হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (8601)


8601 - عن أبي طلحة أن نبي الله صلى الله عليه وسلم أمر يوم بدر بأربعة وعشرين رجلًا من صناديد قريش، فقذفوا في طوىً من أطواء بدر خبيث مخبث. وكان إذا ظهر على قوم أقام بالعرْصة ثلاث ليالٍ. فلمّا كان ببدر اليوم الثالث أمر براحلته فشدّ عليها رحلها، ثمّ مشى واتّبعه أصحابه وقالوا: ما نرى ينطلق إِلَّا لبعض حاجته حتَّى قام على شفة الرّكي فجعل يناديهم بأسمائهم وأسماء آبائهم:"يا فلان بن فلان، ويا فلان بن فلان، أيسرّكم أنكم أطعتم الله ورسوله؟ فإنا قد وجدنا ما وعدنا ربّنا حقًّا، فهل وجدتم ما وعد ربّكم حقًّا؟" قال: فقال عمر: يا رسول الله! ما تكلم من أجساد لا أرواح لها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"والذي نفس محمد بيده، ما أنتم بأسمع لما أقول منهم".

قال قتادة: أحياهم الله حتَّى أسمعهم قوله توبيخًا وتصغيرًا ونقيمة وحسرة وندمًا.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976) ومسلم في الجنّة وصفة نعيمها وأهلها (78: 2875) كلاهما من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، من أنس بن مالك، عن أبي طلحة (هو زيد بن سهل الأنصاري) قال: فذكره. والسياق للبخاري، واختصره مسلم.

قوله:"على شفة الركيّ" أي طرف البئر، والركيّ بفتح الراء وكسر الكاف وتشديد آخره: البئر قبل أن تطوى.

قوله:"في طويّ من أطواء بدر" طوي: وهي البئر التي طويت وبنيت بالحجارة لتثبت ولا تنهار. ويجمع بين الروايتين بأنها كانت مطوية فاستهدمت فصارت كالركي. انظر: الفتح (7/ 302) قوله:"أقام بالعرصة ثلاث ليال" العرصة: الساحة أو البقعة الواسعة.

وعدد قتلى المشركين كان سبعين. فلعل الآخرين دفنوا في أماكن أخرى.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাদ্‌র যুদ্ধের দিন কুরাইশ সর্দারদের মধ্য থেকে চব্বিশজন লোকের ব্যাপারে নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তাদেরকে বাদ্‌রের কূপগুলোর (ত্বয়ী) মধ্যে একটি নোংরা ও দুর্গন্ধযুক্ত কূপে নিক্ষেপ করা হলো। আর তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো গোত্রের ওপর বিজয় লাভ করতেন, তখন সেই বিস্তৃত ময়দানে তিন রাত অবস্থান করতেন।

বাদ্‌র প্রান্তরে যখন তৃতীয় দিন হলো, তখন তিনি তাঁর বাহন প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তার উপর আসন শক্ত করে বাঁধা হলো। অতঃপর তিনি হেঁটে চললেন এবং সাহাবীগণও তাঁর অনুসরণ করলেন। সাহাবীগণ বললেন, আমরা মনে করি, তিনি তাঁর কোনো প্রয়োজনেই যাচ্ছেন, যতক্ষণ না তিনি সেই কূপের (রাকিয়) কিনারায় এসে দাঁড়ালেন। এরপর তিনি তাদেরকে তাদের নাম ও তাদের পিতাদের নাম ধরে ডাকতে লাগলেন:

"হে অমুকের পুত্র অমুক! হে অমুকের পুত্র অমুক! তোমরা যদি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করতে, তবে কি তোমরা খুশি হতে না? আমরা তো আমাদের প্রতিপালক আমাদের কাছে যা ওয়াদা করেছিলেন, তা সত্য পেয়েছি। তোমরাও কি তোমাদের প্রতিপালক তোমাদের কাছে যা ওয়াদা করেছিলেন, তা সত্য পেয়েছ?"

বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আপনি এমন দেহের সঙ্গে কথা বলছেন, যার মধ্যে কোনো রূহ নেই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তোমরা আমার কথা তাদের চেয়ে বেশি শোনো না।"

কাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আল্লাহ তাদের জীবিত করেছিলেন, যেন তারা তাঁর কথা শুনতে পায়—ভর্ৎসনা, হেয় প্রতিপন্ন করা, প্রতিশোধ, আফসোস ও অনুশোচনা স্বরূপ।









আল-জামি` আল-কামিল (8602)


8602 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك قتلى بدر ثلاثًا، ثمّ أتاهم فقام عليهم، فناداهم، فقال:"يا أبا جهل بن هشام! يا أمية بن خلف! يا عتبة بن ربيعة! يا شيبة بن ربيعة! أليس قد وجدتم ما وعد ربّكم حقًّا؟ فإني قد وجدت ما وعدني ربي حقًّا" فسمع عمر قول النَّبِي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! كيف يسمعوا وأنّى يجيبوا وقد جيفوا؟ قال:"والذي نفسي بيده! ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، ولكنهم لا يقدرون أن يجيبوا" ثمّ أمر بهم فسحبوا فألقوا في قليب بدر.

صحيح: رواه مسلم في الجنّة وصفة نعيمها وأهلها (77: 2874) عن هدّاب بن خالد، حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكره.
قوله:"فأُلقوا في قليب بدر" لم يكن أمية بن خلف في القليب لأنه كان ضخمًا فانتفخ وتقطّعت أوصاله بعد الجرّ فألقوا عليه من الحجارة والتراب ما غيبه، لكنه كان قريبًا من القليب فنودي فيمن نودي.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের নিহতদের তিন দিন (মাঠে) রেখে দিলেন। এরপর তিনি তাদের কাছে এলেন এবং তাদের সামনে দাঁড়িয়ে তাদের নাম ধরে ডাকলেন। তিনি বললেন: "হে আবু জাহল ইবনে হিশাম! হে উমাইয়া ইবনে খালাফ! হে উতবা ইবনে রবি’আহ! হে শায়বা ইবনে রবি’আহ! তোমাদের প্রতিপালক তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য পাওনি? নিশ্চয়ই আমার প্রতিপালক আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, আমি তা সত্য পেয়েছি।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা শুনে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তারা কিভাবে শুনবে এবং কিভাবেই বা উত্তর দেবে, যখন তারা পচে গেছে (লাশ হয়ে গেছে)?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! আমি যা বলছি, তোমরা তাদের চেয়ে বেশি শ্রবণকারী নও। তবে তারা উত্তর দিতে সক্ষম নয়।" এরপর তিনি তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদেরকে টেনে নিয়ে বদরের কূপে নিক্ষেপ করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (8603)


8603 - عن ابن عمر قال: وقف النَّبِي صلى الله عليه وسلم على قليب بدر فقال:"هل وجدتم ما وعد ربّكم حقًّا؟" ثمّ قال:"إنَّهم الآن يسمعون ما أقول"، فذكر لعائشة فقالت: إنّما قال النَّبِي صلى الله عليه وسلم:"إنهم الآن ليعلمون أن الذي كنت أقول لهم هو الحق". ثم قرأت: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [النمل: 80] حتَّى قرأت الآية.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3980) ومسلم في الجنائز (26: 932) كلاهما من طريق هشام، عن أبيه، عن ابن عمر قال: فذكره.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর কূপের (লাশ ফেলার স্থান) কাছে দাঁড়িয়ে বললেন, "তোমাদের প্রতিপালক তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তা কি তোমরা সত্য বলে পেলে?" এরপর তিনি বললেন, "তারা এখন আমি যা বলছি তা শুনতে পাচ্ছে।" এরপর বিষয়টি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো শুধু এতটুকুই বলেছিলেন: "তারা এখন জানতে পারছে যে, আমি তাদের কাছে যা বলতাম, তা-ই সত্য।" এরপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয় আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারবেন না..." (সূরা নামল: ৮০) যতক্ষণ না তিনি আয়াতটি শেষ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8604)


8604 - عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالقتلى أن يطرحوا في القليب، فطرحوا فيه، إِلَّا ما كان من أمية بن خلف، فإنه انتفخ في درعه، فملأها، فذهبوا ليحركوه، فتزايل، فأقروه، وألقوا عليه ما غيبه من التراب والحجارة، فلمّا ألقاهم في القليبٍ، وقف عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أهل القليب، هل وجدتم ما عدكم ربّكم حقًّا؟ فإني قد وجدت ما وعدني ربي حقًّا" قال: فقال له أصحابه: يا رسول الله! أتكلم قومًا موتى؟ ! فقال لهم:"لقد علموا أن ما وعدتهم حق" قالت عائشة: والناس يقولون: لقد سمعوا ما قلت لهم، وإنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد علموا".

حسن: رواه أحمد (26361)، وابن حبَّان (7088)، والحاكم (3/ 224) كلّهم من حديث محمد بن إسحاق قال: أخبرني يزيد بن رومان، عن عروة بن الزُّبير، عن عائشة قالت: فذكرته وهو عند ابن هشام (1/ 638).

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرّح.

ثمّ لفظ الحاكم يختلف عن هذه، وإليكم ذكره كاملًا:

قالت عائشة: لما أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالقتلى أن يطرحوا في القليب طرحوا فيه، وأخذ عتبة بن ربيعة، فسحب إلى القليب، فنظر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى وجه أبي حذيفة بن عتبة، فإذا هو كئيب، قد تغير لونه، فقال:"يا أبا حذيفة! لعلك قد دخلك من شأن أبيك شيء؟" أو كما قال صلى الله عليه وسلم فقال: لا والله يا رسول الله! ما شككت في أبي ولا في مصرعه، ولكني كنت أعرف من أبي رأيًا وحلمًا وفضلًا، فكنت أرجو أن يهديه ذلك إلى الإسلام، فلمّا رأيت ما أصابه، وذكرت ما مات عليه من الكفر بعد الذي كنت أرجو له، أحزنني ذلك، فدعا له رسول الله صلى الله عليه وسلم بخير وقال له:"خيرًا" انتهى.

وقصة أبي حذيفة ذكرها ابن إسحاق بقوله: فيما بلغني كما هو عند سيرة ابن هشام (1/
640، 638) فالله أعلم بالصواب.

وأبو حذيفة هو ابن عتبة بن ربيعة بن عبد شمس بن عبد مناف القرشي كان من السابقين إلى الإسلام، وهاجر هجرتين، وصلى إلى القبلتين، وشهد بدرًا وأحدًا والخندق والحديبية والمشاهد كلها، وقتل يوم اليمامة شهيدًا. وهو الذي تبنى سالمًا كما تبنى رسول الله صلى الله عليه وسلم زيد بن حارثة، فكان أبو حذيفة يرى أنه ابنه فأنكحه ابنة أخيه فاطمة بنت الوليد بن عتبة، فلمّا أنزل الله {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ} [الأحزاب: 5] رد كل أحد تبنّى ابنًا من أولئك إلى أبيه، ومن لم يعرف أبوه رد إلى مواليه.

وقصته في الرضاع مشهورة، فإن سهلة بنت سهيل زوجة أبي حذيفة أتت لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إن سالمًا بلغ ما يبلغ الرجال، وإنه يدخل عليّ، وأظن في نفس أبي حذيفة من ذلك شيئًا، فقال:"أرضعيه تحرمي عليه" رواه مسلم كما سبق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিহতদের কূপে নিক্ষেপ করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তাদের কূপে নিক্ষেপ করা হলো, কেবল উমাইয়া ইবনু খালাফ ব্যতীত। কারণ সে তার বর্মে (ঢালে) এমনভাবে ফুলে গিয়েছিল যে তা ভরে গিয়েছিল। তারা তাকে সরাতে গেল, তখন সে বিচ্ছিন্ন হয়ে (ভেঙ্গে) গেল। ফলে তারা তাকে ছেড়ে দিল এবং তার উপর মাটি ও পাথর চাপা দিল যা তাকে আড়াল করে দেয়। যখন তিনি তাদেরকে কূপে নিক্ষেপ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের উপর দাঁড়িয়ে বললেন: "হে কূপের অধিবাসীগণ! তোমাদের প্রতি তোমাদের রব যে ওয়াদা করেছিলেন, তা কি তোমরা সত্য পেয়েছ? কারণ, আমার রব আমাকে যে ওয়াদা করেছিলেন, আমি তা সত্য পেয়েছি।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তাঁর সাহাবিগণ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মৃতদের সাথে কথা বলছেন?" তিনি তাদের বললেন: "তারা জেনে নিয়েছে যে, তাদের যে ওয়াদা দেওয়া হয়েছিল তা সত্য।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মানুষ বলে যে, তারা আমার কথা শুনেছে, কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শুধু বলেছিলেন: "তারা জেনে নিয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8605)


8605 - عن أبي إسحاق قال: سمعت البراء بن عازب رضي الله عنهما يحدّث قال: جعل النَّبِي صلى الله عليه وسلم على الرجالة يوم أحد - وكانوا خمسين رجلًا - عبد الله بن جبير، فقال:"إنَّ رأيتمونا تخطفنا الطير فلا تبرحوا مكانكم هذا حتَّى أرسل إليكم، وإن رأيتمونا هزمنا القوم وأوطأناهم فلا تبرحوا حتَّى أرسل إليكم"، فهزموهم، قال: فأنا والله رأيت النساء يشددن قد بدت خلاخلهن وأسوقهن، رافعات ثيابهن، فقال أصحاب ابن جبير: الغنيمة أي قوم الغنيمة، ظهر أصحابكم فما تنتظرون؟ فقال عبد الله بن جبير: أنسيتم ما قال لكم رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قالوا: والله لنأتين الناس فلنصيبن من الغنيمة فلمّا أتوهم صرفت وجوههم، فأقبلوا منهزمين، فذاك إذ يدعوهم الرسول في أخراهم، فلم يبق مع النَّبِي صلى الله عليه وسلم غير اثني عشر رجلًا، فأصابوا منا سبعين، وكان النَّبِي صلى الله عليه وسلم وأصحابه أصاب من المشركين يوم بدر أربعين ومائة: سبعين أسيرًا، وسبعين قتيلا … الحديث.

صحيح: رواه البخاري في الجهاد والسير (3039) عن عمرو بن خالد، حَدَّثَنَا زهير، حَدَّثَنَا أبو إسحاق (هو السبيعي) قال: سمعت البراء بن عازب يحدّث قال: فذكره.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পঞ্চাশজন পদাতিক তীরন্দাজদের উপর আব্দুল্লাহ ইবনে জুবাইরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিযুক্ত করলেন এবং বললেন: "যদি তোমরা দেখতে পাও যে, পাখি এসে আমাদের ছোঁ মেরে নিয়ে যাচ্ছে, তবুও আমি তোমাদের কাছে বার্তা না পাঠানো পর্যন্ত তোমরা এই স্থান ত্যাগ করবে না। আর যদি তোমরা দেখতে পাও যে, আমরা শত্রুদের পরাজিত করেছি এবং তাদের উপর বিজয় লাভ করেছি, তবুও আমি তোমাদের কাছে বার্তা না পাঠানো পর্যন্ত তোমরা এ স্থান ত্যাগ করবে না।" অতঃপর (মুসলিমরা) তাদের পরাজিত করল। তিনি (বারা ইবনে আযিব) বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি নারীদেরকে দৌড়ে পালাতে দেখেছি, তাদের গোড়ালি ও পায়ের নিম্নাংশ উন্মুক্ত হয়ে গিয়েছিল, তারা তাদের পোশাক উপরে তুলে ধরেছিল। তখন ইবনে জুবাইরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সঙ্গীরা বলতে শুরু করল: গনিমত! হে কওম, গনিমত! তোমাদের সাথীরা জয়ী হয়েছে, তোমরা আর কীসের অপেক্ষা করছ? আব্দুল্লাহ ইবনে জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে যা বলেছেন তা কি তোমরা ভুলে গেছো? তারা বলল: আল্লাহর শপথ! আমরা লোকদের কাছে যাব এবং গনিমত অর্জন করবই। অতঃপর যখন তারা তাদের কাছে পৌঁছল, তখন তাদের (মুসলমানদের) দিক পরিবর্তিত হলো (অর্থাৎ তারা পাল্টে গেল), আর তারা পালাতে শুরু করল। এই সময় রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পেছন থেকে তাদের ডাকছিলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাত্র বারো জন লোক অবশিষ্ট রইল। (শত্রুরা) আমাদের সত্তরজনকে আঘাত করল (হত্যা করল)। অথচ বদরের যুদ্ধের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সঙ্গীরা মুশরিকদের একশত চল্লিশজনকে কাবু করেছিলেন: সত্তরজন বন্দী এবং সত্তরজন নিহত। ...হাদীসটি।









আল-জামি` আল-কামিল (8606)


8606 - عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر:"من استطعتم أن تأسروا من بني عبد المطلب، فإنهم خرجوا كُرهًا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (676) عن أبي سعيد، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة
ابن مضرّب، عن علي فذكره. وإسناده صحيح.

وأمّا ما رواه ابن إسحاق قال: حَدَّثَنِي العباس بن عبد الله بن معبد، عن بعض أهله، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لأصحابه يومئذ:"إنِّي قد عرفت أن رجالا من بني هاشم وغيرهم قد أخرجوا كرهًا، لا حاجة لهم بقتالنا".

وذكر منهم: أبو البختري بن هشام بن الحارث بن أسد والعباس بن عبد المطلب.

فقال أبو حذيفة: أنقتل آباءنا وأبناءنا وإخواننا وعشيرتنا، ونترك العباس، والله لئن لقيته لأُلحمنّه السيف، قال: فبلغت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال لعمر بن الخطّاب:"يا أبا حفص! أيُضرب وجه عم رسول الله بالسيف؟" فقال عمر: يا رسول الله! دعني فلأضرب عنقه بالسيف، فوالله! لقد نافق. فكان أبو حذيفة يقول: ما أنا بآمن من تلك الكلمة التي قلت يومئذ. ولا أزال منها خائفًا إِلَّا أن تكفرها عني الشهادة، فقتل يوم اليمامة شهيدًا. فهو ضعيف؛ فإن فيه رجالا لا يعرفون.

وأمّا أبو البختري فكان أكف القوم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بمكة، وكان لا يؤذيه، ولا يبلغه عنه شيء يكرهه، وكان ممن قام في نقض الصحيفة التي كتبت قريش علي بني هاشم وبني المطلب، فلقيه المجذّر بن زياد البلوي حليف الأنصار. فقال المجذّر لأبي البختري: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد نهانا عن قتلك، ومع أبي البختري زميل له، قد خرج معه من مكة، وهو جنادة بن مليحة بنت زهير بن الحارث بن أسد، فقال: وزميلي؟ فقال له المجذر: لا والله ما نحن بتارك زميلك، ما أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا بك وحدك، فقال: لا والله إذا لأموتن أنا وهو جميعًا. لا تتحدث عني نساء مكة أني تركت زميلي حرصًا على الحياة.

ثمّ إن المجذّر أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: والذي بعثك بالحق لقد جهدت عليه أن يستأسر، فآتيك به فأبى إِلَّا أن يقاتلني، فقاتلته فقتلته.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদর যুদ্ধের দিন বললেন: "বনু আব্দুল মুত্তালিবের মধ্যে যাদেরকে তোমরা বন্দী করতে সক্ষম হবে, (তাদের বন্দী করো), কারণ তারা অনিচ্ছাসত্ত্বেও (যুদ্ধে) এসেছিল।"

এটি সহীহ। ইমাম আহমদ (৬৭৬) এটি বর্ণনা করেছেন আবু সাঈদ থেকে, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইসরাঈল, তিনি আবু ইসহাক থেকে, তিনি হারিসা ইবনে মুদাররিব থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর এর সনদ সহীহ।

আর যা ইবনু ইসহাক বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-আব্বাস ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে মা'বাদ, তার পরিবারের কারো সূত্রে, ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন তাঁর সাহাবীদের বলেছিলেন: "আমি অবগত হয়েছি যে, বনু হাশিম ও অন্যান্য গোত্রের কিছু লোককে অনিচ্ছাসত্ত্বেও বের করে আনা হয়েছে। আমাদের সাথে যুদ্ধ করার কোনো প্রয়োজন তাদের নেই।" তিনি তাদের মধ্যে আবু আল-বাখতারি ইবনে হিশাম ইবনে আল-হারিস ইবনে আসাদ এবং আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের নাম উল্লেখ করলেন।

তখন আবু হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা কি আমাদের পিতা, পুত্র, ভাই ও আত্মীয়-স্বজনকে হত্যা করব, আর আব্বাসকে ছেড়ে দেব? আল্লাহর কসম! যদি আমি তাকে পাই, তবে অবশ্যই আমি তার গায়ে তলোয়ার চালাব। বর্ণনাকারী বলেন: এ কথা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট পৌঁছালে তিনি উমর ইবনুল খাত্তাবকে বললেন: "হে আবু হাফস! রাসূলের চাচার মুখে কি তলোয়ারের আঘাত করা হবে?" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে ছেড়ে দিন, আমি অবশ্যই তার গর্দান তলোয়ার দিয়ে মেরে দেব। আল্লাহর কসম! সে মুনাফিকি করেছে। এরপর থেকে আবু হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: সেদিন আমি যে কথা বলেছিলাম, তার থেকে আমি নিরাপদ নই। আমি সর্বদা এ বিষয়ে ভীত থাকি, যদি না শাহাদাত আমার পক্ষ থেকে তার কাফফারা হয়ে যায়। এরপর তিনি ইয়ামামার যুদ্ধে শাহীদ হন। তবে এই (সনদটি) দুর্বল; কারণ এতে এমন কিছু বর্ণনাকারী রয়েছেন যাদের পরিচয় জানা যায় না।

আর আবু আল-বাখতারি প্রসঙ্গে বলতে হয়, তিনি মক্কায় থাকাকালীন সময়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উপর আক্রমণ করা থেকে নিজেকে সবচেয়ে বেশি বিরত রাখতেন। তিনি তাঁকে কষ্ট দিতেন না এবং তাঁর কাছ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অপছন্দনীয় কোনো কিছু পৌঁছাতো না। কুরাইশরা বনু হাশিম ও বনু মুত্তালিবের বিরুদ্ধে যে চুক্তিপত্র লিখেছিল, তা ভঙ্গ করার উদ্যোগ গ্রহণকারীদের মধ্যে তিনিও ছিলেন। (বদরের দিন) আনসারদের মিত্র আল-মুজায্যার ইবনে যিয়াদ আল-বালাবি তার সাথে দেখা করলেন। আল-মুজায্যার আবু আল-বাখতারিকে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে তোমাকে হত্যা করা থেকে নিষেধ করেছেন। আবু আল-বাখতারির সাথে তার এক সহযাত্রী ছিল, যে তার সাথে মক্কা থেকে বের হয়েছিল। সে হলো জুনাদা ইবনে মুলাইহা বিনতে যুহাইর ইবনে আল-হারিস ইবনে আসাদ। তখন আবু আল-বাখতারি জিজ্ঞেস করলেন: আর আমার সহযাত্রী? আল-মুজায্যার তাকে বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা তোমার সহযাত্রীকে ছাড়ব না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কেবল তোমাকে একাই (ছাড় দিতে) নির্দেশ দিয়েছেন। তখন আবু আল-বাখতারি বললেন: আল্লাহর কসম! তাহলে আমি এবং সে দুজনই একসাথে মারা যাব। মক্কার নারীরা যেন আমার বিষয়ে আলোচনা না করে যে, আমি জীবনের লোভে আমার সহযাত্রীকে ছেড়ে দিয়েছিলাম। এরপর আল-মুজায্যার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে বললেন: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি তাকে বন্দী হওয়ার জন্য পীড়াপীড়ি করেছিলাম, যেন আমি তাকে আপনার কাছে নিয়ে আসতে পারি, কিন্তু সে তা প্রত্যাখ্যান করে আমার সাথে যুদ্ধ করতে চাইল। ফলে আমি তার সাথে যুদ্ধ করলাম এবং তাকে হত্যা করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8607)


8607 - عن علي بن أبي طالب قال: جاء رجل من الأنصار قصير بالعباس بن عبد المطلب أسيرًا، فقال العباس: يا رسول الله! إن هذا والله ما أسرني، لقد أسرني رجل أجْلح من أحسن الناس وجهًا على فرس أبلق ما أراه في القوم، فقال الأنصاري: أنا أسرته يا رسول الله! فقال:"اسكت، فقد أيدك الله تعالى بملك كريم" قال علي: فأسرنا من بني عبد المطلب: العباس، وعقيلًا، ونوفل بن الحارث.

صحيح: رواه أحمد (948) عن حجَّاج، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب، عن علي فذكره في حديث طويل. وإسناده صحيح.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্য থেকে খাটো আকৃতির এক ব্যক্তি আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিবকে বন্দী হিসেবে নিয়ে এলেন। তখন আব্বাস বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর কসম, এই ব্যক্তি আমাকে বন্দী করেনি। বরং আমাকে বন্দী করেছে এক টাক মাথার ব্যক্তি, যার চেহারা ছিল মানুষের মধ্যে সবচেয়ে সুন্দর, (সে ছিল) একটি সাদা-কালো ঘোড়ার উপর আরোহণকারী। আমি তাকে এই লোকদের মধ্যে দেখতে পাচ্ছি না। তখন আনসারী ব্যক্তিটি বলল, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমিই তাকে বন্দী করেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "চুপ থাকো, আল্লাহ তাআলা তোমাকে একজন সম্মানিত ফিরিশতা দ্বারা সাহায্য করেছেন।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমরা বানু আব্দুল মুত্তালিবের মধ্যে থেকে আব্বাস, আকীল এবং নাওফাল ইবনু হারিসকে বন্দী করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8608)


8608 - عن ابن عباس قال: فلمّا أسروا الأسارى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر وعمر:"ما ترون في هؤلاء الأسارى؟" فقال أبو بكر: يا نبي الله! هم بنو العم والعشيرة، أرى أن تأخذ منهم فدية فتكون لنا قُوة على الكفار، فعسى الله أن يهديهم للإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما ترى يا ابن الخطّاب؟" قلت: لا، والله! يا رسول الله! ما أرى الذي رأى أبو بكر، ولكني أرى أن تمكنّا فنضرب أعناقهم، فتمكّن عليًا من عقيل فيضرب عنقه، وتمكنّي من فلان (نسيبًا لعمر) فأضرب عنقه، فإن هؤلاء أئمة الكفر وصناديدها فهوى رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قال أبو بكر، ولم يهو ما قلت، فلمّا كان من الغد جئت فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر قاعدين يبكيان، قلت: يا رسول الله! أخبرني من أي شيء تبكي أنت وصاحبك، فإن وجدت بكاء بكيت وإن لم أجد تباكيت لبكائكما، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أبكي للذي عرض عليّ أصحابك، من أخذهم الفداء، لقد عرض علي عذابهم أدنى من هذه الشجرة" (شجرة قريبة من نبي الله صلى الله عليه وسلم) وأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ} [الأنفال: 67] إِلَى قَولِهِ: {فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِبًا} [الأنفال: 69] فأحلّ الله الغنيمة لهم.

صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (58: 1763) من طرق عن عكرمة بن عمار، حَدَّثَنِي أبو زميل سماك الحنفي، حَدَّثَنِي عبد الله بن عباس قال: حَدَّثَنِي عمر بن الخطّاب قال: فذكر الحديث بطوله كما هو مذكور في موضعه.

ورواه الإمام أحمد (208) عن أبي نوح قراد، قال: أخبرنا عكرمة بن عمار بإسناده أطول من هذا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন বন্দীদের ধরে আনা হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "এই বন্দীদের সম্পর্কে তোমাদের কী মত?"

তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর নবী! তারা আমাদের চাচাতো ভাই ও গোত্রের লোক। আমার মত হলো, আপনি তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করুন, যা কাফিরদের মুকাবেলায় আমাদের জন্য শক্তি হবে। আর সম্ভবত আল্লাহ তাদের ইসলাম গ্রহণের তৌফিক দেবেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে ইবনুল খাত্তাব, তোমার কী মত?"

আমি (উমর) বললাম: না, আল্লাহর শপথ! হে আল্লাহর রাসূল! আবূ বকর যা দেখেছেন, আমি তা দেখি না। বরং আমার মত হলো, আপনি আমাদের ক্ষমতা দিন, যাতে আমরা তাদের গর্দান উড়িয়ে দিতে পারি। আপনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আকীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপরে ক্ষমতা দিন, যাতে তিনি তার গর্দান উড়িয়ে দেন। আর আমাকে অমুকের (উমরের একজন আত্মীয়) উপর ক্ষমতা দিন, যাতে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই। কারণ, এরা হলো কুফরের নেতা ও রথী-মহারথী।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতকে পছন্দ করলেন এবং আমার মতকে পছন্দ করলেন না।

পরের দিন যখন আমি এলাম, তখন দেখি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসে আছেন এবং কাঁদছেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি ও আপনার সঙ্গী কী কারণে কাঁদছেন, আমাকে বলুন। যদি কান্নার কারণ পাই, তবে আমিও কাঁদব, আর যদি কারণ না পাই, তবে আপনাদের কান্নার কারণে আমি কান্নার ভান করব।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কাঁদছি সেই কারণে, যা তোমার সাথীরা আমার কাছে প্রস্তাব করেছে—তাদের পক্ষ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণের কারণে। আমার সামনে তাদের আযাব এই গাছের চেয়েও কাছে দেখানো হয়েছে।" (গাছটি ছিল আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছাকাছি।)

আর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "কোনো নবীর জন্য উচিত নয় যে, তার নিকট যুদ্ধবন্দী থাকবে, যতক্ষণ না সে পৃথিবীতে রক্তপাত করে শক্তিবৃদ্ধি করে।" [সূরাহ আল-আনফাল: ৬৭] তাঁর এই উক্তি পর্যন্ত: "অতএব তোমরা যে গনীমত লাভ করেছো, তা থেকে বৈধ ও পবিত্র বস্তু খাও।" [সূরাহ আল-আনফাল: ৬৯]। এভাবে আল্লাহ তাদের জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8609)


8609 - عن ابن عمر قال: استشار رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأسارى أبا بكر فقال: قومك وعشيرتك فخل سبيلهم، فاستشار عمر فقال: اقتلهم قال: فغداهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ} [الأنفال: 67] إِلَى قَولِهِ: {فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِبًا} [الأنفال: 69] قال: فلقي النَّبِي صلى الله عليه وسلم عمر قال:"كاد أن يصيبنا في خلافك بلاء".

حسن: رواه الحاكم (2/ 329) عن أبي العباس محمد بن أحمد المحبوبي، ثنا سعيد بن مسعود، ثنا عبيد الله بن موسى، ثنا إسرائيل، عن إبراهيم بن مهاجر، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

قال الحاكم: صحيح الإسناد. وقال الذّهبي: على شرط مسلم.

قلت: وهو كما قال غير أن إبراهيم بن مهاجر البجلي وإن كان من رجال مسلم إِلَّا أنه مختلف فيه
فقال أبو حاتم: ليس بالقوي، وقال ابن حبَّان: كثير الخطأ، ومشّاه الآخرون. وبه صار الإسناد حسنًا.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বন্দীদের বিষয়ে আবূ বাকরের সাথে পরামর্শ করলেন। আবূ বকর বললেন, ‘এরা আপনার স্বজাতি এবং আপনার গোত্রীয় লোক, অতএব আপনি তাদের ছেড়ে দিন।’ অতঃপর তিনি উমরের সাথে পরামর্শ করলেন। তিনি (উমর) বললেন, ‘তাদেরকে হত্যা করুন।’ তিনি (ইবনু উমর) বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন। তখন আল্লাহ তা‘আলা অবতীর্ণ করলেন: {কোনো নবীর জন্য সঙ্গত নয় যে, তাঁর নিকট যুদ্ধবন্দী থাকবে, যতক্ষণ না তিনি যমীনে যথেষ্ট রক্তপাত ঘটান (শত্রুদের পর্যুদস্ত করেন)} [সূরা আনফাল: ৬৭] হতে আল্লাহর বাণী: {সুতরাং তোমরা যুদ্ধলব্ধ যে সম্পদ ভোগ করছ, তা বৈধ ও পবিত্র জেনে খাও} [সূরা আনফাল: ৬৯] পর্যন্ত। তিনি (ইবনু উমর) বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে বললেন, ‘তোমার মতের বিরোধিতার কারণে প্রায় আমাদের ওপর বিপদ এসে পড়েছিল।’









আল-জামি` আল-কামিল (8610)


8610 - عن أنس - وذكر رجلًا عن الحسن - قال: استشار رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس في الأسارى يوم بدر، فقال:"إنَّ الله قد أمكنكم منهم" قال: فقام عمر بن الخطّاب، فقال: يا رسول الله! اضرب أعناقهم، قال: فأعرض عنه النَّبِي صلى الله عليه وسلم قال: ثمّ عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أيها الناس! إن الله قد أمكنكم منهم، وإنما هم إخوانكم بالأمس" قال: فقام عمر، فقال: يا رسول الله! اضرب أعناقهم، قال: فأعرض عنه النَّبِي صلى الله عليه وسلم، قال: ثمّ عاد النَّبِي صلى الله عليه وسلم فقال للناس مثل ذلك، فقام أبو بكر، فقال: يا رسول الله! نرى أن تعفو عنهم، وتقبل منهم الفداء، قال: فذهب عن وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم ما كان فيه من الغم، قال: فعفا عنهم، وقبل منهم الفداء، قال: وأنزل الله: {لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 68].

حسن: رواه أحمد (13555) عن علي بن عاصم، عن حميد، عن أنس فذكره.

ورُوي مرسلًا عن الحسن كما هو، إِلَّا أن الراوي عن الحسن لم يُسم.

وإسناده حسن من أجل علي بن عاصم هو ابن صُهيب الواسطي وهو ضعيف عند أكثر أهل العلم إِلَّا أن العجلي وثّقه، وكان أحمد لا يرى بأسًا بالرواية عنه.

قال عبد الله بن أحمد بن حنبل: حَدَّثَنِي أبي قال: قال وكيع وذكر علي بن عاصم فقال: خذوا من حديثه ما صحّ ودعوا ما غلط، أو ما أخطأ فيه.

قال عبد الله:"كان أبي يحتج بهذا ويقول: كان يغلط ويخطئ، وكان فيه لجاج، ولم يكن متهما بالكذب".

وهذا الحديث مما لم يخطئ فيه.

وبمعناه ما رُوي عن عبد الله قال: لما كان يوم بدر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تقولون في هؤلاء الأسرى؟" قال: فقال أبو بكر: يا رسول الله! قومك وأهلك، استبقهم، واستأن بهم، لعل الله أن يتوب عليهم، قال: وقال عمر: يا رسول الله! أخرجوك وكذبوك، قربهم فاضرب أعناقهم، قال: وقال عبد الله بن رواحة: يا رسول الله! انظر واديًا كثير الحطب، فأدخلهم فيه، ثمّ أضرم عليهم نارًا، قال: فقال العباس: قطعت رحمك، قال: فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يردّ عليهم شيئًا، قال: فقال ناس: يأخذ بقول أبي بكر، وقال ناس: يأخذ بقول عمر، وقال ناس: يأخذ بقول عبد الله بن رواحة. قال: فخرج عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّ الله ليلين قلوب الرجال فيه، حتَّى تكون ألين من اللبن، وإن الله ليشد قلوب رجال فيه، حتَّى تكون أشد من الحجارة، وإن مثلك يا أبا بكر كمثل إبراهيم عليه السلام، قال: {فَمَنْ تَبِعَنِي فَإِنَّهُ مِنِّي وَمَنْ عَصَانِي فَإِنَّكَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [إبراهيم: 36] ومثلك يا
أبا بكر كمثل عيسى قال: {إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [المائدة: 118] وإن مثلك يا عمر كمثل نوح قال: {وَقَالَ نُوحٌ رَبِّ لَا تَذَرْ عَلَى الْأَرْضِ مِنَ الْكَافِرِينَ دَيَّارًا} [نوح: 26] وإن مثلك يا عمر كمثل موسى قال: {وَقَالَ مُوسَى رَبَّنَا إِنَّكَ آتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلأَهُ زِينَةً وَأَمْوَالًا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّوا عَنْ سَبِيلِكَ رَبَّنَا اطْمِسْ عَلَى أَمْوَالِهِمْ وَاشْدُدْ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا حَتَّى يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ} [يونس: 88] أنتم عالة فلا ينفلتن منهم أحد إلا بفداء أو ضربة عنق".

قال عبد الله: فقلت: يا رسول الله، إلا سهيل ابن بيضاء، فإني قد سمعته يذكر الإسلام، قال: فسكت قال: فما رأيتني في يوم أخوف من أن تقع عليّ حجارة من السماء في ذلك اليوم حتى قال:"إلا سهيل ابن بيضاء" قال: فأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (67) لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 67 - 68].

رواه أحمد (3632) عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي عبيدة، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه الترمذي (1714)، (3084) من طريق أبي معاوية به، إلا أنه لم يذكر القصة بطولها.

ورواه أحمد (3634) عن حسين - يعني ابن محمد - حدثنا جرير - يعني ابن حازم - عن الأعمش … فذكر نحوه. إلا أنه قال: فقام عبد الله بن جحش، فقال: يا رسول الله! أعداء الله، كذبوك، وآذوك، وأخرجوك، وقاتلوك، وأنت بواد كثير الحطب، فاجمع لهم حطبًا كثيرًا، ثم أضرمه عليهم، وقال: سهل بن بيضاء.

وقال الترمذي: هذا حديث حسن، وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه.

وكذلك جزم غير واحد من أهل العلم بأنه لم يسمع من أبيه، بل وقد صرّح هو بنفسه بأنه لم يسمع من أبيه، ولكن قال بعض أهل العلم: إنه حديث أهل البيت ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.

وللحديث طرق أخرى عن ابن مسعود، لكنها أشد ضعفًا من هذه.

وقوله (سهيل ابن بيضاء) كذا في حديث أبي معاوية، وجاء في حديث جرير بن حازم: (سهل ابن بيضاء) وهذا هو الصواب.

قال ابن سعد في الطبقات (4/ 231):"والذي روى هذه القصة في سهيل ابن بيضاء قد أخطأ، سهيل ابن بيضاء أسلم قبل عبد الله بن مسعود ولم يستخف بإسلامه، وهاجر إلى المدينة، وشهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مسلما لا شك فيه، فغلط من روى ذلك الحديث ما بينه وبين أخيه، لأن سهيلا أشهر من أخيه سهل، والقصة في سهل، وأقام سهل بالمدينة بعد ذلك، وشهد مع النبي صلى الله عليه وسلم بعض المشاهد، وبقي بعد النبي صلى الله عليه وسلم. اهـ

وقوله: (عبد الله بن رواحة) كذا جاء في حديث أبي معاوية، وجاء في حديث جرير: (عبد الله
ابن جحش) بدل (عبد الله بن رواحة) قال الطبراني (10259): والصواب عبد الله بن جحش.

وأما ما رُوي عن علي، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن جبرائيل هبط عليه فقال له: خيّرهم - يعني أصحابك - في أسارى بدر القتل أو الفداء على أن يقتل منهم قابل مثلهم، قالوا: الفداء، ويقتل منا".

وفي رواية:"خيرهم - يعني أصحابك - في الأسارى إن شاؤوا الفداء على أن يُقتل العام المقبل منهم عدتهم قالوا: الفداء، ويقتل منا عدتهم". فهو معلول سندًا ومتنًا. رواه الترمذي (1567) وابن حبان في صحيحه (4795) كلاهما من حديث أبي داود الحفري (وهو عمرو بن سعد) قال: حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن سفيان بن سعيد الثوري، عن هشام بن حسان، عن ابن سيرين، عن عبيدة (وهو ابن عمرو السلماني) عن علي فذكره.

واللفظ للترمذي، واللفظ الثاني لابن حبان.

وأعله الترمذي فقال:"هذا حديث حسن غريب من حديث الثوري، لا نعرفه إلا من حديث ابن أبي زائدة. وروى أبو أسامة، عن هشام، عن ابن سيرين، عن عبيدة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه. وروى ابن عون عن ابن سيرين، عن عبيدة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا. وأبو داود الحفري اسمه: عمر بن سعد" اهـ.

فتفرد ابن أبي زائدة مع كونه ثقة دون أصحاب الثوري محل نظر.

ثم الاختلاف في الوصل والإرسال، قال البخاري:"روى أكثر الناس هذا الحديث عن ابن سيرين، عن عبيدة مرسلا". (علل الترمذي الكبير 2/ 971).

وقال الدارقطني:"المرسل أشبه بالصواب". (العلل 4/ 31).

وزدْ على ذلك كله أن في معناه غرابة؛ فإن التخيير لو حصل للنبي صلى الله عليه وسلم من الوحي لما جاءت المعاتبة على اختياره الفداء دون القتل في قوله تعالى: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (67) لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 67 - 68] ومن حاول الجمع فقد تكلف.

وقوله:"قابل" أي في العام المقبل يقتل من المسلمين مثل هذا العدد.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত (এবং একজন বর্ণনাকারী হাসান (রহ.) এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন বন্দীদের ব্যাপারে মানুষের সাথে পরামর্শ করলেন। তিনি বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে তাদের ওপর ক্ষমতা দিয়েছেন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তাদের গর্দান কেটে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার ফিরে এসে বললেন, "হে লোক সকল! আল্লাহ তোমাদেরকে তাদের ওপর ক্ষমতা দিয়েছেন, আর গতকালও তারা ছিল তোমাদের ভাই।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তাদের গর্দান কেটে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার ফিরে এসে লোকদেরকে একই কথা বললেন। তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মতে আপনি তাদের প্রতি দয়া করুন এবং তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করুন।" বর্ণনাকারী বলেন, এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় যে পেরেশানি ছিল তা দূর হয়ে গেল। তিনি বলেন, এরপর তিনি তাদের ক্ষমা করে দিলেন এবং তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহ তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "যদি আল্লাহর পূর্ব সিদ্ধান্ত না থাকত, তবে তোমরা যা গ্রহণ করেছ (মুক্তিপণ), তার জন্য তোমাদের ওপর বিরাট শাস্তি আসত।" (সূরা আনফাল: ৬৮)।

এই ঘটনার অর্থে আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে: যখন বদরের দিন হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এইসব বন্দীদের ব্যাপারে তোমাদের কী অভিমত?" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এরা আপনার গোত্রের লোক ও আত্মীয়-স্বজন। আপনি এদের জীবিত রাখুন এবং তাদের প্রতি সদয় হোন, সম্ভবত আল্লাহ তাদের তাওবা কবুল করবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এরা আপনাকে দেশ থেকে বের করে দিয়েছে এবং আপনাকে মিথ্যাবাদী বলেছে। এদেরকে আমার কাছে আনুন, আমি এদের গর্দান কেটে দেব।" বর্ণনাকারী বলেন, আর আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! অনেক কাঠখড়ি আছে এমন একটি উপত্যকা দেখুন, তাদের সেখানে ঢুকিয়ে দিন, তারপর তাদের উপর আগুন ধরিয়ে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "তুমি তোমার আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করলে!" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কারো কথার কোনো জবাব না দিয়ে (ঘরে) প্রবেশ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন কেউ কেউ বলল, "তিনি আবু বকরের অভিমত গ্রহণ করবেন।" আবার কেউ কেউ বলল, "তিনি উমরের অভিমত গ্রহণ করবেন।" আবার কেউ কেউ বলল, "তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহার অভিমত গ্রহণ করবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে বেরিয়ে এসে বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ কারও কারও অন্তর নিজের জন্য এমন কোমল করে দেন যে তা দুধের চেয়েও নরম হয়ে যায়, আর নিশ্চয় আল্লাহ কারও কারও অন্তর নিজের জন্য এমন কঠিন করে দেন যে তা পাথরের চেয়েও কঠোর হয়ে যায়। আর হে আবূ বকর! তোমার উদাহরণ হলো ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'অতএব যে আমার অনুসরণ করবে, সে আমার দলভুক্ত, আর যে আমার অবাধ্য হবে, তবে নিশ্চয় আপনি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।' (সূরা ইবরাহীম: ৩৬)। আর হে আবূ বকর! তোমার উদাহরণ হলো ঈসা (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'যদি আপনি তাদের শাস্তি দেন তবে তারা তো আপনারই বান্দা, আর যদি আপনি তাদের ক্ষমা করে দেন, তবে নিশ্চয়ই আপনি পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়।' (সূরা মায়েদা: ১১৮)। আর হে উমর! তোমার উদাহরণ হলো নূহের (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'আর নূহ বলল, হে আমার রব! আপনি পৃথিবীতে কাফিরদের মধ্য থেকে একটি বসতি স্থাপনকারীকেও অবশিষ্ট রাখবেন না।' (সূরা নূহ: ২৬)। আর হে উমর! তোমার উদাহরণ হলো মূসার (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'মূসা বলল, হে আমাদের রব! আপনি তো ফির‘আউন ও তার পারিষদবর্গকে পার্থিব জীবনে সৌন্দর্য ও সম্পদ দান করেছেন। হে আমাদের রব! যাতে তারা আপনার পথ থেকে বিচ্যুত করে। হে আমাদের রব! তাদের ধন-সম্পদ ধ্বংস করে দিন এবং তাদের অন্তরকে কঠোর করে দিন, যাতে তারা যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি না দেখা পর্যন্ত ঈমান না আনে।' (সূরা ইউনুস: ৮৮)। তোমরা (বর্তমানে) দরিদ্র। তাদের মধ্য থেকে কেউই যেন মুক্তিপণ অথবা গর্দান কেটে দেওয়া ছাড়া পালাতে না পারে।"

বর্ণনাকারী আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! সুহাইল ইবন বাইদা ব্যতীত, কেননা আমি শুনেছি সে ইসলামের কথা আলোচনা করে।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি চুপ রইলেন। বর্ণনাকারী বলেন, সেদিন আমার আকাশ থেকে পাথর পড়ে যাওয়ার চেয়েও বেশি ভয় লাগছিল, যতক্ষণ না তিনি বললেন: "তবে সুহাইল ইবন বাইদা ব্যতীত।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "কোনো নবীর জন্য সঙ্গত নয় যে, তার হাতে যুদ্ধবন্দী থাকবে, যে পর্যন্ত না সে জমিনে রক্তক্ষয় করে। তোমরা দুনিয়ার ক্ষণস্থায়ী সম্পদ চাও, আর আল্লাহ চান আখিরাত। আর আল্লাহ মহাপরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময় (৬৭)। যদি আল্লাহর পূর্ব সিদ্ধান্ত না থাকত, তবে তোমরা যা গ্রহণ করেছ, তার জন্য তোমাদের ওপর বিরাট শাস্তি আসত (৬৮)।" (সূরা আনফাল: ৬৭-৬৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (8611)


8611 - عن ابن عباس قال: فادى النبي صلى الله عليه وسلم بأسارى بدر، فكان فداء كل واحد منهم أربعة آلاف.

صحيح: رواه عبد الرزاق (9394) ومن طريقه الطبراني في الكبير (11/ 406 - 407) عن معمر، عن قتادة، قال: وأخبرني عثمان الجزري، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.

وعثمان الجزري فيه كلام ولكنه توبع. وذكر الهيثمي في"المجمع" (6/ 89) وقال:"رواه
الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله رجال الصحيح".

وقال ابن هشام في سيرته (1/ 660): كان فداء المشركين يومئذ أربعة آلاف درهم للرجل إلى ألف درهم إلا من لا شيء له، فمنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عليه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের বন্দীদের মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন, আর তাদের প্রত্যেকের মুক্তিপণ ছিল চার হাজার।









আল-জামি` আল-কামিল (8612)


8612 - عن عبد الله بن الزبير قال: كانت قريش ناحتْ قتلاها، ثم ندمتْ، وقالوا: لا تنوحوا عليهم فيبلغ ذلك محمدًا وأصحابه، فيشمتوا بكم. وكان في الأسرى أبو وداعة بن صبيرة السهمي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن له بمكة ابنا تاجرًا كيّسًا ذا مال كأنكم به قد جاءكم في فداء أبيه" فلما قالت قريش في الفداء ما قالت، قال المطلب: صدقتم والله لئن فعلتم ليتأرَّبُ عليكم، ثم انسل من الليل، فقدم المدينة، ففدى أباه بأربعة ألف درهم.

حسن: رواه الطبراني في الكبير (14/ 203 - 204) من وجهين عن جرير بن حازم قال: ثنا ابن إسحاق، قال: حدثني يحيى بن عباد، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير قال: فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (6/ 90):"رواه الطبراني ورجاله ثقات".

قلت: إسناده حسن من أجل ابن إسحاق، ومن هذا الطريق رواه أيضًا الضياء في المختارة (9/ 312 - 313).

ولكن ذكره ابن هشام في سيرته (1/ 647 - 648) عن محمد بن إسحاق مرسلًا، أي لم يذكر فيه"عبد الله بن الزبير".

وأما ما روي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم جعل فداء أهل الجاهلية يوم بدر أربع مائة فإن فيه شذوذًا.

رواه أبو داود (2691) والنسائي في الكبرى (8607) والحاكم (2/ 125) والبيهقي (6/ 321 - 322) من طريق عبد الرحمن بن المبارك العيشي، حدثنا سفيان بن حبيب، حدثنا شعبة، عن أبي العنبس، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس فذكره.

وقال الحاكم: حديث صحيح على شرطهما.

قلت: ليس كما قالا، فإن أبا العنبس وهو الكوفي الأكبر ليس من رجال الشيخين، ولم يوثّقه أحد، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم يتابع على ذلك، وفي قوله: أربع مائة: نكارة وشذوذ. والمحفوظ: أربعة آلاف كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশরা তাদের নিহতদের জন্য বিলাপ করেছিল, অতঃপর তারা অনুতপ্ত হলো এবং বলল: তোমরা তাদের জন্য বিলাপ করো না, তাহলে এই খবর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সঙ্গীদের কাছে পৌঁছে যাবে, ফলে তারা তোমাদের নিয়ে উপহাস করবে। বন্দীদের মধ্যে ছিলেন আবু ওয়াদা‘আহ ইবনু সুবাইরাহ আস-সাহমী। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "মক্কায় তার একজন বিচক্ষণ, সম্পদশালী ব্যবসায়ী ছেলে আছে। যেন তোমরা দেখছো, সে তার পিতার মুক্তির জন্য তোমাদের কাছে এসে গেছে।" যখন কুরাইশরা মুক্তিপণ সম্পর্কে যা বলার বলল, তখন মুত্তালিব বলল: তোমরা সত্য বলেছো। আল্লাহর কসম! তোমরা যদি এমনটি করো, তবে তা তোমাদের উপর বিপদ টেনে আনবে। এরপর সে রাতের বেলায় চুপিচুপি চলে গেল, অতঃপর মদীনায় এসে তার পিতাকে চার হাজার দিরহামের বিনিময়ে মুক্ত করে নিয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (8613)


8613 - عن أنس أن رجالًا من الأنصار استأذنوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: ائذن لنا فلنترك لابن أختنا عباس فداءه، قال:"والله لا تذرون منه درهمًا".

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4018) عن إبراهيم بن المنذر، حدثنا محمد بن فليح،
عن موسى بن عقبة، قال ابن شهاب: حدثنا أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্য থেকে কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চাইলেন। তারা বললেন: আপনি আমাদের অনুমতি দিন, যাতে আমরা আমাদের ভাগ্নে আব্বাসের মুক্তিপণ ছেড়ে দিতে পারি। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহর কসম! তোমরা তার থেকে একটি দিরহামও ছাড়তে পারবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (8614)


8614 - عن عائشة قالت: قال العباس: إني كنت مسلمًا يا رسول الله! قال:"الله أعلم بإسلامك، فإن يكن كما تقول فالله يجزيك فافد نفسك، وابني أخويك نوفل بن الحارث، وعقيل بن أبي طالب، وحليفك عتبة بن عمرو"قال: ما ذاك عندي يا رسول الله! قال:"فأين المال الذي دفنت أنت وأم الفضل، فقلت لها: إن أصبت فهذا المال لبني الفضل، وعبد الله وقثم" فقال: والله يا رسول الله إني أشهد أنك رسول الله إن هذا لشيء ما علمه أحد غيري وغير أم الفضل، فاحسب لي يا رسول الله ما أصبتم مني عشرين أوقية من مال كان معي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفعل" ففدى العباس نفسه وابني أخويه وحليفه، وأنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [الأنفال: 70] فأعطاني مكان العشرين من الأوقية في الإسلام عشرين عبدًا كلهم في يده مال يضرب به، مع ما أرجو من مغفرة الله عز وجل.

حسن: رواه الحاكم (3/ 324) وعنه البيهقي (6/ 322) من حديث يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، ثنا يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه صرّح بالتحديث.

وروى محمد بن إسحاق هذه القصة من أوجه أخرى عن ابن عباس. رواه أحمد (3310) وفيه رجل لم يسم، وفي الأخرى عن يزيد بن رومان عن عروة، عن الزهري وجماعة سماهم. ورواه البيهقي في الدلائل (3/ 142) نحوه، وهذه تقوي ما سبق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি মুসলিম ছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার ইসলাম সম্পর্কে আল্লাহই ভালো জানেন। যদি তুমি যা বলছো তা সত্য হয়, তবে আল্লাহ তোমাকে পুরস্কৃত করবেন। তবে তুমি তোমার নিজের পক্ষ থেকে মুক্তিপণ দাও এবং তোমার দুই ভাইপো—নাওফাল ইবনুল হারিস ও উকাইল ইবনু আবী তালিব এবং তোমার চুক্তিবদ্ধ মিত্র উতবাহ ইবনু আমর-এর মুক্তিপণও দাও।" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে তো তা নেই। তিনি বললেন: "তাহলে সেই সম্পদ কোথায় যা তুমি ও উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাটি চাপা দিয়েছিলে? আর তুমি তাকে বলেছিলে যে, ‘যদি আমি আঘাতপ্রাপ্ত হই (বা মারা যাই), তবে এই সম্পদ ফাদল, আব্দুল্লাহ ও ক্বুসামের জন্য’?" তখন তিনি (আব্বাস) বললেন: আল্লাহর শপথ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি আল্লাহর রাসূল। এই বিষয়টি আমি ও উম্মুল ফাদল ছাড়া আর কেউ জানত না। সুতরাং ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে থাকা সম্পদ থেকে আপনারা যা নিয়েছেন, সেই বিশ উকিয়া (Ounce)-কে আমার জন্য গণ্য করুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাই করব।" এরপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের, তাঁর দুই ভাইপোর এবং তাঁর মিত্রের মুক্তিপণ দিলেন। আর আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {হে নবী, তোমরা বন্দীদের মধ্যে যাদের উপর কর্তৃত্ব কর, তাদেরকে বল: যদি আল্লাহ তোমাদের অন্তরে কোনো কল্যাণ দেখতে পান, তবে তোমাদের কাছ থেকে যা নেওয়া হয়েছে, তা থেকে উত্তম কিছু তিনি তোমাদেরকে দেবেন এবং তোমাদেরকে ক্ষমা করবেন; আর আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।} [সূরা আনফাল: ৭০] অতঃপর ইসলামের (কল্যাণে), সেই বিশ উকিয়ার পরিবর্তে আল্লাহ আমাকে বিশজন দাস প্রদান করলেন, যাদের প্রত্যেকের হাতে এমন সম্পদ ছিল যা দিয়ে তারা ব্যবসা করত; সেই সাথে আমি আল্লাহ তাআলার পক্ষ থেকে যে ক্ষমার আশা রাখি (তাও পেলাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (8615)


8615 - عن ابن عباس قال: كان ناس من الأسرى يوم بدر لم يكن لهم فداء، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم فداءهم أن يعلموا أولاد الأنصار الكتابة، قال: فجاء غلام يومًا يبكي إلى أبيه، فقال: ما شأنك؟ قال: ضربني معلمي، قال: الخبيث يطلب بذهل بدر، والله لا تأتيه أبدًا.

حسن: رواه أحمد (2216) عن علي بن عاصم، والبيهقي (6/ 322) من طريق علي بن عاصم وخالد بن عبد الله - كلاهما عن داود بن أبي هند، حدثنا عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن عاصم؛ فإنه ضعيف عند أكثر أهل العلم إلا أن الإمام أحمد كان حسن الرأي فيه، وقد توبع.

وقوله: الذهْل: الثأر أو العداوة والحقد.

وروى ابن سعد في طبقاته (2/ 22) عن عامر الشعبي مرسلًا: قال: أسر النبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر سبعين أسيرًا، وكان يفادي بهم على قدر أموالهم، وكان أهل مكة يكتبون وأهل المدينة لا يكتبون. فمن لم يكن له فداء دفع إليه عشرة غلمان من غلمان المدينة فعلمهم، فإذا حذقوا فهو فداؤه.

وقال: فكان زيد بن ثابت ممن علّم. انتهى.

وقال ابن الطلاع في أقضية رسول الله صلى الله عليه وسلم (1/ 235 - 236):"وربما فودي على أن يعلم عددًا من المسلمين الكتابة، روي عن النبي صلى الله عليه وسلم يعلم عشرة من المسلمين الكتابة، قال ابن وهب:"لأن أهل المدينة لم يكونوا يحسنون الخط".




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধের বন্দীদের মধ্যে এমন কিছু লোক ছিল যাদের মুক্তিপণ দেওয়ার মতো কিছু ছিল না। তাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের মুক্তিপণ নির্ধারণ করলেন যে তারা আনসারদের সন্তানদেরকে লেখা শেখাবে। তিনি বললেন: একদিন একটি ছেলে কাঁদতে কাঁদতে তার বাবার কাছে এলো। বাবা জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কী হয়েছে? সে বললো: আমার শিক্ষক আমাকে মেরেছেন। বাবা বললেন: এই দুষ্টু লোকটা বদরের প্রতিশোধ চাইছে! আল্লাহর কসম, তুমি আর কখনোই তার কাছে যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (8616)


8616 - عن عائشة قالت: لما بعت أهل مكة في فداء أسراهم، بعثت زينب في فداء أبي العاص بمال، وبعثت فيه بقلادة لها، كانت عند خديجة، أدخلتها بها على أبي العاص، قالت: فلما رآها رسول الله صلى الله عليه وسلم رق لها رقّة شديدة، وقال:"أرأيتم أن تطلقوا لها أسيرها، وتردّوا الذي لها؟" فقالوا: نعم، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ عليه - أو وعده - أن يخلّي سبيل زينب إليه، وبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم زيد بن حارثة ورجلا من الأنصار، فقال:"كونوا ببطن (يأجج) حتى تمرّ بكما زينب، فتصحباها حتى تأتيا بها".

حسن: رواه أبو داود (2692) وأحمد (26362) وابن الجارود (1090) والحاكم (3/ 23 و 236 و 4/ 44 - 45) والبيهقي كلهم من طرق عن محمد بن إسحاق، حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه عباد، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فذكرته. والسياق لأبي داود، وهو في سيرة ابن هشام (1/ 653).

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنه حسن الحديث إذا صرّح.

وقال الحاكم: حديث صحيح على شرط مسلم.

وممن مُنّ عليهم أيضًا بغير فداء: المطلب بن حنطب بن الحارث بن عبيدة بن عمر بن مخزوم، كان لبعض بني الحارث بن الخزرج فترك في أيديهم حتى خلّوا سبيله، فلحق بقومه.

وصيفي بن أبي رفاعة من بني مخزوم، ترك في أيدي أصحابه، فلما لم يأت أحد في فدائه أخذوا عليه ليبعثن إليهم بفدائه، فخلّوا سبيله، فلم يف لهم بشيء.

وأبو عزة وهو عمرو بن عبد الله بن عثمان بن أهيب بن حذافة بن جُمح كان محتاجًا ذا بنات،
فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! لقد عرفت ما لي من مال، وإني لذو حاجة وذو عيال، فامنن علي، فمنّ عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وأخذ عليه ألّا يظاهر عليه أحدًا فقال أبو عزة في ذلك يمدح رسول الله صلى الله عليه وسلم:

من مبلغ عني الرسول محمدًا … بأنك حق والمليك حميد

وأنت امرؤ تدعو إلى الحق والهدى … عليك من الله العظيم شهيد

سيرة ابن هشام (1/ 659 - 660)




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মক্কার লোকেরা তাদের বন্দীদের মুক্তিপণ পাঠাল, তখন যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূল ‘আস-এর মুক্তিপণ হিসেবে কিছু অর্থ পাঠালেন। তিনি এর সঙ্গে একটি হারও পাঠালেন, যা খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিল এবং যা দিয়ে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়নাবকে আবূল ‘আস-এর কাছে (বাসরঘরে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি (আয়িশা) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা দেখলেন, তখন তিনি অত্যন্ত মর্মাহত হলেন এবং বললেন: "তোমরা কি মনে করো যে, তোমরা তার জন্য তার বন্দীকে মুক্ত করে দেবে এবং তার যা কিছু আছে, তা তাকে ফেরত দেবে?" তারা বলল: হ্যাঁ। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছ থেকে প্রতিশ্রুতি নিয়েছিলেন—অথবা তিনি তাঁকে ওয়াদা দিয়েছিলেন—যে, তিনি যায়নাবকে তাঁর কাছে ফেরত পাঠাবেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দ ইবন হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আনসারী এক ব্যক্তিকে পাঠালেন এবং বললেন: "তোমরা ইয়াজাজ উপত্যকায় অবস্থান করবে, যতক্ষণ না যায়নাব তোমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করে। তারপর তোমরা তার সঙ্গী হয়ে তাকে (মদিনায়) নিয়ে আসবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8617)


8617 - عن جبير بن مطعم أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في أسارى بدر:"لو كان المطعم بن عديّ حيًّا ثم كلّمني في هؤلاء النّتْنى لتركتهم له".

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4024) عن إسحاق بن منصور، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه فذكره.

وقوله:"النتنى" جمع نتن بالنون وهم أسارى بدر من المشركين.

والمطعم والد جبير ممن دخل النبي صلى الله عليه وسلم في جواره عندما رجع من الطائف، فإن المطعم أمر أربعة من أولاده فلبسوا السلاح، وقام كل واحد منهم عند ركن من الكعبة، فبلغ ذلك قريشًا، فقالوا له: أنت الرجل الذي لا تخفر ذمته، وكان مطعم من أشد من قام في نقض الصحيفة التي كتبها قريش علي بني هاشم، ومن معهم من المسلمين حين حصروهم في الشعب.

ومات المطعم بن عدي قبل وقعة بدر، وله بضع وتسعون سنة.

وفي أحاديث الأبواب السابقة دليل على أن الإمام مخير في الأسارى البالغين، إن شاء منّ عليهم، وأطلقهم من غير فداء، وإن شاء فاداهم بمال معلوم، وإن شاء قتلهم، وإليه ذهب الشافعي وأحمد وهو قول الأوزاعي وسفيان وغيرهم من أهل العلم.



يصيب العدو منه غرة واشتغلنا به، فنزلت: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْ} [الأنفال: 1] فقسمها رسول الله صلى الله عليه وسلم على فواق بين المسلمين، قال: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أغار في أرض العدو نفّل الربع، وإذا أقبل راجعًا وكُلُّ الناسِ، نفّل الثلث، وكان يكره الأنفال، ويقول:"ليردّ قوي المؤمنين على ضعيفهم"

رواه أحمد (22762) عن معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق، عن عبد الرحمن بن عياش بن أبي ربيعة، عن سليمان بن موسى، عن أبي سلّام عن أبي أمامة، عن عبادة بن الصامت فذكره.

ورواه محمد بن إسحاق فقال: وحدثني عبد الرحمن بن الحارث وغيره من أصحابنا، عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن أبي أمامة الباهلي قال: سألت عبادة بن الصامت عن الأنفال فقال: فينا أصحاب بدر نزلت حين اختلفنا في النفل، وساءت فيه أخلاقنا، فنزعه الله من أيدينا، فجعله إلى رسوله، فقسمّه رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المسلمين عن بواء، يقول: على السواء. سيرة ابن هشام (1/ 642).

ورواه أيضًا الترمذي (1561) وابن ماجه (2852) وابن حبان (4855) والحاكم (2/ 135) كلهم من حديث عبد الرحمن بن الحارث بهذا الإسناد واختصره بعضهم.

وقال الترمذي: حديث عبادة حسن.

وقال الحاكم بعد أن رواه من حديث إسماعيل بن جعفر، حدثني عبد الرحمن بن الحارث بإسناده: صحيح على شرط مسلم، وله شاهد من حديث محمد بن إسحاق القرشي.

وهؤلاء جميعًا زادوا في الإسناد"مكحول" بين سليمان بن موسى وأبي أمامة.

وأعل البخاري بأن سليمان بن موسى منكر الحديث، وقال: أنا لا أروي عنه شيئًا، روى سليمان بن موسى أحاديث عامتها مناكير وقال: هذا الحديث لا يصح، إنما روى هذه الحديث داود بن عمرو عن أبي سلام، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا" العلل الكبير للترمذي (2/ 665 - 666).




জুবাইর ইবনে মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বদরের বন্দীদের সম্পর্কে বলেন: "যদি মুত‘ইম ইবনে আদী জীবিত থাকত এবং এই দুর্গন্ধযুক্ত (বন্দীদের) ব্যাপারে আমার সাথে কথা বলত, তবে আমি তাদেরকে তার জন্য ছেড়ে দিতাম।"

সহীহ: এটি বুখারী (৪০০২৪) ইসহাক ইবনে মানসূর থেকে বর্ণনা করেছেন...। তাঁর বাণী "আল-নুতনা" (النتنى) হল 'নাতন' (نتن)-এর বহুবচন, যা দ্বারা বদরের মুশরিক বন্দীদের বোঝানো হয়েছে। মুত‘ইম হলেন জুবাইরের পিতা, যিনি তায়েফ থেকে ফেরার সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে আশ্রয় দিয়েছিলেন। কেননা মুত‘ইম তাঁর চার পুত্রকে অস্ত্র ধারণ করার নির্দেশ দেন এবং তাদের প্রত্যেকে কা‘বার একটি করে কোণায় দাঁড়ান। এ খবর কুরাইশদের নিকট পৌঁছালে তারা মুত‘ইমকে বলেছিল: আপনি এমন একজন ব্যক্তি যার প্রতিশ্রুতি কখনও ভঙ্গ হয় না। কুরাইশরা যখন বনু হাশিম ও তাদের সাথে থাকা মুসলমানদের উপত্যকায় অবরুদ্ধ করে রেখেছিল, তখন যে চুক্তির পত্র লেখা হয়েছিল তা বাতিলের জন্য যারা জোরালো ভূমিকা নিয়েছিলেন মুত‘ইম ছিলেন তাদের অন্যতম। মুত‘ইম ইবনে আদী বদর যুদ্ধের আগে নব্বই-এর অধিক বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন। পূর্ববর্তী অধ্যায়ের হাদীসগুলোতে প্রমাণ রয়েছে যে, প্রাপ্তবয়স্ক বন্দীদের ব্যাপারে ইমামের (শাসকের) স্বাধীনতা রয়েছে: তিনি চাইলে তাদের প্রতি অনুগ্রহ করে মুক্তিপণ ছাড়াই ছেড়ে দিতে পারেন, অথবা চাইলে তাদের থেকে নির্দিষ্ট অর্থ নিয়ে মুক্তিপণ নিতে পারেন, অথবা চাইলে তাদের হত্যা করতে পারেন। ইমাম শাফিঈ, ইমাম আহমদ, ইমাম আওযায়ী এবং সুফিয়ান ও অন্যান্য জ্ঞানীরা এই মত পোষণ করেন।

উবাদাহ ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শত্রু এর সুযোগ নিয়ে আমাদের উপর হামলা করার উপক্রম হয়েছিল এবং আমরা এ নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়ি। ফলে নাযিল হয়: *“তারা আপনাকে গনীমত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে। বলুন, গনীমত আল্লাহ এবং রাসূলের। সুতরাং তোমরা আল্লাহকে ভয় কর এবং তোমাদের নিজেদের মধ্যে সদ্ভাব বজায় রাখো।”* [সূরা আল-আনফাল: ১] অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা মুসলমানদের মধ্যে দ্রুত ভাগ করে দেন। তিনি (উবাদাহ) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম শত্রুদের এলাকায় আক্রমণ করতেন, তখন তিনি এক-চতুর্থাংশ (নফল বা অতিরিক্ত) দিতেন। আর যখন তিনি ফিরে আসতেন এবং সমস্ত মানুষ (অর্থাৎ যারা গনীমতে অংশগ্রহণ করত) উপস্থিত থাকত, তখন তিনি এক-তৃতীয়াংশ (নফল) দিতেন। আর তিনি আনফাল (অতিরিক্ত গনীমত) অপছন্দ করতেন এবং বলতেন: "শক্তিশালী মু'মিনরা যেন তাদের দুর্বলদের ওপর (তা ফিরিয়ে) দেয়।"

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (২২৭৬২) মু‘আবিয়াহ ইবনে আমর থেকে...। এটি মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাকও বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ‘আব্দুর রহমান ইবনুল হারিস ও আমাদের অন্যান্য সাথীগণ আমার কাছে বর্ণনা করেছেন, সুলাইমান ইবনে মূসা থেকে, তিনি মাকহূল থেকে, তিনি আবূ উমামাহ আল-বাহিলী থেকে। তিনি বলেন: আমি উবাদাহ ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনফাল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: আমাদের, অর্থাৎ বদরের যোদ্ধাদের সম্পর্কেই তা নাযিল হয়েছিল, যখন আমরা গনীমত নিয়ে মতভেদ করি এবং আমাদের আচরণ খারাপ হয়ে যায়। তখন আল্লাহ তা আমাদের হাত থেকে নিয়ে নিয়েছিলেন এবং তাঁর রাসূলের কাছে অর্পণ করেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা মুসলমানদের মধ্যে সমানভাবে ভাগ করে দেন। সীরাতে ইবনে হিশাম (১/৬৪২)। এটি তিরমিযী (১৫৬১), ইবনে মাজাহ (২৮৫২), ইবনে হিব্বান (৪৮৫৫) এবং হাকিমও (২/১৩৫) বর্ণনা করেছেন। তাদের প্রত্যেকে আব্দুর রহমান ইবনুল হারিসের হাদীস থেকে এই সনদসহ বর্ণনা করেছেন এবং কেউ কেউ তা সংক্ষিপ্ত করেছেন। তিরমিযী বলেন: উবাদাহ-এর হাদীসটি ‘হাসান’ (উত্তম)। হাকিম এটি বর্ণনা করার পর বলেন: এটি মুসলিমের শর্ত অনুযায়ী সহীহ। এর সাক্ষী হিসেবে মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক আল-কুরাশীর হাদীস রয়েছে। এঁরা সকলেই সনদে সুলাইমান ইবনে মূসা ও আবূ উমামাহ-এর মাঝে 'মাকহূল'-এর নাম অতিরিক্ত উল্লেখ করেছেন। বুখারী সুলাইমান ইবনে মূসা সম্পর্কে দুর্বলতা প্রকাশ করেছেন এবং বলেছেন: আমি তার থেকে কিছুই বর্ণনা করি না। সুলাইমান ইবনে মূসা যে হাদীসগুলো বর্ণনা করেছেন, সেগুলোর অধিকাংশ মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। তিনি বলেছেন: এই হাদীসটি সহীহ নয়, বরং এই হাদীসটি দাউদ ইবনে আমর আবূ সালাম থেকে মুরসালরূপে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। (আত-তিরমিযীর আল-ইলালুল কাবীর ২/৬৬৫-৬৬৬)।









আল-জামি` আল-কামিল (8618)


8618 - عن الزبير بن العوام قال: ضربت يوم بدر للمهاجرين بمائة سهم.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4027) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام (هو ابن يوسف الصنعاني)، عن معمر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، أن الزبير قال: فذكره.

قال الحافظ ابن حجر:"العدد الذي ذكره هنا يغاير حديث البراء الذي فيه أن المهاجرين كانوا زيادة على ستين، فيجمع بينهما بأن حديث البراء أورده فيمن شهدها حسًّا، وحديث الباب فيمن شهدها حسًّا وحكمًا، ويحتمل أن يكون المراد بالعدد الأول الأحرار والثاني بانضمام مواليهم وأتباعهم. الفتح (7/ 326)




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন মুহাজিরদের জন্য আমি একশটি অংশ নির্ধারণ করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8619)


8619 - عن قيس بن أبي حازم قال: كان عطاء البدريين خمسة آلاف، وقال عمر: لأفضلنّهم على من بعدهم.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4022) عن إسحاق بن إبراهيم، سمع محمد بن فضيل، عن إسماعيل (هو ابن أبي خالد) عن قيس قال: فذكره.




কায়স ইবনে আবী হাযিম থেকে বর্ণিত, বদরী সাহাবীগণের ভাতা ছিল পাঁচ হাজার (মুদ্রা), আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি অবশ্যই তাদেরকে তাদের পরবর্তীদের উপর প্রাধান্য দেব।









আল-জামি` আল-কামিল (8620)


8620 - عن علي بن أبي طالب قال: كانت لي شارف من نصيبي من المغنم يوم بدر، وكان النبي صلى الله عليه وسلم أعطاني مما أفاء الله عليه من الخمس يومئذ … الحديث بطوله.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4003) ومسلم في الأشربة (2: 1979) كلاهما من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أخبرني علي بن حسين بن علي أن حسين بن علي أخبره أن عليًا قال: فذكره.



على المسند (15966/ 2).

وابن ذي الجوشن هو شمر، وليس بأهل للرواية، كما قال الذهبي.

قال المنذري في مختصر السنن (4/ 90): قال أبو القاسم البغوي: ولا أعلم لذي الجوشن غير هذا الحديث. ويقال: إن أبا إسحاق سمعه من شمر بن ذي الجوشن، عن أبيه، والله أعلم. هذا آخر كلامه. والحديث لا يثبت، فإنه دائر بين الانقطاع أو رواية من لا يعتمد على روايته. انتهى كلام المنذري.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধের দিন গনীমতের (লুণ্ঠিত সম্পদের) মধ্যে আমার ভাগে একটি বয়স্ক উটনী ছিল। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেদিন আল্লাহ তাঁকে খুমুস (পঞ্চমাংশ) হিসাবে যা দান করেছিলেন, তা থেকে আমাকে দিয়েছিলেন...। (সম্পূর্ণ হাদীসটি দীর্ঘ)।