আল-জামি` আল-কামিল
9668 - عن عبد الله بن زمعة بن الأسود بن المطلب بن أسد قال: لما اسْتُعِزَّ برسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا عنده في نفر من المسلمين، قال: دعا بلال للصلاة، فقال:"مروا من يصلي بالناس" قال: فخرجت فإذا عمر في الناس، وكان أبو بكر غائبا، فقال: قم يا عمر، فصل بالناس. قال: فقام، فلما كَبَّر عمر سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم صوته، وكان عمر رجلا مِجْهرا، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فأين أبو بكر؟ يأبى الله ذلك والمسلمون، يأبى الله ذلك والمسلمون" قال: فبعث إلى أبي بكر، فجاء بعد أن صلى عمر تلك الصلاة، فصلى بالناس.
قال: وقال عبد الله بن زمعة: قال لي عمر: ويحك، ماذا صنعت بي يا ابن زمعة، والله ما ظننت حين أمرتني إلا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرك بذلك، ولولا ذلك ما
صليت بالناس. قال: قلت: والله! ما أمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم ولكن حين لم أر أبا بكر رأيتك أحق من حضر بالصلاة.
حسن: رواه أبو داود (4660)، وأحمد (18906) كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، حدثني الزهري، حدثني عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن زمعة قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرَّح.
وقوله:"اسْتُعِزَّ" يقال: استعَزَّ بالمريض إذا غلب على نفسه من شدة المرض.
وصلاة عمر بالناس لعلها كانت في أول الأمر وقت غياب أبى بكر من ذلك المجلس كما دل عليه الحديث، ثم صلى أبو بكر بالناس باستمرار.
আবদুল্লাহ ইবনু যামআ ইবনু আসওয়াদ ইবনুল মুত্তালিব ইবনু আসাদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অসুস্থতা তীব্র হলো এবং আমি মুসলিমদের একটি দলের সঙ্গে তাঁর কাছে ছিলাম, তখন তিনি সালাতের জন্য বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং বললেন: "লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করার জন্য কাউকে নির্দেশ দাও।"
তিনি বলেন: আমি বের হলাম। তখন দেখলাম উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের মধ্যে আছেন। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন অনুপস্থিত ছিলেন। আমি বললাম: হে উমার, উঠুন এবং লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করুন।
তিনি বলেন: তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন। যখন তিনি তাকবীর দিলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন উচ্চস্বরে তেলাওয়াতকারী ব্যক্তি।
তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আবূ বকর কোথায়? আল্লাহ এবং মুসলিমগণ এটা (উমারের ইমামতি) পছন্দ করেন না। আল্লাহ এবং মুসলিমগণ এটা পছন্দ করেন না।"
তিনি বলেন: এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠানো হলো। তিনি আসলেন যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই সালাত শেষ করে ফেলেছেন। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন।
আবদুল্লাহ ইবনু যামআ বলেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন, "আফসোস তোমার জন্য! ইবনু যামআ, তুমি আমার সাথে কী করলে? আল্লাহর কসম! যখন তুমি আমাকে নির্দেশ দিয়েছিলে, আমি শুধু এটাই ভেবেছিলাম যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাকে এই নির্দেশ দিয়েছেন। তা না হলে আমি লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করতাম না।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: "আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে কোনো নির্দেশ দেননি। তবে যখন আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম না, তখন উপস্থিত সকলের মধ্যে আমি আপনাকেই সালাতের জন্য সবচেয়ে উপযুক্ত মনে করেছিলাম।"
9669 - عن سهل بن سعد قال: كان قتال بين بني عمرو بن عوف، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فأتاهم ليصلح بينهم بعد الظهر، فقال لبلال:"إن حضرت صلاة العصر ولم آتك فمر أبا بكر فليصل بالناس" … الحديث بطوله.
صحيح: رواه أبو داود (941)، والنسائي (793)، وأحمد (22816)، وصحّحه ابن خزيمة (853)، وابن حبان (2261) كلهم من طريق حماد بن زيد، حدثنا أبو حازم، عن سهل بن سعد فذكره. وإسناده صحيح.
والحديث في قصة إمامة أبي بكر لصلاة العصر عند غياب النبي صلى الله عليه وسلم رواه البخاري في الأحكام (7190) من طريق حماد بن زيد، عن أبي حازم به.
ورواه مسلم في الصلاة (421) من طرق أخرى عن أبي حازم به، لكن ليس عندهما الموضع الشاهد، وهو قوله:"إن حضرت صلاة العصر ولم آتك فمر أبا بكر فليصل بالناس".
وروي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا ينبغي لقوم فيهم أبو بكر أن يؤمَّهم غيره".
رواه الترمذي (3673) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفي، حدثنا أحمد بن بشير، عن عيسى بن ميمون الأنصاري، عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته. وقال:"هذا حديث غريب" وهو كما قال: فإن عيسى بن ميمون الأنصاري ضعيف عند جمهور أهل العلم.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বানূ 'আমর ইবনু আওফের মধ্যে ঝগড়া চলছিল। এই খবর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছালো। তাই তিনি যোহরের পর তাদের মধ্যে মীমাংসা করার জন্য তাদের কাছে গেলেন। তিনি বেলালকে বললেন, "যদি আসরের নামাযের সময় এসে যায় এবং আমি তোমার কাছে না ফিরি, তাহলে তুমি আবূ বকরকে লোকদেরকে নিয়ে নামায পড়াতে বলো।" ...হাদিসটি সম্পূর্ণ দীর্ঘ।
9670 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أصبح منكم اليوم صائما؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن تبع منكم اليوم جنازة؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن أطعم منكم اليوم مسكينا؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن عاد منكم اليوم مريضا؟" قال أبو بكر: أنا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اجتمعن في امريء إلا دخل الجنة".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (1028) عن محمد بن أبي عمر المكي، ثنا مروان بن
معاوية الفزاري، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم الأشجعي، عن أبي هريرة قال: فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে আজ কে রোযা অবস্থায় ভোর করেছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তিনি (নবী) বললেন: "তোমাদের মধ্যে আজ কে জানাযায় শরীক হয়েছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তিনি (নবী) বললেন: "তোমাদের মধ্যে আজ কে কোনো মিসকীনকে খাদ্য দান করেছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তিনি (নবী) বললেন: "তোমাদের মধ্যে আজ কে কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে গিয়েছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই আমলগুলো কোনো ব্যক্তির মধ্যে একত্রিত হলে সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
9671 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أنفق زوجين من شيء من الأشياء في سبيل الله دعي من أبواب -يعني: الجنة- يا عبد الله! هذا خير، فمن كان من أهل الصلاة دعي من باب الصلاة، ومن كان من أهل الجهاد دعي من باب الجهاد، ومن كان من أهل الصدقة دعي من باب الصدقة، ومن كان من أهل الصيام دعي من باب الصيام، وباب الريان"، فقال أبو بكر: ما على هذا الذي يدعى من تلك الأبواب من ضرورة، وقال: هل يدعى منها كلها أحد يا رسول الله؟ قال:"نعم، وأرجو أن تكون منهم يا أبا بكر".
متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3666)، ومسلم في الزكاة (1027 - 85) كلاهما من طرق، عن الزهري قال: أخبرني حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أن أبا هريرة، قال: فذكره. وهذا لفظ البخاري، وسياق مسلم نحوه.
وفي لفظ لهما:"من أنفق زوجين في سبيل الله دعاه خزنة الجنة، كل خزنة بابٍ: أي فُل، هَلُمَّ" فقال أبو بكر: يا رسول الله، ذلك الذي لا تَوَى عليه، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني لأرجو أن تكون منهم".
رواه مسلم في الزكاة (1027 - 86) وهذا لفظه، والبخاري في الجهاد (2841) كلاهما من طرق عن شيبان بن عبد الرحمن، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أنه سمع أبا هريرة يقول: فذكره.
وقوله:"لا توى" أي لا هلاك.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো কিছুর দুটি জোড়া (বা অংশ) খরচ করবে, তাকে জান্নাতের দরজাগুলো থেকে ডাকা হবে—‘হে আল্লাহর বান্দা! এটা উত্তম।’ অতএব, যে সালাত আদায়কারীদের অন্তর্ভুক্ত, তাকে সালাতের দরজা থেকে ডাকা হবে। যে জিহাদকারীদের অন্তর্ভুক্ত, তাকে জিহাদের দরজা থেকে ডাকা হবে। যে সদকা প্রদানকারীদের অন্তর্ভুক্ত, তাকে সদকার দরজা থেকে ডাকা হবে। আর যে সিয়াম পালনকারীদের অন্তর্ভুক্ত, তাকে সিয়ামের দরজা ও ‘রাইয়ান’ দরজা থেকে ডাকা হবে।" তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, যে ব্যক্তিকে এই দরজাগুলো থেকে ডাকা হবে, তার কোনো প্রয়োজন (বা ক্ষতি) নেই। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সকল দরজা থেকেই কি কাউকে ডাকা হবে?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এবং আমি আশা করি, হে আবূ বাকর! আপনি তাদের মধ্যে গণ্য হবেন।"
9672 - عن عائشة قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه:"ادعي لي أبا بكر وأخاك حتى أكتب كتابا، فإني أخاف أن يتمنى متمنٍّ، ويقول قائل: أنا أولى، ويأبى الله والمؤمنون إلا أبا بكر".
متفق عليه: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2387) عن عبيد الله بن سعيد، ثنا يزيد بن هارون، أخبرنا إبراهيم بن سعد، ثنا صالح بن كيسان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: فذكرته.
ورواه البخاري في الأحكام (7217) عن يحيى بن يحيى، أنا سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، سمعت القاسم بن محمد قال: قالت عائشة: وارأساه، فذكرته في حديث طويل، وفي آخره نحو ما ساقه مسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর অসুস্থতার সময় আমাকে বললেন: "আবু বকরকে এবং তোমার ভাইকে আমার কাছে ডেকে আনো, যেন আমি একটি লিপি লিখে দিতে পারি। কারণ আমি আশঙ্কা করছি যে, কোনো আকাঙ্ক্ষাকারী যেন আকাঙ্ক্ষা না করে এবং কোনো বক্তা যেন না বলে যে: আমিই (খিলাফতের জন্য) অধিক যোগ্য। অথচ আল্লাহ এবং মুমিনগণ আবু বকর ছাড়া অন্য কাউকে অস্বীকার করবেন (বা গ্রহণ করবেন না)।"
9673 - عن عائشة قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره … وفيه قصة ضياع عقد لعائشة وبقاء الناس من أجله بدون ماء ولا وضوء، وتوبيخ أبي بكر لعائشة وطعنه إياها، فأنزل الله آية التيمم، فتيمموا، فقال أسيد بن حضير: ما هي بأول
بركتكم يا آل أبي بكر، قالت: فبعثنا البعير الذي كنت عليه فأصبنا العقد تحته.
متفق عليه: رواه مالك في كتاب الطهارة (120) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. ورواه البخاري في فضائل الصحابة (3672) ومسلم في الطهارة (367 - 108) كلاهما من طريق مالك به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে তাঁর কোনো এক সফরে বের হলাম। ...এবং এতে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হার হারানোর ঘটনা বর্ণিত আছে, যার কারণে লোকেরা পানি ও উযূ ছাড়া অবস্থান করতে বাধ্য হয়। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ভর্ৎসনা করেন এবং তাঁকে (হাতে) খোঁচা দেন। তখন আল্লাহ তা'আলা তায়াম্মুমের আয়াত নাযিল করলেন। ফলে তারা তায়াম্মুম করলেন। তখন উসায়দ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ বকরের পরিবার! এটি তোমাদের প্রথম বরকত নয়। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর আমরা যে উটের পিঠে আমি ছিলাম সেটিকে উঠালাম এবং তার নিচেই হারটি খুঁজে পেলাম।
9674 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من جرَّ ثوبه خيلاء لم ينظر الله إليه يوم القيامة"، فقال أبو بكر: إن أحد شقي ثوبي يسترخي، إلا أن أتعاهد ذلك منه؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنك لست تصنع ذلك خيلاء". قال موسى: فقلت لسالم: أذكر عبد الله: من جرَّ إزاره؟ قال: لم أسمعه ذكر إلا ثوبه.
متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3665)، ومسلم في اللباس (2085 - 44) كلاهما من طريق سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر قال: فذكره. وهذا لفظ البخاري، وسياق مسلم مختصر، ليس فيه قصة أبي بكر الصديق.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অহংকারবশত তার কাপড় (জমিনে) টেনে চলে, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তার দিকে তাকাবেন না।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমার কাপড়ের এক কিনারা ঝুলে যায়, যদি না আমি তার প্রতি খেয়াল রাখি?" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তা অহংকারবশত করো না।"
9675 - عن أسلم قال: سمعت عمر بن الخطاب رضي الله عنه يقول: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوما أن نتصدق فوافق ذلك مالا عندي، فقلت: اليوم أسبق أبا بكر إن سبقته يوما. فجئت بنصف مالي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أبقيت لأهلك؟" قلت: مثله. قال: وأتى أبو بكر بكل ما عنده، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أبقيت لأهلك؟" قال: أبقيت لهم الله ورسوله. قلت لا أسابقك إلى شيء أبدا.
حسن: رواه أبو داود (1678)، والترمذي (3675) كلاهما من حديث الفضل بن دكين، حدثنا هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه فذكره.
قال الترمذي: حسن صحيح.
ومن هذا الوجه رواه الحاكم (1/ 414) وقال: صحيح على شرط مسلم.
وإسناده حسن من أجل الكلام في هشام بن سعد المدني، وهو وإن كان من رجال مسلم فقد تكلم فيه ابن معين والنسائي وغيرهما، ومشّاه الآخرون، وهو حسن الحديث.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সাদকা (দান) করার জন্য আদেশ করলেন। আমার কাছে তখন কিছু সম্পদ ছিল। আমি বললাম: যদি কোনো দিন আবূ বকরকে ছাড়িয়ে যেতে পারি, তবে আজকেই পারবো। তাই আমি আমার অর্ধেক সম্পদ নিয়ে আসলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার পরিবারের জন্য কী রেখেছো?" আমি বললাম: তার সমান (অর্ধেক) রেখে এসেছি। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে যা কিছু ছিল, সব নিয়ে আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তোমার পরিবারের জন্য কী রেখেছো?" তিনি বললেন: তাদের জন্য আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলকে রেখে এসেছি। (এটা দেখে) আমি বললাম: আমি আর কখনও কোনো বিষয়ে আপনার সঙ্গে পাল্লা দেব না।
9676 - عن عبد الله بن الزبير قال: كان اسم أبي بكر عبد الله بن عثمان، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أنت عتيق الله من النار" فسُمِّيَ عتيقا.
حسن: رواه البزار (2213)، والطبراني في الكبير (1/ 5)، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (17، 8)، وصحّحه ابن حبان (6864) كلهم من طريق حامد بن يحيى البلخي، عن سفيان ابن عيينة، عن زياد بن سعد (هو الخراساني)، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه فذكره.
وذكره الهيثمي في المجمع (9/ 40) فقال:"رواه البزار والطبراني بنحوه ورجاله ثقات".
قال البزار:"وهذا الحديث لا نعلم أحدا رواه بهذا الإسناد إلا حامد عن ابن عيينة".
قلت: إسناده حسن من أجل حامد بن يحيى البلخي، فإنه صدوق، كما قال ابن أبي حاتم.
وأما أبو حاتم فقال:"هذا حديث باطل" العلل (2668). لعله لتفرد حامد بن البلخي عن ابن عيينة.
وفي معناه ما روي عن عائشة أم المؤمنين قالت: إني لفي بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه بالفناء، وبيني وبينهم الستر، إذ أقبل أبو بكر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سرَّه أن ينظر إلى عتيق من النار فلينظر إلى هذا".
رواه سعيد بن منصور -كما في الاستيعاب- حدثنا صالح بن موسى، حدثنا موسى بن إسحاق، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أم المؤمنين فذكرته.
وصالح بن موسى بن إسحاق بن طلحة التيمي الكوفي، ضَعَّفَه ابن معين وأبو حاتم وابن حبان وغيرهم.
ورواه أبو يعلى (4899) عن سويد بن سعيد، عن صالح بن موسى، عن معاوية بن إسحاق، عن عائشة بنت طلحة بإسناده فذكرته، وجاء فيه:"وإن اسمه الذي سماه أهله لعبد الله بن عثمان، فغلب عليه اسم عتيق".
وكذلك لا يصح ما روي عنها قالت: إن أبا بكر دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أنت عتيق الله من النار" فيومئذ سمي عتيقا.
رواه الترمذي (3679)، والطبراني في الكبير (1/ 6) كلاهما من طريق إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عمه إسحاق بن طلحه، عن عائشة فذكرته.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب" أي: ضعيف.
وهو كذلك، فإن إسحاق بن يحيى بن طلحة ضعيف باتفاق أهل العلم. وقد اضطرب في إسناد هذا الحديث.
فمرة قال: عن عمه إسحاق بن طلحة كما هنا.
ومرة قال: عن عمه موسى بن طلحة كما عند الحاكم (2/ 415).
ومرة قال: عن عمه عيسى بن طلحة كما عند الحاكم أيضا (3/ 276).
ومرة قال: عن معاوية بن إسحاق، عن أبيه، عن عائشة كما في معرفة الصحابة لأبي نعيم (60).
ورواه الطبراني في الكبير (1/ 5) وابن منده -كما في الإصابة- بإسناده عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، قال: سألنا عائشة رضي الله عنها عن اسم أبي بكر، فقالت: عبد الله. فقلت:
إنهم يقولون: عتيق. فقالت: إن أبا قحافة كان له ثلاثة، فسمى واحدا عتيقا، ومعتِقا، ومعتَقا، هذا لفظ الطبراني، ولفظ ابن منده: فسمى واحدا عتيقا، والثاني معتقا، والثالث عُتَيقا.
وفي إسناده ابن لهيعة مشهور بسوء حفظه. وبه أعله أيضا الحافظ ابن حجر.
ورواه أيضا بإسناده عن الليث بن سعد أنه قال: إنما سمي أبو بكر رضي الله عنه عتيقا لجمال وجهه، واسمه عبد الله بن عثمان.
قال الهيثمي:"رجاله ثقات".
وكذلك رواه عن أبي حفص عمرو بن علي الفلاس.
قال الهيثمي في المجمع (9/ 41):"وإسناده جيد حسن".
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম ছিল আব্দুল্লাহ ইবনু উসমান। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি আল্লাহর পক্ষ থেকে জাহান্নামের আগুন থেকে আযাদ (মুক্ত)।" ফলে তাঁকে 'আতীক' নামে ডাকা হতে লাগল।
9677 - عن ابن عباس قال: إن أبا بكر رضي الله عنه خرج وعمر رضي الله عنه يكلم الناس، فقال: اجلس، فأبى، فقال: اجلس، فأبى، فتشهد أبو بكر رضي الله عنه، فمال إليه الناس وتركوا عمر، فقال: أما بعد، فمن كان منكم يعبد محمدا صلى الله عليه وسلم فإن محمدا صلى الله عليه وسلم قد مات، ومن كان يعبد الله فإن الله حي لا يموت، قال الله تعالى: {وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ} إلى {الشَّاكِرِينَ} [آل عمران: 144] والله لكأن الناس لم يكونوا يعلمون أن الله أنزلها حتى تلاها أبو بكر رضي الله عنه، فتلقاها منه الناس، فما يُسمع بشر إلا يتلوها.
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1241، 1242) عن بشر بن محمد، أنا عبد الله، أخبرني معمر ويونس، عن الزهري، أخبرني أبو سلمة، قال: أخبرني ابن عباس أن أبا بكر فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন, আর তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের সাথে কথা বলছিলেন। তিনি (আবূ বাকর) বললেন: বসো। কিন্তু তিনি (উমার) অস্বীকার করলেন। তিনি আবার বললেন: বসো। কিন্তু তিনি আবার অস্বীকার করলেন। এরপর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (খুতবার শুরুতে) শাহাদাহ পাঠ করলেন। ফলে লোকেরা উমারকে ছেড়ে আবূ বাকরের দিকে মনোনিবেশ করল। তিনি বললেন: আম্মা বা'দ (অতঃপর), তোমাদের মধ্যে যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইবাদত করতে, তারা জেনে রাখো যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেছেন। আর যারা আল্লাহর ইবাদত করতে, তারা জেনে রাখো যে আল্লাহ চিরঞ্জীব, তিনি কখনো মরবেন না। আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {আর মুহাম্মাদ একজন রাসূল ছাড়া আর কিছু নন...} থেকে শুরু করে { ...শুকরিয়া আদায়কারীদের জন্য} [সূরা আলে ইমরান: ১৪৪]। আল্লাহর কসম! আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন, তখন যেন লোকেরা জানতই না যে আল্লাহ তা নাযিল করেছেন। ফলে লোকেরা তার কাছ থেকে আয়াতটি গ্রহণ করল, অতঃপর যে কোনো মানুষকে শোনা যেত, সে-ই আয়াতটি তিলাওয়াত করছিল।
9678 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مات وأبو بكر بالسُّنح … فذكرت الحديث، وفيه: ثم خرج فقال: أيها الحالف، على رسلك، فلما تكلم أبو بكر جلس عمر، فحمد الله أبو بكر وأثنى عليه، وقال: ألا من كان يعبد محمدا صلى الله عليه وسلم فإن محمدا قد مات، ومن كان يعبد الله فإن الله حي لا يموت، وقال: {إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُمْ مَيِّتُونَ} [الزمر: 30] وقال: {وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِنْ مَاتَ أَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ وَمَنْ يَنْقَلِبْ عَلَى عَقِبَيْهِ فَلَنْ يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ} [آل عمران: 144] قال: فنشج الناس يبكون، قال: واجتمعت الأنصار إلى سعد بن عبادة في سقيفة بني ساعدة، فقالوا: منا أمير ومنكم أمير، فذهب إليهم أبو بكر وعمر بن الخطاب وأبو عبيدة بن الجراح، فذهب عمر يتكلم، فأسكته أبو بكر، وكان عمر يقول: والله! ما أردت بذلك إلا أني قد هيأت كلاما قد أعجبني، خشيت أن لا يبلغه أبو بكر، ثم تكلم أبو بكر فتكلم أبلغ الناس، فقال في كلامه: نحن الأمراء وأنتم الوزراء، فقال حباب بن المنذر: لا والله! لا نفعل، منا أمير ومنكم أمير، فقال أبو بكر: لا ولكنا الأمراء وأنتم الوزراء، هم أوسط العرب دارا، وأعربهم أحسابا، فبايعوا عمر أو أبا عبيدة، فقال عمر: بل نبايعك أنت، فأنت سيدنا، وخيرنا، وأحبنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخذ عمر بيده، فبايعه وبايعه الناس. فقال قائل: قتلتم سعد بن عبادة، فقال عمر: قتله الله.
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3667، 3668) عن إسماعيل بن عبد الله، ثنا سليمان بن بلال، عن هشام بن عروة، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.
بويع له بالخلافة في اليوم الذي مات فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم في سقيفة بني ساعدة، ثم بويع بيعة العامة يوم الثلاثاء من غد ذلك اليوم، وتخلف عن بيعته سعد بن عبادة وطائفة من الخزرج، وفرقة من قريش، ثم بايعوه بعد غير سعد.
وقيل: إن عليا لم يبايعه إلا بعد موت فاطمة، ثم لم يزل سامعا مطيعا له يثني عليه ويفضله. وكان نقش خاتمه: نعم القادر الله، فيما ذكر الزبير بن بكار، وقال غيره: كان نقش خاتمه: عبد ذليل لرب جليل. ذكر هذا كله الحافظ ابن عبد البر في"الاستيعاب".
وكانت وفاته يوم الاثنين في جمادى الأولى سنة ثلاث عشرة من الهجرة، وهو ابن ثلاث وستين سنة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইন্তিকাল করেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সুনহ নামক স্থানে ছিলেন... (হাদীসের বাকি অংশ উল্লেখ করে)। এতে ছিল যে, তিনি (আবূ বকর) বের হয়ে বললেন: হে শপথকারী (উমর), তুমি শান্ত হও। যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসে গেলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন এবং বললেন: জেনে রাখো, যারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইবাদত করত, তারা জেনে রাখুক, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেছেন। আর যারা আল্লাহর ইবাদত করত, তারা জেনে রাখুক, আল্লাহ চিরঞ্জীব, তিনি কখনো মরবেন না। তিনি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয়ই তুমিও মরণশীল এবং তারা সবাই মরণশীল।" [সূরা যুমার: ৩০]। তিনি আরো তিলাওয়াত করলেন: "মুহাম্মাদ একজন রাসূল মাত্র; তার পূর্বে বহু রাসূল গত হয়েছেন। যদি তিনি মারা যান অথবা নিহত হন, তবে কি তোমরা পশ্চাতে ফিরে যাবে? কেউ যদি পশ্চাতে ফিরে যায়, সে আল্লাহর কোনো ক্ষতি করতে পারবে না। আর যারা কৃতজ্ঞ, আল্লাহ তাদের অতি শীঘ্রই পুরস্কার দেবেন।" [সূরা আলে ইমরান: ১৪৪]।
বর্ণনাকারী বলেন: এতে লোকজন কাঁদতে কাঁদতে আওয়াজ তুলে ফেলল। বর্ণনাকারী বলেন: এদিকে আনসারগণ বানূ সাঈদার ছাক্বীফায় সা'দ ইব্নু উবাদার কাছে সমবেত হলেন এবং বললেন: আমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে এবং তোমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে। তখন আবূ বকর, উমর ইবনুল খাত্তাব এবং আবূ উবাইদাহ ইব্নুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের কাছে গেলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বলতে শুরু করতে চাইলে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে থামিয়ে দিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আল্লাহর কসম! আমি এর দ্বারা (কথা বলার চেষ্টা দ্বারা) উদ্দেশ্য করেছিলাম যে, আমি আমার জন্য পছন্দনীয় একটি বক্তব্য তৈরি করে রেখেছিলাম; আমার ভয় ছিল আবূ বকর হয়তো সেটি বলতে পারবেন না। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন এবং তিনি মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বাগ্মী ব্যক্তি হিসেবে কথা বললেন। তিনি তাঁর বক্তব্যে বললেন: আমরা হলাম আমীর (শাসক) এবং তোমরা হলে উযীর (উপদেষ্টা)। তখন হুবাব ইব্নুল মুনযির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা এটা করব না। আমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে এবং তোমাদের মধ্য থেকে একজন আমীর হবে। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: না, বরং আমরাই আমীর হব এবং তোমরাই উযীর হবে। তারা (মুহাজিরগণ) হলো গোত্রের দিক থেকে আরবের মধ্যমণি এবং বংশমর্যাদার দিক থেকে আরবদের মধ্যে সবচেয়ে সম্মানিত। সুতরাং তোমরা হয় উমর অথবা আবূ উবাইদার হাতে বাইয়াত করো। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরং আমরা আপনার হাতেই বাইয়াত করব। কারণ আপনিই আমাদের নেতা, আমাদের শ্রেষ্ঠ এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমাদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়জন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাত ধরলেন এবং তাঁর হাতে বাইয়াত করলেন, আর লোকেরাও বাইয়াত করলেন। একজন বলল: তোমরা সা'দ ইব্নু উবাদাহকে হত্যা করেছ। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহই তাকে হত্যা করেছেন।
সহীহ: এটি বুখারী (৩৬৬৭, ৩৬৬৮) সাহাবীদের ফযীলত অধ্যায়ে বর্ণনা করেছেন ইসমাঈল ইব্ন আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি সুলাইমান ইব্ন বিলালের সূত্রে, তিনি হিশাম ইব্ন উরওয়ার সূত্রে, তিনি উরওয়া ইব্ন যুবাইরের সূত্রে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি উল্লেখ করেছেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তিকালের দিনই বানূ সাঈদার ছাক্বীফায় তাঁর খিলাফতের জন্য বাইয়াত গ্রহণ করা হয়। এরপর পরের দিন মঙ্গলবার সাধারণ মানুষের পক্ষ থেকে বাইয়াত গ্রহণ করা হয়। সা'দ ইব্নু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), খাযরাজ গোত্রের একটি দল এবং কুরাইশের একটি অংশ তাঁর বাইয়াত থেকে বিরত থাকেন। এরপর সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত বাকি সবাই তাঁর হাতে বাইয়াত করেন।
বলা হয় যে, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইন্তিকালের আগে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাতে বাইয়াত করেননি। এরপরও তিনি (আলী) সর্বদা তাঁর অনুগত ও বাধ্য ছিলেন, তাঁর প্রশংসা করতেন এবং তাঁকে শ্রেষ্ঠত্ব দিতেন। তাঁর (আবূ বকর) আংটির নকশা ছিল: 'নিয়ন্তা আল্লাহই শ্রেষ্ঠ' (নিয়’মাল ক্বাদিরু আল্লাহ) – যেমনটি যুবাইর ইব্নু বাক্কার উল্লেখ করেছেন। অন্যরা বলেন, তাঁর আংটির নকশা ছিল: 'মহামহিম রবের জন্য এক বিনীত বান্দা' (আবদুন যালীলুন লিরাব্বিন জালীল)। হাফিয ইব্নু আব্দুল বার্র 'আল-ইসতিয়াব' গ্রন্থে এ সব কিছু উল্লেখ করেছেন।
হিজরী ত্রয়োদশ সনে জুমাদাল ঊলা মাসের সোমবার তিনি তেষট্টি বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন।
9679 - عن طارق بن شهاب قال: جاء وفد بزاخة من أسدٍ وغطفان إلى أبي بكر يسألونه
الصلح، فخيَّرهم بين الحرب المجلية والسلم المخزية، فقالوا: هذه المجلية قد عرفناها، فما المخزية؟ قال: ننزع منكم الحلقة والكراع، ونغنم ما أصبنا منكم، وتردون علينا ما أصبتم منا، وتدون لنا قتلانا، وتكون قتلاكم في النار، وتتركون أقوامًا يتبعون أذناب الإبل حتى يُرِيَ الله خليفة رسول الله صلى الله عليه وسلم والمهاجرين أمرًا يعذرونكم به، فعرض أبو بكرٍ ما قال على القوم، فقام عمر بن الخطاب فقال: قد رأيت رأيًا وسنشير عليك، فأما ما ذكرت من الحرب المجلية والسلم المخزية فنعم ما ذكرت، وما ذكرت أن نغنم ما أصبنا منكم وتردون ما أصبتم منا فنعم ما ذكرت، وأما ما ذكرت: تدون قتلانا وتكون قتلاكم في النار، فإن قتلانا قاتلت فقتلت على أمر الله، أجورها على الله، ليس لها دياتٌ، فتتابع القوم على ما قال عمر.
صحيح: رواه أبو بكر البرقاني في كتابه"المخرَّج على الصحيحين" كما في كتاب الجمع بين الصحيحين للحميدي - بإسناده عن مسدد، عن يحيى القطان، عن سفيان الثوري، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره.
ورواه البخاري في الأحكام (7221) عن مسدد به مختصرا، وهو قول أبي بكر لوفد بزاخة:"تتبعون أذناب الإبل حتى يري الله خليفة نبيه صلى الله عليه وسلم والمهاجرين أمرا يعذرونكم به".
أخرج أبو داود في"الزهد" (35) بإسناد صحيح من طريق هشام بن عروة قال: أخبرني أبي: أنَّ أبا بكر أسلم وله أربعون ألف درهم.
قال عروة: فأخبرتني عائشة قالت: توفي أبو بكر ولم يترك دينارا ولا درهما. ومناقبه كثيرة جدا، وترجمته في تاريخ دمشق قدر مجلدة.
তারিক ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আসাদ ও গাতফান গোত্রের বুযাখা এলাকার একটি প্রতিনিধিদল আপোষের সন্ধি চাইতে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলো। তিনি তাদের সামনে দুটি পথ রাখলেন: সর্বস্ব হারানো যুদ্ধ (আল-হারব আল-মাজলিয়াহ) অথবা অপমানজনক শান্তি (আস-সিলম আল-মাখযিয়াহ)। তারা বলল: সর্বস্ব হারানো যুদ্ধ (আল-মাজলিয়াহ) সম্পর্কে আমরা জেনেছি, কিন্তু অপমানজনক শান্তি (আল-মাখযিয়াহ) কী?
তিনি (আবূ বাকর) বললেন: আমরা তোমাদের কাছ থেকে বর্ম ও ঘোড়া কেড়ে নেব, তোমাদের কাছ থেকে আমরা যা কিছু লাভ করব (গনীমত হিসেবে) তা আমাদের থাকবে, আর তোমরা আমাদের কাছ থেকে যা কিছু লাভ করেছিলে তা আমাদের ফিরিয়ে দেবে। তোমরা আমাদের নিহতদের জন্য রক্তমূল্য (দিয়াহ) দেবে, আর তোমাদের নিহতরা জাহান্নামের অধিবাসী হবে। এবং তোমরা এমন কিছু লোককে ছেড়ে দেবে যারা উটের পিছনে পিছনে ঘুরে বেড়াবে (অর্থাৎ চরম দারিদ্রে জীবন কাটাবে), যতক্ষণ না আল্লাহ্ রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলীফা ও মুহাজিরগণকে এমন কোনো সুযোগ দেন যার মাধ্যমে তারা তোমাদেরকে ক্ষমা করতে পারে।
এরপর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার বক্তব্য লোকদের কাছে পেশ করলেন। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: আমি একটি মতামত পেশ করছি এবং আমরা আপনাকে পরামর্শ দেব। আপনি সর্বস্ব হারানো যুদ্ধ ও অপমানজনক শান্তির যে কথা উল্লেখ করেছেন, তা আপনি উত্তমই বলেছেন। আর আপনি যে বলেছেন—আমরা তোমাদের কাছ থেকে যা পাব তা গনীমত হিসেবে নেব এবং তোমরা আমাদের কাছ থেকে যা লাভ করেছিলে তা ফিরিয়ে দেবে—এই কথাটিও আপনি উত্তমই বলেছেন। কিন্তু আপনি যা বলেছেন—তোমরা আমাদের নিহতদের জন্য দিয়াহ দেবে এবং তোমাদের নিহতরা জাহান্নামের অধিবাসী হবে—এই বিষয়ে (আমার ভিন্ন মত): নিশ্চয়ই আমাদের নিহতরা আল্লাহর নির্দেশে যুদ্ধ করেছে এবং শহীদ হয়েছে, তাদের প্রতিদান আল্লাহর কাছে রয়েছে, তাদের জন্য কোনো রক্তমূল্য (দিয়াহ) নেই।
এরপর লোকেরা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্যের সাথে একমত পোষণ করল।
9680 - عن أبي سعيد الخدري أنهم خرجوا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فنزلوا رفقاء، رفقة مع فلان، ورفقة مع فلان، قال: فنزلت في رفقة أبي بكر، فكان معنا أعرابي من أهل البادية، فنزلنا بأهل بيت من الأعراب، وفيهم امرأة حامل، فقال لها الأعرابي: أيسرك أن تلدي غلاما؟ إن أعطيتني شاة ولدت غلاما. فأعطته شاة، وسجع لها أساجيع، قال: فذبح الشاة، فلما جلس القوم يأكلون، قال رجل: أتدرون ما هذه الشاة؟ فأخبرهم، قال: فرأيت أبا بكر متبرزا مستنبلا متقيئا.
صحيح: رواه أحمد (11482) عن يحيى بن آدم، حدثنا زهير، عن الأسود بن قيس، عن نُبيح (هو ابن عبد الله العنزي)، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وإسناده صحيح.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে বের হলেন। তারা বিভিন্ন দলে বিভক্ত হয়ে পড়লেন, এক দল অমুকের সাথে, আরেক দল অমুকের সাথে। তিনি (আবূ সাঈদ) বলেন: আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দলে ছিলাম। আমাদের সাথে একজন বেদুইন (আরবী) ছিল। আমরা এক বেদুইন পরিবারের কাছে পৌঁছলাম, যেখানে একজন গর্ভবতী মহিলা ছিল। তখন সেই বেদুইন মহিলাটিকে বলল: তুমি কি চাও যে তোমার একটি পুত্র সন্তান জন্ম হোক? যদি তুমি আমাকে একটি বকরী দাও, তবে তোমার পুত্র সন্তান জন্ম হবে। অতঃপর মহিলাটি তাকে একটি বকরী দিল, আর সে তাকে কিছু ছন্দোবদ্ধ বাক্য (ঝাড়ফুঁকের মতো) বলল। তিনি বলেন, অতঃপর সে (বেদুইন) বকরীটি যবেহ করল। যখন লোকেরা খেতে বসল, তখন এক ব্যক্তি বলল: তোমরা কি জানো এই বকরীটা কীসের? তারপর সে তাদেরকে (ঘটনাটি) জানাল। তিনি বলেন, তখন আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম যে, তিনি উঠে গিয়ে পেট পরিষ্কার করতে এবং বমি করতে লাগলেন।
9681 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّهم! أعِزَّ الإسلام بأحب هذين الرجلين إليك بأبي جهل أو بعمر بن الخطاب". فكان أحبهما إليه عمر بن الخطاب.
حسن: رواه الترمذي (3681)، وأحمد (5696)، وصحّحه ابن حبان (6881) كلهم من طريق خارجة بن عبد الله الأنصاري، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب من حديث ابن عمر" وهو كذلك فإن خارجة ابن عبد الله الأنصاري مختلف فيه وقد توبع.
فقد رواه الحاكم (3/ 83) من طريق شبابة بن سوار، ثنا المبارك بن فضالة، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّهم أَيِّد الدين بعمر بن الخطاب".
قوله:"اللهم أَعِزَّ الإسلام بأحب هذين الرجلين" هذا كان في بداية الأمر، يعني أن النبي صلى الله عليه وسلم دعا للاثنين أولا ثم دعا في الأخير لعمر بن الخطاب وحده لأنه كان أحبهما إليه.
ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! এই দুইজন ব্যক্তির মধ্যে যিনি তোমার নিকট অধিক প্রিয়, তার মাধ্যমে ইসলামকে ইজ্জত দান করো: আবু জাহল অথবা উমার ইবনুল খাত্তাব।" অতঃপর তাদের দুজনের মধ্যে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর নিকট অধিক প্রিয় ছিলেন।
9682 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم أعِزَّ الإسلام بعمر بن الخطاب خاصة".
صحيح: رواه ابن ماجه (105) وصحّحه الحاكم (3/ 83) ومن طريقه البيهقي في الكبرى (6/ 370) كلاهما من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
وصحّحه ابن حجر في فتح الباري (7/ 48).
وفي الباب عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اللهم أعِزَّ الإسلام بأبي جهل بن هشام أو بعمر ابن الخطاب" قال: فأصبح فغدا عمر على رسول الله صلى الله عليه وسلم فأسلم.
رواه الترمذي (3683) عن أبي كريب، حدثنا يونس بن بكير، عن النضر أبي عمر، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وقال:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وقد تكلم بعضهم في النضر أبي عمر، وهو يروي مناكير".
وهو كما قال: فإن النضر بن عبد الرحمن أبا عمر الخزار ضعيف باتفاق أهل العلم، وبه أعله البخاري كما في علل الترمذي الكبير (2/ 936).
ورواه الحاكم (3/ 38) من طريق سعيد بن سليمان (هو الواسطي)، ثنا المبارك بن فضالة، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"اللهم أعِزَّ الإسلام بعمر".
والصحيح أنه من مسند ابن عمر، وليس من مسند ابن عباس كما تقدم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! বিশেষত উমর ইবনুল খাত্তাবের মাধ্যমে ইসলামকে মর্যাদা দান করুন।"
9683 - عن عبد الله بن عمر قال: بينما هو في الدار خائفا، إذ جاءه العاص بن وائل السهمي أبو عمرو عليه حلة حبرة، وقميص مكفوف بحرير، وهو من بني سهم، وهم حلفاؤنا في الجاهلية، فقال له: ما بالك؟ قال: زعم قومك أنهم سيقتلوني إن أسلمت. قال: لا سبيل إليك، بعد أن قالها أمنت، فخرج العاص فلقي الناسَ قد سال بهم الوادي، فقال: أين تريدون؟ فقالوا: نريد هذا ابن الخطاب الذي صبأ، قال: لا سبيل إليه، فكرَّ الناسُ.
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3864) عن يحيى بن سليمان قال: ثني ابن وهب قال: ثني عمر بن محمد قال: فأخبرني جدي زيد بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، قال: بينما فذكره.
وفي لفظ:"لما أسلم عمر اجتمع الناس عند داره، وقالوا: صبأ عمر، وأنا غلام فوق ظهر بيتي، فجاء رجل عليه قباء من ديباج، فقال: قد صبأ عمر فما ذاك؟ فأنا له جار، قال: فرأيت الناس تصدعوا عنه، فقلت: من هذا؟ قالوا: العاص بن وائل"
رواه البخاري في مناقب الأنصار (3865) عن علي بن عبد الله، ثنا سفيان قال عمرو بن دينار: سمعته قال: قال عبد الله بن عمر: لما أسلم عمر فذكره.
ولا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب أنه قال: خرجت أتعرض لرسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن أسلم، فوجدته قد سبقني إلى المسجد، فقمت خلفه، فاستفتح سورة الحاقة، فجعلت أعجب من تأليف القرآن، قال: فقلت: هذا والله شاعر كما قالت قريش، قال: فقرأ: {إِنَّهُ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَرِيمٍ (40) وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍ قَلِيلًا مَا تُؤْمِنُونَ} [الحاقة: 40 - 41] قال: قلت: كاهن، قال: {وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍ قَلِيلًا مَا تَذَكَّرُونَ (42) تَنْزِيلٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ (43) وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ الْأَقَاوِيلِ (44) لَأَخَذْنَا مِنْهُ بِالْيَمِينِ (45) ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ الْوَتِينَ (46) فَمَا مِنْكُمْ مِنْ أَحَدٍ عَنْهُ حَاجِزِينَ} [الحاقة: 42 - 47] إلى آخر السورة، قال: فوقع الإسلام في قلبي كل موقع.
رواه أحمد (107) عن أبي المغيرة (اسمه: عبد القدوس بن الحجاج الخولاني)، حدثنا صفوان، حدثنا شريح بن عبيد قال: قال عمر بن الخطاب فذكره.
وإسناده منقطع لأن شريح بن عبيد لم يدرك عمر، وبه أعله الهيثمي في المجمع (9/ 62).
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس قال: سألت عمر عن إسلامه قال: خرجت بعد إسلام
حمزة بثلاثة أيام، فإذا فلان بن فلان المخزومي، فقلت له: أرغبت عن دين آبائك واتبعت دين محمد؟ قال: إن فعلت فقد فعله من هو أعظم عليك حقا مني، قال: قلت: ومن هو؟ قال: أختك وختنك، قال: فانطلقت فوجدت الباب مغلقا وسمعت همهمة، قال: ففتح لي الباب فدخلت، فقلت: ما هذا الذي أسمعه عندكم؟ قالوا: ما سمعت شيئا، فما زال الكلام بيني وبينهم، حتى أخذت برأس ختني فضربته ضربة فأدميته، فقامت إلي أختي فأخذت برأسي فقالت: قد كان ذلك على رغم أنفك، قال: فاستحييت حين رأيت الدماء، فجلست وقلت: أروني هذا الكتاب، فقالت أختي: إنه لا يمسه إلا المطهرون، فإن كنت صادقا فقم فاغتسل، قال: فقمت فاغتسلت وجئت فجلست، فأخرجوا إلي صحيفة فيها: {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ} قلت: أسماء طاهرة طيبة: {طه (1) مَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لِتَشْقَى (2)} [طه: 1 - 2] إلى قوله: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى} [طه: 8] فتعظمت في صدرِي، وقلت: من هذا فرت قريش؟ ثم شرح صدري للإسلام، فقلت: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى} [طه: 8]، قال: فما في الأرض نسمة أحب إلي من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قلت: أين رسول الله؟ قالت: عليك عهد الله وميثاقه أن لا تهجه بشيء يكرهه، قلت: نعم، قالت: فإنه في دار أرقم بن أبي الأرقم في دار عند الصفا، فأتيت الدار فأسلمت. . . الحديث بطوله.
رواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (6/ 3410) من طريق محمد بن أبان، عن إسحاق بن عبد الله، عن أبان بن صالح عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.
وإسحاق بن عبد الله هو ابن أبي فروة متروك. وروي من أوجه أخرى كلها معلولة.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন (উমর) নিজ ঘরে ভীত অবস্থায় ছিলেন, তখন তাঁর কাছে আস ইবনে ওয়াইল আস-সাহমি, আবু আমর, এলেন। তার পরনে ছিল হাবরা (ইয়েমেনি নকশা করা) পোশাক এবং রেশম দিয়ে পাড় লাগানো জামা। তিনি ছিলেন বনু সাহম গোত্রের, যারা জাহেলিয়াতের যুগে আমাদের মৈত্রীভুক্ত ছিল। আস তাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনার কী হয়েছে? তিনি (উমর) বললেন: আমার গোত্রের লোকেরা ধারণা করছে যে আমি ইসলাম গ্রহণ করলে তারা আমাকে হত্যা করবে। আস বললেন: আপনার ওপর কেউ হাত তুলতে পারবে না। যখন তিনি এই কথা বললেন, তখন (উমর) নিরাপদ হয়ে গেলেন। এরপর আস বাইরে গেলেন এবং দেখলেন মানুষজন উপত্যকা ভরে ছুটে আসছে। তিনি বললেন: তোমরা কোথায় যাচ্ছ? তারা বলল: আমরা খাত্তাবের এই ছেলেকে চাই, যে ধর্মান্তরিত হয়েছে। আস বললেন: তার কাছে যাওয়া যাবে না। ফলে লোকজন ফিরে গেল।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন লোকেরা তার ঘরের সামনে সমবেত হলো এবং বলতে লাগল: উমর ধর্মত্যাগ করেছে। (আব্দুল্লাহ ইবনে উমর বলেন) আমি তখন আমার ঘরের ছাদে থাকা একটি বালক ছিলাম। তখন রেশমের তৈরি কাবা পরিহিত এক ব্যক্তি এসে বললেন: উমর ধর্মত্যাগ করেছে তো তাতে কী? আমি তাকে আশ্রয় দানকারী (জার)। (আব্দুল্লাহ ইবনে উমর) বলেন: আমি দেখলাম লোকজন তার কাছ থেকে সরে গেল। আমি জিজ্ঞেস করলাম: ইনি কে? তারা বলল: আল-আস ইবনে ওয়াইল।
9684 - عن عبد الله بن هشام قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم، وهو آخذ بيد عمر بن الخطاب، فقال له عمر: يا رسول الله، لأنت أحب إلي من كل شيء إلا من نفسي. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا، والذي نفسي بيده حتى أكون أحب إليك من نفسك" فقال له عمر: فإنه الآن -والله- لأنت أحب إليَّ من نفسي. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"الآن يا عمر".
صحيح: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6632) عن يحيى بن سليمان، ثني ابن وهب، أخبرني حيوة قال: ثني أبو عقيل زهرة بن معبد، أنه سمع جده عبد الله بن هشام فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনু হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমার কাছে আমার জীবন ব্যতীত সবকিছু থেকে প্রিয়।’ তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘না, সেই সত্তার কসম, যার হাতে আমার প্রাণ, যতক্ষণ না আমি তোমার কাছে তোমার নিজের জীবনের চাইতেও প্রিয় হই।’ তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, ‘আল্লাহর কসম, এখন আপনি আমার নিজের জীবনের চাইতেও প্রিয়।’ তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘এখন, হে উমার!’
9685 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لقد كان فيما قبلكم من الأمم محدَّثون فإن يك في أمتي أحد فإنه عمر".
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3689) عن يحيى بن قزعة، ثنا إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
قال البخاري بعده:"زاد زكريا بن أبي زائدة، عن سعد، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد كان فيمن كان قبلكم من بني إسرائيل رجال يُكَلَّمون من غير أن يكونوا أنبياء، فإن يكن من أمتي منهم أحد فعمر".
وهذا الحديث المعلق الذي ذكره البخاري اختلف فيه على زكريا:
فرواه عنه داود بن عبد الحميد، وإسحاق الأزرق مرفوعا، كما ذكره الحافظ في التغليق (4/ 64).
ورواه عنه عبد الله بن إدريس، عن سعد بن إبراهيم، عن أبي سلمة به مرسلا، كما أخرج ابن أبي شيبة (32635) عن عبد الله بن إدريس به.
وذكره الدارقطني في"العلل" (9/ 313) ولم يرجح أحدهما على الآخر.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতসমূহের মধ্যে মুহাদ্দাস (ঐশী প্রেরণা প্রাপ্ত) লোক ছিল। যদি আমার উম্মতে এমন কেউ থাকে, তবে সে হলো উমর।"
9686 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يقول:"قد كان يكون في الأمم قبلكم محدَّثون، فإن يكن في أمتي منهم أحد فعمر، فإن عمر بن الخطاب منهم".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2398) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن سرح، ثنا عبد الله ابن وهب، عن إبراهيم بن سعد، عن أبيه سعد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وكذلك رواه من وجهين آخرين عن ابن عجلان، عن سعد بن إبراهيم بهذا الإسناد مثله.
قلت: رواه أصحاب إبراهيم بن سعد عنه من مسند أبي هريرة، وخالفهم ابن وهب فرواه عن إبراهيم، عن أبيه، عن أبي سلمة، عن عائشة. وكلاهما صحيح، لا يُعِلُّ أحدهما الآخر.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতসমূহের মধ্যে 'মুহাদ্দাস' (আল্লাহ কর্তৃক ইলহামপ্রাপ্ত) ব্যক্তিরা ছিল। যদি আমার উম্মতের মধ্যে তাদের কেউ থাকে, তবে সে হলো উমার। নিশ্চয়ই উমার ইবনুল খাত্তাব তাদেরই একজন।
9687 - عن أبي سعيد الخدري يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بينما أنا نائم رأيت الناس يُعرضون عليَّ وعليهم قمص، منها ما يبلغ الثدي، ومنها ما يبلغ دون ذلك، ومرَّ عليَّ عمر بن الخطاب، وعليه قميص يجرُّه"، قالوا: ما أوَّلته يا رسول الله؟ قال:"الدين".
متفق عليه: رواه البخاري في التعبير (7008)، ومسلم في فضائل الصحابة (2390) كلاهما من طريق يعقوب بن إبراهيم، ثني أبي، عن صالح، عن ابن شهاب، ثني أبو أمامة بن سهل، أنه سمع أبا سعيد الخدري فذكره.
وقوله:"عليه قميصى يجرُّه". فيه إشارة إلى الفتوحات الإسلامية التي تقع في خلافته، وتبقى آثاره لمن بعده.
ونقل ابن حجر في الفتح (12/ 396) بأن أهل التعبير اتفقوا على أن القميص يعبر بالدين، وأن طوله يدل على بقاء آثار صاحبه من بعده.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি ঘুমন্ত অবস্থায় থাকাকালে মানুষদেরকে আমার সামনে পেশ করা হলো, আর তাদের গায়ে ছিল জামা (কামীস)। তার মধ্যে কিছু এমন ছিল যা বুক পর্যন্ত পৌঁছায় এবং কিছু ছিল তার চেয়ে কম। আর আমার সামনে দিয়ে উমার ইবনুল খাত্তাব অতিক্রম করলেন, তাঁর গায়ে ছিল এমন জামা যা তিনি টেনে নিয়ে যাচ্ছিলেন।" সাহাবীগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি এর কী ব্যাখ্যা করেছেন?" তিনি বললেন: "দীন" (ধর্ম)।