আল-জামি` আল-কামিল
7688 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله ليؤيد هذا الدين بأقوام لا خلاق لهم".
صحيح: رواه النسائي في الكبرى (8834)، والبزار (كشف الأستار - 1722)، وصحّحه ابن حبان (4517) كلهم من طرق عن إبراهيم بن خالد الصنعاني، حدثنا رباح بن زيد، عن معمر بن راشد، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أنس .. فذكره. وإسناده صحيح. وله طرق أخرى عن أنس.
وبمعناه ما روي عن ابن مسعود من قوله:"إن الله ليؤيد هذا الدين بالرجل الفاجر". رواه الطبراني في الكبير (9/ 207 - 208) من طريق أبي نعيم، عن سفيان الثوري، عن عاصم، عن زر، عن عبد الله .. فذكره موقوفا.
ورواه ابن حبان (4518) عن حميد بن الربيع، حدثنا أبو داود الحفري، عن سفيان، عن عاصم، عن زر، عن عبد الله (هو ابن مسعود) .. فذكره مرفوعا.
واختلف على عاصم في رفعه ووقفه، وساق الدارقطني في العلل (5/ 60 - 61) هذا الاختلاف، ثم قال:"والمحفوظ عن عاصم، عن زر، عن عبد الله قوله غير مرفوع".
وخالف عامر بن عبدة زر بن حبيش، فرواه عن ابن مسعود مرفوعا، روايته عند مسدد في مسنده (2113 - المطالب).
وزر بن حبيش أوثق من عامر بدرجات. والله أعلم.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ এমন কিছু সম্প্রদায় দ্বারা এই দীনকে সাহায্য করেন, যাদের পরকালে কোনো অংশ নেই।"
7689 - عن أنس قال: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم: فقال:"أخذ الراية زيد فأصيب، ثم أخذها جعفر فأصيب، ثم أخذها عبد الله بن رواحة فأصيب، ثم أخذها خالد بن الوليد عن غير إمرة، ففتح عليه، وما يسرني - أو قال: ما يسرهم - أنهم عندنا"، وقال: وإن عينيه لتذرفان.
صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (3063) عن يعقوب بن إبراهيم، حدثنا ابن علية، عن أيوب، عن حُميد بن هلال، عن أنس بن مالك .. فذكره.
قوله:"ما يسرهم أنهم عندنا" أي لما رأوا من الكرامة بالشهادة فلا يعجبهم أن يعودوا إلى الدنيا كما كانوا. الفتح (6/ 17).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "যায়িদ পতাকা গ্রহণ করল এবং শাহাদাত বরণ করল, এরপর জা'ফর তা গ্রহণ করল এবং শাহাদাত বরণ করল, এরপর আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা তা গ্রহণ করল এবং শাহাদাত বরণ করল, এরপর খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ সেনাপতিত্ব ব্যতীতই তা গ্রহণ করল এবং তার মাধ্যমে বিজয় এলো। আর আমি চাই না—অথবা তিনি বললেন: তারা চাইবে না—যে তারা আমাদের কাছে ফিরে আসুক।" বর্ণনাকারী বলেন: এ সময় তাঁর (নবীর) উভয় চোখ অশ্রু ঝরাচ্ছিল।
7690 - عن أبي هريرة قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية وأنا فيهم، فقال:"إن لقيتم فلانا وفلانا فحرقوهما بالنار، فلما ودعنا النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إني كنت أمرتكم أن تحرقوهما
بالنار، وإنه لا ينبغي أن يعذب بعذاب الله غيره، فإن لقيتموهما فاقتلوهما".
صحيح: رواه النسائي في الكبرى (8753) عن الحارث بن مسكين قراءة عليه - عن ابن وهب، قال: حدثني عمرو بن الحارث - وذكر آخر - عن بُكير بن عبد الله، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.
وعلّقه البخاري في الجهاد والسير (2954) عن ابن وهب، أخبرني عمرو وحده به. وعند البخاري في موضع آخر (3016) من غير ذكر التوديع.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি সামরিক দল (সারিয়্যা) প্রেরণ করলেন এবং আমি তাদের মধ্যে ছিলাম। তিনি বললেন, "যদি তোমরা অমুক অমুককে পাও, তবে তাদের আগুনে পুড়িয়ে মারবে।" এরপর যখন আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে বিদায় নিচ্ছিলাম, তিনি বললেন, "আমি তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলাম যেন তোমরা তাদের আগুনে পুড়িয়ে মারো। কিন্তু নিশ্চয়ই আল্লাহ ছাড়া অন্য কারও জন্য আল্লাহর শাস্তি (আগুন) দিয়ে শাস্তি দেওয়া উচিত নয়। সুতরাং, যদি তোমরা তাদের পাও, তবে তাদের হত্যা করবে।"
7691 - عن عبد الله بن يزيد الخطمي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا شيّع جيشا فبلغ عقبة الوداع قال:"أستودع الله دينكم، وأمانتكم، وخواتم أعمالكم".
صحيح: رواه أبو داود (2601)، والنسائي في الكبرى (10288) واللفظ له، والحاكم (2/ 97 - 98) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن أبي جعفر الخطمي، عن محمد بن كعب، عن عبد الله الخطمي قال .. فذكره. وإسناده صحيح.
وأما ما روي عن معاذ بن أنس مرفوعا:"لأن أشيع مجاهدًا في سبيل الله فأكفه على رحله غدوة أو روحة أحب إلي من الدنيا وما فيها". فإسناده ضعيف.
رواه ابن ماجه (2824)، وأحمد (15643) من طريق ابن لهيعة، عن زبان بن فائد، عن سهل بن معاذ بن أنس، عن أبيه .. فذكره.
وإسناده ضعيف لضعف ابن لهيعة وزبان بن فائد، وبهما أعله البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 167).
ورواه الحاكم (2/ 98) وعنه البيهقي (9/ 173) من طريق يحيى بن أيوب، عن زبّان به. وقال: صحيح الإسناد.
قلت: علته زبان وهو ضعيف الحديث باتفاق أهل العلم. وكان يروي عن سهل بن معاذ مناكير.
وقوله:"أكفه" كذا في سنن ابن ماجه، وفي المسند:"فأكتفه" وفي السنن الكبرى:"فأكنفه" والمقصود إعانة المجاهد في سبيل الله.
আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-খাতমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো সেনাদলকে বিদায় জানাতেন এবং উকবাতুল ওয়াদা (বিদায় ঘাঁটিতে) পৌঁছাতেন, তখন তিনি বলতেন: "আমি তোমাদের দ্বীন, তোমাদের আমানত এবং তোমাদের শেষ আমলগুলোকে আল্লাহর কাছে সোপর্দ করছি।"
7692 - عن معاذ بن أنس الجهني قال: غزوت مع نبي الله صلى الله عليه وسلم غزوة كذا وكذا، فضيق الناس المنازل، وقطعوا الطريق، فبعث نبي الله صلى الله عليه وسلم مناديا ينادي في الناس:"أن من ضيق منزلا، أو قطع طريقا، فلا جهاد له".
حسن: رواه أبو داود (2629)، وأحمد (15648)، والبيهقي (9/ 152) من طريق إسماعيل بن
عياش، عن أسيد بن عبد الرحمن الخثعمي، عن فروة بن مجاهد اللخمي، عن سهل بن معاذ بن أنس الجهني، عن أبيه .. فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل سهل بن معاذ فإنه حسن الحديث، وإسماعيل بن عياش صدوق فيما يرويه عن أهل الشام، وهذه منها؛ فإن أسيد بن عبد الرحمن شامي ثقة.
له طريق آخر عن أسيد عند أبي داود في سننه (2630)، والطحاوي في شرح مشكل الآثار (44).
মু'আয ইবনু আনাস আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অমুক অমুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। তখন লোকেরা (বিশ্রামের জায়গায়) জায়গা সঙ্কীর্ণ করে ফেলল এবং রাস্তা বন্ধ করে দিল। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ঘোষককে মানুষের মাঝে এই মর্মে ঘোষণা দেওয়ার জন্য পাঠালেন যে: "যে ব্যক্তি বাসস্থানকে সঙ্কীর্ণ করবে, অথবা রাস্তা বন্ধ করে দেবে, তার জন্য কোনো জিহাদ নেই।"
7693 - عن أبي ثعلبة الخشني قال: كان الناس إذا نزلوا منزلا - في لفظ: كان الناس إذا نزل رسول الله صلى الله عليه وسلم منزلا - تفرقوا في الشعاب والأودية فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن تفرقكم في هذه الشعاب والأودية إنما ذلكم من الشيطان". فلم ينزل بعد ذلك منزلا إلا انضم بعضهم إلى بعض حتى يقال: لو بسط عليهم ثوب لعمّهم.
صحيح: رواه أبو داود (2628)، وأحمد (17736)، وصحّحه ابن حبان (2690)، والحاكم (2/ 115) كلهم من طرق عن الوليد بن مسلم، حدثنا عبد الله بن العلاء بن زبر، إنه سمع مسلم بن مشكم أبا عبيد الله يقول: حدثنا أبو ثعلبة الخشني .. فذكره. وإسناده صحيح. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
আবু সা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা যখন কোনো স্থানে অবতরণ করত - অন্য বর্ণনায়: লোকেরা যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে কোনো স্থানে অবতরণ করত - তখন তারা উপত্যকা ও গিরিপথগুলিতে (এলোমেলোভাবে) ছড়িয়ে পড়ত। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "এই উপত্যকা ও গিরিপথগুলিতে তোমাদের এভাবে ছড়িয়ে পড়া শয়তানের কাজ।" এরপর থেকে তারা যখনই কোনো স্থানে অবতরণ করত, তখনই তারা পরস্পরের সাথে এত কাছাকাছি হয়ে অবস্থান করত যে, বলা যেত, যদি তাদের উপর একটি কাপড় বিছিয়ে দেওয়া হতো, তবে তা তাদের সবাইকে আবৃত করে ফেলত।
7694 - عن بريدة بن الحصيب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أمر أميرًا على جيش أو سرية، أوصاه في خاصته بتقوى الله ومن معه من المسلمين خيرًا، ثم قال:"اغزوا باسم الله في سبيل الله، قاتلوا من كفر بالله، اغزوا ولا تغلوا، ولا تغدروا، ولا تمثلوا، ولا تقتلوا وليدًا، وإذا لقيت عدوك من المشركين فادعهم إلى ثلاث خصال أو خلال، فأيتهن ما أجابوك فاقبل منهم، وكف عنهم، ثم ادعهم إلى الإسلام، فإن أجابوك فاقبل منهم، وكف عنهم، ثم ادعهم إلى التحول من دارهم إلى دار المهاجرين، وأخبرهم أنهم إن فعلوا ذلك فلهم ما للمهاجرين، وعليهم ما على المهاجرين، فإن أبوا أن يتحولوا منها فأخبرهم أنهم يكونون كأعراب المسلمين يجري عليهم حكم الله الذي يجري على المؤمنين، ولا يكون لهم في الغنيمة والفيء شيء إلا أن يجاهدوا مع المسلمين. فإن هم أبوا فسلهم الجزية، فإن هم أجابوك فاقبل منهم وكف عنهم، فإن هم أبوا فاستعن بالله وقاتلهم، وإذا حاصرت أهل حصن
فأرادوك أن تجعل لهم ذمة الله وذمة نبيه فلا تجعل لهم ذمة الله ولا ذمة نبيه، ولكن اجعل لهم ذمتك وذمة أصحابك، فإنكم أن تُخفروا ذممكم وذمم أصحابكم أهون من أن تخفروا ذمة الله وذمة رسوله، وإذا حاصرت أهل حصن فأرادوك أن تنزلهم على حكم الله، فلا تنزلهم على حكم الله، ولكن أنزلهم على حكمك، فإنك لا تدري أتصيب حكم الله فيهم أم لا؟".
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1731: 2، 3) من طريق سفيان (هو الثوري)، عن علقمة بن مرثد، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه .. فذكره.
ثم أشار مسلم عقبه إلى أن هذا الحديث رواه النعمان بن مقرن، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه.
وروي عن أبي البختري أن سلمان حاصر قصرا من قصور فارس فقال لأصحابه: دعوني حتى أفعل ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل، فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: إني امرؤ منكم وإن الله رزقني الإسلام، وقد ترون طاعة العرب، فإن أنتم أسلمتم وهاجرتم إلينا فأنتم بمنزلتنا، يجري عليكم ما يجري علينا، وإن أنتم أسلمتم وأقمتم في دياركم فأنتم بمنزلة الأعراب يجري لكم ما يجري لهم ويجري عليكم ما يجري عليهم، فإن أبيتم وأقررتم بالجزية فلكم ما لأهل الجزية وعليكم ما على أهل الجزية، عرض عليهم ذلك ثلاثة أيام ثم قال لأصحابه: انهدوا إليهم ففتحها.
رواه الترمذي (1548) من طريق أبي عوانة - وأحمد (23726) من طريق إسرائيل - و (23734) من طريق حماد بن سلمة - كلهم عن عطاء بن السائب، عن أبي البختري (هو سعيد بن فيروز الطائي) .. فذكره. والسياق لحماد بن سلمة.
وقال الترمذي:"حديث حسن لا نعرفه إلا من حديث عطاء بن السائب، وسمعت محمدًا يقول: أبو البختري لم يدرك سلمان؟ لأنه لم يدرك عليا وسلمان مات قبل علي".
قلت: وعلى هذا فإسناده منقطع.
وعطاء بن السائب اختلط، ولكن حماد بن سلمة سمع منه قبل الاختلاط.
وقوله:"فنهد إليهم" أي نهض إليهم.
وكان ذلك في السنة السادسة عشر، وقد بعث عمر بن الخطاب سعد بن أبي وقاص لغزو كسرى، فلم يبق من غربي دجلة إلى أرض العرب أحد من الفلاحين إلا تحت الجزية والخراج، وامتنع نهر شهر من سعد أشد الامتناع، فبعث إليهم سعد سلمان الفارسي، فدعاهم إلى الله عز وجل، أو الجزية أو المقاتلة، فأبوا إلا المقاتلة. انظر: البداية والنهاية (7/ 63).
وفي الباب عن ابن عباس قال:"ما قاتل رسول الله صلى الله عليه وسلم قوما قط إلا دعاهم".
رواه أحمد (2105)، وعبد بن حميد (697)، والدارمي (2488) والحاكم (1/ 15)، والبيهقي (9/ 107) من طرق عن سفيان الثوري، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن أبيه، عن ابن عباس ..
فذكره.
وقال الحاكم"هذا حديث صحيح من حديث الثوري، ولم يخرجاه، وقد احتج مسلم بأبي نجيح والد عبد الله، واسمه يسار، وهو من موالي المكيين".
قلت ظاهر إسناده كذلك لكن ذكر الدارمي عقب الحديث أن سفيان لم يسمع من ابن أبي نجيح هذا الحديث.
وقال أحمد بن حنبل: حدثنا عبد الرحمن (هو ابن مهدي) قال: سألت سفيان عن حديث ابن أبي نجيح، عن أبيه: ما قاتل النبي صلى الله عليه وسلم قوما فقال: أشك فيه. حكاه عبد الله بن أحمد عن أبيه في العلل (3/ 74).
وقد تابعه الحجاج بن أرطاة عن ابن أبي نجيح به، أخرجه أحمد (2053)، الحجاج بن أرطاة وهو مدلس وقد عنعن. وللحديث طرق أخرى لا تخلو من مقال.
বুরিদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো বাহিনী বা ছোট দলের জন্য কোনো আমীর (কমান্ডার) নিযুক্ত করতেন, তখন তিনি বিশেষভাবে তাকে আল্লাহ্র তাকওয়া (ভীতি) অবলম্বনের উপদেশ দিতেন এবং তার সঙ্গে থাকা মুসলিমদের সাথে সদ্ব্যবহার করার জন্য উপদেশ দিতেন। অতঃপর বলতেন: “আল্লাহ্র নামে, আল্লাহ্র পথে জিহাদ করো। যারা আল্লাহকে অস্বীকার করে তাদের সাথে যুদ্ধ করো। যুদ্ধ করো, কিন্তু (গণিমতের মালে) খিয়ানত করো না, বিশ্বাসঘাতকতা করো না, (শত্রুর অঙ্গ) বিকৃত করো না এবং শিশুদের হত্যা করো না।
আর যখন তুমি মুশরিক শত্রুদের সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখন তাদেরকে তিনটি কাজের প্রতি আহ্বান জানাও। এর মধ্যে যেটিতেই তারা সাড়া দিক না কেন, তা তুমি তাদের থেকে মেনে নাও এবং তাদের উপর থেকে হাত গুটিয়ে নাও (যুদ্ধ বন্ধ করো)।
অতঃপর তাদেরকে ইসলামের প্রতি আহ্বান করো। যদি তারা সাড়া দেয়, তবে তা মেনে নাও এবং তাদের থেকে বিরত থাকো। এরপর তাদেরকে তাদের বাসস্থান ছেড়ে মুহাজিরদের বাসস্থানে চলে আসার আহ্বান করো এবং তাদেরকে জানিয়ে দাও যে, তারা যদি তা করে, তবে মুহাজিরদের জন্য যা রয়েছে, তাদের জন্যও তা-ই থাকবে এবং মুহাজিরদের উপর যে দায়িত্ব রয়েছে, তাদের উপরও সেই দায়িত্ব বর্তাবে।
যদি তারা সেখান থেকে স্থানান্তরিত হতে অস্বীকার করে, তবে তাদেরকে জানিয়ে দাও যে তারা মুসলিম আরব বেদুঈনদের (আ'রাবুল মুসলিমীন) মতো গণ্য হবে। মুমিনদের উপর আল্লাহ্র যে বিধান কার্যকর হয়, তাদের উপরও সেই বিধান কার্যকর হবে। তবে তারা গণীমত ও ফাঈ (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ)-এর কোনো অংশ পাবে না, যতক্ষণ না তারা মুসলিমদের সাথে জিহাদে অংশগ্রহণ করে।
যদি তারা (এই দুটি) অস্বীকার করে, তবে তাদের কাছে জিযিয়া (সুরক্ষার কর) চাও। যদি তারা এতে সাড়া দেয়, তবে তা মেনে নাও এবং তাদের থেকে বিরত থাকো। আর যদি তারা তা-ও অস্বীকার করে, তবে আল্লাহ্র সাহায্য চাও এবং তাদের সাথে যুদ্ধ করো।
আর যখন তুমি কোনো দুর্গের অধিবাসীদের অবরোধ করবে এবং তারা তোমার কাছে আল্লাহ্র নিরাপত্তা (যিম্মাহ) ও তাঁর নবীর নিরাপত্তার অধীনে আসতে চাইবে, তখন তাদেরকে আল্লাহ্র নিরাপত্তা কিংবা তাঁর নবীর নিরাপত্তা দিও না। বরং তাদেরকে তোমার নিজের এবং তোমার সঙ্গীদের নিরাপত্তা দাও। কারণ, তোমরা যদি তোমাদের নিজেদের ও তোমাদের সঙ্গীদের নিরাপত্তা চুক্তি ভঙ্গ করো, তবে তা আল্লাহ্র ও তাঁর রাসূলের নিরাপত্তা চুক্তি ভঙ্গের চেয়ে সহজ (কম গুরুতর) হবে।
আর যখন তুমি কোনো দুর্গের অধিবাসীদের অবরোধ করবে এবং তারা চাইবে যে, তুমি তাদেরকে আল্লাহ্র বিধান অনুসারে আত্মসমর্পণ করাও, তখন তাদেরকে আল্লাহ্র বিধান অনুসারে আত্মসমর্পণ করাও না। বরং তুমি তাদেরকে তোমার নিজস্ব বিধান অনুসারে আত্মসমর্পণ করাও। কারণ তুমি জানো না, তুমি তাদের ক্ষেত্রে আল্লাহ্র সঠিক বিধানে পৌঁছতে পারবে কি না।”
7695 - عن ابن عون قال: كتبت إلى نافع أسأله عن الدعاء قبل القتال قال: فكتب إلي إنما كان ذلك في أول الإسلام قد أغار رسول الله صلى الله عليه وسلم علي بني المصطلق، وهم غارون وأنعامهم تسقى على الماء، فقتل مقاتلتهم وسبى سبيهم وأصاب يومئذ جويرية ابنة الحارث وحدثني هذا الحديث عبد الله بن عمر، وكان في ذاك الجيش.
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2541)، ومسلم في الجهاد والسير (1730) كلاهما من حديث ابن عون به .. فذكره. والسياق لمسلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইবনু আওন বলেন: আমি নাফি’-এর নিকট লিখে যুদ্ধের পূর্বে (শত্রুর জন্য) দো‘আ করা সম্পর্কে জানতে চাইলাম। তিনি আমাকে উত্তরে লিখে পাঠালেন: এই নির্দেশ কেবল ইসলামের প্রথম দিকেই প্রযোজ্য ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মুসতালিকের উপর অতর্কিতে আক্রমণ করেন, যখন তারা ছিল সম্পূর্ণ অসতর্ক এবং তাদের গবাদিপশুগুলো পানির ধারে পান করছিল। তিনি তাদের যোদ্ধাদের হত্যা করেন ও তাদের নারীদেরকে বন্দী করেন। সেদিন তিনি জুয়াইরিয়া বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লাভ করেন। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট এই হাদীস বর্ণনা করেছেন এবং তিনি সেই বাহিনীতে উপস্থিত ছিলেন।
7696 - عن جابر قال: لم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يغزو في الشهر الحرام إلا أن يُغزى - أو يُغزوا - فإذا حضر ذلك أقام حتى ينسلخ.
صحيح: رواه أحمد (14583) عن حجين بن المثنى، حدثنا ليث، عن أبي الزبير، عن جابر .. فذكره.
وإسناده صحيح، وأبو الزبير هو: محمد بن مسلم بن تدرس المكي، والليث هو: ابن سعد، وكان الليث لا يروي عن أبي الزبير إلا ما علم أنه سمعه من جابر.
وقوله:"فإذا حضر ذلك أقام حتى ينسلخ" أي إذا غزي دافع عن الإسلام وأهله حتى يندحر العدو.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হারাম (নিষিদ্ধ) মাসে যুদ্ধাভিযান করতেন না, তবে যদি তাঁকে আক্রমণ করা হতো—কিংবা তাদের (মুসলিমদের) উপর আক্রমণ করা হতো (তবে তিনি যুদ্ধ করতেন)। আর যখন আক্রমণ ঘটতো, তখন তিনি মাস শেষ না হওয়া পর্যন্ত (প্রতিরক্ষায়) অবস্থান করতেন।
7697 - عن النعمان بن مقرن قال: شهدت القتال مع رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا لم يقاتل في أول النهار انتظر حتى تهب الأرواح، وتحضر الصلوات.
وفي لفظ: شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فكان إذا لم يقاتل أول النهار انتظر حتى تزول الشمس وتهب الرياح وينزل النصر.
صحيح: رواه البخاري في الجزية والموادعة (3160) عن الفضل بن يعقوب، حدثنا عبد الله بن جعفر الرقي، حدثنا المعتمر بن سليمان، حدثنا سعيد بن عبيد الله الثقفي، حدثنا بكر بن عبد الله المزني، وزياد بن جبير، عن جبير بن حية قال: بعث عمر الناس في أفناء الأمصار يقاتلون المشركين، فأسلم الهرمزان، فذكر قصة طويلة في آخرها قال النعمان .. فذكره. واللفظ الأول للبخاري.
واللفظ الثاني رواه أبو داود (2655)، والترمذي (1613)، كلاهما من طريق عن حماد بن سلمة، أخبرنا أبو عمران الجوني، عن علقمة بن عبد الله المزني، عن معقل بن يسار أن عمر بن الخطاب بعث النعمان بن مقرن إلى الهرمزان فذكر الحديث بطوله، فقال النعمان بن مقرن .. فذكره. وإسناده صحيح.
قال الترمذي: هذا حديث حسن صحيح.
নু'মান ইবনু মুকাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলাম। তিনি যখন দিনের শুরুতে যুদ্ধ করতেন না, তখন বাতাস প্রবাহিত হওয়া পর্যন্ত এবং সালাতসমূহ (নামাজের সময়) উপস্থিত হওয়া পর্যন্ত অপেক্ষা করতেন।
অন্য বর্ণনায় রয়েছে: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলাম। তিনি যখন দিনের প্রথম ভাগে যুদ্ধ করতেন না, তখন সূর্য হেলে যাওয়া পর্যন্ত, বাতাস প্রবাহিত হওয়া পর্যন্ত এবং বিজয় নাযিল হওয়া পর্যন্ত অপেক্ষা করতেন।
7698 - عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا غزا قوما لم يُغِرْ عليهم حتى يصبح، فإن سمع أذانا أمسك، وإن لم يسمع أذانا أغار بعد ما يصبح، فنزلنا خيبر ليلا.
وفي لفظ: أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج إلى خيبر، فجاءها ليلا، وكان إذا جاء قوما بليل لا يغير عليهم حتى يصبح، فلما أصبح خرجت يهود بمساحيهم ومكاتلهم، فلما رأوه قالوا: محمد والله، محمد والخميس فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"الله أكبر! خربت خيبر، إنا إذا نزلنا بساحة قوم فساء صباح المنذرين".
صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (2943) عن عبد الله بن محمد، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق، عن حميد قال: سمعت أنسا يقول .. فذكره. ورواه (2945) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن حميد، عن أنس .. فذكره باللفظ الثاني.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো জাতির বিরুদ্ধে যুদ্ধযাত্রা করতেন, তখন সকাল না হওয়া পর্যন্ত তিনি তাদের ওপর আক্রমণ করতেন না। যদি তিনি আযান শুনতে পেতেন, তবে তিনি বিরত থাকতেন, আর যদি আযান শুনতে না পেতেন, তবে সকাল হওয়ার পর আক্রমণ করতেন। আমরা খায়বারের কাছে রাতে পৌঁছলাম।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খায়বারের উদ্দেশ্যে বের হলেন এবং রাতে সেখানে পৌঁছলেন। তিনি যখন রাতে কোনো জাতির নিকট আসতেন, তখন সকাল না হওয়া পর্যন্ত তাদের ওপর আক্রমণ করতেন না। যখন সকাল হলো, ইয়াহূদীরা তাদের কোদাল ও ঝুড়ি নিয়ে বের হলো। যখন তারা তাঁকে দেখল, তারা বলল: আল্লাহর কসম, মুহাম্মাদ! মুহাম্মাদ এবং তার সেনাবাহিনী। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আল্লাহু আকবার! খায়বার ধ্বংস হয়ে গেছে। নিশ্চয় আমরা যখন কোনো জাতির প্রাঙ্গণে অবতরণ করি, তখন যাদের সতর্ক করা হয়েছে, তাদের সকালটি মন্দ হয়।"
7699 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغير إذا طلع الفجر، وكان يستمع الأذان، فإن سمع أذانا أمسك، وإلا أغار، فسمع رجلا يقول: الله أكبر الله أكبر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على الفطرة"، ثم قال: أشهد أن لا إله إلا الله أشهد أن لا إله إلا الله فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خرجت من النار، فنظروا فإذا هو راعي معزى".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (382) عن زهير بن حرب، حدثنا يحيى (يعني ابن سعيد)، عن حماد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن أنس .. فذكره.
وفي الباب عن عصام المزني - وكانت له صحبة - قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا بعث جيشا أو سرية يقول لهم:"إذا رأيتم مسجدًا، أو سمعتم مؤذنا فلا تقتلوا أحدًا".
رواه الترمذي (1549) - واللفظ له - وأبو داود (2635)، وأحمد (15714) من طرق عن سفيان ابن عيينة، عن عبد الملك بن نوفل بن مساحق، عن ابن عصام المزني، عن أبيه - وكانت له صحبة - فذكره.
وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب.
قلت: في إسناده ابن عصام المزني لم يرو عنه غير عبد الملك بن نوفل، ولم يوثقه أحد، ولذا قال الحافظ في التقريب: لا يعرف حاله.
وعبد الملك بن نوفل روى عنه غير واحد، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (7/ 107)، ولذا قال الحافظ: مقبول أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের উদয় হলে (শত্রুপক্ষের উপর) আক্রমণ করতেন। আর তিনি আযান মনোযোগ দিয়ে শুনতেন। যদি আযান শুনতে পেতেন, তবে বিরত থাকতেন (আক্রমণ করতেন না)। অন্যথায় আক্রমণ করতেন। অতঃপর তিনি এক ব্যক্তিকে 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলতে শুনলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে ফিতরাত (স্বভাবজাত ধর্ম) এর ওপর আছে।" এরপর লোকটি বলল: 'আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে জাহান্নাম থেকে মুক্তি পেল।" অতঃপর তারা (সাহাবাগণ) তাকিয়ে দেখলেন যে লোকটি ছিল একজন ছাগলের রাখাল।
7700 - عن أبي هريرة، قال: لما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، واستخلف أبو بكر بعده، وكفر من كفر من العرب، قال عمر بن الخطاب لأبي بكر: كيف تقاتل الناس وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله فمن قال: لا إله إلا الله فقد عصم مني ماله ونفسه إلا بحقه وحسابه على الله"، فقال أبو بكر: والله لأقاتلن من فرّق بين الصلاة والزكاة فإن الزكاة حق المال، والله لو منعوني عقالا كانوا يؤدونه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم لقاتلتهم على منعه، فقال عمر بن الخطاب: فوالله ما هو إلا أن رأيت الله عز وجل قد شرح صدر أبي بكر للقتال، فعرفت أنه الحق.
متفق عليه: رواه البخاري في الاعتصام بالكتاب والسنة (7284)، ومسلم في الإيمان (20)
كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث بن سعد، عن عقيل، عن الزهري قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة .. فذكر الحديث ولفظهما سواء.
وروي نحوه من حديث أنس إلا أنه خطأ، رواه النسائي (3094) عن محمد بن بشار، حدثنا عمرو بن عاصم، حدثنا عمران أبو العوام القطان، حدثنا معمر، عن الزهري، عن أنس .. فذكر نحوه.
وقال النسائي عقبه:"عمران القطان ليس بالقوي في الحديث، وهذا الحديث خطأ، والذي قبله، الصواب حديث الزهري عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي هريرة".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হলো এবং তাঁর পরে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, আর আরবের কিছু লোক কুফরি করল, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু বকরকে বললেন: আপনি কীভাবে লোকেদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবেন, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন লোকেদের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে। সুতরাং যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে তার ধন-সম্পদ ও জীবন আমার থেকে রক্ষা করে নিল, তবে (ইসলামের) হক অনুযায়ী (যা করা প্রয়োজন তা করা যেতে পারে)। আর তার হিসাব আল্লাহর উপর ন্যস্ত।" তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! যে সালাত ও যাকাতের মধ্যে পার্থক্য করবে, আমি অবশ্যই তার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করব। কারণ যাকাত হলো সম্পদের হক। আল্লাহর কসম! তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যে একটি রশিও (বা উটের বাঁধন) প্রদান করত, যদি তারা তা দিতেও অস্বীকার করে, তবে আমি তাদের এই অস্বীকৃতির কারণেও তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করব। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি কেবল এটুকু দেখলাম যে আল্লাহ তা‘আলা আবু বকরের বক্ষকে যুদ্ধের জন্য প্রশস্ত করে দিয়েছেন। তখন আমি বুঝলাম যে এটাই সত্য।
7701 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله، فمن قال: لا إله إلا الله فقد عصم مني نفسه وماله إلا بحقه وحسابه على الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2946)، ومسلم في الإيمان (21: 33) من طريقين عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة .. فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলে। সুতরাং যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলল, সে আমার থেকে তার জীবন ও সম্পদ রক্ষা করল, তবে এর (ইসলামের) হক্ব বা অধিকার ব্যতীত। আর তার হিসাব আল্লাহর কাছে।
7702 - عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم خيبر:"لأعطين هذه الراية رجلا يحب الله ورسوله، يفتح الله على يديه"، قال عمر بن الخطاب: ما أحببت الإمارة إلا يومئذ، قال: فتساورتُ لها رجاء أن أدعى لها قال: فدعا رسول الله علي بن أبي طالب، فأعطاه إياها، وقال:"امش ولا تلتفت حتى يفتح الله عليك"، قال: فسار عليٌّ شيئا ثم وقف ولم يلتفت، فصرخ: يا رسول الله على ماذا أقاتل الناس؟ قال:"قاتِلْهم حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله وأن محمدا رسول الله، فإذا فعلوا ذلك فقد منعوا منك دماءهم وأموالهم إلا بحقها، وحسابهم على الله".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2405: 33) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن القاري، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة .. فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন বলেছিলেন: "আমি অবশ্যই এই পতাকা এমন একজন লোককে দেব, যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে, আর আল্লাহ তার হাতে বিজয় দান করবেন।" উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেদিন ছাড়া আমি কখনও নেতৃত্ব (ইমারাহ) পছন্দ করিনি। তিনি বলেন: আমি আকাঙ্ক্ষা করলাম যে, আমাকেই যেন তার জন্য ডাকা হয়। তিনি বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী ইবনে আবী তালিবকে ডাকলেন এবং তাকে তা দিলেন আর বললেন: "চলো, আর আল্লাহ তোমার ওপর বিজয় দান না করা পর্যন্ত পিছু ফিরে তাকাবে না।" তিনি বললেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছুদূর অগ্রসর হলেন, তারপর থামলেন কিন্তু পিছু ফিরলেন না। তিনি চিৎকার করে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি কিসের ভিত্তিতে লোকদের সাথে যুদ্ধ করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাদের সাথে ততক্ষণ যুদ্ধ করো, যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল। যখন তারা তা করবে, তখন তারা তোমার থেকে তাদের রক্ত ও সম্পদ রক্ষা করবে, তবে তার (ইসলামের) হক অনুযায়ী (যদি কিছু বাকি থাকে)। আর তাদের হিসাব-নিকাশ আল্লাহর ওপর ন্যস্ত।"
7703 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله، وأن محمدًا رسول الله، ويقيموا الصلاة ويؤتوا الزكاة، فإذا فعلوا ذلك عصموا مني دماءهم وأموالهم إلا بحق الإسلام، وحسابُهم على الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (25)، ومسلم في الإيمان (22: 36) كلاهما من طريق شعبة، عن واقد بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر، سمعت أبي يحدّث عن ابن عمر .. فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন লোকদের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত লড়াই করি যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল, আর তারা সালাত প্রতিষ্ঠা করে ও যাকাত আদায় করে। যখন তারা তা করবে, তখন তারা তাদের রক্ত ও সম্পদ আমার কাছ থেকে রক্ষা করে নেবে, তবে ইসলামের অধিকার (হক) ব্যতিরেকে। আর তাদের হিসাব আল্লাহর ওপর ন্যস্ত।"
7704 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله، فإذا قالوها، وصلوا صلاتنا، واستقبلوا قبلتنا، وذبحوا ذبيحتنا
فقد حرمت علينا دماؤهم وأموالهم إلا بحقها، وحسابهم على الله".
صحيح: رواه البخاري في الصلاة (392) عن نعيم قال: حدثنا ابن المبارك، عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك .. فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে লড়াই করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই) বলে। যখন তারা তা বলবে, আমাদের সালাত আদায় করবে, আমাদের কিবলার দিকে মুখ করবে এবং আমাদের যবেহকৃত প্রাণী যবেহ করবে, তখন তাদের রক্ত ও সম্পদ আমাদের জন্য হারাম হয়ে যাবে—তবে এর প্রাপ্য অধিকার (হক্ব) ব্যতীত। আর তাদের হিসাব-নিকাশ আল্লাহর কাছে।"
7705 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله، فإذا قالوا: لا إله إلا الله عصموا مني دماءهم وأموالهم إلا بحقّها، وحسابُهم على الله، ثم قرأ: {لَسْتَ عَلَيْهِمْ بِمُصَيْطِرٍ}.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (21/ 35) من طرق عن سفيان، عن أبي الزبير، عن جابر قال .. فذكره.
ورواه أيضا من وجه آخر عن أبي سفيان، عن جابر مثله.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে লড়াই করি যতক্ষণ না তারা ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলে। যখন তারা ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলবে, তখন তারা আমার থেকে তাদের রক্ত ও সম্পদ নিরাপদ করে নিল, তবে এর (ইসলামের) হক্ব (অধিকার) ব্যতিত। আর তাদের হিসাব-নিকাশ আল্লাহ্র উপর ন্যস্ত।" এরপর তিনি পাঠ করলেন: {তুমি তাদের উপর কর্তৃত্বকারী নও}।
7706 - عن أوس بن أبي أوس الثقفي قال: إنا لقعود عند رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصفة، وهو يقص علينا، ويذكّرنا، إذ جاء رجل فسارّه فقال:"اذهبوا فاقتلوه"، قال: فلما ولى الرجل دعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أيشهد أن لا إله إلا الله؟" قال الرجل: نعم، يا رسول الله، فقال:"اذهبوا فخلّوا سبيله، فإنما أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله، فإذا فعلوا ذلك حرمت علي دماؤهم وأموالهم إلا بحقها".
صحيح: رواه النسائي (3983)، وابن ماجه (3929)، وأحمد (16163) - والسياق له - كلهم من حديث عبد الله بن بكر السهمي حدثنا حاتم بن أبي صغيرة، عن النعمان بن سالم، أن عمرو بن أوس أخبره، أن أباه أوسا أخبره .. فذكره. وإسناده صحيح، وللحديث طرق أخرى وما ذكرته هو أسلمها.
আওস ইবনু আবী আওস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা সুফ্ফায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসা ছিলাম। তিনি আমাদের কাছে গল্প বলছিলেন এবং উপদেশ দিচ্ছিলেন, এমন সময় এক ব্যক্তি এসে তাঁর কানে কানে কিছু বলল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা যাও এবং তাকে হত্যা করো।" বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি যখন চলে গেল, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডেকে আনলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "সে কি সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই?" লোকটি বলল: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা যাও এবং তাকে ছেড়ে দাও। কারণ, আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই। যখন তারা তা করবে, তখন তাদের রক্ত ও সম্পদ আমার থেকে সুরক্ষিত থাকবে, তবে ইসলামের হক্ব বা অধিকার ব্যতীত।"
7707 - عن أبي مالك، عن أبيه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من قال: لا إله إلا الله، وكفر بما يُعبد من دون الله، حرُم ماله ودمه، وحسابه على الله".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (23) من طرق عن مروان الفزاري، عن أبي مالك، عن أبيه فذكر الحديث. وأبو مالك هو سعد بن طارق الأشجعي، وأبوه طارق بن أُشيم بن مسعود الأشجعي.
তারিক ইবনে উশাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলল এবং আল্লাহ ব্যতীত যার উপাসনা করা হয়, তা অস্বীকার (কুফর) করল, তার সম্পদ ও রক্ত (অন্যের জন্য) হারাম (সুরক্ষিত) হলো, আর তার হিসাব আল্লাহর উপর ন্যস্ত।"