হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (9748)


9748 - عن سعد بن أبي وقاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من كنت مولاه فعلي مولاه".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (1393) والنسائي في الكبرى (8414) كلاهما من طريق عبد الله بن داود، عن عبد الواحد بن أيمن، عن أبيه أن سعدا قال: فذكره. وإسناده حسن من أجل عبد الواحد بن أيمن.

ورواه ابن ماجه (121)، والنسائي في الكبرى (8343)، وابن أبي عاصم في السنة (1421) كلهم من طرق، عن عبد الرحمن بن سابط، عن سعد بن أبي وقاص قال: كنت جالسا فتنقصوا علي بن أبي طالب فقال: لقد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول له خصال ثلاثة، لأن تكون لي واحدة منهن أحب إليَّ من حمر النعم، سمعته يقول:"إنه مني بمنزلة هارون من موسى، إلا أنه لا نبي بعدي" وسمعته يقول:"لأعطين الراية غدا رجلا يحب الله ورسوله، ويحبه الله ورسوله" وسمعته يقول:"من كنت مولاه فعلي مولاه".

وإسناده منقطع. لأن عبد الرحمن بن سابط لم يسمع من سعد بن أبي وقاص. قاله ابن معين. انظر: المراسيل (ص 127).

وفي الباب ما روي عن البراء بن عازب قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فنزلنا بغدير خم، فنودي فينا: الصلاة جامعة، وكُسِح لرسول الله صلى الله عليه وسلم تحت شجرتين، فصلى الظهر، وأخذ بيد علي رضي الله عنه فقال:"ألستم تعلمون أني أولى بالمؤمنين من أنفسهم؟" قالوا: بلى. قال:"ألستم تعلمون أني أولى بكل مؤمن من نفسه؟" قالوا: بلى. قال: فأخذ بيد علي فقال:"من كنت مولاه فعلي مولاه، اللهم! وال من والاه، وعاد من عاداه" قال: فلقيه عمر بعد ذلك، فقال له: هنيئا يا ابن أبي طالب أصبحت وأمسيت مولى كل مؤمن ومؤمنة.

رواه ابن ماجه (116)، وأحمد (18479) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، أخبرنا علي بن زيد بن جدعان، عن عدي بن ثابت، عن البراء بن عازب فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد بن جدعان، فإنه ضعيف عند أكثر أهل العلم.

وبه أعله البوصيري في مصباح الزجاجة.

وكذلك لا يصح ما روي عن أبي الطفيل عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال لعلي:"من كنت مولاه فهذا
مولاه، اللَّهم وال من والاه، وعاد من عاداه".

رواه أحمد (19302)، والنسائي في خصائص علي (93)، والطحاوي في شرح المشكل (1762)، وصحّحه ابن حبان (6931) كلهم من طرق، عن فطر بن خليفة، عن أبي الطفيل عامر ابن واثلة قال: فذكره في سياق طويل.

وفطر بن خليفة المخزومي مولاهم أبو بكر الحناط مختلف فيه، وقد رمي بالتشيع، تكلم فيه أبو بكر بن عياش والدارقطني وغيرهما لسوء مذهبه، ولذلك لا تقبل منه هذه الزيادة.

ولا تنفع متابعة حبيب بن أبي ثابت عن أبي الطفيل وهو عند أحمد (952)، والنسائي في الخصائص (88) وفيه شريك بن عبد الله القاضي سيء الحفظ، وقد اختلف عليه بهذه الزيادة.

ولكن رواه الحاكم (3/ 109) من طريق أبي عوانة متابعة له.

ورواه النسائي في الخصائص (84) من وجه آخر عن زيد بن أرقم ولم يذكر هذه الزيادة، فالظاهر أنه وقع اضطراب في حديث زيد بن أرقم في ذكر هذه الزيادة، وقد رويت هذه الزيادة عن عدد من الصحابة ولا يخلو واحد منه من مجهول، أو ضعيف، أو متهم، وكذا قال أحمد:"إنها زيادة كوفية" نقله شيخ الإسلام ابن تيمية في فتاواه (4/ 417).

وقال: وأما قوله"من كنت مولاه فعلي مولاه، اللهم! وال من والاه. . . الخ" فهذا ليس في شيء من الأمهات، إلا في الترمذي، وليس فيه إلا:"من كنت مولاه فعلي مولاه"، وأما الزيادة فليست في الحديث. وسئل عنها أحمد فقال:"زيادة كوفية"، ولا ريب أنها أكاذيب لوجوه:

أحدها: أن الحق لا يدور مع معين إلا النبي صلى الله عليه وسلم، لأنه لو كان كذلك لوجب اتباعه في كل ما قال، ومعلوم أن عليا ينازعه الصحابة واتباعه في مسائل وجد فيها النص يوافق من نازعه، كالمتوفي عنها زوجها وهي حامل.

وقوله:"اللهم! انصر من نصره. . . الخ" خلاف الواقع، قاتل معه أقوام يوم صفين فما انتصروا، وأقوام لم يقاتلوا فما خذلوا، كسعد الذي فتح العراق لم يقاتل معه، وكذلك أصحاب معاوية وبني أمية الذين قاتلوه فتحوا كثيرا من بلاد الكفار ونصرهم الله.

وكذلك قوله:"اللهم! وال من والاه، وعاد من عاداه" مخالف لأصل الإسلام. فإن القرآن قد بين أن المؤمنين إخوة مع قتالهم وبغي بعضهم على بعض، وقوله:"من كنت مولاه فعلي مولاه" فمن أهل الحديث من طعن فيه كالبخاري وغيره، ومنهم من حسنه، فإن كان قاله فلم يرد به ولاية مختصا بها، بل ولاية مشتركة، وهي ولاية الإيمان التي للمؤمنين، والموالاة ضد المعاداة، ولا ريب أنه يجب موالاة المؤمنين على سواهم، ففيه رد على النواصب. انتهى.

وما قاله شيخ الإسلام هو حق لا ريب فيه، ومن ذهب إلى تصحيحه لم يلاحظ هذا الجانب الذي أشار إليه شيخ الإسلام، ثم إن صحة الإسناد لم يستلزم صحة المتن لوجود الشذوذ وغيرها.
وهو أمر معروف لدى علماء أهل الحديث والله الموفق.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা।"

(অপর এক বর্ণনায় সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত) তিনি বলেন: আমি বসে ছিলাম, তখন লোকেরা আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমালোচনা করছিল। তখন আমি বললাম: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তার (আলী) সম্পর্কে তিনটি বিশেষ গুণ বর্ণনা করতে শুনেছি, যার মধ্যে একটি আমার জন্য লাল উট অপেক্ষা অধিক প্রিয়। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "তিনি (আলী) আমার কাছে হারূণ (আঃ)-এর কাছে মূসা (আঃ)-এর মর্যাদার মতো, তবে আমার পরে কোনো নবী নেই।" আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "আমি অবশ্যই আগামীকাল এমন এক ব্যক্তির হাতে পতাকা দেব, যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালবাসে এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলও তাকে ভালবাসেন।" আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা।"

এ বিষয়ে বারা ইবনু 'আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। আমরা গাদীরে খুম নামক স্থানে অবতরণ করলাম। আমাদের মাঝে ঘোষণা করা হলো: সালাতুল জামি'আ (সম্মিলিত সালাত)। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর জন্য দুটি গাছের নিচে স্থান পরিষ্করণ করা হলো। অতঃপর তিনি যোহরের সালাত আদায় করলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে বললেন: "তোমরা কি জানো না যে, আমি মু'মিনদের কাছে তাদের নিজেদের অপেক্ষাও বেশি কর্তৃত্বপূর্ণ?" তারা বলল: অবশ্যই জানি। তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো না যে, আমি প্রত্যেক মু'মিনের কাছে তার নিজের অপেক্ষাও বেশি কর্তৃত্বপূর্ণ?" তারা বলল: অবশ্যই জানি। অতঃপর তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে বললেন: "আমি যার মাওলা, আলীও তার মাওলা। ইয়া আল্লাহ! যে তাকে বন্ধু বানায়, তুমিও তাকে বন্ধু বানাও এবং যে তার সাথে শত্রুতা করে, তুমিও তার সাথে শত্রুতা করো।"

তিনি (বারা') বলেন: এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আলীর সাক্ষাৎ হলে তিনি তাঁকে বললেন: অভিনন্দন, হে ইবনু আবী তালিব! তুমি তো সকাল-সন্ধ্যায় প্রত্যেক মুমিন-মুমিনার মাওলা হয়ে গেলে।

(বিশেষজ্ঞ পর্যালোচনায় বলা হয়েছে): তবে শাইখুল ইসলাম (ইবনু তাইমিয়্যাহ) যা বলেছেন, তা নিঃসন্দেহে সঠিক। যারা এই হাদীসকে সহীহ বলে রায় দিয়েছেন, তারা সেই দিকটি বিবেচনা করেননি, যা শাইখুল ইসলাম ইঙ্গিত করেছেন। সনদের বিশুদ্ধতা মূল হাদীসের পাঠের (মতন) বিশুদ্ধতাকে আবশ্যক করে না, কারণ এতে শাজ (বিচ্ছিন্নতা) বা অন্যান্য দুর্বলতা থাকতে পারে। হাদীসশাস্ত্রের আলিমদের কাছে এটি একটি সুপরিচিত বিষয়। আল্লাহই তাওফীকদাতা।









আল-জামি` আল-কামিল (9749)


9749 - عن أبي سعيد الخدري قال: كنا جلوسا ننتظر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرج علينا من بعض بيوت نسائه، قال: فقمنا معه، فانقطعت نعله، فتخلف عليها علي يخصفها، فمضى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومضينا معه، ثم قام ينتظره وقمنا معه فقال:"إن منكم من يقاتل على تأويل هذا القرآن، كما قاتلت على تنزيله". فاستشرفنا وفينا أبو بكر وعمر فقال:"لا، ولكنه خاصف النعل". قال: فجئنا نبشره، قال: وكأنه قد سمعه.

حسن: رواه أحمد (11773) -واللفظ له-، والنسائي في الكبرى (8488)، وأبو يعلى (1086)، والطحاوي في مشكله (4058)، وصحّحه ابن حبان (6937)، والحاكم (3/ 122 - 123) كلهم من طرق، عن إسماعيل بن رجاء الزبيدي، عن أبيه (هو رجاء بن ربيعة) قال: سمعت أبا سعيد الخدري يقول: فذكره.

وإسناده حسن من أجل والد إسماعيل وهو رجاء بن ربيعة الزبيدي فإنه حسن الحديث.

ووهمَ من ظن أن إسماعيل بن رجاء هو الحِصني المتروك. وإنما هو إسماعيل بن رجاء بن ربيعة الزبيدي أبو إسحاق الكوفي ثقة وثّقه ابن معين وأبو حاتم والنسائي وغيرهم.

وقوله:"إن منكم من يقاتل على تأويل القرآن" وفيه إشارة إلى قتال الخوارج الذين هم شرار خلق الله لأنهم انطلقوا إلى آيات نزلت في الكفار، فجعلوها على المؤمنين كما قال ابن عمر.

وأول ما نجم ذلك في زمان علي بن أبي طالب رضي الله عنه، فقاتلهم بالنهروان حتى قتل كثيرا منهم، يقال: كانوا ستة آلاف، وقيل: من ثمانية آلاف إلى عشرة آلاف، ولم ينج منهم إلا دون العشرة.

وبذلك ظهرت معجزة ما أخبر به النبي صلى الله عليه وسلم قبل الوقوع.

وروي عن ربعي بن حراش قال: حدثنا علي بن أبي طالب بالرحبة، قال: لما كان يوم الحديبية خرج إلينا ناس من المشركين فيهم سهيل بن عمرو وأناس من رؤساء المشركين، فقالوا: يا رسول الله! خرج إليك ناس من أبنائنا وإخواننا وأرقائنا وليس لهم فقه في الدين، وإنما خرجوا فرارا من أموالنا وضياعنا فارددهم إلينا. فإن لم يكن لهم فقه في الدين سنفقههم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا معشر قريش لتنتهن أو ليبعثن الله عليكم من يضرب رقابكم بالسيف على الدين، قد امتحن الله قلوبهم على الإيمان" قالوا: من هو يا رسول الله؟ فقال له أبو بكر: من هو يا رسول الله؟ وقال عمر: من هو يا رسول الله؟ قال:"هو خاصف النعل" وكان أعطى عليا نعله يخصفها، ثم التفت إلينا علي فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من كذب علي متعمدا فليبوأ مقعده من النار".

رواه الترمذي (3715)، والنسائي في خصائص علي (31)، والطحاوي في شرح المشكل (4053)
كلهم من طريق شريك بن عبد الله النخعي القاضي، عن منصور بن المعتمر، عن ربعي بن حراش قال: فذكره.

وشريك بن عبد الله القاضي مختلف فيه، والغالب على حديثه الخطأ إلا فيما توبع.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা বসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অপেক্ষা করছিলাম। তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদের কোনো এক কক্ষ থেকে আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন। তিনি বলেন, আমরা তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন তাঁর জুতা ছিঁড়ে গেল। ফলে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা সেলাই করার জন্য পিছনে থেকে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে গেলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে এগিয়ে গেলাম। এরপর তিনি আলীর জন্য দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে এমন এক ব্যক্তি আছে, যে এই কুরআনের ব্যাখ্যার (তা’বীল) উপর লড়াই করবে, যেমন আমি এর অবতরণের (তাঞ্জীল) উপর লড়াই করেছি।" আমরা তখন ঝুঁকে তাকালাম (এই খেতাব কার জন্য তা জানার জন্য), আর আমাদের মধ্যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "না, বরং সে হচ্ছে জুতা সেলাইকারী ব্যক্তি।" তিনি (আবূ সাঈদ) বলেন, আমরা তাঁকে (আলীকে) সুসংবাদ দিতে আসলাম। তিনি বললেন, মনে হলো যেন তিনি ইতোমধ্যেই তা শুনেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9750)


9750 - عن أبي سنان يزيد بن أمية الدؤلي قال: مرض علي بن أبي طالب مرضا شديدا حتى أدنف وخفنا عليه، ثم إنه برأ ونَقِهَ، فقلنا: هنيئا لك أبا الحسن، الحمد لله الذي عافاك، قد كنا نخاف عليك. قال: لكني لم أخف على نفسي، أخبرني الصادق المصدق أني لا أموت حتى أضرب على هذه، وأشار إلى مقدم رأسه الأيسر، فتُخضَّبُ هذه منها بدم، وأخذ بلحيته، وقال لي:"يقتلك أشقى هذه الأمة كما عقر ناقة الله أشقى بني فلان من ثمود".

قال: فنسبه رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى فخذه الدنيا دون ثمود.

حسن: رواه أبو يعلى (569) عن عبيد الله (هو القواريري)، حدثنا عبد الله بن جعفر (وهو ابن أبي نجيح)، أخبرني زيد بن أسلم، عن أبي سنان يزيد بن أمية قال: فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل عبد الله بن جعفر، وبه أعله الهيثمي لكنه توبع، فقد رواه عبد بن حميد (92) عن محمد بن بشر (هو العبدي الكوفي)، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، ثنا زيد بن أسلم، عن أبي سنان الدؤلي يزيد بن أمية فذكره.

وعبد الرحمن بن أبي الزناد متكلم فيه إلا أنه لا بأس به في المتابعة.

ورواه الطبراني في الكبير (1/ 63 - 64) والحاكم (1/ 113) كلاهما من طريق عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، حدثني خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أسلم أن أبا سنان الدؤلي قال: فذكره.

وهذه متابعة أخرى ولكن عبد الله بن صالح (هو أبو صالح المصري كاتب الليث) متكلم فيه ولكنه توبع في الجملة.

وحسَّنه الهيثمي في المجمع (9/ 137) فقال:"رواه الطبراني، وإسناده حسن".



ولذا أخرجه الإمام مسلم، ولكنه أُعِلَّ بتفرد عدي بن ثابت لأنه كان غاليا في التشيع، والصحيح في هذا ما رواه الشيخان: البخاري (3783)، ومسلم (75) عن البراء بن عازب مرفوعا:"الأنصار لا يحبّهم إلا مؤمن، ولا يبغضهم إلا منافق، فمن أحبّهم أحبّه الله، ومن أبغضهم أبغضه الله". وهو مخرج في موضعه، لأن بغض المنافقين كان لجميع الصحابة، وخُصَّ بالأنصار لأنهم من أهل بلدهم، وسارعوا إلى نصرة الإسلام، وتركوا رئيسهم عبد الله بن أبي ابن سلول الذي كان يحلم أن يكون ملكا على أهل المدينة.

وكذلك لا يصحّ ما روي عن أم سلمة أنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحب عليا منافق، ولا يبغضه مؤمن".

رواه الترمذي (3717)، وأحمد (26507)، وأبو يعلى (6904) كلهم من طريق محمد بن فضيل، عن عبد الله بن عبد الرحمن أبي نضر، عن المساور الحميري، عن أمه قالت: دخلت على أم سلمة فسمعتها تقول: فذكرته.

وإسناده ضعيف لجهالة المساور وأمه فإنهما مجهولان. وبه أعله الذهبي، وحكم بأنه خبر منكر، إلا أن الترمذي قال:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

ورواه الطبراني في الكبير (23/ 380) عن يحيى بن عبد الباقي الأذني، ثنا محمد بن عوف الحمصي، ثنا أبو جابر محمد بن عبد الملك، ثنا الحكم بن محمد -شيخ مكي-، عن فطر بن خليفة، عن أبي الطفيل قال: سمعت أم سلمة تقول: أشهد أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أحب عليا فقد أحبني، ومن أحبني فقد أحب الله، ومن أبغض عليا فقد أبغضني، ومن أبغضني فقد أبغض الله".

وأبو جابر محمد بن عبد الملك هو الأزدي، قال أبو حاتم: ليس بقوي، وذكره ابن حبان في الثقات. والحكم بن محمد المكي لم أقف على ترجمته.

وأما الهيثمي فقد حسَّن إسناده في المجمع (9/ 132).

وروي عن جميع بن عمير التيمي، قال: دخلت مع عمتي على عائشة، فسئلت أي الناس كان أحب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: فاطمة، فقيل: من الرجال؟ قالت: زوجها، إن كان ما علمت صواما قواما.

رواه الترمذي (3874)، وأبو يعلى (4857)، والطبراني في الكبير (22/ 404)، وصحّحه الحاكم (3/ 154) كلهم من طرق عن جميع بن عمير قال: فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: جميع بن عمير التيمي أبو الأسود الكوفي، قال البخاري: فيه نظر، قال ابن حبان: كان
رافضيا يضع الحديث، وبه أعله الذهبي في تلخيص المستدرك، فقال:"جُميع متهم، ولم تقل عائشة هذا أصلا".



للخاص والعام. وهذا الحديث إنما افتراه زنديق أو جاهل: ظنه مدحا؛ وهو مطرق الزنادقة إلى القدح في علم الدين؛ إذ لم يبلغه إلا واحد من الصحابة".



قال: وقال:"من كنت مولاه فإن مولاه عليٌّ".

قال: وأخبرنا الله عز وجل في القرآن أنه قد رضي عنهم، عن أصحاب الشجرة، فعلم ما في قلوبهم، هل حدثنا أنه سخط عليهم بعد؟ !

قال: وقال نبي الله لعمر حين قال: ائذن لي فلأضرب عنقه. قال:"وكنت فاعلا؟ ! وما يدريك لعل الله قد اطلع إلى أهل بدر فقال اعملوا ما شئتم".

رواه أحمد (3061) -والسياق له-، والترمذي (3732)، والنسائي في الخصائص (42)، والطحاوي في شرح المشكل (3555)، وصحّحه الحاكم (3/ 132) كلهم من طريق أبي بلج، حدثنا عمرو بن ميمون قال: إني جالس إلى ابن عباس إذا أتاه تسعة رهط، فقالوا: يا أبا عباس فذكر الحديث.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه عن شعبة -يعني عن أبي بلج- بهذا الإسناد إلا من هذا الوجه".

قلت: ليس كما قال بل تابعه أبو عوانة عن أبي بلج عند أحمد والحاكم وغيرهما.

وقال الحاكم: صحيح الإسناد.

وذهب ابن حجر إلى صحة هذا الحديث وتقويته بشواهده.

وهو ليس كما قالوا. فإن أبا بلج هو يحيى بن سليم الفزاري الكوفي مختلف فيه، فوثّقه ابن معين وابن سعد والنسائي والدارقطني، وقال أبو حاتم: صالح الحديث لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثقات، وقال يخطئ، وذكره في المجروحين وقال: كان ممن يخطئ لم يفحش خطؤه حتى استحق الترك، ولا أتى منه ما لا ينفك البشر عنه. فيسلك به مسلك العدول، فأرى أن لا يحتاج بما انفرد من الرواية، وهو ممن استخير الله فيه.

وقال البخاري: فيه نظر، وقال أحمد: روى حديثا منكرا، وذكر هذا الحديث ابن عدي والذهبي من مناكير أبي بلج.

وقال شيخ الإسلام ابن تيمية في منهاج السنة (5/ 34 - 36): (إن هذا ليس مسندا بل هو مرسل لو ثبت عن عمرو بن ميمون، وفيه ألفاظ هي كذب على رسول الله صلى الله عليه وسلم كقوله:"أما ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى، غير أنك لست بنبي، لا ينبغي أن أذهب إلا وأنت خليفتي". فإن النبي صلى الله عليه وسلم ذهب غير مرة وخليفته على المدينة غير علي، كما اعتمر عمرة الحديبية وعلي معه وخليفته غيره، وغزا بعد ذلك خيبر ومعه علي وخليفته بالمدينة غيره، وغزا غزوة الفتح وعلي معه وخليفته في المدينة غيره، وغزا حنينا والطائف وعلي معه وخليفته بالمدينة غيره، وحج حجة الوداع وعلي معه وخليفته بالمدينة غيره، وغزا غزوة بدر ومعه علي وخليفته بالمدينة غيره.

وكل هذا معلوم بالأسانيد الصحيحة وباتفاق أهل العلم بالحديث، وكان علي معه في غالب
الغزوات وإن لم يكن فيها قتال.

فإن قيل: استخلافه يدل على أنه لا يستخلف إلا الأفضل لزم أن يكون علي مفضولا في عامة الغزوات، وفي عمرته وحجته، لا سيما وكل مرة كان يكون الاستخلاف على رجال مؤمنين، وعام تبوك ما كان الاستخلاف إلا على النساء والصبيان ومن عذر الله، وعلى الثلاثة الذين خُلِّفوا أو متهم بالنفاق، وكانت المدينة آمنة لا يخاف على أهلها، ولا يحتاج المستخلف إلى جهاد، كما يحتاج في أكثر الاستخلافات.

وكذلك قوله:"وسد الأبواب كلها إلا باب عليٍّ" فإن هذا مما وضعته الشيعة على طريق المقابلة، فإن الذي في الصحيح عن أبي سعيد عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال في مرضه الذي مات فيه:"إن أمن الناس عليَّ في ماله وصحبته أبو بكر، ولو كنت متخذا خليلا غير ربي لاتخذت أبا بكر خليلا، ولكن أخوة الإسلام ومودته، لا يبقين في المسجد خوخة إلا سدت إلا خوخة أبي بكر"، ورواه ابن عباس أيضا في الصحيحين. ومثل قوله:"أنت وليي في كل مؤمن بعدي" فإن هذا موضوع باتفاق أهل المعرفة بالحديث، والذي فيه من الصحيح ليس هو من خصائص الأئمة، بل ولا من خصائص عليٍّ، بل قد شاركه فيه غيره، مثل كونه يحب الله ورسوله، ويحبه الله ورسوله، ومثل استخلافه وكونه منه بمنزلة هارون من موسى، ومثل كون علي مولى مَن النبي صلى الله عليه وسلم مولاه، فإن كل مؤمن موال لله ورسوله، ومثل كون براءة لا يبلغها إلا رجل من بني هاشم، فإن هذا يشترك فيه جميع الهاشميين، لما رُوي أن العادة كانت جارية بأن لا ينقض العهود ويحلها إلا رجل من قبيلة المطاع).

وإن صح قوله:"وسد الأبواب كلها إلا باب عليٍّ" فمعناه يحمل على ما ذكر ابن كثير في البداية والنهاية (11/ 55) حيث قال: (وهذا لا ينافي ما ثبت في صحيح البخاري من أمره عليه الصلاة والسلام في مرضه الذي مات فيه بسد الأبواب الشارعة إلى المسجد إلا باب أبي بكر الصديق؛ لأن نفي هذا في حق علي كان في حال حياته لاحتياج فاطمة إلى المرور من بيتها إلى بيت أبيها، فجعل هذا رفقا بها، وأما بعد وفاته فزالت هذه العلة فاحتيج إلى فتح باب الصديق لأجل خروجه إلى المسجد ليصلي بالناس إذ كان الخليفة عليهم بعد موته عليه الصلاة والسلام وفيه إشارة إلى خلافته).

وللحديث عدة شواهد منها:

حديث زيد بن أرقم عند أحمد (19287) والنسائي في الكبرى (8369).

وحديث ابن عمر عند أحمد (4797) وأبي يعلى (5601).

وحديث سعد بن أبي وقاص عند أحمد (1511) والنسائي في الخصائص (41).

وحديث علي بن أبي طالب عند البزار (506).

وحديث جابر بن سمرة عند الطبراني في الكبير (2/ 274).

ولا يصح منها شيء إلا أن ابن حجر حسَّن بعضها، وقوَّى البعض الآخر. انظر: الفتح (7/
14 - 15).

وروي عن جابر بن عبد الله قال: دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم عليا يوم الطائف فانتجاه، فقال الناس: لقد طال نجواه مع ابن عمه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما انتجيته ولكن الله انتجاه".

رواه الترمذي (3726)، وأبو يعلى (2163)، وابن أبي عاصم في السنة (3121 - ظلال الجنة) كلهم من طريق الأجلح بن عبد الله بن حجية، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث الأجلح، وقد رواه غير ابن فضيل أيضا عن الأجلح.

ومعنى قوله:"ولكن الله انتجاه". يقول: إن الله أمرني أن أنتجي معه.

والأجلح بن عبد الله أكثر أهل العلم تكلموا فيه وكان شيعيا.

وللحديث طريق آخر رواه الطبراني في الكبير (2/ 202) من طريق يحيى بن الحسن بن فرات القزاز، ثنا محمد بن أبي حفص العطار، عن سالم بن أبي حفص (كذا في المطبوع ولعل الصواب: سالم بن أبي حفصة)، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر مثله.

وسالم بن أبي حفصة كان غاليا في التشيع، ويحيى بن الحسن بن الفرات لم أجد له ترجمة، ومحمد بن أبي حفص العطار قال الأزدي: يتكلمون فيه.

وروي عن ابن عمر قال: آخى رسول الله صلى الله عليه وسلم بين أصحابه، فجاء علي تدمع عيناه، فقال: يا رسول الله، آخيت بين أصحابك، ولم تؤاخ بيني وبين أحد، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنت أخي في الدنيا والآخرة".

رواه الترمذي (3720)، وصحّحه الحاكم (3/ 14) كلاهما من طريق علي بن قادم، ثنا علي بن صالح بن حي، عن حكيم بن جبير، عن جميع بن عمير التيمي، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده ضعيف، فإن حكيم بن جبير الأسدي ضعيف باتفاق أهل العلم. وشيخه جميع بن عمير أيضا من الضعفاء.

والحديث أعله الذهبي بجميع بن عمير في التلخيص.

وروي عن علي بن أبي طالب أنه قال: كنت إذا سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطاني، وإذا سكت ابتدأني.

رواه الترمذي (3722)، والنسائي في خصائص علي (119)، وصحّحه الحاكم (3/ 125) كلهم من طريق عوف (هو ابن أبي جميلة)، عن عبد الله بن عمرو بن هند الجملي قال: قال علي فذكره.

وإسناده منقطع. قال عوف بن أبي جميلة:"عبد الله بن عمرو الجملي لم يسمع من علي". انظر: المراسيل (ص 109).

ورواه النسائي في الخصائص (120) عن محمد بن المثنى، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري (سعيد بن فيروز)، عن علي قال: كنت إذا سألت
أُعْطِيْتُ، وإذا سكتُّ ابتديتُ.

قال شعبة: أبو البختري لم يدرك عليا ولم يره. المراسيل (ص: 76).

ورواه النسائي في الخصائص أيضا (121) من طريق حجاج (هو ابن محمد المصيصي)، عن ابن جريج، حدثنا أبو حرب بن أبي الأسود (هو الديلي البصري) ورجل آخر، عن زاذان قال: قال علي: فذكره.

قال النسائي عقبه: ابن جريج لم يسمع من أبي حرب.

وروي عن أم عطية قالت: بعث النبي صلى الله عليه وسلم جيشا فيهم علي. قالت: فسمعت النبي صلى الله عليه وسلم وهو رافع يديه يقول:"اللهم! لا تمتني حتى تريني عليا".

رواه الترمذي (3737)، والطبراني في الكبير (25/ 68) كلاهما من طريق أبي عاصم، عن أبي الجراح، حدثني جابر بن صبح، حدثتني أم شراحيل، حدثتني أم عطية فذكرته.

وإسناده ضعيف لجهالة أبي الجراح البهزي، وأم شراحيل لا يعرف حالها.

وروي عن أبي سعيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعلي:"يا علي، لا يحل لأحد يجنب في هذا المسجد غيري وغيرك".

رواه الترمذي (3727)، وأبو يعلى (1042) كلاهما من طريق محمد بن فضيل، عن سالم بن أبي حفصة، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره.

وسالم بن أبي حفصة كان غاليا في التشيع، وشيخه عطية بن سعد العوفي أيضا كان شيعيا، وهو ضعيف الحديث إذا انفرد. ولم أجد له متابعا.

وقد سمع البخاري هذا الحديث من الترمذي فاستغربه.

ومعنى الحديث: أنه لا يحل لأحد يستطرقه جنبا غير النبي صلى الله عليه وسلم وعلي.

وروي عن أنس بن مالك قال: كان عند النبي صلى الله عليه وسلم طير فقال:"اللهم ائتني بأحب خلقك إليك يأكل معي هذا الطير" فجاء علي، فأكل معه.

وعند النسائي وأبي يعلى:"فجاء أبو بكر فردَّه، وجاء عمر فردَّه، ثم جاء علي فأذن له". رواه الترمذي (3721)، والنسائي في الخصائص (10)، وأبو يعلى (4052) كلهم من طريق عيسى بن عمر، عن السدي، عن أنس فذكره.

وقال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث السدي إلا من هذا الوجه.

والسدي هو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة مختلف فيه، وكان من الغلاة في التشيع، وكان يشتم أبا بكر وعمر.

وحديث الطير قد حكم عليه الأئمة بالضعف والنكارة.

قال البزار:"كل من رواه عن أنس فليس بالقوي"
وقال العقيلي:"وهذا الباب الرواية فيها لين وضعف، ولا نعلم فيها شيئا ثابتا، وهكذا قال محمد بن إسماعيل البخاري".

وقال شيخ الإسلام ابن تيمية:"إن حديث الطائر من المكذوبات الموضوعات عند أهل العلم والمعرفة بحقائق النقل". منهاج السنة (4/ 99).

وروي عن أبي عبد الله الجدلي قال: دخلت على أم سلمة فقالت لي: أيُسَبُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم فيكم؟ قلت: معاذ الله، أو سبحان الله، أو كلمة نحوها. قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من سبَّ عليا فقد سبَّني".

وفي لفظ: قالت أم سلمة: أيُسَبُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنابر؟ قلت: وأنى ذلك؟ قالت: أليس يُسَبُّ علي ومن يحبه؟ فأشهد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يحبه.

رواه أحمد (26748)، والنسائي في الخصائص (91)، وصحّحه الحاكم (3/ 121) كلهم من طريق يحيى بن بكير، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي عبد الله الجدلي فذكره.

واللفظ الآخر رواه أبو يعلى (7013)، والطبراني في الكبير (23/ 322 - 323) كلاهما من طرق، عن أبي عبد الله الجدلي قال: فذكره.

وفيه أبو عبد الله الجدلي اسمه: عبد بن عبد أو عبد الرحمن بن عبد الكوفي، كان غاليا في التشيع، وكان على شرطة المختار وصاحب رايته، وتفرد بهذا اللفظ.

وروي عن سعد بن أبي وقاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من آذى عليا فقد آذاني". رواه البزار (1166)، وأبو يعلى (770)، والشاشي في مسنده (72) كلهم من طريق قنان بن عبد الله النهمي، حدثنا مصعب بن سعد، عن أبيه (سعد بن أبي وقاص) قال: فذكره.

وقنان بن عبد الله النهمي مختلف فيه، فضعَّفَه النسائي، وتفرد بهذا اللفظ، ولم يتابع عليه، وقد قال الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة.

وروي عن علي قال: كنت شاكيا فمر بي رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أقول: اللهم! إن كان أجلي قد حضر فأرحني، وإن كان متأخرا فارفعني، وإن كان بلاء فصبِّرني، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف قلت؟" قال: فأعاد عليه ما قال. قال: فضربه برجله، فقال:"اللهم! عافه أو اشفه" -شعبة الشاك- فما اشتكيت وجعي بعد.

رواه الترمذي (3564)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (1058)، وأحمد (637، 638)، وصحّحه ابن حبان (6940)، والحاكم (2/ 620 - 621) كلهم من طرق عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن سلمة، عن علي فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".

وقال الحاكم: هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
قلت: هو حديث منكر، فإن عبد الله بن سلمة وهو المرادي ليس من رجال الشيخين، ثم هو مختلف فيه، فقال البخاري: لا يتابع في حديثه، وقال أبو حاتم: تعرف وتنكر، وقال شعبة: عن عمرو بن مرة: كان عبد الله بن سلمة يحدثنا فنعرف وننكر، كان قد كبر.

وروي عن ابن عباس قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم على علي وفاطمة وهما يضحكان، فلما رأيا النبي صلى الله عليه وسلم سكتا، فقال لهما النبي صلى الله عليه وسلم:"ما لكما كنتما تضحكان، فلما رأيتماني سكتما؟" فبادرت فاطمة، فقالت: بأبي أنت يا رسول الله، قال: هذا أنا أحب إلى رسول الله منك، فقلت: بل أنا أحب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم منك، فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال:"يا بنية لك رقة الولد، وعلي أعز علي منك".

رواه الطبراني في الكبير (11063) عن عبد الرحمن بن خلاد الدورقي، ثنا ملحان بن سليمان الدورقي، ثنا عبد الله بن داود الخريبي، ثنا الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.

ذكره الهيثمي في المجمع (9/ 202) وقال:"رواه الطبراني ورجاله رجال الصحيح".

قلت: فيه شيخ الطبراني وشيخ شيخه لم أقف على ترجمتهما.

وروي عن هبيرة بن يريم قال: خطبنا الحسن بن علي رضي الله عنه، فقال: لقد فارقكم رجل بالأمس لم يسبقه الأولون بعلم، ولا يدركه الآخرون، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يبعثه بالراية: جبريل عن يمينه، وميكائيل عن شماله، لا ينصرف حتى يفتح له.

رواه أحمد (1719) -واللفظ له-، والنسائي في خصائص علي (23)، وصحّحه ابن حبان (6936)، والطبراني في الكبير (3/ 79 - 81) كلهم من طرق، عن أبي إسحاق (هو السبيعي)، عن هبيرة بن يريم قال: فذكره.

قلت: ظاهر إسناده لا بأس به، ولكن في متنه نكارة، وهبيرة بن يريم رمي بالتشيع.

ورواه البزار في مسنده (1340) عن عمرو بن علي قال: حَدَّثَنَا أبو عاصم قال: حَدَّثَنَا سكين بن عبد العزيز، قال: حدثني حفص بن خالد قال: حدثني أبي خالد بن جابر قال: لما قُتِلَ علي بن أبي طالب رضي الله عنه قام الحسن بن علي خطيبا، فقال: قد قتلتم والله! الليلة رجلا في الليلة التي أنزل فيها القرآن، وفيها رفع عيسى بن مريم، وفيها قتل يوشع بن نون فتى موسى.

قال سكين: حدثني رجل قد سماه قال: وفيها تيب على بني إسرائيل - ثم رجع إلى حديث حفص بن خالد فقال: والله! ما سبقه أحد كان قبله ولا يدركه أحد كان بعده، والله! إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليبعثه في السرية جبريل عن يمينه وميكائيل عن يساره، والله! ما ترك من صفراء ولا بيضاء إلا ثمان مائة درهم أو سبع مائة درهم كان أعدها لخادم.

وقال:"هذا الحديث بهذه الألفاظ لَا نعلم أَحَدًا يرويها إلا الحسن بن علي بهذا الإسناد، وإسناده صالح، ولا نعلم يحدث عن حفص بن خالد غير سكين بن عبد العزيز".

قلت: في إسناده حفص بن خالد وأبوه خالد بن جابر مجهولان.
وقال ابن كثير في البداية والنهاية (11/ 28):"وهذا حديث غريب جدا، وفيه نكارة".

وروي عن علي بن أبي طالب قال: قال لي عبد الله بن سلَّام، وقد وضعت رجلي في الغرز وأنا أريد العراق: لا تأت أهل العراق، فإنك إن أتيتهم أصابك ذباب السيف بها. قال علي: وأيم الله لقد قالها لي رسول الله. قال أبو الأسود: فقلت في نفسي: ما رأيت كاليوم رجلا محاربا يحدث الناس بمثل هذا.

رواه الحميدي (53)، والبزار (718)، وأبو يعلى (491)، وابن حبان (6733)، والحاكم (3/ 140) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، حدثنا عبد الملك بن أعين، عن أبي حرب بن أبي الأسود الدؤلي، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.

قلت: وهو كما قال إلا أن عبد الملك بن أعين رافضي، له حديث واحد في الصحيحين متابعة، ولذا تعقبه الذهبي بقوله:"ابن أعين غير مرضي".

وروي عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر الشمس فتأخرت ساعة من نهار.

رواه الطبراني في الأوسط (4051) عن علي بن سعيد، ثنا أحمد بن عبد الرحمن بن المفضل الحراني، ثنا الوليد بن عبد الواحد التميمي، ثنا معقل بن عبيد الله، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وقال الطبراني:"لم يروه عن معقل إلا الوليد، تفرد به أحمد بن عبد الرحمن، ولم يرو عن أبي الزبير إلا معقل".

قلت: معقل بن عبيد الله مختلف فيه، والغالب عليه الضعف، كما أنه تفرد به عن أبي الزبير.

وروي عن أسماء بنت عميس قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوحى إليه، ورأسه في حجر عليٍّ، فلم يصل العصر حتى غربت الشمس، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صليت يا علي؟" قال: لا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم! إنه كان في طاعتك وطاعة رسولك فاردد عليه الشمس" قالت أسماء: فرأيتها غربت، ثم رأيتها طلعت بعدما غربت.

فإسناده ضعيف أيضا، رواه الطحاوي في شرح المشكل (1067)، والطّبراني في الكبير (24/ 147، 152)، والعقيلي في الضعفاء (3/ 327)، والجوزقاني في الأباطيل (1/ 158)، وابن الجوزي في الموضوعات (667) كلهم من طرق عن فضيل بن مرزوق، عن إبراهيم بن الحسن، عن فاطمة بنت الحسين، عن أسماء بنت عميس فذكرته.

قال ابن الجوزي:"هذا الحديث موضوع بلا شك".

وقال الجوزقاني:"هذا حديث منكر مضطرب".

قلت: في سنده الفضيل بن مرزوق، مختلف فيه، وإبراهيم بن الحسن لم أقف فيه على جرح ولا تعديل، فهو في عداد المجهولين.
وأيضا فإن هذه القصة وقعت بخيبر، كما في بعض الروايات، والمسلمون كانوا أكثر من ألف وأربعمائة، وهي حادثة عظيمة لو وقعت لاشتهرت وتوفرت الهمم والدواعي على نقلها، ويمتنع أن ينفرد بنقله واحد واثنان، ولو نقله الصحابة لنقله منهم أهل العلم كما نقلوا أمثاله، ولم ينفرد به المجهولون الذين لا يعرف ضبطهم وعدالتهم، وليس في جميع أسانيد هذا الحديث إسناد واحد يثبت، تعلم عدالة ناقليه وضبطهم، ولا يعلم اتصال إسناده. هذا ملخص كلام شيخ الإسلام ابن تيمية وتلميذه الذهبي. انظر: منهاج السنة (4/ 184) وترتيب الموضوعات للذهبي.

وروي عن قيس بن عباد قال: قلت لعلي: أخبرْنا عن مسيرك هذا، أعهدٌ عهده إليك رسول الله صلى الله عليه وسلم أم رأيٌ رأيتَه؟ فقال: ما عهِدَ إليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بشيءٍ، ولكنه رأي رأيته. رواه أبو داود (4666)، وعبد الله بن أحمد في زوائد المسند (1271) كلاهما من حديث إسماعيل بن إبراهيم الهذلي، حدثنا ابن علية، عن يونس (هو ابن عبيد)، عن الحسن، عن قيس بن عباد فذكره. وإسناده صحيح.

والحسن البصري وإن كان مدلّسا إلا أن شيخه قيس بن عباد تابعي، وكلاهما بصريان معاصران، فيستبعد أن يكون بينهما أحدٌ.

ورواه أحمد (1207) عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن علي بن زيد، عن الحسن، عن قيس ابن عباد، أطول من هذا، وفيه:"والله ما عهدَ إليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عهدا إلا شيئا عهده إلى الناس، ولكن الناس وقعوا على عثمان فقتلوه، فكان غيري فيه أسوأ حالا وفعلا مني، ثم رأيتُ أني أحقهم بهذا الأمر، فوثبتُ عليه، والله أعلم أصبْنا أم أخطأنا. وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف.

وفي الباب أحاديث أخرى ضعيفة وموضوعة.




আবু সিনান ইয়াযীদ ইবনু উমাইয়াহ আদ-দুআলী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একবার মারাত্মকভাবে অসুস্থ হয়ে পড়েন, এমনকি তিনি দুর্বল হয়ে পড়েন এবং আমরা তার জন্য ভীত হয়ে পড়ি। এরপর তিনি আরোগ্য লাভ করেন ও সুস্থ হয়ে ওঠেন। তখন আমরা বললাম: হে আবুল হাসান, আপনাকে অভিনন্দন! আল্লাহকে ধন্যবাদ যিনি আপনাকে আরোগ্য দান করেছেন। আমরা আপনার ব্যাপারে খুবই ভীত ছিলাম।

তিনি (আলী রাঃ) বললেন: কিন্তু আমি আমার নিজের জন্য ভীত ছিলাম না। কারণ সত্যবাদী সত্যায়নকারী (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জানিয়েছেন যে, আমি ততক্ষণ পর্যন্ত মৃত্যুবরণ করব না, যতক্ষণ না আমার এই স্থানটিতে (তিনি তার মাথার বাম সামনের অংশে ইশারা করলেন) আঘাত করা হয় এবং এই স্থানটি রক্তে রঞ্জিত হয় (তিনি তার দাড়ি ধরলেন) এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "এই উম্মতের মধ্যে সবচেয়ে হতভাগ্য ব্যক্তি তোমাকে হত্যা করবে, যেমন সামূদ জাতির অমুক গোত্রের সবচেয়ে হতভাগ্য ব্যক্তি আল্লাহর উটনীকে হত্যা করেছিল।"

তিনি (রাবী) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (হত্যাকারীকে) সামূদ জাতির অমুক শাখার দিকে সম্বন্ধিত করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9751)


9751 - عن علي قال: اقضوا كما كنتم تقضون، فإني أكره الاختلاف، حتى يكون للناس جماعة أو أموت كما مات أصحابي.

فكان ابن سيرين يرى أن عامة ما يروى عن علي الكذب.

صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3707) عن علي بن الجعد، أنا شعبة، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن عبيدة، عن علي قال: فذكره.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তোমরা সেভাবেই বিচার করো যেভাবে তোমরা আগে বিচার করতে। কারণ, আমি মতপার্থক্যকে অপছন্দ করি, যতক্ষণ না মানুষের মধ্যে ঐক্য প্রতিষ্ঠিত হয়, অথবা আমার সাথীরা যেভাবে মৃত্যুবরণ করেছে, আমিও সেভাবে মৃত্যুবরণ করি। ইবনু সীরীন মনে করতেন যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা কিছু বর্ণনা করা হয়, তার অধিকাংশই মিথ্যা। (সহীহ)









আল-জামি` আল-কামিল (9752)


9752 - عن سعد بن عبيدة قال: جاء رجل إلى ابن عمر فسأله عن عثمان، فذكر عن محاسن عمله، قال: لعل ذاك يسوؤك؟ قال: نعم. قال: فأرغم الله بأنفك. ثم سأله عن علي، فذكر محاسن عمله، قال: هو ذاك بيته أوسط بيوت النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال: لعل ذاك يسوؤك؟ قال: أجل. قال: فأرغم الله بأنفك، انطلق فاجهد علي جهدك.
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3704) عن محمد بن رافع، ثنا حسين، عن زائدة، عن أبي حصين، عن سعد بن عبيدة قال: فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা’দ ইবনু উবাইদা বলেছেন: একজন লোক ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি (ইবনু উমর) তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উত্তম আমলগুলো উল্লেখ করলেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, সম্ভবত এটা তোমার খারাপ লাগছে? লোকটি বলল, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আল্লাহ তোমার নাক ধূলিসাৎ করুন (আল্লাহ তোমাকে লাঞ্ছিত করুন)। এরপর লোকটি তাঁকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উত্তম আমলগুলো উল্লেখ করলেন এবং বললেন, তিনি তো সেই ব্যক্তি, যার ঘর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরসমূহের মাঝখানে অবস্থিত ছিল। এরপর তিনি বললেন, সম্ভবত এটা তোমার খারাপ লাগছে? লোকটি বলল, অবশ্যই। তিনি বললেন, আল্লাহ তোমার নাক ধূলিসাৎ করুন। তুমি যাও, আমার বিরুদ্ধে তোমার সব প্রচেষ্টা ব্যয় করো।









আল-জামি` আল-কামিল (9753)


9753 - عن عبيد الله بن عياض بن عمرو القاري قال: جاء عبد الله بن شداد فدخل على عائشة، ونحن عندها جلوس، مرجعه من العراق ليالي قتل علي، فقالت له: يا عبد الله بن شداد! هل أنت صادقي عما أسألك عنه؟ تحدثني عن هؤلاء القوم الذين قتلهم علي. قال: وما لي لا أصدقك؟ قالت: فحدثني عن قصتهم.

قال فإن عليا لما كاتب معاوية، وحكم الحكمين، خرج عليه ثمانية آلاف من قُرّاء الناس، فنزلوا بأرض يقال لها: حَروراء من جانب الكوفة، وإنهم عَتِبوا عليه فقالوا: انسلختَ من قميص ألبسكه الله تعالى، واسم سماك الله تعالى به، ثم انطلقتَ، فحكّمتَ في دين الله، فلا حكم إلا لله تعالى.

فلما أن بلغ عليًّا ما عتبوا عليه، وفارقوه عليه، فأمر مؤذنا فأذّن: أن لا يدخل على أمير المؤمنين إلا رجل قد حمل القرآن، فلما أن امتلأت الدار من قُرَّاء الناس دعا بمصحف إمام عظيم، فوضعه بين يديه، فجعل يصكه بيده ويقول: أيها المصحف حدِّث الناسَ، فناداه الناس، فقالوا: يا أمير المؤمنين! ما تسأل عنه إنما هو مداد في ورق، ونحن نتكلم بما رُوينا منه، فماذا تريد؟ قال: أصحابكم هؤلاء الذين خرجوا، بيني وبينهم كتاب الله يقول الله تعالى في كتابه في امرأة ورجل: {وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُوا حَكَمًا مِنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِنْ أَهْلِهَا إِنْ يُرِيدَا إِصْلَاحًا يُوَفِّقِ اللَّهُ بَيْنَهُمَا} [النساء: 35]. فأمة محمد صلى الله عليه وسلم أعظم دمًا وحرمةً من امرأة ورجل.

ونقموا عليَّ أن كاتبت معاوية: كتب علي بن أبي طالب، وقد جاءنا سهيل بن عمرو، ونحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالحديبية، حين صالح قومه قريشا، فكتب رسول الله صلى الله عليه وسلم بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ فقال سهيل: لا تكتب بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، فقال: كيف نكتب؟ فقال: اكتب باسمك اللهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فاكتبْ محمد رسول الله"، فقال لو أعلم أنك رسول الله، لم أُخالفْك، فكتب: هذا ما صالح محمد بن عبد الله قريشا. يقول الله تعالى في كتابه: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ} [الأحزاب: 21].

فبعث إليهم عليٌّ عبدَ الله بن عباس فخرجتُ معه، حتى إذا توسطنا عسكرهم قام ابن الكوّاء يخطب الناس فقال: يا حملة القرآن! إن هذا عبد الله بن عباس، فمن لم يكن
يعرفه فأنا أعرفه من كتاب الله ما يعرفه به هذا ممن نزل فيه وفي قومه {قَوْمٌ خَصِمُونَ} [الزخرف: 58].

فردُّوه إلى صاحبه، ولا تواضعوه كتاب الله، فقام خطباؤهم فقالوا: والله! لنواضعنه كتاب الله، فإن جاء بحق نعرفه لنتبعنّه، وإن جاء بباطل لنُبكتنَّه بباطله، فواضعوا عبد الله الكتاب ثلاثة أيام، فرجع منهم أربعة آلاف كلهم تائب، فيهم ابن الكوّاء، حتى أدخلهم على عليٍّ الكوفة، فبعث علي إلى بقيتهم، فقال: قد كان من أمرنا وأمر الناس ما قد رأيتم، فقفوا حيث شئتم، حتى تجتمع أمة محمد صلى الله عليه وسلم، بيننا وبينكم أن لا تسفكوا دمًا حرامًا، أو تقطعوا سبيلًا، أو تظلموا ذمةً، فإنكم إن فعلتم فقد نبذنا إليكم الحربَ على سواء، إن الله لا يحب الخائنين.

فقالت له عائشة: يا ابن شداد، فقد قتلهم! فقال: والله! ما بعث إليهم حتى قطعوا السبيل، وسفكوا الدم، واستحلوا أهل الذمة، فقالت: آلله؟ قال: آلله الذي لا إله إلا هو لقد كان. قالت: فما شيء بلغني عن أهل العراق يتحدثونه؟ يقولون: ذو الثدي، وذو الثدي. قال: قد رأيته، وقمت مع علي عليه في القتلى، فدعا الناس فقال: أتعرفون هذا؟ فما أكثر من جاء يقول: قد رأيته في مسجد بني فلان يصلي، ورأيته في مسجد بني فلان يصلي، ولم يأتوا فيه بثبتٍ يُعرف إلا ذلك، قالت: فما قول علي حين قام عليه كما يزعم أهل العراق؟ قال: سمعته يقول: صدق الله ورسوله، قالت: هل سمعت منه أنه قال غير ذلك؟ قال: اللهم لا. قالت: أجل، صدق الله ورسوله، يرحم الله عليا إنه كان من كلامه لا يرى شيئا يعجبه إلا قال: صدق الله ورسوله، فيذهب أهل العراق يكذبون عليه، ويزيدون عليه في الحديث.

حسن: رواه أحمد (656)، وأبو يعلى (474) كلاهما من طريق يحيى بن سُليم، عن عبد الله ابن عثمان بن خُثيم، عن عبيد الله بن عياض بن عمرو القاري قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل يحيى بن سليم الطائفي وعبد الله بن عثمان بن خثيم فإنهما حسنا الحديث.

وقال الهيثمي في"المجمع" (6/ 235):"رجاله ثقات".



فضائل بقية العشرة المبشرين بالجنة وهم:

1 - طلحة بن عبيد الله

2 - الزبير بن العوام

3 - سعد بن أبي وقاص
4 - عبد الرحمن بن عوف

5 - أبو عبيدة بن الجراح

6 - سعيد بن زيد




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। উবাইদুল্লাহ ইবনু ইয়াদ ইবনু আমর আল-কারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহাদাতের কয়েক রাত আগে যখন আব্দুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ ইরাক থেকে ফিরে এলেন, তখন তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলেন, আর আমরা তাঁর কাছে উপবিষ্ট ছিলাম। তিনি [আয়িশা] তাঁকে বললেন: হে আব্দুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ! আমি তোমাকে যা জিজ্ঞেস করব, তুমি কি সে বিষয়ে আমার সাথে সত্য কথা বলবে? তুমি কি আমাকে সেই লোকদের সম্পর্কে বলবে যাদেরকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হত্যা করেছিলেন? তিনি [আব্দুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ] বললেন: আমি কেন আপনাকে সত্য কথা বলব না? তিনি [আয়িশা] বললেন: তাহলে আমাকে তাদের ঘটনা বলো।

তিনি বললেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে চিঠি চালাচালি করলেন এবং দুইজন সালিশ নিযুক্ত করলেন, তখন আট হাজার কুরআন পাঠক (কুররা) তাঁর বিরুদ্ধে বেরিয়ে গেল। তারা কুফার পার্শ্ববর্তী হারূরা নামক স্থানে অবস্থান নিল। তারা তাঁর প্রতি অসন্তুষ্ট ছিল এবং বলেছিল: আপনি সেই পোশাক পরিত্যাগ করেছেন যা আল্লাহ আপনাকে পরিয়েছিলেন এবং সেই নাম পরিত্যাগ করেছেন যা আল্লাহ আপনাকে দিয়েছিলেন। অতঃপর আপনি আল্লাহর দ্বীনের ব্যাপারে সালিশ নিযুক্ত করলেন। অথচ আল্লাহ তাআলা ছাড়া কারো হুকুম (বিধান) নেই।

যখন আলীর নিকট তাদের অভিযোগ পৌঁছল এবং যে কারণে তারা তাঁর থেকে বিচ্ছিন্ন হলো তা জানা গেল, তখন তিনি একজন ঘোষককে নির্দেশ দিলেন, যাতে ঘোষণা করা হয়: 'আমীরুল মুমিনীন-এর কাছে যেন কেবল তারাই প্রবেশ করে, যারা কুরআন মুখস্থ করেছে।' যখন ঘর কুরআন পাঠকদের ভিড়ে পূর্ণ হলো, তখন তিনি একটি বিশাল মূল কুরআনের কপি আনতে বললেন। তিনি তা নিজের সামনে রাখলেন এবং হাত দিয়ে এর উপর আঘাত করে বললেন: হে কুরআন! মানুষের সাথে কথা বলো। লোকেরা তখন তাঁকে ডেকে বলল: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি কী জিজ্ঞেস করছেন? এটি তো কাগজে কালি মাত্র। আমরাই তো এর থেকে যা বর্ণিত হয়েছে তা নিয়ে কথা বলি। আপনি কী চান? তিনি বললেন: তোমাদের এই সঙ্গীরা যারা বেরিয়ে গেছে, আমার এবং তাদের মাঝে আল্লাহর কিতাবই বিচারক। আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে একজন নারী ও একজন পুরুষ সম্পর্কে বলেন: {وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُوا حَكَمًا مِنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِنْ أَهْلِهَا إِنْ يُرِيدَا إِصْلَاحًا يُوَفِّقِ اللَّهُ بَيْنَهُمَا} (যদি তোমরা তাদের উভয়ের মধ্যে বিরোধের আশঙ্কা করো, তবে পুরুষের পরিবার হতে একজন সালিশ এবং নারীর পরিবার হতে একজন সালিশ নিযুক্ত করবে; যদি তারা দুজন শান্তি স্থাপন করতে চায়, তবে আল্লাহ তাদের মধ্যে মিল করিয়ে দেবেন।) [সূরা আন-নিসা: ৩৫]। অতএব, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের রক্ত ও মর্যাদা একজন নারী ও একজন পুরুষের চেয়েও অনেক বেশি গুরুতর।

তারা আমার উপর অসন্তুষ্ট হয়েছে যে, আমি মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে চিঠি চালাচালি করেছি এবং তাতে ‘আলী ইবনু আবী তালিব’ লিখেছি। (স্মরণ করো) যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুদায়বিয়ায় ছিলাম এবং তিনি তাঁর গোত্র কুরাইশদের সাথে সন্ধি করছিলেন, তখন সুহাইল ইবনু আমর আমাদের কাছে এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লিখলেন: بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ (বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম)। সুহাইল বলল: আপনি بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ লিখবেন না। তিনি [নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] বললেন: তাহলে আমরা কীভাবে লিখব? সে বলল: আপনি লিখুন: بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ (বিসমিকা আল্লাহুম্মা)। তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তাহলে তুমি লিখো: মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ (আল্লাহর রাসূল মুহাম্মাদ)।’ তখন সে বলল: আমি যদি জানতাম যে আপনি আল্লাহর রাসূল, তবে আমি আপনার বিরোধিতা করতাম না। তখন লেখা হলো: ‘এ সেই সন্ধি যা মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ কুরাইশদের সাথে করেছেন।’ আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে বলেন: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ} (নিশ্চয়ই তোমাদের জন্য আল্লাহর রাসূলের মধ্যে উত্তম আদর্শ রয়েছে, তাদের জন্য যারা আল্লাহ ও আখেরাতের আশা রাখে।) [সূরা আল-আহযাব: ২১]।

অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের নিকট আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রেরণ করলেন এবং আমিও তাঁর সাথে বেরিয়ে পড়লাম। আমরা যখন তাদের শিবিরের মাঝখানে পৌঁছলাম, তখন ইবনু আল-কাওয়্যা দাঁড়িয়ে লোকদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: হে কুরআনের ধারকগণ! ইনি হলেন আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস। যে তাঁকে না চেনে, আমি তাঁকে চিনিয়ে দিচ্ছি। ইনি সেই লোক, যার ও যার কওমের ব্যাপারে আল্লাহর কিতাবে এ কথা নাযিল হয়েছে: {قَوْمٌ خَصِمُونَ} (এক ঝগড়াটে জাতি) [সূরা আয-যুুখরুফ: ৫৮]। অতএব, তোমরা তাঁকে তার সাথীর নিকট ফিরিয়ে দাও এবং আল্লাহর কিতাব নিয়ে তাঁর সাথে তর্ক-বিতর্ক করো না। তখন তাদের বক্তারা দাঁড়িয়ে বলল: আল্লাহর শপথ! আমরা অবশ্যই আল্লাহর কিতাব নিয়ে তাঁর সাথে তর্ক-বিতর্ক করব। যদি তিনি এমন কোনো সত্য নিয়ে আসেন যা আমরা জানি, তবে আমরা অবশ্যই তাঁকে অনুসরণ করব। আর যদি তিনি কোনো বাতিল নিয়ে আসেন, তবে আমরা তাঁর বাতিল দিয়েই তাঁকে পরাভূত করব। অতঃপর তারা তিন দিন আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে কিতাব (কুরআন) নিয়ে বিতর্ক করল। ফলে তাদের মধ্যে থেকে ইবনু আল-কাওয়্যাসহ চার হাজার লোক তওবা করে ফিরে এলো। তিনি তাদেরকে আলীর নিকট কুফায় নিয়ে আসলেন।

অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাকিদের কাছে বার্তা পাঠালেন এবং বললেন: আমার ও মানুষের ব্যাপারটি তোমরা তো দেখেছ। তোমরা যেখানে ইচ্ছা অবস্থান করো, যতক্ষণ না মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মত একত্রিত হয়। আমাদের ও তোমাদের মাঝে চুক্তি হলো এই যে, তোমরা কোনো হারাম রক্তপাত ঘটাবে না, অথবা পথ অবরোধ করবে না, অথবা কোনো চুক্তিবদ্ধ (জিম্মি) লোকের উপর যুলম করবে না। যদি তোমরা তা করো, তবে আমরা তোমাদের বিরুদ্ধে সমানভাবে যুদ্ধ ঘোষণা করলাম। নিশ্চয়ই আল্লাহ খিয়ানতকারীদের ভালোবাসেন না।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে ইবনু শাদ্দাদ! তাহলে তো আলী তাদেরকে হত্যা করেছিলেন! তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! পথ অবরোধ করা, রক্তপাত ঘটানো এবং চুক্তিবদ্ধ (জিম্মি) লোকদের জীবন হালাল করার আগ পর্যন্ত তিনি তাদের বিরুদ্ধে অভিযান পাঠাননি। তিনি [আয়িশা] বললেন: আল্লাহর কসম? তিনি বললেন: সেই আল্লাহর কসম, যিনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, ঠিক তাই হয়েছিল। তিনি [আয়িশা] বললেন: ইরাকবাসীরা যা আলোচনা করে সেই ‘যূস-সাদয়’ (‘বক্ষওয়ালা’) এবং ‘যূস-সাদয়’ সম্পর্কে আমার নিকট কী খবর পৌঁছেছে? তিনি বললেন: আমি তাকে দেখেছি এবং নিহতদের মাঝে আলীর সাথে দাঁড়িয়েছিলাম। তিনি লোকদেরকে ডাকলেন এবং বললেন: তোমরা কি একে চেনো? তখন অনেক লোক এসে বলল: আমরা তাকে বনী অমুকের মসজিদে সালাত আদায় করতে দেখেছি, এবং বনী অমুকের মসজিদে সালাত আদায় করতে দেখেছি। তবে এর বাইরে কোনো নিশ্চিত প্রমাণ তারা পেশ করতে পারেনি।

তিনি [আয়িশা] বললেন: ইরাকবাসীরা যেমন ধারণা করে, এর উপর দাঁড়িয়ে আলীর কথা কী ছিল? তিনি বললেন: আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। তিনি [আয়িশা] বললেন: তুমি কি তাঁকে এর থেকে ভিন্ন কিছু বলতে শুনেছ? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, না। তিনি [আয়িশা] বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। আল্লাহ আলীর উপর রহম করুন। তাঁর স্বভাব এমন ছিল যে, যখনই তিনি কোনো কিছু দেখে মুগ্ধ হতেন, তখনই বলতেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। আর ইরাকবাসীরা তাঁর নামে মিথ্যা রচনা করে এবং হাদীসে যোগ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (9754)


9754 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عشرة من قريش في الجنة، أبو بكر في الجنة، وعمر في الجنة، وعثمان في الجنة، وعلي في الجنة، وطلحة في الجنة، والزبير في الجنة، وسعد وسعيد في الجنة، وعبد الرحمن بن عوف في الجنة، وأبو عبيدة بن الجراح في الجنة".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (13823) وفي الأوسط (2222) وفي الصغير (62) من طرق عن حامد بن يحيى البلخي، عن سعير بن الخِمس، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عمر فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (14877):"رواه الطبراني في الثلاثة، ورجاله رجال الصحيح غير حامد بن يحيى البلخي وهو ثقة".

وإسناده حسن من أجل سعير بن الخِمس، فإنه حسن الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরাইশ গোত্রের দশজন জান্নাতে যাবে। আবূ বকর জান্নাতে, উমর জান্নাতে, উসমান জান্নাতে, আলী জান্নাতে, তালহা জান্নাতে, যুবাইর জান্নাতে, সা‘দ ও সাঈদ জান্নাতে, আবদুর রহমান ইবনু আউফ জান্নাতে এবং আবূ উবাইদা ইবনুল জাররাহ জান্নাতে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9755)


9755 - عن * *




* হতে ...









আল-জামি` আল-কামিল (9756)


9756 - عن الزبير بن العوام قال: كان على النبي صلى الله عليه وسلم درعان يوم أحد، فنهض إلى الصخرة، فلم يستطع، فأقعد طلحة تحته، فصعد النبي صلى الله عليه وسلم عليه حتى استوى على الصخرة، فقال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"أوجب طلحة".

حسن: رواه الترمذي (1692، 3738)، وأحمد (1417)، وصحّحه ابن حبان (6979)، والحاكم (3/ 374)، والبيهقي (6/ 370 و 9/ 46) كلهم من طرق عن محمد بن إسحاق قال: حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن جده عبد الله بن الزبير، عن الزبير بن العوام فذكره. وسقط ذكر"أبيه" من ابن حبان. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث محمد بن إسحاق" وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

وقوله:"أوجب طلحة" أي عمل عملا أوجب له الجنة.




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উহুদ যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিধানে দুটি বর্ম ছিল। তিনি একটি পাথরের উপর উঠতে চাইলেন, কিন্তু পারলেন না। তখন তিনি তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তার নিচে বসালেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উপর ভর করে সেই পাথরের উপর উঠে স্থির হলেন। (যুবাইর) বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তালহা (জান্নাতকে) ওয়াজিব করে নিয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9757)


9757 - عن عبد الله بن الزبير قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"أوجب طلحة". حين صنع ما صنع برسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد كان الناس انهزموا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى انتهى بعضهم إلى المنقا دون الأعوص، وفرَّ عثمان بن عفان وعقبة بن عثمان، وسعد بن عثمان رجلان من الأنصار، ثم من بني زريق حتى بلغوا الجلعب - جبلا بناحية المدينة، فأقاموا به ثلاثا، ثم رجعوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد ذهبتم فيها عريضة".

حسن: رواه محمد بن إسحاق في سيرته (514) قال: حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তালহা (জান্নাত) ওয়াজিব করে নিয়েছে।" যখন তিনি (তালহা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য যা করার তা করেছিলেন। অথচ (সেদিন) লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে (যুদ্ধক্ষেত্র ছেড়ে) পলায়ন করে চলে গিয়েছিল, এমনকি তাদের কেউ কেউ আল-মানকা পর্যন্ত পৌঁছেছিল, যা আল-আওসের নিকটস্থ নয়। আর উসমান ইবনু আফফান, উক্ববা ইবনু উসমান এবং সা'দ ইবনু উসমান – এই দুইজন আনসারী ব্যক্তি যারা বনু যুরাইকের ছিলেন – তাঁরা পালিয়ে জালআব নামক স্থানে পৌঁছেছিলেন, যা মদীনার নিকটস্থ একটি পর্বত। সেখানে তাঁরা তিন দিন অবস্থান করলেন। অতঃপর তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা তো অনেক লম্বা পথ পাড়ি দিয়ে গিয়েছিলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9758)


9758 - عن أنس عن أبي طلحة قال: كنت فيمن تغشاه النعاس يوم أحد، حتى سقط سيفي من يدي مرارا، يسقط وآخذه، ويسقط فآخذه.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4068) عن خليفة، ثنا يزيد بن زريع، ثنا سعيد، عن
قتادة، عن أنس، عن أبي طلحة قال: فذكره.




আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম সেই লোকদের মধ্যে, যাদেরকে উহুদ দিবসে তন্দ্রা আচ্ছন্ন করেছিল। এমনকি আমার হাত থেকে আমার তলোয়ার বারবার পড়ে যাচ্ছিল। সেটি পড়ে যেত এবং আমি তা ধরে নিতাম, আবার পড়ে যেত এবং আমি তা ধরে নিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (9759)


9759 - عن طلحة أن أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قالوا لأعرابي جاهل: سَلْه عمن قضى نحبه من هو؟ وكانوا لا يجترؤون على مسألته، يوقّرونه ويهابونه، فسأله الأعرابي فأعرض عنه، ثم سأله فأعرض عنه، ثم سأله فأعرض عنه، ثم إني اطلعت من باب المسجد، وعليّ ثياب خضر، فلما رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أين السائل عمن قضى نحبه". قال الأعرابي أنا يا رسول الله. قال:"هذا ممن قضى نحبه".

حسن: رواه الترمذي (3203، 3742)، والبزار (943)، وأبو يعلى (663) كلهم من طريق يونس بن بكير، حدثنا طلحة بن يحيى، عن موسى وعيسى ابنى طلحة، عن أبيهما طلحة فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث أبي كريب عن يونس بن بكير. وقد رواه غير واحد من كبار أهل الحديث عن أبي كريب بهذا الحديث.

وسمعت محمد بن إسماعيل يحدث بهذا عن أبي كريب ووضعه في كتاب"الفوائد".

وهو كما قال؛ فإن طلحة بن يحيى مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد توبع.

رواه الطبراني في الكبير (1/ 76) عن يحيى بن عثمان بن صالح، ثنا سليمان بن أيوب، حدثني أبي، عن جدي، عن موسى بن طلحة، عن أبيه قال: لما رجع النبي صلى الله عليه وسلم من أحد صعد المنبر، فحمد الله عز وجل وأثنى عليه، ثم قرأ هذه الآية {رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ} الآية كلها، فقام إليه رجل، فقال: يا رسول الله، من هؤلاء؟ فأقبلت وعلي ثوبان أخضران فقال:"أيها السائل هذا منهم".

وسليمان بن أيوب هو ابن سليمان بن عيسى بن موسى الطلحي قال فيه ابن عدي: عامة أحاديثه لا يُتابع عليها، ووثّقه يعقوب بن شيبة، وذكره ابن حبان في الثقات.

وأبوه وجده مجهولان لا يوجد فيهما توثيق لمعتبر، ولكنه لا بأس بهما في المتابعة.

وروي عن جابر بن عبد الله قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من سرّه أن ينظر إلى شهيد على وجه الأرض، فلينظر إلى طلحة بن عبيد الله".

رواه الترمذي (3739)، وابن ماجه (125) كلاهما من طريق الصلت بن دينار الأزدي، عن أبي نضرة (وهو المنذر بن مالك)، عن جابر فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث الصلت، وقد تكلم بعض أهل العلم في الصلت بن دينار، وضعّفه، وتكلّموا في صالح بن موسى".

قلت: وهو كما قال؛ فإن الصلت بن دينار متروك، قال ابن حبان: كان ممن يشتم أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، ويبغض علي بن أبي طالب وينال منه ومن أهل بيته على كثرة المناكير في روايته.




তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ একজন অজ্ঞ বেদুঈনকে বললেন: যে ব্যক্তি তার প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করেছে (বা শহীদ হয়েছে), সে কে— আপনি তাঁকে (নবীকে) জিজ্ঞাসা করুন। সাহাবীগণ তাঁকে সম্মান ও ভয়ের কারণে এই প্রশ্ন করার সাহস পাচ্ছিলেন না। অতঃপর বেদুঈন লোকটি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলে তিনি তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তারপর সে আবার জিজ্ঞাসা করল, তবুও তিনি মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তারপর সে তৃতীয়বার জিজ্ঞাসা করল, তখনও তিনি মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর আমি (তালহা) মসজিদের দরজা দিয়ে প্রবেশ করলাম, আর আমার পরনে ছিল সবুজ কাপড়। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে দেখলেন, তখন তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি তার প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করেছে, সেই বিষয়ে প্রশ্নকারী কোথায়?" বেদুঈন লোকটি বলল: আমি, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "এই ব্যক্তি (তালহা) তাদের অন্তর্ভুক্ত, যারা তাদের প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9760)


9760 - عن السائب بن يزيد قال: صحبتُ عبد الرحمن بن عوف، وطلحة بن عبيد الله، والمقداد، وسعدا رضي الله عنهم، فما سمعت أحدا منهم يحدث عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا أني سمعت طلحة يحدث عن يوم أحد.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4062) عن عبد الله بن أبي الأسود، ثنا حاتم بن إسماعيل، عن محمد بن يوسف قال: سمعت السائب فذكره.




সায়িব ইবন ইয়াযিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি আবদুর রহমান ইবন আওফ, তালহা ইবন উবাইদুল্লাহ, মিকদাদ ও সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাহচর্য লাভ করেছি। আমি তাদের কাউকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে (ব্যাপকভাবে) হাদীস বর্ণনা করতে শুনিনি, তবে আমি তালহাকে উহুদ দিবসের ঘটনা সম্পর্কে বর্ণনা করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (9761)


9761 - عن قيس بن أبي حازم قال: رأيت يد طلحة شلَّاء وقى بها النبي صلى الله عليه وسلم يوم أحد.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4063) عن عبد الله بن أبي شيبة، حدثنا وكيع، عن إسماعيل، عن قيس فذكره.




কায়স ইবনু আবী হাযিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতকে অবশ অবস্থায় দেখলাম, যার দ্বারা তিনি উহুদের দিন নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রক্ষা করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9762)


9762 - عن جابر بن عبد الله قال: لما كان يوم أحد وولى الناس، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم في ناحية في اثنى عشر رجلا من الأنصار، وفيهم طلحة بن عبيد الله، فأدركهم المشركون فالتفت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال:"من للقوم؟" فقال طلحة: أنا. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كما أنت". فقال رجل من الأنصار: أنا يا رسول الله! فقال:"أنت" فقاتل حتى قتل، ثم التفت فإذا المشركون، فقال:"من للقوم؟" فقال طلحة: أنا. قال:"كما أنت" فقال رجل من الأنصار: أنا. فقال:"أنت" فقاتل حتى قتل، ثم لم يزل يقول ذلك، ويخرج إليهم رجل من الأنصار فيقاتل قتال من قبله حتى يقتل، حتى بقي رسول الله صلى الله عليه وسلم وطلحة بن عبيد الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من للقوم؟" فقال طلحة: أنا. فقاتل طلحة قتال الأحد عشر، حتى ضربت يده، فقطعت أصابعه، فقال: حس. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو قلت: بسم الله لرفعتك الملائكة والناس ينظرون". ثم رد الله المشركين.

حسن: رواه النسائي (3149)، -وعنه ابن السني في عمل اليوم والليلة (670) - عن عمرو بن سوَّاد قال: أنبأنا ابن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، وذكر آخر قبله، عن عمارة بن غزية، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمارة بن غزية ويحيى بن أيوب، فإنهما حسنا الحديث.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন উহুদ যুদ্ধ সংঘটিত হলো এবং লোকেরা পিছু হটলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের বারোজন লোকের সাথে এক কোণে ছিলেন, যাদের মধ্যে তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। অতঃপর মুশরিকরা তাঁদের ধরে ফেলল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুরে দাঁড়িয়ে বললেন: "এই দলটির (মুশরিকদের) মোকাবিলা কে করবে?" তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যেমন আছো তেমনই থাকো।" তখন আনসারদের একজন লোক বললেন: আমি, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: "তুমি যাও।" অতঃপর সে যুদ্ধ করল এবং শহীদ হলো।

এরপর তিনি আবার দেখলেন যে মুশরিকরা এসে পড়েছে। তিনি বললেন: "দলটির মোকাবিলা কে করবে?" তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। তিনি বললেন: "তুমি যেমন আছো তেমনই থাকো।" তখন আনসারদের একজন লোক বললেন: আমি। তিনি বললেন: "তুমি যাও।" অতঃপর সে যুদ্ধ করল এবং শহীদ হলো।

এরপর তিনি এভাবে বলতেই থাকলেন, আর আনসারদের একজন লোক বেরিয়ে এসে তার পূর্ববর্তী ব্যক্তির মতো যুদ্ধ করে শহীদ হতে লাগল, এভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শুধু অবশিষ্ট রইলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দলটির মোকাবিলা কে করবে?" তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। এরপর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এগারোজন লোকের (সমান) যুদ্ধ করলেন। এমনকি তাঁর হাতে আঘাত করা হলো এবং তাঁর আঙ্গুলগুলো কেটে গেল। তিনি (কষ্টে) 'হিস্' বললেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি 'বিসমিল্লাহ' বলতে, তবে ফেরেশতারা তোমাকে উপরে উঠিয়ে নিত আর লোকেরা দেখত।" এরপর আল্লাহ মুশরিকদের ফিরিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9763)


9763 - عن أبي عثمان قال: لم يبق مع النبي صلى الله عليه وسلم في بعض تلك الأيام التي قاتل فيهن رسول الله صلى الله عليه وسلم غير طلحة وسعد عن حديثهما.

متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3722، 3723)، ومسلم في فضائل الصحابة (2414) كلاهما عن محمد بن أبي بكر المقدمي، ثنا معتمر، عن أبيه، عن أبي عثمان فذكره.
ومعنى قوله:"عن حديثهما" أي هما حدثاني بذلك.




আবু উসমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তিনি যে দিনগুলোতে যুদ্ধ করেছিলেন, সে দিনগুলোর মধ্যে কোনো কোনো দিনে তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত আর কেউ অবশিষ্ট ছিলেন না, যা তাঁদের উভয়ের বর্ণনা থেকে জানা যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (9764)


9764 - عن * *




৯৭৬৪ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (9765)


9765 - عن عبد الله بن الزبير قال: كنت يوم الأحزاب جعلت أنا وعمر بن أبي سلمة في النساء، فنظرت فإذا أنا بالزبير على فرسه يختلف إلى بني قريظة مرتين أو ثلاثا، فلما رجعت قلت: يا أبت، رأيتك تختلف، قال أوهل رأيتني يا بُنَيَّ؟ قلت: نعم. قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من يأت بني قريظة فيأتيني بخبرهم" فانطلقت فلما رجعت جمع لي رسول الله صلى الله عليه وسلم أبويه، فقال:"فداك أبي وأمي".

متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3720)، ومسلم في فضائل الصحابة (2416) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير قال: فذكره.

وهذا لفظ البخاري. وفي لفظ مسلم:"مع النسوة في أطم حسان" وفي لفظ آخر له:"في الأطم الذي فيه النسوة يعني نسوة النبي صلى الله عليه وسلم".




আবদুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং উমার ইবনে আবী সালামা খন্দকের (আহযাবের) দিন মহিলাদের মাঝে ছিলাম। আমি তাকিয়ে দেখলাম যে, যুবাইর (আমার পিতা) তাঁর ঘোড়ার পিঠে চড়ে বনু কুরাইযার দিকে দুই-তিনবার আসা-যাওয়া করছেন। যখন আমি ফিরে এলাম, তখন আমি বললাম, হে পিতা! আমি আপনাকে আসা-যাওয়া করতে দেখলাম। তিনি বললেন, হে আমার পুত্র! তুমি কি আমাকে দেখেছ? আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন, "কে বনু কুরাইযার কাছে গিয়ে তাদের খবর নিয়ে আসবে?" তখন আমি সেখানে গেলাম। যখন আমি ফিরে এলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার জন্য তাঁর পিতামাতা উভয়কে একত্রিত করলেন (অর্থাৎ একত্রে উল্লেখ করে সম্মান জানালেন) এবং বললেন, "আমার পিতা ও মাতা তোমার জন্য উৎসর্গ হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (9766)


9766 - عن جابر قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"من يأتيني بخبر القوم يوم الأحزاب؟" قال الزبير: أنا. ثم قال:"من يأتيني بخبر القوم؟" قال الزبير: أنا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن لكل نبي حواريا، وحواري الزبير".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2846) وفي المغازي (4113)، ومسلم في فضائل الصحابة (2415 - 48) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.

قوله:"من يأتيني بخبر القوم" أي: خبر بني قريظة في نقض العهد، وأما قصة حذيفة رضي الله عنه فكانت لخبر قريش، وكانت في ليلة شديدة البرد.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আহযাব (খন্দক) যুদ্ধের দিন কে আমাকে শত্রুদলের সংবাদ এনে দেবে?" যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি। অতঃপর তিনি (নবী) বললেন, "কে আমাকে শত্রুদলের সংবাদ এনে দেবে?" যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই প্রত্যেক নবীর একজন হাওয়ারী (বিশেষ অনুসারী) থাকে, আর যুবাইর হলো আমার হাওয়ারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (9767)


9767 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن لكل نبى حواريا، وإن حواريّ الزبير بن العوام".
حسن: رواه الترمذي (3744)، وأحمد (680) كلاهما من طريق عاصم (هو ابن أبي النجود)، عن زر، عن علي فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، ويقال الحواري هو الناصر".

قلت: إسناده حسن من أجل عاصم فإنه حسن الحديث.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই প্রত্যেক নবীর একজন হাওয়ারী (সাহায্যকারী/শিষ্য) থাকে, আর আমার হাওয়ারী হলো যুবাইর ইবনু আওয়াম।"