হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (8581)


8581 - عن علي بن أبي طالب قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر ولأبي بكر:"مع أحدكما جبريل، ومع الآخر ميكائيل، وإسرافيل ملك عظيم يشهد القتال أو يكون في القتال".

صحيح: رواه أحمد (1257)، وأبو يعلى (340)، والبزّار في مسنده (729)، وصحّحه الحاكم (3/ 134) كلّهم من طرق عن مسعر بن كدام، عن أبي عون الثقفي، عن أبي صالح الحنفي، عن علي بن أبي طالب فذكره. وإسناده صحيح.

قال الحاكم: صحيح الإسناد، وقال الذّهبي على شرط مسلم.

وأورده الدَّارقطني في علله (4/ 195) وذكر الاختلاف على مسعر وصوّب من رواه من أصحاب مسعر، عن أبي عون الثقفي، عن أبي صالح الحنفي، عن علي.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধের দিন আমাকে এবং আবূ বকরকে বললেন: "তোমাদের দুজনের একজনের সাথে জিবরীল আছেন, এবং অপরজনের সাথে আছেন মীকাঈল। আর ইসরাফীল একজন মহান ফেরেশতা, যিনি যুদ্ধে উপস্থিত হন অথবা যুদ্ধে থাকেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (8582)


8582 - عن عبد الله بن ثعلبة بن صعير قال: خفق رسول الله صلى الله عليه وسلم خفقة في العريش، ثمّ انتبه فقال:"أبشر يا أبا بكر! هذا جبريل معتجر بعمامته، آخذ بعنان فرسه يقوده على ثناياه النقْع، أتاك نصر الله وعِدَتُه". وأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخذ كفًّا من الحصى بيده، ثمّ خرج، فاستقبل القوم فقال:"شاهت الوجوه" ثمّ نفحهم بها، ثمّ قال لأصحابه:"احملوا" فلم تكن إِلَّا الهزيمة. فقتل الله من قتل من صناديدهم، وأسر من أسر منهم.

حسن: رواه ابن إسحاق قال: حَدَّثَنِي الزّهري، عن عبد الله بن ثعلبة بن صعير فذكره. رواه الأموي عنه في مغازيه كما في البداية والنهاية (5/ 126).

وذكره ابن هشام في السيرة (1/ 626 - 627) بدون إسناد.

وهو جزء من حديث استنصار أبي جهل عند الإمام أحمد (23661) إِلَّا أنه لم يذكر هذا الجزء.

وعبد الله بن ثعلبة صحابي صغير حديثه مرسل، ومرسل الصحابي مقبول عند جمهور أهل العلم.

وفي الباب ما رُوي عن أبي داود المازني - وكان شهد بدرًا - قال: إني لأتبع رجلًا من المشركين لأضربه، إذ وقع رأسه قبل أن يصل إليه سيفي. فعرفت أنه قد قتله غيري.

رواه الإمام أحمد (23778) عن يزيد، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن أبيه، قال: قال أبو داود المازني فذكره.

وهو عند ابن هشام في سيرته (1/ 633) وفيه: قال ابن إسحاق: حَدَّثَنِي أبي إسحاق بن يسار،
عن رجال من بني مازن بن النجار، عن أبي داود المازني فذكره.

فظهر منه أن بين إسحاق بن يسار وبين أبي داود المازني رجالا لا يعرفون.




আব্দুল্লাহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু সু'আইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরিশে (তাঁবুতে) সামান্য তন্দ্রাচ্ছন্ন হলেন। এরপর তিনি জাগ্রত হয়ে বললেন: "হে আবূ বাকর! সুসংবাদ গ্রহণ করো! এই তো জিবরীল (আঃ)! তিনি তাঁর পাগড়ি পরিহিত অবস্থায়, তাঁর ঘোড়ার লাগাম ধরে তাকে নিয়ে আসছেন। তাঁর সামনের দাঁতে ধুলা লেগে আছে। আল্লাহর সাহায্য ও তাঁর প্রতিশ্রুতি তোমার নিকট এসেছে।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিলেন। তিনি তাঁর হাতে এক মুঠো নুড়িপাথর নিলেন। তারপর তিনি বেরিয়ে এসে শত্রুদের মুখোমুখি হলেন এবং বললেন: "চেহারাগুলো মলিন হোক!" এরপর তিনি নুড়িপাথরগুলো তাদের দিকে নিক্ষেপ করলেন এবং তাঁর সাহাবীগণকে বললেন: "আক্রমণ করো!" এরপর পরাজয় ব্যতীত আর কিছুই ঘটেনি। আল্লাহ তা‘আলা তাদের সর্দারদের মধ্যে যাদেরকে হত্যার ইচ্ছা করলেন, তাদেরকে হত্যা করলেন এবং যাদেরকে বন্দী করার ইচ্ছা করলেন, তাদেরকে বন্দী করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8583)


8583 - عن ابن عباس قال: رفع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده يوم بدر. فقال:"يا رب! إن تهلك هذه العصابة، فلن تعبد في الأرض أبدًا". فقال له جبريل عليه السلام: خُذْ قبضة من التراب، فأخذ قبضةً من التراب فرمى بها في وجوههم، فما من المشركين من أحد إِلَّا أصاب عينيه ومنخريه وفمَه تراب من تلك القبضة فولَّوا مدبرين.

حسن: رواه الطبري في تفسيره (11/ 86)، وابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1673) كلاهما من طريق أبي صالح، قال: حَدَّثَنِي معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي صالح وهو عبد الله بن صالح كاتب اللّيث، مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বদর যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত তুললেন এবং বললেন: "হে আমার রব! যদি আপনি এই দলটি (মুসলমানদের) ধ্বংস করে দেন, তবে পৃথিবীতে আর কখনোই আপনার ইবাদত করা হবে না।" তখন জিবরাঈল (আঃ) তাঁকে বললেন: "এক মুঠো মাটি নিন।" অতঃপর তিনি এক মুঠো মাটি নিলেন এবং তা তাদের (মুশরিকদের) মুখে নিক্ষেপ করলেন। মুশরিকদের এমন কেউ ছিল না যার চোখ, নাক ও মুখ সেই মুঠো মাটির দ্বারা আক্রান্ত হয়নি। ফলে তারা পিঠ দেখিয়ে পালাতে শুরু করল।









আল-জামি` আল-কামিল (8584)


8584 - عن حكيم بن حزام قال: لما كان يوم بدر سمعنا صوتًا وقع من السماء إلى الأرض، كأنه صوت حصاة وقعت في طست، ورمى رسول الله صلى الله عليه وسلم بتلك الحصيات، فانهزموا، فذلك قول الله تعالى: {وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ رَمَى وَلِيُبْلِيَ الْمُؤْمِنِينَ مِنْهُ بَلَاءً حَسَنًا} [الأنفال: 17].

حسن: رواه الطبراني في الكبير (3/ 227)، والطبري في تفسيره (11/ 84)، وابن أبي حاتم في التفسير (5/ 1672)، والبيهقي في الدلائل (3/ 80)، كلّهم من طرق عن موسى بن يعقوب الزمعي، عن يزيد بن عبد الله، عن أبي بكر بن سليمان بن أبي حثمة، عن حكيم بن حزام فذكره. واللّفظ لابن أبي حاتم.

قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 84):"إسناده حسن".

قلت: موسى بن يعقوب الزمعي حسن الحديث، وفيه أيضًا يزيد بن عبد الله قال البيهقي:"هذا هو ابن وهب بن زمعة عمّ موسى بن يعقوب".

لم يوثّقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، وقد روى عنه ابن أخيه موسى بن يعقوب، ولحديثه أصل، وهو في المغازي، وليس في الأحكام.

ورواه الطبراني في الكبير (3/ 227) عن أحمد بن بهرام الأيذجي، ثنا محمد بن يزيد الأسفاطي، ثنا إبراهيم بن يحيى الشجري، حَدَّثَنِي أبي، ثنا موسى بن يعقوب الزمعي، عن عبد الله بن يزيد مولى الأسود بن سفيان، عن أبي بكر بن سليمان، عن أبي حثمة: عن حكيم بن حزام قال: لما كان يوم بدر أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخذ كفًّا من الحصباء فاستقبلنا به فرمانا بها قال:"شاهت الوجوه" فانهزمنا فأنزل الله عز وجل: {وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ رَمَى} [الأنفال: 17].
كذا وقع في هذا الإسناد:"عبد الله بن يزيد مولى الأسود بن سفيان" مع أنه رواه غير واحد عن موسى الزمعي فسمّوا شيخه:"يزيد بن عبد الله" كما في الإسناد السابق، بل رواه ابن أبي حاتم (5/ 1672) من طريق يحيى بن محمد بن هانئ، عن موسى الزمعي به، وسمّاه:"يزيد بن عبد الله" كرواية الجماعة.

فالأشبه أن ما وقع في معجم الطبراني خطأ فإن في إسناده عدة علل.

شيخ الطبراني لا يعرف حاله، وإبراهيم بن يحيى الشجري لين الحديث، وأبوه يحيى بن محمد بن عباد بن هانئ الشجري ضعيف، وكان ضريرًا يتلقّن.

وإنْ كان ما في المعجم الكبير محفوظًا، فلعل الزمعي رواه عن شيخين، فيُقوّي أحدهما الآخر.

والخلاصة: أنه حديث حسن كما قال الهيثمي.

وقوله: {وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ} أي: ما بلّغتَ إذ رميتَ، ولكن الله بلّغ، فأصاب وجوه جيش الكفار، فما بقي أحدٌ منهم إلّا أصابها منه شيء.

قال ابن إسحاق: ثمّ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ حفنة من الحصباء، فاستقبل قريشًا بها ثم قال: شاهت الوجوه، ثمّ نضحهم بها، وأمر أصحابه فقال:"شدّوا" فكانت الهزيمة، فقتل الله تعالى من قتل من صناديد قريش، وأسر من أسر من أشرافهم.

سيرة ابن هشام (1/ 6




হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন বদরের দিন আসলো, তখন আমরা আকাশ থেকে জমিনে পতিত হওয়া একটি আওয়াজ শুনলাম, যা ছিল যেন কোনো পাত্রে একটি নুড়ি পাথর পড়ার শব্দের মতো। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই নুড়ি পাথরগুলো (শত্রুদের দিকে) নিক্ষেপ করলেন, ফলে তারা পরাজিত হলো। আর এটাই আল্লাহ তাআলার এই বাণীর অর্থ: "আর যখন তুমি নিক্ষেপ করেছিলে, তখন তুমি নিক্ষেপ করোনি; বরং আল্লাহই নিক্ষেপ করেছিলেন, যাতে তিনি মুমিনদেরকে তাঁর পক্ষ থেকে উত্তম পরীক্ষার মাধ্যমে পরীক্ষা করতে পারেন।" [সূরা আল-আনফাল: ১৭]।









আল-জামি` আল-কামিল (8585)


8585 - عن أبي طلحة صلى الله عليه وسلم قال: غشينا النعاس، ونحن في مصافنا يوم بدر. قال أبو طلحة: كنت فيمن غشيه النعاس يومئذ فجعل سيفي يسقط من يدي وآخذه، ويسقط وآخذه.

صحيح: رواه الإمام أحمد (16357) عن يونس، حَدَّثَنَا شيبان، عن قتادة، وحسين (وهو ابن محمد) في تفسير شيبان، عن قتادة قال: وحدثنا أنس بن مالك أن أبا طلحة قال: فذكره.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن حبَّان (7180) وشيبان هو ابن عبد الرحمن النحوي ثقة صاحب كتاب ولكن رواه البخاري في التفسير (4562) عن إسحاق بن إبراهيم بن عبد الرحمن أبي يعقوب، حَدَّثَنَا حسين بن محمد بإسناده فقال فيه: يوم أحد.

وكذلك رواه أيضًا في المغازي (4068): وقال لي خليفة، حَدَّثَنَا يزيد بن زريع، حَدَّثَنَا سعيد، عن قتادة، عن أنس، عن أبي طلحة فذكر نحوه.

فرأى أهل العلم أن النعاس وقع في بدر كما في قوله تعالى في سورة الأنفال: {إِذْ يُغَشِّيكُمُ النُّعَاسَ أَمَنَةً مِنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً لِيُطَهِّرَكُمْ بِهِ وَيُذْهِبَ عَنْكُمْ رِجْزَ الشَّيْطَانِ وَلِيَرْبِطَ عَلَى قُلُوبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ الْأَقْدَامَ} [الأنفال: 11] كما وقع في أحد أيضًا لقوله تعالى في سورة آل عمران:
{ثُمَّ أَنْزَلَ عَلَيْكُمْ مِنْ بَعْدِ الْغَمِّ أَمَنَةً نُعَاسًا يَغْشَى طَائِفَةً مِنْكُمْ} [آل عمران: 154] وهذا اختيار البخاري.




আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, বদরের দিনে আমরা যখন আমাদের সারিতে ছিলাম, তখন আমাদের তন্দ্রা আচ্ছন্ন করে ফেলেছিল। আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি ছিলাম তাদের মধ্যে, যাদেরকে সেদিন তন্দ্রা আচ্ছন্ন করেছিল। ফলে আমার হাত থেকে আমার তলোয়ার পড়ে যাচ্ছিল এবং আমি সেটা ধরছিলাম, আবার পড়ে যাচ্ছিল এবং আমি সেটা ধরছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8586)


8586 - عن أنس بن مالك يقول: قال أبو جهل: {اللَّهُمَّ إِنْ كَانَ هَذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِنَ السَّمَاءِ أَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ} [الأنفال: 32]، فَنَزَلَتْ: {وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنْتَ فِيهِمْ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ (33) وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ} [الأنفال: 33، 34].

متفق عليه: رواه مسلم في صفات المنافقين (2796) عن عبيد الله بن معاذ العنبري، حَدَّثَنَا أبي، عن شعبة، عن عبد الحميد الزيادي، أنه سمع أنس بن مالك يقول: فذكره.

ورواه البخاري في التفسير عن أحمد (4648) وعن محمد بن النضر (4649) كلاهما عن عبيد الله بن معاذ العنبري بإسناده مثله.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু জাহল বলেছিল: হে আল্লাহ! যদি এই (ইসলাম) তোমার পক্ষ থেকে সত্য হয়, তবে তুমি আকাশ থেকে আমাদের ওপর পাথর বর্ষণ করো অথবা আমাদের ওপর কঠিন শাস্তি নিয়ে আসো। তখন (এর পরিপ্রেক্ষিতে) নাযিল হয়: "আল্লাহ এমন নন যে, তুমি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে থাকা অবস্থায় তিনি তাদেরকে শাস্তি দেবেন; আর আল্লাহ তাদেরকে শাস্তি দেবেন এমনও নন যে, তারা ক্ষমা প্রার্থনা করছে (অথচ তিনি শাস্তি দিচ্ছেন)। তাদের কী হয়েছে যে, আল্লাহ তাদের শাস্তি দেবেন না, অথচ তারা মসজিদুল হারাম থেকে (মানুষকে) বাধা দিচ্ছে?" (সূরা আনফাল: ৩৩, ৩৪)









আল-জামি` আল-কামিল (8587)


8587 - عن عبد الله بن ثعلبة بن صعير أن أبا جهل قال حين التقى القوم: اللهم أقطعنا للرحم، وآتانا بما لا يُعرف فأحنه الغداة، فكان المستفتِحَ.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23661) عن يزيد، أخبرنا محمد - يعني ابن إسحاق - حَدَّثَنِي الزّهري، عن عبد الله بن ثعلبة بن صعير فذكره.

وإسناده صحيح ومحمد بن إسحاق وإن كان حسن الحديث إذا صرّح ولكنه رواه أيضًا صالح بن كيسان - وهو ثقة حافظ - عن الزهري به مثله، ومن طريقه رواه النسائي في الكبرى (11137) والحاكم (2/ 328) وقال: صحيح على شرط الشّيخين.

وعبد الله بن ثعلبة صحابي صغير، ولد قبل الهجرة بأربع سنين وقيل: بعد الهجرة، فالحديث مرسل صحابي وهو مقبول عند جماهير أهل العلم.

وقوله: أقطعنا: اسم تفضيل للقطع.

وقوله: آتانا: اسم تفضيل من الاتيان.

وقوله: فأحِنْه من أحانه الله - أي أهلكه. قال السدي: كان المشركون حين خرجوا من مكة إلى بدر، أخذوا بأستار الكعبة فاستنصروا الله وقالوا: اللهم انصر أعلى الجندين، وأكرم الفئتين وخير القبيلتين، فقال الله: {إِنْ تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَاءَكُمُ الْفَتْحُ} [الأنفال: 19].

يقول: لقد نصرت ما قلتم، وهو محمد صلى الله عليه وسلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে সা'লাবাহ ইবনে সু'আইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু জাহল বলেছিল যখন দুই দল (বদরের যুদ্ধে) মুখোমুখি হলো: “হে আল্লাহ! যে পক্ষ সবচেয়ে বেশি আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্নকারী এবং যা অপরিচিত (নব প্রবর্তিত দ্বীন) তা নিয়ে আমাদের কাছে এসেছে, তুমি আজ সকালে তাকে ধ্বংস করে দাও।” এভাবে সে-ই (যুদ্ধের) ফায়সালা বা বিজয় প্রার্থনাকারী ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (8588)


8588 - عن ابن عباس قال: لما نزل المسلمون بدرًا، وأقبل المشركون، نظر رسول الله
- صلى الله عليه وسلم إلى عتبة بن ربيعة، وهو على جمل أحمر، فقال: إن يكن عند أحد من القوم خير فهو عند صاحب الجمل الأحمر، إن يطيعوه يرشدوا، وهو يقول: يا قوم! أطيعوني في هؤلاء القوم، فإنكم إن فعلتم لم يزل ذلك في قلوبكم، ينظر كل رجل إلى قاتل أخيه، وقاتل أبيه، فاجعلوا جبنها برأسي وارجعوا، فقال أبو جهل: اِنتفخَ واللهِ سحره حين رأى محمدًا وأصحابه، إنّما محمد وأصحابه كأكلة جزور، لو قد التقينا، فقال عتبة: ستعلم من الجبان المفسد لقومه، أما والله إني لأرى قومًا يضربونكم ضربًا، أما ترون كأنّ رؤوسهم الأفاعي، وكأن وجوههم السيوف، ثمّ دعا أخاه وابنه فخرج يمشي بينهما ودعا بالمبارزة.

صحيح: رواه البزّار - كشف الأستار (1762) عن إبراهيم بن سعيد الجوهري، والحسن بن يونس أبي علي الضرير قالا: ثنا يزيد بن هارون، أنبأ جرير بن حازم، عن أخيه يزيد بن حازم، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال البزّار:"لا نعلم يرويه بهذا اللّفظ إِلَّا ابن عباس ولا له إِلَّا هذا الطريق، ولا أسنده إِلَّا يزيد بن هارون، وحدث به مرة مسندًا وحدث به في الكتب مرسلًا.

ويزيد بن حازم لم يُسنِد غير هذا الحديث" انتهى.

وقال الهيثمي في"المجمع" (6/ 76): رجاله ثقات.

قلت: وهو كما قال ويزيد بن حازم ثقة ثبت.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মুসলিমগণ বদরের প্রান্তরে অবতরণ করলেন এবং মুশরিকরা এগিয়ে আসল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উতবাহ ইবনে রাবি’আহর দিকে তাকালেন। সে একটি লাল উটের উপর ছিল। তিনি বললেন: যদি এই সম্প্রদায়ের কারো মধ্যে কোনো কল্যাণ থাকে, তবে তা এই লাল উটের আরোহীর কাছে আছে। যদি তারা তার আনুগত্য করে, তবে তারা সঠিক পথ পাবে। (উতবাহ) বলছিল: হে আমার সম্প্রদায়! এই লোকেদের (মুহাম্মাদের সাথীদের) ব্যাপারে তোমরা আমার কথা শোনো। কারণ, যদি তোমরা (যুদ্ধ) করো, তবে তা তোমাদের হৃদয়ে গেঁথে থাকবে। তখন প্রত্যেক ব্যক্তি তার ভাইয়ের হত্যাকারী এবং তার পিতার হত্যাকারীর দিকে তাকিয়ে থাকবে। অতএব, এর কাপুরুষতাকে আমার মাথার ওপর রাখো এবং তোমরা ফিরে যাও। তখন আবু জাহল বলল: আল্লাহর শপথ! মুহাম্মাদ ও তার সাথীদের দেখে ওর (উতবার) ফুসফুস ফুলে উঠেছে (ভয়ে)। মুহাম্মাদ ও তার সাথীরা তো একটি উটের গোশতের মতোই (সহজে শেষ করে দেওয়া যাবে), যদি আমরা মুখোমুখি হই। তখন উতবাহ বলল: কে কাপুরুষ আর কে তার কওমের মধ্যে বিপর্যয় সৃষ্টিকারী, তা শীঘ্রই তুমি জানতে পারবে। আল্লাহর শপথ! আমি এমন একটি সম্প্রদায়কে দেখছি যারা তোমাদেরকে (ভয়ংকর) আঘাত করবে। তোমরা কি দেখছো না যে, তাদের মাথাগুলো যেন সাপ, আর তাদের চেহারাগুলো যেন তলোয়ার? অতঃপর সে তার ভাই ও পুত্রকে ডাকল এবং তাদের দুজনের মাঝে হেঁটে বেরিয়ে এল এবং একক যুদ্ধের আহ্বান জানাল।









আল-জামি` আল-কামিল (8589)


8589 - عن علي بن أبي طالب قال: وبات رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة يدعو ويقول:"اللهم إن تُهلك هذه العصابة لا تعبد في الأرض"، فلمّا طلع الفجر قال:"الصّلاة عباد الله" فأقبلنا من تحت الشجر والحجف، فحث على القتال وقال:"كأني أنظر إلى صرعاهم"، فلمّا دنا القوم إذا رجل يسير في القوم على جمل أحمر. فقال النَّبِي صلى الله عليه وسلم للزبير:"ناد بعض أصحابك، فسلْه من صاحب الجمل الأحمر؟ ، فإن يكن في القوم أحد يأمر بخير فهو" فسأل الزُّبير: من صاحب الجمل الأحمر؟ قالوا: عتبة بن ربيعة، وهو ينهى عن القتال، وهو يقول: يا قوم! إني أرى قومًا مستميتين، والله! ما أظن أن تصلوا إليهم حتَّى تهلكوا، قال: فلمّا بلغ أبا جهل ما يقول: أقبل إليه فقال: ملئت رئتك رعبًا حين رأيت محمدًا وأصحابه، فقال له عتبة: إياي تعني يا مصفّر استه، ستعلم أينا أجبن، فنزل عن جمله وأتبعه أخوه شيبة، وابنه الوليد، فدعوا إلى البراز فذكر الحديث بطوله.
صحيح: رواه أحمد (948) والبزّار - كشف الأستار (1761) كلاهما من حديث إسرائيل عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب، عن علي فذكره. وإسناده صحيح.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাত অতিবাহিত করলেন দু‘আ করতে করতে এবং বলছিলেন: “হে আল্লাহ! যদি আপনি এই দলটি (মুসলমানদের) ধ্বংস করে দেন, তবে পৃথিবীতে আপনার ইবাদাত করা হবে না।” অতঃপর যখন ফজর উদিত হলো, তিনি বললেন: “সালাত, আল্লাহর বান্দাগণ!” (তখন) আমরা গাছপালা ও ঢালের নিচ থেকে তার দিকে এগিয়ে গেলাম। তিনি যুদ্ধের জন্য উৎসাহ দিলেন এবং বললেন: “আমি যেন তাদের নিহত হওয়ার স্থানগুলো দেখতে পাচ্ছি।”

যখন কাফির দলটি কাছাকাছি এলো, হঠাৎ দেখা গেল, লাল উটের ওপর সওয়ার হয়ে এক ব্যক্তি তাদের (কাফিরদের) মাঝে হেঁটে যাচ্ছে। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “তোমার সাথীদের কাউকে ডাকো এবং তাকে জিজ্ঞেস করতে বলো: লাল উটের আরোহী লোকটি কে? যদি কাফির দলের মধ্যে কেউ থাকে যে কল্যাণের নির্দেশ দেয়, তবে সে-ই হবে এই ব্যক্তি।”

যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: লাল উটের আরোহী লোকটি কে? তারা (কুরাইশরা) বললো: সে হলো উতবা ইবনু রাবী‘আহ। সে যুদ্ধের ব্যাপারে নিষেধ করছিল এবং বলছিল: “হে আমার সম্প্রদায়! আমি এমন একদল লোককে দেখছি যারা মরতে প্রস্তুত হয়ে আছে। আল্লাহর কসম! আমার মনে হয় না যে তোমরা তাদের কাছে পৌঁছাতে পারবে যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা ধ্বংস হয়ে যাও।”

বর্ণনাকারী বলেন: উতবা যা বলছিল, তা যখন আবূ জাহেলের কাছে পৌঁছাল, সে উতবার দিকে এগিয়ে এসে বলল: “মুহাম্মাদ ও তার সঙ্গীদের দেখে তোমার ফুসফুস ভয়ে পূর্ণ হয়ে গেছে!” তখন উতবা তাকে বলল: “ওহে, যার পিছন হলুদ হয়ে আছে (কাপুরুষ), তুমি কি আমাকে উদ্দেশ্য করে বলছো? শীঘ্রই জানতে পারবে আমাদের মধ্যে কে সবচেয়ে ভীতু।” অতঃপর সে তার উট থেকে নেমে পড়ল এবং তার ভাই শাইবা ও তার ছেলে ওয়ালীদও তাকে অনুসরণ করল। এরপর তারা মল্লযুদ্ধের জন্য আহ্বান জানাল। অতঃপর বর্ণনাকারী সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8590)


8590 - عن عبد الرحمن بن عوف أنه قال: بينا أنا واقف في الصف يوم بدر، نظرت عن يميني وشمالي، فإذا أنا بين غلامين من الأنصار، حديثة أسنانهما، تمنيت لو كنت بين أضلع منهما، فغمزني أحدهما، فقال: يا عم هل تعرف أبا جهل؟ قال: قلت نحم، وما حاجتك إليه يا ابن أخي؟ قال: أخبرت أنه يسبّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذي نفسي بيده لئن رأيته لا يفارق سوادي سواده حتَّى يموت الأعجل منا، قال: فتعجبت لذلك، فغمزني الآخر، فقال مثلها: قال: فلم أنشب أن نظرت إلى أبي جهل يزول في الناس، فقلت: ألا تريان؟ هذا صاحبكما الذي تسألان عنه، قالما: فابتدراه فضرباه بسيفيهما، حتَّى قتلاه، ثمّ انصرفا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبراه، فقال:"أيكما قتله؟" فقال كل واحد منهما: أنا قتلت، فقال:"هل مسحتما سيفيكما؟" قالا: لا، فنظر في السيفين فقالما:"كلاكما قتله" وقضى بسلبه لمعاذ بن عمرو بن الجموح، (والرجلان: معاذ بن عمرو بن الجموح ومعاذ بن عفراء).

متفق عليه: رواه البخاري في فرض الخمس (3141) ومسلم في الجهاد والسير (42: 1752) كلاهما عن يوسف بن الماجشون، عن صالح بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن جده عبد الرحمن بن عوف أنه قال: فذكره.




আব্দুল রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন আমি যখন সারিতে দাঁড়িয়েছিলাম, তখন আমি আমার ডানে ও বামে তাকালাম। দেখলাম আমি আনসারদের দুইজন বালকের মাঝে দাঁড়িয়ে আছি, যাদের বয়স ছিল একেবারে তরুণ। আমি কামনা করছিলাম, যদি আমি তাদের চেয়ে অধিক শক্তিশালী কারো মাঝে থাকতাম। অতঃপর তাদের একজন আমাকে কনুই দিয়ে খোঁচা দিল এবং বলল: চাচা, আপনি কি আবু জাহলকে চেনেন? আমি বললাম: হ্যাঁ চিনি। হে আমার ভাতিজা, তার কাছে তোমার কী প্রয়োজন? সে বলল: আমাকে জানানো হয়েছে যে সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেয়। যার হাতে আমার প্রাণ, আমি যদি তাকে দেখতে পাই, তবে আমাদের দুজনের মধ্যে দ্রুত মৃত্যুবরণকারী মারা না যাওয়া পর্যন্ত আমার শরীর তার শরীর থেকে আলাদা হবে না। তিনি (আব্দুল রহমান) বলেন: আমি তাতে অবাক হলাম। অতঃপর অন্যজন আমাকে কনুই দিয়ে খোঁচা দিল এবং একই কথা বলল। তিনি বলেন: এর কিছুক্ষণ পরই আমি আবু জাহলকে দেখলাম মানুষের মধ্যে ঘোরাফেরা করছে। আমি বললাম: তোমরা কি দেখছ না? এই সেই লোক, যার সম্পর্কে তোমরা জানতে চেয়েছ। তারা দুজন দ্রুত এগিয়ে গিয়ে তাদের তলোয়ার দিয়ে তাকে আঘাত করল এবং তাকে হত্যা করল। এরপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে এলো এবং তাঁকে খবর দিল। তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে কে তাকে হত্যা করেছে?" তাদের প্রত্যেকেই বলল: আমি তাকে হত্যা করেছি। তিনি বললেন: "তোমরা কি তোমাদের তলোয়ার মুছে ফেলেছ?" তারা বলল: না। তখন তিনি তলোয়ার দুটির দিকে তাকালেন এবং বললেন: "তোমরা উভয়েই তাকে হত্যা করেছ।" আর তিনি তার (আবু জাহলের) যাবতীয় সম্পদ (সালব) মু'আয ইবন আমর ইবনুল জুমূহের জন্য ফয়সালা করলেন। (আর এই দুজন তরুণ ছিল: মু'আয ইবন আমর ইবনুল জুমূহ এবং মু'আয ইবন আফরা)।









আল-জামি` আল-কামিল (8591)


8591 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ينظر لنا ما صنع أبو جهل؟ فانطلق ابن مسعود، فوجده قد ضربه ابنا عفراء حتَّى برد، قال: فأخذ بلحيته فقالما: آنت أبو جهل؟ فقال: وهل فودتى رجل قتلتموه؟ أو قال: قتله قومه؟ قال: وقال أبو مجلز: قال أبو جهل فلو غير أكّارٍ قتلني.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4020)، ومسلم في الجهاد والسير (118: 1800) كلاهما من طريق إسماعيل ابن علية، حَدَّثَنَا سليمان التميمي حَدَّثَنَا أنس بن مالك قال (فذكره) واللّفظ لمسلم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের জন্য কে দেখবে আবু জাহেল কী করেছে?" অতঃপর ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গেলেন। তিনি তাকে এমনভাবে পেলেন যে, আফরার দুই ছেলে তাকে আঘাত করে শীতল (নিস্তেজ) করে দিয়েছে। তিনি (ইবনে মাসউদ) বলেন: আমি তার দাড়ি ধরে বললাম: তুমিই কি আবু জাহেল? সে বলল: তোমরা যাকে হত্যা করলে, এর চেয়ে বড় (বিজয়) আর কী হতে পারে? অথবা (রাবী বলেন: সে বলেছিল): তার সম্প্রদায় যাকে হত্যা করেছে। (রাবী) বলেন, আর আবূ মিজলায বলেছেন: আবু জাহেল বলেছিল: যদি কোনো কৃষক/চাষী ছাড়া অন্য কেউ আমাকে হত্যা করত (তবে ভালো হতো)।









আল-জামি` আল-কামিল (8592)


8592 - عن عبد الله بن مسعود أنه أتى أبا جهل، وبه رمق يوم بدر، فقال أبو جهل: هل أعمد من رجلٍ قتلتموه؟

صحيح: رواه البخاري في المغازي (3961) عن ابن نمير (هو محمد بن عبد الله بن نمير) حَدَّثَنَا
أبو أسامة، حَدَّثَنَا إسماعيل (هو ابن أبي خالد)، أخبرنا قيس (هو ابن أبي حازم)، عن عبد الله (هو ابن مسعود) أنه أتى (فذكره).

قوله:"أعمد" بالمهملة أفعل تفضيل من عمد أي هلك.

ولا يصح ما رواه أبو عبيدة عن أبيه عبد الله بن مسعود قال: انتهيت إلى أبي جهل يوم بدر وقد ضربت رجله، وهو صريع، وهو يذبّ الناس عنه بسيف له، فقلت: الحمد الله الذي أخزاك يا عدو الله! فقال: هل هو إِلَّا رجل قتله قومه؟ ! قال: فجعلت أتناوله بسيف لي غير طائل، فأصبت يده، فندر سيفه، فأخذته، فضربته به حتَّى قتلته، قال: ثمّ خرجت حتَّى أتيت النَّبِي صلى الله عليه وسلم كأنما أقلّ من الأرض، فأخبرته، فقال:"آلله الذي لا إله إِلَّا هو"فرددها ثلاثًا، قال: قلت: آلله الذي لا إله إِلَّا هو، قال: فخرج يمشي معي، حتَّى قام عليه، فقال:"الحمد لله الذي أخزاك يا عدو الله، هذا كان فرعون هذه الأمة" قال (يعني وكيع): وزاد فيه أبي، عن أبي إسحاق، عن أبي عبيدة قال: قال عبد الله: فنفّلني سيفه".

رواه الإمام أحمد (4246) عن وكيع، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي عبيدة، قال: قال عبد الله، فذكره.

ورواه أيضًا (3824) من وجه آخر عن شريك، عن أبي إسحاق.

وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه.

ورواه أبو داود (2722) من وجه آخر عن وكيع، عن أبيه، عن أبي إسحاق عن أبي عبيدة، عن عبد الله بن مسعود قال: نفّلني رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر سيف أبي جهل كان قتله.

ووالد وكيع هو الجراح بن مليح تكلم فيه غير واحد من أهل العلم، والخلاصة فيه أنه لا يقبل تفرده.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বদরের দিনে আবু জাহেলের কাছে এসেছিলেন, যখন তার মধ্যে তখনও কিছু প্রাণ অবশিষ্ট ছিল। তখন আবু জাহেল বলল: তোমরা যাকে হত্যা করলে তার চেয়েও অধিক ধ্বংসপ্রাপ্ত (হতভাগা) আর কেউ কি আছে?

আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বদরের দিন আবু জাহেলের কাছে পৌঁছলাম, যখন তার পায়ে আঘাত করা হয়েছিল এবং সে মাটিতে লুটিয়ে ছিল। সে নিজের কাছে আসা লোকদেরকে তার তলোয়ার দিয়ে বাধা দিচ্ছিল। আমি বললাম: সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তোমাকে লাঞ্ছিত করেছেন, হে আল্লাহর শত্রু! সে বলল: সে কি এমন একজন মানুষ নয়, যাকে তার গোত্রের লোকেরা হত্যা করেছে?! তিনি (ইবনে মাসউদ) বললেন: অতঃপর আমি আমার হাতে থাকা একটি ভোঁতা তলোয়ার দিয়ে তাকে আঘাত করতে শুরু করলাম। আমি তার হাতে আঘাত করলাম, ফলে তার তলোয়ারটি পড়ে গেল। আমি সেটি নিয়ে তাকে সেই তলোয়ার দিয়েই আঘাত করলাম যতক্ষণ না তাকে হত্যা করলাম। তিনি বললেন: অতঃপর আমি সেখান থেকে বের হয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলাম যেন আমি মাটি থেকে হালকা হয়ে গেছি (অর্থাৎ অত্যন্ত হালকা ও স্বস্তিবোধ করছিলাম)। আমি তাঁকে খবরটি জানালাম। তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম, যিনি ছাড়া আর কোনো ইলাহ নেই!"— তিনি এটা তিনবার পুনরাবৃত্তি করলেন। আমি বললাম: আল্লাহর কসম, যিনি ছাড়া আর কোনো ইলাহ নেই। তিনি বললেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে হেঁটে বের হলেন, অবশেষে তার (আবু জাহেলের) কাছে এসে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তোমাকে লাঞ্ছিত করেছেন, হে আল্লাহর শত্রু! এই ব্যক্তিই ছিল এই উম্মতের ফিরআউন।" আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তার (আবু জাহেলের) তলোয়ারটি অতিরিক্ত গনিমত হিসেবে প্রদান করলেন, কারণ আমিই তাকে হত্যা করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8593)


8593 - عن عروة بن الزُّبير قال: قال الزُّبير: لقيت يوم بدر عبيدة بن سعيد بن العاص وهو مدجج لا يُرى منه إِلَّا عيناه وهو يكنى أبا ذات الكرش فقال: أنا أبو ذات الكرش، فحملت عليه بالعنزة فطعنت في عينه فمات، قال هشام: فأخبرت أن الزُّبير قال: لقد وضعت رجلي عليه ثمّ تمطأت فكان الجهد أن نزعتها وقد انثنى طرفاها، قال عروة: فسأله إياها رسول الله صلى الله عليه وسلم فأعطاه، فلمّا قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذها، ثمّ طلبها أبو بكر فأعطاه، فلمّا قبض أبو بكر سألها إياه عمر فأعطاه إياها فلمّا قبض عمر أخذها، ثمّ طلبها عثمان منه فأعطاه إياها، فلمّا قتل عثمان وقدت عند آل علي فطلبها عبد الله بن الزُّبير، فكانت عنده حتَّى قتل.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (3998) عن عبيد بن إسماعيل، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن
هشام بن عروة عن أبيه قال: قال الزُّبير: فذكره.

قوله:"مدجّج" أي مغطى بالسلاح ولا يظهر منه شيء.




যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বদরের দিন উবাইদাহ ইবন সাঈদ ইবন আল-আস-এর সাক্ষাৎ পেলাম, সে ছিল সম্পূর্ণরূপে বর্মে আবৃত (মুদাজ্জাজ); তার চোখ ব্যতীত আর কিছুই দেখা যাচ্ছিল না। তার উপনাম ছিল আবু যাতিল কারশ। সে বলল: আমি আবু যাতিল কারশ। অতঃপর আমি (ছোট) বর্শা (আনযা) নিয়ে তার ওপর আক্রমণ করলাম এবং তার চোখে আঘাত করলাম, ফলে সে মারা গেল। হিশাম বললেন: আমাকে জানানো হয়েছে যে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছিলেন: আমি তার ওপর আমার পা রাখলাম, তারপর টেনে বের করার জন্য শরীর বাঁকালাম। সেটা টেনে বের করতে আমার অনেক কষ্ট হলো, আর ইতোমধ্যে সেটির অগ্রভাগ বেঁকে গিয়েছিল। উরওয়াহ বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা (বর্শাটি) তাঁর কাছে চাইলেন, আর তিনি তা দিয়ে দিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন, তখন তিনি তা নিয়ে নিলেন। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা চাইলেন, তিনি তাঁকে তা দিলেন। যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা তাঁর কাছে চাইলেন, আর তিনি তাঁকে তা দিলেন। যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন, তখন তিনি তা নিয়ে নিলেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা তাঁর কাছে চাইলেন, আর তিনি তাঁকে তা দিলেন। যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন, তখন তা আলীর বংশধরদের কাছে ছিল। অতঃপর আব্দুল্লাহ ইবন যুবাইর তা চাইলেন, আর তিনি নিহত হওয়ার আগ পর্যন্ত তা তাঁর কাছেই ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (8594)


8594 - عن عبد الرحمن بن عوف قال: كاتبت أمية بن خلف كتابًا بأن يحفظني في صاغيتي بمكة وأحفظه في صاغيته بالمدينة، فلمّا ذكرت"الرحمن" قال: لا أعرف الرحمن، كاتبني باسمك الذي كان في الجاهلية، فكاتبته"عبد عمرو" فلمّا كان يوم بدر خرجت إلى جبل لأَحرزه حين نام الناس، فأبصر بلال، فخرج حتَّى وقف على مجلس من الأنصار فقال: أمية بن خلف، لا نجوت إن نجا أمية، فخرج معه فريق من الأنصار في آثارنا، فلمّا خشيت أن يلحقونا خلّفت لهم ابنه لأشغلهم فقتلوه، ثمّ أبوا حتَّى يتبعونا - وكان رجلًا ثقيلًا - فلمّا أدركونا قلت له: ابرك، فبرك، فألقيت عليه نفسي لأمنعه، فتجلّلوه بالسيوف من تحتي حتَّى قتلوه، وأصاب أحدهم رجلي بسيفه، وكان عبد الرحمن بن عوف يرينا ذلك الأثر في ظهر قدمه.

صحيح: رواه البخاري في الوكالة (2301) عن عبد العزيز بن عبد الله قال: حَدَّثَنِي يوسف بن الماجشون، عن صالح بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن جده عبد الرحمن بن عوف رضي الله عنه قال: فذكره.

وذكره ابن إسحاق في السيرة عن عبد الرحمن بن عوف بأطول من هذا فقال: حَدَّثَنِي يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه، وقال ابن إسحاق: وحدثنيه أيضًا عن عبد الله بن أبي بكر وغيرهما عن عبد الرحمن بن عوف قال: فذكر القصة مطولًا. سيرة ابن هشام (1/ 631 - 632)




আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমাইয়া ইবনু খালাফের সাথে একটি চুক্তি করেছিলাম যে সে মক্কায় আমার সম্পদ রক্ষা করবে এবং আমি মদীনায় তার সম্পদ রক্ষা করব। যখন আমি [চুক্তিতে আল্লাহর নাম হিসেবে] ‘আর-রাহমান’ (পরম করুণাময়) শব্দটি উল্লেখ করলাম, তখন সে বলল: আমি ‘আর-রাহমান’ চিনি না। জাহিলিয়াতের যুগে তোমার যে নাম ছিল, সেই নামেই আমার সাথে চুক্তি করো। তখন আমি তার সাথে ‘আবদ আমর’ নাম ব্যবহার করে চুক্তি করলাম। এরপর যখন বদরের দিন হলো, লোকেরা ঘুমিয়ে পড়লে আমি তাকে সুরক্ষিত রাখার জন্য একটি পাহাড়ের দিকে নিয়ে গেলাম। তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখতে পেলেন। তিনি বেরিয়ে এসে আনসারদের এক মজলিসের সামনে দাঁড়ালেন এবং বললেন: এই তো উমাইয়া ইবনু খালাফ। উমাইয়া যদি বেঁচে যায়, তবে আমি বাঁচব না। এরপর আনসারদের একটি দল আমাদের পিছু পিছু ছুটতে শুরু করল। যখন আমি আশঙ্কা করলাম যে তারা আমাদের ধরে ফেলবে, তখন আমি তাদের ব্যস্ত রাখার জন্য তার ছেলেকে তাদের সামনে রেখে দিলাম। ফলে তারা তাকে হত্যা করল। তবুও তারা ক্ষান্ত হলো না এবং আমাদের পিছু নেওয়া বন্ধ করল না—আর সে (উমাইয়া) ছিল একজন স্থূলকায় লোক। যখন তারা আমাদের ধরে ফেলল, আমি তাকে বললাম: বসে পড়ো। সে বসে পড়ল। তখন আমি তাকে রক্ষা করার জন্য তার উপরে ঝাঁপিয়ে পড়লাম। কিন্তু তারা আমার নিচ থেকেই তলোয়ার দ্বারা তাকে কোপাতে শুরু করল, অবশেষে তাকে হত্যা করে ফেলল। তাদের মধ্যে একজন তার তলোয়ার দিয়ে আমার পায়ে আঘাত করল। আব্দুর রহমান ইবনু আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের তার পায়ের উপরিভাগে সেই আঘাতের চিহ্ন দেখাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8595)


8595 - عن عبد الله بن مسعود قال: أوّل سورة أنزلت فيها سجدة {وَالنَّجْمِ} قال: فسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم وسجد من خلفه إِلَّا رجلًا رأيته أخذ كفًّا من ترابٍ فسجد عليه، فرأيته بعد ذلك قتل كافرًا، وهو أمية بن خلف.

متفق عليه: أخرجه البخاري في التفسير (4863) ومسلم في المساجد ومواضع الصّلاة (576: 105) كلاهما من طريق أبي إسحاق (هو السبيعي) قال سمعت الأسود بن يزيد، عن عبد الله (وهو ابن مسعود) قال: فذكره.

وعندما طُرح قتلى المشركين في قليب بدر لم يطرح معهم، لأنه انتفخ في درعه فملأها، فذهبوا ليحركوه فتزايل لحمه، فأقروه، وألقوا عليه ما غيبه من التراب والحجارة. سيرة ابن هشام (1/ 639 - 638).




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: প্রথম যে সূরাতে সিজদার আয়াত নাযিল হয়েছিল, তা হলো সূরাহ আন-নাজম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিজদা করলেন এবং তাঁর পিছনে যারা ছিল তারাও সিজদা করল। তবে আমি একজনকে দেখলাম যে সে এক মুষ্টি মাটি নিল এবং তার উপর সিজদা করল। আমি পরবর্তীতে তাকে কাফির অবস্থায় নিহত হতে দেখেছি, সে হলো উমাইয়াহ ইবনে খালাফ।









আল-জামি` আল-কামিল (8596)


8596 - عن إبراهيم قال: أراد الضَّحَّاك بن قيس أن يستعمل مسروقًا فقال له عمارة بن عقبة: أتستعمل رجلًا من بقايا قتلة عثمان؟ فقال له مسروق: حَدَّثَنَا عبد الله بن مسعود - وكان في أنفسنا موثوق الحديث - أن النَّبِي صلى الله عليه وسلم لما أراد قتل أبيك قال: من للصِّبية؟ قال:"النّار"، فقد رضيت لك ما رضي لك رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه أبو داود (2686) والحاكم (2/ 124) كلاهما من حديث عبد الله بن جعفر الرقي، قال أخبرني عبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنَيسة، عن عمرو بن مرة، عن إبراهيم فذكره. وإسناده صحيح.

قال الحاكم: صحيح على شرطهما.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, ইব্‌রাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: দাহহাক ইবনু ক্বায়স মাসরূককে (কোনো কাজে) নিযুক্ত করতে চাইলেন। তখন উমারাহ ইবনু উক্ববাহ তাকে বললেন: আপনি কি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকারীদের অবশিষ্টদের মধ্য থেকে একজনকে নিযুক্ত করবেন? মাসরূক তখন তাকে বললেন: আমাদের নিকট আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদীস বর্ণনা করেছেন—আর আমাদের কাছে তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে অত্যন্ত বিশ্বস্ত ছিলেন—যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তোমার পিতাকে হত্যা করতে চাইলেন, তখন তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "শিশুদের কী হবে?" তিনি বললেন: "জাহান্নামের আগুন।" মাসরূক বললেন: সুতরাং আমি তোমার জন্য তাতেই সন্তুষ্ট হলাম, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমার জন্য সন্তুষ্ট ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8597)


8597 - عن ابن عباس قال: فادى رسول الله صلى الله عليه وسلم أسارى بدر، وكان فداء كل رجل منهم أربعة آلاف، وقتل عقبة بن أبي معيط قبل الفداء، قام إليه علي بن أبي طالب فقتله صبرا، قال: من للصبية يا رسول الله؟ قال:"النّار".

صحيح: رواه عبد الرزّاق (9394) ومن طريقه الطبراني (11/ 406 - 407) عن معمر، عن قتادة. قال: وأخبرني عثمان الجزري، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.

ومعنى قول النَّبِي صلى الله عليه وسلم:"النّار": أي أنت لك النّار، وأمّا الصبية فاتركهم فالله كافلهم، لأن عقبة بن أبي معيط هذا هو الشقي الذي ألقى سلا الجزور على ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يُصَلِّي في بيت الله.

وقيل: النّار أي في ذلك الوقت؛ لأن عقبة بن أبي معيط وأولاده كانوا في حالة الكفر في ذلك الحين، فلمّا أسلم أولاده خرجوا من هذا الوعيد، ويكون قول مسروق في غير محله.

قلت: ولم يقتل صبرًا من الأسرى إِلَّا عقبة بن أبي معيط، والنضر بن الحارث، وأمّا طُعيمة بن عدي فقد قتل في المعركة. هكذا قال أبو عبيد في الأموال (171).

وأمّا ما روي في قتل طعيمة بن عدي صبرًا فكله ضعيف لإرساله.



وقال فيه: يخالف ويخطئ.

ونقل الذّهبي في الميزان (1/ 162) قول الدَّارقطني بأنه ضعيف.

وقال:"هو أحمد بن يحيى بن المنذر شيخ موسى بن إسحاق ومطين، ليس بشيء" انتهى.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের বন্দীদের মুক্তিপণ গ্রহণ করেন। তাদের প্রত্যেক ব্যক্তির মুক্তিপণ ছিল চার হাজার। আর মুক্তিপণ গ্রহণের আগেই উক্ববা ইবনু আবী মু‘আইতকে হত্যা করা হয়েছিল। আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে গিয়ে তাঁকে বন্দী অবস্থায় শিরশ্ছেদ করে হত্যা করেন। উক্ববা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার শিশুদের জন্য কে রইল? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জাহান্নাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (8598)


8598 - عن أنس بن مالك قال: كنا مع عمر بين مكة والمدينة، فتراءينا الهلال، وكنت رجلًا حديد البصر، فرأيته، وليس أحد يزعم أنه رآه غيري، قال: فجعلت أقول لعمر: أما تراه؟ فجعل لا يراه، قال: يقول عمر: سأراه وأنا مستلق على فراشي، ثمّ أنشأ يحدثنا عن أهل بدر فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرينا مصارع أهل بدر بالأمس، يقول:"هذا مصرع فلان غدًا، إن شاء الله" قال: فقال عمر: فوالذي بعثه بالحق! ما أخطؤوا الحدود التي حد رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فجعلوا في بئر بعضهم على بعض، فانطلق رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى انتهى إليهم فقال:"يا فلان بن فلان! ويا فلان بن فلان! هل وجدتم ما وعدكم الله ورسوله حقًّا؟ فإني قد وجدت ما وعدني الله حقًّا".

قال عمر: يا رسول الله! كيف تكلّم أجسادًا لا أرواح فيها؟ قال:"ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، غير أنهم لا يستطيعون أن يردوا عليّ شيئًا".

صحيح: رواه مسلم في الجنّة وصفة نعيمها وأهلها (2873: 76) من طرق عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس بن مالك قال: فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। আমরা চাঁদ দেখার চেষ্টা করছিলাম। আমি ছিলাম তীক্ষ্ণ দৃষ্টিসম্পন্ন একজন লোক, তাই আমি চাঁদ দেখতে পেলাম। কিন্তু আমি ছাড়া আর কেউ দাবি করছিল না যে তারা চাঁদ দেখেছে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করতে লাগলাম: আপনি কি তা দেখছেন না? কিন্তু তিনি তা দেখতে পেলেন না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার বিছানায় শুয়ে দেখব।

এরপর তিনি আমাদের বদরবাসীদের (বদর যুদ্ধে নিহত কাফিরদের) সম্পর্কে বলতে শুরু করলেন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আমাদের পূর্ব দিনই বদরের নিহতদের শাহাদাতস্থলগুলো দেখিয়ে দিয়েছিলেন। তিনি বলছিলেন: “ইনশাআল্লাহ! আগামীকাল এটা অমুক ব্যক্তির মৃত্যুস্থান।”

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সেই সত্তার শপথ, যিনি তাঁকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) যে স্থানগুলো নির্ধারণ করে দিয়েছিলেন, তারা (নিহতরা) তা থেকে এক চুলও বিচ্যুত হয়নি। এরপর তাদেরকে একটি কূপে একজনের ওপর আরেকজনকে ফেলে দেওয়া হলো।

অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) সেখানে গেলেন এবং তাদের কাছে পৌঁছে বললেন: “হে অমুকের পুত্র অমুক! এবং হে অমুকের পুত্র অমুক! তোমাদের রব ও তাঁর রাসূল তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য বলে পেয়েছ? আমি তো আমার রব আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছেন, তা সত্য বলে পেয়েছি।”

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি এমন দেহের সাথে কথা বলছেন, যার মধ্যে কোনো আত্মা নেই?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি যা বলছি, তোমরা তাদের থেকে বেশি শুনতে পাও না। তবে তারা আমাকে কোনো উত্তর দিতে সক্ষম নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (8599)


8599 - عن عبد الله بن مسعود قال: استقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم البيت، فدعا على ستة نفر من قريش، فيهم أبو جهل، وأمية بن خلف، وعتبة بن ربيعة، وشيبة بن ربيعة، وعقبة بن أبي معيط، فأقسم بالله لقد رأيتهم صرعى على بدر قد غيرتهم الشّمس، وكان يومًا حارًّا.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3960) ومسلم في الجهاد والسير (110: 1794) كلاهما من طريق زهير (هو ابن معاوية) حَدَّثَنَا أبو إسحاق، عن عمرو بن ميمون، عن عبد الله بن مسعود قال: فذكره. واللّفظ لمسلم.

قوله:"فدعا على ستة نفر من قريش" لم يذكر إِلَّا الخمسة أما السادس فهو الوليد بن عتبة كما عند البخاري.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা‘বার দিকে মুখ করলেন, এরপর তিনি কুরাইশের ছয়জন লোকের বিরুদ্ধে বদদো‘আ করলেন। তাদের মধ্যে ছিল আবূ জাহল, উমাইয়াহ ইবনু খালফ, উতবাহ ইবনু রাবী‘আহ, শাইবাহ ইবনু রাবী‘আহ এবং উকবাহ ইবনু আবী মু‘আইত। তিনি (ইবনু মাসঊদ) বলেন: আল্লাহর শপথ, আমি তাদের বদরের দিন মৃত অবস্থায় পড়ে থাকতে দেখেছি। সূর্য তাদেরকে বিকৃত করে দিয়েছিল এবং সেদিন খুবই গরম ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (8600)


8600 - عن ابن عباس، قال: إن الملأ من قريش اجتمعوا في الحجر، فتعاقدوا باللات والعزى، ومناة الثالثة الأخرى، ونائلة وإساف: لو قد رأينا محمدًا، لقد قمنا إليه قيام
رجل واحد، فلم نفارقه حتَّى نقتله، فأقبلت ابنته فاطمة رضي الله عنها تبكي، حتَّى دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: هؤلاء الملأ من قريش، قد تعاقدوا عليك، لو قد رأوك، لقد قاموا إليك فقتلوك، فليس منهم رجل إِلَّا قد عرف نصيبه من دمك. فقال: يا بنية! أريني وضوءًا، فتوضأ، ثمّ دخل عليهم المسجد، فلمّا رأوه، قالوا: ها هو ذا، وخفضوا أبصارهم، وسقطت أذقانهم في صدورهم، وعقروا في مجالسهم، فلم يرفعوا إليه بصرًا، ولم يقم إليه منهم رجل، فأقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى قام على رؤوسهم، فأخذ قبضة من التراب، فقال:"شاهت الوجوه" ثمّ حصبهم بها، فما أصاب رجلًا منهم من ذلك الحصى حصاة إِلَّا قتل يوم بدر كافرًا.

حسن: رواه أحمد (2672)، وابن حبَّان (6502)، وصحّحه الحاكم (1/ 163) كلّهم من طرق عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن عثمان بن خُثيم فإنه حسن الحديث.

ورواه أبو بكر بن عَيَاش عن عبد الله بن عثمان بهذا الإسناد واختلف عليه:

فمرة رواه عن عبد الله بن عثمان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس كما رواه البيهقي في الدلائل (6/ 240). وقد توبع على هذا الوجه كما تقدّم.

ومرة رواه عن عبد الله بن عثمان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن فاطمة كما رواه الحاكم (3/ 157). ولم يُتابع على هذا الوجه فلعله من سوء حفظه لأنه لما كبَّر ساء حفظه. ويقال: وممن قتل يوم بدر عامر بن عبد الله بن الجراح قتله ولده أبو عبيدة عامر بن عبد الله بن الجراح وفيه نزل قوله تعالى: {لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ أُولَئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ أُولَئِكَ حِزْبُ اللَّهِ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ} [المجادلة: 22] إِلَّا أنه منكر. رواه الطبراني في الكبير (1/ 117 - 118) والحاكم (3/ 264 - 265) كلاهما من طريق أسد بن موسى، ثنا ضمرة، عن ابن شوذب، قال: جعل أبو أبي عبيدة يتصدى لأبي عبيدة يوم بدر، فجعل أبو عبيدة يُحيد عنه، فلمّا أكثر قصده أبو عبيدة فقتله، فأنزل الله عز وجل فيه هذه الآية.

وابن شوذب هو عبد الله بن شوذب الخراساني وثّقه ابن معين والنسائي، ولكن بينه وبين أبي عبيدة بون شاسع، فإنه مات سنة ست أو سبع وخمسين بعد المائة وهو من رجال التهذيب. ولذا قال الحافظ في الإصابة (5/ 509) رواه الطبراني بسند جيد عن عبد الله بن شوذب. وقال في الفتح (7/ 93): رواه الطبراني وغيره من طريق عبد الله بن شوذب مرسلًا" وقال في التلخيص (4/ 102):"وهذا معضل وكان الواقدي ينكره ويقول: مات والد أبي عبيدة قبل الإسلام".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশের নেতৃস্থানীয় ব্যক্তিরা কা'বা চত্বরে (হিজর) একত্রিত হলো। তারা লাত, উযযা, তৃতীয় মানাত, না'ইলা এবং ইসাফের নামে শপথ করল যে, যদি তারা মুহাম্মাদকে দেখে, তবে তারা এক ব্যক্তি হিসেবে তার দিকে উঠে যাবে এবং তাকে হত্যা না করা পর্যন্ত তাকে ছাড়বে না। অতঃপর তাঁর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাঁদতে কাঁদতে আসলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করে বললেন: কুরাইশের ওই নেতৃস্থানীয় ব্যক্তিরা আপনার বিরুদ্ধে শপথ করেছে। তারা যদি আপনাকে দেখে, তবে তারা আপনার দিকে এগিয়ে এসে আপনাকে হত্যা করবে। তাদের এমন কেউ নেই, যে আপনার রক্তে তার ভাগ সম্পর্কে অবহিত নয়। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আমার প্রিয় কন্যা! আমাকে ওযুর পানি এনে দাও।" অতঃপর তিনি ওযু করলেন। এরপর তিনি তাদের নিকট মসজিদে প্রবেশ করলেন। যখন তারা তাঁকে দেখল, তখন তারা বলল: "এই তো তিনি।" কিন্তু তারা তাদের দৃষ্টি অবনত করল, তাদের চিবুক তাদের বুকের উপর ঝুঁকে পড়ল এবং তারা নিজ নিজ মজলিসে নিশ্চল হয়ে রইল। তাদের কেউই তাঁর দিকে চোখ তুলে তাকাতে পারল না এবং তাদের মধ্য থেকে কেউই তাঁর দিকে উঠে দাঁড়াতে পারল না। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে গেলেন এবং তাদের মাথার উপর দাঁড়ালেন। তিনি এক মুষ্টি মাটি নিলেন এবং বললেন: "শাহতিল উজূহ (মুখমণ্ডল বিকৃত হোক)!" অতঃপর তিনি সেই মাটি তাদের দিকে নিক্ষেপ করলেন। তাদের মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি ছিল না, যার গায়ে সেই মাটির একটি কণাও লেগেছিল, অথচ সে বদরের দিন কাফির হিসেবে নিহত হয়নি।