হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1041)


1041 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن موسى القاضي إملاءً، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا [أبو] [1] الرَّبيع الزَّهراني ويحيى بن المغيرة، قالا: حدثنا جَرِير بن عبد الحميد، عن منصور، عن أبي مَعْشَر، عن إبراهيم، عن علقمة، عن قَرْثَعٍ الضَّبِّي -وكان قرثعٌ من القرّاء الأولين- عن سلمان قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا سلمانُ، ما يومُ الجمعة؟ " قلت: الله ورسوله أعلم، قال: "يا سلمانُ، يومُ الجمعة فيه جُمِع أبوك -أو أبوكم- وأنا أُحدِّثك عن يوم الجمعة: ما من رجلٍ يَتطهَّرُ يومَ الجمعة كما أُمِرَ، ثم يَخرُج من بيته حتى يأتيَ الجمعةَ فيقعدَ فيُنصِتَ حتى يَقضِيَ صلاته إلّا كان كفَّارةً لما قبلَه مِن الجمعة" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، واحتجَّ الشيخان بجميع رواته غير قرثع، سمعتُ أبا علي القارئ يقول: أردت أن أجمَع مسانيد قرثع الضَّبِّي، فإنه من زهّاد التابعين، فلم يُسنِد تمامَ العشرة.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "হে সালমান, জুমু'আর দিনটি কী?" আমি বললাম, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই অধিক অবগত।" তিনি বললেন, "হে সালমান, জুমু'আর দিনেই তোমার পিতা—বা তোমাদের পিতাকে—একত্রিত করা হয়েছিল (সৃষ্টি করা হয়েছিল)। আর আমি তোমাকে জুমু'আর দিন সম্পর্কে বলছি: এমন কোনো ব্যক্তি নেই, যে জুমু'আর দিন নির্দেশিত পন্থায় পবিত্রতা অর্জন করে, এরপর তার ঘর থেকে বের হয় এবং জুমু'আর নামাজে আসে, সেখানে বসে থাকে ও চুপ করে মনোযোগ দিয়ে শোনে যতক্ষণ না সে তার সালাত শেষ করে, তবে তা তার পূর্ববর্তী জুমু'আ পর্যন্ত সংঘটিত পাপের কাফ্ফারা হয়ে যায়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "أبو" سقطت من النسخ الخطية، وهو أبو الربيع الزهراني سليمان بن داود العتكي.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل قرثع الضبي. أبو الربيع الزهراني: هو سليمان بن داود العتكي، ومنصور: هو ابن المعتمر، وأبو معشر: هو زياد بن كليب، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي، وسلمان صحابيه: هو الفارسي.وأخرجه النسائي (1676) و (1736) عن إسحاق بن إبراهيم، عن جرير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 39/ (23729)، والنسائي (1677) و (1737) من طريق أبي عوانة، وأحمد 39/ (23718) عن هشيم، كلاهما عن مغيرة بن مقسم الضبي، عن أبي معشر، به. إلّا أنَّ هشيمًا لم يذكر علقمة بين قرثع وإبراهيم، وزاد أبو عوانة في آخر المتن: "ما اجتُنبت المَقتلة".ويشهد لخلق آدم يوم الجمعة حديث أبي هريرة عند مسلم (854).وفي باب الجمعة إلى الجمعة كفارة حديث أبي هريرة عند مسلم (233).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1042)


1042 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو جعفر أحمد بن عبد الحميد الحارثي، حدثنا الحسين بن علي الجُعْفي، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشْعَث الصَّنعاني، عن أوس بن أوس الثَّقَفي قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ من أفضلِ أيامِكم يومَ الجُمُعة، فيه خُلِق آدمُ، وفيه قُبِض، وفيه النَّفخةُ، وفيه الصَّعْقة، فأكثِروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضةٌ عليَّ" قالوا: وكيف تُعرَض صلاتُنا عليك وقد أَرَمْتَ؟ فقال: "إنَّ الله عز وجل قد حرَّم على الأرض أن تأكلَ أجسادَ الأنبياءِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আওস ইবনু আওস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের সর্বোত্তম দিনগুলোর মধ্যে হলো জুমুআর দিন। এ দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এ দিনেই তাঁর রূহ কবয করা হয়েছে, এ দিনেই শিঙ্গায় ফুঁক (নাফখা) দেওয়া হবে এবং এ দিনেই (মহাপ্রলয়ের) মূর্ছা (সা'কা) হবে। সুতরাং তোমরা এই দিনে আমার উপর বেশি করে সালাত (দরুদ) পাঠ করো। কারণ তোমাদের সালাত আমার কাছে পেশ করা হয়।"
সাহাবীরা জিজ্ঞেস করলেন: আপনি তো জীর্ণশীর্ণ হয়ে যাবেন (মাটির সাথে মিশে যাবেন), তখন আমাদের সালাত (দরুদ) আপনার কাছে কীভাবে পেশ করা হবে?
তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা জমিনের জন্য নবীদের দেহ ভক্ষণ করা হারাম করে দিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، عبد الرحمن بن يزيد -وإن جاء مقيدًا هنا وفي بعض مصادر التخريج بابن جابر- اختُلف في تعيينه، فذهب الدارقطني وغيره إلى أنه ابن جابرٍ الثقةُ، وعليه فالإسناد صحيح، وذهب البخاري وأبو حاتم وأبو زرعة وأبو داود وابن حبان إلى أنه ابن تميمٍ الضعيفُ، وعليه فالإسناد ضعيف، ذكر ذلك ابن رجب في "شرح العلل" 2/ 681 - 682، وابن القيم في "جلاء الأفهام" ص 80 - 85. أبو الأشعث الصنعاني: اسمه شراحيل بن آدَهْ.وأخرجه أحمد 26/ (16162)، وأبو داود (1047) و (1531)، وابن ماجه (1085) و (1636)، والنسائي (1678)، وابن حبان (910) من طرق عن الحسين بن علي الجعفي، بهذا الإسناد. ووقع اسم الصحابي عند ابن ماجه في الموضع الأول: شداد بن أوس، وهو وهمٌ، نبَّه عليه المزي في "تحفة الأشراف" 2/ 4 و 4/ 143.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (8895).وله شواهد عديدة ذكرناها في تعليقنا على "سنن أبي داود" فلتُنظر.قوله: "وفيه النفخة" قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: الثانية.وقوله: "الصعقة" قال: الصوت الهائل يفزع له الإنسانُ، والمراد: النفخة الأولى، أو صعقة موسى عليه الصلاة والسلام، وعلى هذا فالنفخة يحتمل الأولى أيضًا.وقوله: "أرَمتَ" قال: بفتح الراء، أصله: أرمَمْت من أرمَّ، بتشديد الميم: إذا صار رميمًا، فحذفوا إحدى الميمين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1043)


1043 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الرَّبيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا مالك. وحدثنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى البِرْتي وإسماعيل بن إسحاق القاضي، قالا: حدثنا القَعْنَبي، عن مالك.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن، عن مالك، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خيرُ يومٍ طَلَعَتْ فيه الشمس يومُ الجمعة، فيه خُلقَ آدم، وفيه أُهبِط، وفيه تِيبَ عليه، وفيه مات، وفيه تقوم الساعةُ، وما من دابةٍ إلّا وهي مُصِيخةٌ يومَ الجمعة مِن حينِ تُصبِحُ حتى تَطلُعَ الشمسُ، شَفَقًا من الساعة إلّا الجنَّ والإنسَ، وفيها ساعةٌ لا يُصادِفُها عبدٌ مسلمٌ وهو يُصلِّي يسأل اللهَ شيئًا، إلّا أعطاه إياه".قال كعب: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ، فقلت: بل في كلِّ جمعة، قال: فقرأ كعبٌ التوراةَ، فقال: صدق رسولُ الله صلى الله عليه وسلم. قال أبو هريرة: ثم لقيتُ عبدَ الله بن سَلَام فحدَّثتُه بمجلسي مع كعب، فقال عبد الله بن سَلَام: قد علمتُ أيَّةَ ساعة هي، قال أبو هريرة: فقلت له: فأخبِرْني بها؟ فقال عبدُ الله بنُ سَلَام: هي آخر ساعةٍ في يوم الجمعة، فقلت: كيف هي آخرُ ساعة في يومِ الجمعة وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يُصادِفُها عبدٌ مسلم وهو يصلِّي"، وتلك الساعة لا يُصلَّى فيها؟ فقال عبد الله بن سَلَام: ألم يقل رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن جَلَس مجلسًا ينتظرُ الصلاةَ، فهو في صلاةٍ حتى يُصلِّيَ"؟! [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، إنما اتفقا على أحرفٍ من أوله في حديث الأعرج عن أبي هريرة: "خيرُ يومٍ طلعت فيه الشمسُ يوم الجمعة" [2].وقد تابع محمدُ بنُ إسحاق يزيدَ بنَ الهاد على روايته عن محمد بن إبراهيم التَّيمي بالزيادات فيه:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে দিনের উপর সূর্য উদিত হয়, তার মধ্যে সর্বোত্তম দিন হলো জুমআর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়, এই দিনেই তাকে (জান্নাত থেকে) অবতরণ করানো হয়, এই দিনেই তার তাওবা কবুল করা হয়, এই দিনেই তিনি ইন্তেকাল করেন, এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। জিন ও মানুষ ব্যতীত এমন কোনো প্রাণী নেই যা জুমআর দিন সকাল হওয়া থেকে সূর্য উদয় হওয়া পর্যন্ত কিয়ামতের ভয়ে কান খাড়া করে থাকে না। আর এর (জুমআর দিনের) মধ্যে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যখন কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দান করেন।"

কা‘ব (আহবার) বললেন: এটি বছরে একটি দিন। আমি (আবু হুরায়রা) বললাম: বরং এটি প্রতি জুমআয়। কা‘ব এরপর তাওরাত পড়লেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সত্য বলেছেন।

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি আব্দুল্লাহ ইবনু সালামের সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং কা‘বের সাথে আমার আলোচনার কথা তাকে জানালাম। তখন আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম বললেন: আমি জানি সেই মুহূর্তটি কখন। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে বললাম: তবে আমাকে তা বলুন? আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম বললেন: এটি হলো জুমআর দিনের শেষ মুহূর্ত। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেহেতু বলেছেন, "কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় সেই মুহূর্তটি পায়..." আর সেই সময়টিতে তো সালাত আদায় করা যায় না, তাহলে শেষ মুহূর্তে তা কীভাবে সম্ভব? তখন আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি: "যে ব্যক্তি কোনো মজলিসে বসে সালাতের অপেক্ষায় থাকে, সালাত আদায় করা পর্যন্ত সে সালাতের মধ্যেই থাকে?"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وهو في "مسند أحمد" 16/ (10303) و 39/ (23785) عن عبد الرحمن بن مهدي بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (1046) عن القعنبي، به.وأخرجه الترمذي (491) من طريق معن بن عيسى، عن مالك به. وقال: حديث صحيح.وأخرجه النسائي (1766) من طريق بكر بن مضر، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، به.وأخرجه أحمد 39/ (23791) من طريق قيس بن سعد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، به. وأخرجه النسائي (9840) من طريق أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة.وسيأتي من طريق أبي سلمة عن أبي هريرة فيما بعده (1044)، ومختصرًا برقم (4043)، ومن طريق سعيد بن الحارث عن أبي سلمة عن أبي سعيد وعبد الله بن سلام برقم (1046).وسيأتي من حديث عبد الله بن سلام برقم (8912).قوله: "مُصيخة" أي: مصغية مستمعة.



[2] البخاري (935)، ومسلم (854). وانظر ما قبله.وقول أبي هريرة هنا: جئت الطور، أي: بلاد الشام، قال ياقوت في "معجم البلدان" 4/ 47: ويقال لجميع بلاد الشام: الطور.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1044)


1044 - أخبرَناه أبو جعفرٍ محمد بن عليٍّ الشَّيبانيّ بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفَاريّ، حدثنا يعلى بن عُبيد، حدثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بنِ إبراهيم بن الحارث التَّيميّ، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، عن أبي هُريرة قال: جئتُ الطُّورَ فلقيتُ هناك كعبَ الأحبار، فحدّثتُه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وحدَّث عن التوراة، فما اختَلَفا حتى مررتُ بيوم الجمعة، قال: قلت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "في كلِّ يومِ جمعةٍ ساعةٌ لا يوافقُها مؤمنٌ وهو يصلِّي، يسألُ الله شيئًا إلا أعطاه إياه"، فقال كعب: تلك في كلِّ سنة، فقلت: ما كذلك قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرجع فتَلَا، ثم قال: صَدَقَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، في كلِّ جمعة. قال أبو هريرة: ثم لقيتُ عبدَ الله بن سَلَامٍ فحدثتُه بمجلسي مع كعب. فذكر الحديث بنحوٍ من حديث مالك [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তূর পাহাড়ে গেলাম এবং সেখানে কা'ব আল-আহবারের সাথে আমার সাক্ষাৎ হলো। আমি তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে হাদীস শোনালাম এবং তিনিও তাওরাত থেকে বর্ণনা করলেন। জুমুআর দিন সম্পর্কে আলোচনা না করা পর্যন্ত আমাদের দুজনের বর্ণনার মধ্যে কোনো মতভেদ ঘটল না। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক জুমুআর দিনে এমন একটি মুহূর্ত রয়েছে, যখন কোনো মুমিন বান্দা সালাতরত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কিছু প্রার্থনা করে, আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দান করেন।" তখন কা'ব বললেন: সেটি তো প্রত্যেক বছরে একবার আসে। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটি বলেননি। তখন তিনি (কা'ব) ফিরে গেলেন এবং (তাওরাত) পাঠ করলেন। এরপর বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য বলেছেন, তা প্রত্যেক জুমুআতেই হয়। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি আব্দুল্লাহ ইবনু সালামের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং কা'বের সাথে আমার বৈঠকের বিষয়টি তাকে জানালাম। অতঃপর তিনি মালিকের হাদীসের অনুরূপ এই হাদীস বর্ণনা করলেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، محمد بن إسحاق وإن رواه بالعنعنة، قد توبع.وأخرجه أحمد 39/ (23786) عن يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد 12/ (7151) و 16/ (10302)، والبخاري (935) و (5294)، ومسلم (852)، وابن ماجه (1137)، والنسائي (1760 - 1765) و (10230 - 10233) و (10235) من طرق عن أبي هريرة. وانظر ما قبله.وقول أبي هريرة هنا: جئت الطور، أي: بلاد الشام، قال ياقوت في "معجم البلدان" 4/ 47: ويقال لجميع بلاد الشام: الطور.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1045)


1045 - أخبرنا أبو النَّضْر محمد بن محمد الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، أخبرني عَمرو بن الحارث، أنَّ الجُلَاح أبا كثير، أخبره، أنَّ أبا سلمة بن عبد الرحمن حدَّثه عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "يومُ الجمعة ثِنتا عَشْرة -يريد ساعةً- ولا يوجدُ عبدٌ مسلمٌ يسألُ اللهَ شيئًا إلّا آتاه الله، فالتَمِسُوها آخرَ الساعةِ بعد العصر" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بالجُلاح أبي كثير، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জুম্মার দিন বারোটি মুহূর্ত (সময়)। কোনো মুসলিম বান্দা যদি আল্লাহ্‌র কাছে কোনো কিছু প্রার্থনা করে, আল্লাহ্‌ তাকে তা দান করেনই। তোমরা সেই মুহূর্তটিকে আসরের পর দিনের শেষ প্রহরে সন্ধান করো।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل الجلاح، وقد تفرد به. وضعّف هذا الإسناد البيهقي في "الشعب".وأخرجه أبو داود (1048) عن أحمد بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (1709) من طريقين آخرين عن عبد الله بن وهب، به.وفي الباب عن عبد الله بن سلام وأبي هريرة، انظر ما قبله. وانظر ما سلف برقم (1043) و (1044).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1046)


1046 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبيد الله [1] بن أبي داود المُنادي، حدثنا يونس بن محمد المؤدِّب، حدثنا فُلَيح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، عن أبي سَلَمة قال: قلت: والله لو جئتُ أبا سعيدٍ الخدري فسألتُه عن هذه الساعة، لعلَّه أن يكون عنده منها عِلْم، فأتيتُه فقلت: يا أبا سعيد، إنَّ أبا هريرة حدَّثَنا عن الساعة التي في الجمعة، فهل عندك منها عِلْم؟ فقال: سألنا النبيَّ صلى الله عليه وسلم عنها، فقال: "إنِّي كنتُ أعلمُها، ثم أُنسِيتُها كما أُنسيتُ ليلةَ القَدْرِ"، ثم خرجتُ من عنده فدخلت على عبدِ الله بن سَلَام، ثم ذكر الحديث [2]. وهذا شاهد صحيح على شرط الشيخين الحديث يزيد بن الهاد ومحمد بن إسحاق، ولم يُخرجاه.




আবূ সালামাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি (মনে মনে) বললাম, আল্লাহর কসম! আমি যদি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যেতাম এবং তাকে এই (বিশেষ) সময়টি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম, সম্ভবত তার কাছে এ বিষয়ে কিছু জ্ঞান থাকতে পারে। অতঃপর আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং বললাম, হে আবূ সাঈদ! আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদেরকে জুমু'আর দিনের সেই (বিশেষ) সময়টি সম্পর্কে বলেছেন, এ ব্যাপারে আপনার কি কোনো জ্ঞান আছে? তিনি (আবূ সাঈদ) বললেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তখন তিনি বলেছিলেন: "আমি তা জেনেছিলাম, কিন্তু লাইলাতুল কদর (কদরের রাত)-কে যেমন ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে, তেমনি আমাকেও তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে।" অতঃপর আমি তাঁর কাছ থেকে বের হলাম এবং আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। অতঃপর তিনি (আবূ সালামাহ) অবশিষ্ট হাদীসটি উল্লেখ করেন। এই হাদীসটি ইয়াযীদ ইবনু আল-হাদ এবং মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকের বর্ণনার সমর্থক এবং শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা তা (তাদের গ্রন্থে) সংকলন করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: عبد الله، وهو خطأ، صوابه: عُبيد الله مصغر. وانظر ما سلف برقم (1043) و (1044).



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل فليح بن سليمان. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه أحمد 16/ (11624) عن يونس بن محمد المؤدب، بهذا الإسناد. وقرن بيونس سريجَ بنَ النعمان. وانظر ما سلف برقم (1043) و (1044).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1047)


1047 - حدَّثَناه أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن محمد بن عَمرو، قال: حدثني عَبيدة بن سفيان الحَضرَميّ، عن أبي الجَعْد الضَّمْري -وكانت له صحبة- أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من تَرَك ثلاثَ جُمَعٍ تَهاوُنًا بها، طَبَعَ اللهُ على قلبه" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ আল-জা'দ আদ-দুমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি অবহেলা করে তিনটি জুমু‘আহ্ ছেড়ে দেয়, আল্লাহ্ তার হৃদয়ে মোহর মেরে দেন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى، ومسدّد: هو ابن مسرهد، ويحيى بن سعيد: هو القطان.وأخرجه أبو داود (1052) عن مسدد بن مسرهد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15498)، والنسائي (1668) من طريق يحيى بن سعيد القطان، به.وأخرجه ابن ماجه (1125)، والترمذي (500)، وابن حبان (2786) من طرق عن محمد بن عمرو بن علقمة، به. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه ابن حبان (258) من طريق سفيان الثوري، عن محمد بن عمرو، به بلفظ: "من ترك الجمعة ثلاثًا من غير عذر فهو منافق".ويشهد له حديث جابر بن عبد الله الآتي برقم (1093)، وإسناده حسن.وحديث ابن عمر وأبي هريرة مرفوعًا: "لينتهين أقوام عن وَدْعهم الجمعات، أو ليختمنَّ الله على قلوبهم، ثم ليكونن من الغافلين"وفي الباب عن أبي هريرة سيأتي برقم (1095). الدارمي، وذكره ابن حبان في "الثقات" -قال البخاري: لم يصح سماعه من سمرة، وقال في "التاريخ الكبير" 4/ 177: لا يصح حديث قدامة في الجمعة.وأخرجه أحمد 33/ (20087)، وأبو داود (1053)، والنسائي (1673) من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وقد صرَّح قتادة بالسماع من قدامة عند أحمد.وأخرجه أحمد 33/ (20087)، وابن حبان (2789) من طرق عن همام بن يحيى، به.وأخرجه أحمد 33/ (20159)، وابن حبان (2788) من طريق وكيع عن همام، به، بلفظ: "من فاتته الجمعة".وأخرجه ابن ماجه (1128)، والنسائي (1674) من طريق خالد بن قيس، عن قتادة، عن الحسن البصري، عن سمرة، وخالد بن قيس قد خالفه من هو أوثق منه وهو همام بن يحيى، وقد رجَّح البخاري رواية همام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1048)


1048 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحْبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا همّام بن يحيى، حدثنا قتادة، عن قُدامة بن وَبَرةَ الجُعْفي، عن سَمُرة بن جُندُب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن تَركَ الجمعة من غير عُذرٍ، فليتصدَّق بدينار، فإن لم يَجِدْ فبنصفِ دينار" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرَّج لخلافٍ فيه لسعيد بن بَشير وأيوب بن العلاء فإنهما قالا: عن قتادة عن قُدامةَ بن وَبَرَة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرسلًا.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো ওজর (সঙ্গত কারণ) ছাড়া জুমু‘আ (সালাত) ছেড়ে দেয়, সে যেন এক দীনার সাদকা করে। যদি সে তা না পায়, তবে যেন অর্ধ দীনার সাদকা করে।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، قدامة بن وبرة -وإن وثقه ابن معين في رواية عثمان بن سعيد الدارمي، وذكره ابن حبان في "الثقات" -قال البخاري: لم يصح سماعه من سمرة، وقال في "التاريخ الكبير" 4/ 177: لا يصح حديث قدامة في الجمعة.وأخرجه أحمد 33/ (20087)، وأبو داود (1053)، والنسائي (1673) من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وقد صرَّح قتادة بالسماع من قدامة عند أحمد.وأخرجه أحمد 33/ (20087)، وابن حبان (2789) من طرق عن همام بن يحيى، به.وأخرجه أحمد 33/ (20159)، وابن حبان (2788) من طريق وكيع عن همام، به، بلفظ: "من فاتته الجمعة".وأخرجه ابن ماجه (1128)، والنسائي (1674) من طريق خالد بن قيس، عن قتادة، عن الحسن البصري، عن سمرة، وخالد بن قيس قد خالفه من هو أوثق منه وهو همام بن يحيى، وقد رجَّح البخاري رواية همام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1049)


1049 - حدَّثَناه أبو بكر بنُ إسحاق، أخبرنا عُبيد بن عبد الواحد، حدثنا أبو الجُماهِر، حدثنا سعيدُ بن بَشير، عن قتادة.وأخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا إبراهيمُ بنُ أبي طالب، حدثنا أبو هشام محمد بن يزيد، حدثنا إسحاقُ بنُ يوسف، عن أيوب أبي [1] العلاء، عن قَتَادةَ، عن قُدامةَ بن وَبَرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَنْ فاتته الجمعةُ مِن غير عُذْرٍ، فليتصدَّقْ بدرهمٍ أو نصفِ درهم، أو صاعِ حِنْطةٍ أو نصفِ صاع" [2]. هذا لفظ حديث العنبري، ولم يزدنا الشيخ أبو بكر فيه على الإرسال.1049 م - أخبرني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا عبد الله بن أحمد ابن حنبل، قال: سمعتُ أبي وسُئل عن حديث همامٍ عن قتادة، وخلافِ أبي العلاء إياه فيه، فقال: همامٌ عندنا أحفظُ من أيوبَ أبي العلاء [3].




কুদামা ইবনে ওয়াবারা থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো ওজর (সঙ্গত কারণ) ছাড়া জুমু‘আহ (নামাজ) থেকে বঞ্চিত হলো (অর্থাৎ আদায় করলো না), সে যেন এক দিরহাম বা অর্ধ দিরহাম কিংবা এক সা‘ গম বা অর্ধ সা‘ গম সাদকা করে।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: بن، وهو أيوب بن مِسكين، ويقال: ابن أبي مسكين، أبو العلاء القصاب. أبو الجُماهر هو: محمد بن عثمان التنوخي.وأخرجه أبو داود (1054) عن محمد بن سليمان الأنباري، عن إسحاق بن يوسف، بهذا الإسناد. فذكره مرسلًا أيضًا. وقرن بإسحاق بن يوسف: محمد بن يزيد الواسطي.قال أبو داود: رواه سعيد بن بشير عن قتادة هكذا، إلّا أنه قال: مُدًّا أو نصف مُدٍّ، وقال: عن سمرة.



[2] إسناده ضعيف لإرساله، وقد خالف أيوب أبا العلاء في إسناده همامُ بن يحيى، فقال: عن قدامة عن سمرة، كما في الطريق السابق، وقد رجَّح الإمام أحمد همامًا عن أيوب كما سيأتي بإثر هذا الحديث. أما متابعُه وهو سعيد عن بشير فقد اختُلف عليه، فرواه أبو الجماهر هنا عنه عن قتادة عن قدامة مرسلًا، ورواه محمد بن شعيب عنه قتادة قدامة عن عن سمرة فرفعه، كما عند البيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 248، ثم قال سعيد بإثره: فسألت قتادة هل يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم؟ فشكَّ في ذلك، قال سعيد: وقد ذكر بعض أصحابنا أنَّ قتادة يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. أبو الجُماهر هو: محمد بن عثمان التنوخي.وأخرجه أبو داود (1054) عن محمد بن سليمان الأنباري، عن إسحاق بن يوسف، بهذا الإسناد. فذكره مرسلًا أيضًا. وقرن بإسحاق بن يوسف: محمد بن يزيد الواسطي.قال أبو داود: رواه سعيد بن بشير عن قتادة هكذا، إلّا أنه قال: مُدًّا أو نصف مُدٍّ، وقال: عن سمرة.



1049 [3] - وأخرجه أبو داود بإثر الحديث (1054) عن أحمد بن حنبل. بلال، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (353) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن أبي عمرو، به.وسيأتي مكررًا بإسناده ومتنه برقم (7581).وفي الباب عن عائشة عند البخاري (902)، ومسلم (847) قالت: كان الناس ينتابون يوم الجمعة من منازلهم والعوالي، فيأتون في الغبار، يصيبهم الغبار والعرق، ويخرج منهم العرق، فأتى رسولَ الله إنسان منهم -وهو عندي- فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لو أنكم تطهّرتم ليومكم هذا".وعنها أيضًا عند البخاري (903)، ومسلم (847) قالت: كان الناس مَهَنةَ أنفسهم، وكانوا إذا راحوا إلى الجمعة راحوا في هيئتهم، فقيل لهم: لو اغتسلتم.وقول ابن عباس: لماذا بدأ الغسل، قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: لماذا ابتدأ شرعه، أي: حتى تعرف أنَّ علَّته قد عدمت الآن، فلو فُرِض واجبًا لما بقي وجوبه الآن، فكيف وهو غير واجب من الأصل، وهذا المعنى هو الذي يقتضيه تمام الحديث.قلنا: ويؤيده قول ابن عباس في آخر الحديث في رواية أبي داود: ثم جاء الله بالخير، ولبسوا غير الصوف، وكُفُوا العمل، ووُسِّع مسجدهم، وذهب بعضُ الذي كان يؤذي بعضهم بعضًا من العرق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1050)


1050 - أخبرنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا ابن وهب، حدثنا سليمان بن بلال، عن عَمرو بن أبي عَمرٍو مولى المطَّلب، عن عكرمة، عن ابن عباس: أنَّ رجلين من أهل العراق أتياه فسألاهُ عن الغُسل يومَ الجمعة: أواجبٌ هو؟ فقال لهما ابن عباس: من اغتَسَل فهو أحسن وأطهر، وسأُخبركما لماذا بدأ الغُسل، كان الناس في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم مُحتاجين يَلبَسون الصُّوف ويَسقُون النخلَ على ظُهورِهم، وكان المسجد ضيّقًا مُقارِبَ السَّقف، فخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ الجمعة في يومٍ صائفٍ شديدِ الحرّ، ومنبرُه قصير، إنما هو ثلاثُ درجات، فخطب الناسَ، فعَرِق الناسُ في الصوف، فثارت أبدانُهم ريحَ العَرَق والصوفِ حتى كان [1] يؤذي بعضُهم بعضًا، حتى بلغت أرواحُهم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر، فقال: "أيها الناس، إذا كان هذا اليومُ فاغتَسِلوا وليَمسَّ أحدُكم أطيبَ ما يجدُ من طِيبِه أو دُهْنِه" [2]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইরাকের দুজন লোক তাঁর (ইবনু আব্বাসের) কাছে এসে জুমু‘আর দিনে গোসল করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো: এটা কি ওয়াজিব? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের বললেন: যে গোসল করবে, তা উত্তম ও অধিক পবিত্রতার কারণ। আর গোসল কেন শুরু হয়েছিল, আমি তোমাদের সে বিষয়ে অবহিত করব। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে লোকেরা অভাবী ছিল, তারা পশমের (উলের) কাপড় পরিধান করত এবং পিঠের উপর ভার বহন করে খেজুর গাছগুলিতে পানি দিত। আর মসজিদ ছিল সংকীর্ণ এবং ছাদ ছিল নিচু। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জুমু‘আর দিন প্রচণ্ড গরমের এক গ্রীষ্মের দিনে (নামাযের জন্য) বের হলেন। তাঁর মিম্বার ছিল ছোট, যা ছিল মাত্র তিনটি সিঁড়ির ধাপ। তিনি মানুষের উদ্দেশ্যে খুতবাহ দিলেন। লোকেরা পশমের কাপড়ে ঘর্মাক্ত হয়ে গেল। তাদের শরীর থেকে ঘাম ও পশমের মিলিত দুর্গন্ধ এমনভাবে ছড়িয়ে পড়ল যে, তা একে অপরকে কষ্ট দিচ্ছিল। এমনকি সেই দুর্গন্ধ মিম্বারে থাকা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পর্যন্ত পৌঁছাল। অতঃপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল, যখন এই দিন (জুমু‘আর দিন) আসে, তখন তোমরা গোসল করো এবং তোমাদের প্রত্যেকে যেন তার কাছে থাকা সবচেয়ে উত্তম সুগন্ধি বা তেল ব্যবহার করে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز): كاد. بلال، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (353) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن أبي عمرو، به.وسيأتي مكررًا بإسناده ومتنه برقم (7581).وفي الباب عن عائشة عند البخاري (902)، ومسلم (847) قالت: كان الناس ينتابون يوم الجمعة من منازلهم والعوالي، فيأتون في الغبار، يصيبهم الغبار والعرق، ويخرج منهم العرق، فأتى رسولَ الله إنسان منهم -وهو عندي- فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لو أنكم تطهّرتم ليومكم هذا".وعنها أيضًا عند البخاري (903)، ومسلم (847) قالت: كان الناس مَهَنةَ أنفسهم، وكانوا إذا راحوا إلى الجمعة راحوا في هيئتهم، فقيل لهم: لو اغتسلتم.وقول ابن عباس: لماذا بدأ الغسل، قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: لماذا ابتدأ شرعه، أي: حتى تعرف أنَّ علَّته قد عدمت الآن، فلو فُرِض واجبًا لما بقي وجوبه الآن، فكيف وهو غير واجب من الأصل، وهذا المعنى هو الذي يقتضيه تمام الحديث.قلنا: ويؤيده قول ابن عباس في آخر الحديث في رواية أبي داود: ثم جاء الله بالخير، ولبسوا غير الصوف، وكُفُوا العمل، ووُسِّع مسجدهم، وذهب بعضُ الذي كان يؤذي بعضهم بعضًا من العرق.



[2] إسناده جيد، عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب فيه كلام يحطه عن رتبة الصحيح. ابن وهب: هو عبد الله، وعكرمة: هو مولى ابن عباس.وأخرجه أحمد 4/ (2419) عن أبي سعيد عبد الرحمن بن عبد الله البصري، عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (353) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن أبي عمرو، به.وسيأتي مكررًا بإسناده ومتنه برقم (7581).وفي الباب عن عائشة عند البخاري (902)، ومسلم (847) قالت: كان الناس ينتابون يوم الجمعة من منازلهم والعوالي، فيأتون في الغبار، يصيبهم الغبار والعرق، ويخرج منهم العرق، فأتى رسولَ الله إنسان منهم -وهو عندي- فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لو أنكم تطهّرتم ليومكم هذا".وعنها أيضًا عند البخاري (903)، ومسلم (847) قالت: كان الناس مَهَنةَ أنفسهم، وكانوا إذا راحوا إلى الجمعة راحوا في هيئتهم، فقيل لهم: لو اغتسلتم.وقول ابن عباس: لماذا بدأ الغسل، قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: لماذا ابتدأ شرعه، أي: حتى تعرف أنَّ علَّته قد عدمت الآن، فلو فُرِض واجبًا لما بقي وجوبه الآن، فكيف وهو غير واجب من الأصل، وهذا المعنى هو الذي يقتضيه تمام الحديث.قلنا: ويؤيده قول ابن عباس في آخر الحديث في رواية أبي داود: ثم جاء الله بالخير، ولبسوا غير الصوف، وكُفُوا العمل، ووُسِّع مسجدهم، وذهب بعضُ الذي كان يؤذي بعضهم بعضًا من العرق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1051)


1051 - أخبرنا أبو عَمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك ببغداد، حدثنا علي بن إبراهيم الواسطيّ، حدثنا وهب بن جرير، حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن أبي أُمامة بن سهل، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن كعب، قال: كنتُ قائدَ أبي حين ذهب بصرُه، إذا خرجتُ به إلى الجمعة فسمع الأذان صلَّى على أبي أَمامة أسعد بن زُرارة واستغفر له، فمكثتُ كثيرًا لا يسمع أذان الجمعة إلّا فعل ذلك، فقلت: يا أبَتِ، أرأيت استغفارك لأبي أمامة كلما سمعتَ الأذان للجمعة ما هو؟ قال: أيْ بنيَّ، كان أولَ من جمَّع بنا بالمدينة في هَزْمٍ من حَرَّةِ بني بَيَاضة يقال لها: نقيعُ الخَضِمات، قال: قلت: كم كنتم يومئذ؟ قال: أربعين رجلًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وهو شاهد الحديث الذي تفرَّد بإخراجه البخاريُّ [2] من حديث إبراهيم بن طَهْمان عن أبي جَمرة عن ابن عباس: أولُ جمعة في الإسلام بعد جمعةٍ بالمدينة جمعةٌ بجُواثَى [3] عبد القَيس.




আব্দুল রহমান ইবনে কা'ব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতার দৃষ্টিশক্তি হারানোর পর তাঁর পথপ্রদর্শক হিসেবে কাজ করতাম। যখনই আমি তাঁকে নিয়ে জুমুআর জন্য বের হতাম এবং তিনি আযান শুনতেন, তখনই তিনি আবূ উমামাহ আস'আদ ইবনু যুরারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য দরূদ পড়তেন এবং তাঁর জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন। আমি দীর্ঘ সময় ধরে এটি লক্ষ্য করলাম যে, যখনই তিনি জুমুআর আযান শোনেন, তিনি তা-ই করেন। তখন আমি বললাম: হে আব্বাজান, জুমুআর আযান শোনার পর আপনি আবূ উমামার জন্য সর্বদা যে ইস্তিগফার (ক্ষমা প্রার্থনা) করেন, এর কারণ কী? তিনি বললেন: হে আমার পুত্র, তিনি ছিলেন সেই ব্যক্তি, যিনি মদীনার বানী বায়াদাহ গোত্রের একটি নিচু ভূমিতে (যা নাকী'উল খাদ্বিমাত নামে পরিচিত) আমাদের নিয়ে সর্বপ্রথম জুমুআ আদায় করেছিলেন। আমি জিজ্ঞেস করলাম: সেদিন আপনারা কতজন ছিলেন? তিনি বললেন: চল্লিশজন পুরুষ।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق. وهب بن جرير عن أبيه: هو جرير بن حازم.وأخرجه أبو داود (1069)، وابن ماجه (1082)، وابن حبان (7013) من طرق عن محمد ابن إسحاق، بهذا الإسناد. ووقع عندنا في أصل "الإحسان" و"التقاسيم": عبد الله بن كعب، بدل عبد الرحمن، وهو خطأ وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" 13/ 35.وسيأتي الحديث في "المستدرك" من طريق يونس بن بكير عن محمد بن إسحاق برقم (4919).قوله: هزم، قال ابن الأثير: هزم الأرض: هو ما تهزَّم بها، أي: تشقق، ويجوز أن يكون جمع هَزْمَة: وهو المتطامن من الأرض، وهَزْم بني بياضة: هو موضع بالمدينة.والنقيع: هو الماء الناقع، وهو المجتمع، ونقيع الخضمات: موضع قرب المدينة كان يستنقع فيه الماء، أي: يجتمع.والخضمات ضُبطت بفتح الخاء المعجمة وتثليث الضاد، كما في "شرح القاموس".



[2] في "صحيحه" (892) و (4371). سيظهر في التخريج.وأخرجه أحمد 26/ (16172)، وأخرجه النسائي (1741) عن موسى بن عبد الرحمن الكوفي، كلاهما (أحمد وموسى) عن حسين بن علي الجعفي، بهذا الإسناد. ولفظه عندهما: "كان له بكل خطوة كأجر سنة، صيامها وقيامها"، وليس عندهما قوله في آخره: "ومن مسَّ الحصى فقد لغا".وأخرجه أحمد (16175) عن عبد الله بن المبارك، والنسائي (1703) و (1707) من طريق الوليد بن مسلم الدمشقي، كلاهما عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، به. ولفظه: "كان له كأجر سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أحمد (16176) من طريق راشد بن داود الصنعاني، عن أبي الأشعث الصنعاني -واسمه: شراحيل بن آده- به. ولفظه أيضًا: "كان له بكل خطوة خطاها عمل سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أيضًا بنحو هذا اللفظ أحمد (16161) من طريق محمد بن سعيد المصلوب، وأبو داود (346) من طريق عبادة بن نُسي، كلاهما عن أوس بن أوس رفعه. ومحمد بن سعيد المصلوب هذا متروك كذبوه، ووقع عندهما: "من غَسَل رأسه يوم الجمعة واغتسل". وهذا لفظ رواية عبادة بن نسي.وسيأتي في "المستدرك" بعد هذا الحديث من طريق يحيى بن الحارث، وبعده من طريق حسان ابن عطية، كلاهما عن أبي الأشعث الصنعاني، به. فلينظرا.وبرقم (1055) من طريق عثمان بن الشيباني، عن أبي الأشعث، عن أوس بن أوس، عن عبد الله ابن عمرو.قوله: "غسل واغتسل" قال النووي في "شرح المهذب" 4/ 543: يروى "غسل" بالتخفيف والتشديد، والأرجح عند المحققين التخفيف، والمختار أنَّ معناه: غسل رأسه، ويؤيده رواية أبي داود (السالف تخريجها قبل قليل من طريق عبادة بن نسي): "من غسل رأسه يوم الجمعة واغتسل".وقال السندي في حاشيته على "المسند": "اغتسل"، أي: سائر جسده، وإفراد الرأس للاهتمام به، لأنهم أصحاب الأشعار، وغسل الرأس لصاحب الشعر لا يخلو من تعب.



1051 [3] - جُواثَي: موضع يبعد عن مدينة الهفوف من الأحساء -شرقي الملكة العربية السعودية- مسافة 17 كم. سيظهر في التخريج.وأخرجه أحمد 26/ (16172)، وأخرجه النسائي (1741) عن موسى بن عبد الرحمن الكوفي، كلاهما (أحمد وموسى) عن حسين بن علي الجعفي، بهذا الإسناد. ولفظه عندهما: "كان له بكل خطوة كأجر سنة، صيامها وقيامها"، وليس عندهما قوله في آخره: "ومن مسَّ الحصى فقد لغا".وأخرجه أحمد (16175) عن عبد الله بن المبارك، والنسائي (1703) و (1707) من طريق الوليد بن مسلم الدمشقي، كلاهما عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، به. ولفظه: "كان له كأجر سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أحمد (16176) من طريق راشد بن داود الصنعاني، عن أبي الأشعث الصنعاني -واسمه: شراحيل بن آده- به. ولفظه أيضًا: "كان له بكل خطوة خطاها عمل سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أيضًا بنحو هذا اللفظ أحمد (16161) من طريق محمد بن سعيد المصلوب، وأبو داود (346) من طريق عبادة بن نُسي، كلاهما عن أوس بن أوس رفعه. ومحمد بن سعيد المصلوب هذا متروك كذبوه، ووقع عندهما: "من غَسَل رأسه يوم الجمعة واغتسل". وهذا لفظ رواية عبادة بن نسي.وسيأتي في "المستدرك" بعد هذا الحديث من طريق يحيى بن الحارث، وبعده من طريق حسان ابن عطية، كلاهما عن أبي الأشعث الصنعاني، به. فلينظرا.وبرقم (1055) من طريق عثمان بن الشيباني، عن أبي الأشعث، عن أوس بن أوس، عن عبد الله ابن عمرو.قوله: "غسل واغتسل" قال النووي في "شرح المهذب" 4/ 543: يروى "غسل" بالتخفيف والتشديد، والأرجح عند المحققين التخفيف، والمختار أنَّ معناه: غسل رأسه، ويؤيده رواية أبي داود (السالف تخريجها قبل قليل من طريق عبادة بن نسي): "من غسل رأسه يوم الجمعة واغتسل".وقال السندي في حاشيته على "المسند": "اغتسل"، أي: سائر جسده، وإفراد الرأس للاهتمام به، لأنهم أصحاب الأشعار، وغسل الرأس لصاحب الشعر لا يخلو من تعب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1052)


1052 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو جعفر أحمد بن عبد الحميد الحارثي، حدثنا حُسين بن علي الجُعْفي، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد ابن جابر، عن أبي الأشعث الصَّنْعاني، عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم -وذكر يومَ الجُمُعة-: "من غَسَل واغتَسَل، وغدا وابتَكَر، ودَنا وأنصَتَ واستَمعَ، غُفِرَ له ما بينَه وبين الجمعة، وزيادةُ ثلاثةِ أيام، ومن مَسَّ الحصى فقد لَغَا" [1]. رواه يحيى بن الحارث الذِّماري وحسان بن عَطيَّة عن أبي الأشعثأما حديث يحيى بن الحارث:




আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জুমুআর দিনের কথা উল্লেখ করে বলেছেন: "যে ব্যক্তি (নিজের জামা-কাপড়) ধৌত করল এবং (শরীরে) গোসল করল, এবং (মসজিদের দিকে) অতি ভোরে গেল ও জলদি পৌঁছল, এবং (খুতবা প্রদানকারীর) নিকটবর্তী হল, আর নীরব থাকল এবং মনোযোগ সহকারে শুনল, তার এই জুমুআ এবং পরবর্তী জুমুআর মধ্যবর্তী (গুনাহসমূহ) মাফ করে দেওয়া হয়, আর অতিরিক্ত তিন দিনেরও (গুনাহ মাফ হয়)। আর যে ব্যক্তি কাঁকর স্পর্শ করল, সে অনর্থক কাজ করল।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، لكن فيه علتان:إحداهما: أنَّ عبد الرحمن بن يزيد بن جابر -وإن جاء مصرَّحًا باسمه هكذا في مصادر التخريج- إلّا أنه اختُلف في تعيينه، فذهب قوم إلى أنه ابن جابر هذا وهو ثقة، وذهب آخرون إلى أنه عبد الرحمن بن يزيد بن تميم وهو ضعيف، كما بيّنا ذلك عند الحديث رقم (1042).والثانية: أنَّ أحمد بن عبد الحميد الحارثي قد تفرَّد في لفظ هذا الحديث فقال فيه: "غفر له ما بينه وبين الجمعة وزيادة ثلاثة أيام، ومن مس الحصى فقد لغا" وهذا اللفظ ليس من حديث أوس بن أوس، وإنما هو من حديث أبي هريرة عند مسلم (857) وغيره، فيكون الحارثي قد ركّب إسناد حديث أوس على متن حديث أبي هريرة فأخطأ، وخالف من هو أوثق منه كما سيظهر في التخريج.وأخرجه أحمد 26/ (16172)، وأخرجه النسائي (1741) عن موسى بن عبد الرحمن الكوفي، كلاهما (أحمد وموسى) عن حسين بن علي الجعفي، بهذا الإسناد. ولفظه عندهما: "كان له بكل خطوة كأجر سنة، صيامها وقيامها"، وليس عندهما قوله في آخره: "ومن مسَّ الحصى فقد لغا".وأخرجه أحمد (16175) عن عبد الله بن المبارك، والنسائي (1703) و (1707) من طريق الوليد بن مسلم الدمشقي، كلاهما عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، به. ولفظه: "كان له كأجر سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أحمد (16176) من طريق راشد بن داود الصنعاني، عن أبي الأشعث الصنعاني -واسمه: شراحيل بن آده- به. ولفظه أيضًا: "كان له بكل خطوة خطاها عمل سنة، صيامها وقيامها".وأخرجه أيضًا بنحو هذا اللفظ أحمد (16161) من طريق محمد بن سعيد المصلوب، وأبو داود (346) من طريق عبادة بن نُسي، كلاهما عن أوس بن أوس رفعه. ومحمد بن سعيد المصلوب هذا متروك كذبوه، ووقع عندهما: "من غَسَل رأسه يوم الجمعة واغتسل". وهذا لفظ رواية عبادة بن نسي.وسيأتي في "المستدرك" بعد هذا الحديث من طريق يحيى بن الحارث، وبعده من طريق حسان ابن عطية، كلاهما عن أبي الأشعث الصنعاني، به. فلينظرا.وبرقم (1055) من طريق عثمان بن الشيباني، عن أبي الأشعث، عن أوس بن أوس، عن عبد الله ابن عمرو.قوله: "غسل واغتسل" قال النووي في "شرح المهذب" 4/ 543: يروى "غسل" بالتخفيف والتشديد، والأرجح عند المحققين التخفيف، والمختار أنَّ معناه: غسل رأسه، ويؤيده رواية أبي داود (السالف تخريجها قبل قليل من طريق عبادة بن نسي): "من غسل رأسه يوم الجمعة واغتسل".وقال السندي في حاشيته على "المسند": "اغتسل"، أي: سائر جسده، وإفراد الرأس للاهتمام به، لأنهم أصحاب الأشعار، وغسل الرأس لصاحب الشعر لا يخلو من تعب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1053)


1053 - فحدثني علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا يزيد بن الهيثم القَطِيعي، حدثنا إبراهيم بن أبي الليث، حدثنا الأشجَعيُّ عن سفيان، عن عبد الله بن عيسى، عن يحيى بن الحارث، عن أبي الأشعث الصنعانيّ، عن أوسِ بن أوس الثَّقفي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن غَسَل واغتَسَل ثم غدا، وابتَكَر، فجلس من الإمام قريبًا فاستَمَع وأنصَتَ، كان له بكلِّ خُطْوةٍ أجرُ سنةٍ، صيامِها وقيامِها" [1].وأما حديث حسان بن عطية:




আওস ইবনে আওস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি (ফরজ) গোসল করল এবং (স্ত্রীকেও) গোসল করাল, অতঃপর (জুমআর জন্য) খুব সকালে রওনা হলো এবং প্রথম ভাগে পৌঁছাল, তারপর ইমামের কাছাকাছি বসল, আর মনোযোগ দিয়ে শুনল ও নীরব রইল, তার জন্য প্রতিটি পদক্ষেপে এক বছর রোজা রাখা ও রাত জেগে ইবাদত করার সওয়াব রয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل إبراهيم بن أبي الليث -وهو إبراهيم بن نصر الترمذي- وهو أحسن حالًا في روايته عن الأشجعي من غيرها، وقد توبع هنا في حديث أوس بن أوس. الأشجعي: هو عبيد الله بن عبد الرحمن، وسفيان: هو الثوري، وأبو الأشعث الصنعاني: هو شراحيل بن آدَه.وأخرجه أحمد 26/ (16178)، والترمذي (496)، والنسائي (1720) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه الترمذي (496) من طريق أبي جناب يحيى بن أبي حية، عن عبد الله بن عيسي، به.وقال بإثره: ويروى عن ابن المبارك: "غسل رأسه واغتسل".وأخرجه النسائي (1697) و (1719) من طريقين عن يحيى بن الحارث الذِّماري، به.وانظر ما قبله وما بعده. وابن حبان (2781) من طرق عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وقال ابن حبان بإثره: قوله: "من غَسَل" يريد: غَسَل رأسه، "واغتسل" يريد: اغتسل بنفسه. لأنَّ القوم كانت لهم جُمَمٌ (جمع جُمَّة، وهو من شعر الرأس: ما سقط على المنكبين) احتاجوا إلى تعاهدها.وقوله: "بكّر وابتكر" يريد: بكَّر إلى الغُسل، وابتكر إلى الجمعة.وأخرج أبو داود (349) بإسناده إلى مكحول في قوله: "غسل واغتسل"، قال: غسل رأسه وجسده. و (350) عن سعيد بن عبد العزيز قال: غسل رأسه وغسل جسده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1054)


1054 - أخبرناه الحسن بن حَليم المروَزي، أخبرنا أبو الموجِّه، حدثنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا الأوزاعيُّ، حدثنا حسّان بن عَطيّة، حدثني أبو الأشعث الصَّنعاني، حدثني أوس بن أوس الثقفيّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن غَسَل واغتَسَل يوم الجمعة، ثم بَكَّر وابتَكَر، فدنا واستَمَع ولم يَلْغُ، كان له بكل خُطْوة يخطوها عملُ سنةٍ، أجرُ صيامها وقيامها" [1]. قد صحَّ هذا الحديث بهذه الأسانيد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وأظنه لحديثٍ واءٍ لا يُعلَّل مثلُ هذه الأسانيد بمثله، وهو حديث:




আওস ইবনু আওস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘যে ব্যক্তি জুমু‘আর দিন (নিজেকে) ধৌত করল এবং (পূর্ণ) গোসল করল, অতঃপর তাড়াতাড়ি গেল ও আগে আগে পৌঁছল, এবং (ইমামের) নিকটবর্তী হলো, মনোযোগ সহকারে শুনল ও অনর্থক কথা বলল না, তার প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে এক বছরের আমলের সওয়াব হবে—এর রোযার সওয়াব ও এর (রাতে দাঁড়িয়ে) ইবাদত করার সওয়াব।’




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. الحسن بن حليم: هو الحسن بن محمد بن حليم الحليمي، نُسب إلى جده، وأبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك، والأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو.وأخرجه أحمد 26/ (16173) و (16174)، وأبو داود (345)، وابن ماجه (1087)، وابن حبان (2781) من طرق عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وقال ابن حبان بإثره: قوله: "من غَسَل" يريد: غَسَل رأسه، "واغتسل" يريد: اغتسل بنفسه. لأنَّ القوم كانت لهم جُمَمٌ (جمع جُمَّة، وهو من شعر الرأس: ما سقط على المنكبين) احتاجوا إلى تعاهدها.وقوله: "بكّر وابتكر" يريد: بكَّر إلى الغُسل، وابتكر إلى الجمعة.وأخرج أبو داود (349) بإسناده إلى مكحول في قوله: "غسل واغتسل"، قال: غسل رأسه وجسده. و (350) عن سعيد بن عبد العزيز قال: غسل رأسه وغسل جسده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1055)


1055 - حدَّثَناه أبو بكر أحمد بن كامل، حدثنا أحمد بن الوليد الفحَّام، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا ثَور بن يزيد، عن عثمان الشَّيبانيّ [1]، أنه سمع أبا الأشعث الصَّنعانيَّ يحدِّث عن أوس بن أوس الثَّقفي، عن عبد الله بن عَمروٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن غَسَل يوم الجمعة واغتَسَل، ودنا من الإمام واقترب، واستَمَع وأنصَتَ، كان له بكلِّ خُطوةٍ يَخطُوها أجرُ صيام سنةٍ وقيامِها" [2]. هذا لا يعلِّل الأحاديث الثابتة الصحيحة من أوجُهٍ:أولها: أنَّ حسان بن عطيّة قد ذَكَرَ سماع أوس بن أوس من النبي صلى الله عليه وسلم.وثانيها: أنَّ ثَوْر بن يزيد دون أولئك في الاحتجاج به.وثالثها: أنَّ عثمان الشَّيباني مجهول.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমুআর দিন গোসল করল এবং (পুনরায় উত্তমরূপে) গোসল করল, আর ইমামের নিকটবর্তী হলো ও ঘনিষ্ঠ হলো, এবং মনোযোগ দিয়ে শুনল ও নীরব থাকল, তার প্রতিটি পদক্ষেপের বিনিময়ে এক বছর রোযা রাখা এবং রাত জেগে ইবাদত করার সওয়াব লাভ হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقع عند الحاكم "الشيباني"، وهو خطأ صوابه: عثمان الشامي، كذا وقع منسوبًا في "إتحاف المهرة" لابن حجر 9/ 436 وفي مصادر التخريج، وهو عثمان بن خالد الشامي، ذكره البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 219 وقال: يروي عن أبي الأشعث عن أوس، روى عنه ثور بن يزيد.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عثمان الشامي، وقد أخطأ عثمان هذا فزاد في الإسناد: عبد الله بن عمرو، مع أنَّ أوس بن أوس قد صرَّح بسماعه من النبي صلى الله عليه وسلم كما في رواية حسان بن عطية السالفة قبل هذا.واخرجه أحمد 11/ (6954)، والبيهقي 3/ 227 من طريق روح بن عبادة، بهذا الإسناد.قال البيهقي: هكذا رواه جماعة عن ثور بن يزيد، والوهم في إسناده ومتنه من عثمان الشامي هذا، والصحيح رواية الجماعة عن أبي الأشعث عن أوس عن النبي صلى الله عليه وسلم، والله أعلم.قلنا: لا وهم في متنه، فقد صحَّ الإسناد إليه كما في الرواية السابقة، وانظر لزامًا تعليقنا على "مسند أحمد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1056)


1056 - حدثنا علي بن حَمْشاذ، حدثنا موسى بن هارون وصالح بن محمد الرَّازي والحسين بن محمد بن زياد.وحدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، قالوا: حدثنا سُرَيج بن يونس، حدثنا هارون بن مسلم العِجْلي، حدثنا أبانُ بن يزيد، عن يحيى بن أبي كَثِير، عن عبد الله بن أبي قَتادة، قال: دخل عليَّ أبي وأنا أغتسِلُ يوم الجمعة، فقال: غُسلٌ من جَنابةٍ أو للجمعة؟ قال: قلت: من جَنابة، قال: أعِدْ غُسلًا آخر؛ فإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من اغتَسَلَ يوم الجمعةِ، كان في طهارةٍ إلى الجمعةِ الأخرى" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وهارون بن مسلم العِجْلي شيخٌ قديمٌ للبصريين يقال له: الحِنّائي، ثقةٌ قد روى عنه أحمد بن حنبل وعبيد الله بن عمر القَوارِيريّ.




আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আব্দুল্লাহ) বলেন: আমার পিতা আমার কাছে আসলেন যখন আমি জুমার দিন গোসল করছিলাম। অতঃপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন: (এটা কি) জানাবাতের গোসল, নাকি জুমার জন্য? আমি বললাম: জানাবাত (নাপাকি) থেকে। তিনি বললেন: তুমি (জুমার নিয়তে) অন্য আরেকটি গোসল করো। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জুমার দিন গোসল করে, সে পরবর্তী জুমা পর্যন্ত পবিত্রতার মধ্যে থাকে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن إن شاء الله، هارون بن مسلم العجلي وثقه المصنف هنا، وروى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال أبو حاتم: لين، وقال الدارقطني في "العلل": كان ضعيفًا، وقال مرة كما في "سؤالات البرقاني": صويلح يعتبر به.وأخرجه ابن حبان (1222) من طريق محمد بن عبد الأعلى، عن هارون بن مسلم، بهذا الإسناد.قوله: "كان في طهارة إلى الجمعة الأخرى" قال ابن حبان: يريد به من الذنوب، لأنَّ من حضر الجمعة بشرائطها، غُفِر به ما بينها وبين الجمعة الأخرى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1057)


1057 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا عليُّ بن عبد العزيز، حدثنا حجّاج بن منهال، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن محمد بن إسحاق، عن محمد ابن إبراهيم، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة وأبي سعيد، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن غَسَل يوم الجمعة واستاك ولَبِس أحسنَ ثيابه وتطيَّب بطيبٍ إِن وَجَدَه، ثم جاء ولم يتخطَّ الناسَ، فصلَّى ما شاء الله أن يصلي، فإذا خرج الإمامُ سكت، فذلك كفارةٌ إلى الجمعة الأخرى" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وقد رواه أيضًا إسماعيل ابن عُليَّة عن محمد بن إسحاق، مثل رواية حماد بن سلمة، وقيَّده بأبي أُمامة بن سهل مقرونًا بأبي سلمة:




আবূ হুরায়রা ও আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি জুমুআর দিন গোসল করলো, মিসওয়াক করলো, এবং উত্তম পোশাক পরিধান করলো, আর সুগন্ধি ব্যবহার করলো যদি সে তা পায়, অতঃপর (মসজিদে) এলো এবং মানুষের ঘাড় টপকে গেল না, আর আল্লাহ্‌র ইচ্ছানুযায়ী সালাত আদায় করলো, এরপর যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বের হলেন, তখন সে নীরব রইল, তবে তা তার জন্য পরবর্তী জুমুআ পর্যন্ত পাপের কাফ্‌ফারা হবে।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن محمد بن إسحاق صرَّح بالتحديث عند أحمد -كما سيأتي تخريجه في الرواية التي بعد هذه- فانتفت شبهة تدليسه.وأخرجه أبو داود (343) عن موسى بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 15/ (9484)، ومسلم (857)، وأبو داود (1050)، وابن ماجه (1090)، والترمذي (498)، وابن حبان (1231) و (2780) من طريق أبي صالح، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه بنحوه أيضًا أحمد 17/ (11347) من طريق عطية العوفي، عن أبي سعيد الخدري.وفيه زيادة في آخره.وانظر ما بعده.وفي الباب عن أبي ذر سيأتي في المستدرك برقم (1086)، والمحفوظ أنه من حديث سلمان الفارسي كما سيأتي بيانه.وعن أبي أيوب الأنصاري عند أحمد 38/ (23571).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1058)


1058 - أخبرَناهُ أحمد بن جعفر القَطِيعيّ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، عن محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن إبراهيم، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن وأبي أُمامة بن سَهل، عن أبي هريرة وأبي سعيدٍ قالا: سَمِعْنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن اغتسل يوم الجمعة، واستنَّ ومسَّ من طيبٍ إن كان عنده، ولَبِس أحسنَ ثيابه، ثم جاء إلى المسجد، ولم يتخطَّ رِقابَ الناس، ثم ركع ما شاء الله أن يركع، ثم أنصَتَ إذا خرج إمامُه حتى يصلي، كانت له كفارةً لما بينها وبين الجمعة التي كانت قبلَها".يقول أبو هريرة: وثلاثةُ أيامٍ زيادةً؛ إنَّ الله قد جعل الحسنة بعَشْر أمثالها [1].إسماعيل ابن عُليَّة من الثقات الذي أجمعا على إخراجه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شهر ربيع الأول سنةَ خمسٍ وتسعين وثلاث مئة:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তাঁরা বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি জুমার দিন গোসল করবে, মিসওয়াক করবে, এবং তার কাছে সুগন্ধি থাকলে তা ব্যবহার করবে, আর তার সবচেয়ে ভালো পোশাক পরিধান করবে, এরপর মসজিদে আসবে, এবং (আসার সময়) মানুষের ঘাড় ডিঙ্গিয়ে যাবে না, এরপর আল্লাহ যা তাওফীক দেন, সে পরিমাণ সালাত আদায় করবে (নফল পড়বে), এরপর তার ইমাম (খুতবার জন্য) বের হলে সালাত শেষ না হওয়া পর্যন্ত চুপ থাকবে (খুতবা মনোযোগ দিয়ে শুনবে), তার জন্য তা পূর্ববর্তী জুমা এবং এই জুমার মধ্যবর্তী সময়ের গুনাহের কাফফারা হবে।” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এবং অতিরিক্ত আরও তিন দিনের (গুনাহের কাফফারা হবে); কেননা আল্লাহ নেক কাজকে দশ গুণ (সওয়াব) দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كسابقه.وأخرجه أحمد 18/ (11768)، وأبو داود (343) من طريقين عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1059)


1059 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي، حدثنا الحارث بن أبي أُسامة، حدثنا محمد بن عيسى بن الطَّبّاع، حدثنا مُصعَب بن سَلَّام، عن هشام بن الغازِ، عن نافع، عن ابن عمر قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا خرج يومَ الجمعة فقَعَدَ على المنبر، أذَّن بلال [1].هذا حديث صحيح الإسناد، فإنَّ هشام بن الغازِ ممن يُجمع حديثُه، ولم يُخرجاه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জুমুআর দিনে (মসজিদে) বের হতেন এবং মিম্বরের উপর বসতেন, তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আযান দিতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل مصعب بن سلَّام التميمي الكوفي، وقال الذهبي في "تلخيصه": ليس بحجة.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 205، وفي "السنن الصغرى" (620) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (1532)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (2560) من طريقين عن محمد بن عيسى بن الطباع، به.وأخرجه بنحوه ابن عدي في "الكامل" 8/ 87 من طريق زياد بن أيوب، عن مصعب بن سلام، به.وله شاهد من حديث السائب بن يزيد عند البخاري (912) و (913) و (916)، وانظر تتمة تخريجه في "مسند أحمد" 24/ (15716).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1060)


1060 - حدثنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حدثنا محمد بن إسماعيل ابن مِهْران، حدثنا هشام بن عمَّار، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا ابن جُرَيج، عن عطاء ابن أبي رباح، عن ابن عباس قال: استوى النبيُّ صلى الله عليه وسلم على المنبر يوم الجمعة، فقال للناس: "اجلِسُوا"، فسمعه ابنُ مسعود [1] وهو على باب المسجد فجَلَس، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "تعالَ يا ابنَ مسعود" [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, জুমু'আর দিনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং লোকজনকে বললেন: "তোমরা বসো।" তখন ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের দরজায় ছিলেন, তিনি তা শুনলেন এবং বসে পড়লেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে ইবনু মাসউদ, তুমি ভেতরে এসো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: ابن مسعدة، في الموضعين، والتصويب من "السنن الكبرى" للبيهقي، وسائر مصادر التخريج. وأما رواية معاذ بن معاذ فقد أخرجها البيهقي 3/ 218 من طريقه عن ابن جريج، به.وأما رواية أبي زيد النحوي، فكما عند الدارقطني في "العلل" 13/ 383 (3274)، ولم نقع عليها فيما بين يديّ من مصادر.وقد رجح الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 3/ 293 كونه من حديث ابن عباس.وروى هذا الحديث أيضًا إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن مسعود، فجعله من مسند ابن مسعود، كما في "علل الدارقطني".ورواه عبد الرزاق وروح بن عبادة عن ابن جريج عن عطاء، مرسلًا: أما رواية عبد الرزاق فهي في "مصنفه" (5368)، ورواية روح أخرجها الحارث بن أبي أسامة (1015 - بغية الباحث).ورواه عمرو بن دينار عن عطاء مرسلًا، أخرجه من طريقه البيهقي 3/ 218، وأبو إسماعيل الهروي في "ذم الكلام" (279). قال الدارقطني في "العلل" 13/ 383: ورواه عمرو بن دينار عن عطاء مرسلًا، والمرسل أشبه.



[2] رجاله ثقات ابن جريج -وهو عبد الملك بن عبد العزيز- وإن لم يصرح بسماعه من عطاء، فروايته عنه محمولة على الاتصال، والوليد بن مسلم قد صرَّح بالتحديث عنه، أما هشام بن عمار فقد كبر فصار يتلقن. ثم إنَّ هذا الحديث قد اختُلف في وصله وإرساله، قال أبو داود: هذا يعرف مرسلًا، وقال الدارقطني: والمرسل أشبه.قلنا: رواه ابن جريج، واختُلف عنه فيه:فقد رواه الوليد بن مسلم عن ابن جريج عن عطاء عن ابن عباس، فجعله من مسند ابن عباس، كما عند الحاكم هنا، وعنه أخرجه البيهقي 3/ 205، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (1780) عن محمد بن يحيي، عن هشام بن عمار، به. وقال: إن كان الوليد ابن مسلم ومن دونه حفظ ابن عباس في هذا الإسناد، فإنَّ أصحاب ابن جريج أرسلوا هذا الخبر عن عطاء عن النبي صلى الله عليه وسلم.ورواه مخلد بن يزيد ومعاذ بن معاذ وأبو زيد النحوي عن ابن جريج عن عطاء عن جابر بن عبد الله، فجعلوه من مسند جابر.أما رواية مخلد بن يزيد فستأتي عند الحاكم (1068)، وعنه البيهقي 3/ 206 عن يحيى بن محمد العنبري، عن محمد بن إبراهيم العبدي، عن يعقوب بن كعب الحلبي، عنه، به.وعن يعقوب بن كعب هذا أخرجه أبو داود (1091)، ومن طريقه البيهقي 3/ 206، وابن الجوزي في "التحقيق" (806). قال أبو داود: هذا يعرف مرسلًا، إنما رواه الناس عن عطاء عن النبي صلى الله عليه وسلم، ومخلد هو شيخ.وأخرجه أبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (680) و (3141) -ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 33/ 128 - من طريق إسحاق بن زريق، عنه، به. وأما رواية معاذ بن معاذ فقد أخرجها البيهقي 3/ 218 من طريقه عن ابن جريج، به.وأما رواية أبي زيد النحوي، فكما عند الدارقطني في "العلل" 13/ 383 (3274)، ولم نقع عليها فيما بين يديّ من مصادر.وقد رجح الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 3/ 293 كونه من حديث ابن عباس.وروى هذا الحديث أيضًا إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن مسعود، فجعله من مسند ابن مسعود، كما في "علل الدارقطني".ورواه عبد الرزاق وروح بن عبادة عن ابن جريج عن عطاء، مرسلًا: أما رواية عبد الرزاق فهي في "مصنفه" (5368)، ورواية روح أخرجها الحارث بن أبي أسامة (1015 - بغية الباحث).ورواه عمرو بن دينار عن عطاء مرسلًا، أخرجه من طريقه البيهقي 3/ 218، وأبو إسماعيل الهروي في "ذم الكلام" (279). قال الدارقطني في "العلل" 13/ 383: ورواه عمرو بن دينار عن عطاء مرسلًا، والمرسل أشبه.