আল-জামি` আল-কামিল
9081 - عن مروان بن الحكم والمسور بن مخرمة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قَامَ حِينَ جَاءَهُ وَفْدُ هَوَازِنَ مُسْلِمِينَ، فَسَأَلُوهُ أَنْ يَرُدَّ إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ وَسَبْيَهُمْ، فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"مَعِي مَنْ تَرَوْنَ، وَأَحَبُّ الْحَدِيثِ إِلَيَّ أَصْدَقُهُ، فَاخْتَارُوا إِحْدَى الطَّائِفَتَيْنِ: إِمَّا السَّبْيَ،
وَإمَّا الْمَالَ، وَقَدْ كُنْتُ اسْتَأنَيْتُ بِكُمْ" وَكَانَ أَنْظَرَهُمْ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بِضْعَ عَشْرَةَ لَيْلَةً، حِينَ قَفَلَ مِنَ الطَّائِفِ، فَلَمَّا تبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم غَيْرُ رَادٍّ إِلَيْهِمْ إِلَّا إِحْدَى الطَّائِفَتَيْنِ، قَالُوا: فَإِنَّا نَخْتَارُ سَبْيَنَا. فَقَامَ رَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي الْمُسْلِمِينَ، فَأَثْنَى عَلَى اللَّهِ بمَا هُوَ أَهْلُهُ، ثُمَّ قَال:"أَمَّا بَعْدُ، فَإِنَّ إِخْوَانَكُمْ قَدْ جَاءُونَا تَائِبِينَ، وإنِّي قَدْ رَأَيْتُ أَنْ أَرُدَّ إِلَيْهِمْ سَبْيَهُمْ، فَمَنْ أَحَبَّ مِنْكُمْ أَنْ يُطَيِّبَ ذَلِكَ فَلْيَفْعَلْ، وَمَنْ أَحَبَّ مِنكُمْ أَنْ يَكُونَ عَلَى حَظِّهِ، حَتَّى نُعْطِيَهُ إِيَّاهُ مِنْ أَوَّل مَا يُفِيءُ اللَّهُ عَلَيْنَا، فَلْيَفْعَلْ" فَقَال النَّاسُ: قَدْ طَيَّبْنَا ذَلِكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّا لَا نَدْرِي مَنْ أَذِنَ مِنْكُمْ فِي ذَلِكَ مِمَّنْ لَمْ يَأذَنْ، فَارْجِعُوا حَتَّى يَرْفَعَ إِلَيْنَا عُرَفَاؤُكُمْ أَمْرَكُمْ" فرَجَعَ النَّاسُ، فَكَلَّمَهُمْ عُرَفَاؤُهُمْ، ثُمَّ رَجَعُوا إِلَى رَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَخْبَرُوهُ أَنَّهُمْ قَدْ طَيّبوا وَأَذِنُوا. هَذَا الَّذِي بَلَغَنِي عَنْ سَبْيِ هَوَازِنَ.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4318، 4319) عن سعيد بن عفير، حدثني ليث، حدثني عقيل، وعن إسحاق، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا ابن أخي ابن شهاب كلاهما عن محمد بن شهاب قال: وزعم عروة بن الزبير أن مروان والمسور بن مخرمة أخبراه: فذكراه.
মারওয়ান ইবনুল হাকাম ও মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়েছিলেন যখন তাঁর নিকট হাওয়াজিন গোত্রের প্রতিনিধিদল মুসলিম হয়ে আগমন করলো। তারা তাঁকে তাদের সম্পদ ও বন্দীদের ফিরিয়ে দেওয়ার অনুরোধ জানালো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বললেন: "তোমরা যাদের দেখছো, তারা আমার সাথে আছে (অর্থাৎ এরা গণিমতের হকদার)। আর আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয় কথা হলো সত্য। সুতরাং তোমরা দু'টি জিনিসের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নাও: হয় বন্দীগণকে, না হয় সম্পদকে। আমি তোমাদের জন্য অপেক্ষা করেছি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তায়েফ থেকে প্রত্যাবর্তনের পর তাদের জন্য দশেরও অধিক রাত্রি অপেক্ষা করেছিলেন। যখন তারা নিশ্চিত হলো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’টি জিনিসের মধ্যে যেকোনো একটি ব্যতীত অন্যটি ফেরত দেবেন না, তখন তারা বললো: "আমরা আমাদের বন্দীদেরকেই বেছে নিলাম।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের মাঝে দাঁড়িয়ে গেলেন, আল্লাহর যথোপযুক্ত প্রশংসা করলেন, অতঃপর বললেন: "শোনো! তোমাদের ভাইয়েরা অনুতপ্ত হয়ে আমাদের কাছে এসেছে। আমি সিদ্ধান্ত নিয়েছি যে, তাদের বন্দীগণকে তাদের কাছে ফিরিয়ে দেবো। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে খুশি মনে ছেড়ে দিতে চাও, সে তা করতে পারো। আর তোমাদের মধ্যে যে নিজের অংশ ধরে রাখতে চাও, যাতে আল্লাহ আমাদের যে গণিমত প্রথমে দান করবেন, তা থেকে আমরা তোমাদেরকে তার মূল্য দিতে পারি—সেও তা করতে পারো।" লোকেরা তখন বললো: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সানন্দে তা ছেড়ে দিলাম (খুশি মনে ফিরিয়ে দিলাম)।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা জানি না, তোমাদের মধ্যে কে কে এর অনুমতি দিয়েছো এবং কে কে দাওনি। সুতরাং তোমরা ফিরে যাও, যেন তোমাদের গোত্রপতিরা (বা সর্দাররা) তোমাদের বিষয়টি আমাদের কাছে উত্থাপন করতে পারে।" তখন লোকেরা ফিরে গেল এবং তাদের গোত্রপতিরা তাদের সাথে কথা বললো। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে এসে জানালো যে, তারা সানন্দে ফিরিয়ে দিতে সম্মত হয়েছে এবং অনুমতি দিয়েছে। হাওয়াজিন গোত্রের বন্দীদের ব্যাপারে এই বর্ণনাটিই আমার কাছে পৌঁছেছে।
9082 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: شهدت رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين وجاءته وفود هوازن فقالوا: يا محمد! إنا أصل وعشيرة فمن علينا من الله عليك فإنه قد نزل بنا من البلاء ما لا يخفى عليك فقال:"اختاروا بين نسائكم وأموالكم وأبنائكم" قالوا: خيرتنا بين أحسابنا وأموالنا نختار أبناءنا فقال:"أما ما كان لي ولبني عبد المطلب فهو لكم فإذا صليتُ الظهر فقولوا: إنا نستشفع برسول الله صلى الله عليه وسلم على المؤمنين وبالمؤمنين على رسول الله صلى الله عليه وسلم في نسائنا وأبنائنا" قال: ففعلوا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما ما كان لي ولبني عبد المطلب فهو لكم" وقال المهاجرون: ما كان لنا فهو لرسول الله صلى الله عليه وسلم وقالت الأنصار مثل ذلك، وقال عيينة بن بدر: أما ما كان لي ولبني فزارة فلا، وقال الأقرع بن حابس: أما أنا وبنو تميم فلا، وقال عباس بن مرداس: أما أنا وبنو سليم فلا، فقالت الحيان: كذبت بل هو لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أيها الناس ردوا عليهم نساءهم وأبناءهم فمن تمسك بشيء من الفيء فله علينا ستة فرائض من أول شيء يفيئه الله علينا" ثم ركب راحلته وتعلق به الناس يقولون: اقسم علينا فيئنا بيننا، حتى ألجؤوه إلى سمرة فخطفت رداءه، فقال:"يا أيها الناس! ردوا علي ردائي فوالله! لو كان لكم بعدد شجر تهامة نعم لقسمته بينكم ثم لا تُلفُوني بخيلًا ولا جبانًا ولا كذوبًا" ثم دنا من بعيره فأخذ وبرة من سنامه فجعلها بين أصابعه السبابة
والوسطى ثم رفعها فقال:"يا أيها الناس! ليس لي من هذا الفيء ولا هذه إلا الخمس، والخمس مردود عليكم، فردوا الخياط والمخيط، فإن الغلول يكون على أهله يوم القيامة عارًا ونارًا وشنارًا". فقام رجل معه كُبة من شعر فقال: إني أخذت هذه أصلح بها بردعة بعير لي دبر قال:"أما ما كان لي ولبني عبد المطلب فهو لك" فقال الرجل: يا رسول الله! أما إذ بلغت ما أرى فلا أرب لي بها ونبذها.
حسن: رواه النسائي (3688)، وأبو داود (2694)، وأحمد (7037)، والبيهقي (6/ 336) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، قال: حدثني عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. ومنهم من اختصره. وهو في سيرة ابن هشام (2/ 489). وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وشيخه عمرو بن شعيب.
قال الزهري: وأخبرني ابن المسيب: أنهم أصابوا يومئذ ستة آلاف من السبي، فجاؤوا مسلمين بعد ذلك، ذكره ابن سعد في الطبقات (2/ 155)
وأما ما روي عن أبي جَرْوَلٍ زُهَيْر بن صُرَدٍ الْجُشَمِيّ، يَقُولُ: لَمَّا أَسَرَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ حُنينٍ يَوْمَ هَوَازِنَ، وَذَهَبَ يُفَرِّقُ الشُّبَّانَ وَالسَّبْيَ أَنْشَدْتُهُ هَذَا الشَّعْرَ:
امْنُنْ عَلَيْنَا رَسُولَ اللَّهِ فِي كَرَمٍ … فَإِنَّكَ الْمَرْءُ نَرْجُوهُ ونَنَتْظِرُ
امْنُنْ عَلَى بَيْضَةٍ قَدْ عَاقَهَا قَدَرٌ … مُفَرَّقًا شَمْلُهَا فِي دَهْرِهَا غِيَرُ
أَبْقَتْ لَنَا الدَّهْرَ هَتَّافًا عَلَى حُزُنٍ … عَلَى قُلُوبِهِمُ الْغَمَّاءُ وَالْغُمُرُ
إِنْ لَمْ تَدَارَكْهُمُ نَعْمَاءُ تَنْشُرُهَا … يَا أَرْجَحَ النَّاسِ حِلْمًا حِينَ يُخْتَبَرُ
امْنُنْ عَلَى نِسْوَةٍ قَدْ كُنْتَ تَرْضَعُهَا … وَإِذْ يَزِينُكَ مَا تَأتِي وَمَا تَذَرُ
لا تَجْعَلَنا كَمَنْ شَالَتْ نَعَامَتُهُ … فَاسْتَبْقِ مِنَّا فَإِنَّا مَعْشَرٌ زهر
إِنَّا لَنَشْكُرُ لِلنَّعْمَاءِ إِذْ كُفِرَتْ … وَعِنْدَنَا بَعْدَ هَذَا الْيَوْمِ مُدَّخَرُ
فَأَلْبِسِ الْعَفْوَ مَنْ قَدْ كُنْتَ تَرْضَعُهُ … مِنْ أُمَّهَاتِكَ إِنَّ الْعَفْوَ مُشْتَهَرُ
يَا خَيْرَ مَنْ مَرَحَتْ كَمْتُ الْجِيَادِ بِهِ … عِنْدَ الْهياجِ إِذَا مَا اسْتَوْقَدَ الشَّرَرُ
إِنَّا نُؤمّلُ عَفْوًا مِنْكَ نَلْبَسُهُ … هَادِي الْبَرِيَّةِ إِذْ تَعْفُو وَتَنْتَصِرُ
فَاعْفُ عَفَا اللَّهُ عَمَّا أَنْتَ رَاهِبُهُ … يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِذْ يَهْدِي لَكَ الظُّفَرُ
فَلَمَّا سَمِعَ هَذَا الشَّعْرَ قَالَ:"مَا كَانَ لِي وَلبَني عَبْدِ الْمُطَّلِبِ فَهُوَ لَكُمْ"، وَقَالَتْ قُرَيْشٌ: مَا كَانَ لَنَا فَهُوَ لِلَّهِ وَلِرَسُولِهِ، وَقَالَتِ الأَنْصَارُ: مَا كَانَ لَنَا فَهُوَ لِلَّهِ وَلرَسُولِهِ. فهو ضعيف.
رواه الطبراني في الكبير (5/ 311، 312) عن عبيد الله بن رماحس الجشمي، ثنا أبو عمرو زياد بن طارق - وكان قد لبث عليه عشرون ومائة سنة، قال: سمعت أبا جرول زهير بن صرد الجشمي، يقول: فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (6/ 187): رواه الطبراني في الثلاثة، وفيه من لم أعرفهم.
قلت: يقصد بهذا عبيد الله بن رماحس شيخ الطبراني، وزياد بن طارق.
وعبيد الله بن رماحس القيسي الرملي ذكره الذهبي في الميزان (3/ 6) وقال:"روى عنه الأمير بدر الحمامى، وأبو القاسم الطبراني، وأحمد بن إسماعيل بن عاصم، وأبو سعيد بن الأعرابي، والحسن بن زيد الجعفري، ومحمد بن إبراهيم بن عيسى المقدسي. وكان معمرًا، ما رأيت للمتقدمين فيه جرحًا، وما هو بمعتمد عليه. ثم رأيت الحديث الذي رواه له (يعني: هذا الحديث) علة قادحة. قال أبو عمر بن عبد البر في شعر زهير: رواه عبيد الله بن رماحس، عن زياد بن طارق، عن زياد بن صرد بن زهير، عن أبيه، عن جده زهير بن صرد، فعمد عبيد الله إلى الإسناد وأسقط رجلين منه، وما قنع بذلك حتى صرح بأن زياد بن طارق قال: حدثني زهير، هكذا هو في معجم الطبراني وغيره بإسقاط اثنين من سنده".
قلت: إن صح هذا القول فعبيد الله بن رماحس يتهم بالكذب، وأما زياد بن طارق فهو مجهول.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হুনাইনের যুদ্ধের দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপস্থিত ছিলাম। তখন তাঁর নিকট হাওয়াজিন গোত্রের প্রতিনিধিদল আগমন করল এবং বলল: হে মুহাম্মাদ! আমরা আপনার আত্মীয় ও গোত্রীয় লোক। আপনি আমাদের উপর দয়া করুন, আল্লাহ আপনাকে দয়া করবেন। আমাদের উপর যে বিপদ নেমে এসেছে, তা আপনার অজানা নয়।
তিনি বললেন: “তোমরা তোমাদের নারী, সম্পদ ও সন্তানদের মধ্যে যে কোনো একটি বেছে নাও।” তারা বলল: আপনি আমাদের নিকট আমাদের বংশমর্যাদা ও আমাদের সম্পদের মধ্যে একটি বেছে নিতে বলেছেন, আমরা আমাদের সন্তানদের বেছে নিলাম।
তিনি বললেন: “আমার এবং বনু আব্দুল মুত্তালিবের ভাগে যা পড়েছে, তা তোমাদের জন্য। যখন আমি যুহরের সালাত আদায় করব, তখন তোমরা বলবে: আমরা আমাদের নারী ও সন্তানদের ব্যাপারে মুমিনদের বিরুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সুপারিশকারী বানাচ্ছি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিরুদ্ধে মুমিনদের সুপারিশকারী বানাচ্ছি।”
তিনি বলেন: তারা তা-ই করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমার ও বনু আব্দুল মুত্তালিবের যা কিছু, তা তোমাদের জন্য।”
মুহাজিরগণ বললেন: আমাদের ভাগে যা পড়েছে, তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য। আনসারগণও অনুরূপ বললেন। কিন্তু উয়ায়না ইবনু বদর বললেন: আমার এবং বনু ফাযারার যা কিছু, তা (আমরা দেব না)। আর আকরা’ ইবনু হাবিস বললেন: আমি ও বনু তামীম (ফেরত দেব) না। আর আব্বাস ইবনু মিরদাস বললেন: আমি ও বনু সুলাইম (ফেরত দেব) না। তখন উপস্হিত গোত্র দুটি বলল: তুমি মিথ্যা বলেছ, বরং তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে লোক সকল! তাদের স্ত্রী ও সন্তানদের তাদের কাছে ফিরিয়ে দাও। যে কেউ কোনো গণীমতের বস্তু আঁকড়ে থাকবে, আল্লাহ আমাদের নিকট প্রথমে যে গণীমত পাঠাবেন, তা থেকে তার জন্য ছয়টি অংশ আমার উপর আবশ্যক হবে।”
এরপর তিনি তাঁর সাওয়ারীতে আরোহণ করলেন। লোকজন তাঁর সাথে ঝুলে পড়ল এবং বলতে লাগল: আমাদের মধ্যে আমাদের গণীমত বণ্টন করে দিন। এমনকি তারা তাঁকে একটি বাবলা গাছের দিকে ঠেলে নিয়ে গেল, ফলে তাঁর চাদরটি ছিনিয়ে নেওয়া হলো। তিনি বললেন: “হে লোক সকল! আমার চাদর আমাকে ফিরিয়ে দাও। আল্লাহর শপথ! যদি তোমাদের তিহামার বৃক্ষরাজির সমসংখ্যক উটও থাকে, তবে আমি তা তোমাদের মধ্যে বণ্টন করে দিতাম। এরপরও তোমরা আমাকে কৃপণ, ভীরু বা মিথ্যাবাদী পাবে না।”
এরপর তিনি তাঁর উটের কাছে গিয়ে তার কুঁজ থেকে একটি পশম নিলেন এবং তা তাঁর শাহাদাত ও মধ্যমা অঙ্গুলির মাঝে রাখলেন, এরপর তা তুলে ধরলেন এবং বললেন: “হে লোক সকল! এই গণীমতের মালের এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) ছাড়া আমার কিছুই নেই, আর এই এক পঞ্চমাংশও তোমাদের দিকে ফিরিয়ে দেওয়া হবে। তোমরা সূঁচ এবং সুতাও ফিরিয়ে দাও। কেননা, খেয়ানত (গণীমতের মাল চুরি) কিয়ামতের দিন এর অধিকারীর জন্য লজ্জার কারণ, আগুন ও দুর্নামের কারণ হবে।”
তখন এক লোক দাঁড়াল, যার সাথে এক গোছা চুল ছিল। সে বলল: আমি এটি নিয়েছি আমার একটি ঘা হওয়া উটের পিঠের গদি মেরামত করার জন্য। তিনি বললেন: “আমার ও বনু আব্দুল মুত্তালিবের ভাগে যা পড়েছে, তা তোমার জন্য।” লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! যখন আমি এমন অবস্থা দেখলাম, তখন আমার এর প্রয়োজন নেই। অতঃপর সে সেটি ফেলে দিল।
9083 - عن عَنْ أَبِي مُوسَى قَال: كُنْتُ عِنْدَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَهْوَ نَازِلٌ بِالْجِعْرَانَةِ بَيْنَ مَكَّةَ وَالْمَدِينَةِ وَمَعَهُ بِلَالٌ، فَأَتَى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَعْرَابِيٌّ فَقَالَ: أَلَا تُنْجِزُ لِي مَا وَعَدْتَنِي. فَقَالَ لَهُ:"أَبْشِرْ" فَقَالَ: قَدْ أَكْثَرْتَ عَلَيَّ مِنْ أَبْشِرْ. فَأَقْبَلَ عَلَى أَبِي مُوسَى وَبِلَالٍ كَهَيْئَةِ الْغَضْبَانِ فَقَال:"رَدَّ الْبُشْرَى فَاقْبَلَا أَنْتُمَا" قَالَا: قَبِلْنَا. ثُمَّ دَعَا بِقَدَحٍ فِيهِ مَاءٌ فَغَسَلَ يَدَيْهِ وَوَجْهَهُ فِيهِ، وَمَجَّ فِيهِ، ثُمَّ قَالَ:"اشْرَبَا مِنْهُ، وَأَفْرِغَا عَلَى وُجُوهِكُمَا وَنُحُورِكُمَا، وَأَبْشِرَا" فَأَخَذَا الْقَدَحَ فَفَعَلَا، فَنَادَتْ أُمُّ سَلَمَةَ مِنْ وَرَاءِ السِّتْرِ أَنْ أَفْضلَا لأُمِّكُمَا. فَأَفْضلَا لَهَا مِنْهُ طَائِفَةً.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4328) ومسلم في فضائل الصحابة (164: 2497) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, যখন তিনি মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে অবস্থিত জি‘ইর্রানায় অবস্থান করছিলেন এবং তাঁর সাথে বিলালও ছিলেন। তখন একজন বেদুঈন এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল, আপনি আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন তা কি পূর্ণ করবেন না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "সুসংবাদ গ্রহণ করো।" লোকটি বলল, আপনি আমার উপর ‘সুসংবাদ গ্রহণ করো’ কথাটি অনেক বেশি ব্যবহার করেছেন। তখন তিনি আবূ মূসা ও বিলালের দিকে রাগান্বিতের মতো হয়ে মুখ ফিরালেন এবং বললেন, "সে সুসংবাদ প্রত্যাখ্যান করেছে, সুতরাং তোমরা দু’জন তা গ্রহণ করো।" তারা দু’জন বললেন, আমরা গ্রহণ করলাম। অতঃপর তিনি এক পেয়ালা পানি চাইলেন। তাতে তিনি তাঁর দু’হাত ও চেহারা মুবারক ধুলেন এবং তাতে কুল্লি করা পানি দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমরা দু’জন তা পান করো, তোমাদের চেহারা ও গলায় ঢেলে দাও, এবং সুসংবাদ গ্রহণ করো।" অতঃপর তাঁরা পেয়ালাটি নিলেন এবং তা করলেন। তখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দার আড়াল থেকে ডেকে বললেন, তোমাদের মায়ের জন্য কিছু বাঁচিয়ে রাখো। তখন তাঁরা তার জন্য কিছু অংশ বাঁচিয়ে রাখলেন।
9084 - عن عبد الرحمن بن مالك بن جعشم المدلجي أن أباه أخبر أن سراقة بن مالك رضي الله عنه أخبره أنه لما خرج النبي صلى الله عليه وسلم مهاجرا إلى المدينة جعلت قريش لمن رده مائة ناقة قال: فبينا أنا جالس في نادي قومي جاء رجل فقال: والله لقد رأيت ثلاثة ركبة مروا علي آنفا والله إني لأظنه محمدا عليه السلام، قال: فأومأت إليه بعيني أن اسكت. قلت: إنما هم بنو فلان يبغون ضالة لهم، فقال: لعله وسكت، قال: فمكثت قليلا ثم قمت فدخلت بيتي فأمرت بفرس فقيد إلى بطن الوادي وأخرجت سلاحي من وراء حجرتي وأخذت سهامي التي أستقسم بها ثم لبست لأمتي ثم أخرجت قداحي فاستقسمت فخرج سهم الذي أكره أن لا أضره وقد كنت أرجو أن أرده فآخذ المائة، قال: فركبت على أثره، قال: فبينا فرسي تشتد بي عثرت وسقطت عنها فأخرجت قداحي فاستقسمت فخرج السهم الذي أكره أن لا أضره فأبيت إلا أن أتبعه فركبت فلما بدا لي القوم ونظرت إليهم عثر بي فرسي وذهبت يداه في الأرض وسقطت عنه فاستخرج يداه، وأتبعها دخان مثل الغبار، فعرفت أنه قد منع مني، وأنه ظاهر فناديتهم فقلت: انظروني فوالله لا أريبكم ولا يأتيكم مني شيء تكرهونه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قل له ما تبغي؟" فقلت له: اكتب لي كتابا فكتبه ثم ألقاه إلي فسكت فلم أذكر شيئا مما كان فلما فتح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة وفرغ من حنين خرج إليه ومعه الكتاب الذي كتبه له قال: فبينما أنا عامد له دخلت بين ظهراني كتيبة من كتائب الأنصار قال: فطفقوا يقرعوني بالرماح ويقولون: إليك إليك حتى دنوت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على ناقة أنظر إلى ساقه في غرزة كأنها جمارة فرفعت يدي بالكتاب فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اليوم يوم وفاء وبرادنه" قال: فأسلمت ثم انصرفت فسقت إلى النبي صلى الله عليه وسلم صدقتي.
صحيح: رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (1029، 1030) وابن أبي عمر العدني في مسنده - المطالب العالية (9/ 467) والطبراني في الكبير (7/ 135، 134) كلهم من حديث عبد الرحمن بن مالك وهو ابن أخي سراقة بن مالك بن جعشم، أن أباه أخبره، أنه سمع سراقة بن مالك فذكره.
واللفظ لابن أبي عاصم. وأصله في الصحيح سبق ذكره في قصة الهجرة إلا أنه لم يذكر قصة حضور سراقة بن مالك إلى حنين.
ورواه الحميدي في مسنده (2/ 401) عن سفيان قال: سمعت الزهري يخبر عن ابن سراقة، أو
ابن أخي سراقة، عن سراقة فذكره.
قال سفيان: هذا الذي حفظت عن الزهري واختلط عليَّ من أوله شيء، فأخبرني وائل بن داود عن الزهري بعض هذا الكلام، لا أخلص ما حفظت من الزهري، وما أخبرنيه وائل، قال سراقة، فذكر نحوه. وهذا إسناد صحيح أيضا، وقوله: وما أخبرنيه وائل، قال سراقة: القائل هو ابن أخي سراقة، لا وائل بن داود.
সুরাকাহ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে অবহিত করেছেন যে, যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা থেকে মদীনার উদ্দেশ্যে হিজরত করেন, তখন কুরাইশরা ঘোষণা করেছিল যে, যে ব্যক্তি তাঁকে ধরে ফিরিয়ে আনবে তাকে একশো উট পুরস্কার দেওয়া হবে। তিনি (সুরাকাহ) বলেন: আমি যখন আমার গোত্রের মজলিসে বসেছিলাম, তখন এক ব্যক্তি এসে বলল: আল্লাহর কসম! আমি এইমাত্র তিনজন আরোহীকে দেখলাম, তারা আমার পাশ দিয়ে গেল। আল্লাহর কসম! আমার মনে হয়, তিনি মুহাম্মদ (عليه السلام)। (সুরাকাহ) বলেন: আমি চোখের ইশারায় তাকে চুপ থাকতে বললাম। আমি বললাম: তারা তো অমুক গোত্রের লোক, তারা তাদের হারানো বস্তু খুঁজছে। লোকটি বলল: হয়তো বা, এবং সে চুপ হয়ে গেল।
তিনি বললেন: আমি অল্পক্ষণ অপেক্ষা করলাম, তারপর উঠে আমার ঘরে প্রবেশ করলাম। আমি নির্দেশ দিলাম, যেন একটি ঘোড়াকে উপত্যকার ভেতরে প্রস্তুত রাখা হয়। আমি আমার কক্ষের আড়াল থেকে আমার অস্ত্র বের করলাম এবং আমার ভাগ্য নির্ধারণকারী তীরগুলো নিলাম, তারপর আমার বর্ম পরিধান করলাম। এরপর আমি আমার ভাগ্যনির্ধারণী তীরগুলো বের করে কসম করলাম (আল্লাহর কাছে চাওয়া): আমার অপছন্দনীয় তীরটি বের হলো যে, আমি যেন তাঁর কোনো ক্ষতি না করি। অথচ আমি আশা করছিলাম যে, আমি তাঁকে ফিরিয়ে আনব এবং একশো উট লাভ করব।
তিনি বলেন: আমি তাঁর পিছু নিলাম। আমার ঘোড়া আমাকে নিয়ে দ্রুত ছুটে চলার সময় হোঁচট খেল এবং আমি তা থেকে পড়ে গেলাম। আমি আমার তীর বের করে ভাগ্য নির্ধারণ করলাম, আবারও সেই তীরটি বের হলো যা নির্দেশ করে যে, আমি যেন তাঁর কোনো ক্ষতি না করি। তবুও আমি তাঁকে অনুসরণ করা ছাড়া অন্য কিছু মানতে পারলাম না। আমি আবার আরোহণ করলাম। যখন আমি লোকগুলোকে দেখতে পেলাম এবং তাদের দিকে তাকালাম, তখন আমার ঘোড়া আবার হোঁচট খেল এবং তার সামনের পা দুটো মাটিতে দেবে গেল। আমি তা থেকে পড়ে গেলাম। ঘোড়া তার পা দুটো বের করার পর ধূলার মতো ধোঁয়া তার পিছু নিল। তখন আমি বুঝতে পারলাম যে, তিনি আমার থেকে সুরক্ষিত এবং তিনি সফল হবেন। তাই আমি তাদের ডেকে বললাম: "আমার জন্য অপেক্ষা করুন। আল্লাহর কসম, আমি তোমাদের কোনো সন্দেহ সৃষ্টি করব না এবং তোমাদের অপছন্দ হয় এমন কিছু আমার কাছ থেকে তোমাদের কাছে আসবে না।" তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে বলো, সে কী চায়?" আমি তাঁকে বললাম: "আমার জন্য একটি নিরাপত্তা পত্র লিখে দিন।" তিনি সেটি লিখে আমার দিকে ছুঁড়ে দিলেন। এরপর আমি নীরব থাকলাম এবং যা ঘটেছিল, তার কিছুই আর কাউকে বললাম না।
যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা জয় করলেন এবং হুনাইনের যুদ্ধ থেকে অবসর হলেন, তখন সুরাকাহ সেই লেখাটি নিয়ে তাঁর কাছে গেলেন। তিনি বলেন: আমি যখন তাঁর দিকে যাচ্ছিলাম, তখন আনসারদের একটি সামরিক দলের মাঝখানে ঢুকে পড়লাম। তারা আমাকে বর্শা দিয়ে খোঁচা দিতে লাগল এবং বলতে লাগল: "পিছনে যাও! পিছনে যাও!" অবশেষে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছাকাছি গেলাম। তিনি তখন একটি উটনীর উপর ছিলেন। আমি লাগামের মধ্যে তাঁর পা দেখছিলাম, যা খেজুর গাছের ভিতরের নরম অংশের (জুম্মারা) মতো দেখাচ্ছিল। আমি আমার হাতে থাকা সেই লেখাটি তুলে ধরলাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আজ হচ্ছে অঙ্গীকার পূরণের দিন এবং তাকে কাছে নিয়ে এসো।" তিনি (সুরাকাহ) বলেন: এরপর আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম। তারপর ফিরে গিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে আমার সাদাকাহ (যাকাত) নিয়ে গেলাম।
9085 - عن أنس قال: اعتمر النبي صلى الله عليه وسلم أربع عمر كلهن في ذي القعدة إلا التي مع حجته: عمرة من الحديبية أو زمن الحديبية في ذي القعدة، وعمرة من العام المقبل في ذي القعدة، وعمرة من جعرانة حيث قسم غنائم حنين في ذي القعدة، وعمرة مع حجته.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4148) ومسلم في الحج (1253) كلاهما عن هدبة بن خالد - ويقال له: هدّاب - حدثنا همام، حدثنا قتادة أن أنسا أخبره فذكره.
قوله:"عمرة من العام المقبل" - وهي العمرة المعروفة بعمرة القضية.
و"الجعرانة": بكسر الجيم وسكون العين، وقد تكسر العين وتشدد الراء - منزل بين الطائف ومكة.
وانظر بقية الأحاديث في كتاب الحج والعمرة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারটি উমরাহ করেছেন। হজ্জের সাথে কৃত উমরাহটি ছাড়া বাকি সবগুলোই যুল-কা'দা মাসে হয়েছিল। (সেগুলো হলো:) হুদায়বিয়া থেকে বা হুদায়বিয়ার সময়ে যুল-কা'দা মাসে একটি উমরাহ, পরবর্তী বছর যুল-কা'দা মাসে একটি উমরাহ, জি'ইররানা থেকে একটি উমরাহ—যখন তিনি হুনাইনের গনীমতের মাল বন্টন করেছিলেন—যা যুল-কা'দা মাসে হয়েছিল, এবং তাঁর হজ্জের সাথে একটি উমরাহ।
9086 - عن * *
مهاجر رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قالوا: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم قطبة بن عامر بن حديدة في عشرين رجلا إلى حي من خثعم بناحية تبالة، وأمره أن يشن الغارة عليهم، فخرجوا على عشرة أبعرة يتعقبونها، فأخذوا رجلا، فسألوه فاستعجم عليهم، فجعل يصيح بالحاضر ويحذرهم فضربوا عنقه، ثم أمهلوا حتى نام الحاضر فشنوا عليهم الغارة، فاقتتلوا قتالا شديدا حتى كثر الجرحى في الفريقين جميعا، وقتل قطبة بن عامر من قتل، وساقوا النعم والشاء والنساء إلى المدينة، وجاء سيل أَتِيٌّ، فحال بينهم وبينه فما يجدون إليه سبيلا، وكانت سهمانهم أربعة أبعرة أربعة أبعرة، والبعير يعدل بعشر من الغنم، بعد أن أخرج الخمس. الطبقات الكبرى (2/ 162).
رواه أحمد (22466) عن محمد بن بكر، حدثنا إسرائيل، حدثنا أبو إسحاق، عن الشعبي، عن رعية السحيمي، فذكره.
وإسناده منقطع لأن عامرًا الشعبي كثير الإرسال، ولم يصرح بالسماع، والحديث ورد مرسلا في مصادر أخرى، كما عند ابن أبي شيبة (3779
র'ইয়াহ আস-সুহাইমী থেকে বর্ণিত, তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুতবাহ ইবনু আমির ইবনু হাদিদাহকে বিশজন লোকসহ তিবালার পার্শ্ববর্তী খাছ'আম গোত্রের দিকে প্রেরণ করেন এবং তাদেরকে তাদের উপর অতর্কিত আক্রমণ করার নির্দেশ দেন। তারা দশটি উটের উপর পালাক্রমে আরোহণ করে রওনা হলেন। তারা এক ব্যক্তিকে পাকড়াও করলেন। তারা তাকে জিজ্ঞাসাবাদ করলেন, কিন্তু সে তাদের সাথে স্পষ্টভাষায় কথা বলল না (উত্তর দিতে অস্বীকার করল)। এরপর সে গোত্রের লোকদের উদ্দেশ্যে চিৎকার করতে এবং তাদেরকে সতর্ক করতে শুরু করল। ফলে তারা তার গর্দান উড়িয়ে দিলেন। এরপর তারা অপেক্ষা করলেন যতক্ষণ না গোত্রের লোকেরা ঘুমিয়ে পড়ল। অতঃপর তারা তাদের উপর আক্রমণ করলেন। উভয় পক্ষের মধ্যে তীব্র যুদ্ধ শুরু হলো, এমনকি উভয় দলেই বহু সংখ্যক লোক আহত হলো। কুতবাহ ইবনু আমির যারা নিহত হওয়ার ছিল তাদেরকে হত্যা করলেন। তারা গবাদি পশু, ভেড়া-বকরী এবং নারীদেরকে মদীনার দিকে হাঁকিয়ে নিয়ে এলেন। (পথে) এক প্রবল বন্যা আসলো, যা তাদের ও মদীনার মাঝে প্রতিবন্ধকতা সৃষ্টি করল, ফলে তারা (লুটের মাল নিয়ে) যাওয়ার কোনো পথ খুঁজে পেল না। তাদের হিস্যায় (গনীমতের) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) বের করার পর চার-চারটি করে উট পড়ল। আর একটি উট দশটি বকরীর সমান (মূল্যবান) গণ্য হতো।
9087 - عن أبي عبد الرحمن أن عثمان حيث حوصر أشرف عليهم وقال: أنشدكم ولا أنشد إلا أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: ألستم تعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من حفر رومة فله الجنة" فحفرتها؟ ألستم تعلمون أنه قال:"من جهز جيش العسرة فله الجنة" فجهزتها قال: فصدقوه بما قال.
صحيح: رواه البخاري في الوصايا (2778) قال: قال عبدان، أخبرني أبي، عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي عبد الرحمن أن عثمان فذكره.
وقول البخاري:"قال عبدان" يحمل على الاتصال، ولذا قال البيهقي (6/ 167): رواه البخاري في الصحيح عن عبدان.
وعبدان هو عبد الله بن عثمان بن جبلة الملقب بعبدان من شيوخ البخاري.
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন অবরোধের মধ্যে ছিলেন, তখন তিনি তাদের উপর দৃষ্টি দিলেন এবং বললেন: আমি তোমাদের শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আর আমি নবি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীগণ ছাড়া অন্য কাউকে জিজ্ঞেস করছি না: তোমরা কি জানো না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘যে রুমা কূপ খনন করবে, তার জন্য জান্নাত রয়েছে’? আর আমি তা খনন করেছিলাম? তোমরা কি জানো না যে তিনি (নবি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: ‘যে ব্যক্তি জাইশুল উসরাহ (কষ্টের সেনাবাহিনী) কে সজ্জিত করবে, তার জন্য জান্নাত রয়েছে’? আর আমি তা সজ্জিত করেছিলাম? (আবু আবদুর রহমান) বলেন: অতঃপর তারা তিনি যা বলেছিলেন, তাতে সত্যতা স্বীকার করল।
9088 - عن كعب بن مالك يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم قلما يريد غزوة يغزوها إلا ورى بغيرها حتى كانت غزوة تبوك، فغزاها رسول الله صلى الله عليه وسلم في حر شديد، واستقبل سفرا بعيدا ومفازا، واستقبل غزو عدو كثير، فجلى للمسلمين أمرهم ليتأهبوا أهبة عدوهم،
وأخبرهم بوجهه الذي يريد.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2948) ومسلم في التوبة (2769: 54) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك أن عبد الله بن كعب - وكان قائد كعب من بنيه - قال: سمعت كعب بن مالك، فذكره.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো যুদ্ধাভিযান করতে মনস্থ করতেন, তখন তিনি তার আসল উদ্দেশ্য গোপন রেখে অন্য কোনো স্থানের ইঙ্গিত দিতেন। কিন্তু তাবুক যুদ্ধের ক্ষেত্রে তিনি তা করেননি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তীব্র গরমের মধ্যে সেই যুদ্ধে গমন করেন। তিনি দূরপাল্লার পথ ও বিস্তীর্ণ মরুভূমি অতিক্রম করেন এবং বিপুল সংখ্যক শত্রুর মোকাবেলার সম্মুখীন হন। তাই তিনি মুসলমানদের জন্য তাদের উদ্দেশ্যের বিষয় স্পষ্ট করে দিলেন, যাতে তারা শত্রুর মোকাবিলার জন্য যথাযথ প্রস্তুতি নিতে পারে এবং যেদিকে তিনি যেতে চান, তা তাদেরকে জানিয়ে দিলেন।
9089 - عن عبد الرحمن بن سمرة قال: جاء عثمان بن عفان إلى النبي صلى الله عليه وسلم بألف دينار في ثوبه حين جهز النبي صلى الله عليه وسلم جيش العسرة، قال: فصبها في حجر النبي صلى الله عليه وسلم، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يقلبها بيده، ويقول:"ما ضر ابن عفان ما عمل بعد اليوم" يرددها مرارا.
حسن: رواه الترمذي (3701) وأحمد (20630) وابن أبي عاصم في الجهاد (82) والحاكم (3/ 102) كلهم من حديث ضمرة بن ربيعة، عن عبد الله بن شؤذب، عن عبد الله بن القاسم، عن كثير مولى عبد الرحمن بن سمرة، عن عبد الرحمن بن سمرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل كثير بن أبي كثير مولى ابن سمرة، فإنه حسن الحديث، فقد روى عنه عدد كثير، ووثقه العجلي وابن حبان، وأصله ثابت في الصحيح.
وروي عن عبد الرحمن بن خباب السلمي قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فحث على جيش العسرة، فقال عثمان بن عفان: علي مائة بعير بأحلاسها وأقتابها. قال: ثم حث، فقال عثمان: علي مائة أخرى بأحلاسا وأقتابها. قال: ثم نزل مرقاة من المنبر، ثم حث، فقال عثمان بن عفان: علي مائة أخرى بأحلاسها وأقتابها. قال: فرأيت النبي صلى الله عليه وسلم يقول بيده هكذا يحركها - وأخرج عبد الصمد يده كالمتعجب -:"ما على عثمان ما عمل بعد هذا".
رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (16696) عن أبي موسى العنزي، قال: حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، قال حدثني سكن بن المغيرة، قال: حدثني الوليد بن أبي هشام، عن فرقد أبي طلحة، عن عبد الرحمن بن خباب السلمي، فذكره.
ورواه الترمذي (3700) وابن حميد (300) كلاهما من أبي داود الطيالسي - وهو في مسنده (1189) عن سكن بن المغيرة بإسناده نحوه.
قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه لا نعرفه إلا من حديث السكن بن مغيرة.
قلت: وهو كما قال. والسكن بن المغيرة حسن الحديث، ولكن فيه فرقد أبو طلحة"مجهول" قال علي بن المديني: لا أعرفه، وتفرد بالرواية عنه الوليد بن أبي هشام.
আবদুর রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'জাইশুল উসরাহ' (তাবুকের যুদ্ধ)-এর জন্য সেনাবাহিনীকে প্রস্তুত করছিলেন, তখন উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড়ের মধ্যে এক হাজার স্বর্ণমুদ্রা (দিনার) নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে ঢেলে দিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে তা উল্টে পাল্টে দেখতে লাগলেন এবং বলছিলেন: "আজকের দিনের পর ইবনে আফফান যা কিছুই করবে, তাতে তার কোনো ক্ষতি হবে না।" তিনি কথাটি বারবার বলছিলেন।
9090 - عن عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ: أَرْسَلَنِي أَصْحَابِي إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَسْأَلُهُ الْحُمْلَانَ لَهُمْ، إِذْ هُمْ مَعَهُ فِي جَيْشِ الْعُسْرَةِ وَهْيَ غَزْوَةُ تَبُوكَ فَقُلْتُ: يَا نَبِيَّ اللَّهِ، إِنَّ أَصْحَابِي أَرْسَلُونِي إِلَيْكَ لِتَحْمِلَهُمْ. فَقَالَ:"وَاللَّهِ لَا أَحْمِلُكُمْ عَلَى شَئٍ" وَوَافَقْتُهُ، وَهْوَ غَضْبَانُ وَلَا
أَشْعُرُ، وَرَجَعْتُ حَزِينًا مِنْ مَنعِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، وَمِنْ مَخَافَةِ أَنْ يَكُونَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم قد وَجَدَ فِي نَفْسِهِ عَلَيَّ، فَرَجَعْتُ إِلَى أَصْحَابِي فَأَخْبَرْتُهُمُ الَّذِي قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم، فَلَمْ أَلْبَثْ إِلَّا سُوَيْعَةً إِذْ سَمِعْتُ بِلَالًا يُنَادِي: أَىْ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ قَيْسٍ. فَأَجَبْتُهُ، فَقَالَ: أَجِبْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَدْعُوكَ، فَلَمَّا أَتَيْتُهُ، قَالَ:"خُذْ هَذَيْنِ الْقَرِينينِ - وَهَذَيْنِ الْقَرِينَيْنِ لِسِتَّةِ أَبْعِرَةٍ ابْتَاعَهُنَّ حِينَئِذٍ مِنْ سَعْدٍ - فَانْطَلِقْ بِهِنَّ إِلَى أَصْحَابِكَ فَقُلْ: إِنَّ اللَّهَ (أَوْ قَالَ: إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم" يَحْمِلُكُمْ عَلَى هَؤُلَاءِ فَارْكَبُوهُنَّ".
قال أبو موسى: فَانْطَلَقْتُ إلى أصحابي بِهِنَّ، فَقُلْتُ: إِنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَحْمِلُكُمْ عَلَى هَؤُلَاءِ وَلَكِن وَاللَّهِ لَا أَدَعُكُمْ حَتَّى يَنْطَلِقَ مَعِي بَعْضكُمْ إِلَى مَنْ سَمِعَ مَقَالَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حين سألته لكم ومنعه في أول مرة، ثم إعطاءه إياي بعد ذلك، لَا تَظُنُّوا أَنِّي حَدَّثْتُكُمْ شَيْئًا لَمْ يَقُلْهُ، فَقَالُوا لِي: والله! إِنَّكَ عِنْدَنَا لَمُصَدَّقٌ، وَلَنَفْعَلَنَّ مَا أَحْبَبْتَ.
فَانْطَلَقَ أَبُو مُوسَى بِنَفَرٍ مِنْهُمْ حَتَّى أَتَوُا الَّذِينَ سَمِعُوا قَوْلَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ومَنْعَهُ إِيَّاهُمْ، ثُمَّ إِعْطَاءَهُمْ بَعْدُ، فَحَدَّثُوهُمْ بما حَدَّثَهُمْ بِهِ أَبُو مُوسَى، سواء.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4415) ومسلم في الأيمان والنذور (1649: 8) كلاهما عن محمد بن العلاء الهمداني، حدثنا أبو أسامة، عن بريد بن عبد الله بن أبي بردة، عن أبي بردة، عن أبي موسى قال فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার সাথীরা আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট পাঠালেন, যেন আমি তাদের জন্য বাহনের ব্যবস্থা করতে অনুরোধ করি। কারণ তারা তাঁর সঙ্গে জাইশুল উসরাহ (কষ্টের বাহিনী)-তে ছিলেন, আর তা ছিল তাবুক যুদ্ধ। আমি বললাম, হে আল্লাহর নবী! আমার সাথীরা আমাকে আপনার নিকট পাঠিয়েছেন, যেন আপনি তাদের জন্য বাহনের ব্যবস্থা করেন। তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের জন্য কোনো কিছুরই ব্যবস্থা করতে পারব না।" আমি তাঁর কাছে এমন সময় গিয়েছিলাম যখন তিনি রাগান্বিত ছিলেন, আর আমি তা জানতে পারিনি।
আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (বাহন দিতে) নিষেধ করার কারণে এবং সম্ভবত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার উপর মনঃক্ষুণ্ণ হয়েছেন—এই আশঙ্কায় বিষণ্ণ মনে ফিরে এলাম। আমি আমার সাথীদের নিকট ফিরে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বলেছিলেন, তা তাদের জানালাম। সামান্য কিছুক্ষণ পরেই আমি শুনতে পেলাম, বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ডাকছেন: "হে আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স!" আমি তাঁকে জবাব দিলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দিন, তিনি আপনাকে ডাকছেন।
যখন আমি তাঁর নিকট গেলাম, তিনি বললেন: "এই দুটো জোড়া নাও, আর এই দুটো জোড়া নাও"—(এগুলো ছিল সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে সে সময় কেনা মোট ছয়টি উট)। "তুমি এগুলো নিয়ে তোমার সাথীদের নিকট যাও এবং বলো: আল্লাহ (বা তিনি বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) তোমাদের জন্য এই বাহনগুলোর ব্যবস্থা করেছেন, অতএব তোমরা এগুলোতে আরোহণ করো।"
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি সেগুলো নিয়ে আমার সাথীদের নিকট গেলাম এবং বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের জন্য এই বাহনগুলোর ব্যবস্থা করেছেন। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের ছাড়ব না যতক্ষণ না তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ আমার সাথে সেই ব্যক্তির নিকট যাবে, যে ব্যক্তি তোমাদের জন্য আমার অনুরোধের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা শুনেছিল এবং প্রথমবার তাঁর নিষেধ করার কথা ও এরপরে আমাকে তা দেওয়ার কথা শুনেছে, যেন তোমরা মনে না করো যে আমি তোমাদের এমন কিছু বলেছি যা তিনি বলেননি।
তারা আমাকে বলল: আল্লাহর কসম! আপনি আমাদের কাছে অবশ্যই সত্যবাদী। আপনি যা পছন্দ করেন, আমরা তা অবশ্যই করব।
সুতরাং আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের মধ্যে থেকে কিছু লোককে সাথে নিয়ে গেলেন, এমনকি তারা তাদের নিকট পৌঁছলেন যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রথমবার নিষেধ করার ও এরপর তাদেরকে বাহন দেওয়ার কথা শুনেছিল। অতঃপর তারা তাদের নিকট হুবহু সেই কথাই বর্ণনা করল যা আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের নিকট বর্ণনা করেছিলেন।
[সহীহ: বুখারী (৪৪১৫), মুসলিম (১৬৪৯/৮)]
9091 - عن سعد بن أبي وقاص قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى تبوك، واستخلف عليّا فقال: أتخلفني في الصبيان والنساء؟ قال:"ألا ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى، إلا أنه ليس نبي بعدي".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4416) ومسلم في فضائل الصحابة (31: 2404) كلاهما من طريق شعبة، عن الحكم (هو ابن عيينة) عن مصعب بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه سعد بن أبي وقاص قال: فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবুক অভিমুখে যাত্রা করলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে স্থলাভিষিক্ত করে গেলেন। তখন তিনি (আলী) বললেন, আপনি কি আমাকে শিশু ও নারীদের মাঝে রেখে যাচ্ছেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, আমার নিকট তোমার অবস্থান হবে মূসার নিকট হারূনের অবস্থানের মতো? তবে পার্থক্য এই যে, আমার পরে কোনো নবী নেই।"
9092 - عن كعب بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج يوم الخميس في غزوة تبوك، وكان يحب أن يخرج يوم الخميس.
صحيح: رواه البخاري في الجهاد (2950) عن عبد الله بن محمد، حدثنا هشام، أخبرنا معمر،
عن الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه، فذكره.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক যুদ্ধের জন্য বৃহস্পতিবার বের হয়েছিলেন এবং তিনি বৃহস্পতিবার বের হওয়া পছন্দ করতেন।
9093 - عن واثلة بن الأسقع، قال: نادى رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، فخرجت إلى أهلي، فأقبلت وقد خرج أول صحابة رسول الله صلى الله عليه وسلم فطفقت في المدينة أنادي: ألا من يحمل رجلًا له سهمه، فنادى شيخ من الأنصار، قال: لنا سهمه على أن نحمله عقبة وطعامه معنا؟ قلت: نعم، قال: فسر على بركة الله، قال: فخرجت مع خير صاحب حتى أفاء الله علينا، فأصابني قلائص فسقتهن حتى أتيته، فخرج فقعد على حقيبة من حقائب إبله، ثم قال: سقهن مدبرات، ثم قال: سقهن مقبلات، فقال: ما أرى قلائصك إلا كرامًا، قال: إنما هي غنيمتك التي شرطت لك، قال: خذ قلائصك يا ابن أخي، فغير سهمك أردنا.
وفي رواية عنه: خرجت مهاجرا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما أقبل الناس من بين خارج وقائم فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يرى جالسا إلا دنا إليه فسأله: هل لك من حاجة؟ وبدأ بالصف الأول ثم بالثاني ثم الثالث حتى دنا إلي، فقال:"لك من حاجة؟" قلت: نعم يا رسول الله! قال: وما حاجتك؟ قلت:"الإسلام" قال:"هو خير لك" قال:"وتهاجر" قلت: نعم قال:"هجرة البادية أو هجرة الباتة؟" قلت: أيهما أفضل؟ قال:"الهجرة الباتة: أن تثبت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهجرة البادية أن ترجع إلى باديتك وعليك السمع والطاعة في عسرك ويسرك، ومكرهك ومنشطك، وأثرة عليك" قال: فبسطت يدي إليه، فبايعته، قال: واستثنى لي حيث لم أستثن لنفسي"فيما استطعت" قال: ونادى رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك فخرجت إلى أهلي، فوافقت أبي جالسا في الشمس يستدبرها فسلمت عليه بتسليم الإسلام، فقال: أصبوت؟ فقلت: أسلمت، فقال: لعل الله يجعل لنا ولك فيه خيرا، فرضيت بذلك منه، فبينا أنا معه إذ أتتني أختي تسلم علي، فقلت: يا أختاه! زوديني زاد المرأة أخاها غازيا، فأتتني بعجين في دلو، والدلو في مزود، فأقبلت، وقد خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فجعلت أنادي: ألا من يحمل رجلًا له سهمه، فناداني شيخ من الأنصار، فقال: لنا سهمه على أن نحمله عقبة وطعامه معنا فقلت: نعم، قال: سر على بركة الله، فخرجت مع خير صاحب لي زادني حملانا على ما شارطت، وخصني بطعام سوى ما أطعم معه، حتى أفاء الله علينا، فأصابني قلائص فسقتهن حتى أتيته وهو في خبائه، فدعوته فخرج فقعد على حقيبة من حقائب إبله، ثم قال: سقهن مدبرات، فسقتهن مدبرات، ثم قال: سقهن
مقبلات، فسقتهن مقبلات، فقال: ما أرى قلائصك إلا كرامًا، قال: قلت: إنما هي غنيمتك التي شرطت لك، فقال: خذ قلائصك يا ابن أخي، فغير سهمك أردنا.
حسن: رواه أبو داود (2676) ومن طريقه البيهقي (9/ 28) من طريق محمد بن شعيب بن شابور، أخبرني أبو زرعة يحيى بن أبي عمرو السيباني، عن عمرو بن عبد الله الحضرمي، عن واثلة بن الأسقع فذكره. واللفظ الأول لهما.
ورواه الطبراني في الكبير (22/ 80 - 81) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (921) من طريق محمد بن شعيب بن شابور به باللفظ الثاني.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن عبد الله الحضرمي، فإنه حسن الحديث فقد وثّقه الفسوي في المعرفة والتاريخ (2/ 437) والعجلي وذكره ابن حبان في الثقات، وقال في مشاهير علماء الأنصار: كان متقنا، وفيه أيضا محمد بن شعيب بن شابور، وهو صدوق.
وقوله:"فغير سهمك أردنا" يشبه أن يكون معناه: إني لم أرد سهمك من المغنم، إنما أردت مشاركتك في الأجر والثواب. قاله الخطابي في المعالم.
ওয়াছিলাহ ইবনু আল-আসক্বা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবূক যুদ্ধের সময় ঘোষণা দিলেন। আমি আমার পরিবারের কাছে চলে গেলাম। এরপর যখন ফিরে আসলাম, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণের প্রথম দল বের হয়ে গেছেন। আমি মদীনার মধ্যে ঘুরে ঘুরে ঘোষণা দিতে লাগলাম: "কেউ কি এমন ব্যক্তিকে বহন করবে, যার জন্য (যুদ্ধে) তার অংশ রয়েছে?" তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন বৃদ্ধ লোক আওয়াজ দিয়ে বললেন: "আমরা তাকে বহন করব এবং তার খাবারের দায়িত্বও নেব, এই শর্তে যে তার অংশ আমাদের হবে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আল্লাহর বরকতে চলো।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর আমি এক উত্তম সাথীর সাথে বের হলাম, যতক্ষণ না আল্লাহ আমাদের বিজয় দান করলেন। আমি কিছু অল্পবয়সী উটনি লাভ করলাম। আমি সেগুলোকে হাঁকিয়ে আনলাম এবং তার কাছে আসলাম। তিনি বের হয়ে এলেন এবং তাঁর উটের পিঠের ওপর রাখা বস্তুর উপর বসলেন। এরপর তিনি বললেন: "এগুলোকে পেছন দিক থেকে হাঁকাও।" এরপর বললেন: "এগুলোকে সামনের দিক থেকে হাঁকাও।" এরপর তিনি বললেন: "আমি তোমার উটনিগুলোকে খুবই উত্তম দেখছি।" আমি বললাম: "এগুলো সেই গনীমতের অংশ যা আমি আপনার জন্য শর্ত করেছিলাম।" তখন তিনি বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, তোমার উটনিগুলো তুমি নাও। আমরা তোমার অংশ (সরাসরি) চাইনি।"
অপর এক বর্ণনায় তার থেকে এসেছে: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে হিজরত করে আসলাম। যখন লোকেরা আগমন করতে লাগল—কেউ বাইরে ছিল আর কেউ অবস্থানরত—তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কোনো উপবিষ্ট ব্যক্তিকে দেখলেই তার কাছে যেতেন এবং জিজ্ঞাসা করতেন: "তোমার কি কোনো প্রয়োজন আছে?" তিনি প্রথম কাতার থেকে শুরু করে দ্বিতীয়, তারপর তৃতীয় কাতার পর্যন্ত আসলেন, অবশেষে আমার কাছে আসলেন এবং বললেন: "তোমার কি কোনো প্রয়োজন আছে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলুল্লাহ!" তিনি বললেন: "তোমার কী প্রয়োজন?" আমি বললাম: "ইসলাম।" তিনি বললেন: "এটি তোমার জন্য কল্যাণকর।" তিনি বললেন: "আর তুমি কি হিজরত করবে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "গ্রামে (বাদিয়াহ) হিজরত নাকি স্থায়ী (বাত্তা) হিজরত?" আমি বললাম: "কোনটি উত্তম?" তিনি বললেন: "স্থায়ী হিজরত হলো: তুমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে স্থায়ীভাবে অবস্থান করবে। আর গ্রামের হিজরত হলো: তুমি তোমার গ্রামে ফিরে যাবে, তবে তোমার ওপর নির্দেশ থাকবে—তোমার কষ্টের সময় ও সুখের সময়, তোমার অপছন্দের সময় ও আনন্দের সময়, এবং তোমার ওপর অন্যের অগ্রাধিকার দেওয়া হলেও—শ্রবণ ও আনুগত্য করা।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমি আমার হাত বাড়ালাম এবং তাঁর হাতে বাইয়াত করলাম। তিনি আমার জন্য এমন শর্ত জুড়ে দিলেন যা আমি নিজের জন্য রাখিনি: "যতক্ষণ তুমি সামর্থ্য রাখো।"
বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবূক যুদ্ধের জন্য ঘোষণা দিলেন। আমি আমার পরিবারের কাছে চলে গেলাম। আমি আমার পিতাকে সূর্যের দিকে পিঠ দিয়ে বসে থাকতে দেখলাম। আমি তাকে ইসলামের নিয়মানুসারে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "তুমি কি ধর্মচ্যুত হয়েছ?" আমি বললাম: "আমি ইসলাম গ্রহণ করেছি।" তিনি বললেন: "সম্ভবত আল্লাহ আমাদের এবং তোমার জন্য এতে কল্যাণ রাখবেন।" আমি তার এই উত্তরে সন্তুষ্ট হলাম। যখন আমি তার সাথে ছিলাম, তখন আমার বোন আমাকে সালাম দিতে আসলো। আমি বললাম: "হে আমার বোন! যেমনিভাবে একজন নারী তার গাযী (যোদ্ধা) ভাইকে পাথেয় দেয়, আমাকেও পাথেয় দাও।" তখন সে একটি বালতিতে করে আটা মাখা খামির নিয়ে আসল। বালতিটি ছিল একটি চামড়ার থলির ভেতর। এরপর আমি যাত্রা শুরু করলাম, ততক্ষণে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বের হয়ে গেছেন। আমি ঘোষণা দিতে লাগলাম: "কেউ কি এমন ব্যক্তিকে বহন করবে যার জন্য তার (যুদ্ধে) অংশ রয়েছে?" তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন বৃদ্ধ লোক আমাকে আওয়াজ দিয়ে বললেন: "আমরা তাকে বহন করব এবং তার খাবারের দায়িত্বও নেব, এই শর্তে যে তার অংশ আমাদের হবে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আল্লাহর বরকতে চলো।" আমি আমার শ্রেষ্ঠ সাথীর সাথে বের হলাম। সে আমাকে চুক্তিবদ্ধ অংশ ছাড়াও অতিরিক্ত কিছু বহন করার সুযোগ দিল এবং তার সাথে যে খাবার খাওয়া হতো, তা ছাড়াও অতিরিক্ত খাবার দিয়ে আমাকে বিশেষভাবে আপ্যায়ন করল। এভাবে আল্লাহ আমাদের বিজয় দান করলেন। আমি কিছু অল্পবয়সী উটনি লাভ করলাম। আমি সেগুলোকে হাঁকিয়ে আনলাম এবং তাঁর কাছে আসলাম। তিনি তাঁর তাঁবুর মধ্যে ছিলেন। আমি তাঁকে ডাকলাম। তিনি বের হয়ে এলেন এবং তাঁর উটের পিঠের ওপর রাখা বস্তুর উপর বসলেন। এরপর বললেন: "এগুলোকে পেছন দিক থেকে হাঁকাও।" আমি সেগুলোকে পেছন দিক থেকে হাঁকালাম। এরপর বললেন: "এগুলোকে সামনের দিক থেকে হাঁকাও।" আমি সেগুলোকে সামনের দিক থেকে হাঁকালাম। তিনি বললেন: "আমি তোমার উটনিগুলোকে খুবই উত্তম দেখছি।" আমি বললাম: "এগুলো সেই গনীমতের অংশ যা আমি আপনার জন্য শর্ত করেছিলাম।" তখন তিনি বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, তোমার উটনিগুলো তুমি নাও। আমরা তোমার অংশ (সরাসরি) চাইনি।"
9094 - عن يعلى بن أمية قال: غَزَوْتُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم الْعُسْرَةَ قَالَ: كَانَ يَعْلَى يَقُولُ: تِلْكَ الْغَزْوَةُ أَوْثَقُ أَعْمَالِي عِنْدِي. قَالَ عَطَاءُ: فَقَالَ صَفْوَانُ: قَالَ يَعْلَى: فَكَانَ لِي أَجِيرٌ، فَقَاتَلَ إِنْسَانًا فَعَضَّ أَحَدُهُمَا يَدَ الآخَرِ، قَالَ عَطَاءٌ: فَلَقَدْ أَخْبَرَنِي صَفْوَانُ: أَيُّهُمَا عَضَّ الآخَرَ فَنَسِيتُهُ، قَالَ: فَانْتَزَعَ الْمَعْضُوضُ يَدَهُ مِنْ فِي الْعَاضِّ، فَانْتَزَعَ إِحْدَى ثَنِيَّتَيْهِ، فَأَتَيَا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَهْدَرَ ثَنيَّتَهُ. قَالَ عَطَاءٌ: وَحَسِبْتُ أَنَّهُ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أَفَيَدَعُ يَدَهُ فِي فِيكَ تَقْضَمُهَا، كَأَنَّهَا فِي فِي فَحْلٍ يَقْضَمُهَا".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4417) ومسلم في القسامة والمحاربين (23: 1674) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أخبرني صفوان بن يعلى بن أمية، عن أبيه قال فذكره.
ইয়া'লা ইবনে উমায়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে গাযওয়ায়ে উসরাতে (তাবুকের যুদ্ধে) অংশ নিয়েছিলাম।
ইয়া'লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: সেই যুদ্ধটি আমার কাছে আমার সবচেয়ে নির্ভরযোগ্য আমল (নেক কাজ)।
আতা বলেন, সাফওয়ান বলেছেন, ইয়া'লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার একজন শ্রমিক (ভাড়াটে কর্মী) ছিল। সে একজন ব্যক্তির সাথে মারামারি করছিল। তখন তাদের মধ্যে একজন অন্যজনের হাতে কামড় দিল।
আতা বলেন: সাফওয়ান আমাকে জানিয়েছিলেন যে কে কাকে কামড় দিয়েছিল, কিন্তু আমি তা ভুলে গেছি।
তিনি (ইয়া'লা) বলেন: তখন যার হাতে কামড় দেওয়া হয়েছিল, সে কামড়দাতা ব্যক্তির মুখ থেকে তার হাত টেনে বের করে নেয়। এর ফলে কামড়দাতা লোকটির সামনের পাটির একটি দাঁত উপড়ে গেল।
অতঃপর তারা উভয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। তিনি সেই দাঁত উপড়ে যাওয়ার ক্ষতিপূরণ বাতিল করে দেন (অর্থাৎ কামড়দাতার দাঁত উপড়ে যাওয়ার জন্য কোনো ক্ষতিপূরণ ধার্য করেননি)।
আতা বলেন: আমার মনে হয় তিনি (সাফওয়ান) বলেছেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সে কি তার হাত তোমার মুখে ছেড়ে দেবে, আর তুমি তা চিবিয়ে খাবে? যেন হাতটি কোনো হিংস্র পশুর মুখে রয়েছে, যে তা চিবিয়ে খাচ্ছে!”
9095 - عن أبي هريرة أو عن أبي سعيد (شك الأعمش) قال: لما كان غزوة تبوك، أصاب الناس مجاعة، قالوا: يا رسول الله! لو أذنت لنا فنحرنا نواضحنا فأكلنا وادهنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"افعلوا" قال: فجاء عمر، فقال: يا رسول الله! إن فعلت قل الظهر، ولكن ادعهم بفضل أزوادهم، ثم ادع الله لهم عليها بالبركة، لعل الله أن يجعل في ذلك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم" قال: فدعا بنطع فبسطه، ثم دعا بفضل أزوادهم، قال: فجعل الرجل يجيء بكف ذرة، قال: ويجيء الآخر بكف
تمر، قال: ويجيء الآخر بكسرة. حتى اجتمع على النطع من ذلك شيء يسير، قال: فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالبركة، ثم قال:"خذوا في أوعيتكم" قال: فأخذوا في أوعيتهم، حتى ما تركوا في العسكر وعاء إلا ملؤوه، قال: فأكلوا حتى شبعوا، وفضلت فضلة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أشهد أن لا إله إلا الله، وأني رسول الله، لا يلقى الله بهما عبد، غير شاك، فيحجب عن الجنة".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (45: 27) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة أو عن أبي سعيد فذكره.
ورواه الإمام أحمد (11080) عن أبي معاوية بإسناده، وفيه: لما كان غزوة تبوك أصاب الناس مجاعة، ثم ذكر مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অথবা আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত (আ'মাশের সন্দেহ), তিনি বলেন, যখন তাবুক যুদ্ধ চলছিল, তখন মানুষের উপর দুর্ভিক্ষ নেমে আসল।
তারা বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি আমাদের অনুমতি দেন, তবে আমরা আমাদের পানি বহনকারী উটগুলোকে নহর (যবেহ) করি এবং আমরা তা ভক্ষণ করি ও চর্বি ব্যবহার করি।'
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমরা তা করো।"
বর্ণনাকারী বলেন, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! যদি আপনি তা করেন, তবে বাহন কমে যাবে। বরং আপনি তাদের কাছে তাদের অবশিষ্ট পাথেয় নিয়ে আসতে বলুন, অতঃপর তাতে আল্লাহর কাছে বরকতের জন্য দু‘আ করুন। সম্ভবত আল্লাহ এর মধ্যে কিছু করে দেবেন (বরকত দান করবেন)।'
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "হ্যাঁ (ঠিক বলেছ)।"
বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি একটি চামড়ার দস্তরখানা (নত্ব') আনতে বললেন এবং তা বিছালেন। এরপর তিনি তাদের অবশিষ্ট পাথেয় আনতে বললেন।
তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন একজন ব্যক্তি এক মুঠো ভুট্টা নিয়ে আসছিল, আরেকজন এক মুঠো খেজুর নিয়ে আসছিল এবং আরেকজন এক টুকরা রুটি নিয়ে আসছিল। এভাবে সেই দস্তরখানার উপর সামান্য কিছু জিনিস জমা হলো।
তিনি বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বরকতের জন্য দু‘আ করলেন, এরপর বললেন, "তোমরা তোমাদের পাত্রগুলোতে নিয়ে নাও।"
তিনি বলেন, অতঃপর তারা তাদের পাত্রগুলোতে নিতে শুরু করল, এমনকি তারা সেনাছাউনিতে এমন কোনো পাত্র বাকি রাখল না যা তারা পূর্ণ করেনি।
তিনি বলেন, অতঃপর তারা পেট ভরে খেল এবং কিছু অবশিষ্টও রইল।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল। যে বান্দা সন্দেহমুক্ত হয়ে এ দু’টি বাক্য নিয়ে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করবে, তাকে জান্নাত থেকে বঞ্চিত করা হবে না।"
9096 - عن أبي هريرة قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في مسير قال: فنفدت أزواد القوم قال: حتى هم بنحر بعض حمائلهم قال: فقال عمر: يا رسول الله! لو جمعت ما بقي من أزواد القوم، فدعوت الله عليها، قال: ففعل قال: فجاء ذو البر ببره وذو التمر بتمره (وقال مجاهد وذو النواة بنواه) قلت: وما كانوا يصنعون بالنوى؟ قال: كانوا يمصونه ويشربون عليه الماء، قال: فدعا عليها، حتى ملأ القوم أزودتهم قال: فقال عند ذلك"أشهد أن لا إله إلا الله وأني رسول الله لا يلقى الله بهما عبد غير شاك فيهما إلا دخل الجنة".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (27) عن أبي بكر بن النضر بن أبي النضر، قال: حدثني أبو النضر هاشم بن القاسم، حدثنا عبيد الله الأشجعي، عن مالك بن مِغوَل، عن طلحة بن مصرف، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। তিনি বলেন, তখন লোকজনের কাছে থাকা খাদ্যসামগ্রী ফুরিয়ে গেল। এমনকি তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কিছু বাহন (উট) জবাই করার ইচ্ছা করলেন। তিনি বলেন, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি লোকজনের কাছে অবশিষ্ট থাকা সামান্য খাদ্যসামগ্রী সংগ্রহ করেন এবং তার উপর আল্লাহর কাছে দু‘আ করেন (তাহলে কেমন হয়)?' তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা-ই করলেন। তিনি বলেন, তখন যার কাছে গম ছিল সে গম নিয়ে এল, আর যার কাছে খেজুর ছিল সে খেজুর নিয়ে এল। (মুজাহিদ বলেন, আর যার কাছে খেজুরের আঁটি ছিল সে তার আঁটি নিয়ে এল)। আমি (বর্ণনাকারী) বললাম, তারা আঁটি দিয়ে কী করতো? তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন, তারা তা চুষে পানি পান করত। তিনি বলেন, এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর দু‘আ করলেন। ফলে লোকেরা তাদের খাদ্যসামগ্রী ভর্তি করে নিল। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল। যে বান্দা এই দুটি (সাক্ষ্য) নিয়ে আল্লাহ্র সঙ্গে সাক্ষাৎ করবে, আর তাতে সামান্যতম সন্দেহ পোষণ করবে না, সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
9097 - عن فضالة بن عبيد الأنصاري يقول: غزونا مع النبي صلى الله عليه وسلم غزوة تبوك، فجهد بالظهر جهدًا شديدًا، فشكوا إلى النبي صلى الله عليه وسلم ما بظهرهم من الجهد، فتحين بهم مضيقًا، فسار النبي صلى الله عليه وسلم فيه، فقال:"مروا بسم الله"، فمر الناس عليه بظهرهم، فجعل ينفخ بظهرهم:"اللهم احمل عليها في سبيلك، إنك تحمل على القوي والضعيف، وعلى الرطب واليابس في البر والبحر" قال: فما بلغنا المدينة حتى جعلت تنازعنا أزمتها.
قال فضالة: هذه دعوة النبي صلى الله عليه وسلم على القوي والضعيف، فما بال الرطب واليابس! فلما قدمنا الشام غزونا غزوة قبرس في البحر، فلما رأيت السفن في البحر وما يدخل فيها عرفت دعوة النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أحمد (23955) وابن حبان (4681) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2110)
كلهم من حديث صفوان بن عمرو، عن شريح بن عبيد، عن فضالة بن عبيد الأنصاري، قال: فذكره. وإسناده صحيح.
ফাদ্বালা ইবনু উবাইদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাবুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। (যাত্রাপথে) পশুর পিঠে অত্যন্ত কঠিন কষ্ট অনুভূত হচ্ছিল। লোকেরা তাদের বাহনগুলোর পিঠে যে কষ্ট হচ্ছিল, তা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করল। তিনি তাদের জন্য একটি সংকীর্ণ স্থান নির্ধারণ করলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই পথে চলতে শুরু করলেন এবং বললেন, "বিসমিল্লাহ (আল্লাহর নামে) অগ্রসর হও।" এরপর লোকেরা তাদের বাহনসহ সেই সংকীর্ণ স্থান অতিক্রম করতে লাগল। তিনি (নবী) তাদের বাহনগুলোর পিঠে ফুঁ দিতে লাগলেন এবং দু'আ করলেন: "হে আল্লাহ! আপনার পথে এর উপর বোঝা বহন করিয়ে দিন। নিশ্চয়ই আপনি সবলের উপর এবং দুর্বলের উপর, এবং স্থল ও সমুদ্রে আর্দ্র ও শুষ্ক (বস্তু)-এর উপর, ভার বহন করিয়ে থাকেন।" তিনি (ফাদ্বালা) বলেন: আমরা মদীনায় পৌঁছা পর্যন্ত অবস্থা এমন হয়েছিল যে, সেগুলো (বাহনগুলো) আমাদের লাগাম ধরে টানাটানি শুরু করে দিয়েছিল (অর্থাৎ নিয়ন্ত্রণ করা কঠিন হচ্ছিল)।
ফাদ্বালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই দু'আ ছিল সবল ও দুর্বলের জন্য। কিন্তু আর্দ্র ও শুষ্কের (রطب ও ইয়াবিসের) বিষয়টি কী? যখন আমরা শামে পৌঁছালাম, তখন আমরা ক্বুবরুস (সাইপ্রাস) অভিযানে অংশগ্রহণ করলাম। যখন আমি সমুদ্রে জাহাজগুলো এবং এর মধ্যে যা কিছু (ভারী বোঝা) বহন করা হয়, তা দেখলাম, তখন আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই দু'আর তাৎপর্য বুঝতে পারলাম।
9098 - عن ابن عباس، أنه قيل لعمر بن الخطاب: حدثنا من شأن العسرة، قال: خرجنا إلى تبوك في قيظ شديد، فنزلنا منزلا، أصابنا فيه عطش، حتى ظننا أن رقابنا ستنقطع، حتى إن كان الرجل ليذهب يلتمس الماء، فلا يرجع حتى نظن أن رقبته ستنقطع، حتى إن الرجل لينحر بعيره فيعصر فرثه فيشربه، ويجعل ما بقي على كبده، فقال أبو بكر الصديق: يا رسول الله! قد عودك الله في الدعاء خيرًا، فادع لنا، فقال:"أتحب ذلك؟" قال: نعم، قال: فرفع يديه صلى الله عليه وسلم، فلم يرجعهما حتى أظلت سحابة، فسكبت، فملؤوا ما معهم، ثم ذهبنا ننظر، فلم نجدها جاوزت العسكر.
صحيح: رواه ابن حبان (1383) والبزار - كشف الأستار (1841) والحاكم (1/ 159) والبيهقي في الدلائل (5/ 231) كلهم من حديث ابن وهب، قال: أخبرنا عمرو بن الحارث، عن سعد بن أبي هلال، عن عتبة بن أبي عتبة، عن نافع بن جبير، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
تنبيه: سقط من إسناد ابن حبان"عتبة بن أبي عتبة".
وروى البيهقي في الدلائل (5/ 227) عن عبد الله بن محمد بن عقيل بن أبي طالب في قوله تعالى: {الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ} [التوبة: 117] قال: خرجوا في غزوة تبوك: الرجلان والثلاثة على بعير، وخرجوا في حر شديد، فأصابهم يومًا عطش حتى جعلوا ينحرون إبلهم ليعصروا أكراشها، ويشربوا ماءها، فكان ذلك عسرة من الياء، وعسرة من النفقة، وعسرة من الظهر إلا أنه مرسل.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলা হয়েছিল: আপনি আমাদেরকে 'আসরাহ্' (কষ্টকর) অভিযান সম্পর্কে কিছু বলুন।
তিনি (উমার) বললেন: আমরা তীব্র গরমে তাবুক অভিযানে বের হলাম। আমরা এক জায়গায় অবতরণ করলাম, যেখানে আমরা এমন তৃষ্ণার্ত হলাম যে আমরা মনে করছিলাম আমাদের ঘাড়গুলি যেন ছিঁড়ে যাবে। এমনকি অবস্থা এমন ছিল যে, একজন লোক পানি খুঁজতে গেলে, সে আর ফিরে আসত না, আর আমরা মনে করতাম যে তারও ঘাড় ছিঁড়ে গেছে (তৃষ্ণায়)। এমনকি এমনও হচ্ছিল যে, একজন লোক তার উটকে যবেহ করে তার গোবর নিংড়িয়ে তার রস পান করত, এবং অবশিষ্ট অংশ তার কলিজার উপর রাখত (ঠান্ডা হওয়ার জন্য)। অতঃপর আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনাকে দু'আ করার ক্ষেত্রে সবসময় উত্তম অভ্যস্ত করেছেন (আপনার দু'আ কবুল করেছেন), তাই আপনি আমাদের জন্য দু'আ করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা চাও?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু’ হাত উঠালেন। তিনি হাত নামালেন না যতক্ষণ না একটি মেঘ এসে ছায়া দিল এবং বৃষ্টি বর্ষণ করল। ফলে তারা তাদের কাছে যা কিছু ছিল সব পূর্ণ করে নিল। এরপর আমরা দেখতে গেলাম, আমরা দেখিনি যে সেই মেঘ আমাদের সেনাছাউনি অতিক্রম করেছে।
9099 - عن أبي الطفيل قال: كان بين رجل من أهل العقبة وبين حذيفة بعض ما يكون بين الناس، فقال: أنشدك بالله! كم كان أصحاب العقبة؟ قال: فقال له القوم: أخبره إذ سألك، قال: كنا نخبر أنهم أربعة عشر، فإن كنت منهم فقد كان القوم خمسة عشر، وأشهد بالله أن اثني عشر منهم حرب لله ولرسوله في الحياة الدنيا ويوم يقوم الأشهاد، وعذر ثلاثة، قالوا: ما سمعنا منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا علمنا بما أراد القوم، وقد كان في حرة فمشى فقال:"إن الماء قليل، فلا يسبقني إليه أحد" فوجد قوما قد سبقوه، فلعنهم يومئذ.
صحيح: رواه مسلم في صفات المنافقين (2997: 11) عن زهير بن حرب حدثنا أبو أحمد الكوفي حدثنا الوليد بن جميع، حدثنا أبو الطفيل فذكره.
قال النووي: وهذه العقبة ليست العقبة المشهورة بمنى التي كان بها بيعة الأنصار رضي الله عنهم، وإنما هذه عقبة على طريق تبوك، اجتمع المنافقون فيها للغدر برسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك فعصمه الله منهم. اهـ.
قلت: يزيده وضوحا الرواية التالية:
আবু তুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আকাবার অধিবাসীদের একজন লোক এবং হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে সাধারণ মানুষের মধ্যে যেরূপ হয়ে থাকে, সেরূপ কিছু মনোমালিন্য ছিল। অতঃপর (ওই লোকটি হুযাইফাকে) বলল: আমি আল্লাহর কসম দিয়ে আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি, আকাবার সাথীগণ কতজন ছিল? তিনি (হুযাইফা) বললেন। তখন লোকেরা তাঁকে বলল: সে যখন তোমাকে জিজ্ঞাসা করেছে, তখন তাকে খবর দাও। তিনি বললেন: আমরা শুনতাম যে তারা ছিল চৌদ্দ জন। তবে যদি আপনি তাদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে থাকেন, তবে তারা পনেরো জন ছিল। আর আমি আল্লাহর কসম করে সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তাদের বারো জন ইহকালে ও সাক্ষীগণ দণ্ডায়মান হওয়ার দিনে (কিয়ামতের দিন) আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিরুদ্ধে যুদ্ধরত ছিল। আর তিনজনের ওজর (আপত্তি) ছিল। তারা বলেছিল: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আহ্বানকারীর কথা শুনতে পাইনি এবং লোকেরা কী করতে চেয়েছিল, তা আমরা জানতামও না। আর (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক হাররাহ নামক স্থানে ছিলেন এবং পথ চলছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই পানি কম, সুতরাং কেউ যেন আমার আগে সেখানে না যায়।" কিন্তু তিনি কিছু লোককে পেলেন, যারা তাঁর আগেই সেখানে চলে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি সেই দিন তাদের অভিসম্পাত করেছিলেন।
9100 - عن أبي الطفيل قال: لما أقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوة تبوك أمر مناديا فنادى: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ العقبة، فلا يأخذها أحد. فبينما رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوده حذيفة، ويسوق به عمار إذ أقبل رهط متلثمون على الرواحل، غشوا عمارا وهو يسوق برسول الله صلى الله عليه وسلم وأقبل عمار يضرب وجوه الرواحل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لحذيفة:"قد، قد" حتى هبط رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما هبط رسول الله صلى الله عليه وسلم نزل ورجع عمار، فقال:"يا عمار، هل عرفت القوم؟" فقال: قد عرف عامة الرواحل والقوم متلثمون، قال:"هل تدري ما أرادوا؟" قال: الله ورسوله أعلم، قال:"أرادوا أن ينفروا برسول الله صلى الله عليه وسلم فيطرحوه" قال: فسار عمار رضي الله عنه رجلا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: نشدتك بالله كم تعلم كان أصحاب العقبة؟ فقال: أربعة عشر، فقال: إن كنت فيهم فقد كانوا خمسة عشر، فعذر رسول الله صلى الله عليه وسلم منهم ثلاثة، قالوا: والله ما سمعنا منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما علمنا ما أراد القوم، فقال عمار: أشهد أن الاثني عشر الباقين منهم حرب لله ولرسوله في الحياة الدنيا ويوم يقوم الأشهاد.
قال أبو الوليد: وذكر أبو الطفيل في تلك الغزوة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال للناس وذكر له أن في الماء قلة، فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم مناديا فنادى: أن لا يرد الماء أحد قبل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فورده رسول الله صلى الله عليه وسلم فوجد رهطا وردوه قبله، فلعنهم رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ.
حسن: رواه أحمد (23792) عن يزيد، أخبرنا الوليد - يعني ابن عبد الله بن جميع، عن أبي الطفيل، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل الوليد بن عبد الله بن جميع، فإنه حسن الحديث.
আবুত তুফায়ল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবুক যুদ্ধ থেকে ফিরছিলেন, তখন তিনি একজন ঘোষককে আদেশ করলেন, সে যেন ঘোষণা করে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল-আক্বাবা (গিরিপথ) ধরেছেন, তাই কেউ যেন সে পথ অবলম্বন না করে।
এমন সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পথ দেখাচ্ছিলেন এবং আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বাহনটি চালাচ্ছিলেন। হঠাৎ উটের ওপর আরোহিত একদল মুখোশধারী লোক এগিয়ে এলো এবং তারা আম্মারকে ঘিরে ফেলল, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বাহনটি চালাচ্ছিলেন। তখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত বাহনগুলোর মুখে আঘাত করতে লাগলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুযাইফাকে বললেন: "যথেষ্ট হয়েছে, যথেষ্ট হয়েছে।" অবশেষে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিচে অবতরণ করলেন।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিচে নামার পর আম্মার ফিরে এলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "হে আম্মার, তুমি কি লোকগুলোকে চিনতে পেরেছ?" আম্মার বললেন: আমি বেশিরভাগ বাহনগুলোকে চিনতে পেরেছি, কিন্তু লোকগুলো ছিল মুখোশধারী। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি জানো তারা কী চেয়েছিল?" আম্মার বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: "তারা চেয়েছিল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ভয় পাইয়ে দিয়ে (বা ধাক্কা দিয়ে) নিচে ফেলে দিতে।"
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের একজন সাহাবীকে জিজ্ঞেস করলেন: আমি তোমাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তুমি কি জানো আক্বাবার সাথীরা কতজন ছিল? তিনি বললেন: চৌদ্দ জন। আম্মার বললেন: যদি তুমি তাদের মধ্যে না থাকতে, তবে তারা পনেরো জন ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের মধ্যে তিনজনকে অব্যাহতি দিলেন, যারা বলেছিলেন: আল্লাহর কসম! আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ঘোষকের ডাক শুনিনি এবং আমরা জানতাম না যে লোকগুলো কী চেয়েছিল।
আম্মার বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে অবশিষ্ট বারো জন ইহকালীন জীবনে এবং সাক্ষীরা যখন দাঁড়াবে (বিচার দিবসে), তখন তারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরুদ্ধে যুদ্ধকারী।
আবুল ওয়ালীদ বলেন: আবুত তুফায়ল ঐ যুদ্ধে (তাবুক) উল্লেখ করেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকজনকে বললেন—এবং তাঁকে বলা হয়েছিল যে পানিতে ঘাটতি আছে—তাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন ঘোষককে আদেশ করলেন, সে যেন ঘোষণা করে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আগে কেউ যেন পানির ঘাটে না যায়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন সেখানে গেলেন, তখন একদল লোককে দেখতে পেলেন যারা তাঁর আগেই সেখানে গিয়েছিল। তাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন তাদেরকে অভিশাপ দিলেন।