আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1001 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا الإمام أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا أبو الأزهَر -وكتبتُه من أصله- حدثنا يعقوب بن إبراهيم ابن سعد، حدثني أَبي، عن ابن إسحاق قال: وحدثني -في الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم إذا المَرْءُ المسلمُ صلَّى عليه في صلاته- محمدُ بنُ إبراهيم، عن محمد بن عبد الله بن زيد بن عبد ربَّه، عن أبي مسعود عُقْبة بن عمرو قال: أقبل رجلٌ حتى جَلَسَ بين يَدَيْ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ونحن عندَه، فقال: يا رسولَ الله، أمَّا السلامُ عليك، فقد عَرَفْناه، فكيف نُصلِّي عليك إذا نحن صلَّينا عليك في صلاتنا، صلَّى اللهُ عليك؟ قال: فصَمَتَ حتى أحبَبْنا أنَّ الرجل لم يسأَلْه، ثم قال: "إذا أنتم صَلَّيتم عليَّ فقولوا: اللهَّم صلِّ على محمدٍ النبيِّ الأُمِّيِّ وعلى آلِ محمدٍ كما صلَّيتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيم، وبارِكْ على محمدٍ النبيِّ الأُمِّيِّ وعلى آلِ محمدٍ كما باركتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيم، إنك حَميدٌ مَجِيد" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بذِكْر الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في الصلوات.
আবূ মাসউদ উকবা ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি এলো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে বসল, যখন আমরা তাঁর পাশে ছিলাম। সে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনার প্রতি সালাম (জানানোর পদ্ধতি) তো আমরা জেনেছি। কিন্তু আমরা যখন আমাদের সালাতে আপনার উপর সালাত পাঠ করব, তখন কীভাবে আপনার উপর সালাত (দরূদ) পাঠ করব? আপনার উপর আল্লাহর অনুগ্রহ বর্ষিত হোক।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন, এমনকি আমরা কামনা করলাম যে লোকটি যদি প্রশ্ন না-ই করত! অতঃপর তিনি বললেন, "যখন তোমরা আমার উপর সালাত (দরূদ) পাঠ করবে, তখন বলো: 'আল্লাহুম্মা সাল্লি আলা মুহাম্মাদিনিন নাবিইয়্যিল উম্মিয়্যি ওয়া আলা আলি মুহাম্মাদিন কামা সাল্লাইতা আলা ইবরাহীমা ওয়া আলা আলি ইবরাহীমা, ওয়া বারিক আলা মুহাম্মাদিনিন নাবিইয়্যিল উম্মিয়্যি ওয়া আলা আলি মুহাম্মাদিন কামা বারাকতা আলা ইবরাহীমা ওয়া আলা আলি ইবরাহীমা, ইন্নাকা হামীদুন মাজীদ।' (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আপনি উম্মী নবী মুহাম্মাদ এবং তাঁর পরিবারের প্রতি অনুগ্রহ বর্ষণ করুন, যেমন আপনি ইবরাহীম ও তাঁর পরিবারের প্রতি অনুগ্রহ বর্ষণ করেছেন। আর আপনি উম্মী নবী মুহাম্মাদ এবং তাঁর পরিবারের প্রতি বরকত দান করুন, যেমন আপনি ইবরাহীম ও তাঁর পরিবারের প্রতি বরকত দান করেছেন। নিশ্চয় আপনি প্রশংসিত ও মহামহিম।)"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد انفرد إبراهيم بن سعد عنه بقوله في هذا الحديث: "إذا نحن صلَّينا عليك في صلاتنا" وإبراهيم ثقة حُجة، وكذا ابنه يعقوب. أبو الأزهر هو أحمد بن الأزهر النيسابوري، محمد بن إبراهيم: هو ابن الحارث التَّيمي.وأخرجه ابن حبان (1959) عن أبي بكر محمد بن إسحاق -وهو ابن خزيمة- بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (17072) عن يعقوب بن إبراهيم، به.وأخرجه أبو داود (981)، والنسائي (9794) من طريقين عن ابن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، به.وأخرجه بنحوه أحمد 28/ (17067) و 37/ (22352)، ومسلم (405)، وأبو داود (980)، والترمذي (3220)، والنسائي (9793) و (11359)، وابن حبان (1958) و (1965) من طرق عن مالك، عن نعيم بن عبد الله المُجمِر، عن محمد بن عبد الله بن زيد الأنصاري، به. وليس فيه قوله: "النبي الأمي"، وهو في "الموطأ" رواية يحيى الليثي 1/ 165 - 166.وأخرجه كذلك النسائي (1210) و (9795) من طريق محمد بن سيرين، عن عبد الرحمن بن بشر، عن أبي مسعود.وقد سُمِّي السائل للنبي صلى الله عليه وسلم في بعض طرق هذا الحديث، وهو بشير بن سعد.
1002 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي، حدثنا عبد الصمد بن الفَضْل [1]، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حَيْوة، عن أبي هانئ، عن أبي علي عمرو بن مالك، عن فَضَالة بن عُبيد الأنصاري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأَى رجلًا صلَّى لم يَحمَدِ اللهَ ولم يُمجِّده، ولم يُصلِّ على النبي صلى الله عليه وسلم، وانصرف، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عَجِلَ هذا" فدَعَاه، فقال له ولغيره: "إذا صلَّى أحدُكم فليَبدأْ بتحميدِ ربِّه والثناءِ عليه، ثم ليُصلِّ على النبي صلى الله عليه وسلم ثم يَدعُو بما شاءَ" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولا تُعرَفُ له عِلَّةٌ، ولم يُخرجاه.وله شاهد صحيح على شرطهما:
ফাদালাহ ইবনু উবাইদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একজন লোককে দেখলেন, যে সালাত আদায় করল কিন্তু আল্লাহর প্রশংসা ও মহিমা বর্ণনা করল না, এবং নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদও পড়ল না, আর সে (তাড়াতাড়ি) চলে গেল। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ লোকটি তাড়াহুড়া করেছে।" অতঃপর তিনি তাকে ডাকলেন এবং তাকে ও অন্যদেরকে বললেন: "যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করবে, তখন সে যেন প্রথমে তার রবের প্রশংসা ও গুণগান দ্বারা শুরু করে, এরপর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদ পড়ে, তারপর যা ইচ্ছা দু'আ করে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: المفضل. وعبد الصمد بن الفضل هذا: هو البلخي، له ترجمة في "تاريخ الإسلام "للذهبي 6/ 774، وذكره قاسم بن قطلوبغا في "الثقات" (6924).
[2] إسناده صحيح. وقد سلف برقم (936). وأخرجه البيهقي 2/ 379 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وفي الباب -بزيادة الترحُّم فيه على محمد وإبراهيم عليهما السلام وآلهما- غيرُ ما حديث، ذكرها الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 38 - 42، ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكن الحافظ رحمه الله ذهب إلى تقوية بعضها ببعض وحسَّن الحديث، خلافًا للنووي رحمه الله حيث ذكر في "الأذكار" له أنَّ ذِكْر الترحُّم فيه بدعة لا أصل له، وذكر إنكار أبي بكر بن العربي له.
1003 - أخبرناه أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن محمد الكِنْدي، حدثنا عَوْن بن سلَّام [حدثنا سَلَّام] [1] بن سُلَيم أبو الأحوَص، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوَص وأبي عُبيدة قالا: قال عبد الله: يتشهَّدُ الرجلُ، ثم يُصلِّي على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يَدعُو لنفسه [2].قد أُسنِدَ هذا الحديثُ عن عبد الله بن مسعود بإسنادٍ صحيح مُهمَل:
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক তাশাহ্হুদ পাঠ করবে, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত (দরুদ) পাঠ করবে, অতঃপর নিজের জন্য দোয়া করবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من "السنن الكبرى" للبيهقي 2/ 153. و"السنن الصغرى" له أيضًا (458)، حيث رواه فيهما عن المصنف بإسناده ومتنه. وأخرجه البيهقي 2/ 379 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وفي الباب -بزيادة الترحُّم فيه على محمد وإبراهيم عليهما السلام وآلهما- غيرُ ما حديث، ذكرها الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 38 - 42، ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكن الحافظ رحمه الله ذهب إلى تقوية بعضها ببعض وحسَّن الحديث، خلافًا للنووي رحمه الله حيث ذكر في "الأذكار" له أنَّ ذِكْر الترحُّم فيه بدعة لا أصل له، وذكر إنكار أبي بكر بن العربي له.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل ابن أبي دارم شيخ المصنف، وشيخه الكندي لم نتبينه ولم نقف على حاله، لكن روي هذا من غير طريقهما.فقد أخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 1/ 297 عن أبي الأحوص -وهو سلّام بن سليم- بهذا الإسناد. وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي وأبو عبيدة: هو ابن عبد الله بن مسعود، وقرينه أبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجُشمي، وعبد الله: هو ابن مسعود. وأخرجه البيهقي 2/ 379 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وفي الباب -بزيادة الترحُّم فيه على محمد وإبراهيم عليهما السلام وآلهما- غيرُ ما حديث، ذكرها الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 38 - 42، ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكن الحافظ رحمه الله ذهب إلى تقوية بعضها ببعض وحسَّن الحديث، خلافًا للنووي رحمه الله حيث ذكر في "الأذكار" له أنَّ ذِكْر الترحُّم فيه بدعة لا أصل له، وذكر إنكار أبي بكر بن العربي له.
1004 - حدَّثَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن يحيى بن السَّبّاق، عن رجل من بني الحارث، عن ابن مسعود، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "إذا تَشهَّدَ أحدُكم في الصلاة فليقل: اللهمَّ صَلِّ على محمدٍ وعلى آل محمد، وبارِكْ على محمدٍ وعلى آل محمد، وارحَمْ محمدًا وآلَ محمد، كما صلَّيتَ وبارَكْتَ وتَرحَّمتَ على إبراهيم وعلى آلِ إبراهيم، إنك حميدٌ مَجِيد" [1]. وأكثر الشواهد لهذه القاعدة لفروض الصلاة:
ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ সালাতের মধ্যে তাশাহহুদ পাঠ করবে, তখন সে যেন বলে: 'হে আল্লাহ! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গের প্রতি রহমত বর্ষণ করুন, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গের প্রতি বরকত দিন, এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গের প্রতি দয়া করুন, যেমন আপনি ইবরাহীম (আঃ) ও ইবরাহীম (আঃ)-এর পরিবারবর্গের প্রতি রহমত, বরকত ও দয়া করেছেন। নিশ্চয়ই আপনি প্রশংসিত, মহিমান্বিত।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لجهالة يحيى بن السباق وإبهام شيخه. وأخرجه البيهقي 2/ 379 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وفي الباب -بزيادة الترحُّم فيه على محمد وإبراهيم عليهما السلام وآلهما- غيرُ ما حديث، ذكرها الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 38 - 42، ولا يخلو إسناد واحد منها من مقال، لكن الحافظ رحمه الله ذهب إلى تقوية بعضها ببعض وحسَّن الحديث، خلافًا للنووي رحمه الله حيث ذكر في "الأذكار" له أنَّ ذِكْر الترحُّم فيه بدعة لا أصل له، وذكر إنكار أبي بكر بن العربي له.
1005 - ما حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن علي بن بَحْر البَرِّي [1]، حدثنا أَبي، حدثني عبد المُهيمِن بن عبّاس بن سهل الساعدي قال: سمعت، أَبي يحدِّث عن جدِّي، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول: "لا صلاةَ لمن لا وُضوءَ له، ولا وضوءَ لمن لم يَذكُرِ اللهَ عليه، ولا صلاةَ لمن لم يُصلِّ على نبيِّ الله في صلاتِه" [2].لم يخرج هذا الحديث على شرطهما، فإنهما لم يُخرِّجا عبدَ المهيمن.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "ঐ ব্যক্তির সালাত (নামায) হবে না, যার ওযু নেই। আর ঐ ব্যক্তির ওযু হবে না, যে তাতে আল্লাহর নাম (বিসমিল্লাহ) উল্লেখ করেনি। আর ঐ ব্যক্তির সালাত হবে না, যে তার সালাতে আল্লাহর নবীর উপর দরূদ পড়েনি।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: البرتي.
[2] إسناده ضعيف بمرّة، عبد المهيمن بن عباس متفق على ضعفه، ووهَّاه الذهبي في "تلخيصه"، وقال الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب": أخرج الحاكم حديثه في "المستدرك" فوهم.وأخرجه ابن ماجه (400) عن عبد الرحمن بن إبراهيم -وهو الحافظ المعروف بدُحَيم- عن ابن أبي فديك، عن عبد المهيمن بن عباس، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (382) من طريق عبيد الله بن محمد المنكدري، عن ابن أبي فديك، عن أُبي بن عباس -أخي عبد المهيمن- عن أبيه، به. وهذا إسناد لا يصح، فأُبي ضعيف، والمنكدري لم نقف له على ترجمة، ومخالفته لدُحيم واهية لا تستقيم.
1006 - حدثنا أحمد بن كامل القاضي، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا بِشْر بن عمر الزَّهْراني.وأخبرني عبد الرحمن بن الحسن الأَسَدي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس؛ قالا: حدثنا شُعْبة، عن سعد بن إبراهيم، عن أبي عُبَيدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه كان في الركعتين الأُولَييَنِ كأنه على الرَّضْف. قال: قلنا حتى يقومَ؟ قال: حتى يقومَ [1].تابعه مِسعَرٌ عن سعد بن إبراهيم:
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রথম দুই রাকাতে এমনভাবে থাকতেন যেন তিনি উত্তপ্ত পাথরের ওপর আছেন। (বর্ণনাকারী) বললেন: আমরা বললাম, 'যতক্ষণ না তিনি (তৃতীয় রাকাতের জন্য) দাঁড়ান?' তিনি বললেন: 'যতক্ষণ না তিনি দাঁড়ান।'
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده رجاله عن آخرهم لا بأس بهم غير عبد الرحمن بن الحسن الأسدي شيخ المصنف في أحد طريقيه فإنه ضعيف، وهو متابع، وأبو عبيدة -وهو ابن عبد الله بن مسعود- لم يصحَّ له سماعٌ من أبيه، فهو منقطع. أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي.وأخرجه أحمد 6/ (3656) و 7/ (3895) و (4155)، وأبو داود (995)، والترمذي (366) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. قال الترمذي: هذا حديث حسن، إلّا أنَّ أبا عبيدة لم يسمع من أبيه.وأخرجه أحمد 7/ (4388 - 4390)، والنسائي (766) من طريق إبراهيم بن سعد بن إبراهيم، عن أبيه، به.الرَّضْف: الحجارة المُحْماة بالشمس أو بالنار.قال الترمذي: والعمل على هذا عند أهل العلم: يختارون أن لا يطيل الرجلُ القعودَ في الركعتين الأُوليين، ولا يزيد على التشهُّد شيئًا في الركعتين الأُوليين، وقالوا: إن زاد على التشهد فعليه سجدتا السهو، هكذا رُوِيَ عن الشعبي وغيره. لأبي عبيدة عن أبيه، لأنه لم يصحَّ سماعه منه، والحديث الذي أشار إليه أخرجه مسلم في "صحيحه" (450) دون البخاري، وهو عنده من طريق علقمة بن قيس النخعي عن عبد الله بن مسعود.وأما طريق شعبة فقد أخرجها ابن أبي شيبة 13/ 91، والبغوي في "الجعديات" (106)، والدارقطني في "السنن" (246) وغيرهم عن عمرو بن مرة قال: قلت لأبي عبيدة: أكان عبد الله مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا.
1007 - حدَّثَناه أبو الحُسين [1] علي بن عبد الرحمن السَّبيعي بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة، حدثنا عثمان بن سعيد المُرِّي، حدثنا مِسعَر، عن سعد بن إبراهيم، فذكره بنحوه [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وقد اتَّفقا على إخراج حديث شعبة، عن عمرو بن مُرَّة، عن أبي عُبيدة، عن عبد الله: أنه لم يكن مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلةَ الجِنِّ [3].
১০০৭- আমাদের কাছে কূফায় আবুল হুসাইন [১] আলী ইবনু আব্দুর রহমান সাবীঈ বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে আহমাদ ইবনু হাযিম ইবনু আবী গারযাহ বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে উসমান ইবনু সাঈদ আল-মুরী বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে মিস'আর বর্ণনা করেছেন, সা'দ ইবনু ইব্রাহীম থেকে। তিনি (সা'দ) অনুরূপভাবে এটি উল্লেখ করেছেন [২]। এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা এটি সংকলন করেননি। তবে তারা উভয়েই শু'বাহ কর্তৃক, আমর ইবনু মুররাহ থেকে, তিনি আবূ উবাইদাহ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত এই হাদীসটি সংকলন করতে একমত হয়েছেন যে, নিশ্চয়ই তিনি (আব্দুল্লাহ) জিনের রাতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলেন না [৩]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ص) و (ب) و (ع) إلى الحسن. وأبو الحسين هذا: هو علي بن عبد الرحمن ابن عيسى -كما جاء في غير موضع عند المصنف- السبيعي، وهو ابن مَاتَي مولى آل زيد بن علي العلوي، ترجمه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 15/ 566. والسَّبيعي في اسمه: نسبة إلى مَحلَّة بالكوفة يقال لها: السَّبِيع. لأبي عبيدة عن أبيه، لأنه لم يصحَّ سماعه منه، والحديث الذي أشار إليه أخرجه مسلم في "صحيحه" (450) دون البخاري، وهو عنده من طريق علقمة بن قيس النخعي عن عبد الله بن مسعود.وأما طريق شعبة فقد أخرجها ابن أبي شيبة 13/ 91، والبغوي في "الجعديات" (106)، والدارقطني في "السنن" (246) وغيرهم عن عمرو بن مرة قال: قلت لأبي عبيدة: أكان عبد الله مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا.
[2] انظر ما قبله.وأخرجه أحمد (7/ 4074) عن عبد القدوس بن بكر بن خُنيس، عن مسعر، بهذا الإسناد. لأبي عبيدة عن أبيه، لأنه لم يصحَّ سماعه منه، والحديث الذي أشار إليه أخرجه مسلم في "صحيحه" (450) دون البخاري، وهو عنده من طريق علقمة بن قيس النخعي عن عبد الله بن مسعود.وأما طريق شعبة فقد أخرجها ابن أبي شيبة 13/ 91، والبغوي في "الجعديات" (106)، والدارقطني في "السنن" (246) وغيرهم عن عمرو بن مرة قال: قلت لأبي عبيدة: أكان عبد الله مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا.
1007 [3] - هذا ذهول من الحاكم رحمه الله، فإنهما لم يخرجاه من هذا الطريق، وهما لم يخرجا شيئًا لأبي عبيدة عن أبيه، لأنه لم يصحَّ سماعه منه، والحديث الذي أشار إليه أخرجه مسلم في "صحيحه" (450) دون البخاري، وهو عنده من طريق علقمة بن قيس النخعي عن عبد الله بن مسعود.وأما طريق شعبة فقد أخرجها ابن أبي شيبة 13/ 91، والبغوي في "الجعديات" (106)، والدارقطني في "السنن" (246) وغيرهم عن عمرو بن مرة قال: قلت لأبي عبيدة: أكان عبد الله مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن؟ قال: لا.
1008 - حدثنا أبو النَّضْر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا أبو الجُمَاهِر محمد بن عثمان التَّنُوخي، حدثنا سعيد بن بَشِير، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة قال: أَمَرَنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن نَرُدَّ على الإمام، وأن نَتَحَابَّ، و أن يُسلِّمَ بعضُنا على بعض [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وسعيد بن بَشِير إمام أهل الشام في عَصْره، إلّا أنَّ الشيخين لم يُخرجاه بما وَصَفَه أبو مُسهِر من سوءِ حفظه، ومثلُه لا يُترَك بهذا القَدْر.
সمرة (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করেছেন যে, আমরা যেন ইমামকে উত্তর (জবাব) দেই, আমরা যেন পরস্পরকে ভালোবাসি এবং আমরা যেন একে অপরের প্রতি সালাম দেই।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث حسن إن شاء الله، وهذا إسناد فيه لين من قِبَل سعيد بن بشير، فإنه ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، وهو في هذا قد تُوبع، وأما سماع الحسن -وهو البصري- من سمرة بن جندب فقد سلف الكلام فيه عند الحديث رقم (151). وقد صحَّح هذا الحديث ابن خزيمة برقم (1710)، وحسَّنه الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 271، وجوَّده ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 232.وأخرجه أبو داود (1001) عن محمد بن عثمان أبي الجُماهر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (922) من طريق همّام بن يحيى، عن قتادة، به -دون ذكر التحابِّ، وهمام ثقة، والطريق إليه جيد.قوله: أن نردَّ على الإمام، أي: سلِّموا من الصلاة ناوين الردَّ على تسليم الإمام.
1009 - أخبرنا جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي، حدثنا أحمد بن علي الخزَّاز، حدثنا عبد الوهاب بن نَجْدة، حدثنا أشعَثُ بن شُعبة، حدثنا المِنهال بن خَليفة، عن الأزرَق بن قيس قال: صلَّى بنا إمامٌ لنا يُكنَى أبا رِمْثةَ، قال: صلَّيتُ هذه الصلاةَ -أو مثلَ هذه الصلاة- مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: وكان أبو بكر وعمرُ يقومانِ في الصفِّ المقدَّمِ عن يمينه، وكان رجل قد شَهِدَ التكبيرةَ الأُولى من الصلاة، فصلَّى نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم ثم سلَّم عن يمينه وعن يساره حتى رأينا بياضَ خدِّه، ثم انفَتَلَ كانفتال أبي رِمْثة -يعني نفسَه- فقام الرجلُ الذي أدرَكَ معه التكبيرةَ الأُولى من الصلاة يَشفَعُ، فوَثَبَ إليه عمرُ فأخذ بمَنكِبِه فهزَّه، ثم قال: اجلِسْ، فإنه لم يَهلِكْ أهلُ الكتاب إلَّا أنه لم يكن بين صَلَواتهم فَصْلٌ، فرفع النبيُّ صلى الله عليه وسلم بصرَه فقال: "أصاب اللهُ بك يا ابنَ الخطَّابِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু রিমসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এই সালাত - অথবা এর মতো একটি সালাত - রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আদায় করেছিলাম। তিনি বলেন: আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (নবীজীর) ডানপাশে অগ্রবর্তী কাতারে দাঁড়াতেন। সালাতে প্রথম তাকবীরে যোগ দেওয়া এক ব্যক্তি (তখনও উপস্থিত ছিলেন)। আল্লাহ্র নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করলেন এবং ডান ও বাম দিকে সালাম ফেরালেন, এমনভাবে যে আমরা তাঁর গালের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। অতঃপর তিনি আবু রিমসাহর মতো করে ঘুরলেন - অর্থাৎ তিনি (বর্ণনাকারী) নিজেকে বোঝালেন (যেভাবে তিনি সালাত শেষে সাধারণত ঘুরতেন)। তখন যে ব্যক্তি সালাতের প্রথম তাকবীর তাঁর সাথে পেয়েছিলেন, তিনি দাঁড়িয়ে নফল আদায় করতে শুরু করলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত তার দিকে এগিয়ে গেলেন এবং কাঁধ ধরে ঝাঁকালেন, এরপর বললেন: বসুন। কারণ আহলে কিতাবগণ ধ্বংস হয়েছে শুধুমাত্র এই কারণে যে, তাদের সালাতগুলোর (ফরয ও নফলের) মধ্যে কোনো বিরতি ছিল না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চোখ তুলে তাকালেন এবং বললেন: "হে খাত্তাবের পুত্র, আল্লাহ তোমার দ্বারা সঠিক কাজ করিয়েছেন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] أصل الحديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف المنهال بن خليفة، وقد خولف كما سيأتي، وقال الذهبي في "تلخيصه": المنهال ضعَّفه ابن معين، وأشعث فيه لين، والحديث منكر.وأخرجه أبو داود (1007) عن عبد الوهاب بن نجدة، بهذا الإسناد.وخالف عبدُ الله بن سعيد بن أبي هند عند عبد الرزاق (3973)، وشعبةُ بن الحجاج عند أحمد 38/ (23121) وأبي يعلى (7166)، كلاهما عن الأزرق بن قيس، عن عبد الله بن رباح، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى العصر، فقام رجل يصلِّي، فرآه عمر فقال له: اجلس فإنما هلك أهلُ الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصلٌ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أحسَنَ ابنُ الخطَّاب". وهذا إسناد صحيح. وتابع الجراحَ بنَ مخلد عليه هكذا موصولًا: سليمانُ بن عبيد الله الغيلاني، عن أبي قتيبة. أخرجه البيهقي أيضًا 2/ 104.وخالف أبا قتيبة الحسينُ بنُ حفص فرواه عن سفيان الثوري عن عاصم الأحول عن عكرمة عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. أخرجه البيهقي 2/ 104، والحسين بن حفص ثقة جليل وكان من المختصِّين بسفيان الثوري كما قال أبو نعيم الأصبهاني، وقال البيهقي بإثر روايته: وكذلك رواه سفيان بن عيينة وعبدة بن سليمان عن عاصم الأحول عن عكرمة مرسلًا.قلنا: ورواية عبدة بن سليمان أخرجها الترمذي في كتابه "العلل الكبير" (101) عن هناد بن السَّري عنه، وهما ثقتان، وأما رواية سفيان بن عيينة فلم نقف عليها مسنَدة.ثم أخرجه الترمذي (102) -وكذا أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 192 - 193 - من طريق حرب ابن ميمون، عن خالد الحذاء، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم على رجل يسجد على جبهته ولا يضع أنفه على الأرض، قال: "ضع أنفك يسجدْ معك" ثم قال الترمذي: وحديث عكرمة عن النبي صلى الله عليه وسلم -يعني مرسلًا- أصحُّ. قلنا: وحرب بن ميمون -وهو الأصغر- متروك.وأخرج الطبراني في "الكبير" (11917)، و"الأوسط" (4111)، وابن المقرئ في "معجمه" (427) من طريق الضحاك بن حُمرة، عن منصور -وهو ابن زاذان- عن عاصم البجلي، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من لم يلزق أنفه مع جبهته بالأرض إذا سجد لم تُجْزِ صلاته"، وعاصم البجلي قال الطبراني: هو عاصم بن سليمان الأحول. قلنا: والضحاك بن حُمرة ضعيف.وأخرجه البيهقي 2/ 104 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس أنه قال: إذا سجدت فضع أنفك على الأرض مع جبهتك. وهذا إسناد حسن لولا ما قيل في رواية سماك عن عكرمة أنه وقع له فيها اضطراب.وفي الباب عن أبي حميد الساعدي في صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال فيها: ثم سجد -يعني النبي صلى الله عليه وسلم فأمكن أنفه وجبهته. أخرجه أبو داود (734)، والترمذي (270) وقال: حسن صحيح.وعن وائل بن حُجْر قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسجد على الأرض واضعًا جبهته وأنفه في سجوده. أخرجه أحمد 31/ (18864)، ورجاله ثقات.وفي حديث طاووس عن ابن عباس عند البخاري (812)، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: "أُمرت أن أسجد على سبعة أعظم: على الجبهة -وأشار بيده على أنفه- واليدين والركبتين وأطراف القدمين .. ". فهذا كلُّه يدلِّل على تأكيد وضع الأنف مع الجبهة على الأرض في السجود وأنه من تمام السجود.
1010 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا إبراهيم بن عبد السلام الضَّرير، حدثنا الجرَّاح بن مَخلَد، حدثنا أبو قُتيبة، حدثنا سفيان الثَّوْري، عن عاصم الأحوَل، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا صلاةَ لمن لم يُمِسَّ أنفَه الأرضَ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه، وقد أوقَفَه شعبةُ عن عاصم:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার নাক মাটিতে স্পর্শ করায় না, তার সালাত (নামায) হয় না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] روي هذا الحديث موصولًا ومرسلًا، والصواب إرساله كما قال الترمذي وغيره، وأبو قتيبة -وهو سَلْم بن قتيبة- مع ثقته له أوهام، قال أبو حاتم الرازي: ليس به بأس كثير الوهم. قلنا: وقد اختلف عليه في رفعه ووقفه كما في الرواية التالية عند المصنف، فكأنَّ الوهم منه.وأخرجه الدارقطني (1318) و (1319)، ومن طريقه البيهقي 2/ 104 عن أبي بكر عبد الله ابن سليمان بن الأشعث، عن الجراح بن مخلد، عن أبي قتيبة، عن شعبة وسفيان، عن عاصم الأحول، به -موصولًا مرفوعًا. قال الدارقطني: قال لنا أبو بكر: لم يُسنده عن سفيان وشعبة إلّا أبو قتيبة، والصواب عن عاصم مرسلًا. وتابع الجراحَ بنَ مخلد عليه هكذا موصولًا: سليمانُ بن عبيد الله الغيلاني، عن أبي قتيبة. أخرجه البيهقي أيضًا 2/ 104.وخالف أبا قتيبة الحسينُ بنُ حفص فرواه عن سفيان الثوري عن عاصم الأحول عن عكرمة عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. أخرجه البيهقي 2/ 104، والحسين بن حفص ثقة جليل وكان من المختصِّين بسفيان الثوري كما قال أبو نعيم الأصبهاني، وقال البيهقي بإثر روايته: وكذلك رواه سفيان بن عيينة وعبدة بن سليمان عن عاصم الأحول عن عكرمة مرسلًا.قلنا: ورواية عبدة بن سليمان أخرجها الترمذي في كتابه "العلل الكبير" (101) عن هناد بن السَّري عنه، وهما ثقتان، وأما رواية سفيان بن عيينة فلم نقف عليها مسنَدة.ثم أخرجه الترمذي (102) -وكذا أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 192 - 193 - من طريق حرب ابن ميمون، عن خالد الحذاء، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم على رجل يسجد على جبهته ولا يضع أنفه على الأرض، قال: "ضع أنفك يسجدْ معك" ثم قال الترمذي: وحديث عكرمة عن النبي صلى الله عليه وسلم -يعني مرسلًا- أصحُّ. قلنا: وحرب بن ميمون -وهو الأصغر- متروك.وأخرج الطبراني في "الكبير" (11917)، و"الأوسط" (4111)، وابن المقرئ في "معجمه" (427) من طريق الضحاك بن حُمرة، عن منصور -وهو ابن زاذان- عن عاصم البجلي، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من لم يلزق أنفه مع جبهته بالأرض إذا سجد لم تُجْزِ صلاته"، وعاصم البجلي قال الطبراني: هو عاصم بن سليمان الأحول. قلنا: والضحاك بن حُمرة ضعيف.وأخرجه البيهقي 2/ 104 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس أنه قال: إذا سجدت فضع أنفك على الأرض مع جبهتك. وهذا إسناد حسن لولا ما قيل في رواية سماك عن عكرمة أنه وقع له فيها اضطراب.وفي الباب عن أبي حميد الساعدي في صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال فيها: ثم سجد -يعني النبي صلى الله عليه وسلم فأمكن أنفه وجبهته. أخرجه أبو داود (734)، والترمذي (270) وقال: حسن صحيح.وعن وائل بن حُجْر قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسجد على الأرض واضعًا جبهته وأنفه في سجوده. أخرجه أحمد 31/ (18864)، ورجاله ثقات.وفي حديث طاووس عن ابن عباس عند البخاري (812)، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: "أُمرت أن أسجد على سبعة أعظم: على الجبهة -وأشار بيده على أنفه- واليدين والركبتين وأطراف القدمين .. ". فهذا كلُّه يدلِّل على تأكيد وضع الأنف مع الجبهة على الأرض في السجود وأنه من تمام السجود.
1011 - Null
1011 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إبراهيم بن عبد السلام، حدثنا الجرَّاح بن مخلد، حدثنا أبو قُتيبة، حدثنا شُعبة، عن عاصم الأحول، عن عِكرِمة، عن ابن عباس قال: لا صلاةَ لمن لم يُمِسَّ أنفَه الأرضَ.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ব্যক্তি তার নাক মাটিতে স্পর্শ করায় না, তার সালাত হয় না।
1012 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا علي بن الحسن بن أبي عيسى، مُعلَّى بن أَسَد، حدثنا وُهَيب، عن محمد بن عَجْلان، عن محمد بن إبراهيم التَّيْمي، عن عامر بن سعد، عن أبيه قال: أَمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بوَضْعِ اليدين ونَصْبِ القدمين في الصلاة [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وقد صَحَّ على شرطه بلفظٍ أشْفَى من هذا:
সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মধ্যে হাত রাখতে এবং পা খাড়া করে রাখতে নির্দেশ দিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا الحديث قد اختُلف فيه على محمد بن عجلان في وصله وإرساله، والمرسل من حديث عامر بن سعد عن النبي صلى الله عليه وسلم أصحُّ كما قال الترمذي وأبو حاتم في "العلل" (318)، والدارقطني في "العلل" أيضًا 4/ 344 - 1346 (616)، فجمهور أصحاب ابن عجلان قد رووه عنه مرسلًا.وأخرجه الترمذي (277) عن عبد الله بن عبد الرحمن -وهو الدارمي- عن معلَّى بن أسد، بهذا الإسناد.ثم رواه الترمذي (278) مرة أخرى عن عبد الله بن عبد الرحمن عن المعلَّى عن حماد بن مَسعَدة -وهو ثقة- عن ابن عجلان مرسلًا، لم يذكر فيه سعدًا: وهو ابن أبي وقّاص. ثم أشار إلى أنه رواه هكذا مرسلًا غيرُ واحد عن ابن عجلان، وقال: وهذا أصحُّ من حديث وُهيب، وهو الذي أجمع عليه أهل العلم واختاروه. قلنا: يعني وضع اليدين ونصب القدمين.وله شاهد من حديث أبي حميد الساعدي عند البخاري (828) في وصف صلاة النبي صلى الله عليه وسلم، وفيه: فإذا سجد وضع يديه غير مفترش ولا قابضهما، واستقبل بأطراف أصابع رجليه القِبلة.
1013 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا عبد الرحمن بن المبارك، حدثنا وُهَيب، عن محمد بن عَجْلان قال: أخبرني محمد بن إبراهيم التَّيْمي، عن عامر بن سعد بن مالك، عن أبيه قال: أَمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بوَضْعِ الكفَّين ونَصْبِ القدمين في الصلاة [1].
সা'দ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাতের (নামাজের) মধ্যে উভয় হাত রাখার এবং উভয় পা খাড়া রাখার নির্দেশ দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره كسابقه. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (8478)، والبيهقي 2/ 107 من طريق معاذ بن المثنى، بهذا الإسناد. وقوله: "ترِّب ووجهك" من التقريب أي: أوصِلْه إلى التراب وضعه عليه.
1014 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر الأزْدي، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، عن أبي حمزة، عن أبي صالح قال: كنت عند أمِّ سَلَمة، فدَخَلَ عليها ذو قَرابةٍ لها شابٌّ ذو جُمَّةٍ، فقام يصلِّي فنَفَخَ، فقالت: يا بُنيَّ، لا تَنفُخْ، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لعبدٍ لنا أسود: "أيْ رباحُ، تَرِّبْ وجهَك" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবু সালিহ বলেন,) আমি উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট ছিলাম। তখন তার এক যুবক আত্মীয়, যার লম্বা চুল (জুম্মাহ) ছিল, তার কাছে প্রবেশ করল। সে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে শুরু করল এবং (সালাতের মধ্যে) ফুঁ দিলো। তখন তিনি বললেন: হে আমার বৎস! ফুঁ দিও না। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমাদের একজন কালো গোলামকে বলতে শুনেছি: "ওহে রাবাহ! তোমার মুখমণ্ডল ধূলিধূসরিত করো (অর্থাৎ সঠিকভাবে সিজদা করো)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث محتمل للتحسين، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي حمزة: وهو ميمون الأعور، إلّا أنه لم ينفرد بهذا الحديث، فقد تابعه غير واحدٍ عن أبي صالح، وأبو صالح هذا: هو مولى طلحة ابن عبيد الله، ويقال: مولى أم سلمة، يقال: اسمه زاذان، ويقال: ذكوان، وهو غير السَّمَان، وقد روى عنه هذا الحديث جماعةٌ وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم يجرحه أحد، فمثله يرقى حديثه إلى التحسين، والله تعالى أعلم.وقد اختُلف في اسم العبد، فقيل: اسمه رباح، كما هو هنا، وقيل: يسار، وقيل: أفلح، ولا يضرُّ هذا الخلاف، فالحاصل أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له: "ترِّب وجهك".وأخرجه أحمد 44/ (26744)، والترمذي (381) و (382) من طرق عن ميمون أبي حمزة، بهذا الإسناد. وأعلَّه الترمذي بميمون هذا.وأخرجه أحمد (26572) من طريق سعيد بن عثمان الورّاق، وابن حبان (1913) من طريق داود بن أبي هند، كلاهما عن أبي صالح، به.وأخرجه أبو يعلى (6954) عن كامل بن طلحة الجَحدري، عن حماد بن سلمة، عن عاصم -وهو ابن بهدلة- عن أبي صالح، به. فإن كان الجحدري حفظه فهذا راوٍ رابع لهذا الحديث عن أبي صالح، لكن الجحدري قد خولف فيه عن حماد، فقد رواه عفان عن حمادٍ عند أحمد (26744) فقال فيه: أبو حمزة عن أبي صالح.قوله: فنفخ، أي: في الأرض ليزول عنها التراب فيسجد. وقوله: "ترِّب ووجهك" من التقريب أي: أوصِلْه إلى التراب وضعه عليه.
1015 - أخبرنا أبو عبد الرحمن محمد بن عبد الله التاجر، حدثنا أبو حاتم الرازِيّ.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن سليمان بن الحارث؛ قالا: حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا سعيد بن أبي عَرُوبة، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة بن جُندُب قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يَستوفِز الرجلُ في صلاته [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মধ্যে হালকাভাবে বা সঙ্কুচিত ভঙ্গিতে বসতে নিষেধ করেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وقد سلف الكلام على إثبات سماع الحسن البصري من سمرة عند الحديث رقم (151).وأخرجه البيهقي 2/ 281 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 33/ (20111) من طريق سعيد بن بشير، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نعتدل في الجلوس وأن لا نستوفز. وسعيد بن بشير فيه ضعف لكن يعتبر به في المتابعات والشواهد.وقوله "يستوفز الرجل" أي: يستعجل، وتكون العجلة سببًا في عدم الطمأنينة، ويشهد لهذا المعنى حديث أبي هريرة في قصة المسيء صلاته حيث لم يكن يطمئن في صلاته، فكان النبي صلى الله عليه وسلم يقول له في كل مرة: "ارجع فصلِّ فإنك لم تصلِّ"، وهو عند البخاري (757) و (793) ومسلم (397). وأخرجه هكذا مختصرًا ابن ماجه (897) من طريق حفص بن غياث، عن العلاء بن المسيب، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا من طريق حفص بن غياث، عن الأعمش، عن سعد بن عُبيدة، عن المستورِد بن الأحنف، عن صلة بن زُفَر، عن حذيفة. وهذا إسناد صحيح. وانظر تتمة تخريجه فيما يأتي برقم (1216).
1016 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا يوسف بن يعقوب القاضي، حدثنا نَصْر بن علي، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن العلاء بن المسيِّب، عن عمرو ابن مُرَّة، عن طلحة بن يزيد عن حُذَيفة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول إذا رفع رأسَه من السجود: "ربِّ اغفِرْ لي" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সিজদা থেকে মাথা উঠাতেন, তখন বলতেন: "হে আমার রব, আমাকে ক্ষমা করে দিন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد فيه انقطاع، طلحة بن يزيد -وهو أبو حمزة الأنصاري مولاهم- لم يسمع هذا الحديث من حذيفة كما قال النسائي (1382)، وبينهما فيه صلة بن زفر كما سيأتي بيانه عند الحديث المطوَّل برقم (1216). وأخرجه هكذا مختصرًا ابن ماجه (897) من طريق حفص بن غياث، عن العلاء بن المسيب، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا من طريق حفص بن غياث، عن الأعمش، عن سعد بن عُبيدة، عن المستورِد بن الأحنف، عن صلة بن زُفَر، عن حذيفة. وهذا إسناد صحيح. وانظر تتمة تخريجه فيما يأتي برقم (1216).
1017 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسي، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا عبد السلام بن عاصم، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثنا كامل أبو العلاء، عن حَبِيب ابن أبي ثابت، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول بين السجدتَينِ: "اللهمَّ اغفِرْ لي وارحَمْني، واجبُرْني وارفَعْني واهدِني وارزُقْني" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وأبو العلاء كامل بن العلاء ممَّن يُجمَعُ حديثُه في الكوفيين.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই সিজদার মাঝখানে বলতেন: "হে আল্লাহ, আমাকে ক্ষমা করুন, আমাকে দয়া করুন, আমার ক্ষতিপূরণ করুন, আমার মর্যাদা বাড়িয়ে দিন, আমাকে হেদায়েত দিন এবং আমাকে রিযিক দান করুন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عبد السلام بن عاصم وكامل أبي العلاء. وقد سلف برقم (978). السجدتين، فهذا من السُّنة، فقد أخرج مسلم (536) -وهو التالي عند المصنف- من طريق طاووس قال: قلنا لابن عباس في الإقعاء على القدمين، فقال: السُّنّة، فقلنا له: إنا لَنراه جفاءً بالرجل، فقال ابن عباس: بل هي سنة نبيك صلى الله عليه وسلم. انظر "شرح مسلم" للإمام النووي، و"خلاصة الأحكام" له أيضًا 1/ 418 - 419.
1018 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة بن جُندُب قال: نَهَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الإقعاءِ في الصلاة [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وله رواية في إباحة الإقعاء صحيحٌ على شرط مسلم:
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মধ্যে ইক্কা’ (ইকআ’ বা এক বিশেষ বসার ভঙ্গিমা) করতে নিষেধ করেছেন। [১] এই হাদীসটি বুখারীর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু বুখারী ও মুসলিম কেউই তা উদ্ধৃত করেননি। ইক্কা’ বৈধ হওয়া সম্পর্কে মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ অন্য একটি বর্ণনাও রয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. سعيد: هو ابن أبي عروبة، والحسن: هو ابن أبي الحسن البصري، وقد تقدم الكلام على إثبات سماعه من سمرة عند الحديث رقم (151).وأخرجه البيهقي 2/ 120 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.ثم أخرجه عن أبي عبد الله أيضًا لكن من طريق محمد بن عبد الله الأنصاري، عن سعيد بن أبي عروبة، به.وله شاهد من حديث عائشة عند مسلم (498) ولفظه: كان ينهى عن عُقْبة الشيطان. وفسَّره أبو عبيدة معمر بن المثنى وصاحبه أبو عبيد القاسم بن سلّام وآخرون من أهل اللغة بالإقعاء: وهو أن يُلصِق ألْيتيه بالأرض وينصب ساقيه ويضع يديه على الأرض، وهذا هو النوع المكروه الذي ورد فيه النهي في هذا الحديث، ونوع آخر من الإقعاء: وهو أن يجعل أَلْيتيه على عَقِبيه بين السجدتين، فهذا من السُّنة، فقد أخرج مسلم (536) -وهو التالي عند المصنف- من طريق طاووس قال: قلنا لابن عباس في الإقعاء على القدمين، فقال: السُّنّة، فقلنا له: إنا لَنراه جفاءً بالرجل، فقال ابن عباس: بل هي سنة نبيك صلى الله عليه وسلم. انظر "شرح مسلم" للإمام النووي، و"خلاصة الأحكام" له أيضًا 1/ 418 - 419.
1019 - حدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري وعلي بن عيسى قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبدي، حدثنا يعقوب بن كعب الحَلَبي، حدثنا مَخلَد بن يزيد، عن ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبَير، أنه سمع طاووسًا يقول: قلتُ لابن عباس في الإقعاءِ، قال: هي سُنَّة، قلت: إنا نراه جَفَاءً، فقال ابن عباس: إنها السُّنّة [1].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঊস বলেন:) আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইকা' (সালাতে বিশেষ এক প্রকার বসার পদ্ধতি) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: এটি একটি সুন্নাহ। আমি বললাম: আমরা এটিকে (এক ধরনের) বেমানান বা রুক্ষ আচরণ মনে করি। তখন ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটিই সুন্নাহ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس المكي.وأخرجه أحمد 5/ (2853)، ومسلم (536)، وأبو داود (845)، والترمذي (283) من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد.
1020 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعبد الله محمد بن موسى قالا: حدثنا محمد بن أيوب، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا هشام، عن مَعمَر، عن إسماعيل ابن أُمية، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نَهَى رجلًا وهو جالسٌ مُعتمِدٌ على يده اليسرى في الصلاة فقال: "إنها صلاةُ اليهودِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে নিষেধ করেন, যখন সে সালাতের (নামাযের) মধ্যে বাম হাতের উপর ভর করে বসেছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এটা ইয়াহুদিদের নামায।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. هشام: هو ابن يوسف الصنعاني.وأخرجه البيهقي 2/ 136 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وسلف عند المصنف برقم (933) من طريق عبد الرزاق عن معمر، ولم يذكر فيه قوله: "إنها صلاة اليهود".