হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1081)


1081 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِي بن خُزيمة، حدثنا عبد الله بن يَزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو مَرْحُوم، عن سَهْل بن معاذ بن أنس الجُهَني، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الحُبْوةِ يومَ الجُمعة، والإمامُ يخطُب [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মু'আয ইবনে আনাস আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু'আর দিনে ইমাম খুতবা প্রদানকালে হুবওয়াহ (বিশেষভাবে হাঁটু গেড়ে বসা) করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده فيه ضعف، انفرد به أبو مرحوم - واسمه عبد الرحيم بن ميمون - عن سهل بن معاذ بن أنس، وضعفه ابن المنذر في "الأوسط" 4/ 90، وعبد الحق الإشبيلي في "الأحكام الوسطى" 3/ 63، ووافقه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 173، فأبو مرحوم إنما يعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه أحمد 24/ (15630)، وأبو داود (1110)، والترمذي (514) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن.قوله: عن الحبوة، بكسر الحاء وضمها اسم من الاحتباء، والجمع: حُبًا وحِبًا، قال ابن الأثير في "النهاية": وإنما نُهي عنه لأنَّ الاحتباء يجلب النوم فلا يسمع الخطبة، ويعرِّض طهارته للانتقاض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1082)


1082 - أخبرنا بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا جرير بن حازم، عن ثابت، عن أنس، قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يَنزِلُ من المنبَرِ فيَعرِضُ له الرجلُ في الحاجة، فيقومُ معه حتى يقضيَ حاجتَه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি মিম্বর থেকে নামতেন, তখন কোনো প্রয়োজনে একজন লোক তাঁর সামনে এসে দাঁড়াত। তিনি লোকটির প্রয়োজন পূরণ না হওয়া পর্যন্ত তার সাথে দাঁড়িয়ে থাকতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، غير أنَّ المحفوظ من حديث ثابت - وهو ابن أسلم البناني - أنَّ ذلك كان في صلاة العشاء وليس في صلاة الجمعة، أعلَّ الحديث بذلك غير واحد من أهل العلم، منهم البخاري وأبو داود والترمذي والدارقطني، وأرجعوا الوهم فيه إلى جرير بن حازم.وأخرجه أبو داود (1120) عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: الحديث ليس بمعروف عن ثابت، وهو مما تفرد به جرير بن حازم.وأخرجه أحمد 19/ (12201) و (12284) و 20/ (13228)، وابن ماجه (1117)، والترمذي (517)، والنسائي (1744)، وابن حبان (8205) من طرق عن جرير بن حازم، به. قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من حديث جرير بن حازم، سمعت محمدًا يقول: وهم جرير في هذا الحديث، والصحيح ما روي عن ثابت عن أنس قال: أقيمت الصلاة فأخذ رجل بيد النبي صلى الله عليه وسلم فما زال يكلمه حتى نعس بعض القوم، والحديث هو هذا، وجرير بن حازم ربما يهم في الشيء، وهو صدوق.قلنا: والحديث الذي أشار إليه البخاري هو في "صحيحه" (643) من طريق حميد، وفي "صحيح مسلم" (376) (126) من طريق حماد بن سلمة، كلاهما عن ثابت عن أنس. وقد صرَّح حماد في روايته أنَّ ذلك كان في صلاة العشاء. الناس شخص النبي صلى الله عليه وسلم، فقام أناس يصلون بصلاته، فأصبحوا فتحدثوا بذلك … الحديث.وأخرجه بنحوه أيضًا البخاري (730)، ومسلم (782)، وابن ماجه (942)، والنسائي (840) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان له حصير يبسطه بالنهار ويحتجره بالليل، فثاب إليه ناس فصلَّوا وراءه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1083)


1083 - أخبرني مَخلَد بن جعفر الباقَرْحي، حدثنا جعفر بن محمد الفِرْيابي، حدثنا زهير بن حرب، حدثنا هُشَيم، أخبرنا يحيى بن سعيد، عن عَمْرة، عن عائشة قالت: صلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حُجرته والناسُ يأتمُّون به من وراءِ الحُجرة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কক্ষে সালাত আদায় করলেন, আর লোকেরা কক্ষের বাইরে থেকে তাঁর অনুসরণ করে সালাত আদায় করছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري، وعمرة: هي بنت عبد الرحمن بن سعد بن زرارة الأنصارية.وأخرجه أبو داود (1126) عن زهير بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 40/ (24016) عن هشيم بن بشير، به.وأخرجه بنحوه البخاري (729) من طريق عبدة بن سليمان، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي من الليل في حجرته، وجدار الحجرة قصير، فرأى الناس شخص النبي صلى الله عليه وسلم، فقام أناس يصلون بصلاته، فأصبحوا فتحدثوا بذلك … الحديث.وأخرجه بنحوه أيضًا البخاري (730)، ومسلم (782)، وابن ماجه (942)، والنسائي (840) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان له حصير يبسطه بالنهار ويحتجره بالليل، فثاب إليه ناس فصلَّوا وراءه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1084)


1084 - أخبرنا أبو بكر بن أبي نصر الدَّارَبردي بمَرْو، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا يوسف بن عيسى، حدثنا الفضل بن موسى، أخبرنا عبد الحميد بن جعفر، عن يزيدَ بن أبي حبيب، عن عطاء، عن ابن عمر قال: كان إذا كان بمكة فصلى الجمعةَ تقدم فصلى ركعتين، ثم تقدم فصلى أربعًا، فإذا كان بالمدينة صلى الجمعة، ثم رجع إلى بيته فصلى ركعتين، ولم يُصلِّ في المسجد، فقيل له، فقال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يفعلُ ذلك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما اتفقا على حديث ابن عمر في الركعتين في بيته [2]، ولمسلمٍ وحدَه: كان يُصلي بعد الجمعة أربعًا [3]. وقد تابع ابنُ جريج يزيدَ بنَ أبي حبيب على روايته عن عطاء:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন মক্কায় থাকতেন এবং জুমার সালাত আদায় করতেন, তখন (জুমার ফরযের পর) তিনি প্রথমে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর সামনে এগিয়ে এসে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন। আর যখন তিনি মদীনায় থাকতেন, তখন জুমার সালাত আদায় করে নিজ বাড়িতে ফিরে গিয়ে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন এবং মসজিদে সালাত আদায় করতেন না। তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটিই করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (1130) عن محمد بن عبد العزيز بن أبي رِزمَة المروزي، عن الفضل بن موسى، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده. ركعتين ثم أربعًا، يعني ست ركعات، كما في الحديث التالي.



[2] أخرجه البخاري (937) و (1172)، ومسلم (882) (70) و (71) من طريق نافع عن ابن عمر.وأخرج البخاري (1165) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر عن أبيه قال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين قبل الظهر، وركعتين بعد الظهر، وركعتين بعد الجمعة، وركعتين بعد المغرب، وركعتين بعد العشاء. وهو عند مسلم (882) (72) من هذا الطريق في ركعتي الجمعة فقط. ركعتين ثم أربعًا، يعني ست ركعات، كما في الحديث التالي.



1084 [3] - لم يخرج ذلك مسلم عن ابن عمر، وإنما روى أبو داود والترمذي عنه أنه كان يصلي بعدها ركعتين ثم أربعًا، يعني ست ركعات، كما في الحديث التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1085)


1085 - هكذا أخبرناه أبو بكر بنُ إسحاق الفقيه، أخبرنا إبراهيم بن إسحاق الأنماطيّ، حدثنا هارون بن عبد الله، حدثنا حجاج بن محمد، عن ابن جُريج، قال: أخبرني عطاء أنه رأى ابنَ عمر يُصلي يومَ الجمعة، فيتقدَّمُ عن مُصلَّاه الذي صلى فيه الجمعةَ قليلًا غيرَ كثير، فيركعُ ركعتين، قال: ثم يمشي أنفسَ من ذلك، فيركعُ أربع ركعات، قلتُ لعطاء: كم رأيتَ ابنَ عمر يصنعُ ذلك؟ قال: مِرارًا [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আতা (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে জুমার দিনে সালাত আদায় করতে দেখেছেন। তিনি (ইবনে উমর) যে স্থানে জুমার সালাত আদায় করেছিলেন, সেখান থেকে সামান্য পরিমাণে, বেশি নয়, সামনে সরে গেলেন এবং দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। আতা বলেন: এরপর তিনি তার চেয়েও আরও বেশি দূরে হেঁটে গেলেন এবং চার রাকাত সালাত আদায় করলেন। [ইবনে জুরাইজ বলেন:] আমি আতাকে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি ইবনে উমরকে কতবার এমনটি করতে দেখেছেন? তিনি বললেন: বহুবার।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. هارون بن عبد الله: هو الحمّال، وحجاج بن محمد: هو المصيصي الأعور، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (1133) عن إبراهيم بن الحسن، عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (523 م) من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن جريج، عن عطاء قال: رأيت ابن عمر صلى بعد الجمعة ركعتين، ثم صلى بعد ذلك أربعًا. عنه كما هنا فجعله من حديث أبي ذر، ورواه ابن أبي ذئب عنه بالإسناد نفسه لكن جعله من حديث سلمان الفارسي، وهو المحفوظ، قال الدارقطني في "العلل": والحديث عندي حديث ابن أبي ذئب، لأنَّ للحديث أصلًا محفوظًا عن سلمان يرويه أهل الكوفة. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 3/ 605 - 606: فأما ابن عجلان فهو دون ابن أبي ذئب في الحفظ فروايته مرجوحة، مع أنه يحتمل أن يكون ابن وديعة سمعه من أبي ذر وسلمان جميعًا، ويرجح كونه عن سلمان وروده من وجه آخر عنه. انتهى. قلنا ورجح أبو زرعة كما في "علل ابن أبي حاتم" (581) حديث ابن عجلان، ورجح أبو حاتم حديث ابن أبي ذئب لأنه متابع، ونقل عن يحيى بن معين قوله: ابن أبي ذئب أثبت في المقبري من ابن عجلان.يحيى بن سعيد: هو القطان، وابن عجلان: اسمه محمد.وأخرجه أحمد 35/ (21539)، وابن ماجه (1097)، والدارقطني في "العلل" (2045) من طرق عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (5589)، والحميدي (138) عن سفيان بن عيينة، وأحمد (21569) من طريق الليث بن سعد عن ابن عجلان، به.ولم يذكر عبد الرزاق في روايته عن سفيان أبا سعيد المقبري، وقال الحميدي عنه: أُراه عن أبيه؛ على الظن.أما حديث سلمان الفارسي فقد أخرجه أحمد 39/ (23710) و (23725)، والبخاري (883) و (910)، وابن حبان (2776) من طريق ابن أبي ذئب عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن عبد الله بن وديعة عنه.وأخرجه أحمد (23718) و (23729)، والنسائي (1677) و (1737) من طريق قرثع الضبي، عن سلمان الفارسي.وخالف ابنَ عجلان وابنَ أبي ذئب صالحُ بن كيسان، فأخرجه من طريقه ابن خزيمة (1803)، والبيهقي 3/ 243 عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة. وصالح بن كيسان ثقة، لكن قال أبو زرعة وأبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (581) -: هذا خطأ.وفي الباب عن أبي هريرة وأبي سعيد معًا، سلف برقم (1057)، وذكرنا هناك تتمة شواهده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1086)


1086 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بنُ يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا ابن عَجْلان، عن سعيد بن أبي سعيد، عن عبد الله بن وَدِيعة [1]، عن أبي ذَرٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن اغتسل يومَ الجمعة فأحسن الغُسلَ، وتطهَّر فأحسن الطُّهور، ولَبِس من خير ثيابه، ومسَّ ما كَتَبَ الله له من طِيبِ أو دُهنِ أهله، ولم يفرِّقْ بين اثنين، إلّا غُفِرَ له إلى الجمعة الأخرى" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমুআর দিনে গোসল করে এবং উত্তমরূপে গোসল সম্পন্ন করে, এবং পবিত্রতা অর্জন করে, অতঃপর উত্তমরূপে পবিত্রতা অর্জন করে, এবং তার উত্তম পোশাক পরিধান করে, এবং আল্লাহ তার জন্য যে সুগন্ধি বা ঘরের তেল (তৈল) বরাদ্দ রেখেছেন, তা ব্যবহার করে, আর (মসজিদে) দু’জনের মাঝে পার্থক্য সৃষ্টি করে না (অর্থাৎ দু’জনকে সরিয়ে সামনে যায় না), তাহলে পরবর্তী জুমুআ পর্যন্ত তার (ছোট) গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقع في رواية المصنف - ومن طريقه رواه هكذا قوام السنة الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (916) -: سعيد بن أبي سعيد عن عبد الله بن وديعة، لم يُذكر فيه أبو سعيد بين سعيد وابن وديعة، وقد ذكر الدارقطني في "العلل" (2045) أنَّ يحيى بن سعيد القطان عن ابن عجلان قال فيه: عن أبيه، وهو كذلك في مصادر التخريج من رواية يحيى القطان. أما سفيان بن عيينة فقد رواه عن ابن عجلان واختلف عليه فلم يقل مرةً: عن أبيه، وقال مرة: أُراه عن أبيه، كما سيتبين في التخريج. عنه كما هنا فجعله من حديث أبي ذر، ورواه ابن أبي ذئب عنه بالإسناد نفسه لكن جعله من حديث سلمان الفارسي، وهو المحفوظ، قال الدارقطني في "العلل": والحديث عندي حديث ابن أبي ذئب، لأنَّ للحديث أصلًا محفوظًا عن سلمان يرويه أهل الكوفة. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 3/ 605 - 606: فأما ابن عجلان فهو دون ابن أبي ذئب في الحفظ فروايته مرجوحة، مع أنه يحتمل أن يكون ابن وديعة سمعه من أبي ذر وسلمان جميعًا، ويرجح كونه عن سلمان وروده من وجه آخر عنه. انتهى. قلنا ورجح أبو زرعة كما في "علل ابن أبي حاتم" (581) حديث ابن عجلان، ورجح أبو حاتم حديث ابن أبي ذئب لأنه متابع، ونقل عن يحيى بن معين قوله: ابن أبي ذئب أثبت في المقبري من ابن عجلان.يحيى بن سعيد: هو القطان، وابن عجلان: اسمه محمد.وأخرجه أحمد 35/ (21539)، وابن ماجه (1097)، والدارقطني في "العلل" (2045) من طرق عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (5589)، والحميدي (138) عن سفيان بن عيينة، وأحمد (21569) من طريق الليث بن سعد عن ابن عجلان، به.ولم يذكر عبد الرزاق في روايته عن سفيان أبا سعيد المقبري، وقال الحميدي عنه: أُراه عن أبيه؛ على الظن.أما حديث سلمان الفارسي فقد أخرجه أحمد 39/ (23710) و (23725)، والبخاري (883) و (910)، وابن حبان (2776) من طريق ابن أبي ذئب عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن عبد الله بن وديعة عنه.وأخرجه أحمد (23718) و (23729)، والنسائي (1677) و (1737) من طريق قرثع الضبي، عن سلمان الفارسي.وخالف ابنَ عجلان وابنَ أبي ذئب صالحُ بن كيسان، فأخرجه من طريقه ابن خزيمة (1803)، والبيهقي 3/ 243 عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة. وصالح بن كيسان ثقة، لكن قال أبو زرعة وأبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (581) -: هذا خطأ.وفي الباب عن أبي هريرة وأبي سعيد معًا، سلف برقم (1057)، وذكرنا هناك تتمة شواهده.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد اختلف فيه على سعيد بن أبي سعيد المقبري، فرواه ابن عجلان عنه كما هنا فجعله من حديث أبي ذر، ورواه ابن أبي ذئب عنه بالإسناد نفسه لكن جعله من حديث سلمان الفارسي، وهو المحفوظ، قال الدارقطني في "العلل": والحديث عندي حديث ابن أبي ذئب، لأنَّ للحديث أصلًا محفوظًا عن سلمان يرويه أهل الكوفة. وقال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 3/ 605 - 606: فأما ابن عجلان فهو دون ابن أبي ذئب في الحفظ فروايته مرجوحة، مع أنه يحتمل أن يكون ابن وديعة سمعه من أبي ذر وسلمان جميعًا، ويرجح كونه عن سلمان وروده من وجه آخر عنه. انتهى. قلنا ورجح أبو زرعة كما في "علل ابن أبي حاتم" (581) حديث ابن عجلان، ورجح أبو حاتم حديث ابن أبي ذئب لأنه متابع، ونقل عن يحيى بن معين قوله: ابن أبي ذئب أثبت في المقبري من ابن عجلان.يحيى بن سعيد: هو القطان، وابن عجلان: اسمه محمد.وأخرجه أحمد 35/ (21539)، وابن ماجه (1097)، والدارقطني في "العلل" (2045) من طرق عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (5589)، والحميدي (138) عن سفيان بن عيينة، وأحمد (21569) من طريق الليث بن سعد عن ابن عجلان، به.ولم يذكر عبد الرزاق في روايته عن سفيان أبا سعيد المقبري، وقال الحميدي عنه: أُراه عن أبيه؛ على الظن.أما حديث سلمان الفارسي فقد أخرجه أحمد 39/ (23710) و (23725)، والبخاري (883) و (910)، وابن حبان (2776) من طريق ابن أبي ذئب عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن عبد الله بن وديعة عنه.وأخرجه أحمد (23718) و (23729)، والنسائي (1677) و (1737) من طريق قرثع الضبي، عن سلمان الفارسي.وخالف ابنَ عجلان وابنَ أبي ذئب صالحُ بن كيسان، فأخرجه من طريقه ابن خزيمة (1803)، والبيهقي 3/ 243 عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة. وصالح بن كيسان ثقة، لكن قال أبو زرعة وأبو حاتم - كما في "العلل" لابنه (581) -: هذا خطأ.وفي الباب عن أبي هريرة وأبي سعيد معًا، سلف برقم (1057)، وذكرنا هناك تتمة شواهده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1087)


1087 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكْرَمٍ، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق. وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا عيسى بن يونس، عن محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا نَعَس أحدُكم يومَ الجمعة في مجلِسه، فليتحوَّلْ من مجلسِه ذلك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যখন কারো জুমু‘আর দিন তার বসার স্থানে তন্দ্রা আসে, তখন সে যেন সেই স্থান থেকে সরে যায়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، وهذا إسناد حسن، محمد بن إسحاق صدوق حسن الحديث، وقد صرَّح بالتحديث عند أحمد (6187) فانتفت شبهة تدليسه، لكن روي الحديث من وجه آخر عن ابن عمر موقوفًا، وقد صحَّح وقفه غير واحد من الأئمة كابن المديني والبيهقي والنووي، انظر تفصيل ذلك التعليق على "مسند أحمد" 8/ (4741).وأخرجه أحمد (4875) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (4741) و (6187)، وأبو داود (1119)، والترمذي (526)، وابن حبان (2792) من طرق عن محمد بن إسحاق، به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه موقوفًا الشافعي في "الأم" 2/ 204 - 205، وابن أبي شيبة 2/ 119، والبيهقي 3/ 237 من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر. وهذا إسناد صحيح، قال البيهقي: ولا يثبت رفع هذا الحديث، والمشهور عن ابن عمر من قوله. قال: كنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم الجمعة، ثم ننصرف وليس للحيطان ظل نستظل فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1088)


1088 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا بكَّار بن قُتيبةَ القاضي بمصر، حدثنا أبو داود الطيالسي، حدثنا ابن أبي ذئب، عن مسلم بن جُندُب، عن الزُّبير بن العوَّام قال: كنا نصلي الجمعةَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فكنَّا نبتدِرُ الفيءَ، فما يكون إلّا قَدْر قدم أو قدمين [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما خرَّج البخاري عن أبي خَلْدة عن أنس بغير هذا اللفظ [2].




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুমু'আর সালাত আদায় করতাম, আর আমরা দ্রুত ছায়া ধরার জন্য ছুটতাম, তখন তা (ছায়া) এক বা দুই কদম (পা) পরিমাণ ছাড়া অন্য কিছুই হতো না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أنه منقطع، مسلم بن جندب لم يدرك الزبير بن العوام، بينهما واسطة كما سيأتي.وأخرجه أحمد 3/ (1411) عن يزيد بن هارون، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (1436) عن يحيى بن آدم، عن ابن أبي ذئب، عن مسلم بن جندب قال: حدثني من سمع الزبير بن العوام يقول … فذكره. وهذا إسناد ضعيف أيضًا لإبهام الواسطة بين مسلم والزبير. لكن يشهد له حديث سلمة بن الأكوع في "الصحيحين": البخاري (4168)، ومسلم (860) قال: كنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم الجمعة، ثم ننصرف وليس للحيطان ظل نستظل فيه.



[2] "صحيح البخاري" (906)، ولفظه عن أنس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا اشتد البرد بكَّر بالصلاة، وإذا اشتدَّ الحر أبرد بالصلاة؛ يعني الجمعة. وأخرجه على الجادة أيضًا دون ذكر الجمعة: أحمد 12/ (7284)، ومسلم (607) (162)، وابن ماجه (1122)، والترمذي (524)، والنسائي (1753) و (1754) من طريق سفيان بن عيينة، والبخاري (580)، ومسلم (607) (161)، وأبو داود (1121)، والنسائي (1549)، وابن حبان (1483) من طريق مالك، وأحمد 14/ (8883)، ومسلم (607) (162)، والنسائي (1548)، وابن حبان (1485) من طريق عبيد الله بن عمر العمري، وأحمد 13/ (7665) و (7765)، ومسلم (607) (162) من طريق معمر، ومسلم أيضًا (607) (162) من طريق يونس، وابن حبان (1486) من طريق ثابت بن ثوبان، ستتهم عن الزهري، به. وقال يونس في روايته: "من أدرك ركعة من الصلاة مع الإمام … " فزاد فيها: "مع الإمام"، وقرن ثابت بن ثوبان بالزهري مكحولًا.وخالف الرواةَ عن ابن عيينة: محمدُ بنُ منصور الجوّاز، فرواه عنه عن الزهري، به، وقال فيه: "من أدرك من صلاة الجمعة ركعة فقد أدرك"، فشذّ بذلك، أخرجه عنه النسائي في "المجتبى" (1425).وأخرج أحمد 12/ (7460) و (7538)، وابن ماجه (700)، والنسائي (1515) من طريق معمر، عن الزهري، به: "من أدرك من العصر ركعة قبل أن تغرب الشمس فقد أدركها، ومن أدرك من الصبح ركعة قبل أن تطلع الشمس فقد أدركها".ونحوه أخرجه أحمد (7458)، والبخاري (556)، والنسائي (1516)، وابن حبان (1586) من طريق يحيى بن أبي كثير، وأحمد 14/ (8585) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن أبي سلمة، عن أبي هريرة.وسلف الحديث على الجادة برقم (878) و (1025) من طريق زيد أبي عتاب وسعيد المقبري عن أبي هريرة مرفوعًا: "إذا جئتم ونحن سجود فاسجدوا ولا تعدوها شيئًا، ومن أدرك ركعة فقد أدرك الصلاة".ومن طريقين آخرين عن أبي هريرة بصلاة الصبح فقط سلف (1026) و (1027): "من صلى ركعة من الصبح ثم طلعت الشمس فليصل الصبح"، وفي الموضع الثاني: "فليتم صلاته".وانظر "العلل" للدارقطني (1730).وانظر الحديثين بعد هذا.وروي الحديث بذكر الجمعة من حديث عبد الله بن عمر، من رواية الزهري عن سالم عنه مرفوعًا عند ابن ماجه (1123) والنسائي (1552)، وإسناده ضعيف.وعن الزهري عن سالم مرسلًا عند النسائي (1553) ولفظه: "من أدرك ركعة من صلاة من الصلوات … "، وإسناده صحيح لولا إرساله.قال الإمام ابن خزيمة بإثر حديث أبي هريرة (1850) "من أدرك ركعة من صلاة الجمعة … " قال: هذا خبر روي على المعنى، لم يُؤدَّ على لفظ الخبر، ولفظ الخبر: "من أدرك من الصلاة ركعة"، فالجمعة من الصلاة أيضًا كما قاله الزهري، فإذا روي الخبر على المعنى لا على اللفظ جاز أن يقال: من أدرك من الجمعة ركعة، إذ الجمعة من الصلاة، فإذا قال النبي صلى الله عليه وسلم: "من أدرك من الصلاة ركعة فقد أدرك الصلاة" كانت الصلوات كلها داخلة في هذا الخبر، الجمعة وغيرها من الصلوات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1089)


1089 - حدثني علي بن العباس الإسكندرانيُّ بمكة، حدثنا الفضل بن محمد الأنطاكي، حدثنا محمد بن ميمون الإسكندراني، حدثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعيّ، حدثني الزُّهريّ، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من أدركَ مِن صلاةِ الجمعة ركعةً، فقد أدركَ الصلاة" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমুআর নামাযের এক রাকআত পেল, সে নামায পেল।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده واهٍ، الفضل بن محمد الأنطاكي قال الدارقطني: كان يضع الحديث، وقال ابن عدي: وصل أحاديث وسرق أحاديث وزاد في المتون. ثم أنَّ ذِكْر الجمعة في الحديث فيه نكارة، وهم فيه محمد بن ميمون الاسكندراني - وهو محمد بن عبد الله بن ميمون نُسب هنا إلى جده - فرواه هنا هكذا عن الوليد بن مسلم عن الأوزاعي، كما قال الدارقطني في "العلل" (1730)، وقال: إنما رواه الحفاظ عن الأوزاعي: "من أدرك من الصلاة ركعة".الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه من طريق محمد بن عبد الله بن ميمون عن الوليد بن مسلم بهذا اللفظ: ابن خزيمة (1850).وخالف ابنَ ميمون عليُّ بنُ سهل الرملي، فرواه على الجادَّة، فقد أخرجه من طريقه ابن خزيمة (1849) عن الوليد، به بلفظ: "من أدرك من الصلاة ركعة فقد أدرك الصلاة". وانظر لزامًا التعليق على "سنن ابن ماجه" (1121).وأخرجه على الجادَّة مسلم (607) (162) من طريق عبد الله بن المبارك، والنسائي (1550) من طريق موسى بن أعين، كلاهما عن الأوزاعي، به.وخالفهما أبو المغيرة في إسناده دون متنه، فقال فيه: عن الأوزاعي، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، أخرجه من طريقه النسائي (1551)، ثم قال بإثره: لا نعلم أحدًا تابع أبا المغيرة على قوله: عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة، والصواب: عن أبي سلمة عن أبي هريرة. وأخرجه على الجادة أيضًا دون ذكر الجمعة: أحمد 12/ (7284)، ومسلم (607) (162)، وابن ماجه (1122)، والترمذي (524)، والنسائي (1753) و (1754) من طريق سفيان بن عيينة، والبخاري (580)، ومسلم (607) (161)، وأبو داود (1121)، والنسائي (1549)، وابن حبان (1483) من طريق مالك، وأحمد 14/ (8883)، ومسلم (607) (162)، والنسائي (1548)، وابن حبان (1485) من طريق عبيد الله بن عمر العمري، وأحمد 13/ (7665) و (7765)، ومسلم (607) (162) من طريق معمر، ومسلم أيضًا (607) (162) من طريق يونس، وابن حبان (1486) من طريق ثابت بن ثوبان، ستتهم عن الزهري، به. وقال يونس في روايته: "من أدرك ركعة من الصلاة مع الإمام … " فزاد فيها: "مع الإمام"، وقرن ثابت بن ثوبان بالزهري مكحولًا.وخالف الرواةَ عن ابن عيينة: محمدُ بنُ منصور الجوّاز، فرواه عنه عن الزهري، به، وقال فيه: "من أدرك من صلاة الجمعة ركعة فقد أدرك"، فشذّ بذلك، أخرجه عنه النسائي في "المجتبى" (1425).وأخرج أحمد 12/ (7460) و (7538)، وابن ماجه (700)، والنسائي (1515) من طريق معمر، عن الزهري، به: "من أدرك من العصر ركعة قبل أن تغرب الشمس فقد أدركها، ومن أدرك من الصبح ركعة قبل أن تطلع الشمس فقد أدركها".ونحوه أخرجه أحمد (7458)، والبخاري (556)، والنسائي (1516)، وابن حبان (1586) من طريق يحيى بن أبي كثير، وأحمد 14/ (8585) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، كلاهما عن أبي سلمة، عن أبي هريرة.وسلف الحديث على الجادة برقم (878) و (1025) من طريق زيد أبي عتاب وسعيد المقبري عن أبي هريرة مرفوعًا: "إذا جئتم ونحن سجود فاسجدوا ولا تعدوها شيئًا، ومن أدرك ركعة فقد أدرك الصلاة".ومن طريقين آخرين عن أبي هريرة بصلاة الصبح فقط سلف (1026) و (1027): "من صلى ركعة من الصبح ثم طلعت الشمس فليصل الصبح"، وفي الموضع الثاني: "فليتم صلاته".وانظر "العلل" للدارقطني (1730).وانظر الحديثين بعد هذا.وروي الحديث بذكر الجمعة من حديث عبد الله بن عمر، من رواية الزهري عن سالم عنه مرفوعًا عند ابن ماجه (1123) والنسائي (1552)، وإسناده ضعيف.وعن الزهري عن سالم مرسلًا عند النسائي (1553) ولفظه: "من أدرك ركعة من صلاة من الصلوات … "، وإسناده صحيح لولا إرساله.قال الإمام ابن خزيمة بإثر حديث أبي هريرة (1850) "من أدرك ركعة من صلاة الجمعة … " قال: هذا خبر روي على المعنى، لم يُؤدَّ على لفظ الخبر، ولفظ الخبر: "من أدرك من الصلاة ركعة"، فالجمعة من الصلاة أيضًا كما قاله الزهري، فإذا روي الخبر على المعنى لا على اللفظ جاز أن يقال: من أدرك من الجمعة ركعة، إذ الجمعة من الصلاة، فإذا قال النبي صلى الله عليه وسلم: "من أدرك من الصلاة ركعة فقد أدرك الصلاة" كانت الصلوات كلها داخلة في هذا الخبر، الجمعة وغيرها من الصلوات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1090)


1090 - حدثناه محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثنا أسامة بن زيد الليثي، عن ابن شِهاب، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أدركَ من الجمعة ركعةً فليُصلِّ إليها أخرى" [1].قال أسامة: وسمعتُ من أهل المجلس عن القاسم بن محمد وسالمٍ أنهما كانا يقولان ذلك.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমু'আর (সালাতের) একটি রাকাআত পেল, সে যেন তার সাথে আরেকটি রাকাআত আদায় করে।" উসামা বলেন: আমি মজলিসের লোকদের থেকে কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ ও সালিমের সূত্রে শুনেছি যে, তারা উভয়েও এরূপ বলতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده فيه ضعف، يحيى بن أيوب - وهو الغافقي - وشيخه أسامة بن زيد الليثي فيهما مقال وعندهما مناكير، وهذا منها لمخالفتهما في لفظه.وأخرجه ابن ماجه (1121) من طريق عمر بن حبيب، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبي سلمة وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. وهذا إسناد ضعيف، عمر بن حبيب متفق على ضعفه.وانظر ما قبله. فقد أخرجه ابن حبان (1487) من طريق أبي كامل الجَحدري، عن حماد بن زيد، عن مالك بن أنس وحده، بهذا الإسناد، ولفظه: "من أدرك من صلاة ركعة فقد أدرك".وأخرجه كذلك البخاري (580)، ومسلم (607) (161)، وأبو داود (1121)، والنسائي (1549)، وابن حبان (1483) من طرق عن مالك وحده، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1091)


1091 - حدَّثَناه علي بن حَمْشَاذ، حدثنا هشام بن علي، حدثنا عبد الله بن عبد الوهَّاب الحَجَبيُّ، حدثنا حماد بن زيد، عن مالك بن أنس وصالح بن أبي الأخضر، عن الزُّهْري، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من أدركَ من الجمعة ركعةً، فليصلِّ إليها أخرى" [1]. كُلُّ هؤلاء الأسانيد الثلاثة صِحاح على شرط الشيخين! ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتفقا على حديث الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَنْ أدرك من الصَّلاة ركعةً" و"مَنْ أدرك من صلاةِ العصر ركعةً" [2].ولمسلم فيه الزيادة: "فقد أدركها كُلَّها" فقط [3].




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুম্মার এক রাকআতও পেল, সে যেন তার সাথে আরেকটি রাকআত পড়ে নেয়।" [১]। এই তিনটি সনদই শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ! কিন্তু তারা এই শব্দে এটি বর্ণনা করেননি। বরং তারা যুহরি, আবূ সালামা, আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এই হাদীসটির উপর একমত হয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের এক রাকআত পেল" এবং "যে ব্যক্তি আসরের সালাতের এক রাকআত পেল।" [২]। আর মুসলিম-এর বর্ণনায় অতিরিক্ত অংশ রয়েছে: "তাহলে সে পুরো সালাতটিই পেল।" [৩]।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من جهة صالح بن أبي الأخضر، وهذا اللفظ له كما صرَّح بذلك الدارقطني في "العلل" (1730)، أما لفظ مالك بن أنس فقد جاء على الجادة بدون ذكر الجمعة كما يأتي في مصادر التخريج. فقد أخرجه ابن حبان (1487) من طريق أبي كامل الجَحدري، عن حماد بن زيد، عن مالك بن أنس وحده، بهذا الإسناد، ولفظه: "من أدرك من صلاة ركعة فقد أدرك".وأخرجه كذلك البخاري (580)، ومسلم (607) (161)، وأبو داود (1121)، والنسائي (1549)، وابن حبان (1483) من طرق عن مالك وحده، به.



[2] سبق تخريجها.



1091 [3] - مسلم برقم (607) (162) في طريق عبيد الله بن عمر العمري عن الزهري عن أبي سلمة عن أبي هريرة، بلفظ: "فقد أدرك الصلاة كلها".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1092)


1092 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا عَمرو بن خالد الحرَّاني، حدثنا زهير، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحْوَص، عن عبد الله، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال لِقومٍ يتخلفون عن الجمعة: "لقد هَمَمْتُ أن آمُرَ رجلًا يصلي بالناس، ثم أُحرِّقَ على قومٍ يتخلفون عن الجمعة بُيوتَهم" [1].وهكذا رواه أبو داود الطيالسي عن زهير [2]، وهو صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه هكذا، إنما خرَّجاه بذكر العَتَمة وسائر الصلوات [3].




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর সালাত থেকে অনুপস্থিত থাকা একদল লোক সম্পর্কে বলেছেন: “আমি সংকল্প করেছি যে, আমি একজনকে লোকদের নিয়ে সালাত আদায়ের নির্দেশ দেবো, অতঃপর জুমু‘আর সালাত থেকে পিছিয়ে থাকা লোকদের ওপর তাদের ঘরবাড়ি জ্বালিয়ে দেবো।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 6/ (3816) و 7/ (4007)، ومسلم (652) من طرق عن زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 6/ (3743) من طريق إسرائيل بن يونس، و 7/ (4295) و (4297) من طريق معمر بن راشد، كلاهما عن أبي إسحاق السبيعي، به. إلّا أنَّ رواية إسرائيل مطلقة لم يقيدها بالجمعة، ورغم أنَّ رواية إسرائيل عن جده أبي إسحاق في غاية الإتقان لملازمته إياه، إلّا أنَّ زهيرًا ومعمرًا قد تابعهما غير واحد على ذكر الجمعة كسفيان الثوري والرحيل بن معاوية أخي زهير، انظر تفصيل ذلك في تعليقنا على "مسند أحمد" (3743)، وانظر أحاديث الباب هناك.



[2] "مسند الطيالسي" (314).



1092 [3] - بل أخرجه مسلم هكذا بذكر الجمعة من طريق زهير بإسناد الحاكم ومتنه، كما مرَّ في التخريج، أما ما أخرجاه بذكر العتمة وسائر الصلوات فهو من حديث أبي هريرة عند البخاري (644) و (657)، ومسلم (651).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1093)


1093 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم المِصْري، حدثنا ابن أبي فُدَيك، حدثنا ابن أبي ذئب، عن أَسِيد بن أبي أَسِيد البَرَّاد، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن تَرَكَ الجُمعةَ ثلاثًا من غير ضَرورةٍ، طَبَعَ الله على قلبه" [1].




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি কোনো প্রয়োজন বা অপারগতা ব্যতীত তিনবার জুমু'আহ ত্যাগ করে, আল্লাহ তার অন্তরে মোহর মেরে দেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل أسيد بن أبي أسيد وابن أبي فُدَيك، أما ابن أبي فُدَيك - واسمه محمد بن إسماعيل بن أبي فديك - فمتابع. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ذئب.وهذا إسناد اختُلف فيه على أَسيد، فرواه ابن أبي ذئب وسليمان بن بلال وزهير بن معاوية عنه عن عبد الله بن أبي قتادة عن جابر، ورواه عبد العزيز الدراوردي عنه عن عبد الله بن أبي قتادة عن أبيه. ورجح الدارقطني في "العلل" (3263) رواية ابن أبي ذئب ومن تابعه، وقال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه 2/ 551: ابن أبي ذئب أحفظ من الدراوردي، وكأنه أشبه، وكأن الدراوردي لزم الطريق.وأخرجه ابن ماجه (1126)، والنسائي (1669) من طريق عبد الله بن وهب، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 22/ (14559)، وابن ماجه (1126) من طريق زهير بن معاوية، به.وسيأتي عند المصنف (3853) من طريق الدراوردي عن أسيد عن عبد الله بن أبي قتادة عن أبيه، ويأتي تخريجه من هذه الطريق هناك. وانظر ما بعده.وفي الباب عن أبي الجعد الضمري سلف برقم (1047) وإسناده حسن، وذكرنا شواهده هناك.قوله: "طبع الله على قلبه" أي: ختم عليه وغشاه ومنعه ألطافَه. "النهاية" لابن الأثير 3/ 112.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1094)


1094 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا ابن أبي أُوَيس، حدثني أخي، عن سليمان بن بلال، عن أَسِيد بن أبي أَسِيد، فذكره بنحوه [1].هذا حديث خرَّجت فيما تقدَّم من هذا الكتاب من حديث الثوري وغيره عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن عَبِيدَةَ بن سفيان الحَضْرمي، عن أبي الجَعْد الضَّمْري، وصححتُه على شرط مسلم، وهذا الشاهد العالي وجدتُه بعدُ.وله شاهدٌ آخر من حديث محمد بن عجلان صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه:




১ ০৯৪ - আমাদের সংবাদ দিয়েছেন আবু বকর ইবনু ইসহাক, তাঁকে সংবাদ দিয়েছেন আল-হাসান ইবনু আলী ইবনু যিয়াদ, তাঁদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী উওয়াইস, তিনি বলেন, আমার ভাই আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি সুলাইমান ইবনু বিলালের সূত্রে, তিনি উসাইদ ইবনু আবী উসাইদের সূত্রে এটি অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন। আমি এই কিতাবের পূর্বের অংশে এই হাদীসটি সাওরী এবং অন্যান্যদের হাদীস হিসেবে উদ্ধৃত করেছি, যা মুহাম্মাদ ইবনু আমর ইবনু আলকামা, তিনি উবাইদাহ ইবনু সুফইয়ান আল-হাদরামীর সূত্রে, তিনি আবুল জা'দ আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর আমি এটিকে মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ বলে প্রমাণ করেছি। এই উচ্চতর সানাদযুক্ত শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) আমি পরবর্তীতে পেয়েছি। এর আরও একটি সমর্থক বর্ণনা রয়েছে যা মুহাম্মাদ ইবনু আজলানের হাদীস, এটিও মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ। কিন্তু তাঁরা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن كسابقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1095)


1095 - حدَّثَناه أبو القاسم عبد الله بن محمد الفقيه بنَيسابور، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا محمد بن بشار، حدثنا مَعْديُّ بن سليمان، حدثنا ابن عَجْلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ألا هل عسى أحدُكم أن يتخذَ الصُّبَّةَ من الغنم على رأس مِيلٍ أو مِيلَين، فيتعذَّرَ عليه الكَلأُ على رأس ميلٍ أو ميلينٍ، فيرتفعَ حتى تجيءَ الجمعةُ، فلا يَشهدُها حتى يُطبَع على قلبه" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! তোমাদের কেউ যেন এমন না হয় যে, সে এক বা দুই মাইল দূরে কিছু ছাগল-ভেড়ার দল রাখে। এরপর সেই এক বা দুই মাইল দূরত্বের মধ্যে ঘাস (খাদ্য) পেতে তার কষ্ট হয় এবং সে আরও দূরে চলে যায়। ফলে জুমু'আর সালাতের সময় আসে, আর সে তা (জুমু'আ) আদায় করে না, শেষ পর্যন্ত তার অন্তরে মোহর মেরে দেওয়া হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بمرَّةٍ من أجل معدي بن سليمان. ابن عجلان اسمه: محمد.وأخرجه ابن ماجه (1127) عن محمد بن بشار، بهذا الإسناد.وله شواهد عن جابر وابن عمر وحارثة بن النعمان مخرَّجة في التعليق على ابن ماجه، وكلها ضعيفة لا يعضد بعضها بعضًا.قوله: "الصُّبَّة من الغنم" قال ابن الأثير: أي: جماعة منها، وقد اختلف في عددها فقيل: ما بين العشرين إلى الأربعين من الضأن والمعز، وقيل: من المعز خاصة، وقيل: نحو الخمسين، وقيل: ما بين الستين إلى السبعين، والصبة من الإبل نحو خمس أو ست. وفي باب ترك الجمعة لعذر عن ابن عباس عند البخاري (901)، ومسلم (699)، وسلف في "المستدرك" برقم (1061).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1096)


1096 - حدثنا أبو بكر إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّيّ، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا أبو سَلَمة التَّبُوذكي، حدثنا ناصِح بن العلاء، حدثني عمار بن أبي عمار، قال: مررتُ بعبد الرحمن بن سَمُرة يوم الجمعة وهو على نهرٍ يُسيِّل الماءَ مع غِلمانِه ومَوالِيهِ، فقلت له: يا أبا سعيدٍ، الجمعةَ! فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا كان مطرٌ وابلٌ، فصلُّوا في رِحالِكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وناصح بن العلاء هذا بصريٌّ ثقة، إنما المطعونُ فيه ناصحٌ أبو عبد الله المُحَلِّميّ الكوفي، فإنه روى عن سِماك بن حَرْب المناكير.




আবদুর রহমান ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার ইবনে আবি আমার বলেন: আমি জুমার দিন আবদুর রহমান ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, তখন তিনি একটি নদীর কাছে তাঁর গোলাম ও ভৃত্যদের সাথে পানি প্রবাহিত করছিলেন। আমি তাঁকে বললাম, হে আবু সাঈদ! জুমার দিন (জুমআর সালাতের সময় হয়েছে)! তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি মুষলধারে বৃষ্টিপাত হয়, তবে তোমরা তোমাদের বাসস্থানেই সালাত আদায় করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل ناصح بن العلاء، فهو مختلَف فيه. أبو سلمة التبوذكي: هو موسى بن إسماعيل، ومحمد بن إدريس: هو أبو حاتم الرازي الحافظ.وأخرجه أحمد 34/ (20620)، وابنه عبد الله (20621) من طريقين عن ناصح، بهذا الإسناد. وفي باب ترك الجمعة لعذر عن ابن عباس عند البخاري (901)، ومسلم (699)، وسلف في "المستدرك" برقم (1061).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1097)


1097 - أخبرني يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أبو بكر محمد بن النضر الجارُودي، حدثنا نصر بن علي الجَهْضَمي، حدثنا سفيان بن حَبِيب، عن خالد الحذَّاء، عن أبي قِلابة، عن أبي المَلِيح، عن أبيه: أنه شَهِدَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم زمنَ الحُديبية وأصابهم مطرٌ في يوم جمعةٍ لم يَبُلَّ أسفلَ نِعالِهم، فأمرَهم النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يُصلُّوا في رِحالِهم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، وقد احتجَّ الشيخان برواته، وهو من النوع الذي طلبوا المتابِع فيه للتابعي عن الصحابي [2]، ولم يُخرجاه.




উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হুদায়বিয়ার সময়কালে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছিলেন। জুমুআর দিনে তাদের উপর বৃষ্টি বর্ষিত হয়েছিল, যা তাদের জুতার নিচের অংশও ভেজাতে পারেনি। এরপরও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নির্দেশ দিলেন যেন তারা তাদের অবস্থানস্থলে (ঘরে) সালাত আদায় করে নেয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح إن كان سفيان بن حبيب سمع هذا الحديث من خالد - وهو ابن مهران - الحذاء، فقد أخرجه أبو داود (1059) عن نصر بن علي الجهضمي، عن سفيان بن حبيب قال: خُبِّرنا عن خالد الحذاء. قلنا: لكن خالف أبا داود أبو بكر محمدُ بن النضر الجارودي كما هو هنا، وابن خزيمة في "صحيحه" (1863)، ويوسف بن يعقوب القاضي عند البيهقي 3/ 186، فقالوا جميعًا: سفيان بن حبيب عن خالد الحذاء. وقد ثبت سماع سفيان من خالد، ثم هو متابع.أبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرمي، وأبو المليح: هو ابن أسامة بن عمير الهذلي.وأخرجه أحمد 34/ (20704) و (20705) من طريق سفيان الثوري، و (20707)، وابن ماجه (936) من طريق إسماعيل ابن علية، وابن حبان (2079) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، ثلاثتهم عن خالد بن مهران الحذاء، بهذا الإسناد. وذكر بعضهم في قصة، ولم يذكروا جميعهم أنَّ ذلك كان يوم الجمعة.وأخرجه أحمد 33/ (20280) من طريق أبي بشر الحلبي، عن أبي المليح، به. وذكر أنَّ ذلك كان يوم الجمعة، لكن لم يذكر زمنه في الحديبية أو في حنين.وأخرجه أحمد 34/ (20700) و (20702) و (20703) و (20711) و (20713) و (20715) و (20720)، وأبو داود (1057)، والنسائي (929)، وابن حبان (2081) و (2083) من طرق (همام وشعبة وأبان وسعيد) عن قتادة بن دعامة السدوسي، عن أبي المليح، به. واختُلف فيه على شعبة، فقال عبد الله بن المبارك عنه عن قتادة عند ابن حبان (2083) أنَّ ذلك كان زمن الحديبية، وقال بهز ويحيى بن سعيد عنه عن قتادة كسائر الرواة عن قتادة: أنَّ ذلك كان يوم حنين. وأخرج أبو داود (1058) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن صاحب له، عن أبي مليح: أن ذلك كان يوم جمعة. وهذا إسناد ضعيف لإبهام صاحب سعيد.وفي باب ترك الجمعة لعذر انظر ما قبله.وفي باب ترك الجماعة بشكل عام لعذر عن ابن عمر عند البخاري (632) و (666)، ومسلم (697)، وذكرنا سائر شواهده عند الحديث (4478) من "مسند أحمد".



[2] تقدم تعقيبنا على كلامه هذا عند الحديث رقم (97). وأخرجه البخاري (911) من طريق مخلد بن يزيد، عن ابن جريج، به. فاستدراك الحاكم له عليهما ذهول منه.وأخرجه أحمد 8/ (4659) و (4874) و 9/ (5046) و 10/ (6024) و (6062)، والبخاري (6269) و (6270)، ومسلم (2177) (27) و (28)، والترمذي (2749)، وابن حبان (586) و (587) من طرق عن نافع، به. ولم يذكروا فيه قوله: إنا في الجمعة، إلى آخره، وزاد بعضهم في آخره: ولكن تفسحوا وتوسعوا.وأخرجه أحمد 9/ (5625)، ومسلم (2177) (29)، والترمذي (2750) من طريق الزهري، عن سالم، عن ابن عمر. وزاد سالم في آخره: وكان ابن عمر إذا قام له رجل عن مجلسه، لم يجلس فيه.وأخرج أحمد 9/ (5567)، وأبو داود (4828) من طريق عقيل بن طلحة قال: سمعت أبا الخصيب قال: كنت قاعدًا، فجاء ابن عمر، فقام رجل من مجلسه له، فلم يجلس فيه وقعد في مكان آخر، فقال الرجل: ما كان عليك لو قعدت؟ فقال: لم أكن أقعد في مقعدك ولا مقعد غيرك بعد شيء شهدته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام له رجل من مجلسه فذهب ليجلس فيه، فنهاه رسول الله صلى الله عليه وسلم.لفظ أحمد، واقتصر أبو داود على المرفوع فقط. وهذا إسناد فيه ضعف لجهالة حال أبي الخصيب.وفي الباب عن أبي هريرة، وأبي سعيد الخدري، وأنس بن مالك، وجابر بن عبد الله، والبراء بن عازب، وعائشة أم المؤمنين، انظر التعليق على "المسند" (4659).ونزيد عليها هنا: عن أبي بكرة، وسيأتي في "المستدرك" برقم (7906).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1098)


1098 - أخبرنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تمِيم الحنظليُّ ببغداد، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عمر بن عطاء بن أبي الخُوَار: أنَّ نافع بن جُبير أرسله إلى السائب بن يزيد ليسأله عن شيءٍ رآه منه معاوية، فقال: صليتُ معه في المقصورة فقمتُ لأصلِّيَ في مكاني، فقال: لا تصلِّ حتى تمضيَ أمام ذلك أو تَكَلَّمَ، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أَمَرَنا بذلك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (নাফে' ইবনু জুবাইর আমাকে মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক তাঁর (সা'ইব-এর) থেকে দেখা কোনো বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে সা'ইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রেরণ করলে) সা'ইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তাঁর (মু'আবিয়াহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) সাথে মাকসুরাহতে (মসজিদের সংরক্ষিত অংশে) সালাত আদায় করলাম। অতঃপর আমি আমার নিজ স্থানে দাঁড়িয়ে অতিরিক্ত সালাত (সুন্নাত বা নফল) আদায় করতে প্রস্তুত হলাম। তখন তিনি (মু'আবিয়াহ্) বললেন: তুমি ঐ স্থান থেকে সামনে না যাওয়া পর্যন্ত অথবা (কারও সাথে) কথা না বলা পর্যন্ত (অন্য কোনো) সালাত আদায় করো না। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এই নির্দেশই দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل.وأخرجه أحمد 28/ (16866) و (16913)، ومسلم (883)، وأبو داود (1129) من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد. وذكروا جميعهم في رواياتهم: أنَّ تلك الصلاة كانت صلاة الجمعة. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. وأخرجه البخاري (911) من طريق مخلد بن يزيد، عن ابن جريج، به. فاستدراك الحاكم له عليهما ذهول منه.وأخرجه أحمد 8/ (4659) و (4874) و 9/ (5046) و 10/ (6024) و (6062)، والبخاري (6269) و (6270)، ومسلم (2177) (27) و (28)، والترمذي (2749)، وابن حبان (586) و (587) من طرق عن نافع، به. ولم يذكروا فيه قوله: إنا في الجمعة، إلى آخره، وزاد بعضهم في آخره: ولكن تفسحوا وتوسعوا.وأخرجه أحمد 9/ (5625)، ومسلم (2177) (29)، والترمذي (2750) من طريق الزهري، عن سالم، عن ابن عمر. وزاد سالم في آخره: وكان ابن عمر إذا قام له رجل عن مجلسه، لم يجلس فيه.وأخرج أحمد 9/ (5567)، وأبو داود (4828) من طريق عقيل بن طلحة قال: سمعت أبا الخصيب قال: كنت قاعدًا، فجاء ابن عمر، فقام رجل من مجلسه له، فلم يجلس فيه وقعد في مكان آخر، فقال الرجل: ما كان عليك لو قعدت؟ فقال: لم أكن أقعد في مقعدك ولا مقعد غيرك بعد شيء شهدته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام له رجل من مجلسه فذهب ليجلس فيه، فنهاه رسول الله صلى الله عليه وسلم.لفظ أحمد، واقتصر أبو داود على المرفوع فقط. وهذا إسناد فيه ضعف لجهالة حال أبي الخصيب.وفي الباب عن أبي هريرة، وأبي سعيد الخدري، وأنس بن مالك، وجابر بن عبد الله، والبراء بن عازب، وعائشة أم المؤمنين، انظر التعليق على "المسند" (4659).ونزيد عليها هنا: عن أبي بكرة، وسيأتي في "المستدرك" برقم (7906).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1099)


1099 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لا يُقِمْ أحدُكم أخاه من مجلِسِه، ثم يَخلُفه فيه"، فقلت له: إنا في يوم الجمعة، قال: في يوم الجمعة وغيرها [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بزيادة ذكر الجمعة!آخر كتاب الجمعة ‌‌من كتاب صلاة العيدين




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন তার ভাইকে তার বসার স্থান থেকে উঠিয়ে না দেয়, আর সে যেন সেখানে তার স্থলাভিষিক্ত না হয়।" আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: আমরা তো জুমার দিনে আছি। তিনি বললেন: জুমার দিনে এবং অন্য দিনগুলোতেও (এই নিষেধাজ্ঞা প্রযোজ্য)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 10/ (6371).وأخرجه مسلم (2177) (28) عن محمد بن رافع، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (911) من طريق مخلد بن يزيد، عن ابن جريج، به. فاستدراك الحاكم له عليهما ذهول منه.وأخرجه أحمد 8/ (4659) و (4874) و 9/ (5046) و 10/ (6024) و (6062)، والبخاري (6269) و (6270)، ومسلم (2177) (27) و (28)، والترمذي (2749)، وابن حبان (586) و (587) من طرق عن نافع، به. ولم يذكروا فيه قوله: إنا في الجمعة، إلى آخره، وزاد بعضهم في آخره: ولكن تفسحوا وتوسعوا.وأخرجه أحمد 9/ (5625)، ومسلم (2177) (29)، والترمذي (2750) من طريق الزهري، عن سالم، عن ابن عمر. وزاد سالم في آخره: وكان ابن عمر إذا قام له رجل عن مجلسه، لم يجلس فيه.وأخرج أحمد 9/ (5567)، وأبو داود (4828) من طريق عقيل بن طلحة قال: سمعت أبا الخصيب قال: كنت قاعدًا، فجاء ابن عمر، فقام رجل من مجلسه له، فلم يجلس فيه وقعد في مكان آخر، فقال الرجل: ما كان عليك لو قعدت؟ فقال: لم أكن أقعد في مقعدك ولا مقعد غيرك بعد شيء شهدته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام له رجل من مجلسه فذهب ليجلس فيه، فنهاه رسول الله صلى الله عليه وسلم.لفظ أحمد، واقتصر أبو داود على المرفوع فقط. وهذا إسناد فيه ضعف لجهالة حال أبي الخصيب.وفي الباب عن أبي هريرة، وأبي سعيد الخدري، وأنس بن مالك، وجابر بن عبد الله، والبراء بن عازب، وعائشة أم المؤمنين، انظر التعليق على "المسند" (4659).ونزيد عليها هنا: عن أبي بكرة، وسيأتي في "المستدرك" برقم (7906).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1100)


1100 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري.وأخبرنا بكر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا أبو قِلابة الرَّقَاشي.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حمْشَاذ وعبد الله بن الحسين القاضي، قالوا: حدثنا الحارث بن أبي أسامة؛ قالوا: حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ثوَّاب بن عُتبة [1]، عن عبد الله بن بُريدَة، عن أبيه، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يخرجُ يومَ الفِطر حتى يَطعَمَ، ولا يَطعَمُ يومَ النَّحر حتى يَرجِع [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وثوَّابُ بن عُتبة المَهْري قليل الحديث، ولم يُجرَح بنوع يَسقُط به حديثُه.وهذه سُنَّة عزيزةٌ من طريق الرواية، مستفيضةٌ في بلاد المسلمين.




বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল ফিতরের দিন কিছু না খেয়ে (সালাতের জন্য) বের হতেন না, আর ঈদুল আযহার দিন তিনি (সালাত থেকে) ফিরে না আসা পর্যন্ত খেতেন না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز) و (ب): ثواب بن عبيد الله، في الموضعين، وصحح عليها في الموضع الأول في (ز)، والصواب ما أثبتنا من (ص) و (ع) و"إتحاف المهرة" 3/ 571. الحديث، وهو في "الصحيح".وعن أبي سعيد الخدري عند أحمد 17/ (11226)، وإسناده حسن، وذكرنا تتمة شواهده هناك.



[2] إسناده حسن من أجل ثوَّاب بن عتبة. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل.وأخرجه ابن ماجه (1756) عن محمد بن يحيى الذهلي، عن أبي عاصم النبيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 38/ (22983) و (23042)، والترمذي (542)، وابن حبان (2812) من طرق عن ثواب بن عتبة، به. وقال الترمذي: حديث غريب. ونقل عن البخاري قوله: لا أعرف لثوّاب بن عتبة غير هذا الحديث. قلنا: ووقع عند بعضهم: لم يأكل حتى يذبح، وعند البعض: حتى ينحر، بدلًا من قوله حتى يرجع.وأخرجه أحمد 38/ (22984) من طريق عقبة بن عبد الله الرفاعي، عن عبد الله بن بريدة، به. ولفظه: ولا يأكل يوم الأضحى حتى يرجع فيأكل من أضحيّته. وهكذا رواه عن عقبة غير واحد من الثقات، وانفرد الوليد بن مسلم فيما أخرجه البيهقي في "السنن" 3/ 283 فرواه عن ابن مهدي عن عقبة بلفظ: أَكل من كَبِد أضحيّته؛ وعقبة هذا ضعيف صاحب مناكير، والراوي عنه هكذا وقع مسمًّى عند البيهقي: ابن مهدي، وظاهره أنه عبد الرحمن بن مهدي، لكن الوليد بن مسلم لا يعرف بالرواية عنه، وهو - أي: عبد الرحمن - أصغر طبقةً من الوليد، أما الوليد فمشهور بالتدليس، ومن شيوخه أبو مهدي، واسمه سعيد بن سنان الحمصي، وهذا متروك الحديث، فنخشى أن يكون هذا هو صاحب الحديث دلّسه الوليد، والله تعالى أعلم.وفي باب أكل النبي صلى الله عليه وسلم يوم الفطر قبل الخروج إلى الصلاة، عن أنس بن مالك، سيأتي بعد هذا الحديث، وهو في "الصحيح".وعن أبي سعيد الخدري عند أحمد 17/ (11226)، وإسناده حسن، وذكرنا تتمة شواهده هناك.