আল-জামি` আল-কামিল
7208 - عن سويد بن النعمان أنه أخبره: أنهم كانوا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالصهباء وهي على روحةٍ من خيبر، فحضرت الصّلاةُ، فدعا بطعام فلم يجده إِلَّا سويقا، فلاك منه فلُكْناه
معه، ثمّ دعا بماء فمضمض، ثمّ صلى وصلينا ولم يتوضأ.
صحيح: رواه البخاريّ في الأطعمة (5390) عن سليمان بن حرب، حَدَّثَنَا حمّاد عن يحيى، عن بشير بن يسار، عن سويد بن النعمان .. فذكره.
قوله:"إِلَّا سويقا" السويق: هو طعام يتخذ من مدقوق الحنطة والشعير، وقد وصفه أعرابي فقال: عدّة المسافر، وطعام العجلان، وبلغة المريض. الفتح (1/ 312).
قلت: ولعله يتخذ شرابا أيضًا كما تفيد الأحاديث الآتية:
সুওয়াইদ ইবনুন নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁকে অবহিত করেন যে, তারা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আস-সাহবা নামক স্থানে ছিলেন, যা খায়বার থেকে এক দিনের (বা এক বিকালের) সফরের দূরত্বে অবস্থিত। যখন সালাতের সময় উপস্থিত হলো, তখন তিনি খাবার আনতে বললেন। কিন্তু তাঁরা ছাতু (সাওীক) ছাড়া আর কিছুই পেলেন না। তিনি তা থেকে কিছু চিবালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে তা চিবিয়ে খেলাম। অতঃপর তিনি পানি চাইলেন এবং কুলি করলেন, এরপর সালাত আদায় করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম। তিনি নতুন করে ওযু করেননি।
7209 - عن أبي بردة قال: قدمتُ المدينة فلقيني عبد الله بن سلّام، فقال لي: انطلق إلى المنزل، فأسقيك في قدح شرب فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم وتصلي في مسجد صلى فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فانطلقت معه، فسقاني سويقا، وأطعمني تمرا، وصليت في مسجده.
صحيح: رواه البخاريّ في الاعتصام (7342) عن أبي كريب، حَدَّثَنَا أبو أسامة، حدثنا بُريد، عن أبي بردة قال .. فذكره.
ورواه في المناقب (3814) عن سليمان بن حرب، حَدَّثَنَا شعبة، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه بلفظ:"ألا تجيء فأطعمك سويقا وتمرًا وتدخل في بيت".
আবূ বুরদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মদিনায় আসলাম। তখন আমার সাথে আব্দুল্লাহ ইবনু সাল্লামের সাক্ষাৎ হলো। তিনি আমাকে বললেন: আপনি আমার বাড়িতে চলুন। আমি আপনাকে সেই পাত্রে পান করাবো, যে পাত্রে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পান করেছিলেন, এবং আপনি সেই মসজিদে সালাত আদায় করবেন যেখানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করেছিলেন। অতঃপর আমি তাঁর সাথে গেলাম। তিনি আমাকে ছাতু পান করালেন, খেজুর খাওয়ালেন এবং আমি তাঁর মসজিদে সালাত আদায় করলাম।
7210 - عن الشعبي قال: دخلنا على فاطمة بنت قيس فأتحفتنا برُطب ابن طاب، وسقتنا سويق سلت، فسألتها عن المطلقة ثلاثًا أين تعتد؟ قالت: طلقني بعلي ثلاثًا، فأذن لي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن أعتد في أهلي.
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (1480: 43) عن يحيى بن حبيب، حَدَّثَنَا خالد بن الحارث الهُجيميّ، حَدَّثَنَا قرة، حَدَّثَنَا سيَّار أبو الحكم، حَدَّثَنَا الشعبي قال .. فذكره.
ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (শা’বী বলেন) আমরা ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তিনি আমাদের রুতাব ইবনু তা’ব খেজুর দিয়ে আপ্যায়ন করলেন এবং যবের ছাভীক (সত্তু) পান করালেন। এরপর আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, যে মহিলাকে তিন তালাক দেওয়া হয়েছে, সে কোথায় ইদ্দত পালন করবে? তিনি বললেন: আমার স্বামী আমাকে তিন তালাক দিয়েছিলেন। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আমার পরিবারের কাছে ইদ্দত পালনের অনুমতি দিয়েছিলেন।
7211 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي طلحة:"التمسْ غلامًا من غلمانكم يخدمني، فخرج بي أبو طلحة يردفني وراءه، فكنت أخدم رسول الله صلى الله عليه وسلم كلما نزل، فكنت أسمعه يكثر أن يقول:"اللَّهُمَّ إني أعوذ بك من الهم والحزن والعجز والكسل والبخل والجبن وضلع الدين وغلبة الرجال" فلم أزل أخدمه حتَّى أقبلنا من خيبر، وأقبل بصفية بنت حيي قد حازها، فكنت أراه يحوي لها وراءه بعباءة - أو بكساء - ثمّ يردفها وراءه، حتَّى إذا كنا بالصهباء صنع حيسا في نطع، ثمّ أرسلني فدعوت رجالا فأكلوا، وكان ذلك بناءه بها، ثمّ أقبل حتَّى إذا بدا له أُحُد، قال: هذا جبل يحبنا ونحبه، فلمّا أشرف على المدينة قال: اللَّهُمَّ إني أحرم ما بين جبليها مثل ما
حرم به إبراهيم مكة، اللَّهُمَّ بارك لهم في مُدّهم وصاعهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5425) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا إسماعيل بن جعفر، عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب بن عبد الله بن حنطب، أنه سمع أنس بن مالك يقول .. فذكره.
ورواه مسلم في النكاح (1365) من وجوه أخرى عن أنس.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমাদের ছেলেদের মধ্য থেকে একটি গোলাম খুঁজে দাও, যে আমাকে খেদমত করবে।" এরপর আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে সাথে নিয়ে বের হলেন, তিনি আমাকে তাঁর পেছনে বসিয়ে নিলেন। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখনই কোথাও অবতরণ করতেন, তাঁর খেদমত করতাম। আমি তাঁকে প্রায়শই এই দু'আটি করতে শুনতাম: "হে আল্লাহ! আমি তোমার নিকট আশ্রয় চাই দুশ্চিন্তা ও পেরেশানি থেকে, অপারগতা ও অলসতা থেকে, কৃপণতা ও ভীরুতা থেকে, ঋণের বোঝা থেকে এবং মানুষের কর্তৃত্ব বা প্রাধান্য থেকে।"
আমি তাঁর খেদমত করতে থাকলাম, যতক্ষণ না আমরা খায়বার থেকে ফিরে আসলাম। তিনি সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিজের অধিকারে নিয়ে এলেন। আমি তাঁকে দেখতাম, তিনি সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পেছনে সওয়ারীর উপর বসানোর জন্য একটি চাদর বা কাপড়ের দ্বারা স্থান ঠিক করে দিতেন, অতঃপর তাঁকে পেছনে বসিয়ে নিতেন।
যখন আমরা সাহবা নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তিনি একটি দস্তরখান বিছিয়ে তার ওপর 'হাইস' (খেজুর, পনির ও ঘি মিশ্রিত এক প্রকার খাবার) তৈরি করলেন। অতঃপর আমাকে পাঠালেন, আমি লোকজনকে ডাকলাম, তারা এসে খেলো। আর এটিই ছিল তাঁর সাথে বাসর (বাসর রাতের ভোজ)।
এরপর তিনি মদীনার দিকে এলেন। যখন উহুদ পর্বত দৃষ্টিগোচর হলো, তিনি বললেন: "এই পর্বত আমাদেরকে ভালোবাসে এবং আমরাও তাকে ভালোবাসি।" যখন তিনি মদীনার কাছাকাছি এসে মদীনার দিকে তাকালেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! আমি ইব্রাহীম (আঃ) যেভাবে মক্কার দুটি পর্বতের মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম (পবিত্র এলাকা) করেছিলেন, ঠিক সেভাবেই এর দুই পর্বতের মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম ঘোষণা করছি। হে আল্লাহ! তুমি তাদের মুদ্দ ও সা’ (ওজন ও পরিমাপের পাত্র) এ বরকত দাও।"
7212 - عن عائشة أم المؤمنين قالت: دخل عليَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ذات يوم فقال:"هل عندكم شيء؟" فقلنا: لا. فقال:"فإني إذن صائم". ثمّ أتانا يومًا آخر فقلنا: يا رسول الله، أُهدي لنا حَيْسٌ، فقال:"أرينيه، فلقد أصبحتُ صائمًا". فأكل.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1154: 170) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا وكيع، عن طلحة بن يحيى، عن عمته عائشة بنت طلحة، عن عائشة أم المؤمنين قالت .. فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে আসলেন এবং বললেন, "তোমাদের কাছে কিছু আছে কি?" আমরা বললাম, "না।" তখন তিনি বললেন, "তাহলে আমি রোযা রাখলাম।" এরপর তিনি অন্য একদিন আমাদের কাছে আসলেন। আমরা বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল, আমাদের জন্য হায়স (খেজুর, ঘি ও আটা বা পনিরের মিশ্রণে তৈরি খাবার) হাদিয়া এসেছে।" তিনি বললেন, "আমাকে সেটি দেখাও। আমি তো রোযা শুরু করেছিলাম।" অতঃপর তিনি খেলেন।
7213 - عن عبد الله بن بسر قال: نزل رسول الله صلى الله عليه وسلم على أبيّ، قال: فقربنا إليه طعاما ووطبةً فأكل منها. الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2042) عن محمد بن المثنى العنزيّ، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن يزيد بن مير، عن عبد الله بن بسر قال .. فذكره.
قوله:"وطبة". قال النوويّ: هكذا رواية الأكثرين"وطْبة" بالواو وإسكان الطاء وبعدها باء موحدة. وهكذا رواه النضر بن شميل راوي هذا الحديث عن شعبة. والنضر إمام من أئمة اللغة. وفسَّره النضر فقال: الوطبة: الحيس بجمع التمر البرني والأقط المدقوق والسمن.
ونقل القاضي عياض عن رواية بعضهم في مسلم:"وطئة" بفتح الواو وكسر الطاء وبعدها همزة، وادعى أنه الصواب، وهكذا ادعاه آخرون. والوطئة بالهمز عند أهل اللغة: طعام يتخذ من التمر كالحيس، هذا ما ذكروه، ولا منافاة بين هذا كله. فيقبل ما صحت به الروايات وهو صحيح في اللغة. والله أعلم. شرح مسلم (12/ 225).
আবদুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পিতার ঘরে অতিথি হলেন। তিনি বললেন: অতঃপর আমরা তাঁর সামনে খাবার এবং একটি ‘ওয়াতবাহ’ পেশ করলাম। অতঃপর তিনি তা থেকে খেলেন।
7214 - عن محمود بن الربيع الأنصاري: أن عتبان بن مالك - وكان من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا من الأنصار -:"أنه أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله إني أنكرت بصري، وأنا أصلي لقومي، فإذا كانت الأمطار سال الوادي الذي بيني وبينهم، لم أستطع أن آتي مسجدهم فأصلي لهم، فوددت يا رسول الله أنك تأتي فتصلي في بيتي فأتخذه مصلى، فقال: سأفعل إن شاء الله، قال عتبان: فغدا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبو بكر حين ارتفع النهار، فاستأذن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأذنتُ له، فلم يجلس حتَّى دخل
البيت، ثمّ قال لي: أين تحب أن أصلي من بيتك؟ فأشرت إلى ناحية من البيت، فقام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فكبَّر، فصففنا، فصلى ركعتين، ثمّ سلَّم وحبسناه على خزير صنعناه، فثاب في البيت رجال من أهل الدار ذوو عدد فاجتمعوا، فقال قائل منهم: أين مالك ابن الدخشن؟ فقال بعضهم: ذلك منافقٌ، لا يحب الله ورسوله، قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تقل، ألا تراه قال: لا إله إِلَّا الله يريد بذلك وجه الله" قال: الله ورسوله أعلم، قال: قلنا: فإنا نرى وجهه، ونصيحته إلى المنافقين، فقال:"فإن الله حرَّم على النّار من قال: لا إله إِلَّا الله يبتغي بذلك وجه الله". قال ابن شهاب: ثمّ سألت الحصين بن محمد الأنصاري - أحد بني سالم، وكان من سراتهم - عن حديث محمود، فصدّقه.
وفي لفظ: على جشيشة صنعناها له.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5401)، ومسلم في المساجد (33: 263) كلاهما من طريق ابن شهاب قال: أخبرني محمود بن الربيع الأنصاري .. فذكره.
واللّفظ الآخر لمسلم (33: 265) من طريق الأوزاعيّ، عن ابن شهاب به مختصرًا.
قوله:"خزير صنعناه" بالخاء المعجمة وبالزاي وآخره راء ويقال:"خزيرة" بالهاء.
قال ابن قُتَيبة: الخزيرة: لحمٌ يقطّع صغارا، ثمّ يصب عليه ماء كثير، فإذا نضج، در عليه دقيق، فإن لم يكن فيها لحم، فهي عصيدة، وفي صحيح البخاريّ قال: قال النضر: الخزيرة من النخالة، والحريرة بالحاء المهملة والراء المكررة من اللبن، وكذا قال أبو الهيثم: إذا كانت من نخالة فهي خزيرة، وإذا كانت من دقيق فهي حريرة، والمراد نخالة فيها غليظ الدقيق.
قوله في الرواية الأخرى: جشيشة، قال شمر: هي أن تطحن الحنطة طحنا جليلا، ثمّ يلقى فيها لحم، أو تمر، فتطبخ به.
উতবান ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী ছিলেন এবং আনসারদের মধ্য থেকে বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন।
তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার দৃষ্টিশক্তি কমে গেছে। আর আমি আমার কওমের ইমামতি করি। যখন বৃষ্টি হয়, তখন আমার ও তাদের মধ্যবর্তী উপত্যকায় পানি ভরে যায়। তখন আমি তাদের মসজিদে গিয়ে তাদের নিয়ে সালাত আদায় করতে পারি না। তাই আমি চাই, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আমার বাড়িতে এসে সালাত আদায় করুন, যেন আমি সেই জায়গাটিকে সালাতের স্থান (মুসাল্লা) বানাতে পারি।"
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইনশাআল্লাহ, আমি তা করব।" উতবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: পরদিন সকালে দিনের অনেকটা উপরে উঠলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুমতি চাইলে আমি তাঁকে অনুমতি দিলাম। তিনি বসার আগেই ঘরের ভেতরে প্রবেশ করলেন। এরপর আমাকে বললেন: "তোমার ঘরের কোন অংশে আমি সালাত আদায় করি তা তুমি পছন্দ করো?" আমি ঘরের এক কোণে ইশারা করলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তাকবীর দিলেন। আমরা তাঁর পিছনে কাতার বাঁধলাম। তিনি দু'রাকাত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর সালাম ফেরালেন।
আমরা তাঁকে প্রস্তুত করা 'খাযীর' (এক প্রকার খাবার) খাওয়ার জন্য আটকে রাখলাম। ইতোমধ্যে ঘরের মালিকদের পক্ষ থেকে বেশ কিছু লোক (পুরুষ) ঘরে জড়ো হলো। তাদের মধ্যে একজন বলল: "মালিক ইবন আদ-দুখশুন কোথায়?" তখন তাদের কেউ কেউ বলল: "সে তো মুনাফিক, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে না।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ কথা বলো না। তুমি কি তাকে দেখোনি যে সে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর সে দ্বারা আল্লাহর সন্তুষ্টি চেয়েছে?" সে (উপস্থিত ব্যক্তি) বলল: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন।" আমরা বললাম: "আমরা তো তার চেহারা ও তার উপদেশ-পরামর্শ মুনাফিকদের দিকেই দেখি।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ সেই ব্যক্তির জন্য জাহান্নামের আগুনকে হারাম করে দিয়েছেন, যে আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে।"
অন্য একটি বর্ণনায় 'খাযীর' এর স্থলে 'জাশিশা' (খাদ্য বিশেষ) শব্দটি এসেছে।
7215 - عن لقيط بن صبرة قال: اتبعنا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فلم نجده، فأرسلت إلينا عائشة بعصيدةٍ وتمرٍ، وجاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يتقلع، فقال:"هل طعمتم من شيء؟" قلنا: نعم يا رسول الله.
وفي رواية:"فأمرت لنا بخزيرة فصنعت لنا".
صحيح: رواه أبو داود (143)، والنسائي في الكبرى (1965)، وأحمد (17846)، والحاكم (1/ 148) من طرق عن ابن جريج، ثنا إسماعيل بن كثير، عن عاصم بن لقيط بن صبِرة، عن أبيه، فذكره. والسياق للنسائيّ، ولم يسق أبو داود متنه، وهو عند أحمد بسياق أطول.
والرّواية الأخرى لأبي داود (142) من طريق يحيى بن سُليم، عن إسماعيل بن كثير، به في سياق أطول أيضًا. وإسناده صحيح.
লুকাইত ইবনু সবরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে অনুসরণ করলাম, কিন্তু তাকে পেলাম না। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে 'আছীদা' (এক প্রকার খাবার) ও খেজুর পাঠালেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অত্যন্ত দ্রুত পদক্ষেপে (বা ব্যস্ততার সাথে) এলেন এবং বললেন: "তোমরা কি কিছু খেয়েছো?" আমরা বললাম: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তিনি (আয়িশা) আমাদের জন্য 'খাজীরা' তৈরির নির্দেশ দিলেন এবং তা আমাদের জন্য তৈরি করা হলো।"
7216 - عن عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أنها كانت إذا مات الميِّت من أهلها، فاجتمع لذلك النساء، ثمّ تفرقن إِلَّا أهلها وخاصتها، أمرت ببُرمةٍ من تلبينةٍ فطبخت، ثمّ صُنعَ ثريدٌ، فصُبت التلبينة عليها، ثمّ قالت: كلن منها فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"التلبينة مُجمّة لفؤاد المريض، تذهب ببعض الحزن".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5417)، ومسلم في السّلام (2216) كلاهما من طريق اللّيث بن سعد، حَدَّثَنِي عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة .. فذكرته.
قوله:"التلبينة" ويقال: التلبين وهو حساء يُعمل من دقيق، أو نخالة وربما جُعل فيها عسل سميت به تشبيها باللبن لبياضها ورقَّتها.
وقوله:"مجمّة" أي مريحة، والجمام - بكسر الجيم -: الراحة.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর পরিবারের কেউ মারা যেতেন এবং সেই জন্য মহিলারা একত্রিত হতেন, এরপর তাঁর পরিবার ও ঘনিষ্ঠ জন ছাড়া অন্যরা চলে যেতেন, তখন তিনি এক ডেকচি তালবিনা (যব/আটা দিয়ে তৈরি এক প্রকার খাবার) রান্না করতে বলতেন। এরপর ছারীদ (রুটি বা গোশতের ঝোল মিশ্রিত খাবার) তৈরি করা হতো এবং তার উপর তালবিনা ঢালা হতো। অতঃপর তিনি বলতেন: তোমরা এটা খাও। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তালবিনা অসুস্থ ব্যক্তির হৃদয়ের জন্য আরামদায়ক এবং তা কিছু দুশ্চিন্তা দূর করে।"
7217 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: كنا نخرج في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفطر صاعا من طعام. وقال أبو سعيد: وكان طعامنا الشعير، والزبيب والأقط، والتمرُ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1510) عن معاذ بن فضالة، ثنا أبو عمر، عن زيد، عن عياض بن عبد الله بن سعد، عن أبي سعيد الخدريّ .. فذكره.
زيد هو ابن أسلم، وأبو عمر هو حفص بن ميسرة.
ورواه مسلم في الزّكاة (985) عن زيد بن أسلم، ومن طرق أخرى عن عياض بن عبد الله.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের যুগে ঈদুল ফিতরের দিন এক ‘সা’ পরিমাণ খাদ্য বের করতাম (যাকাতুল ফিতর হিসেবে)। আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরো বলেন, আমাদের খাদ্য ছিল যব, কিশমিশ, পনীর এবং খেজুর।
7218 - عن عائشة قالت: كان رسول الله يحب الحلواء والعسل.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5431)، ومسلم في الطلاق (1474: 21) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام، قال: أخبرني أبي، عن عائشة، فذكرته. واللّفظ للبخاريّ، وعند مسلم في حديث طويل.
وفي الباب عن عبد الله بن سلّام قال:"كنتُ مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في أناس من أصحابه، إذ أقبل عثمان بن عفّان ومعه راحلة عليها غَرارتين، وهو محتجز بعقال ناقته، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أي شيء في الغرارتين؟" قال: دقيق وسمن وعسل، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أنخْ" فأناخ، ثمّ دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بِبُرْمة، فجعل فيها من ذلك الدقيق والسمن والعسل، ثمّ لبَكهـ، ثمّ أكل، ثمّ قال لأصحابه:"كلوا هذا الذي تسمية فارسُ الخبيص".
أسأل عنه" رواه عبد الرزّاق.
وقد رجّح شيخ الإسلام ابن تيمية أن جبن المجوس حلال، وذلك لأن الصّحابة لما فتحوا بلاد العراق أكلوا جبن المجوس، وكان هذا ظاهرا شائعا بينهم، وما ينقل عن بعضهم من كراهة ذلك ففيه نظر، فإنه من نقل بعض الحجازيين، وفيه نظر. وأهل العراق كانوا أعلم بهذا، فإن المحبوس كانوا ببلادهم، ولم يكونوا بأرض الحجاز.
ويدل على ذلك أن سلمان الفارسي كان هو نائب عمر بن الخطّاب على المدائن، وكان يدعو الفرس إلى الإسلام، وقد ثبت عنه: أنه سئل عن شيء من السمن والجبن والفراء؟ فقال: الحلال ما أحل الله في كتابه، والحرام ما حرم الله في كتابه، وما سكت عنه فهو مما عفا عنه. وقد رواه أبو داود مرفوعًا إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. مجموع الفتاوي (21/ 103 - 104). وهو قول أبي حنيفة واحدي الروايتين عن أحمد. وأمّا ما رُوي عن ابن عمر أن قال:"أتي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بجُبنة في تبوك فدعا بسكين فسمّى وقطع". فهو مرسل. رواه أبو داود (3819) عن يحيى بن موسى البلخيّ، ثنا إبراهيم بن عيينة، عن عمرو بن منصور، عن الشعبيّ، عن ابن عمر، فذكره.
ومن هذا الوجه صحَّحه ابن حبَّان (5241).
وإبراهيم بن عيينة (وهو أخو سفيان بن عيينة) مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
وقد خالفه عيسى بن يونس فرواه عن عمرو بن منصور عن الشعبي مرسلًا. رواه ابن أبي شيبة (24913).
ورواه أيضًا عبد الرزّاق (8795) من وجه آخر عن عمرو بن منصور، عن الشعبيّ، والضحاك ابن مزاحم قالا: أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم بجبنة في غزوة تبوك فقيل: يا رسول الله إن هذا طعام يصنعه أهل فارس، أخشى أن يكون فيه ميتة قال:"سموا الله وكلوه". وهذا مرسل أيضًا وهو الصَّحيح.
وفي معناه ما رُوي عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أتي بجبنة، فجعل أصحابه يضربونها بالعصيّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ضعوا السكين واذكروا اسم الله وكلوا".
رواه أحمد (2080) والبزّار - كشف الأستار (2878) كلاهما من طريق وكيع بن الجراح، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن جابر، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ثمّ رواه البزّار (38797) من طريق ليث بن أبي سليم، عن جابر به بنحوه.
قال البزّار:"لا نعلم أحدًا يروي عن ابن عباس إِلَّا عكرمة، ولا عنه إِلَّا جابر".
قلت: وجابر هو الجعفي وهو متروك الحديث.
والحديث سئل عنه الإمام أحمد فقال:"هو حديث منكر". وانظر: جامع العلوم والحكم (ص 269 الحديث 30).
رواه الطبرانيّ في الكبير (14/ 315)، والأوسط (7688)، والحاكم (4/ 109 - 110) كلّهم من طريق الوليد بن مسلم قال: حَدَّثَنِي محمد بن حمزة بن يوسف بن عبد الله بن سلّام، عن أبيه، عن جده فذكره.
وقال الطبرانيّ:"لا يروى هذا الحديث عن عبد الله بن سلّام إِلَّا بهذا الإسناد، تفرّد به الوليد بن مسلم".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد". وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 37 - 38):"رواه الطبرانيّ في الثلاثة ورجال الصغير والأوسط ثقات".
قلت: ولكن في إسناده حمزة بن يوسف ويقال: حمزة بن محمد بن يوسف لم يرو عنه إِلَّا ابنه محمد، ولم يوثقه غير ابن حبَّان، وقد قال الذّهبيّ:"لا يعرف وقال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يُتابع ولم أجد له متابعًا.
وروي مسدد كما في المطالب العالية (2400) - بسند صحيح عن أنس بن مالك:"أنه أُتِيَ بخبيص في جام من فضة أو ذهب، فأمر به على رغيف ثمّ أكل منه".
والخبيص نوع من الحلوى يعمل من التمر والسمن والعسل.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হালুয়া ও মধু পছন্দ করতেন।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি কিতাবুল আত্বইমা-তে (৫৪৩১) এবং মুসলিম কিতাবুত ত্বলাক-এ (১৪৭৪: ২১) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই আবূ উসামা-এর সূত্রে, তিনি হিশাম থেকে, তিনি বলেন: আমাকে আমার পিতা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অবহিত করেছেন, অতঃপর তা উল্লেখ করেছেন। শব্দগুলো ইমাম বুখারীর। আর ইমাম মুসলিমের নিকট এটি একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ।
এ অনুচ্ছেদে আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও হাদীস রয়েছে। তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর সাহাবীগণের এক দলের মধ্যে ছিলাম, যখন উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আগমন করলেন। তাঁর সাথে একটি বাহন ছিল যার উপর দুটি বস্তা রাখা ছিল। তিনি তার উটের লাগাম দিয়ে কোমর বেঁধে রেখেছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "বস্তা দুটির ভেতরে কী আছে?" তিনি বললেন: আটা, ঘি ও মধু। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "বাহনটিকে বসাও।" অতঃপর তিনি সেটিকে বসালেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি পাতিল চাইলেন, অতঃপর তাতে সেই আটা, ঘি ও মধু ঢেলে দিলেন, এরপর তা মিশিয়ে নিলেন, অতঃপর খেলেন এবং তাঁর সাহাবীগণকে বললেন: "তোমরা এটা খাও, পারস্যবাসীরা যাকে 'খাবিস' বলে।" (এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল)। এটি আব্দুর রাযযাক বর্ণনা করেছেন।
শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়া মাজুসীদের (অগ্নিপূজকদের) তৈরি পনির হালাল হওয়ার অভিমতকে প্রাধান্য দিয়েছেন। কেননা সাহাবীগণ যখন ইরাকের শহরসমূহ জয় করলেন, তখন তাঁরা মাজুসীদের তৈরি পনির খেতেন। এটি তাদের মধ্যে সুস্পষ্ট ও প্রচলিত ছিল। তাদের কারও কারও থেকে যা মাকরুহ (অপছন্দনীয়) হওয়ার বর্ণনা এসেছে, তা পর্যালোচনার বিষয়। কেননা এটি কিছু হিজাযবাসীর বর্ণনা থেকে এসেছে, এবং এটি প্রশ্নবিদ্ধ। আর ইরাকের অধিবাসীরা এ বিষয়ে অধিক জ্ঞানী ছিলেন, কারণ মাজুসীরা তাদের দেশেই ছিল, হিজাযের ভূমিতে ছিল না। এর প্রমাণস্বরূপ বলা যায় যে, সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাদায়েনের উপর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নায়েব (প্রতিনিধি) ছিলেন এবং তিনি পারস্যবাসীদেরকে ইসলামের দিকে আহবান করতেন। তাঁর থেকে সহীহ সনদে বর্ণিত আছে: তাঁকে যখন ঘি, পনির ও ফার (লোমশ চামড়া) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো, তখন তিনি বললেন: "যা আল্লাহ তাঁর কিতাবে হালাল করেছেন, তাই হালাল। আর যা আল্লাহ তাঁর কিতাবে হারাম করেছেন, তাই হারাম। আর যা সম্পর্কে তিনি নীরব থেকেছেন, তা ক্ষমার আওতাভুক্ত।" এটি আবূ দাঊদ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত মারফূ‘ (উত্থিত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। (মাজমূ‘ আল-ফাতাওয়ি: ২১/১০৩-১০৪)। এটি ইমাম আবূ হানিফা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর এবং ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত দুটি মতের একটি।
আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: "তাবুকের যুদ্ধে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি পনির আনা হলো। তিনি ছুরি চেয়ে নিলেন, বিসমিল্লাহ বললেন এবং কাটলেন।" এটি মুরসাল (সনদ বিচ্ছিন্ন)। এটি আবূ দাঊদ (৩৮১৯) ইয়াহইয়া ইবনু মূসা আল-বালখী থেকে, তিনি ইবরাহীম ইবনু ‘উয়াইনাহ থেকে, তিনি আমর ইবনু মানসূর থেকে, তিনি শা‘বী থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, অতঃপর তা উল্লেখ করেছেন।
এই সূত্র ধরে ইবনু হিব্বান (৫২৪১) এটিকে সহীহ বলেছেন। ইবরাহীম ইবনু ‘উয়াইনাহ (তিনি সুফিয়ান ইবনু ‘উয়াইনাহর ভাই) সম্পর্কে মতভেদ আছে, তবে যদি তিনি কারো বিরোধিতা না করেন তবে তিনি হাসানুল হাদীস (উত্তম বর্ণনাকারী)। অথচ ঈসা ইবনু ইউনুস তাঁর বিরোধিতা করেছেন এবং তিনি এটি আমর ইবনু মানসূর থেকে, তিনি শা‘বী থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এটি ইবনু আবী শাইবাহ (২৪৯১৩) বর্ণনা করেছেন। আব্দুর রাযযাকও (৮৭৯৫) আমর ইবনু মানসূর থেকে ভিন্ন সূত্রে, তিনি শা‘বী ও যাহ্হাক ইবনু মুযাহিম থেকে বর্ণনা করেছেন। তারা দু'জন বলেন: তাবুক যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পনির আনা হলো। বলা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ, এটি পারস্যবাসীদের তৈরি খাবার, আমি আশঙ্কা করছি এতে মৃত প্রাণী (মৃত জীবজন্তুর উপাদান) থাকতে পারে। তিনি বললেন: "আল্লাহর নাম নাও এবং খাও।" এটিও মুরসাল, আর এটিই সঠিক।
এর কাছাকাছি অর্থে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি পনির আনা হলো, তখন তাঁর সাহাবীগণ লাঠি দিয়ে সেটিতে আঘাত করতে লাগলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ছুরি রাখো এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করো ও খাও।"
এটি আহমাদ (২০৮০) ও বাযযার— কাশফ আল-আস্তার (২৮৭৮) উভয়েই ওয়াকী ইবনুল জাররাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে ইসরাঈল হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি জাবির থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, অতঃপর তা উল্লেখ করেছেন।
এরপর বাযযার (৩৮৭৯৭) লায়স ইবনু আবী সুলাইমের সূত্রে জাবির থেকে এর কাছাকাছি বর্ণনা করেছেন। বাযযার বলেছেন: "আমরা জানি না ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ইকরিমা ব্যতীত কেউ এটি বর্ণনা করেছেন, আর ইকরিমা থেকেও জাবির ব্যতীত কেউ বর্ণনা করেছেন।" আমি (আলবানী) বলি: জাবির হলেন আল-জু‘ফী, যিনি হাদীসের ক্ষেত্রে মাতরূক (পরিত্যাজ্য)। এই হাদীসটি সম্পর্কে ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: "এটি মুনকার (অস্বীকার্য) হাদীস।" দেখুন: জামি‘ আল-‘উলূম ওয়াল হিকাম (পৃ. ২৬৯, হাদীস ৩০)।
এটি তাবারানী আল-কাবীর (১৪/৩১৫), আল-আওসাত (৭৬৮৮), এবং হাকিম (৪/১০৯-১১০) বর্ণনা করেছেন। সকলেই আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম-এর সূত্রে। তিনি বলেন: আমাকে মুহাম্মাদ ইবনু হামযাহ ইবনু ইউসুফ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন, অতঃপর তা উল্লেখ করেছেন। তাবারানী বলেন: "আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীসটি শুধু এই সনদেই বর্ণিত হয়েছে। ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম এতে একক।" হাকিম বলেন: "সনদ সহীহ।" হাইছামী 'আল-মাজমা‘'-এ (৫/৩৭-৩৮) বলেন: "তাবারানী এটি তিন গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং আস-সাগীর ও আল-আওসাত-এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য।" আমি (আলবানী) বলি: কিন্তু এর সনদে হামযাহ ইবনু ইউসুফ আছেন, অথবা বলা হয়: হামযাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ। তার থেকে তার পুত্র মুহাম্মাদ ব্যতীত কেউ বর্ণনা করেননি এবং ইবনু হিব্বান ছাড়া অন্য কেউ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি। যাহাবী বলেছেন: "তিনি অপরিচিত।" আর হাফিয ইবনু হাজার বলেছেন: "মাকবুল (গ্রহণযোগ্য)," অর্থাৎ যদি তাকে অনুসরণ করা হয়। কিন্তু আমি তার কোনো অনুসারী পাইনি।
মুসাদ্দাদ (যেমনটি আল-মাতা-লিব আল-‘আলিয়্যাহ গ্রন্থে (২৪০০) রয়েছে) সহীহ সনদে আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: "তাঁর নিকট রূপা বা সোনার থালায় করে খাবিস আনা হলে তিনি সেটি রুটির উপর রাখার নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তা থেকে খেলেন।"
আর খাবিস হচ্ছে এক প্রকার মিষ্টান্ন যা খেজুর, ঘি ও মধু দিয়ে তৈরি করা হয়।
7219 - عن جابر بن عبد الله: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سأل أهله الأدم، فقالوا: ما عندنا إِلَّا خلّ، فدعا به فجعل يأكل به ويقول:"نعم الْأُدم الخلُّ".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2052: 166) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا أبو عوانة، عن أبي بشر، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর পরিবারের কাছে সালুন (খাবারের সাথে খাওয়ার বস্তু) চাইলেন। তাঁরা বললেন: আমাদের কাছে সিরকা (খল) ছাড়া আর কিছু নেই। তখন তিনি তা আনতে বললেন এবং তা দিয়ে খেতে শুরু করলেন এবং বলতে লাগলেন: "সিরকা কতই না উত্তম সালুন।"
7220 - عن جابر بن عبد الله قال: أخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي ذات يوم إلى منزله، فأخرج إليه فلقا من خبز، فقال:"ما من أدم؟" فقالوا: لا، إِلَّا شيء من خلٍّ، قال: فإن الخل نعم الأدم".
قال جابر: فما زلتُ أحب الخلّ منذ سمعتها من نبي الله صلى الله عليه وسلم. وقال طلحة: ما زلت أحب الخل منذ سمعتها من جابر.
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2052: 161) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقي، حَدَّثَنَا إسماعيل ابن علية، عن المثنى بن سعيد، حَدَّثَنِي طلحة بن نافع، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাত ধরে তাঁর ঘরে নিয়ে গেলেন। তখন তাঁর কাছে এক টুকরা রুটি বের করা হলো। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "কোনো তরকারি (বা অদম) আছে কি?" তাঁরা বললেন: "না, তবে সামান্য পরিমাণ সিরকা আছে।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সিরকা কতই না উত্তম তরকারি।" জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন থেকে আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে এই কথা শুনেছি, তখন থেকে আমি সিরকা পছন্দ করে আসছি। আর তালহা বলেন: যখন থেকে আমি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে এই হাদীস শুনেছি, তখন থেকে আমি সিরকা পছন্দ করে আসছি।
7221 - عن جابر بن عبد الله قال: كنت جالسًا في داري، فمر بي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأشار إلي فقمت إليه، فأخذ بيدي، فانطلقنا حتَّى أتى بعض حجر نسائه، فدخل، ثمّ أذن لي، فدخلت الحجاب عليها، فقال:"هل من غداء؟" فقالوا: نعم، فأتي بثلاثة أقرصة، فوضعن علي نبيّ، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرصا، فوضعه بين يديه، وأخذ قرصا آخر فوضعه بين يديّ، ثمّ أخذ الثالث، فكسره باثنين، فجعل نصفه بين يديه، ونصفه بين يديّ، ثمّ قال:"هل من أدم؟" قالوا: لا، إِلَّا شيء من خل، قال:"هاتوه، فنعمَ الأدمُ هو".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2052: 169) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، أخبرنا حجَّاج بن أبي زينب، حَدَّثَنِي أبو سفيان طلحة بن نافع، قال: سمعت جابر بن عبد الله فذكره.
قوله:"فوضعن علي نبي". هكذا هو في أكثر الأصول: نبي، وفسروه بمائدة من خوص، ونقل القاضي عياض عن كثير من الرواة أو الأكثرين، أنه بتّيٌّ والبتّ: كساء من وبر أو صوف، فلعله منديل وضع عليه هذا الطعام. قال ورواه بعضهم: بُنّي. قال القاضي الكناني: هذا هو الصواب وهو طبق من خوص. قاله النوويّ.
وقوله:"فدخلت الحجاب عليها" أي دخلت الجهة التي فيها الحجاب بدون أن أرى بشرتها.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার ঘরে বসেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পাশ দিয়ে গেলেন। তিনি আমাকে ইশারা করলেন, তাই আমি তাঁর দিকে গেলাম। তিনি আমার হাত ধরলেন। আমরা চলতে লাগলাম, অবশেষে তিনি তাঁর স্ত্রীদের কক্ষগুলোর একটিতে এলেন এবং প্রবেশ করলেন। এরপর আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি পর্দার আড়াল দিয়ে প্রবেশ করলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “দুপুরের খাবার (নাস্তা) আছে কি?” তারা বললো: হ্যাঁ। তখন তিনটি রুটি আনা হলো। সেগুলো একটি 'নাবী' (খাবার রাখার স্থান বা মাদুর) এর উপর রাখা হলো। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি রুটি নিলেন এবং তাঁর সামনে রাখলেন। আরেকটি রুটি নিলেন এবং আমার সামনে রাখলেন। অতঃপর তিনি তৃতীয় রুটিটি নিলেন এবং সেটি দু'ভাগ করলেন। এক ভাগ তাঁর সামনে রাখলেন এবং অপর ভাগ আমার সামনে রাখলেন। এরপর তিনি বললেন: “কোন সালুন (সহযোগী খাবার) আছে কি?” তারা বললো: না, শুধুমাত্র কিছু সিরকা (ভিনেগার) ছাড়া। তিনি বললেন: “ওটা নিয়ে এসো। সিরকা কত উত্তম সালুন!”
7222 - عن عائشة، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: نعم الأدم أو الإدام - الخلُّ".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2051) عن عبد الله بن عبد الرحمن الدارميّ، أخبرنا يحيى بن حسان، أخبرنا سليمان بن بلال، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة .. فذكرته.
وأمّا ما رُوي عن أم هانئ بنت أبي طالب قالت: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"هل عندكم شيء؟" فقلت: لا إِلَّا كسرٌ يابسة وخلٌّ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"قرّبيه فما أفقر بيت من أدم فيه خلٌّ" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (1841) عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا ابن عَيَّاش، عن أبي حمزة الثُّمالي، عن الشعبيّ، عن أم هانئ بنت أبي طالب .. فذكرته.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه من حديث أم هانئ إِلَّا من هذا الوجه".
قلت: وإسناده ضعيف من أجل أبي حمزة الثُّماليّ، واسمه ثابت بن أبي صفية الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم، فقد ضعَّفه الإمام أحمد، ويحيى بن معين، وأبو حاتم، والنسائي وابن عدي، وابن حبَّان وغيرهم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সিরকা কতই না উত্তম তরকারি।"
7223 - عن أنس قال: جعل المهاجرون والأنصار يحفرون الخندق حول المدينة، وينقلون التراب على متونهم وهم يقولون:
نحن الذين بايعوا محمدًا … على الإسلام ما بقينا أبدًا
قال: يقول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يجيبهم:
اللَّهُمَّ إنه لا خير إِلَّا خير الآخرة … فبارك في الأنصار والمهاجره.
قال: يؤتون بملء كفي من الشعير، فيصنع لهم بإهالةٍ سنخةٍ توضع بين يدي القوم، والقوم جياع، وهي بشعة في الحلق، ولها ريح منتن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4101) عن أبي معمر، ثنا عبد الوارث، عن عبد العزيز، عن أنس .. فذكره.
ورواه مسلم في الجهاد والسير (1805) من وجوه أخرى عن أنس مختصرًا.
وقوله:"بإهالة": الدهن الذي يؤندم به سواء كان زيتا أو سمنا أو شحما. وقيل: هو ما أصاب من الألية والشحم وقيل: الاسم الجامد.
وقوله:"سنخة": المتغيرة الريح من قدمها.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাজির ও আনসারগণ মদীনার চারপাশে খন্দক (পরিখা) খনন করতে লাগলেন এবং নিজেদের পিঠে করে মাটি বহন করছিলেন। এ সময় তারা বলছিলেন:
আমরাই সেই ব্যক্তিরা, যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে ইসলামের উপর বায়'আত (শপথ) গ্রহণ করেছি, যতক্ষণ আমরা চিরকাল জীবিত থাকি।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জবাবে বলছিলেন:
হে আল্লাহ! আখিরাতের কল্যাণ ছাড়া আর কোনো কল্যাণ নেই। সুতরাং আনসার ও মুহাজিরগণকে বরকত দান করুন।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তাদের জন্য দুই হাতের অঞ্জলি ভরে যব আনা হতো। সেই যব বাসি ও দুর্গন্ধযুক্ত চর্বি (ইহালাত) দিয়ে রান্না করা হতো এবং ক্ষুধার্ত লোকজনের সামনে পরিবেশন করা হতো। সেই খাবার গলার কাছে খুবই কটু লাগত এবং তাতে পচা গন্ধ ছিল।
7224 - عن أنس قال: ولقد رهن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم درعه بشعير، ومشيتُ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بخبز
شعير وإهالة سنخة، ولقد سمعته يقول:"ما أصبح لآل محمد صلى الله عليه وسلم إِلَّا صاعٌ ولا أمسى"، وإنهم لتسعةُ أبيات.
صحيح: رواه البخاريّ في الرهن (2508) عن مسلم بن إبراهيم، ثنا هشام، ثنا قتادة، عن أنس فذكره.
وقوله:"وإنهم لتسعة أبيات" أي إن عنده لتسع نسوة كما رواه في البيوع (2069) بالإسناد نفسه وجاء فيه:"ما أمسى عند آل محمد صاع بر، ولا صاع حب". وإن عنده لتسع نسوة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তাঁর লৌহবর্ম যবের বিনিময়ে বন্ধক রেখেছিলেন। আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পচা চর্বি মিশ্রিত যবের রুটি নিয়ে গিয়েছিলাম। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য না সকালে এক সা (খাদ্য) অবশিষ্ট থাকতো, না সন্ধ্যায়।" অথচ তারা ছিলেন নয়টি পরিবার।
7225 - عن أنس: أن أم سليم أمه عمدتْ إلى مُدّ من شعير جشّتْه، وجعلت منه خطيفةً، وعصرتْ عُكَّةً عندها، ثمّ بعثني إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأتيتُه وهو في أصحابه - الحديث.
وفي لفظ:"ثمّ عمدت إلى عُكة كان فيها شيء من سمنٍ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5450) عن الصلت بن أحمد، ثنا حمّاد بن زيد، عن الجعد أبي عثمان، عن أنس. ورواه مسلم في الأشربة (2040) من وجوه أخرى عن أنس.
واللّفظ الآخر عند الإمام أحمد (12491) من طريق حمّاد بن زيد، عن هشام (هو ابن حسان القردوسي)، عن محمد (هو ابن سيرين) عن أنس فذكره.
قوله:"خطيفة" وزن عَصيدة ومعناه، وقيل: أصله أن يؤخذ لبن ويُدَرْ عليه دقيق، ويطبخ ويلعقها الناس، فيخطفونها بالأصابع والملاعق، فسميت بذلك وهي فعيلة بمعنى مفعولة. الفتح (9/ 574).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মা উম্মে সুলাইম এক মুদ্দ (পরিমাণ) যব নিলেন এবং তা আংশিকভাবে পিষে 'খাতিফাহ' (এক ধরনের খাবার) তৈরি করলেন। আর তিনি তাঁর কাছে থাকা একটি ঘিয়ের পাত্র (উক্কাহ) নিংড়ে নিলেন (বা মাখন বের করলেন)। অতঃপর তিনি আমাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম যখন তিনি তাঁর সাহাবীগণের সাথে ছিলেন— [এরপর হাদীছটি পূর্ণ করা হয়েছে]।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "অতঃপর তিনি একটি পাত্রের দিকে মনোযোগ দিলেন যাতে কিছু পরিমাণ ঘি (সামন) ছিল।"
7226 - عن جابر: أن أم مالك كانت تهدي للنبي صلى الله عليه وسلم في عكة لها سمنا، فيأتيها بنوها، فيسألون الأدم، وليس عندهم شيء، فتعمِدُ إلى الذي كانت تهدي فيه للنبيّ صلى الله عليه وسلم، فتجد فيه سمنا، فما زال يقيم لها أدم بيتها حتَّى عصرتْه، فأتت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال:"عصرتيها؟" قالت: نعم قال:"لو تركتيها ما زال قائمًا".
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2280) عن سلمة بن شبيب، ثنا الحسن بن أعين، ثنا معقل، عن أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.
وأمّا ما رُوي عن ابن عمر قال: دخل عليه عمر - وهو على مائدته - فأوسع له عن صدر المجلس، فقال: بسم الله. ثمّ ضرب بيده فلقمَ لقمةً. ثمّ ثنّى بأخرى. ثمّ قال: إني لأجد طعم دسم، ما هو بدسم اللحم؟ . فقال عبد الله: يا أمير المؤمنين إني خرجتُ إلى السوق أطلب السمين لأشتريه، فوجدته غاليا. فاشتريت بدرهم من المهزول، وحملتُ عليه بدرهم سمنا. فأردتُ أن يتردد عيالي عظما عظما. فقال عمر: ما اجتمعا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم قطّ إِلَّا أكل أحدهما، وتصدق
بالآخر. قال عبد الله: خذ يا أمير المؤمنين، فلن يجتمعا عندي إِلَّا فعلتُ ذلك. قال: ما كنت لأفعل". فهو ضعيف. رواه ابن ماجة (3361) عن أبي كريب، ثنا يحيى بن عبد الرحمن الأرحبيّ، ثنا يونس بن أبي يعفور، عن أبيه، عن ابن عمر .. فذكره.
وفي إسناده يونس بن أبي يعفور مختلف فيه، والغالب عليه الضعف، بل قال ابن حبَّان في المجروحين (3/ 139):"منكر الحديث يرُوي عن أبيه وعن الثّقات ما لا يشبه حديث الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به عندي بما انفرد به من الأخبار".
وضعّفه أيضًا ابن معين، والنسائيّ، ومشَّاه الآخرون.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর একটি চামড়ার পাত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ঘি উপঢৌকন দিতেন। অতঃপর তার ছেলেরা তার কাছে এসে তরকারি চাইত, কিন্তু তাদের কাছে কোনো তরকারি থাকত না। তখন সে সেই পাত্রটির দিকে যেত যা দ্বারা সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপঢৌকন দিত এবং দেখত তাতে ঘি ভর্তি রয়েছে। এভাবে তা তাদের ঘরের তরকারি হিসেবে বহাল থাকল, যতক্ষণ না সে পাত্রটি চেপে খালি করে দিল। অতঃপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। তিনি বললেন: "তুমি কি এটি চেপে খালি করে দিয়েছো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "যদি তুমি তা ছেড়ে দিতে, তবে তা বিদ্যমান থাকত।"
7227 - عن ميمونة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن الفأرة تقعُ في السمن فقال:"انزعوها وما حولها فاطرحوه".
وزاد في رواية:"وكلوا سمنكم".
صحيح: رواه مالك في الاستئذان (20) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس، عن ميمونة .. فذكرته.
ورواه البخاريّ في الوضوء (236) من طريق معن، عن مالك، به مثله.
وزاد: قال معن: حَدَّثَنَا مالك ما لا أحصيه يقول: عن ابن عباس، عن ميمونة.
والزيادة المذكورة أعلاه عند البخاريّ أيضًا (235) عن إسماعيل (هو ابن أبي أويس) عن مالك، به.
وقد جاء الوصف في بعض الروايات بأن السمن كان جامدًا.
رواه الإمام أحمد (26803) عن محمد بن مصعب، ثنا الأوزاعيّ، عن الزّهريّ، بإسناده وفيه:"في سمن لهم جامد".
وكذلك رواه النسائيّ (4259) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقيّ، ومحمد بن يحيى بن عبد الله النيسابوريّ، عن عبد الرحمن بن مهديّ، عن مالك، عن الزهري بإسناده وفيه:"في سمن جامد" إِلَّا أن بعض أهل العلم أعلوا هذه الزيادة بمخالفة أصحاب مالك الذين لم يذكروها.
ولكن يؤيدها ما رواه أبو داود الطيالسي (2839) عن سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس: أن فأرة وقعتْ في سمن جامد لآل ميمونة فأمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن تؤخذ الفأرة وما حولها.
وكذلك رواه حجَّاج بن المنهال فيما رواه البيهقيّ في المعرفة (19359) وكذلك إسحاق بن راهويه في مسنده كما في التلخيص (3/ 4) وهو عند ابن حبَّان في صحيحه (1392) كلاهما عن سفيان بن عيينة بإسناده بهذه الزيادة.
والسمن الجامد هو الذي يؤخذ منه ما حول الفأرة.
وفي الباب رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وقعت الفأرةُ في السمن، فإن كان جامدًا فألقوها وما حوله، وإن كان مائعا فلا تقربوه".
رواه أبو داود (3842)، وأحمد (7601) وصحّحه ابن حبَّان (1393 - 1394) كلّهم من طريق عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة .. فذكره.
وهو في مصنف عبد الرزّاق (278) ثمّ قال عقبه:"وقد كان معمر أيضًا يذكره عن الزّهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، عن ميمونة، وكذلك أخبرناه ابن عيينة". اهـ
فجعل معمر من ممسند أبي هريرة، ولذا أعلّه البخاريّ وغيره.
قال الترمذيّ (1798):"وروي معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحو حديث ميمونة. وهو حديث غير محفوظ. وسمعت محمد بن إسماعيل يقول: حديث معمر، عن الزهري … خطأ. والصحيح حديث الزّهريّ، عن عبيد الله، عن ابن عباس، عن ميمونة.
وقال غيره: الطريقان صحيحان، نقل الحافظ ابن حجر في الفتح (9/ 668) عن الذهلي أنه جزم بأن الطريقين صحيحان.
قلت: وكذا صحَّحه أيضًا ابن حبَّان وأخرجه في صحيحه، واكتفى البغوي في شرح السنة (2812) بإخراج حديث أبي هريرة، ثمّ ذكر بعده إعلال البخاريّ، ولكنه لم يخرج حديث ميمونة الذي في الصَّحيح كعادته.
وفي رواية أبي هريرة زيادة مفيدة وهي:"إن كان مائعا فلا تقربوه" أي أكلا وطعامًا، لأن غير الماء من المائعات إذا وقعت فيها النجاسة ينجس قلّ ذلك المائع أو كثر بخلاف الماء، فإنه لا ينجس عند الكثرة ما لم يتغير بالنجاسة.
ولذلك اتفق أهل العلم على أن الزيت إذا ماتت فيه فأرة أو وقعت فيه نجاسة أخرى أنه ينجس، ولا يجوز أكله.
وأمّا الانتفاع به كالاستصباح فجائز على الصَّحيح.
وقال تعالى: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ} [التين: 1].
মায়মুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এমন একটি ইঁদুর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যা ঘিয়ের (বা মাখনের) মধ্যে পড়ে গিয়েছিল। তিনি বললেন: "তোমরা সেটিকে এবং তার আশেপাশের অংশটুকু বের করে ফেলে দাও।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: "আর তোমরা তোমাদের (বাকি) ঘি খাও।"