হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (828)


828 - عن جابر بن سمرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ألا إنّي فرط لكم على
الحوض، وإنّ بعد ما بين طرفيه كما بين صنعاء وأبلة، كأنّ الأباريق فيه النّجوم".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2305) عن الوليد بن شجاع بن الوليد السكونيّ، حدثني أبي رحمه الله، حدثني زياد بن خيثمة، عن سماك بن حرب، عن جابر بن سمرة، فذكره.




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “শুনে রাখো! আমি তোমাদের জন্য হাউযে (কাউসারে) অগ্রগামী থাকব। আর নিশ্চয়ই এর দুই প্রান্তের মধ্যবর্তী দূরত্ব সান‘আ ও আবলাহর দূরত্বের ন্যায়। তাতে রাখা পেয়ালাগুলো নক্ষত্ররাজির মতো (অসংখ্য ও উজ্জ্বল)।”









আল-জামি` আল-কামিল (829)


829 - عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، قال: كتبتُ إلى جابر بن سمرة مع غلامي نافع: أخبرني بشيء سمعتَ من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال فكتب إليَّ إنِّي سمعتُه يقول:"أنا الفَرَط على الحَوْض".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2305: 45) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن المهاجر ابن مسمار، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، فذكره.




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আমের ইবনে সা'দ ইবনে আবি ওয়াক্কাস বলেন: আমি আমার গোলাম নাফে'-এর মাধ্যমে জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে যা শুনেছেন, সে বিষয়ে আমাকে অবহিত করুন। তিনি উত্তরে আমার কাছে লিখলেন, আমি তাঁকে (নবীকে) বলতে শুনেছি: "আমি হাউযের (কাউসার) কাছে তোমাদের অগ্রগামী (প্রস্তুতকারী) হিসেবে থাকব।"









আল-জামি` আল-কামিল (830)


830 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"أنا فرطكم بين أيديكم، فإن لم تجدوني، فأنا على الحوض ما بين أيلة إلى مكة. وسيأتي رجال ونساء بآنيةٍ وقِرَبٍ ثم لا يذوقون منه شيئًا".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (6449) عن عبد اللَّه بن أحمد بن موسى بعسكر مكرم، قال: حدثنا محمد بن معمر، قال: حدّثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، قال: حدثني أبو الزبير، قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير، وأبو عاصم هو الضّحّاك بن مخلد بن الضّحّاك الشيبانيّ النّبيل البصريّ من رجال الجماعة، ولا يعكر قول البزّار -كشف الأستار (3481) -:"لا نعلمه يُروى بهذا اللّفظ إِلَّا عن جابر، وإنّما يعرف هذا من حديث حجّاج عن ابن جريج".

فقد يكون له إسنادان هذا أحدهما، والثاني ما رواه الحجّاج عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول (فذكر الحديث).

ومن هذا الطريق رواه الطّبرانيّ في"الأوسط" (753) وقال:"لم يروِ هذا الحديث عن ابن جريج إِلَّا حجّاج".

قلت: بل رواه أيضًا أبو عاصم النّبيل، وكلاهما ثقتان.

والحديث في مسند الإمام أحمد من وجهين آخرين أحدهما (15120) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه ولم يرفعه، فذكر مثله، وهو في حكم المرفوع.

والوجه الثاني (14719) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر، أنّه سمع النّبيّ صلى الله عليه وسلم يقول فذكره.

وابنُ لهيعة فيه كلام معروف، ولكنه توبع هنا، ولا بأس به في المتابعات.

على أن له إسنادًا آخر رواه ابن أبي عاصم في السنة (771) عن محمد بن إسماعيل، ثنا
إسماعيل بن أبي أويس، عن أبي الزّناد، عن موسى بن عقبة، عن أبي الزّبير، حدّثني جابر، أنّه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"أنا بين أيديكم، فإن لم تجدوني فأنا على الحوض، والحوض ما بين أيلة إلى مكة، وسيأتي رجال ونساء يُطرَدون منه فلا يطعموا منه شيئًا".

وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن أبي أويس، فإنّه تُكلِّم في حفظه، ولكن موافقة غيره تدل على أنّه لم يخطئ فيه وهو من رجال الشّيخين.

ومعنى قوله:"وسيأتي رجال ونساءٌ بأنيةٍ وقربٍ ثم لا يذوقون منه شيئًا".

قال ابن حبان: أريدَ به من سائر الأمم الذين قد غفر لهم، يجيئون بأواني ليستقوا بها من الحوض، فلا يُسْقَون منه، لأنّ الحوض لهذه الأمّة خاص دون سائر الأمم إذ محال أن يقدر الكافر والمنافق على حمل الأواني والقرب في القيامة، لأنّهم يساقون إلى النّار. نعوذ باللَّه من ذلك". انتهى.

قلت: وقد يراد بهم أهل البدعة من أمّة محمد صلى الله عليه وسلم الذين يمنعون من الشّرب من الحوض كما هو مصرَّح في الأحاديث الصّحيحة:"إنّك لا تدري ما أحدثوا بعدك".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি তোমাদের আগে তোমাদের জন্য অগ্রগামী (প্রস্তুতকারী) হিসেবে থাকব। যদি তোমরা আমাকে (সেখানে) না পাও, তাহলে আমি হাউজের (কাউসারের) ধারে থাকব, যা আয়লা থেকে মক্কা পর্যন্ত দূরত্বে বিস্তৃত। শীঘ্রই এমন পুরুষ ও নারী আসবে যাদের সাথে পাত্র ও মশক থাকবে, কিন্তু তারা তার (পানি) থেকে কিছুই পান করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (831)


831 - عن الصُّنابح الأحمسيّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا إنّي فرطكم على الحوض، وإنّي مكاثرٌ بكم الأمم، فلا تَقْتَتِلُنَّ بعدي".

صحيح: رواه ابن ماجه (3944) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، قال: حدثنا أبي ومحمد بن بشر، قالا: حدثنا إسماعيل، عن قيس، عن الصّنابح، فذكره.

وإسماعيل هو ابن أبي خالد، وقيس هو ابن أبي حازم، ورجاله ثقات.

وقد أخرجه كلٌ من الإمام أحمد (19069)، وابن أبي عاصم في السنة (739)، وابن حبان في صحيحه (5985، 6446، 6447) من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد بإسناده مثله، إِلَّا أَنَّ البعض اختصره كما أنّ البعض قال: الصنابحيّ بالياء، وهو خطأ كما بيَّن ذلك الحافظ في"التهذيب"، ونقل عن ابن المديني والبخاري ويعقوب بن شيبة وغير واحد.

والصُّنابح: بضم أوله، ثم نون -هو ابن الأعسر الأحمسي- صحابي سكن الكوفة، وقد ثبت سماعة من النبيّ صلى الله عليه وسلم كما صرَّح به في مسند الإمام أحمد، والسنة لابن أبي عاصم.

قال ابن حبان في"صحيحه" عقب ذكر الحديث:"الصُّنابح من الصّحابة، والصُّنابحيّ من التّابعين".

قلت: الرّاوي في هذا الحديث هو الصُّنابح بن الأعسر، كما مضى، ولا خلاف في صحبته.

والصّنابحيّ هو عبد الرحمن بن عُسيلة أبو عبد اللَّه الصّنابحيّ من كبار التابعين.

وعبد اللَّه الصّنابحي صحابي آخر روي له مالك في الموطأ، وهو مختلف في صحبته، روى عن النبيّ صلى الله عليه وسلم وعن أبي بكر، وعبادة بن الصّامت. وعنه عطاء بن يسار.

قال ابن معين: عبد اللَّه الصُّنابحي يروي عنه المدنيّون يُشبه أن يكون له صحبة.
قلت: وهو ليس صاحبنا في هذا الحديث.




আস-সুনাবিহ আল-আহমাসি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! নিশ্চয় আমি হাউজের (কাউসার) ধারে তোমাদের অগ্রগামী (প্রস্তুতকারী), আর আমি তোমাদের (সংখ্যাধিক্য) দ্বারা অন্যান্য উম্মতের ওপর গর্ব করব। সুতরাং তোমরা আমার পরে (পরস্পরের সাথে) লড়াই করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (832)


832 - عن أبي بكر الصّديق قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"أَيْ رَبِّ خلقتني سيّدَ ولد آدم ولا فخر، وأوّل من تنشق عنه الأرض يوم القيامة ولا فخر، حتى إنّه يرد عليَّ الحوض أكثر مما بين صنعاء وأيلة".

حسن: رواه الإمام أحمد (15) عن إبراهيم بن إسحاق الطَّالقانيّ، قال: حدّثني النّضر بن شميل المازنيّ، قال: حدّثني أبو نعامة، قال حدّثني أبو هنيدة البراء بن نوفل، عن والان العدويّ، عن حذيفة، عن أبي بكر الصديق في حديث طويل.

وإسناده حسن. وانظر تخريجه كاملًا في الشّفاعة الكبرى.




আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আদম সন্তানের সর্দার, এতে কোনো অহংকার নেই। আর কিয়ামতের দিন আমিই প্রথম ব্যক্তি যার জন্য যমীন বিদীর্ণ হবে, এতেও কোনো অহংকার নেই। এমনকি হাউজে (কাউসারে) আমার কাছে যারা উপস্থিত হবে, তাদের সংখ্যা সান'আ ও আইলার মধ্যবর্তী দূরত্বের চেয়েও বেশি হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (833)


833 - عن أنس، قال: سألت النبيّ صلى الله عليه وسلم أن يشفع لي يوم القيامة، فقال:"أنا فاعل". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأين أطلبك؟ قال:"اطلبني أوّل ما تطلبني على الصّراط". قال: قلت: فإن لم ألقاك على الصّراط؟ قال:"فاطلبني عند الميزان". قلت: فإن لم ألقك عند الميزان؟ قال:"فاطلبني عند الحوض، فإنّي لا أخطئ هذه الثلاث المواطن".

حسن: رواه الترمذيّ (3433) عن عبد اللَّه بن الصّباح الهاشميّ، حدّثنا بدل بن المحَّبر، حدثنا حرب بن ميمون الأنصاريّ أبو الخطّاب، حدّثنا النّضر بن أنس، عن أبيه، فذكر مثله.

ورواه الإمام أحمد (12825) عن يونس بن محمد، حدّثنا حرب بن ميمون، بإسناده، مثله.

وإسناده حسن من أجل حرب بن ميمون، فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذي:"حديث حسن غريب لا نعرفه إِلا من هذا الوجه".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম যে, তিনি যেন কিয়ামতের দিন আমার জন্য সুপারিশ করেন। তিনি বললেন, "আমি তা করব।" তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তখন আমি আপনাকে কোথায় খুঁজব?" তিনি বললেন, "তুমি যখন প্রথমবার আমাকে খুঁজবে, তখন আমাকে সিরাতের (পুলসিরাত) ওপর খুঁজবে।" তিনি বলেন, আমি বললাম, "যদি সিরাতের ওপর আপনার সাথে আমার দেখা না হয়?" তিনি বললেন, "তাহলে আমাকে মীযানের (দাঁড়িপাল্লা) কাছে খুঁজবে।" আমি বললাম, "যদি মীযানের কাছেও আপনার সাথে আমার দেখা না হয়?" তিনি বললেন, "তাহলে আমাকে হাউজের (কাউসার) কাছে খুঁজবে। কারণ আমি এই তিনটি স্থান থেকে দূরে থাকব না (বা সরে যাব না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (834)


834 - عن أبي أمامة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّهَ وَعَدَنِي أن يُدخِل من أمَّتي الجنَّةَ سبعين ألفًا بغير حساب".

فقال يزيد بن الأخنس السُّلميّ: واللَّه ما أولئك في أمَّتك إِلَّا كالذُّباب الأَصْهب في الذِّبَّان! فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فإنّ ربِّي قد وَعَدني سبعين ألفًا، مع كلِّ ألفٍ سبعون ألفًا، وزادني ثلاثَ حَثَياتٍ".

قال: فما سعةُ حَوْضِك يا نبيَّ اللَّه؟ قال:"كما بين عَدَنِ إلى عَمَّان، وأوْسعُ وأَوْسعُ" يُشيرُ بيده. قال:"فيه مَثْعَبان من ذهب وفضة". قال: فما حوضُك يا نبيَّ اللَّه؟ قال:"ماءٌ أشدُّ بياضًا من اللَّبن، وأحلى مذاقةً من العسل، وأطيب رائحةً من المسك، مَن شرب منه لم يظْمأ بعدها، ولم يَسْودَّ وجهُه أبدًا".
حسن: رواه أحمد (22156) قال: حدّثنا عصام بن خالد، حدّثني صفوان بن عمرو، عن سُليم ابن عامر الخبائريّ وأبي اليمان الهوزَنيّ، عن أبي أمامة، فذكره.

وإسناده حسن، وأبو اليمان الهوزني هو عامر بن عبد اللَّه بن لُحي -مصغرًا- ذكره ابن حبان في ثقاته، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول". أي عند المتابعة، وقد توبع كما ترى، وسُليم بن عامر الخبائريّ ثقة من رجال مسلم.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الطبرانيّ في"الكبير" (7672)، وابن أبي عاصم في السنة (729)، وصحّحه ابن حبان (6457، 7246).

وأمّا قول عبد اللَّه بن الإمام أحمد عقب حديث أبي أمامة وجدتُ هذا الحديث في كتاب أبي بخطّ يده، وقد ضرب عليه، فظننتُ أنه ضرب عليه لأنه خطأ، إنّما هو: عن زيد، عن أبي سلّام، عن أبي أمامة". فهو مشكل؛ لأنّ إسناده صحيح.

بل أصح من حديث زيد، عن أبي سلّام، عن أبي أمامة إن كان الإمام قصد به كما ظنّ عبد اللَّه ولده؛ لأنّ فيه مصعب بن سلام التميميّ الكوفي ضعيف، ومن طريقه أخرجه الطبرانيّ (8/ 140) عنه، عن عبد اللَّه بن العلاء بن زيد، عن أبي سلام الأسود، عن أبي أمامة الباهليّ، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم وهذا لفظه:"حوضي كما بين عدن وعمان، فيه الأكاويب عدد نجوم السّماء، من شرب منه لم يظمأ بعده أبدًا، وإنّ من يرد عليه من أمّتي الشعثة رؤوسهم الدّنسة ثيابهم، لا يُنكحون المتنعمات، ولا يحضرون السدد - يعني أبواب السلطان الذين يعطون كل الذي عليهم، ولا يعطون كل الذي لهم".

قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 362): رواه أحمد والطبرانيّ، ورجال أحمد وبعض أسانيد الطبرانيّ رجال الصحيح إِلَّا أنه قال في الطبرانيّ:"فما شرابه؟ قال: شرابه أبيض من اللّبن، وأحلى مذاقة من العسل".




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা আমার সাথে ওয়াদা করেছেন যে, তিনি আমার উম্মতের সত্তর হাজার লোককে বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।”

তখন ইয়াযিদ ইবনুল আখনাস আস-সুলামী বললেন: আল্লাহর কসম! আপনার উম্মতের মধ্যে এরা তো মশা-মাছির ভিড়ে লাল মাছিটির মতো (অর্থাৎ সংখ্যায় খুবই নগণ্য)! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “নিশ্চয় আমার রব আমার সাথে সত্তর হাজারের ওয়াদা করেছেন, যার প্রতিটি হাজারের সাথে আরও সত্তর হাজার থাকবে। আর তিনি আমাকে অতিরিক্ত তিনটি অঞ্জলি (হাত ভর্তি পরিমাণ) দান করেছেন।”

তিনি (ইয়াযিদ) বললেন: হে আল্লাহর নবী! আপনার হাউজের প্রশস্ততা কতটুকু? তিনি বললেন: “আদন থেকে আম্মান পর্যন্ত দূরত্বের মতো, বরং আরও প্রশস্ত, আরও প্রশস্ত,” এ কথা বলে তিনি হাত দ্বারা ইশারা করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাতে সোনা ও রূপার দুটি নালা থাকবে।” তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আপনার হাউজের পানি কেমন? তিনি বললেন: “এর পানি দুধের চেয়েও অধিক সাদা, মধুর চেয়েও অধিক সুস্বাদু, এবং মেশকের চেয়েও অধিক সুগন্ধযুক্ত। যে ব্যক্তি তা থেকে একবার পান করবে, সে আর কখনো পিপাসার্ত হবে না, এবং তার চেহারা কখনো কালো হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (835)


835 - عن عتبة بن عبد السُّلميّ يقول: قام أعرابيٌّ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: ما حوضك الذي تحدّث عنه؟ فقال:"هو كما بين صنعاء إلى بُصْرى، ثم يمدّني اللَّه فيه بكُراعٍ لا يدري بشر ممن خُلق أي طرفيه".

قال فكبّر عمر. فقال صلى الله عليه وسلم:"أمّا الحوضُ فيزدحم عليه فقراء المهاجرين الذين يُقْتتلون في سبيل اللَّه ويموتون في سبيل اللَّه، وأرجو أن يوردني اللَّه الكراع فأشرب منه".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (6450) من طريق معمر بن يعمر، قال: حدّثنا معاوية بن سلّام، قال: حدّثنا أخي زيد بن سلّام، أنه سمع أبا سلّام، قال: حدّثني عامر بن زيد البكالي أنه سمع عتبة بن عبد السلمي، فذكره.

ورواه ابنُ أبي عاصم في السنة (715) من طريق أبي توبة الرّبيع بن نافع: حدّثنا معاوية بن سلام، أنه سمع أبا سلّام، أخبرني عمرو بن زيد البكالي بإسناده مختصرًا، فحذف الواسطة بين
معاوية بن سلام وبين أبي سلّام وهو"أخوه زيد بن سلّام". ولكن رواه البيهقيّ في"البعث" (274) من وجه آخر عن أبي توبة، فأثبت الواسطة.

وإسناده حسن من أجل عامر بن زيد البكالي، وإنه من رجال التعجيل (505)، ولما ذكر الحسيني: ليس بالمشهور، تعقبه الحافظ فقال: بل معروف، وأطال في ذكره، والخلاصة أنه حسن الحديث.




উতবাহ ইবনু আব্দ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক বেদুঈন (আরব) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দাঁড়িয়ে বললো: আপনার হাউয (হাউযে কাওসার) সম্পর্কে আপনি যা আলোচনা করেন, তা কেমন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তা সান‘আ থেকে বুসরার মধ্যবর্তী দূরত্বের মতো। এরপর আল্লাহ তাতে আমাকে একটি নহর দ্বারা সাহায্য করবেন, সৃষ্টির মধ্যে কোনো মানুষই যার দুই প্রান্তের কোনোটিই জানে না।

রাবী বলেন, অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর দিলেন। এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আর ঐ হাউযের উপর ভিড় করবে গরিব মুহাজিরগণ, যারা আল্লাহর পথে যুদ্ধ করে এবং আল্লাহর পথে মৃত্যুবরণ করে। আমি আশা করি, আল্লাহ আমাকে ঐ নহরের কাছে পৌঁছাবেন, অতঃপর আমি তা থেকে পান করব।









আল-জামি` আল-কামিল (836)


836 - عن يحنّس، أنّ حمزة بن عبد المطّلب لمّا قدم المدينة، تزوّج خولةَ بنتَ قيس ابن قَهْد الأنصاريّة من بني النَّجار، قال: وكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يزور حمزةَ في بيتها، وكانت تحدِّثُ عنه صلى الله عليه وسلم أحاديث، قالت: جاءنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومًا، فقلت: يا رسول اللَّه، بلغني عنك أنَّك تحدِّث أنَّ لك يوم القيامة حوضًا ما بين كذا إلى كذا؟ قال:"أَجَلْ، وأَحبُّ النّاس إليَّ أن يروي منه قومُكِ". قالت: فقدّمتُ إليه بُرْمَةً فيها خُبْرَةٌ -أو خَزِيرة- فوضع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يده في البُرمة ليأكل، فاحترقتْ أصابعه، فقال:"حَسِّ". ثم قال:"ابنُ آدم إن أصابه البرد قال: حسّ، وإن أصابه الحرُّ قال: حسّ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (27316) عن حسين بن محمد، قال: حدثنا جرير -يعني ابن حازم- عن يحيى بن سعيد، عن يُحَنَّس، فذكر الحديث.

ويُحنّس -بضم أوله، وفتح المهملة، وتشديد النون المفتوحة، ثم مهملة- ابن عبد اللَّه من رجال مسلم. وإسناده صحيح.

ورواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 232)، وابن أبي عاصم في السنة (705) من وجه آخر عن حمّاد بن زيد، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن خولة بنت قيس بن فهد، وكانت امرأة حمزة بن عبد المطلب فقتل عنها، فجاءت نبيّ اللَّه صلى الله عليه وسلم تزوره، قالت: يا نبيّ اللَّه قد كنتُ أحبّ أن ألقاك فأسألك عن شيء، ذكر لي أنك تذكر أن لك حوضًا ما بين كذا إلى كذا. . . .". فذكر الحديث مثله. إِلَّا أنّ ابن أبي عاصم اختصره.

ثم رواه الطبرانيّ، والإمام أحمد (27315)، وابن أبي عاصم في السنة (704) كلهم من طريق ابن أبي شيبة، عن أبي خالد الأحمر، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن خولة بنت حكيم، فذكرت الحديث مختصرًا.

قال الطبرانيّ:"هكذا رواه أبو خالد عن خولة بنت حكيم، والصواب حديث حماد بن زيد".

قلت: وهو كما قال، فإن هذا الحديث من مسند خولة بنت قيس، وشذّ أبو خالد فجعله من مسند خولة بنت حكيم.

والحديث أورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 361) وقال: رجال أحمد رجال الصّحيح.

ورُوي عن أسامة بن زيد نحوه، وفيه ذكر للكوثر والحوض معًا. رواه الطبرانيّ.
قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 363):"فيه حرام بن عثمان وهو متروك".




খাওলা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মদীনায় আগমন করলেন, তখন তিনি বনু নাজ্জার গোত্রের আনসারী খাওলা বিনত কায়স ইবনু কাহদকে বিবাহ করলেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (খাওলার) ঘরে হামযার সাথে দেখা করতে আসতেন। তিনি (খাওলা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে হাদীস বর্ণনা করতেন। তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট আসলেন। তখন আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমি আপনার সম্পর্কে শুনেছি যে, আপনি বলেছেন, কিয়ামতের দিন আপনার একটি হাউয (ফাউন্ডেন) থাকবে যা অমুক স্থান থেকে অমুক স্থান পর্যন্ত বিস্তৃত? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, আর আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয় সেই লোকেরা যারা তোমার কওম থেকে এসে তা থেকে পান করবে।" তিনি (খাওলা) বলেন: এরপর আমি তাঁর নিকট একটি পাত্র পেশ করলাম, যাতে খুবরাহ -অথবা খাযীরাহ- (এক প্রকার খাবার) ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাবার গ্রহণের জন্য পাত্রে তাঁর হাত রাখলেন, তখন তাঁর আঙ্গুল পুড়ে গেল। তিনি বললেন: "ইস!" অতঃপর তিনি বললেন: "আদম সন্তান এমন যে, তাকে ঠান্ডা স্পর্শ করলে সে 'ইস' বলে, আর তাকে গরম স্পর্শ করলেও সে 'ইস' বলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (837)


837 - عن أبي الدّرداء، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا فرطكم على الحوض، فلأعرفنَّ ما نوزعت في أحد منكم".

وفي رواية:"لألفين ما نوزعت أحدًا منكم على الحوض. فأقول أنا: من أصحابي". فيقال: إنّك لا تدري ما أحدثوا بعدك. قال أبو الدّرداء: يا رسول اللَّه، ادع اللَّه أن لا يجعلني منهم قال:"لستَ منهم".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (737، 767) عن هشام بن عمار، ثنا يحيى بن حمزة، ثنا يزيد بن أبي مريم، أنّ أبا عبيد اللَّه حدّثه عن أبي الدّرداء، فذكره.

ورواه أيضًا (768) من وجه آخر عن عمرو بن عثمان، ثنا أبيّ، حدّثنا محمد بن مهاجر، قال: سمعت يزيد بن أبي مريم، يحدث عن أبي عبيد اللَّه، عن أبي الدّرداء، فذكره. واختصره في بعض المواضع.

وإسناده حسن من أجل يزيد بن أبي مريم فإنه حسن الحديث، غير أنّ أبا عبيد اللَّه تحرّف إلى"أبي عبد اللَّه" وإلى"أبي عبيدة"، وإلى"أبي عبيد".

والصّواب هو: أنه أبو عبيد اللَّه مسلم بن مِشكم كما سمّاه ابنُ أبي عاصم في الموضع الأوّل، وهو كاتب لأبي الدّرداء من رجال السنن وهو ثقة.

ورواه الطبرانيّ باللّفظ الثاني في الأوسط (399)، قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 365):"ورواه الطبرانيّ بإسنادين ورجال أحدهما رجال الصّحيح غير أبي عبد اللَّه -كذا والصواب: عبيد اللَّه- الأشعريّ وهو ثقة".




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি তোমাদের আগে হাউযের (কাউসার) কাছে উপস্থিত থাকব। তোমাদের মধ্যে কাউকে যেন আমার কাছ থেকে জোর করে সরিয়ে নেওয়া না হয়, আমি তা অবশ্যই জানতে চাইব (অর্থাৎ তাদের পক্ষে সুপারিশের জন্য ঝগড়া করব)।"

অন্য বর্ণনায় রয়েছে: "আমি হাউযের কাছে তোমাদের মধ্যে কারো বিষয়েই যেন ঝগড়ার সম্মুখীন না হই। তখন আমি বলব: এরা তো আমার সাহাবী।" জবাবে বলা হবে: "আপনি জানেন না, তারা আপনার পরে কী নতুনত্ব সৃষ্টি করেছে (ধর্মের মধ্যে পরিবর্তন এনেছে)।" আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন তিনি আমাকে তাদের অন্তর্ভুক্ত না করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদের অন্তর্ভুক্ত নও।"









আল-জামি` আল-কামিল (838)


838 - عن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا ممسك بحجزكم عن النّار، وتغلبون تقاحمون فيها تفاحم الفراش والجنادب، وأوشك أن أرسل بحجزكم، وأفرط لكم على الحوض، وتردون علي معًا وأشتاتًا".

حسن: رواه ابن أبي شيبة في المصنف (11/ 451 - 452)، وعنه ابنُ أبي عاصم في السنة (744) عن مالك بن إسماعيل، ثنا يعقوب بن عبد اللَّه القميّ، عن حفص بن حُميد، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن عمر بن الخطّاب، فذكره.

ورجاله ثقات غير يعقوب بن عبد اللَّه القميّ، ضعّفه الدَّارقطنيّ، ومشّاه غيره وهو حسن الحديث، وفي التقريب:"صدوق يهم".

ولبداية الحديث شواهد صحيحة من حديث أبي هريرة في الصحيحين، البخاريّ (6483)، ومسلم (2284)، ومن حديث جابر في مسلم (2285)، وسيأتي تخريجه كاملًا في فضائل النبيّ صلى الله عليه وسلم.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদের কোমর ধরে আগুন থেকে টেনে রাখছি, কিন্তু তোমরা আমাকে অতিক্রম করে প্রজাপতি ও ঝিঁঝিঁ পোকার মতো ঝাঁপিয়ে পড়ে তাতে প্রবেশ করতে চাইছো। শীঘ্রই আমি তোমাদের কোমর ছেড়ে দেব, আর আমি তোমাদের জন্য হাউযের (কাওসার) দিকে অগ্রগামী হব, এবং তোমরা সম্মিলিতভাবে ও বিচ্ছিন্নভাবে আমার কাছে ফিরে আসবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (839)


839 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول على هذا المنبر:"ما بالُ رجال يقولون: إنّ رحم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا تنفع قومه، بلى واللَّهِ إِنَّ رحمي موصولةٌ في الدّنيا والآخرة، وإنّي أيّها النّاس فرط لكم على الحوض، فإذا جئتم قال رجل: يا رسول اللَّه، أنا فلان بن فلان. قال آخر: أنا فلان بن فلان. فأقول: أما النَّسبُ فقد عرفتُه، ولكنكم أحدثتم بعدي وارتدتُم القهقرى".

حسن: رواه أبو يعلى (1238) عن زهير، حدّثنا أبو عامر، عن زهير، عن عبد اللَّه بن محمد، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه، فذكره.

زهير هو ابن حرب أبو خيثمة، وزهير الثاني هو ابن محمد التميمي وكلاهما من رجال الجماعة وإن كان زهير بن محمد مختلف فيه، فيقال: روايته عن أهل الشام غير مستقيمة، وشيخه هنا عبد اللَّه ابن محمد مدني، وهو ابن عقيل بن أبي طالب الهاشميّ، والإسناد حسن من أجل الكلام في حفظه غير أنه حسن الحديث، وأخرجه الحاكم (4/ 74 - 75) من طريق زهير بن محمد، وقال:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

وقال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 364):"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصّحيح غير عبد اللَّه ابن محمد بن عقيل، وقد وُثِّق".

قلت: وهو كما قال، غير أنه فاته العزو إلى الإمام أحمد، لأنّه رواه أيضًا من وجهين (11138) عن أبي عامر بإسناده غير أنّ فيه حمزة بن أبي سعيد الخدريّ، والوجه الثاني (11139) عن زكريا بن عدي، حدثنا عبيد اللَّه، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن حمزة بن أبي سعيد، عن أبيه، فذكر مثله.

ولا يحكم عليه بالاضطراب في الإسناد لسوء حفظ عبد اللَّه بن محمد بن عقيل؛ لأنه من الجائز أن يسمع الحديث من أبناء أبي سعيد الخدريّ فمرة عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، وأخرى عن حمزة بن أبي سعيد الخدريّ، وعبد الرحمن بن أبي سعيد ثقة من رجال مسلم، وحمزة بن أبي سعيد الخدريّ"مقبول" لكنه توبع.

ولا يُعكّر هذا ما رواه أحمد (111345) عن أبي النّضر، حدّثنا شريك، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن سعيد بن المسيب، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث لأنّ فيه شريكًا وهو ابن عبد اللَّه النخعيّ الكوفيّ تغيّر حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة، فلعله أخطأ فجعل سعيد بن المسيب بدلًا من عبد الرحمن بن أبي سعيد.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই মিম্বরের উপর দাঁড়িয়ে বলতে শুনেছি: "মানুষের কী হয়েছে যে তারা বলে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়তা তাঁর কওমের কোনো উপকারে আসবে না? না, আল্লাহর কসম! নিশ্চয় আমার আত্মীয়তার বন্ধন দুনিয়া ও আখিরাত উভয় জায়গাতেই সংযুক্ত। হে লোক সকল! আমিই হাউযের (হাউজে কাওসার) উপর তোমাদের অগ্রগামী হব। যখন তোমরা আসবে, তখন এক ব্যক্তি বলবে: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি অমুকের পুত্র অমুক। অন্য একজন বলবে: আমি অমুকের পুত্র অমুক। তখন আমি বলব: বংশ পরিচয় তো আমি চিনেছি, কিন্তু তোমরা আমার পরে নতুন বিষয় উদ্ভাবন করেছ এবং তোমরা পিছনের দিকে ফিরে গিয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (840)


840 - عن أبي برزة، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ لي حوضًا ما بين أيلة إلى صنعاء، عرضُه كطوله، فيه ميزابان يَنْثَعِبان من الجنة، من وَرِق، والآخر من
ذهب، أحلى من العسل، وأبرد من الثّلج، وأبيض من اللّبن، من شرب منه لم يظمأ حتى يدخل الجنة، فيه أباريق عدد نجوم السّماء".

حسن: رواه الإمام أحمد (19804)، والبزار (3849)، وابن أبي عاصم في السنة (722) كلّهم من طريق شدّاد بن سعيد أبي طلحة، قال: حدّثنا جابر بن عمرو أبو الوازع أنه سمع أبا برزة الأسلمي يقول (فذكره).

وصحّحه ابن حبان (1458)، والحاكم (1/ 76) كلاهما من هذا الوجه.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم، فقد احتجّ بحديثين عن أبي طلحة الرّاسبيّ، عن أبي الوازع، عن أبي برزة.

قلت: بل إسناده حسن من أجل الكلام في جابر بن عمرو أبي الوازع، فإنه مختلف فيه، فوثّقه الإمام أحمد، وذكره ابن حبان في"الثقات". وقال النَّسائيّ: منكر الحديث. وقال ابن معين: ليس بشيء.

والخلاصة فيه أنه حن الحديث، وله أسانيد أخرى وهذا أصحها.

وأمّا ما رواه أبو داود (4749) عن مسلم بن إبراهيم، حدّثنا عبد السّلام بن أبي حازم أبو طالوت قال: شهدت أبا برزة دخل على عبيد اللَّه بن زياد فحدثني فلان، سماه مسلم، وكان في السِّماط، فلما رآه عبيد اللَّه قال: إنّ محمديّكم هذا الدّحداح، ففهمها الشيخ، فقال: ما كنت أحسب أني أبقى في قوم يعيروني بصحبة محمد صلى الله عليه وسلم، فقال له عبيد اللَّه، إنّ صحبة محمد صلى الله عليه وسلم لك زين غير شين، ثم قال: إنّما بعثتُ إليك لأسألك عن الحوض، سمعتَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكر فيه شيئًا؟ فقال له أبو برزة: نعم لا مرة ولا ثنتين ولا ثلاثًا ولا أربعًا ولا خمسًا، فمن كذّب به فلا سقاه اللَّه منه، ثم خرج مغضبًا". ففيه رجل مبهم لم يُسم، إِلَّا أَنَّ القصّة صحيحة.




আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয় আমার একটি হাউজ (হাউজে কাওসার) রয়েছে, যা আইলা থেকে সান'আ পর্যন্ত বিস্তৃত, এর প্রস্থ এর দৈর্ঘ্যের সমান। এতে জান্নাত থেকে দুটি নালী (ঝোরা) প্রবাহিত হয়—একটি রূপার এবং অপরটি সোনার। এটি মধুর চেয়েও মিষ্টি, বরফের চেয়েও শীতল এবং দুধের চেয়েও সাদা। যে ব্যক্তি এর থেকে পান করবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করা পর্যন্ত আর কখনো তৃষ্ণার্ত হবে না। এতে আকাশের তারকারাজির সংখ্যার সমান পানপাত্র রয়েছে।'









আল-জামি` আল-কামিল (841)


841 - عن عبد اللَّه بن بريدة قال: شكّ عبيد اللَّه بن زياد في الحوض، وكانت فيه حرورية فقال: أرأيتم الحوض الذي يُذكر ما أُراه شيئًا! قال: فقال له ناس من صحابته: فإنّ عندك رهطًا من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فأرسلْ إليهم فاسألهم، فأرسل إلى رجل من مزينة فسأله عن الحوض فحدّثه، ثم قال: أرسل إلى أبي برزة الأسلميّ فأتاه وعليه ثوبا حبر، قد ائتّزر بواحد وارتدي بالآخر، قال: وكان رجلًا لحيمًا إلى القصر فلما رآه عبيد اللَّه ضحك ثم قال: إن مُحمّديَّكم هذا الدحداح، قال: ففهمها الشيخ فقال: واعجباه! ألا أَراني في قومي يعدُّون صحابة محمّد صلى الله عليه وسلم عارًا، قال: فقال له جلساء عبيد اللَّه: إنّما أرسل إليك الأميرُ ليسألك عن الحوض، هل سمعتَ من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فيه شيئًا؟ قال: نعم سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكره فمن كذَّب به فلا
سقاه اللَّه منه. قال: ثم نفض رداءَهُ وانصرف غضبانًا. قال: فأرسل عبيد اللَّه إلى زيد ابن الأرقم فسأله عن الحوض فحدّثه حديثًا مونقًا أعجبه، فقال: إنّما سمعتَ هذا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال: لا، ولكن حدّثنيه أخي. قال: فلا حاجة لنا في حديث أخيك! فقال أبو سبرة -رجل من صحابة عبيد اللَّه- فإنّ أباك حين انطلق وافدًا إلى معاوية انطلقتُ معه فلقيتُ عبد اللَّه بن عمرو بن العاص فحدثني من فِيهِ إلى فيَّ حديثًا سمعه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأملاه عليَّ وكتبه. قال: فإنّي أقسمتُ عليك لما أَعْرقَتَ هذا البِرْذون حتى تأتيني بالكتاب. قال: فركبت البرذون فركضته حتى عَرِقَ، فأتيتُه بالكتاب فإذا فيه: هذا ما حدّثني عبد اللَّه بن عمرو بن العاص أنّه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه يبغض الفحش والتّفحش، والذي نفس محمّد بيده! لا تقوم السّاعة حتى يظهر الفحش والتّفحش، وسوء الجوار، وقطيعة الأرحام، وحتى يخون الأمين، ويؤتمن الخائن، والذي نفس محمّد بيده إنّ أسلم المسلمين لمن سلم المسلمون من لسانه ويده، وإنَّ أفضل الهجرة لمن هجر ما نهاه اللَّه عنه، والذي نفسي بيده إنَّ مثل المؤمن كمثل القطعة من الذهب نفخ عليها صاحبها فلم تتغير ولم تنقص، والذي نفس محمّد بيده إنَّ مثل المؤمن كمثل النّحلة أكلت طيبًا ووضعت طيبًا ووقعت فلم تكسر ولم تفسد، ألا وإنَّ لي حوضًا ما بين ناحيتيه كما بين أيلة إلى مكة -أو قال صنعاء إلى المدينة- وإنَّ فيه من الأباريق مثل الكواكب هو أشد بياضًا من اللَّبن، وأحلى من العسل، مَنْ شرب منه لم يظمأ بعدها أبدًا".

قال أبو سبرة: فأخذ عبيدُ اللَّه الكتاب فجزعت عليه فلقي يحيى بن يعمر فشكوت ذلك إليه، فقال: واللَّهِ لأنا أحفظ له مني لسورة من القرآن فحدثني به كما كان في الكتاب سواء.

حسن: رواه عبد الرّزاق (20852)، وعنه أحمد (6872) (19763) -كاملًا ومختصرًا- وابن أبي عاصم في السنة (700، 702) عن معمر، عن مطر الورّاق، عن عبد اللَّه بن بريدة، فذكره، إِلَّا أنّ ابن أبي عاصم اختصره على موضع الحوض.

وإسناده حسن من أجل مطر الورّاق، فإنّه حسن الحديث في المتابعات والشّواهد.

وقد روي عن أبي سَبرة، قال: كان عُبيد اللَّه بن زياد يسألُ عن الحوض، حوض محمد صلى الله عليه وسلم، وكان يُكذِّبُ به، بعدما سأل أبا برزة والبراء بن عازب، وعائذَ بن عمرو، ورجلًا آخر، وكان يكذِّبُ به، فقال أبو سبرة: أنا أحدِّثُك بحديث فيه شفاءُ هذا، إنّ أباك بعث معي بمال إلى معاوية، فلقيتُ
عبد اللَّه بن عمرو، فحدَّثني مما سمع من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأمْلى عليَّ، فكتب بيدي، فلم أَزِدْ حرفًا، ولم أنْقُص حرفًا، حدَّثني أَنّ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال:"إنّ اللَّه لا يحبُّ الفُحْش، أو يبغضُ الفاحشَ والمتفحِّش". قال: ولا تقوم السَّاعةُ حتى يظهر الفُحْشُ والتَّفاحُش، وقطيعةُ الرّحم، وسوء المجاورة، وحتى يُؤْتَمَنَ الخائن، ويُخَوَّن الأمين". وقال:"ألا إنّ موعدَكم حوضي، عرضُه وطُولُه واحد، وهو كما بين أَيلة ومكّة، وهو مسيرة شهر، فيه مثلُ النّجوم أباريقُ، شرابُه أشدُّ بياضًا من الفضّة، مَنْ شَرِبَ منه مَشْرَبًا، لم يظمأ بعده أبدًا". فقال عبيد اللَّه: ما سمعتُ في الحوض حديثًا أثبت من هذا، فصدَّق به، وأخذ الصّحيفة، فحبسها عنده.

رواه الإمام أحمد (6514)، وابن أبي عاصم في السنة (701)، والحاكم (1/ 75)، والبيهقيّ في"البعث" (155) كلّهم من طريق حسين المعلّم، حدّثنا عبد اللَّه بن بريدة، عن أبي سبرة، فذكره.

وأبو سَبْرة هو سالم بن سلمة الهذليّ، ذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 308)، وقال الحاكم: حديث صحيح، فقد اتفق الشِّيخان على الاحتجاج بجميع رواته غير أبي سَبْرة الهذليّ، وهو تابعي كبير، مبين ذكره في المسانيد والتواريخ غير مطعون فيه. ولكنه قال في"الميزان" (2/ 111): سالم بن سَبْرة -أبو سبرة الهذليّ روى عنه ابن بريدة:"مجهول". وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 284) فقال:"رواه أحمد في حديث طويل، وأبو سبرة هذا اسمه سالم بن سبرة، قال أبو حاتم: مجهول".

ولا يقال: إنه عبد اللَّه بن عابس النّخعيّ الكوفي الذي ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 569)، وقال فيه الحافظ:"مقبول". أي إذا تُوبع لأنّه جاء منسوبًا إلى أبيه في روايات كثيرة بأنه أبو سبرة بن سلمة، أو سالم بن سبرة".




আব্দুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উবাইদুল্লাহ ইবনু যিয়াদ হাউয (হাউযে কাওসার) সম্পর্কে সন্দেহ প্রকাশ করল। তার কাছে হারুরিয়্যা গোত্রের কিছু লোক ছিল। সে বলল: তোমরা হাউয সম্পর্কে যা আলোচনা করো, আমি তো তাকে (তাতে) কিছুই মনে করি না!

আব্দুল্লাহ ইবনু বুরাইদাহ বলেন: তখন তার সাঙ্গোপাঙ্গদের মধ্য থেকে কয়েকজন তাকে বলল: আপনার কাছে তো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীদের মধ্য থেকে কয়েকজন আছেন, আপনি তাদের কাছে লোক পাঠান এবং তাদের জিজ্ঞাসা করুন। সে মুযাইনা গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে লোক পাঠাল এবং তাকে হাউয সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। লোকটি তাকে সে বিষয়ে জানাল। এরপর সে বলল: আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠাও। তিনি তার কাছে এলেন, তখন তিনি দু’টি ডোরাকাটা চাদর পরিহিত ছিলেন, একটি কোমরে পেঁচানো এবং অপরটি গায়ে জড়ানো ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: তিনি কিছুটা বেঁটে এবং স্থূলকায় ছিলেন। উবাইদুল্লাহ তাকে দেখে হাসল এবং বলল: তোমাদের এই মুহাম্মাদী লোকটি তো "আদ-দাহদাহ" (অর্থাৎ স্থূলকায় ও বেঁটে)। বর্ণনাকারী বলেন: বৃদ্ধ লোকটি (আবূ বারযাহ) তা বুঝে ফেললেন এবং বললেন: আশ্চর্যের বিষয়! আমি কি দেখতে পাচ্ছি না যে, আমার জাতি মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী হওয়াকে একটি লজ্জার বিষয় বলে গণ্য করছে? তখন উবাইদুল্লাহর মজলিসের লোকেরা তাকে বলল: আমীর আপনাকে শুধু হাউয সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করার জন্য ডেকেছেন, আপনি কি এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে কিছু শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এর উল্লেখ করতে শুনেছি। যে ব্যক্তি একে মিথ্যা প্রতিপন্ন করবে, আল্লাহ যেন তাকে তা থেকে পান না করান। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি তার চাদর ঝেড়ে ফেলে রাগান্বিত অবস্থায় চলে গেলেন।

তিনি বললেন: এরপর উবাইদুল্লাহ যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠাল এবং তাকে হাউয সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে একটি মনোমুগ্ধকর হাদীস শোনালেন, যা তার পছন্দ হলো। উবাইদুল্লাহ বলল: আপনি কি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে সরাসরি শুনেছেন? তিনি বললেন: না, আমার ভাই আমাকে এটি শুনিয়েছে। উবাইদুল্লাহ বলল: আপনার ভাইয়ের হাদীসের আমাদের কোনো দরকার নেই! তখন আবূ সাবরাহ—উবাইদুল্লাহর সাঙ্গোপাঙ্গদের মধ্য থেকে একজন—বলল: আপনার পিতা যখন মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রতিনিধি হয়ে গিয়েছিলেন, আমি তার সঙ্গে গিয়েছিলাম। সেখানে আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা পেলাম। তিনি তার মুখ থেকে আমার মুখে এমন একটি হাদীস বর্ণনা করলেন, যা তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে শুনেছিলেন। তিনি তা আমাকে লিখিয়ে দেন এবং আমি তা লিখে রাখি। উবাইদুল্লাহ বলল: আমি কসম করে বলছি, তুমি তোমার এই ঘোড়াটিকে ঘর্মাক্ত না করা পর্যন্ত সেই লিখিত কিতাব নিয়ে আমার কাছে আসবে না। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আমি ঘোড়ার পিঠে আরোহণ করলাম এবং তাকে দ্রুত ছুটিয়ে নিয়ে গেলাম, ফলে তা ঘর্মাক্ত হলো। এরপর আমি তার কাছে সেই কিতাব নিয়ে এলাম। তাতে লেখা ছিল:

আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে যা বর্ণনা করেছেন, তা এই: তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ অশ্লীলতা ও কটুভাষীকে ঘৃণা করেন। যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তার শপথ! কিয়ামত কায়েম হবে না, যতক্ষণ না অশ্লীলতা ও কটুভাষিতা, প্রতিবেশীর সাথে খারাপ ব্যবহার এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করা প্রকাশ পাবে; এবং এমনকি বিশ্বস্তকে বিশ্বাসঘাতক গণ্য করা হবে এবং বিশ্বাসঘাতককে বিশ্বস্ত হিসেবে ধরা হবে। যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তার শপথ! মুসলমানদের মধ্যে সবচেয়ে মুসলিম সে, যার জিহ্বা ও হাত থেকে অন্য মুসলমান নিরাপদ থাকে। আর সর্বোত্তম হিজরত হলো, যে ব্যক্তি আল্লাহ যা থেকে নিষেধ করেছেন, তা পরিত্যাগ করে। যার হাতে আমার জীবন, তার শপথ! মুমিনের দৃষ্টান্ত হলো স্বর্ণের টুকরার মতো; তার মালিক তাতে ফুঁক দিলেও তা পরিবর্তিত হয় না এবং কমেও না। যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তার শপথ! মুমিনের দৃষ্টান্ত হলো মৌমাছির মতো; সে ভালো জিনিস খায় এবং ভালো জিনিস রাখে (মধু তৈরি করে) এবং কোনো কিছুর উপর বসলে তাকে ভাঙেও না, নষ্টও করে না। শুনে রাখো, আমার একটি হাউয আছে, যার দু’পাশের দূরত্ব হলো আয়লা থেকে মক্কা পর্যন্ত — অথবা তিনি বললেন: সান'আ থেকে মদীনা পর্যন্ত। তাতে তারকারাজির মতো পানপাত্র থাকবে। এটি দুধের চেয়েও অধিক সাদা এবং মধুর চেয়েও অধিক মিষ্টি। যে ব্যক্তি একবার তা পান করবে, সে এরপর আর কখনও পিপাসার্ত হবে না।"

আবূ সাবরাহ বলেন: এরপর উবাইদুল্লাহ বইটি নিয়ে নিল। এতে আমি চিন্তিত হলাম এবং ইয়াহইয়া ইবনু ইয়া'মার-এর সাথে দেখা করলাম এবং বিষয়টি তার কাছে অভিযোগ করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! কুরআনের কোনো সূরার চেয়েও আমি এটি অধিক মুখস্থ রেখেছি। এরপর তিনি কিতাবে যা লেখা ছিল হুবহু তাই আমার কাছে বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (842)


842 - عن أبي حمزة قال: دخل أبو برزة على عبيد اللَّه بن زياد، فقال: إنّ محدِّثَكم -كذا- هذا الدّحداح فقال: ما كنتُ أرى أعيش في قوم يعدّون صحبة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عارًا. قالوا: إنّ الأمير إنّما دعاك ليسألك عن الحوض، عن أي باله. قال: أحقّ هو؟ قال: نعم، فمن كذّب به فلا سقاه اللَّه منه.

حسن: رواه البيهقيّ في"البعث" (154) من طريق محمد بن يحيى الذّهليّ، ثنا عبد الرحمن بن مهديّ، عن قرّة بن خالد، عن أبي حمزة، فذكره.

ورجال إسناده ثقات غير أبي حمزة واسمه طلحة بن يزيد الأنصاري حسن الحديث.




আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনে যিয়াদের নিকট প্রবেশ করলেন। অতঃপর [ইবনে যিয়াদ] বলল: তোমাদের এই বর্ণনাকারী—এই ‘দাহদাহ’ (মূর্খ) এই রকম! তখন [আবূ বারযাহ] বললেন: আমি ভাবিনি যে, এমন এক কওমের মধ্যে জীবিত থাকব, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্যকে লজ্জার কারণ মনে করে। লোকজন বলল: আমীর তো আপনাকে ডেকেছেন হাউয (হাউযে কাওসার) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করার জন্য, এটি সম্পর্কে আপনার কী বক্তব্য। তিনি [আবূ বারযাহ] বললেন: এটা কি সত্য? তিনি বললেন: হ্যাঁ, যে ব্যক্তি এটাকে অস্বীকার করবে, আল্লাহ যেন তাকে তা থেকে পান না করান।









আল-জামি` আল-কামিল (843)


843 - عن أبي طالوت العنزيّ، قال: سمعتُ أبا برزة، وخرج من عند عبيد اللَّه بن زياد وهو مُغْضَب، فقال: ما كنتُ أظنُّ أن أعيش حتّى أُخَلَّف في قوم يُعيّروني بصحبة محمد صلى الله عليه وسلم، قالوا: إنّ محمديَّكم هذا الدَّحداح! سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول في الحوض، فمن كذّب فلا سقاه اللَّه منه.
حسن: رواه الإمام أحمد (19779) عن يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن مهزم العنزيّ، عن أبي طالوت العنزيّ، قال. . . فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن مهزم وهو حسن الحديث.




আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উবায়দুল্লাহ ইবনু যিয়াদ-এর নিকট থেকে ক্রুদ্ধ অবস্থায় বের হলেন এবং বললেন: আমি ভাবিনি যে আমি এতকাল বেঁচে থাকব যে আমাকে এমন এক প্রজন্মের মাঝে ফেলে যাওয়া হবে, যারা আমাকে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য থাকার কারণে তিরস্কার করবে। তারা বলে: তোমাদের এই মুহাম্মাদী হলো 'দাহদাহ' (তুচ্ছ ব্যক্তি)! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হাউয (কাওসার) সম্পর্কে বলতে শুনেছি। সুতরাং যে ব্যক্তি তা অস্বীকার করবে, আল্লাহ তাকে তা থেকে পান করাবেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (844)


844 - عن أنس بن مالك، أنّ زيادًا -أو ابن زياد- ذُكر عنده الحوض، فأنكر ذلك، فبلغ ذلك أنسًا فقال: أما واللَّهِ لأسوأنّه غدًا، فقال: ما أنكرتم من الحوض؟ قالوا: سمعتَ النّبيّ صلى الله عليه وسلم يذكره. قال: نعم، ولقد أدركت عجائز بالمدينة لا يصلين صلاة إلا سألن اللَّه تعالى أن يوردهن حوض محمد صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (698) عن هدبة، ثنا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

ورواه أبو يعلى (3355) من طريق عبد الرحمن بن سلام الجُميحي عن حمّاد به. وإسناده صحيح، وكذا قال الحافظ في"الفتح" (11/ 468) بعد أن عزاه إلى أبي يعلى.

ورواه الإمام أحمد (13405) من وجه آخر عن حمّاد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أنس، فذكر مثله، وزاد فيه صفة الحوض:"إنّ ما بين طرفيه كما بين أيلة إلى مكة -أو ما بين صنعاء ومكة- وإنّ آنيته أكثر من نجوم السّماء".

وفيه علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف.

ورواه الحاكم (1/ 78)، والبيهقيّ في البعث (158) كلاهما من وجه آخر عن حميد، عن أنس مثل حديث ابن أبي عاصم وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

ورواه أيضًا من وجه آخر عن حميد، عن أنس، قال: دخلتُ على عبيد اللَّه بن زياد، وهم يتراجعون في ذكر الحوض. قال: فقال: جاءكم أنس. قال: يا أنس، ما تقول في الحوض؟ قال: قلت: ما حسبتُ أنّي أعيش حتى أرى مثلكم يمترون في الحوض. لقد تركتُ بعدي عجائز ما تصلي واحدة منهنّ صلاة إِلَّا سألت ربَّها أن يوردها حوض محمد صلى الله عليه وسلم.

وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিয়াদ—অথবা ইবনু যিয়াদ—এর কাছে হাউয (কাউসার) সম্পর্কে আলোচনা করা হলো, কিন্তু সে তা অস্বীকার করল। এই খবর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি কালই তাকে লজ্জিত করব। (এরপর তিনি বললেন:) তোমরা হাউয সম্পর্কে কী অস্বীকার করো? (তারা জিজ্ঞেস করল/বলল: আপনি কি) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে আলোচনা করতে শুনেছেন? তিনি (আনাস) বললেন: হ্যাঁ। আল্লাহর কসম! আমি মদীনার এমন বৃদ্ধ নারীদের পেয়েছি, যারা নামায শেষ করার পর আল্লাহ তাআলার কাছে এই দু'আ না করে ক্ষান্ত হতেন না যে, আল্লাহ যেন তাঁদেরকে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাউয নসীব করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (845)


845 - عن زيد بن أرقم، قال: بعث إليَّ عبيد اللَّه بن زياد، فأتيتُه فقال:

ما أحاديث تحدِّثُها وترويها عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا نجدها في كتاب اللَّه عز وجل؟ تحدِّث أنّ له حوضًا في الجنّة! قال: لقد حدّثناه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ووعدناه. قال: كذبتَ، ولكنّك شيخٌ قد خَرِفْتَ! . قال: إنّي قد سَمِعَتْه أذناي، ورعاه قلبي من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من كذب عليَّ متعمِّدًا، فليتبوأ مقعده من جهنّم". وما كذبتُ على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الإمام أحمد (19266)، والطبرانيّ في الكبير (5/ 203 - 204)، والبزار - كشف الأستار (217) - كلّهم من طريق أبي حيان التّيميّ، حدّثني يزيد بن حيان التّيميّ، قال: حدّثنا زيد بن أرقم في مجلسه، قال: بعث إلى عبيد اللَّه بن زياد، فذكر مثله. وإسناده صحيح.

ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم (1/ 77) وقال:"على شرط مسلم".




যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উবাইদুল্লাহ ইবনু যিয়াদ আমার কাছে লোক পাঠাল। আমি তার কাছে গেলাম। সে বলল: কী সব হাদীস তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করো, যা আমরা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কিতাবে খুঁজে পাই না? তুমি বলছো যে জান্নাতে তাঁর জন্য একটি হাউজ রয়েছে! তিনি (যায়িদ) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই আমাদেরকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং এর প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন। সে (উবাইদুল্লাহ) বলল: তুমি মিথ্যা বলছো, তুমি তো এমন এক বৃদ্ধ হয়ে গেছো যার বুদ্ধিভ্রষ্ট হয়েছে! তিনি (যায়িদ) বললেন: অবশ্যই আমার দুই কান তা শুনেছে এবং আমার অন্তর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে তা সংরক্ষণ করেছে। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমার উপর ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা আরোপ করে, সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়।" আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যা আরোপ করিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (846)


846 - عن زيد بن أرقم، قال: كنّا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فنزلنا منزلًا فقال:"ما أنتم جزء من مائة ألف جزء ممن يرد عليَّ الحوض". قال: قلنا: كم كنتم يومئذ؟ قال: سبعمائة أو ثمانمائة.

حسن: رواه أبو داود (4746) عن حفص بن عمر النّمريّ، حدّثنا شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي حمزة، عن زيد بن أرقم، فذكر مثله.

وإسناده حسن من أجل أبي حمزة، واسمه طلحة بن يزيد الأنصاريّ روى عنه عمرو بن مرة.

وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 394)، وروى له البخاريّ وصحّح بعض حديثه التّرمذيّ، والحاكم كما سيأتي، فمثله يحسّن حديثه.

وأمّا ما نقله الحافظ في"التهذيب" وفي"التقريب" بأنّ النّسائيّ وثّقه فالغالب على الظَّن أنه وهمٌ من الحافظ، لأنّه لا سلف له، وقد أورد المزّيّ في"تهذيبه" حديثًا عن النَّسائيّ ولم ينقل عنه توثيقه، فتنبّه.

وأمّا هذا الحديث فقد رواه كل من أحمد (19268، 19291)، وابن أبي عاصم في السنة (733)، والحاكم (1/ 77) كلّهم من حديث عمرو بن مرّة به، مثله.

قال الحاكم:"أبو حمزة الأنصاريّ هذا هو طلحة بن يزيد، قد احتجّ به البخاريّ، وقال أيضًا: على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، ولكنهما تركاه للخلاف الذي في متنه من العدد".

وأمّا ما رواه الترمذيّ (2444)، وابن ماجه (4303) من حديث العباس بن سالم الدّمشقيّ، قال: نُبْئتُ عن أبي سلَّام قال: بعث إليَّ عمر بنُ عبد العزيز، فأتيتُه على بريد، فلمّا قَدِمْتُ عليه، قال: لقد شققنا عليك يا أبا سلام! في مركبك؟ قال: أجل واللَّه يا أميرَ المؤمنين. قال: واللَّهِ ما أردت المشقَّةَ عليك، ولكنْ حديثٌ بلغني أنَّك تُحدِّثُ به، عن ثوبان مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الحوض، فأحببتُ أن تشافهني به. قال: فقلتُ: حدّثني ثوبانُ مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنَّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ حوضي ما بين عدن إلى أَيْلةَ، أشدُّ بياضًا من اللَّبن وأَحْلَى من العَسَل، أَكَاويبُهُ كعددِ نجوم السّماء، مَنْ شرب منه شَرْبةً لم يظمأ بعدها أبدًا، وأوَّلُ من يَرِدُه عليَّ فقراءُ المهاجرين الدُّنْسُ ثيابًا والشُّعْثُ رُووسًا، الذين لا ينكحون المنَعَّمات، ولا يُفتَح لهم السُّدَدُ". قال: فبكى عمر حتى اخضلَّتْ لحيتُه، ثم قال: لكنّي قد نكحتُ المنعَّمَاتِ وفُتِحتْ لي السُّدَد، لا جَرَمَ أَنِّي لا أَغْسِلُ ثوبي الذي على جسدي حتى يتَّسِخَ، ولا أَدْهُنُ رأسي حتى يَشْعَثَ". فيه انقطاع؛ لأنّ العباس بن سالم
لم يبيّن الواسطة بينه وبين أبي سلّام.

وقد رواه الإمام أحمد (22376)، والحاكم (4/ 184) وعنه البيهقيّ في"البعث" (135)، وتمّام في فوائده (1760) من هذا الوجه، وله أوجه أخرى كلّها ضعيفة.

ولذا قال الترمذيّ:"حديث غريب من هذا الوجه" أي ضعيف.

وقال:"وقد رُوي هذا الحديث عن معدان بن أبي طلحة، عن ثوبان، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم. وأبو سلّام الحبشيّ اسمه ممطور وهو شاميّ ثقة". انتهى:

قلت: حديث معدان بن أبي طلحة عن ثوبان، رواه مسلم كما مضى.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا: أَنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر:

"أنت صاحبي على الحوض، وصاحبي في الغار".

رواه الترمذيّ (3670) عن يوسف بن موسى القطّان البغداديّ، حدّثنا مالك بن إسماعيل، عن منصور بن أبي الأسود، حدّثني كثير أبو إسماعيل، عن جميع بن عُمير التّيميّ، عن ابن عمر، فذكره.

وكثير أبو إسماعيل ضعيف ضعّفه أبو حاتم، والنّسائيّ، والجوزجانيّ وغيرهم. ومع هذا ذكره ابنُ حبان في"الثقات" (9/ 30) وهو دليل على تساهله.

وشيخُه جُميع بن عُمير التّيميّ أبو الأسود الكوفيّ، قال فيه البخاريّ: في أحاديثه نظر، قال ابن عدي: هو كما قاله البخاريّ: في أحاديثه نظر، وعامة ما يرويه لا يتابعه عليه أحد. وقال ابن نمير: كان من أكذب الناس.

مع هذا فإنّ الترمذيّ هو الآخر مَنْ تساهل فقال:"حسن صحيح غريب".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد اللَّه بن عمر أيضًا قال: إنّه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"حوضي كما بين عدن وعمّان، أبردُ من الثّلج، وأحلى من العسل، وأطيب ريحًا من المسك، أكوابُه مثلُ نجوم السّماء، مَنْ شرب منه شَرْبةً لم يظمأ بعدها أبدًا، أوّل النّاس عليه وُرودًا صعاليكُ المهاجرين".

قال قائل: ومن هم يا رسول اللَّه؟ قال:"الشَّعَثَةُ رؤوسهم، الشّحبةُ وجوههم، الدَّنِسةُ ثيابُهم، لا يُفتح لهم السُّدَد، ولا يُنكحون المتنعمات، الذين يُعطُون كلّ الذي عليهم، ولا يأخذون الذي لهم".

رواه الإمام أحمد (6162) عن أبي المغيرة، حدثنا عمرو بن عمرو أبو عثمان الأحموسي حدّثني المخارق بن أبي المخارق، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.

والمخارق بن أبي المخارق لم يرو عنه إِلَّا عمرو بن أبي عمرو، ولذا قال الحسينيّ:"مجهول". وهو الصّواب.

وأمّا قول ابن حبان: واسم أبيه عبد اللَّه بن جابر الأحمسيّ إن شاء اللَّه يروي عن ابن عمر، وروى عنه عمرو بن عمرو الأحمسيّ"."الثقات" (5/ 444).
فهو وهم منه، فإنّ هذا رجل آخر وهو من رجال"التهذيب" متأخر عنه من رجال البخاريّ.

واغترّ به الحافظ الهيثميّ في"المجمع" (10/ 365 - 366) فقال:"رواه أحمد والطبراني من رواية عمرو بن عمرو الأحمسيّ، عن المخارق بن أبي المخارق، واسم أبيه عبد اللَّه بن جابر، وقد ذكرهما ابن حبان في"الثقات".

والحافظ ابن حجر أيضًا نقل قول ابن حبان في"التعجيل" (1016) ولم يعلق عليه بشيء.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أُبي بن كعب، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وأنا على الحوض. قيل: وما الحوض يا رسول اللَّه؟ قال: والذي نفسي بيده إنّ شرابه أبيض من اللَّبن، وأحلى من العسل، وأبيض من الثّلج، وأطيب ريحًا من المسك، وآنيته أكثر عددًا من النّجوم، لا يشرب منه إنسان فيظمأ أبدًا، ولا يُصْرَف عنه إنسان فيروَى أبدًا".

رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (717) عن عقبة بن مكرم الضّبيّ، ثنا يونس بن بكير، ثنا عبد الغفار بن القاسم، عن عدي بن ثابت، عن زر بن حبيش، عن أُبي بن كعب، فذكره.

وفيه عبد الغفار بن القاسم أبو مريم الأنصاريّ قال فيه أبو حاتم والنّسائيّ: متروك الحديث، وقال علي بن المديني: كان يضع الحديث. وقال أبو داود: وأنا أشهد أنّ أبا مريم كذّاب، لأني قد لقيته وسمعت منه، واسمه عبد الغفّار بن القاسم.

فمثله لا يستشهد بحديثه، كما أنه زاد في حديثه في آخره وهي قوله:"ولا يُصرفُ عنه إنسانٌ فيروى أبدًا. فإنّ هذه الزّيادة لم تثبت في الأحاديث الصّحيحة، وإن كان جاء في بعض الروايات الضعيفة، منها هذه:

وكذلك ما روي عن ابن مسعود مرفوعًا وفيه:"وإن حُرمه لم يُرْوَ بعده". وإسناده ضعيف. انظر تخريجه في"المقام المحمود".

وكذلك ما روي عن أنس، وفيه:"ومن لم يشربْ منه لم يُرْوَ أبدًا".

رواه البزّار، والطبرانيّ، ورواته ثقات غير المسعوديّ، قاله المنذريّ في الترغيب والترهيب (4/ 207). والمسعوديّ مختلط.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن جبير بن مطعم، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:

"ألستُ مولاكم؟ ألستُ خيركم؟". قالوا: بلى يا رسول اللَّه. قال:"فإنّي فرطٌ لكم على الحوض يوم القيامة، واللَّهُ سائلُكم عن اثنتين، عن القرآن وعن عترتي".

رواه ابن أبي عاصم في السنة من وجهين (1465، 740) كلاهما عن إبراهيم بن محمد بن ثابت، حدثنا عمرو بن أبي عمرو، عن المطلب، عن جبير بن مطعم، فذكر الحديث. واللّفظ للموضع الأوّل، وفي الموضع الثاني اختصره.

وفيه إبراهيم بن محمد بن ثابت الأنصاريّ ترجمه ابن عدي في"الكامل" (1/ 260 - 261).
وقال:"مدنيّ روى عنه عمرو بن أبي سلمة وغيره مناكير. وذكر من طريق عمرو بن أبي سلمة أربعة أحاديث، وليس منها هذا الحديث، وقال: ولإبراهيم بن محمد بن ثابت هذا غير ما ذكرته من الأحاديث، وأحاديثه صالحة محتملة، ولعله أُتي ممن قد روى عنه". انتهى.

ولكن علّته الإرسال، فإنّ المطّلب وهو ابن عبد اللَّه بن حنطب قال فيه أبو حاتم: عامة روايته مرسل، ولم يذكر أحدٌ أنّه سمع جبير بن مطعم. بل قال البخاريّ: لا أعرف للمطّلب بن حنطب عن أحدٍ من الصّحابة سماعا إلّا قوله: حدّثني من شهد خطبة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

فأخشى أن يكون هذا الحديث أيضًا مما أرسله المطلب بن حنطب؛ لأني لم أقف على طريقه.

وفي الباب أيضًا عن زيد بن ثابت مرفوعًا:"إنّي تاركٌ فيكم الخليفتين من بعدي، كتاب اللَّه وعترتي: أهل بيتيّ، وإنّهما لن يتفرّقا حتى يردا الحوض".

إسناده ضعيف. رواه أبو بكر بن أبي شيبة في المصنف (11/ 452)، وعنه ابن أبي عاصم في السنة (754)، كما رواه أيضًا الإمام أحمد (21578)، والطبرانيّ في الكبير (4921) كلّهم من طريق شريك، عن الرُّكين، عن القاسم بن حسان، عن زيد بن ثابت، فذكر مثله.

وشريك هو ابن عبد اللَّه النّخعيّ ضعيف لسوء حفظه. والقاسم بن حسان مجهول.

وعن أبي بكرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ليردنَّ على الحوض رجالٌ ممن صحبني ورآني حتى إذا رُفعوا إليَّ ورأيتهم اختُلجوا دونِي فلأقولنَّ: ربِّ أصحابي اصحابي. فيقال: إنّك لا تدري ما أحدثوا بعدك".

رواه الإمام أحمد (20494)، وابن أبي عاصم في السنة (765) كلاهما من حديث عفّان، حدثنا حمّاد بن سلمة، أخبرنا علي بن زيد، عن الحسن، عن أبي بكرة، فذكر الحديث، واللّفظ لأحمد وفيه علتان.

الأولى: الحسن وهو البصريّ مدلس ولم يصرِّح بالسّماع.

والثانية: علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف، إلا أنه توبع، فقد رواه ابن أبي عاصم في السنة (766) من وجه آخر عن سعيد، عن قتادة، عن حسن، عن أبي بكرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ليردنَّ أقوامٌ عليّ الحوض حتى إذا رفعوا رؤوسهم اختلجوا دوني".

وسعيد هو ابن بشير الأزدي ضعيف، وقتادة والحسن كلاهما مدلّسان، إنّ هذا الحديث مشهور عن سمرة بن جندب، وصوّبنا أنّه مرسل.

وفي الباب أيضًا عن عِرْباض بن سارية، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لتزدحمنَّ هذه الأمّة على الحوض ازدحام إبل وردت لخمس".

رواه الطبراني في الكبير (18/ 253) عن عمرو بن إسحاق بن إبراهيم، ثنا أبي ح.

وحدّثنا عبد الرحمن بن معاوية العتبي، ثنا إسحاق بن إبراهيم بن زبريق الحمصي، ثنا عمرو بن
الحارث، ثنا عبد اللَّه بن سالم، عن الزبيديّ، ثنا لقمان بن عامر، عن سويد بن جبلة، عن عرباض ابن سارية، فذكر الحديث.

قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 365): رواه الطبرانيّ بإسنادين وأحدهما حسن.

قلت: ليس كما قال إِلَّا أن يكون قد اغترّ بصنيع ابن حبان فإنه ذكر إسحاق بن إبراهيم بن زبريق الحمصيّ وهو: إسحاق بن إبراهيم بن العلاء بن زبريق الحمصيّ، وقد ينسب إلى جدّ أيه، أطلق عليه محمد بن عوف أنه كان يكذب، وقال النسائيّ: ليس بثقة.

وأمّا ابن حبان فذكره في الثقات (8/ 163) وهو الذي حمل الهيثميّ أن يحسّن إسناده.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن البراء بن عازب قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"حوضي ما بين أيلة إلى صنعاء، له ميزابان أحدهما من ذهب، والآخر من فضّة، آنيته عدد نجوم السّماء، أشدّ بياضًا من اللّبن، وأحلى من العسل، وريحُه أطيب من المسك. مَنْ شرب منه لم يظمأ أبدًا".

رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (3408) عن جعفر، حدّثنا سفيان بن وكيع بن الجرّاح، قال: حدّثنا أبو داود الحفريّ، قال: حدّثنا مطيع الغزَّال، عن الشّخّير، عن البراء بن عازب، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 367):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، وفيه سفيان بن وكيع، وهو ضعيف".

قلت: سفيان بن وكيع بن الجرّاح كان شيخًا فاضلًا، إِلَّا أنه ابْتُلي بورّاقه، فأدخل عليه ما ليس من حديثه، فنُصح فلم يقبل، فسقط حديثه.

وأبو داود الحفريّ هو: عمر بن سعد بن عبيد، والحفري -بفتح المهملة والفاء- نسبة إلى موضع بالكوفة، من رجال مسلم.

وفي الباب عن عمر بن الخطّاب إِلَّا أنه موقوف ضعيف، رواه ابن أبي عاصم في السنة (697) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا عبد اللَّه بن إدريس، عن أشعث، عن علي بن زيد، عن يوسف بن مهران، عن ابن عباس، قال: قال عمر بن الخطّاب: سيأتي قومٌ يكذبون بالقدر، ويكذبون بالحوض، ويكذبون بالشّفاعة، ويكذبون بقوم يخرجون من النّار.

وأشعث هو ابن بزار الهجيميّ البصريّ، قال ابن معين: ليس بشيء وتركهـ النّسائيّ. وقال البخاريّ: منكر الحديث. وذكره ابن حبان في المجروحين (105) وقال: يخالف الثقات في الأخبار، ويروي المنكر في الآثار حتى خرج عن حدّ الاحتجاج به، وترجمة العقيليّ في الضعفاء الكبير (1/ 32) إِلَّا أنّه توبع. فقد رواه الإمام أحمد (156) عن هُشيم، أخبرنا علي بن زيد، عن يوسف بن مهران، عن ابن عباس قال: خطب عمر بن الخطّاب -وقال هشيم مرة: خطبنا: - فحمد اللَّه وأثنى عليه، فذكر الرّجم، فقال: لا تُخْدَعُنَّ عنه، فإنّه حدٌّ من حدود اللَّه، ألا إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد رَجَم، ورجمنا بعده، ولولا أن يقول قائلون: زاد عمر في كتاب اللَّه عز وجل ما ليس
منه، لكتبْتُه في ناحية من المصحف، شهد عمر بن الخطاب -وقال هشيم مرة: وعبد الرحمن بن عوف وفلان وفلان- أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد رَجَم ورجَمْنا مِنْ بعدِه، ألا وإنّه سيكون مِنْ بعدكم قومٌ يكَذَّبون بالرَّجْم، وبالدّجّال، وبالشّفاعة، وبعذاب القبر، ويقوم يُخْرَجون من النّار بعد ما امْتَحَشُوا.

فانحصرتْ العلّةُ في علي بن زيد وهو ابن جدعان وهو ضعيف، ويوسف بن مهران لم يرو عنه إلّا علي بن زيد، وهو ليّن الحديث كما قال الحافظ في التقريب.

ولكن لبعض فقراته اسانيد صحيحة سأذكرها في مواضعها إن شاء اللَّه تعالى.




যায়িদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমরা এক স্থানে অবতরণ (বিশ্রাম) করলাম। তখন তিনি বললেন: "যারা আমার হাউযে (কাউসারে) আগমন করবে, তোমরা তাদের এক লক্ষ ভাগের এক অংশও নও।" তিনি বলেন: আমরা জিজ্ঞাসা করলাম: সেদিন আপনারা সংখ্যায় কতজন ছিলেন? তিনি বললেন: সাতশ' অথবা আটশ' জন।









আল-জামি` আল-কামিল (847)


847 - عن كعب بن عجرة، قال: خرج إلينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن تسعة، خمسة، وأربعة، أحد العددين من العرب، والآخر من العجم، فقال:"اسمعوا، هل سمعتم أنه سيكون بعدي أمراءُ، فمن دخل عليهم فصدّقهم بكذبهم، وأعانهم على ظلمهم فليس مني ولستُ منه، وليس بوارد عليّ الحوض، ومن لم يدخل عليهم ولم يُعنهم على ظلمهم ولم يصدقهم بكذبهم فهو مني وأنا منه، وهو واردٌ علي".

صحيح: رواه الترمذي (2259) عن هارون بن إسحاق الهمدانيّ، حدّثني محمد بن عبد الوهاب، عن مِسْعَر، عن أبي حصين، عن الشّعبيّ، عن عاصم العدويّ، عن كعب بن عُجرة، فذكره.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، وصحّحه ابنُ حبان (279)، والحاكم (1/ 79)، كلاهما من هذا الوجه.

قال الترمذيّ:"هذا حديث صحيح غريب، لا نعرفه من حديث مسعر إلّا من هذا الوجه. قال هارون: فحدّثني محمد بن عبد الوهاب، عن سفيان، عن أبي حصين، عن الشعبيّ، عن عاصم العدويّ، عن كعب بن عُجرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، نحوه. قال هارون: وحدّثني محمد، عن سفيان، عن زُبيد، عن إبراهيم -وليس بالنّخعيّ- عن كعب بن عجرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم نحو حديث مسعر".

قلت: وأما حديث سفيان فرواه النسائيّ (7/ 160)، والإمام أحمد (18126) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن سفيان، بإسناده نحوه.

وصحّحه ابن حبان (282، 283، 285)، والحاكم (1/ 79).

وللحديث طرق أخرى صحيحة، ومنها ما رواه ابن أبي شيبة في مصنفه (11/ 453) عن الفضل ابن دُكين، عن سفيان، بإسناده.




কাব ইবনে উজরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন, তখন আমরা নয়জন ছিলাম—পাঁচজন এবং চারজন। দুই দলের একটি ছিল আরবদের থেকে এবং অন্যটি ছিল অনারবদের থেকে। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা শোনো! তোমরা কি শুনেছ যে, আমার পরে কিছু শাসক আসবে? যে ব্যক্তি তাদের নিকট প্রবেশ করবে এবং তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে স্বীকার করবে, আর তাদের যুলুমের উপর তাদের সহযোগিতা করবে, সে আমার কেউ নয় এবং আমি তার কেউ নই, আর সে আমার নিকট হাউজে (কাওসারে) পৌঁছাবে না। আর যে ব্যক্তি তাদের নিকট প্রবেশ করবে না, তাদের যুলুমের উপর তাদের সহযোগিতা করবে না এবং তাদের মিথ্যাকে সত্য বলে স্বীকার করবে না, সে আমার লোক এবং আমি তার লোক, আর সে আমার নিকট (হাউজে কাওসারে) পৌঁছাবে।