হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (7968)


7968 - عن أبي فاطمة قال: قلت: يا رسول الله، حدثْني بعمل أستقيم عليه، وأعمله. قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عليك بالهجرة فإنه لا مثل لها".

حسن: رواه النسائيّ (4167) عن هارون بن محمد بن بكار بن بلال، عن محمد (وهو ابن عيسى بن سميع) قال: حَدَّثَنَا زيد بن واقد، عن كثير بن مرة أن أبا فاطمة حدَّثه، أنه قال: يا رسول الله .. فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عيسى بن سميع، فإنه حسن الحديث.

وأبو فاطمة هو الأزديّ، وقيل: الدوسيّ، وقيل: الليثي صحابي شهد فتح مصر، ونزل الشام.

واختلف في اسمه: فقيل أنيس، وقيل: عبد الله بن أنيس.




আবু ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে এমন একটি আমলের কথা বলুন যার উপর আমি অবিচল থাকতে পারি এবং তা করতে পারি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তুমি হিজরতকে আবশ্যক করে নাও, কারণ এর কোনো তুলনীয় (আমল) নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (7969)


7969 - عن خبّاب قال: هاجرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم نبتغي وجه الله، ووجب أجرنا على الله، فمنا من مضى لم يأكل من أجره شيئًا. منهم مصعب بن عمير قتل يوم أحد، فلم نجد شيئًا نكفنه فيه إِلَّا نمرة، كنا إذا غطينا بها رأسه خرجتْ رجلاه، فإذا غطينا رجليه خرج رأسه. فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نغطي رأسه بها، ونجعل على رجليه من إذخر، ومنا من أينعتْ له ثمرته فهو يهدبها.

صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3914) عن مسدد، حَدَّثَنَا يحيى، عن الأعمش، قال: سمعت شقيق بن سلمة، قال: حَدَّثَنَا خبّاب قال .. فذكره.

وقوله: يهْدبها - من الهدب وهو الاجتناء.




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহ্‌র সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে আল্লাহ্‌র রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে হিজরত করেছিলাম এবং আমাদের প্রতিদান আল্লাহ্‌র উপর আবশ্যক হয়ে গিয়েছিল। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ এমন ছিলেন, যারা চলে গেছেন (মৃত্যুবরণ করেছেন) কিন্তু তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যতমও উপভোগ করেননি। তাদের মধ্যে অন্যতম হলেন মুসআব ইবনু উমায়ের, যিনি উহুদের দিন শহীদ হন। আমরা তাকে কাফন দেওয়ার জন্য একটি চাদর (নামিরাহ) ছাড়া আর কিছুই পাইনি। আমরা যখন তা দিয়ে তাঁর মাথা ঢাকতাম, তখন তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যখন তাঁর পা ঢাকতাম, তখন মাথা বেরিয়ে যেত। তখন আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ দিলেন যে, আমরা যেন সেই চাদর দিয়ে তাঁর মাথা ঢেকে দেই এবং তাঁর পায়ের উপর ইজখির ঘাস দিয়ে দেই। আর আমাদের মধ্যে এমন লোকও আছেন, যার ফল পেকেছে এবং তিনি তা সংগ্রহ করছেন (বা উপভোগ করছেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (7970)


7970 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: جاء أعرابي إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسأله عن الهجرة فقال:"ويحك إن الهجرة شأنها شديد فهل لك من إبل؟" قال: نعم قال:"فتعطي صدقتها؟" قال: نعم، قال:"فهل تمنح منها؟" قال: نعم قال:"فتحلبها يوم ورودها؟" قال: نعم قال:"فاعمل من وراء البحار فإن الله لن يترك من عملك شيئًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3923)، ومسلم في الإمارة (1865) كلاهما
من طريق الوليد بن مسلم حَدَّثَنَا الأوزاعي عن الزّهريّ، عن عطاء بن يزيد الليثيّ، عن أبي سعيد .. فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

وقوله:"فاعمل من وراء البحار" مبالغة في إعلامه بأن لا يضيع في أي موضع كان. فتح الباري (7/ 259).




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার জন্য আফসোস! নিশ্চয়ই হিজরতের বিষয়টি কঠিন। তোমার কি উট আছে?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি সেগুলোর যাকাত দাও?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি তা থেকে (অন্যকে) দান করো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি পানি পানের দিনে সেগুলোর দুধ দোহন করো?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তাহলে তুমি দূর-দূরান্তে কাজ করে যাও, নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমার কোনো আমলকে বৃথা যেতে দেবেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7971)


7971 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رجل يا رسول الله، أي الهجرة أفضل؟ قال:"أن تهجر ما كره ربَّك عز وجل" وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الهجرة هجرتان، هجرة الحاضر وهجرة البادي. فأما البادي فيجيب إذا دُعيّ، ويطيع إذا أمر. وأمّا الحاضر فهو أعظمها بلية، وأعظمها أجرًا"

صحيح: رواه النسائيّ (4165) وصحّحه ابن حبَّان (4863) كلاهما من حديث عمرو بن مرة، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي كثير الزبيديّ، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره. وإسناده صحيح.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কোন হিজরতটি সর্বোত্তম?" তিনি বললেন: "তুমি তোমার মহান ও মহিমান্বিত রব যা অপছন্দ করেন, তা বর্জন করা।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "হিজরত দুই প্রকার: স্থায়ীভাবে বসবাসকারীর হিজরত এবং যাযাবরের (বা গ্রামীণ ব্যক্তির) হিজরত। যাযাবর হলে, তাকে আহ্বান করা হলে সে সাড়া দেয় এবং তাকে আদেশ করা হলে সে আনুগত্য করে। আর স্থায়ীভাবে বসবাসকারী ব্যক্তিটি (এই দুইয়ের মধ্যে) সবচেয়ে বড় পরীক্ষার সম্মুখীন হয় এবং সবচেয়ে বেশি প্রতিদান লাভ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7972)


7972 - عن عمر بن الخطّاب كان فرض للمهاجرين الأوّلين أربعة آلاف في أربعة. وفرض لابن عمر ثلاثة آلاف وخمس مائة. فقيل له: هو من المهاجرين، فلم نقصته من أربعة آلاف؟ فقال: إنّما هاجر به أبواه. يقول: ليس هو كمن هاجر بنفسه.

صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3912) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام (ابن يوسف الصنعاني) عن ابن جريج قال: أخبرني عبيد الله بن عمر، عن نافع، يعني عن ابن عمر، عن عمر بن الخطّاب .. فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি প্রথম দিকের মুহাজিরদের জন্য চার হাজার (মুদ্রা) বরাদ্দ করেছিলেন। আর ইবনু উমরের (আব্দুল্লাহ ইবনু উমর) জন্য তিনি সাড়ে তিন হাজার (৩,৫০০) বরাদ্দ করেছিলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: তিনিও তো মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত, তাহলে আপনি কেন তাঁকে চার হাজার থেকে কম দিলেন? তিনি বললেন: তার পিতা-মাতাই তাকে নিয়ে হিজরত করেছেন। তিনি বোঝাতে চাইলেন: সে তার মতো নয়, যে নিজে (স্বেচ্ছায়, পূর্ণ সামর্থ্যে) হিজরত করেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7973)


7973 - عن مجاشع بن مسعود السلمي قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بأخي بعد الفتح، قلت: يا رسول الله، جئتك بأخي لتبايعه على الهجرة، قال: ذهب أهل الهجرة بما فيها فقلت: على أي شيء تبايعه؟ قال: أبايعه على الإسلام، والإيمان، والجهاد. فلقيت أبا معبد بعد، وكان أكبرهما، فسألته فقال: صدق مجاشع.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4306، 4305) ومسلم في الإمارة (84: 1863) كلاهما من طرق عن عاصم بن سليمان الأحول، عن أبي عثمان النهديّ، قال: أخبرني مجاشع بن مسعود السلمي قال .. فذكره.

وفي رواية عند مسلم (83: 1863) من طريق إسماعيل بن زكريا، عن عاصم الأحول بإسناده
أن مجاشع بن مسعود السلمي هو الذي أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يبايعه، والصواب هو الأوّل. كذا أكده أيضًا الدَّارقطنيّ واسم أخيه مجالد بن مسعود، وكنيته أبو معبد.




মুজাশ্শি' ইবনে মাসঊদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আমার ভাইকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আমার ভাইকে আপনার নিকট নিয়ে এসেছি যাতে তিনি হিজরতের উপর বাই'আত করতে পারেন। তিনি বললেন, হিজরতের সাথে যা কিছু (সওয়াব/ফযীলত) সম্পর্কিত ছিল, হিজরতকারীরা তা নিয়ে গেছে। আমি বললাম, তাহলে আপনি কিসের উপর তাকে বাই'আত করাবেন? তিনি বললেন, আমি তাকে ইসলাম, ঈমান ও জিহাদের উপর বাই'আত করাব। এরপর আমি আবূ মা'বাদ-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম, যিনি তাদের দুজনের মধ্যে বড় ছিলেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, মুজাশ্শি' সত্য বলেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (7974)


7974 - عن مجاشع بن مسعود أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بابن أخ له، يبايعه على الهجرة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، بل يبايع على الإسلام، فإنه لا هجرة بعد الفتح، ويكون من التابعين بإحسان".

صحيح: رواه أحمد (15847) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1404) والطَّبرانيّ في الكبير (20/ 768) كلّهم من طريق أبي معاوية - يعني شيبان، عن يحيى بن أبي كثير، عن يحيى بن إسحاق، عن مجاشع بن مسعود .. فذكره.

وإسناده صحيح. يحيى بن إسحاق ويقال: ابن أبي إسحاق الأنصاري ثقة وثّقه ابن معين وابن حبَّان.

والجمع بين هذا وما قبله أن مجاشع أتى بأخيه كما أتى بابن أخيه أيضًا.




মুজাশে' ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর ভাতিজাকে নিয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যাতে তিনি হিজরতের উপর তাঁর হাতে বাইআত গ্রহণ করেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং সে ইসলামের উপর বাইআত করুক। কেননা বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত নেই। সে যেন উত্তমভাবে অনুসরণকারীদের (তাবেয়ীদের) অন্তর্ভুক্ত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7975)


7975 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح، فتح مكة:"لا هجرة، ولكن جهاد ونية وإذا استنفرتم فانفروا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3077) ومسلم في الإمارة (85: 1353) كلاهما من حديث منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس .. فذكره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন বলেছেন: "আর (মক্কা বিজয়ের পর) কোনো হিজরত নেই, তবে রয়েছে জিহাদ ও নিয়ত (সংকল্প)। আর যখন তোমাদেরকে (জিহাদের জন্য) ডাকা হবে, তখন তোমরা বেরিয়ে পড়বে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7976)


7976 - عن عائشة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الهجرة؟ فقال:"لا هجرة بعد الفتح، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (86: 1864) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا أبي، حَدَّثَنَا عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن عطاء، عن عائشة قالت فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর হিজরত নেই, তবে জিহাদ ও নিয়ত (সৎ সংকল্প) আছে। আর যখন তোমাদেরকে (জিহাদের জন্য) আহ্বান জানানো হয়, তখন তোমরা বের হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (7977)


7977 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لما فتحت مكة:"لا هجرة بعد الفتح، ولا شغار في الإسلام".

حسن: رواه أبو داود (2751، 1591) والتِّرمذيّ (1413) والنسائي (4806) وابن ماجة (2959) وأحمد (7012) وصحّحه ابن خزيمة (2280) كلّهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন মক্কা বিজয় হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত (দেশত্যাগ) নেই এবং ইসলামে কোনো শিগার (বিবাহ) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (7978)


7978 - عن صفوان بن أمية أنه قيل له: إنه لا يدخل الجنّة إِلَّا من هاجر. قال: فقلت: لا أدخل منزلي حتَّى أتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسأله، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله إن هذا سرق خميصة لي لرجل معه، فأمر بقطعه. فقلت: يا رسول الله إني قد وهبتها له.
قال:"فهلا قبل أن تأتيني به" قال: قلت: يا رسول الله، إنهم يقولون: لا يدخل الجنّة إِلَّا من هاجر؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا هجرة بعد فتح مكة، ولكن جهاد ونية، وإذا استنفرتم فانفروا".

صحيح: رواه النسائيّ (4169) وأحمد (15306) كلاهما من حديث وهيب، حَدَّثَنَا ابن طاوس، عن أبيه، عن صفوان بن أمية .. فذكره، واللّفظ لأحمد، ولفظ النسائيّ مختصر. وإسناده صحيح. وله طرق أخرى عن طاوس، انظر للمزيد كتاب الحدود باب لا شفاعة للسارق إذا بلغ السلطان.




সাফওয়ান ইবন উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বলা হয়েছিল: যে ব্যক্তি হিজরত করেনি, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না। তিনি বললেন, তখন আমি বললাম: আমি আমার ঘরে প্রবেশ করব না যতক্ষণ না আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করি। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম এবং বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যক্তি আমার সাথে থাকা এক লোকের একটি পশমী চাদর চুরি করেছে। তখন তিনি তার হাত কাটার নির্দেশ দিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো তাকে তা দান করে দিয়েছি। তিনি বললেন: তুমি তাকে আমার কাছে নিয়ে আসার আগেই কেন দান করলে না? তিনি বললেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! তারা বলে যে, যে ব্যক্তি হিজরত করেনি, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: মক্কা বিজয়ের পর (নির্দিষ্ট) হিজরত নেই। তবে রয়েছে জিহাদ এবং নিয়ত। আর যখন তোমাদেরকে যুদ্ধে বের হওয়ার জন্য ডাকা হয়, তখন তোমরা বেরিয়ে পড়ো।









আল-জামি` আল-কামিল (7979)


7979 - عن غزية بن الحارث أنه أخبره أن شبابًا من قريش أرادوا أن يهاجروا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فمنعهم آباؤهم. فذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا هجرة بعد الفتح، إنّما هو الحشر، والنية، والجهاد".

صحيح: رواه سعيد بن منصور في سننه (2353) عن عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث أن ابن أبي هلال حدَّثه عن يزيد بن خصيفة عن عبد اللهْ بن رافع، عن غزية .. فذكره. وإسناده صحيح.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: لما نزلت هذه السورة: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ (1) وَرَأَيْتَ النَّاسَ} قال: قرأها رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى ختمها. وقال:"الناس حَيِّز، وأنا وأصحابي حيز" وقال:"لا هجرة بعد الفتح ولكن جهاد ونية" فقال له مروان: كذبت، وعنده رافع بن خديج، وزيد بن ثابت، وهما قاعدان معه على السرير. فقال أبو سعيد: لو شاء هذان لحدثاك ولكن هذا يخاف أن تنزعه عن عرافة قومه، وهذا يخشى أن تنزعه عن الصّدقة. فسكتا، فرفع مروان عليه الدرة ليضربه، فلمّا رأيا ذلك، قالا: صدق. فإسناده منقطع.

رواه أحمد (11167) عن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري الطائيّ، عن أبي سعيد .. فذكره.

ورواه الطيالسي (2319) ومن طريقه الحاكم (2/ 257) من رواية شعبة به.

وهذا إسناد منقطع، فإن أبا البختري الطائي - وهو سعيد بن فيروز - لم يدرك أبا سعيد، كما قال أبو حاتم. وأمّا الحاكم فقال: صحيح الإسناد.

وقوله"حيز" بفتح الحاء المهملة. وتشديد الياء المكسورة، وفي آخره الزاي: أي في ناحية في الفضل.

وفي هذا الباب عدة آثار:

منها: ما جاء عن مجاهد قال: قلت لابن عمر رضي الله عنهما: إني أريد أن أهاجر إلى الشام. قال: لا هجرة، ولكن جهاد، فانطلق فاعرض نفسك، فإن وجدت شيئًا وإلَّا رجعت. وفي رواية:"لا هجرة اليوم، أو بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
رواه البخاريّ في المناقب (3899) وفي المغازي (4311، 4310، 4309) وهي كلها موقوفة على ابن عمر.

ومنها: ما جاء عن عطاء بن أبي رباح قال: زرت عائشة مع عبيد بن عمير الليثيّ، فسألناها عن الهجرة فقالت: لا هجرة اليوم. كان المؤمنون يفرّ أحدهم بدينه إلى الله تعالى، وإلى رسوله مخافة أن يفتن عليه، فأما اليوم فقد أظهر الله الإسلام، واليوم يعبد ربه حيث شاء. ولكن جهاد ونية.

رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3900) عن إسحاق بن يزيد الدمشقيّ، حَدَّثَنَا يحيى بن حمزة، حَدَّثَنِي الأوزاعيّ، عن عطاء بن أبي رباح، قال فذكره.

هكذا رواه البخاريّ في عدة مواضع موقوفًا على عائشة، ورواه مسلم كما سبق مرفوعًا.

وفي قول عائشة دليل على أن المسلم إذا كان في بلد ولو في بلد الكفر، ولكن له حرية في العبادة لله وحده، وأداء شعائر الإسلام الأخرى فلا تجب عليه الهجرة، بل البقاء في مثل هذا البلد أفضل من الهجرة منه لدعوة غير المسلمين إلى الإسلام. وأمّا إن كان في بلد لا يستطيع أن يعبد الله كما ينبغي، فيجب عليه الهجرة من هذا البلد وعليه يدل الباب الآتي:




গাযিয়াহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে খবর দিয়েছেন যে, কুরাইশের কতিপয় যুবক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হিজরত করতে চেয়েছিলেন, কিন্তু তাদের পিতারা তাদের বাধা দেন। তারা এ বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিজয়ের (মক্কা বিজয়ের) পর আর কোনো হিজরত নেই। এখন হলো (দ্বীনের জন্য) সমবেত হওয়া, নিয়ত এবং জিহাদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (7980)


7980 - عن عبد الرحمن بن حميد أنه سمع عمر بن عبد العزيز يسأل السائب بن يزيد يقول: هل سمعت في الإقامة بمكة شيئًا؟ فقال السائب: سمعت العلاء بن الحضرمي يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"للمهاجر إقامة ثلاثٍ بعد الصدر". كأنه يقول: لا يزيد عليها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3933)، ومسلم في الحجّ (1352) كلاهما من طرق عن حميد بن عبد الرحمن. فذكره.

وليس عند البخاريّ:"كأنه يقول: لا يزيد عليها".

وقوله:"بعد الصدر" أي بعد الرجوع من منى. وهذا خاصٌّ بالمهاجرين من مكة إلى المدينة؛ لأن عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان وقت الجهاد وتأسيس الدولة الإسلامية.




আব্দুর রহমান ইবনু হুমাইদ থেকে বর্ণিত, তিনি উমার ইবনু আব্দুল আযীযকে সাইব ইবনু ইয়াযীদকে জিজ্ঞেস করতে শুনেছেন: "মক্কায় অবস্থান (ইক্বামত) সম্পর্কে আপনি কি কিছু শুনেছেন?" তখন সাইব বললেন, "আমি আলা ইবনুল হাদরামি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: 'মুহাজিরদের জন্য (হজ্জ থেকে) প্রত্যাবর্তনের পর তিন দিন অবস্থান করার অনুমতি আছে।' যেন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছেন, এর বেশি যেন না হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7981)


7981 - عن جنادة بن أبي أمية حدث أن رجالا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال بعضهم: إن الهجرة قد انقطعت، فاختلفوا في ذلك قال: فانطلقت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إن أناسًا يقولون: إن الهجرة قد انقطعت، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الهجرة لا تنقطع ما كان الجهاد".
صحيح: رواه أحمد (16597) عن حجَّاج، حَدَّثَنَا ليث (ابن سعد) حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن جنادة بن أبي أمية .. فذكره. وإسناده صحيح.




জুনাদাহ ইবনে আবী উমাইয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে কিছু লোক বলছিলেন: হিজরত (ইসলামের জন্য দেশত্যাগ) বন্ধ হয়ে গেছে। ফলে তারা এ বিষয়ে মতভেদ করলেন। তিনি বলেন: অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিছু লোক বলছে যে, হিজরত বন্ধ হয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যতদিন পর্যন্ত জিহাদ থাকবে, ততদিন পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7982)


7982 - عن عبد الله بن السعدي - رجل من بني مالك بن حسْل - أنه قدم على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في ناس من أصحابه فقالوا له: احفظ رحالنا، ثمّ تدخل، وكان أصغر القوم، فقضى لهم حاجتهم ثمّ قالوا له: ادخل فدخل، فقال: حاجتك؟ قال: حاجتي تحدثني: انقضت الهجرة؟ فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"حاجتك خير من حوائجهم، لا تنقطع الهجرة ما قُوتل العدو".

صحيح: رواه أحمد (22324) والبيهقي (9/ 17 - 18) وصحّحه ابن حبَّان (4866) كلّهم من حديث عبد الله بن محيريز، عن عبد الله بن السعدي .. فذكره.

ورواه أحمد (1671) والنسائي (4172، 4173) بإسناد حسن آخر نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আস-সা'দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি বনু মালিক ইবনে হিসলের একজন লোক ছিলেন, তিনি তার কয়েকজন সাথীসহ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তারা (সাথীরা) তাকে বলল, তুমি আমাদের মালপত্র পাহারা দাও, এরপর ভেতরে প্রবেশ করো। তিনি ছিলেন দলের সবচেয়ে কম বয়সী। তিনি তাদের প্রয়োজন (পাহারা) মিটানোর পর তারা তাকে বলল, এবার ভেতরে প্রবেশ করো। তিনি প্রবেশ করলে (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, তোমার প্রয়োজন কী? তিনি বললেন, আমার প্রয়োজন হলো, আপনি আমাকে বলুন: হিজরত কি শেষ হয়ে গেছে? তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমার প্রয়োজন তাদের সকলের প্রয়োজনের চেয়ে উত্তম। যতক্ষণ শত্রুর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা হবে, ততক্ষণ পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (7983)


7983 - عن عبد الله بن السعدي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تنقطع الهجرة ما دام العدو يقاتل" فقال معاوية وعبد الرحمن بن عوف، وعبد الله بن عمرو بن العاص: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الهجرة خصلتان: إحداهما أن تهجر السيئات، والأخرى أن تهاجر إلى الله ورسوله، ولا تنقطع الهجرة ما تقبلت التوبة، ولا تزال التوبة مقبولة حتَّى تطلع الشّمس من المغرب، فإذا طلعت طبع على كل قلب بما فيه. وكفي الناس عن العمل".

حسن: رواه أحمد (1671) عن الحكم بن نافع، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، يرده إلى مالك بن يخامر عن ابن السعدي .. فذكره.

وهذا إسناد شامي حسن، فإن ضمضم بن زرعة حسن الحديث، وإسماعيل بن عَيَّاش صدوق فيما رواه عن أهل الشام.

وابن السعدي هو عبد الله بن السعدي القرشي العامري الصحابي عاش إلى زمن معاوية، وقيل: مات في خلافة عمر.

وروق أبو داود (2479) وأحمد (16906) والنسائي في الكبرى (8658) من طرق عن حريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن أبي عوف، عن أبي هند البجليّ، عن معاوية قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تنقطع الهجرة حتَّى تنقطع التوبة، ولا تنقطع التوبة حتَّى تطلع الشّمس من مغربها".

وفي إسناده أبو هند البجليّ، لا يذكر في ترجمته من الرواة عنه إِلَّا عبد الرحمن بن أبي عوف، ولم يوثقه أحد ولذا قال الذّهبيّ في الميزان:"لا يعرف" وقال ابن القطان:"مجهول". وقال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة.

مما لا خلاف بين أهل العلم أن الهجرة باقية إلى يوم القيامة من دار الحرب إلى دار الإسلام،
وإنما الذي نسخ بعد فتح مكة: وجوبُ الهجرة من مكة إلى المدينة.




আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যতদিন শত্রু যুদ্ধ করতে থাকবে, ততদিন হিজরত বন্ধ হবে না।" অতঃপর মু'আবিয়া, আব্দুর রহমান ইবনু 'আউফ এবং আব্দুল্লাহ ইবনু 'আমর ইবনুল 'আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় হিজরত দুই প্রকারের: একটি হলো তুমি পাপ কাজসমূহ পরিহার করবে; আর অন্যটি হলো তুমি আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলের দিকে হিজরত করবে। যতক্ষণ পর্যন্ত তওবা কবুল করা হয়, ততক্ষণ পর্যন্ত হিজরত বন্ধ হবে না। আর তওবা ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হতে থাকবে যতক্ষণ না সূর্য পশ্চিম দিক থেকে উদিত হয়। যখন (সূর্য) উদিত হবে, তখন প্রত্যেক হৃদয়ের কর্ম অনুযায়ী তাতে সীলমোহর মেরে দেওয়া হবে এবং মানুষের কাজ করা বন্ধ হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (7984)


7984 - عن سلمة بن الأكوع أنه دخل الحجاج فقال: يا ابن الأكوع؛ ارتددت على عقبيك؟ تعربت؟ قال: لا، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم أذن في البدو.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7087) ومسلم في الإمارة (1862) كلاهما عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع. فذكره.

وزاد البخاريّ عقبه: وعن يزيد بن أبي عبيد قال: لما قتل عثمان بن عفّان خرج سلمة بن الأكوع إلى الربذة، وتزوج هناك امرأة، وولدت له أولادًا، فلم يزل بها حتَّى قبل أن يموت بليال، فنزل المدينة. وهذا موصول بالسند المذكور (فتح الباري 13/ 41).

الأصل أن المهاجر يحرم عليه العودة إلى البلد الذي هاجر منه، إِلَّا إذا ألم يأمن الفتنة على نفسه، وعِرْضه، وماله فلا مانع من ذلك. لأنه لا يوجد نص صريح صحيح يمنع العودة إلى البلد الذي هاجر منه بعد فتح مكة. وقد أذن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ابن الأكوع أن يعود إلى البدو بعد أن هاجر منها إلى الحضر.




সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাজ্জাজের কাছে প্রবেশ করলেন। তখন হাজ্জাজ তাঁকে বললেন: হে ইবনুল আকওয়া', তুমি কি তোমার পূর্বাবস্থায় ফিরে গিয়েছ (হিজরতের পর)? তুমি কি আবার মরুচারী হয়ে গেছ? তিনি বললেন: না, বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মরু অঞ্চলে (গ্রামাঞ্চলে) বসবাসের অনুমতি দিয়েছেন।

বুখারী এর সাথে আরও যোগ করেছেন: ইয়াযিদ ইবনু আবী উবাইদ বলেছেন: যখন উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন, তখন সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাবাযাহ নামক স্থানে চলে গেলেন। সেখানে তিনি একজন মহিলাকে বিবাহ করলেন এবং তার সন্তানাদি জন্মগ্রহণ করলো। তিনি সেখানেই বসবাস করতে থাকলেন। এরপর মৃত্যুর মাত্র কয়েক রাত পূর্বে তিনি মদীনায় ফিরে এলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (7985)


7985 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا دخل مكة قال:"اللهم لا تجعل منايانا بها حتَّى تخرجنا منها".

صحيح: رواه أحمد (4778، 6076) والبزّار (كشف الأستار 1751)، والبيهقي (9/ 19) كلّهم من طرق عن عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن أبيه، عن ابن عمر. فذكره. وإسناده صحيح.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কায় প্রবেশ করতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ, আপনি সেখান থেকে আমাদের বের করে না আনা পর্যন্ত সেখানে আমাদের মৃত্যু ঘটাবেন না।"









আল-জামি` আল-কামিল (7986)


7986 - عن عبد الله بن عمرو، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل معاهدًا لم يرحْ رائحة الجنّة، وإن ريحها توجد من مسيرة أربعين عاما".

صحيح: رواه البخاريّ في الجزية والموادعة (3166) عن قيس بن حفص، حَدَّثَنَا عبد الواحد، حَدَّثَنَا الحسن بن عمرو، حَدَّثَنَا مجاهد، عن عبد الله بن عمرو .. فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিভুক্ত ব্যক্তিকে হত্যা করবে, সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। অথচ জান্নাতের সুঘ্রাণ চল্লিশ বছরের দূর থেকেও পাওয়া যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (7987)


7987 - عن أبي بكرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل نفسا معاهدة بغير حلّها حرّم الله عليه الجنّة أن يجد ريحها".

حسن: رواه النسائيّ (4748)، وأحمد (20383)، 20397)، وابن أبي عاصم في الديات (209)، والبيهقي (9/ 205)، وصحّحه ابن حبَّان (4882)، والحاكم (1/ 44) كلّهم من حديث يونس بن عبيد، عن الحكم بن الأعرج، عن الأشعث بن ثُرملة، عن أبي بكرة .. فذكره.

وإسناده حسن، والأشعث بن ثرملة - بضم المثلثة وبعدها راء ساكنة، ثمّ ميم مضمومة - لم يرو عنه إِلَّا الحكم بن الأعرج كما نص عليه أحمد وابن حبَّان وأبو حاتم وأبو زرعة إِلَّا أن ابن أبي حاتم نقل عن ابن معين قوله: يرُوي عنه يونس بن عبيد، بصري ثقة مشهور.

قلت: لقد نص أهل العلم على أن الأشعث ليس له إِلَّا حديث واحد، وهو هذا، فكيف يكون مشهورًا؟ وكذا قول ابن معين:"روى عنه يونس بن عبيد" لم يتابع على ذلك. والله أعلم.

وأمّا ابن حجر فقال:"ثقة" ولعل ذلك اعتمادًا على قول ابن معين، ولكن الصواب أنه حسن الحديث.

ولحديث أبي بكرة طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

منها ما رواه عبد الرزّاق (10/ 462)، ومن طريقه أحمد (20469)، والبيهقي (13318) وغيرهم. قال: أخبرنا معمر، عن قتادة أو غيره عن الحسن، عن أبي بكر قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ ريح الجنّة ليوجد من مسيرة مئة عام، وما من عبد يقتل نفسا معاهدة بغير حقها إِلَّا حرم الله عليه الجنّة".

والحسن هو البصري الإمام المعروف مدلِّس وقد عنعن، وقد روى ابن حبَّان (7382) وغيره عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن أبي بكرة.

قال البخاريّ والدارقطني وغيرهما: حديث الأشعث أصح.




আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে তার ন্যায্য অধিকার ব্যতীত হত্যা করবে, আল্লাহ তার উপর জান্নাত হারাম করে দেবেন, এমনকি সে তার সুগন্ধও পাবে না।"