আল-জামি` আল-কামিল
7121 - عن عبد الله بن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه لقي زيد بن عمرو بن نفيل بأسفل بلدح، وذاك قبل أن ينزل على رسول الله صلى الله عليه وسلم الوحيُ، فقدَّم إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سفرةً فيها لحمٌ، فأبى أن يأكل منها، ثم قال: إني لا آكل مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلا مما ذكر اسم الله عليه.
وفي رواية: أن النبي صلى الله عليه وسلم لقي زيد بن عمرو بن نفيل بأسفل بلدح، قبل أن ينزل على النبي صلى الله عليه وسلم الوحي فقُدِّمَتْ إلى النبي صلى الله عليه وسلم سفرة، فأبى أن يأكل منها، ثم قال زيد: إني لستُ آكل مما تذبحون على أنصابكم، ولا آكل إلا ما ذكر اسم الله عليه، وأن زيد بن عمرو كان يعيب على قريش ذبائحهم ويقول: الشاة خلقها الله، وأنزل لها من السماء الماء، وأنبت لها من الأرض، ثم تذبحونها على غير اسم الله إنكارًا لذلك، وإعظامًا له.
صحيح: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5499) عن معلى بن أسد، حدثنا عبد العزيز بن المختار، أخبرنا موسى بن عقبة قال أخبرني سالم أنه سمع عبد الله (هو ابن عمر) فذكره.
والرواية الأخرى رواه البخاري أيضا في مناقب الأنصار (3826) عن محمد بن أبي بكر، حدثنا فضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة به.
والسفرة كانت لقريش قدّموها للنبي صلى الله عليه وسلم فأبى أن يأكل منها، فقدّمها النبي صلى الله عليه وسلم لزيد بن عمرو، معتقدًا منه بأنه على عادات قريش، فأبى أن يأكل منها وقال مخاطبا لقريش الذين قدّموها أولًا.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়েদ ইবনু আমর ইবনু নুফায়েলের সাথে বালদাহর নিম্নভূমিতে সাক্ষাৎ করেছিলেন। আর এটা ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর অহী নাযিল হওয়ার আগের ঘটনা। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সামনে গোশতসহ একটি দস্তরখান পেশ করলেন। কিন্তু তিনি তা খেতে অস্বীকার করলেন। এরপর তিনি বললেন: তোমরা যা তোমাদের প্রতিমার উদ্দেশ্যে জবাই করো, আমি তা খাই না। আমি শুধু সেটাই খাই, যার উপর আল্লাহর নাম নেওয়া হয়েছে।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়েদ ইবনু আমর ইবনু নুফায়েলের সাথে বালদাহর নিম্নভূমিতে সাক্ষাৎ করেছিলেন, তা ছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর অহী নাযিল হওয়ার আগের ঘটনা। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে দস্তরখান পেশ করা হলে তিনি তা খেতে অস্বীকার করলেন। এরপর যায়েদ বললেন: আমি সেসব খাই না যা তোমরা তোমাদের প্রতিমাদের উদ্দেশ্যে জবাই করো এবং আমি শুধু সেটাই খাই, যার উপর আল্লাহর নাম নেওয়া হয়েছে। আর যায়েদ ইবনু আমর কুরাইশদের জবাই করা পশুর সমালোচনা করতেন এবং বলতেন: এই মেষকে আল্লাহ সৃষ্টি করেছেন, তার জন্য আকাশ থেকে পানি বর্ষণ করেছেন, এবং যমীন থেকে তার জন্য শস্য উৎপন্ন করেছেন। এরপরও তোমরা আল্লাহর নাম ছাড়া অন্য নামে তা জবাই করো! তিনি এর তীব্র নিন্দা করতেন এবং একে গুরুতর মনে করতেন।
7122 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا عقر في الإسلام".
صحيح: رواه أبو داود (3222)، وأحمد (13032)، وصحَّحه ابن حبان (3146) كلهم من طريق عبد الرزاق - وهو في مصنفه (6690) - ثا معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره، وهو قطعة من حديث مطول، اختصره أبو داود، وهو بتمامه عند الآخرين. وإسناده صحيح.
وقوله:"لا عقر في الإسلام" فسّره عبد الرزاق عند أبي داود بقوله:"كانوا يعقرون عند القبر ببقرةٍ أو شاةٍ - وفي لفظ: أو بشيء - اهـ.
وقال الخطابي في معالم السنن (4/ 339):"كان أهل الجاهلية يعقرون الإبل على قبر الرجل الجواد، يقولون: نجازيه على فعله؛ لأنه كان يعقرها في حياته، فيطعمها الأضياف، فنحن نعقرها عند قبره لتأكلها السباع والطير، فيكون مُطعما بعد مماته، كما كان مُطعما في حياته".
قال:"ومنهم من كان يذهب في ذلك إلى أنه إذا عُقرت راحلتُه عند قبره، حُشر في القيامة راكبًا، ومن لم يُعقر عنه حُشر راجلًا، وكان هذا على مذهب من يرى البعث منهم بعد الموت".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে (কবরের কাছে) আক্বর (পশু যবেহ করার প্রথা) নেই।"
7123 - عن ابن عباس قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن مُعاقرة الأعراب.
حسن: رواه أبو داود (2820) - ومن طريقه البيهقي (9/ 313) - عن هارون بن عبد الله، ثنا حماد بن مسعدة، عن عوف، عن أبي ريحانة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي ريحانة واسمه عبد الله بن مطر البصري فإنه صدوق لا بأس به، وقال ابن عدي:"لا أعرف له حديثا منكرًا فأذكره" وبقية رجاله ثقات، وعوف هو ابن أبي جميلة الأعرابي. وقد أشار أبو داود عقب الحديث إلى أن غندرًا وهو محمد بن جعفر قد أوقف الحديث على ابن عباس - يعني في روايته عن عوف الأعرابي ولم أقف عليها، وعلى كل حال حماد بن مسعدة ثقة، والزيادة من الثقة مقبولة.
ومعنى الحديث كما قال الخطابي:"هو أن يتبارى الرجلان كل واحد منهما يجاود صاحبه، فيعقر هذا عددًا من إبله، ويعقر صاحبه، فأيهما كان أكثر عقرًا غلب صاحبه ونفره. كره أكل
لحومها لئلا تكون مما أهلّ به لغير الله".
قلتُ: ويؤيد هذا المعنى ما رواه مسدد - كما في المطالب العالية (2356) - عن ربعي بن عبد الله قال: سمعت الجارود (هو ابن أبي بُسرة) يقول: كان رجل من بني رباح يقال له: ابن أثال - وكان شاعرًا - أتى الفرزدق بماءٍ بظهر الكوفة على أن يعقر هذا مائة من الإبل، وهذا مائة من الإبل إذا وردت الماء، فلما وردت قاما إليها بالسيوف يكتسعان عراقيبها، فخرج الناس على الحمرات والبغال يريدون اللحم، وعلي بن أبي طالب رضي الله عنه بالكوفة، فخرج على بغلة رسول الله صلى الله عليه وسلم البيضاء، وهو ينادي: أيها الناس، لا تأكلوا من لحومها فإنه أهل لغير الله تعالى".
وإسناده حسن، ربعي بن عبد الله بن الجارود بن أبي بسرة البصري، وجدّه الجارود كلاهما صدوقان كما في التقريب.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেদুঈনদের মধ্যে প্রতিদ্বন্দিতামূলক উট জবাই করা (মু'আক্বারাহ্) নিষিদ্ধ করেছেন।
7124 - عن رافع بن خديج قلتُ: يا رسول الله، إنا لاقو العدو غدًا، وليستْ معنا مدًى؟ قال صلى الله عليه وسلم:"أعجلْ أو أرني ما أنهر الدمَ، وذُكِر اسمُ الله فكُلْ، ليس السنَّ والظفرَ، وسأحدِّثُك أما السنَّ فعظْمٌ، وأما الظفرُ فمدى الحبشة" الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5498)، ومسلم في الأضاحي (1968: 20) كلاهما من طريق سعيد بن مسروق، عن عباية بن رفاعة بن رافع بن خديج، عن جده رافع بن خديج فذكره، والسياق لمسلم.
রাফে' ইবন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আগামীকাল আমরা শত্রুর মুখোমুখি হচ্ছি, অথচ আমাদের সাথে (যবেহ করার) কোনো ছুরি (বা অস্ত্র) নেই?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জলদি করো। যা রক্ত প্রবাহিত করে (রক্তপাত ঘটায়), যদি তাতে আল্লাহর নাম স্মরণ করা হয়, তবে তা খাও। তবে দাঁত ও নখ দিয়ে (যবেহ করো) না।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন, "আমি তোমাদেরকে এর কারণ বলছি: দাঁত হল একটি অস্থি (হাড়), আর নখ হলো হাবশাবাসীদের ছুরি।"
7125 - عن ابن عباس في قوله عز وجل: {وَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ} [سورة الأنعام: 121] قال: خاصمهم المشركون، فقالوا: ما ذبح الله فلا تأكلوه، وما ذبحتم أنتم أكلتموه؟ ! .
حسن: رواه النسائي (4437)، وابن جرير في تفسيره (9/ 523) من طريق سفيان الثوري، ثني هارون بن عنترة، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل هارون بن عنترة الشيباني الكوفي فإنه حسن الحديث وبقية رجاله ثقات.
ورواه أبو داود (2818)، وابن ماجه (3173)، والحاكم (4/ 113، 231) من طريق إسرائيل، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره، غير أنه لم يعين الذين خاصموا النبي صلى الله عليه وسلم في الميتة. وقال الحاكم في الموضعين:"صحيح على شرط مسلم".
ولكن حديث سماك عن عكرمة مضطرب إلا أنه لا بأس به في المتابعات.
وروى أبو داود (2819)، والترمذي (3069)، وابن جرير الطبري في تفسيره (9/ 526)، والطبراني في الكبير (11/ 457)، والبيهقي (9/ 240) من طرق عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس بنحوه إلا أنه في رواية أبي داود والطبراني، والبيهقي أن الذين خاصموا النبي صلى الله عليه وسلم كانوا من اليهود، وعند غيرهم أن ناسا من غير تعيين.
وفي إسناده عطاء بن السائب وإن كان ثقة إلا أنه اختلط بأخرة، وقد رواه عنه زياد البكّائي كما عند الترمذي، وجرير بن عبد الحميد كما عند ابن جرير، وعمران بن عيينة عند الباقي.
وقد نص الأئمة في ترجمته أن جريرًا حدّث عنه بعد اختلاطه، ولعل الآخرين كذلك، ولذلك أخطأ السائب فذكر اليهود، والصحيح أنهم المشركون كما في رواية عنترة الشيباني، عن ابن عباس. ولذلك أعل ابن القيم رواية أبي داود هذه في تهذيبه على مختصر المنذري (4/ 113) بأربع علل، وقال في العلة الأخيرة:"إن سورة الأنعام مكية باتفاق، ومجيء اليهود إلى النبي صلى الله عليه وسلم ومجادلتهم إياه إنما كان بعد قدومه المدينة، وأما بمكة فإنما كان جداله مع المشركين عباد الأصنام" اهـ.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী— "{আর তোমরা তা থেকে খেয়ো না, যার উপর আল্লাহর নাম উচ্চারিত হয়নি}" [সূরা আল-আন'আম: ১২১] সম্পর্কে তিনি বলেন: মুশরিকরা তাদের সাথে বিতর্ক করেছিল। তারা বলেছিল: যা আল্লাহ যবেহ করেছেন (অর্থাৎ মৃত পশু), তা তোমরা খাও না, অথচ তোমরা যা যবেহ করো, তা তোমরা খাও?!
7126 - عن عائشة أن قوما يأتونا باللحم، لا ندري: أذُكرَ اسم الله عليه أم لا؟ فقال:"سَمُّوا عليه أنتم وكلوه" قالت: وكانوا حديثي عهدٍ بالكفر.
صحيح: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5507) عن محمد بن عبيد الله، حدثنا أسامة بن حفص المدني، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه مالك في الذبائح (1) عن هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا.
قال ابن عبد البر في التمهيد (22/ 298):"لم يُختلف عن مالك - فيما علمت - في إرسال هذا الحديث، وقد أسنده جماعة عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة".
وقلت: ومن هولاء أسامة بن حفص المدني عند البخاري، والنضر بن شميل عند النسائي (4336).
عَلَّمَكُمُ اللَّهُ فَكُلُوا مِمَّا أَمْسَكْنَ عَلَيْكُمْ وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (4) الْيَوْمَ أُحِلَّ لَكُمُ الطَّيِّبَاتُ وَطَعَامُ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حِلٌّ لَكُمْ وَطَعَامُكُمْ حِلٌّ لَهُمْ} [سورة المائدة: 4 - 5].
أهل الكتاب هم: اليهود والنصارى.
والمراد بالطعام: ذبائحهم كما قال ابن عباس وأصحابه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিছু লোক আমাদের কাছে গোশত নিয়ে আসত। আমরা জানতাম না যে এর উপর আল্লাহর নাম উচ্চারণ করা হয়েছে কি না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা এর উপর আল্লাহর নাম নিয়ে নাও এবং খাও।" তিনি (আয়িশা) বললেন: আর তারা ছিল কুফরীর সাথে সদ্য পরিচিত।
7127 - عن عبد الله بن مغفل قال: أصبت جرابا من شحم يوم خيبر قال: فالتزمته فقلت: لا أعطي اليوم أحدًا من هذا شيئا.
قال: فالتفتُّ فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم مبتسمًا.
متفق عليه: رواه مسلم في الجهاد (1772) عن شيبان بن فرّوخ، حدثنا سليمان بن المغيرة، حدثنا حميد بن هلال، عن عبد الله بن مغفل فذكره.
وأخرجه الشيخان: البخاري في المغازي (4214)، ومسلم كلاهما من وجه آخر عن شعبة، عن حميد بن هلال بإسنادهما. وفيه يقول عبد الله بن مغفل:"رُمِيَ إلينا جراب فيه طعامٌ وشحم يوم خيبر، فوثبتُ لآخذه قال: فالتفتُّ فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستحييتُ منه".
আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খায়বারের দিনে চর্বি ভর্তি একটি চামড়ার থলে পেলাম। তিনি বললেন: অতঃপর আমি তা আঁকড়ে ধরলাম এবং বললাম: আজ আমি এর থেকে কাউকে কিছুই দেব না। তিনি বললেন: এরপর আমি তাকালাম, দেখি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসছেন।
7128 - عن أبي هريرة قال: لما فتحتْ خيبر أهديت للنبي صلى الله عليه وسلم شاةٌ فيها سُمٌّ … الحديث.
صحيح: رواه البخاري في الجزية والموادعة (3169) عن عبد الله بن يوسف، ثنا الليث، قال: حدثني سعيد (هو ابن أبي سعيد المقبري)، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন খায়বার জয় করা হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে একটি বিষযুক্ত বকরী উপহার দেওয়া হলো।
7129 - عن عائشة قالت: يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي توفي فيه:"يا عائشة! إني أجد ألم الطعام الذي أكلتُه بخيبر، فهذا أوان انقطاع أبهري من ذلك السم".
صحيح: رواه الحاكم (3/ 58) وعنه البيهقي (10/ 11) من حديث عنبسة، ثنا يونس، عن ابن شهاب قال: قال عروة: كانت عائشة تقول فذكرته. وذكره البخاري في المغازي (4428) معلقا بقوله:"وقال يونس فذكره مثله".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সেই অসুস্থতার সময়, যেটিতে তিনি ইন্তেকাল করেন, বলছিলেন: "হে আয়িশা! আমি সেই খাবারের যন্ত্রণা অনুভব করছি যা আমি খায়বারে খেয়েছিলাম, আর এখন সেই বিষের কারণে আমার প্রধান ধমনী (বা জীবননালী) ছিন্ন হয়ে যাওয়ার সময় এসেছে।"
7130 - عن أنس بن مالك أن يهوديا دعا النبي صلى الله عليه وسلم إلى خبز شعير، وإهالة سَنِخَة فأجابه.
صحيح: رواه أحمد (13201) عن عبد الصمد، حدثنا أبان، حدثنا قتادة، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح.
ولكن البخاري في البيوع (2069) من طريق هشام الدستوائي، عن قتادة، عن أنس، أنه مشى إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بخبز شعير، وإهالة سنخة. ولقد رهن النبي صلى الله عليه وسلم درعًا له بالمدينة عند يهودي، وأخذ منه شعيرًا لأهله.
فلعل أبان وهو ابن يزيد العطار اختصر الحديث والقصة هي كما ذكرها هشام، فنسب بأن يهوديًا دعا النبي صلى الله عليه وسلم إلى الطعام، بينما كان أنس أحضر هذا الطعام من اليهودي بالرهن، وليس فيه
ذكر السنخة، وهي ما أذيب من الإلية والشحم، وقد تكون المتغيرة الريح لطول المدة.
وفي الباب عن قبيصة بن هُلْب عن أبيه قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن طعام النصارى فقال:"لا يتخلجنَّ في صدرك طعامٌ ضارعت فيه النصرانية".
رواه أبو داود (3784)، والترمذي (1565)، وابن ماجه (2830) وأحمد (21965، 21966) من طرق عن سماك بن حرب، حدثني قبيصة بن هلب، عن أبيه فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
ولكن في إسناده قبيصة بن هُلب تفرد عنه سماك بن حرب، قال علي بن المديني والنسائي:"مجهول" وذكره ابن حبان على عادته في الثقات بل قال العجلي:"تابعي ثقة".
ولم يعتد الحافظ بتوثيقه؛ لذا قال:"مقبول" يعني حيث يتابع وإلا فلين الحديث، ولم أجد من تابعه على هذا الإسناد.
وفي معناه حديث عدي بن حاتم قال: يا رسول الله، طعاما لا أدعه إلا تحرجا؟ قال:"فلا تدعن طعاما ضارعت فيه النصرانية". وهو جزء من حديث طويل.
رواه أبو داود الطيالسي (1129)، وأحمد (18262، 19274) وابن حبان (332)، والبيهقي (7/ 279) من طرق عن شعبة، عن سماك بن حرب، قال: سمعت مُري بن قطري، قال: سمعت عدي بن حاتم، قال: فذكره.
وفي إسناده مري بن قطري لم يوثقه غير ابن حبان في الثقات (5/ 459) وقال الذهبي في الميزان (4/ 95):"لا يعرف تفرد عنه سماك بن حرب".
وقوله: في حديث هلب:"يتخجلنَّ" وفي رواية:"يختلجن" أي لا تشكن.
وقوله:"ضارعت" أي شابهت من المضارعة وهي المشابهة والمقاربة والمعنى: لا يتحركن في قلبك شكٌّ أن ما شابهت فيه النصاري حرام أو خبيث أو مكروه. انظر: النهاية في غريب الحديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ইহুদি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যবের রুটি এবং বাসি ও দুর্গন্ধযুক্ত চর্বি (বা ঘি) দ্বারা তৈরি খাবারে দাওয়াত করেছিল। তিনি সেই দাওয়াতে সাড়া দিয়েছিলেন।
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হুলব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খ্রিষ্টানদের খাবার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "এমন খাবার যা খ্রিষ্টানদের (আচার-অনুষ্ঠানের) সাথে সাদৃশ্য রাখে, তা যেন তোমার মনে কোনো দ্বিধা বা সন্দেহ তৈরি না করে।"
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আদি ইবনে হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল, এমন খাবার যা আমি সংকোচবশত পরিত্যাগ করি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এমন খাবার অবশ্যই পরিত্যাগ করবে না যা খ্রিষ্টানদের (আচার-অনুষ্ঠানের) সাথে সাদৃশ্য রাখে।"
7131 - عن كعب بن مالك - أنه كانت لهم غنم ترعى بسلْعٍ، فأبصرت جارية لنا بشاة من غنمنا موتا، فكسرت حجرا فذبحتها به، فقال لهم: لا تأكلوا حتى أسأل النبي صلى الله عليه وسلم، أو أرسل إلى النبي صلى الله عليه وسلم من يسأله. وأنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن ذاك، أو أرسل، فأمره بأكلها.
صحيح: رواه البخاري في الوكالة (2304) عن إسحاق بن إبراهيم، سمع المعتمر، أنبأنا عبيد الله، عن نافع، أنه سمع ابنَ كعب بن مالك، يحدث عن أبيه فذكره.
قال عبيد الله: فيُعجبني أنها أمة، وأنها ذبحتْ.
وتابع المعتمرَ عن عبيد الله على هذا الإسناد عبدةُ بن سليمان الكلابي: أخرجه البخاريُّ في
الذبائح (5504) عن صدقة، أخبرنا عبدة، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابنٍ لكعب بن مالك، عن أبيه: أنَّ امرأةً ذبحتْ شاةً بحجر، فسُئلَ النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فأمر بأكلها. وقال الليثُ: حدثنا نافع أنه سمع رجلًا من الأنصار، يُخبر عبدَ الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم أن جاريةً لكعبٍ … بهذا.
وأولاد كعب بن مالك من الرواة عن أبيهم هم ثلاثة: عبد الله، وعبد الرحمن، وعبيد الله، وهم كلهم ثقات كما قال ابن معين، وقد جاء في بعض الروايات بأنه عبد الرحمن.
وأخرج البخاري هذا الحديث في صحيحه في عدة مواضع:
منها في الذبائح (5501) عن محمد بن أبي بكر، حدثنا معتمر، عن عبيد الله، عن نافع، سمع ابنَ كعب بن مالك يخبر ابنَ عمر، أن أباه أخبره: أن جاريةً لهم كانت ترعى غنما بسلع فأبصرت بشاة من غنمها موتًا، فكسرتْ حجرًا فذبحتها. فقال لأهله: لا تأ كلوا حتى آتي النبي صلى الله عليه وسلم فأسأله، أو حتى أُرسلَ إليه من يسأله، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم أو بعثَ إليه - فأمر النبيُّ صلى الله عليه وسلم بأكلها.
ومنها في الذبائح أيضا (5502) عن موسى، حدثنا جويرية، عن نافع، عن رجل من بني سلمة، أخبر عبد الله: أن جارية لكعب بن مالك ترعى غنما له بالجبيل الذي بالسوق، وهو بسلع فأصيبتْ شاة، فكسرتْ حجرًا، فذبحتْها فذكروا للنبي صلى الله عليه وسلم، فأمرهم بأكلها.
ومنها ما رواه في الذبائح أيضا (5505) من حديث مالك وهو في الموطأ في الذبائح (4) عن نافع، عن رجل من الأنصار، عن معاذ بن سعد - أو سعد بن معاذ - أخبره: أن جاريةً لكعب بن مالك كانت ترعى غنما بسلع فأصيبتْ شاةٌ منها، فأدركتْها فذبحتْها بحجر، فسُئلَ النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"كلوها". وفيه رجل لم يُسم. كما وقع اختلاف على نافع أشار إليه الدارقطني في التتبع (314 - 315) وخلص القول بأنه لا يصح عن نافع، عن ابن عمر.
قلت: ولكنه صحّ عن غيره ولذا سقتُ جميع الروايات التي أخرجها البخاري فما صحَّ لا يعل بما لا يصحُّ.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাদের কিছু ছাগল ছিল যা সালা' নামক স্থানে চরে বেড়াত। তাদের একজন দাসী দেখল যে তাদের ছাগলের মধ্যে একটির মৃত্যু আসন্ন হয়েছে। তখন সে একটি পাথর ভেঙে তা দিয়ে সেটিকে যবেহ করল। [কা'ব] তাদেরকে বললেন: তোমরা তা খেও না, যতক্ষণ না আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করি, অথবা তাঁর কাছে কাউকে পাঠিয়ে জিজ্ঞাসা করাই। অতঃপর তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন, অথবা (কাউকে) পাঠালেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে সেটি খেতে আদেশ করলেন।
7132 - عن رافع بن خديج أنه قال: يا رسول الله! ليس لنا مدى؟ فقال:"ما أنهر الدمَ وذُكرَ اسم الله فكل، ليس الظفر والسن، أما الظفر فمدى الحبشة، وأما السن فعظم". الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الذبائح والصيد (5503) ومسلم في الأضاحي (1968: 23) كلاهما من طريق شعبة، عن سعيد بن مسروق، عن عَباية بن رفاعة بن رافع، عن جده، فذكره.
والسياق للبخاري ولم يذكر مسلم لفظه كاملًا وإنما أحاله على اللفظ الذي قبله.
ووقع في مطبوعة سنن أبي داود (2821) بعد قوله:"ليس معنا مدي" زيادة:"أفنذبح بالمروة
وشقة العصا؟"، والظاهر أنها مدرجة من بعض النساخ ولذلك لم يذكرها المنذري في تهذيبه (2703) ولا البيهقي الذي أخرجه من طريق أبي داود.
قال النووي:"وفي هذا الحديث تصريح بجواز الذبح بكل محدَّدٍ يقطع إلا الظفر، والسنَّ، وسائر العظام، فيدخل في ذلك السيف، والسكين، والسنان، والحجر، والخشب، والزجاج، والقصب، والخزف، والنحاس، وسائر الأشياء المحدَّدة، فكلها تحصل بها الذكاة". شرح صحيح مسلم (13/ 123).
রাফি' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কি ছুরি (বা ধারালো যবেহ করার বস্তু) নেই?" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যা রক্ত প্রবাহিত করে এবং যার উপর আল্লাহর নাম স্মরণ করা হয়, তা খাও (অর্থাৎ তা দ্বারা যবেহ করা হালাল)। তবে নখ এবং দাঁত নয়। কারণ নখ হলো হাবশাবাসীদের যবেহ করার ছুরি, আর দাঁত হলো (এক প্রকার) হাড়।"
7133 - عن محمد بن صفوان قال: أصّدتُ أرنبين فذبحتهما بمروةٍ، فسألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عنهما، فأمرني بأكلهما".
صحيح: رواه أبو داود (2822)، والنسائي (4313)، وابن ماجه (3175)، وأحمد (15870) وصحَّحه ابن حبان (5887) كلهم من طرق عن عاصم الأحول، عن الشعبي، عن محمد بن صفوان فذكره. وإسناده صحيح. كذا رواه عاصم الأحول، عن الشعبي، عن محمد بن صفوان، وتابعه داود بن أبي هند. رواه النسائي (4411)، وابن ماجه (3244)، وأحمد (15871)، وصححه الحاكم (4/ 235) وقال: على شرط مسلم.
وخالفهما قتادة، فرواه عن الشعبي، عن جابر بن عبد الله بنحوه.
رواه الترمذي (1472)، والبيهقي (9/ 321) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة به. وقال الترمذي:"واختلف أصحاب الشعبي في رواية هذا الحديث. فروي داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن محمد بن صفوان. وروي عاصم الأحول عن الشعبي، عن صفوان بن محمد أو محمد بن صفوان. ومحمد بن صفوان أصح. وروي جابر الجعفي، عن الشعبي، عن جابر بن عبد الله نحو حديث قتادة عن الشعبي، ويحتمل أن يكون الشعبي روى عنهما جميعًا. قال محمد (يعني البخاري) حديث الشعبي، عن جابر بن عبد الله غير محفوظ". اهـ.
وزاد في العلل الكبير (2/ 630) من قول البخاري:"وحديث محمد بن صفوان أصح".
মুহাম্মাদ ইবনু সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি দুটি খরগোশ শিকার করলাম এবং একটি ধারালো পাথরের সাহায্যে সে দুটিকে যবেহ করলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সে দুটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তখন তিনি আমাকে সে দুটি খেতে আদেশ দিলেন।
7134 - عن رجل من بني حارثة أنه كان يرعى لِقْحةً بشعبٍ من شعاب أحُدٍ، فأخذها الموتُ، فلم يجد شيئا ينحرها به، فأخذ وتدًا فوجأ به في لبّتها حتى أُهريق دمُها، ثم جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره بذلك، فأمره بأكلها.
صحيح: رواه أبو داود (2823) - ومن طريقه البيهقي (9/ 281) - عن قتيبة بن سعيد، ثنا يعقوب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن رجل من بني حارثة، فذكره.
وإسناده صحيح، ويعقوب هو ابن عبد الرحمن القاري المدني ثم الإسكندراني. وتابعه سفيان الثوري فيما رواه الإمام أحمد (23647).
وخالفهما سفيان بن عيينة، فرواه عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار: أن غلامًا من بني
حارثة كان يرعى لقحة له بأحد …" الحديث. رواه ابن أبي شيبة (5/ 391)، وعبد الرزاق (8626) كلاهما عن ابن عيينة به.
هكذا رواه مرسلا، وتابعه الإمام مالك في الموطأ في الذبائح (3).
قال ابن عبد البر في التمهيد (5/ 136): وهكذا رواه جماعة رواة الموطأ مرسلا، ومعناه متصل من وجوه ثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا أعلم أحدا أسنده عن زيد بن أسلم إلا جرير بن حازم، عن أيوب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري".
قلتُ: وهو متعقب بما سبق فقد أسنده أيضًا يعقوب والثوري. وعدم تسمية الصحابي لا يضر كما هو معروف. وأما رواية جرير المشار إليها فرواه النسائي (4402).
ورواه أيضًا ابن الجارود في"المنتقى" (896) وفيه: قال جرير - يعني ابن حازم -: كان أيوب يحدثني عن زيد بن أسلم، فلقيتُ زيدًا فسألته فقال: ثني عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، قال: فذكره. وهذا لون آخر من الاختلاف، لكن ليس بمؤثر، بل يقوي الرواية المسندة، والاختلاف في إبهام الصحابي أو تسميته لا يضر كما أسلفت، فالحديث صحيح على كل حال.
وقد حسّنه ابن عبد البر في التمهيد (5/ 150 - 151).
বানু হারিছা গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, তিনি উহুদ পাহাড়ের কোনো এক গিরিপথে একটি গর্ভধারণক্ষম উটনি চরাচ্ছিলেন। তখন সেটির মৃত্যু ঘনিয়ে এলো, কিন্তু সে সেটিকে যবেহ করার মতো কোনো জিনিস খুঁজে পেল না। তাই সে একটি কাঠের খুঁটি নিল এবং সেটির গলায় (যবেহ করার স্থানে) বিদ্ধ করল, যতক্ষণ না তার রক্ত প্রবাহিত হলো। অতঃপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে এ বিষয়ে তাঁকে জানালো। তখন তিনি তাকে সেটি খাওয়ার নির্দেশ দিলেন।
7135 - عن عدي بن حاتم قال: قلتُ: يا رسول الله، أرأيت إنْ أحدنا أصاب صيدًا، وليس معه سكين أيذبحُ بالمروة، وشقة العصا؟ فقال:"أمْررِ الدمَ بما شِئت، واذكر اسم الله عز وجل".
حسن: رواه أبو داود (2824)، والنسائي (4304)، وابن ماجه (3177)، وأحمد (18250)، وصحَّحه ابن حبان (332)، والحاكم (4/ 240) كلهم من طرق عن سماك بن حرب قال: سمعت مريَّ بن قطري، يحدث عن عدي بن حاتم، فذكره. قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: بل إسناده حسن فحسب؛ من أجل سماك بن حرب، فإنه حسن الحديث، وأما شيخه مري بن قطري فلم يرو عنه إلا سماك، ووثّقه ابن معين كما في تاريخ عثمان الدارمي (766) ولم يقف عليه الحافظ ابن حجر فقال في التقريب:"مقبول" وهو حسن الحديث إلا أنه ليس من رجال مسلم كما قال الحاكم.
وفي الباب عن زيد بن ثابت، أن ذئبًا نيَّبَ في شاة فذبحوها بالمروة، فرخّص النبي صلى الله عليه وسلم في أكلها.
رواه النسائي (4412، 4419) وابن ماجه (3176)، وأحمد (21597)، وصحَّحه ابن حبان (5885)، والحاكم (4/ 113 - 114) كلهم من طرق عن شعبة، قال: سمعت حاضر بن المهاجر أبا عيسى الباهلي، قال: سمعت سليمان بن يسار يتحدث عن زيد بن ثابت، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: ورجاله ثقات سوي حاضر بن المهاجر فلم يوثّقه غير ابن حبان، ولم يرو عنه إلا شعبة؛
ولذا قال الحافظ:"مقبول". يعني حيث يتابع وإلا فليّن الحديث، بل قال أبو حاتم:"مجهول".
ولا تنفع متابعة الواقدي له فإنه متروك، ومن طريقه رواه البيهقي (9/ 250).
وقوله:"نيّبَ" أي أنشبَ أنيابه فيها.
وأما ما رويَ عن ابن عباس وأبي هريرة قالا: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن شريطة الشيطان وهي التي تذبح فيُقطع الجلد، ولا تُفرى الأوداج، ثم تُترك حتى تموت. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2826)، وأحمد (2618) كلاهما من طريق عبد الله بن المبارك، عن معمر، عن عمرو بن عبد الله، عن عكرمة، عن ابن عباس وأبي هريرة، فذكراه، واللفظ لأبي داود.
ولفظ أحمد:"لا تأكل الشريطة، فإنها ذبيحة الشيطان، ولم يذكر التفسير. وصحَّحه من هذا الوجه ابن حبان (5888)، والحاكم (4/ 113) غير أن ابن حبان وقع عنده عن أبي هريرة وحده.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وهو ليس كما قال؛ لأن في إسناده عمرو بن عبد الله وهو ابن الأسوار اليماني، ويقال له: عمرو بَرْق أو ابن بَرْق، وإن ذكره ابن حبان في الثقات، فقد قال ابن معين:"ليس بالقوي". وقال ابن عدي:"حديثه لا يتابعه الثقات عليه" وحكى العقيلي عن الإمام أحمد أنه قال:"له أشياء مناكير، وكان عند معمر لا بأس به" وقال ابن أبي مريم عن يحيى بن معين قال: زعم هشام القاضي أنه ليس بثقة. وقال ابن الأعرابي عن أبي داود: كان معمر إذا حدّث أهل البصرة قال لهم:"عمرو بن عبد الله وإذا حدّث أهل اليمن لا يسمّيه".
قل: ولعل السبب في ذلك أنهم كانوا يسيئون الرأي فيه، والخلاصة فيه أنه ضعيف. وأما الحافظ فقال في التقريب:"صدوق فيه لين".
وكذلك لا يصح ما رويَ عن أبي العُشراء، عن أبيه قال: يا رسول الله! أما تكون الذكاة إلا من اللبَّة، أو الحلق؟ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو طعنتَ في فخذها لأجزأ عنك".
رواه أبو داود (2825)، والترمذي (1481)، والنسائي (4480)، وابن ماجه (3174)، وأحمد (18947) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن أبي العشراء، عن أبيه، فذكره.
وإسناده ضعيف لجهالة أبي العُشراء، قال الذهبي في الميزان:"لا يُدري من هو ولا من أبوه؟" وقال الحافظ:"مجهول".
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث حماد بن سلمة، ولا نعرف لأبي الشراء، عن أبيه غير هذا الحديث" ونقل نحوه عن البخاري في العلل الكبير (2/ 634 - 635).
وقال الحافظ في التلخيص (4/ 134):"أبو العشراء مختلف في اسمه وفي اسم أبيه، وقد تفرد حماد بن سلمة بالرواية عنه على الصحيح، ولا يعرف حاله".
وقال الخطابي في معالم السنن (4/ 117):"هذا في ذكاة غير المقدور عليه، فأما المقدور عليه فلا
يذكيه إلا قطع المذابح لا أعلم فيه خلافًا بين أهل العلم وضعفوا هذا الحديث لأن راويه مجهول".
ولذا قال أبو داود عقب الحديث:"وهذا لا يصلح إلا في المتردية والمتوحش".
আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমাদের কেউ শিকার করে এবং তার সাথে ছুরি না থাকে, তাহলে কি সে ধারালো পাথর বা লাঠির ফাটল দিয়ে যবেহ করতে পারবে? তিনি বললেন: "যা দিয়ে ইচ্ছা তুমি রক্ত প্রবাহিত করো এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করো।"
7136 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: اذكاة الجنين ذكاةُ أمه".
حسن: رواه أحمد (11343)، وصححه ابن حبان (5889) من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن أبي الودّاك جبر بن نوف، عن أبي سعيد، فذكره. وانظر تفصيله في كتاب"الأضاحي".
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: গর্ভস্থ সন্তানের যবেহ (হালাল হওয়ার পদ্ধতি) তার মায়ের যবেহ।
7137 - عن أبي سعيد الخدري أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بغلامٍ يسلخُ شاةً، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تنحَّ حتى أريكَ"، فأدخل يده بين الجلد واللحم، فدحس بها حتى توارت إلى الإبط، ثم مضى، فصلى للناس ولم يتوضّأ.
وزاد في رواية:"يا غلام، هكذا فأسلخْ".
حسن: رواه أبو داود (185)، وابن ماجه (3179)، وصحَّحه ابن حبان (1162) كلهم من طريق مروان بن معاوية، ثنا هلال بن ميمون الجهني، ثنا عطاء بن يزيد الليثي، قال: لا أعلمه إلا عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
والرواية الأخرى عند ابن ماجه.
وإسناده حسن من أجل هلال بن ميمون، فإنه حسن الحديث.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি বালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে একটি ছাগলের চামড়া ছাড়াচ্ছিল। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "সরে যাও, আমি তোমাকে দেখাচ্ছি।" অতঃপর তিনি চামড়া ও মাংসের মাঝখানে তার হাত ঢুকিয়ে দিলেন এবং তা দিয়ে ভেতরের দিকে ঠেলে দিলেন যতক্ষণ না তা বগলে পৌঁছাল। অতঃপর তিনি চলে গেলেন এবং লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন, কিন্তু উযু (অজু) করেননি।
অপর এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: "হে বালক, এভাবেই তুমি চামড়া ছাড়াও।"
7138 - عن أبي هريرة قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم أو ليلة فإذا هو بأبي بكر وعمر، فقال:"ما أخرجكما من بيوتكما هذه الساعة؟" قالا: الجوع يا رسول الله. قال:"وأنا والذي نفسي بيده لأخرجني الذي أخرجكما قوموا". فقاموا معه، فأتى رجلا من الأنصار، فإذا هو ليس في بيته، فلما رأته المرأةُ قالت: مرحبا وأهلا. فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أين فلان؟"، قالت: ذهب يستعذب لنا من الماء، إذ جاء الأنصاري فنظر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وصاحبيه، ثم قال: الحمد لله ما أحد اليوم أكرم أضيافا مني، قال: فانطلق، فجاءهم بعذقٍ، فيه بُسرٌ وتمرٌ ورطبٌ. فقال: كلوا من هذه، وأخذ المدية، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إياك والحلوب". فذبح لهم فأكلوا من الشاة، ومن ذلك العذق وشربوا، فلما أن شبعوا ورووا قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر
وعمر:"والذي نفسي بيده لتسألن عن هذا النعيم يوم القيامة، أخرجكم من بيوتكم الجوع، ثم لم ترجعوا حتى أصابكم هذا النعيم".
وفي رواية:"لا تذبحنَّ ذات دُرٍّ".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2038: 140) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا خلف بن خليفة، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
والرواية الأخرى للترمذي (2369) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. وقال الترمذي:"حسن صحيح غريب".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন বা এক রাতে বের হলেন। হঠাৎ তিনি আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলেন। তিনি বললেন, "এই সময়ে তোমাদের দু'জনকে তোমাদের ঘর থেকে কী বের করে এনেছে?" তাঁরা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল, ক্ষুধা।" তিনি বললেন, "আর আমি—যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! যা তোমাদের বের করে এনেছে, তা আমাকেও বের করে এনেছে। তোমরা ওঠো!" এরপর তাঁরা তাঁর সাথে রওনা হলেন। তিনি এক আনসারীর বাড়িতে গেলেন, কিন্তু তিনি বাড়িতে ছিলেন না। যখন তাঁর স্ত্রী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলেন, তখন বললেন, "মারহাবা (স্বাগতম) এবং আহলান (আপনাদের সানন্দে বরণ করছি)।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন, "অমুক কোথায়?" স্ত্রী বললেন, "তিনি আমাদের জন্য মিষ্টি পানি আনতে গেছেন।" এমন সময় আনসারী ব্যক্তিটি এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর দুই সঙ্গীর দিকে তাকালেন। তারপর বললেন, "আলহামদুলিল্লাহ (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর)। আজ আমার চেয়ে অধিক সম্মানিত মেহমান আর কারো নেই।" তিনি দ্রুত গেলেন এবং একটি কাঁদি নিয়ে আসলেন, যাতে ছিল কাঁচা, শুকনো ও পাকা খেজুর। তিনি বললেন, "তোমরা এই খেজুরগুলো খাও।" আর তিনি একটি ছুরি নিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "দুধের গাভী বা ছাগল থেকে সাবধান!" এরপর তিনি তাদের জন্য (একটি পশু) যবেহ করলেন। তাঁরা সেই বকরির গোশত এবং সেই খেজুর কাঁদি থেকে খেলেন ও পানি পান করলেন। যখন তাঁরা পেট ভরে খেলেন ও পিপাসা মিটলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! কিয়ামত দিবসে তোমাদেরকে এই নেয়ামত সম্পর্কে অবশ্যই জিজ্ঞাসা করা হবে। ক্ষুধা তোমাদের ঘর থেকে বের করে এনেছিল, এরপর এই নেয়ামত লাভ না করা পর্যন্ত তোমরা ফিরে যাওনি।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "দুধ আছে এমন পশু যবেহ করো না।"
7139 - عن * *
৭১৩৯ - ... থেকে বর্ণিত, **
7140 - عن ابن عباس قال: وجد النبي صلى الله عليه وسلم شاةً ميتةً أُعطيتْها مولاة الميمونة من الصدقة، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"هلَّا انتفعتم بجلدها". قالوا: إنها ميتة. قال:"إنما حرم أكلها".
متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1492)، ومسلم في الحيض (363: 101) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، حدثني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس فذكره.
ورواه مالك في الصيد (16) عن ابن شهاب به مثله.
وزاد مسلم (363: 100) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن الزهري به.
قوله:"هلّا أخذتم إهابها فدبغتموه فانتفعتم به".
وزاد أيضًا في بعض الطرق عن سفيان به، عن ابن عباس، عن ميمونة.
وزاد الدارقطني (1/ 42) - ومن طريقه البيهقي (1/ 20) - من حديث عمرو بن الربيع بن طارق، ثنا يحيى بن أيوب، عن عقيل، عن الزّهريّ به:"أو ليس في الماء والدباغ ما يطهرها؟" وفي لفظ: أو ليس في الماء والقرظ ما يطهرها؟".
وإسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب الغافقي المصري، وإن كان من رجال الشيخين إلا أن فيه مقالًا، ولكنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات.
والقرظ: شجر يدبغ به، وقيل هو ورق السَّلم يدبغ الأدم.
قال أبو حنيفة: القرظ أجود ما تُدبغ به الأُهب في أرض العرب، وهي تُدبغ بورقه وثمره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একটি মৃত বকরী দেখতে পেলেন, যা মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত দাসীকে সদকা হিসেবে দেওয়া হয়েছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তোমরা কেন এর চামড়া থেকে ফায়দা (উপকার) গ্রহণ করলে না?” তারা বলল, এটি তো মৃত (মৃত জন্তু)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “কেবল তা খাওয়াটাই হারাম করা হয়েছে।”