হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7221)


7221 - عن جابر بن عبد الله قال: كنت جالسًا في داري، فمر بي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأشار إلي فقمت إليه، فأخذ بيدي، فانطلقنا حتَّى أتى بعض حجر نسائه، فدخل، ثمّ أذن لي، فدخلت الحجاب عليها، فقال:"هل من غداء؟" فقالوا: نعم، فأتي بثلاثة أقرصة، فوضعن علي نبيّ، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرصا، فوضعه بين يديه، وأخذ قرصا آخر فوضعه بين يديّ، ثمّ أخذ الثالث، فكسره باثنين، فجعل نصفه بين يديه، ونصفه بين يديّ، ثمّ قال:"هل من أدم؟" قالوا: لا، إِلَّا شيء من خل، قال:"هاتوه، فنعمَ الأدمُ هو".

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2052: 169) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، أخبرنا حجَّاج بن أبي زينب، حَدَّثَنِي أبو سفيان طلحة بن نافع، قال: سمعت جابر بن عبد الله فذكره.

قوله:"فوضعن علي نبي". هكذا هو في أكثر الأصول: نبي، وفسروه بمائدة من خوص، ونقل القاضي عياض عن كثير من الرواة أو الأكثرين، أنه بتّيٌّ والبتّ: كساء من وبر أو صوف، فلعله منديل وضع عليه هذا الطعام. قال ورواه بعضهم: بُنّي. قال القاضي الكناني: هذا هو الصواب وهو طبق من خوص. قاله النوويّ.

وقوله:"فدخلت الحجاب عليها" أي دخلت الجهة التي فيها الحجاب بدون أن أرى بشرتها.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার ঘরে বসেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পাশ দিয়ে গেলেন। তিনি আমাকে ইশারা করলেন, তাই আমি তাঁর দিকে গেলাম। তিনি আমার হাত ধরলেন। আমরা চলতে লাগলাম, অবশেষে তিনি তাঁর স্ত্রীদের কক্ষগুলোর একটিতে এলেন এবং প্রবেশ করলেন। এরপর আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি পর্দার আড়াল দিয়ে প্রবেশ করলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “দুপুরের খাবার (নাস্তা) আছে কি?” তারা বললো: হ্যাঁ। তখন তিনটি রুটি আনা হলো। সেগুলো একটি 'নাবী' (খাবার রাখার স্থান বা মাদুর) এর উপর রাখা হলো। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি রুটি নিলেন এবং তাঁর সামনে রাখলেন। আরেকটি রুটি নিলেন এবং আমার সামনে রাখলেন। অতঃপর তিনি তৃতীয় রুটিটি নিলেন এবং সেটি দু'ভাগ করলেন। এক ভাগ তাঁর সামনে রাখলেন এবং অপর ভাগ আমার সামনে রাখলেন। এরপর তিনি বললেন: “কোন সালুন (সহযোগী খাবার) আছে কি?” তারা বললো: না, শুধুমাত্র কিছু সিরকা (ভিনেগার) ছাড়া। তিনি বললেন: “ওটা নিয়ে এসো। সিরকা কত উত্তম সালুন!”









আল-জামি` আল-কামিল (7222)


7222 - عن عائشة، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: نعم الأدم أو الإدام - الخلُّ".

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2051) عن عبد الله بن عبد الرحمن الدارميّ، أخبرنا يحيى بن حسان، أخبرنا سليمان بن بلال، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة .. فذكرته.

وأمّا ما رُوي عن أم هانئ بنت أبي طالب قالت: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"هل عندكم شيء؟" فقلت: لا إِلَّا كسرٌ يابسة وخلٌّ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"قرّبيه فما أفقر بيت من أدم فيه خلٌّ" فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (1841) عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا ابن عَيَّاش، عن أبي حمزة الثُّمالي، عن الشعبيّ، عن أم هانئ بنت أبي طالب .. فذكرته.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه من حديث أم هانئ إِلَّا من هذا الوجه".

قلت: وإسناده ضعيف من أجل أبي حمزة الثُّماليّ، واسمه ثابت بن أبي صفية الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم، فقد ضعَّفه الإمام أحمد، ويحيى بن معين، وأبو حاتم، والنسائي وابن عدي، وابن حبَّان وغيرهم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সিরকা কতই না উত্তম তরকারি।"









আল-জামি` আল-কামিল (7223)


7223 - عن أنس قال: جعل المهاجرون والأنصار يحفرون الخندق حول المدينة، وينقلون التراب على متونهم وهم يقولون:

نحن الذين بايعوا محمدًا … على الإسلام ما بقينا أبدًا

قال: يقول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يجيبهم:

اللَّهُمَّ إنه لا خير إِلَّا خير الآخرة … فبارك في الأنصار والمهاجره.

قال: يؤتون بملء كفي من الشعير، فيصنع لهم بإهالةٍ سنخةٍ توضع بين يدي القوم، والقوم جياع، وهي بشعة في الحلق، ولها ريح منتن.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4101) عن أبي معمر، ثنا عبد الوارث، عن عبد العزيز، عن أنس .. فذكره.

ورواه مسلم في الجهاد والسير (1805) من وجوه أخرى عن أنس مختصرًا.

وقوله:"بإهالة": الدهن الذي يؤندم به سواء كان زيتا أو سمنا أو شحما. وقيل: هو ما أصاب من الألية والشحم وقيل: الاسم الجامد.

وقوله:"سنخة": المتغيرة الريح من قدمها.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাজির ও আনসারগণ মদীনার চারপাশে খন্দক (পরিখা) খনন করতে লাগলেন এবং নিজেদের পিঠে করে মাটি বহন করছিলেন। এ সময় তারা বলছিলেন:

আমরাই সেই ব্যক্তিরা, যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে ইসলামের উপর বায়'আত (শপথ) গ্রহণ করেছি, যতক্ষণ আমরা চিরকাল জীবিত থাকি।

আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জবাবে বলছিলেন:

হে আল্লাহ! আখিরাতের কল্যাণ ছাড়া আর কোনো কল্যাণ নেই। সুতরাং আনসার ও মুহাজিরগণকে বরকত দান করুন।

আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তাদের জন্য দুই হাতের অঞ্জলি ভরে যব আনা হতো। সেই যব বাসি ও দুর্গন্ধযুক্ত চর্বি (ইহালাত) দিয়ে রান্না করা হতো এবং ক্ষুধার্ত লোকজনের সামনে পরিবেশন করা হতো। সেই খাবার গলার কাছে খুবই কটু লাগত এবং তাতে পচা গন্ধ ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7224)


7224 - عن أنس قال: ولقد رهن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم درعه بشعير، ومشيتُ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بخبز
شعير وإهالة سنخة، ولقد سمعته يقول:"ما أصبح لآل محمد صلى الله عليه وسلم إِلَّا صاعٌ ولا أمسى"، وإنهم لتسعةُ أبيات.

صحيح: رواه البخاريّ في الرهن (2508) عن مسلم بن إبراهيم، ثنا هشام، ثنا قتادة، عن أنس فذكره.

وقوله:"وإنهم لتسعة أبيات" أي إن عنده لتسع نسوة كما رواه في البيوع (2069) بالإسناد نفسه وجاء فيه:"ما أمسى عند آل محمد صاع بر، ولا صاع حب". وإن عنده لتسع نسوة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তাঁর লৌহবর্ম যবের বিনিময়ে বন্ধক রেখেছিলেন। আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পচা চর্বি মিশ্রিত যবের রুটি নিয়ে গিয়েছিলাম। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য না সকালে এক সা (খাদ্য) অবশিষ্ট থাকতো, না সন্ধ্যায়।" অথচ তারা ছিলেন নয়টি পরিবার।









আল-জামি` আল-কামিল (7225)


7225 - عن أنس: أن أم سليم أمه عمدتْ إلى مُدّ من شعير جشّتْه، وجعلت منه خطيفةً، وعصرتْ عُكَّةً عندها، ثمّ بعثني إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأتيتُه وهو في أصحابه - الحديث.

وفي لفظ:"ثمّ عمدت إلى عُكة كان فيها شيء من سمنٍ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5450) عن الصلت بن أحمد، ثنا حمّاد بن زيد، عن الجعد أبي عثمان، عن أنس. ورواه مسلم في الأشربة (2040) من وجوه أخرى عن أنس.

واللّفظ الآخر عند الإمام أحمد (12491) من طريق حمّاد بن زيد، عن هشام (هو ابن حسان القردوسي)، عن محمد (هو ابن سيرين) عن أنس فذكره.

قوله:"خطيفة" وزن عَصيدة ومعناه، وقيل: أصله أن يؤخذ لبن ويُدَرْ عليه دقيق، ويطبخ ويلعقها الناس، فيخطفونها بالأصابع والملاعق، فسميت بذلك وهي فعيلة بمعنى مفعولة. الفتح (9/ 574).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মা উম্মে সুলাইম এক মুদ্দ (পরিমাণ) যব নিলেন এবং তা আংশিকভাবে পিষে 'খাতিফাহ' (এক ধরনের খাবার) তৈরি করলেন। আর তিনি তাঁর কাছে থাকা একটি ঘিয়ের পাত্র (উক্কাহ) নিংড়ে নিলেন (বা মাখন বের করলেন)। অতঃপর তিনি আমাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম যখন তিনি তাঁর সাহাবীগণের সাথে ছিলেন— [এরপর হাদীছটি পূর্ণ করা হয়েছে]।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "অতঃপর তিনি একটি পাত্রের দিকে মনোযোগ দিলেন যাতে কিছু পরিমাণ ঘি (সামন) ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (7226)


7226 - عن جابر: أن أم مالك كانت تهدي للنبي صلى الله عليه وسلم في عكة لها سمنا، فيأتيها بنوها، فيسألون الأدم، وليس عندهم شيء، فتعمِدُ إلى الذي كانت تهدي فيه للنبيّ صلى الله عليه وسلم، فتجد فيه سمنا، فما زال يقيم لها أدم بيتها حتَّى عصرتْه، فأتت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال:"عصرتيها؟" قالت: نعم قال:"لو تركتيها ما زال قائمًا".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2280) عن سلمة بن شبيب، ثنا الحسن بن أعين، ثنا معقل، عن أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.

وأمّا ما رُوي عن ابن عمر قال: دخل عليه عمر - وهو على مائدته - فأوسع له عن صدر المجلس، فقال: بسم الله. ثمّ ضرب بيده فلقمَ لقمةً. ثمّ ثنّى بأخرى. ثمّ قال: إني لأجد طعم دسم، ما هو بدسم اللحم؟ . فقال عبد الله: يا أمير المؤمنين إني خرجتُ إلى السوق أطلب السمين لأشتريه، فوجدته غاليا. فاشتريت بدرهم من المهزول، وحملتُ عليه بدرهم سمنا. فأردتُ أن يتردد عيالي عظما عظما. فقال عمر: ما اجتمعا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم قطّ إِلَّا أكل أحدهما، وتصدق
بالآخر. قال عبد الله: خذ يا أمير المؤمنين، فلن يجتمعا عندي إِلَّا فعلتُ ذلك. قال: ما كنت لأفعل". فهو ضعيف. رواه ابن ماجة (3361) عن أبي كريب، ثنا يحيى بن عبد الرحمن الأرحبيّ، ثنا يونس بن أبي يعفور، عن أبيه، عن ابن عمر .. فذكره.

وفي إسناده يونس بن أبي يعفور مختلف فيه، والغالب عليه الضعف، بل قال ابن حبَّان في المجروحين (3/ 139):"منكر الحديث يرُوي عن أبيه وعن الثّقات ما لا يشبه حديث الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به عندي بما انفرد به من الأخبار".

وضعّفه أيضًا ابن معين، والنسائيّ، ومشَّاه الآخرون.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর একটি চামড়ার পাত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ঘি উপঢৌকন দিতেন। অতঃপর তার ছেলেরা তার কাছে এসে তরকারি চাইত, কিন্তু তাদের কাছে কোনো তরকারি থাকত না। তখন সে সেই পাত্রটির দিকে যেত যা দ্বারা সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপঢৌকন দিত এবং দেখত তাতে ঘি ভর্তি রয়েছে। এভাবে তা তাদের ঘরের তরকারি হিসেবে বহাল থাকল, যতক্ষণ না সে পাত্রটি চেপে খালি করে দিল। অতঃপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। তিনি বললেন: "তুমি কি এটি চেপে খালি করে দিয়েছো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "যদি তুমি তা ছেড়ে দিতে, তবে তা বিদ্যমান থাকত।"









আল-জামি` আল-কামিল (7227)


7227 - عن ميمونة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن الفأرة تقعُ في السمن فقال:"انزعوها وما حولها فاطرحوه".

وزاد في رواية:"وكلوا سمنكم".

صحيح: رواه مالك في الاستئذان (20) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس، عن ميمونة .. فذكرته.

ورواه البخاريّ في الوضوء (236) من طريق معن، عن مالك، به مثله.

وزاد: قال معن: حَدَّثَنَا مالك ما لا أحصيه يقول: عن ابن عباس، عن ميمونة.

والزيادة المذكورة أعلاه عند البخاريّ أيضًا (235) عن إسماعيل (هو ابن أبي أويس) عن مالك، به.

وقد جاء الوصف في بعض الروايات بأن السمن كان جامدًا.

رواه الإمام أحمد (26803) عن محمد بن مصعب، ثنا الأوزاعيّ، عن الزّهريّ، بإسناده وفيه:"في سمن لهم جامد".

وكذلك رواه النسائيّ (4259) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقيّ، ومحمد بن يحيى بن عبد الله النيسابوريّ، عن عبد الرحمن بن مهديّ، عن مالك، عن الزهري بإسناده وفيه:"في سمن جامد" إِلَّا أن بعض أهل العلم أعلوا هذه الزيادة بمخالفة أصحاب مالك الذين لم يذكروها.

ولكن يؤيدها ما رواه أبو داود الطيالسي (2839) عن سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس: أن فأرة وقعتْ في سمن جامد لآل ميمونة فأمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن تؤخذ الفأرة وما حولها.

وكذلك رواه حجَّاج بن المنهال فيما رواه البيهقيّ في المعرفة (19359) وكذلك إسحاق بن راهويه في مسنده كما في التلخيص (3/ 4) وهو عند ابن حبَّان في صحيحه (1392) كلاهما عن سفيان بن عيينة بإسناده بهذه الزيادة.
والسمن الجامد هو الذي يؤخذ منه ما حول الفأرة.

وفي الباب رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وقعت الفأرةُ في السمن، فإن كان جامدًا فألقوها وما حوله، وإن كان مائعا فلا تقربوه".

رواه أبو داود (3842)، وأحمد (7601) وصحّحه ابن حبَّان (1393 - 1394) كلّهم من طريق عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة .. فذكره.

وهو في مصنف عبد الرزّاق (278) ثمّ قال عقبه:"وقد كان معمر أيضًا يذكره عن الزّهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، عن ميمونة، وكذلك أخبرناه ابن عيينة". اهـ

فجعل معمر من ممسند أبي هريرة، ولذا أعلّه البخاريّ وغيره.

قال الترمذيّ (1798):"وروي معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحو حديث ميمونة. وهو حديث غير محفوظ. وسمعت محمد بن إسماعيل يقول: حديث معمر، عن الزهري … خطأ. والصحيح حديث الزّهريّ، عن عبيد الله، عن ابن عباس، عن ميمونة.

وقال غيره: الطريقان صحيحان، نقل الحافظ ابن حجر في الفتح (9/ 668) عن الذهلي أنه جزم بأن الطريقين صحيحان.

قلت: وكذا صحَّحه أيضًا ابن حبَّان وأخرجه في صحيحه، واكتفى البغوي في شرح السنة (2812) بإخراج حديث أبي هريرة، ثمّ ذكر بعده إعلال البخاريّ، ولكنه لم يخرج حديث ميمونة الذي في الصَّحيح كعادته.

وفي رواية أبي هريرة زيادة مفيدة وهي:"إن كان مائعا فلا تقربوه" أي أكلا وطعامًا، لأن غير الماء من المائعات إذا وقعت فيها النجاسة ينجس قلّ ذلك المائع أو كثر بخلاف الماء، فإنه لا ينجس عند الكثرة ما لم يتغير بالنجاسة.

ولذلك اتفق أهل العلم على أن الزيت إذا ماتت فيه فأرة أو وقعت فيه نجاسة أخرى أنه ينجس، ولا يجوز أكله.

وأمّا الانتفاع به كالاستصباح فجائز على الصَّحيح.



وقال تعالى: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ} [التين: 1].




মায়মুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এমন একটি ইঁদুর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যা ঘিয়ের (বা মাখনের) মধ্যে পড়ে গিয়েছিল। তিনি বললেন: "তোমরা সেটিকে এবং তার আশেপাশের অংশটুকু বের করে ফেলে দাও।"

অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: "আর তোমরা তোমাদের (বাকি) ঘি খাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7228)


7228 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلوا الزيتَ وادّهنوا به فإنه من شجرة مباركة".

وفي لفظ:"ائتدِموا بالزيت".

حسن: رواه الترمذيّ (1851)، وابن ماجة (3319)، والحاكم (4/ 123) كلّهم من طرق عن عبد الرزّاق، عن معمر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر .. فذكره. واللّفظ للترمذيّ، واللّفظ الآخر لابن ماجة والحاكم.

ورواه من هذا الوجه أيضًا الضياء المقدسي في المختارة (82، 83).

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".

وهو كما قال، ولكن فيه علة خفية، وهي أن عبد الزراق قد اضطرب في إسناده، فرواه عن معمر هكذا موصولًا.

ورواه في مصنفه (19568) عن معمر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال .. فذكره. ولم يقل:"عن عمر".

وتارةً يرويه عن معمر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه قال: أحسبه عن عمر، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال .. فذكره هكذا بالشك.

وقد أشار الترمذيّ عقب الحديث إلى هذا الاختلاف فقال:"وكان عبد الرزّاق يضطرب في رواية هذا الحديث" ثمّ ذكر هذه الوجوه.

وقد جزم البخاريّ بترجيح الحديث المرسل كما في العلل الكبير (3/ 779)، وكذا يحيى بن معين كما في تاريخه برواية الدوري (595)، وإليه يؤمن كلام أبي حاتم الرازي في العلل (1520) بأن عبد الرزّاق رواه دهرًا من حياته مرسلًا، ثمّ أسنده عن عمر في آخر عمره.

قلت: وإن كان المحفوظ فيه الإرسال عن عبد الرزّاق، كما قاله هولاء الأئمة النقاد غير أنه جاء من وجه آخر موصولًا عن زيد بن أسلم، وهو ما رواه الطحاويّ في شرح مشكل الآثار (4448)، والطَّبرانيّ في الأوسط (9192) من طريق أبي قرة، عن زمعة بن صالح، عن زياد بن سعد، عن زيد بن أسلم قال: سمعت أبي يحدث عن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم .. فذكر مثله.

وفي إسناده زمعة بن صالح الجندي اليُمنى فيه ضعف من قبل حفظه، وبقية رجاله ثقات. وأبو قرة هو: موسى بن طارق الزبيدي اليمانيّ، فالإسناد يصلح في المتابعات وبه يرتقي الحديث إلى درجة الحسن. ورُوي بمعناه عن أبي أسيد قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"كلوا الزيت وادهنوا به فإنه من شجرة مباركة" إِلَّا أن فيه جهالة.

رواه الترمذيّ (1852)، وأحمد (16054)، والنسائي في الكبرى (6669)، والحاكم (2 /
397 - 398) كلّهم من طرق عن سفيان الثوريّ، عن عبد الله بن عيسى، عن رجل يقال له: عطاء من أهل الشام، عن أبي أسيد فذكره.

ووقع عند أحمد:"عن أبي أسيد - أو أبي أَسيد بن ثابت، شكَّ سفيان - وأبو أَسيد يقال اسمه: عبد الله بن ثابت الأنصاري قاله الدَّارقطنيّ في العلل (7/ 32 - 33) قال:"ومن قال فيه: أبو أسيد. بالضم - فقد وهِمَ" ووافقه الخطيب البغدادي في موضع الأوهام (2/ 179).

قال الترمذيّ:"حديث غريب من هذا الوجه إنّما نعرفه من حديث سفيان الثوريّ، عن عبد الله بن عيسى" اهـ وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وليس كما قال؛ لأن عطاء هذا ليس هو ابن أبي رباح كما قد يتبادر، ولا سيما وقد وقع مهملا عند الحاكم، وإنما هو رجل آخر من أهل الشام كما جاء مبينا عند الترمذيّ وغيره، ولم يرو عنه غير عبد الله بن عيسى ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته (7/ 252) على عادته في توثيق من لم يعرف فيه جرح، ولذلك أورده الذّهبيّ في الميزان (3/ 77) فقال:"عطاء الشّاميّ عن أبي أسيد في أكل الزيت ليّن البخاريّ حديثه". وكذلك روي بمعناه أيضًا عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلوا الزيتَ وادهنوا به، فإنه مبارك".

رواه ابن ماجة (3320)، والحاكم (2/ 398) من طريق صفوان بن عيسى القاضي، ثنا عبد الله بن سعيد، قال: سمعت جدي يحدث عن أبي هريرة .. فذكره.

ذكره الحاكم شاهدًا الحديث أبي أسيد السابق وصحَّح إسناده، فتعقبه الذّهبيّ بقوله:"قلت: عبد الله واهٍ" يعني عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ المدنيّ، فإنه متروك.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যয়তুন খাও এবং তা দিয়ে মালিশ করো, কেননা এটি বরকতপূর্ণ গাছ থেকে উৎপন্ন।" অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "তোমরা যয়তুন তেলকে সালন হিসেবে ব্যবহার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (7229)


7229 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يجوع أهل بيت عندهم التمرُ".

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2046) عن عبد الله بن عبد الرحمن الدارميّ، أخبرنا يحيى بن حسَّان، حَدَّثَنَا سلمان بن بلال، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة .. فذكرته.

وأخرجه الترمذيّ (1815) من هذا الوجه، ونقل عن البخاريّ أنه قال:"لا أعلم أحدًا رواه غير يحيى بن حسان".

قلت: وليس كما قال، بل رواه أيضًا مروان بن محمد - وهو ابن حسان الأسدي الدّمشقيّ ثقة - عن سليمان بن بلال بإسناده. رواه ابن ماجة (3327)، وصحّحه ابن حبَّان (5206).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, “যে বাড়িতে খেজুর আছে, সে বাড়ির লোকেরা ক্ষুধার্ত থাকে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (7230)


7230 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عائشة بيتٌ لا تمر فيه جياعٌ أهلُه، يا عائشة بيتٌ لا تمر فيه جياعٌ أهله - أو جاع أهلُه" - قالها مرتين أو ثلاثًا.

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2046: 153) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حَدَّثَنَا
يعقوب بن محمد بن طحلاء، عن أبي الرجال محمد بن عبد الرحمن، عن أمه (هي عمرة بنت عبد الرحمن)، عن عائشة … فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে আয়িশা, যে ঘরে খেজুর নেই, সে ঘরের অধিবাসীরা ক্ষুধার্ত। হে আয়িশা, যে ঘরে খেজুর নেই, সে ঘরের অধিবাসীরা ক্ষুধার্ত”— তিনি এই কথাটি দুই অথবা তিনবার বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7231)


7231 - عن سلمى أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"بيتٌ لا تمر فيه كالبيت لا طعام فيه".

حسن: رواه ابن ماجة (3328) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدّمشقيّ، ثنا ابن أبي فُديك، ثنا هشام بن سعد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن جدته سلمى .. فذكرته.

وإسناده حسن، من أجل هشام بن سعد المدنيّ، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يخالف، أو يأتي بمنكر، بل يشهد له حديث عائشة السابق، وبقية رجاله ثقات. وابن أبي فديك هو: محمد بن إسماعيل بن مسلم بن أبي فديك المدني.

ورواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 299) من طريق سعيد بن سليمان الواسطيّ، ثنا إسماعيل بن زكريا، عن حارثة بن محمد، أخبرني عبيد الله بن أبي رافع، عن أمه وكانت خادما للنبي صلى الله عليه وسلم قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"بيت لا تمر فيه جياع أهله".

كذا ذكره بلفظ حديث عائشة، وقال:"عن أمه" بدل"عن جدته". فجعل الحديث من مسند الخادم لرسول الله صلى الله عليه وسلم وليس لسلمى، والأوّل أصح.




سلمى (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ঘরে খেজুর নেই, সে ঘর এমন, যে ঘরে কোনো খাবার নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (7232)


7232 - عن أبي هريرة قال: قسم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يومًا بين أصحابه تمرا، فأعطى كل إنسان سبع تمرات، فأعطاني سبع تمرات، إحداهن حَشفةٌ، فلم تكن فيهن تمرة أعجب إلى منها شدّتْ في مضاغي.

صحيح: رواه البخاريّ في الأطعمة (5411) عن أبي النعمان، حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، عن عباس الجريريّ، عن أبي عثمان النهديّ، عن أبي هريرة .. فذكره.

قوله:"حشفة" الحشف رديء التمر، وهي تيبس الرطبة في النخلة قبل أن ينتهي طيبُها.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের মাঝে খেজুর বণ্টন করলেন। তিনি প্রত্যেক ব্যক্তিকে সাতটি করে খেজুর দিলেন। তিনি আমাকেও সাতটি খেজুর দিলেন, সেগুলোর মধ্যে একটি ছিল হাশফা [নিম্নমানের শুষ্ক খেজুর]। কিন্তু সেই খেজুরগুলোর মধ্যে ওইটির চেয়ে আমার কাছে অধিক প্রিয় আর কোনো খেজুর ছিল না, যা চিবানোর সময় আমার মাড়িতে শক্তভাবে আটকে গিয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7233)


7233 - عن أنس بن مالك قال: أُتي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بتمر عتيق، فجعل يُفتشه يُخرج السوسَ منه. وفي لفظ:"فيه دود".

صحيح: رواه أبو داود (3832)، وابن ماجة (3333) من طريق سلْم بن قتيبة أبي قتيبة، عن همام، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك .. فذكره. وليس عند ابن ماجة:"يخرج السوس منه". واللّفظ الآخر رواه أبو داود عقبه عن محمد بن كثير، ثنا همام بإسناده.

وإسناده صحيح. وهمام هو: ابن يحيى العوذي.

وأمّا ما رُوي عن ابن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُفتّش التمرُ عما فيه". فهو ضعيف.

رواه الطبرانيّ في الكبير (13787)، والبيهقي في الشعب (5883) من طريق محمد بن بكار، ثنا
إسماعيل بن زكريا، عن قيس بن الربيع، عن جبلة بن سُحيم، عن ابن عمر فذكره. وإسناده ضعيف من أجل قيس بن الربيع.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 42):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، وفيه قيس بن الربيع، وثَّقه شعبة والثوريّ، وضعّفه يحيى القطان، وبقية رجاله ثقات".

كذا عزاه للأوسط وأظنه سبق قلم، فإني لم أجده فيه ولا في مجمع البحرين.

وله طريق آخر لا يفرح به، أخرجه أيضًا الطبرانيّ في الكبير (13830)، والبيهقي في الشعب (5885) من طريق داود بن الزبرقان، عن حفص بن عمران الكنديّ، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عمر نحوه. وداود بن الزبرقان متروك، كذّبه الأزدي.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু পুরাতন খেজুর আনা হলো। অতঃপর তিনি তা পরীক্ষা করতে লাগলেন এবং এর ভেতর থেকে পোকা বের করে ফেলতে লাগলেন। অন্য এক বর্ণনায় আছে, তাতে পোকা ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (7234)


7234 - عن ابنَيْ بُسر السُلميين قالا: دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقدمنا زبدًا وتمرًا؟ ، وكان يحب الزبد والتمر.

صحيح: رواه أبو داود (3837)، وابن ماجة (3334) من طريق ابن جابر، حَدَّثَنِي سُليم بن عامر، عن ابنيْ بُسر فذكراه.

وإسناده صحيح، ابن جابر هو: عبد الرحمن بن يزيد بن جابر الشامي، وابنا بسر هما: عبد الله وعطية صحابيان.

وفي الباب عن إسماعيل بن أبي خالد، عن أبيه قال: دخلت على رجل وهو يتجمع لبنا بتمر، فقال: ادْنُ، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمَّاها الأطيبين.

رواه أحمد (15893) عن وكيع، ثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن أبيه فذكره.

وفي إسناده أبو خالد الأحمسي البجليّ، تفرّد بالرواية عنه ابنه إسماعيل، ولم يوثقه غير ابن حبَّان، لذا قال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يتابع، ولا أعلم له متابعا.

فقول الهيثميّ في"المجمع" (5/ 41)"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح، خلا أبا خالد وهو ثقة، بناء على اعتماده على توثيق ابن حبَّان، كما مر مرارًا.

قوله:"وهو يتجمّع" التجمع والمَجْع: أكل التمر باللبن وهو أن يحسو حُسوة من اللبن ويأكل على أثرها تمرة.

وأمّا ما رُوي عن يوسف بن عبد الله بن سلّام قال: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أخذ كِسرةً من خبز شعير، فوضع عليها تمرة وقال:"هذه إدام هذه". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3830)، والتِّرمذيّ في الشمائل (185) من طريق عمر بن حفص، ثنا أبي، عن محمد بن أبي يحيى، عن يزيد الأعور، عن يوسف بن عبد الله بن سلام … فذكره. وإسناده ضعيف
من أجل جهالة يزيد وهو ابن أبي أمية الأعور.




বুসরের দুই পুত্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের কাছে আগমন করলেন। তখন আমরা তাঁর সামনে মাখন ও খেজুর পেশ করলাম। আর তিনি মাখন ও খেজুর পছন্দ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7235)


7235 - عن جابر بن عبد الله قال: كان بالمدينة يهودي، وكان يُسلفني في تمري إلى الجُذاذ، وكانت لجابر الأرض التي بطريق رومة، فجلست فخلا عاما، فجاءني اليهودي عند الجذاذ، ولم أجد منها شيئًا، فجعلت أستنظره إلى قابل، فيأبى، فأُخبِرَ بذلك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال لأصحابه: امشوا نستنظر لجابر من اليهوديّ، فجاءوني في نخلي، فجعل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يكلم اليهوديّ، فيقول: أبا القاسم لا أنظره، فلمّا رأى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قام فطاف في النخل، ثمّ جاءه فكلّمه، فأبى، فقمت فجئت بقليل رطب، فوضعتُه بين يدي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فأكل، ثمّ قال: أين عريشك يا جابر؟ فأخبرته، فقال: افرش لي فيه، ففرشتُه، فدخل فرقد، ثمّ استيقظ، فجئته بقبضة أخرى، فأكل منها، ثمّ قام فكلّم اليهوديّ، فأبى عليه، فقام في الرطاب في النخل الثانية، ثمّ قال: يا جابر جُذَّ واقضِ، فوقف في الجذاذ، فجذذتُ منها ما قضيته، وفضَلَ منه، فخرجتُ حتَّى جئتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فبشره، فقال:"أشهد أني رسول الله".

صحيح: رواه البخاريّ في الأطعمة (5443) عن سعيد بن أبي مريم، حَدَّثَنَا أبو غسَّان، حَدَّثَنِي أبو حازم، عن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي ربيعة، عن جابر بن عبد الله … فذكره.

قوله:"إلى الجذاذ". بكسر الجيم ويجوز فتحها، والذال المعجمة ويجوز إهمالها أي زمن قطع ثمر النخل وهو الصرام.

قوله:"استنظره" أي استهمله.

قوله:"عرشك" هو المكان الذي يتخذ في البستان ليستظل فيه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মদিনায় একজন ইহুদি ছিল। সে আমার খেজুর কাটার সময় (জুযা‌য) পর্যন্ত আমার খেজুরের ব্যাপারে আমাকে ঋণ দিত। জাবিরের জমিটি রোমা যাওয়ার পথে ছিল। এক বছর আমি বসে থাকলাম এবং ফলন খারাপ হলো। ফলে খেজুর কাটার সময় (জুযা‌য) লোকটি আমার কাছে এল, কিন্তু আমি এর থেকে কিছুই পেলাম না। আমি তাকে আগামী বছর পর্যন্ত সময় দিতে অনুরোধ করতে লাগলাম, কিন্তু সে অস্বীকার করল। এই খবর নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে পৌঁছল। তিনি তাঁর সাহাবীদেরকে বললেন: চলো, আমরা জাবিরের জন্য ইহুদিটির কাছ থেকে সময় চেয়ে নিই। তারা আমার খেজুর বাগানে আমার কাছে আসলেন। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহুদিটির সঙ্গে কথা বলতে লাগলেন, কিন্তু সে বলতে থাকল: আবুল কাসিম! আমি তাকে সময় দেব না। যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখলেন (যে সে মানছে না), তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং খেজুর গাছের চারাগুলোর মধ্যে ঘুরলেন। অতঃপর আবার তার কাছে এসে কথা বললেন, কিন্তু সে অস্বীকার করল। আমি উঠে কিছু ভেজা খেজুর নিয়ে আসলাম এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে রাখলাম। তিনি খেলেন। এরপর তিনি বললেন: হে জাবির! তোমার আরিশ (ছাউনি) কোথায়? আমি তাঁকে জানালাম। তিনি বললেন: আমার জন্য এর মধ্যে বিছানা প্রস্তুত করো। আমি বিছানা প্রস্তুত করলাম। তিনি সেখানে প্রবেশ করে ঘুমালেন। অতঃপর তিনি জেগে উঠলেন। আমি তাঁর জন্য আরেক মুঠো খেজুর নিয়ে আসলাম। তিনি তা থেকে খেলেন। এরপর তিনি উঠে দাঁড়িয়ে ইহুদিটির সঙ্গে কথা বললেন, কিন্তু সে তার উপর (কথা রাখতে) অস্বীকার করল। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার সেই খেজুর চারাগুলোর মধ্যে গিয়ে দাঁড়ালেন। অতঃপর বললেন: হে জাবির! খেজুর কাটো এবং পরিশোধ করো। তিনি খেজুর কাটার জায়গায় দাঁড়িয়ে রইলেন। আমি তা থেকে (খেজুর) কেটে নিলাম যা দিয়ে আমি তার ঋণ পরিশোধ করলাম। এর পরেও অতিরিক্ত থেকে গেল। আমি বের হলাম এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে সুসংবাদ দিলাম। তখন তিনি বললেন: "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি আল্লাহ্‌র রাসূল।"









আল-জামি` আল-কামিল (7236)


7236 - عن عبد الله بن عمر قال: بينا نحن عند النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم جلوس إذا أتي بِجُمَّار نخلة، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من الشجر لما بركته كبركة المسلم" فظننتُ أنه يعني النخلة، فأردت أن أقول: هي النخلة يا رسول الله، ثمّ التفتُّ فإذا أنا عاشر عشرة أنا أحدثهم فسكتُّ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"هي النخلة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5444) عن عمر بن حفص بن غياث، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا الأعمش، قال: حَدَّثَنِي مجاهد، عن عبد الله بن عمر .. فذكره. ورواه مسلم في صفة القيامة.
والجنة والنار (2811) من وجه آخر عن مجاهد مختصرًا.

قوله:"بجُمّار" بضم الميم وتشديدها وهو: الذي يؤكل من قلب النخل يكون لينا.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম, তখন খেজুর গাছের জুম্মার (ভেতরের নরম অংশ) আনা হলো। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বৃক্ষসমূহের মধ্যে এমন একটি বৃক্ষ আছে, যার বরকত একজন মুসলিমের বরকতের মতো।" আমি ধারণা করলাম যে তিনি খেজুর গাছকেই বুঝিয়েছেন। আমি বলতে চাইলাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেটি খেজুর গাছ। এরপর আমি চারদিকে তাকিয়ে দেখলাম যে আমি দশজনের মধ্যে দশম এবং তাদের মধ্যে আমিই ছিলাম সবচেয়ে কম বয়সী। তাই আমি চুপ করে রইলাম। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা হলো খেজুর গাছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7237)


7237 - عن سهل بن سعد قال: إن كنا لنفرح بيوم الجمعة، كانت لنا عجوز تأخذ أصول السِّلق، فتجعله في قدر لها، فتجعل فيه حبّات من شعير، إذا صلينا زُرناها، فقرّبته
إلينا، وكنا نفرح بيوم الجمعة من أجل ذلك، وما كنا نتغدى، ولا نقبل إِلَّا بعد الجمعة، والله ما فيه شحم ولا ودك.

صحيح: رواه البخاريّ في الأطعمة (5403) عن يحيى بن بكير، حَدَّثَنَا يعقوب بن عبد الرحمن، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد .. فذكره.

قوله:"أصول السلق" بكسر السين المهملة نوع من البقل لها ورق طوال، وأصلٌ ذاهب في الأرض، وورقها غضٌّ طري يؤكل مطبوخا. وقوله:"ولا ودك" هو الدسم وزنا ومعنى.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা জুমু‘আর দিন আসলেই খুশি হতাম। আমাদের এক বৃদ্ধা মহিলা ছিলেন, যিনি সিল্ল্ক্ব (পালংশাক জাতীয় এক প্রকার উদ্ভিদ) এর মূল সংগ্রহ করতেন, এবং তা তার একটি পাত্রে রান্না করতেন, আর তাতে কিছু যবের দানা মিশিয়ে দিতেন। যখন আমরা (জুমু‘আর সালাত) পড়ে নিতাম, তখন আমরা তার কাছে যেতাম। আর তিনি তা আমাদের সামনে পরিবেশন করতেন। আর এই কারণেই আমরা জুমু‘আর দিন খুব খুশি হতাম। জুমু‘আর (সালাতের) পরই কেবল আমরা খাবার খেতাম এবং ভোজ গ্রহণ করতাম। আল্লাহর কসম! তাতে কোনো চর্বি বা মেদ (তেল) থাকত না।









আল-জামি` আল-কামিল (7238)


7238 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمن الذي يقرأ القرآن كمثل الأترجة ريحها طيب، وطعمها طيب ......". الحديث.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5427)، ومسلم في صلاة المسافرين وقصرها (797) كلاهما عن قتيبة بن سعيد - وزاد مسلم أبا كامل الجحدري - عن أبي عوانة، عن قتادة، عن أنس فذكره بتمامه.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে মু'মিন কুরআন পাঠ করে তার উদাহরণ হলো আতার্জ্জা ফলের মতো, যার গন্ধও উত্তম এবং স্বাদও উত্তম। ... (বাকি হাদীস)।









আল-জামি` আল-কামিল (7239)


7239 - عن جابر بن عبد الله قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمر الظهران نجني الكباث، فقال:"عليكم بالأسود منه، فإنه أطيب"، فقيل: أكنتَ ترعى الغنم؟ قال: نعم."وهل من نبي إِلَّا رعاها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5453)، ومسلم في الأشربة (2050) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر بن عبد الله .. فذكره.

وقوله:"الكباث": هو النضيج من ثمر الأراك، حبُّه فويق حب الكزبرة في القدر. كما في المعجم الوسيط.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাররুজ-জাহরান নামক স্থানে ছিলাম এবং কাবাছ (আরাক ফলের পাকা ফল) সংগ্রহ করছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমরা এর মধ্যে কালো ফলগুলো নাও, কারণ সেগুলোই বেশি সুস্বাদু।" অতঃপর জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি কি বকরি চরাতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। এমন কোনো নবী নেই, যিনি বকরি চরাননি।









আল-জামি` আল-কামিল (7240)


7240 - عن كلدة بن حنبل: أن صفوان بن أمية بعثه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بلبن وجِداية وضغأبيس، والنبي صلى الله عليه وسلم بأعلى مكة، فدخلتُ، ولم أسلّم فقال:"ارجع فقل: السّلام عليكم"، وذاك بعد ما أسلم صفوان بن أمية.

حسن: رواه أبو داود (5176)، والتِّرمذيّ (2710)، والنسائي في الكبرى (6702)، وأحمد (15425) كلهم من طرق عن ابن جريج، أخبرني عمرو بن أبي سفيان، أن عمرو بن عبد الله بن
صفوان أخبره أن كلدة بن حنبل أخبره .. فذكره.

وزادوا في آخره: وقال عمرو (يعني ابن أبي سفيان): وأخبرني بهذا الحديث أمية بن صفوان عن كلدة بن حنبل، ولم يقل: سمعته من كلدة.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن عبد الله فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إِلَّا من حديث ابن جريج".

وقال: وضغأبيس: هو حشيش يؤكل.

وفي النهاية: هي صغار القثاء واحدها ضغبوس.




কُلদাহ ইবনে হানবাল থেকে বর্ণিত, সাফওয়ান ইবনে উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু দুধ, একটি ছাগলছানা এবং দগাবিস (এক প্রকার ভোজ্য শাক/ঘাস) সহ পাঠালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কার উঁচু অংশে অবস্থান করছিলেন। আমি প্রবেশ করলাম, কিন্তু সালাম দিলাম না। তখন তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং বলো, 'আসসালামু আলাইকুম'।" আর এটি ঘটেছিল সাফওয়ান ইবনে উমাইয়া ইসলাম গ্রহণের পর।