হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7241)


7241 - عن سعد قال: رأيتني سابعَ سبعة مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ما لنا طعام إِلَّا ورق الحُبْلة أو الحبلة - حتَّى يضع أحدنا ما تضعُ الشاة، ثمّ أصبحت بنو أسد تعزِّرُني على الإسلام، خسرتُ إذا وضلّ سعيي.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5412)، ومسلم في الزهد والرقائق (2966: 12) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس (هو ابن أبي حازم)، عن سعد (هو ابن أبي وقَّاص) قال .. فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

قوله:"ورق الحُبْلة" قيل المراد به ثمر العضاه وثمر السمر، وهو يشبه اللوبيا كذا في الفتح. وفي المعجم الوسيط: الحُبْلة: ثمرة فصيلة القطانيات كالفول والعدس والفاصوليا وغيرها، وتكون ذات فلقتين ويضع بزرات، وهي تتفتّح عندما تنضج.

وقوله:"بنو أسد": المراد به بنو الزُّبير بن العوام. ومعني تعزرني توبخني على التقصير فيه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাতজনের মধ্যে সপ্তম। আমাদের জন্য হুবলাহ গাছের পাতা ছাড়া কোনো খাবার ছিল না, এমনকি আমাদের কারো কারো মল ছাগলের মলের মতো হতো। এরপর বনু আসাদ গোত্রের লোকেরা ইসলামের ব্যাপারে আমাকে তিরস্কার করতে শুরু করল। যদি তাই হয়, তবে তো আমি ক্ষতিগ্রস্ত হয়ে গেলাম এবং আমার প্রচেষ্টা ব্যর্থ হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (7242)


7242 - عن ابن عمر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال في غزوة خيبر:"من أكل من هذه الشجرة يعني الثوم - فلا يقرب مسجدنا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (853)، ومسلم في المساجد (561: 68) كلاهما من طريق يحيى القطان، عن عبيد الله، حَدَّثَنِي نافع، عن ابن عمر .. فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের সময় বললেন: "যে ব্যক্তি এই গাছ থেকে খায়—অর্থাৎ রসুন—সে যেন আমাদের মসজিদের নিকটবর্তী না হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7243)


7243 - عن عبد العزيز بن صُهَيب قال: سئل أنس عن الثوم؟ فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من أكل من هذه الشجرة فلا يقربنّا، ولا يُصَلِّي معنا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5451)، ومسلم في المساجد (562) كلاهما من طريق عبد العزيز بن صُهَيب به. واللّفظ لمسلم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে রসুন সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি এই গাছ (সবজি) থেকে খায়, সে যেন আমাদের কাছে না আসে এবং আমাদের সাথে সালাত আদায় না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (7244)


7244 - عن جابر بن عبد الله، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أكل ثوما أو بصلا فليعتزلنا أو ليعتزل مسجدنا - ولتقعد في بيته، وإنه أتي بقِدْر فيه خضرات من بقول، فوجد لها ريحا، فسأل فأخبر بما فيها من البقول، فقال: قرّبوها إلى بعض أصحابه، فلمّا رآه كره أكلها، قال: كُلْ فإني أناجي من لا تناجي".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (855)، ومسلم في المساجد (564: 73) - والسياق له - من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، حَدَّثَنِي عطاء بن أبي رباح، أن جابر بن عبد الله قال .. فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি রসুন বা পেঁয়াজ খাবে, সে যেন আমাদের থেকে দূরে থাকে, অথবা আমাদের মসজিদ থেকে দূরে থাকে, আর সে যেন তার বাড়িতেই অবস্থান করে।" (একবার) তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) কাছে একটি ডেকচি আনা হলো, যাতে শাকসবজির তরকারি ছিল। তিনি সেগুলোর গন্ধ পেলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, তখন তাতে কী ধরনের শাকসবজি আছে, তা তাঁকে জানানো হলো। তখন তিনি বললেন: "তোমরা এটি তাঁর কয়েকজন সাহাবীর কাছে নিয়ে যাও।" যখন তিনি দেখলেন যে (সাহাবী) তা খেতে অপছন্দ করছেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "খাও। কেননা আমি তাঁর সাথে গোপনে কথা বলি, যার সাথে তোমরা গোপনে কথা বলো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7245)


7245 - عن جابر بن عبد الله، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من أكل من هذه البقلة الثوم وقال مرة:

من أكل البصل والثوم والكراث - فلا يقربن مسجدنا، فإن الملائكة تتأذّى مما تتأذى منه بنو آدم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (564: 78) عن محمد بن حاتم، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، عن جابر .. فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এই সবজি—অর্থাৎ রসুন—খায়।" আর অন্য এক বার তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি পেঁয়াজ, রসুন ও কুররাছ খায়, সে যেন আমাদের মসজিদের কাছে না আসে। কারণ ফেরেশতাগণও সেই জিনিস দ্বারা কষ্ট পান, যা দ্বারা আদম সন্তান কষ্ট পেয়ে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7246)


7246 - عن جابر قال:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أكل البصل والكراث، فغلبتْنا الحاجة فأكلنا منها، فقال: من أكل من هذه الشجرة المنتنة فلا يقربن مسجدنا؛ فإن الملائكة تتأذى مما تتأذى منه الإنس".

صحيح: رواه مسلم في المساجد ومواضع الصّلاة (564: 72) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا كثير بن هشام، عن هشام الدستوائيّ، عن أبي الزُّبير .. فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পেঁয়াজ ও কুররাস (এক প্রকার শাক) খেতে নিষেধ করেছেন। কিন্তু প্রয়োজনের কারণে আমরা তা খেয়েছিলাম। তখন তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি এই দুর্গন্ধযুক্ত গাছটি (পেঁয়াজ/রসুন/কুররাস) খায়, সে যেন আমাদের মসজিদের কাছাকাছি না আসে; কারণ, মানুষ যা দ্বারা কষ্ট পায়, ফেরেশতারাও তা দ্বারা কষ্ট পান।"









আল-জামি` আল-কামিল (7247)


7247 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من أكل من هذه الشجرة فلا يقربن مسجدنا، ولا يؤذينا بريح الثوم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (563: 71) من طريق عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهريّ، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة .. فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি এই (বিশেষ) সবজি থেকে খায়, সে যেন আমাদের মসজিদের কাছে না আসে এবং রসুনের গন্ধ দ্বারা আমাদের কষ্ট না দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7248)


7248 - عن أبي سعيد قال: لم نعدُ أن فتحت خيبر، فوقعنا أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في تلك البقلة النوم، والناس جياع، فأكلنا منها أكلا شديدًا، ثمّ رحنا إلى المسجد، فوجد رسول الله صلى الله عليه وسلم الريح، فقال:"من أكل من هذه الشجرة الخبيثة شيئًا فلا يقربنا في المسجد"، فقال الناس: حرمت حرمت فبلغ ذاك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال:"أيها الناس! إنه ليس بي تحريم ما أحلّ الله ليّ، ولكنها شجرة أكره ريحَها".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (565) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا إسماعيل ابن عُلية، عن
الجُريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد .. فذكره.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খায়বার বিজয়ের পর পরই আমরা—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ—সেই তীব্র গন্ধযুক্ত (নওম) সবজিটি খেতে শুরু করলাম। লোকেরা ছিল ক্ষুধার্ত। আমরা তা থেকে প্রচুর খেলাম। অতঃপর আমরা মসজিদের দিকে রওনা হলাম। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গন্ধ পেলেন, তখন তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি এই নিকৃষ্ট গাছের কিছু খেয়েছে, সে যেন আমাদের নিকটবর্তী না হয়, অর্থাৎ মসজিদে না আসে।" লোকেরা তখন বলতে লাগল: এটা হারাম হয়ে গেছে, এটা হারাম হয়ে গেছে। এ কথা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছালে তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি আমার জন্য আল্লাহ যা হালাল করেছেন, তা হারাম করতে চাই না। বরং এটি এমন একটি গাছ, যার গন্ধ আমি অপছন্দ করি।"









আল-জামি` আল-কামিল (7249)


7249 - عن أبي سعيد الخدريّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم على زرّاعة بصل هو وأصحابه، فنزل ناس منهم فأكلوا منه، ولم يأكل آخرون، فرُحنا إليه، فدعا الذين لم يأكلوا البصل، وأخّر الآخرين حتَّى ذهب ريحُها.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (566) من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو، عن بكير الأشجّ، عن ابن خباب (وهو عبد الله)، عن أبي سعيد الخدريّ .. فذكره.

وفي الباب عن أبي سعيد الخدريّ أنه ذُكر عند رسول الله صلى الله عليه وسلم الثوم والبصل، وقيل: يا رسول الله وأشدُّ ذلك كله الثوم أفتحرّمه؟ فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: كلوه ومن أكله منكم فلا يقرب هذا المسجد حتَّى يذهب منه ريحُه".

رواه أبو داود (3823) عن أحمد بن صالح، ثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو، أن بكر بن سوادة حدَّثه، أن أبا النجيب مولى عبد الله بن سعد حدَّثه، أن أبا سعيد الخدريّ حدَّثه .. فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (1669) من طريق يونس بن عبد الأعلى، عن ابن وهب بإسناده وزاد:"والكراث".

وفي الإسناد أبو النجيب لم يوثقه غير ابن حبَّان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" يعني حيث يتابع وإلَّا فلين الحديث، ولم اجد من تابعه.

وبقية رجاله ثقات، وعمرو هو: ابن عبد الحارث المصري ثقة فقيه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে সাথে নিয়ে একটি পেঁয়াজের ক্ষেতের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তাঁদের মধ্য থেকে কিছু লোক নেমে তা থেকে খেলেন, কিন্তু অন্যরা খেলেন না। অতঃপর আমরা তাঁর নিকট পৌঁছলাম। তখন তিনি সেই লোকদের ডাকলেন যারা পেঁয়াজ খায়নি, আর অন্যদেরকে পিছনে রাখলেন যতক্ষণ না তাদের মুখের দুর্গন্ধ দূর হল।

আর এই বিষয়ে আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট রসুন ও পেঁয়াজ সম্পর্কে আলোচনা করা হল। জিজ্ঞাসা করা হলো: ইয়া রাসূলুল্লাহ! এগুলোর মধ্যে সবচেয়ে তীব্র গন্ধযুক্ত হচ্ছে রসুন, আপনি কি তা হারাম ঘোষণা করবেন? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা তা খাও, কিন্তু তোমাদের মধ্যে যে তা খাবে, সে যেন এই মসজিদের নিকটবর্তী না হয়, যতক্ষণ না এর দুর্গন্ধ দূর হয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (7250)


7250 - عن معدان أبي طلحة، أن عمر بن الخطّاب خطب يوم الجمعة، فذكر نبي الله صلى الله عليه وسلم وذكر أبا بكر وذكر خطبة طويلة - قال في آخرها:"ثمّ إنكم أيها الناس تأكلون شجرتين لا أراهما إِلَّا خبيثتين، هذا البصل والثوم، لقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا وجد ريحهما من الرّجل أمر به فأخرج إلى البقيع، فمن أكلهما فليُمِتْهما طبخًا".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (567) عن محمد بن المثنى، ثنا يحيى بن سعيد، ثنا هشام، ثنا قتادة، عن سالم بن أبي الجعد، عن معدان بن أبي طلحة .. فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জুমআর দিন খুতবা দিলেন। তিনি তাতে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা উল্লেখ করলেন এবং আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা উল্লেখ করলেন এবং একটি দীর্ঘ খুতবা দিলেন। তিনি তার শেষে বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা এমন দুটি গাছ খাও, যে দুটিকে আমি কেবল নিকৃষ্টই মনে করি—এগুলো হলো পেঁয়াজ ও রসুন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, যখন তিনি কোনো ব্যক্তির মধ্যে এই দুটির (পেঁয়াজ ও রসুনের) গন্ধ পেতেন, তখন তিনি তাকে আদেশ করতেন, ফলে তাকে বাকী (কবরস্থান) পর্যন্ত বের করে দেওয়া হতো। অতএব, যে ব্যক্তিই এগুলো খাবে, সে যেন এগুলোকে রান্না করে (গন্ধ) দূর করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7251)


7251 - عن قرة بن إياس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن هاتين الشجرتين فقال:"من أكلهما فلا يقربن مسجدنا" وقال:"إن كنتم لا بد آكلوهما فأميتوهما طبخا"، قال: يعني البصل والثوم.

حسن: رواه أبو داود (3827)، والنسائي في الكبرى (6646) والتِّرمذيّ في العلل الكبير (2/ 765) والبيهقي في الكبرى (3/ 78) كلّهم من طريق خالد بن ميسرة العطّار، عن معاوية بن قرة،
عن أبيه .. فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن ميسرة فإنه حسن الحديث. قال ابن عدي:"هو عندي صدوق فإني لم أر له حديثًا منكرًا".

وقال الترمذيّ في العلل الكبير (3/ 766):"سألت محمدًا عن هذا الحديث؟ فقال:"هو حديث حسن".

وفي الباب عن أبي زياد خيار بن مسلمة أنه سأل عائشة عن البصل؟ قالت:"إنَّ آخر طعام أكله رسول الله صلى الله عليه وسلم طعام فيه بصل". رواه أبو داود (3829)، والنسائي في الكبرى (6646)، وأحمد (24585) كلّهم من طريق بقية بن الوليد، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي زياد خيار بن سلمة .. فذكره.

وفي إسناده خيار بن سلمة فلم يوثقه غير ابن حبَّان، وقد تفرّد عنه خالد بن معدان، لذا قال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يتابع، ولم أجد له متابعا، وبقية رجاله ثقات غير بقية، فإنه صدوق مدلس لكنه صرَّح بالتحديث عند أحمد.

وأمّا ما رُوي عن عليّ قال:"نهي عن أكل الثوم مطبوخا" فهو معلول.

رواه أبو داود (3828)، والتِّرمذيّ (1808) كلاهما من طريق مسدد، ثنا الجراح بن مليح، عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل، عن عليّ فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا الحديث ليس إسناده بذلك القويّ، وقد روي هذا عن عليّ قوله، وروي عن شريك بن حنبل، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا.

قلت: والرّواية الموقوفة أخرجها الترمذيّ (1809) عن هناد، حَدَّثَنَا وكيع، عن أبيه، عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل، عن عليّ قال:"لا يصلح أكل الثوم إِلَّا مطبوخا".

وأمّا الرواية المرسلة فأشار إليها أبو حاتم الرازي - كما في العلل (2/ 6): فسئل عن حديث رواه قيس بن الربيع، عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل، عن عليّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل أكل الثوم" قال: هذا حديث خطأ، منهم من يقول: عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل، عن عليّ قوله موقوف، ورواه عبد الرحمن بن مهديّ، عن الثوريّ، عن أبي إسحاق، عن شريك بن حنبل - لم يقل عن عليّ -"لا يحل أكل الثوم". وهو أشبه عندي لأن الثوري أحفظهم".

قلت: ويؤيده ما رواه ابن أبي شيبة (24975)، والبغوي في مُعْجَم الصّحابة (1249)، وأبو نعيم في معرفة الصّحابة (3735) من طرق عن يونس بن إسحاق السبيعيّ، عن عمير بن قميم، عن شريك بن حنبل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من أكل هذه البقلة الخبيثة فلا يقربن مسجدنا - يعني الثوم".

قال أبو نعيم:"ورواه شعبة عن أبي إسحاق مثله".
فتبين بهذا أن المحفوظ عن شريك بن حنبل، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا فإن شريك بن حنبل ليست له صحبة.

وكذلك لا يصح عن عقبة بن عامر الجهني قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لأصحابه:"لا تأكلوا البصل ثمّ قال: كلمة خفية"النيي". رواه ابن ماجة (3366) عن حرملة بن يحيى، ثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن عثمان بن نعيم، عن المغيرة بن نهيك، عن دُخين الحجريّ، أنه سمع عقبة بن عامر الجهني فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل عثمان بن نعيم، هو: ابن قيس الرعيني المصريّ، وشيخه المغيرة بن نهيك الحجري المصريّ، فكلاهما مجهولان كما في التقريب.




কুররা ইবনে ইয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দুটি উদ্ভিদ (খাদ্য) খেতে নিষেধ করেছেন। অতঃপর তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি এগুলো খাবে, সে যেন আমাদের মসজিদের নিকটবর্তী না হয়।" তিনি আরও বললেন: "যদি তোমাদের এগুলো খেতেই হয়, তবে রান্না করে এগুলোকে (গন্ধ) মেরে ফেলো।" (বর্ণনাকারী) বলেন: এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো পেঁয়াজ ও রসুন।









আল-জামি` আল-কামিল (7252)


7252 - عن * *




৭২৫২ - থেকে









আল-জামি` আল-কামিল (7253)


7253 - عن جابر بن سمرة: أن رجلًا نزل الحرة ومعه أهله وولده، فقال رجل: إن ناقة لي ضلت، فإن وجدتها فأمسكها. فوجدها فلم يجد صاحبها فمرضت فقالت امرأته: انحرها، فأبى فنفقت، فقالت: اسلخها حتَّى نقدِّد شحمها ولحمها ونأكله. فقال: حتَّى أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتاه فسأله فقال:"هل عندك غنى يغنيك؟" قال: لا. قال:"فكلوها"، قال فجاء صاحبها، فأخبره الخبر فقال: هلا كنت نحرتها، قال: استحييتُ منك.

حسن: رواه أبو داود (3816)، وأحمد (20993)، وابنه عبد الله (20903) كلّهم من طرق عن حمّاد بن سلمة، ثنا سماك، عن جابر بن سمرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل سماك بن حرب فإنه حسن الحديث إذا روى عن غير عكرمة، غير أنه تغير بأخرة، لكن رواه عنه حمّاد بن سلمة، وأبو عوانة الوضاح اليشكريّ، وروايتهما عنه في صحيح مسلم، فرواه أحمد أيضًا (20824) عن عفّان، ثنا أبو عوانة، عن سماك، عن جابر بن سمرة قال:"مات بغل - وقال حمّاد بن سلمة ناقة - عند رجل فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم يستفتيه، فزعم جابر بن سمرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لصاحبها:"أما لك ما يغنيك عنها؟" قال: لا، قال:"اذهب فكلها". قال أبو عبد الرحمن (هو عبد الله بن أحمد):"الصواب ناقة".

وصحّحه الحاكم (4/ 125) من هذا الوجه.




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি হার্রা নামক স্থানে তার পরিবার ও সন্তান-সন্ততিসহ অবতরণ করল। তখন এক লোক বলল: আমার একটি উটনি হারিয়ে গেছে। যদি তুমি সেটি পাও, তবে ধরে রেখো। লোকটি সেটিকে পেল, কিন্তু তার মালিককে খুঁজে পেল না। উটনিটি অসুস্থ হয়ে পড়ল। তার স্ত্রী বলল: এটিকে যবাই করো। সে (লোকটি) অস্বীকার করল। ফলে সেটি মরে গেল। স্ত্রী বলল: এটিকে চামড়া ছাড়িয়ে নাও, যাতে আমরা এর চর্বি ও গোশত শুকিয়ে খেতে পারি। সে বলল: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জিজ্ঞাসা না করা পর্যন্ত (তা করব না)। অতঃপর সে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে এসে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: "তোমার কি এমন সম্পদ আছে, যা তোমাকে (অন্য খাদ্যের) সামর্থ্য যোগাবে?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা এটি খাও।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তার মালিক এল এবং সে তাকে সব ঘটনা জানাল। তখন মালিক বলল: তুমি এটিকে যবাই করলে না কেন? সে (লোকটি) বলল: আমি তোমার কাছে লজ্জা অনুভব করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (7254)


7254 - عن سمرة بن جندب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يجزئ من الضرورة أو الضارورة غبوق أو صبوح".
صحيح: رواه الحاكم (4/ 125) من طريق معاذ بن معاذ العنبريّ، ثنا ابن عون قال: قرأت عند الحسن كتاب سمرة بن جندب إلى بنيه، وفيه: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فذكره.

ورواه أبو عبيد في غريب الحديث (1/ 61) عن معاذ بهذا الإسناد مثله إِلَّا أنه لم يذكر فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا يضره ذلك لأن الظاهر أنه ذكر في أول الحديث من الكتاب كما هي طبيعة الصحف، والنسخ المروية بإسناد واحد.

وإسناده صحيح. وقوله:"الضارورة هي لغة في الضرورة كما في النهاية، وقوله:"غبوق" هو الشرب آخر النهار، والصبوح في أوله ثمّ استعملا في الأكل، فالأكل الصبوح هو الغداء، وأكل الغبوق هو العشاء.

وأمّا ما رُوي عن أبي واقد الليثي: أنهم قالوا: يا رسول الله إنا بأرض تصيبنا بها المخمصة، فمتى تحل لنا الميتة؟ قال:"إذا لم تصطبحوا، ولم تغتبقوا، ولم تحتفئوا فشأنَكم بها". فهو معلول. رواه الأوزاعي عن حسان بن عطية واختلف عليه: فرواه الإمام أحمد (21901) عن الوليد بن مسلم، ثنا الأوزاعيّ، ثنا حسان بن عطية، عن أبي واقد الليثي فذكره.

ورواه الحاكم (4/ 125) من طريق أبي عاصم (هو الضَّحَّاك بن مخلد)، ثنا الأوزاعي بهذا الإسناد.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين". فتعقبه الذّهبيّ بقوله:"فيه انقطاع".

قلت: يشير إلى أن حسان بن عطية لم يسمعه من أبي واقد، وإنما بينهما واسطة، وكذلك قال البيهقيّ في المعرفة (14/ 129):"هذا حديث منقطع لم يسمعه حسان بن عطية من أبي واقد، وإنما سمعه من مرثد أو عن أبي مرثد، وهو مجهول". وقد رجّح الدَّارقطنيّ في العلل (1154) رواية الوليد بن مسلم المنقطعة. فهو لا يخلو من انقطاع أو مجهول. ومعنى الحديث: إذا لم يجد الرّجل غداء أو عشاء حلت له الميتة وإلَّا فلا.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن سمرة بن جندب أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا روّيت أهلك من اللبن غبوقا فاجتنبْ ما نهى الله عنه من ميتة".

رواه الحاكم (4/ 125)، والبيهقي (9/ 357) من طريق يحيى بن يحيى، عن خارجة، عن ثور، عن راشد بن سعد، عن سمرة بن جندب فذكره. وصحّح إسناده الحاكم.

قلت: كذا قالا! مع أن في إسناده خارجة وهو: ابن مصعب بن خارجة، أبو الحجاج الخراسانيّ، متفق على وهنه، قال النسائيّ وغيره: متروك الحديث، وكذبه يحيى بن معين في رواية.

تنبيه: تمّ تصحيح هذا الحديث في المنة الكبرى (8/ 373) ظنا مني بأن خارجة هذا هو: خارجة بن مصعب بن خارجة بن مصعب بن خارجة الحفيد، والصحيح أنه خارجة بن مصعب بن خارجة أبو الحجاج الجدّ وهو متروك.

وفي الباب عن الفُجيع العامري أنه أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما يحل لنا من الميتة؟" قال:"ما
طعامكم؟ قلنا: نغتبق ونصطبح، قال: ذاك - وأبي - الجوع، فأحل لهم الميتة على هذه الحال. ففي إسناده ضعف، وفي متنه نكارة.

قال أبو نعيم: فسَّره لي عقبة: قدح غدوة، وقدح عشية.

رواه أبو داود (3817) عن هارون بن عبد الله، ثنا الفضل بن دكين، ثنا عقبة بن وهب بن عقبة العامري قال: سمعت أبي يحدّث عن الفُجيع العامري فذكره.

وفيه قول أبي نعيم: فسَّره لي عقبة: قدح غدوة، وقدح عشية.

ومن طريق أبي داود رواه البيهقيّ (9/ 357).

وفي إسناده وهب بن عقبة العامري لم يوثقه غير ابن حبَّان، ولم يرو عنه إِلَّا أبنه عقبة بن وهب، فهو مجهول، وقال الحافظ:"مستور".

وأمّا ابنه عقبة بن وهب العامري البكائي الكوفي فمختلف فيه، والأكثر على أنه لا يعرف، وقال الحافظ في التقريب"مقبول" يعني حيث يتابع، ولم أجد من تابعه عليه، ولذا قال الذّهبيّ في الميزان:"لا يعرف وخبره لا يصح". يعني حديثه هذا. وقال البيهقيّ:"في ثبوته نظر".




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "অভাব বা প্রয়োজনের ক্ষেত্রে সকালের খাবার অথবা রাতের খাবার যথেষ্ট হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7255)


7255 - عن أبي واقد الليثي قال: قدم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم المدينة وهم يَجُبُّون أسنمة الإبل، ويقطعون أليات الغنم، فقال:"ما قطع من البهيمة وهي حية فهي ميتة".

حسن: رواه أبو داود (2858)، والتِّرمذيّ (1480) واللّفظ له، وأحمد (21903)، وابن الجارود (876)، والحاكم (4/ 239) كلّهم من طرق عن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي واقد الليثيّ، فذكره.

وقال الترمذيّ:"حديث حسن غريب لا نعرفه إِلَّا من حديث زيد بن أسلم".

وقال في العلل الكبير (2/ 633):"سألت محمدًا عن هذا، فقلت له: أترى هذا الحديث محفوظا؟ قال: نعم، قلت له: عطاء بن يسار أدرك أبا واقد؟ فقال: ينبغي أن يكون أدركهـ".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ [ومسلم].

وفيه عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار المدني ضُعّف، لكنه توبع، فرواه الحاكم (4/ 123 - 124) من طريق إسماعيل بن إسحاق القاضيّ، ثنا عليّ بن عبد الله بن جعفر، ثنا أبيّ، عن زيد بن أسلم بإسناده.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: ليس كما قال، لأن عبد الله بن جعفر والد عليّ بن المديني ضعيف الحديث، لكن يعتبر به، وبقية رجاله ثقات، فالحديث بمجموع الطريقين يكون حسنا.
ولكن أعلّه أبو زرعة الرازي - كما في علل ابن أبي حاتم (2/ 3) - والدارقطني في العلل (1152) بالإرسال، والمحفوظ عند البخاريّ وغيره الوصل كما سبق.

وقوله:"يَجُبّون" أي يقطعون.

وقوله:"أليات" أي طرف الشاة.

فكل عضو قطع من البهيمة وهي حية فلا يجوز أكله، لأنه صار ميتة بزوال الحياة عنه، وكانوا يفعلون ذلك في الجاهليّة فنهوا عنه.

وفي معناه ما رُوي عن ابن عمر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما قطع من البهيمة وهي حية، فما قطع منها فهو ميتة، إِلَّا أنه معلول.

رواه ابن ماجة (3216)، والدارقطني (4793)، والحاكم (4/ 124) من طريق هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن ابن عمر فذكره.

وسكت عنه الحاكم، وفي إسناده هشام بن سعد المدنيّ، وهو حسن الحديث ما لم يخالف، وقد خولف في هذا الإسناد كما سبق في حديث أبي واقد.

نعم رواه الطبرانيّ في الأوسط (7932) من طريق ابن نافع، عن عاصم بن عمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر مرفوعًا نحوه. وفيه عاصم بن عمر العمري وهو ضعيف، واستنكره عليه أبو حاتم الرازي فقال:"هذا حديث منكر". العلل (1526).

وكذلك لا يصح ما رُوي عن تميم الداري مرفوعًا:"يكون في آخر الزمان قومٌ يَجُبّون أسنمة الإبل، ويقطعون أذناب الغنم، ألا فما قُطع من حي فهو ميت". رواه ابن ماجة (3217) من طريق أبي بكر الهذليّ، عن شهر بن حوشب، عن تميم الداري فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا من أجل أبي بكر الهذلي فإنه متروك الحديث. وشهر فيه كلام مشهور.

وضعّف إسناده البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 13).




আবূ ওয়াক্বিদ আল-লায়সী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনায় আগমন করলেন, যখন তারা (সেখানকার লোকেরা) উটের কুঁজ কেটে নিত এবং ভেড়ার চর্বিযুক্ত লেজ কেটে ফেলত। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “জীবন্ত প্রাণী থেকে যা কেটে নেওয়া হয়, তা মৃত (অর্থাৎ ভক্ষণ করা হারাম)।”









আল-জামি` আল-কামিল (7256)


7256 - عن أبي ثعلبة الخشني: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن أكل كل ذي ناب من السباع.

متفق عليه: رواه مالك في الضحايا (2176 - رواية أبي مصعب الزّهريّ) عن ابن شهاب، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن أبي ثعلبة الخشني فذكره. ورواه البخاريّ في الذبائح والصيد (5530) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك به. ورواه مسلم في الصيد والذبائح (1932: 14) من طريق مالك - وغيره - به.

وزارد في رواية أخرى عن ابن شهاب أنه قال: ولم أسمع ذلك من علمائنا بالحجاز حتَّى حَدَّثَنِي أبو إدريس وكان من فقهاء أهل الشام.
وتفرد يحيى الليثي فرواه عن مالك في الصيد (13) بالإسناد السابق عن أبي ثعلبة ولفظه:"أكل كل ذي ناب من السباع حرام" يرى ابن عبد البر أن هذا اللّفظ لحديث أبي هريرة الآتي. التمهيد (11/ 6).




আবূ সা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সকল হিংস্র জন্তুর মধ্যে দাঁতবিশিষ্ট (বা নখরধারী) প্রাণী খেতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7257)


7257 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أكلُ كلِّ ذي ناب من السباع حرام".

صحيح: رواه مالك في الصيد (14) عن إسماعيل بن أبي حكيم، عن عبيدة بن سفيان الحضرميّ، عن أبي هريرة فذكره. ورواه مسلم في الصيد والذبائح (1933: 15) من طريق مالك به نحوه.

قلت: وهذا حديث مدنيّ، وكأن الزهري لم يبلغه هذا الحديث لذلك أخذه عن الشامين كما سبق.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শিকারী হিংস্র জন্তুদের মধ্যে ছেদন দাঁত (বা নখর) বিশিষ্ট সব প্রাণীর মাংস খাওয়া হারাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (7258)


7258 - عن ابن عباس قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن كل ذي ناب من السباع، وعن كل ذي مخلب من الطير".

صحيح: رواه مسلم في الصيد والذبائح (1934: 16) عن عبيد الله بن معاذ العنبريّ، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا شعبة، عن الحكم (هو ابن عيينة)، عن ميمون بن مهران، عن ابن عباس فذكره.

تنبيه: رواه أبو داود (3805)، وابن ماجة (3234)، والنسائي (4348) وأحمد (3141) كلّهم من طرق عن سعيد بن أبي عروبة، عن عليّ بن الحكم، عن ميمون بن مهران، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قال:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم خيبر عن أكل كل ذي ناب من السباع، وعن كلِّ ذي مخلب من الطير".

فزاد في إسناده رجلًا بين ميمون بن مهران وابن عباس وهو سعيد بن جبير كما زاد في متنه زمن التحريم وهو يوم خيبر. وهذا مزيد في متصل الأسانيد كما قال الخطيب. انظر: النكت الظراف (5/ 253).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকল হিংস্র জন্তু, যাদের ধারালো দাঁত আছে, এবং সকল শিকারী পাখি, যাদের নখর (থাবা) আছে, (তাদের গোশত খেতে) নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7259)


7259 - عن المقدام بن معديكرب، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ألا لا يحل ذو ناب من السباع، ولا الحمار الأهلي، ولا اللقطة من مال معاهَد إِلَّا أن يستغني عنها، وأيما رجل أضاف قومًا فلم يقْروه، فإن له أن يعقبهم بمثل قراه".

صحيح: رواه أبو داود (3804) عن محمد بن المصفى الحمصيّ، ثنا محمد بن حرب، عن الزبيديّ، عن مروان بن رؤبة التغلبيّ، عن عبد الرحمن بن أبي عوف، عن المقدام بن معديكربّ فذكره.

وصحّحه ابن حبَّان (12) من هذا الوجه فرواه من طريق محمد بن حرب بإسناده، ولفظه:"إنِّي أوتيت الكتاب وما يعدله، يوشك شبعان على أريكته أن يقول: بيني وبينكم هذا الكتاب، فما كان فيه من حلال أحللناه، وما كان فيه من حرام حرّمناه، ألا وإنه ليس كذلك". فاقتصر على أول الحديث ولم يذكره باقيه.
وفي إسنادهما مروان بن رؤبة التغلبي لم يوثقه غير ابن حبَّان، ولذا قال الحافظ فيه:"مقبول" يعني حيث يتابع، وقد توبع. فقد رواه أبو داود (4604)، وأحمد (17174) من طريق حَريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن أبي عوف، عن المقدام به بتمامه. وإسناده صحيح.




মিকদাম ইবন মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! হিংস্র জন্তুদের মধ্যে দাঁতযুক্ত কোনো প্রাণী হালাল নয়, আর গৃহপালিত গাধাও (হালাল নয়), আর সন্ধিবদ্ধ (মুসলিম রাষ্ট্রের সাথে চুক্তিবদ্ধ অমুসলিম) ব্যক্তির সম্পদ থেকে পাওয়া হারানো বস্তুও হালাল নয়, যতক্ষণ না সে তা থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়। আর কোনো ব্যক্তি যদি কোনো কওমের মেহমান হয় এবং তারা তাকে মেহমানদারি না করে, তবে তার জন্য অনুমতি আছে যে, সে যেন তাদের কাছ থেকে তার মেহমানদারির সমপরিমাণ ক্ষতিপূরণ গ্রহণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7260)


7260 - عن أبي هريرة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّم يوم خيبر كل ذي ناب من السباع، والمجثّمة، والحمار الإنسي ....

حسن: رواه الترمذيّ (1795)، وأحمد (8789) من طريق زائدة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره. وقال الترمذيّ:"حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو، هو ابن علقمة بن وقَّاص الليثي فإنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وزائدة هو ابن قدامة الثقفي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের দিন হারাম করেছেন— দাঁতওয়ালা সকল প্রকার হিংস্র প্রাণী, মাজ্ছুমাহ (যে পশুকে ধরে লক্ষ্যবস্তু বানানো হয় ও হত্যা করা হয়) এবং গৃহপালিত গাধাকে।