হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (8608)


8608 - عن ابن عباس قال: فلمّا أسروا الأسارى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر وعمر:"ما ترون في هؤلاء الأسارى؟" فقال أبو بكر: يا نبي الله! هم بنو العم والعشيرة، أرى أن تأخذ منهم فدية فتكون لنا قُوة على الكفار، فعسى الله أن يهديهم للإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما ترى يا ابن الخطّاب؟" قلت: لا، والله! يا رسول الله! ما أرى الذي رأى أبو بكر، ولكني أرى أن تمكنّا فنضرب أعناقهم، فتمكّن عليًا من عقيل فيضرب عنقه، وتمكنّي من فلان (نسيبًا لعمر) فأضرب عنقه، فإن هؤلاء أئمة الكفر وصناديدها فهوى رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قال أبو بكر، ولم يهو ما قلت، فلمّا كان من الغد جئت فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر قاعدين يبكيان، قلت: يا رسول الله! أخبرني من أي شيء تبكي أنت وصاحبك، فإن وجدت بكاء بكيت وإن لم أجد تباكيت لبكائكما، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أبكي للذي عرض عليّ أصحابك، من أخذهم الفداء، لقد عرض علي عذابهم أدنى من هذه الشجرة" (شجرة قريبة من نبي الله صلى الله عليه وسلم) وأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ} [الأنفال: 67] إِلَى قَولِهِ: {فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِبًا} [الأنفال: 69] فأحلّ الله الغنيمة لهم.

صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (58: 1763) من طرق عن عكرمة بن عمار، حَدَّثَنِي أبو زميل سماك الحنفي، حَدَّثَنِي عبد الله بن عباس قال: حَدَّثَنِي عمر بن الخطّاب قال: فذكر الحديث بطوله كما هو مذكور في موضعه.

ورواه الإمام أحمد (208) عن أبي نوح قراد، قال: أخبرنا عكرمة بن عمار بإسناده أطول من هذا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন বন্দীদের ধরে আনা হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "এই বন্দীদের সম্পর্কে তোমাদের কী মত?"

তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর নবী! তারা আমাদের চাচাতো ভাই ও গোত্রের লোক। আমার মত হলো, আপনি তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করুন, যা কাফিরদের মুকাবেলায় আমাদের জন্য শক্তি হবে। আর সম্ভবত আল্লাহ তাদের ইসলাম গ্রহণের তৌফিক দেবেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে ইবনুল খাত্তাব, তোমার কী মত?"

আমি (উমর) বললাম: না, আল্লাহর শপথ! হে আল্লাহর রাসূল! আবূ বকর যা দেখেছেন, আমি তা দেখি না। বরং আমার মত হলো, আপনি আমাদের ক্ষমতা দিন, যাতে আমরা তাদের গর্দান উড়িয়ে দিতে পারি। আপনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আকীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপরে ক্ষমতা দিন, যাতে তিনি তার গর্দান উড়িয়ে দেন। আর আমাকে অমুকের (উমরের একজন আত্মীয়) উপর ক্ষমতা দিন, যাতে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই। কারণ, এরা হলো কুফরের নেতা ও রথী-মহারথী।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতকে পছন্দ করলেন এবং আমার মতকে পছন্দ করলেন না।

পরের দিন যখন আমি এলাম, তখন দেখি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসে আছেন এবং কাঁদছেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি ও আপনার সঙ্গী কী কারণে কাঁদছেন, আমাকে বলুন। যদি কান্নার কারণ পাই, তবে আমিও কাঁদব, আর যদি কারণ না পাই, তবে আপনাদের কান্নার কারণে আমি কান্নার ভান করব।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কাঁদছি সেই কারণে, যা তোমার সাথীরা আমার কাছে প্রস্তাব করেছে—তাদের পক্ষ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণের কারণে। আমার সামনে তাদের আযাব এই গাছের চেয়েও কাছে দেখানো হয়েছে।" (গাছটি ছিল আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছাকাছি।)

আর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "কোনো নবীর জন্য উচিত নয় যে, তার নিকট যুদ্ধবন্দী থাকবে, যতক্ষণ না সে পৃথিবীতে রক্তপাত করে শক্তিবৃদ্ধি করে।" [সূরাহ আল-আনফাল: ৬৭] তাঁর এই উক্তি পর্যন্ত: "অতএব তোমরা যে গনীমত লাভ করেছো, তা থেকে বৈধ ও পবিত্র বস্তু খাও।" [সূরাহ আল-আনফাল: ৬৯]। এভাবে আল্লাহ তাদের জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8609)


8609 - عن ابن عمر قال: استشار رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأسارى أبا بكر فقال: قومك وعشيرتك فخل سبيلهم، فاستشار عمر فقال: اقتلهم قال: فغداهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ} [الأنفال: 67] إِلَى قَولِهِ: {فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِبًا} [الأنفال: 69] قال: فلقي النَّبِي صلى الله عليه وسلم عمر قال:"كاد أن يصيبنا في خلافك بلاء".

حسن: رواه الحاكم (2/ 329) عن أبي العباس محمد بن أحمد المحبوبي، ثنا سعيد بن مسعود، ثنا عبيد الله بن موسى، ثنا إسرائيل، عن إبراهيم بن مهاجر، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

قال الحاكم: صحيح الإسناد. وقال الذّهبي: على شرط مسلم.

قلت: وهو كما قال غير أن إبراهيم بن مهاجر البجلي وإن كان من رجال مسلم إِلَّا أنه مختلف فيه
فقال أبو حاتم: ليس بالقوي، وقال ابن حبَّان: كثير الخطأ، ومشّاه الآخرون. وبه صار الإسناد حسنًا.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বন্দীদের বিষয়ে আবূ বাকরের সাথে পরামর্শ করলেন। আবূ বকর বললেন, ‘এরা আপনার স্বজাতি এবং আপনার গোত্রীয় লোক, অতএব আপনি তাদের ছেড়ে দিন।’ অতঃপর তিনি উমরের সাথে পরামর্শ করলেন। তিনি (উমর) বললেন, ‘তাদেরকে হত্যা করুন।’ তিনি (ইবনু উমর) বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন। তখন আল্লাহ তা‘আলা অবতীর্ণ করলেন: {কোনো নবীর জন্য সঙ্গত নয় যে, তাঁর নিকট যুদ্ধবন্দী থাকবে, যতক্ষণ না তিনি যমীনে যথেষ্ট রক্তপাত ঘটান (শত্রুদের পর্যুদস্ত করেন)} [সূরা আনফাল: ৬৭] হতে আল্লাহর বাণী: {সুতরাং তোমরা যুদ্ধলব্ধ যে সম্পদ ভোগ করছ, তা বৈধ ও পবিত্র জেনে খাও} [সূরা আনফাল: ৬৯] পর্যন্ত। তিনি (ইবনু উমর) বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে বললেন, ‘তোমার মতের বিরোধিতার কারণে প্রায় আমাদের ওপর বিপদ এসে পড়েছিল।’









আল-জামি` আল-কামিল (8610)


8610 - عن أنس - وذكر رجلًا عن الحسن - قال: استشار رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس في الأسارى يوم بدر، فقال:"إنَّ الله قد أمكنكم منهم" قال: فقام عمر بن الخطّاب، فقال: يا رسول الله! اضرب أعناقهم، قال: فأعرض عنه النَّبِي صلى الله عليه وسلم قال: ثمّ عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أيها الناس! إن الله قد أمكنكم منهم، وإنما هم إخوانكم بالأمس" قال: فقام عمر، فقال: يا رسول الله! اضرب أعناقهم، قال: فأعرض عنه النَّبِي صلى الله عليه وسلم، قال: ثمّ عاد النَّبِي صلى الله عليه وسلم فقال للناس مثل ذلك، فقام أبو بكر، فقال: يا رسول الله! نرى أن تعفو عنهم، وتقبل منهم الفداء، قال: فذهب عن وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم ما كان فيه من الغم، قال: فعفا عنهم، وقبل منهم الفداء، قال: وأنزل الله: {لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 68].

حسن: رواه أحمد (13555) عن علي بن عاصم، عن حميد، عن أنس فذكره.

ورُوي مرسلًا عن الحسن كما هو، إِلَّا أن الراوي عن الحسن لم يُسم.

وإسناده حسن من أجل علي بن عاصم هو ابن صُهيب الواسطي وهو ضعيف عند أكثر أهل العلم إِلَّا أن العجلي وثّقه، وكان أحمد لا يرى بأسًا بالرواية عنه.

قال عبد الله بن أحمد بن حنبل: حَدَّثَنِي أبي قال: قال وكيع وذكر علي بن عاصم فقال: خذوا من حديثه ما صحّ ودعوا ما غلط، أو ما أخطأ فيه.

قال عبد الله:"كان أبي يحتج بهذا ويقول: كان يغلط ويخطئ، وكان فيه لجاج، ولم يكن متهما بالكذب".

وهذا الحديث مما لم يخطئ فيه.

وبمعناه ما رُوي عن عبد الله قال: لما كان يوم بدر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تقولون في هؤلاء الأسرى؟" قال: فقال أبو بكر: يا رسول الله! قومك وأهلك، استبقهم، واستأن بهم، لعل الله أن يتوب عليهم، قال: وقال عمر: يا رسول الله! أخرجوك وكذبوك، قربهم فاضرب أعناقهم، قال: وقال عبد الله بن رواحة: يا رسول الله! انظر واديًا كثير الحطب، فأدخلهم فيه، ثمّ أضرم عليهم نارًا، قال: فقال العباس: قطعت رحمك، قال: فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يردّ عليهم شيئًا، قال: فقال ناس: يأخذ بقول أبي بكر، وقال ناس: يأخذ بقول عمر، وقال ناس: يأخذ بقول عبد الله بن رواحة. قال: فخرج عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّ الله ليلين قلوب الرجال فيه، حتَّى تكون ألين من اللبن، وإن الله ليشد قلوب رجال فيه، حتَّى تكون أشد من الحجارة، وإن مثلك يا أبا بكر كمثل إبراهيم عليه السلام، قال: {فَمَنْ تَبِعَنِي فَإِنَّهُ مِنِّي وَمَنْ عَصَانِي فَإِنَّكَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [إبراهيم: 36] ومثلك يا
أبا بكر كمثل عيسى قال: {إِنْ تُعَذِّبْهُمْ فَإِنَّهُمْ عِبَادُكَ وَإِنْ تَغْفِرْ لَهُمْ فَإِنَّكَ أَنْتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [المائدة: 118] وإن مثلك يا عمر كمثل نوح قال: {وَقَالَ نُوحٌ رَبِّ لَا تَذَرْ عَلَى الْأَرْضِ مِنَ الْكَافِرِينَ دَيَّارًا} [نوح: 26] وإن مثلك يا عمر كمثل موسى قال: {وَقَالَ مُوسَى رَبَّنَا إِنَّكَ آتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلأَهُ زِينَةً وَأَمْوَالًا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّوا عَنْ سَبِيلِكَ رَبَّنَا اطْمِسْ عَلَى أَمْوَالِهِمْ وَاشْدُدْ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا حَتَّى يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ} [يونس: 88] أنتم عالة فلا ينفلتن منهم أحد إلا بفداء أو ضربة عنق".

قال عبد الله: فقلت: يا رسول الله، إلا سهيل ابن بيضاء، فإني قد سمعته يذكر الإسلام، قال: فسكت قال: فما رأيتني في يوم أخوف من أن تقع عليّ حجارة من السماء في ذلك اليوم حتى قال:"إلا سهيل ابن بيضاء" قال: فأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (67) لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 67 - 68].

رواه أحمد (3632) عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي عبيدة، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

ورواه الترمذي (1714)، (3084) من طريق أبي معاوية به، إلا أنه لم يذكر القصة بطولها.

ورواه أحمد (3634) عن حسين - يعني ابن محمد - حدثنا جرير - يعني ابن حازم - عن الأعمش … فذكر نحوه. إلا أنه قال: فقام عبد الله بن جحش، فقال: يا رسول الله! أعداء الله، كذبوك، وآذوك، وأخرجوك، وقاتلوك، وأنت بواد كثير الحطب، فاجمع لهم حطبًا كثيرًا، ثم أضرمه عليهم، وقال: سهل بن بيضاء.

وقال الترمذي: هذا حديث حسن، وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه.

وكذلك جزم غير واحد من أهل العلم بأنه لم يسمع من أبيه، بل وقد صرّح هو بنفسه بأنه لم يسمع من أبيه، ولكن قال بعض أهل العلم: إنه حديث أهل البيت ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.

وللحديث طرق أخرى عن ابن مسعود، لكنها أشد ضعفًا من هذه.

وقوله (سهيل ابن بيضاء) كذا في حديث أبي معاوية، وجاء في حديث جرير بن حازم: (سهل ابن بيضاء) وهذا هو الصواب.

قال ابن سعد في الطبقات (4/ 231):"والذي روى هذه القصة في سهيل ابن بيضاء قد أخطأ، سهيل ابن بيضاء أسلم قبل عبد الله بن مسعود ولم يستخف بإسلامه، وهاجر إلى المدينة، وشهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مسلما لا شك فيه، فغلط من روى ذلك الحديث ما بينه وبين أخيه، لأن سهيلا أشهر من أخيه سهل، والقصة في سهل، وأقام سهل بالمدينة بعد ذلك، وشهد مع النبي صلى الله عليه وسلم بعض المشاهد، وبقي بعد النبي صلى الله عليه وسلم. اهـ

وقوله: (عبد الله بن رواحة) كذا جاء في حديث أبي معاوية، وجاء في حديث جرير: (عبد الله
ابن جحش) بدل (عبد الله بن رواحة) قال الطبراني (10259): والصواب عبد الله بن جحش.

وأما ما رُوي عن علي، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن جبرائيل هبط عليه فقال له: خيّرهم - يعني أصحابك - في أسارى بدر القتل أو الفداء على أن يقتل منهم قابل مثلهم، قالوا: الفداء، ويقتل منا".

وفي رواية:"خيرهم - يعني أصحابك - في الأسارى إن شاؤوا الفداء على أن يُقتل العام المقبل منهم عدتهم قالوا: الفداء، ويقتل منا عدتهم". فهو معلول سندًا ومتنًا. رواه الترمذي (1567) وابن حبان في صحيحه (4795) كلاهما من حديث أبي داود الحفري (وهو عمرو بن سعد) قال: حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن سفيان بن سعيد الثوري، عن هشام بن حسان، عن ابن سيرين، عن عبيدة (وهو ابن عمرو السلماني) عن علي فذكره.

واللفظ للترمذي، واللفظ الثاني لابن حبان.

وأعله الترمذي فقال:"هذا حديث حسن غريب من حديث الثوري، لا نعرفه إلا من حديث ابن أبي زائدة. وروى أبو أسامة، عن هشام، عن ابن سيرين، عن عبيدة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه. وروى ابن عون عن ابن سيرين، عن عبيدة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا. وأبو داود الحفري اسمه: عمر بن سعد" اهـ.

فتفرد ابن أبي زائدة مع كونه ثقة دون أصحاب الثوري محل نظر.

ثم الاختلاف في الوصل والإرسال، قال البخاري:"روى أكثر الناس هذا الحديث عن ابن سيرين، عن عبيدة مرسلا". (علل الترمذي الكبير 2/ 971).

وقال الدارقطني:"المرسل أشبه بالصواب". (العلل 4/ 31).

وزدْ على ذلك كله أن في معناه غرابة؛ فإن التخيير لو حصل للنبي صلى الله عليه وسلم من الوحي لما جاءت المعاتبة على اختياره الفداء دون القتل في قوله تعالى: {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (67) لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ} [الأنفال: 67 - 68] ومن حاول الجمع فقد تكلف.

وقوله:"قابل" أي في العام المقبل يقتل من المسلمين مثل هذا العدد.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত (এবং একজন বর্ণনাকারী হাসান (রহ.) এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন বন্দীদের ব্যাপারে মানুষের সাথে পরামর্শ করলেন। তিনি বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে তাদের ওপর ক্ষমতা দিয়েছেন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তাদের গর্দান কেটে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার ফিরে এসে বললেন, "হে লোক সকল! আল্লাহ তোমাদেরকে তাদের ওপর ক্ষমতা দিয়েছেন, আর গতকালও তারা ছিল তোমাদের ভাই।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তাদের গর্দান কেটে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার ফিরে এসে লোকদেরকে একই কথা বললেন। তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মতে আপনি তাদের প্রতি দয়া করুন এবং তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করুন।" বর্ণনাকারী বলেন, এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় যে পেরেশানি ছিল তা দূর হয়ে গেল। তিনি বলেন, এরপর তিনি তাদের ক্ষমা করে দিলেন এবং তাদের কাছ থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহ তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "যদি আল্লাহর পূর্ব সিদ্ধান্ত না থাকত, তবে তোমরা যা গ্রহণ করেছ (মুক্তিপণ), তার জন্য তোমাদের ওপর বিরাট শাস্তি আসত।" (সূরা আনফাল: ৬৮)।

এই ঘটনার অর্থে আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে: যখন বদরের দিন হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এইসব বন্দীদের ব্যাপারে তোমাদের কী অভিমত?" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এরা আপনার গোত্রের লোক ও আত্মীয়-স্বজন। আপনি এদের জীবিত রাখুন এবং তাদের প্রতি সদয় হোন, সম্ভবত আল্লাহ তাদের তাওবা কবুল করবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এরা আপনাকে দেশ থেকে বের করে দিয়েছে এবং আপনাকে মিথ্যাবাদী বলেছে। এদেরকে আমার কাছে আনুন, আমি এদের গর্দান কেটে দেব।" বর্ণনাকারী বলেন, আর আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! অনেক কাঠখড়ি আছে এমন একটি উপত্যকা দেখুন, তাদের সেখানে ঢুকিয়ে দিন, তারপর তাদের উপর আগুন ধরিয়ে দিন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "তুমি তোমার আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করলে!" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কারো কথার কোনো জবাব না দিয়ে (ঘরে) প্রবেশ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন কেউ কেউ বলল, "তিনি আবু বকরের অভিমত গ্রহণ করবেন।" আবার কেউ কেউ বলল, "তিনি উমরের অভিমত গ্রহণ করবেন।" আবার কেউ কেউ বলল, "তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহার অভিমত গ্রহণ করবেন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে বেরিয়ে এসে বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ কারও কারও অন্তর নিজের জন্য এমন কোমল করে দেন যে তা দুধের চেয়েও নরম হয়ে যায়, আর নিশ্চয় আল্লাহ কারও কারও অন্তর নিজের জন্য এমন কঠিন করে দেন যে তা পাথরের চেয়েও কঠোর হয়ে যায়। আর হে আবূ বকর! তোমার উদাহরণ হলো ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'অতএব যে আমার অনুসরণ করবে, সে আমার দলভুক্ত, আর যে আমার অবাধ্য হবে, তবে নিশ্চয় আপনি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।' (সূরা ইবরাহীম: ৩৬)। আর হে আবূ বকর! তোমার উদাহরণ হলো ঈসা (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'যদি আপনি তাদের শাস্তি দেন তবে তারা তো আপনারই বান্দা, আর যদি আপনি তাদের ক্ষমা করে দেন, তবে নিশ্চয়ই আপনি পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়।' (সূরা মায়েদা: ১১৮)। আর হে উমর! তোমার উদাহরণ হলো নূহের (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'আর নূহ বলল, হে আমার রব! আপনি পৃথিবীতে কাফিরদের মধ্য থেকে একটি বসতি স্থাপনকারীকেও অবশিষ্ট রাখবেন না।' (সূরা নূহ: ২৬)। আর হে উমর! তোমার উদাহরণ হলো মূসার (আলাইহিস সালাম)-এর মতো। তিনি বলেছিলেন: 'মূসা বলল, হে আমাদের রব! আপনি তো ফির‘আউন ও তার পারিষদবর্গকে পার্থিব জীবনে সৌন্দর্য ও সম্পদ দান করেছেন। হে আমাদের রব! যাতে তারা আপনার পথ থেকে বিচ্যুত করে। হে আমাদের রব! তাদের ধন-সম্পদ ধ্বংস করে দিন এবং তাদের অন্তরকে কঠোর করে দিন, যাতে তারা যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি না দেখা পর্যন্ত ঈমান না আনে।' (সূরা ইউনুস: ৮৮)। তোমরা (বর্তমানে) দরিদ্র। তাদের মধ্য থেকে কেউই যেন মুক্তিপণ অথবা গর্দান কেটে দেওয়া ছাড়া পালাতে না পারে।"

বর্ণনাকারী আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! সুহাইল ইবন বাইদা ব্যতীত, কেননা আমি শুনেছি সে ইসলামের কথা আলোচনা করে।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি চুপ রইলেন। বর্ণনাকারী বলেন, সেদিন আমার আকাশ থেকে পাথর পড়ে যাওয়ার চেয়েও বেশি ভয় লাগছিল, যতক্ষণ না তিনি বললেন: "তবে সুহাইল ইবন বাইদা ব্যতীত।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "কোনো নবীর জন্য সঙ্গত নয় যে, তার হাতে যুদ্ধবন্দী থাকবে, যে পর্যন্ত না সে জমিনে রক্তক্ষয় করে। তোমরা দুনিয়ার ক্ষণস্থায়ী সম্পদ চাও, আর আল্লাহ চান আখিরাত। আর আল্লাহ মহাপরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময় (৬৭)। যদি আল্লাহর পূর্ব সিদ্ধান্ত না থাকত, তবে তোমরা যা গ্রহণ করেছ, তার জন্য তোমাদের ওপর বিরাট শাস্তি আসত (৬৮)।" (সূরা আনফাল: ৬৭-৬৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (8611)


8611 - عن ابن عباس قال: فادى النبي صلى الله عليه وسلم بأسارى بدر، فكان فداء كل واحد منهم أربعة آلاف.

صحيح: رواه عبد الرزاق (9394) ومن طريقه الطبراني في الكبير (11/ 406 - 407) عن معمر، عن قتادة، قال: وأخبرني عثمان الجزري، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.

وعثمان الجزري فيه كلام ولكنه توبع. وذكر الهيثمي في"المجمع" (6/ 89) وقال:"رواه
الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله رجال الصحيح".

وقال ابن هشام في سيرته (1/ 660): كان فداء المشركين يومئذ أربعة آلاف درهم للرجل إلى ألف درهم إلا من لا شيء له، فمنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عليه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের বন্দীদের মুক্তিপণ গ্রহণ করলেন, আর তাদের প্রত্যেকের মুক্তিপণ ছিল চার হাজার।









আল-জামি` আল-কামিল (8612)


8612 - عن عبد الله بن الزبير قال: كانت قريش ناحتْ قتلاها، ثم ندمتْ، وقالوا: لا تنوحوا عليهم فيبلغ ذلك محمدًا وأصحابه، فيشمتوا بكم. وكان في الأسرى أبو وداعة بن صبيرة السهمي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن له بمكة ابنا تاجرًا كيّسًا ذا مال كأنكم به قد جاءكم في فداء أبيه" فلما قالت قريش في الفداء ما قالت، قال المطلب: صدقتم والله لئن فعلتم ليتأرَّبُ عليكم، ثم انسل من الليل، فقدم المدينة، ففدى أباه بأربعة ألف درهم.

حسن: رواه الطبراني في الكبير (14/ 203 - 204) من وجهين عن جرير بن حازم قال: ثنا ابن إسحاق، قال: حدثني يحيى بن عباد، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير قال: فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (6/ 90):"رواه الطبراني ورجاله ثقات".

قلت: إسناده حسن من أجل ابن إسحاق، ومن هذا الطريق رواه أيضًا الضياء في المختارة (9/ 312 - 313).

ولكن ذكره ابن هشام في سيرته (1/ 647 - 648) عن محمد بن إسحاق مرسلًا، أي لم يذكر فيه"عبد الله بن الزبير".

وأما ما روي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم جعل فداء أهل الجاهلية يوم بدر أربع مائة فإن فيه شذوذًا.

رواه أبو داود (2691) والنسائي في الكبرى (8607) والحاكم (2/ 125) والبيهقي (6/ 321 - 322) من طريق عبد الرحمن بن المبارك العيشي، حدثنا سفيان بن حبيب، حدثنا شعبة، عن أبي العنبس، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس فذكره.

وقال الحاكم: حديث صحيح على شرطهما.

قلت: ليس كما قالا، فإن أبا العنبس وهو الكوفي الأكبر ليس من رجال الشيخين، ولم يوثّقه أحد، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم يتابع على ذلك، وفي قوله: أربع مائة: نكارة وشذوذ. والمحفوظ: أربعة آلاف كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশরা তাদের নিহতদের জন্য বিলাপ করেছিল, অতঃপর তারা অনুতপ্ত হলো এবং বলল: তোমরা তাদের জন্য বিলাপ করো না, তাহলে এই খবর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সঙ্গীদের কাছে পৌঁছে যাবে, ফলে তারা তোমাদের নিয়ে উপহাস করবে। বন্দীদের মধ্যে ছিলেন আবু ওয়াদা‘আহ ইবনু সুবাইরাহ আস-সাহমী। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "মক্কায় তার একজন বিচক্ষণ, সম্পদশালী ব্যবসায়ী ছেলে আছে। যেন তোমরা দেখছো, সে তার পিতার মুক্তির জন্য তোমাদের কাছে এসে গেছে।" যখন কুরাইশরা মুক্তিপণ সম্পর্কে যা বলার বলল, তখন মুত্তালিব বলল: তোমরা সত্য বলেছো। আল্লাহর কসম! তোমরা যদি এমনটি করো, তবে তা তোমাদের উপর বিপদ টেনে আনবে। এরপর সে রাতের বেলায় চুপিচুপি চলে গেল, অতঃপর মদীনায় এসে তার পিতাকে চার হাজার দিরহামের বিনিময়ে মুক্ত করে নিয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (8613)


8613 - عن أنس أن رجالًا من الأنصار استأذنوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: ائذن لنا فلنترك لابن أختنا عباس فداءه، قال:"والله لا تذرون منه درهمًا".

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4018) عن إبراهيم بن المنذر، حدثنا محمد بن فليح،
عن موسى بن عقبة، قال ابن شهاب: حدثنا أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্য থেকে কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চাইলেন। তারা বললেন: আপনি আমাদের অনুমতি দিন, যাতে আমরা আমাদের ভাগ্নে আব্বাসের মুক্তিপণ ছেড়ে দিতে পারি। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহর কসম! তোমরা তার থেকে একটি দিরহামও ছাড়তে পারবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (8614)


8614 - عن عائشة قالت: قال العباس: إني كنت مسلمًا يا رسول الله! قال:"الله أعلم بإسلامك، فإن يكن كما تقول فالله يجزيك فافد نفسك، وابني أخويك نوفل بن الحارث، وعقيل بن أبي طالب، وحليفك عتبة بن عمرو"قال: ما ذاك عندي يا رسول الله! قال:"فأين المال الذي دفنت أنت وأم الفضل، فقلت لها: إن أصبت فهذا المال لبني الفضل، وعبد الله وقثم" فقال: والله يا رسول الله إني أشهد أنك رسول الله إن هذا لشيء ما علمه أحد غيري وغير أم الفضل، فاحسب لي يا رسول الله ما أصبتم مني عشرين أوقية من مال كان معي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفعل" ففدى العباس نفسه وابني أخويه وحليفه، وأنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [الأنفال: 70] فأعطاني مكان العشرين من الأوقية في الإسلام عشرين عبدًا كلهم في يده مال يضرب به، مع ما أرجو من مغفرة الله عز وجل.

حسن: رواه الحاكم (3/ 324) وعنه البيهقي (6/ 322) من حديث يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، ثنا يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه صرّح بالتحديث.

وروى محمد بن إسحاق هذه القصة من أوجه أخرى عن ابن عباس. رواه أحمد (3310) وفيه رجل لم يسم، وفي الأخرى عن يزيد بن رومان عن عروة، عن الزهري وجماعة سماهم. ورواه البيهقي في الدلائل (3/ 142) نحوه، وهذه تقوي ما سبق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি মুসলিম ছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার ইসলাম সম্পর্কে আল্লাহই ভালো জানেন। যদি তুমি যা বলছো তা সত্য হয়, তবে আল্লাহ তোমাকে পুরস্কৃত করবেন। তবে তুমি তোমার নিজের পক্ষ থেকে মুক্তিপণ দাও এবং তোমার দুই ভাইপো—নাওফাল ইবনুল হারিস ও উকাইল ইবনু আবী তালিব এবং তোমার চুক্তিবদ্ধ মিত্র উতবাহ ইবনু আমর-এর মুক্তিপণও দাও।" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে তো তা নেই। তিনি বললেন: "তাহলে সেই সম্পদ কোথায় যা তুমি ও উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাটি চাপা দিয়েছিলে? আর তুমি তাকে বলেছিলে যে, ‘যদি আমি আঘাতপ্রাপ্ত হই (বা মারা যাই), তবে এই সম্পদ ফাদল, আব্দুল্লাহ ও ক্বুসামের জন্য’?" তখন তিনি (আব্বাস) বললেন: আল্লাহর শপথ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি আল্লাহর রাসূল। এই বিষয়টি আমি ও উম্মুল ফাদল ছাড়া আর কেউ জানত না। সুতরাং ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার কাছে থাকা সম্পদ থেকে আপনারা যা নিয়েছেন, সেই বিশ উকিয়া (Ounce)-কে আমার জন্য গণ্য করুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাই করব।" এরপর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের, তাঁর দুই ভাইপোর এবং তাঁর মিত্রের মুক্তিপণ দিলেন। আর আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {হে নবী, তোমরা বন্দীদের মধ্যে যাদের উপর কর্তৃত্ব কর, তাদেরকে বল: যদি আল্লাহ তোমাদের অন্তরে কোনো কল্যাণ দেখতে পান, তবে তোমাদের কাছ থেকে যা নেওয়া হয়েছে, তা থেকে উত্তম কিছু তিনি তোমাদেরকে দেবেন এবং তোমাদেরকে ক্ষমা করবেন; আর আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।} [সূরা আনফাল: ৭০] অতঃপর ইসলামের (কল্যাণে), সেই বিশ উকিয়ার পরিবর্তে আল্লাহ আমাকে বিশজন দাস প্রদান করলেন, যাদের প্রত্যেকের হাতে এমন সম্পদ ছিল যা দিয়ে তারা ব্যবসা করত; সেই সাথে আমি আল্লাহ তাআলার পক্ষ থেকে যে ক্ষমার আশা রাখি (তাও পেলাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (8615)


8615 - عن ابن عباس قال: كان ناس من الأسرى يوم بدر لم يكن لهم فداء، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم فداءهم أن يعلموا أولاد الأنصار الكتابة، قال: فجاء غلام يومًا يبكي إلى أبيه، فقال: ما شأنك؟ قال: ضربني معلمي، قال: الخبيث يطلب بذهل بدر، والله لا تأتيه أبدًا.

حسن: رواه أحمد (2216) عن علي بن عاصم، والبيهقي (6/ 322) من طريق علي بن عاصم وخالد بن عبد الله - كلاهما عن داود بن أبي هند، حدثنا عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن عاصم؛ فإنه ضعيف عند أكثر أهل العلم إلا أن الإمام أحمد كان حسن الرأي فيه، وقد توبع.

وقوله: الذهْل: الثأر أو العداوة والحقد.

وروى ابن سعد في طبقاته (2/ 22) عن عامر الشعبي مرسلًا: قال: أسر النبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر سبعين أسيرًا، وكان يفادي بهم على قدر أموالهم، وكان أهل مكة يكتبون وأهل المدينة لا يكتبون. فمن لم يكن له فداء دفع إليه عشرة غلمان من غلمان المدينة فعلمهم، فإذا حذقوا فهو فداؤه.

وقال: فكان زيد بن ثابت ممن علّم. انتهى.

وقال ابن الطلاع في أقضية رسول الله صلى الله عليه وسلم (1/ 235 - 236):"وربما فودي على أن يعلم عددًا من المسلمين الكتابة، روي عن النبي صلى الله عليه وسلم يعلم عشرة من المسلمين الكتابة، قال ابن وهب:"لأن أهل المدينة لم يكونوا يحسنون الخط".




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধের বন্দীদের মধ্যে এমন কিছু লোক ছিল যাদের মুক্তিপণ দেওয়ার মতো কিছু ছিল না। তাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের মুক্তিপণ নির্ধারণ করলেন যে তারা আনসারদের সন্তানদেরকে লেখা শেখাবে। তিনি বললেন: একদিন একটি ছেলে কাঁদতে কাঁদতে তার বাবার কাছে এলো। বাবা জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কী হয়েছে? সে বললো: আমার শিক্ষক আমাকে মেরেছেন। বাবা বললেন: এই দুষ্টু লোকটা বদরের প্রতিশোধ চাইছে! আল্লাহর কসম, তুমি আর কখনোই তার কাছে যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (8616)


8616 - عن عائشة قالت: لما بعت أهل مكة في فداء أسراهم، بعثت زينب في فداء أبي العاص بمال، وبعثت فيه بقلادة لها، كانت عند خديجة، أدخلتها بها على أبي العاص، قالت: فلما رآها رسول الله صلى الله عليه وسلم رق لها رقّة شديدة، وقال:"أرأيتم أن تطلقوا لها أسيرها، وتردّوا الذي لها؟" فقالوا: نعم، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ عليه - أو وعده - أن يخلّي سبيل زينب إليه، وبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم زيد بن حارثة ورجلا من الأنصار، فقال:"كونوا ببطن (يأجج) حتى تمرّ بكما زينب، فتصحباها حتى تأتيا بها".

حسن: رواه أبو داود (2692) وأحمد (26362) وابن الجارود (1090) والحاكم (3/ 23 و 236 و 4/ 44 - 45) والبيهقي كلهم من طرق عن محمد بن إسحاق، حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه عباد، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فذكرته. والسياق لأبي داود، وهو في سيرة ابن هشام (1/ 653).

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنه حسن الحديث إذا صرّح.

وقال الحاكم: حديث صحيح على شرط مسلم.

وممن مُنّ عليهم أيضًا بغير فداء: المطلب بن حنطب بن الحارث بن عبيدة بن عمر بن مخزوم، كان لبعض بني الحارث بن الخزرج فترك في أيديهم حتى خلّوا سبيله، فلحق بقومه.

وصيفي بن أبي رفاعة من بني مخزوم، ترك في أيدي أصحابه، فلما لم يأت أحد في فدائه أخذوا عليه ليبعثن إليهم بفدائه، فخلّوا سبيله، فلم يف لهم بشيء.

وأبو عزة وهو عمرو بن عبد الله بن عثمان بن أهيب بن حذافة بن جُمح كان محتاجًا ذا بنات،
فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! لقد عرفت ما لي من مال، وإني لذو حاجة وذو عيال، فامنن علي، فمنّ عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وأخذ عليه ألّا يظاهر عليه أحدًا فقال أبو عزة في ذلك يمدح رسول الله صلى الله عليه وسلم:

من مبلغ عني الرسول محمدًا … بأنك حق والمليك حميد

وأنت امرؤ تدعو إلى الحق والهدى … عليك من الله العظيم شهيد

سيرة ابن هشام (1/ 659 - 660)




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মক্কার লোকেরা তাদের বন্দীদের মুক্তিপণ পাঠাল, তখন যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূল ‘আস-এর মুক্তিপণ হিসেবে কিছু অর্থ পাঠালেন। তিনি এর সঙ্গে একটি হারও পাঠালেন, যা খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিল এবং যা দিয়ে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়নাবকে আবূল ‘আস-এর কাছে (বাসরঘরে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি (আয়িশা) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা দেখলেন, তখন তিনি অত্যন্ত মর্মাহত হলেন এবং বললেন: "তোমরা কি মনে করো যে, তোমরা তার জন্য তার বন্দীকে মুক্ত করে দেবে এবং তার যা কিছু আছে, তা তাকে ফেরত দেবে?" তারা বলল: হ্যাঁ। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছ থেকে প্রতিশ্রুতি নিয়েছিলেন—অথবা তিনি তাঁকে ওয়াদা দিয়েছিলেন—যে, তিনি যায়নাবকে তাঁর কাছে ফেরত পাঠাবেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দ ইবন হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আনসারী এক ব্যক্তিকে পাঠালেন এবং বললেন: "তোমরা ইয়াজাজ উপত্যকায় অবস্থান করবে, যতক্ষণ না যায়নাব তোমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করে। তারপর তোমরা তার সঙ্গী হয়ে তাকে (মদিনায়) নিয়ে আসবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8617)


8617 - عن جبير بن مطعم أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في أسارى بدر:"لو كان المطعم بن عديّ حيًّا ثم كلّمني في هؤلاء النّتْنى لتركتهم له".

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4024) عن إسحاق بن منصور، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه فذكره.

وقوله:"النتنى" جمع نتن بالنون وهم أسارى بدر من المشركين.

والمطعم والد جبير ممن دخل النبي صلى الله عليه وسلم في جواره عندما رجع من الطائف، فإن المطعم أمر أربعة من أولاده فلبسوا السلاح، وقام كل واحد منهم عند ركن من الكعبة، فبلغ ذلك قريشًا، فقالوا له: أنت الرجل الذي لا تخفر ذمته، وكان مطعم من أشد من قام في نقض الصحيفة التي كتبها قريش علي بني هاشم، ومن معهم من المسلمين حين حصروهم في الشعب.

ومات المطعم بن عدي قبل وقعة بدر، وله بضع وتسعون سنة.

وفي أحاديث الأبواب السابقة دليل على أن الإمام مخير في الأسارى البالغين، إن شاء منّ عليهم، وأطلقهم من غير فداء، وإن شاء فاداهم بمال معلوم، وإن شاء قتلهم، وإليه ذهب الشافعي وأحمد وهو قول الأوزاعي وسفيان وغيرهم من أهل العلم.



يصيب العدو منه غرة واشتغلنا به، فنزلت: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْ} [الأنفال: 1] فقسمها رسول الله صلى الله عليه وسلم على فواق بين المسلمين، قال: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أغار في أرض العدو نفّل الربع، وإذا أقبل راجعًا وكُلُّ الناسِ، نفّل الثلث، وكان يكره الأنفال، ويقول:"ليردّ قوي المؤمنين على ضعيفهم"

رواه أحمد (22762) عن معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق، عن عبد الرحمن بن عياش بن أبي ربيعة، عن سليمان بن موسى، عن أبي سلّام عن أبي أمامة، عن عبادة بن الصامت فذكره.

ورواه محمد بن إسحاق فقال: وحدثني عبد الرحمن بن الحارث وغيره من أصحابنا، عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن أبي أمامة الباهلي قال: سألت عبادة بن الصامت عن الأنفال فقال: فينا أصحاب بدر نزلت حين اختلفنا في النفل، وساءت فيه أخلاقنا، فنزعه الله من أيدينا، فجعله إلى رسوله، فقسمّه رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المسلمين عن بواء، يقول: على السواء. سيرة ابن هشام (1/ 642).

ورواه أيضًا الترمذي (1561) وابن ماجه (2852) وابن حبان (4855) والحاكم (2/ 135) كلهم من حديث عبد الرحمن بن الحارث بهذا الإسناد واختصره بعضهم.

وقال الترمذي: حديث عبادة حسن.

وقال الحاكم بعد أن رواه من حديث إسماعيل بن جعفر، حدثني عبد الرحمن بن الحارث بإسناده: صحيح على شرط مسلم، وله شاهد من حديث محمد بن إسحاق القرشي.

وهؤلاء جميعًا زادوا في الإسناد"مكحول" بين سليمان بن موسى وأبي أمامة.

وأعل البخاري بأن سليمان بن موسى منكر الحديث، وقال: أنا لا أروي عنه شيئًا، روى سليمان بن موسى أحاديث عامتها مناكير وقال: هذا الحديث لا يصح، إنما روى هذه الحديث داود بن عمرو عن أبي سلام، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا" العلل الكبير للترمذي (2/ 665 - 666).




জুবাইর ইবনে মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বদরের বন্দীদের সম্পর্কে বলেন: "যদি মুত‘ইম ইবনে আদী জীবিত থাকত এবং এই দুর্গন্ধযুক্ত (বন্দীদের) ব্যাপারে আমার সাথে কথা বলত, তবে আমি তাদেরকে তার জন্য ছেড়ে দিতাম।"

সহীহ: এটি বুখারী (৪০০২৪) ইসহাক ইবনে মানসূর থেকে বর্ণনা করেছেন...। তাঁর বাণী "আল-নুতনা" (النتنى) হল 'নাতন' (نتن)-এর বহুবচন, যা দ্বারা বদরের মুশরিক বন্দীদের বোঝানো হয়েছে। মুত‘ইম হলেন জুবাইরের পিতা, যিনি তায়েফ থেকে ফেরার সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে আশ্রয় দিয়েছিলেন। কেননা মুত‘ইম তাঁর চার পুত্রকে অস্ত্র ধারণ করার নির্দেশ দেন এবং তাদের প্রত্যেকে কা‘বার একটি করে কোণায় দাঁড়ান। এ খবর কুরাইশদের নিকট পৌঁছালে তারা মুত‘ইমকে বলেছিল: আপনি এমন একজন ব্যক্তি যার প্রতিশ্রুতি কখনও ভঙ্গ হয় না। কুরাইশরা যখন বনু হাশিম ও তাদের সাথে থাকা মুসলমানদের উপত্যকায় অবরুদ্ধ করে রেখেছিল, তখন যে চুক্তির পত্র লেখা হয়েছিল তা বাতিলের জন্য যারা জোরালো ভূমিকা নিয়েছিলেন মুত‘ইম ছিলেন তাদের অন্যতম। মুত‘ইম ইবনে আদী বদর যুদ্ধের আগে নব্বই-এর অধিক বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন। পূর্ববর্তী অধ্যায়ের হাদীসগুলোতে প্রমাণ রয়েছে যে, প্রাপ্তবয়স্ক বন্দীদের ব্যাপারে ইমামের (শাসকের) স্বাধীনতা রয়েছে: তিনি চাইলে তাদের প্রতি অনুগ্রহ করে মুক্তিপণ ছাড়াই ছেড়ে দিতে পারেন, অথবা চাইলে তাদের থেকে নির্দিষ্ট অর্থ নিয়ে মুক্তিপণ নিতে পারেন, অথবা চাইলে তাদের হত্যা করতে পারেন। ইমাম শাফিঈ, ইমাম আহমদ, ইমাম আওযায়ী এবং সুফিয়ান ও অন্যান্য জ্ঞানীরা এই মত পোষণ করেন।

উবাদাহ ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শত্রু এর সুযোগ নিয়ে আমাদের উপর হামলা করার উপক্রম হয়েছিল এবং আমরা এ নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়ি। ফলে নাযিল হয়: *“তারা আপনাকে গনীমত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে। বলুন, গনীমত আল্লাহ এবং রাসূলের। সুতরাং তোমরা আল্লাহকে ভয় কর এবং তোমাদের নিজেদের মধ্যে সদ্ভাব বজায় রাখো।”* [সূরা আল-আনফাল: ১] অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা মুসলমানদের মধ্যে দ্রুত ভাগ করে দেন। তিনি (উবাদাহ) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম শত্রুদের এলাকায় আক্রমণ করতেন, তখন তিনি এক-চতুর্থাংশ (নফল বা অতিরিক্ত) দিতেন। আর যখন তিনি ফিরে আসতেন এবং সমস্ত মানুষ (অর্থাৎ যারা গনীমতে অংশগ্রহণ করত) উপস্থিত থাকত, তখন তিনি এক-তৃতীয়াংশ (নফল) দিতেন। আর তিনি আনফাল (অতিরিক্ত গনীমত) অপছন্দ করতেন এবং বলতেন: "শক্তিশালী মু'মিনরা যেন তাদের দুর্বলদের ওপর (তা ফিরিয়ে) দেয়।"

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (২২৭৬২) মু‘আবিয়াহ ইবনে আমর থেকে...। এটি মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাকও বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ‘আব্দুর রহমান ইবনুল হারিস ও আমাদের অন্যান্য সাথীগণ আমার কাছে বর্ণনা করেছেন, সুলাইমান ইবনে মূসা থেকে, তিনি মাকহূল থেকে, তিনি আবূ উমামাহ আল-বাহিলী থেকে। তিনি বলেন: আমি উবাদাহ ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনফাল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: আমাদের, অর্থাৎ বদরের যোদ্ধাদের সম্পর্কেই তা নাযিল হয়েছিল, যখন আমরা গনীমত নিয়ে মতভেদ করি এবং আমাদের আচরণ খারাপ হয়ে যায়। তখন আল্লাহ তা আমাদের হাত থেকে নিয়ে নিয়েছিলেন এবং তাঁর রাসূলের কাছে অর্পণ করেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা মুসলমানদের মধ্যে সমানভাবে ভাগ করে দেন। সীরাতে ইবনে হিশাম (১/৬৪২)। এটি তিরমিযী (১৫৬১), ইবনে মাজাহ (২৮৫২), ইবনে হিব্বান (৪৮৫৫) এবং হাকিমও (২/১৩৫) বর্ণনা করেছেন। তাদের প্রত্যেকে আব্দুর রহমান ইবনুল হারিসের হাদীস থেকে এই সনদসহ বর্ণনা করেছেন এবং কেউ কেউ তা সংক্ষিপ্ত করেছেন। তিরমিযী বলেন: উবাদাহ-এর হাদীসটি ‘হাসান’ (উত্তম)। হাকিম এটি বর্ণনা করার পর বলেন: এটি মুসলিমের শর্ত অনুযায়ী সহীহ। এর সাক্ষী হিসেবে মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক আল-কুরাশীর হাদীস রয়েছে। এঁরা সকলেই সনদে সুলাইমান ইবনে মূসা ও আবূ উমামাহ-এর মাঝে 'মাকহূল'-এর নাম অতিরিক্ত উল্লেখ করেছেন। বুখারী সুলাইমান ইবনে মূসা সম্পর্কে দুর্বলতা প্রকাশ করেছেন এবং বলেছেন: আমি তার থেকে কিছুই বর্ণনা করি না। সুলাইমান ইবনে মূসা যে হাদীসগুলো বর্ণনা করেছেন, সেগুলোর অধিকাংশ মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। তিনি বলেছেন: এই হাদীসটি সহীহ নয়, বরং এই হাদীসটি দাউদ ইবনে আমর আবূ সালাম থেকে মুরসালরূপে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। (আত-তিরমিযীর আল-ইলালুল কাবীর ২/৬৬৫-৬৬৬)।









আল-জামি` আল-কামিল (8618)


8618 - عن الزبير بن العوام قال: ضربت يوم بدر للمهاجرين بمائة سهم.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4027) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام (هو ابن يوسف الصنعاني)، عن معمر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، أن الزبير قال: فذكره.

قال الحافظ ابن حجر:"العدد الذي ذكره هنا يغاير حديث البراء الذي فيه أن المهاجرين كانوا زيادة على ستين، فيجمع بينهما بأن حديث البراء أورده فيمن شهدها حسًّا، وحديث الباب فيمن شهدها حسًّا وحكمًا، ويحتمل أن يكون المراد بالعدد الأول الأحرار والثاني بانضمام مواليهم وأتباعهم. الفتح (7/ 326)




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন মুহাজিরদের জন্য আমি একশটি অংশ নির্ধারণ করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (8619)


8619 - عن قيس بن أبي حازم قال: كان عطاء البدريين خمسة آلاف، وقال عمر: لأفضلنّهم على من بعدهم.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4022) عن إسحاق بن إبراهيم، سمع محمد بن فضيل، عن إسماعيل (هو ابن أبي خالد) عن قيس قال: فذكره.




কায়স ইবনে আবী হাযিম থেকে বর্ণিত, বদরী সাহাবীগণের ভাতা ছিল পাঁচ হাজার (মুদ্রা), আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি অবশ্যই তাদেরকে তাদের পরবর্তীদের উপর প্রাধান্য দেব।









আল-জামি` আল-কামিল (8620)


8620 - عن علي بن أبي طالب قال: كانت لي شارف من نصيبي من المغنم يوم بدر، وكان النبي صلى الله عليه وسلم أعطاني مما أفاء الله عليه من الخمس يومئذ … الحديث بطوله.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4003) ومسلم في الأشربة (2: 1979) كلاهما من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أخبرني علي بن حسين بن علي أن حسين بن علي أخبره أن عليًا قال: فذكره.



على المسند (15966/ 2).

وابن ذي الجوشن هو شمر، وليس بأهل للرواية، كما قال الذهبي.

قال المنذري في مختصر السنن (4/ 90): قال أبو القاسم البغوي: ولا أعلم لذي الجوشن غير هذا الحديث. ويقال: إن أبا إسحاق سمعه من شمر بن ذي الجوشن، عن أبيه، والله أعلم. هذا آخر كلامه. والحديث لا يثبت، فإنه دائر بين الانقطاع أو رواية من لا يعتمد على روايته. انتهى كلام المنذري.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধের দিন গনীমতের (লুণ্ঠিত সম্পদের) মধ্যে আমার ভাগে একটি বয়স্ক উটনী ছিল। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেদিন আল্লাহ তাঁকে খুমুস (পঞ্চমাংশ) হিসাবে যা দান করেছিলেন, তা থেকে আমাকে দিয়েছিলেন...। (সম্পূর্ণ হাদীসটি দীর্ঘ)।









আল-জামি` আল-কামিল (8621)


8621 - عن أبي طلحة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا ظهر على قوم أقام بالعرصة ثلاث ليال،

فلما كان ببدر اليوم الثالث أمر براحلته فشد عليها رحلها، ثم مشى وأتبعه أصحابه وقالوا: ما نرى ينطلق إلا لبعض حاجته حتى قام على شفة الركي، فجعل يناديهم … فذكر الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976) عن عبد الله بن محمد، سمع روح بن عبادة، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة قال: ذكر لنا أنس بن مالك، عن أبي طلحة فذكره.

ورواه مسلم أيضًا (2875) إلا أنه لم يذكر موضع الشاهد.

وكان رحيله صلى الله عليه وسلم من بدر ليلة الاثنين ومعه الأسارى وعليهم شقران والغنائم الكثيرة، وبعث بشيرين إلى المدينة.

وأما ما روي عن ابن عباس قال: قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم حين فرغ من بدر: عليك العير ليس دونها شيء، قال: فناداه العباس بن عبد المطلب، إنه لا يصلح لك، قال:"ولم؟" قال: لأن الله عز وجل إنما وعدك إحدى الطائفتين، وقد أعطاك ما وعدك. فهو منكر.

رواه الترمذي (3080) وأحمد (2022) والحاكم (2/ 327) كلهم من طريق إسرائيل، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذي: حسن صحيح. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.

قلت: سماك عن عكرمة معروف بالاضطراب، ثم في متنه نكارة وهي أن الآية الكريمة {وَإِذْ يَعِدُكُمُ اللَّهُ إِحْدَى الطَّائِفَتَيْنِ أَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ أَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ} [الأنفال: 7] نزلت في بدر، فكيف عرف العباس بن عبد المطلب الذي جاء مع كفار مكة بهذه الآية الكريمة.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো জনগোষ্ঠীর উপর বিজয় লাভ করতেন, তখন তিনি যুদ্ধক্ষেত্রে তিন দিন অবস্থান করতেন।

যখন বদরের দিন তৃতীয় দিন এল, তখন তিনি তাঁর বাহনকে প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন এবং সেটির উপর হাওদা বাঁধা হলো। এরপর তিনি হাঁটলেন এবং তাঁর সাহাবীগণ তাঁকে অনুসরণ করলেন। তাঁরা বলাবলি করলেন: আমরা মনে করি তিনি কেবল কোনো ব্যক্তিগত প্রয়োজনে যাচ্ছেন। অবশেষে তিনি কূপের কিনারে গিয়ে দাঁড়ালেন এবং তাদেরকে (মৃত কাফেরদের) ডাকতে শুরু করলেন... এরপর তিনি পুরো হাদীসটি উল্লেখ করলেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বদর থেকে প্রত্যাবর্তন সোমবার রাতে হয়েছিল, তাঁর সাথে ছিল যুদ্ধবন্দীগণ, যাদের উপর শুকরান নিযুক্ত ছিলেন, এবং ছিল প্রচুর গনীমতের মাল। তিনি শুভ সংবাদবাহক হিসেবে দু'জনকে মদীনায় প্রেরণ করলেন।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: বদর যুদ্ধ শেষ হওয়ার পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো: আপনার সামনে কাফেলার উট রয়েছে, যা সুরক্ষিত নয় (বা যার কাছে আর কোনো বাধা নেই)। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন। তখন আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব তাঁকে ডেকে বললেন: এটি আপনার জন্য ঠিক হবে না। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কেন?" আব্বাস বললেন: কেননা আল্লাহ তাআলা আপনাকে কেবল দু'টি দলের (কাফেলা বা যুদ্ধদল) মধ্য থেকে একটির প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন, আর তিনি আপনাকে যা প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন, তা তিনি দান করেছেন। এটি মুনকার (অস্বীকারযোগ্য)।









আল-জামি` আল-কামিল (8622)


8622 - عن أبي أمامة بن سهل قال: لما فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من بدر بعث بشيرَين إلى
أهل المدينة، بعث زيد بن حارثة إلى أهل السافلة، وبعث عبد الله بن رواحة إلى أهل العالية يبشرونهم بفتح الله على نبيه صلى الله عليه وسلم، فوافق زيد بن حارثة ابنه أسامة حين سوى التراب على رقية بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقيل له: ذاك أبوك حين قدم. قال أسامة: فجئت وهو واقف للناس يقول: قتل عتبة بن ربيعة، وشيبة بن ربيعة، وأبو جهل بن هشام، ونبيه، ومنبه، وأمية بن خلف، فقلت: يا أبت أحق هذا؟ قال: نعم والله يا بُني.

حسن: رواه الحاكم (3/ 217 - 218) من حديث يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر بن حزام وصالح بن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه قال: فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق وهو مدلس ولكنه صرّح بالتحديث. ونبيه ومنبه هما ابنا الحجاج.

وأورده ابن هشام في سيرته (1/ 642 - 643) من وجه آخر نحوه وزاد فيه ممن قتل من رؤساء قريش:"وزمعة بن الأسود، وأبو البختري العاص بن هشام".




আবূ উমামাহ ইবনু সাহল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের যুদ্ধ থেকে ফারেগ হলেন, তখন তিনি মদীনাবাসীদের কাছে দুজন সুসংবাদ বহনকারীকে পাঠালেন। তিনি যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সাফিলার (নিচের অংশের) অধিবাসীদের কাছে পাঠালেন এবং আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আলিয়াহর (উপরের অংশের) অধিবাসীদের কাছে পাঠালেন, যেন তারা তাঁদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল্লাহ্ তা‘আলার পক্ষ থেকে প্রদত্ত বিজয় সম্পর্কে সুসংবাদ দেন।

যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পুত্র উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে এমন সময় সাক্ষাৎ করলেন, যখন উসামা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কন্যা রুকাইয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কবরে মাটি সমান করছিলেন। তখন উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলা হলো: ঐ যে তোমার পিতা এসে গেছেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁর কাছে আসলাম, তখন তিনি লোকদের সামনে দাঁড়িয়ে বলছেন: উতবা ইবনু রাবি‘আহ, শাইবাহ ইবনু রাবি‘আহ, আবূ জাহল ইবনু হিশাম, নুবাইহ, মুনাব্বিহ এবং উমাইয়্যাহ ইবনু খালাফ নিহত হয়েছে। আমি বললাম: হে আমার পিতা, এটা কি সত্য? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! হে আমার পুত্র।









আল-জামি` আল-কামিল (8623)


8623 - عن أسامة بن زيد أن النبي صلى الله عليه وسلم خلّف عثمان بن عفان وأسامة بن زيد على رقية بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم أيام بدر، فجاء زيد بن حارثة على العضباء ناقة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالبشارة.

قال أسامة: فسمعت الهيعة، فخرجت فإذا زيد قد جاء بالبشارة، فوالله ما صدقت حتى رأيت الأسارى، فضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم لعثمان بسهمه.

صحيح: رواه البيهقي في الدلائل (3/ 130) عن أبي الحسن المقري، قال: أخبرنا الحسن بن محمد بن إسحاق، قال: أخبرنا يوسف بن يعقوب، قال: أخبرنا محمد بن أبي بكر، قال: أخبرنا عمرو بن عاصم قال: أخبرنا حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن أسامة بن زيد فذكره. وإسناده صحيح.

والهيعة: صيحة الفزع.

وممن أحضر من أسارى بدر إلى المدينة سهيل بن عمرو:

رُوي عن يحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة قال: قدم بالأسارى حين قدم بهم المدينة وسودة بنت زمعة رضي الله عنها زوج النبي صلى الله عليه وسلم عند آل عفراء في مناخهم على عوف ومعوذ ابني عفراء، وذلك قبل أن يضرب عليهن الحجاب.

قالت سودة: فوالله إني لعندهم إذ أتينا، فقيل: هؤلاء الأسارى قد أتي بهم، فرجعت إلى بيتي، ورسول الله صلى الله عليه وسلم فيه، وإذا أبو يزيد سهيل بن عمرو في ناحية الحجرة، يداه مجموعتان إلى عنقه بحبل، فوالله ما ملكت حين رأيت أبا يزيد كذلك أن قلت: أي أبا يزيد! أعطيتم بأيديكم ألا مِتُّم
كرامًا؟ فما انتهيت إلا بقول رسول الله صلى الله عليه وسلم من البيت:"يا سودة أعلى الله وعلى رسوله؟" فقلت: يا رسول الله! والذي بعثك بالحق ما ملكت حين رأيت أبا يزيد مجموعة يداه إلى عنقه بالحبل أن قلت ما قلت. إلا أنه مرسل.

رواه أبو داود (2680) والبيهقي (9/ 89) كلاهما من حديث ابن إسحاق قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن يحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة فذكره، ولم يذكر أبو داود لفظه بتمامه، ويحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة تابعي، وهو الذي يحكي القصة، فهي من مراسيله.

ولكن رواه الحاكم (3/ 22) من طريق أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن يحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة، فزاد فيه"عن جده" وكذا ذكره ابن حجر عن الحاكم في إتحاف المهرة (10/ 468)، فإن صحت هذه الزيادة فهو مرسل أيضًا؛ لأنه لا يوجد في الصحابة من اسمه عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة.




উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিনগুলোতে রুকাইয়্যা বিনতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেখাশোনা করার জন্য উসমান ইবনু আফফান এবং উসামা ইবনু যায়িদকে নিযুক্ত করলেন। অতঃপর যায়িদ ইবনু হারিসা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটনী আল-'আদ্ববায় চড়ে সুসংবাদ নিয়ে এলেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি (আতঙ্কের) একটি চিৎকার শুনতে পেলাম। আমি বাইরে বের হয়ে দেখলাম যায়িদ সুসংবাদ নিয়ে এসেছেন। আল্লাহর শপথ, বন্দীদের না দেখা পর্যন্ত আমি বিশ্বাস করিনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমানের জন্য তাঁর (গণীমতের) অংশ নির্ধারণ করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (8624)


8624 - عن أبي عزيز بن عمير أخي مصعب بن عمير قال: كنت في الأسارى يوم بدر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استوصوا بالأسارى خيرًا" وكنت في نفر من الأنصار، وكانوا إذا قدموا غداءهم وعشاءهم أكلوا التمر، وأطعموني الخبز بوصية رسول الله صلى الله عليه وسلم إياهم.

حسن: رواه الطبراني في الكبير (22/ 393) عن الحسين بن علي العطار المصيصي، ثنا شباب العصفري، ثنا بكر بن سليمان، ثنا محمد بن إسحاق، حدثني نبيه بن وهب، عن أبي عزيز بن عمير أخي مصعب بن عمير فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وكذا حسّنه أيضًا الهيثمي في المجمع (6/ 86).

وأبو عزيز: قيل: اسم أبي عزيز هذا زرارة، له صحبة، وسماع من النبي صلى الله عليه وسلم ورواية، حدث عنه نبيه بن وهب يعد في أهل المدينة، وزعم الزبير أنه قتل يوم أحد كافرًا، وذلك غلط. والله أعلم. انظر: الاستيعاب.

واختلف على ابن إسحاق:

فرواه الطبراني هكذا موصولا، وذكره ابن هشام في السيرة (1/ 645) قال: قال ابن إسحاق: وحدثني نبيه بن وهب أخو بني عبد الدار أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حين أقبل بالأسارى … الحديث بنحوه. وهذا مرسل.

وذكره ابن حجر في الإصابة (10329) عن ابن إسحاق قال: حدثني نبيه بن وهب قال: سمعت
من يذكر عن أبي عزيز قال: كنت في الأسارى يوم بدر … فذكر الحديث. فزاد بين نبيه بن وهب وبين أبي عزيز مبهمًا. والله أعلم.




আবূ আযীয ইবনে উমায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মুসআব ইবনে উমায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাই) বলেন: আমি বদরের যুদ্ধের দিন বন্দীদের মধ্যে ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা বন্দীদের সাথে উত্তম ব্যবহার করো।" আমি আনসারদের একটি দলের সাথে ছিলাম। তারা যখন তাদের দুপুরের খাবার অথবা রাতের খাবার পেশ করত, তখন তারা নিজেরা খেজুর খেত এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তাদের প্রতি করা ওসিয়তের কারণে আমাকে রুটি খেতে দিত।









আল-জামি` আল-কামিল (8625)


8625 - عن مقسم مولى عبد الله بن الحارث يحدّث عن ابن عباس أنه سمعه يقول: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} [النساء: 95] عن بدر، والخارجون إلى بدر.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (3954) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام (هو ابن يوسف الصنعاني) أن ابن جريج أخبرهم قال: أخبرني عبد الكريم (هو الجزري) عن مقسم (هو أبو القاسم) عن ابن عباس فذكره.

مقسم مولى عبد الله بن الحارث ويقال: مولى ابن عباس لشدة لزومه له.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (বদরের যুদ্ধ প্রসঙ্গে) বলতেন: {মুমিনদের মধ্যে যারা (জিহাদ থেকে) বসে থাকে} [সূরা আন-নিসা: ৯৫]—তা দ্বারা বদরের যুদ্ধ থেকে পেছনে থাকা লোক এবং বদরের উদ্দেশ্যে বেরিয়ে পড়াদের বোঝানো হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (8626)


8626 - عن حميد قال: سمعت أنسًا رضي الله عنه يقول: أصيب حارثة يوم بدر وهو غلام، فجاءت أمه إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! قد عرفت منزلة حارثة مني، فإن يكن في الجنة أصبر وأحتسب، وإن تك الأخرى تر ما أصنع، فقال:"ويحك، أو هبلتِ، أو جنة واحدة هي؟ إنها جنان كثيرة، وإنه لفي جنة الفردوس"

صحيح: رواه البخاري في المغازي (3982) عن عبد الله بن محمد، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق (هو إبراهيم بن محمد الفزاري) عن حميد (هو الطويل) عن أنس قال: فذكره.

قوله:"أصيب حارثة يوم بدر" هو ابن سراقة بن الحارث بن عدي الأنصاري وأبوه سراقة، له صحبة واستشهد يوم حنين، وأمه هي الربيع بنت النضر عمة أنس بن مالك.

قوله:"ويحك" هي كلمة رحمة، وقيل: إنها للتوبيخ.

وقوله:"أو هبلت" أي ثقلت.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদর যুদ্ধের দিন শহীদ হন, যখন তিনি ছিলেন যুবক। অতঃপর তাঁর মা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! হারিসা আমার কাছে কত প্রিয় ছিল, তা আপনি জানেন। যদি সে জান্নাতে থাকে, তবে আমি ধৈর্য ধারণ করব ও সওয়াবের আশা রাখব। আর যদি অন্য কিছু হয়, তবে আমি কী করি তা আপনি দেখতে পাবেন।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আফসোস তোমার জন্য! তুমি কি দিশেহারা হয়ে গেছো? জান্নাত কি মাত্র একটিই? নিশ্চয়ই তা অনেক জান্নাত। আর সে তো জান্নাতুল ফিরদাউসে রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (8627)


8627 - عن حفصة قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إني لأرجو ألا يدخل النار أحد - إن شاء الله تعالى - ممن شهد بدرًا والحديبية".

قالت: قلت: يا رسول الله! أليس قد قال الله: {وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا كَانَ عَلَى رَبِّكَ حَتْمًا مَقْضِيًّا} [مريم: 71] قال:"ألم تسمعيه يقول: {ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوْا وَنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا} [مريم: 72]".

صحيح: رواه ابن ماجه (4281) وأحمد (26440) وصحّحه ابن حبان (4800) كلهم من طرق عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، عن أم مبشر - امرأة زيد بن حارثة - عن حفصة فذكرته.

وفي رواية: عن أم مبشر قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو في بيت حفصة، فذكرت الحديث.
فيكون من مسند أم مبشر نفسها، كذا عند مسلم (2496) من وجه آخر عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: أخبرتني أم مبشر أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول عند حفصة: فذكرت الحديث إلا أنه ليس فيه ذكر بدر.

وقوله تعالى: {وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا} [مريم: 71] المراد بالورود هو المرور على الصراط، وهو جسر منصوب على جهنم، فيقع فيها أهلها، وينجو المؤمنون، وإن كانت حفصة فهمت الدخول في النار، فرد عليها النبي صلى الله عليه وسلم بالآية التي بعدها بأن المراد بها المرور على الصراط لا الورود في النار.

وإن فهم من الآية الدخول في النار فتكون للمؤمنين بردًا وسلامًا، ثم يخرجون فيها، ويدخلون الجنة بخلاف الكفار.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি অবশ্যই আশা করি—যদি আল্লাহ তাআলা চান—যারা বদর ও হুদায়বিয়ার যুদ্ধে উপস্থিত ছিল, তাদের কেউই জাহান্নামে প্রবেশ করবে না।" তিনি বললেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ কি বলেননি: "{তোমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই, যে তা (জাহান্নামে) প্রবেশ করবে না; এটা তোমার রবের অনিবার্য ফয়সালা} [সূরা মারইয়াম: 71]?" তিনি বললেন: "তুমি কি তাঁকে বলতে শোননি: "{অতঃপর আমি মুত্তাকীদেরকে উদ্ধার করব এবং যালিমদেরকে নতজানু অবস্থায় তার মধ্যে রেখে দেব} [সূরা মারইয়াম: 72]?"