হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1181)


1181 - أخبرني أبو الحسين محمد بن أحمد بن تمِيم القَنْطَري، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا يحيى بن إسحاق السَّيْلَحِينيّ، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن ثابت البُنانيّ، عن عبد الله بن رَبَاح، عن أبي قَتادةَ: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم مَرَّ بأبي بكرٍ وهو يصلي يَخفِضُ من صوته، ومَرَّ بعُمر وهو يصلي رافعًا صوتَه، فلما اجتمعا عند النبي صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر: "يا أبا بكر، مررتُ بكَ وأنتَ تصلي تخفِضُ من صوتك! " قال: قد أسمعتُ من ناجيتُ، فقال: "مررتُ بكَ يا عمر وأنت تَرفعُ صوتك! " قال: يا رسول الله أحتسِبُ به أُوقظُ الوَسْنان، قال: فقال لأبي بكر: "ارفَعْ من صوتك شيئًا"، وقال لعمر: "اخفِضْ من صوتك" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন এবং নিজের কণ্ঠস্বর নিচু রাখছিলেন। আর তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন এবং তাঁর কণ্ঠস্বর উঁচু রাখছিলেন। অতঃপর তাঁরা যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একত্রিত হলেন, তখন তিনি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে আবূ বাকর, আমি তোমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, আর তুমি সালাত আদায় করছিলে তোমার কণ্ঠস্বর নিচু রেখে!" তিনি বললেন: আমি যার সাথে ফিসফিস করে কথা বলছিলাম (আল্লাহর সাথে), তাকে শুনিয়েছি। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উমার, আমি তোমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, আর তুমি তোমার কণ্ঠস্বর উঁচু রেখেছিলে!" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এর দ্বারা আমি নেকি লাভের আশা করি এবং ঘুমন্ত ব্যক্তিকে জাগিয়ে তুলি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমার কণ্ঠস্বর কিছুটা উঁচু করো।" এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমার কণ্ঠস্বর নিচু করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير شيخ المصنف، فهو حسن الحديث في المتابعات، وقد توبع. إلّا أنه اختُلف في وصله وإرساله، فقد خالف يحيى بن إسحاق السيلحيني موسى بنُ إسماعيل، فقد رواه عن حماد بن سلمة عن ثابت البناني عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، ورجح المرسلَ الترمذي وابن أبي حاتم.وأخرجه أبو داود (1329) عن الحسن بن الصباح، والترمذي (447) عن محمود بن غيلان، وابن حبان (733) من طريق محمد بن عبد الرحيم صاحب السابري، ثلاثتهم عن يحيى بن إسحاق السيلحيني، بهذا الإسناد. قال الترمذي: هذا حديث غريب، وإنما أسنده يحيى بن إسحاق عن حماد، وأكثر الناس إنما رووا هذا الحديث عن ثابت عن عبد الله بن رباح مرسلًا.قلنا: لم نقع إلى الآن على من رواه مرسلًا غير موسى بن إسماعيل، فقد رواه أبو داود (1329) عنه، عن حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن النبي صلى الله عليه وسلم. هكذا لم يذكر ابن رباح ولا أبا قتادة. لكن تابع الترمذيَّ على ما ذهب إليه أبو حاتم الرازي، فقال - كما في "العلل" لابنه (327) -: الصحيح عن عبد الله بن رباح: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم … مرسلًا، أخطأ فيه السالحيني.وله شاهد من حديث أبي هريرة عند أبي داود (1330)، وإسناده حسن.وآخر من حديث علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (865)، وإسناده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1182)


1182 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدلُ، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا محمد بن رافع ومحمد بن يحيى، قالا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن إسماعيل بن أمية، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد الخُدْري قال: اعتكف النبي صلى الله عليه وسلم في المسجد، فسَمِعهم يَجهَرون بالقراءة، وهو في قُبَّةٍ له، فكَشَفَ السُّتور وقال: "ألا كلُّكم يناجي ربَّه، فلا يُؤذِينَّ بعضُكم بعضًا، ولا يَرفَعنَّ بعضُكم على بعضٍ في القراءة في الصلاة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ইতিকাফ করছিলেন। তিনি তাঁর তাঁবুর (কুবা) ভেতরে থাকা অবস্থায় মুসল্লিদের উচ্চস্বরে কিরাত পাঠ শুনতে পেলেন। তিনি পর্দা সরিয়ে বললেন: "সাবধান! তোমরা প্রত্যেকেই নিজ নিজ রবের সাথে একান্তে কথা বলছো। সুতরাং তোমাদের কেউ যেন অন্যদের কষ্ট না দেয় এবং তোমাদের কেউ যেন সালাতের মধ্যে কিরাত পড়ার সময় একে অপরের উপর আওয়াজ উঁচু না করে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. الحسين بن محمد بن زياد: هو القباني، ومحمد بن رافع: هو ابن أبي زيد النيسابوري، ومحمد بن يحيى: هو الذهلي، وإسماعيل بن أمية: هو ابن عمرو بن سعيد الأموي.وأخرجه النسائي (8038) عن محمد بن رافع وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 18/ (11896)، وأبو داود (1232) من طريق عبد الرزاق، به.وفي الباب عن ابن عمر عند أحمد 8/ (4928)، وإسناده صحيح.وعن البياضي عند أحمد 31/ (19022)، والنسائي (8037)، وهو صحيح، وانظر الكلام عليه في "المسند".وعن علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (663)، وإسناده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1183)


1183 - حدثنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أبو بكر محمد بن محمد بن رجاء بن السِّنْدي، حدثنا أبو كُرَيب وموسى بن عبد الرحمن المَسْروقي، قالا: حدثنا الحسين بن علي الجُعْفي، حدثنا زائدة، عن سليمان، عن حَبِيب بن أبي ثابت، عن عَبْدة بن أبي لُبابة، عن سُوَيد بن غَفَلَة، عن أبي الدَّرْداء، يَبلُغ به النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "من أَتى فِراشَه وهو يَنْوي أن يقومَ بالليل فغَلَبتْه عينُه حتى يُصبحَ، كُتب له ما نَوَى، وكان نومُه صدقةً عليه من ربِّه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، والذي عندي أنهما علَّلاه بتوقيفٍ رُوِيَ عن زائدة:




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত পৌঁছান যে, তিনি (নবী) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার বিছানায় আসে এই নিয়তে যে সে রাতে (সালাতের জন্য) উঠবে, কিন্তু ঘুম তাকে কাবু করে ফেলে এবং সে ভোর হওয়া পর্যন্ত ঘুমিয়ে থাকে, তার জন্য সে যা নিয়ত করেছিল তা লেখা হয় এবং তার এই ঘুম তার রবের পক্ষ থেকে তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، إلّا أنه قد وقع اضطراب في إسناده، واختلف في رفعه ووقفه، وصحَّح الدارقطني وقفه. أبو كريب: هو محمد بن العلاء، وزائدة: هو ابن قدامة، وسليمان: هو ابن مهران الأعمش.وأخرجه ابن ماجه (1344)، والنسائي (1463) عن هارون بن عبد الله الحمال، عن الحسين بن علي الجعفي، بهذا الإسناد.وأخرج ابن حبان (2588) من طريق مسكين بن بكير، عن شعبة، عن عبدة بن أبي لبابة، عن سويد بن غفلة: أنه عاد زر بن حبيش في مرضه، فقال: قال أبو ذر أو أبو الدرداء - شك شعبة - قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما من عبد يحدِّث نفسه بقيام ساعة من الليل، فينام عنها، إلّا كان نومه صدقة تصدق الله بها عليه، وكتب له أجر ما نوى".وانظر تتمة تخريجه وبيان الخلاف في إسناده في عملنا على "سنن ابن ماجه".وسيأتي بعده من طريق معاوية بن عمرو عن زائدة، بهذا الإسناد إلى أبي الدرداء من قوله، موقوفًا عليه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1184)


1184 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، فذكره بإسناده من قول أبي الدَّرْداء [1].وهذا مما لا يُوهِن، فإنَّ الحسين بن علي الجُعْفي أقدمُ وأحفظُ وأعرفُ بحديث زائدة من غيره، والله أعلم.




১১৪৮ - আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবু বকর ইবন ইসহাক, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন মুহাম্মদ ইবন আহমাদ ইবনুন-নাদ্ব্‌র, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মু'আবিয়া ইবন আমর, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন যায়েদাহ, অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ তা আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি থেকে উল্লেখ করেছেন। আর এটা দুর্বলকারী বিষয় নয়। কারণ হুসাইন ইবন আলী আল-জু'ফি অন্যদের তুলনায় যায়েদাহ্‌র হাদীস সম্পর্কে অধিক পুরাতন, অধিক মুখস্থকারী এবং অধিক জ্ঞাত। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، وسلف قبله مرفوعًا، وقال الدارقطني في "العلل" 6/ 207: والمحفوظ الموقوف.وأخرجه النسائي (1464) عن سويد بن نصر، عن عبد الله بن المبارك، عن سفيان الثوري، عن عبدة، عن سويد بن غفلة، عن أبي ذر أو أبي الدرداء، موقوفًا. ثم أعاد الإسناد عينه، إلّا أنَّ ابن المبارك قال: سفيان بن عيينة، بدلًا من الثوري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1185)


1185 - حدثنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا محمد بن محمد بن رجاء، حدثنا موسى بن عبد الرحمن، حدثنا حسين بن علي عن زائدة، عن هشام بن حسّان، عن محمد بن سِيرين، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تخُصُّوا يومَ الجمعة بصيام من بين الأيام، ولا تخُصُّوا ليلةَ الجمعة بقيامٍ من بين الليالي" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অন্য দিনগুলো থেকে কেবল জুমু'আর দিনকে রোযা রাখার জন্য বিশেষভাবে নির্দিষ্ট করো না, আর অন্য রাতগুলো থেকে জুমু'আর রাতকে (ইবাদতের উদ্দেশ্যে) কিয়াম করার জন্য বিশেষভাবে নির্দিষ্ট করো না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. موسى بن عبد الرحمن: هو ابن سعيد المسروقي، وحسين بن علي: هو الجعفي، وزائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه ابن حبان (3612) و (3613) عن محمد بن إسحاق بن خزيمة، عن موسى بن عبد الرحمن المسروقي، بهذا الإسناد.وأخرجه مسلم (1144) (148)، والنسائي (2764) و (2768) من طريقين عن حسين بن علي الجعفي، به. وزادا في آخره: "إلّا أن يكون في صوم يصومه أحدكم". فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرج أحمد 15/ (9127) من طريق عوف بن أبي جميلة، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يفرد يوم الجمعة بصوم.وأخرج أحمد 16/ (10424)، والبخاري (1985)، ومسلم (1144) (147)، وأبو داود (2420)، والترمذي (743)، وابن ماجه (1723)، والنسائي (2769)، وابن حبان (3614) من طريق أبي صالح ذكوان السمان، والنسائي (2770) من طريق مجاهد بن جبر، كلاهما عن أبي هريرة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يصومن أحدكم يوم الجمعة، إلّا يومًا قبله أو بعده".وأخرج أحمد 15/ (9284) من طريق همام عن قتادة، قال: حدثنا صاحب لنا عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه نهى عن صوم يوم الجمعة إلّا في صوم متتابع.وأخرج أحمد 12/ (7388) و 13/ (7839)، والنسائي (2757)، وابن حبان (3609) من طريق عبد الله بن عمرو القاري، وأحمد 14/ (8772) و 15/ (9467)، والنسائي (3610) من طريق رجل من بني الحارث يقال له: أبو الأوبر، وأحمد 15/ (9097)، والنسائي (2763) من طريق محمد بن جعفر المخزومي، ثلاثتهم عن أبي هريرة، قال: ما أنا نهيتُ عن صيام يوم الجمعة، محمدٌ نهى عنه ورب الكعبة. وذكر في رواية المخزومي وأبي الأوبر لذلك قصة. ولم يسم النسائي في روايته المخزومي، وإنما قال: فلان بن جعفر المخزومي.وسيأتي في "المستدرك" (1612) من طريق عامر بن لدين الأشعري عن أبي هريرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يوم الجمعة عيد، فلا تجعلوا يوم عيدكم يوم صيامكم، إلّا أن تصوموا قبله أو بعده".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1186)


1186 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا شُعَيب بن الليث بن سعد، حدثنا الليث.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبيد بن عبد الواحد، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، عن محمد بن عَجْلان، عن أبي إسحاق الهَمْداني، عن عمرو بن أَوس [1] الثقفي، عن عَنْبَسة بن أبي سفيان، عن أخته أُم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من صلّى ثنتي عشرةَ ركعةً في يوم، بنى اللهُ له بيتًا في الجنة: أربعَ ركعاتٍ قبل الظُّهر، وركعتين بعد الظُّهر، وركعتين قبل العصر، وركعتين بعد المغرب، وركعتين قبل الصُّبح" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি দিনে বারো রাকাত সালাত আদায় করবে, আল্লাহ্ তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর তৈরি করবেন। (সালাতগুলো হলো:) যুহরের পূর্বে চার রাকাত, যুহরের পরে দুই রাকাত, আসরের পূর্বে দুই রাকাত, মাগরিবের পরে দুই রাকাত এবং ফজরের পূর্বে দুই রাকাত।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أويس، والصواب ما أثبتنا كما في مصادر ترجمته ومصادر التخريج، ووقع في (ص): بن أبي أُويس، وهو خطأ. وأخرجه أحمد 44/ (26774) من طريق خالد بن يزيد، والنسائي (1473) من طريق ابن جريج، كلاهما عن عطاء بن أبي رباح، عن عنبسة، به. وهذا إسناد منقطع، كما قال النسائي: عطاء بن أبي رباح لم يسمعه من عنبسة. ورغم أنه قد وقع التصريح بالتحديث في "مسند أحمد" إلّا أنه ربما يكون خطأً من بعض الرواة، بدليل ما أخرجه النسائي (1472) من طريق ابن جريج قال: قلت لعطاء: بلغني أنك تركع قبل الجمعة اثنتي عشرة ركعة، أبلغك في ذلك خبر؟ فقال: أخبرتْ أمُّ حبيبة عنبسةَ بنَ أبي سفيان، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره.وما أخرجه النسائي أيضًا (1487) من طريق معقل بن عبيد الله الجزري، عن عطاء قال: أُخبِرتُ أنَّ أم حبيبة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره.وقد صرَّح محمد بن سعيد الطائفي باسم الواسطة بين عطاء وعنبسة، فيما أخرجه النسائي (493) و (1474) من طريقه عن عطاء، عن يعلى بن أمية، عن عنبسة، به.وأخرجه النسائي (1475) من طريق أبي يونس القشيري، عن عطاء، عن شهر بن حوشب، عن أم حبيبة، مرفوعًا.ورواه عاصم بن أبي النجود، عن أبي صالح ذكوان السمان، عن أم حبيبة، واختلف عليه في رفعه ووقفه:فقد أخرجه أحمد 44/ (26768) و 45/ (27411)، والنسائي (1481) من طريق حماد بن زيد، عن عاصم بن أبي النجود، عن أبي صالح، عن أم حبيبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.وتابع حمادَ بنَ زيد حمادُ بنُ سلمة، واختُلف عليه، فقد رواه سويد بن عمرو - كما عند النسائي (1492) - عنه، عن عاصم، به، فرفعه.ورواه النضر بن شميل - كما عند النسائي في "المجتبى" (1810) - عنه، عن عاصم، عن أبي صالح، عن أم حبيبة قولها، فذكره موقوفًا.وأخرجه ابن ماجه (1140)، والترمذي (414)، والنسائي (1471) و (1488)، من طريق المغيرة بن زياد، عن عطاء، عن عائشة، مرفوعًا. وهذا إسناد ضعيف، قال الترمذي: حديث غريب من هذا الوجه، ومغيرة بن زياد قد تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه. وقال النسائي: هذا خطأ، ولعله أراد عنبسة بن أبي سفيان، فصحفه. ونحوه قال الدارقطني في "العلل" (4026).وأخرجه ابن ماجه (1142)، والنسائي (1482) من طريق محمد بن سليمان، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، رفعه. قال النسائي: هذا الحديث عندي خطأ، ومحمد بن سليمان ضعيف. وقال أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه 2/ 165 (288) -: هذا خطأ … كنت معجبًا بهذا الحديث، وكنت أرى أنه غريب، حتى رأيت سهيلٌ، عن أبي إسحاق، عن المسيب، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة، عن أم حبيبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فعلمت أنَّ ذاك لزم الطريق.وانظر الأحاديث الثلاثة التالية.



[2] حديث صحيح، رجاله ثقات، على اضطراب واختلاف كثير وقع في إسناده، كما سيتضح. الليث: هو ابن سعد، وأبو إسحاق الهمداني: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه ابن حبان (2452) عن ابن خزيمة، عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (1476) من طريق بكر بن مضر، عن محمد بن عجلان، به.وخالف محمدَ بنَ عجلان سهيلُ بن أبي صالح، فرواه عن أبي إسحاق، عن المسيب بن رافع، عن عنبسة بن أبي سفيان، عن أم حبيبة، مرفوعًا، كما في الذي بعده، وسنذكر الاختلاف في رفعه ووقفه هناك.وأخرجه مختصرًا دون بيان أي الركعات هي: أحمد 44/ (26781)، ومسلم (728) (103)، والنسائي (491)، وابن حبان (2451) من طريق شعبة بن الحجاج، ومسلم (728) (102) عن أبي غسان المسمعي، والنسائي (492) عن حميد بن مسعدة، كلاهما (أبو غسان وحميد) عن بشر بن المفضل، ومسلم (728) (101) من طريق سليمان بن حيان، وأبو داود (1250) من طريق إسماعيل ابن علية، أربعتهم (شعبة وبشر بن المفضل وسليمان بن حيان وابن علية) عن داود بن أبي هند، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، به.وقد خالف شعبةَ ومن تابعه يزيدُ بنُ هارون، فرواه عن داود بن أبي هند، عن النعمان بن سالم، عن عنبسة بن أبي سفيان، عن أم حبيبة، مرفوعًا، لم يذكر فيه عمرو بن أوس، واختُلف على بشر بن المفضل، فقد خالف أبا غسان المسمعي وحميدَ بنَ مسعدة: مسدَّدٌ، فرواه عنه كرواية يزيد بن هارون، وهذا ما سيأتي برقم (1188). وأخرجه أحمد 44/ (26774) من طريق خالد بن يزيد، والنسائي (1473) من طريق ابن جريج، كلاهما عن عطاء بن أبي رباح، عن عنبسة، به. وهذا إسناد منقطع، كما قال النسائي: عطاء بن أبي رباح لم يسمعه من عنبسة. ورغم أنه قد وقع التصريح بالتحديث في "مسند أحمد" إلّا أنه ربما يكون خطأً من بعض الرواة، بدليل ما أخرجه النسائي (1472) من طريق ابن جريج قال: قلت لعطاء: بلغني أنك تركع قبل الجمعة اثنتي عشرة ركعة، أبلغك في ذلك خبر؟ فقال: أخبرتْ أمُّ حبيبة عنبسةَ بنَ أبي سفيان، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره.وما أخرجه النسائي أيضًا (1487) من طريق معقل بن عبيد الله الجزري، عن عطاء قال: أُخبِرتُ أنَّ أم حبيبة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره.وقد صرَّح محمد بن سعيد الطائفي باسم الواسطة بين عطاء وعنبسة، فيما أخرجه النسائي (493) و (1474) من طريقه عن عطاء، عن يعلى بن أمية، عن عنبسة، به.وأخرجه النسائي (1475) من طريق أبي يونس القشيري، عن عطاء، عن شهر بن حوشب، عن أم حبيبة، مرفوعًا.ورواه عاصم بن أبي النجود، عن أبي صالح ذكوان السمان، عن أم حبيبة، واختلف عليه في رفعه ووقفه:فقد أخرجه أحمد 44/ (26768) و 45/ (27411)، والنسائي (1481) من طريق حماد بن زيد، عن عاصم بن أبي النجود، عن أبي صالح، عن أم حبيبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.وتابع حمادَ بنَ زيد حمادُ بنُ سلمة، واختُلف عليه، فقد رواه سويد بن عمرو - كما عند النسائي (1492) - عنه، عن عاصم، به، فرفعه.ورواه النضر بن شميل - كما عند النسائي في "المجتبى" (1810) - عنه، عن عاصم، عن أبي صالح، عن أم حبيبة قولها، فذكره موقوفًا.وأخرجه ابن ماجه (1140)، والترمذي (414)، والنسائي (1471) و (1488)، من طريق المغيرة بن زياد، عن عطاء، عن عائشة، مرفوعًا. وهذا إسناد ضعيف، قال الترمذي: حديث غريب من هذا الوجه، ومغيرة بن زياد قد تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه. وقال النسائي: هذا خطأ، ولعله أراد عنبسة بن أبي سفيان، فصحفه. ونحوه قال الدارقطني في "العلل" (4026).وأخرجه ابن ماجه (1142)، والنسائي (1482) من طريق محمد بن سليمان، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، رفعه. قال النسائي: هذا الحديث عندي خطأ، ومحمد بن سليمان ضعيف. وقال أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه 2/ 165 (288) -: هذا خطأ … كنت معجبًا بهذا الحديث، وكنت أرى أنه غريب، حتى رأيت سهيلٌ، عن أبي إسحاق، عن المسيب، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة، عن أم حبيبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فعلمت أنَّ ذاك لزم الطريق.وانظر الأحاديث الثلاثة التالية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1187)


1187 - أخبرنا أبو العباس عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أَبي أُسامة، حدثنا يونس بن محمد المؤدِّب، حدثنا فُلَيح بن سليمان، حدثنا سُهَيل بن أبي صالح، عن أبي إسحاق عمرو بن عبد الله، عن المسيَّب بن رافع، عن عَنْبَسة بن أبي سفيان، عن أُمِّ حَبيبة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن صلَّى ثِنتي عشرة ركعةً، بنى الله له بيتًا في الجنة: أربعًا قبل الظُّهر، وثِنتَين بعدها، وركعتين قبل العصر، وركعتين بعد المغرِب، وركعتين قبل الصُّبح" [1].كلا الإسنادين صحيحان على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وشواهدها كلُّها صحيحة.فمنها متابعةُ النعمانِ بن سالم ومكحولٍ الفقيهِ المسيّبَ بنَ رافع.أما حديث النعمان بن سالم:




উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি বারো রাকাত (নফল) সালাত আদায় করবে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করবেন। (তা হলো:) যোহরের পূর্বে চার রাকাত, এর পরে দুই রাকাত, আসরের পূর্বে দুই রাকাত, মাগরিবের পরে দুই রাকাত এবং ফজরের পূর্বে দুই রাকাত।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لاضطرابه، وفليح بن سليمان - وإن ضعفه النسائي وغيره، واحتجَّ به آخرون - قد توبع، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه النسائي (1483) عن أحمد بن الأزهر، عن يونس بن محمد المؤدب، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (415) من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق السبيعي، به. وقال: حديث حسن صحيح.وخالف الثوريَّ زهيرُ بنُ معاوية، فأخرجه من طريقه النسائي (1477) عن أبي إسحاق، عن المسيب، عن عنبسة، عن أم حبيبة قولها، فذكره موقوفًا.ورواه إسماعيل بن أبي خالد عن المسيب بن رافع، واختُلف عليه في رفعه ووقفه أيضًا، فرواه يزيد بن هارون عنه، عن عنبسة، عن أم حبيبة مرفوعًا، كما عند أحمد 44/ (26769)، وابن ماجه (1141)، والنسائي (1478).ورواه يعلى بن عبيد كما عند النسائي (1179)، وعبد الله بن المبارك عنده أيضًا (1493)، كلاهما عنه - يعني إسماعيل بن أبي خالد -عن المسيب بن رافع، عن أم حبيبة، موقوفًا.وخالف إسماعيلَ بنَ أبي خالد حصينُ بنُ عبد الرحمن، فقد أخرجه من طريقه النسائي (1480) عن المسيب بن رافع، عن أبي صالح ذكوان السمان، عن عنبسة، عن أم حبيبة، موقوفًا. فأدخل أبا صالح بين المسيب وعنبسة.وانظر لزامًا تمام تخريجه وبيان الاختلاف فيه في التعليق على "مسند أحمد" 44/ (26769).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1188)


1188 - فأخبرَناه أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا داود بن أبي هند.وأخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا معاذ بن المثنَّى، حدثنا مسدَّد، حدثنا بِشْر بن المفضَّل، حدثنا داود بن أبي هند، عن النعمان بن سالم، عن عَنْبَسة بن أبي سفيان، عن أُمِّ حَبِيبة بنت أبي سفيان قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من صلَّى ثِنتي عشرةَ سجدةً تطوُّعًا، بنى الله له بيتًا في الجنة" [1].وأما حديث مكحول:




উম্মে হাবীবা বিনতে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি স্বেচ্ছাপ্রণোদিত নফল (সালাত) হিসেবে বারোটি সিজদা (রাক'আত) আদায় করবে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করবেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، على وهمٍ في إسناده، فقد اختُلف فيه على داود بن أبي هند:فرواه عنه يزيد بن هارون هنا، وهشيم بن بشير عند أحمد 45/ (27395)، عن النعمان بن سالم، بهذا الإسناد. بلا واسطة بين النعمان وعنبسة.ورواه عنه سليمان بن حيان عند مسلم (728) (101)، وإسماعيل ابن علية عند أبي داود (1250)، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة، عن أم حبيبة. وصحَّح ذلك الدارقطني في "العلل" (4026).ورواه عنه بشر بن المفضل، واختلف عليه فيه:فرواه عنه مسدد بن مسرهد هنا، عن داود بن أبي هند به، دون ذكر عمرو بن أوس.وخالفه أبو غسان المسمعي عند مسلم (728) (102)، وحميد بن مسعدة عند النسائي (492)، فروياه عن بشر بن المفضل، عن داود بن أبي هند، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة، عن أم حبيبة.وأخرجه أحمد 44/ (26775) و (26781)، ومسلم (728) (103)، والنسائي (491)، وابن حبان (2451) من طريق شعبة بن الحجاج، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة، عن أم حبيبة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1189)


1189 - فحدَّثناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغاني، حدثنا عبد الله بن يوسف التِّنِّيسي، حدثنا الهيثم بن حُميد، حدثنا النعمان بن المنذر، عن مكحول، عن عَنْبَسة بن أبي سفيان، عن أُم حَبِيبة أنها أخبرته، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من حافَظَ على أربع رَكَعَاتٍ قبل الظُّهر وأربعٍ بعدها، حرَّمه الله على النار" [1].




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি যুহরের (ফরয) সালাতের পূর্বে চার রাকাত এবং এর পরে চার রাকাত (সুন্নাত) নিয়মিতভাবে আদায় করে, আল্লাহ তাকে জাহান্নামের জন্য হারাম করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، قال البخاري - كما في "العلل الكبير" للترمذي (54) -: مكحول لم يسمع من عنبسة. وقال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه (488): مكحول لم يلق عنبسة.قلنا: ورواه مروان بن محمد، عن سعيد بن عبد العزيز، عن سليمان بن موسى، عن مكحول، واختلف فيه على مروان:فأخرجه النسائي (1491) عن أحمد بن ناصح، عن مروان، عن سعيد، عن سليمان، عن مكحول، بهذا الإسناد مرفوعًا.وخالفه محمود بن خالد، فيما أخرجه النسائي (1485) عن مروان بن محمد، عن سعيد، عن سليمان، عن مكحول، به إلى أم حبيبة قولها. فوقفه.واختلف فيه على سعيد بن عبد العزيز، فقد خالف مروان بن محمد: أبو عاصم النبيل، فرواه عن سعيد بن عبد العزيز، عن سليمان بن موسى، عن محمد بن أبي سفيان، عن أم حبيبة، مرفوعًا. فذكر محمد بن أبي سفيان بدل عنبسة. أخرج ذلك النسائي (1486).وأخرجه مرفوعًا كرواية مكحول هذه النسائي (1484) من طريق حسان بن عطية، عن عنبسة، عن أم حبيبة.وأخرج النسائي (1489) من طريق القاسم بن عبد الرحمن الدمشقي، عن عنبسة، عن أم حبيبة مرفوعًا: "ما من عبد مؤمن يصلي أربع ركعات بعد الظهر فتمسَّ وجهه النار أبدًا".وأخرج أيضًا (1490) من طريق عبد الله بن مهاجر الشعيثي، عن عنبسة، عن أم حبيبة مرفوعًا: "من صلى أربعًا قبل الظهر وأربعًا بعدها لم تمسه النار".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1190)


1190 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى العَنْبري، حدثنا مُسدَّد.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، قالا: حدثنا إسماعيل - وهو ابنُ عُليَّة - عن عُيينةَ بن عبد الرحمن، عن أبيه قال: قال بُرَيدة: خرجتُ ذاتَ يوم أمشي في حاجة، فإذا أنا برسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي فظَننتُه يريد حاجةً، فجعلتُ أكُفُّ عنه، فلم أزل أفعلُ ذلك حتى رآني، فأشار إليَّ فأتيتُه، فأخذ بيدِي، فانطلقنا نمشي جميعًا، فإذا أنا برجل بين أيدينا يصلي يُكثِر الركوعَ والسجود، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أتُرى هذا يُرائي؟ " فقلت: الله ورسوله أعلم، قال: فأرسلَ يدَه وطبَّق بين يديه ثلاث مِرار، ويرفع يديه ويصوِّبها ويقول: "عليكم هَدْيًا قاصدًا، عليكم هَدْيًا قاصدًا، عليكم هَدْيًا قاصدًا، فإنه مَن يُشادَّ هذا الدينَ يَغلِبْه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমি আমার কোনো প্রয়োজনে হেঁটে যাচ্ছিলাম। তখন হঠাৎ আমি দেখলাম যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাঁটছেন। আমি মনে করলাম যে তাঁরও কোনো প্রয়োজন আছে, তাই আমি তাঁকে এড়িয়ে যেতে লাগলাম। আমি এমনটি করতেই থাকলাম যতক্ষণ না তিনি আমাকে দেখলেন। তিনি আমাকে ইশারা করলেন, আমি তাঁর কাছে গেলাম। তিনি আমার হাত ধরলেন এবং আমরা একসাথে হাঁটতে লাগলাম। তখন আমরা আমাদের সামনে এক ব্যক্তিকে নামায পড়তে দেখলাম, যে প্রচুর রুকু ও সিজদা করছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি কি মনে করো, এ ব্যক্তি লোক দেখানোর জন্য এমন করছে?" আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত ছেড়ে দিলেন, এবং তিনবার দু'হাতকে মিলিয়ে (তাকবীরের মতো করে) ওঠালেন ও নামালেন এবং বললেন: "তোমরা মধ্যমপন্থা অবলম্বন করো, তোমরা মধ্যমপন্থা অবলম্বন করো, তোমরা মধ্যমপন্থা অবলম্বন করো। কেননা, যে ব্যক্তি এই দ্বীনের ব্যাপারে কঠোরতা করবে, এই দ্বীনই তাকে পরাভূত করবে (অর্থাৎ সে পরাজিত হবে)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى. وهو في "مسند أحمد" 38/ (22963).وأخرجه أحمد أيضًا 33/ (19786) عن يزيد بن هارون، وبإثره عن وكيع ومحمد بن بكر البرساني، و 38/ (23053) عن وكيع وحده، ثلاثتهم عن عيينة بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وقال يزيد بن هارون - خطأً - في روايته: عن أبي برزة، بدلًا من بريدة، لكن ذكر الإمام أحمد إثر روايته أنه رجع عن هذا الخطأ، وقال بعد ذلك: عن بريدة.وفي الباب عن ابن عباس مرفوعًا، وفيه: "وإياكم والغلو في الدين، فإنما هلك من كان قبلكم بالغلو في الدين"، وسيأتي في "المستدرك" (1729).وعن أبي هريرة، عند البخاري (39)، وفيه: "إنَّ الدين يسر، ولن يشادَّ الدين أحد إلّا غلبه".وعن أنس بن مالك، عند أحمد 20/ (13052)، وفيه: "إنَّ هذا الدين متين، فأوغلوا فيه برفق".قوله: "هديًا قاصدًا"، أي: طريقًا معتدلًا. وذكر أحمد بن حنبل والقاسم بن زكريا الحديث مطولًا فيه قصة لحذيفة مع أمه، واختصره أحمد بن سليمان وابن أبي شيبة كما هو هنا في "المستدرك" إلّا أنَّ الأخير زاد في آخره: "عرض لي ملكٌ استأذن ربه أن يسلم عليَّ، ويبشرني أنَّ الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".وستأتي هذه الزيادة منفردة في "المستدرك" برقم (5730).وأخرجه أحمد 38/ (23329)، والترمذي (3781)، والنسائي (380) و (8240)، وابن حبان (7126) من طرق عن إسرائيل، به. وذكروه جميعًا مطولًا بالقصة المشار إليها إلّا النسائي (380) فمختصرًا. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه إلّا من حديث إسرائيل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1191)


1191 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق العدلُ ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا زيد بن حُباب، حدثنا إسرائيل بن يونس، عن مَيسرة بن حَبِيب، عن المِنْهال بن عمرو، عن زِرٍّ، عن حُذيفةَ: أنه صلَّى مع النبي صلى الله عليه وسلم المغربَ، ثم صلَّى حتى صلَّى العشاء [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করলেন, এরপর তিনি সালাত আদায় করতে থাকলেন যতক্ষণ না তিনি ইশার সালাত আদায় করলেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. زِرّ: هو ابن حُبَيش الأسدي، وحذيفة: هو ابن اليمان.وأخرجه أحمد 38/ (23436). وأخرجه النسائي (379) و (380) عن أحمد بن سليمان، و (8307) عن القاسم بن زكريا، وابن حبان (6960) من طريق ابن أبي شيبة، أربعتهم (أحمد بن حنبل، وأحمد بن سليمان، والقاسم، وابن أبي شيبة) عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد. وذكر أحمد بن حنبل والقاسم بن زكريا الحديث مطولًا فيه قصة لحذيفة مع أمه، واختصره أحمد بن سليمان وابن أبي شيبة كما هو هنا في "المستدرك" إلّا أنَّ الأخير زاد في آخره: "عرض لي ملكٌ استأذن ربه أن يسلم عليَّ، ويبشرني أنَّ الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".وستأتي هذه الزيادة منفردة في "المستدرك" برقم (5730).وأخرجه أحمد 38/ (23329)، والترمذي (3781)، والنسائي (380) و (8240)، وابن حبان (7126) من طرق عن إسرائيل، به. وذكروه جميعًا مطولًا بالقصة المشار إليها إلّا النسائي (380) فمختصرًا. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه إلّا من حديث إسرائيل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1192)


1192 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح، حدثنا ابن أبي مريم، أخبرني عبد الله بن فَرُّوخ، عن ابن جُريج، عن عطاء، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أكرِمُوا بُيوتَكم ببعض صَلاتِكم" [1]. قد اتفق الشيخان على إخراج حديث عُبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "صلُّوا في بُيوتِكم، ولا تتخذوها قبورًا".فأما حديث عبد الله بن فَرُّوخ فإنَّ لفظه عجبٌ، وهو شيخٌ من أهل مكة صدوق، سكن مصرَ وبها مات.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের ঘরগুলোকে তোমাদের কিছু সালাতের (নামাযের) মাধ্যমে সম্মান দান করো।" [১] দুই শায়খ (বুখারী ও মুসলিম) উবাইদুল্লাহ্ থেকে, তিনি নাফি' থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত এই হাদীসটি উদ্ধৃত করার বিষয়ে একমত হয়েছেন যে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের ঘরগুলোতে সালাত (নামায) আদায় করো এবং সেগুলোকে কবরে পরিণত করো না।" আর আব্দুল্লাহ্ ইবনু ফাররুখ-এর হাদীসটির শব্দাবলী চমৎকার। তিনি মক্কার অধিবাসী একজন সত্যবাদী শায়খ ছিলেন, যিনি মিসরে বসবাস করতেন এবং সেখানেই মৃত্যুবরণ করেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، عبد الله بن فروخ - هو الخراساني - روايته عن ابن جريج عن عطاء عن أنس فيها مقال، وقال الذهبي في "تلخيصه": أحاديثه غير محفوظة. قلنا: لكن للحديث شواهد بمعناه في "الصحيحين" يتقوى بها. ابن أبي مريم: هو سعيد بن الحكم الجمحي، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 335، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 6/ (2332) من طريق سليمان بن أحمد، عن يحيى بن عثمان بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (1207)، وابن المنذر في "الأوسط" (2746)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 333، والضياء في "المختارة" (2330) و (2331) من طريقين عن سعيد بن أبي مريم، به.وأخرجه عبد الرزاق (1534) عن ابن عيينة، قال: حُدِّثت عن أنس، فذكره.وله شاهد بمعناه من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (778)، ولفظه: "إذا قضى أحدكم الصلاة في مسجده فليجعل لبيته نصيبًا من صلاته، فإنَّ الله جاعل في بيته من صلاته خيرًا".وآخر من حديث زيد بن ثابت، عند مسلم (711)، وفيه: "عليكم بالصلاة في بيوتكم، فإنَّ خير صلاة المرء في بيته إلّا الصلاة المكتوبة".وثالث من حديث عبد الله بن عمر، عند البخاري (1187)، ومسلم (777): "صلوا في بيوتكم، ولا تتخذوها قبورًا"، وهو عند أحمد في "المسند" 8/ (4511)، وهناك ذكرنا سائر أحاديث الباب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1193)


1193 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيَّاري، حدثنا عبد الله بن علي الغَزَّال، حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، حدثنا الحسين بن واقد، حدثنا عبد الله بن بُريدَة، عن أبيه قال: أصبح رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومًا، فدعا بلالًا فقال: "يا بلالُ، بمَ سَبقتَني إلى الجنة؟ إني دخلتُ البارحةَ الجنةَ فسمعتُ خَشخَشَتَك أمامي"، فقال بلال: يا رسول الله، ما أذّنتُ قطُّ إلّا صليتُ ركعتين، وما أصابني حَدَثٌ قطُّ إلّا توضأتُ عنده، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بهذا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকালে উঠলেন, অতঃপর বেলালকে ডাকলেন এবং বললেন: "হে বেলাল, কিসের মাধ্যমে তুমি জান্নাতে আমার আগে পৌঁছে গেলে? গত রাতে আমি জান্নাতে প্রবেশ করেছিলাম এবং আমার সামনে তোমার পদধ্বনি শুনতে পেলাম।" বেলাল বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, আমি যখনই আযান দিয়েছি, তখনই দুই রাকাত (নফল) সালাত আদায় করেছি। আর যখনই আমার ওযু ভেঙেছে (বা আমার হাদাস হয়েছে), তখনই আমি তার জন্য (নতুন করে) ওযু করেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ কারণেই।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الله بن علي الغزَّال، فلم يرو عنه غير القاسم بن القاسم السياري، ولم نقع له على ترجمة، ولم نتبيَّن حاله، لكنه قد توبع. والحسين بن واقد - وهو المروزي - صدوق لا بأس به، وباقي رجاله ثقات. عبد الله بن بريدة: هو ابن الحصيب الأسلمي المروزي.وأخرجه أحمد 38/ (23040) عن علي بن الحسن بن شقيق، بهذا الإسناد. وزاد فيه قصة رؤيته صلى الله عليه وسلم لقصر عمر بن الخطاب في الجنة.وأخرجه أحمد (22996)، وابن حبان (7086) و (7087) من طريق زيد بن الحباب، والترمذي (3689) من طريق علي بن الحسين بن واقد، كلاهما عن الحسين بن واقد، به. وزادوا جميعًا فيه قصة قصر عمر بن الخطاب المشار إليها آنفًا، إلّا رواية ابن حبان (7087).وسيرد الحديث في "المستدرك" برقم (5328) من طريق محمد بن موسى الباشاني عن علي بن الحسن بن شقيق، مشتملًا على القصة المذكورة.وللحديث شاهد من حديث أبي هريرة عند البخاري (1149)، ومسلم (2458).وآخر من حديث جابر بن عبد الله عند البخاري (3679)، ومسلم (2457).قوله: "إني دخلت البارحة الجنة"، قال الترمذي: يعني رأيت في المنام كأني دخلت الجنة، هكذا روي في بعض الحديث. "خشخشتك" قال ابن الأثير: الخشخشة: حركة لها صوت كصوت السلاح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1194)


1194 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا شعبة، عن أبي جعفر المَديني قال: سمعت عُمارة بن خُزيمة يحدِّث عن عثمان بن حُنَيف: أنَّ رجلًا ضريرًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: ادْعُ الله أن يُعافيَني، فقال: "إن شئت أخَّرتُ ذلك وهو خير، وإن شئتَ دعوتُ"، قال: فادْعُه، قال: فأمره أن يتوضأ فيُحسِنَ وُضوءَه ويصليَ ركعتين ويدعوَ بهذا الدعاء فيقول: "اللهمَّ إني أسألك وأتوجَّهُ إليك بنبيِّك محمدٍ نبيِّ الرَّحمة، يا محمدُ إني توجّهتُ بك إلى ربي في حاجتي هذه فتُقضَى لي، اللهمَّ شَفِّعْه فيَّ وشَفِّعني فيه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উসমান ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক অন্ধ ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: আল্লাহর কাছে দু'আ করুন যেন তিনি আমাকে আরোগ্য দান করেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি চাইলে আমি এটা বিলম্বিত করি, আর সেটাই উত্তম। আর যদি তুমি চাও, তাহলে আমি দু'আ করব।" লোকটি বলল: তাহলে আপনি দু'আ করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন উত্তমরূপে ওযু করে, দু'রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করে এবং এই দু'আ পাঠ করে: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই এবং তোমার নবী, রহমতের নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে তোমার দিকে মনোনিবেশ করি (তোমার নৈকট্য কামনা করি)। হে মুহাম্মাদ! আমি আমার এই প্রয়োজনে আপনার মাধ্যমে আমার রবের দিকে মনোনিবেশ করলাম, যাতে এটি পূর্ণ করা হয়। হে আল্লাহ! আমার ব্যাপারে তাঁকে সুপারিশকারী বানান এবং আমার সুপারিশ তাঁর ব্যাপারে কবুল করুন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وقد اختُلف في هذا الإسناد على أبي جعفر المديني، فرواه شعبةُ عنه عن عمارة بن خزيمة عن عثمان بن حنيف، كما عند الحاكم هنا وفيما سيأتي برقم (1930)، وتابع شعبةَ في هذا الإسناد حمادُ بنُ سلمة، كما سيأتي في التخريج.وخالفهما رَوح بن القاسم - فيما سيأتي برقم (1950) و (1951) - فرواه عن أبي جعفر المديني عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف عن عمه عثمان بن حنيف. وتابع رَوحًا هشامٌ الدَّستُوائي، وسيأتي تخريج طريقه هناك.وقد رجَّح أبو زُرعة رواية شعبة، كما في "العلل" لابن أبي حاتم (2064)، وخالفه ابنُ أبي حاتم فرجَّح رواية روح بن القاسم، لمتابعة هشام الدَّستُوائي له.وسبَق ابنَ أبي حاتم إلى ذلك عليُّ بنُ المديني كما في "الدعاء" للطبراني (1052)، حيث ذكر رواية شعبة ورواية روح بن القاسم، ثم قال: ما أرى روحَ بن القاسم إلا قد حَفِظَه.قلنا: لا يبعد أن يكون كلٌّ منهما محفوظًا، ويكونَ أبو جعفر المديني قد سمعه من كلا الرجُلين: عُمارة وأبي أمامة، وكلٌّ منهما سمعه من عثمان بن حُنيف. على أنه إن كان الصحيحُ ذكرَ أحدِهما دون الآخر، فلا يضرُّ أيّهما كان، فكلاهما ثقة، والله أعلم.شعبة: هو ابن الحجاج، وأبو جعفر المديني: هو الخَطْمي، واسمه: عمير بن يزيدوأخرجه أحمد 28/ (17240). وأخرجه ابن ماجه (1385) عن أحمد بن منصور بن سيار، والترمذي (3578)، والنسائي (10420) عن محمود بن غيلان، ثلاثتهم (أحمد وابن سيار ومحمود) عن عثمان بن عمر، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن صحيح غريب. وأخرجه أحمد (17241) عن روح بن عبادة، عن شعبة، به.وأخرجه أحمد (17242)، والنسائي (10419) من طريق حماد بن سلمة، عن أبي جعفر المديني، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1195)


1195 - أخبرنا عليُّ بن عيسى الحِيري، حدثنا أحمد بن نَجْدةَ، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا عبد الله بن وَهْب بن مُسلِم القُرشي، أخبرني حَيْوةُ بن شُرَيح، أنَّ الوليد بن أبي الوليد [1] أخبره، أنَّ أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري حدثه، عن أبيه، عن جده، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "اكتُمِ الخِطْبةَ، ثم توضأ فأحسِنْ وضوءك، ثم صلِّ ما كَتبَ الله لك، ثم احمَدْ ربَّك ومجِّدْه، ثم قل: اللهمَّ إنك تَقدِرُ ولا أقدِر، وتَعلَمُ ولا أعلمُ، وأنت علَّام الغُيوب، فإن رأيتَ لي فلانةَ - تُسمِّيها باسمها - خيرًا لي في دِيني ودُنياي وآخرتي فاقدُرْها لي، وإن كان غيرُها خيرًا لي منها في دِيني ودُنياي وآخِرتي فاقضِ لي بها" أو قال: "فاقدُرْها لي" [2]. هذه سُنَّة صلاة الاستخارة عزيزةٌ، تفرَّد بها أهل مصر، ورواته عن آخرهم ثقات، ولم يُخرجاه.




আবূ আইয়্যূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা (বিয়ের) প্রস্তাব গোপন রাখো। অতঃপর তুমি উত্তমরূপে ওযু করো, এরপর আল্লাহ তোমার জন্য যা নির্ধারণ করেছেন (নফল সালাত), তা আদায় করো। এরপর তোমার রবের প্রশংসা ও মহিমা বর্ণনা করো। তারপর বলো: ‘হে আল্লাহ! নিশ্চয় আপনি ক্ষমতাবান, আমি নই। আপনি জানেন, আমি জানি না। আর আপনিই হচ্ছেন সকল গায়েবের পরিজ্ঞাতা (আল্লামুল গুয়ুব)। আপনি যদি অমুক নারীকে (তার নাম উল্লেখ করবে) আমার জন্য আমার দীন, আমার দুনিয়া ও আমার আখিরাতের জন্য কল্যাণকর মনে করেন, তবে তাকে আমার জন্য নির্ধারণ করে দিন। আর যদি তার চেয়ে অন্য কেউ আমার জন্য আমার দীন, আমার দুনিয়া ও আমার আখিরাতের জন্য কল্যাণকর হয়, তবে আপনি তাকে আমার জন্য ফয়সালা করে দিন।’ অথবা তিনি বলেছেন: ‘তবে তাকে আমার জন্য নির্ধারণ করে দিন।’




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أبي أيوب. وعن ابن مسعود عند الطبراني في "الكبير" (10012) و (10052).



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد فيه لِين، خالد بن أبي أيوب الأنصاري تفرد بالرواية عنه ابنه أيوب، وهذا الأخير فيه لين. وقد ذهب غير واحد من أهل العلم إلى أنَّ أبا أيوب الأنصاري جدُّ أيوب بن خالد لأمه.وأخرجه أحمد 38/ (23597)، وابن حبان (4040) من طريقين عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23596) من طريق ابن لهيعة، عن الوليد بن أبي الوليد، به.وسيأتي في "المستدرك" برقم (2731) من طريق محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن ابن وهب، به.وفي باب صلاة الاستخارة في الأمور كلها مطلقًا عن جابر بن عبد الله عند أحمد (14707)، والبخاري (1162).وعن أبي سعيد الخدري عند ابن حبان (885)، وإسناده حسن.وعن أبي هريرة عند ابن حبان (886). وعن ابن مسعود عند الطبراني في "الكبير" (10012) و (10052).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1196)


1196 - أخبرنا أبو النضر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا إسماعيل بن عَبد الله بن زُرَارة الرَّقِّي، حدثنا خالد بن عبد الله، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يحافظُ على صلاة الضُّحى إلّا أوَّاب"، قال: "وهي صلاة الأوّابين" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "চাশতের সালাত (সালাতুদ-দুহা) নিয়মিতভাবে শুধু 'আওওয়াব' (আল্লাহমুখী ও অধিক তাওবাকারী) ব্যক্তিই সংরক্ষণ করে থাকে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: "আর এটি হলো আওওয়াবীনদের সালাত।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي، وإسماعيل بن عبد الله بن زرارة صدوق فيه كلام لكنه متابع. أبو النضر الفقيه: هو محمد بن محمد بن يوسف، وخالد بن عبد الله: هو الواسطي، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه ابن خزيمة (1224) عن محمد بن يحيى، عن إسماعيل بن عبد الله بن زرارة، بهذا الإسناد. وقال بإثره: لم يتابع هذا الشيخ إسماعيلُ بن عبد الله على إيصال هذا الخبر، رواه الدراوردي، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، مرسلًا، ورواه حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة قوله.قلنا: لكن روي هذا الحديث موصولًا من غير وجه عن محمد بن عمرو، فقد أخرجه الطبراني في "الأوسط" (3865) من طريق عمرو بن حمران، وابن عدي في "الكامل" 6/ 198، وقوام السنة الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1968) من طريق محمد بن دينار الطاحي، وابن شاهين في "الترغيب" (127) من طريق عاصم بن بكار الليثي، ثلاثتهم عن محمد بن عمرو بن علقمة، به. واقتصر في روايتي الطبراني وابن شاهين على الشطر الأول من الحديث. وعمرو بن حمران قال أبو حاتم كما في "الجرح والتعديل" 6/ 227: صالح الحديث، ومحمد بن دينار الطاحي قال ابن عدي: حسن الحديث، عامة حديثه ينفرد به.وأخرج ابن شاهين أيضًا (129) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة رفعه: "صلاة الضحى صلاة الأوابين". والإسناد إلى يحيى ضعيف.وأخرج هشام بن عمار في "حديثه" (145) عن سعيد بن يحيى اللخمي، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة مرسلًا عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "لا يحافظ على صلاة الضحى إلّا أواب".وأخرج أحمد 16/ (10559) من طريق سليمان بن أبي سليمان، والمروزي في "مختصر قيام الليل" ص 281 من طريق عبد الرحمن بن مل النهدي، كلاهما عن أبي هريرة قال: أوصاني خليلي صلى الله عليه وسلم بثلاث، ولست بتاركهن في سفر ولا حضر: أن لا أنام إلّا على وتر، وأن أصوم ثلاثة أيام من كل شهر، وأن لا أدع ركعتي الضحى، فإنها صلاة الأوابين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1197)


1197 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا بكر بن مُضَر، حدثنا عمرو بن الحارث، عن بُكَير بن الأشَجِّ، عن الضَّحّاك بن عبد الله القُرشي، حدَّثه عن أنس بن مالك قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في سَفَرٍ صلَّى سُبْحةَ الضحى ثمانيَ رَكَعات، فلما انصرف قال: "إني صليتُ صلاةَ رَغْبةٍ ورَهْبة، فسألتُ ربي ثلاثًا، فأعطاني اثنتين ومَنَعني واحدةً، سألتُه أن لا يقتلَ أمتي بالسِّنين، ففعل، وسألتُه أن لا يُظهِرَ عليهم عدوًّا، ففعل، وسألته أن لا يُلبِسَهم شِيَعًا، فأَبى عليَّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتفقا على حديث أم هانئ في ثمان ركعاتِ الضحى فقط [2].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক সফরে আট রাকাত সালাতুত-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করতে দেখলাম। অতঃপর তিনি ফিরে এসে বললেন: "নিশ্চয় আমি আশা ও ভয় (রাগবাহ্ ও রাহবাহ্) মিশ্রিত সালাত আদায় করেছি। আমি আমার রবের কাছে তিনটি জিনিস চেয়েছিলাম। তিনি আমাকে দুটি দিয়েছেন এবং একটি থেকে বারণ করেছেন (বা দেননি)। আমি তাঁর কাছে চেয়েছিলাম যেন তিনি আমার উম্মতকে দুর্ভিক্ষ দ্বারা ধ্বংস না করেন, তিনি তা করেছেন। আমি চেয়েছিলাম যেন তিনি তাদের উপর তাদের শত্রুকে জয়ী না করেন, তিনি তা করেছেন। আমি চেয়েছিলাম যেন তিনি তাদের দল-উপদলে বিভক্ত না করেন, কিন্তু তিনি (তা করতে) অস্বীকার করেছেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة الضحاك بن عبد الله القرشي، فلم يرو عنه غير بكير - وهو ابن عبد الله بن الأشج - ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان.وأخرجه أحمد 19/ (12486) و 20/ (12589)، والنسائي (489) من طريقين عن عمرو بن الحارث، بهذا الإسناد.لكن للحديث شواهد يصح بها، منها حديث ثوبان وسعد بن أبي وقاص عند مسلم (2889) و (2890). وحديث ثوبان سيأتي عند المصنف مطوَّلًا برقم (8595).وحديث أبي هريرة، وسيأتي برقم (8789). وإسناده حسن.وانظر تتمة شواهده وتخريجه وتفصيل الكلام على إسناده في عملنا على "مسند أحمد" (12486).شِيَعًا: فِرَقًا، ويَلبِسهم: يجعلهم مختلطين؛ يعني في المعارك متحاربين. الركوع والسجود.



[2] البخاري (1103) و (1176) و (4292)، ومسلم (336) عن أم هانئ قالت: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيتها يوم فتح مكة، فاغتسل وصلى ثماني ركعات، فلم أر صلاةً قط أخف منها، غير أنه يتم الركوع والسجود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1198)


1198 - حدثنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جُريج، أخبرني عثمان بن أبي سليمان، أنَّ أبا سلمة بن عبد الرحمن أخبره، أنَّ عائشة أخبرته: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يَمُتْ حتى كان أكثرُ صلاته جالسًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃত্যুবরণ করেননি, যতক্ষণ না তাঁর অধিকাংশ সালাত বসে আদায় করা অবস্থায় ছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي قلابة، وهو عبد الملك بن محمد الرقاشي، لكنه قد توبع. وقد اختلف فيه على أبي سلمة، فرواه عثمان بن أبي سليمان، عنه، عن عائشة، كما في هذه الرواية، ورواه أبو إسحاق السبيعي، عنه، عن أم سلمة، كما سيأتي في التخريج، وقد صحَّح الدارقطني في "العلل" (3655) رواية أبي إسحاق عن أبي سلمة عن أم سلمة، ثم قال: وحديث عثمان بن أبي سليمان عن أبي سلمة عن عائشة، غير مدفوع، لأنَّ عثمان ثقة، ويمكن أن يكون أبو سلمة أخذه عنهما.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وابن جريح: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أحمد 42/ (25361) عن عبد الرزاق، ومسلم (732) (116)، والنسائي في "الكبرى" (1364) من طريق حجاج بن محمد، كلاهما عن ابن جريج، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وخالف عثمانَ بن أبي سليمان أبو إسحاق السبيعي، فقد أخرجه أحمد 44/ (26599) و (26709)، والنسائي في "المجتبى" (1655) من طريق سفيان الثوري، وأحمد (26709) و (26730)، والنسائي في "الكبرى" (1363)، وابن حبان (2507) من طريق شعبة، وأحمد (26605) من طريق إسرائيل، وأحمد (26726)، وابن ماجه (1225) و (4237) من طريق أبي الأحوص، أربعتهم عن أبي إسحاق، عن أبي سلمة، عن أم سلمة. وقال بعضهم في روايته: كان أكثر صلاته قاعدًا إلّا المكتوبة.وخالفهم يونس بن أبي إسحاق، فقد أخرجه أحمد (26544)، والنسائي في "الكبرى" (1362) من طريق يونس، عن أبيه، عن أبي الأسود، عن أم سلمة.وخالف يونسَ عمرُ بنُ أبي زائدة، فقد أخرجه النسائي في "الكبرى" (1361) من طريقه، عن أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة. قال الدارقطني في "العلل" (3655): وليس بمحفوظ.وقد روي معنى الحديث من غير وجه عن عائشة، فقد أخرج أحمد 42/ (25449)، والبخاري (1119)، ومسلم (731) (112)، وأبو داود (954)، والترمذي (374)، والنسائي في "المجتبى" (1648) من طريق عبد الله بن يزيد وأبي النضر - اقتصر الترمذي وحده على طريق أبي النضر - عن أبي سلمة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلي جالسًا، فيقرأ وهو جالس، فإذا بقي من قراءته نحو من ثلاثين أو أربعين آية، قام فقرأها وهو قائم، ثم ركع، ثم سجد، ثم يفعل في الركعة الثانية مثل ذلك.وأخرج أحمد 40/ (24191)، والبخاري (1118) و (1148)، ومسلم (731) (111)، وأبو داود (953)، وابن ماجه (1227)، والنسائي في "الكبرى" (1360)، وابن حبان (2509) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أم المؤمنين أنها أخبرته: أنها لم تر رسول الله صلى الله عليه وسلم قاعدًا قط حتى أسنَّ، فكان يقرأ قاعدًا، حتى أراد أن يركع قام فقرأ نحوًا من ثلاثين آية، أو أربعين آية، ثم ركع. واللفظ للبخاري.وأخرج أحمد 42/ (26202)، ومسلم (732) (117) من طريق عبد الله بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أنها قالت: كان آخر صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم حين ثَقُل وبدن وهو جالس.وأخرج البخاري (4837) من طريق حيوة، عن أبي الأسود، عن عروة، عن عائشة، وفيه: فلما كثر لحمه صلى جالسًا، فإذا أراد أن يركع قام فقرأ، ثم ركع.وبنحو ذلك أخرجه أحمد 43/ (25826)، ومسلم (731) (113)، وابن ماجه (1226)، والنسائي في "المجتبى" (1650) من طريق عمرة، وأحمد 43/ (26002)، ومسلم (731) (114) من طريق علقمة بن وقاص الليثي، كلاهما عن عائشة.وانظر حديث عبد الله بن شقيق عن عائشة الآتي بعد هذا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1199)


1199 - حدثني علي بن حَمْشاذ، حدثنا إبراهيم بن الحسين الكِسَائي، حدثنا الربيع بن يحيى، حدثنا يزيد بن إبراهيم التُّستَري، عن محمد بن سِيرين، عن عبد الله بن شَقِيق العُقَيلي، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي قائمًا وقاعدًا، فإذا افتتح الصلاة قائمًا ركع قائمًا، وإذا افتتح الصلاة قاعدًا ركع قاعدًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ [2]، وقد خرجتُه قبل هذا من حديث حُمَيد عن عبد الله بن شقيق، وهذا موضعه، وحديث ابن سيرين هذا شاهدٌ صحيح لما تقدم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে ও বসে সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি দাঁড়িয়ে সালাত শুরু করতেন, তখন দাঁড়িয়েই রুকু করতেন। আর যখন তিনি বসে সালাত শুরু করতেন, তখন বসেই রুকু করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل الربيع بن يحيى - وهو الأُشناني - وقد توبع.وأخرجه أحمد 42/ (25688)، والنسائي في "المجتبى" (1647)، وابن حبان (2511) من طريق وكيع، عن يزيد بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 41/ (24809) و (24822)، و 42/ (25329) و (25330)، و 43/ (25907) و (26257)، ومسلم (730) (110)، من طرق عن محمد بن سيرين، به.وسلف الحديث من طريق حميد الطويل عن عبد الله بن شقيق برقم (1035) وانظر تخريجه هناك.وانظر ما سلف برقم (960) و (1034).



[2] بل أخرجه مسلم بهذا اللفظ، لكن في أوله: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يكثر الصلاة قائمًا وقاعدًا … الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1200)


1200 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا إسماعيل بن قُتَيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا وكيع، عن إبراهيم بن طَهْمان، عن حسين المعلِّم، عن عبد الله بن بُرَيدة، أنَّ عِمْران بن حُصَين قال: كان بيَ الناصُورُ، فسألت النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن الصلاة، فقال: "صلِّ قائمًا، فإن لم تستطع فجالسًا، فإن لم تستطع فعلى جَنْب" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما أخرجه البخاري من حديث يزيد بن زُرَيع عن حسين المعلِّم مختصرًا [2].




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নাসূর (রোগ) দ্বারা আক্রান্ত ছিলাম। তাই আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "তুমি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করো; যদি তুমি সক্ষম না হও তবে বসে (সালাত আদায় করো); আর যদি তুমি তাতেও সক্ষম না হও, তবে কাত হয়ে (শুইয়ে) সালাত আদায় করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. حسين المعلِّم: هو الحسين بن ذكوان.وأخرجه أحمد 33/ (19819)، وأبو داود (952)، وابن ماجه (1223)، والترمذي (372) من طريق وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وسيأتي الحديث من طريق عبد الله بن المبارك عن إبراهيم بن طهمان برقم (3211).وأخرج أحمد (19887)، والبخاري (1115) و (1116)، وأبو داود (951)، وابن ماجه (1231)، والترمذي (371)، والنسائي (1366)، وابن حبان (2513) من طرق عن حسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة، أنَّ عمران بن حصين قال: كنت رجلًا ذا أسقام كثيرة، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صلاتي قاعدًا، قال: "صلاتك قاعدًا على النصف من صلاتك قائمًا، وصلاة الرجل مضطجعًا على النصف من صلاته قاعدًا".والناصور: هو الباسور، وهو المرض المعروف، ويجمع على بواسير، يقال بالموحدة وبالنون.



[2] هذا وهم من الحاكم رحمه الله، فرواية البخاري المختصرة ليست من حديث يزيد بن زريع، وإنما عنده برقم (1117) من حديث عبد الله بن المبارك، عن إبراهيم بن طهمان، عن حسين المعلم، كما سيأتي في "المستدرك" (3211)، أما رواية يزيد بن زريع عن حسين المعلم فهي ليست مختصرة، وإنما أخرجها ابن ماجه (1231) - كما سلف في التخريج. ولفظها عنده: أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الرجل يصلي قاعدًا، قال: "من صلى قائمًا فهو أفضل، ومن صلى قاعدًا فله نصف أجر القائم، ومن صلى نائمًا فله نصف أجر القاعد".