আল-জামি` আল-কামিল
9021 - عن سئل أنس بن مالك عن خضاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن شاب إِلَّا يسيرًا، ولكن أبا بكر وعمر بعده خضبا بالحناء والكتم، قال: وجاء أبو بكر بأبيه أبي قحافة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة يحمله حتَّى وضعه بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر:"لو أقررت الشّيخ في بيته لأتيناه" تكرمه لأبي بكر، فأسلم ولحيته ورأسه كالثغامة بياضًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"غيروهما وجنبوه السواد".
صحيح: رواه أحمد (12635) والبزّار - كشف الأستار (2981) وأبو يعلى (2831) وصحّحه ابن حبَّان (5472) والحاكم (3/ 244) كلّهم من حديث بن سلمة، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، قال: سئل أنس فذكره. واللّفظ لأحمد. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين.
قلت: محمد بن سلمة هو الحراني شيخ أحمد الباهلي، لم يرو عنه سوى مسلم.
وقال الحاكم: قال ابن وهب (وهو معطوف على الإسناد السابق) وأخبرني عمر بن محمد، عن زيد بن أسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم هنّأ أبا بكر بإسلام أبيه.
رجاله ثقات، عمر بن محمد هو ابن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطّاب من رجال الصَّحيح.
وهي سنة عزيزة لولا فيه إرسال، فإن زيد بن أسلم مولى عمر بن الخطّاب تابعي ثقة وكان يرسل.
وأمّا مسألة الاجتناب من السواد فستأتي في موضعها.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেজাব (চুল/দাড়ি রাঙানো) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খুব সামান্য সংখ্যক চুলই পেকেছিল, কিন্তু তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরে আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মেহেদী (হিন্না) ও কাতাম-এর মাধ্যমে খেজাব ব্যবহার করতেন। তিনি (আনাস/রাবী) আরও বললেন: মক্কা বিজয়ের দিন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিতা আবূ কুহাফাকে বহন করে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিয়ে এলেন এবং তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে বসালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকরকে বললেন: "যদি তুমি বৃদ্ধকে তাঁর বাড়িতেই থাকতে দিতে, তবে আমরাই তাঁর কাছে যেতাম।"—এটা ছিল আবূ বকরের প্রতি সম্মান প্রদর্শন। তখন তিনি (আবূ কুহাফা) ইসলাম গ্রহণ করলেন। তাঁর দাড়ি ও মাথার চুল 'সুগামা' (এক প্রকার সাদা উদ্ভিদ)-এর মতো ধবধবে সাদা ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এগুলোর রং পরিবর্তন করে দাও, তবে কালো রং ব্যবহার করা থেকে বিরত থাকবে।"
9022 - عن عائشة قالت: جاءت هند بنت عتبة بن ربيعة فقالت: يا رسول الله! والله ما كان على ظهر الأرض خباء أحب إليّ من أن يذلّوا من أهل خبائك، وما أصبح اليوم على ظهر الأرض خباء أحب إلي من أن يعزّوا من أهل خبائك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وأيضًا، والذي نفسي بيده!" ثمّ قالت: يا رسول الله! إن أبا سفيان رجل مسّيك، فهل عليَّ حرج من أن أطعم من الذي له، عِيالَنا؟ فقال لها:"لا، إِلَّا بالمعروف".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6641) ومسلم في الأقضية (1714: 9) كلاهما من حديث ابن شهاب الزّهري، حَدَّثَنِي عروة بن الزُّبير، أن عائشة قالت: واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
و"الخباء" - البيت.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হিন্দ বিনত উতবাহ ইবন রাবিআ এসে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর কসম, পৃথিবীতে আপনার তাঁবুর (ইসলামের) অধিবাসীরা লাঞ্ছিত হোক, এর চেয়ে প্রিয় কোনো তাঁবু আমার কাছে ছিল না। আর আজ পৃথিবীতে এমন কোনো তাঁবু নেই, যার অধিবাসীরা সম্মানিত হোক, এটা আপনার তাঁবুর অধিবাসীদের সম্মানিত হওয়ার চেয়ে আমার কাছে অধিক প্রিয়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আরও (বৃদ্ধি পাবে), যার হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম!" এরপর তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আবূ সুফিয়ান একজন কৃপণ লোক। আমি যদি তার সম্পদ থেকে আমাদের পরিবারবর্গকে খাওয়াই, তাতে কি আমার কোনো গুনাহ হবে? তিনি তাকে বললেন: "না, তবে (তা হতে হবে) ন্যায়সঙ্গতভাবে/প্রচলিত পদ্ধতি অনুযায়ী (আল-মা'রুফ)।"
9023 - عن وهب بن منبه قال: سألت جابرًا: هل غنموا يوم الفتح شيئًا؟ قال: لا.
حسن: رواه أبو داود (3023) وابن سعد في الطبقات (2/ 143) من طريق إسماعيل، يعني ابن عبد الكريم، حَدَّثَنِي إبراهيم بن عقيل بن معقل، عن أبيه، عن وهب بن منبه فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عبد الكريم، وإبراهيم بن معقل وأبيه، فإن كلا منهم حسن الحديث.
وحسّن إسناده أيضًا ابن حجر في الفتح (8/ 13).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: মক্কা বিজয়ের দিন কি তাঁরা কোনো গণীমত লাভ করেছিলেন? তিনি বললেন: না।
9024 - عن أم هانئ تقول: ذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الفتح فوجدته يغتسل، وفاطمة ابنته تستره، فسلمت عليه فقال:"من هذه؟" فقلت: أنا أم هانئ بنت أبي طالب، فقال:"مرحبًا بأم هانئ" فلمّا فرغ من غسله قام فصلى ثمان ركعات ملتحفًا في ثوب واحد فقلت: يا رسول الله! زعم ابن أمي عليّ أنه قاتل رجلًا قد أجرته فلانُ بن هُبَيْرة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أجرنا من أجرت يا أم هانئ" قالت أم هانئ: وذلك ضحى.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الضحى (359) عن أبي النضر مولى عمر بن عبيد الله، أن أبا مرة مولى أم هانئ أخبره، أنه سمع أم هانئ تقول: فذكرته.
ورواه البخاريّ في الجزية (3171) ومسلم في الغسل (336) كلاهما من حديث مالك إِلَّا أن مسلمًا اختصره فلم يذكر الأمان ولا الصّلاة.
উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং তাঁকে গোসলরত অবস্থায় পেলাম। তাঁর কন্যা ফাতিমা তাঁকে পর্দা করে রেখেছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "কে এ?" আমি বললাম: আমি উম্মে হানী বিনতে আবু তালিব। তিনি বললেন: "উম্মে হানী! তোমাকে স্বাগতম।" যখন তিনি গোসল সম্পন্ন করলেন, তখন এক কাপড়ে আবৃত হয়ে দাঁড়িয়ে আট রাকাত সালাত আদায় করলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার মায়ের ছেলে আলী দাবি করছে যে, সে এমন এক ব্যক্তিকে হত্যা করবে, যাকে আমি আশ্রয় দিয়েছি— (ঐ ব্যক্তি হলো) অমুক ইবনে হুবায়রা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উম্মে হানী! তুমি যাকে আশ্রয় দিয়েছ, আমরাও তাকে আশ্রয় দিলাম।" উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এটা ছিল চাশতের (দিনের প্রথমাংশের) সময়।
9025 - عن أم هانئ: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل بيتها يوم فتح مكة، فصلى ثمان ركعات، ما رأيته صلى صلاة قطّ أخف منها، غير أنه كان يتم الركوع والسجود.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4292) ومسلم في صلاة المسافرين (80: 336) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرة بن مرة، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى قال: ما أخبرني أحد أنه رأى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضحى إِلَّا أم هانئ فإنها حدثت: فذكرته.
الجمع بين الحديثين الذي قبله وبين هذا أنه صلى الله عليه وسلم صلى في بيته الذي نزل فيه وجاءت أم هانئ تشتكي عليّ بن أبي طالب، ثمّ نزل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في بيتها زائرًا، فصلى فيه أيضًا، وهي تخبر ما رأت في منزل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وما رأت في بيتها.
উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন তাঁর (উম্মে হানী'র) ঘরে প্রবেশ করলেন এবং আট রাকাত সালাত আদায় করলেন। আমি এর চেয়ে হালকা (সহজ) সালাত তাঁকে আর কখনো আদায় করতে দেখিনি, তবে তিনি রুকু ও সিজদা পূর্ণভাবে আদায় করতেন।
9026 - عن أنس بن مالك أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل مكة يوم الفتح وعلى رأسه المغفر، فلمّا نزعه جاءه رجل فقال: ابن خطل متعلق بأستار الكعبة فقال:"أقتله".
قال مالك: ولم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم فيما يرى - والله أعلم - يومئذ محرمًا.
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (247) عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك قال: فذكره.
ورواه البخاريّ في المغازي (4286) ومسلم في الحجّ (45: 1357) كلاهما من طريق مالك به.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন তাঁর মাথায় শিরস্ত্রাণ (মাগফার) ছিল। যখন তিনি তা খুললেন, তখন একজন লোক তাঁর কাছে এসে বলল: ইবনু খাতাল কা'বার গিলাফ ধরে আছে। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।"
মালেক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: দৃশ্যত, আল্লাহই ভালো জানেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই দিন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন না।
9027 - عن أبي برزة الأسلمي يقول: قتلت عبد العزّى بن خطل، وهو متعلق بستر الكعبة.
حسن: رواه أحمد (19794) عن إسماعيل، حَدَّثَنِي شداد بن سعيد قال: حَدَّثَنِي جابر بن عمرو الراسبي قال: سمعت أبا برزة الأسلمي فذكره.
إسماعيل هو ابن علية.
وإسناده حسن من أجل جابر بن عمرو وأبو الوازع الراسبي مختلف فيه فوثقه أحمد وذكره ابن حبَّان في الثّقات، وتكلم فيه ابن معين والنسائي غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف. ولكن وقع الخلاف في اسم قاتل ابن خطل ورجح الواقدي أنه أبو برزة الأسلمي، وجزم محمد بن إسحاق بأن سعيد بن حريث وأبا برزة الأسلمي اشتركا في قتله. وسبق بعض الكلام في كتاب المرتد.
আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আব্দুল উযযা ইবন খতলকে হত্যা করেছিলাম, যখন সে কা'বার পর্দা ধরে ঝুলে ছিল।
9028 - عن عَنْ سَعْدٍ قَالَ: لَمَّا كَانَ يَوْمُ فَتْحِ مَكَّةَ آمن رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إِلَّا أربعة نفر وامرأتين وسماهم، وابن أبي سرح، فذكر الحديث قال: وأمّا ابن أبي سرح فإنه اخْتَبَأَ عِنْدَ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ فلمّا دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إلى البيعة جَاءَ بِهِ حَتَّى أَوْقَفَهُ عَلَى رسول الله صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: يَا نبي الله! بَايعْ عَبْدَ اللَّهِ فَرَفَعَ رَأْسَهُ فَنَظَرَ إِلَيْهِ ثَلَاثًا كُلُّ ذَلِكَ يَأْبَى
فَبَايَعَهُ بَعْدَ ثَلَاثٍ ثُمَّ أَقْبَلَ عَلَى أَصحَابِهِ فَقَالَ:"أَمَا كَانَ فِيكُمْ رَجُلٌ رَشِيدٌ يَقُومُ إِلَى هَذَا حَيْثُ رَآنِي كَفَفْتُ يَدِي عَنْ بَيْعَتِهِ فَيَقْتُلُهُ" فَقَالُوا: مَا نَدْرِي يَا رَسولَ اللَّهِ! مَا فِي نَفْسِكَ، أَلَّا أَوْمَأتَ إِلَيْنَا بِعَيْنِكَ؟ قَالَ:"إِنَّهُ لَا يَنْبَغِي لِنَبِيٍّ أَنْ تَكُونَ لَهُ خَائِنَةُ الْأَعْيُنِ".
قال أبو داود: كان عبد الله أخا عثمان من الرضاعة، وكان الوليد بن عقبة أخا عثمان لأمه، ضربه عثمان الحد إذ شرب الخمر.
صحيح: رواه أبو داود (2683) عن عثمان بن أبي شيبة قال: حَدَّثَنَا أحمد بن المفضل، قال: حَدَّثَنَا أسباط بن نصر، قال: زعم السدي، عن مصعب بن سعد، عن سعد فذكره. وأخرجه النسائيّ (4067) من وجه آخر عن أحمد بن المفضل.
وممن أمر بالقتل يوم الفتح: عكرمة بن أبي جهل.
وإسناده صحيح. انظر للمزيد كتاب المرتد.
وفي الباب عن سعيد بن يربوع المخزومي قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم فتح مكة:"أمن الناس إِلَّا هؤلاء الأربعة فلا يؤمنون في حل ولا حرم ابن خطل ومقيس بن صبابة المخزومي وعبد الله بن أبي سرح وابن نقيذ" فأما ابن خطل فقتله الزُّبير بن العوام وأمّا عبد الله بن أبي سرح فاستأمن له عثمان رضي الله عنه فأومن وكان أخاه من الرضاعة فلم يقتل ومقيس بن صبابة قتله ابن عم له أحد قد سماه وقتل عليّ رضي الله عنه ابن نقيذ وقينتين كانتا لمقيس فقتلت إحداهما وأفلتت الأخرى وأسلمت.
رواه أبو داود (2684) والدارقطني (4/ 168) والبيهقي (9/ 212، 120) من طريق عن زيد بن الحباب، أخبرنا عمر بن عثمان بن عبد الرحمن بن سعيد بن يربوع المخزومي، حَدَّثَنِي جدي، عن أبيه فذكره. واللّفظ للبيهقي. ولفظ أبي داود والدارقطني مختصر.
وفي إسناده عمر بن عثمان بن عبد الرحمن وقيل: عمرو كما في رواية أبي داود والصواب الأوّل. كما قال أبو داود في كتاب التفرد فيما نقل عن المزي، ولم يوثقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعًا.
قال الواقدي: الذين أمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بقتلهم ستة نفر، وأربع نسوة:
1 - عكرمة بن أبي جهل.
2 - هبار بن الأسود.
3 - عبد الله بن سعد بن أبي سرح.
4 - مقيس بن صبابة الليثي.
5 - حويرث بن نقيذ.
6 - عبد الله بن هلال بن خطل الأدرمي.
7 - هند بنت عتبة بن ربيعة.
8 - سارة مولاة عمرو بن هاشم.
9 - و 10 - قينتين لابن خطل وهما: قرينا، وقريبة.
المغازي (2/ 725)
وقال الحافظ ابن حجر: وقد جمعت أسماءهم من مفرقات الأخبار وهم: فذكرهم.
ثمّ قال: فأما ابن أبي سرح فكان أسلم، ثمّ ارتد، ثمّ شفع فيه عثمان يوم الفتح إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فحقن دمه، وقبل إسلامه.
وأمّا عكرمة ففر إلى اليمن، فتبعته امرأته أم حكيم بنت الحارث بن هشام، فرجع معها بأمان من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وأمّا الحويرث فكان شديد الأذى لرسول الله صلى الله عليه وسلم بمكة فقتله عليّ يوم الفتح.
وأمّا مقيس بن صبابة فكان أسلم، ثمّ عدا على رجل من الأنصار فقتله، وكان الأنصاري قتل أخاه هشامًا خطأ، فجاء مقيس فأخذ الدية، ثمّ قتل الأنصاري، ثمّ ارتد، فقتله ثميلة بن عبد الله يوم الفتح.
وأمّا هبار فكان شديد الأذى للمسلمين، وعرض لزينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم لما هاجرت، فنخس بعيرها فأسقطت، ولم يزل ذلك المرض بها حتَّى ماتت، فلمّا كان يوم الفتح بعد أن أهدر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دمه، أعلن بالإسلام، فقبل منه، فعفا عنه.
وأمّا القينتان فاستؤمن لإحداهما فأسلمت، وقتلت الأخرى.
وأمّا سارة فأسلمت، وعاشت إلى خلافة عمر، وقال الحميدي: بل قتلت.
قال: وذكر أبو معشر فيمن أهدر دمه: الحارث بن طلاطل الخزاعي قتله عليّ.
وذكر الحاكم: أيضًا ممن أهدر دمه كعب بن زهير، وقصته مشهورة، وقد جاء بعد ذلك، وأسلم ومدح، ووحشي بن حرب، وهند بنت عتبة امرأة أبي سفيان وأسلمت، وأرنب مولاة ابن خطل أيضًا قتلت، وأم سعد قتلت فيما ذكر ابن إسحاق فكملت العدة ثمانية رجال، وست نسوة. انتهى.
الفتح (8/ 11 - 12) وسبق ذكر من قتل وارتد في كتاب المرتد.
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মক্কা বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চারজন পুরুষ ও দুইজন নারী ব্যতীত সকলকে নিরাপত্তা দিয়েছিলেন এবং তিনি তাদের নাম উল্লেখ করেছিলেন। তাদের মধ্যে ইবনু আবী সারহও ছিল। অতঃপর (রাবী) হাদীসের বাকি অংশ বর্ণনা করেন। তিনি (রাবী) বলেন: ইবনু আবী সারহ উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লুকিয়ে ছিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকদেরকে বায়‘আত করার জন্য ডাকলেন, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিয়ে এলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সামনে দাঁড় করিয়ে বললেন: হে আল্লাহর নবী! আবদুল্লাহর বায়‘আত গ্রহণ করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুললেন এবং তিনবার তার দিকে তাকালেন। প্রতিবারই তিনি (বায়‘আত গ্রহণ করতে) অস্বীকার করলেন। তিনবার পর তিনি তাকে বায়‘আত করালেন। অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীগণের দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: “তোমাদের মধ্যে কি কোনো বিচক্ষণ ব্যক্তি ছিল না, যে এই লোকটিকে হত্যা করার জন্য উঠে দাঁড়াত, যখন সে দেখল যে আমি তার বায়‘আত গ্রহণ থেকে হাত গুটিয়ে নিয়েছি?” তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা জানি না আপনার মনের মধ্যে কী রয়েছে, আপনি যদি চোখ দিয়ে আমাদের ইশারা করতেন? তিনি বললেন: “কোনো নবীর জন্য চোখ দিয়ে লুকানো ইশারা করা শোভনীয় নয়।”
9029 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أقبل يوم الفتح من أعلى مكة على راحلته مردفًا أسامة بن زيد، ومعه بلال ومعه عثمان بن طلحة من الحجبة حتَّى أناخ في المسجد، فأمره أن يأتي بمفتاح البيت، ففتح ودخل رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه أسامة وبلال وعثمان، فمكث فيها نهارًا طويلًا، ثمّ خرج فاستبق الناس، وكان عبد الله بن عمر أول من دخل، فوجد بلالًا وراء الباب قائمًا، فسأله: أين صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فأشار
له إلى المكان الذي صلى فيه، قال عبد الله: فنسيت أن أسأله: كم صلى من سجدة؟
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2988) ومسلم في الحجّ (388: 1329) كلاهما من طريق نافع، عن عبد الله بن عمر قال: فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের দিন মক্কার উচ্চ ভূমি থেকে তাঁর বাহনে আরোহণ করে আগমন করেন। তিনি উসামা ইবনে যায়দকে তাঁর পেছনে বসিয়েছিলেন। তাঁর সাথে ছিলেন বিলাল এবং কাবার তত্ত্বাবধায়কদের মধ্য থেকে উসমান ইবনে তালহা। তিনি মসজিদে এসে তাঁর বাহনকে বসালেন। অতঃপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (উসমানকে) কাবার চাবি আনতে নির্দেশ দিলেন। এরপর কাবা খোলা হলো এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রবেশ করলেন। তাঁর সাথে প্রবেশ করলেন উসামা, বিলাল এবং উসমান। তিনি সেখানে দীর্ঘ সময় অবস্থান করলেন। এরপর তিনি বের হলেন এবং লোকেরা (কাবা শরীফে প্রবেশ করতে) প্রতিযোগিতা শুরু করল। আর আব্দুল্লাহ ইবনে উমরই সর্বপ্রথম প্রবেশ করলেন। তিনি দরজার পেছনে বিলালকে দাঁড়ানো অবস্থায় দেখতে পেলেন। তখন তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে উমর) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কোথায় সালাত আদায় করেছেন? তখন তিনি (বিলাল) যে স্থানে সালাত আদায় করেছিলেন, সেই দিকে ইশারা করলেন। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কিন্তু আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করতে ভুলে গেলাম যে, তিনি কতটি সিজদা (রাকাত) আদায় করেছিলেন?
9030 - عن ابن عباس قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما قدم أبى أن يدخل البيت، وفيه الآلهة، فأمر بها فأخرجت، فأخرجوا صورة إبراهيم وإسماعيل في أيديهما الأزلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قاتلهم الله، أما والله قد علموا أنهما لم يستقسما بها قطّ" فدخل البيت فكبر في نواحيه، ولم يصل فيه.
صحيح: رواه البخاريّ في الحجّ (1601) عن أبي معمر، حَدَّثَنَا عبد الوارث، حَدَّثَنَا أيوب، حَدَّثَنَا عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وقول عبد الله بن عمر مقدم على قول ابن عباس لأنه مثبت، وابن عباس ينفي، والجمع ممكن.
قال ابن حجر: وابن عباس لم يكن مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وإنما أسند نفيه تارة لأسامة وتارة لأخيه الفضل مع أنه لم يثبت أن الفضل كان معهم إِلَّا في رواية شاذة.
ثمّ نقل الجمع بين حديث أسامة وبلال عن النوويّ وغيره أنه قال: ويجمع بين إثبات بلال ونفي بلال بأنهم لما دخلوا الكعبة اشتغلوا بالدعاء، فرأى أسامة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يدعو فاشتغل أسامة بالدعاء في ناحية والنبي صلى الله عليه وسلم في ناحية، ثمّ صلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فرآه بلال لقربه منه ولم يره أسامة لبعده واشتغاله، ولأن بإغلاق الباب تكون الظلمة مع احتمال أن يحجبه عنه بعض الأعمدة فنفاها عملًا بظنه، وقال المحب الطبريّ: يحتمل أن يكون أسامة غاب عنه بعد دخوله لحاجة فلم يشهد صلاته انتهى.
ويشهد له ما رواه أبو داود الطيالسي في مسنده عن ابن أبي ذئب، عن عبد الرحمن بن مهران، عن عمير مولى ابن عباس، عن أسامة، قال: دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في الكعبة فرأى صورًا فدعا بدلو من ماء فأتيته به فضرب به الصّور، فهذا الإسناد جيد. الفتح
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মক্কায়) আগমন করলেন, তখন তিনি বাইতুল্লাহর (কাবার) ভেতরে প্রবেশ করতে অস্বীকার করলেন, কারণ তাতে দেব-দেবী ছিল। অতঃপর তিনি সেগুলোকে (মূর্তিগুলোকে) বের করে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। তখন সেগুলো বের করে দেওয়া হলো। তারা ইবরাহীম ও ইসমাঈল (আঃ)-এর এমন ছবিও বের করল, যাদের হাতে জুয়ার তীর (ভাগ্য পরীক্ষার তীর) ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! আল্লাহর কসম, তারা ভালোভাবেই জানে যে, এই দুজন (ইবরাহীম ও ইসমাঈল) কখনোই এর মাধ্যমে ভাগ্য পরীক্ষা করেননি।" এরপর তিনি কাবার ভেতরে প্রবেশ করলেন এবং এর বিভিন্ন কোণে তাকবীর বললেন, কিন্তু সেখানে সালাত আদায় করেননি।
9031 - عن عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن قريشًا أهمهم شأن المرأة التي سرقت في عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في غزوة الفتح فقالوا: من يكلم فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: ومن يجترئ عليه إِلَّا أسامة بن زيد، حب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتي بها رسول الله صلى الله عليه وسلم فكلمه فيها أسامة بن زيد، فتلون وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أتشفع في حد من حدود الله؟" فقال له أسامة: استغفر لي يا رسول الله! فلمّا كان العشي قام رسول الله صلى الله عليه وسلم فاختطب فأثنى على الله
بما هو أهله، ثمّ قال:"أما بعد فإنما أهلك الذين من قبلكم أنهم كانوا إذا سرق فيهم الشريف تركوه وإذا سرق فيهم الضعيف أقاموا عليه الحد وإني والذي نفسي بيده لو أن فاطمة بنت محمد سرقت لقطعت يدها" ثمّ أمر بتلك المرأة التي سرقت فقطعت يدها قال يونس: قال ابن شهاب: قال عروة: قالت عائشة: فحسنت توبتها بعد وتزوجت وكانت تأتيني بعد ذلك فأرفع حاجتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4304) ومسلم في الحدود (8: 1688) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرنا يونس بن يزيد، عن ابن شهاب الزهري قال: أخبرني عروة بن الزُّبير، عن عائشة قالت: فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী বলেন: মক্কা বিজয়ের অভিযানে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে যে মহিলাটি চুরি করেছিল, তার বিষয়টি কুরাইশদের জন্য খুবই গুরুত্বপূর্ণ হয়ে দাঁড়ালো। তারা বলল: কে এ বিষয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলবে? তারা বলল: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয় পাত্র উসামা ইবনু যায়দ ছাড়া তাঁর কাছে এমন কথা বলার সাহস আর কার আছে? অতঃপর তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আনা হলো এবং উসামা ইবনু যায়দ তার পক্ষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন। এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেল এবং তিনি বললেন: "তুমি কি আল্লাহর নির্ধারিত একটি শাস্তির ব্যাপারে সুপারিশ করছো?" তখন উসামা তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। অতঃপর যখন সন্ধ্যা হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং আল্লাহর যথাযোগ্য প্রশংসা করলেন। তারপর বললেন: "শোনো! তোমাদের পূর্ববর্তী লোকেরা ধ্বংস হয়েছে কেবল এই কারণে যে, যখন তাদের মধ্যে কোনো সম্ভ্রান্ত ব্যক্তি চুরি করত, তখন তারা তাকে ছেড়ে দিত আর যখন কোনো দুর্বল লোক চুরি করত, তখন তার উপর দণ্ড কার্যকর করত। সেই সত্তার কসম, যার হাতে আমার প্রাণ, যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও চুরি করত, তবে আমি তারও হাত কেটে দিতাম।" অতঃপর তিনি সেই মহিলার ব্যাপারে নির্দেশ দিলেন, যে চুরি করেছিল। ফলে তার হাত কেটে দেওয়া হলো।
ইউনুস বলেন, ইবনু শিহাব বলেন, উরওয়াহ বলেন, আয়শা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: এরপর তার তাওবা সুন্দর হয়েছিল এবং সে বিবাহ করেছিল। সে এরপর আমার কাছে আসত এবং আমি তার প্রয়োজনগুলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তুলে ধরতাম।
9032 - عن عروة بن الزُّبير قال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ خالد بن الوليد أن يدخل من أعلى مكة من كَداء، ودخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من كُدَا، فقتل من خيل خالد بن الوليد يومئذ رجلان: حبيش بن الأشعر، وكرْز بن جابر الفهري.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4280) عن عبيد بن إسماعيل حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام، عن أبيه، فذكره في حديث مطول.
ذكر ابن إسحاق: إن هذين الرجلين سلكا طريقًا فشذا عن عسكر خالد فقتلهما المشركون يومئذ.
উরুয়াহ ইবনুয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, সেই দিন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খালিদ ইবনুল ওয়ালীদকে আদেশ করলেন যেন তিনি মক্কার উঁচু এলাকা 'কাদা' (Kadaa) নামক স্থান দিয়ে প্রবেশ করেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজে প্রবেশ করলেন 'কুদা' (Kuda) নামক স্থান দিয়ে। সেদিন খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অশ্বারোহী বাহিনীর দুইজন লোক নিহত হন: (তারা হলেন) হুবাইশ ইবনুল আশআর এবং কার্য ইবনু জাবির আল-ফিহরী।
9033 - عن جابر أنه سئل: هل غنمتم يوم الفتح شيئًا؟ قال: لا.
حسن: رواه أبو داود (3023) عن الحسن بن الصبّاح، حَدَّثَنَا إسماعيل - يعني ابن عبد الكريم، حَدَّثَنِي إبراهيم بن عقيل بن معقل، عن أبيه، عن وهب بن منبه قال: سألت جابرًا فذكره.
وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن عقيل بن معقل الصنعاني فإنه صدوق.
وحسّنه أيضًا الحافظ ابن حجر في الفتح (8/ 13) وفيه دليل لمن قال: إن مكة فتحت صلحًا، وفي المسألة تفاصيل في كتب الفقه.
وفي الحديث دليل على أن مكة فتحت صلحًا، وقتل خالد بن الوليد عددًا من المشركين لم يجعله عنوة، لأن ذلك كان اجتهادًا منه، ودفاعًا عن النفس، ولم يكن ذلك بأمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ولذلك لم يجر فيها قسم غنيمة ولا سبي أهلها.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: মক্কা বিজয়ের দিন তোমরা কি কোনো গণীমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) পেয়েছিলে? তিনি বললেন: না।
9034 - عن عبد الله بن عباس قال: أقام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمكة تسعة عشر يومًا يصلّي ركعتين.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4298) عن عبدان، أخبرنا عبد الله (هو ابن المبارك) أخبرنا عاصم (هو ابن سليمان الأحول) عن عكرمة، عن عبد الله بن عباس قال: فذكره.
وقال ابن إدريس: حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق، عن محمد بن مسلم بن شهاب ومحمد بن عليّ بن الحسين وعاصم بن عمر بن قتادة وعمرو بن شعيب وعبد الله بن أبي بكر قالوا: لما افتتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة أقام بها خمسة عشر."المعرفة والتاريخ" للفسوي (3/ 296) والسيرة لابن هشام (2/ 437).
قال البيهقيّ في الدلائل (5/ 24، 24) هذا منقطع، والأصح رواية ابن المبارك، عن عاصم الأحول التي اعتمدها البخاريّ رحمه الله تعالى.
আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় উনিশ দিন অবস্থান করেছিলেন এবং তিনি (এ সময়) দুই রাকাত করে সালাত আদায় করতেন।
9035 - عن بريدة بن الحصيب أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم صَلَّى الصَّلَوَاتِ يَوْمَ الْفَتْحِ بِوُضُوءٍ وَاحِدٍ وَمَسَحَ عَلَى خُفَّيْهِ، فَقَالَ لَهُ عُمَرُ: لَقَدْ صَنَعْتَ الْيَوْمَ شَيْئًا لَمْ تَكُنْ تَصْنَعُهُ؟ قَالَ:"عَمْدًا صنَعْتُهُ يَا عُمَرُ".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (277) من طرق عن سُفْيَانَ عَنْ عَلْقَمَةَ بْنِ مَرْثَدٍ، عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، فذكره.
ورواه ابن ماجة (510) وابن خزيمة (13) كلاهما من حديث سفيان الثوري، عن محارب بن دثار، عن ابن بريدة، عن أبيه، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ لكل صلاة إِلَّا يوم فتح مكة، فإنه شغل، فجمع بين الظهر والعصر بوضوء واحد.
واللّفظ لابن خزيمة، وقال: غريب غريب. يعني المشهور أنه من حديث سفيان الثوري، عن علقمة بن مرثد، كما عند مسلم.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন এক ওযুর দ্বারা একাধিক সালাত আদায় করেন এবং তাঁর মোজার উপর মাসাহ করেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: 'আজ আপনি এমন একটি কাজ করেছেন যা আপনি পূর্বে করতেন না।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'হে উমার! আমি ইচ্ছাকৃতভাবেই তা করেছি।'
9036 - عن عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ: بَعَثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي بَعْثٍ، فَقَالَ:"إِنْ وَجَدْتُمْ فُلَانًا وَفُلَانًا فَأَحْرِقُوهُمَا بِالنَّارِ" ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ أَرَدْنَا الْخُرُوجَ:"إِنِّي أَمَرْتُكُمْ أَنْ تُحْرِقُوا فُلَانًا وَفُلَانًا، وإِنَّ النَّارَ لَا يُعَذّبُ بِهَا إِلَّا اللَّهُ، فَإِنْ وَجَدْتُمُوهُمَا فَاقْتُلُوهُمَا".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3016) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا اللّيث، عن بكير، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.
وزاد الترمذيّ (1571):"لرجلين من قريش".
وقوله:"فلانًا وفلانًا" الأوّل اسمه: هبَّار بن الأسود الذي آذى زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم حين خرجت من مكة مهاجرة إلى المدينة، فإنه لم يزل يطعن بعيرها برمحه حتَّى صرعها، وألقت ما في بطنها، وأهريقت دما.
والثاني اسمه: نافع بن قيس.
وهذا البعث بعثه رسول الله صلى الله عليه وسلم بإمرة حمزة بن عمرو الأسلمي. انظر: الفتح (6/ 149). ولم يدركوا هبارا وصاحبه فرجعوا.
وأسلم هبار بالجعرانة، وذلك بعد فتح مكة، ثمّ قدم المدينة. انظر للمزيد الإصابة (8969).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে একটি অভিযানে পাঠালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "যদি তোমরা অমুক ও অমুক ব্যক্তিকে পাও, তাহলে তাদেরকে আগুন দিয়ে পুড়িয়ে দিও।" অতঃপর যখন আমরা বের হতে প্রস্তুত হলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলাম যে, তোমরা অমুক ও অমুককে পুড়িয়ে দেবে। কিন্তু (মনে রেখো) আগুন দিয়ে আল্লাহ ছাড়া আর কেউ শাস্তি দেন না। সুতরাং যদি তোমরা তাদেরকে পাও, তাহলে তাদেরকে হত্যা করো।"
9037 - عن عَنْ حَمْزَةَ بْنِ عَمْرٍو الْأَسْلَمِيِّ صَاحِبِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَعَثَهُ وَرَهْطًا مَعَهُ إِلَى رَجُلٍ مِنْ عُذْرَةَ فَقَالَ:"إِنْ قَدَرْتُمْ عَلَى فُلَانٍ فَأَحْرِقُوهُ بِالنَّارِ" فَانْطَلَقُوا حَتَّى إِذَا تَوَارَوْا مِنْهُ نَادَاهُمْ أَوْ أَرْسلَ فِي أَثَرِهِمْ فَرَدُّوهُمْ ثُمَّ قَالَ:"إِنْ أَنْتُمْ قَدَرْتُمْ عَلَيْهِ فَاقْتُلُوهُ وَلَا تُحْرِقُوهُ بِالنَّارِ، فَإِنَّمَا يُعَذِّبُ بِالنَّارِ رَبُّ النَّارِ".
صحيح: رواه أحمد (16035، 16036) من طرق عن ابن جريج، قال: أخبرني زياد بن سعد، أن أبا الزّناد، قال: أخبرني حنظلة بن علي، عن حمزة بن عمرو الأسلمي، فذكره. وإسناده صحيح.
قال البخاريّ:"حديث حمزة بن عمرو الأسلمي في هذا الحديث أصح" علل الترمذيّ الكبير (2/ 675).
ورواه أبو داود (2673)، وأحمد (16034) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن، عن أبي الزّناد قال: حَدَّثَنِي محمد بن حمزة الأسلمي، عن أبيه، فذكر نحوه.
فسمى المغيرة شيخ أبي الزّناد: محمد بن حمزة الأسلمي، وزياد بن سعد سماه حنظلة بن علي، وزياد أوثق بكثير من المغيرة، ثمّ إن محمد بن حمزة الأسلمي روى عنه جمع، ولكن لم ينص على توثيقه أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي: عند المتابعة.
وقد توبع لكن ذلك من الاختلاف على أبي الزّناد كما سبق، ومع ذلك قال ابن حجر في الفتح (6/ 149) أخرجه أبو داود بإسناد صحيح.
يعني أن لأبي الزّناد شيخين، ولا يترجح أحدهما على الآخر.
হামযাহ ইবনে আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ও তাঁর সাথে একটি দলকে উদরা গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে পাঠালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "যদি তোমরা অমুককে ধরতে পারো, তবে তাকে আগুন দিয়ে জ্বালিয়ে দেবে।" তারা চলে গেলেন। যখন তারা তাঁর দৃষ্টির আড়াল হলেন, তখন তিনি তাদেরকে ডাক দিলেন অথবা তাদের পিছনে লোক পাঠালেন। তারা ফিরে এলে, তিনি বললেন: "যদি তোমরা তাকে ধরতে পারো, তবে তাকে হত্যা করবে, কিন্তু আগুন দিয়ে জ্বালাবে না। কারণ, আগুন দ্বারা শুধু আগুনের মালিকই শাস্তি দেন।"
9038 - عن أبي الطفيل قال: لما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة بعث خالد بن الوليد إلى نخلة، وكانت بها العزى، فأتاها خالد بن الوليد، وكانت على تلال السمرات، فقطع السمرات وهدم البيت الذي كان عليها، ثمّ أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأخبره فقال:"ارجع فإنك لم تصنع شيئًا" فرجع خالد، فلمّا نظرت إليه السدنة، وهم حجابها أمعنوا في الجبل، وهم يقولون: يا عزى خبليه، يا عزى عوريه، وإلَّا فموتي برغم! قال: فأتاها خالد، فإذا امرأة عريانة ناشرة شعرها تحثو التراب على رأسها فعممها بالسيف حتَّى قتلها، ثمّ رجع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأخبره قال:"تلك العزى".
حسن: رواه أبو يعلى (902) واللّفظ له، والنسائي في الكبرى (11483) كلاهما من حديث محمد بن الفضيل، حَدَّثَنَا الوليد بن جميع، عن أبي الطفيل فذكره.
وزاد النسائيّ: فرجع خالد، فلمّا بصرت به السدنة وهم حجبتها أمعنوا في الجبل وهو يقولون: يا عزى يا عزى، فأتاها خالد - فذكر نحوه.
وإسناده حسن من أجل الوليد بن جميع - وهو الوليد بن عبد الله بن جميع، نسب إلى جده -؛ فإنه حسن الحديث، فقد وثَّقه ابن معين والعجلي وقال أحمد: ليس به بأس.
وقال ابن إسحاق: ثمّ بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم خالد بن الوليد إلى العزى، وكانت بيتًا بنخلة يعظمه قريش وكنانة ومضر، وكان سدنتها وحجّابها من بني شيبان من بني سليم حلفاء بني هاشم، فلمّا سمع حاجبها السلمي بمسير خالد بن الوليد إليها علّق سيفه عليها، ثمّ اشتد في الجبل الذي هي فيه وهو يقول:
أيا عزّى شدّي شدّة لا شوى لها … على خالد ألقي القناع وشمّري
أيا عزى إن لم تقتلي المرء خالدًا … فبوئي بإثم عاجل أو تُنصّري
سيرة ابن هشام (2/ 436 - 437)
وقال غيره: وكان آخر سادن للعزى"ذبية بن حرمي السلمي ثمّ الشيباني" قتله خالد بن الوليد بعد هدمه الوثن والبيت وقطعه الشجرة أو الشجرات الثلاث.
وقال الواقدي: وأقبل خالد بالسيف إليها وهو يقول:
يا عُزَّ كُفرانَكِ لا سُبحانَكِ … إنِّي وجدتُ اللهَ قد أهانَكِ
قال: فضربها بالسيف فجزلها باثنتين، ثمّ رجع إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره فقال:"نعم! تلك العُزّى وقد يئست أن تُعبدَ ببلادكم أبدًا" ثمّ قال خالد: أيْ رسول الله، الحمدُ لله الذي أكرمنا بك، وأنقذنا من الهَلَكة، إني كنت أرى أبي يأتي إلى العُزّى بحتره، مئة من الإبل والغنم، فيذبحها للعُزّى، ويقيم عندها ثلاثًا ثمّ ينصرف إلينا مسرورًا، فنظرتُ إلى ما مات عليه أبي، وذلك الرأي الذي كان يُعاش في فضله، كيف خُدع حتَّى صار يذبح لحجر لا يسمع ولا يبصر ولا يضر ولا ينفع؟ ! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ هذا الأمرَ إلى الله، فمَنْ يسَّرَهُ للهدى تيسر، ومَنْ يُسِّرَه للضلالة كان فيها" وكان هدمها لخمس ليال بقين من رمضان سنة ثمان. مغازي الواقدي
أنت وذاك! فأقبل سعد يمشي إليها وتخرج إليه امرأة عريانة سوداء ثائرة الرأس تدعو بالويل وتضرب صدرها، فقال السادن: مناة دونك بعض غضباتك! ويضربها سعد بن زيد الأشهلي وقتلها ويقبل إلى الصنم معه أصحابه فهدموه ولم يجدوا في خزانتها شيئًا، وانصرف راجعًا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان ذلك لست بقين من شهر رمضان. طبقات ابن سعد (2/ 146 - 147).
আবুত তুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয় করলেন, তিনি খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নাখলা অভিমুখে পাঠালেন। সেখানে উযযা (নামক প্রতিমা) ছিল। খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে পৌঁছালেন। (প্রতিমাটি) বাবলা গাছের টিলাগুলির উপর ছিল। তিনি বাবলা গাছগুলো কেটে ফেললেন এবং এর উপর যে ঘরটি ছিল, তা ভেঙে দিলেন। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জানালেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ফিরে যাও, তুমি তো কিছুই করোনি।" খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে গেলেন। যখন সেখানের রক্ষক বা খাদিমরা (যারা এর পূজারী ও প্রহরী ছিল) তাঁকে দেখল, তারা পাহাড়ের গভীরে পালিয়ে যেতে লাগল এবং বলতে লাগল: "হে উযযা! তাকে পাগল করে দাও! হে উযযা! তাকে অন্ধ করে দাও! নতুবা (আমাদের) দুঃখের সাথে তুমি মরে যাও!" তিনি (আবুত তুফাইল) বলেন: এরপর খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে গেলেন। সেখানে তিনি একজন উলঙ্গ মহিলাকে দেখতে পেলেন, যার চুল ছিল এলোমেলো, এবং সে নিজের মাথায় মাটি ছিটাচ্ছিল। তিনি তাকে তরবারি দ্বারা আঘাত করে হত্যা করলেন। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে এসে তাঁকে জানালেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওটাই ছিল উযযা।"
9039 - عن ابن عمر بَعَثَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم خَالِدَ بْنَ الْوَلِيدِ إِلَى بَنِي جَذِيمَةَ، فَدَعَاهُمْ إِلَى الإسْلَامِ فَلَمْ يُحْسِنُوا أَنْ يَقُولُوا أَسْلَمْنَا. فَجَعَلُوا يَقُولُونَ صَبَأنَا، صَبَأنَا. فَجَعَلَ خَالِدٌ يَقْتُلُ مِنْهُمْ وَيَأْسِرُ، وَدَفَعَ إِلَى كُلِّ رَجُلٍ مِنَّا أَسِيرَهُ، حَتَّى إِذَا كَانَ يَوْمٌ أَمَرَ خَالِدٌ أَنْ يَقْتُلَ كُلُّ رَجُلٍ مِنَّا أَسِيرَهُ فَقُلْتُ وَاللَّهِ لَا أَقْتُلُ أَسِيرِي، وَلَا يَقْتُلُ رَجُلٌ مِنْ أَصحَابِي أَسِيرَهُ، حَتَّى قَدِمْنَا عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرْنَاهُ، فرَفَعَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَدَهُ فَقَالَ:"اللَّهُمَّ إِنِّي أَبْرَأُ إِلَيْكَ مِمَّا صَنَعَ خَالِدٌ" مَرَّتَيْنِ.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4339) عن محمود، حَدَّثَنَا عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن الزّهري، عن سالم، عن أبيه فذكره.
وهو في مصنف عبد الرزّاق (9434).
وجذيمة - بفتح الجيم، وكسر المعجمة - ابن عامر بن عبد مناة بن كنانة، وهذا البعث كان عقب فتح مكة في شوال قبل الخروج إلى حنين. لأن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعث خالدًا داعيًا، ولم يبعثه مقاتلا، فوطئ بني جذيمة فأصاب منهم.
ذكره ابن إسحاق، السيرة لابن هشام (2/ 428).
وقال: حَدَّثَنِي حكيم بن حكيم بن عباد بن حنيف، عن أبي جعفر محمد بن عليّ قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم خالد بن الوليد حين افتتح مكة داعيًا، ولم يبعثه مقاتلًا، ومعه قبائل من العرب: سليم بن منصور ومدلج بن مرة، فوطئوا بني جذيمة بن عامر بن عبد مناة بن كنانة فلمّا رآه القوم أخذوا السلاح، فقال خالد: ضعوا السلاح، فإن الناس قد أسلموا، إِلَّا أنه مرسل، وذكر أيضًا قول جحْدم: ويلكم يا بني جذيمة! إنه خالد والله! ما بعد وضع السلاح إِلَّا الإسار، وما بعد الإسار إِلَّا ضرب الأعناق، والله لا أضع سلاحي أبدًا.
ثمّ رواه أيضًا من مرسل أبي جعفر محمد بن عليّ قال: فلمّا وضعوا السلاح أمر بهم خالد عند
ذلك، فكتّفوا، ثمّ عرضهم على السيف فقتل من قتل منهم. فلمّا انتهى الخبر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم رفع يديه إلى السماء ثمّ قال:"اللهم إني أبرأ إليك مما صنع خالد بن الوليد".
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খালিদ ইবনুল ওয়ালীদকে বনী জাযীমার কাছে পাঠালেন। তিনি তাদেরকে ইসলামের দিকে আহ্বান করলেন, কিন্তু তারা ‘আমরা ইসলাম গ্রহণ করেছি’ এই কথাটি সঠিকভাবে বলতে পারল না। বরং তারা বলতে লাগল, ‘আমরা ধর্মচ্যুত হয়েছি, আমরা ধর্মচ্যুত হয়েছি।’ তখন খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের মধ্যে হত্যা শুরু করলেন এবং বন্দিও করলেন। তিনি আমাদের মধ্যে প্রত্যেকের কাছেই তার বন্দীকে সোপর্দ করলেন। অবশেষে একদিন খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নির্দেশ দিলেন যে, আমাদের প্রত্যেকে যেন তার বন্দীকে হত্যা করে। তখন আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি আমার বন্দীকে হত্যা করব না এবং আমার সাথীদের মধ্যে কেউও তার বন্দীকে হত্যা করবে না। অবশেষে আমরা যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং তাঁকে এ বিষয়ে জানালাম, তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত উঠিয়ে দুবার বললেন: “হে আল্লাহ! খালিদ যা করেছে, তা থেকে আমি তোমার কাছে দায়মুক্তির ঘোষণা দিচ্ছি।”
9040 - عن عَنْ ابْنِ أَبِي حَدْرَدٍ الْأَسْلَمِيِّ، قَالَ: كُنْتُ يَوْمَئِذٍ فِي خَيْلِ خَالِدِ بْنِ الْوَلِيدِ، فَقَالَ لِي فَتًى مِنْ بَنِي جَذِيمَةَ، وَهُوَ فِي سِنِّي، وَقَدْ جُمِعَتْ يَدَاهُ إلَى عُنُقِهِ بِرُمَّةٍ وَنِسْوَةٌ مُجْتَمِعَاتٌ غَيْرَ بَعِيدٍ مِنْهُ: يَا فَتَى، فَقُلْتُ: مَا تَشَاءُ؟ قَالَ: هَلْ أَنْتَ آخِذٌ بِهَذِهِ الرُّمَّةِ، فَقَائِدِي إلَى هَؤُلَاءِ النِّسْوَةِ حَتَّى أَقْضِيَ إلَيْهِنَ حَاجَةً، ثُمَّ تَرُدَّنِي بَعْدُ، فَتَصْنَعُوا بِي مَا بَدَا لَكُمْ؟ قَالَ: قُلْتُ: وَاللَّهِ لَيَسِيرٌ مَا طَلَبْتَ. فَأَخَذْتُ بِرُمَّتِهِ فَقُدْتُهُ بِهَا، حَتَّى وَقَفَ عَلَيْهِنَّ، فَقَالَ: اسْلَمِي حُبَيْشِ، عَلَى نَفَذٍ مِنْ الْعَيْشِ:
أَرَيْتُكِ إذْ طَالَبْتُكُمْ فَوَجَدْتُكُمْ … بِحَلْيَةَ أَوْ أَلْفَيْتُكُمْ بِالْخَوَانِقِ
أَلَمْ يَكُ أَهْلًا أَنْ يُنَوَّلَ عَاشِقٌ … تَكَلَّفَ إدْلَاجَ السُّرَى وَالْوَدَائِقِ
فَلَا ذَنْبَ لِي قَدْ قُلْتُ إذْ أَهْلُنَا مَعًا … أَثِيبِي بِوُدٍّ قَبْلَ إحْدَى الصَّفَائِقِ
أَثِيبِي بِوُدٍّ قَبْلَ أَنْ تَشْحَطَ النَّوَى … وَيَنْأَى الْأَمِيرُ بِالْحَبِيبِ الْمُفارِقِ
فَإِنِّي لَا ضَيَّعْتُ سِرَّ أَمَانَةٍ وَلَا … رَاقَ عَيْني عَنْكَ بَعْدَكَ رَائِقُ
سِوَى أَنَّ مَا نَالَ الْعَشِيرَةَ شَاغِلٌ … عَنْ الْوُدِّ إلَّا أَنْ يَكُونَ التَّوَامُقُ
قَالَ ابْنُ إسْحَاقَ: وَحَدَّثَنِي يَعْقُوبُ بْنُ عُتْبَةَ بْنِ الْمُغِيرَةِ بْنِ الْأَخْنَسِ، عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ ابْنِ أَبِي حَدْرَدٍ الْأَسْلَمِيِّ، (قَالَ) قَالَتْ: وَأَنْتَ فَحُيِّيتُ سَبْعًا وَعَشْرًا، وِتْرًا وَثَمَانِيًا تَتْرَى. قَالَ: ثُمَّ انْصَرَفْتُ بِهِ. فَضرِبَتْ عُنُقُهُ.
حسن: رواه محمد بن إسحاق قال: حَدَّثَنِي يعقوب بن عتبة بن المغيرة بن الأخنس، عن الزّهري، عن ابن أبي حدرد الأسلمي قال: فذكره. سيرة ابن هشام (2/ 533 - 534).
وإسناده حسن من أجل تصريح محمد بن إسحاق إِلَّا أني أخشى فيه من الانقطاع بين الزهري وبين ابن أبي حدرد، واسمه عبد الله بن أبي حدرد. ثمّ وقفت على روايات أخرى وفيها زيادة"عن أبيه" هكذا رواه أبو نعيم في معرفة الصّحابة (4089) والبيهقي في الدلائل (5/ 115) والخرائطي في اعتلال القلوب (251) وهكذا نقله أيضًا ابن حجر في الإصابة (4643) وبهذا ثبت الإسناد.
قال ابن إسحاق: فحدثني أبو فراس بن أبي سنبلة الأسلمي عن أشياخ منهم عمن كان حضرها منهم، قالوا: فقامت إليه حين ضربت عنقه، فاكبتْ عليه، فما زالت تقبّله حتَّى ماتت عنده.
ইবনু আবী হাদ্রাদ আল-আসলামী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সেদিন খালিদ ইবনু ওয়ালীদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অশ্বারোহী বাহিনীর সাথে ছিলাম। বানু জাযীমা গোত্রের এক যুবক, যে আমারই সমবয়সী ছিল এবং যার দু’হাত রশি দিয়ে তার গলার সাথে বাঁধা ছিল, সে আমার কাছাকাছি থাকা সমবেত নারীদের দিকে ইশারা করে আমাকে বললো:
"হে যুবক!" আমি বললাম: "তুমি কী চাও?" সে বললো: "তুমি কি এই রশি ধরে আমাকে ঐ নারীদের কাছে নিয়ে যেতে পারো, যেন আমি তাদের কাছে আমার কিছু প্রয়োজন মিটিয়ে নিতে পারি? এরপর তুমি আমাকে ফিরিয়ে আনবে এবং তোমরা যা উপযুক্ত মনে করো, আমার সাথে তা করবে?"
বর্ণনাকারী বলেন: আমি বললাম: "আল্লাহর কসম, তুমি যা চেয়েছো, তা সামান্যই।" এরপর আমি তার রশি ধরলাম এবং তাকে টেনে নিয়ে গেলাম, যতক্ষণ না সে তাদের কাছে গিয়ে দাঁড়ালো। তখন সে বললো: "হে হুবাইশ, জীবনের শেষ প্রান্তে এসেও তুমি নিরাপদ থেকো।
যখন আমি তোমাদেরকে খুঁজেছিলাম, তখন আমি কি তোমাদেরকে হালিয়াহ্ বা খাওয়ানিক-এ পাইনি?
যে প্রেমিক রাতের আঁধারে ও বৃষ্টির কষ্টকর পথ পাড়ি দিয়ে সফর করেছে, সে কি প্রতিদান পাওয়ার যোগ্য নয়?
আমার কোনো দোষ নেই, যখন আমাদের পরিবার একত্রে ছিল, আমি বলেছিলাম— কোনো বিপর্যয় আসার আগেই ভালোবাসার প্রতিদান দাও।
ভালোবাসার প্রতিদান দাও, এর আগেই যে আমাদের দূরত্ব বেড়ে যায়, আর দূরে চলে যাওয়া প্রিয়জনকে নিয়ে নেতা (আমীর) চলে যান।
আমি কখনো আমানতের গোপন বিষয় নষ্ট করিনি, আর তোমার পরে অন্য কিছু আমার চোখকে আকর্ষণ করেনি।
তবে গোত্রের ওপর যা ঘটেছে, তা ভালোবাসা থেকে মনোযোগ ঘুরিয়ে দিয়েছে, শুধু হৃদয়ের প্রগাঢ় ভালোবাসা ছাড়া (যা সর্বদা বিদ্যমান)।"
ইবনু ইসহাক বলেন: ইয়াকুব ইবনু উতবাহ ইবনু মুগীরা ইবনুল আখনাস আমার কাছে যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে ইবনু আবী হাদ্রাদ আল-আসলামী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মেয়েটি (জবাবে) বললো: "তুমি দীর্ঘকাল বেঁচে থাকো, সাতবার, দশবার, বিজোড় ও জোড় সংখ্যায় বারবার!"
তিনি (ইবনু আবী হাদ্রাদ) বলেন: এরপর আমি তাকে নিয়ে ফিরে আসলাম। অতঃপর তার গর্দান কেটে ফেলা হলো।
ইবনু ইসহাক বলেন: আবূ ফিরায়াস ইবনু আবী সুমবুলা আল-আসলামী আমার কাছে তাদের মধ্যেকার এমন কিছু শায়খদের থেকে বর্ণনা করেছেন, যারা সেখানে উপস্থিত ছিলেন। তারা বলেন: তার গর্দান কেটে ফেলার সময় মেয়েটি তার কাছে ছুটে গেলো, তার ওপর ঝুঁকে পড়লো এবং তাকে চুম্বন করতে থাকলো, অবশেষে তার কাছেই সে মারা গেলো।