আল-জামি` আল-কামিল
848 - عن جابر بن عبد اللَّه، أنّ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم قال لكعب بن عُجْرةَ:"أعاذَك اللَّهُ من إمارة السُّفهاء". قال: وما إمارةُ السُّفهاء؟ قال:"أُمراءُ يكونون بعدي لا يقْتدون بهديي، ولا يستنّون بسنّتي، فمنْ صدَّقهم بكذبهم، وأعانهم على ظلمهم، فأولئكَ ليسوا منّي، ولستُ منهم، ولا يَردوا عليَّ حَوْضي، ومن لم يُصَدِّقْهم بكذبهم، ولم
يُعنهُم على ظلمهم، فأولئك منّي وأنا منهم، وسيردوا عليَّ حَوْضي.
يا كعبَ بنَ عُجْرة: الصَّوْمُ جُنَّةٌ، والصَّدقة تُطفئُ الخطيئة، والصّلاةُ قُربان -أو قال: بُرهان-.
يا كعب بن عُجْرة، إنّه لا يدخُلُ الجنَّةَ لَحْمٌ نبت من سُحتٍ، النّارُ أولى به، يا كعب بن عُجرة، النّاسُ غاديان: فمُبتاع نفسّه فمُعْتِقُها، وبائعٌ نفسه فمُوبقها".
حسن: رواه الإمام أحمد (14441) عن عبد الرزّاق وهو في مصنّفه (20719)، ومن طريقه أخرجه ابنُ حبان في صحيحه (4514)، والحاكم (4/ 422) عن معمر، عن ابن خُثيم، عن عبد الرحمن بن سابط، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن خثيم وهو عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم -مصغرًا- القارئ المكيّ، وهو حسن الحديث، ومن طريقه رواه أيضًا أبو يعلى (1999)، والبزّار - كشف الأستار (1609).
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد". وهو لا يفرّق بين الحسن والصحيح.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা'ব ইবনে উজরাকে বললেন: "আল্লাহ তোমাকে নির্বোধদের নেতৃত্ব থেকে রক্ষা করুন।" তিনি (কা'ব) বললেন: নির্বোধদের নেতৃত্ব কী? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার পরে এমন কিছু শাসক আসবে, যারা আমার হেদায়েত অনুসরণ করবে না এবং আমার সুন্নাত অনুযায়ী চলবে না। অতঃপর যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে এবং তাদের যুলুমে সহায়তা করবে, তারা আমার কেউ নয় এবং আমি তাদের কেউ নই। আর তারা আমার হাউযের (কাউসার) কাছে আসতে পারবে না। আর যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে না এবং তাদের যুলুমে সহায়তা করবে না, তারা আমারই অন্তর্ভুক্ত এবং আমি তাদেরই অন্তর্ভুক্ত। আর তারা অবশ্যই আমার হাউযের কাছে আসবে।
হে কা'ব ইবনে উজরা! সওম (রোযা) হলো ঢাল, আর সাদাকা (দান) গুনাহকে নিভিয়ে দেয়, এবং সালাত (নামায) হলো নৈকট্য—অথবা তিনি বলেছেন: প্রমাণ।
হে কা'ব ইবনে উজরা! নিশ্চয়ই সেই গোশত জান্নাতে প্রবেশ করবে না, যা হারাম (অবৈধ) উপায়ে উৎপাদিত হয়েছে; জাহান্নামের আগুনই তার জন্য অধিক উপযুক্ত। হে কা'ব ইবনে উজরা! মানুষ দু’ভাবে সকাল করে: একজন যে তার আত্মাকে (আল্লাহর কাছে) বিক্রি করে মুক্তি দেয়, আর একজন যে তার আত্মাকে (শয়তান বা প্রবৃত্তির কাছে) বিক্রি করে ধ্বংস করে ফেলে।"
849 - عن حذيفة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّها ستكون أمراء يكذبون ويظلمون، فمن صدقهم بكذبهم، وأعانهم على ظلمهم، فليس مني ولستُ منه، ولا يرد علي الحوض، ومن لم يصدقهم بكذبهم، ولم يعنهم على ظلمهم فهو مني وأنا منه، وسيرد عليّ الحوض".
صحيح: رواه الإمام أحمد (23260)، والبزّار (2834) كلاهما من حديث إسماعيل ابن علية، عن يونس بن عبيد، عن محمد بن هلال -أو عن غيره- عن ربعي بن حراش، عن حذيفة، فذكر مثله.
إلّا أنّ في البزّار: عن ربعي أو غيره، فجعل الشّك في ربعي لا في حميد، والصّواب أنّ الشّك في حميد؛ لأنّه رواه البزّار (2833)، والطبرانيّ في الأوسط (8486) من طريق سهل بن أسلم العدويّ، عن يونس بن عبيد، بإسناده بدون شك. قال البزّار: لم يشك فيه سهل بن أسلم.
وما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"سيكون عليكم أمراء يأمرونكم بما لا يفعلون، فمن صدّقهم بكذبهم وأعانهم على ظلمهم، فليس مني ولست منه، ولن يرد عليّ الحوض". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (5702)، والبزار -كشف الأستار (1608) - كلاهما من طريق العلاء بن المسيب، عن إبراهيم بن قُعَيس، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإبراهيم بن قُعيس هو إبراهيم بن إسماعيل بن قُعيس مولى بني هاشم ضعّفه أبو حاتم، ووثَّقه ابن حبان، وبه علّله الهيثميّ في"المجمع" (5/ 247).
وفيه أيضًا حديث خبّاب بن الأرت.
رواه الإمام أحمد (21074)، والطبرانيّ (2627)، وصحّحه ابن حبان (284)، والحاكم (1/ 76) كلّهم من طريق حاتم بن أبي صغيرة أبي يونس القُشيريّ، عن سماك بن حرب، عن عبد اللَّه بن خبّاب، عن أبيه خبّاب، فذكر الحديث قريبًا منه. قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
إلّا أنّهم لم ينتبهوا إلى أنّ فيه انقطاعًا بين سماك بن حرب، وبين عبد اللَّه بن خبّاب فقد قال عبد اللَّه بن أحمد: سألت أبي: سماك بن حرب سمع من عبد اللَّه بن خبّاب؟ فقال: لا. ذكره العلائيّ في جامع التحصيل في ترجمة سماك بن حرب (265) وقال المزيّ في"تهذيب" في ترجمة عبد اللَّه بن خبّاب:"روى عنه سماك بن حرب، ولم يدركهـ". وفيه أيضًا حديث النّعمان بن بشير.
رواه الإمام أحمد (18353)، وفيه رجل لم يُسم، كما ليس فيه ذكر للحوض.
وحديث أبي سعيد الخدريّ. رواه الإمام أحمد (11192)، وفيه رجل مجهول، وليس فيه ذكر للحوض.
من الفوائد المهمّة:
قال القرطبيّ رحمه اللَّه تعالى:"ومما يجب على كلّ مكلَّف أنّ يعلمه ويصدِّق به: أن اللَّه تعالى قد خصَّ نبيَّه محمدًا صلى الله عليه وسلم بالكوثر الذي هو الحوض المصرَّح باسمه، وصفته، وشرابه وآنيته في الأحاديث الكثيرة الصحيحة الشّهيرة، التي يحصل بمجموعها العلم القطعيّ، واليقين التواتريّ؛ إذ قد روى ذلك عن النبيّ صلى الله عليه وسلم من الصّحابة نيّف على الثلاثين. في الصّحيحين منهم نيِّف على العشرين، وباقيهم في غيرهما مما صحَّ نقله، واشتهرتْ روايته، ثم قد رواها عن الصحابة من التابعين أمثالُهم، ثم لم تزلْ تلك الأحاديث مع توالي الأعصار، وكثرة الرواة لها في جميع الأقطار، تتوفّر هممُ الناقلين لها على روايتها وتخليدها في الأمهات وتدوينها، إلى أن انتهى ذلك إلينا، وقامتْ به حجّةُ اللَّه علينا، فَلَزِمَنَا الإيمانُ بذلك والتصديق به، كما أجمع عليه السّلف، وأهلُ السنة من الخَلَف، وقد أنكرته طائفةٌ من المبتدعة وأحالوه عن ظاهره، وغلوا في تأويله من غير إحالة عقليّة ولا عادية، تلزم من إقراره على ظاهره، ولا منازعة سمعية، ولا نقلية تدعو إلى تأويله، فتأويله تحريفٌ صدَرَ عن عقل سخيف، خرَق به إجماع السّلف، وفارق به مذهبَ أئمّة الخلف" انتهى."المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم" (6/ 90).
وأما قوله:"الكوثر هو الحوض". فالصّواب أنّ الكوثر نهر في الجنّة يصبُّ في الحوض، كما ثبت في الأحاديث الصّحيحة.
وقد نقل الحافظ ابن حجر في"الفتح" (11/ 467) كلام القرطبيّ السّابق إلّا أنه سقط منه ذكر"الكوثر"، فصارت العبارة هكذا:"قد خصَّ نبيَّه محمدًا صلى الله عليه وسلم بالحوض المصرَّح باسمه. . . إلخ".
ثم قال الحافظ:"وأنكره الخوارج وبعض المعتزلة، وممن كان ينكره عبيد اللَّه بن زياد أحد أمراء العراق لمعاوية وولده".
قلت: ثم آمن عبد اللَّه بن زياد بالحوض لما سمع كلام أبي سبرة وقال:"ما سمعتُ في الحوض حديثًا أثبت من هذا، فصدّق به، وأخذ الصّحيفة فحبسها عنده". وقد سبق الحديث بكامله مع تخريجه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই এমন সব শাসক আসবে যারা মিথ্যা কথা বলবে এবং জুলুম করবে। অতএব, যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে মেনে নেবে এবং তাদের জুলুমে সহায়তা করবে, সে আমার কেউ নয় এবং আমি তার কেউ নই। আর সে হাউজে (কাউসারে) আমার কাছে আসতে পারবে না। পক্ষান্তরে, যে ব্যক্তি তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে মেনে নেবে না এবং তাদের জুলুমে সহায়তা করবে না, সে আমার লোক এবং আমি তার লোক। আর সে হাউজে (কাউসারে) আমার কাছে আসবে।"
850 - عن أُسَيْد بن حُضَيْر، أنّ رجلًا من الأنصار خلا برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: ألا تستعملني كما استعملتَ فلانًا؟ فقال:"إنّكم ستلقون بعدي أَثَرة، فاصبروا حتى تلقوني على الحوض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3792)، ومسلم في الإمارة (1845) كلاهما عن محمد بن بشار، حدّثنا محمد بن جعفر غندر، حدّثنا شعبة، سمعتُ قتادة، عن أنس بن مالك، عن أُسيد بن حُضير، فذكره.
وقوله:"أَثَرَة" بفتحتين، ويجوز ضمّ الأوّل وسكون الثاني وهو من الاستيثار، فاصبروا على الإيثار، وفيه إشارة إلى أنّ الأمر سيصير في غير الأنصار فكان كما وصف النبيّ صلى الله عليه وسلم. انظر"الفتح" (11/ 118).
উসাইদ ইবনু হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসার ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একান্তে সাক্ষাৎ করে বলল: আপনি যেমন অমুককে নিযুক্ত করেছেন, আমাকেও কি তেমনি নিযুক্ত করবেন না? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার পরে তোমরা পক্ষপাতমূলক আচরণ (স্বার্থপরতা) দেখতে পাবে। অতএব, তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না তোমরা হাউযের (কাউসার) ধারে আমার সাথে মিলিত হও।"
851 - عن أنس بن مالك، قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم للأنصار:"إنّكم ستلقون بعدي أَثَرة فاصبروا حتى تلقوني، وموعدكم الحوض".
صحيح: رواه البخاريّ في مناقب الأنصار (3793) عن محمد بن بشار، قال: حدّثنا غندر، حدّثنا شعبة، عن هشام، قال: سمعتُ أنس بن مالك، فذكر الحديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদেরকে বললেন: "নিশ্চয় আমার পরে তোমরা (তোমাদের প্রাপ্য অধিকারের ক্ষেত্রে) অন্যের প্রাধান্য দেখতে পাবে। সুতরাং তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না তোমরা আমার সাথে সাক্ষাৎ করো। তোমাদের সাক্ষাতের স্থান হলো হাউয (কাউসার)।"
852 - عن عبد اللَّه بن زيد بن عاصم المازنيّ، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم للأنصار:"إنّكم ستلقون بعدي أَثَرة فاصبروا حتى تلْقوني على الحوض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4330)، ومسلم في الزكاة (1061) كلاهما من حديث عمرو بن يحيى بن عُمارة، عن عبّاد بن تميم، عن عبد اللَّه بن زيد بن عاصم، فذكره في حديث طويل، وسيأتي في موضعه إن شاء اللَّه.
আব্দুল্লাহ ইবনু যায়িদ ইবনু আসিম আল-মাযিনী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদেরকে বললেন: "নিশ্চয় তোমরা আমার পরে (অন্যদের কর্তৃক তোমাদের উপর) অগ্রাধিকার/স্বার্থপরতা দেখতে পাবে। অতএব, তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না তোমরা হাউযের (কাছে) আমার সাথে মিলিত হও।"
853 - عن أنس قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يا معشر الأنصار موعدكم حوضي، آنيته أكثر من عدد نجوم السماء أو مثل عدد نجوم السماء، وإن عرضه كما بيني وبين صنعاء أو كما بيني وبين عمان".
حسن: رواه البزّار (6215) عن عبد اللَّه بن سعيد، ثنا عقبة بن خالد، ثنا سعد بن سعيد، قال: سمعت أنس بن مالك، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 361):"رواه البزّار ورجاله رجال الصّحيح".
قلت: وهو كما قال إلّا أنّ سعد بن سعيد وهو أخو يحيى بن سعيد الأنصاريّ لا يرتقي إلى درجة الثقة من أجل الكلام في حفظه غير أنه حسن الحديث.
وفي الباب أيضًا عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل -يعني ابن أبي طالب- قال: قدم معاوية المدينة، فتلقاه أبو قتادة، فقال: أما إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد قال:"إنّكم ستلقون بعدي أَثرةً". قال: فبمَ أمركم؟ قال: أمرنا أن نصبر. قال:"فاصبروا إذًا".
رواه الإمام أحمد (22591) عن عبد الرزّاق -وهو في المصنف (19909) -، عن معمر، قال: أخبرني عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، فذكره.
وفيه انقطاع؛ فإنّ عبد اللَّه بن محمد بن عقيل لم يدرك القصّة، وأما هو فجائز الحديث مع كلام أهل العلم في حفظه، لأنّه تغيّر فصار يتلقّن.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن أبي ليلى، قال: سمعتُ البراء يحدِّث قومًا فيهم كعب بن عجرة، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول للأنصار:"إنّكم ستلقون بعدي أثرة". قالوا: فما تأمرنا؟ قال:"اصبروا حتّى تلقوني على الحوض".
رواه الإمام أحمد (18582) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن يزيد بن أبي زياد، قال: سمعتُ ابن أبي ليلى، قال (فذكر الحديث).
ويزيد بن أبي زياد القرشي الهاشميّ أبو عبد اللَّه مولاهم الكوفيّ، ضعيف. غير أنّ أبا زرعة قال: ليّن يُكتب حديثه ولا يحتجّ به، وقال الآجري عن أبي داود: لا أعلم أحدًا ترك حديثه وغيره أحبُّ إليَّ منه. وقال ابنُ عدي: هو من شيعة الكوفة، ومع ضعفه يكتبُ حديثه.
قلت: فمثله لو ذكر في الشواهد لما يكون مستكرًا غير أني أستغني عنه لوجود الأحاديث الصحيحة في الباب.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "হে আনসার সম্প্রদায়! তোমাদের সাথে আমার সাক্ষাতের স্থান হবে আমার হাউয (হাউযে কাওসার)। এর পানপাত্রগুলো আকাশের তারকারাজির সংখ্যার চেয়ে বেশি হবে, অথবা আকাশের তারকারাজির সংখ্যার মতোই হবে। আর এর প্রশস্ততা আমার ও সান'আ-এর মধ্যবর্তী দূরত্বের মতো, অথবা আমার ও 'আম্মান-এর মধ্যবর্তী দূরত্বের মতো।"
854 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ما بين بيتي ومنبري روضة من رياض الجنة، ومنبري على حوضي".
متفق عليه: رواه مالك في القبلة (10) عن خبيب بن عبد الرحمن، عن حفص بن عاصم، عن أبي هريرة، أو عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال. . . فذكره.
ورواه البخاريّ في الاعتصام (7335) من طريق مالك -بدون شك- من حديث أبي هريرة.
وكذلك رواه مسلم في الحج (1391) من طريقين يحيى بن سعيد، وابن نمير كلاهما عن عبيد اللَّه بن عمر، عن خبيب بن عبد الرحمن، بإسناده مثله.
ومن طريق يحيى رواه أيضًا البخاريّ (1196) فظهر منه أنّ الشّك من مالك.
ولكن رواه ابن أبي عاصم في السنة (731) من طريقين عن أبي أسامة وابن نمير كلاهما عن عبيد اللَّه بن عمر بإسناده، وكذا في بعض نسخ الموطأ: فقالوا:"ما بين قبري" بدلًا من"بيتي". مع أنّ مسلمًا رواه أيضًا من طريق ابن نمير ولم يذكر فيه"قبري".
وأمّا البخاريّ فرواه من طريق يحيى بن سعيد، عن عبيد اللَّه، وكذلك مسلم ولم يذكرا"قبري". ولكن بّوب عليه البخاريّ بقوله:"باب فضل ما بين القبر والمنبر". وكذلك بوّب النّووي في صحيح مسلم، فلعلّ ذلك باعتبار ما صار إليه الأمر؛ لأنّ القبرَ صار في البيت.
وأمّا ذكر القبر في الحديث المرفوع فهو شاذ؛ لأنّ القبر لم يكن موجودًا ولا معروفًا عندما نطق به النبيّ صلى الله عليه وسلم بهذا الحديث. فلا يُعقل أنّ يحدّد لهم الرّوضة الشّريفة بما بين المنبر المعروف والقبر غير المعروف، إلّا أنّ يقال: إنّ بعض الرّواة رووه بالمعني باعتبار ما صار إليه القبر.
وأما قوله:"منبري على حوضي". فقال الزّرقاني:"يُنقل المنبر الذي قال عليه هذه المقالة يوم القيامة فينصب على حوضه".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার গৃহ এবং আমার মিম্বরের মধ্যবর্তী স্থান জান্নাতের উদ্যানসমূহের মধ্যে একটি উদ্যান। আর আমার মিম্বর হলো আমার হাউজের (হাউজে কাউসার) উপর অবস্থিত।"
855 - عن سهل بن سعد، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ لكلّ قوم فَرَطًا، وإنّي فرطُكم على الحوض، فمن ورد عليَّ الحوض فشرب لم يظمأ، ومن لم يظما دخل الجنّة".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (6/ 168) عن عبدان بن أحمد، ثنا دُحيم، ثنا ابن أبي فديك، عن موسى بن يعقوب، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في موسى بن يعقوب، فقد ضعفه النسائيّ، وابن المدينيّ، ووثّقه ابن معين. وقال أبو داود: صالح، وذكره ابن حبان في الثقات (7/ 758)، ووثّقه ابن القطّان، وذكره ابن عدي في"الكامل" (6/ 2341)، وأخرج له عدّة أحاديث ليس منها الحديث المذكور، وقال:"ولموسى بن يعقوب غير ما ذكرت من الأحاديث أحاديث حسان، يروي عنه ابن أبي فديك، وخالد بن مخلد، وهو عندي لا بأس به وبرواياته".
أي أنّ ابن عدي لم يجد له حديثًا منكرًا، بل الأحاديث التي ذكرها وما لم يذكرها حكم عليها بالحسان، وأرجو أن يكون الحديث المذكور أيضًا من الحسان إلّا قوله:"ومن لم يظمأْ دخل الجنّة" فإني لم أجد له شاهدًا.
ورُوي عن سمرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ لكلّ نبيٍّ حوضًا، وإنّهم يتباهون أيُّهم أكثر واردةً، وإنّي أرجو أن أكون أكثرهم واردةً".
رواه الترمذيّ (2443) عن أحمد بن محمد بن علي بن نَيْزك، حدّثنا محمد بن بكّار الدّمشقيّ،
حدّثنا سعيد بن بشير، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة، فذكره.
قال الترمذيّ: هذا حديث غريب، وقد روى الأشعث بن عبد الملك هذا الحديث عن الحسن، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مُرسلًا، ولم يذكر فيه: عن سمرة وهو أصح".
قلت: وهو كما قال، وفيه من العلل:
الأولى: الإرسال، وهو الصحيح.
والثانية: عنعنة الحسن البصريّ وهو مدلّس، وسماعه من سمرة مختلف فيه، والرّاجح عندي أنه سمع منه مطلقًا.
والثالثة: فيه سعيد بن بشير وهو الأزدي، ضعيف عند جمهور أهل العلم.
وقد رُوي عن سمرة من وجه آخر أضعف من هذا، وهو ما رواه الطبراني في"الكبير" (7/ 312) عن موسى بن هارون، ثنا مروان بن جعفر السمري، ثنا محمد بن إبراهيم، ثنا جعفر بن سعد، خُبيب بن سليمان، عن أبيه، عن سمرة بن جندب، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الأنبياء يتباهون أيّهم أكثر أصحابًا من أمته، فأرجو أن أكون يومئذ أكثرهم كلّهم واردة، فإنّه كل رجل منهم يومئذ قائم على حوض ملآن معه عصا يدعو من عرف من أمّته، ولكل أمّة سيما يعرفهم بها نبيُّهم".
وفيه سلسلة من الضّعفاء، جعفر بن سعد ضعيف، خبيب بن سليمان مجهول، وأبوه سليمان بن سمرة لم يوثقه غير ابن حبان فهو"مقبول" إذا توبع وإلّا فلين الحديث.
ولذا قال الحافظ ابن حجر بعد أنّ نقل قول الترمذيّ:"والمرسل أخرجه ابن أبي الدّنيا بسند صحيح عن الحسن، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ لكل نبيّ حوضًا وهو قائم على حوضه، بيده عصا يدعو من عرف من أمّته، ألا إنهم يتباهون أيّهم أكثر تبعًا، وإنّي لأرجو أنّ أكون أكثرهم تبعًا".
وأخرجه الطبرانيّ من وجه آخر عن سمرة موصولًا مرفوعًا، مثله، وفي سنده لين". انظر:"الفتح" (11/ 467).
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (10/ 363):"رواه الطبراني وفيه مروان بن جعفر السمريّ وثقه ابن أبي حاتم، وقال الأزديّ: يتكلّمون فيه، وبقية رجاله ثقات". فهو ليس كما قال، بل فيه من هو أضعفُ من السمري، والتّعليل بهم أولى.
وفي الباب عن أبي سعيد، وابن عباس وغيرهما، وفي أسانيدهم مَنْ لا يُحمدون إلّا أنّها بمجموعها تشهد لحديث سهل بن سعد، فيكون اختصاص نبيّنا صلى الله عليه وسلم بالكوثر الذي يَصُب على الحوض، وهو خاص بالنبيّ صلى الله عليه وسلم لا يشاركه فيه غيره، وبه امتنّ اللَّه تبارك وتعالى في قوله: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَر}.
وأمّا ما ذكره أبو محمد البربهاريّ في"شرح السنة" (19):"ولكلّ نبيّ حوض إلّا صالح النبيّ فإنّ حوضه ضرع ناقته". فهو موضوع.
رواه العقيليّ في الضعفاء الكبير (3/ 64)، وعنه ابن الجوزيّ في"الموضوعات" (3/ 564) من طريق عبد الكريم بن كيسان، عن سويد بن عُمير، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حوضي أشرب منه يوم القيامة ومن اتبعني من الأنبياء، ويبعث اللَّه ناقة ثمود لصالح فيحلبها فيشربها، والذين آمنوا معه حتى يوافوا بها الموقف معه، ولها رُغاء". فذكر الحديث بطوله.
قال العقيليّ: عبد الكريم بن كيسان مجهول بالنّقل، حديثه غير محفوظ.
وقال ابن الجوزيّ: هذا حديث موضوع لا أصل له.
وقال الذهبيّ في"الميزان" (2/ 645) بعد ما أورد الحديث:"إنّه موضوع".
قلتُ: وللحديث طرق أخرى لا تخلو من ضعيف أو مبهم أو مجهول.
وسويد بن عمير وقد سُمّي أبوه عامرًا، مختلف في صحبته، ذكره الحافظ ابن حجر في"الإصابة" في الفصل الرّابع، وأنه تابعي صغير، وأنه لا صحبة له، وحديثه مرسل.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই প্রত্যেক সম্প্রদায়ের জন্য একজন অগ্রগামী (ফারা'ত) থাকে, আর আমি হাউযের উপর তোমাদের অগ্রগামী। সুতরাং যে ব্যক্তি আমার হাউযে এসে পান করবে, সে আর কখনো পিপাসার্ত হবে না। আর যে ব্যক্তি পিপাসার্ত হবে না, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
856 - عن * *
صالح الفوزان.
৮৫৬ - থেকে বর্ণিত * * সালেহ আল-ফাওযান।
857 - عن أنس بن مالك، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أوّلُ النّاس يشفع في الجنّة، وأنا أكثر الأنبياء تبعًا".
وفي رواية:"أنا أكثر الأنبياء تبعًا يوم القيامة، وأنا أوّل من يقْرع باب الجنّة".
وفي رواية:"أنا أوّل شفيع في الجنّة، لم يُصَدَّق نبيٌّ من الأنبياء ما صدّقتُ، وإنّ من الأنبياء نبيًّا ما يصدِّقه من أمّته إلّا رجل واحد".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (196) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدّثنا جرير، عن المختار بن فلفل، عن أنس، فذكره.
والرواية الثانية رواها من وجه آخر عن سفيان، عن المختار، بإسناده.
والرّواية الثالثة رواها من وجه آخر عن زائدة، عن المختار، بإسناده.
وأمّا ما رواه الدّارميّ (49)، والخلال في"السنة" (235) من حديث سعيد بن سليمان، عن منصور بن أبي الأسود، عن ليث، عن الرّبيع بن أنس، عن أنس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أوّلهم خروجًا، وأنا قائدهم إذا وفدوا، وأنا خطيبُهم إذا أنصتوا، وأنا مستشفعهم إذا حُبسوا، وأنا مبشِّرهم إذا أيسوا، الكرامةُ والمفاتيح يومئذ بيدي، وأنا أكرمُ ولد آدم على ربّي، يطوف عليَّ ألف خادم كأنّهم بيض مكنون أو لؤلؤ منثور".
ففيه ليث بن أبي سليم وهو صدوق اختلط أخيرًا، ولم يتميّز حديثه فترك، كما في التقريب. ورواه الترمذيّ (3610) من وجه آخر عن ليث، به، مختصرًا، وقال:"حسن غريب".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জান্নাতে সর্বপ্রথম আমিই সুপারিশকারী হব এবং নবীদের মধ্যে আমার অনুসারীর সংখ্যা হবে সর্বাধিক।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "কিয়ামতের দিন নবীদের মধ্যে আমার অনুসারীর সংখ্যা হবে সর্বাধিক এবং আমিই সর্বপ্রথম জান্নাতের দরজায় করাঘাতকারী হব।"
আরেক বর্ণনায় রয়েছে: "জান্নাতে আমিই প্রথম সুপারিশকারী। অন্য কোনো নবীকেই এত বেশি বিশ্বাস করা হয়নি, যতটা আমাকে বিশ্বাস করা হয়েছে। আর নবীদের মধ্যে এমনও নবী আছেন, তাঁর উম্মতের একজন মাত্র লোক ব্যতীত আর কেউই তাঁকে বিশ্বাস করেনি।"
অন্য এক সূত্রে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমিই তাদের মধ্যে সর্বপ্রথম বেরিয়ে আসব, যখন তারা আগমন করবে তখন আমিই তাদের নেতা হব, যখন তারা নীরব থাকবে তখন আমিই তাদের বক্তা হব, যখন তারা আটক থাকবে তখন আমিই তাদের জন্য সুপারিশকারী হব, যখন তারা নিরাশ হবে তখন আমিই তাদের সুসংবাদ দাতা হব। সেই দিন (কিয়ামতের দিন) সম্মান ও চাবিগুলো আমার হাতে থাকবে। আমি আমার রবের নিকট আদম সন্তানদের মধ্যে সর্বাধিক সম্মানিত। আমার চারপাশে হাজারো খাদেম এমনভাবে ঘুরতে থাকবে যেন তারা আবৃত ডিম অথবা ছড়িয়ে থাকা মুক্তা।"
858 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا سيّد ولد آدم يوم القيامة، وأوّل من ينشق عنه القبر، وأوّل شافع وأوّل مشفَّع".
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2278) عن الحكم بن موسى أبي صالح، حدّثنا هِقْل (يعني ابن زياد)، عن الأوزاعيّ، حدّثني أبو عمار، حدّثني عبد اللَّه بن فرّوخ، حدّثني أبو هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি কিয়ামতের দিন আদম-সন্তানদের (মানবজাতির) সর্দার। আর আমিই প্রথম ব্যক্তি যার থেকে কবর বিদীর্ণ হবে, এবং আমিই প্রথম সুপারিশকারী ও আমিই প্রথম যার সুপারিশ কবুল করা হবে।
859 - عن أُبي بن كعب، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا كان يوم القيامة كنت إمام النّبيين وخطيبَهم، وصاحب شفاعتهم غير فخر".
حسن: رواه الترمذيّ تحث حديث ذي رقم (3613)، وابن ماجه (4314) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن الطّفيل بن أبي بن كعب، عن أبيه، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (21245)، وابن أبي عاصم في السنة (787)، والحاكم (4/ 78) وقال:
"صحيح الإسناد ولم يخرجاه بهذه السياقة".
قلت: هو حسن فقط، وكذلك قال الترمذيّ أيضًا لأنّ فيه عبد اللَّه بن محمد بن عقيل مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وفي الباب عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا سيّد ولد آدم يوم القيامة، ولا فخر، وبيدي لواء الحمد ولا فخر، وما من نبي يومئذ آدم فمن سواه إلّا تحت لوائي، وأنا أوّل من تنشق عنه الأرض ولا فخر".
قال:"فيفزع النّاس ثلاث فزعات. . .". فذكر الحديث بطوله، مثل حديث أبي هريرة في المحشر. وإسناده ضعيف، وسيأتي الحديث بكماله.
رواه الترمذيّ (3148، 3615) عن ابن أبي عمر، حدّثنا سفيان، عن علي بن زيد بن جدعان، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكر الحديث بطوله.
قال الترمذيّ:"حديث حسن، وقد روى بعضهم هذا الحديث عن أبي نضرة، عن ابن عباس، الحديث بطوله".
قلت: بل هو ضعيف، فإنّ علي بن زيد بن جدعان ضعيف.
وأما حديث ابن عباس فهو ما رواه أحمد (2546) عن عفّان، حدّثنا حماد بن سلمة، عن علي ابن زيد، عن أبي نضرة، قال: خطبنا ابن عباس على منبر البصرة، فقال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم (فذكر الحديث) بطوله نحو حديث أبي هريرة في المحشر.
وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد اللَّه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أنا قائد المرسلين ولا فخر، وأنا خاتم النّبيين ولا فخر، وأنا أوّل شافع، وأوّل مشفّع ولا فخر".
رواه الدّارميّ (50)، والطّبراني في الأوسط (172)، والبيهقي في الاعتقاد (ص 192)، وفي دلائله (5/ 480) كلّهم من طرق عن بكر بن مضر، عن جعفر بن ربيعة، عن صالح بن عطاء بن خباب مولى بني الدئل، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (8/ 254):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، وفيه صالح بن عطاء بن خباب ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات".
قلت: كذا قال، مع أنه مترجم في الثقات (6/ 455) وهو عمدته في توثيق الرجال، فلعل النّسخة التي عنده سقط منها ترجمته، ثم لم أقف على توثيقه من غير ابن حبان، ولم يذكر من روى عنه سوى جعفر بن ربيعة فهو في عداد المجهولين.
وفيه أيضًا عن عبد اللَّه بن سلام قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا سيّد ولد آدم يوم القيامة ولا فخر، وأوّل من تنشق عنه الأرض، وأوّل شافع ومشفّع، بيدي لواءُ الحمد تحتي آدم فمن دونه".
رواه ابن حبان في"صحيحه" (6478) عن أحمد بن علي بن المثنى (وهو أبو يعلى والحديث
في مسنده (7493) قال: حدّثنا عمرو بن محمد النّاقد، قال: حدّثنا عمرو بن عثمان الكلابيّ، قال: حدّثنا موسى بن أعين، عن معمر بن راشد، عن محمد بن عبد اللَّه بن أبي يعقوب، عن بشر بن شفاف، عن عبد اللَّه بن سلام، فذكره.
ورواه ابن أبي عاصم في السنة (793) من وجه آخر عن عمرو بن عثمان بإسناده مختصرًا.
إسناده ضعيف من أجل عمرو بن عثمان بن سيار الكلابي، قال أبو حاتم: يتكلمون فيه، كان شيخًا أعمى بالرقة، يحدّث الناسَ من حفظه بأحاديث منكرة، وقال النسائي والأزديّ: متروك الحديث.
ومع هذا ذكره ابنُ حبان في"الثقات" (8/ 473) وقال: ربما أخطأ، وأخرج عنه في صحيحه، وفيه دليل على تساهله، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (8/ 254) فقال بعد أن عزاه لأبي يعلى:"وفيه عمرو بن عثمان الكلابيّ، ووثّقه ابنُ حبان على ضعفه، وبقية رجاله ثقات".
وفي الباب أيضًا عن أبي الدّرداء مرفوعًا:"أنا أوّل من يؤذن له بالسّجود يوم القيامة، وأنا أوّل من يؤذن له أنّ يرفع رأسه". فذكر الحديث بطوله.
رواه الإمام أحمد (21737) عن حسن، حدّثنا ابن لهيعة، حدّثنا يزيد بن حبيب، عن عبد الرحمن بن جبير، عن أبي الدّرداء، فذكره.
وابن لهيعة فيه كلام معروف، وعبد الرحمن بن جبير لم يسمع من أبي الدّرادء، ثم رُوي هذا الحديث بأسانيد أخرى من طرق عن ابن لهيعة، وفيها اضطراب شديد، والظّاهر أنّه يعود إلى ابن لهيعة، فإنّه تغيّر بعد احتراق كتبه فلم يضبط لا لفظ الحديث ولا الإسناد.
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس، قال: جلس ناسٌ من أصحاب النّبيِّ صلى الله عليه وسلم ينتظرونه فخرج حتّى إذا دنا منهم، سمعهم يتذاكرون، فتسمَّع حديثهم، فإذا بعضهم يقول: عجبًا إنّ اللَّه اتّخذ من خلقه خليلًا، فإبراهيمُ خليله. وقال آخر: ما بأعجب من {وَكَلَّمَ اللَّهُ مُوسَى تَكْلِيمًا} [سورة النساء: 13]. وقال آخر: فعيسى كلمةُ اللَّه ورُوحه. وقال آخر: وآدم اصطفاه اللَّه. فخرج عليهم فسلّم وقال:"قد سمعتُ كلامَكم وعَجَبَكم، إنّ إبراهيمَ خليلُ اللَّه، وهو كذلك، ومُوسى نَجيُّه وهو كذلك، وعيسى روحُه وكلمتُه وهو كذلك، وآدمُ اصطفاه اللَّه تعالى وهو كذلك. ألا وأنا حبيب اللَّه ولا فخر، وأنا حاملُ لواء الحمد يوم القيامة ولا فخر، وأنا أوّل شافع، وأول مُشفَّع يوم القيامة ولا فخر، وأنا أوّل من يُحرِّك بحِلَقِ الجنّة ولا فخر، فيفتحُ اللَّه فيُدْخِلنيها ومعي فقراء المؤمنين ولا فخر، وأنا أكرم الأوّلين والآخرين على اللَّه ولا فخر".
رواه الترمذيّ (3616)، والدّارميّ (48) كلاهما من حديث عبيد اللَّه بن عبد المجيد، حدّثنا زمعة ابن أبي صالح، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب". أي ضعيف.
قلت: وهو كما قال، فإن زمعة بن أبي صالح وهو الجندي اليماني أبو وهب ضعيف باتفاق من
أهل العلم.
قال الحافظ ابنُ كثير في تفسيره:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، ولبعضه شواهد في الصّحاح وغيرها".
قلت: وهو كما قال، وقد سبق ذكر هذه الشواهد.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন ক্বিয়ামতের দিন হবে, তখন আমি নবীদের ইমাম, তাদের বক্তা এবং তাদের সুপারিশকারী হব, তবে এতে কোনো গর্ব নেই।
860 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لكلّ نبيّ دعوة يدعو بها، فأريد أن أختبئ دعوتي شفاعةً لأمّتي في الآخرة".
متفق عليه: رواه مالك في القرآن (26) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ومن هذا الطريق رواه القعنبي أيضًا عن مالك كما رواه الجوهري في مسند الموطأ (533).
ورواه البخاريّ في الدّعوات (6304) عن إسماعيل (وهو ابن أبي أويس)، عن مالك، بإسناده.
ورواه مسلم في الإيمان (198) من طريق ابن وهب قال: أخبرني مالك بن أنس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، نحوه.
ومن طريق ابن وهب أخرجه أيضًا الجوهريّ في مسند الموطأ (147)، ونفى أن يكون للقعنبيّ طريق ابن شهاب.
وللحديث طرق أخرى ذكرها مسلمٌ، ورواه البخاريّ في التوحيد (7474) من وجه آخر عن الزهريّ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নবীরই একটি দু'আ রয়েছে যা সে করে থাকে। আমি আমার সেই দু'আটিকে পরকালে আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফা'আত) হিসেবে সংরক্ষিত রাখতে চাই।"
861 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لكلّ نبي دعوة مستجابة، فتعجّل كل نبي دعوته، وإنّي اختبأتُ دعوتي شفاعة لأمّتي يوم القيامة، فهي نائلة إن شاء اللَّه من مات من أمّتي لا يشرك باللَّه شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (199) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي رواية من وجه آخر عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، بلفظ:"لكل نبيّ دعوةٌ مستجابة يدعو بها، فيستجاب له فيؤْتاها، وإنّي اختبأتُ دعوتي شفاعة لأمّتي يوم القيامة".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক নবীর জন্য একটি কবুলযোগ্য দু'আ রয়েছে। সুতরাং প্রত্যেক নবীই তাঁর সেই দু'আ তাড়াতাড়ি (দুনিয়ায়) করে ফেলেছেন। আর আমি আমার সেই দু'আকে কিয়ামতের দিন আমার উম্মতের জন্য শাফাআত (সুপারিশ) হিসেবে লুকিয়ে রেখেছি। আল্লাহর ইচ্ছায় তা আমার উম্মতের সেই ব্যক্তিকে লাভ করবে যে আল্লাহ্র সাথে কাউকে সামান্যতম শরীক না করে মৃত্যুবরণ করেছে।
862 - عن أبي هريرة، أنّه قال لكعب الأحبار: إنّ نبيَّ اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لكلّ نبيٍّ دعوة يدعوها، فأنا أريد إن شاء اللَّه أن أختبئ دعوتي شفاعة لأمّتي يوم القيامة".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (199) عن حرملة بن يحيى، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أنّ عمرو بن أبي سفيان بن أَسيد بن جارية الثّقفيّ أخبره، أنّ أبا هريرة قال لكعب، فذكره.
فقال كعب لأبي هريرة: أنت سمعتَ هذا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال أبو هريرة: نعم
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কাব আল-আহবারকে বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নবীরই একটি করে দু'আ (আহ্বান) আছে, যা তিনি করে থাকেন। আমি আল্লাহর ইচ্ছায় আমার সেই দু'আটি কিয়ামতের দিন আমার উম্মতের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) হিসেবে গোপন (সংরক্ষিত) রাখতে চাই।" অতঃপর কা'ব আবূ হুরায়রাকে জিজ্ঞেস করলেন: "আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে সরাসরি এটি শুনেছেন?" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হ্যাঁ।"
863 - عن اجتمع أبو هريرة وكعب، فجعل أبو هريرة يحدِّث كعبًا عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، وكعب يحدِّث أبا هريرة عن الكتب. قال أبو هريرة: قال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"لكلّ نبي دعوة مستجابة، وإنّي اختبأتُ دعوتي شفاعةً لأمّتي يوم القيامة".
صحيح: رواه الإمام أحمد (7714) عن عبد الرزّاق، حدّثنا معمر، عن الزّهريّ، قال: أخبرني القاسم بن محمد، قال: اجتمع أبو هريرة وكعب، فذكره.
وكعب هو ابن مانع الحميريّ من اليمن، المعروف بكعب الأحبار، كان عالمًا من علماء اليهود، أدرك النّبيَّ صلى الله عليه وسلم، وأسلم في خلافة أبي بكر الصديق، وقدم المدينة أيام عمر بن الخطّاب، وكان يحدِّث من أخبار بني إسرائيل، فكثرت الرّوايات الإسرائيلية في قصص القرآن؛ ولذا كان عمر بن الخطاب رضي الله عنه حذّره من كثرة هذه الروايات وقال له:"لتتركنّ الأحاديث أو لألحقنّك بأرض القردة". رواه أبو زرعة الدّمشقيّ في"تاريخه" (1/ 544). فخرج إلى الشّام، ومات في خلافة عثمان، وقد جاوز المائة رحمه اللَّه تعالى.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু হুরায়রা ও কা‘ব একত্রিত হলেন। আবু হুরায়রা কা’বকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদিস বর্ণনা করছিলেন, আর কা’ব আবু হুরায়রাকে কিতাবসমূহ (পূর্বের ধর্মগ্রন্থ) থেকে বর্ণনা করছিলেন। আবু হুরায়রা বললেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নবীর জন্যই একটি করে কবুলযোগ্য দু‘আ (প্রার্থনা) রয়েছে। আর আমি আমার সেই দু‘আকে ক্বিয়ামতের দিন আমার উম্মতের জন্য শাফা‘আত (সুপারিশ) হিসেবে লুকিয়ে রেখেছি।"
864 - عن أنس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كلُّ نبيٍّ سأل سؤالًا أو قال: لكلّ نبي دعوة قد دعا بها فاستُجيب، فجعلتُ دعوتي شفاعة لأمّتي يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الدعوات (6305)، ومسلم في الإيمان (200: 344) كلاهما من حديث المعتمر، عن أبيه، عن أنس، واللّفظ للبخاريّ.
وأما مسلم فأحال على حديث قتادة عن أنس إلّا وليس فيه"فاستجيب". والباقي سواء.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক নবী একটি করে প্রশ্ন (বা দু‘আ) করার সুযোগ পেয়েছিলেন এবং তা কবুল করা হতো। অথবা (তিনি বললেন:) প্রত্যেক নবীর একটি করে দু‘আ আছে, যা তিনি করেছেন এবং তা কবুল করা হয়েছে। আমি আমার দু‘আটিকে কিয়ামতের দিন আমার উম্মতের জন্য শাফা‘আত হিসেবে সংরক্ষণ করে রেখেছি।
865 - عن جابر بن عبد اللَّه، يقول عن النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لكلّ نبي دعوة، قد دعا بها في أمّته، وخبأتُ دعوتي شفاعة لأمّتي يوم القيامة".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক নবীর জন্য একটি করে দু'আ (দোয়া) ছিল, যা তিনি তাঁর উম্মতের জন্য করে গেছেন। আর আমি আমার দু'আকে কিয়ামতের দিন আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফা‘আত) হিসেবে লুকিয়ে রেখেছি।
866 - عن صحيح: رواه مسلم في الإيمان (201) عن محمد بن أحمد بن أبي خلف، حدّثنا روح، حدّثنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ৮৬৬ - সহীহ: এটি ইমাম মুসলিম তাঁর ঈমান অধ্যায়ের (২০১) নম্বরে মুহাম্মাদ ইবনে আহমাদ ইবনে আবি খালফ থেকে, তিনি রূহ থেকে, তিনি ইবনে জুরাইজ থেকে বর্ণনা করেছেন। ইবনে জুরাইজ বলেন: আমাকে আবুয যুবাইর অবহিত করেছেন যে, তিনি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন। অতঃপর তিনি হাদিসটি বর্ণনা করেছেন।
867 - عن أُبي بن كعب، قال: كنتُ في المسجد، فدخل رجلٌ يُصلِّي. فقرأ قراءةً أنكرتُها عليه ثم دخل آخر، فقرأ قراءة سوى قراءة صاحبه. فلمّا قضينا الصّلاة دخلنا جميعًا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقلت: إنّ هذا قرأ قراءةً أنكرتُها عليه ودخل آخر فقرأ سوى قراءة صاحبه، فأمرهما رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقرأ، فحَسَّنَ النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم شأنّهما فَسُقِطَ في نفسي من التَّكذيب ولا إذْ كُنتُ في الجاهليّة. فلمّا رأى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما قد غشيني ضرب في صدري ففِضْتُ عَرَقًا، وكأنّما أنظرُ إلى اللَّه عز وجل فَرَقًا فقال لي:"يا أُبَيُّ، أُرْسِلَ إِلَيَّ: أن اقْرإ القرآن على حرف. فرددتُ إليه أَنْ هَوِّنْ على
أمَّتي. فرَدَّ إليَّ الثانية: اقْرَأْهُ على حرفين. فرددتُ إليه: أَنْ هَوِّنْ على أُمَّتِي. فردَّ إليَّ الثالثةَ: اقرَأْهُ على سبعة أحرف، فلك بكُلِّ رَدَّةٍ رَدَدْتُكَهَا مسألةٌ تَسْأَلُنِيهَا. فقلت: اللَّهم اغفرْ لأمّتي. اللَّهم اغفر لأُمَّتي. وأَخَّرْتُ الثّالثة ليوم يرغبُ إليَّ الخلقُ كلُّهم حتى إبراهيمُ صلى الله عليه وسلم".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (820) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، حدّثنا أبي، حدّثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد اللَّه بن عيسى بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن جدّه، عن أبي ابن كعب، فذكر الحديث.
وقوله:"وأخّرتُ الثّالثة"، وهي الشّفاعة كما جاء التصريح في الرّوايات الأخرى بقوله:"واختبأتُ الثّالثة شفاعةً لأمّتي يوم القيامة".
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মসজিদে ছিলাম। এমন সময় এক ব্যক্তি প্রবেশ করল এবং সালাত আদায় করতে লাগল। সে এমনভাবে তেলাওয়াত করল যা শুনে আমি আপত্তি জানালাম। এরপর অন্য আরেকজন প্রবেশ করল এবং তার সাথীর তেলাওয়াত থেকে ভিন্নভাবে তেলাওয়াত করল।
যখন আমরা সালাত শেষ করলাম, তখন আমরা সবাই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। আমি বললাম: নিশ্চয়ই এই ব্যক্তি এমনভাবে তেলাওয়াত করেছে যা শুনে আমি আপত্তি জানিয়েছি, আর অন্যজন প্রবেশ করে তার সাথীর তেলাওয়াত থেকে ভিন্নভাবে তেলাওয়াত করেছে।
অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দু'জনকে তেলাওয়াত করতে আদেশ করলেন। তারা তেলাওয়াত করলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উভয়ের তেলাওয়াতকেই উত্তম বলে স্বীকৃতি দিলেন। এতে আমার মনে সন্দেহের সৃষ্টি হলো—যা আমার জাহিলিয়্যাতের (অন্ধকার যুগের) সময়েও সৃষ্টি হয়নি।
যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখলেন যে আমাকে কী আচ্ছন্ন করেছে, তখন তিনি আমার বুকে আঘাত করলেন। ফলে আমার শরীর থেকে ঘাম ঝরে পড়ল, আর (ভয়ে) যেন আমি আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল-কে দেখছিলাম।
অতঃপর তিনি আমাকে বললেন: "হে উবাই, আমার নিকট এই বার্তা প্রেরণ করা হয়েছিল যে, আমি যেন কুরআনকে এক হরফে (পদ্ধতিতে) পাঠ করি। আমি আল্লাহর নিকট পুনরায় জানালাম যে, আমার উম্মতের জন্য সহজ করে দিন। তিনি দ্বিতীয়বার আমার কাছে এই বার্তা পাঠালেন যে, 'তুমি কুরআন দুই হরফে পাঠ করো।' আমি পুনরায় জানালাম: 'আমার উম্মতের জন্য সহজ করে দিন।' তিনি তৃতীয়বার আমার কাছে এই বার্তা পাঠালেন যে, 'তুমি কুরআন সাত হরফে (পদ্ধতিতে) পাঠ করো। আর তুমি যতবার আমার কাছে অনুরোধ করেছ, তার প্রত্যেকটির বিনিময়ে তোমার জন্য একটি করে চাওয়া আছে যা তুমি আমার কাছে চাইবে।'
আমি বললাম: 'হে আল্লাহ, আমার উম্মতকে ক্ষমা করে দিন! হে আল্লাহ, আমার উম্মতকে ক্ষমা করে দিন!' আর আমি তৃতীয় চাওয়াটি ঐ দিনের জন্য স্থগিত রাখলাম যেদিন ইবরাহীম (আঃ) সহ সমস্ত সৃষ্টি আমার প্রতি মুখাপেক্ষী হবে।"
