হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (908)


908 - عن ابن عمر قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يصبرْ على لأوائها وشدّتها أحدٌ إلا كنتُ له شفيعًا، أو شهيدًا يوم القيامة".

صحيح: رواه مالك في كتاب الجامع (3) عن قطن بن وهب بن عُمير بن الأجدع، أن يُحَنَّس مولى الزّبير بن العوّام أخبره، أنّه كان جالسًا عند عبد اللَّه بن عمر في الفتنة، فأنَتْه مولاةً له تُسلم عليه، فقالت: إنّي أردت الخروجَ يا أبا عبد الرحمن اشتدّ علينا الزّمان. فقال لها عبد اللَّه بن عمر: اقعدي لَكِاع فإنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).

ورواه مسلم في الحجّ (1377) عن يحيى بن يحيى قال: قرأتُ على مالك، فذكره.

وقوله:"لأوائها" شدائد المقام فيها.

وقوله:"شهيدًا" أي مزكيًّا لعمله إذا كان عملُه خيرًا.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তিই এর (মদীনার) কষ্ট ও কঠোরতা ধৈর্যের সাথে সহ্য করবে, কিয়ামতের দিন আমি অবশ্যই তার জন্য সুপারিশকারী হব অথবা সাক্ষী হব।”









আল-জামি` আল-কামিল (909)


909 - عن أبي سعيد الخدريّ يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يصبر أحدٌ على لأوائها فيموت إلّا كنتُ له شفيعًا أو شهيدًا يوم القيامة إذا كان مسلمًا".

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1374: 477) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ليث، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي سعيد مولى المهْريّ أنّه جاء أبا سعيد الخدريّ ليالي الحرّة فاستشاره في الجلاء من المدينة، وشكا إليه أسعارَها وكثرةَ عياله، وأخبره أن لا صَبْرَ له على جَهْد المدينة ولَأوائها.
فقال له: ويحك لا آمرُك بذلك، إنّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি মুসলিম অবস্থায় এর (মদিনার) কষ্ট ও দুঃখকষ্টে ধৈর্য ধারণ করে এবং মারা যায়, কিয়ামতের দিন আমি তার জন্য সুপারিশকারী অথবা সাক্ষী হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (910)


910 - عن سعد بن أبي وقّاص قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"المدينة خير لهم لو كانوا يعلمون، لا يدعُها أحدٌ رغبةً عنها إلّا أبدل اللَّه فيها من هو خير منه، ولا يثبثُ أحدٌ على لأوائها وجَهْدها إلّا كنتُ له شفيعًا، أو شهيدًا يوم القيامة".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1363)، من طريق عثمان بن حكيم، حدّثني عامر بن سعد، عن أبيه (سعد بن أبي وقاص) قال (فذكر الحديث).




সাদ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মদীনা তাদের জন্য উত্তম, যদি তারা জানত। যে ব্যক্তি এর প্রতি বিতৃষ্ণা বা অনিচ্ছা হেতু একে ত্যাগ করবে, আল্লাহ সেখানে তার চেয়ে উত্তম কাউকে স্থলাভিষিক্ত করবেন। আর যে কেউ এর দুঃখ-কষ্ট ও কঠোরতার উপর ধৈর্য ধরে থাকবে, কিয়ামতের দিন আমি তার জন্য সুপারিশকারী অথবা সাক্ষী হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (911)


911 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يصبر على الأواءِ المدينة وشدّتها أحدٌ من أمتّي إلّا كنتُ له شفيعًا يوم القيامة، أو شهيدًا".

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1378) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفي الباب عن أسماء بنت عُميس قالت: إنّها سمعتْ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يصبر على لأواء المدينة وشدّتها أحدٌ إلّا كنتُ له شفيعًا أو شهيدًا يوم القيامة".

رواه الإمام أحمد (27085)، والنّسائيّ في الكبرى (4282)، والطّبرانيّ في الكبير 24/ رقم (373) كلّهم من طريق يعقوب (ابن إبراهيم بن سعد الزّهريّ) قال: حدّثني أبي، عن الوليد بن كثير (المخزوميّ) قال: حدّثني عبد اللَّه بن مسلم الطّويل -صاحب المصاحف- أن كلابَ بن تَليد أخا بني سعد بن ليث - أنه بينا هو جالس مع سعيد بن المسيّب جاءه رسول نافع بن جُبير بن مُطْعِم بن عدي يقول: إنّ ابنَ خالتك يقرأُ عليك السَّلامَ ويقول: أخبرني كيف الحديث الذي كنتَ حدَّثْتَني عن أسماء بنت عُميس؟ فقال سعيد بن المسيب: أخْبره أن أسماء بنت عميس أخبرتني (فذكر الحديث).

وفيه كلاب بن تَليد لم يؤثر فيه توثيق أحد غير ابن حبان فإنه ذكره في"الثقات" (5/ 338)، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا تُوبع وإلّا فلين الحديث.

والرّاوي عنه عبد اللَّه بن مسلم الطويل -صاحب المقصورة أو المصاحف- لم يرو عنه سوى الوليد بن مسلم، ولم يؤثر فيه: توثيق أحد غير أن ابن حبان ذكره في الثقات (7/ 52) فقال فيه: عبد اللَّه بن محمد بن مسلم الطّويل، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع وإلّا فليّن الحديث.

وقال فيه الذّهبيّ:"لا يكادُ يُعرف".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের যে কেউ মদীনার কষ্ট ও তীব্রতা সহ্য করবে, কিয়ামতের দিন আমি অবশ্যই তার জন্য সুপারিশকারী হব অথবা সাক্ষী হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (912)


912 - عن أبي سعيد، أنه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم وذُكر عنده عمُّه فقال:"لعلّه تنفعه شفاعتي يوم القيامة، فيُجعل في ضحضاح من النّار يبلغ كعبيه، يغلي منه دماغه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3885)، ومسلم في الإيمان (210) من حديث اللّيث
ابن سعد، حدّثنا ابن الهاد، عن عبد اللَّه بن خبّاب، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر مثله.

قوله:"ضحضاح" هو ما رق من الماء على وجه الأرض إلى نحو الكعبين، واستعير في النّار.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন। তাঁর (নবীজীর) নিকট তাঁর চাচার আলোচনা করা হলে তিনি বললেন: "সম্ভবত কিয়ামতের দিন আমার শাফায়াত তার উপকারে আসবে। তখন তাকে জাহান্নামের এক অগভীর স্থানে রাখা হবে যা তার টাখনু পর্যন্ত পৌঁছাবে, যার কারণে তার মস্তিষ্ক ফুটতে থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (913)


913 - عن العباس بن عبد المطلب، أنّه قال للنبيّ صلى الله عليه وسلم: ما أغنيتَ عن عمِّك، فإنّه كان يحوطُك ويغضبُ لك؟ ! قال:"هو في ضحضاح من نار، ولولا أنا لكان في الدّرَك الأسْفل من النّار".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3883)، ومسلم في الإيمان (209) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن سفيان، حدّثنا عبد الملك بن عمير، حدّثنا عبد اللَّه بن الحارث، حدّثنا عباس ابن عبد المطلب، فذكره.

وفي لفظ عند مسلم من رواية ابن أبي عمر، عن سفيان بإسناده. قلت: يا رسول اللَّه، إنّ أبا طالب كان يحوطك وينصرك، فهل نفعه ذلك؟ قال:"نعم، وجدتُه في غمرات من النّار، فأخرجته إلى ضحضاح".




আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আপনি আপনার চাচার (আবু তালিবের) জন্য কী করেছেন? তিনি তো আপনাকে রক্ষা করতেন এবং আপনার জন্য রাগ করতেন! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (আবু তালিব) এখন জাহান্নামের হালকা অগভীর স্থানে আছে। যদি আমি না থাকতাম, তবে সে জাহান্নামের সর্বনিম্ন স্তরে থাকত।"

মুসলিমের অপর এক বর্ণনায় এসেছে: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আবু তালিব আপনাকে রক্ষা করতেন এবং আপনাকে সাহায্য করতেন। এতে কি তার কোনো উপকার হয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, আমি তাকে জাহান্নামের গভীর আগুনে পেয়েছিলাম, অতঃপর তাকে বের করে হালকা অগভীর স্থানে নিয়ে এসেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (914)


914 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُعطيتُ خمسًا لم يُعطهنّ أحدٌ من الأنبياء قبلي، نصرتُ بالرُّعب مسيرة شهر، وجُعلتْ لي الأرض مسجدًا وطهورًا، وأيّما رجل من أمّتي أدركته الصّلاة فليصلِّ، وأحلَّتْ لي الغنائم، وكان النّبيُّ صلى الله عليه وسلم يُبعث إلى قومه خاصّة وبُعثتُ إلى النّاس كافة، وأعطيتُ الشّفاعة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (438)، ومسلم في المساجد (521) كلاهما من حديث هُشيم، عن سيار، عن يزيد الفقير، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে যা আমার পূর্বে অন্য কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি:

১. এক মাসের পথের দূরত্বেও শত্রুদের মনে আমার ভয় (ত্রাস) ঢুকিয়ে দিয়ে আমাকে সাহায্য করা হয়েছে।
২. আমার জন্য সমস্ত জমিনকে সালাত আদায়ের স্থান (মসজিদ) এবং পবিত্রতার উপায় (পবিত্রকারী) স্বরূপ বানানো হয়েছে। সুতরাং আমার উম্মতের কোনো ব্যক্তির যেখানেই সালাতের সময় হবে, সে যেন সেখানেই সালাত আদায় করে নেয়।
৩. আমার জন্য গনীমতের মাল হালাল করা হয়েছে।
৪. অন্যান্য নবীগণকে বিশেষভাবে তাঁদের নিজ নিজ কওমের কাছে প্রেরণ করা হয়েছিল, কিন্তু আমাকে সমস্ত মানুষের জন্য প্রেরণ করা হয়েছে।
৫. এবং আমাকে শাফা‘আত (সুপারিশ করার অধিকার) প্রদান করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (915)


915 - عن أبي ذرّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُتيتُ خمسًا لم يؤتهنّ نبيٌّ كان قبلي: نُصرتُ بالرّعب؛ فيرعب مني العدو مسيرة شهر، وجُعلت لي الأرض مسجدًا وطهورًا، وأحلت لي الغنائم ولم تُحل لأحد كان قبلي، وبُعثتُ إلى الأحمر والأسود، وقيل لي: سلْ تُعطه، فاختبأتُهَا شفاعةً لأمّتي، وهي نائلة منكم -إن شاء اللَّه- من لقي اللَّه لا يشرك به شيئًا".

حسن: رواه الإمام أحمد (21299) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدّثني سليمان الأعمش، عن مجاهد بن جبر أبي الحجّاج، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلس إلّا أنه صرّح بالتحديث كما أنه توبع.

وقد أشار البزار -كشف الأستار (3460) - إلى رواية الأعمش هذه ولم يخرجها، ولكن
أخرجه من وجه آخر عن شعبة، عن واصل يعني الأحدب، عن مجاهد، عن أبي ذر، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 371):"رواه البزار بإسنادين حسنين".

وأخرجه الحاكم (2/ 434) من وجه آخر عن أبي أسامة وقد سئل عن قوله تعالى: {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا} [سورة سبأ: 28] فقال: حدّثنا الأعمش، بإسناده، فذكر مثله.

قال مجاهد في تفسير الأحمر والأسود: الإنس والجنّ.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه بهذه السياقة، إنّما أخرجاه ألفاظًا من الحديث متفرقة".

ورواه أبو داود (489) من وجه آخر عن جرير، عن الأعمش، بإسناده مختصر بلفظ:"جُعلتْ لي الأرضُ طهورًا ومسجدًا".




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে এমন পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে যা আমার পূর্বে কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি: এক মাসের দূরত্বে অবস্থিত শত্রু আমার প্রতি ভয়ের মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করা হয়েছে, আমার জন্য জমিনকে সালাত আদায়ের স্থান (মসজিদ) ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম বানিয়ে দেওয়া হয়েছে, আমার জন্য গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) হালাল করা হয়েছে যা আমার পূর্বে আর কারো জন্য হালাল করা হয়নি, আমাকে লাল ও কালো সকলের (মানব ও জ্বীন জাতি) প্রতি প্রেরণ করা হয়েছে, আর আমাকে বলা হয়েছে: তুমি চাও, তোমাকে দেওয়া হবে। তাই আমি তা আমার উম্মতের জন্য শাফাআত (সুপারিশ) হিসেবে লুকিয়ে রেখেছি। আর ইনশাআল্লাহ, তোমাদের মধ্যে যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক না করে তাঁর সাক্ষাৎ লাভ করবে, তারা তা অবশ্যই লাভ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (916)


916 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه: أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عام غزوة تبوك قام من اللّيل يصلي، فاجتمع وراءه رجال من أصحابه يحرسونه حتّى إذا صلى وانصرف إليهم، فقال لهم:"لقد أُعطيتُ اللّيلة خمسًا ما أُعْطِيَهُنَّ أحدٌ قبلي: أمّا أنا فأُرْسِلْتُ إلى النّاس كلِّهم عامَّةً، وكان مَنْ قبلي إنّما يُرْسَلُ إلى قومه، ونُصِرْتُ على العدوِّ بالرُّعْب، ولو كان بيني وبينهم مسيرةُ شهرٍ لَمُلئ منه رعبًا، وأُحلَّت لي الغنائمُ آكلُها، وكان مَنْ قبلي يُعَظِّمون أَكْلَها كانوا يحرقُونَها، وجُعلت لي الأرضُ مساجدَ وطَهُورًا أينما أَدْركتني الصَّلاةُ تَمَسَّحْتُ وَصَلَّيْتُ، وكان مَنْ قبلي يُعَظِّمون ذلك إنما كانوا يُصلُّون في كَنائِسهم وبِيَعِهم، والخامسة هي ما هي، قيل لي: سَلْ فإنَّ كلَّ نبيٍّ قد سأل، فأخَّرْتُ مسألتي إلى يوم القيامة، فهي لكم ولمن شهد أن لا إله الا اللَّه".

حسن: رواه الإمام أحمد (7068) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا بكر بن مُضر، عن ابن الهاد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، فإنّه حسن الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবুক যুদ্ধের বছর রাতে সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। তখন তাঁর সাহাবীদের মধ্য থেকে কিছু লোক তাঁকে পাহারা দেওয়ার জন্য তাঁর পেছনে জমায়েত হলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন এবং তাদের দিকে ফিরলেন, তখন তিনি তাদের বললেন: "আজ রাতে আমাকে পাঁচটি জিনিস দান করা হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কাউকে দেওয়া হয়নি:

১. আমি সকল মানুষের জন্য সাধারণভাবে প্রেরিত হয়েছি, অথচ আমার পূর্বে যাঁরা ছিলেন, তাঁরা শুধু তাঁদের নিজ নিজ জাতির প্রতি প্রেরিত হতেন।
২. শত্রুর ওপর আমাকে ভয় (ত্রাস) দ্বারা সাহায্য করা হয়েছে। আমার ও তাদের মধ্যে যদি এক মাসের দূরত্বও থাকত, তবুও তাদের অন্তরে আমার পক্ষ থেকে ভয় ভরে যেত।
৩. আমার জন্য গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) হালাল করা হয়েছে, আমি তা খেতে পারি; অথচ আমার পূর্বের লোকেরা তা খাওয়াকে গুরুতর মনে করতেন, তারা তা জ্বালিয়ে দিতেন।
৪. আমার জন্য জমিনকে সালাতের স্থান ও পবিত্রতা অর্জনের উপকরণ (পবিত্র) করে দেওয়া হয়েছে। যখনই সালাতের সময় আমাকে পেয়ে বসে, আমি পবিত্রতা অর্জন করে সালাত আদায় করে নিই; অথচ আমার পূর্বের লোকেরা এই বিষয়টিকে গুরুতর মনে করতেন, তারা কেবল তাদের উপাসনালয়সমূহে সালাত আদায় করতেন।
৫. আর পঞ্চম বিষয়টি হলো—যা বলার মতো! আমাকে বলা হয়েছে: ‘আপনি চান (যা কিছু চাওয়ার), কারণ প্রত্যেক নবীই চেয়েছেন।’ তখন আমি আমার প্রার্থনা কিয়ামতের দিনের জন্য স্থগিত করে রেখেছি। তাই এটি তোমাদের জন্য এবং সেই সব লোকের জন্য, যারা সাক্ষ্য দেবে যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (917)


917 - عن ابن عباس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أُعطيتُ خمسًا لم يُعطهنَّ نبيٌّ قبلي، ولا أقولهنَّ فخرًا: بُعثتُ إلى النّاس كافّة، الأحمر والأسود، ونُصرتُ بالرُّعب مسيرة شهر، وأُحلَّتْ لي الغنائم، ولم تَحلَّ لأحد قبلي، وجعلتْ لي الأرضُ مسجدًا وطهورًا، وأُعطيتُ الشّفاعة، فأخّرتُها لأمّتي فهي لمن لا يشرك باللَّه شيئًا".

حسن: رواه الإمام أحمد (2742)، والبزّار -كشف الأستار (3460) - وابن أبي عاصم في السنة (803) كلّهم من طريق يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهم سواء.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشميّ مختلف فيه فوثّقه ابن سعد، والعجلي، وقال ابن عدي: مع
ضعفه يكتب حديثه وتكلّم فيه أحمد وابن معين وأبو حاتم وغيرهم، والسّبب في تضعيفه أنه لما كبر ساء حفظه وتغيّر، وكان يلقّن، ما لُقِّن وقعتِ المناكير فيه، وكان صدوقًا، قاله ابن حبان.

قلت: الظّاهر أنه أصاب في هذا الحديث، ولم يخطئ لوجود متابع له، وكثرة شواهده الصّحيحة.

وأما المتابع فهو ما رواه البزار -كشف الأستار- كما سبق من طريق ابن أبي يعلى، عن الحكم، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وابن أبي ليلى سيء الحفظ إلّا أنه توبع أيضًا في الإسناد الأوّل.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (8/ 258) وقال:"رواه أحمد والبزّار والطّبرانيّ بنحوه إلّا أنه قال:"حتى إنّ العدو ليخافني من مسيرة شهر أو شهرين. وقيل لي: سلْ تُعْطَه، فادّخرتُ دعوتي شفاعة لأمّتي". ورجال أحمد رجال الصّحيح غير يزيد بن أبي زياد، وهو حسن الحديث".

وفي الباب أيضًا عن أبي موسى مرفوعًا:"أُعطيتُ خمسًا بعثتُ إلى الأحمر والأسود، وجعلتْ لي الأرض طهورًا ومسجدًا، وأحلتْ لي الغنائم، ولم تحل لمن كان قبلي، ونصرتُ بالرّعب شهرًا، وأعطيتُ الشّفاعة، وليس من نبيّ إلّا وقد سأل الشّفاعة، وإنّي اختباتُ شفاعتي، ثم جعلتها لمن مات من أمّتي لم يشرك باللَّه شيئًا".

رواه الإمام أحمد (19735) عن حسين بن محمد، حدّثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي بردة، عن أبي موسى الأشعريّ.

وأبو إسحاق مدلّس ومختلط، وإسرائيل سمع منه بعد الاختلاط كما قال الإمام أحمد، ولذا اضطرب في رفعه ووقفه، فقد رواه الإمام أحمد (19736) من وجه آخر عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي بردة، مرسلًا، ولم يذكر أبا موسى فلعلّه عائد إلى اختلاطه فلم يتميّز من الرّفع والإرسال، أيهما أرجح، مع أنّ القاعدة أنّ زيادة الثقة مقبولة، ولكن هنا أبو إسحاق وإن كان ثقة إلّا أنه اختلط في آخر حياته.

وكذلك في الباب أيضًا عن عوف بن مالك مرفوعًا:"أُعطيتُ أرْبعًا لم يُعطهنّ أحدٌ كان قبلنا، وسألتُ ربّي الخامسة فأعطانيها، كان النّبيُّ يبعث إلى قريته ولا يعدوها، وبُعثت كافة إلى النّاس، وأرهب منا عدوُّنا مسيرة شهر، وجُعلت لي الأرض طهورًا ومساجد، وأحل لنا الخمسُ ولم يحل لأحد كان قبلنا، وسألتُ ربّي الخامسة، فسألته أن لا يلقاه عبد من أمّتي يوحِّده إلّا أدخله الجنّة فأعطانيها".

رواه ابن حبان في"صحيحه" (6399) عن أبي يعلى، حدّثنا هارون بن عبد اللَّه الحمّال، حدّثنا ابن أبي فديك، عن عبيد اللَّه بن عبد الرّحمن بن موهب، عن عباس بن عبد الرحمن بن ميناء الأشجعيّ، عن عوف بن مالك، فذكره.

وعباس بن عبد الرحمن بن ميناء الأشجعيّ لم يوثقه أحدٌ وإنّما ذكره ابن حبان في كتابه
"الثقات"، وأخرج عنه في صحيحه، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول". أي إذا تُوبع، ولم يتابع فهو لين الحديث.

والرّاوي عنه عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن موهب، قال فيه النسائي: ليس بالقوي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি এবং আমি এগুলো অহংকার করে বলছি না: (১) আমাকে সকল মানুষের জন্য—শ্বেত ও কৃষ্ণ সবার জন্য—নবী করে পাঠানো হয়েছে; (২) এক মাসের দূরত্ব পর্যন্ত শত্রুদের অন্তরে ভয় ঢুকিয়ে দিয়ে আমাকে সাহায্য করা হয়েছে; (৩) আমার জন্য গনীমতের সম্পদ হালাল করা হয়েছে, যা আমার পূর্বে কারো জন্য হালাল ছিল না; (৪) আমার জন্য জমিনকে সিজদার স্থান ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম (পবিত্রকারী) বানানো হয়েছে; (৫) আর আমাকে শাফাআত (সুপারিশ করার অধিকার) দেওয়া হয়েছে, তবে আমি তা আমার উম্মতের জন্য স্থগিত রেখেছি। সুতরাং এই শাফাআত সেই ব্যক্তির জন্য, যে আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (918)


918 - عن أبي أُمامة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صنفان من أمّتي لن تنالهما شفاعتي: إمام ظلوم، وكلّ غال مارق".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (8/ 337) عن معاذ بن المثنى ومحمد بن التمار البصريّ، قالا: ثنا مسدّد، ثنا جعفر بن سليمان، عن المعلى بن زياد الفردوسيّ، عن أبي غالب، عن أبي أمامة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي غالب صاحب أبي أمامة غير أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (5/ 235)، والمنذريّ في الترغيب والترهيب (3404) وقالا: رواه الطبراني في الكبير، ورجاله ثقات غير أن المنذريّ عزاه أيضًا إلى الأوسط وهو فيه كما في مجمع البحرين (2577) ولكن من وجه آخر عن الخليل بن مرة، عن أبي غالب، عنه ولفظه:"صنفان من أمّتي لا تنالهما شفاعتي إمام غاشم ظلوم، وغالٍ في الدّين".

وفيه الخليل بن مرّة ضعيف، والرّاوي عنه العلاء بن سليمان وهو الرّقيّ، قال ابن عدي:"منكر الحديث، يأتي بمتون وأسانيد لا يتابع عليها".

ولذا أفرد الهيثميّ بعد أن عزاه للطبرانيّ في"الكبير" و"الأوسط" ذكر رجال الطبرانيّ بأنهم ثقات دون رجال"الأوسط"، ولم يتنبّه له المنذريّ.




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের দুই শ্রেণির লোক আমার সুপারিশ (শাফাআত) পাবে না: একজন অত্যাচারী শাসক এবং প্রত্যেক সীমালঙ্ঘনকারী (ধর্মের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করে) বিপথগামী ব্যক্তি।









আল-জামি` আল-কামিল (919)


919 - عن معقل بن يسار، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"رجلان لا تنالهما شفاعتي: إمام ظلوم غشوم، وآخر غال في الدِّين مارق منه".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (20/ 214)، وابن أبي عاصم في السنة (41) كلاهما من حديث ابن المبارك، قال: أخبرني منيع، حدّثني معاوية بن قرّة، عن معقل بن يسار، فذكره.

وإسناده حسن من أجل منيع، ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلا، وترجمه ابن عدي في"الكامل" (6/ 2456) وهو منيع بن عبد الرحمن أبو عبد اللَّه البصريّ، وساق له حديثًا واحدًا وقال:"منيع هذا يحدِّث عن سعيد بن أبي عروبة، وعن غيره بأحاديث حسان، وفي حديثه إفرادات وأرجو أنه لا بأس به".

ونقل عنه الحافظ في اللّسان (6/ 103) ولكن تحرّف فيه إلى"منير".
وقال الهيثميّ في"المجمع" (5/ 235 - 236):"رواه الطبرانيّ بإسنادين في أحدهما منيع، قال ابن عدي: له أفراد وأرجو أنه لا بأس به، وبقية رجال الأول ثقات".

والإسناد الثاني الذي أشار إليه الهيثمي هو ما أخرجه الطبرانيّ في"الكبير" (20/ 124) أيضًا من طريق أغلب بن تميم، عن معلى بن زياد، عن معاوية بن قرة، عن معقل بن يسار، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صنفان من أمّتي لا تنالهما شفاعتي: سلطان ظلوم غشوم، وغال في الدّين يشهد عليهم فيتبرأ منهم".

وإسناده ضعيف جدًّا من أجل أغلب بن تميم قال فيه البخاريّ: منكر الحديث، وقال ابن معين: ليس بشيء، وقال ابن حبان: حدّث عنه يزيد بن هارون، خرج عن حدّ الاحتجاج به لكثرة خطئه. انظر ترجمته في"الميزان" (1/ 273).

وأمّا ما رُوي عن أنس مرفوعًا:"صنفان من أمّتي لا تنالهما شفاعتي: المرجئة والقدرية". قيل: يا رسول اللَّه: من القدرية؟ قال:"قوم يقولون: لا قدر". قيل: فمن المرجئة؟ قال:"قوم يكونون في آخر الزمان، إذا سئلوا عن الإيمان يقولون: نحن مؤمنون إن شاء اللَّه". فهو موضوع، أخرجه ابن الجوزيّ في"الموضوعات" (282)، والجوزقاني في"الأباطيل" (34) وقال: هذا حديث باطل، وفي إسناده ظلمات.




মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুই ব্যক্তি আমার শাফায়াত (সুপারিশ) লাভ করবে না: একজন হলো অত্যাচারী ও নিষ্ঠুর শাসক/নেতা, আর অপরজন হলো সেই ব্যক্তি যে দ্বীনের বিষয়ে বাড়াবাড়ি করে এবং তা থেকে সীমালঙ্ঘন করে বেরিয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (920)


920 - عن أبي الدّرداء قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ اللّعانين لا يكونون شهداء ولا شفعاء يوم القيامة".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2598) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا معاوية بن هشام، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم وأبي حازم، عن أمِّ الدّرداء، عن أبي الدّرداء، فذكره.




আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই অধিক অভিশাপকারীরা কিয়ামতের দিন সাক্ষী হতে পারবে না এবং সুপারিশকারীও হতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (921)


921 - عن ربيعة بن كعب الأسلميّ، قال: كنتُ أبيتُ مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأتيته بوَضوئه وحاجته، فقال لي:"سَلْ". فقلتُ: أسألُك مرافتَك في الجنّة. قال:"أو غير ذلك؟". قلت: هو ذاك. قال:"فأعنّي على نفسك بكثرة السّجود".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (489) عن الحكم بن موسى أبي صالح، حدّثنا حِقْل بن زياد قال: سمعت الأوزاعيّ قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة، حدثني ربيعة بن كعب فذكره.




রাবিয়া ইবনু কা'ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রাত যাপন করতাম। আমি তাঁর জন্য উযূর পানি ও তাঁর প্রয়োজনীয় সামগ্রী নিয়ে আসতাম। তখন তিনি আমাকে বললেন, "কিছু চাও।" আমি বললাম, আমি আপনার কাছে জান্নাতে আপনার সাথীত্ব (সাহচর্য) প্রার্থনা করি। তিনি বললেন, "অথবা অন্য কিছু?" আমি বললাম, ঐটাই (আমার চাওয়া)। তিনি বললেন, "তাহলে তুমি অধিক সিজদা করার মাধ্যমে এ ব্যাপারে আমাকে সাহায্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (922)


922 - عن خادم للنّبيّ صلى الله عليه وسلم رجل أو امرأة قال: كان النّبيُّ صلى الله عليه وسلم مما يقول للخادم:"ألك حاجة؟". قال: حتّى كان ذات يوم، فقال: يا رسول اللَّه حاجتي. قال:"وما
حاجتُك؟". قال: حاجتي أن تشفع لي يوم القيامة. قال:"ومن دلَّك على هذا؟". قال: ربِّي. قال:"إما لا، فأعنّي بكثرة السّجود".

صحيح: رواه الإمام أحمد (16076) عن عفّان، حدّثنا خالد -يعني الواسطيّ- قال: حدّثنا عمرو بن يحيى الأنصاريّ، عن زياد بن أبي زياد مولى بني مخزوم، عن خادم، فذكره.

وإسناده صحيح. وأورده الهيثميّ في"المجمع" (2/ 249) فقال:"رواه أحمد، ورجاله رجال الصّحيح". والخادم هو ربيعة بن كعب الأسلمي كما مضى.




রাবিআ ইবনে কা'ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খাদেমকে প্রায়ই জিজ্ঞেস করতেন: “তোমার কি কোনো প্রয়োজন আছে?” সে (খাদেম) বলল, এমনকি একদিন এমন হলো যে সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার একটি প্রয়োজন আছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: “তোমার কী প্রয়োজন?” সে বলল: আমার প্রয়োজন হলো, আপনি যেন কিয়ামতের দিন আমার জন্য সুপারিশ করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “কে তোমাকে এ বিষয়ে জানালো?” সে বলল: আমার রব (আল্লাহ)। তিনি বললেন: “যদি (তুমি সত্যিই তা চাও), তবে তুমি অধিক সেজদার মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (923)


923 - عن ربيعة بن كعب، قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"سَلْني أُعْطِكَ". قلتُ: يا رسولَ اللَّه، أَنْظِرْني أنظر في أمري. قال:"فانظر في أمرك". قال: فنظرتُ، فقلت: إنّ أمر الدّنيا ينقطع، فلا أرى شيئًا خيرًا من شيء آخذُه لنفسي لآخرتي، فدخلتُ على النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"ما حاجَتُك؟". فقلت: يا رسول اللَّه، اشْفَعْ لي إلى ربِّك عز وجل، فلْيُعْتقني من النّار، فقال:"مَنْ أمرك بهذا؟". فقلت: لا واللَّه يا رسول اللَّه، ما أمرني به أحدٌ، ولكني نظرتُ في أمري، فرأيتُ أنّ الدُّنيا زائلة من أهلها، فأحببتُ أن آخُذ لآخرتي. قال:"فأعنِّي على نفسِك بكثرة السُّجود".

حسن: رواه الإمام أحمد (16578) عن أبي اليمان، قال: حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن نعيم بن مجمرة، عن ربيعة وفيه إسماعيل بن عياش وهو ضعف في روايته عن غير أهل بلده، وهذا منها، ولكنه تابع.

ومحمد بن إسحاق مدلّس، إلّا أنه صرَّحَ بالتحديث في الرواية التالية.

وهي ما رواه الإمام أحمد (16579) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدّثني محمد بن عمرو بن عطاء، عن نعيم بن مجمّر، عن ربيعة بن كعب قال: كنت أخدم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأقوم له في حوائجه نهاري أجمع حتى يصلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم العشاء الآخرة، فأجلسُ ببابه إذا دخل بيته أقول: لعلَّها أن تحدث لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حاجةٌ. فما أزال أسمعُه يقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"سبحان اللَّه سبحان اللَّه، سبحان اللَّه وبحمده". حتى أَملَّ، فارْجِعَ أو تغلبني عيني فأرقد. قال: فقال لي يومًا لما يرى من خِفّتي له وخدمتي إيّاه:"سَلْني يا ربيعةُ أُعْطِكَ". قال: فقلت: أنظر في أمري يا رسول اللَّه ثم أعلمك ذلك. قال: ففكّرت في نفسي، فعرفتُ أنّ الدُّنيا منقطعة زائلة، وأنَّ لي فيها رزقًا سيكفيني ويأتيني. قال: فقلت: أسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لآخرتي فإنه من اللَّه عز وجل بالمنزل الذي هو به قال: فجئت. فقال:"ما فعلتَ يا ربيعةُ؟". قال: فقلت: نعم يا رسول اللَّه أسألُك أن تشفع لي إلى ربِّك فيعتقني من النّار. قال: فقال:"مَنْ أمرك بهذا يا ربيعة؟". قال: فقلت: لا واللَّه الذي بعثك بالحقّ ما أمرني به أحدٌ، ولكنّك لما قلتَ:"سَلْنِي أُعْطِك". وكنتَ من اللَّه بالمنزل
الذي أنت به، نظرتُ في أمري وعرفت أنّ الدّنيا منقطعة وزائلة، وأن لي فيها رزقًا سيأتيني. فقلت: أسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لآخرتي. قال: فصمت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم طويلًا ثم قال لي:"إنّى فاعلُ، فأعنّي على نفسك بكثرة السّجود".




রাবিআ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করতাম। একদিন যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দ্রুতগতি ও খেদমত দেখলেন, তখন আমাকে বললেন: "হে রাবিআ, আমার কাছে কিছু চাও, আমি তোমাকে দেব।" তিনি (রাবিআ) বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে সময় দিন, আমি আমার বিষয়টি বিবেচনা করে দেখি, তারপর আপনাকে জানাব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি তোমার বিষয়টি বিবেচনা করে নাও।" তিনি (রাবিআ) বলেন: আমি মনে মনে চিন্তা করলাম এবং বুঝতে পারলাম যে দুনিয়া ক্ষণস্থায়ী ও বিনাশশীল, এবং আমার জন্য এতে যে রিযিক নির্ধারিত আছে তা আমাকে যথেষ্ট হবে ও আমার কাছে আসবেই। তাই আমি বললাম: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার আখিরাতের জন্য চাইব, কারণ তিনি পরাক্রমশালী আল্লাহর কাছে বিশেষ মর্যাদার আসনে রয়েছেন। এরপর আমি তাঁর কাছে গেলাম। তিনি বললেন: "হে রাবিআ, তুমি কী করলে?" আমি বললাম, হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল, আমি আপনার কাছে আবেদন করি যে আপনি যেন আপনার রবের নিকট আমার জন্য সুপারিশ করেন, যেন তিনি আমাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। তিনি বললেন: "হে রাবিআ, কে তোমাকে এই কথা বলতে নির্দেশ দিয়েছে?" আমি বললাম, না, আল্লাহর কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে পাঠিয়েছেন! আমাকে কেউ এই নির্দেশ দেয়নি। তবে আপনি যখন বললেন, 'আমার কাছে কিছু চাও, আমি তোমাকে দেব,' আর আপনি আল্লাহর কাছে যে মর্যাদার আসনে আছেন তা দেখে, আমি আমার বিষয়টি বিবেচনা করলাম এবং বুঝলাম যে দুনিয়া ক্ষণস্থায়ী ও বিলীন হয়ে যাবে, আর আমার জন্য যে রিযিক নির্ধারিত আছে তা আমার কাছে আসবেই। তাই আমি আমার আখিরাতের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে চাওয়াকে পছন্দ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দীর্ঘ সময় নীরব থাকলেন, তারপর আমাকে বললেন: "আমি অবশ্যই তা করব। অতএব, তুমি অধিক পরিমাণে সিজদার মাধ্যমে আমার কাজে (বা নিজের কল্যাণে) আমাকে সাহায্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (924)


924 - عن عائشة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما من ميّتٍ يصلّي عليه أمَّةٌ من المسلمين يبلغون مائةً كلّهم يشفعون له، إلّا شُفِّعوا فيه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (947) عن الحسن بن عيسى، حدّثنا ابن المبارك، أخبرنا سلّام ابن أبي مُطيع، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عبد اللَّه بن يزيد رضيع عائشة، عن عائشة، فذكرته.

قال: فحدثتُ به شعيب بن الحبحاب، فقال: حدّثني به أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. القائل: فحدّثتُ به شُعيبًا - هو سلّام بن أبي المطيع فإنّه يرويه من وجهين: أحدهما عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عبد اللَّه بن يزيد، عن عائشة.

والثاني: من طريق شعيب بن الحبحاب، عن أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন: "যে কোনো মৃত ব্যক্তির উপর মুসলমানদের একটি দল জানাযার সালাত আদায় করে, যাদের সংখ্যা একশত পর্যন্ত পৌঁছে, এবং তারা সকলেই তার জন্য সুপারিশ করে, তাহলে তাদের সুপারিশ তার ব্যাপারে কবুল করা হয় (গ্রহণ করা হয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (925)


925 - عن ابن عباس، أنه مات له ابنٌ بقديد أو بعسفان، فقال: يا كريب، انظر ما اجتمع له من النّاس. قال: فخرجتُ فإذا ناسٌ قد اجتمعوا له، فأخبرته، فقال: تقول: هم أربعون؟ قال: نعم. قال: أخرجوه، فإنّي سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من رجل مسلم يموت فيقوم على جنازته أربعون رجلًا، لا يشركون باللَّه شيئًا إلّا شفّعهم اللَّه فيه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (948) من طرق عن أبي صخر، عن شريك بن عبد اللَّه بن أبي نمير، عن كريب مولى ابن عباس، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره.



قال السّخاويّ في"القول البديع" (ص 127):"رواه الطبرانيّ بإسنادين أحدهما جيد، لكن فيه انقطاع؛ لأنّ خالد بن معدان لم يسمع من أبي الدّرداء، وأخرجه ابن أبي عاصم، وفيه ضعف".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, কুদাইদ অথবা উসফান নামক স্থানে তাঁর এক পুত্র মারা গেল। তিনি বললেন, হে কুরাইব! দেখো তার (জানাজার) জন্য কত লোক সমবেত হয়েছে। (কুরাইব) বলেন, আমি বের হলাম এবং দেখলাম কিছু লোক তার জন্য একত্রিত হয়েছে। আমি তাঁকে জানালাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, তুমি কি বলবে যে তারা চল্লিশ জন? (কুরাইব) বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, তাকে (জানাজার জন্য) বের করো। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি মারা যায়, আর তার জানাযায় এমন চল্লিশ জন লোক দাঁড়ায়, যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করে না, আল্লাহ অবশ্যই তাদের সুপারিশ তার (মৃত ব্যক্তির) ব্যাপারে কবুল করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (926)


926 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حتى إذا خلص المؤمنون من النّار، فوالذي نفسي بيده ما منكم من أحد بأشدّ مناشدةً للَّه في استقصاء الحقّ من المؤمنين للَّه يوم القيامة لإخوانهم الذين في النّار، يقولون: ربَّنا كانوا يصومون معنا، ويصلُّون ويحجُّون؟ فيقال لهم: أخرجُوا من عرفتم، فتحرم صورهم على النّار. فيخرجُون خلقًا كثيرًا قد أخذت النّارُ إلى نصف ساقيه وإلى ركبتيه، ثم يقولون: ربَّنا ما بقي فيها أحدٌ ممن أمرْتنا به. فيقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال دينار من خير فأخرجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربَّنا لم نذرْ فيها أحدًا ممن أمرْتنا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال نصف دينار من خير فأخرجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربّنا لم نَذرْ فيها ممن أمرتنا أحدًا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال ذرة من خير فأخرجوه فيخرجون خلقًا كثيرًا. ثم يقولون: ربَّنا لم نَذَرْ فيها أحدًا".

وكان أبو سعيد يقول: إن لم تصدقوني بهذا الحديث فاقرءوا إن شئتم: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِنْ لَدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا} [سورة النساء: 40]. فيقول اللَّه عز وجل: شفعت الملائكةُ، وشفع النّبيُّون، وشفع المؤمنون، ولم يبقَ إلا أرحمُ الرّاحمين فيقبض قبضةً من النّار فيخرج منها قوما لم يعملوا خيرًا قطّ، قد عادوا حُممًا، فيلقيهم في نهر في أفواه الجنّة يقال له:"نهر الحياة" فيخرجون كما تخرج الحِبة في حميل السّيل، ألا ترونها تكون إلى الحجر أو إلى الشّجر، ما يكون إلى الشّمس أُصيفر وأُخَيضر. وما يكون منها إلى الظّل يكون أبيض؟". فقالوا: يا رسول اللَّه، كأنّك كنتَ ترعى بالبادية! . قال:"فيخرجون كاللؤلؤ في رقابهم الخواتم يعرفهم أهلُ الجنَّة. هؤلاء عتقاء اللَّه الذين أدخلهم اللَّه الجنّة بغير عمل عمِلوه ولا خير قدَّموه. ثم يقول: ادخُلوا الجنّة فما رأيتموه فهو لكم. فيقولون: ربّنا، أعطيتنا ما لم تُعط أحدًا من العالمين. فيقول: لكم عندي أفضلُ من هذا. فيقولون: يا ربَّنا، أيُّ شيءٍ أفضلُ من هذا؟ فيقول: رِضاي فلا أسخط عليكم بعده أبدًا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7439)، ومسلم في الإيمان (183) من طريق زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره في حديث طويل، انظره في رؤية المؤمنين ربَّهم يوم القيامة.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মু'মিনগণ জাহান্নাম থেকে মুক্তি লাভ করবে, তখন সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তোমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই যে, আখিরাতে তাদের ঐ ভাইদের জন্য আল্লাহর কাছে পূর্ণ অধিকারের দাবিতে মু'মিনদের চেয়ে বেশি কঠিনভাবে কাকুতি-মিনতি করবে, যারা জাহান্নামে আছে।

তারা বলবে, 'হে আমাদের প্রতিপালক! তারা আমাদের সাথে সাওম পালন করত, সালাত আদায় করত এবং হাজ্জ করত।' তখন তাদেরকে বলা হবে: 'যাদেরকে তোমরা চিনতে পারো, তাদেরকে বের করে নিয়ে আসো।' ফলে জাহান্নামের জন্য তাদের দেহাকৃতি হারাম হয়ে যাবে। তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে, যাদের কারও পায়ের গোছার অর্ধেক পর্যন্ত এবং কারও হাঁটু পর্যন্ত আগুন গ্রাস করেছিল। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, তাদের কেউই আর সেখানে অবশিষ্ট নেই।'

আল্লাহ্ বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে এক দীনার পরিমাণ কল্যাণ (ঈমান) পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, আমরা তাদের কাউকে আর সেখানে রাখিনি।' অতঃপর তিনি বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে অর্ধ দীনার পরিমাণ কল্যাণ পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছিলেন, তাদের কাউকে আমরা ছাড়িনি।' এরপর তিনি বলবেন: 'তোমরা ফিরে যাও এবং যার অন্তরে অণু পরিমাণও কল্যাণ (ঈমান) পাবে, তাকে বের করে আনো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! আমরা আর সেখানে কাউকে রাখিনি।'

আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: 'যদি তোমরা আমাকে এ হাদীস সম্পর্কে বিশ্বাস না করো, তাহলে ইচ্ছা হলে তোমরা পাঠ করতে পারো: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ অণু পরিমাণও জুলুম করেন না। যদি তা নেক কাজ হয়, তবে তিনি তা বহুগুণে বাড়িয়ে দেন এবং তাঁর কাছ থেকে মহা পুরস্কার দান করেন।" (সূরা নিসা: ৪০)

তখন আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা বলবেন: 'ফেরেশতারা সুপারিশ করেছে, নবীগণ সুপারিশ করেছে, মু'মিনগণও সুপারিশ করেছে। এখন শুধু আরহামুর রাহিমীন (দয়ালুদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দয়ালু) বাকি আছে।' অতঃপর তিনি জাহান্নাম থেকে এক মুষ্টি ভরে এমন এক জাতিকে বের করবেন, যারা কখনও কোনো ভালো কাজ করেনি এবং যারা কয়লার মতো কালো হয়ে গেছে। তাদেরকে জান্নাতের প্রবেশমুখে অবস্থিত একটি নদীতে নিক্ষেপ করা হবে, যার নাম 'নহরে হায়াত' (জীবনের নদী)। তারা সেখান থেকে এমনভাবে বের হবে, যেভাবে বন্যার আবর্জনার স্তূপ থেকে বীজ (অথবা ঘাস) গজিয়ে ওঠে। তোমরা কি দেখো না যে, তা পাথর বা গাছের কাছে থাকে? এর যে অংশ সূর্যের দিকে থাকে, তা সামান্য হলুদ ও সামান্য সবুজ হয় এবং যে অংশ ছায়ার দিকে থাকে, তা সাদা হয়?"

সাহাবীগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! মনে হচ্ছে আপনি যেন মরুভূমিতে মেষ চরাতেন!" রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা মুক্তা সদৃশ অবস্থায় বের হবে এবং তাদের ঘাড়ে চিহ্ন (জান্নাতে প্রবেশের সীলমোহর) থাকবে, যা দেখে জান্নাতবাসীরা তাদেরকে চিনতে পারবে। এরাই হলো আল্লাহর মুক্তিপ্রাপ্ত বান্দা, যাদেরকে আল্লাহ্ তাদের আমল বা কোনো নেক কাজ ছাড়াই জান্নাতে প্রবেশ করালেন। এরপর তিনি বলবেন: 'জান্নাতে প্রবেশ করো। তোমরা যা কিছু দেখতে পাবে, তা তোমাদেরই।' তখন তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি আমাদেরকে এমন কিছু দান করেছেন, যা সৃষ্টিকুলের আর কাউকেই দান করেননি।' আল্লাহ্ বলবেন: 'আমার কাছে এর চেয়েও উত্তম কিছু তোমাদের জন্য রয়েছে।' তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! এর চেয়ে উত্তম আর কী হতে পারে?' আল্লাহ্ বলবেন: 'আমার সন্তুষ্টি। এরপর আমি তোমাদের ওপর কখনও অসন্তুষ্ট হব না।"'









আল-জামি` আল-কামিল (927)


927 - عن أبي سعيد الخدري، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"قد أُعطي كلُّ نبيٍّ عطيّة، فكلّ قد تعجّلها، وإنّي أخّرتُ عطيتي شفاعةً لأمّتي، وإنّ الرّجل من أمّتي ليشفع للفئام من النّاس، فيدخلون الجنّة، وإنّ الرّجل ليشفع للقبيلة، وإنّ الرّجل ليشفع للعُصبة، وإنّ الرّجل ليشفع للثلاثة وللرّجلين وللرّجل".

حسن: رواه الإمام أحمد (11148)، وأبو يعلى (1014)، والبزّار -كشف الأستار (3458) - كلّهم من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عطيّة العوفيّ.

ورواه ابن خزيمة في التوحيد (626) من طريق مالك بن مغول، عن عطية، به، مثله.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عطية وهو ابن سعيد بن جنادة العوفيّ مختلف فيه. فقال ابن معين: صالح، وضعّفه النسائيّ وغيره وقال أبو حاتم: ضعيف يكتب حديثه.

قلت: قول أبي حاتم هو العمدة فإنه مع ضعف فيه يكتب حديثه في الشّواهد والمتابعات، وهذا منها وإن انفرد ضُعِّف.

وأرى أنه لم يخطئ في هذا الحديث لوجود شواهد كثيرة لأجزائه، وقد حسّنه الترمذيّ (2440) بعد أن رواه من الطّريق نفسه الجزء الثاني من الحديث.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 371):"إسناده حسن".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: প্রত্যেক নবীকেই একটি বিশেষ দান (দোয়া কবুলের ক্ষমতা) প্রদান করা হয়েছিল, আর প্রত্যেকেই তা তাড়াতাড়ি করে চেয়ে নিয়েছেন। কিন্তু আমি আমার সেই দানকে আমার উম্মতের জন্য সুপারিশ (শাফাআত) হিসেবে স্থগিত রেখেছি। আর আমার উম্মতের কোনো ব্যক্তি মানুষের বিশাল দলের (বহু সংখ্যক) জন্য সুপারিশ করবে, ফলে তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি একটি গোত্রের জন্য সুপারিশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি একটি ছোট দলের (গোষ্ঠীর) জন্য সুপারিশ করবে। আর কোনো ব্যক্তি তিনজনের জন্য, দু’জনের জন্য এবং মাত্র একজনের জন্য সুপারিশ করবে।