আল-জামি` আল-কামিল
8541 - عن جابر في حديث طويل قال: سرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة بطن بُواط، وهو يطلب المجدي بن عمرو الجهنيّ، وكان الناضح يعقبه منا الخمسة والستة والسبعة، فدارتْ عقبة رجل من الأنصار على ناضح له، فأناخه، فركبه، ثمّ بعثه، فتلدّن عليه بعض التلدّن، فقال له: شأ لعنك الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من هذا اللاعن بعيره؟" قال: أنا يا رسول الله! قال:"انزل عنه، فلا تصحبنا بملعون، لا تدعوا على أنفسكم، ولا تدعوا على أولادكم، ولا تدعوأ على أموالكم، لا تُوافقوا من الله ساعة يُسأل فيها عطاء فيستجيب لكم"
صحيح: رواه مسلم في الزهد والرقاق (3009) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن يعقوب بن مجاهد أبي حزرة عن عباد بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বাতন বুওয়াত যুদ্ধে রওনা হলাম, যখন তিনি আল-মাজদি ইবনু আমর আল-জুহানিকে খুঁজছিলেন। আর আমাদের মধ্যে পাঁচ, ছয় বা সাতজন পালাক্রমে (আরোহণের জন্য) একটি উট ব্যবহার করত। এক আনসারী ব্যক্তির নিজের উটে চড়ার পালা এলে সে সেটিকে বসাল, তারপর তাতে আরোহণ করল, এরপর যখন সে সেটিকে হাঁকাতে শুরু করল, তখন উটটি কিছুটা আলস্য দেখাল। তখন লোকটি উটটিকে বলল: দূর হ! আল্লাহ তোমার ওপর অভিশাপ দিন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কে তার উটকে অভিশাপ দিল?" লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওটা থেকে নেমে পড়ো। অভিশাপপ্রাপ্ত উট নিয়ে আমাদের সঙ্গী হবে না। তোমরা নিজেদের বিরুদ্ধে বদদোয়া করো না, তোমাদের সন্তানদের বিরুদ্ধে বদদোয়া করো না এবং তোমাদের সম্পদের বিরুদ্ধে বদদোয়া করো না। কারণ, তোমরা আল্লাহর কাছে এমন কোনো সময়ের সম্মুখীন হয়ো না, যখন তাঁর কাছে কিছু চাওয়া হয় আর তিনি তা কবুল করে নেন।"
8542 - عن أبي إسحاق السبيعي قال: كنت إلى جنب زيد بن أرقم فقيل له: كم غزا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من غزوة؟ قال: تسع عشرة، قيل: كم غزوت أنت معه؟ قال: سبع عشرة،
قلت: فأيهم كانت أول؟ قال: العشير أو العُسيرة. فذكرت لقتادة فقال: العُشيرة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (3949) ومسلم في الجهاد والسير (143: 1254) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إسحاق (هو السبيعي) قال: كنت إلى جنب زيد بن أرقم، فذكر الحديث.
قوله:"فقيل له" القائل هو الراوي"أبو إسحاق السبيعي" كما جاء عند البخاريّ مصرحًا في موضع آخر (4471) بلفظ:"سألت زيد بن أرقم".
قوله:"فذكرت لقتادة" القائل هو شعبة.
وقول قتادة:"العشيرة" هو بالتصغير وبالمعجمة وبإثبات الهاء، ومنهم من حذفها، وقول قتادة هو الذي اتفق عليه أهل السير وهو الصواب.
قاله ابن حجر في الفتح (7/ 281).
و"العشيرة" كانت قرية عامرة بأسفل ينبع النخل، ثمّ صارت محطة للحاج المصري هناك، وهي أول قرى ينبع النخل مما يلي الساحل.
انظر: المعالم الأثيرة ص 192.
وقوله:"فأيهم كانت أول؟" أي غزوة أنت غزوت مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"العشيرة" لأنه سبق قبله غزوتان، وهما الأبواء وبواط. وهذا الترتيب هو الذي نقله البخاريّ عن ابن إسحاق يعني: الأبواء ثمّ بواط، ثمّ العشيرة.
انظر: فتح الباري (7/ 279 - 2
قال ابن إسحاق: وهي غزوة بدر الأولى.
انظر: الطبقات لابن سعد (2/ 9)، والسيرة لابن هشام (1/ 601).
وكرز أسلم فيما بعد، وحسُنَ إسلامه، وقتل يوم الفتح كما ذكر الحافظ ابن حجر في الإصابة.
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু ইসহাক আস-সাবীয়ী বলেন: আমি যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশে ছিলাম। তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কতটি যুদ্ধে (গাযওয়াহ) অংশ নিয়েছিলেন? তিনি বললেন: উনিশটি। জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি নিজে তাঁর সাথে কতটিতে অংশ নিয়েছিলেন? তিনি বললেন: সতেরোটি। আমি [আবু ইসহাক] জিজ্ঞাসা করলাম: সেগুলোর মধ্যে প্রথম কোনটি ছিল? তিনি বললেন: আল-উশাইর অথবা আল-উসাইরাহ। (পরে) আমি বিষয়টি কাতাদাহকে জানালাম, তখন তিনি বললেন: আল-উশাইরাহ।
8543 - عن جندب بن عبد الله، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه بعث رهطًا، وبعث عليهم أبا عبيدة بن الجراح أو عبيدة، فلمّا ذهب لينطلق بكى صبابة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلس، فبعث عليهم عبد الله بن جحش مكانه، وكتب له كتابًا، وأمره أن لا يقرأ الكتاب حتَّى يبلغ مكان كذا وكذا. وقال:"لا تكرهن أحدًا من أصحابك على المسير معك".
فلمّا قرأ الكتاب استرجع ثمّ قال: سمعًا وطاعة لله ولرسوله، فخبرهم الخبر، وقرأ عليهم الكتاب، فرجع رجلان، ومضى بقيتهم فلقوا ابن الحضرمي فقتلوه، ولم يدروا أن ذلك اليوم من رجب أو جمادى. فقال المشركون للمسلمين: قتلتم في الشهر الحرام؟ فأنزل الله عز وجل {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ} [البقرة: 217] الآية فقال بعضهم: إن لم يكونوا أصابوا وزرًا، فليس لهم أجر فأنزل الله عز وجل: {إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أُولَئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ اللَّهِ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [البقرة: 218].
حسن: رواه أبو يعلى (1534)، والطَّبرانيّ في الكبير (2/ 174)، والبيهقي (9/ 11 - 12) كلّهم من حديث معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن الحضرميّ، عن أبي السوار، عن جندب بن عبد الله، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحضرمي وهو ابن لاحق التميمي اليمامي القاص حسن الحديث.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 198)"رواه الطبرانيّ ورجاله ثقات" وفاته العزو إلى أبي يعلى. وللحديث أسانيد أخرى إِلَّا أنها مرسلة ذكر بعضها البيهقيّ في دلائله (3/ 17 - 20).
وقوله:"صبابة" أي شوقًا.
قال ابن سعد: كانت سرية عبد الله بن جحش الأسدي إلى نخلة في رجب على رأس سبعة عشر شهرًا من مهاجر رسول الله صلى الله عليه وسلم، بعثه في اثني عشر رجلًا من المهاجرين. كل اثنين يتعقبان بعيرًا إلى بطن نخلة، وهو بستان ابن عامر الذي قرب مكة. وأمره أن يرصد بها عير قريش. الطبقات (2/ 10) أي لم يأمرهم بالقتال.
وابن الحضرمي الذي قتلوه هو عمرو بن الحضرميّ، وإن قتله في الشهر الحرام أحدث فتنة بين المسلمين والمشركين فإن المشركين اتهموا المسلمين باستحلال الشهر الحرام فتوقف رسول الله صلى الله عليه وسلم عن قبول العير والأسيرين، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعبد الله بن جحش وأصحابه:"ما أمرتكم
بقتال في الشهر الحرام". فلمّا قال ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم سقط في أيدي القوم، وظنوا أنهم قد هلكوا، وعنفهم إخوانهم من المسلمين فيما صنعوا. وقالت قريش: قد استحل محمد وأصحابه الشهر الحرام. وسفكوا فيه الدماء وأخذوا فيه الأموال، وأسروا فيه الرجال، حتَّى أنزل الله على رسول الله صلى الله عليه وسلم: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ} [البقرة: 217].
فلمّا نزل القرآن بهذا من الأمر، وفرّج الله عن المسلمين ما كانوا فيه من الشفق قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم العير والأسيرين، وبعثت إليه قريش في فداء عثمان بن عبد الله والحكم بن كيسان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا نُفديكموهما حتَّى يقدم صاحبانا - يعني سعد بن أبي وقَّاص، وعُتبة بن غزوان - فإنّا نخشاكم عليهما، فإن تقتلوهما نقتل صاحبيكم". فقدم سعد وعتبة، فأفداهما رسول الله صلى الله عليه وسلم منهم.
فأما الحكم بن كيسان فأسلم فحسن إسلامه، وأقام عند رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى قُتل يوم بئر معونة شهيدًا، وأمّا عثمان بن عبد الله فلحق بمكة، فمات بها كافرًا.
ذكره ابن إسحاق. سيرة ابن هشام (1/ 602 - 605).
رُوي عن سعد بن أبي وقَّاص قال: لما قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة جاءته جهينة، فقالوا: إنك قد نزلت بين أظهرنا فأوثق لنا حتَّى نأتيك وتؤمنا، فأوثق لهم فأسلموا، قال: فبعثتا رسول الله صلى الله عليه وسلم في رجب، ولا نكون مائة، وأمرنا أن نغير على حي من بني كنانة إلى جنب جهينة، فأغرنا عليهم وكانوا كثيرًا، فلجأنا إلى جهينة فمنعونا، وقالوا: لم تقاتلون في الشهر الحرام؟ فقلنا: إنّما نقاتل من أخرجنا من البلد الحرام في الشهر الحرام، فقال بعضنا لبعض: ما ترون؟ فقال بعضنا: نأتي نبي الله صلى الله عليه وسلم فنخبره، وقال قوم: لا بل نقيم هاهنا، وقلت أنا في أناس معي: لا بل نأتي عير قريش فنقتطعها، فانطلقنا إلى العير وكان الفيء إذ ذاك: من أخذ شيئًا فهو له، فانطلقنا إلى العير وانطلق أصحابنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبروه الخبر، فقام غضبان محمر الوجه، فقال:"أذهبتم من عندي جميعًا وجئتم متفرقين؟ إنّما أهلك من كان قبلكم الفرقة، لأبعثن عليكم رجلًا ليس بخيركم، أصبركم على الجوع والعطش" فبعث علينا عبد الله بن جحش الأسدي فكان أول أمير أمر في الإسلام.
رواه ابن أبي شيبة (37806)، وعبد الله بن أحمد (1539) فيما وجده في كتاب أبيه بخط يده، وفيما زاده على أبيه، والبزّار (كشف الأستار 1757) كلّهم من طرق عن مجالد بن سعيد، عن زياد بن عِلاقة، عن سعد بن أبي وقَّاص فذكره.
واقتصر البزّار على الجزء الأخير من الحديث وهو قوله:"أول أمير عقد له …".
وإسناده ضعيف، مجالد بن سعيد ضعيف، وزياد بن عِلاقة لم يسمع من سعد بن أبي وقَّاص.
وفي السنة الثانية للهجرة في اليوم الثاني عشر من شهر رمضان خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم مع أصحابه يتعرض لقافلة تجارية قادمة من الشام يقودها أبو سفيان، ويقوم على حراستها أربعون رجلًا.
وكانت وقعة بدر يوم الجمعة صبيحة السابع عشر من رمضان.
জুনদুব ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি দল প্রেরণ করলেন এবং তাদের উপর আবূ উবায়দাহ ইবনু আল-জাররাহ অথবা উবায়দাহকে (নেতা) নিযুক্ত করলেন। যখন তিনি (আবূ উবায়দাহ) রওয়ানা হতে গেলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি গভীর ভালোবাসায় তিনি কেঁদে ফেললেন এবং বসে পড়লেন। অতঃপর তিনি তার স্থলে আব্দুল্লাহ ইবনু জাহশকে তাদের উপর নেতা নিযুক্ত করলেন এবং তার জন্য একটি চিঠি লিখে দিলেন। তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন অমুক অমুক স্থানে না পৌঁছা পর্যন্ত চিঠি না পড়ে। আর তিনি বললেন: "তোমার সঙ্গীদের মধ্যে কাউকে তোমার সাথে চলতে বাধ্য করবে না।"
যখন সে (আব্দুল্লাহ ইবনু জাহশ) চিঠিটি পড়ল, তখন ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিঊন পাঠ করল এবং বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি আমাদের পূর্ণ আনুগত্য। অতঃপর সে তাদের ঘটনাটি জানাল এবং তাদের কাছে চিঠিটি পড়ে শোনাল। ফলে দু'জন লোক ফিরে গেল এবং বাকিরা চলতে থাকল। তারা ইবনু হাযরামীর সাক্ষাৎ পেল এবং তাকে হত্যা করল। কিন্তু তারা বুঝতে পারল না যে, দিনটি রজব মাসের ছিল নাকি জুমাদা মাসের।
মুশরিকরা মুসলিমদের বলল: তোমরা কি সম্মানিত মাসে (হারাম মাসে) হত্যা করেছ? তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা তোমাকে সম্মানিত মাস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে, তাতে যুদ্ধ করা সম্পর্কে..." [সূরাহ আল-বাকারা: ২১৭] আয়াত পর্যন্ত।
তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলল: যদি তারা কোনো পাপ অর্জন না করে, তবে তাদের জন্য কোনো পুরস্কারও নেই। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "যারা ঈমান এনেছে এবং যারা হিজরত করেছে ও আল্লাহর পথে জিহাদ করেছে, তারাই আল্লাহর রহমতের আশা করে। আর আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" [সূরাহ আল-বাকারা: ২১৮]।
8544 - عن كعب بن مالك قال: لم أتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها إِلَّا في غزوة تبوك، غير أني تخلفت عن غزوة بدر، ولم يعاتَب أحد تخلّف عنها، إنّما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يريد عير قريش، حتَّى جمع الله بينهم وبين عدوّهم على غير ميعاد .. الحديث.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (3951) ومسلم في التوبة (53: 2769) كلاهما من طريق اللّيث (هو ابن سعد) عن عقيل (هو ابن خالد الأيلي) عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب أن عبد الله بن كعب قال: سمعتُ كعب بن مالك يقول: فذكره.
بدْر: بالفتح ثمّ السكون هي قرية مشهورة نسبت إلى بدر بن مخلد بن النضر بن كنانة كان نزلها. وقيل: هي اسم البئر التي كان بها، وهي الآن بلدة كبيرة عامرة، على بعد حوالي 150 كيلو متر من المدينة المنورة. المعالم الأثيرة ص 44.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে সমস্ত যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, আমি তাবুক যুদ্ধ ব্যতীত আর কোনো যুদ্ধ থেকে পিছনে ছিলাম না। অবশ্য আমি বদর যুদ্ধ থেকেও পিছনে ছিলাম। কিন্তু যারা ঐ যুদ্ধ থেকে পিছনে ছিল, তাদের কাউকে তিরস্কার করা হয়নি। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মূলত কুরাইশদের বাণিজ্য কাফেলার খোঁজে বের হয়েছিলেন। অবশেষে আল্লাহ তাআলা কোনো পূর্বনির্ধারিত সময় ছাড়াই তাদের ও তাদের শত্রুদের মধ্যে (যুদ্ধ) সংঘটিত করিয়ে দেন... হাদীস।
8545 - عن ابن عباس قال: سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بأبي سفيان بن حرب في أربعين راكبًا من قريش تجارًا قافلين من الشام، فيهم: مخرمة بن نوفل، وعمرو بن العاص، فندب رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين، وقال لهم:"هذا أبو سفيان قافلًا بتجارة قريش، فاخرجوا لها لعل الله ينفلكموها".
فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون، فخف معه رجال، وأبطأ آخرون وذلك إنّما كانت ندبة لمال يصيبونه، لا يظنون أن يلقوا حربًا.
فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم في ثلاثمائة راكب ونيف وأكثر أصحابه مشاة معهم ثمانون
بعيرًا وفرس، ويزعم بعض الناس أنه للمقداد، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وكان بينه وبين عليّ ومرثد بن أبي مرثد الغنوي بعير، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من نقب بني دينار من الحرة على العقيق، فذكر طرقه، حتَّى إذا كان بعرق الظبية لقي رجلًا من الأعراب، فسألوه عن الناس، فلم يجدوا عنه خبرًا، وكان أبو سفيان حين دنا من الحجاز يتحسس الأخبار، ويسأل عنها حتَّى أصاب خبرًا من بعض الركبان، فاستأجر ضمضم بن عمرو الغفاريّ، فبعثه إلى قريش يستنفرهم إلى أموالهم، ويخبرهم أن محمدًا قد عرض لها في أصحابه، فخرج ضمضم سريعًا حتَّى قدم على قريش بمكة، وقال: يا معشر قريش! اللطيمة قد عرض لها محمد في أصحابه - واللطيمة هي التجارة - الغوث! الغوث! وما أظن أن تدركوها، فقالت قريش: أيظن محمد وأصحابه أنها كائنة كعير ابن الحضرميّ، فخرجوا على الصعب والذلول، ولم يتخلف من أشرافها أحد إِلَّا أن أبا لهب قد تخلف، وبعث مكانه العاص بن هشام بن المغيرة، فخرجت قريش وهم تسعمائة وخمسون مقاتلا، ومعهم مائتا فرس يقودونها، وخرجوا معهم بالقيان يضربن الدف، ويتغنين بهجاء المسلمين.
حسن: رواه محمد بن إسحاق، عن محمد بن مسلم الزهري وعاصم بن عمر بن قتادة وعبد الله بن أبي بكر ويزيد بن رومان، عن عروة بن الزُّبير وغيرهم من علمائنا، عن ابن عباس، كل قد حَدَّثَنِي بعض هذا الحديث، فاجتمع حديثهم فيما سقت من حديث بدر. ابن هشام (1/ 606 - 607).
ورواه البيهقيّ في الدلائل (3/ 31 - 32) عن يونس بن بكير، عن ابن إسحاق بإسناده غير أنه لم يذكر ابن عباس في إسناده، واللّفظ له.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرَّح.
وفي الباب ما رُوي عن أبي أيوب الأنصاري يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن بالمدينة:"إنِّي أخبرت عن عير أبي سفيان أنها مقبلة فهل لكم أن نخرج قِبل هذا العير؟ لعل الله يُغنمناها" فقلنا: نعم فخرج وخرجنا، فلمّا سرنا يومًا أو يومين قال لنا:"ما ترون في قتال القوم، فإنهم قد أخبِروا بمخرجكم؟" فقلنا: والله، ما لنا طاقة بقتال العدو، ولكن أردنا العير ثمّ قال:"ما ترون في قتال القوم؟" فقلنا: مثل ذلك. فقال المقداد بن عمرو: إذًا لا نقول لك يا رسول الله كما قال قوم موسى لموسى: {فَاذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ} [المائدة: 24]، قال: فتمنينا معشر الأنصار لو أنا قلنا كما قال المقداد أحب إلينا من أن يكون لنا مال عظيم، فأنزل الله عز وجل على رسوله: {كَمَا أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ لَكَارِهُونَ (5) يُجَادِلُونَكَ فِي الْحَقِّ بَعْدَ مَا تَبَيَّنَ كَأَنَّمَا يُسَاقُونَ إِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُونَ} [الأنفال: 5، 6]، ثمّ أنزل الله عز وجل: {أَنِّي مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذِينَ آمَنُوا
سَأُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ فَاضْرِبُوا فَوْقَ الْأَعْنَاقِ وَاضْرِبُوا مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍ} [الأنفال: 12] وقال: {وَإِذْ يَعِدُكُمُ اللَّهُ إِحْدَى الطَّائِفَتَيْنِ أَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ أَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ} [الأنفال: 7] والشوكة: القوم، وغير ذات الشوكة العير، فلمّا وعدنا إحدى الطائفتين إما القوم وإما العير طابت أنفسنا.
ثمّ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث رجلًا لينظر ما قبل القوم. فقال: رأيت سوادًا ولا أدري. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هم هم هلموا أن نتعاد" ففعلنا فإذا نحن ثلاثمائة وثلاثة عشر رجلًا فأخبرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بعدتنا، فسره ذلك فحمد الله وقال:"عدة أصحاب طالوت" ثمّ إنا اجتمعنا مع القوم، فصففنا فبدرت منا بادرة أمام الصف، فنظر رسول الله صلى الله عليه وسلم إليهم فقال:"معي معي" ثمّ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اللهم إني أنشدك وعدك" فقال ابن رواحة: يا رسول الله! إنى أريد أن أشير عليك ورسول الله صلى الله عليه وسلم أفضل من يشير عليه إن الله عز وجل أعظم من أن تنشده وعده فقال:"يا ابن رواحة! لأنشدن الله وعده فإن الله لا يخلف الميعاد" فأخذ قبضة من التراب، فرمى بها رسول الله عز وجل في وجوه القوم، فانهزموا فأنزل الله عز وجل: {وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ رَمَى} [الأنفال: 17].
فقتلنا وأسرنا، فقال عمر رضي الله عنه: يا رسول الله! ما أرى أن يكون لك أسرى، فإنما نحن داعون مؤلفون فقلنا معشر الأنصار: إنّما يحمل عمر على ما قال حسدا لنا فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمّ استيقظ ثمّ قال:"ادعو لي عمر" فدعي له فقال:"إنَّ الله عز وجل قد أنزل عليّ {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ} [الأنفال: 67].
رواه الطبرانيّ في الكبير (4/ 208 - 210) عن بكر بن سهل، ثنا عبد الله بن يوسف، ثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أسلم أبي عمران، حدَّثه أنه سمع أبا أيوب الأنصاري يقول: فذكره.
وفيه ابن لهيعة سيء الحفظ. فقول الهيثميّ في"المجمع" (6/ 73 - 74): رواه الطبرانيّ وإسناده حسن" ليس بحسن من أجل ابن لهيعة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানতে পারলেন যে, আবু সুফিয়ান ইবনে হারব সিরিয়া থেকে প্রত্যাবর্তিত কুরাইশের চল্লিশ জন আরোহী বণিকের সাথে আছেন। তাদের মধ্যে মাখরামা ইবনে নাওফাল এবং আমর ইবনুল আসও ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের প্রতি আহ্বান জানালেন এবং বললেন: "এই হলো আবু সুফিয়ান কুরাইশের বাণিজ্য কাফেলা নিয়ে ফিরে আসছে। তোমরা এর সন্ধানে বের হও, সম্ভবত আল্লাহ তোমাদেরকে এর গনীমত দান করবেন।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুসলিমগণ বের হলেন। কিছু লোক তাঁর সাথে দ্রুত বের হলেন, আর কিছু লোক বিলম্ব করলেন। কারণ এটি ছিল শুধু সম্পদ লাভের একটি আহ্বান, তারা ভাবেননি যে কোনো যুদ্ধের সম্মুখীন হবেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন শতাধিক কিছু বেশি সংখ্যক আরোহী নিয়ে বের হলেন। তাঁর বেশিরভাগ সাহাবীই ছিলেন পদব্রজে। তাঁদের সাথে ছিল আশিটি উট ও একটি ঘোড়া—কেউ কেউ দাবি করেন যে সেটি মিকদাদের ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, তাঁর, আলী এবং মারসাদ ইবনে আবি মারসাদ আল-গানাওয়ীর মধ্যে একটি উট ছিল (তারা পালাক্রমে সেটির পিঠে আরোহণ করতেন)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাররা’র নাকব বনী দীনার হয়ে আকীক-এর দিক দিয়ে যাত্রা শুরু করলেন। এরপর তাঁর পথের বর্ণনা দেওয়া হলো। অবশেষে যখন তিনি আরকুজ জাবিয়াতে পৌঁছলেন, তখন তিনি একজন বেদুঈনের দেখা পেলেন। তারা তাকে লোকজনের অবস্থা জিজ্ঞেস করলেন, কিন্তু তার কাছ থেকে কোনো খবর পেলেন না। আবু সুফিয়ান যখন হিজাজের কাছাকাছি এলেন, তখন তিনি খবর সংগ্রহ করতে লাগলেন এবং লোকজনের কাছে জিজ্ঞেস করতে লাগলেন, অবশেষে তিনি কিছু আরোহীর কাছ থেকে একটি খবর পেলেন। তখন তিনি দমদম ইবনে আমর আল-গিফারীকে ভাড়া করলেন এবং তাকে কুরাইশদের কাছে পাঠালেন যাতে সে তাদের ধন-সম্পদ রক্ষার জন্য উদ্বুদ্ধ করে এবং তাদের জানায় যে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সঙ্গীদের নিয়ে বাণিজ্য কাফেলার উপর আক্রমণ করার জন্য এগিয়ে এসেছেন। দমদম দ্রুত মক্কার কুরাইশদের কাছে পৌঁছলেন এবং বললেন: "হে কুরাইশ সম্প্রদায়! এই হলো লাতিমা (বাণিজ্য কাফেলা)—মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সঙ্গীদের নিয়ে এর উপর আক্রমণ করতে এগিয়ে এসেছেন। বাঁচাও! বাঁচাও! আমার মনে হয় না তোমরা এটিকে ধরতে পারবে।" (লাতিমা হলো বাণিজ্য)। তখন কুরাইশরা বলল: "মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তার সঙ্গীরা কি মনে করে যে এটা ইবনুল হাদরামীর কাফেলার মতো হবে?" অতঃপর তারা কঠিন ও সহজ সকল পথেই যাত্রা শুরু করল। তাদের নেতাদের মধ্যে আবু লাহাব ছাড়া আর কেউই পিছিয়ে রইল না। আবু লাহাব তার পরিবর্তে আস ইবনে হিশাম ইবনে মুগীরাহকে পাঠাল। কুরাইশরা মোট নয়শত পঞ্চাশ জন যোদ্ধা এবং দুইশত অশ্বের লাগাম ধরে বের হলো। তারা তাদের সাথে গায়িকাদের নিয়ে এসেছিল, যারা দফ বাজাচ্ছিল এবং মুসলিমদের নিন্দা করে গান গাইছিল।
(এই প্রসঙ্গে) আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: আমরা মদীনায় থাকাকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাকে জানানো হয়েছে যে আবু সুফিয়ানের কাফেলা আসছে। তোমরা কি চাও যে আমরা এই কাফেলার দিকে যাত্রা করি? সম্ভবত আল্লাহ আমাদেরকে তা গনীমত হিসেবে দান করবেন।" আমরা বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি বের হলেন এবং আমরাও বের হলাম। যখন আমরা একদিন বা দু’দিন পথ চললাম, তখন তিনি আমাদের বললেন: "শত্রুদের সাথে যুদ্ধ করা সম্পর্কে তোমাদের কী ধারণা? কেননা তোমাদের বের হওয়ার খবর তারা জেনে গেছে।" আমরা বললাম: "আল্লাহর কসম, শত্রুদের সাথে যুদ্ধ করার মতো শক্তি আমাদের নেই। আমরা কেবল কাফেলাকে চেয়েছিলাম।" এরপর তিনি আবার বললেন: "শত্রুদের সাথে যুদ্ধ করা সম্পর্কে তোমাদের কী ধারণা?" আমরা অনুরূপ জবাব দিলাম।
তখন মিকদাদ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমরা আপনাকে এমন কথা বলব না যেমনটি মূসার (আঃ) কওম তাকে বলেছিল: {তুমি এবং তোমার রব যাও, যুদ্ধ করো; আমরা এখানে বসে থাকব} [আল-মায়িদাহ: ২৪]।" তিনি (আবু আইয়ুব) বলেন: আমরা আনসারগণ তখন কামনা করছিলাম, যদি আমরা মিকদাদের মতো কথা বলতাম, তবে তা আমাদের কাছে বিশাল সম্পদ লাভ করার চেয়েও অধিক প্রিয় হতো। অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাঁর রাসূলের উপর নাযিল করলেন: {যেমনভাবে তোমার রব তোমাকে ন্যায়সঙ্গতভাবে তোমার ঘর থেকে বের করেছেন, অথচ মুমিনদের একটি দল তা অপছন্দ করছিল। সত্য স্পষ্টভাবে প্রকাশিত হওয়ার পরও তারা তোমাকে বিতর্কে জড়ায়, যেন তাদেরকে মৃত্যুর দিকে হাঁকিয়ে নেওয়া হচ্ছে আর তারা তা দেখছে} [আনফাল: ৫-৬]। এরপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {নিশ্চয়ই আমি তোমাদের সাথে আছি। অতএব, তোমরা মুমিনদেরকে সুদৃঢ় রাখো। আমি কাফিরদের হৃদয়ে ভীতির সঞ্চার করব। সুতরাং তোমরা তাদের ঘাড়ের উপরে আঘাত হানো এবং তাদের প্রতিটি গ্রন্থিতে আঘাত করো} [আনফাল: ১২]। আর তিনি বললেন: {আর স্মরণ করো, যখন আল্লাহ তোমাদেরকে দু’টি দলের একটির ব্যাপারে প্রতিশ্রুতি দিচ্ছিলেন যে, সেটি তোমাদের হস্তগত হবে। অথচ তোমরা কামনা করছিলে যে, দুর্বল দলটি তোমাদের জন্য হোক} [আনফাল: ৭]। এখানে ‘শওকা’ অর্থ হলো—যোদ্ধা দল, আর ‘গাইরু জাতুশ শওকা’ (দুর্বল দল) হলো—বাণিজ্য কাফেলা। অতঃপর যখন আল্লাহ আমাদের দু’টি দলের (শত্রু দল অথবা কাফেলা) একটির প্রতিশ্রুতি দিলেন যে তা আমাদের জন্য, তখন আমাদের মন সন্তুষ্ট হলো।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে পাঠালেন যাতে সে শত্রুদলের অবস্থা দেখে আসে। সে ফিরে এসে বলল: "আমি একটি কালো বস্তু দেখেছি, কিন্তু নিশ্চিতভাবে কিছু বলতে পারছি না।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওরা ওরাই। এসো, আমরা আমাদের সংখ্যা গণনা করি।" আমরা তা করলাম, তখন দেখা গেল যে আমরা তিনশত তেরো জন পুরুষ। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমাদের সংখ্যা জানালাম, এতে তিনি আনন্দিত হলেন এবং আল্লাহর প্রশংসা করলেন আর বললেন: "এই সংখ্যা তালূতের সঙ্গীদের সংখ্যার সমান।" এরপর আমরা শত্রুদের সাথে মিলিত হলাম এবং কাতারবদ্ধ হলাম। আমাদের মধ্য থেকে একজন কাতার থেকে সামনে এগিয়ে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে তাকালেন এবং বললেন: "আমার সাথে, আমার সাথে (থাকো)।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে তোমার প্রতিশ্রুতির আবেদন জানাচ্ছি।" তখন ইবনে রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে পরামর্শ দিতে চাই। যদিও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যার উপর পরামর্শ দেওয়া হয় তার মধ্যে শ্রেষ্ঠ। নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আপনার কাছে তাঁর প্রতিশ্রুতির আবেদন জানানোর চেয়েও মহান।" তিনি বললেন: "হে ইবনে রাওয়াহা! আমি আল্লাহর কাছে তাঁর প্রতিশ্রুতির আবেদন জানাবোই। কারণ আল্লাহ প্রতিশ্রুতির খেলাফ করেন না।" অতঃপর তিনি এক মুঠো মাটি নিলেন এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা শত্রুদের মুখমণ্ডলে নিক্ষেপ করলেন। ফলে তারা পরাজিত হলো। অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {যখন তুমি নিক্ষেপ করেছিলে, তখন তুমি নিক্ষেপ করোনি; বরং আল্লাহই নিক্ষেপ করেছিলেন} [আনফাল: ১৭]।
অতঃপর আমরা হত্যা করলাম এবং বন্দী করলাম। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার মনে হয় না যে আপনার জন্য বন্দী রাখা উচিত হবে। কেননা আমরা তো কেবল আহ্বানকারী ও ঐক্য স্থাপনকারী মাত্র।" আমরা আনসারগণ বললাম: "উমর যা বলেছেন, তা কেবল আমাদের প্রতি হিংসার কারণেই বলেছেন।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমিয়ে পড়লেন। তারপর জাগ্রত হয়ে বললেন: "উমরকে আমার কাছে ডেকে আনো।" উমরকে ডেকে আনা হলে তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আমার উপর নাযিল করেছেন: {কোনো নবীর জন্য উচিত নয় যে, তার নিকট যুদ্ধবন্দী থাকবে, যতক্ষণ না সে জমিনে রক্তপাত (শত্রুকে দুর্বল) করে। তোমরা পার্থিব সামগ্রী কামনা করো, আর আল্লাহ চান আখিরাত। আর আল্লাহ মহা ক্ষমতাশালী, প্রজ্ঞাময়} [আনফাল: ৬৭]।
8546 - عن أنس قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بُسَيسةَ عينًا ينظر ما صنعتْ عير أبي سفيان. فجاء وما في البيت أحد غيري وغير رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فحدثه الحديث قال: فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم، فتكلم، فقال:"إنَّ لنا طَلِبة فمن كان ظهره حاضرًا فليركب معنا" فجعل رجال يستأذنونه في ظهرانهم في علو المدينة فقال:"لا، إِلَّا من كان ظهره حاضرًا".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1901) من طرق عن هاشم بن القاسم، حَدَّثَنَا سليمان (وهو ابن المغيرة) عن ثابت، عن أنس فذكره.
فلمّا علم أبو سفيان بخروج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه إليه أرسل ضمضم بن عمرو الغفاري إلى مكة يطلب من قريش نجدة.
وقصته في رؤيا عاتكة بنت عبد المطلب.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বুসাইসাহকে গোয়েন্দা হিসেবে পাঠিয়েছিলেন যেন সে দেখে আসে আবু সুফিয়ানের কাফেলা কী করেছে। অতঃপর সে (বুসাইসাহ) ফিরে এল। তখন ঘরে আমি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছাড়া অন্য কেউ ছিল না। সে ঘটনাটি তাঁকে জানাল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘর থেকে বের হলেন এবং কথা বললেন। তিনি বললেন: "আমাদের একটি প্রয়োজন রয়েছে। যার বাহন (আরোহণের পশু) প্রস্তুত আছে, সে যেন আমাদের সাথে আরোহণ করে।" তখন কিছু লোক মদীনার উঁচু এলাকায় অবস্থিত তাদের বাহনগুলো আনার জন্য তাঁর কাছে অনুমতি চাইতে শুরু করল। তিনি বললেন: "না, কেবল যার বাহন প্রস্তুত আছে (সে-ই যাবে)।"
8547 - عن ابن عباس وعروة بن الزُّبير قالا: وقد رأت عاتكة قبل قدوم ضمضم مكة بثلاث ليال رؤيا أفزعتها، فبعثت إلى أخيها العباس بن عبد المطلب، فقالت له: يا أخيّ، والله لقد رأيت الليلة رؤيا أفظعتني، وتخوفت أن يدخل على قومك منها شر ومصيبة، فاكتم عني ما أحدثك به، فقال لها: وما رأيت؟ قالت: رأيت راكبًا أقبل على بعير له، حتَّى وقف بالأبطح، ثمّ صرخ بأعلى صوته: ألا انفروا يا لغدر لمصارعكم في ثلاث، فأرى الناس اجتمعوا إليه، ثمّ دخل المسجد والناس يتبعونه، فبينما هم حوله مثل به بعيره على ظهر الكعبة، ثمّ صرخ بمثلها: ألا انفروا يا لغدر لمصارعكم في ثلاث: ثمّ مثل به بعيره على رأس أبي قبيس، فصرخ مثلها، ثمّ أخذ صخرة فأرسلها، فأقبلت تهوي، حتَّى إذا كانت بأسفل الجبل ارفضت، فما بقي بيت من بيوت مكة ولا دار إِلَّا دخلتها منها فلقة، قال العباس: والله! إن هذه لرؤيا، وأنت فاكتميها، ولا تذكريها لأحد.
ثمّ خرج العباس، فلقي الوليد بن عتبة بن ربيعة، وكان له صديقًا، فذكرها له، واستكتمه إياها، فذكرها الوليد لأبيه عتبة، ففشا الحديث بمكة، حتَّى تحدثت به قريش في أنديتها.
قال العباس: فغدوت لأطوف البيت وأبو جهل بن هشام في رهط من قريش قعود يتحدثون برؤيا عاتكة، فلمّا رآني أبو جهل قال: يا أبا الفضل! إذا فرغت من طوافك فأقبل إلينا، فلمّا فرغت أقبلت حتَّى جلست معهم، فقال لي أبو جهل: يا بني عبد المطلب! متى حدثت فيكم هذه النبية؟ قال: قلت: وما ذاك؟ قال: تلك الرؤيا التي رأت عاتكة، قال: فقلت: وما رأت؟ قال: يا بني عبد المطلب، أما رضيتم أن يتنبأ رجالكم حتَّى تتنبأ نساؤكم، قد زعمت عاتكة في رؤياها أنه قال: انفروا في ثلاث، فسنتربص بكم هذه الثلاث، فإن يك حقًّا ما تقول فسيكون، وإن تمض الثلاث ولم يكن من ذلك شيء، نكتب عليكم كتابًا أنكم أكذب أهل بيت في العرب، قال العباس: فوالله! ما كان مني إليه كبير، إِلَّا أني جحدت ذلك، وأنكرت أن تكون رأت شيئًا، قال: ثمّ تفرقنا.
فلمّا أمسيت، لم تبق امرأة من بني عبد المطلب إِلَّا أتتني، فقالت: أقررتم لهذا
الفاسق الخبيث أن يقع في رجالكم، ثمّ قد تناول النساءَ وأنت تسمع، ثمّ لم يكن عندك غير لشيء مما سمعت، قال: قلت: قد والله فعلت، ما كان مني إليه من كبير، وأيم الله لأتعرضن له، فإن عاد لأكفينكه.
قال: فغدوت في اليوم الثالث من رؤيا عاتكة، وأنا حديد مغضب أرى أني قد فاتني منه أمر أحب أن أدركه منه. قال: فدخلت المسجد فرأيته، فوالله إني لأمشي نحوه أتعرضه، ليعود بعض ما قال فأقع به، وكان رجلًا خفيفًا، حديد الوجه، حديد اللسان، حديد النظر، قال: إذ خرج نحو باب المسجد يشتد، قال: فقلت في نفسي: ما له لعنه الله! أكل هذا فرق مني أن أشاتمه! قال: وإذا هو قد سمع ما لم أسمع. صوت ضمضم بن عمرو الغفاريّ، وهو يصرخ ببطن الوادي واقفًا على بعيره، قد جَدّع بعيرَه، وحول رحله، وشق قميصه، وهو يقول: يا معشر قريش! اللطيمة، اللطيمة، أموالكم مع أبي سفيان قد عرض لها محمد في أصحابه، لا أرى أن تدركوها، الغوث الغوث، قال: فشغلني عنه وشغله عني ما جاء من الأمر.
فتجهز الناس سراعًا، وقالوا: أيظن محمد وأصحابه أن تكون كعير ابن الحضرميّ، كلا والله ليعلمن غير ذلك، فكانوا بين رجلين، إما خارج وإما باعث مكانه رجلًا، وأوعبت قريش، فلم يتخلف من أشرافها أحد. إِلَّا أن أبا لهب بن عبد المطلب تخلف، وبعث مكانه العاص بن هشام بن المغيرة وكان قد لاط له بأربعة آلاف درهم كانت له عليه، أفلس بها، فاستأجره بها على أن يجزي عنه، بعثه فخرج عنه، وتخلف أبو لهب.
قال ابن إسحاق: وحدثني عبد الله بن أبي نجيح: أن أمية بن خلف كان أجمع القعود، وكان شيخًا جليلًا جسيمًا ثقيلًا، فأتاه عقبة بن أبي معيط، وهو جالس في المسجد بين ظهراني قومه بمجمرة يحملها، فيها نار ومجمر، حتَّى وضعها بين يديه، ثمّ قال: يا أبا عليّ! استجمر، فإنما أنت من النساء، قال: قبحك الله وقبح ما جئت به، قال: ثمّ تجهز فخرج مع الناس.
حسن: رواه ابن إسحاق فقال: أخبرني من لا أتهم عن عكرمة، عن ابن عباس، ويزيد بن رومان، عن عروة بن الزُّبير قالا: فذكر القصة.
وفي الإسناد الموصول رجل لم يُسم.
وقد سماه الحاكم (3/ 19) فرواه من طريق يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي
حسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس، عن عكرمة، عن ابن عباس، وعروة بن الزُّبير قالا: فذكر القصة نحوه.
وحسين بن عبد الله الهاشمي المدني ضعيف عند جمهور أهل العلم إِلَّا أنه لم يتهم، ولذا قال ابن عدي: هو ممن يكتب حديثه.
وقد رواه أيضًا البيهقيّ في دلائله (3/ 103 - 104) عن موسى بن عقبة قال: قال ابن شهاب فذكر القصة.
ورواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 346 - 347) عن محمد بن عمرو بن الحمرانيّ، ثنا أبي، ثنا ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة قال: فذكر القصة.
فهذان المرسلان - أعني مرسل عروة بن الزُّبير، ومرسل ابن شهاب - مع اختلاف مخارجها يقويان الموصول.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (6/ 71) وقال: رواه الطبرانيّ مرسلًا، وفيه ابن لهيعة وفيه ضعف، وحديثه حسن".
ونحن نضعف حديث ابن لهيعة إذا لم يرو عنه أحد العبادلة أو قُتَيبة بن سعيد.
فخرجوا بخمسين وتسعمائة مقاتل، وساقوا مائة فرس، ولم يتركوا كارهًا للخروج يظنون أنه في صغْو محمد وأصحابه، ولا مسلمًا يعلمون إسلامه، ولا أحدًا من بني هاشم إِلَّا من لا يتهمون إِلَّا أشخصوه معهم، فكان ممن أشخصوا العباس بن عبد المطلب، ونوفل بن الحارث، وطالب بن أبي طالب، وعقيل بن أبي طالب في آخرين فساروا حتَّى نزلوا الجحفة. دلائل البيهقى (3/ 105).
وكان أبو سفيان اختار طريق الساحل غربًا حتَّى نجا من خطر المسلمين.
قال ابن إسحاق: ولما رأى أبو سفيان أنه قد أحرز عيره، أرسل إلى قريش: إنكم إنّما خرجتم لتمنعوا عيركم ورجالكم وأموالكم، فقد نجّاها الله، فارجعوا فقال أبو جهل بن هشام: والله لا نرجع حتَّى نرد بدرًا - وكان بدر موسمًا من مواسم العرب - يجتمع لهم به سوق كل عام - فنقيم عليه ثلاثًا، فننحر الجزر، ونطعم الطعام، ونُسقي الخمر، وتعزف علينا القيان، وتسمع بنا العرب وبمسيرنا وجمعنا، فلا يزالون يهابوننا أبدًا بعدها فامضوا.
سيرة ابن هشام (1/ 618 - 619)
والمراد بالطائفتين: إحداهما عير أبي سفيان، والأخرى جيش قريش.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উরওয়াহ ইবনে যুবাইর থেকে বর্ণিত, তারা উভয়েই বলেন:
ضمযম মক্কায় পৌঁছানোর তিন রাত আগে আতিকা একটি স্বপ্ন দেখেন, যা তাকে ভীত করে তুলেছিল। তিনি তার ভাই আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের কাছে লোক পাঠালেন এবং তাকে বললেন: ‘হে আমার ভাই! আল্লাহর কসম, গত রাতে আমি এমন একটি ভয়ংকর স্বপ্ন দেখেছি, যাতে আমি শঙ্কিত হয়েছি যে এর ফলে আপনার কওমের উপর কোনো মন্দ ও মুসিবত নেমে আসবে। আমি যা বলছি, তা আপনি আমার কাছে গোপন রাখবেন।’ আব্বাস তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কী দেখেছ?’
তিনি বললেন: ‘আমি দেখলাম, এক আরোহী তার উটের পিঠে চড়ে এলো এবং আবত্বাহ (মক্কার একটি স্থান) নামক স্থানে এসে দাঁড়ালো। অতঃপর সে উচ্চস্বরে চিৎকার করে বলল: ‘ওহে বিশ্বাসঘাতকরা! তোমরা তিন দিনের মধ্যে তোমাদের মৃত্যুকূপে বেরিয়ে পড়ো!’ আমি দেখলাম, লোকেরা তার কাছে সমবেত হলো। এরপর সে মাসজিদে প্রবেশ করল এবং লোকেরা তার অনুসরণ করতে লাগল। যখন তারা তার চারপাশে ছিল, তখন তার উটটি তাকে নিয়ে কা’বার ছাদে উঠে দাঁড়ালো। তারপর সে আবার একই রকম চিৎকার করল: ‘ওহে বিশ্বাসঘাতকরা! তোমরা তিন দিনের মধ্যে তোমাদের মৃত্যুকূপে বেরিয়ে পড়ো!’ এরপর তার উটটি তাকে নিয়ে আবূ কুবাইস পর্বতের চূড়ায় উঠল এবং সে একইভাবে চিৎকার করল। তারপর সে একটি পাথর নিয়ে ছেড়ে দিল। সেটি দ্রুত নিচে নেমে আসতে লাগল। যখন তা পাহাড়ের নিচে এলো, তখন তা চূর্ণ-বিচূর্ণ হয়ে গেল। মক্কার এমন কোনো ঘর বা বাড়ি বাকি রইল না, যার মধ্যে এর টুকরা প্রবেশ করেনি।’
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘আল্লাহর কসম! এটি অবশ্যই একটি বড় স্বপ্ন। তুমি এটিকে গোপন রাখো এবং কারো কাছে উল্লেখ করো না।’
অতঃপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং ওয়ালীদ ইবনে উতবাহ ইবনে রাবী’আর সাথে দেখা করলেন, যিনি ছিলেন তার বন্ধু। তিনি তার কাছে স্বপ্নের কথা বললেন এবং এটিকে গোপন রাখতে বললেন। কিন্তু ওয়ালীদ সেই কথা তার পিতা উতবার কাছে বললেন। ফলে মক্কার সর্বত্র সেই কথা ছড়িয়ে পড়ল, এমনকি কুরাইশরা তাদের মজলিসগুলোতে এই নিয়ে আলোচনা করতে লাগল।
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি কা’বা তাওয়াফ করার জন্য গেলাম। তখন আবূ জাহল ইবনে হিশাম কুরাইশের এক দলের সাথে বসে আতিকার স্বপ্ন নিয়ে কথা বলছিল। আবূ জাহল আমাকে দেখে বলল: ‘হে আবুল ফাযল! আপনার তাওয়াফ শেষ হলে আমাদের কাছে আসুন।’ আমি তাওয়াফ শেষ করে তাদের কাছে এসে বসলাম। আবূ জাহল আমাকে বলল: ‘হে আব্দুল মুত্তালিবের বংশধরেরা! তোমাদের মধ্যে এই নবুওয়াত কবে থেকে শুরু হলো?’ আমি বললাম: ‘কীসের কথা বলছ?’ সে বলল: ‘আতিকার দেখা সেই স্বপ্নটি।’ আমি বললাম: ‘সে কী দেখেছে?’ সে বলল: ‘হে আব্দুল মুত্তালিবের বংশধরেরা! তোমাদের পুরুষরা নবী হিসেবে দাবি করেছে, এতেও কি তোমরা সন্তুষ্ট হওনি যে এখন তোমাদের নারীরাও নবুওয়াতের দাবি করছে? আতিকা তার স্বপ্নে নাকি শুনেছে, (সেই লোকটি) বলেছে: ‘তিন দিনের মধ্যে বেরিয়ে পড়ো।’ আমরা তোমাদের জন্য এই তিনটি দিন অপেক্ষা করব। যদি সে যা বলেছে তা সত্য হয়, তবে তাই হবে। আর যদি তিন দিন পার হয়ে যায় এবং এমন কিছু না ঘটে, তবে আমরা তোমাদের বিরুদ্ধে একটি চুক্তিপত্র লিখব যে তোমরা আরবের সবচেয়ে মিথ্যাবাদী পরিবার।’ আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! আমার পক্ষ থেকে তার প্রতি তেমন কোনো কড়া উত্তর ছিল না, শুধু আমি এটিকে অস্বীকার করলাম এবং বললাম যে আতিকা কিছুই দেখেনি। তিনি বলেন: এরপর আমরা আলাদা হয়ে গেলাম।
যখন সন্ধ্যা হলো, আব্দুল মুত্তালিব বংশের এমন কোনো নারী রইল না, যে আমার কাছে আসেনি। তারা বলল: ‘আপনারা কি এই ফাসিক, দুষ্ট লোককে আপনাদের পুরুষদের নিয়ে বাজে কথা বলার সুযোগ দিয়েছেন? তারপর সে নারীদের নিয়ে কথা বলল, আর আপনি শুনলেন? আপনার কাছে যা শোনা গেল তার কোনো প্রতিবাদ করলেন না?’ আমি বললাম: ‘আল্লাহর কসম, আমি তা-ই করেছি। তার প্রতি আমার বড় কোনো প্রতিক্রিয়া ছিল না। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তার মোকাবিলা করব। যদি সে আবার এমন কিছু করে, তবে আমি তাকে উচিত শিক্ষা দেব।’
আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আতিকার স্বপ্নের তৃতীয় দিন সকালে আমি গেলাম। আমি রাগান্বিত ছিলাম এবং মনস্থির করলাম যে আমি তার কাছে যা বলার সুযোগ হারিয়েছি, তা তার সাথে মোকাবিলা করে পূরণ করব। তিনি বলেন: আমি মাসজিদে প্রবেশ করে তাকে (আবূ জাহলকে) দেখলাম। আল্লাহর কসম! আমি তার দিকে যাচ্ছিলাম এবং তার কাছাকাছি যাচ্ছিলাম যাতে সে তার কোনো কথা পুনরায় বললে আমি তার সাথে ঝগড়া করতে পারি। আবূ জাহল ছিল ক্ষিপ্র, তীক্ষ্ণ চেহারার, বাগ্মী ও তীক্ষ্ণ দৃষ্টির অধিকারী এক ব্যক্তি। তিনি (আব্বাস) বলেন: হঠাৎ সে মাসজিদের দরজার দিকে দ্রুত বেগে বেরিয়ে গেল। আমি মনে মনে বললাম: ‘আল্লাহর লা’নত হোক তার উপর! এ কি আমাকে গালি দেওয়ার ভয়ে এত দ্রুত পালিয়ে যাচ্ছে?’ আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আসলে সে এমন আওয়াজ শুনতে পেয়েছিল যা আমি শুনতে পাইনি। সেটা ছিল যমযম ইবনে আমর আল-গিফারীর চিৎকার। সে উপত্যকার মাঝে দাঁড়িয়ে তার উটের উপর থেকে চিৎকার করছিল। সে তার উটের নাক ও কান কেটে ফেলেছিল, তার হাওদা উল্টে দিয়েছিল এবং নিজের জামা ছিঁড়ে ফেলেছিল। সে বলছিল: ‘হে কুরাইশ সম্প্রদায়! আল-লাতীমাহ! আল-লাতীমাহ! (ব্যবসায়িক কাফেলা)! তোমাদের ধন-সম্পদ আবূ সুফিয়ানের সাথে আছে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সঙ্গীদের নিয়ে সেটিকে বাধাগ্রস্ত করতে আসছে! আমি মনে করি না তোমরা সেটিকে পাবে। সাহায্য করো! সাহায্য করো!’ আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এই ঘটনা আমাকে তার (আবূ জাহলের) কাছ থেকে ব্যস্ত করে দিল এবং এই জরুরি বিষয়টি তাকেও আমার কাছ থেকে ব্যস্ত করে তুলল।
অতঃপর লোকেরা দ্রুত প্রস্তুত হতে শুরু করল এবং বলল: ‘মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তার সঙ্গীরা কি মনে করে যে এটি ইবনুল হাযরামীর কাফেলার মতো হবে? কক্ষনো না! আল্লাহর কসম, তারা অন্য কিছু জানতে পারবে!’ তারা দু’ধরনের ছিল: হয় তারা নিজেরাই যুদ্ধযাত্রায় বের হচ্ছিল, নতুবা নিজেদের পরিবর্তে অন্য কাউকে পাঠাচ্ছিল। কুরাইশের সবাই ব্যাপক প্রস্তুতি নিল এবং তাদের নেতৃস্থানীয়দের কেউ অনুপস্থিত থাকল না, শুধু আবূ লাহাব ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ছাড়া। আবূ লাহাব নিজে না গিয়ে তার পরিবর্তে আল-আস ইবনে হিশাম ইবনে আল-মুগীরাকে পাঠালো। আল-আস আবূ লাহাবের কাছে চার হাজার দিরহামের ঋণে আবদ্ধ ছিল এবং দেউলিয়া হয়ে গিয়েছিল। আবূ লাহাব তাকে এই শর্তে ভাড়া করল যে সে আবূ লাহাবের পক্ষ থেকে যুদ্ধ করবে। সে তাকে পাঠাল এবং আল-আস তার পক্ষে যুদ্ধে গেল, আর আবূ লাহাব মক্কায় রয়ে গেল।
ইবনে ইসহাক বলেন: আমার কাছে আব্দুল্লাহ ইবনে আবী নাজীহ বর্ণনা করেছেন যে, উমাইয়াহ ইবনে খালাফ যুদ্ধ থেকে বিরত থাকার সিদ্ধান্ত নিয়েছিল। সে ছিল একজন সম্মানিত, বিশালদেহী ও ভারিক্কি বৃদ্ধ। উকবাহ ইবনে আবী মু’আইত তার কাছে এলো, যখন সে তার কওমের মাঝে মাসজিদে বসে ছিল। উকবাহ একটি ধূপদানী বহন করছিল, যার মধ্যে আগুন ও ধূপ ছিল। সে সেটি উমাইয়াহর সামনে রাখল এবং বলল: ‘হে আবূ আলী! ধূপ গ্রহণ করুন। আপনি তো নারীদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে গেছেন।’ উমাইয়াহ বলল: ‘আল্লাহ তোমাকে এবং যা এনেছ তাকে ধ্বংস করুন!’ এরপর সে প্রস্তুত হলো এবং লোকদের সাথে বেরিয়ে গেল।
অতঃপর তারা নয়শ’ পঞ্চাশজন যোদ্ধা এবং একশ’টি ঘোড়া নিয়ে বের হলো। তারা এমন কোনো ব্যক্তিকে মক্কায় থাকতে দিল না, যারা যুদ্ধে যেতে অনিচ্ছুক ছিল এবং যাদের ব্যাপারে তাদের ধারণা ছিল যে তারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সঙ্গীদের প্রতি সহানুভূতিশীল। এমনকি তারা যাদের ইসলাম সম্পর্কে জানত, এমন কোনো মুসলিমকেও ছাড়েনি। তারা বনূ হাশিমের এমন কাউকেও ছাড়েনি, যাদেরকে তারা সন্দেহ করত না—তাদের সবাইকে বাধ্য করে নিজেদের সাথে নিয়ে গেল। যাদেরকে জোর করে নিয়ে যাওয়া হয়েছিল তাদের মধ্যে ছিলেন আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব, নওফাল ইবনুল হারিস, তালিব ইবনে আবী তালিব এবং আকীল ইবনে আবী তালিবসহ আরও অনেকে। তারা চলতে চলতে জুহফায় গিয়ে পৌঁছাল। (দালায়েলুল বায়হাকী ৩/১০৫)।
আবূ সুফিয়ান পশ্চিম দিকে সমুদ্র উপকূলের পথ বেছে নিয়েছিলেন, যাতে মুসলিমদের বিপদ থেকে রক্ষা পেতে পারেন। ইবনে ইসহাক বলেন: আবূ সুফিয়ান যখন দেখলেন যে তিনি তার কাফেলাকে নিরাপদে নিয়ে এসেছেন, তখন তিনি কুরাইশদের কাছে লোক মারফত বার্তা পাঠালেন: ‘তোমরা বেরিয়ে এসেছিলে তোমাদের কাফেলা, তোমাদের পুরুষ ও তোমাদের ধন-সম্পদ রক্ষা করার জন্য। আল্লাহ সেগুলোকে রক্ষা করেছেন। অতএব, তোমরা ফিরে যাও।’
কিন্তু আবূ জাহল ইবনে হিশাম বলল: ‘আল্লাহর কসম, আমরা বদরে না গিয়ে ফিরব না।’—বদর ছিল আরবদের একটি বার্ষিক মেলা এবং বাজারের স্থান—‘আমরা সেখানে তিন দিন অবস্থান করব, উট যবেহ করব, লোকজনকে খাওয়াব, মদ পান করাব এবং গায়িকারা আমাদের সামনে গান গাইবে। আরবেরা আমাদের যাত্রা এবং আমাদের জমায়েত সম্পর্কে শুনবে, ফলে এরপর তারা সর্বদা আমাদের ভয় করবে। সুতরাং, তোমরা এগিয়ে চলো।’ (সীরাতে ইবনে হিশাম ১/৬১৮-৬১৯)
আর ‘দুই দলের’ উদ্দেশ্য হলো: একটি হলো আবূ সুফিয়ানের কাফেলা এবং অপরটি হলো কুরাইশদের সেনাবাহিনী।
8548 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم شاور حين بلغه إقبال أبي سفيان قال: فتكلم أبو بكر، فأعرض عنه، ثمّ تكلم عمر، فأعرض عنه، فقام سعد بن عبادة فقال: إيانا تريد؟ يا رسول الله! والذي نفسي بيده! لو أمرتنا أن نُخيضها البحر لأخضناها، ولو أمرتنا أن نضرب أكبادها إلى برك الغماد لفعلنا، قال: فندب رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس، فانطلقوا حتَّى نزلوا بدرًا، ووردت عليهم روايا قريش، وفيهم غلام أسود لبني الحجاج فأخذوه، فكان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يسألونه عن أبي سفيان وأصحابه؟ فيقول: ما لي علم بأبي سفيان، ولكن هذا أبو جهل وعتبة وشيبة وأمية بن خلف، فإذا قال ذلك، ضربوه، فقال: نعم، أنا أخبركم، هذا أبو سفيان، فإذا تركوه، فسألوه فقال: ما لي بأبي سفيان علم، ولكن هذا أبو جهل وعتبة وشيبة وأمية بن خلف في الناس، فإذا قال هذا أيضًا ضربوه، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم يصلي، فلمّا رأى ذلك انصرف، قال:"والذي نفسي بيده! لتضربوه إذا صدقكم وتتركوه إذا كذبكم".
قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا مصرع فلان" قال: ويضع يده على الأرض، ههنا وههنا. قال: فما ماط أحدهم عن موضع يد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1779: 83) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عفّان، حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
قوله:"راويا قريش" أي إبلهم التي كانوا يستقون عليها.
قوله:"فما ماط أحدهم" أي تباعد.
وذكر ابن إسحاق: أن الذي قال ذلك هو سعد بن معاذ ونقل مقالته وهي قوله:"فقد آمنا بك وصدقناك، وشهدنا أن ما جئت به هو الحق، وأعطيناك على ذلك عهودنا ومواثيقنا، على السمع والطاعة، فامض يا رسول الله لما أردت فنحن معك، فوالذي بعثك بالحق لو استعرضت بنا هذا البحر فخضته لخضناه معك، ما تخلف منا رجل واحد، وما نكره أن تلقى بنا عدونا غدًا. إنا لصُبْر في الحرب، صُدْق في اللقاء، لعل الله يريك منا ما تقر به عينك، فسر بنا على بركة الله".
فَسُرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بقول سعد، ونشّطه ذلك ثمّ قال:"سيروا وأبشروا، فإن الله تعالى قد وعدني بإحدى الطائفتين، والله كأني الآن أنظر إلى مصارع القوم". السيرة لابن هشام (1/ 615)
وسعد بن معاذ هو الأشهلي الأنصاري سيد الأوس شهد بدرًا بدون خلاف.
وأمّا سعد بن عبادة فهو الأنصاري الخزرجي أحد النقباء اختلف في شهوده بدرًا. فأثبت مسلم، والبخاري في التاريخ الكبير وكذلك ذكره الواقدي والمدائني وابن الكلبي وأبو أحمد الحافظ في
كتابه الكنى. ولم يذكره ابن عقبة ولا ابن إسحاق. انظر"الاستيعاب".
قلت: إن ثبت شهود سعد بن عبادة بدرًا فلعل القائل هو سعد بن معاذ، ثمّ تلاه سعد بن عبادة، لأن كلا منهما من رؤساء الأنصار.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন আবূ সুফিয়ানের আগমনের খবর পেলেন, তখন পরামর্শ চাইলেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন, কিন্তু তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন, কিন্তু তিনি তাঁর দিক থেকেও মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তখন সা‘দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি আমাদের উদ্দেশ্যেই বলছেন? ঐ সত্তার শপথ, যার হাতে আমার প্রাণ! আপনি যদি আমাদের সমুদ্রে ঝাঁপ দিতে আদেশ করেন, তবে আমরা ঝাঁপ দেব। আর যদি আপনি আমাদেরকে ‘বিরকে আল-গিমাদ’ পর্যন্ত দ্রুতগতিতে আরোহণের নির্দেশ দেন, তবে আমরা তা-ও করব।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম লোকজনকে (যুদ্ধের জন্য) আহ্বান করলেন। অতঃপর তারা রওয়ানা হয়ে বদরে গিয়ে অবতরণ করলেন। এ সময় তাদের সামনে কুরাইশদের পানির বাহক উট এসে পড়ল, আর তাতে বানী হাজ্জাজের এক কালো গোলাম ছিল। তারা তাকে ধরে ফেলল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীগণ তাকে আবূ সুফিয়ান ও তার সাথীদের সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছিলেন। সে বলছিল: আবূ সুফিয়ান সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞান নেই, তবে এই যে আবূ জাহল, উতবাহ, শায়বাহ এবং উমাইয়্যাহ ইবনু খালাফ। যখনই সে এই কথা বলত, তখনই তারা তাকে মারধর করতেন। তখন সে বলত: হ্যাঁ, আমি তোমাদের খবর দিচ্ছি, এই যে আবূ সুফিয়ান। এরপর যখন তারা তাকে ছেড়ে দিয়ে আবার জিজ্ঞেস করতেন, সে বলত: আবূ সুফিয়ান সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞান নেই, তবে এই যে আবূ জাহল, উতবাহ, শায়বাহ এবং উমাইয়্যাহ ইবনু খালাফ লোকজনের মাঝে আছে। যখন সে এই কথা বলত, তখনও তারা তাকে মারধর করতেন।
এদিকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন। যখন তিনি তা দেখলেন, তখন ফিরে আসলেন এবং বললেন: "ঐ সত্তার শপথ, যার হাতে আমার প্রাণ! সে যখন তোমাদের সত্য কথা বলছে, তখন তোমরা তাকে মারছো, আর যখন মিথ্যা কথা বলছে, তখন তোমরা তাকে ছেড়ে দিচ্ছো!"
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "এটা হলো অমুকের নিহত হওয়ার স্থান।" তিনি এই বলে মাটিতে এইখানে এবং এইখানে তাঁর হাত রাখলেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর হাতের স্থান থেকে তাদের কেউই সামান্যও সরে যায়নি (অর্থাৎ তিনি যেখানে স্থান চিহ্নিত করেছিলেন, সেখানেই তারা নিহত হয়েছিল)।
8549 - عن أنس قال: لما سار رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى بدر خرج، فاستشار الناس، فأشار عليه أبو بكر، ثمّ استشارهم فأشار عليه عمر، فسكت، فقال رجل من الأنصار: إنّما يريدكم، فقالوا: يا رسول الله! والله لا نكون كما قالت بنو إسرائيل لموسى: {فَاذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ} [المائدة: 24] ولكن والله لو ضربت أكبادها حتَّى تبلغ برك الغماد لكنا معك.
صحيح: رواه أحمد (12022)، وأبو يعلى (3803) وعنه ابن حبَّان (4721) كلاهما من طرق عن حميد الطّويل، عن أنس فذكره.
وقوله:"أكبادها": أي أكباد الإبل.
وقوله:"الغِماد": بضم الغين وكسرها، بلد في أقصى اليمن، وقيل غير ذلك.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের দিকে যাত্রা শুরু করলেন, তিনি বের হলেন এবং মানুষের সাথে পরামর্শ করলেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে পরামর্শ দিলেন। এরপর তিনি আবার পরামর্শ চাইলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে পরামর্শ দিলেন। অতঃপর তিনি নীরব রইলেন। তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: তিনি তো কেবল তোমাদের (কথা) শুনতে চাচ্ছেন। তখন তাঁরা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! আমরা সেই রকম হব না, যেমন বনী ইসরাঈল মূসা (আঃ)-কে বলেছিল: "সুতরাং আপনি ও আপনার রব যান এবং যুদ্ধ করুন, আমরা এখানেই বসে থাকব।" (সূরা আল-মায়িদাহ: ২৪) কিন্তু আল্লাহর শপথ! আপনি যদি (বাহনগুলোর) পিঠে আঘাত করে বারক আল-গিমাদ পর্যন্তও পৌঁছান, তবুও আমরা আপনার সাথে থাকব।
8550 - عن ابن مسعود قال: شهدت من المقداد بن الأسود مشهدًا لأن أكون صاحبه أحبّ إلي ممّا عدل به: أتى النَّبِي صلى الله عليه وسلم وهو يدعو على المشركين فقال: لا نقول كما قال قوم موسى: {فَاذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا} [المائدة: 24]، ولكنا نقاتل عن يمينك وعن شمالك وبين يديك وخلفك، فرأيت النَّبِي صلى الله عليه وسلم أشرق وجهه وسرّه، يعني قوله.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (3952) عن أبي نعيم (الفضل بن دكين) حَدَّثَنَا إسرائيل (هو ابن يونس) عن مُخارق (هو ابن عبد الله بن جابر البجلي) عن طارق بن شهاب قال: سمعت ابن مسعود يقول: فذكره.
وفي الباب ما رُوي عن محمد بن عمرو الليثي، عن أبيه، عن جده قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى بدر حتَّى إذا كان بالروحاء خطب الناس فقال:"كيف ترون؟" قال أبو بكر: يا رسول الله بلغنا أنهم بكذا وكذا، قال: ثمّ خطب الناس فقال:"كيف ترون؟" فقال عمر مثل قول أبي بكر.
ثمّ خطب فقال:"كيف ترون؟" فقال سعد بن معاذ: إيانا تريد؟ فوالذي أكرمك وأنزل عليك الكتاب، ما سلكتها قطّ ولا لي بها علم، ولئن سرت حتَّى تأتي برك الغماد من ذي يمن لنسيرن معك، ولا نكون كالذين قالوا لموسى من بني إسرائيل: {فَاذْهَبْ أَنْتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ} [المائدة: 24] ولكن اذهب أنت وربك فقاتلا إنا معكم متبعون، ولعلك أن تكون خرجت لأمر وأحدث الله إليك غيره، فانظر الذي أحدث الله إليك فامض له، فصِل حبالَ من شئت، واقطع حبال من شئت، وسالم من شئت، وعادِ من شئت، وخذ من أموالنا ما شئت.
فنزل القرآن على قول سعد: {كَمَا أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ لَكَارِهُونَ} [سورة الأنفال: 5] إلى قوله: {وَيَقْطَعَ دَابِرَ الْكَافِرِينَ} [سورة الأنفال: 7]، وإنما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يريد غنيمة ما مع أبي سفيان، فأحدث الله لنبيه القتال.
رواه ابن أبي شيبة (37815) عن عبد الرحيم بن سليمان، عن محمد بن عمرو الليثي، عن أبيه، عن جده فذكره.
وذكر ابن كثير في البداية والنهاية (5/ 73 - 74) أن ابن مردويه رواه أيضًا في تفسيره من طريق محمد بن عمرو بن علقمة بن وقَّاص الليثي، عن أبيه، عن جده.
وفيه علتان:
الأوّلى: عمرو بن علقمة بن وقَّاص الليثي لم يوثّقه أحد غير أن ابن حبَّان ذكره في"الثّقات" على قاعدته في توثيق المجاهيل. ولذا قال ابن حجر في"التقريب""مقبول" أي عند المتابعة. ولم أجد له متابعة فهو لين الحديث.
والثانية: علقمة بن وقَّاص تابعي ثقة، لم تتت صحبته ففيه إرسال.
ويستفاد من هذا الحديث أن تشاور النَّبِي صلى الله عليه وسلم كان في الروحاء، وهي على مسافة أربعة وسبعين كيلا من المدينة.
ويستفاد من أحاديث هذا الباب أن النَّبِي صلى الله عليه وسلم استشار مرتين:
الأوّلى: بالمدينة حيث بلغه خبر عير أبي سفيان كما في رواية مسلم:"أن النَّبِي صلى الله عليه وسلم شاور حين بلغه إقبال أبي سفيان".
والثانية: عندما وصل إلى الروحاء، وأتاه الخبر عن قريش بمسيرهم ليمنعوا عيرهم، وهم أكثر من ألف، فلو رجع النَّبِي صلى الله عليه وسلم من الروحاء إلى المدينة، فما كان يبعد من قريش أن يغزو المدينة ويتعاون معهم اليهود.
فمضى النَّبِي صلى الله عليه وسلم بعد استشارة أصحابه إلى بدر ليصدهم عن غزو المدينة.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি দৃশ্য প্রত্যক্ষ করেছি, যার সাথী হওয়া আমার কাছে এমন সকল বস্তু থেকে অধিক প্রিয় ছিল যার বিনিময়ে তা অর্জন করা যায়। তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যখন তিনি মুশরিকদের বিরুদ্ধে বদদোয়া করছিলেন (অথবা যুদ্ধের জন্য প্রস্তুতি নিচ্ছিলেন)। তখন তিনি বললেন: আমরা সেই লোকদের মতো বলব না, যারা মূসা (আঃ)-এর সম্প্রদায় বলেছিল: "তুমি ও তোমার রব যাও এবং যুদ্ধ কর।" [সূরা আল-মায়েদা: ২৪] বরং আমরা আপনার ডান দিকে, বাম দিকে, সামনে এবং পিছনে থেকে যুদ্ধ করব। আমি দেখলাম যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখমণ্ডল উজ্জ্বল হয়ে গেল এবং তাঁর কথা (মিকদাদের বক্তব্য) তাঁকে আনন্দিত করল।
আর এ অনুচ্ছেদে মুহাম্মাদ ইবনু আমর আল-লায়সী তার পিতা সূত্রে তার দাদা থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিকে রওয়ানা হলেন। যখন তিনি 'রাওহা' নামক স্থানে পৌঁছলেন, তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "তোমাদের কী মত?" আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা জানতে পেরেছি যে তারা এই এই অবস্থায় আছে। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি আবার খুতবা দিলেন এবং বললেন: "তোমাদের কী মত?" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাকরের কথার মতোই বললেন। অতঃপর তিনি আবার খুতবা দিলেন এবং বললেন: "তোমাদের কী মত?" তখন সা’দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি শুধু আমাদের উদ্দেশ্য করছেন? তবে সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সম্মানিত করেছেন এবং আপনার ওপর কিতাব নাযিল করেছেন! আমি কখনো এই পথ অনুসরণ করিনি এবং এই পথ সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞানও নেই। আর যদি আপনি (ইয়েমেনের) বারকুল গিমাদ পর্যন্তও যাত্রা করেন, তবে আমরা আপনার সাথে যাত্রা করব। আমরা সেই লোকদের মতো হব না, যারা বনী ইসরাঈলের মূসা (আঃ)-কে বলেছিল: "তুমি এবং তোমার রব যাও এবং যুদ্ধ কর, আমরা এখানেই বসে থাকব।" [সূরা আল-মায়েদা: ২৪] বরং আপনি এবং আপনার রব যান এবং যুদ্ধ করুন, আমরা আপনাদের সাথেই অনুসরণকারী হিসেবে থাকব। সম্ভবত আপনি এমন কোনো কাজের জন্য বেরিয়েছেন, যা আল্লাহ্ আপনার কাছে অন্যভাবে প্রকাশ করেছেন। সুতরাং আল্লাহ্ আপনার কাছে যা প্রকাশ করেছেন, আপনি তা বিবেচনা করে অগ্রসর হোন। আপনি যার সাথে চান সম্পর্ক স্থাপন করুন, আর যার সাথে চান সম্পর্ক ছিন্ন করুন; যার সাথে চান সন্ধি করুন, আর যার সাথে চান শত্রুতা করুন; এবং আমাদের সম্পদ থেকে যা চান গ্রহণ করুন।
তখন সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথার ভিত্তিতেই কুরআন নাযিল হলো: "যেমন তোমার রব তোমাকে সত্যের সাথে তোমার ঘর থেকে বের করেছেন, আর নিশ্চয়ই মুমিনদের একটি দল তা অপছন্দ করেছিলো।" [সূরা আল-আনফাল: ৫] এই বাণী থেকে শুরু করে তাঁর বাণী: "এবং কাফিরদের মূল কেটে দেওয়া।" [সূরা আল-আনফাল: ৭] পর্যন্ত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো শুধু আবূ সুফিয়ানের কাফেলার সম্পদ লুণ্ঠনের উদ্দেশ্যে বেরিয়েছিলেন, কিন্তু আল্লাহ তাঁর নবীর জন্য যুদ্ধের ফয়সালা করেন।
8551 - عن ثابت، عن أنس بن مالك قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بُسَيسةَ عينًا ينظر ما صنعت عير أبي سفيان فجاء وما في البيت أحد غيري وغير رسول الله صلى الله عليه وسلم (قال: لا أدري ما استثنى بعض نسائه) قال: فحدثه الحديث، قال: فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فتكلم، فقال:"إنَّ لنا طلبة فمن كان ظهره حاضرًا فليركب معنا" فجعل رجال يستأذنونه في ظهرانهم في علو المدينة فقال:"لا إِلَّا من كان ظهره حاضرًا".
فانطلق رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه حتَّى سبقوا المشركين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا
يقدمن أحد منكم إلى شيء حتَّى أكون أنا دونه" فدنا المشركون، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قوموا إلى جنة عرضها السماوات والأرض" قال: يقول عمير بن الحمام الأنصاري: يا رسول الله! جنة عرضها السماوات والأرض؟ قال:"نعم" قال: بخ بخ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما يحملك على قول بخ بخ؟" قال: لا، والله يا رسول الله! إِلَّا رجاءة أن أكون من أهلها، قال:"فإنك من أهلها" فأخرج تمرات من قرنه فجعل يأكل منهن، ثمّ قال: لئن أنا حييت حتَّى آكل تمراتي هذه إنها لحياة طويلة، قال: فرمى بما كان معه من التمر، ثمّ قاتلهم حتَّى قتل.
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (145: 1901) من طرق عن هاشم بن القاسم، حَدَّثَنَا سليمان (هو ابن المغيرة) عن ثابت، عن أنس فذكره.
وقوله:"بسيسة": بضم الباء وفتح السين، وفي سيرة ابن إسحاق: ابن هشام (1/ 614)"بسبس بن عمرو الجهني" ونسب غيره إلى ذبيان فقال: هو بسبس بن عمرو بن ثعلبة بن خرشة بن عمرو بن سعد بن ذبيان. وكان معه عدي بن أبي الزغباء كما ذكره ابن إسحاق. سيرة ابن هشام (1/ 617).
وذكر قصتها فقال: فأناخا إلى تل قريب من الماء، ثمّ أخذا شنًّا لهما يستسقيان فيه، ومجدي بن عمرو الجهني على الماء، فسمع عدي وبسْبس جاريتين من جواري الحاضر، وهما يتلازمان على الماء. والملزومة تقول لحماحبتها: إنّما تأتي العير غدًا أو بعد غد فأعمل لهم، ثمّ أقضيك الذي لك. قال مجدي: صدقت، ثم خلّص بينهما.
وسمع ذلك عدي وبسْبس فجلسا على بعيريهما ثمّ انطلقا حتَّى أتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبراه بما سمعا.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বুসাইসাহকে গুপ্তচর হিসেবে পাঠালেন যেন সে আবু সুফিয়ানের কাফেলা কী করেছে তা দেখে আসে। অতঃপর তিনি (বুসাইসাহ) ফিরে এলেন। তখন ঘরে আমি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ছাড়া আর কেউ ছিল না। (বর্ণনাকারী বলেন: আমি জানি না, তিনি তাঁর কোনো স্ত্রীকে বাদ দিয়েছিলেন কিনা)। তিনি বললেন: অতঃপর তিনি (বুসাইসাহ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘটনা বললেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইরে বেরিয়ে এলেন এবং কথা বললেন। তিনি বললেন: "নিশ্চয় আমাদের একটি উদ্দেশ্য রয়েছে। যার বাহন প্রস্তুত আছে, সে যেন আমাদের সাথে আরোহণ করে।" লোকেরা মদীনার উঁচু এলাকায় থাকা তাদের বাহন নিয়ে আসার জন্য তাঁর কাছে অনুমতি চাইতে শুরু করল। তিনি বললেন: "না, যে ব্যক্তির বাহন (এখনই) প্রস্তুত আছে, সে ছাড়া আর কেউ নয়।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং তাঁর সাহাবীগণ চলতে শুরু করলেন, যতক্ষণ না তারা মুশরিকদের অতিক্রম করে গেলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমাদের কেউ যেন কোনো কিছুর দিকে অগ্রসর না হয়, যতক্ষণ না আমি তার নিচে (সামনে) থাকি।" মুশরিকরা নিকটবর্তী হলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "দাঁড়াও! সেই জান্নাতের দিকে, যার প্রশস্ততা আসমান ও যমিনের মতো।" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: উমাইর ইবনুল হুমাম আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! এমন জান্নাত যার প্রশস্ততা আসমান ও যমিনের মতো? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (উমাইর) বললেন: বাখ বাখ (বাহ বাহ!)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমাকে 'বাখ বাখ' বলতে কী উদ্বুদ্ধ করল?" তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! জান্নাতবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হওয়ার আশা ছাড়া আর কিছুই নয়। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তুমি জান্নাতবাসীদের অন্তর্ভুক্ত।" অতঃপর তিনি তাঁর থলের মধ্য থেকে কয়েকটি খেজুর বের করলেন এবং তা খেতে লাগলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি যদি এই খেজুরগুলো খাওয়ার জন্য জীবিত থাকি, তবে এটি অবশ্যই একটি দীর্ঘ জীবন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি তাঁর সাথে থাকা খেজুরগুলো ফেলে দিলেন, অতঃপর তিনি তাদের (মুশরিকদের) বিরুদ্ধে যুদ্ধ করলেন, যতক্ষণ না তিনি শহীদ হলেন।
8552 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بالأجراس أن تقطع من أعناق الإبل يوم بدر.
صحيح: رواه أحمد (25166)، وصحّحه ابن حبَّان (4699) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا سعيد، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته.
قال ابن كثير في البداية (5/ 67):"هذا على شرط الشّيخين".
قلت: فيه سعيد هو ابن أبي عروبة مختلط، وكان سماع محمد بن جعفر منه بعد الاختلاط.
ولكن رواه النسائي في الكبرى (8809) من وجه آخر عن خالد بن الحارث، عن سعيد به.
وخالد بن الحارث سمع منه قبل الاختلاط، كما أن سعيد بن أبي عروبة أيضًا توبع في مسند الشاميين للطبراني (2720) وبهذا صحّ إسناد هذا الحديث.
وفي الحديث دليل على أخذ الحيطة عند لقاء العدو، ومنه الكتمان؛ لأن وجود الأجراس في أعناق الإبل يدل على مكان وجودهم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধের দিন উটগুলোর গলা থেকে ঘণ্টাগুলো কেটে ফেলার নির্দেশ দিয়েছিলেন।
8553 - عن عبد الله بن عباس أن النَّبِي صلى الله عليه وسلم قال - وهو في قبة يوم بدر - فذكر الدعاء.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4877) عن إسحاق (الواسطي) حَدَّثَنَا خالد (هو الطحان)، عن خالد (هو الحذاء)، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر الحديث بطوله وهو مذكور في دعائه صلى الله عليه وسلم يوم بدر.
ورُوي عن سعد بن معاذ أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم لما التقى الناس يوم بدر: يا رسول الله، ألا نبني لك عريشًا، فتكون فيه، وتنيخ لك ركائبك، ونلقى عدونا، فإن أظهرنا الله عليهم، وأنجزنا فذاك ما أحب إلينا، وإن تكن الأخرى فتجلس على ركائبك، وتلحق بمن وراءنا من قومنا، فقد والله تخلف عنك أقوام ما نحن لك بأشد حبًا منهم، لو علموا أن نلقى حربًا ما تخلفوا عنك يوادونك وينصرونك. فأثنى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم خيرًا، ودعا له، فبني لرسول الله صلى الله عليه وسلم عريش، فكان فيه وأبو بكر رضي الله عنه ما معهما غيرهما.
رواه البيهقي في الدلائل (3/ 44) من طريق محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن أبي بكر بن حزم أن سعد بن معاذ قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
وهو في سيرة ابن هشام (1/ 620) وفيه: قال ابن إسحاق: حَدَّثَنِي عبد الله بن أبي بكر أنه حدَّث أن سعد بن معاذ قال: فذكره. وهذا مرسل.
كما أنه لم يذكر أن أبا بكر كان معه في هذه القبة وما معهما غيرهما.
সা'দ ইবনে মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বদরের দিন যখন মানুষ (যুদ্ধের জন্য) মুখোমুখি হলো, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা কি আপনার জন্য একটি ছাউনি (বা তাঁবু) নির্মাণ করব না? আপনি সেখানে অবস্থান করবেন এবং আপনার আরোহণের উটগুলোকে আপনার জন্য প্রস্তুত রাখা হবে। আমরা আমাদের শত্রুদের মোকাবিলা করব। যদি আল্লাহ আমাদেরকে তাদের ওপর বিজয়ী করেন এবং আমাদের উদ্দেশ্য সফল করেন, তবে সেটিই হবে আমাদের সবচেয়ে প্রিয়। আর যদি পরিস্থিতি অন্যরকম হয় (অর্থাৎ আমরা পরাজিত হই), তবে আপনি আপনার উটগুলোর পিঠে চড়ে আমাদের পেছনে থাকা আমাদের কওমের (গোত্রের) কাছে চলে যাবেন। আল্লাহর কসম! আপনার থেকে আমাদের চেয়ে কম ভালোবাসে এমন কোনো লোক পেছনে থাকেনি। যদি তারা জানত যে আমরা যুদ্ধে অবতীর্ণ হব, তবে তারা আপনার থেকে পেছনে থাকত না। তারা আপনাকে ভালোবাসে এবং আপনার সাহায্যকারী।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর প্রশংসা করলেন এবং তাঁর জন্য দুআ করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একটি ছাউনি নির্মাণ করা হলো। তিনি এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে অবস্থান করলেন, তাঁদের দুজনের সাথে আর কেউ ছিল না।
8554 - عن علي بن أبي طالب قال: .... ثمّ إنه أصابنا من الليل طش من مطر، فانطلقنا تحت الشجر والحجف نستظل تحتها من المطر، وبات رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو ربه عز وجل، ويقول:"اللهم إنك إن تهلك هذه الفئة لا تعبد" ....
صحيح: رواه أحمد (948) عن حجَّاج، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب، عن علي فذكره في حديث طويل، وهو مذكور في موضعه.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর রাতে আমাদের উপর হালকা বৃষ্টি শুরু হলো। তখন আমরা গাছপালা ও ঢালের (হুজফ) নিচে গিয়ে বৃষ্টির কবল থেকে আশ্রয় নিতে লাগলাম। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই রাত তাঁর পরাক্রমশালী রবের কাছে প্রার্থনা করতে লাগলেন এবং বলছিলেন: "হে আল্লাহ! আপনি যদি এই দলটিকে ধ্বংস করে দেন, তবে পৃথিবীতে আপনার ইবাদত করা হবে না।"
8555 - عن البراء قال: حَدَّثَنِي أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا أنهم كانوا عِدة أصحاب طالوت الذين جاوزوا معه النهر: بضعة عشر وثلاث مئة، قال البراء: لا، والله ما جاوز معه النهر إِلَّا مؤمن.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (3957) عن عمرو بن خالد، حَدَّثَنَا زهير، حَدَّثَنَا أبو
إسحاق (هو السبيعي) قال: سمعت البراء يقول: فذكره.
বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যেসব সাহাবী বদরের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন, তারা আমাকে বলেছেন যে, তাদের সংখ্যা ছিল ততজনই, যতজন তালূতের সাথী তাঁর সাথে নদী পার হয়েছিলেন: তিনশ' দশের কিছু বেশি। বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বললেন: না, আল্লাহর কসম, কোনো মুমিন (ব্যক্তি) ছাড়া আর কেউই তাঁর (তালূতের) সাথে নদী পার হয়নি।
8556 - عن البراء قال: استصغرت أنا وابن عمر يوم بدر، وكان المهاجرون يوم بدر نيفًا على ستين، والأنصار نيفًا وأربعين ومائتين.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (3956) عن محمود (هو ابن غيلان) عن وهب (هو ابن جرير) عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن البراء، قال: فذكره.
قوله: نيفًا: النيف: بفتح النون وتشديد التحتانية وقد تخفف، وهو ما بين العقدين. فتح الباري (7/ 291).
আল-বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের দিন আমাকে এবং ইবনু উমরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অল্পবয়স্ক গণ্য করা হয়েছিল। আর বদরের দিন মুহাজিরগণের সংখ্যা ছিল ষাটোর্ধ্ব এবং আনসারগণের সংখ্যা ছিল দু'শো চল্লিশোর্ধ্ব।
8557 - عن عمر بن الخطّاب قال: لما كان يوم بدر نظر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المشركين وهم ألف، وأصحابه ثلاثمائة وتسعة عشر رجلًا.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (58: 1763) من طرق عن عكرمة بن عمار، حَدَّثَنِي أبو زميل سماك الحنفي، حَدَّثَنِي عبد الله بن عباس، قال: حَدَّثَنِي عمر بن الخطّاب قال: فذكره في حديث طويل.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, যখন বদরের দিন আসলো, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুশরিকদের দিকে তাকালেন। তারা ছিল এক হাজার, আর তাঁর সাহাবীগণ ছিলেন তিনশত ঊনিশ জন পুরুষ।
8558 - عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج يوم بدر في ثلاث مائة وخمسة عشر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم إنهم حفاة فاحملهم اللهم إنهم عراة فاكسُهم، اللهم إنهم جياع فأشبعهم" ففتح الله له يوم بدر، فانقبلوا حين انقلبوا، وما منهم رجل إِلَّا وقد رجع بجمل أو جملين، واكتسوا وشبعوا.
حسن: رواه أبو داود (2747)، والحاكم (2/ 132 - 133، 145)، والبيهقي (6/ 305) كلّهم من طريق عبد الله بن وهب، حَدَّثَنَا حيي، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلّي، عن عبد الله بن عمرو فذكره. وإسناده حسن من أجل حيي، وهو ابن عبد الله المعافري، فإنه مختلف فيه، والأقرب أنه يحتمل مثله في المغازي والفضائل ونحوها إذا سلم من النكارة والمخالفة.
وقد حسن ابن حجر إسناده في الفتح (7/ 292) وأمّا الحاكم فقال في الموضع الأوّل:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين".
وقال في الموضع الثاني: حديث صحيح على شرط مسلم.
قلت: حيي بن عبد الله المعافري لم يخرج له الشيخان أو أحدهما. إنّما روى له الأربعة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন তিনশ’ পনেরোজনকে নিয়ে (যুদ্ধে) বের হয়েছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! তারা পদব্রজে (জুতা ছাড়া) রয়েছে, সুতরাং আপনি তাদের আরোহণের ব্যবস্থা করে দিন। হে আল্লাহ! তারা বস্ত্রহীন, সুতরাং আপনি তাদের পোশাক দিন। হে আল্লাহ! তারা ক্ষুধার্ত, সুতরাং আপনি তাদের তৃপ্ত করুন।" অতঃপর বদরের দিন আল্লাহ তাঁকে বিজয় দান করলেন। তারা যখন ফিরে আসলেন, তখন তাদের এমন কোনো ব্যক্তি ছিল না, যে একটি বা দুটি উট নিয়ে ফিরে আসেনি এবং তারা পোশাক পরিধান করল ও তৃপ্ত হলো।
8559 - عن أبي موسى قال: كان عِدّة أهل بدر عِدّة أصحاب طالوت يوم جالوت: ثلاثمائة وسبعة عشر.
حسن: رواه البزّار - كشف الأستار (1784) عن عمرو بن علي، ثنا ابن أبي عدي، ثنا ثابت بن عمارة، عن غُنيم بن قيس، عن أبي موسى فذكره.
قال البزّار: لا نعلمه عن أبي موسى إِلَّا من هذا الوجه.
وإسناده حسن من أجل ثابت بن عمارة؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وقد قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 93): ورجاله ثقات.
وفي معناه ما رُوي عن ابن عباس أنه قال: إن أهل بدر كانوا ثلاث مائة وثلاثة عشر رجلًا. وكان المهاجرون ستة وسبعين. وكان هزيمة أهل بدر لسبع عشرة مضين يوم الجمعة في شهر رمضان.
رواه أحمد (2232) والبزّار - كشف الأستار (1783) كلاهما من طريقين عن الحجاج، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره.
وزاد البزّار: وكان لواء المهاجرين مع علي بن أبي طالب، وكان لواء الأنصار مع سعد بن عبادة.
والراوي عن الحجاج هو نصر بن باب شيخ الإمام أحمد، وجمهور أهل العلم على تضعيفه إِلَّا أن الإمام أحمد كان حسن الرأي فيه فقال: ما كان به بأس، إنّما أنكروا عليه حين حدّث عن إبراهيم الصائغ، ثمّ إنه توبع عند البزّار.
ولكن فيه حجَّاج وهو ابن أرطاة مدلِّس وقد عنعن.
وذكر البخاري أسماء من سُمّيَ من أهل بدر في صحيحه على حروف المعجم وهم:
1 - النَّبِي محمد بن عبد الله الهاشمي صلى الله عليه وسلم. قدم اسمه الشريف لمكانته.
2 - إياس بن البكير.
3 - بلال بن رباح مولى أبي بكر القرشي.
4 - حمزة بن عبد المطلب الهاشمي.
5 - حاطب بن أبي بلتعة حليف لقريش.
6 - أبو حذيفة بن عتبة بن ربيعة الأنصاري.
7 - حارثة بن الربيع الأنصاري وهو حارثة بن سراقة كان في النظارة.
8 - خبيب بن عدي الأنصاري.
9 - خنيس بن حذافة السهمي.
10 - رفاعة بن رافع الأنصاري.
11 - رواعة بن عبد المنذر أبو لبابة الأنصاري.
12 - الزُّبير بن العوام القرشي.
13 - زيد بن سهل أبو طلحة الأنصاري.
14 - أبو زيد الأنصاري.
15 - سعد بن مالك الزهري.
16 - سعد بن خولة القرشي.
17 - سعيد بن زيد بن عمرو بن نفيل القرشي.
18 - سهل بن حنيف الأنصاري.
19 - ظهير بن رافع الأنصاري.
20 - وأخوه (مظهر بن رافع).
21 - عبد الله بن عثمان القرشي.
22 - عبد الله بن مسعود الهذلي.
23 - عتبة بن مسعود الهذلي.
24 - عبد الرحمن بن عوف الزهري.
25 - عبيدة بن الحارث القرشي.
26 - عبادة بن الصَّامت الأنصاري.
27 - عمر بن الخطّاب العدوي.
28 - علي بن أبي طالب الهاشمي.
29 - عمرو بن عوف، حليف بني عامر بن لؤي.
30 - عقبة بن عمرو الأنصاري.
31 - عامر بن ربيعة العنزي.
32 - عاصم بن ثابت الأنصاري.
33 - عويم بن ساعدة الأنصاري.
34 - عتبان بن مالك الأنصاري.
35 - قدامة بن مظعون.
36 - قتادة بن النعمان الأنصاري.
37 - معاذ بن عمرو بن الجموح.
38 - معوّذ بن عفراء.
39 - وأخوه.
40 - مالك بن ربيعة أبو أسيد الأنصاري.
41 - مرارة بن الربيع الأنصاري.
42 - معن بن عدي الأنصاري.
43 - مسطح بن أثاثة بن عباد بن المطلب بن عبد مناف.
44 - مقداد بن عمرو الكندي، حليف بني زهرة.
45 - هلال بن أمية الأنصاري. رضي الله عنهم.
ينظر: صحيح البخاري، كتاب المغازي، باب تسمية من سمي من أهل بدر.
وأمّا عثمان بن عفّان فذكره البخاري في الفهرس أيضًا ثمّ قال:"خلّفه النَّبِي صلى الله عليه وسلم على ابنته، وضرب له بسهمه.
وكذلك ذكر البخاري في المغازي (4007) أبا مسعود عقبة بن عمرو الأنصاري فيمن شهد بدرًا، ولم يذكره في الفهرس، وهو الصواب؛ فإنه لم يشهد بدرًا، بل نزل بها فنسب إليها، انظر: الإصابة (5631) والفتح (7/ 319).
وكذلك لا يصح ما رواه أبو داود (2731) عن سعيد بن منصور وهو في سننه (2466) حَدَّثَنَا أبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: كنت أميح أصحابي الماء يوم بدر.
رجاله ثقات إِلَّا أنه شاذ، لأن الصَّحيح إن جابرًا لم يشهد بدرًا كما أخبر بذلك عند مسلم (1813) وإنما شهد العقبة مع أبيه وخاله، قاله الدَّارقطني وغيره.
وقوله:"أميح" من المائح الذي ينزل إلى أسفل البئر فيملأ الدلو ويرفعها إلى المائح وهو الذي ينزع الدلو.
ذكر البخاري رحمه الله تعالى من أهل بدر أربعة وأربعين رجلًا فقط. لأن هؤلاء جاء ذكرهم مسندًا في المواضع من كتابه الجامع الصَّحيح، ولذا بوّب بقوله: تسمية من سمّي من أهل بدر في الجامع".
وأمّا عددهم الحقيقي فيبلغ ثلاثمائة وثلاثة عشر بغير شك، ويبلغ ثلاثمائة وخمسين مع الاختلاف. وسبب ذلك يعود إلى الاختلاف في بعض الأسماء كما قال الحافظ ابن حجر في الفتح (7/ 329)، وذكر أن الحافظ ضياء الدين استوعبهم في كتاب الأحكام.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বদরের যোদ্ধাদের সংখ্যা ছিল জালুতের (Goliath) যুদ্ধের দিন তালুতের (Talut) সাথীদের সংখ্যার সমান: তিনশ সতেরো জন।
8560 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا يوم بدر كل ثلاثة على بعير، كان أبو لبابة وعلي بن أبي طالب زَمِيلَي رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: وكانت عقبة رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فقالا: نحن نمشي عنك، فقال:"ما أنتما بأقوى مني، ولا أنا بأغنى من الأجر منكما".
حسن: رواه أحمد (3901) وأبو يعلى (5359) والبزّار - كشف الأستار (1759)، وصحّحه ابن حبَّان (4733)، والحاكم (2/ 91)، والبيهقي في الدلائل (3/ 39) كلّهم من طرق عن حمّاد بن سلمة، أخبرنا عاصم بن بهدلة، عن زر بن حبيش، عن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عاصم بن بهدلة غير أنه حسن الحديث.
وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
وقوله:"عقبة رسول الله صلى الله عليه وسلم" أي نوبته.
قال ابن إسحاق: وكانت إبل أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ سبعين بعيرًا، فاعتقبوها، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم وعلي بن أبي طالب، ومرثد بن أبي مرثد الغنوي يعتقبون بعيرًا. وكان حمزة بن عبد المطلب وزيد بن حارثة وأبو كبشة وأنسة موليا رسول الله صلى الله عليه وسلم يعتقبون بعيرًا. وكان أبو بكر وعمر وعبد الرحمن بن عوف يعتقبون بعيرًا. سيرة ابن هشام (1/ 613).
ففي قول ابن إسحاق: مرثد بن أبي مرثد بدل أبي لبابة، فلعل ذلك في وقتين مختلفين، ولعل علي بن أبي طالب وأبا لبابة كانا زميلي النَّبِي صلى الله عليه وسلم في أول الأمر؛ فإن النَّبِي صلى الله عليه وسلم أمّر على المدينة عند خروجه عبد الله بن أم مكتوم للصلاة بالناس، ثمّ أعاد أبا لبابة من الروحاء. وعينه أميرًا على المدينة كما رواه الحاكم (3/ 632) من طريق ابن لهيعة: ثنا أبو الأسود، عن عروة بن الزُّبير أن أبا لبابة بشير بن عبد المنذر والحارث بن حاطب خرجا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وخرجا معه إلى بدر، فرجعهما وأمّر أبا لبابة على المدينة وضرب لهما بسهمين مع أصحاب بدر، وسكت عليه الحاكم والذّهبي. وابن لهيعة فيه كلام معروف.
فلمّا رجع أبو لبابة صار زميلا النَّبِي صلى الله عليه وسلم علي بن أبي طالب ومرثد بن أبي مرثد.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের দিন আমরা প্রতি তিনজনে একটি উটের উপর আরোহণ করতাম। আবু লুবাবা ও আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহযাত্রী (জমীল) ছিলেন। তিনি (ইবনে মাসউদ) বলেন: (একবার) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (উটে আরোহণের) পালা এলো। তখন তারা দু’জন বললেন: আমরা আপনার পক্ষ থেকে হেঁটে যাবো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা দু’জন আমার চেয়ে বেশি শক্তিশালী নও, আর আমিও তোমাদের চেয়ে পুণ্যের মুখাপেক্ষী কম নই।