আল-জামি` আল-কামিল
7888 - عن عبد الله بن عمرو قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أصاب غنيمة أمر بلالًا فنادى في الناس فيجيئون بغنائمهم فيخمسه ويقسمه، فجاء رجل بعد ذلك بزمام من شعر، فقال: يا رسول الله، هذا فيما كنا أصبناه من الغنيمة. فقال:"أسمعت بلالًا ينادي ثلاثًا؟". قال نعم. قال:"فما منعك أن تجيء به؟". فاعتذر إليه فقال:"كن أنت تجيء به يوم القيامة، فلن أقبله عنك".
حسن: رواه أبو داود (2712)، وأحمد (6996)، وصحّحه ابن حبَّان (4809)، والحاكم (2/ 127 و 129) كلّهم من طرق عن عبد الله بن شوذب، حَدَّثَنِي عامر بن عبد الواحد، عن عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وإسناده حسن من أجل عامر بن عبد الواحد فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কোনো গনীমতের মাল পেতেন, তিনি বেলালকে নির্দেশ দিতেন, অতঃপর তিনি (বেলাল) লোকজনের মাঝে ঘোষণা দিতেন। ফলে তারা তাদের গনীমতের মাল নিয়ে আসত। তিনি এর এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) বের করতেন এবং তা বন্টন করতেন। অতঃপর এর পরে এক ব্যক্তি চুলের তৈরি একটি লাগাম নিয়ে আসলো। সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, এটা সেই গনীমতের মালের অংশ যা আমরা লাভ করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি বেলালকে তিনবার ঘোষণা দিতে শোনোনি?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি কেন এটি নিয়ে আসতে বাধা পেলে?" সে তাঁর নিকট ওযর পেশ করল। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমিই এটি কিয়ামত দিবসে নিয়ে এসো, আমি তোমার পক্ষ থেকে এটি গ্রহণ করব না।"
7889 - عن عبادة بن الصَّامت أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يأخذ الوبرة من جنب البعير من المغنم فيقول:"ما لي فيه إِلَّا مثل ما لأحدكم منه، إياكم والغلول؛ فإن الغلول خزي على صاحبه يوم القيامة، أدوا الخيط والمخيط وما فوق ذلك، وجاهدوا في سبيل الله تعالى القريب والبعيد في الحضر والسفر؛ فإن الجهاد باب من أبواب الجنّة، إنه لينجي الله تبارك وتعالى به من الهم والغم، وأقيموا حدود الله في القريب والبعيد، ولا يأخذكم في الله لومة لائم".
حسن: رواه عبد الله بن أحمد في زوائده على المسند (22795) عن عبد الله بن سالم الكوفي المفلوج، حَدَّثَنَا عبيدة بن الأسود، عن القاسم بن الوليد، عن أبي صادق، عن ربيعة بن ناجد، عن عبادة بن الصَّامت فذكره.
ومن هذا الطريق رواه ابن ماجة (2540) مقتصرا على جزء الحدود. وفي إسناده ربيعة بن ناجد فيه جهالة لكن الحديث له طرق أخرى يتقوى بها. وهي مذكورة في كتاب الحدود.
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গণিমতের উটের গা থেকে একটি মাত্র পশম তুলে নিয়ে বলতেন: "এতে আমার জন্য তোমাদের কারো জন্য যা আছে, তার অতিরিক্ত কিছুই নেই। তোমরা খেয়ানত (আত্মসাৎ) করা থেকে সতর্ক থাকো; কারণ খেয়ানত কিয়ামতের দিন এর অধিকারীর জন্য লজ্জার কারণ হবে। তোমরা সুতা এবং সুঁই এমনকি এর চেয়েও বেশি যা কিছু আছে, তা পরিশোধ করো। আর আল্লাহ তাআলার পথে জিহাদ করো— নিকটবর্তী ও দূরবর্তী, মুকিম অবস্থায় ও সফরে; কারণ নিশ্চয়ই জিহাদ জান্নাতের একটি দরজা। নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা এর মাধ্যমে দুশ্চিন্তা ও পেরেশানি থেকে মুক্তি দেন। আর আল্লাহ্র নির্ধারিত দণ্ডবিধি নিকটবর্তী ও দূরবর্তী সবার ক্ষেত্রে প্রতিষ্ঠা করো এবং আল্লাহ্র (বিধান পালনের) ক্ষেত্রে কোনো নিন্দুকের নিন্দাকে ভয় করো না।"
7890 - عن عبد الله بن شقيق أنه أخبره من سمع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو بوادي القرى وهو على فرسه، فسأله رجل من بلقين فقال: يا رسول الله من هؤلاء؟ قال:"هؤلاء المغضوب عليهم"، وأشار إلى اليهود. قال: ممن هؤلاء؟ قال:"هؤلاء الضالين" يعني النصارى.
قال: وجاءه رجل فقال: استشهد مولاك - أو قال: غلامك - فلان، فقال:"بل يجر إلى النار في عباءة غلها".
صحيح: رواه أحمد (20351) عن عبد الرزّاق، حَدَّثَنَا معمر، عن بديل العقيلي قال: أخبرني عبد الله بن شقيق فذكره. وإسناده صحيح وجهالة الصحابي لا تضر.
وقد صحّحه المنذري في الترغيب والترهيب (2117). وقال الهيثميّ في مجمع الزوائد (5/ 338):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح".
আব্দুল্লাহ ইবনে শাকীক থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁকে জানিয়েছেন, যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ওয়াদিল কুরার নামক স্থানে তাঁর ঘোড়ার ওপর আরোহিত অবস্থায় শুনেছেন, তখন বালকিন গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: হে আল্লাহর রাসূল! এরা কারা? তিনি বললেন: "এরা হলো সেইসব লোক, যারা আল্লাহর গযবপ্রাপ্ত (আল-মাগদূবি আলাইহিম)।" আর তিনি ইহুদিদের দিকে ইঙ্গিত করলেন। লোকটি বলল: আর এরা কারা? তিনি বললেন: "এরা হলো পথভ্রষ্ট (আদ্ব-দ্বাল্লীন)।" অর্থাৎ খ্রিস্টানরা। বর্ণনাকারী বলেন: আর এক ব্যক্তি তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট এসে বলল: আপনার গোলাম—অথবা তিনি বললেন: আপনার যুবক—অমুক শাহাদাত বরণ করেছে। তিনি বললেন: "বরং তাকে জাহান্নামের দিকে টেনে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে একটি চাদরের কারণে, যা সে আত্মসাৎ করেছিল।"
7891 - عن ثابت بن رفيع - وكان يؤمر على السرايا - سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إياكم والغلول، الرّجل ينكح المرأة قبل أن يقسم، ثمّ يردها إلى القسم، أو يلبس الثوب حتَّى يخلق ثم يردها إلى القسم".
صحيح: رواه ابن أبي شيبة في مسنده (654)، - ومن طريقه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2198)، والطَّبرانيّ في الكبير (5/ 16) - كلاهما من طريق عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن زياد المصفر، عن الحسن، حَدَّثَنِي ثابت بن رفيع فذكره. وإسناده صحيح، وزياد المصفر هو زياد بن أبي عثمان الحنفيّ، ثقة، مترجم في الجرح والتعديل (3/ 539).
وثابت بن رفيع ويقال: ابن رويفع قال ابن أبي حاتم: ثابت بن رفيع له صحبة سمعت أبي يقول: هو شامي وهو عندي رويفع بن ثابت.
قلت: وحديث رويفع بن ثابت مخرج في البيوع.
وفي الباب عن أم حبيبة بنت العرباض عن أبيها أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأخذ الوبرة من فيء الله عز وجل، فيقول:"ما لي من هذا إِلَّا مثل ما لأحدكم إِلَّا الخمس، وهو مردود فيكم، فأدوا الخيط والمخيط فما فوقهما، وإياكم والغلول؛ فإنه عار وشنار على صاحبه يوم القيامة".
رواه أحمد (17154)، والبزّار (كشف الأستار 1734)، والطَّبرانيّ في الكبير (18/ 259 - 260) كلّهم من طريق أبي عاصم، حَدَّثَنَا وهب بن خالد الحمصيّ، حدثتني أم حبيبة بنت العرباض، عن أبيها فذكره.
وفي إسناده أم حبيبة بنت العرباض لا يعرف لها راوٍ غير وهب بن خالد، ولم يُنقَل توثيقها عن أحد، وذكره الذّهبيّ في فصل النسوة المجهولات من الميزان (4/ 611). وقال الحافظ في التقريب:"مقبولة" أي عند المتابعة ولم أجد لها متابعا.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 337):"فيه أم حبيبة بنت العرباض ولم أجد من وثقها ولا جرحها وبقية رجاله ثقات".
وفي الباب عن زيد بن خالد الجهني: أن رجلًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم توفي يوم خيبر فذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"صلوا على صاحبكم" فتغيرت وجوه الناس لذلك فقال:"إن صاحبكم
غل في سبيل الله" ففتشنا متاعه فوجدنا خرزا من خرز يهود لا يساوي درهمين.
رواه أبو داود (2710)، والنسائي (1959)، وابن ماجة (2848)، وأحمد (17301، 21675)، وصحّحه ابن حبَّان (4853)، والحاكم (2/ 127، 364) كلّهم من طرق عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبَّان، عن أبي عمرة مولى زيد بن خالد الجهني أنه سمع زيد بن خالد الجهني يحدث فذكره.
وقد وقع اختلاف في إسناده فمنهم من لم يذكر الواسطة بين محمد بن يحيى وبين زيد بن خال الجهنيّ، ومنهم من ذكر الواسطة فمنهم من قال:"عن أبي عمرة" ومنهم من قال:"عن ابن أبي عمرة" وقد قال أبو حاتم:"رواه جماعة عن يحيى عن محمد بن يحيى، عن أبي عمرة، عن زيد بن خالد، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو الصَّحيح. يعني المرسل". علل الحديث (سؤال 460).
وأبو عمرة هذا لا يعرف له راو غير محمد بن يحيى بن حبَّان، وذكره ابن حبَّان في ثقاته ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا. وذكره الذّهبيّ في الكاشف ولم يذكر فيه شيئًا.
وأمّا الحاكم فقال: رجل من جهينة معروف بالصدق.
وقال أيضًا: صحيح على شرط الشّيخين.
تنبيه: تحرف في بعض المصادر"خيبر" إلى"حنين".
وقال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد.
قلت: في إسناده صالح بن محمد بن زائدة مختلف فيه والجمهور على تضعيفه، ولكن قال الإمام أحمد: ما أرى به بأسًا. وقال العجلي: يكتب حديثه.
وروى أبو داود (2714) - ومن طريقه البيهقيّ (9/ 103) - عن أبي صالح محبوب بن موسى الأنطاكي قال: أخبرنا أبو إسحاق عن صالح بن محمد قال:"غزونا مع الوليد بن هشام ومعنا سالم بن عبد الله بن عمر وعمر بن عبد العزيز فغل رجل متاعا، فأمر الوليد بمتاعه، فأحرق وطيف به، ولم يعطه سهمه".
قال أبو داود: وهذا أصح الحديثين، رواه غير واحد أن الوليد بن هشام أحرق رحل زياد شغر وكان قد غل وضربه. قال أبو داود: شَغر لقبه.
وفي معناه ما رُوي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا بكر وعمر حرقوا متاع الغالّ وضربوه، ومنعوه سهمه.
رواه أبو داود (2715) من طريق موسى بن أيوب - وابن الجارود (1082)، والحاكم (2/ 130 - 131)، والبيهقي (9/ 102) من طريق عليّ بن بحر القطان - كلاهما عن الوليد بن مسلم، حَدَّثَنَا زهير بن محمد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. فذكره.
وليس في رواية موسى بن أيوب:"ومنعوا سهمه" إنّما هي في رواية عليّ بن بحر القطان.
وقال الحاكم: حديث غريب صحيح.
قلت: زهير بن محمد مجهول لم يرو عنه غير الوليد بن مسلم.
قال البيهقيّ: يقال: إن زهيرا هذا مجهول وليس بالمكي.
وذهب المزي في أطرافه إلى أنه زهير بن محمد التميمي وهو ثقة إِلَّا أن رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة كما قال البخاريّ. والوليد بن مسلم من أهل الشام.
والغالّ: هو الذي يكتم ما يأخذه من الغنيمة فلا يُطلع الإمام عليه ولا يضعه مع الغنيمة.
وأخذ بهذا الحديث الإمام أحمد وفقهاء الشام منهم مكحول والأوزاعي والوليد بن هشام ويزيد بن يزيد بن جابر، وأتي سعيد بن عبد الملك بغال، فجمع ماله وأحرقه وعمر بن عبد العزيز حاضر فلم يعبه.
وقال يزيد بن يزيد بن جابر: السنة في الذي يغل أن يحرق رحله. واستثنوا من ذلك المصحف وما فيه روح.
وقال مالك والشافعي وأصحاب الرأي: لا يحرق؛ لأن إحراق المتاع إضاعة له. وقد نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن إضاعة المال. انظر للمزيد: المغني (13/ 168).
সাবেত ইবনে রুফাই’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি সামরিক বাহিনীর প্রধান হিসাবে নিযুক্ত হতেন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা (গনীমতের সম্পদে) খেয়ানত করা থেকে সাবধান থেকো। (খেয়ানত হলো,) কোনো ব্যক্তি বণ্টনের পূর্বে (গনীমতের সম্পদ থেকে) কোনো নারীকে বিবাহ করে নেয়, অতঃপর তাকে বণ্টনের জন্য ফিরিয়ে দেয়; অথবা কোনো কাপড় পরিধান করে তা জীর্ণ না হওয়া পর্যন্ত ব্যবহার করে, অতঃপর তা বণ্টনের জন্য ফিরিয়ে দেয়।"
7892 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث سرية فيها عبد الله بن عمر قبل نجد، فغنموا إبلا كثيرة فكان سهمانهم اثني عشر بعيرًا أو أحد عشر بعيرًا، ونفلوا بعيرًا بعيرًا.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (10) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في فرض الخمس (3134)، ومسلم في الجهاد والسير (1749: 35) كلاهما من طريق مالك، به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নজদের দিকে একটি ক্ষুদ্র বাহিনী (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করেছিলেন, যার মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনে উমরও ছিলেন। তারা বিপুল সংখ্যক উট গনীমত হিসেবে লাভ করলেন। তখন তাদের অংশ হয়েছিল এগারোটি কিংবা বারোটি উট, এবং অতিরিক্ত হিসেবে তাদেরকে (নফল বা পুরস্কার স্বরূপ) আরও একটি করে উট দেওয়া হয়েছিল।
7893 - عن عبد الله بن عمر قال: نفّلنا رسول الله صلى الله عليه وسلم نفلا سوى نصيبنا من الخمس، فأصابني شارف - والشارف: المسنّ الكبير.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1750: 38) من طريق عبد الله بن رجاء، عن يونس، عن الزّهريّ، عن سالم، عن أبيه فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে খুমুসে আমাদের প্রাপ্য অংশ ব্যতীত অতিরিক্ত পুরস্কার (নাফল) প্রদান করেছিলেন। ফলে আমার ভাগে একটি শারিফ পড়ল। শারিফ অর্থ হলো বয়স্ক বড় (প্রাণী)।
7894 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان ينفّل بعض من يبعث من السرايا لأنفسهم خاصة سوى قسم عامة الجيش، والخمس في ذلك واجب كله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3135)، ومسلم في الجهاد والسير (1750: 40) كلاهما من طريق اللّيث، حَدَّثَنِي عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سالم، عن ابن عمر .. فذكره.
والسياق لمسلم وليس عند البخاريّ قوله:"والخمس في ذلك واجب كله".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো ছোট সেনাদল (সারিয়া) প্রেরণ করতেন, তখন তিনি তাদের কিছু লোককে বিশেষভাবে অতিরিক্ত বখশিশ (নফল) দিতেন, যা সাধারণ সেনাবাহিনীর ভাগের অতিরিক্ত ছিল। আর এর সবকিছুর মধ্যেই এক-পঞ্চমাংশ (খুমস) প্রদান করা বাধ্যতামূলক ছিল।
7895 - عن سعد بن أبي وقَّاص قال: نزلت فيّ أربع آيات، أصبت سيفًا فأتي به النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، نفلنيه فقال:"ضعْه"، ثمّ قام، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: صلى الله عليه وسلم"ضعه من حيث أخذته"، ثمّ قام، فقال: نفلنيه يا رسول الله، فقال:"ضعه" فقام، فقال: يا رسول الله نفلنيه أأجعل كمن لا غناء له؟ فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ضعه من حيث أخذته"، قال: فنزلت هذه الآية: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ}.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1748: 34) من طريق محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن سماك بن حرب، عن مصعب بن سعد، عن أبيه، فذكره.
قال أبو داود عقب الحديث المذكور (2740): قراءة ابن مسعود: يسألونك النفل.
সাদ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার ব্যাপারে চারটি আয়াত নাযিল হয়েছে। আমি একটি তলোয়ার লাভ করলাম এবং তা নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, এটি আমাকে অতিরিক্ত দান করুন। তিনি বললেন, "এটি রেখে দাও।" অতঃপর আমি দাঁড়ালাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "তুমি যেখানে থেকে তা নিয়েছিলে, সেখানেই রেখে দাও।" এরপর আমি দাঁড়ালাম এবং বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, এটি আমাকে অতিরিক্ত দিন। তিনি বললেন, "এটি রেখে দাও।" অতঃপর আমি দাঁড়ালাম এবং বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, এটি আমাকে অতিরিক্ত দিন। আমি কি এমন ব্যক্তির মতো হব যার কোনো প্রয়োজন নেই? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "তুমি যেখানে থেকে তা নিয়েছিলে, সেখানেই রেখে দাও।" তিনি বলেন, তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তারা আপনাকে যুদ্ধলব্ধ সম্পদ (আনফাল) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে। বলুন, যুদ্ধলব্ধ সম্পদ (আনফাল) আল্লাহ ও রাসূলের জন্য।} (সূরা আনফাল ৮:১)
7896 - عن ابن عباس: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تنفّل سيفه ذا الفقار يوم بدر، وهو الذي رأى فيه الرؤيا لوم أحد.
حسن: رواه الترمذيّ (1561) - واللّفظ له - وابن ماجة (2808)، وأحمد (2445)، والحاكم (2/ 128 - 129) وعنه البيهقيّ في السنن (7/ 41) من طرق عن عبد الرحمن بن أبي الزّناد، عن أبيه، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن ابن عباس فذكره. وسياق أحمد والحاكم طويل.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزّناد.
قال الترمذيّ في العلل الكبير (2/ 668):"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: يروونه عن عبيد الله مرسلًا، قال محمد: وحديث ابن أبي الزّناد، عن أبيه، عن عبيد الله، عن ابن عباس صحيح" اهـ.
وقال الترمذيّ في السنن:"هذا حديث حسن غريب، إنّما نعرفه من هذا الوجه من حديث ابن أبي الزّناد" اهـ.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন যুলফিকার নামের তাঁর তরবারিটি (বিশেষ গনীমত হিসেবে) গ্রহণ করেছিলেন এবং এটিই সেই (তরবারি) যার ব্যাপারে তিনি ওহুদের দিনের জন্য স্বপ্ন দেখেছিলেন।
7897 - عن أبي الجويرية قال: أصبت جرة حمراء فيها دنانير في إمارة معاوية في أرض الروم، قال: وعلينا رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم من بني سليم يقال له: معن بن يزيد قال: فأتيت بها يقسمها بين المسلمين فأعطاني مثل ما أعطى رجلًا منهم ثمّ قال: لولا أني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ورأيته يفعله، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا نفل إِلَّا بعد الخمس" إذًا لأعطيتك قال: ثمّ أخذ فعرض عليّ من نصيبه فأبيت عليه، قلت: ما أنا بأحق به منك.
حسن: رواه أبو داود (2754)، وأحمد (15862)، والبيهقي (6/ 314) من طرق عن عاصم بن كليب قال: حَدَّثَنِي أبو الجويرية فذكره. واللّفظ لأحمد.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن كليب فإنه حسن الحديث.
আবূ আল-জুওয়াইরিয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে রোমীয় এলাকায় একটি লাল কলস পেলাম, যার মধ্যে ছিল স্বর্ণমুদ্রা (দিনার)। তিনি বলেন: আমাদের দায়িত্বে ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একজন, বানূ সুলাইম গোত্রের একজন লোক, যার নাম মা'ন ইবন ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আবূ আল-জুওয়াইরিয়াহ বলেন: আমি সেগুলো নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম, যেন তিনি তা মুসলিমদের মাঝে বন্টন করেন। তিনি তাদের অন্য একজন লোককে যা দিলেন, আমাকেও ঠিক তাই দিলেন। এরপর তিনি (মা'ন ইবন ইয়াযীদ) বললেন: আমি যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ কথা বলতে না শুনতাম এবং তাঁকে এটি করতে না দেখতাম, আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) বের করার পর ব্যতীত নফল (অতিরিক্ত পুরস্কার) দেওয়া যায় না।" তাহলে অবশ্যই আমি তোমাকে (অতিরিক্ত) দিতাম। তিনি (আবূ আল-জুওয়াইরিয়াহ) বলেন: এরপর তিনি নিজের অংশ থেকে আমাকে নিতে প্রস্তাব দিলেন, কিন্তু আমি তা প্রত্যাখ্যান করলাম এবং বললাম: আমি আপনার চেয়ে এর বেশি হকদার নই।
7898 - عن حبيب بن مسلمة الفهري: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينفل الثلث بعد الخمس.
وفي لفظ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نفل الربع بعد الخمس في بدأته، ونفل الثلث بعد الخمس.
صحيح: رواه أبو داود (2748 - 2750)، وابن ماجة (2851)، وأحمد (17462)، وابن حبَّان (4835)، والحاكم (2/ 133)، والبيهقي (6/ 314) كلّهم من طرق عن مكحول، عن زياد بن جارية - أو زيد بن جارية - عن حبيب بن مسلمة الفهري فذكره.
واللّفظ الثاني عند أحمد وابن حبَّان وغيرهما.
وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
وهو كما قال وقد جاء عند أبي داود (2750) أن مكحولا لقي زياد بن جارية التميمي فقال له: هل سمعتَ في النفل شيئًا؟ قال: نعم سمعت حبيب بن مسلمة الفهري يقول: فذكره.
وقوله:"ونفل بعد الخمس" أي أخذ الخمس أولا من تمام الغنيمة ثمّ أعطى الثلث أو الربع مما بقي من الأخماس الأربعة ثمّ قسم البقية بين الغانمين.
وفيه دليل على أنه يجوز للإمام أن يزيد بعض المقاتلين على نصيبه بمقدار الثلث أو الربع من الأخماس الأربعة، وهذا قول أنس بن مالك، وفقهاء الشام منهم: رجاء بن حيوة، ومكحول، والأوزاعي. وبه قال أحمد، وإسحاق، وأبو عبيد. وكان مالك يرى أنه لا نفل إِلَّا من الخمس.
وقال النخعي وغيره: إن شاء الإمام نفله قبل الخمس وإن شاء بعده. انظر: المغني (13/ 60).
وكان بعض الصّحابة يرى أنه لا نفل بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم منهم: عبد الله بن عمرو بن العاص فقد روى ابن ماجة (2853) من طريق رجاء بن أبي سلمة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: لا نفل بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم يرد المسلمون قويهم على ضعيفهم.
وقوله:"في بدأته" أي: في ابتداء الغزو وذلك بأن نهضت سرية من العسكر وابتدروا إلى العدو في أول الغزو فما غنموا كان يعطيهم منها الربع، والبقية يقسم لتمام العسكر، وإن فعل طائفة مثل ذلك حين رجوع العسكر يعطيهم ثلث ما غنموا؛ لأن فعلهم ذلك حين رجوع العسكر أشقُّ لضعف الظهر والعدة والفتور، وزيادة الاشتهاء إلى الأوطان فزاد لذلك.
وأمّا ما رُوي عن عبادة بن الصَّامت:"أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان ينفل في البدأة الربع، وفي القفول الثلث" فلا يصح.
رواه الترمذيّ (1561)، وابن ماجة (2852)، وأحمد (22726) كلّهم من طرق عن سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عَيَّاش بن أبي ربيعة، عن سليمان بن موسى (هو الأشدق)، عن مكحول، عن أبي سلام الأعرج، عن أبي أمامة، عن عبادة بن الصَّامت .. فذكره.
قال الترمذيّ في العلل (2/ 665):"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: لا يصح، إنّما روى هذا الحديث داود بن عمرو، عن أبي سلّام، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا".
قال محمد (يعني البخاريّ):"وسليمان بن موسى منكر الحديث، أنا لا أرُوي عنه شيئًا، روى سليمان بن موسى أحاديث عامتها مناكير". ثمّ ساق له عدة مناكير.
قلت: وفي سنده عبد الرحمن بن الحارث بن عَيَّاش بن أبي ربيعة صدوق له أوهام، وقد اختلف عليه أيضًا.
وأمّا الترمذيّ فقال:"حديث حسن".
হাবীব ইবনু মাসলামাহ আল-ফিহরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গণীমতের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) বাদ দেওয়ার পর অবশিষ্ট থেকে এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত প্রদান করতেন (নফল হিসেবে)।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুদ্ধের প্রারম্ভে (শুরুতে) এক-পঞ্চমাংশ বাদ দেওয়ার পর অবশিষ্ট থেকে এক-চতুর্থাংশ অতিরিক্ত প্রদান করতেন এবং এক-পঞ্চমাংশ বাদ দেওয়ার পর এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত প্রদান করতেন।
7899 - عن عمر قال: كانت أموال بني النضير مما أفاء الله على رسوله صلى الله عليه وسلم مما لم يوجف المسلمون عليه بخيل ولا ركاب، فكانت لرسول الله صلى الله عليه وسلم خاصة، وكان ينفق على أهله نفقة سنته، ثمّ يجعل ما بقي في السلاح والكُراع عدة في سبيل الله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2904)، ومسلم في الجهاد والسير (1757: 48) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن الزّهريّ، عن مالك ابن أوس، عن عمر فذكره.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু নদ্বীরের সম্পদ এমন ছিল যা আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যুদ্ধ ছাড়াই দান করেছিলেন (ফাই হিসেবে দিয়েছিলেন)—যা লাভের জন্য মুসলিমরা ঘোড়া বা উট চালিয়ে আক্রমণ করেনি। তাই এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য নির্দিষ্ট ছিল। আর তিনি তাঁর পরিবার-পরিজনের জন্য এক বছরের ভরণপোষণ খরচ দিতেন। অতঃপর অবশিষ্ট যা থাকত, তা আল্লাহর পথে ব্যবহারের জন্য অস্ত্র ও ঘোড়ার প্রস্তুতিতে রাখতেন।
7900 - عن مالك بن أوس بن الحدثان قال: بينا أنا جالس في أهلي حين متع النهار إذا رسول عمر بن الخطّاب يأتيني فقال: أجب أمير المؤمنين فانطلقت معه حتَّى أدخل على عمر، فإذا هو جالس على رمال سرير ليس بينه وبينه فراش، متكئ على وسادة من أدم فسلمت عليه، ثمّ جلست فقال: يا مال إنه قدم علينا من قومك أهل أبيات وقد أمرت فيهم برضخ فاقبضه، فاقسمه بينهم فقلت: يا أمير المؤمنين لو أمرت به غيري قال: اقبضه أيها المرء، فبينا أنا جالس عنده أتاه حاجبه يرفا فقال: هل لك في عثمان وعبد الرحمن بن عوف والزُّبير وسعد بن أبي وقَّاص يستأذنون؟ قال: نعم فأذن لهم فدخلوا فسلموا وجلسوا ثمّ جلس يرفا يسيرًا ثمّ قال: هل لك في عليّ وعباس قال نعم، فأذن لهما فدخلا فسلما فجلسا فقال عباس: يا أمير المؤمنين اقض بيني وبين هذا - وهما يختصمان - فيما أفاء الله على رسوله صلى الله عليه وسلم من مال بني النضير فقال الرهط عثمان وأصحابه: يا أمير المؤمنين اقض بينهما وأرح أحدهما من الآخر قال عمر: تيدكم أنشدكم بالله الذي بإذنه تقوم السماء والأرض هل تعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا صدقة" يريد رسول الله صلى الله عليه وسلم نفسه؟ قال الرهط: قد قال ذلك فأقبل عمر على عليّ وعباس فقال: أنشدكما الله أتعلمان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد قال ذلك؟ قالا: قد قال ذلك. قال عمر: فإني أحدثكم عن هذا الأمر، إن الله قد خص رسوله صلى الله عليه وسلم في هذا الفيء بشيء لم يعطه أحدًا غيره ثمّ قرأ. {وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْهُمْ} إلى قوله {قَدِيرٌ} فكانت هذه خالصة لرسول الله صلى الله عليه وسلم، والله ما احتازها دونكم ولا استأثر بها عليكم قد أعطاكموها وبثها فيكم حتَّى بقي منها هذا المال، فكان
رسول الله صلى الله عليه وسلم ينفق على أهله نفقة سنتهم من هذا المال، ثمّ يأخذ ما بقي، فيجعله مجعل مال الله فعمل رسول الله صلى الله عليه وسلم بذلك حياته أنشدكم بالله هل تعلمون ذلك؟ قالوا: نعم ثمّ قال لعلي وعباس: أنشدكما بالله هل تعلمان ذلك؟ قال عمر: ثمّ توفى الله نبيه صلى الله عليه وسلم فقال أبو بكر: أنا ولي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقبضها أبو بكر فعمل فيها بما عمل رسول الله صلى الله عليه وسلم والله يعلم إنه فيها لصادق بارّ راشد تابع للحق ثمّ توفى الله أبا بكر فكنت أنا ولي أبي بكر فقبضتها سنتين من إمارتي أعمل فيها بما عمل رسول الله صلى الله عليه وسلم وما عمل فيها أبو بكر والله يعلم إني فيها لصادق بار راشد تابع للحق ثمّ جئتماني تكلماني وكلمتكما واحدة وأمركما واحد جئتني يا عباس تسألني نصيبك من ابن أخيك وجاءني هذا - يريد عليا - يريد نصيب امرأته من أبيها فقلت لكما إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا صدقة". فلمّا بدا لي أن أدفعه إليكما قلت: إن شئتما دفعتها إليكما على أن عليكما عهد الله وميثاقه لتعملان فيها بما عمل فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم وبما عمل فيها أبو بكر وبما عملت فيها منذ وليتها فقلتما: ادفعها إلينا فبذلك دفعتها إليكما فأنشدكم بالله هل دفعتها إليهما بذلك؟ قال الرهط: نعم، ثمّ أقبل على عليّ وعباس فقال: أنشدكما بالله هل دفعتها إليكما بذلك؟ قالا: نعم قال: فتلتمسان مني قضاء غير ذلك، فوالله الذي بإذنه تقوم السماء والأرض لا أقضي فيها قضاء غير ذلك، فإن عجزتما عنها فادفعاها إلي فإني أكفيكماها.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3094)، ومسلم في الجهاد والسير (1756: 49) من طريق مالك بن أنس، عن ابن شهاب الزّهريّ، أن مالك بن أوس حدَّثه قال فذكره.
ورواه أبو عبيد في الأموال (41) عن إسماعيل بن إبراهيم، عن أيوب، عن عكرمة بن خالد، عن مالك بن أوس بن الحدثان، عن عمر بن الخطّاب نحو الحديث الذي ذكرنا في قول العباس وعلي وزاد في آخر حديثه بعضه عن أيوب، عن الزّهريّ، عن مالك بن أوس بن الحدثان، عن عمر نحو الحديث الذي ذكرناه قال:
ثمّ قرأ: {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [الأنفال: 41]، هذه لهولاء. {إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [التوبة: 60]، هذه لهولاء: {مَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَى فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [الحشر: 7] وللفقراء والمهاجرين أو قال: {لِلْفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ} [الحشر: 8] {وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالْإِيمَانَ مِنْ قَبْلِهِمْ} [الحشر: 9] {وَالَّذِينَ جَاءُوا مِنْ بَعْدِهِمْ} قال: فاستوعبت هذه الآية الناس.
فلم يبق أحد من المسلمين إِلَّا له فيها حق - أو قال: حظ - إِلَّا بعض من تملكون من أرقّائكم. وإن عشت إن شاء الله ليؤتين كل مسلم حقه - أو قال: حظه - حتَّى يأتي الراعي بسَرْو حمير ولم يعرق فيه جبينه.
ومن طريق أيوب عن عكرمة بن خالد رواه أيضًا النسائيّ (4148) ثمّ قال: قال الزهري وذكر الآية الكريمة. ورواه أبو داود (2966) من طريق أيوب، عن الزهري قال: قال عمر. فذكر الحديث. فهما لم يقما إسناد الزهري وأقامه أبو عبيد.
মালিক ইবনু আওস ইবনুল হাদাসান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দুপুরবেলা যখন আমি আমার পরিবারের সাথে বসেছিলাম, তখন হঠাৎ উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দূত আমার কাছে এসে বললেন: আমীরুল মুমিনীনকে সাড়া দিন (তাঁর কাছে চলুন)। আমি তার সাথে গেলাম এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তখন তিনি একটি খাটের ওপর বালুর ওপর বসেছিলেন, যার নিচে কোনো বিছানা ছিল না। তিনি চামড়ার একটি বালিশে হেলান দিয়ে ছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম, অতঃপর বসলাম। তিনি বললেন: হে মালিক! তোমার গোত্রের কিছু লোক আমাদের কাছে এসেছে, আর আমি তাদের জন্য কিছু অর্থ বণ্টনের নির্দেশ দিয়েছি। তুমি তা গ্রহণ করো এবং তাদের মধ্যে বণ্টন করে দাও। আমি বললাম: হে আমীরুল মুমিনীন! যদি আপনি আমার পরিবর্তে অন্য কাউকে এর নির্দেশ দিতেন? তিনি বললেন: হে ব্যক্তি! তুমিই তা গ্রহণ করো।
যখন আমি তাঁর কাছে বসেছিলাম, তখন তাঁর প্রহরী ইয়ারফা এসে বললেন: আপনার কি অনুমতি আছে যে, উসমান, আবদুর রহমান ইবনু আওফ, যুবাইর এবং সা‘দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস প্রবেশ করবেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তাদের অনুমতি দিলেন। তারা প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন এবং বসলেন। এরপর ইয়ারফা কিছুক্ষণ বসলেন, তারপর আবার এসে বললেন: আপনার কি আলী এবং আব্বাসকে অনুমতি আছে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তাদের অনুমতি দিলেন। তারা উভয়ে প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন এবং বসলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আমার এবং এর (আলীকে উদ্দেশ্য করে) মাঝে ফায়সালা করে দিন— আর তারা উভয়ে আল্লাহর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আল্লাহ তা‘আলা বনু নাযীর গোত্রের সম্পত্তি থেকে যে ফাইয় (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ) দিয়েছেন, তা নিয়ে ঝগড়া করছিলেন।
তখন উসমান ও তাঁর সঙ্গীরা (উপস্থিত দলটি) বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি তাদের মধ্যে ফায়সালা করে দিন এবং তাদের একজনকে অন্যজনের হাত থেকে শান্তি দিন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা একটু শান্ত হও। আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি— যাঁর অনুমতিতে আসমান ও যমীন টিকে আছে— তোমরা কি জানো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা কোনো উত্তরাধিকার রেখে যাই না, আমরা যা রেখে যাই তা হলো সাদকা (দান)?"— রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ কথা দ্বারা নিজেকেই বুঝিয়েছিলেন। উপস্থিত দলটি বললেন: হ্যাঁ, তিনি তা বলেছেন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী ও আব্বাসের দিকে মুখ করে বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, তোমরা কি জানো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা বলেছেন? তারা উভয়ে বললেন: হ্যাঁ, তিনি তা বলেছেন।
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদেরকে এই বিষয়ে বলছি। আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই 'ফাইয়'-এর (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ) মধ্যে এমন কিছু বিশেষত্ব দিয়েছেন যা তিনি অন্য কাউকে দেননি। অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: {আল্লাহ তাদের থেকে তাঁর রাসূলকে যা কিছু ফায় (ফিরিয়ে) দিয়েছেন...} থেকে শুরু করে {قدير} (পরম ক্ষমতাশীল) পর্যন্ত। তাই এই সম্পদ একান্তভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য নির্দিষ্ট ছিল। আল্লাহর কসম! তিনি তোমাদের বাদ দিয়ে এটি নিজ দখলে রাখেননি এবং তোমাদের ওপর প্রাধান্যও দেননি। তিনি এটি তোমাদেরকে দিয়েছেন এবং তোমাদের মাঝে তা ছড়িয়ে দিয়েছেন, যতক্ষণ না এর কিছু সম্পদ অবশিষ্ট থাকল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই সম্পদ থেকে তাঁর পরিবারের জন্য তাদের এক বছরের খরচ ব্যয় করতেন, এরপর যা অবশিষ্ট থাকত, তা আল্লাহর মালের মতো গণ্য করে রাখতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবদ্দশায় এই অনুযায়ীই কাজ করেছেন। আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, তোমরা কি এ কথা জানো? তারা বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি আলী ও আব্বাসকে বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, তোমরা কি তা জানো?
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর আল্লাহ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইন্তিকাল করালেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলীফা। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তা (সম্পদ) গ্রহণ করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেভাবে এতে কাজ করতেন, তিনিও সেভাবেই কাজ করলেন। আর আল্লাহ জানেন যে, তিনি এই বিষয়ে অবশ্যই সত্যবাদী, নেককার, সঠিক পথের দিশারী এবং হকের অনুসারী ছিলেন। অতঃপর আল্লাহ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও ইন্তিকাল করালেন। তখন আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খলীফা হলাম। আমি আমার খেলাফতের দুই বছর তা গ্রহণ করেছি এবং তাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেভাবে কাজ করেছেন, আমিও সেভাবেই কাজ করেছি। আর আল্লাহ জানেন যে, আমি এই বিষয়ে অবশ্যই সত্যবাদী, নেককার, সঠিক পথের দিশারী এবং হকের অনুসারী। এরপর তোমরা উভয়ে আমার কাছে এসেছ এবং আমার সাথে কথা বলছ। তোমাদের উভয়ের কথা এক এবং তোমাদের উভয়ের দাবিও এক। হে আব্বাস! তুমি এসেছ তোমার ভাতিজার (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) রেখে যাওয়া সম্পদের মধ্যে তোমার অংশ চাইতে। আর এই ব্যক্তি (আলীকে উদ্দেশ্য করে) আমার কাছে এসেছেন তাঁর স্ত্রীর (ফাতেমা) পিতা (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) থেকে তাঁর স্ত্রীর অংশ চাইতে। আমি তোমাদের দুজনকে বলেছিলাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা কোনো উত্তরাধিকার রেখে যাই না, আমরা যা রেখে যাই তা হলো সাদকা (দান)।" যখন আমার মনে হলো যে, আমি এটি তোমাদের হাতে তুলে দেব, তখন আমি বললাম: তোমরা যদি চাও, তবে আমি এটি তোমাদের হাতে এই শর্তে অর্পণ করব যে, তোমাদের ওপর আল্লাহ তা‘আলার অঙ্গীকার ও ওয়াদা থাকবে— তোমরা এতে সেভাবেই কাজ করবে যেভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এতে কাজ করেছেন, যেভাবে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাজ করেছেন, আর যেভাবে আমি এতে কাজ করেছি যখন থেকে এর দায়িত্ব নিয়েছি। তখন তোমরা উভয়ে বললে: এটি আমাদের হাতে তুলে দিন। এই শর্তেই আমি এটি তোমাদের কাছে অর্পণ করেছি। তাই আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, আমি কি এই শর্তেই তাদের হাতে তা অর্পণ করেছিলাম? উপস্থিত দলটি বলল: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি আলী ও আব্বাসের দিকে মুখ করে বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, আমি কি এই শর্তেই তা তোমাদের হাতে অর্পণ করেছিলাম? তারা উভয়ে বললেন: হ্যাঁ। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে কি তোমরা আমার কাছে এর ব্যতিক্রম কোনো ফায়সালা চাচ্ছ? সেই সত্তার কসম, যাঁর হুকুমে আসমান ও যমীন প্রতিষ্ঠিত— আমি এতে এর ব্যতিক্রম কোনো ফায়সালা করব না। যদি তোমরা এর দায়িত্ব বহন করতে অপারগ হও, তাহলে তা আমার কাছে ফিরিয়ে দাও। আমি তোমাদের উভয়কে এর দায়িত্ব থেকে মুক্ত করে দেব।
অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: {আর তোমরা জেনে রাখো যে, তোমরা যা কিছু গণীমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) হিসেবে অর্জন করেছ, তার এক পঞ্চমাংশ আল্লাহ, তাঁর রাসূল, নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম, মিসকীন ও পথিকের জন্য} [আল-আনফাল: ৪১]— এটা তাদের জন্য। {সাদকা (যাকাত) তো কেবল ফকীর, মিসকীন, এর সাথে যুক্ত কর্মচারী, যাদের মন জয় করা উদ্দেশ্য, দাসমুক্তির জন্য, ঋণগ্রস্তদের জন্য, আল্লাহর পথে এবং পথিকদের জন্য} [আত-তাওবা: ৬০]— এটা তাদের জন্য। {আল্লাহ জনপদবাসীদের থেকে তাঁর রাসূলকে যা কিছু ‘ফায়’ (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ) হিসেবে দিয়েছেন, তা আল্লাহ, তাঁর রাসূল, তাঁর নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম, মিসকীন ও পথিকের জন্য} [আল-হাশর: ৭]। আর ফকীর মুহাজিরদের জন্য— অথবা তিনি বললেন: {ঐ ফকীর মুহাজিরদের জন্য, যাদেরকে নিজ ঘর ও সম্পদ থেকে বহিষ্কার করা হয়েছে} [আল-হাশর: ৮]। {আর যারা তাদের (মুহাজিরদের) পূর্বে এই দেশ ও ঈমানের মধ্যে অবস্থান করেছেন} [আল-হাশর: ৯]। {আর যারা তাদের পরে এসেছে}। তিনি বললেন: এই আয়াতটি (আল-হাশরের আয়াত) সকল মানুষকে অন্তর্ভুক্ত করেছে। তোমাদের মালিকানাধীন দাস-দাসী ছাড়া কোনো মুসলিম বাকি রইল না যার এতে কোনো অধিকার নেই— অথবা বললেন: কোনো অংশ নেই। আর যদি আমি বেঁচে থাকি ইনশাআল্লাহ, তবে আমি প্রত্যেক মুসলিমকে তার প্রাপ্য অধিকার— অথবা বললেন: তার অংশ— অবশ্যই দেব, এমনকি রাখাল সায়র হামইয়ার পর্যন্ত পৌঁছালে, আর এতে তার কপালে ঘাম ঝরবে না (অর্থাৎ সহজেই তার কাছে পৌঁছাবে)।
7901 - عن عائشة: أن فاطمة ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم سألت أبا بكر الصديق بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يقسم لها ميراثها مما ترك رسول الله صلى الله عليه وسلم مما أفاء الله عليه فقال لها أبو بكر: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا صدقة". فغضبت فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم فهجرت أبا بكر فلم تزل مهاجرته حتَّى توفيت وعاشت بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم ستة أشهر قالت: وكانت فاطمة تسأل أبا بكر نصيبها مما ترك رسول الله صلى الله عليه وسلم من خيبر وفدك وصدقته بالمدينة فأبى أبو بكر عليها ذلك وقال: لست تاركا شيئًا كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعمل به إِلَّا عملت به فإني أخشى إن تركت شيئًا من أمره أن أزيغ فأما صدقته بالمدينة فدفعها عمر إلى عليّ وعباس، وأمّا خيبر وفدك فأمسكها عمر وقال: هما صدقة رسول الله صلى الله عليه وسلم كانتا لحقوقه التي تعروه ونوائبه وأمرهما إلى من ولي الأمر قال: فهما على ذلك إلى اليوم.
وفي لفظ: أن فاطمة عليها السلام أرسلت إلى أبي بكر تسأله ميراثها من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيما أفاء الله على رسوله صلى الله عليه وسلم تطلب صدقة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم التي بالمدينة وفدك وما بقي من خمس خيبر، فقال أبو بكر: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا فهو صدقة" إنّما يأكل آل محمد من هذا المال يعني مال الله ليس لهم أن يزيدوا على المأكل وإني والله لا أغير شيئًا من صدقات النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم التي كانت عليها في عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ولأعملن فيها بما عمل فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3092 - 3093)، ومسلم في الجهاد والسير (1759: 54) من طريق إبراهيم بن سعد، عن صالح، عن ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزُّبير، أن عائشة أخبرته. فذكرته.
ورواه البخاريّ (3711 - 3712) من طريق شعيب، عن الزهري به. فذكره باللفظ الثاني.
وبمعناه ما رُوي عن أبي البختري قال: سمعت حديثًا من رجل فأعجبني فقلت: اكتبه لي فأتي به مكتوبًا مُذَبَّرًا.
دخل العباس وعلي على عمر وعنده طلحة والزُّبير وعبد الرحمن وسعد وهما يختصمان فقال عمر لطلحة والزُّبير وعبد الرحمن وسعد ألم تعلموا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل مال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صدقة إِلَّا ما أطعمه أهله وكساهم إنا لا نورث" قالوا: بلى. قال فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينفق من ماله على أهله ويتصدق بفضله ثمّ توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوليها أبو بكر سنتين، فكان يصنع الذي كان يصنع رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمّ ذكر شيئًا من حديث مالك بن أوس.
رواه أبو داود (2975)، والطيالسي (61) من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري .. فذكره.
وأبو البختري هو سعيد بن فيروز ثقة إِلَّا أنه لم يُسم شيخه.
وأمّا ما رُوي عن عليّ بن أبي طالب قال: ولّاني رسول الله صلى الله عليه وسلم خمس الخمس فوضعته مواضعه حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم وحياة أبى بكر وحياة عمر، فأتي بمال فدعاني فقال:"خذه". فقلت لا أريده. قال:"خذه فأنتم أحق به". قلت: قد استغنينا عنه، فجعله في بيت المال. فلا يصح.
رواه أبو داود (2983)، والحاكم (2/ 128)، والبيهقي (6/ 343) من طريق أبي جعفر الرازيّ، عن مطرف، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى سمعت عليًّا يقول فذكره. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
كذا قال! وقال الدَّارقطنيّ في العلل (3/ 279 - 280) يرويه مطرف بن طريف، واختلف عنه فرواه أبو جعفر الرازيّ، عن مطرف، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عليّ.
وخالفه أبو عوانة رواه عن مطرف عن رجل يقال له: كثير، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عليّ.
وكثير هذا مجهول، ومطرف لم يسمع من ابن أبي ليلى".
قلت: وأبو جعفر سيئ الحفظ، وخالفه أبو عوانة وهو الوضاح بن عبد الله اليشكري ثقة ثبت.
وروى أبو داود (2984)، وأحمد (646) من طريق هاشم بن البريد، حَدَّثَنَا حسين بن ميمون، عن عبد الله بن عبد الله، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى سمعت عليًّا يقول: اجتمعتُ أنا والعباس وفاطمة وزيد بن حارثة عند النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إن رأيت أن توليني حقنا من هذا الخمس في كتاب الله فاقسمه حياتك كي لا ينازعني أحد بعدك فافعل. قال: ففعل ذلك، قال: فقسمته حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم ولانيه أبو بكر رضي الله عنه حتَّى إذا كانت آخر سنة من سني عمر رضي الله عنه فإنه أتاه مال كثير فعزل حقنا، ثمّ أرسل إلي فقلت: بنا عنه العام غنى، وبالمسلمين إليه حاجة فاردده عليهم فرده عليهم، ثمّ لم يدعني إليه أحد بعد عمر فلقيت العباس بعد ما خرجت من عند عمر فقال: يا عليّ حرمتنا الغداة شيئًا لا يرد علينا أبدًا، وكان رجلًا داهيا. والسياق لأبي داود، وسياق أحمد أطول.
وفي إسناده حسين بن ميمون وهو الخندقي قال ابن المديني: ليس بالمعروف قل من روى عنه،
وقال أبو زرعة: شيخ، وقال أبو حاتم: ليس بقوي في الحديث. وقال البخاريّ في التاريخ الكبير بعد أن ذكر حديثه هذا: وهو حديث لم يتابع عليه.
ورُوي عن المغيرة قال: جمع عمر بن عبد العزيز بني مروان حين استخلف فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كانت له فدك فكان ينفق منها ويعود منها على صغير بني هاشم ويزوج منها أيمهم، وإن فاطمة سألته أن يجعلها لها، فأبى فكانت كذلك في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى مضى لسبيله، فلمّا أن ولي أبو بكر رضي الله عنه عمل فيها بما عمل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في حياته حتَّى مضى لسبيله، فلمّا أن ولي عمر عمل فيها بمثل ما عملًا حتَّى مضى لسبيله، ثمّ أقطعها مروان ثمّ صارت لعمر بن عبد العزيز قال: - يعني عمر بن عبد العزيز - فرأيت أمرا منعه رسول الله صلى الله عليه وسلم فاطمة ليس لي بحق وأنا أشهدكم أني قد رددتها على ما كانت يعني على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
رواه أبو داود (2972) - ومن طريقه البيهقيّ (6/ 301) - عن عبد الله بن الجراح، حَدَّثَنَا جرير، عن المغيرة قال فذكره.
وإسناده حسن إلى عمر بن عبد العزيز من أجل عبد الله بن جراح فإنه حسن الحديث وهو مرسل. وأمّا ما رُوي عن أبي الطفيل قال: لما قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم أرسلت فاطمة إلى أبي بكر: أنت ورثت رسول الله صلى الله عليه وسلم أم أهله؟ قال: فقال: لا بل أهله قالت: فأين سهم رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: فقال أبو بكر: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله عز وجل إذا أطعم نبيا طعمة ثمّ قبضه جعله للذي يقوم من بعده" فرأيت أن أرده على المسلمين فقالت: فأنت وما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم أعلم. ففي ألفاظه نكارة.
رواه أبو داود (2973)، وأحمد (14)، وعبد الله في زوائده من طريق محمد بن فضيل، عن الوليد بن جُميع، عن أبي الطفيل، فذكره والسياق لأحمد.
وفي سنده الوليد بن جميع وهو الوليد بن عبد الله بن جميع وهو صدوق في نفسه إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.
قال ابن حبَّان: كان ممن ينفرد عن الأثبات بما لا يشبه حديث الثّقات، فلمّا فحش ذلك منه بطل الاحتجاج به.
وقال ابن كثير في البداية والنهاية (8/ 195) بعد أن أورد هذا الحديث:"ففي لفظ هذا الحديث غرابة ونكارة، ولعله روي بمعنى ما فهمه بعض الرواة، وفيهم من فيه تشيع فليعلم ذلك. وأحسن ما فيه قولها:"أنت وما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم". وهذا هو الصواب والمظنون بها، واللائق بأمرها وسيادتها وعلمها ودينها، رضي الله عنها. وكأنها سألته بعد هذا أن يجعل زوجها ناظرًا على هذه الصّدقة فلم يجبها إلى ذلك لما قدمناه، فتعتبت عليه بسبب ذلك وهي امرأة من بنات آدم تأسف كما يأسفون وليست بواجبة العصمة مع وجود نص رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومخالفة أبي بكر الصديق رضي الله
عنه وأرضاه".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের পর তাঁর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে অনুরোধ করলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর দেওয়া যে সম্পদ রেখে গেছেন, তা থেকে যেন তাঁর অংশ তাঁকে ভাগ করে দেওয়া হয়। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা উত্তরাধিকারী হই না; আমরা যা রেখে যাই, তা হলো সাদাকা (দান)।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগ করলেন এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সম্পর্ক ত্যাগ করলেন। তিনি তাঁর সঙ্গে কথা বলা ত্যাগ করা অবস্থা থেকে ফিরে আসেননি, যতক্ষণ না তিনি ইনতিকাল করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পর তিনি ছয় মাস জীবিত ছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক রেখে যাওয়া খাইবারের, ফাদাকের ও মদিনার সাদাকা থেকে তাঁর অংশ দাবি করতেন। কিন্তু আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা দিতে অস্বীকার করলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে কাজ করতেন, আমি তার কোনো কিছু পরিত্যাগ করব না, বরং আমিও তা করব। কারণ আমি ভয় করি যে, যদি আমি তাঁর কোনো নির্দেশ বা কাজ ছেড়ে দেই, তবে আমি পথভ্রষ্ট হয়ে যেতে পারি। অতঃপর মদিনার সাদাকা (দান) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে হস্তান্তর করেন। আর খাইবার ও ফাদাকের বিষয়টি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের কাছে রেখে দেন এবং বলেন: এই দুটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাদাকা ছিল। এগুলি তাঁর প্রয়োজনীয় অধিকার ও বিপদাপদের জন্য ছিল। আর এগুলির বিষয় (ভার) তার হাতে থাকবে, যিনি এই দায়িত্ব পালন করবেন। (বর্ণনাকারী) বলেন: সেই দিন থেকে আজ পর্যন্ত ঐ দু'টি এভাবেই রয়েছে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: ফাতিমা (আলাইহাস সালাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক মারফত বার্তা পাঠালেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল্লাহ তা‘আলা যে সম্পদ দিয়েছিলেন, তা থেকে তাঁর উত্তরাধিকারের অংশ দাবি করলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মদিনার সাদাকা, ফাদাক এবং খাইবারের পঞ্চমাংশের অবশিষ্ট অংশ দাবি করছিলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা উত্তরাধিকারী হই না, আমরা যা রেখে যাই, তা হলো সাদাকা।" এই মাল থেকে কেবল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গ খেতে পারবে—অর্থাৎ আল্লাহর মাল থেকে। খাদ্যের অতিরিক্ত অংশ নেওয়ার অধিকার তাদের নেই। আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তাঁর সাদাকাগুলি যে অবস্থায় ছিল, আমি তার কোনো কিছুই পরিবর্তন করব না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মধ্যে যেভাবে কাজ করতেন, আমিও সেভাবে কাজ করব।
(হাদীসটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী (রাহঃ) ফারদুল খুমস (খন্ড ৩০৯২-৩০৯৩) এবং মুসলিম (রাহঃ) জিহাদ ওয়াস সিয়ার (১৭৫৯: ৫৪) অধ্যায়ে ইবরাহীম ইবনু সা’দ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে সালিহ (রাহিমাহুল্লাহ), তিনি ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি উরওয়াহ ইবনু যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর উপরোক্ত হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
ইমাম বুখারী (রাহঃ) (৩৭১১-৩৭১২) শু‘আইব (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি দ্বিতীয় শব্দবিন্যাসটি উল্লেখ করেছেন।
এর মর্মার্থের অনুরূপ একটি বর্ণনা আবূ বাক্তারী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হয়েছে। তিনি বলেন: আমি এক ব্যক্তির কাছ থেকে একটি হাদীস শুনলাম, যা আমাকে মুগ্ধ করল। আমি বললাম: এটি আমার জন্য লিখে দিন। অতঃপর তা লিখে ও ভালোভাবে গুছিয়ে নিয়ে আসা হলো।
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তাঁর কাছে তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আব্দুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তারা দুজন (আলী ও আব্বাস) পরস্পর ঝগড়া করছিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তালহা, যুবাইর, আব্দুর রহমান ও সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তোমরা কি জানো না যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সকল সম্পদ সাদাকা, তবে যে খাবার তিনি তাঁর পরিবারকে খাইয়েছেন এবং যে কাপড় তাদের পরিধান করিয়েছেন, তা ব্যতীত। আমরা উত্তরাধিকারী হই না।" তাঁরা বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সম্পদ থেকে তাঁর পরিবারের জন্য খরচ করতেন এবং উদ্বৃত্ত অংশ সাদাকা করে দিতেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইনতিকাল করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দু'বছর এর দায়িত্ব পালন করলেন। তিনি তাই করতেন, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করতেন। অতঃপর তিনি মালিক ইবনু আওস (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাদীসের কিছু অংশ উল্লেখ করলেন।
এটি আবূ দাঊদ (২৯৭৫) এবং ত্বায়ালিসী (৬১) শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে ‘আমর ইবনু মুররাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আবূ বাক্তারী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
আবূ বাক্তারী হলেন সা‘ঈদ ইবনু ফাইরূয, তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। তবে তিনি তাঁর শাইখের (শিক্ষকের) নাম উল্লেখ করেননি।
আর যা আলী ইবনু আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে খুমস (পঞ্চমাংশ)-এর পঞ্চমাংশের দায়িত্ব দিলেন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায়, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জীবদ্দশায় এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জীবদ্দশায় এর হকদারদের মধ্যে তা বন্টন করেছি। (একবার) কিছু সম্পদ এলো, তিনি আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: "এটা নাও।" আমি বললাম: আমি এটা চাই না। তিনি বললেন: "নাও, তোমরা এর বেশি হকদার।" আমি বললাম: আমাদের এর থেকে প্রয়োজন মিটে গেছে। তখন তিনি তা বায়তুল মালে রেখে দিলেন। এই বর্ণনাটি সহীহ নয়।
এটি আবূ দাঊদ (২৯৮৩), হাকিম (২/১২৮) এবং বায়হাক্বী (৬/৩৪৩) আবূ জা‘ফার আর-রাযী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে মুত্বাররিফ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবূ লাইলা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি আলীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুনেছেন। অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "এর ইসনাদ সহীহ।"
তিনি এমনটাই বলেছেন! কিন্তু দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আল-ইলাল’ (৩/২৭৯-২৮০) গ্রন্থে বলেছেন: মুত্বাররিফ ইবনু তারীফ (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন এবং তার থেকে বর্ণনায় মতভেদ আছে। আবূ জা‘ফার আর-রাযী (রাহিমাহুল্লাহ) তা মুত্বাররিফ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবূ লাইলা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
কিন্তু আবূ ‘আওয়ানাহ (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর বিরোধিতা করেছেন। তিনি তা মুত্বাররিফ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি কাসীর নামক এক ব্যক্তি থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবূ লাইলা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
এই কাসীর নামক লোকটি হলো মাজনূহ (অজ্ঞাত), এবং মুত্বাররিফ (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু আবূ লাইলার কাছ থেকে শুনেননি।
আমি (আলবানী) বলি: আবূ জা‘ফার সিয়িউল হিফয (দুর্বল স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন), আর আবূ ‘আওয়ানাহ (ওয়াদদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-ইয়াশকারী), যিনি সিকাহ সাবত (দৃঢ় ও নির্ভরযোগ্য), তিনি তাঁর বিরোধিতা করেছেন।
আর আবূ দাঊদ (২৯৮৪) এবং আহমাদ (৬৪৬) হাশিম ইবনু বারিদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে, তিনি হুসায়ন ইবনু মায়মূন (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবূ লাইলা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি আলীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুনেছেন: আমি, আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং যায়িদ ইবনু হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একত্রিত হলাম। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি মনে করেন যে, আল্লাহর কিতাবে আমাদের জন্য এই খুমস-এর যে অধিকার আছে, তা আপনি আপনার জীবদ্দশায় আমার দায়িত্বে দিয়ে দিন, যাতে আপনার পরে কেউ আমার সাথে বিতর্ক করতে না পারে, তবে আপনি তা করুন। তিনি বললেন: অতঃপর তিনি তা করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় তা বন্টন করেছি। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর দায়িত্ব আমার উপর দিলেন। এমনকি যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের শেষ বছর হলো, তখন প্রচুর সম্পদ এলো। তিনি আমাদের প্রাপ্য অংশ আলাদা করলেন, অতঃপর আমার কাছে লোক পাঠালেন। আমি বললাম: এই বছর আমাদের এ থেকে প্রয়োজন নেই, বরং মুসলিমদের এর প্রয়োজন রয়েছে। সুতরাং তা তাদের কাছে ফিরিয়ে দিন। অতঃপর তিনি তা তাদের কাছে ফিরিয়ে দিলেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরে আর কেউ আমাকে এর দায়িত্বে দেননি। আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে বেরিয়ে এসে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আলী! আজ সকালে আপনি আমাদের এমন একটি জিনিস থেকে বঞ্চিত করলেন যা আর কখনো আমাদের কাছে ফিরে আসবে না। আব্বাস ছিলেন একজন ধূর্ত ব্যক্তি। শব্দবিন্যাসটি আবূ দাঊদের, আর আহমাদ-এর শব্দবিন্যাসটি আরও দীর্ঘ।
এই সনদে হুসায়ন ইবনু মায়মূন আল-খন্দাকী রয়েছেন। ইবনু মা‘দানী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি সুপরিচিত নন, কম লোকই তাঁর থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন।
আবূ যুর‘আ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি শাইখ (সাধারণ শিক্ষক)। আর আবূ হাতিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি হাদীসে শক্তিশালী নন। ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর আত-তারীখুল কাবীর গ্রন্থে এই হাদীসটি উল্লেখ করার পর বলেছেন: এই হাদীসের উপর তাঁর কোনো অনুসারী নেই।
আর মুগীরা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: উমর ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) যখন খলীফা হলেন, তখন তিনি বনী মারওয়ানের লোকজনকে একত্রিত করলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফাদাক ছিল। তিনি তা থেকে খরচ করতেন এবং বনী হাশিমের ছোটদেরকে তা থেকে সাহায্য করতেন এবং তাদের বিধবাদের বিবাহ দিতেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে অনুরোধ করেছিলেন যে, তিনি যেন তা ফাতিমাকে দিয়ে দেন, কিন্তু তিনি অস্বীকার করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় তা এভাবেই ছিল, যতক্ষণ না তিনি তাঁর পথে চলে গেলেন। যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দায়িত্ব নিলেন, তিনি তাঁর জীবদ্দশায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেমন করতেন, তেমনই করলেন, যতক্ষণ না তিনি তাঁর পথে চলে গেলেন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন দায়িত্ব নিলেন, তিনিও তাঁদের দুজনের মতো কাজ করলেন, যতক্ষণ না তিনি তাঁর পথে চলে গেলেন। এরপর মারওয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) তা বণ্টন করে দিলেন। পরে তা উমর ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাতে এলো। তিনি (অর্থাৎ উমর ইবনু আব্দুল আযীয) বললেন: আমি দেখলাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যে জিনিসটি দেননি, তাতে আমার কোনো অধিকার নেই। আমি তোমাদের সাক্ষ্য রেখে বলছি যে, আমি তা আবার পূর্বের অবস্থায় ফিরিয়ে দিলাম—অর্থাৎ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগের অবস্থায়।
এটি আবূ দাঊদ (২৯৭২) এবং তাঁর সূত্রে বায়হাক্বী (৬/৩০১) আব্দুল্লাহ ইবনু আল-জাররাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে জারীর (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি মুগীরা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
এর ইসনাদটি উমর ইবনু আব্দুল আযীয পর্যন্ত হাসান। কারণ আব্দুল্লাহ ইবনু আল-জাররাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হাসানুল হাদীস (উত্তম বর্ণনাকারী), তবে এটি মুরসাল (একটু দুর্বল সনদ)।
আর যা আবূ তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উত্তরাধিকারী, নাকি তাঁর পরিবার? আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরং তাঁর পরিবার। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ কোথায়? আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তা‘আলা কোনো নবীকে যখন কোনো খাবার দেন, অতঃপর তাঁকে উঠিয়ে নেন, তখন তিনি তা তাঁর পরে যে দায়িত্ব পালন করবে, তার জন্য রাখেন।" তাই আমি সিদ্ধান্ত নিয়েছি যে, তা মুসলিমদের কাছে ফিরিয়ে দেব। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তবে আপনি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আপনি যা শুনেছেন, সে বিষয়ে আপনিই বেশি অবগত। এই বর্ণনার শব্দবিন্যাসে নাকারাহ (অস্বাভাবিকতা) রয়েছে।
এটি আবূ দাঊদ (২৯৭৩), আহমাদ (১৪) এবং আব্দুল্লাহ তাঁর যাওয়াইদ গ্রন্থে মুহাম্মাদ ইবনু ফুযাইল (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে ওয়ালীদ ইবনু জুমাই‘ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আবূ তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন। শব্দবিন্যাসটি আহমাদ-এর।
এর সনদে ওয়ালীদ ইবনু জুমাই‘ রয়েছেন, যিনি হলেন ওয়ালীদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু জুমাই‘। তিনি স্বয়ং মুত্বাদ্দাক (সত্যবাদী), যদি তিনি বিরোধিতা না করেন এবং এমন কিছু নিয়ে না আসেন যা সমালোচিত হতে পারে।
ইবনু হিব্বান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি নির্ভরযোগ্য রাবীদের থেকে এমন সব একক বর্ণনা করতেন, যা নির্ভরযোগ্যদের হাদীসের সঙ্গে সাদৃশ্যপূর্ণ নয়। যখন তাঁর এই বিষয়টি খুব বেড়ে গেল, তখন তাঁর দ্বারা দলীল পেশ করা বাতিল হয়ে গেল।
ইবনু কাসীর (রাহিমাহুল্লাহ) আল-বিদায়া ওয়ান নিহায়া (৮/১৯৫) গ্রন্থে এই হাদীসটি উল্লেখ করার পর বলেছেন: "এই হাদীসের শব্দবিন্যাসে গারাবাহ (বিস্ময়করতা) এবং নাকারাহ (অস্বাভাবিকতা) আছে। সম্ভবত কিছু বর্ণনাকারী যা বুঝেছিলেন, সে অনুযায়ী অর্থে এটি বর্ণিত হয়েছে। আর তাদের মধ্যে এমন লোকও আছেন, যাদের মধ্যে শিয়াদের প্রভাব ছিল, তা জেনে রাখা দরকার। এর মধ্যে সবচেয়ে উত্তম উক্তিটি হলো ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা: 'তবে আপনি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আপনি যা শুনেছেন, সে বিষয়ে আপনিই বেশি অবগত।' এটিই সঠিক এবং তাঁর সম্পর্কে সুধারণা পোষণ করা হয়, এবং তাঁর মর্যাদা, জ্ঞান ও দ্বীনদারির জন্য এটাই মানানসই। আল্লাহ তাঁর উপর সন্তুষ্ট হোন। মনে হয় এরপর তিনি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে অনুরোধ করেছিলেন যে, তিনি যেন তাঁর স্বামীকে এই সাদাকা দেখাশোনা করার দায়িত্ব দেন, কিন্তু আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা মানেননি, যা আমরা পূর্বে উল্লেখ করেছি। এ কারণে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর উপর অসন্তুষ্ট হয়েছিলেন। তিনি আদম-কন্যাদের মধ্যে একজন নারী ছিলেন, যারা অন্যদের মতোই দুঃখ প্রকাশ করে, তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুস্পষ্ট নির্দেশ থাকা সত্ত্বেও তিনি ভুলের ঊর্ধ্বে ছিলেন না। আর আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (আল্লাহ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন) এর বিরোধিতা করেননি।"
7902 - عن زيد بن أسلم عن أبيه: أن معاوية رضي الله عنه لما قدم المدينة حاجًّا جاءه عبد الله بن عمر رضي الله عنهما فقال له معاوية: حاجتك يا أبا عبد الرحمن فقال له: حاجتي عطاء المحررين، فإني رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم أول ما جاءه شيء بدأ بالمحررين.
حسن: رواه ابن الجارود (1114)، والطحاوي في شرح المشكل (4274)، والبيهقي (6/ 349) من طريق محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، حَدَّثَنَا عبد الله بن نافع الصائغ، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه. فذكره.
ورواه أبو داود (2951) عن هارون بن زيد بن أبي الزرقاء، حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم: أن عبد الله بن عمر دخل على معاوية. فذكر نحوه. ولم يذكر:"عن أبيه".
وزيد بن أسلم وأبوه كل منهما أدرك عبد الله بن عمر وروى عنه، فالخطب فيه يسير.
والإسناد حسن من أجل هشام بن سعد فإنه حسن الحديث.
قال الخطّابي في معالم السنن (4/ 204):"يريد بالمحررين المُعتَقين وذلك أنهم قوم لا ديوان لهم وإنما يدخلون تبعًا في جملة مواليهم، وكان الديوان موضوعا على تقديم بني هاشم ثمّ الذين يلونهم في القرابة والسابقة وكان هؤلاء مؤخرين في الذكر فاذكر بهم عبد الله بن عمر وتشفع في تقديم أعطيتهم لما علم من ضعفهم وحاجتهم".
ومن الآثار: عن مالك بن أوس بن الحدثان قال: ذكر عمر بن الخطّاب يومًا الفيئ فقال: ما أنا بأحق بهذا الفيئ منكم وما أحد منا بأحق به من أحد، إِلَّا أنا على منازلنا من كتاب الله عز وجل وقسم رسول الله صلى الله عليه وسلم فالرجل وقِدمه، والرجل وبلاؤه، والرجل وعياله، والرجل وحاجته.
رواه أبو داود (2950)، وأحمد (292)، والبيهقي (6/ 346 - 347) من طريق محمد بن إسحاق قال: عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن مالك بن أوس بن الحدثان قال فذكره. والسياق لأبي داود.
وفيه عنعنة ابن إسحاق وهو مدلِّس لكن له طرق أخرى عند الطبرانيّ في الأوسط (1312).
قال أبو عبيد في الأموال (1/ 377):"وقد كان رأي عمر الأوّل التفضيل على السوابق والغناء عن الإسلام، وهذا هو المشهور من رأيه، وكان رأي أبي بكر التسوية، ثمّ قد جاء عن عمر شبيه بالرجوع إلى رأي أبي بكر" اهـ.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ্জের উদ্দেশ্যে মদীনায় আগমন করলেন, তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট এলেন। মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হে আবূ আব্দুর রহমান! আপনার প্রয়োজন কী? তিনি বললেন: আমার প্রয়োজন হলো মুক্তিপ্রাপ্ত দাসদের (মুহাররারীন) জন্য (রাষ্ট্রীয়) ভাতা। কারণ আমি দেখেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যখনই কোনো সম্পদ আসত, তিনি সর্বপ্রথম মুক্তিপ্রাপ্ত দাসদের দিয়েই শুরু করতেন।
7903 - عن أنس قال في سياق قصة خيبر: فجمع السبي فجاء دحية رضي الله عنه فقال: يا نبي الله أعطني جارية من السبي، قال:"اذهب فخذ جارية" فأخذ صفية بنت حيي فجاء رجل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا نبي الله أعطيت دحية صفية بنت حيي سيدة قريظة والنضير لا
تصلح إِلَّا لك قال:"ادعوه بها" فجاء بها فلمّا نظر إليها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خذ جارية من السبي غيرها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (371)، ومسلم في النكاح (1365: 84) كلاهما من طريق إسماعيل ابن علية، عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أنس بن مالك، فذكره في أثناء قصة خيبر.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খায়বার যুদ্ধের ঘটনা প্রসঙ্গে বলেন: বন্দীদের একত্রিত করা হলো। এরপর দিহিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বললেন, হে আল্লাহর নবী! আমাকে বন্দীদের মধ্য থেকে একজন দাসী দিন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যাও, একটি দাসী নিয়ে নাও।" তখন তিনি সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইকে নিলেন। এরপর এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, হে আল্লাহর নবী! আপনি দিহিয়াকে কুরাইযা ও নাদির গোত্রের নেত্রী সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইকে দিয়ে দিয়েছেন! তিনি তো আপনার জন্য ছাড়া অন্য কারও জন্য উপযুক্ত নন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাকে (দিহিয়াকে) তাকে (সাফিয়্যাহকে) সাথে নিয়ে আসতে বলো।" তখন তিনি তাকে নিয়ে আসলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাকে দেখলেন, তখন বললেন, "এর পরিবর্তে বন্দীদের মধ্য থেকে অন্য কোনো দাসী নিয়ে নাও।"
7904 - عن عائشة قالت: كانت صفية من الصفي.
صحيح: رواه أبو داود (2994)، وصحّحه ابن حبَّان (4822)، والحاكم (2/ 128، و 3/ 39) من طرق عن سفيان (هو الثوري)، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم: هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন আস-সাফী-এর অন্তর্ভুক্ত।
7905 - عن مالك بن أوس بن الحدثان قال: كان فيما احتج به عمر رضي الله عنه أنه قال كانت لرسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث صفايا: بنو النضير وخيبر وفدك، فأما بنو النضير فكانت حبسا لنوائبه، وأمّا فدك فكانت حبسا لأبناء السبيل، وأمّا خيبر فجزأها رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثة أجزاء: جزءين بين المسلمين وجزءا نفقة لأهله، فما فضل عن نفقة أهله جعله بين فقراء المهاجرين.
حسن: رواه أبو داود (2967)، والبزّار (256)، والبيهقي (6/ 296) من طرق عن أسامة بن زيد، عن الزّهريّ، عن مالك بن أوس بن الحدثان. فذكره.
وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد - هو الليثي - فإنه حسن الحديث.
وفي الباب ما رُوي عن عامر الشعبي قال: كان للنبي صلى الله عليه وسلم سهم يدعى الصفي إن شاء عبدًا، وإن شاء أمة، وإن شاء فرسا يختاره قبل الخمس.
رواه أبو داود (2991)، وعبد الرزّاق (9485) من طريق سفيان الثوريّ، عن مطرف، عن عامر الشعبي. فذكره.
وهو مرسل فإن عامرًا الشعبي من التابعين.
ورواه النسائيّ (4145) من طريق محبوب عن أبي إسحاق - هو الفزاري - عن مطرف قال: سئل الشعبي عن سهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وصفيه فقال: أما سهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فكَسَهْم رجل من المسلمين وأمّا سهم الصفي فغرة تُختار من أي شيء شاء. وهو مرسل أيضًا.
وفي الباب أيضًا ما رواه أبو داود (2992) من طرق عن ابن عون قال: سألت محمدًا عن سهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والصفي قال: كان يضرب له بسهم مع المسلمين وإن لم يشهد والصفي يؤخذ له رأس من الخمس قبل كل شيء.
وهو مرسل أيضًا ومحمد هو ابن سيرين.
وفيه أيضًا مرسل قتادة عند أبي داود (2993) وفي إسناده سعيد بن بشير وهو ضعيف.
قال الخطّابي:"الصفي هو ما يصطفيه من عرض الغنيمة من شيء قبل أن يخمس عبد أو جارية أو فرس أو سيف أو غيرها، وكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مخصوصا بذلك مع الخمس الذي له خاصة". معالم السنن (4/ 230).
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জন্য তিনটি 'সাফিয়া' (বিশেষ সম্পত্তি) ছিল: বানু নাযীর, খায়বার এবং ফাদাক। বানু নাযীর ছিল তাঁর প্রয়োজন ও বিপদাপদের জন্য ওয়াকফকৃত। আর ফাদাক ছিল মুসাফিরদের (পথিকদের) জন্য ওয়াকফকৃত। আর খায়বারকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তিন ভাগে বিভক্ত করেন: দুই ভাগ মুসলমানদের মাঝে এবং এক ভাগ তাঁর পরিবারের ভরণপোষণের জন্য। তাঁর পরিবারের ভরণপোষণ থেকে যা অতিরিক্ত থাকত, তিনি তা দরিদ্র মুহাজিরদের মাঝে বণ্টন করে দিতেন।
7906 - عن عليّ قال: كانت لي شارف من نصيبي من المغنم يوم بدر، وكان النبي صلى الله عليه وسلم أعطاني شارفا من الخمس. الحديث.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3091)، ومسلم في الأشربة (1979: 2) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرنا يونس بن يزيد، عن الزّهريّ، أخبرني عليّ بن الحسين بن عليّ، أن حسين بن عليّ أخبره أن عليا قال فذكره. والحديث مذكور بطوله في باب قسمة الغنائم.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধের দিন গণীমতের সম্পদ থেকে আমার প্রাপ্য হিস্যা হিসেবে আমার কাছে একটি শারিফ (বয়স্ক উটনী) ছিল। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) থেকে একটি শারিফ দান করেছিলেন। (হাদীসটি দীর্ঘ)।
7907 - عن يزيد بن عبد الله قال: كنا بالمربد فجاء رجل أشعث الرأس، بيده قطعة أديم أحمر فقلنا: كأنك من أهل البادية. فقال: أجل. قلنا: ناولنا هذه القطعة الأديم التي في يدك، فناولناها، فقرأناها فإذا فيها: من محمد رسول الله إلى بني زهير بن أقيش إنكم إن شهدتم أن لا إله إِلَّا الله وأن محمدًا رسول الله، وأقمتم الصّلاة، وآتيتم الزّكاة، وأديتم الخمس من المغنم، وسهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وسهم الصفي، أنتم آمنون بأمان الله ورسوله.
فقلنا من كتب لك هذا الكتاب؟ قال: رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (2999)، وأحمد (20740)، وصحّحه ابن حبَّان (6557) من طرق عن قرة بن خالد، سمعت يزيد بن عبد الله. فذكره. واللّفظ لأبي داود. وإسناده صحيح.
ইয়াযিদ ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মুরবাদ (নামক স্থানে) ছিলাম। তখন একজন উস্কোখুস্কো চুলের লোক আসলেন, যার হাতে ছিল একটি লাল চামড়ার টুকরা। আমরা বললাম: মনে হচ্ছে আপনি বেদুঈনদের অন্তর্ভুক্ত। তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমরা বললাম: আপনার হাতের চামড়ার এই টুকরাটি আমাদের দিন। তিনি আমাদের তা দিলেন। আমরা সেটি পড়লাম এবং দেখলাম তাতে লেখা আছে: আল্লাহ্র রাসূল মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে বানু যুহায়র ইবনু উকাইশ-এর প্রতি। তোমরা যদি সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল, আর তোমরা সালাত কায়েম করো, যাকাত প্রদান করো, গনীমতের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) আদায় করো, এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ ও ‘সাফী’র অংশ প্রদান করো, তবে তোমরা আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের নিরাপত্তাধীনে নিরাপদ থাকবে। আমরা জিজ্ঞাসা করলাম, আপনার জন্য এই চিঠিটি কে লিখেছেন? তিনি বললেন: আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।