في"أشراط السّاعة" (39) عن ابن الماجشون وغيره، عن الدّراورديّ، عن المغيرة، عن أبي هريرة، مرفوعًا:"ليمرنّ عيسى ابن مريم حاجًّا أو معتمرًا بالمدينة، وليقفَنَّ على قبري، وليقولنَّ: يا محمّد! فأجيبه، وليسلِّمنَّ عليَّ فأردُّ عليه".
وفيه الدّراورديّ وهو عبد العزيز بن محمد بن عبيد، وهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وأمّا المغيرة فالظّاهر أنه ابن عبد الرحمن بن الحارث بن عبد اللَّه بن عياش القرشيّ المخزوميّ، إلّا أنه لم يلقَ أبا هريرة؛ لأنّه وُلد سنة أربع أو خمس وعشرين ومائة، ومات سنة ست وثمانين ومائة، كما قال ابنه عياش.
ورواه أيضًا عن عبد الملك بن حبيب الأندلسيّ في"أشراط السّاعة" فقال: وحدثنيه أصبغ بن الفرج، عن ابن وهب، عن أبي صخر، عن المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكر نحوه.
قلت: أبو صخر هو حُميد بن زياد المدني صاحب العباء، سكن مصر مختلف فيه، فقال النسائيّ: ضعيف، وابن معين له قولان: مرة ضعيف، وأخرى: ليس به بأس.
والحديث بهذه الطرق ولما له من الشواهد يرتقي إلى درجة الحسن إلا قوله:"ليأتين قبري. . ." فإنه لم يرد من طرق صحيحة حسب علمي.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ঈসা ইবনু মারইয়াম অবশ্যই ন্যায়পরায়ণ শাসক ও ইনসাফ প্রতিষ্ঠাকারী নেতা হিসেবে নাযিল হবেন। তিনি অবশ্যই হাজ্জ অথবা উমরাহ অথবা উভয়ের নিয়ত করে কোনো গিরিপথ ধরে চলবেন। আর তিনি অবশ্যই আমার কবরের কাছে আসবেন এবং আমাকে সালাম করবেন, আর আমি অবশ্যই তার জবাব দেব।" আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: হে আমার ভাইয়ের ছেলেরা, যদি তোমরা তাঁকে দেখতে পাও, তবে তোমরা বলো: আবূ হুরাইরাহ আপনাকে সালাম জানাচ্ছে।
719 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُعطيت خمسًا لم يُعطهنّ أحدٌ من الأنبياء قبلي: نُصرتُ بالرُّعب مسيرة شهر، وجعلتْ لي الأرض مسجدًا وطهورًا، وأيما رجل من أمّتي أدركتْه الصّلاة فليصلِّ، وأحلّت لي الغنائم، وكان النبيُّ يبعث إلى قومه خاصة، وبُعثت إلى الناس كافة، وأُعطيت الشّفاعة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (438)، ومسلم في المساجد (521) كلاهما من حديث هُشيم، قال: حدّثنا سيَّار -وهو أبو الحكم- قال: حدّثنا يزيد الفقير، قال: حدّثنا جابر بن عبد اللَّه، فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে অন্য কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি: (১) এক মাসের দূরত্ব পর্যন্ত (শত্রুদের অন্তরে) ভীতির মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করা হয়েছে। (২) আমার জন্য যমীনকে সিজদার স্থান ও পবিত্রকারী (পাক) বানানো হয়েছে। সুতরাং আমার উম্মতের যেই পুরুষের যখনই সালাতের সময় হবে, সে যেন সালাত আদায় করে নেয়। (৩) আমার জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করা হয়েছে। (৪) পূর্বের নবীকে বিশেষ করে তাঁর নিজ জাতির নিকট পাঠানো হতো, আর আমাকে সমগ্র মানবজাতির জন্য পাঠানো হয়েছে। (৫) এবং আমাকে শাফা'আত (সুপারিশ করার অধিকার) দেওয়া হয়েছে।"
720 - عن وعن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"فُضِّلْتُ على الأنبياء بست: أُعطيت جوامع الكلم، ونُصرت بالرُّعب، وأحلت لي الغنائم، وجُعلت لي الأرض طهورًا ومسجدًا، وأُرسلتُ إلى الخلق كافة، وخُتم بي النبيّون".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (523) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে ছয়টি বিষয়ের মাধ্যমে অন্যান্য নবীদের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দান করা হয়েছে: আমাকে 'জাওয়ামি'উল কালিম' (সংক্ষিপ্ত অথচ ব্যাপক অর্থবোধক কথা) দেওয়া হয়েছে; আমাকে সাহায্য করা হয়েছে ভীতি বা ত্রাস দ্বারা; আমার জন্য গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) হালাল করা হয়েছে; আমার জন্য জমিনকে পবিত্রতা অর্জনকারী ও সিজদার স্থান (মসজিদ) বানানো হয়েছে; আমাকে সমগ্র সৃষ্টির কাছে পাঠানো হয়েছে; এবং আমার দ্বারাই নবীদের পরিসমাপ্তি ঘটানো হয়েছে।"
721 - عن أبي ذرّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُتيتُ خمسًا لم يؤتهنّ نبيٌّ كان قبلي: نُصرتُ بالرّعب؛ فيرعب مني العدو مسيرة شهر، وجُعلت لي الأرض مسجدًا وطهورًا، وأحلت لي الغنائم ولم تُحل لأحد كان قبلي، وبُعثتُ إلى الأحمر والأسود، وقيل لي: سلْ تُعطه، فاختبأتُهَا شفاعةً لأمّتي، وهي نائلة منكم -إن شاء
اللَّه- من لقي اللَّه لا يشرك به شيئًا".
صحيح: رواه الإمام أحمد (21299) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدّثني سليمان الأعمش، عن مجاهد بن جبر أبي الحجّاج، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلس إلّا أنه صرّح بالتحديث كما أنه توبع.
فقد أخرجه الحاكم (2/ 434) من وجه آخر عن أبي أسامة وقد سئل عن قوله تعالى: {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا} [سورة سبأ: 28] فقال: حدّثنا الأعمش، بإسناده، فذكر مثله.
قال مجاهد في تفسير الأحمر والأسود: الإنس والجنّ.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه بهذه السياقة، إنّما أخرجاه ألفاظًا من الحديث متفرقة".
ورواه أبو داود (489) من وجه آخر عن جرير، عن الأعمش، بإسناده مختصرًا بلفظ:"جُعلتْ لي الأرضُ طهورًا ومسجدًا".
وفي الباب عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطيتُ خمسًا لم يُعطها أحدٌ قبلي من الأنبياء، جعلت لي الأرض طهورًا ومسجدًا، ولم يكن من الأنبياء يصلي حتى يبلغ محرابه، ونُصرت بالرّعب مسيرة شهر يكون بين يديّ إلى المشركين، فيقذف اللَّه الرّعبَ في قلوبهم، وكان النبيُّ يُبعث إلى خاصة قومه، وبُعثتُ أنا إلى الجنّ والإنس".
رواه البزار -كشف الأستار (2366) - عن محمد، ثنا عبيد اللَّه، عن سالم أبي حماد، عن السديّ، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (8/ 258):"رواه البزار وفيه من لم أعرفهم".
وروي بمعناه بزيادة:"وأحلت لي الغنائم، وأعطيت الشفاعة، فأخرتها لأمتي فهي لمن لا يشرك باللَّه شيئًا".
رواه أحمد (2742)، وفيه يزيد بن أبي زياد الهاشمي مولاهم ضعيف باتفاق أهل العلم.
আবূ যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি: আমাকে ভয়ভীতি দ্বারা সাহায্য করা হয়েছে; ফলে এক মাসের দূরত্ব থেকে আমার শত্রুরা ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে যায়। আর আমার জন্য যমীনকে সালাতের স্থান (মসজিদ) ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম বানানো হয়েছে। আর আমার জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করা হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কারো জন্য হালাল করা হয়নি। আর আমাকে লাল ও কালো সকলের কাছে প্রেরণ করা হয়েছে। আর আমাকে বলা হয়েছিল: তুমি চাও, তোমাকে দেওয়া হবে। কিন্তু আমি সেই সুযোগটি আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফা‘আত) হিসেবে তুলে রেখেছি, আর ইন শা আল্লাহ! তা তোমাদের মধ্য থেকে এমন ব্যক্তি অবশ্যই লাভ করবে, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে তাঁর সাথে মিলিত হবে।
722 - عن أبي هريرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ما من الأنبياء نبيٌّ إلّا أُعطي ما مثلُه آمن عليه البشر، وإنّما الذي أوتيت وحْيًا، أوحاه اللَّه إليَّ، فأرجو أن أكون أكثرهم تابعًا يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4981)، ومسلم في الإيمان (152) كلاهما من حديث اللّيث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো নবী প্রেরিত হননি, যাকে এমন মুজিযা (নিদর্শন) দেওয়া হয়নি যার অনুরূপ দেখে মানুষ তার প্রতি ঈমান এনেছে। আর আমাকে যা দেওয়া হয়েছে, তা হলো ওহী (আল্লাহর বাণী), যা আল্লাহ আমার প্রতি নাযিল করেছেন। সুতরাং আমি আশা করি যে কিয়ামতের দিন আমার অনুসারীর সংখ্যা তাদের (অন্যান্য নবীদের) চেয়ে বেশি হবে।"
723 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسُ محمّدٍ بيده لا يسمعُ بي
أحدٌ من هذه الأمّة يهوديٌّ ولا نصرانيّ، ثم يموت ولم يؤمن بالذي أرسلت به إلّا كان من أصحاب النّار".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (153) عن يونس بن عبد الأعلى، أخبرنا ابن وهب، قال: وأخبرني عمرو، أن أبا يونس حدّثه عن أبي هريرة، فذكر مثله.
وفي معناه رُوي عن أبي موسى الأشعريّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من سمع بي من أمّتي أو يهوديّ أو نصرانيّ، فلم يؤمن بي لم يدخل الجنة". إلا أن فيه انقطاعا، رواه الإمام أحمد (19536، 19562)، والبزّار - كشف الأستار (16)، وابن حبان في صحيحه (4880) كلّهم من حديث شعبة، عن أبي بشر، قال: سمعت سعيد بن جبير، عن أبي موسى الأشعريّ، مثله.
وإسناده ضعيف من أجل الانقطاع، فإن سعيد بن جبير لم يسمع من أبي موسى، لأنه ولد سنة (46 هـ)، وتوفي أبو موسى نحو الخمسين.
وقال البزّار:"لا نعلم أحدًا رواه عن النبي صلى الله عليه وسلم إلّا أبو موسى بهذا الإسناد، ولا أحسب سمع سعيد من أبي موسى".
قلت: وقد مضى حديث أبي هريرة، وهو في الصّحيح.
وأمّا قول الهيثمي في"المجمع" (8/ 261):"رواه الطبرانيّ وأحمد بنحوه في الروايتين، ورجال أحمد رجال الصّحيح، والبزار أيضًا باختصار".
فهو كما قال، إلّا أنه لم يشر إلى الانقطاع، كما يفهم من قوله أن رجال الطبراني ليسوا من رجال الصّحيح.
تنبيه: تحرف الحديث في صحيح ابن حبان إلى"من سمَّع يهوديًّا أو نصرانيًا دخل النار". وبوَّب عليه بقوله: ذكر إيجاب دخول النّار لمن أسمع أهل الكتاب ما يكرهونه، وهذا فيه خطأ كبير نبَّه عليه الحافظ ابن حجر في"إتحاف المهرة" (10/ 24 - 25) فقال: بوَّب عليه: إيجاب دخول النّار لمن أسمع أهل الكتاب ما يكرهون، وهذا فيه نظر كبير وهو غلط نشأ عن تصحيف، وذلك أنّ لفظ هذا الحديث:"من سمع بي من أمّتي أو يهودي أو نصرانيّ فلم يؤمن بي دخل النّار".
هكذا ساقه أبو بكر بن أبي شيبة في"مسنده" عن عفّان، عن شعبة، ثنا أبو بشر، سمعت سعيد ابن جبير، يحدث عن أبي موسى، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، بهذا.
ورواه أحمد في"مسنده" عن محمد بن جعفر، وعن عفّان، عن شعبة، عن أبي بشر، به. فهذا هو الحديث، وكأنّ الرّواية التي وقعت لابن حبان مختصرة:"من سمع بي فلم يؤمن دخل النّار يهوديًّا أو نصرانيًّا". فتحرّف عليه وبوَّب هو على ما تحرّف، فوقع في خطأ كبير.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর শপথ! এই উম্মতের (যুগের) এমন কোনো ব্যক্তি, হোক সে ইহুদি অথবা খ্রিস্টান, যে আমার সম্পর্কে শুনবে, এরপর সে মৃত্যুবরণ করবে, অথচ আমি যা নিয়ে প্রেরিত হয়েছি, তার প্রতি ঈমান আনবে না, সে অবশ্যই জাহান্নামের অধিবাসী হবে।"
724 - عن ابن عباس قال: ما قرأ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على الجن وما رآهم، انطلق رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في طائفة من أصحابه عامدين إلى سوق عكاظ، وقد حيل بين الشياطين وبين خبر السماء. . . وفيه:"فانطلقوا يضربون مشارق الأرض ومغاربها، فمر النفر الذين أخذوا نحو تهامة -وهو بنخل- عامدين إلى سوق عكاظ -وهو يصلي بأصحابه صلاة الفجر- فلما سمعوا القرآن استمعوا له، وقالوا: هذا الذي حال بيننا وبين خبر السماء فرجعوا إلى قومهم فقالوا: يا قومنا إنا سمعنا قرآنا عجبا يهدي إلى الرشد فآمنا به ولن نشرك بربنا أحدا. . . الحديث.
متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الأذان (773) ومسلم في كتاب الصلاة (449 - 149) كلاهما من رواية أبي عوانة، عن أبي بشر جعفر بن أبي وحشية، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وسيأتي تفصيل الكلام على الحديث في كتاب بدء الخلق، باب وفد الجن.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জ্বিনদের কাছে (কুরআন) তিলাওয়াত করেননি এবং তাদের দেখেনওনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের একটি দলকে সঙ্গে নিয়ে উক্বায বাজারের উদ্দেশ্যে যাত্রা করলেন। ইতোমধ্যে শয়তানদেরকে আসমানের সংবাদ শোনা থেকে বাধা দেওয়া হয়েছিল। হাদীসে আরও আছে যে, তারা (জ্বিনেরা) পৃথিবীর পূর্ব ও পশ্চিম প্রান্তে (সমাধানের সন্ধানে) ছুটল। জ্বিনদের যে দলটি তিহামার দিকে গিয়েছিল—আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন নাখলা নামক স্থানে তাঁর সাহাবীদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করছিলেন—উক্বায বাজারের উদ্দেশ্যে যাওয়ার পথে তারা তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। যখন তারা কুরআন শুনতে পেল, তখন তারা মন দিয়ে তা শুনল এবং বলল, 'এটাই সেই জিনিস যা আমাদের এবং আসমানের সংবাদের মাঝে অন্তরায় সৃষ্টি করেছে।' অতঃপর তারা তাদের সম্প্রদায়ের কাছে ফিরে গিয়ে বলল, 'হে আমাদের কওম! আমরা এক অত্যাশ্চর্য কুরআন শুনেছি, যা সঠিক পথের দিশা দেয়। তাই আমরা এতে ঈমান এনেছি এবং আমরা আমাদের রবের সাথে আর কাউকে শরীক করব না।' ... হাদীসের শেষ পর্যন্ত।
725 - عن أبي هريرة أنه كان يحمل مع النبي صلى الله عليه وسلم إداوةً لوضوئه وحاجته. . . وفيه: فقلت: ما بالُ العظم والروثة؟ قال:"هما من طعام الجن، وإنه أتاني وفد جن نصيبين -ونعم الجن- فسألوني الزاد، فدعوت اللَّه لهم أن لا يمروا بعظمٍ ولا بروثةٍ إلا وجدوا عليها طعامًا. . .".
صحيح: رواه البخاريّ في كتاب مناقب الأنصار (3860) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا عمرو بن يحيى بن سعيد قال: أخبرني جدي، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আবু হুরায়রা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অযু এবং অন্যান্য প্রয়োজনের জন্য তাঁর সাথে একটি পানির পাত্র বহন করতেন। ... এরই মধ্যে (আলোচনায়), আমি (আবু হুরায়রা) বললাম, ‘হাড় ও গোবরের কী হবে?’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এগুলো হচ্ছে জিনদের খাদ্য। নাসীবীন নামক স্থানের জিনদের একটি প্রতিনিধি দল আমার কাছে এসেছিল—তারা ছিল উত্তম জিন—এবং তারা আমার কাছে পাথেয় চেয়েছিল। তাই আমি আল্লাহ্র কাছে তাদের জন্য দু‘আ করেছি যে, তারা যেন এমন কোনো হাড় বা গোবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম না করে, যার উপর তারা খাদ্য না পায়।"
726 - عن علقمة قال: سألت ابن مسعود فقلت: هل شهد أحد منكم مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا، . . . وفيه:"أتاني داعي الجن فذهبت معه، فقرأت عليهم
القرآن"، قال: فانطلق بنا فأرانا آثارهم وآثار نيرانهم. . . الحديث.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الصلاة (450) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الأعلى، عن داود، عن عامر قال: سألت علقمة: هل كان ابن مسعود شهد مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: فقال علقمة، فذكره.
ذهب ابن إسحاق إلى أن استماع الجن للقرآن كان ليلة انصرافه من الطائف إلى مكة، كما في سيرة ابن هشام (1/ 421 - 422)، والصحيح كان ذلك قبل خروجه إلى الطائف بسنين، كما قال به كثير من المحققين.
لقد ورد في القرآن ما يدل على أن الرسل كانوا يُبعَثون إلى قومهم من بني جنسهم ليكون أبلغ في الحجة، وأقطع للمعذرة، فهل كان الجن يرسل إليهم الرسل من أنفسهم، أم أنهم كانوا تبعًا لبني آدم؟ كما حكى غير واحد الإجماعَ على أن الجن لم يُرسَل إليهم الرسل من أنفسهم من الجن، وإنما كانوا تبعًا للإنس.
إلا ما حُكي عن الضحاك بن مزاحم أن الجن أرسل إليهم من أنفسهم مستدلًا بقوله تعالى: {يَامَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِنْكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آيَاتِي وَيُنْذِرُونَكُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَذَا قَالُوا شَهِدْنَا عَلَى أَنْفُسِنَا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَشَهِدُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ (130)} [سورة الأنعام: 130].
وأما قوله تعالى: {وَمَا مَنَعَ النَّاسَ أَنْ يُؤْمِنُوا إِذْ جَاءَهُمُ الْهُدَى إِلَّا أَنْ قَالُوا أَبَعَثَ اللَّهُ بَشَرًا رَسُولًا (94) قُلْ لَوْ كَانَ فِي الْأَرْضِ مَلَائِكَةٌ يَمْشُونَ مُطْمَئِنِّينَ لَنَزَّلْنَا عَلَيْهِمْ مِنَ السَّمَاءِ مَلَكًا رَسُولًا} [سورة الإسراء: 94 - 95] ففيه المقارنة بين من يعيش في الأرض وبين من يعيش في السماء، ومسكن الإنس والجن هو الأرض، فكفى أن يكون الرسول من البشر للاثنين.
আবদুল্লাহ ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলক্বামাহ (রহ.) বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমাদের কেউ কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জিনদের রাতের (ঘটনার) সাক্ষী ছিল? তিনি বললেন: না। ... (এই বর্ণনায় রয়েছে:) আমার কাছে জিনদের আহ্বানকারী এসেছিল, তাই আমি তার সাথে গেলাম এবং তাদের কাছে কুরআন পাঠ করলাম। তিনি (ইবন মাসউদ) বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে গেলেন এবং আমাদের তাদের পদচিহ্ন ও তাদের আগুনের চিহ্নগুলি দেখালেন।
727 - عن ميسرة الفجر قال: قلت: يا رسول اللَّه، متى كُتبتَ نبيًّا؟ قال:"وآدم بين الرّوح والجسد".
صحيح: رواه الإمام أحمد (20596)، والطبراني في الكبير (20/ 355)، وابن أبي عاصم في السنة (410) والآجري في الشريعة (943) كلهم من طريق عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا منصور بن سعد، عن بُديل، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن ميسرة الفجر، فذكر الحديث.
وفي بعض الروايات:"كنتُ". كما في الحلية (9/ 53). وكذلك هو في مستدرك الحاكم (2/ 608) رواه من طريق إبراهيم بن طهمان، عن بديل بإسناده وقال: صحيح الإسناد.
والأشهر:"كُتِبتُ" هكذا رواه منصور بن سعد، وإبراهيم بن طهمان، عن بديل وهو ابن ميسرة العقيلي مرفوعًا.
ورواه حماد بن سلمة، عن خالد الحذّاء، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن رجل، قال: قلت:"يا رسول اللَّه، مني بُعثت نبيًّا؟ قال: وآدم بين الروح والجسد".
رواه ابن أبي عاصم في السنة (411) عن هدبة بن خالد، ثنا حماد بن سلمة، فذكر مثله. والرجل المبهم هو ميسرة الفجر.
وهي متابعة قوية لرواية بديل المرفوعة.
إذا عرفت هذا فلا يضر مخالفة حماد بن زيد في روايته عن بديل، عن عبد اللَّه بن شقيق، مرسلًا. وإن كان الحافظ الدّارقطنيّ رجّح الإرسال، إلّا أن زيادة الثقة مقبولة عند جماهير المحدثين كما هو معروف في علم مصطلح الحديث.
والحديث الآتي يشهد لحديث ميسرة الفجر.
মাইসারাতুল ফাজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কখন নবী হিসাবে লিখিত হলেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন আদম (আঃ) রূহ এবং দেহের মাঝখানে ছিলেন।
