হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (728)


728 - عن أبي هريرة قال: قالوا: يا رسول اللَّه، متى وجبت لك النبوة؟ قال:"وآدم بين الروح والجسد".

صحيح: رواه الترمذيّ (3609) عن أبي همام الوليد بن شجاع بن الوليد البغدادي، حدثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث مثله.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب من حديث أبي هريرة، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

ومن هذا الوجه، أخرجه الآجري في الشريعة (946) وفيه"بين خلق آدم ونفخ الروح فيه" ورواه أيضًا من وجه آخر عن الوليد بن مسلم (946) وأخرجه الحاكم (2/ 609) من هذا الوجه شاهدا الحديث ميسرة الفجر.

ومعنى هذا الحديث إن اللَّه قدَّر نبوة محمد صلى الله عليه وسلم قبل أن يخلق آدم قضاءً، ثم ولد ولادة طبيعية من بطن أمه، وبعد أن بلغ أربعين سنة نُبّئ، فمن زعم أنه خلق قبل آدم، أو كان نبيا عند ولادته فقد خالف النصوص الصريحة الصحيحة.

وقد رُوي أيضًا عن ابن عباس إلا أنه ضعيف ولفظه:

قيل: يا رسول اللَّه متى كُتبت نبيا؟ قال:"وآدم بين الروح والجسد".

رواه البزار - كشف الأستار (2364) عن محمد بن عُمارة بن صبيح، ثنا نصر بن مزاحم، ثنا قيس، عن جابر، عن الشعبي، عن ابن عباس قال: فذكر الحديث.

وفيه جابر وهو ابن يزيد الجعفي كذبوه، وفي التقريب:"ضعيف رافضي"، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (8/ 223).

وأما ما روي:"وكنت نبيا وآدم بين الماء والطين" فهو حديث موضوع. قال شيخ الإسلام ابن تيمية:"هذا باطل نقلا وعقلا، فإن آدم ليس بين الماء والطين، بل الطين ماء وتراب، ولكن كان
بين الروح والجسد. فهذا ونحوه فيه علم اللَّه بالأشياء قبل كونها. وكتابته إياه، وإخباره بها". مجموع فتاواه (18/ 399) وأورد الحافظ ابن القيم في إعلام الموقعين (4/ 274) وقال: العوام يروونه: بين الماء والطين. قال شيخنا: هذا باطل وفي الباب أيضًا حديث العرباض بن سارية:"إني عند اللَّه لخاتم النبيين، وإن آدم عليه السلام لمنجدل في طينته" وسيأتي في باب وجوب الإيمان بأن النبي صلى الله عليه وسلم لخاتم النبيين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনার জন্য কখন নবুয়ত নির্ধারিত হয়েছিল?’ তিনি বললেন: ‘যখন আদম (আঃ) রূহ ও দেহের মাঝে ছিলেন।’









আল-জামি` আল-কামিল (729)


729 - عن أنس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يؤمنُ أحدُكم حتّى أكونَ أحبَّ إليه من والده وولده والنّاس أجمعين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (15)، ومسلم في الإيمان (44) كلاهما من حديث عبد العزيز بن صهيب، عن أنس، فذكره، واللّفظ للبخاريّ.

وفي لفظ مسلم:"حتى أكون أحبَّ إليه من أهله وماله والنّاس أجمعين".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ ততক্ষণ পর্যন্ত ঈমানদার হতে পারে না, যতক্ষণ না আমি তার কাছে তার পিতা, তার সন্তান এবং সকল মানুষের চেয়ে প্রিয় হই।"









আল-জামি` আল-কামিল (730)


730 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لا يؤمن أحدكم حتى أكونَ أحبَّ إليه من والده وولده".

صحيح: رواه البخاريّ في الإيمان (14) عن أبي اليمان، قال: أخبرنا شعيب، قال: حدّثنا أبو الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! তোমাদের কেউ ততক্ষণ পর্যন্ত (পূর্ণ) মুমিন হতে পারবে না, যতক্ষণ না আমি তার কাছে তার পিতা ও তার সন্তান অপেক্ষা অধিক প্রিয় হই।"









আল-জামি` আল-কামিল (731)


731 - عن عبد اللَّه بن هشام، قال: كنّا مع النّبيّ صلى الله عليه وسلم، وهو آخذ بيد عمر بن الخطّاب، فقال له عمر: يا رسول اللَّه لأنت أحبُّ إليَّ من كلَّ شيء إلّا من نفسي، فقال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا والذي نفسي بيده، حتى أكونَ أحبَّ إليك من نفسك". فقال له عمر: فإنّه الآن، واللَّهِ، لأنت أحبُّ إليَّ من نفسي. فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"الآن يا عمر".

صحيح: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6632) عن يحيى بن سليمان، قال: حدّثني ابن وهب، قال: أخبرني حيوةُ، قال: حدّثني أبو عقيل زهرة بن معبد، أنه سمع جدَّه عبد اللَّه بن هشام، فذكره.

قال الخطّابيّ:"لم يرد به حُبَّ الطَّبْع، بل أراد به حبَّ الاختيار، لأنّ حبَّ الإنسان نفسه طبعٌ. ولا سبيل إلى قلبه، فمعناه: لا تصْدُق فيّ حتّى تفدِيَ في طاعتي نفسك، وتؤثر رضاي على هواك، وإن كان فيه هلاكك".




আব্দুল্লাহ ইবন হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। তখন তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার জীবন ব্যতীত অন্য সব কিছুর চেয়ে আপনি আমার নিকট অধিক প্রিয়। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! আমি তোমার নিকট তোমার নিজের জীবনের চেয়েও অধিক প্রিয় না হওয়া পর্যন্ত (তোমার ঈমান পূর্ণ হবে না)।" তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আল্লাহর কসম, এখন থেকে অবশ্যই আপনি আমার নিকট আমার নিজের জীবনের চেয়েও অধিক প্রিয়। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এখন (ঠিক হয়েছে), হে উমার!"









আল-জামি` আল-কামিল (732)


732 - عن العباس بن عبد المطلب أنّه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يقول"ذاق طَعْم الإيمان من رضي باللَّه ربًّا، وبالإسلام دينًا، وبمحمّد رسولًا".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (34) من طرق عن عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ، عن يزيد
ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن عامر بن سعد، عن العباس بن عبد المطلب، فذكره.




আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দ্বীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাসূল হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে মেনে নিয়েছে, সে ঈমানের স্বাদ পেয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (733)


733 - عن أنس بن مالك، أنّ أعرابيًّا قال لرسول صلى الله عليه وسلم: متى السّاعة؟ فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما أعددتَ لها؟". قال: حبّ اللَّه ورسوله. قال:"أنت مع مَنْ أحببتَ".

متفق عليه: رواه مسلم في البرّ والصّلة (2639) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدّثنا مالك، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أنس، فذكره.

لم أجده في الموطأ ولم يذكره الجوهريّ في مسند الموطأ.

ورواه البخاريّ في الأحكام (7153)، ومسلم كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، حدّثنا أنس بن مالك، قال: بينما أنا والنّبيّ صلى الله عليه وسلم خارجان من المسجد، فلقينا رجل عند سدّة المسجد، فقال: يا رسول اللَّه، متى السّاعة؟ قال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"ما أعددتَ لها؟" فكأنّ الرّجلَ استكان، ثم قال: يا رسول اللَّه: ما أعددتُ لها كبير صيام ولا صلاة ولا صدقة، ولكنّي أحبُّ اللَّهَ ورسولَه. قال:"أنت مع منْ أحببتَ".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদ থেকে বের হচ্ছিলাম, তখন মাসজিদের দরজার কাছে এক ব্যক্তির সাথে আমাদের দেখা হলো। সে বলল: হে আল্লাহর রসূল! কিয়ামত কবে হবে? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তার জন্য কী তৈরি করেছ?" লোকটি যেন কিছুটা সংকুচিত হয়ে গেল, তারপর বলল: হে আল্লাহর রসূল! আমি তার জন্য অধিক পরিমাণে রোযা, সালাত বা সাদাকা তৈরি করিনি, কিন্তু আমি আল্লাহ ও তাঁর রসূলকে ভালবাসি। তিনি বললেন: "তুমি যাকে ভালোবাসো, তার সাথেই থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (734)


734 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أشدّ أمتي حُبًّا ناسٌ يكونون بعدي، يودُّ أحدُهم لو رآني بأهله وماله".

صحيح: رواه مسلم في كتاب الجنّة (2832) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب بن عبد الرحمن، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

قوله:"من أشدّ أمتي لي حبًّا". أي بعد الصّحابة رضي الله عنهم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের মধ্যে আমার প্রতি সবচেয়ে বেশি ভালোবাসা পোষণকারী হবে এমন কিছু লোক, যারা আমার পরে আসবে। তাদের মধ্যে একজন তার পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদের বিনিময়ে হলেও আমাকে দেখতে চাইবে।









আল-জামি` আল-কামিল (735)


735 - عن أبي عبد الرّحمن الجُهني، قال: بينا نحن عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم طَلَعَ رَكبان، فلمّا رآهما قال:"كِنْدِيَّان مَذْحِجِيَّان" حتّى أتياه، فإذا رجالٌ من مَذْحِج، قال: فدنا إليه أحدُهما ليُبايعه، قال: فلمّا أخذ بيده، قال: يا رسولَ اللَّه، أرأيتَ مَن رآك فآمنَ بك وصدَّقك واتَّبعك، ماذا له؟ قال:"طُوبى له". قال: فمسحَ على يده فانصرف، ثم أقبل الآخرُ حتّى أخذ بيده ليُبايعه، قال: يا رسول اللَّه، أرأيتَ من آمَنَ بك وصدَّقك واتَّبعك ولم يرَك؟ قال:"طوبى له، ثم طُوبى له، ثمّ طوبى له". قال: فمسح على يدِه، فانصرف".

حسن: رواه أحمد (17388)، والطبرانيّ في الكبير (22/ 289)، والبزّار -كشف الأستار (3769) -
كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، حدّثني يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد اللَّه اليزنيّ، عن أبي عبد الرحمن الجهنيّ، فذكر مثله، واللّفظ لأحمد.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنّه مدلّس إلّا أنّه صرَّح بالتحديث.




আবূ আবদির রহমান আল-জুহানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন দুজন আরোহী আগমন করল। যখন তিনি তাদের দেখলেন, তখন বললেন: "তারা কিন্দীয়ান অথবা মাযহিজীয়ান।" যখন তারা তাঁর কাছে আসল, দেখা গেল তারা মাযহিজ গোত্রের লোক।
তিনি বলেন, তাদের মধ্যে একজন তাঁর কাছে এগিয়ে গেল তাঁর হাতে বাইআত করার জন্য। যখন সে তাঁর হাত ধরল, তখন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মনে করেন যে, যে ব্যক্তি আপনাকে দেখেছে, আপনার প্রতি ঈমান এনেছে, আপনাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে এবং আপনাকে অনুসরণ করেছে—তার জন্য কী রয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য রয়েছে তুবা (জান্নাতের বৃক্ষ/সৌভাগ্য)।"
তিনি বলেন, অতঃপর সে তাঁর হাত থেকে হাত সরিয়ে নিল এবং ফিরে গেল। তারপর অন্যজন এগিয়ে আসল এবং তাঁর হাতে বাইআত করার জন্য হাত ধরল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মনে করেন যে, যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান এনেছে, আপনাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে এবং আপনাকে অনুসরণ করেছে, কিন্তু আপনাকে দেখেনি—তার জন্য কী রয়েছে?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য রয়েছে তুবা, তারপর তার জন্য রয়েছে তুবা, তারপর তার জন্য রয়েছে তুবা।" তিনি বলেন, অতঃপর সে তাঁর হাত থেকে হাত সরিয়ে নিল এবং ফিরে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (736)


736 - عن أبي جمعة حبيب بن سباع قال: تغدينا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا أبو عبيدة ابن الجراح قال: فقال: يا رسول اللَّه هل أحد خير منا؟ أسلمنا معك وجاهدنا معك، قال:"نعم، قوم يكونون من بعدكم يؤمنون بي ولم يروني".

حسن: رواه الإمام أحمد (16976) والطبراني في الكبير (3537) وأبو يعلى (1559) وصحّحه الحاكم (4/ 85) كلهم من حديث الأوزاعيّ قال: حدثني أسيد بن عبد الرحمن، قال: حدثني صالح بن جبير، قال: حدثني أبو جمعة، فذكره.

قال الحاكم: صحيح الإسناد.

وإسناده حسن من أجل صالح بن جبير الصُّدائي أبو محمد الشامي الطبراني، ويقال: الفلسطيني الأردني، كان كاتب عمر بن عبد العزيز على الخراج والجند، فقال له مرة: ولينا صالح ابن جبير فوجدناه كاسمه، ووثقه ابن معين، وذكره ابن حبان في الثقات وفي التقريب: صدوق، وروى له عدد كبير.

ولكن قال أبو حاتم: شيخ مجهول فلعله يقصد به قليل الحديث، لأن أبا حاتم يطلق كلمة"مجهول" على قليلي الحديث كما ذكرت بالتفصيل في كتابي: دراسات في الجرح والتعديل.

ورواه البخاري في خلق أفعال العباد (390) عن عبد اللَّه بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن ابن جبير قال: قدم علينا أبو جمعة الأنصاري قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا معاذ بن جبل عاشر عشرة، فقلنا: يا رسول اللَّه! هل من أحد أعظم منا أجرًا؟ آمنا بك واتبعناك، قال:"وما يمنعكم من ذلك ورسول اللَّه بين أظهركم يأتيكم بالوحي من السماء؟ بل قوم يأتون من بعدكم يأتيهم كتاب بين لوحين فيؤمنون به ويعملون بما فيه، أولئك أعظم منكم أجرًا"، وفيه متابعة لأسيد بن عبد الرحمن وهو وإن كان ثقة، وثقه يعقوب بن سفيان وغيره.

وصالح بن جبير له متابعة أيضًا، رواه الإمام أحمد (16977) من طريق الأوزاعي نفسه قال: حدثني أسيد بن عبد الرحمن، عن خالد بن دُريك، عن ابن محيريز قال: قلتُ لأبي جمعة رجل من الصحابة: حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: أحدثكم حديثًا جيدًا، تغدينا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعنا عبيدة بن الجراح. . . فذكر الحديث مثله.

وفي الباب ما روي عن عمر بن الخطاب قال: كنت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالسا فقال:"أنبئوني بأفضل أهل الإيمان إيمانا؟"، قالوا: يا رسول اللَّه، الملائكة، قال:"هم كذلك، ويحق لهم ذلك، وما يمنعهم وقد أنزلهم اللَّه المنزلة التي أنزلهم بها، بل غيرهم" قالوا: يا رسول اللَّه الأنبياء
الذين أكرمهم اللَّه برسالته والنبوة، قال:"هم كذلك ويحق لهم وما يمنعهم وقد أنزلهم اللَّه المنزلة التي أنزلهم بها؟ بل غيرهم" قالوا: يا رسول اللَّه، الشهداء الذين استشهدوا مع الأنبياء، قال:"هم كذلك ويحق لهم وما يمنعهم وقد أكرمهم اللَّه بالشهادة مع الأنبياء؟ بل غيرهم" قالوا: فمن يا رسول اللَّه؟ قال:"أقوام في أصلاب الرجال يأتون من بعدي، يؤمنون بي ولم يروني، ويصدقون بي ولم يروني، يجدون الورق المعلق فيعملون بما فيه فهؤلاء أفضل أهل الإيمان إيمانا".

رواه أبو يعلى (160) عن مصعب بن عبد اللَّه، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن أبي حميد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه عن عمر بن الخطاب، فذكره.

وأخرجه الحاكم (4/ 85، 86)، والخطيب في شرف أصحاب الحديث (62)، كلاهما من طريق محمد بن أبي حميد، وقال الحاكم: صحيح الإسناد ولم يخرجاه.

وتعقبه الذهبي فقال:"بل محمد ضعَّفوه".

قلت: وهو كما قال، فإن محمد بن أبي حُميد -واسمه: إبراهيم الأنصاري الزرقي- أبو إبراهيم المدني، الملقب حماد، ضعيفٌ جدَّا، عند جماهير أهل العلم، فقال أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن معين: ضعيفٌ ليس حديثُه بشيء، وقال البخاري: منكر الحديث، وقال النسائي: ليس بثقة، وقال أبو حاتم: كان رجلًا ضريرًا، منكر الحديث، ضعيف الحديث، وضعّفه أيضًا أبو داود والدارقطني وابن حبان والعقيلي وغيرهم.

فلا يلتفت إلى ما ذكره ابن شاهين في"الثقات" (1206) عن أحمد بن صالح أنه قال: ثقة لا شك فيه، حسن الحديث، روى عنه أهل المدينة، يقولون: حماد، وغيرهم يقولون: محمد بن أبي حميد.

وفيه كلام آخر، راجع"التهذيب".

ورواه العقيلي في الضعفاء (1832) في ترجمة المنهال بن بحر قال: حدثنا هشام بن أبي عبد اللَّه، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن أسلم، عن أبيه عن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتدرون أي الخلق أعجب إيمانًا؟" فذكر الحديث.

وهذه المتابعة لا تفيد شيئًا فإن منهال بن بحر قال فيه العقيلي: في حديثه نظر، وقال:"وهذا الحديث إنما يُعرف لمحمد بن أبي حُميد، عن زيد بن أسلم، وليس بمحفوظ من حديث يحيى بن أبي كثير، ولا يُتابع منهالًا عليه أحد"، انتهى.

قلت: المنهال بن بحر هذا ذكره الذهبي في"الميزان" ونقل قول العقيلي،"في حديثه نظر" وقال: حدث عنه أبو حاتم وقال: ثقة، وذكره ابن عدي في"كامله" وأشار إلى تلبينه.

وفي الإسناد أيضًا يحيى بن أبي كثير ذكره العقيلي في الضعفاء (2051) وقال:"ذُكر بالتدليس"، وفي التقريب:"ثقة ثبت، لكنه يدلس ويرسل".

قلت: وقد رواه معنعنًا فلا يؤمن أن يكون قد دلَّسه في هذا الإسناد، فأسقط رجلًا من الإسناد،
أو سمع من ابن أبي حميد نفسه، فأسقطه لضعفه.

ثم هذا الحديث الذي أشار إليه العقيلي هو حديث آخر رواه الحسن بن عرفة، ومن طريقه الخطيب في"شرف أصحاب الحديث" (61) قال: حدثنا إسماعيل بن عياش الحمصي، عن المغيرة بن قيس التميمي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أي الخلق أعجب إليكم إيمانًا؟" قالوا: الملائكة، قال:"وما لهم لا يؤمنون وهم عند ربهم!" قالوا: فالنبيون؟ ، قال:"وما لهم لا يؤمنون والوحي ينزل عليهم!" قالوا: نحن، قال:"وما لكم لا تؤمنون وأنا بين أظهركم!"، قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن أعجب الخلق إليَّ إيمانًا، لَقَومٌ يكونون من بعدكُم، يجدونَ صُحُفًا، فيها كتابٌ، يؤمنون بما فيها".

وإسماعيل بن عياش ضعيفٌ في روايته عن غير الشاميين، وشيخه المغيرة بن قيس التميمي البصري ليس من الشاميين، ثم هو ضعيفٌ أيضًا.

قال أبو حاتم:"منكر الحديث"، الجرح والتعديل (8/ 227، 228).

وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي سعيد الخدريّ، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أنّ رجلًا قال له: يا رسول اللَّه، طوبى لمن رآك وآمن بك. قال:"طوبى لمن رآني وآمن بي، ثم طوبى ثم طوبى ثم طوبى لمن آمن بي ولم يرني". قال له رجل: وما طوبى؟ قال:"شجرة في الجنّة مسيرة مائة عام، ثياب أهل الجنة تخرج من أكمامها".

رواه الإمام أحمد (11673)، وأبو يعلى (1374) وصحّحه ابنُ حبان (7230، 7413) كلّهم من طرق عن درّاج أبي السّمح، أنّ أبا الهيثم حدّثه عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر مثله.

ودرّاج أبو السّمح يضعّف في روايته عن أبي الهيثم، ولكن رواه ابنُ أبي عاصم في السنة (1487) من وجه آخر عن وكيع، حدّثنا إبراهيم أبو إسحاق، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا مختصرًا بلفظ:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني". وهذه متابعة جيدة، إلّا أنّ إبراهيم أبا إسحاق ضعيف أيضًا.

ومنها: عن أنس بن مالك مرفوعًا:"طوبى لمن آمن بي ورآني مرة، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني" سبع مرار.

رواه الإمام أحمد (12578) عن هاشم بن القاسم، قال: حدّثنا جَسْرٌ، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

وجسر هو ابن فرقد القصّاب أبو جعفر، بصريّ، قال البخاريّ: ليس بذاك عندهم. وقال ابن معين -من وجوه عنه-: ليس بشيء. وقال النسائي: ضعيف. ترجمه الذّهبي في الميزان (1/ 398).

إلّا أنّه توبع فقد رواه أبو يعلى (3391) من طريق أبي عبيدة الحداد، عن محتسب بن عبد الرحمن، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

ومحتسب بن عبد الرحمن أبو عائذ، قال فيه ابنُ عدي: يروي عن ثابت أحاديث ليست
بمحفوظة، ومنها الحديث المذكور. انظر"الميزان" (3/ 442).

ومنها: جاء رجلٌ إلى ابن عمر فقال: يا أبا عبد الرحمن، أنتم نظرتم إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بأعينكم؟ قال: نعم. قال: وكلّمتموه بألسنتكم هذه؟ قال: نعم. قال: وبايعتُموه بأيمانكم هذه؟ قال: نعم. قال: طوبى لكم يا أبا عبد الرحمن. قال: أفلا أخبرك عن شيءٍ سمعته منه؟ سمعتُ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن لم يرني وآمَنَ بي". ثلاثًا.

رواه أبو داود الطّيالسّي في"مسنده" (1956) عن طلحة، عن نافع قال: جاء رجلٌ إلى ابن عمر، فذكره.

وأخرجه أيضًا ابنُ أبي عاصم في السنة (1529 - تحقيق: باسم) من طريق طلحة بن عمرو مختصرًا.

وإسناده ضعيف جدًا فإنّ طلحة بن عمرو الحضرميّ متروك. قال البوصيريّ في"إتحافه":"وقد أجمعوا على ضعفه". وأورده ابن الجوزيّ في"العلل المتناهية" (1/ 302) وقال:"هذا حديث لا يصح عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم".

وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني - سبع مرار".

رواه الإمام أحمد (22138)، والطّبرانيّ في الكبير (8/ 310)، وأبو داود الطّيالسيّ (1228)، وصحّحه ابنُ حبان (7233) كلّهم من طريق همّام، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي أمامة، فذكره.

وهمّام هو: ابن يحيى العوذيّ.

أيمن هو ابن مالك الأشعريّ كما قال ابن حبان وذكره في الثقات (4/ 48)، وترجمة الحافظ في"التعجيل" وقال:"وثّقه ابنُ حبان".

وفي الباب أيضًا عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبي -سبع مرّات- لمن آمن بي ولم يرني".

رواه ابن حبان في صحيحه (7232) من طريق أبي عامر العقديّ، حدّثنا همّام ابن يحيى، عن قتادة، عن أيمن، عن أبي هريرة، فذكره.

قال ابن حبان:"سمع هذا الخبر أيمن عن أبي هريرة وأبي أمامة معًا، وأيمن هذا هو أيمن بن مالك الأشعريّ".




আবু জুমআ হাবীব ইবনে সিবআ’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দুপুরের খাবার খাচ্ছিলাম, আর আমাদের সাথে আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের চেয়ে কি উত্তম কেউ আছে? আমরা আপনার সাথে ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং আপনার সাথে জিহাদ করেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এমন কিছু লোক থাকবে যারা তোমাদের পরে আসবে, তারা আমার প্রতি ঈমান আনবে, অথচ আমাকে দেখেনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (737)


737 - عن فضالة بن عبيد، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اللهمّ من آمن بك، وشهد أنّي رسولُك فحبِّبْ إليه لقاءك، وسهِّلْ عليه قضاءك، وأقْلل له من الدّنيا، ومن لم يؤمن بك، ولم يشهد أنّي رسولُك، فلا تُحبِّبْ إليه لقاءك، ولا تُسهِّل عليه قضاءك، وأكثرْ
له من الدُّنيا".

صحيح: رواه الطبرانيّ في الكبير (18/ 313) من طريق ابن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، عن أبي هانئ، عن عمرو بن مالك، عن فضالة بن عبيد، فذكره.

إسناده صحيح، وصحّحه ابنُ حبان (208)، ورواه من هذا الوجه.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 208) وقال:"رواه الطبرانيّ، ورجاله ثقات".




ফাদালাহ ইবনে উবায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে আল্লাহ! যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান এনেছে এবং সাক্ষ্য দিয়েছে যে আমি আপনার রাসূল, তার জন্য আপনার সাক্ষাতকে প্রিয় করে দিন, তার জন্য আপনার ফয়সালা সহজ করে দিন এবং তার জন্য দুনিয়া সীমিত করে দিন। আর যে ব্যক্তি আপনার প্রতি ঈমান আনেনি এবং সাক্ষ্য দেয়নি যে আমি আপনার রাসূল, তার জন্য আপনার সাক্ষাতকে প্রিয় করবেন না, তার জন্য আপনার ফয়সালা সহজ করবেন না এবং তার জন্য দুনিয়া বাড়িয়ে দিন।”









আল-জামি` আল-কামিল (738)


738 - عن جبير بن مطعم، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لي خمسةُ أسماء: أنا محمد، وأنا أحمد، وأنا الماحي الذي يمحو اللَّه بي الكفر، وأنا الحاشر الذي يُحشر الناس على قدمي، وأنا العاقب".

متفق عليه: رواه مالك في أسماء النّبيّ صلى الله عليه وسلم (1) عن ابن شهاب، عن محمد بن جبير بن مطعم، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).

هكذا في موطأ يحيى بن يحيى اللّيثيّ مرسلًا بدون ذكر"أبيه".

قال ابن عبد البر في"التمهيد" (9/ 151):"هكذا رواه يحيى مرسلًا، ولم يقل فيه"عن أبيه". وتابعه على ذلك أكثر الرّواة للموطأ. . . ورواه معن بن عيسى وغيره عن مالك موصولًا بذكر أبيه. ومن طريقه رواه البخاريّ في المناقب (3532).

وأمّا مسلم فرواه في الفضائل (2354) من طرف -غير مالك- عن الزّهريّ موصولًا وزاد تفسير العاقب بقوله:"والعاقب الذي ليس بعده نبي". وفي تفسير آخر:"ليس بعده أحد".

ورواه بإسناد آخر من طريق عُقَيْل وقال: وفي حديث عُقيل قال: قلت للزّهريّ:"وما العاقب؟ قال: الذي ليس بعده نبيٌّ".

وكذلك قال معمر للزّهريّ:"ما العاقب؟ قال: الذي ليس بعده نبيٌّ".

رواه عبد الرزّاق عنه في مصنفه (19657)، ومن طريقه مسلم إلّا أنّه لم يذكر سؤال معمر للزهريّ.

ولكن رواه الترمذيّ (2840) عن سعيد بن عبد الرحمن المخزوميّ، عن سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، بإسناده وفيه:"وأنا العاقب الذي ليس بعدي نبيٌّ". قال الترمذيّ"حسن صحيح". فجعل التّفسير مرفوعًا.

وسعيد بن عبد الرحمن المخزوميّ ثقة، وثّقه النسائيّ وقال مسلمة في كتاب"الصّلة":"هو ثقة في ابن عيينة، فلا يمكن ترجيح الوقف على الرّفع وإن كان الذين أوقفوه أكثر". ولذا قال الحافظ
في"الفتح" (6/ 557):"هو محتمل للرّفع والوقف".




জুবাইর ইবনু মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পাঁচটি নাম আছে: আমি মুহাম্মাদ, আমি আহমাদ, আমি আল-মাহী (যাকে দিয়ে আল্লাহ কুফরকে মিটিয়ে দেবেন), আমি আল-হাশির (যার পদতলে/পরে মানুষকে সমবেত করা হবে) এবং আমি আল-আকিব।"









আল-জামি` আল-কামিল (739)


739 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كانت بنو إسرائيل تسوسُهم الأنبياء، كلّما هلك نبيٌّ خلفه نبيٌّ، وأنّه لا نبي بعدي، وسيكون خلفاء فيكثرون". قالوا: فما تأمرنا؟ قال:"فوا ببيعة الأوّل فالأوّل، أعطوهم حقَّهم، فإنّ اللَّه سائلُهم عمّا اسْترعَاهُم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3455)، ومسلم في الإمارة (1842) كلاهما عن محمد بن بشّار، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن فُرات القزاز، قال: سمعت أبا حازم، قال: قاعدتُ أبا هريرة خمس سنين، فسمعتُه يحدّث عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال: فذكر مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বনী ইসরাঈলদেরকে নবীগণ নেতৃত্ব দিতেন (বা শাসন করতেন)। যখনই কোনো নবী মারা যেতেন, তখনই তাঁর স্থলাভিষিক্ত হতেন আরেকজন নবী। আর নিশ্চয়ই আমার পরে কোনো নবী নেই। (আমার পরে) খলীফাগণ হবেন এবং তারা সংখ্যায় অনেক হবে। সাহাবীগণ বললেন, আপনি আমাদেরকে কী আদেশ করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তোমরা প্রথমজনের পর প্রথমজনের (ধারাবাহিকভাবে) বাইয়াত পূর্ণ করবে। তোমরা তাদেরকে তাদের প্রাপ্য অধিকার দেবে। কেননা আল্লাহ তাদের ওপর অর্পিত দায়িত্ব সম্পর্কে তাদের কাছে কৈফিয়ত চাইবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (740)


740 - عن أبي هريرة، قال: فذكر حديث الشّفاعة بطوله وجاء فيه:

"فيقولون: يا محمد أنت رسول اللَّه وخاتم الأنبياء، وغفر اللَّه لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر اشفع لنا إلى ربِّك. . . .".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4712)، ومسلم في الإيمان (194) كلاهما من حديث أبي حيان التيميّ، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره بطوله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি শাফা’আত সংক্রান্ত দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং তাতে এসেছে:

"তারা বলবে: হে মুহাম্মাদ! আপনি আল্লাহর রাসূল এবং নবীগণের শেষ (খাতামুল আম্বিয়া)। আল্লাহ আপনার পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন। আপনি আমাদের জন্য আপনার রবের নিকট সুপারিশ করুন...।"









আল-জামি` আল-কামিল (741)


741 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"فضّلتُ على الأنبياء بستّ، فذكر الخصال الست". ومنها"وختم بي النّبيون".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (523) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে অন্য নবীদের উপর ছয়টি বিষয়ে শ্রেষ্ঠত্ব প্রদান করা হয়েছে।" অতঃপর তিনি সেই ছয়টি বৈশিষ্ট্য উল্লেখ করলেন। আর সেগুলোর মধ্যে একটি হলো: "আমার দ্বারাই নবুওয়াত শেষ করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (742)


742 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فإنّي آخر الأنبياء، وإنّ مسجدي آخر المساجد".

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1394) عن إسحاق بن منصور، حدّثنا عيسى بن المنذر الحمصيّ، حدّثنا محمد بن حرب، حدّثنا الزُّبيديُّ، عن الزّهريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وأبي عبد اللَّه الأغرّ مولى الجهنيين -وكان من أصحاب أبي هريرة- أنّهما سمعًا أبا هريرة يقول:"صلاةٌ في مسجد رسولِ اللَّه صلى الله عليه وسلم أفضلُ من ألف صلاةٍ فيما سواه من المساجد، إلّا المسجد الحرام. فإنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم آخرُ الأنبياء. وإنَّ مسجدَه آخرُ المساجد".

قال أبو سلمة وأبو عبد اللَّه: لم نَشُكَّ أنّ أبا هريرة كان يقول عن حديث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فمنعنا ذلك أن نسْتثبتَ أبا هريرة عن ذلك الحديث. حتّى إذا تُوفيّ أبو هريرة، تذاكرنا ذلك. وتلاوَمُنا أنْ لا نكونَ كلّمنا أبا هريرة في ذلك حتى يسنده إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إنْ كان سمعه منه. فبينا نحن على ذلك، جالَسَنَا عبد اللَّه بن إبراهيم بن قارظ، فذكرنا ذلك الحديث. والذي فرّطنا فيه من نصِّ أبي هريرة عنه، فقال لنا عبد اللَّه بن إبراهيم: أشهد أنّي سمعتُ أبا هريرة يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:
"فإنّي آخرُ الأنبياء، وإنّ مسجدي آخرُ المساجد".

وقوله:"إن مسجدي آخر المساجد" يريد به آخر المساجد للأنبياء من حيث التأسيس والبناء، إذ لا يأتي بعده نبي حتى يؤسس مسجدا جديدا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাসজিদে এক সালাত (নামায) আদায় করা মাসজিদুল হারাম ব্যতীত অন্য যে কোনো মাসজিদে এক হাজার সালাত (নামায) আদায় করার চেয়েও শ্রেষ্ঠ। কেননা, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সর্বশেষ নবী এবং তাঁর মাসজিদ সর্বশেষ মাসজিদ।

আবু সালামা ও আবু আবদুল্লাহ বলেন: আমাদের কোনো সন্দেহ ছিল না যে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই হাদীসটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন। তাই আমরা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এই হাদীসটি সম্পর্কে নিশ্চিত হতে চাইনি। এমনকি যখন আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, আমরা এ নিয়ে নিজেদের মধ্যে আলোচনা করলাম এবং আফসোস করলাম যে আমরা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে কথা বলিনি যাতে তিনি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত সনদসহ বর্ণনা করেন, যদি তিনি তা তাঁর কাছ থেকে শুনে থাকেন। আমরা যখন এ অবস্থায় ছিলাম, তখন আবদুল্লাহ ইবনে ইব্রাহীম ইবনে ক্বারিয আমাদের মজলিসে আসলেন। আমরা তাঁকে ঐ হাদীসটি এবং আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে এর স্পষ্ট নির্দেশনা না নেওয়ার ত্রুটির কথা উল্লেখ করলাম। তখন আবদুল্লাহ ইবনে ইব্রাহীম আমাদের বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমি সর্বশেষ নবী এবং নিশ্চয়ই আমার মাসজিদ সর্বশেষ মাসজিদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (743)


743 - عن ثوبان، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقومُ السّاعةُ حتى تلحق قبائلُ من أمّتي بالمشركين، وحتّى يعبدوا الأوثان، وإنّه سيكون في أمّتي ثلاثون كذّابون كلّهم يزعم أنّه نبيٌّ، وأنا خاتم الأنبياء لا نبيّ بعدي".

صحيح: رواه أبو داود (4252)، والترمذيّ (2219)، والإمام أحمد (22394)، كلّهم من طرق عن حمّاد بن زيد، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء عمرو بن مرثد الرحبيّ، عن ثوبان، ذكر الحديث، واللّفظ للترمذيّ ولفظهما مطوّل، وسيأتي في كتاب الفتن إن شاء اللَّه تعالى.

وصحّحه ابن حبان (1714)، والحاكم (4/ 429) كلاهما من وجه آخر عن أبي قلابة عبد اللَّه بن زيد الجرميّ، بإسناده في سياق طويل.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه بهذه السّياقة، وإنما أخرج مسلم (2889) حديث معاذ بن هشام، عن قتادة، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء الرّحبيّ، عن ثوبان مختصرًا".

قلت: وهو كما قال، وقد رواه مسلم أيضًا من طرق عن حماد بن زيد بإسناده مختصرًا (1920) ومطوّلًا (2889)، وابن ماجه (3952) من طريق أبي قلابة الجرميّ ولم يذكر موضع الشّاهد وهو قول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أنا خاتم النّبيين".




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামত ততক্ষণ পর্যন্ত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না আমার উম্মতের কিছু গোত্র মুশরিকদের সাথে মিশে যাবে এবং মূর্তিপূজা শুরু করবে। আর নিশ্চয়ই আমার উম্মতের মধ্যে ত্রিশজন মিথ্যাবাদী আবির্ভূত হবে, যাদের প্রত্যেকেই দাবি করবে যে সে নবী। অথচ আমিই শেষ নবী, আমার পরে কোনো নবী নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (744)


744 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ مثلي ومثلَ الأنبياء من قبلي، كمثل رجلٍ بنى بيتًا فأحسنه وأجمله إلّا موضع لبنة من زاوية، فجعل النّاس يطوفون به ويعجبون له، ويقولون: هلّا وُضِعتْ هذه اللّبنة؟ قال: وأنا اللّبنة، وأنا خاتم النّبيين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3535)، ومسلم في الفضائل (2286: 22) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (7322) عن سفيان، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكر مثله غير أن فيه:"إلّا هذه الثُّلْمة، فأنا تلك الثُّلمة".

ومن هذا الطّريق أخرجه أيضًا مسلم غير أنه ذكر مثل الطريق الأول وهو"اللّبنة".

و"الثُّلمة" بالضّم -فُرْجة المكسور والمهدوم- أي إلّا هذا الموضع الذي فيه ثلمة في البنيان.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আমার উদাহরণ এবং আমার পূর্ববর্তী নবীদের উদাহরণ হলো, এমন এক ব্যক্তির মতো, যে একটি ঘর নির্মাণ করলো এবং তা সুন্দর ও সুসজ্জিত করলো, কিন্তু এক কোণে একটি ইটের স্থান খালি রেখে দিল। অতঃপর লোকেরা সেটির চারপাশে ঘুরে বেড়াতে লাগলো এবং এর সৌন্দর্য দেখে মুগ্ধ হচ্ছিল, আর তারা বলছিল: এই ইটটি কেন স্থাপন করা হলো না? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমিই সেই ইট, আর আমিই শেষ নবী।"









আল-জামি` আল-কামিল (745)


745 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"مثلي ومثل الأنبياء كرجل بني دارًا فأكملها وأحسنها، إلّا موضع لبنة، فجعل النّاسُ يدخلونها ويتعجّبون ويقولون: لولا موضع اللّبنة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3534)، ومسلم في الفضائل كلاهما من حديث سليم ابن حبّان، حدّثنا سعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উপমা এবং অন্যান্য নবীদের উপমা হলো এমন এক ব্যক্তির মতো, যে একটি গৃহ নির্মাণ করল এবং তা সম্পূর্ণ করল ও সুন্দর করল, কিন্তু একটি ইটের স্থান ছাড়া। অতঃপর লোকজন তাতে প্রবেশ করতে লাগল এবং বিস্মিত হতে লাগল এবং বলতে লাগল: যদি এই ইটের জায়গাটি না থাকত (তবে এটি পুরোপুরি নিখুঁত হতো)।"









আল-জামি` আল-কামিল (746)


746 - عن أبي سعيد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مثلي ومثلُ الأنبياء من قبلي كمثل رجل بني بنيانًا، فأحسنه وأجمله إلّا موضع لبنة من زاوية من زواياه، فجعل النّاس يطوفون به ويعجبون له، ويقولون: هلّا وُضعتْ هذه اللّبنةُ؟ قال: فأنا اللَّبنة، وأنا خاتم الأنبياء".

صحيح: رواه مسلمٌ في الفضائل (2286) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد، فذكره.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উপমা এবং আমার পূর্ববর্তী অন্যান্য নবীদের উপমা হলো এমন এক ব্যক্তির মতো, যে একটি ইমারত নির্মাণ করল। সে সেটিকে খুব সুন্দর ও চমৎকারভাবে তৈরি করল, কিন্তু তার এক কোণে একটি ইটের স্থান খালি রেখে দিল। তখন লোকেরা তার আশেপাশে ঘুরে দেখতে লাগল এবং বিস্মিত হয়ে বলতে লাগল: কেন এই ইটটি স্থাপন করা হলো না? তিনি বলেন: সুতরাং আমিই সেই ইট, আর আমিই হলাম সর্বশেষ নবী।"









আল-জামি` আল-কামিল (747)


747 - عن أُبي بن كعب، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"مثلي في النّبيين كمثل رجل بني دارًا فأحسنها وأكملها وجمَّلها، وترك منها موضع لبنةٍ، فجعل النّاسُ يطوفون بالبناء ويعجبون منه ويقولون: لو تمّ موضع تلك اللّبنة، وأنا في النّبيين بموضع تلك اللّبنة".

حسن: رواه الترمذيّ (3613) عن محمد بن بشّار، حدّثنا أبو عامر، حدّثنا زهير بن محمد، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن الطّفيل بن أبي بن كعب، عن أبيه، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (21243) من طريق أبي عامر، به، مثله.

قال الترمذيّ:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال، فإنّ عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، مختلف فيه غير أنّه حسن الحديث.

وفي الباب عن جابر بن عبد اللَّه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أنا قائدُ المرسلين ولا فخر، وأنا خاتم النّبيين ولا فخر، وأنا أوّل شافع، وأوّل مشفَّع ولا فخر".

رواه الدّارميّ (50)، والطبرانيّ في الأوسط (172)، والبيهقي في الاعتقاد (ص 192)، وفي دلائله (5/ 480) كلّهم من طرق عن بكر بن مضر، عن جعفر بن ربيعة، عن صالح بن عطاء بن خباب مولى بني الدئل، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر، فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (8/ 254):"رواه الطبراني في"الأوسط" وفيه صالح بن عطاء بن خباب، ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات". قلت: كذا قال، مع أنه مترجم في"الثقات" (6/ 455) وهو عمدته في توثيق الرّجال، فلعلّ النّسخة التي عنده سقط منها ترجمته، ثم لم أقف على توثيقه من غير ابن حبان، ولم يذكر من روى عنه سوى جعفر بن ربيعة فهو في عداد المجهولين.
ولا يصح ما رُوي عن عقبة بن عامر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لو كان بعدي نبيٌّ لكان عمر بن الخطّاب".

رواه الترمذيّ (3686)، والإمام أحمد (17405)، والحاكم (3/ 85) كلّهم من طريق أبي عبد الرحمن المقرئ، عن حيوة، عن بكر بن عمرو، عن مشرح بن هاعان، عن عقبة بن عامر، فذكر الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث مشرح بن هاعان".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: فيه مشرح بن هاعان وإن كان ابنُ معين وثّقه إلّا أنّه يخالف ويخطئ ولذا قال ابن حبان في المجروحين (1066) يروي عن عقبة بن عامر أحاديث مناكير، لا يتابع عليها، والصّواب في أمره ترك ما ينفرد من الروايات، والاعتبار بما وافق الثقات فيها".

وهنا تفرّد بهذا الحديث، ولم أجد له متابعًا، وقد أكّد الترمذيّ أنه من حديث مشرح بن هاعان، وقد سئل الإمام أحمد عن هذا الحديث فقال: اضرب عليه، فإنّه عندي منكر". المنتخب من العلل للمقدسيّ




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীগণের মধ্যে আমার উপমা হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি গৃহ নির্মাণ করে তা সুন্দর, সম্পূর্ণ ও সুসজ্জিত করল, কিন্তু তার মধ্যে একটি ইটের স্থান খালি রাখল। তখন লোকজন গৃহের চারদিকে প্রদক্ষিণ করতে লাগলো এবং সেটির সৌন্দর্য দেখে মুগ্ধ হতে লাগলো এবং তারা বলতে লাগলো: ‘যদি কেবল ঐ ইটের জায়গাটি পূর্ণ হতো!’ আর আমি নবীগণের মধ্যে সেই ইটের স্থানটিতে (রয়েছি)।”