হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (888)


888 - عن جابر، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرج من النّار بالشّفاعة كأنّهم الثّعارير". قلت: ما الثّعارير؟ قال: الضغابيس، وكان قد سقط فمُه. فقلت لعمرو بن دينار: أبا محمد، سمعتَ جابر بن عبد اللَّه يقول: سمعتُ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يخرج بالشّفاعة من النّار"؟ قال: نعم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرّقاق (6558)، ومسلم في الإيمان (191: 318) كلاهما من حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن جابر فذكر مثله، واللفظ للبخاريّ، وليس عند مسلم:"كأنّهم الثّعارير" وتفسيره.

و"الضغابيس" هي صغار القثاء، وأحدها ضغبوس وقيل غير ذلك.

وقد جاء بيان هذه القصة من وجه آخر، أخرجه مسلم وهو الآتي:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শাফায়াতের মাধ্যমে জাহান্নাম থেকে এমন লোক বের হবে, যেন তারা 'আস-সা'আরীর'।" (বর্ণনাকারী) বললেন: 'আস-সা'আরীর' কী? তিনি (জাবির) বললেন: 'আদ-দাগাবিস'। (বর্ণনাকারী বলেন,) তখন তাঁর (জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) মুখমণ্ডল শিথিল হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর আমি আমর ইবনু দীনারকে বললাম: হে আবূ মুহাম্মাদ! আপনি কি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহকে বলতে শুনেছেন যে, তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "শাফায়াতের মাধ্যমে লোক জাহান্নাম থেকে বের হবে"? তিনি বললেন: হ্যাঁ।









আল-জামি` আল-কামিল (889)


889 - عن يزيد الفقير، قال: كنتُ قد شغفني رأيٌ مِنْ رأي الخوارج فخرجنا في عصابة ذوي عدد نريدُ أن نحجَّ، ثم نخرج على النّاس. قال: فمررنا على المدينة فإذا جابر بن عبد اللَّه يحدّث القوم -جالسٌ إلى سارية- عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: فإذا هو قد ذكر الجهنَّميين. قال: فقلت له: يا صاحبَ رسولِ اللَّه، ما هذا الذي تحدِّثون؟ واللَّه يقول: {رَبَّنَا إِنَّكَ مَنْ تُدْخِلِ النَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنْصَارٍ} [سورة آل عمران: 192]، و {وَأَمَّا الَّذِينَ فَسَقُوا فَمَأْوَاهُمُ النَّارُ كُلَّمَا أَرَادُوا أَنْ يَخْرُجُوا مِنْهَا أُعِيدُوا فِيهَا وَقِيلَ لَهُمْ ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّذِي كُنْتُمْ بِهِ تُكَذِّبُونَ} [سورة السجدة: 20] فما هذا الذي تقولون؟ قال: فقال: أتقرأ القرآن؟ قلتُ: نعم. قال: فهل سمعتَ بمقام محمد عليه السلام؟ (يعني الذي يبعثه اللَّه فيه)، قلت: نعم، قال: فإنّه مقام محمد صلى الله عليه وسلم المحمود الذي يخرجُ اللَّه به من يخرج. قال: ثم نعت وضعَ الصّراط ومرَّ الناسِ عليه. قال: وأخاف أن لا أكون أحفظ ذاك. قال: غير أنه قد زعم أنّ قومًا يخرجون من النّار بعد أن يكونوا فيها. قال: يعني فيخرجون كأنهم عيدان السّماسم. قال: فيدخلون نهرًا من أنهار الجنّة، فيغسلون فيه، فيخرجون كأنّهم
القراطيس. فخرجنا قلنا: ويحكم! أترون الشيخ يكذبُ على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فرجعنا، فلا واللَّه ما خرج منا غير رجل واحد. أو كما قال أبو نعيم.

صحيح: أخرجه مسلم في الإيمان (191: 320) عن الحجاج بن الشاعر، حدّثنا الفضل بن دكين، حدّثنا أبو عاصم (يعني محمد بن أبي أيوب) قال: حدثني يزيد الفقير، فذكره.

"الفقير" بالفاء ثم القاف على وزن عظيم، وهو لقب له؛ لأنّه كان يشكو فقار ظهره، لا أنّه ضد الغني.




ইয়াযীদ আল-ফাকীর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খা‘রিজী মতাদর্শের দ্বারা গভীরভাবে প্রভাবিত ছিলাম। তাই আমরা সংখ্যায় কয়েকজন লোক হজ করার উদ্দেশ্যে বের হলাম এবং (হজের পর) মানুষের বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করার ইচ্ছা করলাম।

তিনি বলেন: আমরা মদীনার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম। এমন সময় আমরা জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি খুঁটির পাশে বসা অবস্থায় দেখতে পেলাম। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে লোকেদের হাদীস শুনাচ্ছিলেন। তিনি বলেন: সে সময় তিনি (জাবির) জাহান্নামী ব্যক্তিদের কথা উল্লেখ করলেন।

ইয়াযীদ বলেন: আমি তাঁকে বললাম, হে আল্লাহর রাসূলের সাহাবী! আপনারা এ কেমন হাদীস বর্ণনা করছেন? অথচ আল্লাহ্ তা‘আলা বলছেন: "হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি যাকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন, তাকে তো আপনি নিশ্চিতভাবে লাঞ্ছিত করলেন; আর জালিমদের জন্য কোনো সাহায্যকারী নেই।" (সূরা আল-ইমরান, ৩: ১৯২)। এবং (আল্লাহ্ বলছেন:) "আর যারা ফাসেকী করে, তাদের ঠিকানা হলো জাহান্নাম। যখনই তারা সেখান থেকে বের হতে চাইবে, তখনই তাদেরকে সেখানে ফিরিয়ে দেয়া হবে এবং তাদেরকে বলা হবে: তোমরা সেই জাহান্নামের শাস্তি আস্বাদন করো, যাকে তোমরা মিথ্যা বলতে।" (সূরা আস-সাজদাহ, ৩২: ২০)। আপনারা এ কী বলছেন?

তিনি (জাবির) বললেন: তুমি কি কুরআন পড়ো? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তুমি কি মুহাম্মাদ (আঃ)-এর মাকামের (স্থান) কথা শুনেছো? (অর্থাৎ যেই মাকামে আল্লাহ্ তাঁকে প্রতিষ্ঠিত করবেন)। আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: সেটি হলো মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাকামে মাহমূদ, যার মাধ্যমে আল্লাহ্ যাকে ইচ্ছা (জাহান্নাম থেকে) বের করবেন।

বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি (জাবির) পুলসিরাত স্থাপন ও তার উপর দিয়ে মানুষের পারাপারের বর্ণনা দিলেন। ইয়াযীদ বলেন: আমার ভয় হচ্ছে যে আমি সেই অংশটুকু মুখস্থ রাখতে পারিনি। তবে তিনি এ কথা অবশ্যই বলেছেন যে, কিছু লোক জাহান্নামে থাকার পর সেখান থেকে বের হবে।

তিনি (জাবির) বললেন: অর্থাৎ তারা বের হবে তিলের ডালের মতো (কালো ও শুষ্ক)। তিনি বলেন: অতঃপর তাদেরকে জান্নাতের একটি নদীতে প্রবেশ করানো হবে, সেখানে তাদেরকে ধৌত করা হবে। ফলে তারা কাগজের মতো (শুভ্র) হয়ে বের হবে।

(ইয়াযীদ বলেন:) এরপর আমরা বের হয়ে বললাম: তোমাদের কী হলো? তোমরা কি এই বৃদ্ধকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নামে মিথ্যা বলতে দেখছো? তখন আমরা ফিরে আসলাম। আল্লাহর কসম! আমাদের মধ্যে কেবল একজন লোক ছাড়া আর কেউ (বিদ্রোহের জন্য) বের হয়নি। অথবা আবূ নু‘আইম যেমন বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (890)


890 - عن عمران بن حصين، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرج قوم من النّار بشفاعة محمد صلى الله عليه وسلم، فيدخلون الجنّة يُسَمَّون الجهنميين".

صحيح: رواه البخاريّ في الرّقاق (6566) عن مسدّد، حدّثنا يحيى، عن الحسن بن ذكوان، حدّثنا أبو رجاء، حدّثنا عمران بن حصين، فذكره.

ورُوي مثل هذا عن ابن عباس.

قال ابن خزيمة في التوحيد (544) سمعت بندار -وهو محمد بن بشار- في الرّحلة الثانية، وقيل له: حدَّثكم يحيى بن سعيد، قال: حدّثنا الحسن بن ذكوان، عن أبي رجاء العُطارديّ، عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بمثله؟ فقال بندار: نعم.

قال ابن خزيمة:"لستُ أُنكر أن يكون الخبران صحيحين؛ لأنّ أبا رجاء قد جمع بين ابن عباس وعمران بن حصين في غير هذا الحديث أيضًا".




ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শাফা‘আতের মাধ্যমে একদল লোক জাহান্নাম থেকে বের হবে এবং জান্নাতে প্রবেশ করবে। তাদেরকে ‘জাহান্নামী’ নামে ডাকা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (891)


891 - عن أنس عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"شفاعتي لأهل الكبائر من أمّتي".

صحيح: رواه أبو داود (4739)، والترمذيّ (2435)، وأحمد (13222)، وابن خزيمة في التوحيد (527)، وابن حبان (6468)، والحاكم (1/ 69) كلّهم من طرق عن أنس بن مالك، فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".

وقوله:"شفاعتي لأهل الكبائر" فإنّما أراد الشّفاعة بعد الشّفاعة الكبرى التي عمّت جميع المسلمين وهي شفاعة لمن قد أُدخل النّار من المؤمنين بذنوبهم وخطاياهم قد ارتكبوها، ولم يغفرها اللَّه لهم في الدّنيا، فيخرجون من النّار بشفاعته صلى الله عليه وسلم". ذكره ابن خزيمة (2/ 577).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "আমার শাফাআত (সুপারিশ) হলো আমার উম্মতের কবিরা গুনাহগারদের জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (892)


892 - عن جابر، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ شفاعتي يوم القيامة لأهل الكبائر من أمّتي".

صحيح: رواه ابن ماجه (4310) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدّمشقيّ، قال: حدّثنا الوليد بن مسلم، قال: حدّثنا زهير بن محمد، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره.

وهذا إسناد صحيح، والوليد بن مسلم وإن كان مدلِّسًا إلا أنّه صرَّح بالتحديث، كما أنّه توبع
فقد أخرجه ابن خزيمة في التوحيد (531)، وابن حبان (6467)، والحاكم (1/ 69) كلّهم من طريق عمرو بن أبي سلمة، ثنا زهير بن محمد به مثله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وقال: وقد تابعه محمد بن ثابت البناني عن جعفر.

قلت: محمد بن ثابت البنانيّ تكلّم فيه غير واحد من أهل العلم، ومن طريقه رواه الترمذيّ (2436)، وابن خزيمة في كتاب التوحيد (530)، والحاكم (1/ 69)، والآجريّ في الشّريعة (778) كلّهم من طريق أبي داود الطّيالسيّ عنه، عن جعفر بن محمد بإسناده، مثله.

وقال محمد بن علي وهو أبو جعفر: قال لي جابر:"يا محمد، من لم يكن من أهل الكبائر فما له، وللشّفاعة؟ !".

قال الترمذيّ:"حديث غريب من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال، فإنّه غريب من الوجه الذي أخرجه، وفيه زيادة منكرة ولم يتابع عليها؛ ولذا أدخله ابنُ حبان في المجروحين في ترجمة محمد بن ثابت البناني (925) وإن لم يذكر تلك الزّيادة.

وأمّا الوجه الأول الذي أخرج من طريقه ابن خزيمة وابن حبان فهو صحيح.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, "নিশ্চয় কিয়ামতের দিন আমার শাফায়াত আমার উম্মতের কবীরা গুনাহকারীদের জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (893)


893 - عن كعب بن عجرة، قال: قلت: يا رسول اللَّه، الشّفاعة؟ قال:"الشّفاعة لأهل الكبائر من أمّتي".

حسن: رواه الآجريّ في الشّريعة (780)، والخطيب في تاريخ بغداد (3/ 40) (في ترجمة محمد بن عمر بن عبد العزيز الهمدانيّ) كلاهما عن طريق محمد بن بكّار، حدّثنا عنبسة بن عبد الواحد، عن واصل، عن أُمَيّ أبي عبد الرحمن، عن الشّعبيّ، عن كعب بن عجرة، فذكره.

قال الخطيب عقب رواية الحديث:"قال علي بن عمر -يعني الدارقطنيّ-: هذا حديث غريب من حديث الشّعبيّ، عن كعب بن عجرة، تفرّد به أُمَيّ بن ربيعة الصيرفيّ عنه، وتفرّد به واصل بن حيّان، عن أُمَيّ، ولا يعلم حدَّث به عنه غير عنبسة بن عبد الواحد".

قلت: رجال إسناده ثقات لا يضرّ، تفرّد بعضهم عن بعض، أما واصل فيرى الدّارقطني أنه ابن حيان الأحدب وهو ثقة ثبت من رجال الجماعة، وقيل: هو مولى أبي عيينة وهو ثقة حجّة أيضًا.

وأمّا أُمَيّ فهو ابن ربيعة الصّيرفيّ أبو عبد الرحمن وهو ثقة أيضًا.




কা'ব ইবনে উজরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম, “হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), শাফাআত (কাদের জন্য)?” তিনি বললেন, “শাফাআত হলো আমার উম্মতের মধ্যে যারা কবিরা গুনাহকারী, তাদের জন্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (894)


894 - عن عوف بن مالك الأشجعي قال: عَرَّس رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم ذاتَ ليلةٍ، فافترش كلُّ رجل منّا ذراعَ راحلته، قال: فانتهيتُ إلى بعض الليل فإذا ناقهُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليس قُدَّامها أحدٌ، قال: فانطلقتُ أطلب رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم فإذا معاذُ بن جبل وعبد اللَّه ابن قيس قائمان، قلت: أين رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قالا: ما ندري غير أنّا سمعنا صوتًا
بأعلى الوادي، فإذا مثل هزيز الرَّحل. قال:"امْكُثُوا يسيرًا". ثم جاءنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"إنّه أتاني اللّيلة آتٍ من ربِّي فخيَّرني بين أن يَدخُلَ نصفُ أمَّتي الجنَّةَ وبين الشَّفاعةِ فاخترتُ الشَّفاعةَ". فقلنا: ننشُدُك اللَّهَ والصُّحبةَ لَمَا جعلْتَنَا من أهل شفاعتك. قال:"فإنّكم من أهل شفاعتي". قال: فأقبلْنا مَعانيقَ إلى النّاس، فإذا هم قد فَزعُوا وفَقَدُوا نَبِيَّهم، وقال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّه أتاني اللّيلة آتٍ من ربِّي فخيَّرني بين أن يَدخُلَ نصفُ أمَّتي الجنَّةَ وبين الشَّفاعةِ فاخترتُ الشَّفاعةَ". قالوا: يا رسول اللَّه نَنشُدُك اللَّهَ والصُّحْبة لما جعلتنا من أهل شفاعتك. قال: فلمّا أضَبُّوا عليه، قال:"فأنا أشهدُكم أنَّ شفاعتي لمن لا يشرك باللَّه شيئًا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (24002)، وابن خزيمة (516، 517)، وابن حبان (211، 6463)، والآجري في الشريعة (793)، والحاكم (1/ 67) كلّهم من طريق قتادة، عن أبي المليح، عن عوف بن مالك الأشجعيّ، فذكره. ولفظهم سواء.

وأخرجه الترمذيّ (2441) من هذا الوجه مختصرًا.

ورواه ابن ماجه (4317) من وجه آخر مختصرًا أيضًا، وفيه:"هي لكل مسلم". وله طرق أخرى، انظر كتاب التوحيد لابن خزيمة.




আওফ ইবনে মালিক আল-আশজা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক রাতে (যাত্রাবিরতির জন্য) অবতরণ করলেন। তখন আমাদের প্রত্যেকেই তার উটের বাহু বিছিয়ে (মাথা বা শরীরের নিচে রেখে) দিল।

তিনি বললেন, অতঃপর আমি রাতের কিছু অংশে যখন উঠে দেখি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উটনী সেখানে দাঁড়িয়ে আছে, কিন্তু তার সামনে কেউ নেই। তিনি বললেন, তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে খুঁজতে গেলাম। গিয়ে দেখি মু'আয ইবনে জাবাল ও আব্দুল্লাহ ইবনে কায়স (আবূ মূসা আল-আশআরী) দাঁড়িয়ে আছেন। আমি জিজ্ঞেস করলাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কোথায়? তারা বললেন, আমরা জানি না। তবে আমরা উপত্যকার উপরের দিক থেকে একটি শব্দ শুনতে পেলাম, যা ছিল যেন উটের হাওদার গুঞ্জন ধ্বনির মতো।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'তোমরা অল্প কিছুক্ষণ অপেক্ষা করো।' অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে এলেন এবং বললেন, 'আজ রাতে আমার রবের পক্ষ থেকে একজন আগন্তুক আমার কাছে এসেছিলেন। তিনি আমাকে আমার উম্মতের অর্ধেককে জান্নাতে প্রবেশ করানোর অথবা শাফা'আতের (সুপারিশের) মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নেওয়ার সুযোগ দেন। আমি শাফা'আতকে বেছে নিয়েছি।'

তখন আমরা বললাম, আমরা আল্লাহ এবং আপনার সাহচর্যের দোহাই দিয়ে বলছি, আপনি যেন আমাদেরকে আপনার শাফা'আতের অন্তর্ভুক্ত করেন। তিনি বললেন, 'নিশ্চয়ই তোমরা আমার শাফা'আতের অন্তর্ভুক্ত।'

তিনি বললেন, অতঃপর আমরা দ্রুতবেগে মানুষের কাছে ফিরে গেলাম। দেখলাম তারা ভয় পেয়েছেন এবং তাদের নবীকে অনুপস্থিত পেয়েছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, 'আজ রাতে আমার রবের পক্ষ থেকে একজন আগন্তুক আমার কাছে এসেছিলেন। তিনি আমাকে আমার উম্মতের অর্ধেককে জান্নাতে প্রবেশ করানোর অথবা শাফা'আতের (সুপারিশের) মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নেওয়ার সুযোগ দেন। আমি শাফা'আতকে বেছে নিয়েছি।'

তারা বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা আল্লাহ এবং আপনার সাহচর্যের দোহাই দিয়ে বলছি, আপনি যেন আমাদেরকে আপনার শাফা'আতের অন্তর্ভুক্ত করেন। বর্ণনাকারী বলেন, যখন তারা তাঁর উপর চাপ প্রয়োগ করলেন (অনুরোধ করতে থাকলেন), তখন তিনি বললেন, 'আমি তোমাদের সাক্ষী রেখে বলছি যে, আমার শাফা'আত তার জন্য, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে না।'









আল-জামি` আল-কামিল (895)


895 - عن عوف بن مالك الأشجعي قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في سفرٍ فنزلنا ليلة، فقمتُ أطلبُ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فلم أجدْه، ووجدتُ معاذ بن جبل وأبا موسى الأشعريّ فقالا: ما حاجتك؟ فقلت: أين رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقالا: لا ندري فبينا نحن على ذلك، إذْ سمعنا في أعلى الوادي هديرًا كهدير الرَّحا، فلم نلبث أن جاء النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم. فقلنا: يا رسول اللَّه فقدناك اللّيلة؟ فقال:"إنه أتاني آتٍ من ربّي فخيّرني بين أن تكون أمتي شطر أهل الجنّة وبين الشّفاعة، فاخترتُ الشّفاعة". فقلنا: يا نبي اللَّه ادعُ اللَّه أن يجعلنا من أهل الشّفاعة. فقال:"اللهمّ اجعلهم من أهلها". ثم أتينا القوم فأخبرناهم، فقالوا: يا رسول اللَّه، ادعُ اللَّه أن يجعلنا من أهل شفاعِتك. فقال:"اللهمّ اجعلهم من أهلها". ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أشهدكم أنّ شفاعتي لكلِّ من مات لا يشرك باللَّه شيئا".

صحيح: رواه عبد الرزاق (20865)، وابنُ أبي عاصم (819)، وابن خزيمة (522) كلّهم من طريق أبي قلابة، عن عوف بن مالك، قال (فذكره)، واللّفظ لعبد الرزاق، ولفظهما قريب منه.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات غير أنّ أبا قلابة رُمي بالتدليس إلّا أنّ ابن خزيمة رواه من
طريقين عن أبي بشر الواسطيّ، قال: حدّثنا خالد -يعني ابن عبد اللَّه-، عن خالد -يعني الحذاء- عن أبي قلابة، بإسناده.

وقال: وقال خالد: فحدّثني حميد بن هلال، عن أبي بردة، عن أبي موسى، عن عوف بن مالك، قال: سمعت خلْف أبي موسى هزيزًا كهزيز الرّحى، فقلت: أين رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال: ورائي وقد أقبل، فإذا أنا برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول اللَّه! إنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم إذا كان بأرض العدو كان عليه حارسًا! فقال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"إنّه أتاني آتٍ من ربّي آنفًا، فخيّرني بين أن يُدخل نصف أمّتي الجنّة، وبين الشّفاعة، فاخترتُ الشّفاعة" انتهى.

قال ابن خزيمة:"جعلت هذا الخبر -أعني خبر عوف بن مالك- بإسنادين:

أحدهما: أبو المليح، عن عوف بن مالك.

والثاني: أبو بردة، عن أبي موسى، عن عوف بن مالك".

فالطّريق الأول كما سبق، والطّريق الثاني هو طريق أبي قلابة تم تحويله إلى طريق أبي بردة، عن أبي موسى، عن عوف بن مالك. ولذلك أفردتُ هذا الطّريق، ولكن رُوي هذا الحديث أيضًا من مسند أبي موسى وهو الآتي:




আওফ ইবনে মালিক আল-আশজা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। এক রাতে আমরা যাত্রা বিরতি করলাম, তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুঁজতে দাঁড়ালাম কিন্তু তাঁকে পেলাম না। আমি মু'আয ইবনে জাবাল এবং আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পেলাম। তাঁরা বললেন: তোমার কী প্রয়োজন? আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোথায়? তাঁরা বললেন: আমরা জানি না। আমরা যখন এরূপ আলোচনা করছিলাম, তখন আমরা উপত্যকার উপর প্রান্তে জাঁতার শব্দের মতো এক গর্জন শুনতে পেলাম। কিছুক্ষণের মধ্যেই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে এলেন। আমরা বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আজ রাতে আমরা আপনাকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমার রবের পক্ষ থেকে একজন আগন্তুক আমার কাছে এসেছিলেন। তিনি আমাকে দুটি জিনিসের মধ্যে একটি বেছে নেওয়ার সুযোগ দেন: হয় আমার উম্মত যেন জান্নাতবাসীদের অর্ধেক হয়, অথবা শাফা‘আত (সুপারিশ)। আমি শাফা‘আতকে বেছে নিলাম।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! আমাদের শাফা‘আতের অধিকারী করার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! এদেরকে শাফা‘আতের অধিকারী করুন।" অতঃপর আমরা লোকদের কাছে এলাম এবং তাদেরকে (এই খবর) জানালাম। তারা বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাদেরকে আপনার শাফা‘আতের অধিকারী করার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! এদেরকে শাফা‘আতের অধিকারী করুন।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রাখছি যে, আমার শাফা‘আত সেই সকল ব্যক্তির জন্য যারা আল্লাহর সাথে কোন কিছুকে শরীক না করে মৃত্যুবরণ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (896)


896 - عن أبي موسى قال: كُنّا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فعرّس وعرّسنا، فقال:"أتي آتٍ بعدكم من ربِّكم فخيّرني بين أن يدخل نصف أمّتي الجنّة، وبين الشّفاعة، فاخترتُ الشّفاعة، فقلنا: يا رسول اللَّه، اجعلنا ممن تشفع له. قال:"أنتم منهم". قلنا: أفلا نبشِّر النّاس بها يا رسول اللَّه؟ وابتدرناه الرجال فلما كثروا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"هي لكلّ من مات لا يشرك باللَّه شيئًا".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (821) عن هشام بن عمار، ثنا الحكم بن هشام، حدّثنا عبد الملك بن عمير، عن أبي بردة، وأبي بكر ابني أبي موسى، عن أبي موسى، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الحكم بن هشام، فإنّه صدوق.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমরা বিশ্রাম নিলাম এবং তিনিও বিশ্রাম নিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: 'তোমাদের পরে আমার রবের পক্ষ থেকে একজন আগন্তুক (ফেরেশতা) এসে আমাকে দুটি বিষয়ের মধ্যে একটি বেছে নিতে বললেন: হয় আমার উম্মতের অর্ধেককে জান্নাতে প্রবেশ করানো, অথবা শাফায়াত। অতঃপর আমি শাফায়াতকে বেছে নিলাম।' আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাদেরকে আপনার শাফায়াত লাভকারীদের অন্তর্ভুক্ত করুন। তিনি বললেন: 'তোমরা তাদেরই অন্তর্ভুক্ত।' আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি লোকদেরকে এই সুসংবাদ দেব না? লোকেরা দ্রুত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এগিয়ে এলো। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে লোকের ভিড় বাড়ল, তখন তিনি বললেন: 'এই শাফায়াত প্রত্যেক সেই ব্যক্তির জন্য, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে মৃত্যুবরণ করেছে।'









আল-জামি` আল-কামিল (897)


897 - عن ابن دارة مولى عثمان، قال: إنا لبالبقيع مع أبي هريرة إذ سمعناه يقول: أنا أعلم النّاس بشفاعة محمد صلى الله عليه وسلم يوم القيامة، قال: فتداكّ النّاس عليه، فقالوا: إيهٍ يرحمك اللَّه! قال: يقول:"اللهمّ اغفر لكل عبد مسلم، لقيك يؤمن بي لا يشرك بك".

حسن: رواه أحمد (9852) عن حجاج، قال: حدّثنا ابن جريج، قال: حدثني العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب، عن ابن دارة، مولى عثمان فذكره.

وإسناده حسن من أجل العلاء بن عبد الرحمن وشيخه ابن دارة مولى عثمان وكلاهما حسن الحديث.
واختلف في ابن دارة هل له صحبة أم لا، والصحيح أنه ليست له صحبة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্ত দাস) ইবনু দারাহ বলেন, আমরা বাকী কবরস্থানে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তখন আমরা তাকে বলতে শুনলাম: কিয়ামতের দিন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শাফা‘আত (সুপারিশ) সম্পর্কে আমিই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি অবগত। বর্ণনাকারী বলেন, তখন লোকেরা তাঁর কাছে ভিড় জমালো এবং বলল: আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন! আপনি বলুন! তিনি বললেন, (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন): “হে আল্লাহ! আপনার সেই সকল মুসলিম বান্দাকে ক্ষমা করে দিন, যারা আপনার সাথে এই অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, তারা আমার প্রতি ঈমান রাখে এবং আপনার সাথে কাউকে শরীক করে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (898)


898 - عن أبي موسى، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم كان يحرُسُه أصحابه، فقمتُ ذات ليلة، فلم أره في منامه، فأخذني ما قَدُم وما حدث، فذَهبتُ أنظر، فإذا أنا بمعاذ قد لقي الذي لقيتُ، فسمعنا صوتًا مثل هزيز الرحا، فوقفا على مكانهما، فجاء النبيّ صلى الله عليه وسلم من قِبَل الصَّوت، فقال:"هل تدرون أين كنتُ؟ وفِيم كنتُ؟ أتاني آتٍ من ربّي عز وجل، فخيَّرني بين أن يدخل نصف أمَّتي الجنّة وبين الشّفاعة، فاخترتُ الشّفاعة". فقالا: يا رسول اللَّه، ادعُ اللَّه عز وجل أن يجعلنا في شفاعتك. فقال:"أنتم ومَنْ ماتَ لا يُشركُ باللَّه شيئًا في شفاعتي".

حسن: رواه أحمد (19618) عن عفّان، حدّثنا حمّاد -يعني ابن سلمة- أخبرنا عاصم، عن أبي بردة، عن أبي موسى، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم وهو ابن أبي النجود فإنّه حسن الحديث.

وعزاه الهيثميّ في"المجمع" (10/ 368 - 369) إلى أحمد والطبرانيّ وقال في رواية أحمد:"رجالهما رجال الصّحيح غير عاصم بن أبي النّجود، وقد وُثِّق، وفيه ضعف".

ورواه حمزة بن علي مخفر، عن أبي بردة، عن أبي موسى قال: غزونا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره قال: فعرّس بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فانتهيت بعض اللّيل إلى مناخ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أطلبه فلم أجده، قال: فخرجتُ بارزًا أطلبه، وإذا رجلٌ من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يطلبُ ما أطلبُ. قال: فيينا نحن كذلك إذ اتّجه إلينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: فقلنا: يا رسول اللَّه، أنت بأرض حرب ولا نأمن عليك فلولا إذْ بَدَتْ لك الحاجة قلت لبعض أصحابك، فقام معك. قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّي سمعت هزيزا كهزيز الرّحى -أو حنينًا كحنين النّحل- وأتاني آت من ربّي عز وجل قال: فخيرني بأن يدخل ثلث أمتي الجنّة وبين الشّفاعة لهم فاخترت لهم شفاعتي وعلمت انها أوسع لهم، فخيّرني أن يُدْخِل شطر أمّتي الجنّة وبين شفاعتي لهم فاخترت شفاعتي لهم وعلمت أنّها أوسعُ لهم". فقالا: يا رسول اللَّه، ادعُ اللَّه تعالى أن يجعلنا من أهل شفاعتك. قال: فدعا لهما، ثم إنّهما نبّها أصحابَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأخبراهم بقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: فجعلوا يأتونه، ويقولون: يا رسول اللَّه، ادع اللَّه تعالى أن يجعلنا من أهل شفاعتك فيدعو لهم، قال: فلمّا أَضَبَّ عليه القوم وكَثُروا، قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّها لمن مات وهو يشهد أن لا إله الا اللَّه".

رواه الإمام أحمد (19724) عن حسن بن موسى -يعني الأشْيب- قال: حدّثنا سُكين بن عبد العزيز، قال: أخبرنا يزيد الأعرج. -قال عبد اللَّه: يعني أظنّه الشنّيّ- قال: حدّثنا حمزة بن علي بن مخفر، عن أبي بردة، عن أبي موسى (فذكره).

وحمزة بن علي بن مخفر من رجال"التعجيل" وهو مجهول، كما ذكره المؤلف، إلّا أنه توبع،
ولبعض فقراته شواهد صحيحة كما مضتْ.

وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا:"خُيِّرت بين الشّفاعة، أو يدخل نصف أُمّتي الجنّة، فاخترتُ الشّفاعة؛ لأنّها أعمُّ وأكفى، أترونها للمنقين؟ لا، ولكنّها للمتلوّثين الخطّاؤون". قال زياد: أما إنّها لحن، ولكن هكذا حدّثنا الذي حدّثنا.

رواه الإمام أحمد (5452) حدّثنا معمر بن سليمان أبو عبد اللَّه، حدّثنا زياد بن خيثمة، عن علي ابن النّعمان بن قراد، عن رجل، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.

وعلي بن النعمان بن قراد لم يرو عنه غير زياد بن خيثمة فهو مجهول، وإن كان ابن حبان ذكره في الثقات على قاعدته في ذكر المجاهيل، واعتمده الهيثمي في"المجمع" (1/ 378) فوثقه، وشيخه مبهم لا يُعرف من هو؟ .

وقد رُوي هذا الحديث عن أبي موسى الأشعريّ.

رواه ابن ماجه (4311) من وجه آخر عن زياد بن خيثمة، عن نعيم بن أبي هند، عن ربعي بن خراش، عن أبي موسى الأشعريّ، وفيه:"أترونها للمنقِّين؟ لا، ولكنّها للمذنبين الخطّائين المتلوثين".

وفي رواية أخرى عن ربعي، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، مرسلًا.

ذكر الدّارقطنيّ هذا الحديث في كتابه"العلل" ونقل ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 438) قول الدارقطني:"ليس في الأحاديث شيء صحيح".

فمن لم يتنبَّه لوقوع الاضطراب في هذا الحديث صحّحه.

وقوله:"للمنقين" من التنقية - أي للمطهّرين من الذنوب.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর সাহাবীগণ পাহারা দিতেন। এক রাতে আমি উঠলাম, কিন্তু তাঁকে তাঁর বিশ্রামস্থলে দেখতে পেলাম না। তখন আমি (অনিশ্চয়তা ও আশঙ্কায়) অত্যন্ত চিন্তিত হলাম। আমি তাঁকে খুঁজতে গেলাম। হঠাৎ আমি মু'আযের দেখা পেলাম, যিনি আমার মতোই পরিস্থিতি অনুভব করছিলেন। তখন আমরা যাঁতার শব্দের মতো একটি শব্দ শুনতে পেলাম। তাঁরা দু'জনই নিজ নিজ স্থানে দাঁড়িয়ে গেলেন। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শব্দের দিক থেকে আসলেন। তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো আমি কোথায় ছিলাম এবং কী করছিলাম? আমার প্রতিপালক, পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর পক্ষ থেকে একজন আগমনকারী এসেছিলেন। তিনি আমাকে আমার উম্মতের অর্ধেককে জান্নাতে প্রবেশ করিয়ে দেওয়া এবং (অন্যদের জন্য) সুপারিশের (শাফা‘আতের) মধ্যে একটি বেছে নিতে বললেন। সুতরাং আমি সুপারিশকেই বেছে নিলাম।" তাঁরা দু'জন বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন তিনি আমাদেরকে আপনার সুপারিশের অন্তর্ভুক্ত করেন। তিনি বললেন: "তোমরা এবং যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক না করে মৃত্যুবরণ করবে, তারা সকলেই আমার সুপারিশের মধ্যে থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (899)


899 - عن أنس قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّي لأوّلُ النّاس تنشقُّ الأرضُ عن جُمْجُمَتِي يوم القيامة ولا فخر، وأُعْطي لواء الحمد ولا فخر، وأنا سيّد النّاس يوم القيامة ولا فخر، وأنا أوّل من يدخل الجنّة يوم القيامة ولا فخر، وإنّي آتي باب الجنّة فآخذ بِحَلْقَتِها فيقولون: مَنْ هذا فأقول: أنا محمّد. فيفْتَحُون لي فأدخلُ فإذا الجبّار مستقبلي، فأسجدُ له فيقول: ارْفَعْ رَأْسَك يا محمّد، وتَكَلَّمْ يُسْمَعْ منك وقُلْ يُقْبلُ منك، واشْفَع تُشَفَّع. فأرفع رأسي، فأقول: أُمّتي أُمّتي يا ربّ، فيقول: اذْهب إلى أُمَّتك فمن وجدتَ في قلبه مثقال حبّة من شعير من الإيمان فأدخله الجنّة، فأُقْبِلُ فَمَنْ وجدتُ في قلبه ذلك فأُدخِلُهُ الجنّة. فإذا الجبَّار مستقبلي فاسجد له فيقول: ارْفَعْ رَأْسَك يا محمّد، وتَكَلَّمْ يُسْمَعْ منك وقُلْ يُقْبلُ منك، واشْفَع تُشَفَّع. فأرفع رأسي فأقول: أمّتي أمّتي أَيْ رَبِّ فيقول: اذهب إلى أمّتك فمن وجدت في قلبه
نصف حبة من شعير من الإيمان فأدْخلْهم الجنّة، فأذهبُ فمن وجدتُ في قلبه مثقال ذلك أدخلهم الجنّة. فإذا الجبار مُستقبلي، فأسجد له فيقول: ارْفَعْ رَأْسَك يا محمّد، وتَكَلَّمْ يُسْمَعْ منك وقُلْ يُقْبلُ منك، واشْفَع تُشَفَّع. فأرفع رأسي فأقول: أمّتي أمّتي. فيقول: اذهب إلى أمَّتِك فمن وجدتُ في قلبه مثقالَ حبَّةٍ من خَرْدل من الإيمان فأدخله الجنّة، فأذهبُ فمن وجدتُ في قلبه مثقالَ ذلك أدخلتُهم الجنّة. وفرغ اللَّهُ من حساب النّاس وأدخل من بقي من أمّتي النّار مع أهل النّار. فيقول أهلُ النّار: ما أغني عنكم أنَّكم كنتم تعبدون اللَّه عز وجل لا تشركون به شيئًا! . فيقول الجبار: فبعِزَّتِي لأعتِقَنَّهم من النّار فيُرسل إليهم فيُخْرجُون وقد امْتَحَشُوا فيدخلون في نَهْر الحياة، فَينْبُتُونَ فيه كما تَنْبُتُ الحبَّةُ في غُثاءِ السَّيْل، ويُكْتَبُ بين أعينهم: هؤلاء عتقاءُ اللَّه فيُذْهبُ بهم فَيُدْخلُون الجنّة، فيقولُ لهم أهلُ الجنّة: هؤلاء الْجَهَنَّمِيُّوَن! فيقول الجبار: بل هؤلاء عتقاءُ الجبار".

حسن: رواه الإمام أحمد (12469)، وابن منده في الإيمان (877)، وابن خزيمة في التوحيد (601)، والضّياء في المختارة (2345)، والدّارميّ (53).

كلّهم من طريق اللّيث، عن ابن الهاد، عن عمرو بن أبي عمرو، عن أنس بن مالك، فذكره، واللّفظ لأحمد.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن أبي عمرو مولى المطّلب فإنه مختلف فيه، فضعّفه ابنُ معين، والنسائيّ، ووثّقه أبو زرعة والعجليّ، وقال أحمد: ليس به بأس. وقال الذهبيّ: حديثه حسن.

وهو كما قال إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه. وله أسانيد ضعيفة، والذي ذكرتُه أصحّها.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আমিই প্রথম ব্যক্তি, যার মাথার খুলি হতে কিয়ামত দিবসে মাটি বিদীর্ণ হবে, এতে কোনো গর্ব নেই। আমাকে 'লিওয়াউল হামদ' (প্রশংসার পতাকা) দেওয়া হবে, এতে কোনো গর্ব নেই। আমিই কিয়ামতের দিন মানবজাতির সরদার, এতে কোনো গর্ব নেই। আমিই কিয়ামতের দিন প্রথম জান্নাতে প্রবেশকারী, এতে কোনো গর্ব নেই।

আমি জান্নাতের দরজায় এসে তার কড়া ধরব। তারা জিজ্ঞাসা করবে, ইনি কে? আমি বলব, আমি মুহাম্মাদ। তখন তারা আমার জন্য দরজা খুলে দেবে। আমি ভেতরে প্রবেশ করব। যখন আমি জাব্বার (পরাক্রমশালী আল্লাহ্)-কে আমার সামনে দেখতে পাব, তখন আমি তাঁর জন্য সাজদাবনত হব। তিনি বলবেন: “হে মুহাম্মাদ, আপনার মাথা উঠান। কথা বলুন, আপনার কথা শোনা হবে। বলুন, তা কবুল করা হবে। সুপারিশ করুন, আপনার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে।”

আমি মাথা উঠিয়ে বলব: “হে আমার রব, আমার উম্মাত! আমার উম্মাত!” তিনি বলবেন: “আপনার উম্মাতের কাছে যান। যার অন্তরে যব পরিমাণ ঈমান পাবেন, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।” তখন আমি ফিরে আসব। যার অন্তরে তা পাব, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাব।

এরপর আমি যখন জাব্বারকে আমার সামনে দেখতে পাব, তখন তাঁর জন্য সাজদাবনত হব। তিনি বলবেন: “হে মুহাম্মাদ, আপনার মাথা উঠান। কথা বলুন, আপনার কথা শোনা হবে। বলুন, তা কবুল করা হবে। সুপারিশ করুন, আপনার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে।” আমি মাথা উঠিয়ে বলব: “হে আমার রব, আমার উম্মাত! আমার উম্মাত!” তিনি বলবেন: “আপনার উম্মাতের কাছে যান। যার অন্তরে অর্ধ যব পরিমাণ ঈমান পাবেন, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।” তখন আমি যাব এবং যার অন্তরে সে পরিমাণ ঈমান পাব, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাব।

এরপর যখন আমি জাব্বারকে আমার সামনে দেখতে পাব, তখন তাঁর জন্য সাজদাবনত হব। তিনি বলবেন: “হে মুহাম্মাদ, আপনার মাথা উঠান। কথা বলুন, আপনার কথা শোনা হবে। বলুন, তা কবুল করা হবে। সুপারিশ করুন, আপনার সুপারিশ গ্রহণ করা হবে।” আমি মাথা উঠিয়ে বলব: “আমার উম্মাত! আমার উম্মাত!” তিনি বলবেন: “আপনার উম্মাতের কাছে যান। যার অন্তরে একটি সরিষা দানা পরিমাণ ঈমান পাবেন, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।” তখন আমি যাব এবং যার অন্তরে সে পরিমাণ ঈমান পাব, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাব।

আর আল্লাহ্ মানুষের হিসাব শেষ করে ফেলবেন এবং আমার উম্মাতের যারা বাকি থাকবে, তাদেরকে জাহান্নামীদের সাথে জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন। তখন জাহান্নামীরা বলবে: “তোমরা তো আল্লাহ্ আযযা ওয়াজাল্লার ইবাদত করতে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করতে না, কিন্তু তোমাদের জন্য এর কী লাভ হলো?”

তখন জাব্বার (আল্লাহ্) বলবেন: “আমার ইজ্জতের শপথ! আমি অবশ্যই তাদের জাহান্নাম থেকে মুক্ত করব।” তিনি তাদের কাছে লোক পাঠাবেন এবং তাদেরকে বের করে আনা হবে, অথচ তারা পুড়ে কয়লা হয়ে গেছে। অতঃপর তাদেরকে 'নাহরুল হাযাত' (জীবনের নহর/নদী)-এর মধ্যে প্রবেশ করানো হবে। তাতে তারা সয়লাবের স্রোতে ভেসে আসা আবর্জনার মধ্যে অঙ্কুরিত হওয়া বীজের মতো সতেজ হয়ে উঠবে। আর তাদের দুই চোখের মাঝখানে লিখে দেওয়া হবে: ‘এরা আল্লাহর মুক্তিকৃত বান্দা।’ তাদের নিয়ে যাওয়া হবে এবং জান্নাতে প্রবেশ করানো হবে। তখন জান্নাতবাসীরা তাদের দেখে বলবে: “এরা তো জাহান্নামী!” জবাবে জাব্বার (আল্লাহ্) বলবেন: “না, বরং এরা জাব্বারের (আল্লাহর) মুক্তিকৃত বান্দা।”









আল-জামি` আল-কামিল (900)


900 - عن أنس قال: سألت النبيّ صلى الله عليه وسلم أن يشفع لي يوم القيامة، فقال:"أنا فاعل". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأين أطلبك؟ قال:"اطلبني أوّل ما تطلبني على الصّراط". قال: قلت: فإن لم ألقاك على الصّراط؟ قال:"فاطلبني عند الميزان". قلت: فإن لم ألقك عند الميزان؟ قال:"فاطلبني عند الحوض، فإنّي لا أخطئ هذه الثلاث المواطن".

حسن: رواه الترمذيّ (2433) عن عبد اللَّه بن الصّباح الهاشميّ، حدّثنا بدل بن المحبَّر، حدّثنا حرب بن ميمون الأنصاريّ أبو الخطّاب، حدّثنا النّضر بن أنس، عن أبيه، فذكر مثله.

ورواه الإمام أحمد (12825) عن يونس بن محمد، حدّثنا حرب بن ميمون، بإسناده، مثله.

وإسناده حسن من أجل حرب بن ميمون، فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذيّ:"حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম যেন তিনি কিয়ামতের দিন আমার জন্য শাফাআত করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তা করব।" আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমি আপনাকে কোথায় খুঁজব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যখন প্রথম আমাকে খুঁজবে, তখন সিরাতের (পুল সিরাত) উপর খুঁজবে।" আমি বললাম, যদি আমি সিরাতের উপর আপনাকে না পাই? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি আমাকে মীযানের (আমল পরিমাপক পাল্লা) কাছে খুঁজবে।" আমি বললাম, যদি আমি মীযানের কাছেও আপনাকে না পাই? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি আমাকে হাউযের (হাউয কাওসার) কাছে খুঁজবে। কারণ, আমি এই তিনটি স্থান থেকে অনুপস্থিত থাকব না।"









আল-জামি` আল-কামিল (901)


901 - عن أمّ حبيبة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أُريت ما تلقى أمّتي بعدي، وسفك بعضهم دماء بعضٍ، وسبق ذلك من اللَّه، كما سبق على الأمم قبلهم، فسألته أن يولّيني شفاعةً يوم القيامة فيهم، ففعل".

صحيح: رواه ابن خزيمة في التوحيد (533)، وابن أبي عاصم في السنة (801)، والحاكم (1/ 68) كلّهم من طريق أبي اليمان، قال: حدّثنا شعيب -وهو ابن أبي حمزة-، عن الزهريّ، عن أنس، عن أمِّ حبيبة، فذكرته.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه، والعلّة عندهما فيه أنّ أبا اليمان حدّث به مرّتين، فقال مرّة عن شعيب، عن الزّهريّ، عن أنس. وقال مرّة: عن شعيب، عن ابن أبي حسين، عن أنس. وقد قدّمنا القول في مثل هذا أنه لا ينكر أن يكون الحديث عند إمام من الأئمّة عن شيخين. فمرّة يحدِّثُ به عن هذا، ومرّة عن ذاك.

وقد حدّثني أبو الحسن علي بن محمد بن عمر، ثنا يحيى بن محمد بن صاعد، ثنا إبراهيم بن هانئ النّيسابوريّ، قال: قال لنا أبو اليمان: الحديثُ حديثُ الزّهريّ، والذي حدّثكم عن ابن أبي حسين غلطتُ فيه بورقة قلبتُها. قال الحاكم: هذا كالأخذ باليد؛ فإنّ إبراهيم بن هانئ ثقة مأمون" انتهى.

قلت: قول الحاكم: أن يكون الحديث عند إمام من الأئمّة عن شيخين. . . إلخ كلام سديد، ولكن يشترط له استواء الطّريقين في الصّحة، وأما إذا عُلِّلت إحدى الطّريقين فلا وجه لصحة الطّريقين كما هنا. فإنّ الحاكم نفسه نقل عن إبراهيم بن هانئ النّيسابوريّ أنه قال له أبو اليمان. . . إلخ ما ذكر.

فتبيّن من هذا أنّ هذا الحديث من حديث الزّهريّ، ومن قال خلاف ذلك فلا وجه له.

وقد روى جعفر بن محمد بن أبان الحرّاني أنّه سأل يحيى بن معين عن هذا الحديث فقال يحيى: أنا سألت أبا اليمان فقال: الحديث حديث الزّهريّ، فمن كتبه عنّي من حديث الزّهريّ فقد أصاب، ومن كتبه عنّي من حديث ابن أبي حسين فقد أخطأ، إنّما كتبُه في آخر حديث ابن أبي حسين، فغلطتُ فحدّثتُ به من حديث ابن أبي حسين، وهو صحيح من حديث الزّهريّ. هكذا قال يحيى.

وقد رُوي هذا الحديث عن أم سلمة، وفيه موسى بن عبيدة ضعيف. انظر:"السنة" لابن أبي عاصم (801).




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'আমার পরে আমার উম্মত যে বিপদের সম্মুখীন হবে তা আমাকে দেখানো হয়েছে। তারা একে অপরের রক্তপাত ঘটাবে। আল্লাহর পক্ষ থেকে এটি পূর্বনির্ধারিত ছিল, যেমন পূর্ববর্তী উম্মতদের ক্ষেত্রেও তা নির্ধারিত ছিল। অতঃপর আমি তাঁর (আল্লাহর) নিকট প্রার্থনা করলাম যেন তিনি কিয়ামতের দিন তাদের জন্য আমাকে সুপারিশের অধিকার দেন, আর তিনি তাই করলেন'।









আল-জামি` আল-কামিল (902)


902 - عن ابن عمر، قال: ما زلنا نُمسك عن الاستغفار لأهل الكبائر حتى سمعنا من في نبيِّنا صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى لا يغفر أن يشرك به، ويغفر ما دون ذلك لمن يشاء". قال:"فإنّي أخّرتُ شفاعتي لأهل الكبائر من أمّتي يوم القيامة".
فأمسكنا عن كثير مما كان في أنفسنا.

حسن: رواه أبو يعلى (5813)، والطبراني في الأوسط -مجمع البحرين (4809) -، وابن أبي عاصم في السنة (380) كلّهم من طريق شيبان بن فرّوخ الأيلي، ثنا حرب بن سُريج المنقريّ، ثنا أيوب السّختيانيّ، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في حرب بن سريج فتكلّم فيه البخاريّ، وابن حبان، وأبو حاتم، ومشّاه أحمد وابن معين والدارقطني، وابن عدي وغيرهم، وهو حسن الحديث.

واعتمد الهيثمي في"المجمع" (7/ 5) توثيق من وثّقه فقال:"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصّحيح غير حرب بن سريج وهو ثقة".

وقد رُوي عنه بإسناد آخر بلفظ:"شفاعتي يوم القيامة لأهل الكبائر من أمّتي". أورده الذهبيّ في"الميزان" (2/ 314) في ترجمة صديق بن سعيد الصوناخي التركي، عن محمد بن نصر المروزيّ، عن يحيى، عن مالك، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وقال:"وهذا لم يروه هؤلاء قطّ، ولكن رواه عن صديق من يجهل حاله وهو أحمد بن عبد اللَّه ابن محمد الزيني فما أدري مَنْ وضعه" انتهى.

قلت: ومن هذا الطّريق أخرجه الخطيب في تاريخ بغداد (8/ 11) في ترجمة الحسين بن أحمد ابن سلمة الأسديّ القاضي أبو عبد اللَّه.

قال الخطيب: قرأت في كتاب علي بن محمد النُّعيمي بخطّه، حدّثني القاضي أبو عبد اللَّه الحسين ابن أحمد بن سلمة الأسديّ المالكي -ببغداد- حدّثنا أبو الحسين أحمد بن عبد اللَّه بن محمد الزيني البصريّ -بجيلا من كورة أسْفِيحان- حدّثنا الصديق بن سعيد الصّوناخي، بإسناده، مثله.

وفي الباب عن أبي الدّرداء مرفوعًا:"شفاعتي لأهل الذّنوب من أمّتي". قال أبو الدّرداء: وإنْ زنى وإن سرق؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"نعم، وإنْ زنى وإنْ سرق على رغم أنف أبي الدّرداء".

رواه الخطيب في"تاريخ بغداد" (1/ 416) (في ترجمة محمد بن إبراهيم بن محمد بن يزيد الطّرسوسيّ أبو الفتح، يعرف بابن البصريّ)، عن الأزهريّ والقاضي أبي العلاء محمد بن علي، قالا: أنبأنا أبو الفتح محمد بن إبراهيم بن محمد بن يزيد الطّرسوسيّ، قال: نبّأنا الحسن بن عبد الرحمن بن زريق -بحمص- قال: نبّأنا محمد بن سنان الشّيرازيّ، قال: نبّأنا إبراهيم بن حيان ابن طلحة، قال: نبّا شعبة، عن الحكم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي الدّرداء، فذكره.

وإسناده ضعيف، فإنّ محمد بن سنان الشّيرازيّ قال في"الميزان" (3/ 575):"صاحب مناكير".

وفيه أيضًا القاضي أبو العلاء محمد بن علي الواسطيّ المقرئ ضعيف مخلّط، وفي الإسناد رجال لا يعرفون.
ولكن رواه البزّار -كشف الأستار (5) - من وجه آخر مختصرًا، وهو قوله صلى الله عليه وسلم:"من مات لا يُشرك باللَّه دخل الجنّة"، قلت: وإن زنى وإن سرق؟ قال:"وإن رغم أنف أبي الدّرداء".

قال البزّار:"وهذا قد روي عن أبي ذر، وأبي الدّرداء، وهذا أحسن أسانيد أبي الدّرداء؛ لأنّ الحسن كوفي مشهور، وزيد ثقة".

قلت: حديث أبي الدّرداء رواه الإمام أحمد (27561) مطوّلًا، عن حسن قال: حدّثنا ابنُ لهيعة، عن واهب بن عبد اللَّه، أنّ أبا الدّرداء، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من قال: لا إله إلّا اللَّه، وحده لا شريك له، دخل الجنّة". قال: قلت: وإنْ زنى وإنْ سرق؟ ! قال:"وإنْ زنى وإنْ سرق". قلت: وإنْ زنى وإنْ سرق؟ ! قال:"وإن زنى وإن سرق". قلت: وإنْ زنى وإنْ سرق؟ ! قال:"وإن زنى وإن سرق، على رغم أنف أبي الدّرداء". قال: فخرجتُ لأُنادي بها في النّاس، قال: فلقيني عمر، فقال: ارجع، فإنَّ النّاس إنْ علموا بهذه، اتّكلوا عليها، فرجعتُ فأخبرتُه صلى الله عليه وسلم، فقال صلى الله عليه وسلم:"صدق عمر".

وفيه ابن لهيعة، وفيه كلام معروف، ولعلّ الهيثميّ أشار إلى هذا في"المجمع" (1/ 16) بقوله:"رواه أحمد والبزّار والطبرانيّ في"الكبير"، و"الأوسط" وإسناد أحمد صحيح، وفيه ابنُ لهيعة، وقد احتجّ به غير واحد".

قلت: ولكن هذا الحديث الذي رواه الإمام أحمد معروف أنه من حديث أبي ذرّ المتفق عليه، وقد مضى في كتاب الإيمان، وسيأتي أيضًا في كتاب صفة الجنّة.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن علي بن أبي طالب مرفوعًا:"شفاعتي لأمّتي من أَحَبَّ أهلّ بيتي وهم شيعتي".

رواه الخطيب في"تاريخ بغداد" (2/ 146) من طريق القاسم بن جعفر بن محمد بن عبد اللَّه بن عمر بن عليّ بن أبي طالب قال: حدّثني أبي، عن أبيه، عن جدّه محمد بن عمر، عن أبيه عمر بن عليّ، عن أبيه علي بن أبي طالب، فذكره.

قال الخطيب:"قدم القاسم بن جعفر بغداد، وحدّث بها عن أبيه، عن جدّه، عن آبائه نسخة أكثرها مناكير".

واعتمد الذّهبيّ قول الخطيب فذكره في الميزان (3/ 369) ولم يزد عليه.

وفي الباب عن سلمان الفارسيّ قال: يأتونَ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم، فيقولون: يا نبيَّ اللَّه! أنتَ الذي فتح اللَّهُ بك، وختم بك، وغفر لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر، قُمْ فاشفع لنا إلى ربِّك، فيقول: نعم، أنا صاحبكم، فيخرج يحوشُ النّار، حتى ينتهي إلى باب الجنّة، فيأخذ بحلق في الباب من ذهب، فيقرعُ البابَ، فيقال: من هذا؟ فيقال: محمد". قال: فيفتح له. قال: فيجيءُ حتّى يقومَ بين يدي اللَّه، فيستأذنُ في السُّجود، فيؤذن له. قال: فيفتحُ اللَّه له من الثّناء، والتّحميد، والتمجيد ما لم
يفتحْهُ لأحد من الخلائق، فينادَى: يا محمد، ارْفعْ رأسَك، سَلْ تُعْطَه، ادعُ تُجب. قال: فيرفعُ رأسه، فيقول: ربّ أمّتي أمّتي، ثم يستأذنُ في السُّجود، فيؤذنُ له، فيفتحُ له من الثّناء والتّحميد والتّمجيد ما لم يُفْتَحه لأحدٍ من الخلائق، فيُنادى: يا محمد، ارْفعْ رأسكَ، سلْ تُعطه، واشفع تشفَّع، وادعُ تُجَب. قال: يفعل ذلك مرّتين أو ثلاثًا، فيُشَفَّعُ فيمن كان في قلبه حبّة من حنطة، أو مثقالُ شعيرة، أو مثقالُ حبّة من خردل من إيمان". قال سلمان: فذلك المقام المحمود.

رواه ابن خزيمة في التوحيد (596) واللّفظ له، وابن أبي عاصم في السنة (813)، والطبرانيّ في الكبير (6/ 303 - 304) إلّا أنه اختصره.

كلّهم من طريق أبي معاوية قال: حدّثنا عاصم الأحول، عن أبي عثمان النّهديّ، عن سلمان. وإسناده صحيح إلّا أنه موقوف على سلمان.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা সবসময় কাবীরা গুনাহকারীদের (বড় পাপকারী) জন্য ইসতিগফার (ক্ষমা প্রার্থনা) করা থেকে বিরত থাকতাম, যতক্ষণ না আমরা আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি যে, “নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তাঁর সাথে শরীক করা ক্ষমা করেন না, এবং এর থেকে কম যা কিছু রয়েছে, তা তিনি যাকে ইচ্ছা ক্ষমা করে দেন।” অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “নিশ্চয়ই আমি আমার উম্মতের কাবীরা গুনাহকারীদের জন্য আমার সুপারিশ (শাফায়াত) কিয়ামতের দিনের জন্য স্থগিত করে রেখেছি।” (ইবনু উমর রাঃ বলেন,) এরপর আমাদের মনে যা কিছু ছিল, আমরা তার অনেক কিছু থেকে বিরত হলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (903)


903 - عن أنس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما زلتُ أشفع إلى ربّي ويُشَفِّعني حتى أقول: ربِّ شفّعني فيمن قال: لا إله إلّا اللَّه، قال: فيقول: ليست هذه لك يا محمد، إنّما هي لي، أما وعزّتي وحِلْمي ورحمتي لا أدعُ في النّار أحدًا -أو قال: عبدًا- قال: لا إله إلّا اللَّه".

حسن: رواه أبو يعلى (2786) عن هارون بن عبد اللَّه، حدّثنا حماد بن مسعدة، عن عمران العمي، عن الحسن، عن أنس، فذكره.

والحسن هو الإمام البصريّ معروف، ولكنّه مدلّس وصرّح بالسماع كما سيأتي.

ورواه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (581)، وابن أبي عاصم في السنة (828) كلاهما من حديث حماد بن مسعدة، بإسناده، مثله.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمران وهو ابن دَاوَر -بفتح الواو وبعدها راء- القطّان أبو العوّام العمي، غير أنّه حسن الحديث، وقد توبع.

وهو ما أخرجه الشّيخان - البخاريّ (7510)، ومسلم (193: 326) كلاهما من حديث حماد ابن زيد، حدّثنا معبد بن هلال العنزي، قال: انطلقنا إلى أنس بن مالك، فذكر الحديث بطوله كما مضى في شفاعة النبيّ صلى الله عليه وسلم لأهل الموقف، وجاء فيه في آخر الحديث:"فأقول: يا ربّ، ائذن لي فيمن قال: لا إله إلّا اللَّه. قال: ليس ذاك إليك، ولكن وعزّتي وكبريائي وعظمتي وجبريائي لأخرجنّ من قال: لا إله إلّا اللَّه".

وقد أشار إليه أيضًا ابن خزيمة في كتاب التوحيد (582) فقال: في خبر حماد بن زيد، عن معبد ابن هلال، عن أنس، فذكر آخر الحديث.

وأخرجه بطوله في موضع آخر (604) من هذا الوجه، وجاء فيه:

قال معبدٌ: فأقبلنا حتى إذا كُنّا بظهر الجبال، قلتُ: لو مِلنا إلى الحسن -وهو مستخفٍ في
منزل أبي خليفة- قال: فدخلنا عليه. فقلنا: يا أبا سعيد، جئنا من عند أخيك أبي حمزة، وحدّثناه حتى إذا فرغنا. قال: ما حدّثكم إلّا بهذا؟ قلنا: ما زادنا على هذا. قال: فقال الحسن: فقد حدّثني منذُ عشرين سنةً، فما أدري أنسي الشّيخُ أم كره أن يحدِّثكم، فتتكلوا؟ قال: فقالوا يا أبا سعيد، حدِّثنا، فضحك وقال: خُلق الإنسان عجولًا، إنّي لم أذكره إلا وأنا أريد أن أحدّثْكموه -كما حدَّثكم- منذ عشرين سنة.

ثم قال:"فأقوم الرابعة، فأحمده بتلك المحامد، ثم أخرّ له ساجدًا".

قال:"فيقال لي: ارفع رأسك، وقُلْ يُسْمَعْ لك، وسَلْ تعطه، واشفع تشفّع". قال:"فأرفع رأسي، فأقول: أي ربِّ، ائذن لي فيمن قال: لا إله إلا اللَّه". قال:"فيقال: ليس لك ذلك، ولكن وعزّتي وكبريائي وعظمتي لأُخرجنّ منها من قال: لا إله إلّا اللَّه". انتهى.

وفي صحيح مسلم قال: معبد: فأشهد على الحسن أنه حدّثنا به أنه سمع أنس بن مالك، أراه قبل عشرين سنة وهو يومئذ جميع.

وليس معنى هذا الحديث أنّ قائل: لا إله إلّا اللَّه بلسانه من غير تصديق قلب يخرج من النّار، وقد جهّل ابنُ خزيمة من قال ذلك، ورماه بقلّة معرفة بدين اللَّه وأحكامه، وذلك يعود إلى جهله بأخبار النّبيّ صلى الله عليه وسلم فمختصرها ومتقصَّاها؛ لأنّ شاهد أن لا إله إلّا اللَّه من غير أن يشهد أنّ للَّه رسلًا وكتبًا وجنّة ونارًا، وبعثًا، وحسابًا يدخل الجنّة أشدّ فرقًا".

وقال أيضًا:"إذ أكثرُ أهل زماننا لا يفهمون هذه الصّناعة، ولا يميّزون بين الخبر المختصر وبين الخبر المتقصّي، فيحتجّون بالخبر المختصر، ويدَعون الخبر المتقصّ، وربّما خفي عليهم الخبر المتقصّى فيحتجّون بالخبر المختصر، ويترأسون قبل التّعلم، قد حُرموا الصّبر على طلب العلم، لا يصبرون حتى يستحقّوا الرّياسة، فيبلغوا منازل العلماء" انتهى. كتاب التوحيد (2/ 615).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আমি আমার রবের কাছে সুপারিশ করতেই থাকব, আর তিনি আমাকে সুপারিশ করার অনুমতি দিতেই থাকবেন, যতক্ষণ না আমি বলব: ‘হে আমার রব! যারা ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলেছে, তাদের ব্যাপারে আমাকে সুপারিশ করার অনুমতি দিন।’ তিনি (আল্লাহ) বলবেন: ‘হে মুহাম্মদ, এটি তোমার জন্য নয়, এটি আমার জন্য। জেনে রাখো! আমার মর্যাদা, আমার সহনশীলতা ও আমার দয়ার শপথ! যারা ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলেছে, আমি তাদের কাউকে—অথবা তিনি বললেন: কোনো বান্দাকে—জাহান্নামে থাকতে দেব না’।”









আল-জামি` আল-কামিল (904)


904 - عن جابر بن عبد اللَّه، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من قال حين يسمع النِّداء: اللهمَّ ربَّ هذه الدّعوة التّامة، والصّلاة القائمة، آتِ محمّدًا الوسيلة والفضيلة، وابعثه مقامًا محمودًا الذي وعدته، حلَّتْ له شفاعتي يوم القيامة".

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (614) عن علي بن عياش، قال: حدّثنا شعيب بن أبي حمزة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.

وفيه أيضًا عن أبي الدّرداء، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، ولكن إسناده ضعيف، رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين) (637). قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 333):"فيه صدقة بن عبد اللَّه السّمين، ضعّفه أحمد والبخاريّ ومسلم وغيرهم، وثقه دُحيم وأبو حاتم وأحمد بن صالح المصريّ".
وفيه أيضًا: سليمان بن أبي كريمة، وهو ضعيف.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি আযান শুনে এই দুআ পাঠ করে: “আল্লাহুম্মা রাব্বা হা-যিহিদ্ দা'ওয়াতিত্ তা-ম্মাহ, ওয়াস্ সলা-তিল ক্বা-য়িমাহ, আ-তি মুহাম্মাদানিল ওয়াসীলাতা ওয়াল ফাযীলাহ, ওয়াব'আসহু মাক্ব-মাম মাহমুদানিল লাযী ওয়া'আদতাহু” (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! এই পরিপূর্ণ আহ্বান এবং প্রতিষ্ঠিত সালাতের প্রতিপালক! আপনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ওয়াসিলাহ ও ফাযীলাহ প্রদান করুন এবং তাঁকে সেই প্রশংসিত স্থানে (মাক্বাম-ই-মাহমুদ) প্রতিষ্ঠিত করুন, যার ওয়াদা আপনি তাঁকে দিয়েছেন), ক্বিয়ামতের দিন তার জন্য আমার শাফাআত অবধারিত হয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (905)


905 - عن ابن عمر، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من استطاع أن يموت بالمدينة فلْيمتْ بها، فإنّي أشفع لمن يموت بها".

حسن: رواه الترمذيّ (3917)، وابن ماجه (312) كلاهما من طريق معاذ بن هشام، قال: حدّثني أبي، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن غريب من حديث أيوب السّختيانيّ".

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ معاذ بن هشام الدّستوائيّ لم يرتق درجة ثقة، إلّا أنّه حسن الحديث. وقد صحّحه ابنُ حبان (3741)، وأخرجه من هذا الوجه.

وقال الترمذيّ:"وفي الباب عن سُبيعة بنت الحارث الأسلميّة".

قلت: وهو الآتي بعد حديث صميتة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদীনাতে মৃত্যুবরণ করতে সক্ষম, সে যেন সেখানেই মৃত্যুবরণ করে, কারণ যে সেখানে মৃত্যুবরণ করে, আমি তার জন্য সুপারিশ করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (906)


906 - عن صمينة -امرأة من بني ليث- وكانت في حجر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قالت: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من استطاع منكم أن يموت بالمدينة فلْيمت، فإنّه مَنْ يموتُ بها أشفعُ له يوم القيامة، وأشهد له".

صحيح: رواه النّسائيّ في"الكبرى"، وابن أبي عاصم في"الأحاد والمثاني" (9382) من طريق عقيل، عن الزّهريّ، عن عبيد اللَّه (ابن عبد اللَّه بن عمر)، عن عبد اللَّه بن عتبة، عن صميتة، فذكرته. وإسناده صحيح.

ولكن رواه يونس عن الزّهريّ، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر، عن صميتة، بإسقاط عبد اللَّه بن عتبة.

من هذا الوجه رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 331).

ورواه ابن حبان في صحيحه (3742) فقال: عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، عن صميتة، فالظّاهر أنّه وقع غلط في الإسناد.

وقد نقل الحافظ في الإصابة (4/ 351) رواية يونس، عن الزّهريّ، عن عبيد اللَّه، عن صميتة -امرأة من بني ليث- يحدّث أنّها سمعت (فذكره).

وزاد فيه: قال الزّهريّ: ثم لقيتُ عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر فسألته عن حديثها فحدّثنيه عن صميتة.

هذه رواية ابن وهب، عن يونس، وهي موافقة لرواية عقيل.

ورواه عتبة، عن يونس، فأدخل صفيّة بنت أبي عبيد بين عبيد اللَّه وصميتة.

ورواه ابن أبي ذئب، عن الزّهريّ، فقال: عن عبيد اللَّه، عن امرأة يتيمة، عن صفية بنت أبي عبيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم" انتهى.
قلت: امرأة يتيمة هي صمية -بالتصغير- الليثية وقيل: الدارية، وكانت يتيمة في حجر عائشة. فدار الحديث بين أن يكون الحديث من مسند صميتة، وبين صفية بنت أبي عبيد. والثانية هي زوجة عبد اللَّه بن عمر، والغالب أنها لم ترو عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، وإنما تروي عن أزواجه مثل عائشة وحفصة وغيرهما.

وقد أكَّد أكثر أهل العلم أنّها لم تدرك النّبيّ صلى الله عليه وسلم، أو أدركته ولكنها لم تسمع منه.




সুমায়না (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি ছিলেন বনু লায়স গোত্রের একজন নারী এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তত্ত্বাবধানে ছিলেন। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের মধ্যে যে মদীনায় মারা যাওয়ার সামর্থ্য রাখে, সে যেন সেখানেই মারা যায়। কেননা, যে ব্যক্তি সেখানে মারা যাবে, কিয়ামতের দিন আমি তার জন্য সুপারিশ করব এবং তার পক্ষে সাক্ষ্য দেব।"









আল-জামি` আল-কামিল (907)


907 - عن سبيعة بنت الحارث الأسلميّة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من استطاع منكم أن يموت بالمدينة فليمتْ؛ لأنّه لا يموتُ بها أحدٌ إلّا كنتُ له شفيعًا أو شهيدًا يوم القيامة".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 294)، وأبو يعلى كما في المطالب العالية (2/ 67)، وأبو نعيم في الصحابة (6/ 3349) كلّهم من طريق عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ، عن أسامة بن زيد، عن عبد اللَّه بن عكرمة، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر بن الخطّاب، عن أبيه، عن سُبيعة الأسلميّة، فذكرته.

ورجاله ثقات خلا عبد اللَّه بن عكرمة. قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 306):

"رواه الطبرانيّ في الكبير، ورجاله رجال الصحيح خلا عبد اللَّه بن عكرمة، وقد ذكره ابن أبي حاتم، وروى عنه جماعة، ولم يتكلّم فيه أحدٌ بسوء".




সুবাইয়া বিনত আল-হারিস আল-আসলামিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যে মদীনাতে মৃত্যুবরণ করতে সক্ষম, সে যেন সেখানেই মৃত্যুবরণ করে। কেননা যে কেউ সেখানে মৃত্যুবরণ করবে, কিয়ামতের দিন আমি অবশ্যই তার জন্য শাফাআতকারী অথবা সাক্ষী হব।"