হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7101)


7101 - عن عدي بن حاتم قال: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قلتُ: إنا قوم نصيد بهذه الكلاب. قال:"إذا أرسلت كلابك المعلمة، وذكرت اسم الله، فكل مما أمسكن عليكم، وإن قتلن إلا أن يأكل الكلب، فإني أخاف أن يكون إنما أمسكه على نفسه، وإن خالطها كلاب من غيرها فلا تأكل".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5483)، ومسلم في الصيد والذبائح (1929: 2) كلاهما من طريق محمد بن فضيل، عن بيان، عن الشعبي، عن عدي بن حاتم، فذكره.

قال النووي:"وهو صريح في منع أكل ما أكلت منه الجارحة، وبه قال أكثر العلماء منهم: ابن عباس، وأبو هريرة، وعطاء، وسعيد بن جبير، والحسن، والشعبي، والنخعي، وعكرمة، وقتادة، وأبو حنيفة وأصحابه، وأحمد وإسحق، وأبو ثور، وابن المنذر، وداود … واحتجوا بقوله تعالى: {فَكُلُوا مِمَّا أَمْسَكْنَ عَلَيْكُمْ} وهذا مما لم يمسك علينا، بل على نفسه". اهد. شرح مسلم (13/ 75).




আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: আমরা এমন এক জাতি যারা এসব কুকুর দ্বারা শিকার করি। তিনি বললেন: যখন তোমরা তোমাদের প্রশিক্ষণপ্রাপ্ত কুকুরগুলোকে শিকারের জন্য প্রেরণ করবে এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করবে, তখন তারা তোমাদের জন্য যা ধরে আনে তা তোমরা খাও, যদিও তারা সেটিকে মেরে ফেলে— তবে যদি কুকুরটি তা থেকে খেয়ে ফেলে (তাহলে খেও না)। কারণ আমি আশঙ্কা করি যে, সেক্ষেত্রে কুকুরটি কেবল নিজের জন্যই শিকার ধরেছিল। আর যদি অন্য কোনো কুকুর তাদের সাথে মিশে যায়, তবে তোমরা খেও না।









আল-জামি` আল-কামিল (7102)


7102 - عن عدي بن حاتم قال: قلتُ: يا رسول الله، أرمي الصيدَ فأجدُ فيه من الغد سهمي؟ قال:"إذا علمتَ أن سهمك قتله، ولم ترَ فيه أثرَ سبعٍ فكُلْ".

صحيح: رواه الترمذي (1468)، والنسائي (4312) من طريق شعبة - والنسائي (4311)، وأحمد (19369) من طريق هشيم - كلاهما عن أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن عدي بن حاتم، فذكره.

وإسناده صحيح، وأبو بشر جعفر بن إياس اليشكري، ثقة من أثبت الناس في سعيد بن جبير.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم".

وأما ما رويَ عن عدي بن حاتم قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صيد البازي؟ فقال:"ما أمسك عليك فكُلْ" فهو شاذ بذكر البازي.

رواه الترمذي (1467) من طريق عيسى بن يونس، عن مجالد، عن الشعبي، عن عدي بن حاتم، فذكره.

ورواه أبو داود (2851)، وأحمد (18258) من طريق عبد الله بن نمير، ثنا مجالد به، فذكراه مطولًا، وهو عند أحمد أطول، وفيه: إنا قوم نتصيد بهذه الكلاب، والبزاةَ فما يحل لنا منها؟

وقال الترمذي: هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث مجالد عن الشعبي". ورواه البيهقي (9/ 238) من طريق أبي داود ثم قال:"ذكر البازي في هذه الرواية لم يأت به الحفاظ عن الشعبي، وإنما أتى به مجالد" اهـ.

قلت: ومجالد هو ابن سعد الهمداني الكوفي ضعيف.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر بن عبد الله قال: نهينا عن صيد كلب المجوس.

رواه الترمذي (1416)، وابن ماجه (3209) من طريق وكيع، ثنا شريك، عن حجاج بن أرطاة، عن القاسم بن أبي بزّة، عن سليمان اليشكري، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وإسناده ضعيف، فيه علتان: شريك هو ابن عبد الله النخعي القاضي سيء الحفظ، وحجاج بن أرطاة مدلس وقد عنعن. ولذا ضعّفه الترمذي بقوله:"حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

قال:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم، لا يرخصون في صيد كلب المجوس" اهـ.

قال ابن عبد البر في الاستذكار (15/ 295 - 296):"وأما صيد المسلم بكلب المجوسي، فالاختلاف فيه قديم، كرهتْه طائفةٌ ولم تجزه، وأجازه آخرون، فممن كرهه جابر بن عبد الله صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم، والحسن البصري، وعطاء، ومجاهد، وإبراهيم النخعي، وسفيان الثوري، وإليه ذهب إسحاق بن راهويه …

وخالفهم آخرون فقالوا: تعليم المجوسي له وتعليم المسلم سواء، وإنما الكلب كآلة الذبح والذكاة، وممن ذهب إلى هذا سعيد بن المسيب، وابن شهاب والحكم، وعطاء - وهو الأصح عنه - وهو قول مالك والشافعي وأبي حنيفة وأصحابهم" اهـ.




আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি শিকারের দিকে তীর নিক্ষেপ করি, কিন্তু পরদিন আমি তাতে আমার তীর দেখতে পাই (তখন কি করব)?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি জানতে পারো যে তোমার তীরই সেটিকে হত্যা করেছে এবং তাতে কোনো হিংস্র পশুর আঘাতের চিহ্ন না দেখো, তবে তুমি তা খাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7103)


7103 - عن عبد الله بن عمرو أن أعرابيا يقال له: أبو ثعلبة قال: يا رسول الله! إن لي كلابا مكلبة فأفتني في صيدها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنْ كان لك كلاب مكلبة فكل مما أمسكن عليك". قال: ذكيا أو غير ذكي؟ قال:"نعم". قال: فإن أكل منه قال:"وإن أكل منه". قال: يا رسول الله، أَفْتِني في قوسي. قال:"كل ما ردت عليك قوسك". قال:"ذكيا أو غير ذكي". قال: وإن تغيب عني؟ قال:"وإن تغيب عنك ما لم يصل أو تجد فيه أثرا غير سهمك". قال أَفْتِني في آنية المجوس إذا اضطررنا إليها؟ قال:"اِغْسِلْها وكُلْ فيها".

حسن: رواه أبو داود (2857)، وأحمد (6725)، والدارقطني (4797) كلهم من طريق حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره. وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن شعيب غير أنه حسن الحديث.

قال ابن عبد الهادي في التنقيح (4/ 627): وحديث عمرو بن شعيب إسناده صحيح إليه، فمن احتج بعمرو فهو صحيح عنده" اهـ.

قلت: وإلى هذا ذهب مالك، ورواية عن أحمد، وقول ضعيف للشافعي، وحملوا النهي في حديث عدي بن حاتم على كراهة التنزيه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সা’লাবা নামক এক বেদুঈন বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার শিকারি কুকুর আছে। এগুলোর শিকার সম্পর্কে আমাকে ফতোয়া দিন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমার শিকারি কুকুর থাকে, তবে যা তারা তোমার জন্য ধরে আনে, তা তুমি খেতে পারো।" সে বলল: যবেহ করা হোক বা না হোক? তিনি বললেন: "হ্যাঁ (খেতে পারো)।" সে বলল: যদি তা (কুকুর) সেখান থেকে খায়? তিনি বললেন: "যদি তা সেখান থেকে খায়, তবুও (খেতে পারো)।" সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমার ধনুক (দ্বারা শিকার) সম্পর্কে আমাকে ফতোয়া দিন। তিনি বললেন: "তোমার ধনুক যা তোমার জন্য ফিরিয়ে আনে, তা তুমি খাও।" সে বলল: যবেহ করা হোক বা না হোক? সে বলল: যদি তা আমার থেকে অনুপস্থিত হয়ে যায়? তিনি বললেন: "যদি তা তোমার থেকে অনুপস্থিতও হয়ে যায়, তবুও (খেতে পারো), যতক্ষণ না তা পচে যায় অথবা তুমি তোমার তীর ব্যতীত অন্য কোনো আঘাতের চিহ্ন খুঁজে পাও।" সে বলল: যদি আমরা অগ্নিপূজকদের (মাজুসদের) বাসন-কোসন ব্যবহার করতে বাধ্য হই, তবে সে সম্পর্কে আমাকে ফতোয়া দিন। তিনি বললেন: "তা ধুয়ে নেবে এবং তাতে খাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7104)


7104 - عن أبي ثعلبة الخشني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في صيد الكلب:"إذا أرسلتَ كلبك، وذكرتَ اسم الله تعالى فكل، وإن أكل منه، وكُلْ ما ردتْ عليك يدُك".

حسن: رواه أبو داود (2852) عن محمد بن عيسى، ثنا هشيم، ثنا داود بن عمرو، عن بُسر بن عبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي ثعلبة الخشني فذكره. وأخرجه البيهقي (9/ 237) من طريق أبي داود.

وإسناده حسن من أجل داود بن عمرو، وهو الدمشقي، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وحسّن إسناده أيضا ابن عبد الهادي في التنقيح (4/ 626).




আবূ সা'লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শিকারী কুকুর সম্পর্কে বলেছেন: "যখন তুমি তোমার কুকুরকে (শিকারের জন্য) পাঠাও এবং আল্লাহর নাম উচ্চারণ করো, তখন তুমি তা খাও, যদিও কুকুর তা থেকে খেয়ে ফেলে। আর তোমার হাত (অর্থাৎ, যা তুমি শিকার হিসেবে) ফিরিয়ে আনে, তা-ও খাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7105)


7105 - عن عدي بن حاتم قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن صيد المعراض؟ قال:"ما أصاب بحده فكله، وما أصاب بعرضه فهو وقيذ". وسألته عن صيد الكلب؟ فقال:"ما أمسك عليك فكل، فإنّ أخذ الكلب ذكاة، وإن وجدتَ مع كلبك أو كلابك كلبا غيره فخشيت أن يكون أخذه معه، وقد قتله، فلا تأكل، فإنما ذكرت اسم الله على كلبك،
ولم تذكره على غيره".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5475)، ومسلم في الصيد والذبائح (1929: 4) كلاهما من طريق زكريا، عن عامر الشعبي، عن عدي بن حاتم فذكره.




আদী ইবনে হাতেম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মি‘রাদ (তীর নিক্ষেপের ভোঁতা সরঞ্জাম) দ্বারা শিকার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন, “যা এর ধারালো অংশে আঘাত করবে, তা খাও। আর যা এর চওড়া বা ভোতা অংশে আঘাত করবে, তা হলো ওয়াখীয (আঘাতে নিহত, যা খাওয়া হারাম)।” আর আমি তাঁকে শিকারী কুকুর দ্বারা শিকার করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন, “যা সে (শিকারী কুকুর) তোমার জন্য ধরে আনে, তা খাও। কেননা কুকুরের শিকার করাটাই হলো যবাহ (যাকাত)। আর যদি তুমি তোমার কুকুর বা কুকুরগুলোর সাথে অন্য কোনো কুকুর পাও, আর তুমি আশঙ্কা করো যে সেটিও এর সাথে ধরেছে এবং এটিকে মেরে ফেলেছে, তাহলে তা খেয়ো না। কেননা তুমি তো আল্লাহর নাম উচ্চারণ করেছো কেবল তোমার কুকুরের উপর, অন্যটির উপর নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (7106)


7106 - عن عدي بن حاتم أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصيد، فقال:"إذا أرسلتَ كلبك فخالطتْه أكلبٌ لم تُسمِّ عليها فلا تأكلْ، فإنك لا تدري أيهما قتله".

صحيح: رواه النسائي (4268)، وأحمد (18259) كلاهما من طريق معمر، عن عاصم بن سليمان، عن عامر الشعبي، عن عدي بن حاتم، فذكره. وإسناده صحيح.




আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শিকার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি বললেন: "যখন তুমি তোমার শিকারী কুকুরকে প্রেরণ করো আর এর সাথে এমন অন্য কুকুর মিশে যায় যার উপর তুমি আল্লাহর নাম নাওনি, তবে তুমি তা খেয়ো না, কেননা তুমি জানো না যে সেগুলোর মধ্যে কোনটি শিকারটিকে হত্যা করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7107)


7107 - عن عدي بن حاتم، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أرسلت كلبك وسميت فأمسك وقتل، فكُلْ، وإن أكل فلا تأكل، فإنما أمسك على نفسه، وإذا خالط كلابا لم يذكر اسم الله عليها فأمسكن وقتلن فلا تأكل، فإنك لا تدري أيها قتل، وإن رميت الصيد فوجدته بعد يوم أو يومين، ليس به إلا أثر سهمك، فكُلْ، وإن وقع في الماء فلا تأكل".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5484)، ومسلم في الصيد والذبائح (1929: 6) كلاهما من طريق عاصم، عن الشعبي، عن عدي بن حاتم فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم:"فإنْ غاب عنك يوما".

وفي معناه روي عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أرسلت الكلب فأكل من الصيد فلا تأكل، فإنما أمسك على نفسه، وإذا أرسلت فقتل ولم يأكل فكل، فإنما أمسك على صاحبه".

رواه أحمد (2049) عن أسباط، حدثنا أبو إسحاق الشيباني، عن حماد، عن إبراهيم، عن ابن عباس، فذكره.

وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي، فقيه أهل الكوفة، ولكنه لم يحدث عن أحد من أصحاب النبي، صلى الله عليه وسلم، وقد أدرك منهم جماعة، ورأى عائشة رؤيا، كما قاله أحمد بن عبد الله العجلي يعني: فيه انقطاع بينه وبين ابن عباس.




আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি তোমার কুকুরকে (শিকারের জন্য) পাঠালে এবং (আল্লাহর) নাম নিলে, আর সে শিকারকে ধরে রাখল ও হত্যা করল, তখন তুমি তা খাও। কিন্তু যদি সে তা থেকে খেয়ে ফেলে, তবে তা খেয়ো না। কারণ সে কেবল নিজের জন্যই তা ধরে রেখেছিল। আর যখন (শিকারের সময়) তা এমন কুকুরের সাথে মিশে গেল যার উপর আল্লাহর নাম নেওয়া হয়নি, অতঃপর তারা (সকলে) মিলে শিকার ধরে রাখল এবং হত্যা করল, তবে তা খেয়ো না। কারণ তুমি জানো না যে তাদের মধ্যে কোনটি (আসলে) হত্যা করেছে। আর যদি তুমি শিকারকে তীর ছুঁড়ে মারো এবং একদিন বা দুইদিন পর তা পাও, আর তাতে তোমার তীরের আঘাত ছাড়া অন্য কোনো আঘাত না থাকে, তবে তা খাও। কিন্তু যদি তা পানিতে পড়ে যায়, তবে তা খেয়ো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7108)


7108 - عن عدي أنه قال للنبي صلى الله عليه وسلم: يرمي الصيدَ فيَقْتَفِرُ أثرُه اليومين والثلاثة، ثم يجده ميتا وفيه سهمُه؟ قال:"يأكل إن شاء".

صحيح: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5485) تعليقًا قال: وقال عبد الأعلى: عن داود (هو ابن أبي هند)، عن عامر (هو الشعبي) عن عدي فذكره. ووصله أبو داود (2853) عن الحسين بن معاذ بن خُليف، قال: حدثنا عبد الأعلى به مثله.

إلا أنه قال:"فيقتفي"بدل"فيقتفر" وهي رواية في البخاري والمعنى واحد، أي يتّبع. فتح الباري (9/ 611). وإسناده صحيح.




আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: (যদি কোনো ব্যক্তি) শিকারকে তীর মারে এবং দুই বা তিন দিন ধরে তার চিহ্ন অনুসরণ করে, অতঃপর সেটিকে মৃত অবস্থায় পায় এবং তাতে তার তীরটি বিদ্ধ থাকে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে চায়, তবে খেতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7109)


7109 - عن أبي ثعلبة الخشني، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا رميتَ بسهمك فغاب عنك فأدركته فكُله ما لم يُنتِنْ".

وفي رواية: في الذي يدرك صيده بعد ثلاث:"فكُلْه ما لم يُنتِنْ".

وزاد في رواية:"وسهمك فيه".

صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1931: 9) عن محمد بن مهران الرازي، حدثنا أبو عبد الله حماد بن خالد الخيّاط، عن معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جُبير، عن أبيه، عن أبي ثعلبة، فذكره.

والرواية الأخرى من طريق معن بن عيسى، عن معاوية به.

والزيادة الأخيرة لأبي داود (2861) من طريق حماد بن خالد به.

الأصل فيه فساد الصيد وعدم فساده فإذا وجده غير فاسد فليأكل وإلا فلا يأكل.




আবু সা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তুমি তোমার তীর নিক্ষেপ করো এবং তা তোমার দৃষ্টির আড়ালে চলে যায়, অতঃপর তুমি তা খুঁজে পাও, তবে তা খাও, যতক্ষণ না তা দুর্গন্ধযুক্ত হয়।"

অন্য এক বর্ণনায়, যে তিন দিন পর তার শিকার খুঁজে পায়, তার সম্পর্কে বলা হয়েছে: "তা খাও, যতক্ষণ না তা দুর্গন্ধযুক্ত হয়।"

এবং অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: "আর তোমার তীর তার (শিকারের) মধ্যে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7110)


7110 - عن عدي بن حاتم قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصيد؟ قال:"إذا رميت سهمك فاذكر اسم الله، فإن وجدته قد قتل فكل، إلا أن تجده قد وقع في ماء، فإنك لا تدري، الماءُ قتله أو سهمُك؟".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5484)، ومسلم في الصيد والذبائح (1929: 7) كلاهما من طريق عاصم، عن الشعبي، عن عدي بن حاتم، فذكره. واللفظ لمسلم.




আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শিকার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "যখন তুমি তোমার তীর নিক্ষেপ করো, তখন আল্লাহর নাম স্মরণ করো (বিসমিল্লাহ বলো)। অতঃপর তুমি যদি তা নিহত অবস্থায় পাও, তবে খাও। তবে যদি তুমি এটিকে পানিতে পড়ে থাকতে দেখো, (তাহলে খেও না) কারণ তুমি জানো না যে পানি তাকে মেরেছে নাকি তোমার তীর?"









আল-জামি` আল-কামিল (7111)


7111 - عن عدي بن حاتم قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المعراض؟ قال:"إذا أصبتَ بحدّه فكل، فإذا أصاب بعرضه فقتل فإنه وقيذ، فلا تأكل".

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5476)، ومسلم في الصيد والذبائح (1929: 3) كلاهما من طريق شعبة، عن عبد الله بن أبي السفر، عن الشعبي قال: سمعت عدي بن حاتم، فذكره.

وقوله:"وقيذ" بالقاف وآخره ذال معجمة وزن عظيم فعيل بمعنى مفعول، وهو ما قُتل بعصا أو حجر أو ما لا حدَّ له.

وقوله:"المعراض": في معناه عدة أقوال لكن المشهور أنه خشبة ثقيلة آخرها عصا محدَّد رأسها، وقد لا يحدَّد.




আদি ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মি‘রাদ (শিকারের জন্য ব্যবহৃত ভোঁতা অস্ত্র) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যদি তুমি এর ধারালো দিক দিয়ে আঘাত করে শিকার করো, তবে তা খাও। কিন্তু যদি এর পাশের অংশ (ভোঁতা দিক) দিয়ে আঘাত লাগে এবং (শিকার) মারা যায়, তবে তা ‘ওয়াকিয’ (ভোঁতা আঘাতে নিহত) হিসেবে গণ্য হবে, অতএব তা খেয়ো না।









আল-জামি` আল-কামিল (7112)


7112 - عن عبد الله بن مغفّل أنه رأى رجلا يخذف فقال له: لا تخذف، فإن رسول الله
- صلى الله عليه وسلم نهى عن الخذف، أو كان يكره الخذف. وقال:"إنه لا يصاد به صيدٌ، ولا ينكى به عدو، ولكنها قد تكسر السن وتفقأ العين". ثم رآه بعد ذلك يخذف فقال له: أحدثك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن الخذف - أو كره الخذف - وأنت تخذف لا أكلمك كذا وكذا.

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5479)، ومسلم في الصيد والذبائح (1954: 54) كلاهما من طريق كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن مغفل فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দেখলেন যে, একজন লোক পাথর ছুড়ে মারছে (আঙুলের সাহায্যে ছোট পাথর ছুঁড়ছে—খাযফ করছে), তখন তিনি তাকে বললেন: তুমি পাথর ছুড়ে মেরো না। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাথর ছুড়ে মারতে নিষেধ করেছেন, অথবা তিনি পাথর ছুড়ে মারা অপছন্দ করতেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় এর দ্বারা কোনো শিকার ধরা যায় না এবং এর দ্বারা কোনো শত্রুকেও প্রতিহত করা যায় না। তবে এটি দাঁত ভেঙে দিতে পারে এবং চোখ নষ্ট করে দিতে পারে।" এরপর তিনি তাকে আবার পাথর ছুড়তে দেখে বললেন: আমি তোমার কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদিস বর্ণনা করলাম যে, তিনি পাথর ছুড়ে মারতে নিষেধ করেছেন—অথবা তিনি তা অপছন্দ করেছেন—আর তুমি এখনো তা করছো? আমি তোমার সাথে এত এত দিন কথা বলব না।









আল-জামি` আল-কামিল (7113)


7113 - عن هشام بن زيد بن أنس بن مالك قال: دخلت مع جدي أنس بن مالك دار الحكم بن أيوب، فإذا قوم قد نصبوا دجاجةً يرمونها قال: فقال أنس: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تصبر البهائم.

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5512)، ومسلم في الصيد والذبائح (1956) كلاهما من طريق شعبة قال: سمعت هشام بن يزيد بن أنس بن مالك قال فذكره. واللفظ لمسلم.

قوله:"أن تصبر البهائم" أي تحبس لتُرمي حتى تموت، وأصل الصبر الحبس.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিশাম ইবনু যায়দ ইবনু আনাস ইবনু মালিক বলেন, আমি আমার দাদা আনাস ইবনু মালিকের সঙ্গে হাকাম ইবনু আইয়ূবের বাড়িতে প্রবেশ করলাম। সেখানে দেখলাম একদল লোক একটি মুরগিকে বেঁধে নিশানা বানিয়ে তীর নিক্ষেপ করছে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পশুকে বেঁধে রেখে লক্ষ্যবস্তু বানাতে (জীবন্ত কষ্ট দিয়ে মারতে) নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7114)


7114 - عن سعيد بن جبير قال: كنت عند ابن عمر فمروا بفتية - أو بنفر - نصبوا دجاجة يرمونها، فلما رأوا ابنَ عمر تفرّقوا عنها، وقال ابن عمر: من فعل هذا؟ إن النبي صلى الله عليه وسلم لعن من فعل هذا.

متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5515)، ومسلم في الصيد والذبائح (1958: 59) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن أبي بشر، عن سعيد بن جبير، قال فذكره. والسياق للبخاري.

وفي لفظ لمسلم من طريق هشيم عن أبي بشر، عن سعيد بن جبير قال: مرَّ ابن عمر بفتيانٍ من قريش قد نصبوا طيرًا، وهم يرمونه، وقد جعلوا لصاحب الطير كل خاطئة من نبلهم فلما رأوا ابنَ عمر تفرّقوا فقال ابن عمر: من فعل هذا؟ لعن الله من فعل هذا. إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لعن من اتخذ شيئا فيه الروح غرضا.




আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। এক সময় তাদের পাশ দিয়ে কতিপয় যুবক যাচ্ছিল—অথবা কিছু লোক—যারা একটি মুরগিকে নিশানা বানিয়ে তীর মারছিল। যখন তারা ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেল, তখন তারা সেখান থেকে সরে পড়ল। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কে এটা করেছে? নিশ্চয়ই নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এমন কাজ যে করে, তাকে অভিশাপ দিয়েছেন।

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কে এটা করেছে? আল্লাহ তাকে অভিশাপ দিন যে এটা করেছে। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেই ব্যক্তিকে অভিশাপ দিয়েছেন যে কোনো রূহবিশিষ্ট বস্তুকে (প্রাণীকে) লক্ষ্যবস্তু (নিশানা) বানায়।









আল-জামি` আল-কামিল (7115)


7115 - عن ابن عمر أنه دخل على يحيى بن سعيد، وغلام من بني يحيى رابط دجاجة يرميها، فمشى إليها ابن عمر حتى حلَّها، ثم أقبل بها وبالغلام معه، فقال: ازجروا غلامكم عن أن يصبر هذا الطير للقتل، فإني سمعت النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن تصبر بهيمة أو غيرها للقتل.
صحيح: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5514) عن أحمد بن يعقوب، أخبرنا إسحاق بن سعيد بن عمرو، عن أبيه أنه سمعه يحدث عن ابن عمر فذكره.

وقوله:"دخل على يحيى بن سعيد" أي ابن العاص بن سعيد بن أمية القرشي الأموي، وهو أخو عمرو بن سعيد الأشدق، وكان يحيى بن سعيد قد ولي إمرة المدينة، وكذا أخوه عمرو.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদের কাছে প্রবেশ করলেন। তখন ইয়াহইয়ার গোত্রের একটি বালক একটি মুরগিকে বেঁধে রেখে সেটিকে তীর ছুঁড়ছিল। ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটির কাছে গেলেন এবং সেটিকে খুলে দিলেন। এরপর তিনি মুরগিটি এবং বালকটিকে সাথে নিয়ে ফিরে এলেন এবং বললেন: তোমরা তোমাদের এই বালকটিকে তিরস্কার করো, যেন সে এই পাখিটিকে এভাবে হত্যার জন্য লক্ষ্যবস্তু হিসেবে বেঁধে না রাখে। কারণ, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শুনেছি যে তিনি কোনো পশু বা অন্য কিছুকে হত্যার জন্য বেঁধে রাখতে (লক্ষ্যবস্তু বানাতে) নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7116)


7116 - عن ابن عمر أنه مرّ على قوم وقد نصبوا دجاجةً حيّةً يرمونها، فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لعن من مثّل بالبهائم.

صحيح: رواه أحمد (4622) عن أبي معاوية (هو محمد بن خازم)، عن الأعمش، عن المنهال، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده صحيح، والمنهال هو ابن عمرو الأسدي.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা একটি জ্যান্ত মুরগিকে নিশানা হিসেবে খাড়া করে সেটিকে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করছিল। তখন তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ব্যক্তিকে অভিশাপ করেছেন, যে পশুর (জীবন্ত অবস্থায়) অঙ্গহানি করে বা তাকে লক্ষ্যবস্তু বানায়।









আল-জামি` আল-কামিল (7117)


7117 - عن عبد الله بن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تتخذوا شيئا فيه الروح غرضًا".

صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1957: 58) عن عبيد الله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شعبة، عن عدي، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره. وعلّقه البخاري عقب حديث ابن عمر (5515) فقال: وقال عدي عن سعيد به ولم يسق متنه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "প্রাণবিশিষ্ট কোনো কিছুকে লক্ষ্যবস্তু হিসেবে ব্যবহার করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7118)


7118 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُقتل شيء من الدواب صبرًا.

صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1959: 60) من طرق عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদ্ধ অবস্থায় (নির্যাতন করে) কোনো জীবজন্তুকে হত্যা করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7119)


7119 - عن عبد الله بن جعفر قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على أناس وهم يرمون كبشا بالنبل فكره ذلك، وقال:"لا تَمْثَلُوا بالبهائم".

حسن: رواه النسائي (4440)، وأبو يعلى (6790) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن معاوية بن عبد الله بن جعفر، عن عبد الله بن جعفر فذكره.

وإسناده حسن، رجاله ثقات مشهورون غير معاوية بن عبد الله بن جعفر القرشي الهاشمي فقد روى عنه جمعٌ من الثقات، وقال يعقوب بن شيبة: كان مقدما وكان يوصف بالفضل والعلم، وقد وثقه العجلي وذكره ابن حبان في الثقات، ولذلك لم يتردد الذهبي في"الكاشف" في توثيقه.

فهو لا ينزل عن درجة صدوق، وأما الحافظ فقال فيه:"مقبول" والصواب أنه صدوق حسن الحديث. وفي معناه روي عن أبي أيوب قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صبر الدابة.

قال أبو أيوب: لو كانت لي دجاجة ما صبرتها.

رواه أحمد (23589) والدارمي (2017) والبيهقي (9/ 71) من طريق أبي عاصم، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثنا يزيد بن أبي حبيب، عن بكير (ابن عبد الله بن الأشج)، عن أبيه، عن عبيد
ابن تِعْلي، عن أبي أيوب، فذكره.

وفي إسناده عبد الله بن الأشج، لم يرو عنه غير ابنه، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (5/ 14) وهو غير مترجم في التعجيل مع أنه على شرطه.

ورواه أبو داود (2687) وأحمد (23590) من طريقين عن عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن ابن تعلي، قال: غزونا مع عبد الرحمن بن خالد بن الوليد، فأتي بأربعة أعلاج من العدو، فأمر بهم، فقتلوا صبرا بالنبل، فبلغ ذلك أبا أيوب، فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن قتل الصبر.

زاد أبو داود: فوالذي نفسي بيده، لو كانت دجاجة ما صبرتها. فبلغ ذلك عبد الرحمن بن خالد بن الوليد، فأعتق أربع رقاب.

فأسقط من هذا السند ذكر عبد الله بن الأشج، والصواب إثباته، فقد قال المزي في ترجمة عبيد بن تعلى من تهذيب الكمال: الصحيح قول من قال:"عن أبيه" أهـ. وتبعه ابن حجر في التهذيب.



رواه أحمد (8836)، والبزار (9743)، والبيهقي (10/ 101) من طريق محمد بن الصباح الدولابي، ثنا إسماعيل بن زكريا، عن الحسن بن الحكم النخعي، عن عدي بن ثابت، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.

قال البزار:"وهذا الحديث رواه شريك عن الحسن بن الحكم، عن عدي بن ثابت، عن البراء وقال إسماعيل، عن الحسن، عن عدي، عن أبي حازم والحسن فليس بالحافظ".

وقال الهيثمي في المجمع (5/ 246):"لم أجده في نسختي من أبي داود - رواه أحمد، والبزار، وأحد إسنادي أحمد رجاله رجال الصحيح خلا الحسن بن الحكم النخعي وهو ثقة". اهـ.

قلت: وهذا الحكم منه بناء على ظاهر إسناده وإلا فالحديث معلول، فقد اختلف فيه على الحسن بن الحكم، فرواه إسماعيل بن زكريا كما ذكرت.

وقد سئل أبو حاتم الرازي عن رواية إسماعيل هذه فقال:"كذا رواه، ورواه غيره عن الحسن بن الحكم، عن عدي بن ثابت، عن رجل من الأنصار، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم وهو أشبه". علل الحديث (2230). وعليه فالحديث من الوجه المحفوظ ضعيف للرجل المبهم.

وقد رواه أبو داود (2860) من هذا الإسناد مختصرا من غير هذا السياق. ولذا لم يقف عليه الهيثمي.




আব্দুল্লাহ ইবনু জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা একটি মেষকে তীর নিক্ষেপ করছিল। তিনি তা অপছন্দ করলেন এবং বললেন: "তোমরা চতুষ্পদ জন্তুদের বিকৃত করো না (বা তাদের লক্ষ্যবস্তু বানিও না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (7120)


7120 - عن أبي الطفيل قال: سئل عليٌّ: أَخَصّكم رسول الله صلى الله عليه وسلم بشيء؟ فقال ما خصنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بشيء لم يعم به الناس كافة إلا ما كان في قِراب سيفي هذا قال: فأخرج صحيفةً مكتوبٌ فيها:"لعن الله من ذبح لغير الله، ولعن الله من سرق منار الأرض، ولعن الله من لعن والده، ولعن الله من آوى محدثا".

صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (1978: 44) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا أبو خالد الأحمر سليمان بن حبان، عن منصور بن حيان، عن أبي الطفيل قال: فذكره.




আবূ তুফাইল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাদেরকে এমন কোনো কিছু খাসভাবে দিয়েছিলেন (যা অন্য সব মানুষকে দেননি)? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এমন কোনো কিছু খাসভাবে দেননি যা সকল মানুষের জন্য নয়, তবে এই যে আমার তরবারির খাপের ভেতরে যা আছে তা ছাড়া। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি একটি লিখিত সহীফা (লিপি) বের করলেন, যাতে লেখা ছিল: “আল্লাহ্‌ অভিশাপ করুন তাকে, যে আল্লাহ্‌ ব্যতীত অন্য কারো জন্য যবেহ করে। আল্লাহ্‌ অভিশাপ করুন তাকে, যে জমির সীমানা চিহ্ন চুরি করে। আল্লাহ্‌ অভিশাপ করুন তাকে, যে তার পিতামাতাকে অভিশাপ দেয়। আল্লাহ্‌ অভিশাপ করুন তাকে, যে কোনো বিদআতী বা পাপীকে আশ্রয় দেয়।”