আল মুসনাদুল জামি`
17243 - عَنْ عُرْوَةَ. قَالَ: كَانَ النَّاسُ يَتَحَرَّوْنَ بِهَدايَاهُمْ يَوْمَ عَائِشَةَ. قَالَتْ عَائِشَةُ:
فَاجْتَمَعَ صَوَاحِبِي إِلَى أم سَلَمَةَ، فَقُلْنَ: يَا أم سَلَمَةَ، وَاللَّهِ إِنَّ النَّاسَ يَتَحَرَّوْنَ بِهَدَايَاهُمْ يَوْمَ عَائِشَةَ وَإِنَّا نُرِيدُ الْخَيْرَ كَمَا تًرِيدُهُ عَائِشَةُ، فَمُرِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَاْمُرَ النَّاسَ أَنْ يُهْدوا إِلَيْهِ حَيْثُ مَا كَانَ، اوْ حَيْثُ مَا دَارَ. قَالَتْ: فَذَكَرَتْ ذَالِكَ أم سَلَمَةَ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم. قَالَتْ: فَاعْرَضَ عَنِّي، فَلَمَّا عَادَ إِلَيَّ ذَكَرْتُ لَهُ ذَاكَ، فَاعْرَضَ عَنِّي، فَلَمَّا كَانَ فِي الثَّالِثَةِ ذَكَرْتُ لَهُ. فَقَاكَ: يَا أم سَلَمَةَ لا تُؤذِينِي فِي عَائِشَةَ، فَإِنَّهُ وَاللَّهِ مَا نَزَلَ عَلَيَّ الْوَحْيُ وَانَا فِي لِحَافِ امْرَاةٍ مِنْكُنَّ غَيْرِهَا.
أخرجه البخاري 3/ 204 قال: حدثنا سليمان بن حرب. وفي 5/ 37 قال: حدثنا عبد اللهِ بن عبد الوهاب. و`التِّرمِذي` 3879 قال: حدثنا يحيى بن درست بصري. و`النَّسائي` 7/ 68 وفي فضائل الصحابة (276) قال: أخبرنا ابو بكر بن إسحاق الصاغاني. قال: حدثنا شاذان.
اربعتهم (سليمان بن حرب، وعبد الله بن عبد الوهاب، ويحيى بن درست، وشاذان) عن حمَّاد بن زيد، عن هشام بن عروة، عن أَبيه، فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (উরওয়াহ) বলেন: লোকেরা তাদের হাদিয়া (উপহার) পাঠাতো সেই দিন, যেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে অবস্থান করতেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমার সহধর্মিণীরা (অন্যান্য স্ত্রীগণ) উম্মে সালামাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে একত্রিত হলেন এবং বললেন: হে উম্মে সালামাহ! আল্লাহর কসম, লোকেরা তাদের হাদিয়াগুলো (উপহার) বিশেষভাবে আয়েশার ঘরে থাকার দিনেই পাঠায়। আর আমরাও আয়েশার মতোই কল্যাণ (নেকী) লাভ করতে চাই। অতএব, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আদেশ করুন, তিনি যেন লোকদেরকে বলে দেন যে তারা যেন তাঁকে যেখানেই পান বা যেখানেই তিনি অবস্থান করেন, সেখানেই তাঁর কাছে হাদিয়া প্রেরণ করে। উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি (উম্মে সালামাহ) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তিনি (উম্মে সালামাহ) বলেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। যখন তিনি পুনরায় আমার কাছে এলেন, আমি আবার তাঁর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলাম, তিনি আবারও মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তৃতীয়বারের সময় যখন আমি তাঁর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলাম, তিনি বললেন: "হে উম্মে সালামাহ! আয়েশার ব্যাপারে আমাকে কষ্ট দিও না। কেননা আল্লাহর কসম! তোমাদের মধ্যে আর কোনো স্ত্রীর চাদরের নিচে থাকা অবস্থায় আমার উপর অহী অবতীর্ণ হয় না, শুধু আয়েশা ছাড়া।"
17244 - عَنْ عَبَّادِ بْنِ حَمْزَةَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الزُّبَيْرِ، انَ عَائِشَةَ، رضي الله عنها، قَالَتْ:
يَانَبِيَّ اللَّهِ، الا تُكَنِّينِي؟ فَقَالَ: اكْتَنِي بِابْنِكِ، يَعْنِي عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ، فَكَانَتْ تُكْنَى أم عَبْدِ اللَّهِ.
أخرجه البخاري في (الأدب المفرد) (851) قال: حدثنا موسى. قال: حدثنا وُهَيب. قال: حدثنا هشام، عن عباد بن حمزة بن عبد الله بن الزبير، فذكره.
- وأخرجه البخاري في (الأدب المفرد) (850) قال: حدثنا محمد بن سلام. قال: حدثنا ابو معاوية. قال: حدثنا هشام بن عُروة، عن يحيى بن عباد بن حمزة، عَنْ عَائِشَةَ، رضي الله عنها، قَالَتْ: اتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم. فَقُلْتُ: يَارَسُولَ اللَّهِ، كَنَّيْتَ نِسَاءَكَ فَاكْنُنِي. فَقَالَ: تَكَنّي بِابْنِ اُخْتِكِ عَبْدِ اللَّهِ.
- وأخرجه أحمد 6/ 186 و 213 قال: حدثنا وكيع، عن هشام، عن رجل من ولد الزبير، عَنْ عَائِشَةَ، انَّهَا قَالَتْ: يَارَسُولَ اللَّهِ، كُلُّ نِسَائِكَ لَهَا كُنْيَةٌ غَيْرِي. قَالَ: انْتِ أم عَبْدِ اللَّهِ.
- وأخرجه ابن ماجة (3739) قال: حدثنا ابو بكر. قال: حدثنا وكيع، عن هشام بن عروة، عن مولى للزبير، عَنْ عَائِشَةَ؛ انَّهَا قَالَتْ لِلنَبِيِّ صلى الله عليه وسلم: كُلُّ ازْوَاجِكَ كَنَيْتَهُ غَيْرِي. قَالَ: فَانْتِ أم عَبْدِ اللَّهِ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আপনার সব স্ত্রীদের কুনিয়াত (উপনাম) দিয়েছেন, অথচ আমার কোনো কুনিয়াত নেই। তিনি বললেন: তুমি তোমার পুত্রের (অর্থাৎ আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর-এর) নামানুসারে কুনিয়াত গ্রহণ করো। এরপর থেকে তিনি উম্মে আব্দুল্লাহ নামে পরিচিত হন।
17245 - عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ انَهَا قَالَتْ:
يَارَسُولَ اللَّهِ، كُلُّ صَوَاحِبِي لَهَا كُنْيَةٌ غَيْرِي. قَالَ: فَاكْتَنِي
بِابْنِكِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الزُّبَيْرِ. فَكَانَتْ تُدْعَى بِاُمِّ عَبْدِ اللَّهِ حَتَّى مَاتَتْ.
- وفي رواية: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: الا تَكْتَنِينَ. قَالَتْ: بِمَنْ اُكْتَنَي. قَالَ: اكْتَنِي بِابْنِكِ عَبْدِ اللَّهِ، يَعْنِي ابْنَ الزُّبَيْرِ. قَالَ: فَكَانَتْ تُكْنَى بِاُمِّ عَبْدِ اللَّهِ.
أخرجه أحمد 6/ 107 قال: حدثنا مُؤمَّل. قال: حدثنا حمَّاد بن زيد. وفي 6/ 151 قال: حدثنا عبد الرزاق. قال: حدثنا مَعْمَر. وفي 6/ 186 قال: حدثنا عمر بن حفص ابو حفص المعيطي. وفي 6/ 260 قال: حدثنا يونس. قال: حدثنا حمَّاد، يعني ابن زيد. و`أبو داود` 4970 قال: حدثنا مًسَدَّد وسُليمان بن حرب، المعنى، قالا: حدثنا حمَّاد.
ثلاثتهم (حمَّاد بن زيد، ومعمر، وعمر بن حفص ابو حفص المعيطي) عن هشام بن عروة، عن أَبيه، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমার সকল সঙ্গিনীদেরই কুনিয়াত (উপনাম) আছে, কেবল আমি ছাড়া।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'তবে তোমার পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনু যুবাইরের নামে কুনিয়াত গ্রহণ করো।' অতঃপর মৃত্যু পর্যন্ত তাঁকে উম্মু আব্দুল্লাহ (আব্দুল্লাহর মা) নামে ডাকা হতো।
অন্য বর্ণনায় এসেছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'তুমি কি কুনিয়াত গ্রহণ করবে না?' তিনি বললেন, 'আমি কার নামে কুনিয়াত গ্রহণ করব?' তিনি বললেন, 'তোমার পুত্র আব্দুল্লাহর নামে কুনিয়াত গ্রহণ করো', অর্থাৎ ইবনু যুবাইর। ফলে তিনি উম্মু আব্দুল্লাহ নামে পরিচিতি লাভ করেন।
17246 - عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدٍ. قَالَ: قَالَتْ عَائِشَةُ رضي الله عنها:
وَارَاْسَاهْ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم: ذَاكِ لَوْ كَانَ وَانَا حَيٌّ فَاسْتَغْفِرُ لَكِ وَادْعُو لَكِ، فَقَالَتْ عَائِشَةُ: واثُكْلِيَاهْ، وَاللَّهِ إِنِّي لاظُّنُّكَ تُحِبُّ مَوْتِي، وَلَوْ كَانَ ذَاكَ لَظَلِلْتَ اخِرَ يَوْمِكَ مُعَرِّسًا بِبَعْضِ ازْوَاجِكَ، فَقَالَ النَّبِيًّ صلى الله عليه وسلم: بَلْ انَا وَارَاْسَاهْ، لَقَدْ هَمَمْتُ، اوْ ارَدْتُ أَنْ ارْسِلَ إِلِى أبي بَكْرٍ وَابْنِهِ فَاعْهَدَ. أَنْ يَقُولَ الْقَائِلُونَ، اوْ يَتَمَنَّى الْمُتَمَنُّونَ، ثُمَّ قُلْتُ: يَابَى اللَّهُ وَيَدْفَعُ الْمُؤْمِنُونَ، اوْ يَدْفَعُ اللَّهُ وًياْبَى الْمُؤْمِنُونَ.
أخرجه البخاري 7/ 155 و 9/ 100 قال: حدثنا يحيى بن يحيى ابو
زكرياء. قال: أخبرنا سُليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد. قال: سمعت القاسم بن محمد، فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আহ! আমার মাথা! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যদি তা হয়, আর আমি জীবিত থাকি, তবে আমি তোমার জন্য আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাইব এবং তোমার জন্য দু'আ করব। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হায় আমার দুর্ভাগ্য! আল্লাহর কসম, আমি মনে করি তুমি আমার মৃত্যু চাও! আর যদি তা (আমার মৃত্যু) হয়ও, তবে তুমি দিনের শেষ ভাগটা তোমার অন্য কোনো স্ত্রীর কাছে গিয়ে রাত কাটাবে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: বরং আমিই, আহ! আমার মাথা ব্যথা! আমি তো ইচ্ছে করেছিলাম, অথবা চেয়েছিলাম যে, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তার পুত্রের কাছে লোক পাঠাই এবং (খিলাফতের) ওয়াসিয়্যত করে যাই, যাতে অন্যরা কিছু বলার বা যারা আকাঙ্ক্ষা করে তাদের আকাঙ্ক্ষা করার সুযোগ না থাকে। এরপর আমি বললাম: আল্লাহ অস্বীকার করবেন এবং মু'মিনগণ তা প্রতিহত করবেন, অথবা আল্লাহ প্রতিহত করবেন এবং মু'মিনগণ অস্বীকার করবেন।
17247 - عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْن عُتْبَةَ، عَنْ عَائِشَةَ. قَالَتْ:
رَجَعَ إِلَيَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ذَاتَ يَوْمٍ مِنْ جِنَازَةٍ مِنَ الْبَقِيعِ، فَوَجَدَنِي وَانَا اجِدُ صُدَاعًا. وانَا اقُولُ: وَارَاْسَاهْ، قَالَ: بَلْ انَا يَاعَائِشَةُ وَارَاْسَاهُ، قَالَ: وَمَا ضَرَّكِ لَوْ مُتِّ قَبْلِي لَغَسَّلْتُكِ وَكَفَّنْتُكِ وَصَلَّيْتُ عَلَيْكِ وَدَفَنْتُكِ، فَقُلْتُ: لَكَانِّي بِكَ وَاللَّهِ لَوْ فَعَلْتَ ذَالِكَ لَرَجَعْتَ إِلى بَيْتِي فَعَرَّسْتَ فِيهِ بِبَعْضِ نِسَائِكَ، قَالَتْ: فَتَبَّسَمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، ثُمَّ بُدِئَ فِي وَجَعِهِ الَّذِي مَاتَ فِيهِ.
أخرجه الدارمي (81) قال: أخبرنا الحكم بن المبارك. قال: حدثنا محمد بن سلمة، عن ابن إسحاق، عن يعقوب بن عُتبة، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، فذكره.
- تقدم برقم (16399.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকী' (কবরস্থান)-এর একটি জানাযা থেকে আমার কাছে ফিরে আসলেন। তিনি আমাকে মাথা ব্যথায় আক্রান্ত অবস্থায় পেলেন। আমি তখন বলছিলাম: "হায়, আমার মাথা!" (ওয়া রা'সাহ্)। তিনি বললেন: "বরং আমি, হে আয়েশা! হায়, আমার মাথা!" তিনি বললেন: "তোমার কী ক্ষতি হতো, যদি তুমি আমার আগে মারা যেতে? আমি তোমাকে গোসল করাতাম, কাফন পরাতাম, তোমার জানাযার সালাত আদায় করতাম এবং তোমাকে দাফন করতাম।" তখন আমি বললাম: "আল্লাহর কসম! আমার মনে হয়, যদি আপনি তা করতেন, তবে (দাফন শেষ করে) আমার ঘরে ফিরে এসে আপনার অন্য কোনো স্ত্রীর সঙ্গে রাত কাটাতেন (বাসর করতেন)।" তিনি বললেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন। এরপর তাঁর সেই রোগ শুরু হলো, যে রোগে তিনি মৃত্যুবরণ করেছিলেন।
17248 - عَنْ أبي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَانِ. أَنَّ عَائِشَةَ، رضي الله عنها، زَوْجَ النَّبىِّ صلى الله عليه وسلم، قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:
1 ~ أخرجه أحمد 6/ 55 قال: حدثنا يحيى. وفي 6/ 112 قال: حدثنا
ابو نُعيم. وفي 6/ 208 قال: حدثنا وكيع (ح) ويزيد. وفي 6/ 224 قال: حدثنا يَعْلَى. و`البُخَارِي` 8/ 69، وفي (الأدب المفرد) (1116) قال: حدثنا ابو نعيم. و`مسلم` 7/ 139 قال: حدثنا ابو بكر بن أبي شَيْبة. قال: حدثنا عبد الرحيم بن سُليمان ويَعْلَى بن عُبيد (ح) وحدثناه إسحاق بن إبراهيم. قال: أخبرنا الملائي (ح) وحدثناه إسحاق بن إبراهيم. قال: أخبرنا اسباط بن محمد. و`أبو داود` 5232 قال: حدثنا ابو بكر بن أبي شَيْبة. قال: حدثنا عبد الرحيم بن سُليمان. و`ابن ماجة` 3696 قال: حدثنا ابو بكر بن أبي شَيْبة. قال: حدثنا عبد الرحيم بن سُليمان. و`التِّرمِذي` 2693 قال: حدثنا علي بن المنذر الكوفي. قال: حدثنا محمد بن فًضَيل. وفي (3882) قال: حدثنا سُويد. قال: أخبرنا عبد الله بن المبارك.
2 ~ وأخرجه أحمد 6/ 88 قال: حدثنا ابو اليمان. قال: أنبانا شًعيب. وفي 6/ 117 قال: حدثنا إبراهيم بن إسحاق. قال: حدثنا ابن مبارك، عن يونس. و`الدارِمِي` 2641 قال: أخبرنا الحكم بن نافع، عن شعَيب بن أبي حمزة. و`البُخَارِي` 4/ 136 قال: حدثنا عبد الله بن محمد. قال: حدثنا هشام. قال: أخبرنا مَعْمر. وفي 5/ 36 قال: حدثنا يحيى بن بُكَير. قال: حدثنا الليث، عن يونس. وفي 8/ 55، وفي (الأدب المفرد) (827) قال: حدثنا ابو اليمان. قال: أخبرنا شعيب. وفي 8/ 68 قال: حدثنا ابن مقاتل. قال: أخبرنا عبد الله. قال: أخبرنا مَعْمر. وفي (الأدب المفرد) (1036) قال: حدثنا عبد الله. قال: حدثني الليث. قال: حدثني يونس. و`مسلم` 7/ 139 قال: حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن الدارمي. قال: أخبرنا ابو اليمان. قال: أخبرنا شُعيب. و`التِّرمِذي` 3881 قال: حدثنا سُويد بن نصر. قال: حدثنا عبد الله
بن المبارك. قال: أخبرنا مَعْمر. و`النَّسائي` 7/ 69، وفي عمل اليوم والليلة (377) قال: أخبرنا عَمرو بن منصور. قال: حدثنا الحكم بن نافع. قال: أنبانا شعَيب. وفي عمل اليوم والليلة (376) قال: أخبرنا محمد بن حاتم. قال: أخبرنا حبان. قال: أخبرنا عبد الله، عن مَعْمر. وفي `الكبرى` تحفة الاشرف 12/ 17766 عن أحمد بن يحيى بن الوزير بن سُليمان، عن سعيد بن عُفَير، عن الليث، عن عبد الرحمن بن خالد بن مُسافر. اربعتهم (شعيب بن أبي حمزة، ويونس بن يزيد الايلي، ومَعْمر بن راشد، وعبد الرحمن بن خالد) عن ابن شهاب الزهري.
كلاهما (عامر الشعبي، والزهري) عن أَبي سلمة بن عبد الرحمن، فذكره.
- الروايات الفاظها متقاربة. واثبتنا لفظ رواية شُعيب، عن الزهري، عند البخاري 8/ 55.
- في رواية محمد بن فُضَيل وابن المبارك، عن الشعبي. ورواية يونس، عن الزهري، وهشام بن يوسف وابن المبارك، عن مَعْمر، عن الزهري. ورواية عَمرو بن منصور، عن أَبي اليمان، عن شُعيب، عن الزهري:. . . هَذَا جِبْرِيلُ يَقْرَاُ عَلَيْكِ السَّلامَ. فَقَالَتْ: وَعَلَيْهِ السًلامُ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ. ..
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"এই যে জিবরীল (আঃ), তিনি তোমাকে সালাম জানাচ্ছেন।"
তখন তিনি বললেন, "তাঁর উপরও শান্তি, আল্লাহর রহমত ও বরকত বর্ষিত হোক।"
17249 - عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ:
أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لَهَا: هَذَا جِبْرِيلُ عليه السلام، وَهُوَ يَقْرَاُ عَلَيْكِ السَّلامَ. فَقَالَتْ: وَعَلَيْهِ السَّلامُ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، تَرَى مَالا نَرَى.
أخرجه أحمد 6/ 150. وعَبْد بن حميد 1480. و`النَّسائي` 7/ 69،
وفي عمل اليوم والليلة (375) قال: أخبرنا نوح بن حبيب.
ثلاثتهم (أحمد بن حنبل، وعَبد بن حُميد، ونوح بن حبيب) عن عبد الرزاق. قال: أخبرنا مَعْمر، عن الزهري، عن عروة، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "এই হলেন জিবরীল (আঃ), আর তিনি তোমাকে সালাম জানাচ্ছেন।" তখন তিনি (আয়িশা) বললেন: "এবং তাঁর উপরও শান্তি, আল্লাহর রহমত ও বরকত বর্ষিত হোক। আপনি এমন কিছু দেখতে পান যা আমরা দেখতে পাই না।"
17250 - عَنْ صَالِحِ بْنِ رَبِيعَةَ بْنِ هُدَيْرٍ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ:
اوْحَى اللَّهُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَانَا مَعَهُ فَقُمْتُ فَاجَفْتُ الْبَابَ بَيْنِي وَبَيْنَهُ، فَلَمَّا رُفِّهَ عَنْهُ قَالَ لِي: يَاعَائِشَةَ، إِنَّ جِبْرِيلَ يُقْرِئُكِ السَّلامَ.
أخرجه النسائي 7/ 69 وفي فضائل الصحابة (277) قال: أخبرنا محمد بن ادم بن سُليمان، عن عَبْدة، عن هشام، عن صالح بن ربيعة بن هدير، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাঁর সাথে থাকাবস্থায় আল্লাহ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি ওহী নাযিল করেন। তখন আমি দাঁড়ালাম এবং আমার ও তাঁর মাঝের দরজাটি বন্ধ করে দিলাম। যখন তাঁর ওপর থেকে (ওহী নাযিলের অবস্থা) হালকা হয়ে গেল, তখন তিনি আমাকে বললেন: হে আয়িশা, নিশ্চয় জিবরীল তোমাকে সালাম জানাচ্ছেন।
17251 - عَنْ أبي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ:
رَايْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَاضَعًا يَدَيْهِ عَلَى مَعْرَفَةِ فَرَسٍ وَهُوَ يُكَلِّمُ رَجُلاً، قُلْتُ: رَايْتُكَ وَاضِعًا يَدَيْكِ عَلَى مَعْرَفَةِ فَرَسِ دِحْيَةَ الْكَلْبِيِّ وَانْتَ تُكَلِّمُهُ، قَالَ: وَرَايْتِيهِ؟ قَالَتْ: نَعَمْ، قَالَ: ذَاكَ جِبْرِيلُ عليه السلام وَهُوَ يُقْرِئُكِ السَّلامَ، قَالَتْ: وَعَلَيْهِ السَّلامً وَرَحمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، جَزَاهُ اللَّهُ خَيْرًا مِنْ صَاحِبٍ وَدَخِيلٍ، فَنِعْمَ الصَّاحِبُ وَنِعْمَ الدَّخِيلُ.
قال أحمد بن حنبل: قال سفيان: الدخيل: الضيف.
أخرجه الحميدي (277) و`أحمد` 6/ 74 و 146 قالا: حدثنا سُفيان، عن مجالد بن سعيد، عن الشعبي، عن أَبي سلمة، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক ব্যক্তির সাথে কথা বলার সময় তার ঘোড়ার ঘাড়ে/আয়ালের উপর হাত রাখা অবস্থায় দেখেছিলাম। আমি বললাম: আমি আপনাকে দিহয়া আল-কালবির ঘোড়ার আয়ালের উপর হাত রাখা অবস্থায় তার (ঐ ব্যক্তির) সাথে কথা বলতে দেখেছি। তিনি বললেন: তুমি তাকে দেখতে পেয়েছ? তিনি (আয়িশা) বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: ইনি ছিলেন জিবরীল (আঃ), আর তিনি তোমাকে সালাম জানাচ্ছেন। তিনি বললেন: ওয়া আলাইহিস সালাম ওয়া রহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু। সঙ্গী ও অতিথির মধ্যে আল্লাহ তাকে উত্তম প্রতিদান দিন। তিনি কতই না উত্তম সঙ্গী এবং কতই না উত্তম অতিথি।
আহমাদ ইবনে হাম্বল বলেছেন যে, সুফিয়ান বলেছেন: ‘আদ-দখীল’ মানে: মেহমান (অতিথি)।
17252 - عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَانِ بْنِ الْحَارِثِ بْنِ هِشَامٍ؛ أَنَّ عَائِشَةَ زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَتْ:
ارْسَلَ ازْوَاجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَاطِمَةَ، بِنْتَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. فَاسْتَاْذَنَتْ عَلَيْهِ وَهُوَ مُضْطَجِعٌ مَعِى فِى مِرْطِى. فَاذِنَ لَهَا. فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّ ازْوَاجَكَ ارْسَلْنَنِى إِلَيْكَ يَسْالْنَكَ الْعَدْلَ فِى ابْنَةِ ابِى قُحَافَةَ، وَانَا سَاكِتَةٌ. قَالَتْ: فَقَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم: اىْ بُنَيَّةُ، الَسْتِ تُحِبِّينَ مَا اُحِبُّ؟ فَقَالَتْ: بَلَى. قَالَ: فَاحِبِّى هَذِهِ. قَالَتْ: فَقَامَتْ فَاطِمَةُ حِينَ سَمِعَتْ ذَالِكَ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرَجَعَتْ إِلَى ازْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَاخْبَرَتْهُنَّ بِالَّذِى قَالَتْ وَبِالَّذِى قَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُلْنَ لَهَا: مَا نُرَاكِ اغْنَيْتِ عَنَّا مِنْ شَىْءٍ، فَارْجِعِى إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقُولِى لَهُ: إِنَّ ازْوَاجَكَ يَنْشُدْنَكَ الْعَدْلَ فِى ابْنَةِ ابِى قُحَافَةَ. فَقَالَتْ فَاطِمَةُ: وَاللَّهِ لا اُكَلِّمُهُ فِيهَا ابَدًا. قَالَتْ عَائِشَةُ: فَارْسَلَ ازْوَاجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم زَيْنَبَ بِنْتَ جَحْشٍ، زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، وَهِىَ الَّتِي كَانَتْ تُسَامِينِى مِنْهُنَّ فِى الْمَنْزِلَةِ عِنْدَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. وَلَمْ ارَ امْرَاةً قَطُّ خَيْرًا فِى الدِّينِ مِنْ زَيْنَبَ، وَاتْقَى للَّهِ، وَاصْدَقَ حَدِيثًا، وَاوْصَلَ لِلرَّحِمِ، وَاعْظَمَ صَدَقَةً، وَاشَدَّ ابْتِذَالاً لِنَفْسِهَا فِى
الْعَمَلِ الَّذِى تَصَدَّقُ بِهِ، وَتَقَرَّبُ بِهِ إِلَى اللَّهِ تَعَالَى مَا عَدَا سَوْرَةً مِنْ حَدٍّ كَانَتْ فِيهَا. تُسْرِعُ مِنْهَا الْفَيْئَةَ. قَالَتْ: فَاسْتَاْذَنَتْ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ
1 ~ أخرجه أحمد 6/ 88 قال: حدثنا ابو اليمان. قال: أخبرنا شعيب (ح) وحدثنا يعقوب. قال: حدثنا أبي، عن صالح. و`البُخَارِي` في (الأدب المفرد) (559) قال: حدثنا الحكم بن نافع. قال: أخبرنا شعيب بن أبي حمزة. و`مسلم` 7/ 135 و 136 قال: حدثني الحسن بن علي الحلواني وأبو بكر بن النضر وعبد بن حُميد. قال عبد: حدثني. وقال الاخران: حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد. قال: حدثني أبي، عن صالح (ح) وحدثنيه محمد بن عبد الله بن قهزاذ. قال: عبد الله بن عثمان حدثنيه عن عبد الله بن المبارك، عن يونس. و`النَّسائي` 7/ 64 قال: أخبرني عبيد الله بن سعد بن إبراهيم بن سعد. قال: حدثنا عمي. قال: حدثنا أبي، عن صالح. وفي 7/ 66 قال: أخبرني عمران بن بكار الحمصي. قال: حدثنا ابو اليمان. قال: أنبانا شعيب.
ثلاثتهم (شعيب بن أبي حمزة، وصالح بن كيسان، ويونس بن يزيد) عن الزهري، قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অন্যান্য স্ত্রীরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন, তখন তিনি আমার চাদরের নিচে আমার সাথে শুয়ে ছিলেন। তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার স্ত্রীরা আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন। তারা আপনার নিকট আবূ কুহাফার কন্যার [অর্থাৎ আয়িশার] ব্যাপারে ইনসাফ (ন্যায়বিচার) প্রার্থনা করছেন। আর আমি তখন চুপ করে ছিলাম। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: হে আমার ছোট কন্যা! আমি যা ভালোবাসি, তুমি কি তা ভালোবাসো না? ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অবশ্যই। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তাহলে তুমি একে (আয়িশাকে) ভালোবাসো। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে একথা শুনলেন, তখন তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের কাছে ফিরে গেলেন। তিনি তাদের কাছে যা বলেছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে যা বলেছিলেন, সে সম্পর্কে তিনি তাদের অবহিত করলেন। স্ত্রীরা তাকে বললেন: আমরা দেখছি না যে তুমি আমাদের জন্য কোনো কিছু করতে পেরেছ। তুমি আবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে যাও এবং তাকে বলো: আপনার স্ত্রীরা আবূ কুহাফার কন্যার ব্যাপারে আপনার কাছে ন্যায়বিচার চাচ্ছেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি তাঁর ব্যাপারে আর কখনো তাঁর সাথে কথা বলব না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে মর্যাদার দিক থেকে তিনি ছিলেন তাদের মধ্যে আমার প্রতিদ্বন্দ্বী। আমি যায়নাবের চেয়ে দ্বীনের ক্ষেত্রে উত্তম, আল্লাহকে অধিক ভয়কারী, কথায় অধিক সত্যবাদী, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষাকারী, অধিক দানশীল এবং সাদকাহর কাজে নিজেকে বিলিয়ে দিতে অধিক কঠোর অন্য কোনো নারী কখনো দেখিনি, তবে তাঁর মধ্যে কিছুটা মেজাজের তীক্ষ্ণতা ছিল, যা থেকে তিনি দ্রুত ফিরে আসতেন (দ্রুত অনুতপ্ত হয়ে যেতেন)। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি [যায়নাব] রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন...।
17253 - عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ. قَالَتْ:
اجْتَمَعْنَ ازْوَاجُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَارْسَلْنَ فَاطِمَةَ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقُلْنَ
لَهَا: إِنَّ نِسَاءَكَ وَذَكَرَ كَلِمَةً مَعْنَاهَا يَنْشُدْنَكَ الْعَدْلَ فِى ابْنَةِ ابِى قُحَافَةَ. قَالَتْ: فَدَخَلَتْ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ مَعَ عَائِشَةَ فِى مِرْطِهَا فَقَالَتْ لَهُ: إِنَّ نِسَاءَكَ ارْسَلْنَنِى وَهُنَّ يَنْشُدْنَكَ الْعَدْلَ فِى ابْنَةِ ابِى قُحَافَةَ. فَقَالَ لَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: اتُحِبِّينِى؟ قَالَتْ: نَعَمْ. قَالَ: فَاحِبِّيهَا. قَالَتْ: فَرَجَعَتْ إِلَيْهِنَّ فَاخْبَرَتْهُنَّ مَا قَالَ فَقُلْنَ لَهَا: إِنَّكِ لَمْ تَصْنَعِى شَيْئًا فَارْجِعِى إِلَيْهِ. فَقَالَتْ: وَاللَّهِ لا ارْجِعُ إِلَيْهِ فِيهَا ابَدًا. وَكَانَتِ ابْنَةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَقًّا. فَارْسَلْنَ زَيْنَبَ بِنْتَ جَحْشٍ قَالَتْ عَائِشَةُ: وَهِىَ الَّتِي كَانَتْ تُسَامِينِى مِنْ ازْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ: ازْوَاجُكَ ارْسَلْنَنِى وَهُنَّ يَنْشُدْنَكَ الْعَدْلَ فِى ابْنَةِ ابِى قُحَافَةَ. ثُمَّ اقْبَلَتْ عَلَىَّ تَشْتِمُنِى فَجَعَلْتُ اُرَاقِبُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَانْظُرُ طَرْفَهُ هَلْ يَاْذَنُ لِى مِنْ أَنْ انْتَصِرَ مِنْهَا. قَالَتْ: فَشَتَمَتْنِى حَتَّى ظَنَنْتُ انَّهُ لا يَكْرَهُ أَنْ انْتَصِرَ مِنْهَا فَاسْتَقْبَلْتُهَا فَلَمْ الْبَثْ أَنْ افْحَمْتُهَا فَقَالَ لَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: إِنَّهَا ابْنَةُ ابِى بَكْرٍ. قَالَتْ عَائِشَةُ: فَلَمْ ارَ امْرَاةً خَيْرًا وَلا اكْثَرَ صَدَقَةً وَلا اوْصَلَ لِلرَّحِمِ وَابْذَلَ لِنَفْسِهَا فِى كُلِّ شَىْءٍ يُتَقَرَّبُ بِهِ إِلَى اللَّهِ تَعَالَى مِنْ
زَيْنَبَ مَا عَدَا سَوْرَةً مِنْ حِدَّةٍ كَانَتْ فِيهَا تُوشِكُ مِنْهَا الْفَيَاْةَ.
أخرجه أحمد 6/ 150. و`النَّسائي` 7/ 67 قال: أخبرنا محمد بن رافع النيسابوري الثقة المامون.
كلاهما (أحمد بن حنبل، ومحمد بن رافع) قالا: حدثنا عبد الرزاق، عن مَعْمر، عن الزهري، عن عروة، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর স্ত্রীগণ একত্রিত হলেন এবং ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পাঠালেন। তারা ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনার স্ত্রীগণ— এবং একটি শব্দ বললেন যার অর্থ হলো— আবূ কুহাফার কন্যার (আয়িশা) ব্যাপারে আপনার কাছে ন্যায়বিচার কামনা করছেন। তিনি বলেন: অতঃপর ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে গেলেন। তখন তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চাদরের মধ্যে তার সাথে ছিলেন। ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আমাকে পাঠিয়েছেন এবং তারা আবূ কুহাফার কন্যার ব্যাপারে আপনার কাছে ন্যায়বিচার কামনা করছেন। তখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: তুমি কি আমাকে ভালোবাসো? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে তুমি তাকেও (আয়িশা) ভালোবাসো। তিনি বলেন: অতঃপর ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে ফিরে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা জানালেন। তখন তারা ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি তো কিছুই করে আসোনি। তুমি আবার তার কাছে ফিরে যাও। ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি আর কখনও এই বিষয়ে তার কাছে যাব না। আর তিনি (ফাতেমা) অবশ্যই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ছিলেন।
তখন তারা যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর স্ত্রীদের মধ্যে তিনিই ছিলেন, যিনি আমার সাথে (মর্যাদায়) পাল্লা দিতেন (বা আমার প্রতিদ্বন্দ্বী ছিলেন)। তিনি (যায়নাব) বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আমাকে পাঠিয়েছেন এবং তারা আবূ কুহাফার কন্যার ব্যাপারে আপনার কাছে ন্যায়বিচার কামনা করছেন। এরপর তিনি আমার দিকে এগিয়ে এসে আমাকে গালি দিতে শুরু করলেন। আমি তখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে লক্ষ্য করতে লাগলাম এবং তার দৃষ্টির প্রান্তের দিকে তাকাতে লাগলাম যে, তিনি আমাকে কি তার (যায়নাবের) কাছ থেকে প্রতিশোধ নেওয়ার (জবাব দেওয়ার) অনুমতি দেন কি না। তিনি (আয়িশা) বলেন: অতঃপর তিনি আমাকে গালি দিতে থাকলেন, এমনকি আমি ধারণা করলাম যে, তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাছ থেকে প্রতিশোধ (জবাব) নিতে আমার অপছন্দ করবেন না। তখন আমি তার মুখোমুখী হলাম এবং তাকে নীরব করে দিতে বেশি দেরি করলাম না। তখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যায়নাবকে বললেন: সে তো আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া অন্য কোনো মহিলাকে আমি দেখিনি, যিনি তার চেয়ে বেশি উত্তম, বেশি দানশীলা, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষায় অধিক সচেষ্ট এবং আল্লাহর কাছে নৈকট্য লাভের জন্য সবকিছুতে নিজেকে বেশি উৎসর্গকারী। তবে তার মধ্যে এক ধরনের দ্রুত রাগ (বা তীক্ষ্ণতা) ছিল, যা দ্রুতই চলে যেত।
17254 - عَنْ عُرْوَةَ. عَنْ عَائشَةَ رَضىَ اللَّهُ عَنْهَا؛
أَنَّ نِسَاءَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كُنَّ حِزْبَيْنِ فَحِزْبٌ فِيهِ عَائِشَةُ وَحَفْصَةُ وَصَفِيَّةُ وَسَوْدَةُ، وَالْحِزْبُ الاخَرُ أم سَلَمَةَ وَسَائِرُ نِسَاءِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وَكَانَ الْمُسْلِمُونَ قَدْ عَلِمُوا حُبَّ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَائِشَةَ، فَإِذَا كَانَتْ عِنْدَ احَدِهِمْ هَدِيَّةٌ يُرِيدُ أَنْ يُهْدِيَهَا إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم اخَّرَهَا، حَتَّى إِذَا كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِى بَيْتِ عَائِشَةَ بَعَثَ صَاحِبُ الْهَدِيَّةِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِى بَيْتِ عَائِشَةَ، فَكَلَّمَ حِزْبُ أم سَلَمَةَ، فَقُلْنَ لَهَا: كَلِّمِى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُكَلِّمُ النَّاسَ، فَيَقُولُ مَنْ ارَادَ أَنْ يُهْدِىَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم هَدِيَّةً فَلْيُهْدِهِ إِلَيْهِ حَيْثُ كَانَ مِنْ بُيُوتِ نِسَائِهِ، فَكَلَّمَتْهُ أم سَلَمَةَ بِمَا قُلْنَ، فَلَمْ يَقُلْ لَهَا شَيْئًا، فَسَالْنَهَا. فَقَالَتْ: مَا قَالَ لِى شَيْئًا. فَقُلْنَ لَهَا فَكَلِّمِيهِ. قَالَتْ فَكَلَّمَتْهُ حِينَ دَارَ إِلَيْهَا ايْضًا، فَلَمْ يَقُلْ لَهَا شَيْئًا، فَسَالْنَهَا. فَقَالَتْ: مَا قَالَ لِى شَيْئًا. فَقُلْنَ لَهَا: كَلِّمِيهِ حَتَّى يُكَلِّمَكِ. فَدَارَ إِلَيْهَا فَكَلَّمَتْهُ. فَقَالَ لَهَا: لا تُؤْذِينِى فِى عَائِشَةَ، فَإِنَّ الْوَحْىَ لَمْ يَاْتِنِى، وَانَا فِى ثَوْبِ امْرَاةٍ إِلَاّ عَائِشَةَ. قَالَتْ: فَقَالَتْ: اتُوبُ إِلَى اللَّهِ مِنْ اذَاكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ. ثُمَّ إِنَّهُنَّ دَعَوْنَ فَاطِمَةَ بِنْتَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَارْسَلْنَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ
صلى الله عليه وسلم تَقُولُ إِنَّ نِسَاءَكَ يَنْشُدْنَكَ اللَّهَ الْعَدْلَ فِى بِنْتِ ابِى بَكْرٍ. فَكَلَّمَتْهُ. فَقَالَ: يَا بُنَيَّةُ، الا تُحِبِّينَ مَا اُحِبُّ. قَالَتْ بَلَى. فَرَجَعَتْ إِلَيْهِنَّ، فَاخْبَرَتْهُنَّ. فَقُلْنَ: ارْجِعِى إِلَيْهِ. فَابَتْ أَنْ تَرْجِعَ، فَارْسَلْنَ زَيْنَبَ بِنْتَ جَحْشٍ، فَاتَتْهُ فَاغْلَظَتْ، وَقَالَتْ: إِنَّ نِسَاءَكَ يَنْشُدْنَكَ اللَّهَ الْعَدْلَ فِى بِنْتِ ابْنِ ابِى قُحَافَةَ. فَرَفَعَتْ صَوْتَهَا، حَتَّى تَنَاوَلَتْ عَائِشَةَ. وَهْىَ قَاعِدَةٌ، فَسَبَّتْهَا حَتَّى إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَيَنْظُرُ
إِلَى عَائِشَةَ هَلْ تَكَلَّمُ قَالَ: فَتَكَلَّمَتْ عَائِشَةُ تَرُدُّ عَلَى زَيْنَبَ، حَتَّى اسْكَتَتْهَا. قَالَتْ: فَنَظَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم إِلَى عَائِشَةَ، وَقَالَ: إِنَّهَا بِنْتُ ابِى بَكْرٍ.
أخرجه البخاري 3/ 204 قال: حدثنا إسماعيل. قال: حدثني اخي، عن سليمان، عن هشام بن عروة، عن أَبيه، فذكره.
- قال البخاري: الكلام الاخير قصة فاطمة يُذكر عن هشام بن عروة، عن رجل، عن الزهري، عن محمد بن عبد الرحمن. وقال ابو مروان: عن هشام، عن عروة كان الناس يتحرون بهداياهم يوم عائشة. وعن هشام، عن رجل من قريش ورجل من الموالي عن الزهري، عن محمد بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام. قالت عائشة: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم فاستاذنت فاطمة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ দুই দলে বিভক্ত ছিলেন। এক দলে ছিলেন আয়িশা, হাফসা, সাফিয়্যাহ ও সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর অন্য দলে ছিলেন উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাকি স্ত্রীগণ।
মুসলিমগণ জানতেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খুব ভালোবাসতেন। তাই যখন তাদের কারো কাছে কোনো উপহার থাকত যা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতে চাইতেন, তখন তিনি তা দেরি করতেন। এমনকি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশার ঘরে আসতেন, তখন উপহারদাতা তার উপহার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আয়িশার ঘরে পাঠাতেন।
তখন উম্মে সালামাহর দল (অন্য স্ত্রীগণ) তাঁর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে বললেন: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলুন, যাতে তিনি লোকদেরকে বলে দেন যে, যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপহার দিতে চায়, তারা যেন তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে যেখানেই তিনি থাকুন না কেন, সেখানেই উপহারটি পাঠিয়ে দেয়।
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের কথামত তাঁর সাথে (নবীর সাথে) কথা বললেন, কিন্তু তিনি তাঁকে কিছুই বললেন না। এরপর তারা তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: তিনি আমাকে কিছুই বলেননি। তারা তাঁকে বললেন: আপনি আবার তাঁর সাথে কথা বলুন। তিনি বলেন: যখন তাঁর কাছে (নবীর কাছে) পালা আসলো, তখনও তিনি তাঁর সাথে কথা বললেন, কিন্তু তিনি তাঁকে কিছুই বললেন না। তারা জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: তিনি আমাকে কিছুই বলেননি। তারা বললেন: আপনি তাঁর সাথে কথা বলতে থাকুন যতক্ষণ না তিনি আপনাকে কিছু বলেন। এরপর যখন তাঁর কাছে পালা আসল, তখন তিনি তাঁর সাথে কথা বললেন। তখন তিনি (নবী) বললেন: আয়িশার ব্যাপারে আমাকে কষ্ট দিও না। কেননা আয়িশা ব্যতীত অন্য কোনো স্ত্রীর চাদরের নিচে থাকা অবস্থায় আমার কাছে ওহী আসেনি।
(উম্মে সালামাহ) বললেন: তখন আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার কষ্ট দেওয়া থেকে আমি আল্লাহর কাছে তাওবা করছি।
এরপর তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতেমাকে ডাকলেন এবং তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠালেন। ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আপনার কাছে আল্লাহর দোহাই দিয়ে আবূ বকরের কন্যার (আয়িশার) ব্যাপারে ন্যায়বিচার চান। তিনি (ফাতেমা) তাঁর সাথে কথা বললেন। তিনি (নবী) বললেন: হে আমার কন্যা, আমি যাকে ভালোবাসি তুমি কি তাকে ভালোবাসতে চাও না? ফাতেমা বললেন: অবশ্যই। তখন তিনি তাদের কাছে ফিরে গেলেন এবং তাদের খবর জানালেন। তারা বললেন: তুমি আবার তাঁর কাছে যাও। কিন্তু তিনি যেতে অস্বীকার করলেন।
এরপর তাঁরা যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। তিনি তাঁর কাছে এসে কঠোরভাবে কথা বললেন এবং বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আপনার কাছে আল্লাহর দোহাই দিয়ে ইবনু আবী কুহাফার কন্যার (আয়িশার) ব্যাপারে ন্যায়বিচার চান। তিনি তাঁর আওয়াজ উঁচু করলেন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে কথা বলতে লাগলেন। আয়িশা তখন বসেছিলেন। যায়নাব তাঁকে গালি দিতে লাগলেন। এমনকি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশার দিকে দেখতে লাগলেন, তিনি কি কোনো কথা বলবেন?
(রাবী) বলেন: তখন আয়িশা কথা বললেন এবং যায়নাবকে এমনভাবে জবাব দিলেন যে যায়নাব নীরব হয়ে গেলেন। (রাবী) বলেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশার দিকে তাকালেন এবং বললেন: সে তো আবূ বকরের কন্যা!
17255 - : عَنْ أم مُحَمَّدٍ، عَنْ عَائِشَةَ. قَالَتْ:
كَانَتْ عِنْدَنَا أم سَلَمَةَ فَجَاءَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عِنْدَ جُنْحِ اللَّيْلِ. قَالَتْ: فَذَكَرَتْ شَيْئًا صَنَعَهُ بِيَدِهِ. قَالَتْ: وَجَعَلَ لا يَفْطُنُ لاُمِّ سَلَمَةَ. قَالَتْ: وَجَعَلْتُ اُومِئُ إِلَيْهِ حَتَّى فَطِنَ. قَالَتْ أم سَلَمَةَ: اهَكَذَا الانَ امَا كَانَتْ وَاحِدَةٌ مِنَّا عِنْدَكَ إِلَاّ فِي خِلابَةٍ كَمَا ارَى وَسَبَّتْ عَائِشَةَ، وَجَعَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَنْهَاهَا فَتَاْبَى. فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: سُبِّيهَا فَسَبَّتْهَا حَتَى غَلَبَتْهَا. فَانْطَلَقَتْ أم سَلَمَةَ إِلَى عَلِيٍّ وَفَاطِمَةَ فَقَالَتْ: إِنَّ عَائِشَةَ سَبَّتْهَا وَقَالَتْ لَكُمْ وَقَالَتْ لَكُمْ. فَقَالَ عَلِيٌّ لِفَاطِمَةَ: اذْهَبِي إِلَيْهِ فَقُولِي: إِنَ عَائِشَةَ قَالَتْ لَنَا وَقَالَتْ لَنَا. فَاتَتْهُ فَذَكَرَتْ ذَالِكَ لَهُ. فَقَالَ لَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: إِنَهَا حِبَّةُ ابِيكِ وَرَبِّ الْكَعْبَةِ. فَرَجَعَتْ إِلَى عَلِيٍّ فَذَكَرَتْ لَهُ
الَّذِي قَالَ لَهَا. فَقَالَ: امَا كَفَاكَ إِلَاّ أَنْ قَالَتْ لَنَا عَائِشَةُ وَقَالَتْ لَنَا حَتَّى اتَتْكَ فَاطِمَةُ فَقُلْتَ لَهَا: إِنَهَا حِبًةُ ابِيكِ وَرَبِّ الْكَعْبَةِ.
أخرجه أحمد 6/ 130 قال: حدثنا عفان. قال: حدثني سليم بن اخضر. وفي 6/ 130 قال: حدثنا ازهر. و`أبو داود` 4898 قال: حدثنا عبيد الله بن معاذ، قال: حدثنا أبي ح وحدثنا عبيد الله بن عُمر بن ميسرة. قال: حدثنا معاذ بن معاذ، المعنى واحد.
ثلاثتهم (سُليم بن اخضر، وازهر، ومعاذ بن معاذ) قالوا: حدثنا ابن عون قال: حدثنا علي بن زيد بن جدعان، عن أم محمد امرأة أبيه، فذكرته.
- في رواية ازهر ومعاذ بن معاذ: زينب بنت جحش بدل أم سلمة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে ছিলেন। অতঃপর রাতের প্রারম্ভে (অন্ধকারে) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন। তিনি (আয়িশা) বললেন: এরপর তিনি এমন কিছু উল্লেখ করলেন যা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের হাত দিয়ে করলেন। তিনি বললেন: আর তিনি উম্মু সালামাহর প্রতি মনোযোগ দিচ্ছিলেন না। তিনি বললেন: আর আমি তাঁকে ইশারা করতে লাগলাম, অবশেষে তিনি মনোযোগ দিলেন। উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওহ! এখন কি এই অবস্থা? আমাদের মধ্যে কেউ কি আপনার কাছে থাকতে পারে না যতক্ষণ না আমি যেমনটি দেখছি, কোনো ছলনা ঘটছে? এবং তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গালি দিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নিষেধ করতে লাগলেন, কিন্তু তিনি বিরত হলেন না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমিও তাকে গালি দাও। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে এমনভাবে গালি দিলেন যে তাকে পরাস্ত করে দিলেন। অতঃপর উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী ও ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন এবং বললেন: আয়িশা আমাকে গালি দিয়েছে, আর তোমাদের সম্পর্কেও সে অনেক কিছু বলেছে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমাহকে বললেন: তুমি তাঁর (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) কাছে যাও এবং বলো: আয়িশা আমাদের সম্পর্কেও অনেক কথা বলেছে। ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে এলেন এবং এ বিষয়টি তাঁকে জানালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (ফাতিমাহকে) বললেন: কা‘বার রবের কসম! সে তোমার পিতার প্রিয়া (অত্যন্ত প্রিয়)। ফাতিমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে গেলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যা বলেছিলেন তা তাঁকে জানালেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আয়িশা আমাদের সম্পর্কে বলেছে, আর আমাদের সম্পর্কে বলেছে—এই সব শুনে ফাতিমাহ যখন তোমার কাছে এলো, তখন তুমি তাঁকে শুধু এ কথা বললে: 'কা‘বার রবের কসম! সে তোমার পিতার প্রিয়া'?
17256 - عَنِ الزُّهْرِىِّ. قَالَ: اخْبَرَنِى سَعِيدُ بْنُ الْمُسَيَّبِ وَعُرْوَةُ بْنُ الزُّبَيْرِ وَعَلْقَمَةُ بْنِ وَقَّاصٍ وَعُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ بْنِ مَسْعُودٍ عَنْ حَدِيثِ عَائِشَةَ، زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، حِينَ قَالَ لَهَا اهْلُ الإِفْكِ مَا قَالُوا فَبَرَّاهَا اللَّهُ مِمَّا قَالُوا وَكُلُّهُمْ حَدَّثَنِى طَائِفَةً مِنْ حَدِيثِهَا. وَبَعْضُهُمْ كَانَ اوْعَى لِحَدِيثِهَا مِنْ بَعْضٍ، وَاثْبَتَ اقْتِصَاصًا، وَقَدْ وَعَيْتُ عَنْ كُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمُ الْحَدِيثَ الَّذِى حَدَّثَنِى، وَبَعْضُ حَدِيثِهِمْ يُصَدِّقُ بَعْضًا، ذَكَرُوا؛ أَنَّ عَائِشَةَ، زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَتْ:
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا ارَادَ أَنْ يَخْرُجَ سَفَرًا، اقْرَعَ بَيْنَ نِسَائِهِ، فَايَّتُهُنَّ خَرَجَ سَهْمُهَا، خَرَجَ بِهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَعَهُ. قَالَتْ عَائِشَةُ: فَاقْرَعَ بَيْنَنَا فِى غَزْوَةٍ غَزَاهَا، فَخَرَجَ فِيهَا سَهْمِى، فَخَرَجْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وَذَالِكَ بَعْدَ مَا اُنْزِلَ الْحِجَابُ، فَانَا اُحْمَلُ فِى هَوْدَجِى،
وَاُنْزَلُ فِيهِ، مَسِيرَنَا، حَتَّى إِذَا فَرَغَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ غَزْوِهِ، وَقَفَلَ، وَدَنَوْنَا مِنَ الْمَدِينَةِ، اذَنَ لَيْلَةً بِالرَّحِيلِ، فَقُمْتُ حِينَ اذَنُوا بِالرَّحِيلِ، فَمَشَيْتُ حَتَّى جَاوَزْتُ الْجَيْشَ، فَلَمَّا قَضَيْتُ مِنْ شَاْنِى اقْبَلْتُ إِلَى الرَّحْلِ، فَلَمَسْتُ صَدْرِى فَإِذَا عِقْدِى مِنْ جَزْعِ ظَفَارِ قَدِ انْقَطَعَ، فَرَجَعْتُ فَالْتَمَسْتُ عِقْدِى فَحَبَسَنِى ابْتِغَاؤُهُ، وَاقْبَلَ الرَّهْطُ الَّذِينَ كَانُوا يَرْحَلُونَ لِى، فَحَمَلُوا هَوْدَجِى، فَرَحَلُوهُ عَلَى بَعِيرِىَ الَّذِى كُنْتُ ارْكَبُ، وَهُمْ يَحْسَبُونَ انِّى فِيهِ، قَالَتْ: وَكَانَتِ النِّسَاءُ إِذْ ذَاكَ خِفَافًا، لَمْ يُهَبَّلْنَ، وَلَمْ يَغْشَهُنَّ اللَّحْمُ إِنَّمَا يَاْكُلْنَ الْعُلْقَةَ مِنَ الطَّعَامِ، فَلَمْ يَسْتَنْكِرِ الْقَوْمُ ثِقَلَ الْهَوْدَجِ حِينَ رَحَلُوهُ وَرَفَعُوهُ وَكُنْتُ جَارِيَةً حَدِيثَةَ السِّنِّ، فَبَعَثُوا الْجَمَلَ وَسَارُوا، وَوَجَدْتُ عِقْدِى بَعْدَ مَا اسْتَمَرَّ الْجَيْشُ، فَجِئْتُ مَنَازِلَهُمْ وَلَيْسَ بِهَا دَاعٍ وَلا مُجِيبٌ، فَتَيَمَّمْتُ مَنْزِلِى الَّذِى كُنْتُ فِيهِ، وَظَنَنْتُ أَنَّ الْقَوْمَ سَيَفْقِدُونِى فَيَرْجِعُونَ إِلَىَّ، فَبَيْنَا انَا جَالِسَةٌ فِى مَنْزِلِى غَلَبَتْنِى
عَيْنِى فَنِمْتُ، وَكَانَ صَفْوَانُ بْنُ الْمُعَطَّلِ السُّلَمِىُّ، ثُمَّ الذَّكْوَانِىُّ قَدْ عَرَّسَ مِنْ وَرَاءِ الْجَيْشِ فَادَّلَجَ فَاصْبَحَ عِنْدَ مَنْزِلِى، فَرَاى سَوَادَ إِنْسَانٍ نَائِمٍ، فَاتَانِى فَعَرَفَنِى حِينَ رَانِى وَقَدْ كَانَ يَرَانِى قَبْلَ أَنْ يُضْرَبَ الْحِجَابُ عَلَىَّ، فَاسْتَيْقَظْتُ بِاسْتِرْجَاعِهِ حِينَ عَرَفَنِى فَخَمَّرْتُ وَجْهِى بِجِلْبَابِى، وَوَاللَّهِ مَا يُكَلِّمُنِى كَلِمَةً وَلا سَمِعْتُ مِنْهُ كَلِمَةً غَيْرَ اسْتِرْجَاعِهِ، حَتَّى انَاخَ رَاحِلَتَهُ، فَوَطِئَ عَلَى يَدِهَا فَرَكِبْتُهَا، فَانْطَلَقَ يَقُودُ بِى الرَّاحِلَةَ، حَتَّى اتَيْنَا الْجَيْشَ، بَعْدَ مَا نَزَلُوا مُوغِرِينَ فِى نَحْرِ الظَّهِيرَةِ، فَهَلَكَ مَنْ
هَلَكَ فِى شَاْنِى، وَكَانَ الَّذِى تَوَلَّى كِبْرَهُ عَبْدُ اللَّهِ، بْنُ اُبَىٍّ، َبْنُ سَلُولَ، فَقَدِمْنَا الْمَدِينَةَ، فَاشْتَكَيْتُ، حِينَ قَدِمْنَا الْمَدِينَةَ شَهْرًا، وَالنَّاسُ يُفِيضُونَ فِى قَوْلِ اهْلِ الإِفْكِ، وَلا اشْعُرُ بِشَىْءٍ مِنْ ذَالِكَ، وَهُوَ يَرِيبُنِى فِى وَجَعِى انِّى لا اعْرِفُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم اللُّطْفَ الَّذِى كُنْتُ ارَى مِنْهُ حِينَ اشْتَكِى، إِنَّمَا يَدْخُلُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَيُسَلِّمُ ثُمَّ يَقُولُ: كَيْفَ تِيكُمْ؟ فَذَاكَ يَرِيبُنِى، وَلا اشْعُرُ بِالشَّرِّ، حَتَّى خَرَجْتُ بَعْدَ مَا نَقِهْتُ، وَخَرَجَتْ مَعِى أم مِسْطَحٍ قِبَلَ الْمَنَاصِعِ، وَهُوَ مُتَبَرَّزُنَا، وَلا نَخْرُجُ إِلَاّ لَيْلاً إِلَى لَيْلٍ، وَذَالِكَ قَبْلَ أَنَّ نَتَّخِذَ الْكُنُفَ قَرِيبًا مِنْ بُيُوتِنَا، وَامْرُنَا امْرُ الْعَرَبِ الاُوَلِ فِى التَّنَزُّهِ، وَكُنَّا نَتَاذَّى بِالْكُنُفِ أَنْ نَتَّخِذَهَا عِنْدَ بُيُوتِنَا،
فَانْطَلَقْتُ انَا وَاُمُّ مِسْطَحٍ، وَهِىَ بِنْتُ ابِى رُهْمِ بْنِ الْمُطَّلِبِ بْنِ عَبْدِ مَنَافٍ، وَاُمُّهَا ابْنَةُ صَخْرِ بْنِ عَامِرٍ، خَالَةُ ابِى بَكْرٍ الصِّدِّيقِ، وَابْنُهَا مِسْطَحُ بْنُ اُثَاثَةَ بْنِ عَبَّادِ بْنِ الْمُطَّلِبِ، فَاقْبَلْتُ انَا وَبِنْتُ ابِى رُهْمٍ قِبَلَ بَيْتِى، حِينَ فَرَغْنَا مِنْ شَاْنِنَا، فَعَثَرَتْ أم مِسْطَحٍ فِى مِرْطِهَا. فَقَالَتْ: تَعِسَ مِسْطَحٌ. فَقُلْتُ لَهَا: بِئْسَ مَا قُلْتِ، اتَسُبِّينَ رَجُلاً قَدْ شَهِدَ بَدْرًا. قَالَتْ: اىْ هَنْتَاهُ، اوَ لَمْ تَسْمَعِى مَا قَالَ؟ قُلْتُ: وَمَاذَا قَالَ؟ قَالَتْ: فَاخْبَرَتْنِى بِقَوْلِ اهْلِ الإِفْكِ، فَازْدَدْتُ مَرَضًا إِلَى مَرَضِى، فَلَمَّا رَجَعْتُ إِلَى بَيْتِى، فَدَخَلَ عَلَىَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَسَلَّمَ. ثُمَّ قَالَ: كَيْفَ تِيكُمْ؟ قُلْتُ: اتَاْذَنُ لِى أَنْ اتِىَ ابَوَىَّ؟ قَالَتْ: وَانَا حِينَئِذٍ اُرِيدُ أَنْ اتَيَقَّنَ الْخَبَرَ مِنْ قِبَلِهِمَا، فَاذِنَ لِى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَجِئْتُ ابَوَىَّ فَقُلْتُ لاُمِّى: يَا اُمَّتَاهْ، مَا يَتَحَدَّثُ
النَّاسُ؟ فَقَالَتْ: يَا بُنَيَّةُ هَوِّنِى عَلَيْكِ، فَوَاللَّهِ لَقَلَّمَا كَانَتِ امْرَاةٌ قَطُّ وَضِيئَةًٌ، عِنْدَ رَجُلٍ يُحِبُّهَا، وَلَهَا ضَرَائِرُ، إِلَاّ كَثَّرْنَ عَلَيْهَا. قَالَتْ: قُلْتُ: سُبْحَانَ اللَّهِ، وَقَدْ تَحَدَّثَ النَّاسُ بِهَذَا؟ قَالَتْ: فَبَكَيْتُ تِلْكَ اللَّيْلَةَ حَتَّى اصْبَحْتُ لا يَرْقَاُ لِى دَمْعٌ وَلا اكْتَحِلُ بِنَوْمٍ، ثُمَّ اصَبَحْتُ ابْكِى، وَدَعَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلِىَّ بْنَ ابِى طَالِبٍ وَأُسامة بْنَ زَيْدٍ حِينَ اسْتَلْبَثَ الْوَحْىُ، يَسْتَشِيرُهُمَا فِى فِرَاقِ اهْلِهِ، قَالَتْ:
فَامَّا أُسامة بْنُ زَيْدٍ فَاشَارَ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِالَّذِى يَعْلَمُ مِنْ بَرَاءَةِ اهْلِهِ، وَبِالَّذِى يَعْلَمُ فِى نَفْسِهِ لَهُمْ مِنَ الْوُدِّ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، هُمْ اهْلُكَ وَلا نَعْلَمُ إِلَاّ خَيْرًا، وَامَّا عَلِىُّ بْنُ ابِى طَالِبٍ فَقَالَ: لَمْ يُضَيِّقِ اللَّهُ عَلَيْكَ. وَالنِّسَاءُ سِوَاهَا كَثِيرٌ، وَإِنْ تَسْالِ الْجَارِيَةَ تَصْدُقْكَ. قَالَتْ: فَدَعَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَرِيرَةَ. فَقَالَ: اىْ بَرِيرَةُ، هَلْ رَايْتِ مِنْ شَىْءٍ يَرِيبُكِ مِنْ عَائِشَةَ؟ قَالَتْ لَهُ بَرِيرَةُ: وَالَّذِى بَعَثَكَ بِالْحَقِّ إِنْ رَايْتُ عَلَيْهَا امْرًا قَطُّ اغْمِصُهُ عَلَيْهَا اكْثَرَ مِنْ انَّهَا جَارِيَةٌ حَدِيثَةُ السِّنِّ، تَنَامُ عَنْ عَجِينِ اهْلِهَا، فَتَاْتِى الدَّاجِنُ فَتَاْكُلُهُ. قَالَتْ: فَقَامَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمِنْبَرِ، فَاسْتَعْذَرَ مِنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ اُبَىٍّ، ابْنِ سَلُولَ. قَالَتْ: فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ عَلَى الْمِنْبَرِ: يَا مَعْشَرَ الْمُسْلِمِينَ، مَنْ يَعْذِرُنِى مِنْ رَجُلٍ قَدْ بَلَغَ اذَاهُ فِى اهْلِ بَيْتِى، فَوَاللَّهِ مَا عَلِمْتُ عَلَى اهْلِى إِلَاّ خَيْرًا، وَلَقَدْ ذَكَرُوا رَجُلاً مَا عَلِمْتُ عَلَيْهِ إِلَاّ خَيْرًا، وَمَا كَانَ يَدْخُلُ عَلَى اهْلِى إِلَاّ مَعِى. فَقَامَ سَعْدُ بْنُ مُعَاذٍ الانْصَارِىُّ فَقَالَ: انَا اعْذِرُكَ مِنْهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنْ كَانَ مِنَ الاوْسِ ضَرَبْنَا عُنُقَهُ، وَإِنْ كَانَ مِنْ إِخْوَانِنَا الْخَزْرَجِ امَرْتَنَا
فَفَعَلْنَا امْرَكَ. قَالَتْ: فَقَامَ سَعْدُ بْنُ عُبَادَةَ، وَهُوَ سَيِّدُ الْخَزْرَجِ، وَكَانَ رَجُلاً صَالِحًا، وَلَكِنِ اجْتَهَلَتْهُ
الْحَمِيَّةُ، فَقَالَ لِسَعْدِ بْنِ مُعَاذٍ: كَذَبْتَ لَعَمْرُ اللَّهِ، لا تَقْتُلُهُ وَلا تَقْدِرُ عَلَى قَتْلِهِ، فَقَامَ اُسَيْدُ بْنُ حُضَيْرٍ، وَهُوَ ابْنُ عَمِّ سَعْدِ بْنِ مُعَاذٍ، فَقَالَ لِسَعْدِ بْنِ عُبَادَةَ: كَذَبْتَ، لَعَمْرُ اللَّهِ لَنَقْتُلَنَّهُ، فَإِنَّكَ مُنَافِقٌ تُجَادِلُ عَنِ الْمُنَافِقِينَ، فَثَارَ الْحَيَّانِ الاوْسُ وَالْخَزْرَجُ، حَتَّى هَمُّوا أَنْ يَقْتَتِلُوا، وَرَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَائِمٌ عَلَى الْمِنْبَرِ، فَلَمْ يَزَلْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُخَفِّضُهُمْ حَتَّى سَكَتُوا وَسَكَتَ. قَالَتْ: وَبَكَيْتُ يَوْمِى ذَالِكَ، لا يَرْقَاُ لِى دَمْعٌ وَلا اكْتَحِلُ بِنَوْمٍ، ثُمَّ بَكَيْتُ لَيْلَتِى الْمُقْبِلَةَ، لا يَرْقَاُ لِى دَمْعٌ وَلا اكْتَحِلُ بِنَوْمٍ، وَابَوَاىَ يَظُنَّانِ أَنَّ الْبُكَاءَ فَالِقٌ كَبِدِى، فَبَيْنَمَا هُمَا جَالِسَانِ عِنْدِى، وَانَا ابْكِى، اسْتَاْذَنَتْ عَلَىَّ امْرَاةٌ مِنَ الانْصَارِ فَاذِنْتُ لَهَا، فَجَلَسَتْ تَبْكِى، قَالَتْ: فَبَيْنَا نَحْنُ عَلَى ذَالِكَ دَخَلَ عَلَيْنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَسَلَّمَ ثُمَّ جَلَسَ. قَالَتْ: وَلَمْ يَجْلِسْ عِنْدِى مُنْذُ قِيلَ لِى مَا قِيلَ، وَقَدْ لَبِثَ شَهْرًا لا يُوحَى إِلَيْهِ فِى شَاْنِى بِشَىْءٍ. قَالَتْ: فَتَشَهَّدَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ جَلَسَ ثُمَّ قَالَ: امَّا بَعْدُ، يَا عَائِشَةُ، فَإِنَّهُ قَدْ بَلَغَنِى عَنْكِ كَذَا وَكَذَا، فَإِنْ كُنْتِ بَرِيئَةً فَسَيُبَرِّئُكِ اللَّهُ، وَإِنْ كُنْتِ الْمَمْتِ بِذَنْبٍ، فَاسْتَغْفِرِى اللَّهَ وَتُوبِى إِلَيْهِ، فَإِنَّ الْعَبْدَ إِذَا اعْتَرَفَ بِذَنْبٍ ثُمَّ تَابَ، تَابَ اللَّهُ عَلَيْهِ. قَالَتْ: فَلَمَّا قَضَى رَسُولُ اللَّهِ
صلى الله عليه وسلم مَقَالَتَهُ، قَلَصَ دَمْعِى، حَتَّى مَا اُحِسُّ مِنْهُ قَطْرَةً. فَقُلْتُ لابِى: اجِبْ عَنِّى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِيمَا قَالَ. فَقَالَ: وَاللَّهِ مَا ادْرِى مَا اقُولُ لِرَسُولِ اللَّهِ
صلى الله عليه وسلم. فَقُلْتُ لاُمِىِّ: اجِيبِى عَنِّى رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. فَقَالَتْ: وَاللَّهِ مَا ادْرِى مَا اقُولُ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. فَقُلْتُ، وَانَا جَارِيَةٌ حَدِيثَةُ السِّنِّ، لا اقْرَاُ كَثِيرًا مِنَ الْقُرْانِ: إِنِّى، وَاللَّهِ لَقَدْ عَرَفْتُ انَّكُمْ قَدْ سَمِعْتُمْ بِهَذَا حَتَّى اسْتَقَرَّ فِى نُفُوسِكُمْ وَصَدَّقْتُمْ بِهِ، فَإِنْ قُلْتُ لَكُمْ إِنِّى بَرِيئَةٌ، وَاللَّهُ يَعْلَمُ انِّى بَرِيئَةٌ، لا تُصَدِّقُونِى بِذَالِكَ، وَلَئِنِ اعْتَرَفْتُ لَكُمْ بِامْرٍ، وَاللَّهُ يَعْلَمُ انِّى بَرِيئَةٌ، لَتُصَدِّقُونَنِى، وَإِنِّى، وَاللَّهِ، مَا اجِدُ لِى وَلَكُمْ مَثَلاً إِلَاّ كَمَا قَالَ ابُو يُوسُفَ: (فَصَبْرٌ جَمِيلٌ وَاللَّهُ الْمُسْتَعَانُ عَلَى مَا تَصِفُونَ). قَالَتْ: ثُمَّ تَحَوَّلْتُ فَاضْطَجَعْتُ عَلَى فِرَاشِى. قَالَتْ: وَانَا وَاللَّهِ، حِينَئِذٍ اعْلَمُ انِّى بَرِيئَةٌ، وَانَّ اللَّهَ مُبَرِّئِى بِبَرَاءَتِى، وَلَكِنْ وَاللَّهِ مَا كُنْتُ اظُنُّ أَنْ يُنْزَلَ فِى شَاْنِى وَحْىٌ يُتْلَى، وَلَشَاْنِى كَانَ احْقَرَ فِى نَفْسِى مِنْ أَنْ يَتَكَلَّمَ اللَّهُ عز وجل فِىَّ بِامْرٍ يُتْلَى، وَلَكِنِّى كُنْتُ ارْجُو أَنْ يَرَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِى النَّوْمِ رُؤْيَا يُبَرِّئُنِى اللَّهُ بِهَا. قَالَتْ: فَوَاللَّهِ مَا رَامَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَجْلِسَهُ، وَلا خَرَجَ مِنْ اهْلِ الْبَيْتِ احَدٌ، حَتَّى انْزَلَ اللَّهُ عَزَّ
وَجَلَّ عَلَى نَبِيِّهِ صلى الله عليه وسلم، فَاخَذَهُ مَا كَانَ يَاْخُذُهُ مِنَ الْبُرَحَاءِ عِنْدَ الْوَحْىِ، حَتَّى إِنَّهُ لَيَتَحَدَّرُ مِنْهُ مِثْلُ الْجُمَانِ مِنَ الْعَرَقِ، فِى الْيَوْمِ الشَّاتِ، مِنْ ثِقَلِ الْقَوْلِ الَّذِى اُنْزِلَ عَلَيْهِ. قَالَتْ: فَلَمَّا سُرِّىَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وَهُوَ يَضْحَكُ، فَكَانَ اوَّلَ كَلِمَةٍ تَكَلَّمَ بِهَا أَنْ قَالَ: ابْشِرِى يَا عَائِشَةُ، امَّا اللَّهُ فَقَدْ بَرَّاكِ. فَقَالَتْ لِى اُمِّى: قُومِى إِلَيْهِ. فَقُلْتُ: وَاللَّهِ لا اقُومُ إِلَيْهِ، وَلا أحمد إِلَاّ اللَّهَ، هُوَ الَّذِى انْزَلَ بَرَاءَتِى. قَالَتْ: فَانْزَلَ اللَّهُ عز وجل: (إِنَّ الَّذِينَ جَاءُوا بِالإِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْ) عَشْرَ ايَاتٍ، فَانْزَلَ
اللَّهُ عز وجل هَؤُلاءِ الايَاتِ بَرَاءَتِى. قَالَتْ: فَقَالَ ابُو بَكْرٍ، وَكَانَ يُنْفِقُ عَلَى مِسْطَحٍ لِقَرَابَتِهِ مِنْهُ وَفَقْرِهِ: وَاللَّهِ لا اُنْفِقُ عَلَيْهِ شَيْئًا ابَدًا، بَعْدَ الَّذِى قَالَ لِعَائِشَةَ، فَانْزَلَ اللَّهُ عز وجل: (وَلا يَاْتَلِ اُولُو الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَالسَّعَةِ أَنْ يُؤْتُوا اُولِى الْقُرْبَى) إِلَى قَوْلِهِ: (الا تُحِبُّونَ أَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَكُمْ). فَقَالَ ابُو بَكْرٍ: وَاللَّهِ إِنِّى لاُحِبُّ أَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لِى، فَرَجَعَ إِلَى مِسْطَحٍ النَّفَقَةَ الَّتِي كَانَ يُنْفِقُ عَلَيْهِ. وَقَالَ: لا انْزِعُهَا مِنْهُ ابَدًا. قَالَتْ عَائِشَةُ: وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سَالَ زَيْنَبَ بِنْتَ جَحْشٍ، زَوْجَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَنْ امْرِى: مَا عَلِمْتِ؟ اوْ مَا رَايْتِ؟ فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ احْمِى سَمْعِى وَبَصَرِى، وَاللَّهِ مَا عَلِمْتُ
إِلَاّ خَيْرًا. قَالَتْ عَائِشَةُ: وَهِىَ الَّتِي كَانَتْ تُسَامِينِى مِنْ ازْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَعَصَمَهَا اللَّهُ بِالْوَرَعِ، وَطَفِقَتْ أختها حِمْنَةُ بِنْتُ جَحْشٍ تُحَارِبُ لَهَا، فَهَلَكَتْ فِيمَنْ هَلَكَ.
أخرجه أحمد 6/ 194 قال: حدثنا عبد الرزاق. قال: حدثنا مَعْمر. وفي 6/ 197 قال: حدثنا بَهْز. قال: حدثني إبراهيم بن سعد، عن صالح. قال بَهْز: قلت له: ابن كيسان؟ قال: نعم. و`البُخَارِي` 3/ 219 و 4/ 40 و 5/ 110 و 6/ 96 و 8/ 168 و 172 و 9/ 176 قال: حدثنا حجاج بن منهال. قال: حدثنا عبد الله بن عُمر النميري. قال: حدثنا يونس بن يزيد الايلي. وفي 3/ 227 قال: حدثنا ابو الربيع سُليمان بن داود. وافهمني بعضَه أحمد. قال: حدثنا فُليح بن سليمان. وفي 5/ 148 و 6/ 95 و 8/ 168 و 172 و 9/ 139 قال: حدثنا عبد العزيز بن عبد الله (الاويسي). قال: حدثنا إبراهيم بن سعد، عن صالح. وفي 6/ 172 و 9/ 193، وفي خلق افعال العباد (صفحة 35) قال: حدثنا يحيى بن بُكير. قال: حدثنا الليث، عن يونس. وفي خلق افعال العباد (35)
قال: حدثنا عبد الله. قال: حدثني الليث، قال: حدثني يونس. و`مسلم` 8/ 112 قال: حدثنا حِبَّان بن موسى. قال: أخبرنا عبد الله بن المبارك. قال: أخبرنا يونس بن يزيد الايلي. ح وحدثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي ومحمد بن رافع وعَبْد بن حُميد. قال ابن رافع: حدثنا وقال الاخران: أخبرنا عبد الرزاق. قال: أخبرنا مَعْمر. وفي 8/ 118 قال: حدثني ابو الربيع العتكي. قال: حدثنا فُليح بن سُليمان. ح وحدثنا الحسن بن علي الحُلْواني وعَبْد بن حُميد. قالا: حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد. قال: حدثنا أبي، عن صالح بن كيسان. و`أبو داود` 4735 قال: حدثنا سُليمان بن داود المهري. قال: أخبرنا عبد الله بن وهب. قال: أخبرني يونس بن يزيد. و`النَّسائي` في `الكبرى` تحفة
الاشراف 11/ 16126 عن أَبي داود سُليمان بن سيف الحراني، عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أَبيه، عن صالح بن كيسان (ح) وعن محمد بن عبد الاعلى، عن محمد بن ثور، عن مَعْمر. وفي 11/ 16129 عن سليمان بن داود المهري، عن ابن وهب، عن يونس وذكر اخر. اربعتهم (مَعْمر بن راشد، وصالح بن كيسان، ويونس بن يزيد، وفليح بن سليمان) عن ابن شهاب الزهري. قال: أخبرني سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير وعلقمة بن وقاص وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، فذكروه.
- وأخرجه الحميدي (284) قال: حدثنا سُفيان، عن وائل بن داود، عن ابنه بكر بن وائل، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن عائشة؛ فذكره مختصرًا. ليس فيه (عروة بن الزبير، ولا علقمة بن وقاص، ولا عُبيد الله بن عبد الله.
- وأخرجه أحمد 6/ 198 قال: حدثنا يعقوب بن إبراهيم. قال: حدثني أبي عن صالح بن كيسان. قال: قال ابن شهاب: حدثني عًروة، فذكر الحديث واسناده.
- وأخرجه أحمد 6/ 264 قال: حدثنا محمد بن يزيد، يعني الواسطي،
عن سُفيان بن عُيَيْنَةَ، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة. قالت: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: ياعائشة، وان كنت الممت بذنب فاستغفري الله، فان التوبة من الذنب الندمُ والاستغفارُ.
- وأخرجه البخاري 3/ 231 قال: حدثنا ابو الربيع سليمان بن داود. قال: وحدثنا فليح، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة وعبد الله بن الزبير، مثله.
- وأخرجه البخاري 6/ 127 قال: حدثنا ابو نعيم. قال: حدثنا سفيان، عن مَعْمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، رضي الله عنها؛ (وَالَّذِي توَلَّى كِبْرَهُ). قالت: عبد الله بن أبي بن سلول.
- وأخرجه النسائي في `الكبرى` تحفة الاشراف 11/ 16311 عن الربيع عن سُليمان، عن الشافعي، عن محمد بن علي بن شافع، عن ابن شهاب، عن عبيد اله بن عبد الله، عن عائشة؛ فذكره.
- وأخرجه أحمد 6/ 59 قال: حدثنا ابو أُسامة. و`البُخَارِي` 9/ 139 قال: حدثني محمد بن حرب. قال: حدثنا يحيى بن أبي زكرياء الغساني. و`مسلم` 8/ 118 قال: حدثنا ابو بكر بن أبي شَيْبة ومحمد بن العلاء. قالا: حدثنا ابو أُسامة. و`أبو داود` 5219 قال: حدثنا موسى بن إسماعيل. قال: حدثنا حمَّاد. و`التِّرمِذي` 3180 قال: حدثنا محمود بن غيلان. قال: حدثنا ابو أُسامة.
ثلاثتهم (ابو أُسامة، ويحيى، وحمَّاد) عن هشام بن عروة، عن أَبيه، فذكره.
- وأخرجه ابو داود (4008) قال: حدثنا موسى بن إسماعيل. قال: حدثنا حمَّاد. قال: حدثنا هشام بن عروة، عن عروة، ان عائشة، رضي الله عنها. قالت: نزل الوحي على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقرا علينا: (سورة انزلناها وفرضناها) حتى اتى على هذه الايات.
قال ابو داود: يعني مخففة.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন ইফতার (মিথ্যা অপবাদ) লোকেরা তাঁর সম্পর্কে অপবাদ আরোপ করেছিল, তখন আল্লাহ তাকে তাদের অপবাদ থেকে মুক্ত ঘোষণা করেন। (বর্ণনাকারী) যুহরি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব, উরওয়াহ ইবনু যুবাইর, আলক্বামাহ ইবনু ওয়াক্কাস ও উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উতবাহ ইবনু মাসঊদ—এই চারজনের প্রত্যেকেই আমাকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের কিছু অংশ বর্ণনা করেছেন, এবং তাদের কারো কারো স্মরণশক্তি অন্যদের চেয়ে ভালো ছিল, এবং বর্ণনাও ছিল নির্ভরযোগ্য। আর আমি তাদের প্রত্যেকের কাছ থেকেই সেই হাদীস মুখস্থ করেছি, যা তারা বর্ণনা করেছেন, এবং তাদের বর্ণনার কিছু অংশ অন্যদের বর্ণনাকে সমর্থন করে। তাঁরা বর্ণনা করেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সফরে যাওয়ার ইচ্ছা করতেন, তখন স্ত্রীদের মধ্যে লটারি করতেন। যার নাম আসত, তিনি তাকেই নিজের সাথে সফরে নিয়ে যেতেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনি এক যুদ্ধে যাওয়ার সময় আমাদের মধ্যে লটারি করলেন এবং তাতে আমার নাম উঠল। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম। এটি ছিল পর্দার বিধান নাযিল হওয়ার পরের ঘটনা। আমি আমার হাওদার মধ্যে থাকতাম এবং এর মধ্যেই নামতাম।
অবশেষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর যুদ্ধ শেষ করে ফিরছিলেন এবং আমরা মাদীনার কাছাকাছি পৌঁছলাম, তখন তিনি এক রাতে যাত্রা শুরু করার ঘোষণা দিলেন। যখন যাত্রার ঘোষণা দেওয়া হলো, আমি উঠলাম এবং হেঁটে সেনাবাহিনীর কিছুটা বাইরে চলে গেলাম। যখন আমার প্রাকৃতিক প্রয়োজন শেষ করলাম, তখন কাফেলার দিকে ফিরে এলাম। আমি আমার বুক স্পর্শ করে দেখলাম, আমার ইয়েমেনী জাযআ পাথরের তৈরি গলার হারটি ছিঁড়ে গেছে। আমি হার খুঁজতে ফিরে গেলাম, আর তা খুঁজতে গিয়ে আমি আটকে গেলাম।
এদিকে যে দলটি আমার উট প্রস্তুত করত, তারা এসে আমার হাওদাটি বহন করে আমার আরোহণের উটের উপর রাখল। তারা মনে করেছিল যে আমি এর ভেতরেই আছি। তিনি (আয়েশা) বলেন, সেই সময় মহিলারা হালকা-পাতলা গড়নের ছিল, তাদের দেহে বেশি মেদ ছিল না। তারা সামান্য খাবার খেত। তাই যখন লোকেরা হাওদাটি উঠিয়ে উটের পিঠে রাখল, তখন তাদের কাছে হাওদার হালকা হওয়াটা অস্বাভাবিক মনে হয়নি। তাছাড়া আমিও ছিলাম তখন অল্প বয়স্কা বালিকা। তারা উট হাঁকিয়ে চলতে শুরু করল।
সেনাবাহিনী চলে যাওয়ার পর আমি আমার হারটি খুঁজে পেলাম। এরপর আমি তাদের মনজিলে ফিরে এলাম, যেখানে আহ্বানকারী বা উত্তরদাতা কেউ ছিল না। তখন আমি সেই স্থানে এলাম যেখানে আমি ছিলাম, আর আমার ধারণা হলো যে, লোকেরা আমাকে খুঁজে না পেয়ে ফিরে আসবে। আমি যখন আমার থাকার জায়গায় বসে ছিলাম, তখন আমার চোখে ঘুম নেমে এলো এবং আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল আস-সুলামী আয-যাকওয়ানী সেনাবাহিনীর পেছনে বিশ্রাম করছিলেন। তিনি ভোর রাতে রওনা হয়ে আমার অবস্থানে এসে পৌঁছলেন। তিনি এক ঘুমন্ত মানুষের প্রতিচ্ছায়া দেখতে পেলেন। তিনি আমার কাছে এলেন এবং আমাকে দেখে চিনতে পারলেন। পর্দার বিধান আসার পূর্বে তিনি আমাকে দেখেছিলেন।
আমাকে চেনার পর যখন তিনি ইন্নালিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন পড়লেন, তখন তাঁর শব্দে আমার ঘুম ভেঙে গেল। আমি আমার চাদর দিয়ে মুখ ঢেকে নিলাম। আল্লাহর কসম! তিনি আমার সাথে একটিও কথা বলেননি, আর আমি তাঁর ইন্নালিল্লাহ... ছাড়া অন্য কোনো শব্দ শুনিনি। অতঃপর তিনি তাঁর বাহনটিকে বসালেন এবং তার সামনের পায়ে চাপ দিলেন, ফলে আমি সেটির উপর আরোহণ করলাম। অতঃপর তিনি বাহনটিকে টেনে নিয়ে চললেন, যতক্ষণ না আমরা দুপুর বেলায় প্রচণ্ড গরমের সময় বিশ্রামের জন্য থামা সেনাবাহিনীর কাছে পৌঁছলাম।
এই ঘটনার ব্যাপারে যারা ধ্বংস হওয়ার ছিল, তারা ধ্বংস হলো। আর এর প্রধান অংশীদার ছিল আব্দুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল। আমরা মাদীনায় এসে পৌঁছলাম। মাদীনায় আসার পর আমি এক মাস অসুস্থ থাকলাম। এদিকে লোকেরা অপবাদ আরোপকারীদের কথা নিয়ে আলোচনা করতে থাকল, অথচ আমি এর কিছুই জানতে পারছিলাম না।
আমার অসুস্থতার সময়ে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই ভালোবাসা ও দয়া দেখছিলাম না, যা আমি অসুস্থ হলে তাঁর পক্ষ থেকে সাধারণত দেখে থাকি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল ঘরে প্রবেশ করতেন, সালাম দিতেন এবং জিজ্ঞেস করতেন: "তোমরা কেমন আছ?" এইটুকুই আমাকে সন্দেহযুক্ত করত, যদিও আমি খারাপ কোনো কিছুর বিষয়ে অবগত ছিলাম না।
অবশেষে যখন আমি সুস্থ হলাম, তখন আমি উম্মে মিসতাহকে সাথে নিয়ে মানাসি' নামক স্থানের দিকে গেলাম। এটি ছিল আমাদের প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের স্থান। আমরা রাতে ছাড়া বের হতাম না, যখন আমরা আমাদের ঘরের পাশে শৌচাগার তৈরি করিনি। পবিত্রতার ব্যাপারে আমাদের রীতি প্রাচীন আরবদের মতোই ছিল। ঘরের পাশে শৌচাগার তৈরি করলে আমরা কষ্ট বোধ করতাম। আমি ও উম্মে মিসতাহ রওনা হলাম। তিনি ছিলেন আবুল রুহম ইবনু মুত্তালিব ইবনু আবদে মানাফের মেয়ে, আর তার মা ছিলেন আবু বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খালা সখর ইবনু আমেরের কন্যা। তার ছেলে হলো মিসতাহ ইবনু উসাসাহ ইবনু আব্বাদ ইবনুল মুত্তালিব। আমরা উভয়ে যখন প্রয়োজন শেষে বাড়ির দিকে ফিরছিলাম, তখন উম্মে মিসতাহ তার চাদরে জড়িয়ে পড়ে হোঁচট খেলেন এবং বলে উঠলেন: "ধ্বংস হোক মিসতাহ!" আমি তাকে বললাম: "তুমি খুব খারাপ কথা বললে! তুমি কি এমন একজন লোককে গালি দিচ্ছ, যে বদর যুদ্ধে উপস্থিত ছিল?" তিনি বললেন: "হে নির্বোধ! তুমি কি শোনোনি সে কী বলেছে?" আমি বললাম: "সে কী বলেছে?" তিনি বললেন: তখন তিনি আমাকে অপবাদকারীদের কথা জানালেন। এতে আমার রোগ আরও বেড়ে গেল।
যখন আমি আমার বাড়িতে ফিরলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে সালাম দিলেন। অতঃপর জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কেমন আছ?" আমি বললাম: "আপনি কি আমাকে আমার বাবা-মায়ের কাছে যাওয়ার অনুমতি দেবেন?" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন আমি তাদের কাছ থেকে সংবাদটি নিশ্চিত হতে চাইছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি আমার বাবা-মায়ের কাছে এসে আমার মাকে বললাম: "হে আম্মা! লোকেরা কী আলোচনা করছে?" মা বললেন: "হে আমার প্রিয় কন্যা! তুমি মন হালকা করো। আল্লাহর কসম! এমন খুব কমই হয়েছে যে, কোনো সুন্দরী নারী কোনো পুরুষের প্রিয়তমা স্ত্রী হবে এবং তার সতীন থাকবে, আর তারা তার বিরুদ্ধে বেশি কথা বলবে না।" তিনি বলেন: আমি বললাম: "সুবহানাল্লাহ! লোকেরা কি এই কথাই আলোচনা করছে?" তিনি বলেন: আমি সেই রাত কাঁদতে কাঁদতে সকাল করলাম। আমার অশ্রু থামল না এবং আমি একফোঁটা ঘুমাতেও পারলাম না। এরপর সকালেও আমি কাঁদতে থাকলাম।
যখন ওহী আসতে বিলম্ব হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারকে (আমাকে) পরিত্যাগ করার বিষয়ে পরামর্শ করার জন্য আলী ইবনু আবী তালিব ও উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন। তিনি বলেন: উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পরামর্শ দিলেন, তাঁর পরিবারের পবিত্রতা সম্পর্কে যা তিনি জানতেন, এবং তাদের প্রতি তাঁর অন্তরে যে ভালোবাসার অনুভূতি ছিল, সে হিসেবে। তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তারা আপনার পরিবার, আর আমরা তাদের সম্পর্কে শুধু ভালো ছাড়া অন্য কিছু জানি না।" আর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আল্লাহ আপনার জন্য সঙ্কীর্ণ করেননি। তিনি ছাড়া অন্য স্ত্রীলোক অনেক আছে। আর আপনি তার দাসীকে জিজ্ঞেস করুন, সে আপনাকে সত্য কথা বলবে।"
তিনি (আয়েশা) বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারীরাহকে ডাকলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "হে বারীরাহ! তুমি কি আয়েশার মধ্যে এমন কিছু দেখেছ যা তোমাকে সন্দেহে ফেলেছে?" বারীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: "যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি তার মধ্যে এমন কোনো ত্রুটি দেখিনি, যা তাকে দোষী করতে পারে। শুধু এতটুকু ছাড়া যে, সে অল্পবয়স্কা বালিকা, সে তার পরিবারের আটা-ময়দা রেখে ঘুমিয়ে যায়, আর গৃহপালিত পশু এসে তা খেয়ে ফেলে।" তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে আব্দুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূলের বিরুদ্ধে সাহায্য চাইলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে বললেন: "হে মুসলিম সমাজ! সেই লোকটির হাত থেকে কে আমাকে সাহায্য করবে, যার কষ্ট আমার পরিবারের উপর পৌঁছেছে? আল্লাহর কসম! আমি আমার পরিবারের ব্যাপারে ভালো ছাড়া অন্য কিছু জানি না। আর তারা এমন একজনের নাম উল্লেখ করেছে, যার ব্যাপারে আমি ভালো ছাড়া অন্য কিছু জানি না এবং সে আমার সাথে ছাড়া আমার পরিবারের কাছে প্রবেশ করত না।"
তখন আনসারদের মধ্য থেকে সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে তার থেকে অব্যাহতি দেব (অর্থাৎ তার বিচার করব)। যদি সে আওস গোত্রের হয়, তবে আমরা তার গর্দান উড়িয়ে দেব। আর যদি সে আমাদের ভাই খাযরাজ গোত্রের হয়, তবে আপনি আমাদের নির্দেশ দিন, আমরা আপনার নির্দেশ পালন করব।" তিনি বলেন: তখন সা'দ ইবনু উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি খাযরাজ গোত্রের সর্দার ছিলেন এবং তিনি ছিলেন একজন নেককার লোক—দাঁড়ালেন। কিন্তু গোত্রীয় আবেগ তাঁকে চঞ্চল করে তুলেছিল। তিনি সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "আল্লাহর কসম! তুমি মিথ্যা বলেছ। তুমি তাকে হত্যা করবে না এবং তুমি তাকে হত্যা করতে সক্ষমও হবে না।" তখন উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চাচাতো ভাই—দাঁড়িয়ে সা'দ ইবনু উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "আল্লাহর কসম! তুমি মিথ্যা বলেছ! আমরা তাকে অবশ্যই হত্যা করব। তুমি তো মুনাফিক, মুনাফিকদের পক্ষ হয়ে তর্ক করছ।" ফলে আওস ও খাযরাজ—এই দুই গোত্র উত্তেজিত হয়ে পড়ল এবং তারা একে অপরের সাথে যুদ্ধ করতে উদ্যত হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন মিম্বারের উপর দাঁড়ানো ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের শান্ত করতে থাকলেন, যতক্ষণ না তারা শান্ত হলো এবং তিনিও নীরব হলেন।
তিনি (আয়েশা) বলেন: আমি সেদিন সারা দিন কাঁদতে থাকলাম, আমার অশ্রু থামল না এবং আমি ঘুমিয়েও শান্তি পেলাম না। এরপর পরের রাতও কাঁদতে থাকলাম, আমার অশ্রু থামল না এবং আমি ঘুমে চোখ জুড়াতে পারলাম না। আমার বাবা-মা মনে করছিলেন যে, কান্নার কারণে আমার কলিজা ফেটে যাবে। যখন তারা আমার কাছে বসে ছিলেন এবং আমি কাঁদছিলাম, তখন আনসারদের একজন মহিলা আমার কাছে আসার অনুমতি চাইলেন, আমি তাকে অনুমতি দিলাম। সেও বসে কাঁদতে শুরু করল। তিনি বলেন: আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন এবং বসলেন। তিনি বলেন: অপবাদ রটার পর থেকে তিনি মাসখানেক আমার কাছে বসেননি, আর আমার বিষয়ে তাঁর কাছে কোনো ওহীও নাযিল হয়নি।
তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে তাশাহহুদ পড়লেন, অতঃপর বললেন: "আম্মা বা'দ (অতএব), হে আয়েশা! তোমার সম্পর্কে আমার কাছে এমন এমন কথা পৌঁছেছে। যদি তুমি নির্দোষ হও, তাহলে আল্লাহ অবশ্যই তোমাকে নির্দোষ প্রমাণ করবেন। আর যদি তুমি কোনো পাপ করে থাকো, তবে আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাও এবং তাঁর দিকে প্রত্যাবর্তন করো। কারণ কোনো বান্দা যখন পাপ স্বীকার করে অনুতপ্ত হয়, অতঃপর তাওবা করে, তখন আল্লাহ তার তাওবা কবুল করেন।"
তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কথা শেষ করলেন, তখন আমার অশ্রু একদম থেমে গেল, আমি এক ফোঁটাও অনুভব করতে পারছিলাম না। আমি আমার আব্বাকে বললাম: "আমার পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তর দিন।" তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলব, তা জানি না।" আমি আমার আম্মাকে বললাম: "আমার পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তর দিন।" তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলব, তা জানি না।" তখন আমি বললাম—আমি তখন অল্প বয়স্কা বালিকা ছিলাম এবং কুরআনের বেশি অংশ মুখস্থ ছিল না—: "আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই জানি যে, আপনারা এই বিষয়টি শুনেছেন, এমনকি তা আপনাদের মনে গেঁথে গেছে এবং আপনারা তা বিশ্বাসও করেছেন। এখন যদি আমি আপনাদের বলি যে আমি নির্দোষ—আর আল্লাহ জানেন আমি নির্দোষ—তাহলে আপনারা আমাকে বিশ্বাস করবেন না। পক্ষান্তরে, যদি আমি এমন কোনো বিষয় স্বীকার করি—আর আল্লাহ জানেন আমি নির্দোষ—তাহলে আপনারা আমাকে বিশ্বাস করবেন। আল্লাহর কসম! আমার ও আপনাদের অবস্থার জন্য ইউসুফ (আঃ)-এর পিতা (ইয়াকুব আঃ)-এর উক্তি ছাড়া আর কোনো উদাহরণ খুঁজে পাচ্ছি না। তিনি বলেছিলেন: **'অতএব, পূর্ণ ধৈর্য ধারণই উত্তম। তোমরা যা বর্ণনা করছ, সে বিষয়ে আল্লাহই আমার একমাত্র ভরসা।'** [সূরা ইউসুফ, ১২: ১৮] তিনি বলেন: অতঃপর আমি ঘুরে গিয়ে আমার বিছানায় শুয়ে পড়লাম।
তিনি বলেন: আল্লাহর কসম! সে সময় আমি জানতাম যে, আমি নির্দোষ এবং আল্লাহ আমার নির্দোষিতাকে প্রমাণ করবেন। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমি কখনোই ভাবিনি যে, আমার ব্যাপারে পঠিতব্য ওহী নাযিল হবে। আমার বিষয়টি আমার কাছে এতো তুচ্ছ ছিল যে, আল্লাহ আমার ব্যাপারে পঠিতব্য কোনো নির্দেশ দিয়ে কথা বলবেন। তবে আমি আশা করেছিলাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হয়ত স্বপ্নে এমন কিছু দেখবেন, যার মাধ্যমে আল্লাহ আমাকে নির্দোষ প্রমাণ করবেন। তিনি বলেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সেই স্থান থেকে সরলেন না এবং ঘরের আর কেউও বাইরে গেল না, এর মধ্যেই মহান আল্লাহ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর ওহী নাযিল করলেন। ওহী নাযিলের সময় তাঁর যে কষ্ট হতো, তা তাঁকে আচ্ছন্ন করে ফেলল। এমনকি শীতের দিনেও তাঁর শরীর থেকে মুক্তার দানার মতো ঘাম ঝরতে লাগল, যা ছিল তাঁর উপর নাযিল হওয়া কথার ভারের কারণে।
তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর থেকে সেই অবস্থা দূর হলো, তিনি হাসছিলেন। তাঁর মুখ থেকে উচ্চারিত প্রথম কথাটি ছিল: "হে আয়েশা! সুসংবাদ গ্রহণ করো। আল্লাহ তোমাকে অবশ্যই নির্দোষ ঘোষণা করেছেন।" আমার মা আমাকে বললেন: "তাঁর কাছে উঠে যাও।" আমি বললাম: "আল্লাহর কসম! আমি তাঁর কাছে উঠব না। আমি শুধু আল্লাহর প্রশংসা করব, যিনি আমার পবিত্রতা নাযিল করেছেন।" তিনি বলেন: অতঃপর মহান আল্লাহ নাযিল করলেন: **"নিশ্চয় যারা এ অপবাদ (ইফক) রটনা করেছে, তারা তোমাদেরই এক দল..."** [সূরা নূর, ২৪: ১১]—এভাবে দশটি আয়াত নাযিল হলো। আল্লাহ তাআলা এই আয়াতগুলো আমার পবিত্রতা ঘোষণা করে নাযিল করেছেন।
তিনি বলেন: তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন—তিনি মিসতাহকে তার আত্মীয়তা ও দারিদ্র্যের কারণে খরচ দিতেন—: "আল্লাহর কসম! আয়েশার ব্যাপারে সে যা বলেছে, এরপর আমি তাকে আর কখনো কোনো খরচ দেব না।" অতঃপর মহান আল্লাহ নাযিল করলেন: **"তোমাদের মধ্যে যারা ঐশ্বর্য ও প্রাচুর্যের অধিকারী, তারা যেন কসম না করে যে, তারা আত্মীয়-স্বজন, অভাবগ্রস্ত এবং আল্লাহর পথে হিজরতকারীকে কিছুই দেবে না। তারা যেন তাদের ক্ষমা করে এবং তাদের উপেক্ষা করে। তোমরা কি চাও না যে আল্লাহ তোমাদের ক্ষমা করে দিন?"** [সূরা নূর, ২৪: ২২] আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই চাই যে আল্লাহ আমাকে ক্ষমা করে দিন।" অতঃপর তিনি মিসতাহকে সেই খরচ ফিরিয়ে দিলেন যা তিনি তাকে দিতেন এবং বললেন: "আমি আর কখনো তা বন্ধ করব না।"
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ব্যাপারে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলেন: "তুমি কী জানো? বা কী দেখেছ?" তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আমার কান ও চোখকে হেফাজত করছি (মিথ্যা শোনা বা দেখা থেকে)। আল্লাহর কসম! আমি তাঁর (আয়েশার) ব্যাপারে ভালো ছাড়া অন্য কিছু জানি না।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে একমাত্র যিনি আমার প্রতিদ্বন্দ্বী ছিলেন। আল্লাহ তাকে তাকওয়ার কারণে রক্ষা করেছিলেন। তবে তার বোন হামনাহ বিনতে জাহশ তার (যায়নাবের) পক্ষ হয়ে ঝগড়া করছিল, ফলে সে ধ্বংসপ্রাপ্তদের মধ্যে ধ্বংস হলো।
17257 - عَنِ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدِ بْنِ أبي بَكْرٍ، عَنْ عَائِشَةَ، مثله.
- يعني البخاري رحمه الله؛ مثل الحديث السابق (17256.
أخرجه البخاري 3/ 231 قال: حدثنا ابو الربيع سليمان بن داود. قال: حدثنا فليح، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن ويحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد بن أبي بكر، فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অনুরূপ।
17258 - عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، وَذُكِرَ الإِفْكُ. قَالَتْ:
جَلَسَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَكَشَفَ عَنْ وَجْهِهِ. وَقَالَ: اعُوذُ بِالسَّمِيعِ الْعَلِيمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ: (إِنَّ الَّذِينَ جَاؤُا بِالإِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْ) الايَةُ.
أخرجه ابو داود (785) قال: حدثنا قطن بن نسير. قال: حدثنا جعفر. قال: حدثنا حُميد الاعرج المكي، عن ابن شهاب، عن عروة، فذكره.
- قال ابو داود: وهذا حديثٌ منكر. قد روى هذا الحديث جماعة عن الزهري لم يذكروا هذا الكلام على هذا الشرح، واخاف ان يكون امر الاستعاذة من كلام حميد.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এবং ইফকের (মিথ্যা অপবাদের) ঘটনা প্রসঙ্গে তিনি (আয়েশা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন এবং তাঁর মুখমণ্ডল থেকে আবরণ সরালেন। তিনি বললেন: আমি সর্বশ্রোতা, মহাজ্ঞানীর কাছে বিতাড়িত শয়তান থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করি। (অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন): "নিশ্চয় যারা এ অপবাদ (ইফক) রটনা করেছে, তারা তোমাদেরই একদল..." (সম্পূর্ণ আয়াত)।
17259 - عَنْ أبي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ:
رُمِيتُ بِمَا رُمِيتُ بِهِ وَانَا غَافِلَةٌ، فَبَلَغَنِي بَعْدَ ذَالِكَ رَضخ مِنْ ذَالِكَ، فَبَيْنَمَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عِنْدِي إِذْ اُوحِيَ إِلَيْهِ، وَكَانَ إِذَا اُوحِيَ
الَيْهِ يَاْخُذُهُ شِبْهُ السُّبَاتِ، فَبَيْنَمَا هُوَ جَالِسٌ عِنْدِي إِذْ اُنْزِلَ عَلَيْهِ الْوَحْيُ، فَرَفَعَ رَاْسَهُ وَهُوَ يَمْسَحُ عَنْ جَبِينِهِ، فَقَالَ: ابْشِرِي يَاعَائِشَةُ، فَقُلْتُ: بِحَمْدِ اللَّهِ عز وجل لا بِحَمْدِكَ، فَقَرَا: (الَّذِينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ) حَتَّى بَلَغَ: (مُبَرَّؤُونَ مِمَّا يَقُولُونَ).
أخرجه أحمد 6/ 30 قال: حدثنا هشيم. وفي 6/ 103 قال: حدثنا ابو سعيد. وعبد بن حميد 1520 قال: أخبرني عَمرو بن عون.
ثلاثتهم (هشيم، وأبو سعيد، وعَمرو) عن عُمر بن أبي سلمة، عن أَبيه، فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার ওপর যখন অপবাদ দেওয়া হয়, তখন আমি অসচেতন (গাফেল) ছিলাম। এরপর আমার কাছে সেই অপবাদের কিছু অংশ পৌঁছল। একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে ছিলেন, এমন সময় তাঁর প্রতি ওহী নাযিল হতে শুরু করল। যখন তাঁর প্রতি ওহী নাযিল হতো, তখন তিনি এক ধরনের সুপ্তাবস্থার (ঘুমন্ত অবস্থার মতো) মধ্যে চলে যেতেন। তিনি আমার কাছে উপবিষ্ট থাকা অবস্থায়ই তাঁর ওপর ওহী নাযিল হলো। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং তাঁর কপাল থেকে ঘাম মুছতে মুছতে বললেন, হে আয়েশা, সুসংবাদ গ্রহণ করো। আমি বললাম: মহান আল্লাহর প্রশংসায়, আপনার প্রশংসায় নয়। অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: "যারা সতী-সাধ্বী নারীদের প্রতি অপবাদ আরোপ করে..." (এই আয়াত) হতে শুরু করে "...তাদের বক্তব্য থেকে তারা (অপবাদপ্রাপ্তরা) মুক্ত" পর্যন্ত।
17260 - عَنْ يُوسُفَ بْنِ مَاهَكَ. قَالَ: كَانَ مَرْوَانُ عَلُى الْحِجَازِ اسْتَعْمَلَهُ مُعَاوِيَةُ، فَخَطَبَ فَجَعَلَ يَذْكُرُ يَزِيدَ بْنَ مُعَاوِيَةَ لِكَيْ يُبَايَعَ لَهُ بَعْدَ أبيه. فَقَالَ لَهُ عَبْدِ الرَّحْمَانِ بْنُ أبي بَكْرٍ شَيْئًا. فَقَالَ خُذُوهُ، فَدَخَلَ بَيْتَ عَائِشَةَ فَلَمْ يَقْدِرُوا. فَقَالَ مَرْوَانُ: إِنَّ هَذَا الَّذِي انْزَلَ اللَّهُ فِيهِ: (وَالَّذِي قَالَ لِوَالِدَيْهِ اُفٍّ لَكُمَا اتَعِدَانِنِي) فَقَالَتْ عَائِشَةُ، مِنْ وَرَاءِ الْحِجَابِ: مَا انْزَلَ اللَّهُ فِينَا شَيْئًا مِنَ الْقُرْانِ، إِلا أَنَّ اللَّهُ انْزَلَ عُذْرِي.
أخرجه البخاري 6/ 166 قال: حدثنا موسى بن إسماعيل. قال: حدثنا ابو عوانة، عن أَبي بشر، عن يوسف بن ماهك، فذكره.
ইউসুফ ইবনে মাহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মারওয়ান তখন হেজাযের শাসক ছিলেন, যাঁকে মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিয়োগ করেছিলেন। তিনি খুতবা দিতে গিয়ে ইয়াযিদ ইবনে মুআবিয়ার কথা উল্লেখ করতে শুরু করলেন, যেন তাঁর পিতার (মুআবিয়া) পরে তাঁর জন্য বাইয়াত গ্রহণ করা হয়। তখন আবদুর রহমান ইবনে আবি বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে কিছু কথা বললেন। মারওয়ান বললেন, ‘তাকে ধরে নিয়ে যাও।’ তখন তিনি (আবদুর রহমান) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে প্রবেশ করলেন। ফলে তারা তাকে ধরতে পারল না। মারওয়ান বললেন, আল্লাহ্ তার সম্পর্কেই আয়াত নাযিল করেছেন: (অর্থাৎ— সে-ই, যে তার পিতামাতাকে বলে, ‘ধিক তোমাদের! তোমরা কি আমাকে এই প্রতিশ্রুতি দাও যে...) (আল-আহকাফ: ১৭ এর অংশ)। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দার আড়াল থেকে বললেন, আমাদের সম্পর্কে আল্লাহ্ কুরআনের কিছুই নাযিল করেননি, তবে আল্লাহ্ আমার (সতীত্বের) ওজর (মুক্তির ঘোষণা) নাযিল করেছেন।
17261 - عَنِ الزُّهْرِيِّ. قَالَ: قَالَ لِيَ الْوَلِيدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ: ابَلَغَكَ أَنَّ عَلِيًّا كَانَ فِيمَنْ قَذَفَ عَائِشَةَ؟ قُلْتُ: لا. وَلَكِنْ قَدْ أخبرني رَجُلانِ مِنْ قَوْمِكَ، ابُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَانِ وأبو بَكْرِ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَانِ بْنِ الْحَارِثِ، أَنَّ عَائِشَةَ، رضي الله عنها قَالَتْ لَهُمَا: كَانَ عَلِيٌّ مُسَلِّمًا فِي شَاْنِهَا.
أخرجه البخاري 5/ 154 قال: حدثني عبد اللهِ بن محمد. قال: املى عليَّ هشام بن يوسف، من حفظه. قال: أخبرنا مَعْمر، عن الزهري، فذكره.
যুহরী থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আল-ওয়ালীদ ইবনু 'আবদিল মালিক আমাকে বললেন: আপনার কাছে কি এই সংবাদ পৌঁছেছে যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কি তাদের মধ্যে ছিলেন যারা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি অপবাদ আরোপ করেছিল? আমি বললাম: না। কিন্তু আপনার সম্প্রদায়ের দুজন লোক— আবূ সালামা ইবনু 'আবদির রহমান এবং আবূ বকর ইবনু 'আবদির রহমান ইবনুল হারিস— আমাকে সংবাদ দিয়েছেন যে, 'আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের দু'জনকে বলেছিলেন: আলী তার (অপবাদের) ব্যাপারে নির্লিপ্ত ছিলেন।
17262 - عَنْ جُمَيْعِ بْنِ عُمَيْرٍ التَّيْمِيِّ. قَالَ: دَخَلْتُ مَعَ عَمَّتِي عَلَى عَائِشَةَ، فَسُئِلَتْ: ايُّ النَّاسِ كَانَ احَبَّ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم؟ قَالَتْ: فَاطِمَةُ، فَقِيلَ: مِنَ الرِّجَالِ؟ قَالَتْ: زَوْجُهَا، إِنْ كَانَ مَا عَلِمْتُ صَوَّامًا قَوّامًا.
أخرجه الترمذي (3874) قال: حدثنا حُسين بن يزيد الكوفي. قال: حدثنا عبد السلام بن حرب، عن أَبي الجُحَّاف، عن جميع بن عمير التيمي، فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। জুমাই' ইবনু উমায়র আত-তাইমী বলেন: আমি আমার ফুপুসহ আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: মানুষের মধ্যে কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সবচেয়ে বেশি প্রিয় ছিলেন? তিনি বললেন: ফাতিমা। তখন বলা হলো: আর পুরুষদের মধ্যে? তিনি বললেন: তাঁর (ফাতিমার) স্বামী। যদি আমি সঠিক জানি, তবে তিনি ছিলেন অধিক সাওম পালনকারী এবং অধিক সালাতে দণ্ডায়মানকারী।