আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1241 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا وَهْب بن جَرِير، حدثنا شُعبة. وأخبرني عبد الرحمن بن الحُصَين القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، عن عمرو بن مُرَّة، عن سالم بن أبي الجعد، عن شُرَحْبيل بن السِّمْط، أنه قال لكعب بن مُرَّة أو مُرَّة بن كعب: حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم دعا على مُضَر، فأتيته فقلت: يا رسول الله، إنَّ الله قد أعطاك واستجاب لك، وإنَّ قومَك قد هلكوا، فادْعُ الله لهم، فقال: "اللهمَّ اسقنا غيثًا مُغيثًا، مَريئًا سريعًا، غَدَقًا طَبَقًا، عاجلًا غيرَ رائثٍ، نافعًا غيرَ ضارّ"، فما كانت إلّا جمعةٌ أو نحوُها حتى سُقُوا [1]. هذا حديث صحيح إسناده على شرط الشيخين، فإنّ بهزَ بن أسَد العَمِّي الثقة الثَّبْت قد رواه عن شعبة بإسناده عن مُرَّةَ بن كعب ولم يَشُكَّ فيه، ومُرَّة بن كعب البَهْزيّ صحابيٌّ مشهور:
মুরাহ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শুরহাবীল ইবনে সিমত তাঁকে বললেন: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা একটি হাদীস আমাদের শোনান। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুদার গোত্রের বিরুদ্ধে বদদোয়া করতে শুনেছি। অতঃপর আমি তাঁর নিকট এসে বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আল্লাহ অবশ্যই আপনাকে দান করেছেন এবং আপনার দু'আ কবুল করেছেন, কিন্তু আপনার কওম তো ধ্বংস হয়ে যাচ্ছে। অতএব আপনি তাদের জন্য আল্লাহর নিকট দু'আ করুন। তখন তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদেরকে এমন পরিত্রাণকারী বৃষ্টি দান করুন যা সুপেয়, দ্রুত, মুষলধার ও ব্যাপক—যা জমিন ঢেকে দেয়—যা দ্রুত আসে, বিলম্বকারী নয় এবং যা উপকারী—ক্ষতিকারক নয়।" এরপর এক জুমু'আ বা এর কাছাকাছি সময়ের মধ্যেই তারা সিক্ত হয়েছিল (বৃষ্টি পেয়েছিল)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، سالم بن أبي الجعد لم يسمع من شرحبيل بن أبي السمط.وأخرجه أحمد 29/ (18062) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (18066)، وابن ماجه (1269) من طريق الأعمش، عن عمرو بن مرة، به. إلّا أنه قال: عن كعب بن مرة، بدون شك، وزاد في آخره: فأتوه فشكوا إليه المطر، فقالوا: يا رسول الله، تهدمت البيوت، فقال: "اللهم حوالينا ولا علينا" قال: فجعل السحاب يتقطع يمينًا وشمالًا.وانظر ما بعده.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند أبي داود (1169)، وإسناده صحيح.وحديث ابن عباس عند ابن ماجه (1270)، ورجاله ثقات، على اختلاف في وصله وإرساله.وقد ثبت الدعاء على مضر من حديث أبي هريرة عند البخاري (4560)، ومسلم (675)، وهو في "مسند أحمد" 12/ (7465)وثبت الدعاء في الاستسقاء من حديث أنس بن مالك عند البخاري (932) و (1014)، ومسلم (897)، وهو في "مسند أحمد" 20/ (13016)قوله: "مريئًا" قال ابن الأثير في "النهاية": يقال: مَرَأني الطعامُ، وأمرأني، إذا لم يثقل على المعدة، وانحدر عنها طيبًا."غدقًا": قال: المطر الكبار القطر."طبقًا" أي: مالئًا للأرض مغطيًا لها، يقال: غيثٌ طبقٌ، أي: عامٌّ واسع."غير رائث" أي: غير بطيء متأخر.
1242 - حدَّثَناه أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا محمد بن محمد بن سليمان، حدثنا عليُّ بن عبد الله المَديني، حدثنا بَهْزُ بن أسد، حدثنا شعبة، عن عمرو بن مُرَّة، عن سالم بن أبي الجعد، عن شُرَحْبيل بن السِّمْط، عن مُرَّة بن كعب: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دعا في الاستسقاء فقال: "اللهم اسقنا غيثًا مُغيثًا، مَريئًا سريعًا، غَدَقًا طَبَقًا، عاجلًا غير رائثٍ، نافعًا غيرَ ضارّ"، فما كانت إلّا جمعةٌ أو نحوُها حتى سُقُوا [1].آخر كتاب الاستسقاء من كتاب الكسوف
মুররা ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইসতিসকার (বৃষ্টি প্রার্থনার) সময় দু'আ করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! আপনি আমাদেরকে এমন বৃষ্টি দিন যা সাহায্যকারী, তৃপ্তিদায়ক, দ্রুত, প্রচুর, সর্বত্র আবৃতকারী, অবিলম্বে, বিলম্বিত নয়, উপকারী, ক্ষতিকারক নয়।" অতঃপর জুমা বা তার কাছাকাছি সময়ের মধ্যেই বৃষ্টি এল (বা তারা সিক্ত হলো)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف كسابقه.
1243 - أخبرني أبو قُتيبة سَلْم بن الفضل الأَدَمي بمكة، حدثنا أبو شعيب الحرَّاني، حدثنا علي بن عبد الله المَدِيني، حدثنا سالم بن نوح العطّار، حدثنا سعيد بن إياس الجُريري، عن حيَّان بن عُمَير، عن عبد الرحمن بن سَمُرة قال: بينما أنا أَرمي أسهُمًا إذِ انكسفت الشمس، فنَبذتُها وانطلقتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فانتهيتُ إليه وهو قائمٌ رافعٌ يديه يُسبِّح ويُكبِّر ويَحمَد ربَّه ويدعو، حتى انجلَتْ، وقرأ سورتين في ركعتين [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যখন তীর নিক্ষেপ করছিলাম, তখন সূর্য গ্রহণ হলো। তখন আমি তীরগুলো ফেলে দিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দিকে দ্রুত চললাম। আমি তাঁর কাছে পৌঁছে দেখলাম তিনি দাঁড়িয়ে আছেন, হাত তুলে আল্লাহর তাসবীহ (পবিত্রতা বর্ণনা) করছেন, তাকবীর (মহিমা ঘোষণা) করছেন, তাঁর রবের প্রশংসা করছেন এবং দোয়া করছেন—যতক্ষণ না (সূর্যগ্রহণ) শেষ হলো। আর তিনি দুই রাকাত সালাতে দুটি সূরা পাঠ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، سعيد بن إياس الجريري وإن كان قد اختلط، إلّا أنه قد روى هذا الحديث عنه غير واحد ممن سمع منه قبل الاختلاط، كإسماعيل ابن علية ووهيب بن خالد وغيرهما. أبو شعيب الحراني: هو عبد الله بن الحسن.وأخرجه مسلم (913) (27) عن محمد بن المثنى، عن سالم بن نوح، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 34/ (20617)، ومسلم (913) (25) و (26)، وأبو داود (1195)، وابن حبان (2848) من طرق عن سعيد بن إياس الجريري، به. من جهة يعلى بن عطاء فضعيف، لجهالة حال عطاء العامري، والد يعلى بن عطاء، فلم يرو عنه غير ابنه يعلى، كما قال أبو الحسن بن القطان.وأخرجه البيهقي 3/ 324 عن أبي عبد الله الحاكم، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه البزار (2395)، وابن خزيمة (1393) عن محمد بن المثنى، عن مؤمل بن إسماعيل، بهما. قال البزار: وهذا الحديث معروف من حديث عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، وأما حديث يعلى بن عطاء فلا نعلم رواه إلّا مؤمل عن الثوري، فجمعهما.قلنا: بل تابع مؤملًا عن الثوري أبو عامر العقدي، فقد أخرجه من طريقه البيهقي 3/ 324 عن سفيان الثوري، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه أحمد 11/ (6868) عن عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، عن عطاء بن السائب، بإسناده وحده، دون إسناد يعلى بن أمية.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد (6483) و (6763)، وأبو داود (1194)، والنسائي (1880) و (1896)، وابن حبان (2838) من طرق عن عطاء بن السائب، به.وأخرجه مختصرًا أحمد (7080) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن السائب بن مالك والد عطاء، عن عبد الله بن عمرو.وفي الباب عن جابر عند أحمد 22/ (14417)، ومسلم (904)، وأبي داود (1178) و (1179)، وابن حبان (2844).وانظر تتمة أحاديث الباب عند حديث ابن عمر في "مسند الإمام أحمد" 10/ (5883).
1244 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا حُمَيد بن عيَّاش الرَّمْلي، حدثنا مُؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا سفيان، عن يعلى بن عطاء، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو. وعن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو قال: انكسفت الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فأطال القيامَ حتى قيل: لا يَرْكع، ثم رَكَع، فأطال الرُّكوع حتى قيل: لا يَرفَع، ثم رَفَع رأسه، فأطال القيام حتى قيل: لا يَرْكع، ثم رَكَع، فأطال الرُّكوع حتى قيل: لا يَرفَع، ثم رَفَعَ رأسه، فأطال القيام حتى قيل: لا يَسجُد. وذَكَر باقي الحديث [1]. حديث الثوري عن يعلى بن عطاء غريبٌ صحيح، فقد احتجَّ الشيخان بمؤمَّل بن إسماعيل، ولم يُخرجاه، فأما عطاء بن السائب فإنهما لم يخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে একবার সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং এত দীর্ঘ সময় ধরে কিয়াম করলেন যে, লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: তিনি বুঝি রুকু করবেন না। তারপর তিনি রুকু করলেন এবং এত দীর্ঘ সময় ধরে রুকু করলেন যে, লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: তিনি বুঝি (তা থেকে) মাথা তুলবেন না। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং এত দীর্ঘ সময় ধরে কিয়াম করলেন যে, লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: তিনি বুঝি রুকু করবেন না। তারপর তিনি রুকু করলেন এবং এত দীর্ঘ সময় ধরে রুকু করলেন যে, লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: তিনি বুঝি (তা থেকে) মাথা তুলবেন না। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং এত দীর্ঘ সময় ধরে কিয়াম করলেন যে, লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: তিনি বুঝি সিজদা করবেন না। আর তিনি হাদীসের বাকি অংশ উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح بطرقه وشواهده، وهذا إسناد حسن من جهة عطاء بن السائب، من أجل مؤمل بن إسماعيل، لكنه قد توبع، وعطاء بن السائب سماع سفيان - وهو الثوري - منه قبل الاختلاط. أما من جهة يعلى بن عطاء فضعيف، لجهالة حال عطاء العامري، والد يعلى بن عطاء، فلم يرو عنه غير ابنه يعلى، كما قال أبو الحسن بن القطان.وأخرجه البيهقي 3/ 324 عن أبي عبد الله الحاكم، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه البزار (2395)، وابن خزيمة (1393) عن محمد بن المثنى، عن مؤمل بن إسماعيل، بهما. قال البزار: وهذا الحديث معروف من حديث عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، وأما حديث يعلى بن عطاء فلا نعلم رواه إلّا مؤمل عن الثوري، فجمعهما.قلنا: بل تابع مؤملًا عن الثوري أبو عامر العقدي، فقد أخرجه من طريقه البيهقي 3/ 324 عن سفيان الثوري، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه أحمد 11/ (6868) عن عبد الرزاق، عن سفيان الثوري، عن عطاء بن السائب، بإسناده وحده، دون إسناد يعلى بن أمية.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أحمد (6483) و (6763)، وأبو داود (1194)، والنسائي (1880) و (1896)، وابن حبان (2838) من طرق عن عطاء بن السائب، به.وأخرجه مختصرًا أحمد (7080) من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن السائب بن مالك والد عطاء، عن عبد الله بن عمرو.وفي الباب عن جابر عند أحمد 22/ (14417)، ومسلم (904)، وأبي داود (1178) و (1179)، وابن حبان (2844).وانظر تتمة أحاديث الباب عند حديث ابن عمر في "مسند الإمام أحمد" 10/ (5883).
1245 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا أبو النضر، حدثنا زهير.وحدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو نُعَيم، حدثنا زهير، عن الأسود بن قيس، حدثني ثعلبة بن عبَّاد العَبْدي من أهل البصرة: أنه شَهِد خُطبةً يومًا لسَمُرة بن جُنْدُب، فذكر في خُطبته، قال سَمُرة: بينما أنا يومًا وغلامٌ من الأنصار نرمي غَرَضًا لنا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، حتى إذا كانت الشمس على قِيْدِ رمحين أو ثلاثة في عين الناظر من الأُفُق، اسودَّت حتى آضَتْ كأنها تَنُّومة، فقال أحدنا لصاحبه: انطلِقْ بنا إلى المسجد، فوالله ليُحْدِثنَّ شأنُ هذه الشمس لرسول الله صلى الله عليه وسلم في أُمته حَدَثًا، فَدَفَعْنا إلى المسجد، فإذا هو بارزٌ، فوافَقْنا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم حين خَرَج إلى الناس، قال: فتقدَّمَ فصلَّى بنا كأطولِ ما قام بنا في صلاةٍ قطُّ، لا نَسمَعُ له صوتَه، ثم رَكَع بنا كأطولِ ما رَكَع بنا في صلاةٍ قطُّ، لا نسمع له صوتَه، ثم سجد بنا كأطولِ ما سجد بنا في صلاةٍ قطّ، لا نسمع له صوتَه، قال: ثم فعل في الركعة الثانية مثلَ ذلك، قال: فوافَقَ تجلِّي الشمس جُلوسَه في الركعة الثانية، قال: ثم سلَّم فحَمِد الله وأثنى عليه، وشهد أن لا إله إلّا الله، وشهد أنه عبدُه ورسولُه، ثم قال: "يا أيها الناس، إنما أنا بَشَرٌ ورسولُ الله، فأُذكِّرُكمُ اللهَ إن كنتُم تعلمون أني قصَّرتُ عن شيءٍ من تبليغ رسالاتِ ربي، لَمَا أخبرتموني، حتى أبلِّغَ رسالاتِ ربي كما ينبغي لها أن تُبلَّغ، وإن كنتُم تعلمون أني قد بلَّغتُ رسالاتِ ربي، لَمَا أخبرتموني"، قال: فقام الناس فقالوا: نَشهَدُ أنّك قد بلَّغتَ رسالاتِ ربِّك، ونصحتَ لأُمتك، وقضيتَ الذي عليك، قال: ثم سكتُوا.فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أمّا بعدُ، فإنَّ رجالًا يَزعُمون أنَّ كسوفَ هذه الشمس وكسوفَ هذا القمر وزوالَ هذه النُّجوم عن مَطالعِها لموتِ رجالٍ عظماءَ من أهل الأرض، وإنهم كَذَبوا، ولكنْ آياتٌ من آيات الله يَفتِنُ بها عبادَه لِينظُر من يُحدِثُ منهم توبةً، والله لقد رأيتُ منذ قمتُ أُصلي ما أنتم لاقونَ في دنياكم وآخرتِكم، وإنه والله لا تقومُ الساعة حتى يخرُج ثلاثون كذابًا، آخرُهم الأعور الدجال؛ ممسوحُ العين اليُسرى كأنها عينُ أبي تِحْيَى [1] - لشيخٍ من الأنصار - وإنه متى خَرَج، فإنه يَزعُم أنه الله، فمن آمن به وصدَّقه واتَّبعه فليس يَنفعُه صالحٌ من عملٍ سَلَفَ، ومن كَفَر به وكذَّبه فليس يُعاقَب بشيءٍ من عملِه سَلَفَ، وإنه سيَظهَر على الأرض كلِّها إلّا الحرمَ وبيتَ المقدس، وإنه يَحصُر المؤمنين في بيت المقدس، فيُزلزَلُون زلزالًا شديدًا [2]، فيهزِمُه الله وجنودَه، حتى إن جِذْمَ الحائط - أو أصلَ الشجرة - ليُنادي: يا مؤمنُ، هذا كافرٌ يستتر بي تعالَ اقتلْه" قال: "فلن يكون ذلك حتى تَرَونَ أُمورًا يَتفاقَم شأنُها في أنفُسِكم، تسَّاءَلون بينكم: هل كان نبيُّكم ذَكَر لكم منها ذِكرًا؟ وحتى تزول جبالٌ عن مَراسِيها، ثم على أَثَر ذلك القَبْضُ" وأشار بيدِه.قال: ثم شهدتُ خُطبةً أخرى قال: فذكر هذا الحديث ما قدَّمها ولا أخَّرها [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সামুরা) বললেন: একদিন আমি ও একজন আনসার যুবক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আমাদের লক্ষ্যবস্তুতে তীর নিক্ষেপ করছিলাম। এমনকি যখন দিগন্তের দিকে তাকানো ব্যক্তির দৃষ্টিতে সূর্য দুই বা তিনটি বর্শার পরিমাণ উপরে ছিল, তখন তা এমনভাবে কালো হয়ে গেল যে, যেন তা একটি কালো কাপড়ের টুকরা।
আমাদের মধ্যে একজন তার সঙ্গীকে বলল: চলো আমরা মসজিদে যাই। আল্লাহর কসম! এই সূর্যের অবস্থা অবশ্যই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উম্মতের মধ্যে কোনো এক বড় ঘটনা ঘটাবেন। অতঃপর আমরা দ্রুত মসজিদে পৌঁছলাম। দেখলাম, তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বাইরে ছিলেন। যখন তিনি মানুষের কাছে বের হচ্ছিলেন, আমরা তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে মিলিত হলাম।
তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে গেলেন এবং আমাদের নিয়ে এমন দীর্ঘ কিয়ামসহ সালাত আদায় করলেন, যা ইতিপূর্বে তিনি আমাদের নিয়ে অন্য কোনো সালাতে করেননি। আমরা তাঁর কিরাআতের কোনো শব্দ শুনতে পাচ্ছিলাম না। অতঃপর তিনি এমন দীর্ঘ রুকু করলেন, যা ইতিপূর্বে অন্য কোনো সালাতে করেননি। আমরা তাঁর কোনো শব্দ শুনতে পাচ্ছিলাম না। অতঃপর তিনি এমন দীর্ঘ সিজদা করলেন, যা ইতিপূর্বে অন্য কোনো সালাতে করেননি। আমরা তাঁর কোনো শব্দ শুনতে পাচ্ছিলাম না। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর দ্বিতীয় রাকাআতে তিনি অনুরূপ করলেন।
তিনি বলেন: দ্বিতীয় রাকাআতে তাঁর বৈঠক চলাকালীন সময়ে সূর্য পরিষ্কার হয়ে গেল। এরপর তিনি সালাম ফিরালেন এবং আল্লাহ্র প্রশংসা ও গুণগান করলেন, সাক্ষ্য দিলেন যে, আল্লাহ্ ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ নেই এবং তিনি আল্লাহ্র বান্দা ও রাসূল।
অতঃপর তিনি বললেন: “হে লোক সকল! আমি তো কেবল একজন মানুষ এবং আল্লাহ্র রাসূল। আমি তোমাদেরকে আল্লাহ্র কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। তোমরা যদি জানো যে, আমি আমার রবের রিসালাতের কোনো কিছু পৌঁছানোতে ত্রুটি করেছি, তবে তোমরা আমাকে অবশ্যই জানাও, যাতে আমি আমার রবের রিসালাত যথাযথভাবে পৌঁছে দিতে পারি। আর যদি তোমরা জানো যে, আমি আমার রবের রিসালাত পৌঁছে দিয়েছি, তবে তোমরা আমাকে অবশ্যই জানাও।”
বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকেরা দাঁড়িয়ে গেল এবং বলল: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি আপনার রবের রিসালাত পৌঁছে দিয়েছেন, আপনার উম্মতকে উপদেশ দিয়েছেন এবং আপনার উপর অর্পিত দায়িত্ব পূর্ণ করেছেন। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তারা নীরব হয়ে গেল।
অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “অতঃপর, কিছু লোক মনে করে যে, এই সূর্যের গ্রহণ, এই চাঁদের গ্রহণ এবং নিজ নিজ স্থান থেকে এই নক্ষত্ররাজির সরে যাওয়া পৃথিবীর কোনো মহান ব্যক্তির মৃত্যুর কারণে ঘটে। তারা মিথ্যা বলেছে। বরং এগুলি আল্লাহ্র নিদর্শনসমূহের মধ্যে অন্যতম নিদর্শন, যা দ্বারা তিনি তাঁর বান্দাদের পরীক্ষা করেন, যেন তিনি দেখতে পারেন তাদের মধ্যে কারা তাওবা করে। আল্লাহ্র শপথ! আমি সালাতে দাঁড়ানোর পর থেকে তোমাদের দুনিয়া ও আখিরাতে তোমরা যা কিছুর সম্মুখীন হবে, তা দেখেছি। আল্লাহ্র শপথ! কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না ত্রিশজন মিথ্যাবাদী আবির্ভূত হয়। তাদের সর্বশেষ হবে একচোখা দাজ্জাল। তার বাম চোখ মুছে দেওয়া (নষ্ট করা) থাকবে, যা দেখতে আনসারদের মধ্য থেকে একজন বৃদ্ধ, আবূ তিহয়াহ-এর চোখের মতো। আর যখনই সে বের হবে, সে নিজেকে আল্লাহ্ বলে দাবি করবে। অতএব, যে ব্যক্তি তার প্রতি ঈমান আনবে, তাকে সত্য বলে মানবে এবং তাকে অনুসরণ করবে, তার পূর্ববর্তী কোনো নেক আমলই তাকে কোনো উপকার দেবে না। আর যে ব্যক্তি তাকে অস্বীকার করবে ও মিথ্যাবাদী বলবে, তার পূর্ববর্তী কোনো আমলের জন্যই তাকে শাস্তি দেওয়া হবে না। আর সে হারাম শরীফ (মক্কা ও মদীনা) এবং বাইতুল মাকদিস ব্যতীত পৃথিবীর সর্বত্র কর্তৃত্ব প্রতিষ্ঠা করবে। সে বাইতুল মাকদিসে মুমিনদেরকে অবরোধ করে রাখবে। ফলে তারা সেখানে ভয়ানকভাবে প্রকম্পিত হবে। অতঃপর আল্লাহ্ তাকে এবং তার সেনাবাহিনীকে পরাজিত করবেন। এমনকি দেয়ালের গোড়া অথবা গাছের মূল পর্যন্ত ডেকে বলবে: ‘হে মুমিন! আমার পেছনে একজন কাফির লুকিয়ে আছে, তুমি এসো এবং তাকে হত্যা করো।’”
তিনি বললেন: “আর এমনটি ঘটবে না, যতক্ষণ না তোমরা এমন কিছু বিষয় দেখতে পাও যার গুরুত্ব তোমাদের দৃষ্টিতে বেড়ে যাবে এবং তোমরা নিজেদের মধ্যে বলাবলি করবে: তোমাদের নবী কি এ বিষয়ে তোমাদের কাছে কিছু বলেছিলেন? এবং যতক্ষণ না পর্বতমালা নিজ নিজ স্থান থেকে সরে যায়। অতঃপর এর পরপরই হবে রূহ কবজ করা।”—এ কথা বলে তিনি হাত দিয়ে ইশারা করলেন।
বর্ণনাকারী (থা‘লাবাহ) বলেন: অতঃপর আমি তাঁর (সামুরার) আরেকটি খুতবায় উপস্থিত হলাম। তিনি এই হাদীসটি বর্ণনা করলেন, যার কোনো অংশ তিনি আগে বা পরে করেননি (অর্থাৎ, হুবহু একই রকম বর্ণনা করলেন)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تصحف في المطبوع إلى: يحيى، بالتحتانية آخر الحروف، والصواب: تحيى، بالتاء، وقد ضبطه ابن حجر في "الإصابة" 4/ 27 بكسر المثناة وسكون الحاء المهملة وفتح التحتانية.
[2] ورد هنا في "صحيح ابن حبان" (2856) من وجه آخر عن الأسود بن قيس ما نصه: قال الأسود: وظني أنه قد حدثني أنَّ عيسى ابن مريم يصيح فيه.
1245 [3] - إسناده ضعيف لجهالة ثعلبة بن عباد، ولبعضه شواهد. أبو النضر: هو هاشم بن القاسم، وأبو نعيم: هو الفضل بن دكين، وزهير: هو ابن معاوية.وأخرجه ابن حبان (2852) من طريق ابن أبي شيبة، عن أبي نعيم الفضل بن دكين، بهذا الإسناد. ولم يسق لفظ خطبة النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه بطوله أحمد 33/ (20178)، ودون ذكر خطبة النبي صلى الله عليه وسلم أبو داود (1184)، والنسائي (1882) من طرق عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه أحمد (20190)، وابنه عبد الله في زياداته على "المسند" (20191)، وابن حبان (2856) من طريق أبي عوانة، عن الأسود بن قيس، به. اختصره أحمد وابنه ولم يذكراه بتمامه.وأخرج أحمد (20180) عن أبي داود الحفري، عن سفيان، عن الأسود، عن ثعلبة، عن سمرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم خطب حين انكسفت الشمس، فقال: "أما بعد".وسيأتي مختصرًا بعدم الجهر في صلاة الكسوف برقم (1257) في أواخر هذا الباب، ويأتي تخريجه هناك.قوله: "نرمي غَرَضًا" أي: هدفًا. "قِيد رمحين" بكسر القاف، أي: قدرهما."آضت" بالمد، أي: رجعت وصارت."تَنُّومة" بفتح مثناة من فوق وتشديد نون: نبتٌ لونه يضرب إلى السواد."يتفاقم": يتعاظم."تسّاءلون" بتشديد السين، أي: تتساءلون. قاله السندي في حاشيته على "مسند أحمد".
1246 - حدثنا أبو محمد عبد الله بن جعفر بن دَرَستَوَيهِ الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان الفارسي، حدثنا عبد العزيز بن عبد الله الأُوَيْسي، حدثنا مسلم بن خالد، عن إسماعيل بن أُمية، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ الشمس كَسَفَت يومَ مات إبراهيم ابنُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فظنَّ الناس أنما انكَسَفَت لِموتِه، فقام النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "أيها الناس، إنما الشمسُ والقمرُ آيتانِ من آيات الله، لا يَنكَسِفانِ لموتِ أحدٍ ولا لحياتِه، فإذا رأيتم ذلك فقوموا إلى الصلاة وإلى ذِكرِ الله، وادعُوا، وتصدَّقوا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পুত্র ইবরাহীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেদিন মারা যান, সেদিন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন লোকেরা মনে করল যে, তার মৃত্যু হওয়ার কারণেই সূর্যগ্রহণ হয়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন: "হে লোক সকল, সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারও মৃত্যু বা জীবনের কারণে গ্রহণ হয় না। সুতরাং যখন তোমরা তা দেখতে পাও, তখন সালাত ও আল্লাহর যিকিরের জন্য দাঁড়াও, এবং দু'আ করো, আর দান-খয়রাত করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد فيه ضعفٌ، مسلم بن خالد - وهو الزنجي - ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد توبع إلا في قوله: "وادعوا وتصدقوا"، لكن لهذه العبارة ما يشهد لها كما سيأتي بيانه.وأخرجه ابن خزيمة (1400) عن محمد بن يحيى، عن عبد العزيز بن عبد الله الأويسي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 10/ (5883)، والبخاري (1042) و (3201)، ومسلم (914)، والنسائي (1857)، وابن حبان (2828) من طريق عبد الرحمن بن القاسم بن محمد بن أبي بكر الصديق، عن أبيه، عن عبد الله بن عمر. لم يذكر فيه قوله: "وادعوا وتصدقوا"، لكن هذه العبارة لها شاهد صحيح من حديث عائشة سيأتي برقم (1249). هي بنت المنذر، وهي امرأة هشام، وأسماء: هي بنت أبي بكر الصديق.وأخرجه أحمد 44/ (26924)، وأبو داود (1192)، وابن حبان (2855) من طريق معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (2519) عن موسى بن مسعود، به.وأخرجه البخاري (1054) عن ربيع بن يحيى، عن زائدة بن قدامة، به.وأخرجه أحمد (26923)، والبخاري (2520) من طريق عثام بن علي، عن هشام بن عروة، به.وانظر ما بعده.
1247 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثنا معاوية بن عمرو.وأخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن عتَّاب العَبْدي ببغداد، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حُذيفة موسى بن مسعود؛ قالا: حدثنا زائدة، عن هشام بن عُرْوة، عن فاطمة، عن أسماءَ، قالت: أمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعَتَاقةِ في كُسُوف الشَّمس [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.وله شاهد صحيح على شرط مسلم:
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্যগ্রহণের সময় দাস মুক্ত করার নির্দেশ দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. معاوية بن عمرو: هو ابن مهلَّب الأزدي، وزائدة: هو ابن قدامة، وفاطمة: هي بنت المنذر، وهي امرأة هشام، وأسماء: هي بنت أبي بكر الصديق.وأخرجه أحمد 44/ (26924)، وأبو داود (1192)، وابن حبان (2855) من طريق معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (2519) عن موسى بن مسعود، به.وأخرجه البخاري (1054) عن ربيع بن يحيى، عن زائدة بن قدامة، به.وأخرجه أحمد (26923)، والبخاري (2520) من طريق عثام بن علي، عن هشام بن عروة، به.وانظر ما بعده.
1248 - أخبرَناه إسماعيل بن محمد بن الفَضْل بن محمد الشَّعراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن حمزة، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن هشام بن عُرْوة، عن فاطمة بنت المُنذِر، عن أسماءَ بنت أبي بكر قالت: أمَرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بَعَتَاقةٍ حين كَسَفتِ الشَّمس [1].
আসমা বিনত আবি বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্য গ্রহণের সময় দাস মুক্ত করার নির্দেশ দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل إبراهيم بن حمزة الزبيري وعبد العزيز بن محمد الدراوردي.وعلَّقه البخاري بإثر الحديث (2519) عن علي بن المديني عن عبد العزيز الدراوردي. ووقع في روايتي البخاري (1058) وأحمد (24571): "فإذا رأيتم ذلك فافزعوا إلى الصلاة" ليس فيهما: "ادعوا وتصدقوا وأعتقوا"، ورواية أحمد (24045) ذكر صفة صلاة الكسوف بطول القيام والركوع، ولم يذكر فيها: "فإذا رأيتم ذلك … " إلى آخره.وستأتي قطع من حديث الكسوف من طريق عروة عن عائشة، بالأرقام (1254) و (1255) و (1258)، ومن طريق عطاء عن عائشة برقم (1251).
1249 - حدثنا عمرو بن محمد العَدْلُ وأحمد بن يعقوب الثَّقَفي، قالا: حدثنا عمر بن حفص السَّدُوسي، حدثنا عاصم بن علي، حدثنا الليث بن سعد، عن هشام بن عُروة، عن عروة، عن عائشة قالت: خَسَفَت الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث وقال فيه: "فإذا رأيتُم ذلك فادْعُوا الله وصلُّوا وتصدَّقوا وأعتِقُوا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। [রাবী] অবশিষ্ট হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং তাতে বলেন: "যখন তোমরা তা দেখতে পাও, তখন তোমরা আল্লাহর নিকট দু'আ করো, সালাত আদায় করো, সাদকা দাও এবং গোলাম আযাদ করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عاصم بن علي - وهو ابن عاصم بن صهيب الواسطي - وقد توبع.وأخرجه مطوَّلًا ومختصرًا أحمد 40/ (24045) و 41/ (24571) و 42/ (25312) و (25352)، والبخاري (1044) و (1058)، ومسلم (901) (1) و (2)، وأبو داود (1191)، والنسائي (1872)، وابن حبان (2845) و (2846) من طرق عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد. ووقع في روايتي البخاري (1058) وأحمد (24571): "فإذا رأيتم ذلك فافزعوا إلى الصلاة" ليس فيهما: "ادعوا وتصدقوا وأعتقوا"، ورواية أحمد (24045) ذكر صفة صلاة الكسوف بطول القيام والركوع، ولم يذكر فيها: "فإذا رأيتم ذلك … " إلى آخره.وستأتي قطع من حديث الكسوف من طريق عروة عن عائشة، بالأرقام (1254) و (1255) و (1258)، ومن طريق عطاء عن عائشة برقم (1251).
1250 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار، حدثنا زكريا بن داود أبو يحيى الخَفّاف، حدثنا عبيد الله بن عمر بن مَيْسَرة، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن أبي قِلَابة، عن النُّعمان بن بَشِير: أنَّ الشمس انكسفت، فصلَّى النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين حتى انجَلَت، ثم قال: "إنَّ الشمس والقمر لا يَنكسفان لموت أحد، ولكنّهما خَلْقانِ من خَلْقِه، ويُحدِث الله في خَلْقِه ما شاء، ثم إِنَّ الله تبارك وتعالى إذا تجلَّى لشيءٍ [1] من خَلْقِه خَشع له، فأيهما انخسف فصلُّوا حتى يَنجَليَ أو يُحدِثَ الله أمرًا" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.
নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে সূর্য গ্রহণ হয়েছিল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি রাকআত সালাত আদায় করলেন যতক্ষণ না গ্রহণ মুক্ত হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না, বরং এ দুটি তাঁর (আল্লাহর) সৃষ্টির দুটি সৃষ্টি। আল্লাহ তাঁর সৃষ্টিতে যা ইচ্ছা তা সংঘটিত করেন। অতঃপর আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা যখন তাঁর সৃষ্টির কোনো কিছুর প্রতি তাজাল্লি (মহিমা প্রকাশ) করেন, তখন তা তাঁর সামনে বিনীত হয়। অতএব, এই দুটির মধ্যে যখনই কোনোটি গ্রহণগ্রস্ত হবে, তোমরা সালাত আদায় করতে থাকো যতক্ষণ না তা মুক্ত হয় অথবা আল্লাহ কোনো নতুন ফয়সালা করেন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: لبشر، وهو خطأ، والتصويب من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج. بدلًا من أبي قلابة.وأخرجه أحمد 30/ (18365) من طريق عبد الوهاب الثقفي، وأبو داود (1193) من طريق الحارث بن عمير البصري، كلاهما عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير. في رواية الحارث: فجعل يصلي ركعتين ركعتين ويسأل عنها حتى انجلت. وفي رواية عبد الوهاب الثقفي: فكان يصلي ركعتين ويسأل، ويصلي ركعتين ويسأل، حتى انجلت. ورواية عبد الوهاب عن أيوب هذه تخالف روايته عن أيوب نفسه عن أبي قلابة عن قبيصة الهلالي الآتية برقم (1253)، فتلك فيها أنه صلى ركعتين فقط أطال فيهما القيام، وهذه فيها أنه صلى ركعتين ركعتين ويسأل حتى انجلت.وقد تابع عبدَ الوهاب الثقفي في لفظه عبدُ الوارث بنُ سعيد، لكن خالفه في إسناده عن أيوب، فقد أخرجه أحمد (18351) من طريق عبد الوارث هذا عن أيوب، عن أبي قلابة، عن رجل، عن النعمان بن بشير.وأخرجه ابن ماجه (1262)، والنسائي (1883) من طريق عبد الوهاب الثقفي، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير. وفيه: فلم يزل يصلي حتى انجلت الشمس، وزاد النسائي: "فصلوا كأحدث صلاة صليتموها من المكتوبة".وأخرجه أحمد (18392) و (18443)، والنسائي (1887) من طريق عاصم الأحول، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير، بلفظ: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى حين انكسفت الشمس مثل صلاتنا يركع ويسجد.وللتوسع في تخريج هذا الحديث والكلام عليه انظر تعليقنا على "مسند أحمد" و"سنن أبي داود".
[2] إسناده ضعيف لانقطاعه واضطرابه، ولاضطراب وشذوذ في متنه أيضًا، أبو قلابة - وهو عبد الله بن زيد الجرمي - لم يسمع من النعمان، وقد أشار البخاري إلى ضعف هذا الحديث فيما حكاه عنه الترمذي في "علله الكبير" 1/ 299 - 300. معاذ بن هشام: هو ابن أبي عبد الله الدستوائي.وقوله في الحديث: "إنَّ الله تبارك وتعالى إذا تجلى لشيء من خلقه خشع" زيادة شاذة لم ترد في سائر الأحاديث الصحيحة الواردة في الكسوف، فليس في شيء منها أنَّ سبب الكسوف هو تجلي الله سبحانه وتعالى للشمس أو القمر.وأخرجه مختصرًا النسائي (1886) عن محمد بن المثنى، عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. (1886) ولفظه: أنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا انخسفت الشمس والقمر فصلوا كأحدث صلاة صليتموها".وخالف ابنَ المثنى ابنُ بشار، فقد أخرجه النسائي (1888) و (11408) عن محمد بن بشار، عن معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن الحسن، عن النعمان بن بشير. فجعل الحسن البصري بدلًا من أبي قلابة.وأخرجه أحمد 30/ (18365) من طريق عبد الوهاب الثقفي، وأبو داود (1193) من طريق الحارث بن عمير البصري، كلاهما عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير. في رواية الحارث: فجعل يصلي ركعتين ركعتين ويسأل عنها حتى انجلت. وفي رواية عبد الوهاب الثقفي: فكان يصلي ركعتين ويسأل، ويصلي ركعتين ويسأل، حتى انجلت. ورواية عبد الوهاب عن أيوب هذه تخالف روايته عن أيوب نفسه عن أبي قلابة عن قبيصة الهلالي الآتية برقم (1253)، فتلك فيها أنه صلى ركعتين فقط أطال فيهما القيام، وهذه فيها أنه صلى ركعتين ركعتين ويسأل حتى انجلت.وقد تابع عبدَ الوهاب الثقفي في لفظه عبدُ الوارث بنُ سعيد، لكن خالفه في إسناده عن أيوب، فقد أخرجه أحمد (18351) من طريق عبد الوارث هذا عن أيوب، عن أبي قلابة، عن رجل، عن النعمان بن بشير.وأخرجه ابن ماجه (1262)، والنسائي (1883) من طريق عبد الوهاب الثقفي، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير. وفيه: فلم يزل يصلي حتى انجلت الشمس، وزاد النسائي: "فصلوا كأحدث صلاة صليتموها من المكتوبة".وأخرجه أحمد (18392) و (18443)، والنسائي (1887) من طريق عاصم الأحول، عن أبي قلابة، عن النعمان بن بشير، بلفظ: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى حين انكسفت الشمس مثل صلاتنا يركع ويسجد.وللتوسع في تخريج هذا الحديث والكلام عليه انظر تعليقنا على "مسند أحمد" و"سنن أبي داود".
1251 - حدثنا علي بن عيسى الحِيْري، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن ابن جُريج، عن عطاء، قال: أخبَرَني من أُصدِّق - يريد عائشة - قالت: كَسَفَت الشمس على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم قيامًا شديدًا، يقوم بالناس ثم يركع، ثم يقوم ثم يركع، ثم يقوم ثم يركع، فركع ركعتين في كلِّ ركعةٍ ثلاثُ رَكَعات، فركع الثالثة ثم سَجَد، حتى إنَّ رجالًا يومئذٍ ليُغشَى عليهم مما قام بهم، حتى إنَّ سِجَال الماء لتُصَبُّ عليهم؛ يقول إذا ركع: "الله أكبر" وإذا رفع قال: "سمع الله لمن حَمِده" حتى تجلَّت الشمس، ثم قال: "إنَّ الشمس والقمر لا يَنكسفان لموتِ أحدٍ ولا لحياتِه، ولكنهما آيتانِ من آياتِ الله يخوِّف بهما عبادَه، فإذا كَسَفا فافزعوا إلى الصلاة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما خرَّجه مسلم من حديث معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن عطاء، عن عُبَيد بن عُمَير، بغير هذا اللفظ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অত্যন্ত দীর্ঘ কিয়াম করলেন। তিনি লোকদের নিয়ে কিয়াম করতেন, তারপর রুকু করতেন, তারপর আবার কিয়াম করতেন, তারপর রুকু করতেন, তারপর আবার কিয়াম করতেন, তারপর রুকু করতেন। তিনি দু'রাকাআত সালাত আদায় করলেন, যার প্রতিটি রাকাআতে তিনটি করে রুকু ছিল। তিনি তৃতীয় রুকু করার পর সিজদা করলেন। এমনকি সে দিন কিছু লোক এত দীর্ঘ কিয়ামের কারণে বেহুঁশ হয়ে যাচ্ছিলেন, যার ফলে তাদের উপর পানির মশক থেকে পানি ঢালা হচ্ছিল। তিনি যখন রুকু করতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহু আকবার" এবং যখন মাথা ওঠাতেন, তখন বলতেন: "সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ"। অবশেষে সূর্য আলোকিত হয়ে গেল। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যু বা জন্মের কারণে গ্রহণ হয় না। বরং এগুলো আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলো দ্বারা তিনি তাঁর বান্দাদেরকে সতর্ক করেন। সুতরাং যখন এগুলো গ্রহণ হয়, তখন তোমরা সালাতের দিকে ধাবিত হও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، على خطأ وقع في إسناده هنا، فالصواب: عن عطاء عن عبيد بن عمير، قال: أخبرني من أُصدِّق، هكذا رواه أبو داود عن عثمان بن أبي شيبة، وكذا في سائر مصادر التخريج، ولا ندري هل الخطأ ممن هو دون عثمان بن أبي شيبة، أم أنه سقطٌ قديمٌ من نسخ "المستدرك".ثم إنَّ الحديث معلٌّ في مخالفة عبيد بن عمير سائر الرواة عن عائشة الذين رووا صفة صلاته صلى الله عليه وسلم للكسوف بأنها أربع ركوعات وأربع سجدات، ومعلٌّ أيضًا في الاختلاف في رفعه ووقفه، انظر تفصيل ذلك في تعليقنا على "سنن أبي داود" (1177). ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (1177) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وذكر فيه عبيد بن عمير بين عطاء وعائشة، وكذلك سائر مصادر التخريج فيما سنذكره.وأخرجه النسائي (1866) عن يعقوب بن إبراهيم، عن إسماعيل ابن علية، به.وأخرجه مسلم (901) (6) من طريق محمد بن بكر، عن ابن جريج، به.وأخرج أحمد 41/ (24472) من طريق حماد بن سلمة، عن قتادة، عن عطاء، عن عبيد بن عمير، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقوم في صلاة الإنابة فيركع ثلاث ركعات ثم يسجد، ثم يركع ثلاث ركعات ثم يسجد.ورواه هشام الدستوائي عن قتادة واختلف عليه فيه، فرواه عنه ابنه معاذ فرفعه، ورواه غيره فوقفه، كما:أخرجه مسلم (901) (7)، والنسائي (508) و (1867)، وابن حبان (2830) من طريق معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن عطاء، عن عبيد بن عمير، عن عائشة: أنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم صلى ست ركعات وأربع سجدات. فذكره مرفوعًا.وأخرجه النسائي (509) و (1868) من طريق وكيع، و (510) من طريق يحيى بن سعيد، كلاهما عن هشام به إلى عائشة قالت: صلاة الآيات ست ركعات في أربع سجدات. فذكراه هكذا موقوفًا.وانظر ما سلف برقم (1249).
1252 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن أحمد بن موسى القاضي ببُخارى، أخبرنا محمد بن أيوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن أبي جعفر الرَّازي، حدثني أبي، عن أبيه، عن الرَّبيع بن أنس، عن أبي العاليَة، عن أُبي بن كعب قال: انكَسَفَت الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى بهم فقرأ سورةً من الطُّوَل، ثم رَكَع خمسَ رَكَعات، وسَجَد سجدتين، ثم قام الثانيةَ فقرأ من الطُّوَل، ثم ركع خمسَ رَكَعات وسَجَد سجدتين، ثم قام الثالثةَ فقرأ من الطُّوَل، ثم ركع خمسَ رَكَعات وسَجَد سجدتين، ثم جلس كما هو، مُستقبِلَ القبلةِ يدعو حتى تجلَّى كُسوفُها [1].الشيخان قد هَجَرا أبا جعفر الرازي ولم يُخرجا عنه، وحاله عند سائر الأئمة أحسنُ الحال، وهذا الحديث فيه ألفاظٌ، ورواته صادقون [2].
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল এবং নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন এবং (কুরআনের) লম্বা সূরাসমূহের মধ্য থেকে একটি সূরা পড়লেন, অতঃপর তিনি পাঁচবার রুকূ করলেন এবং দুই সিজদা করলেন। অতঃপর তিনি দ্বিতীয়বার দাঁড়ালেন এবং লম্বা সূরাসমূহের মধ্য থেকে (একটি সূরা) পড়লেন, অতঃপর তিনি পাঁচবার রুকূ করলেন এবং দুই সিজদা করলেন। অতঃপর তিনি তৃতীয়বার দাঁড়ালেন এবং লম্বা সূরাসমূহের মধ্য থেকে (একটি সূরা) পড়লেন, অতঃপর তিনি পাঁচবার রুকূ করলেন এবং দুই সিজদা করলেন। অতঃপর তিনি সেই অবস্থায় কিবলার দিকে মুখ করে বসে দু'আ করতে থাকলেন, যতক্ষণ না গ্রহণটি মুক্ত হয়ে গেল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، أبو جعفر الرازي، واسمه: عيسى بن ماهان، وابنه عبد الله فيهما مقال، قال الذهبي في "تلخيص المستدرك": خبر منكر، وعبد الله بن أبي جعفر ليس بشيء، وأبوه فيه لين. قلنا: وقد يقع لأبي جعفر الرازي في روايته عن الربيع بن أنس اضطراب كثير، كما قال ابن حبان في "الثقات" 4/ 228، ثم إن أبا جعفر قد تفرد بهذا الحديث.وأخرجه أبو داود (1182) عن أحمد بن الفرات الرازي، عن محمد بن عبد الله بن أبي جعفر الرازي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (1182)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" 35/ (21225) من طريق عمر بن شقيق، عن أبي جعفر الرازي، به.قوله: "من الطول"، قال السندي في حاشيته على "المسند": هو بضم ففتح: جمع الطُّولى، كالكُبَر جمع الكُبرى، قيل: هي من البقرة إلى براءة، ومنهم من استثنى الأنفال وعدَّ الباقي.وقوله: "خمس ركعات" يعني: خمسة ركوعات في ركعة واحدة. سيئ الحفظ، وقال أبو زرعة: شيخ يهم كثيرًا، وقال النسائي: ليس بالقوي، وقال ابن حبان: كان ينفرد عن المشاهير بالمناكير، لا يعجبني الاحتجاج بحديثه إلّا فيما وافق الثقات. انظر ترجمته في "تهذيب الكمال".قلنا: ومثل هذا لا يحتمل تفرده، وقد تفرَّد هنا بهذه الألفاظ، والله أعلم.
[2] أبو جعفر الرازي: وثقه إسحاق بن منصور، وعلي بن المديني، وأبو حاتم، وقال عنه أحمد بن حنبل: صالح الحديث، وقال ابنه عبد الله: ليس بالقوي في الحديث، وقال يحيى بن معين: يكتب حديثه لكنه يخطئ، وقال مرةً: صالح، وقال عمرو بن علي: فيه ضعف وهو من أهل الصدق سيئ الحفظ، وقال أبو زرعة: شيخ يهم كثيرًا، وقال النسائي: ليس بالقوي، وقال ابن حبان: كان ينفرد عن المشاهير بالمناكير، لا يعجبني الاحتجاج بحديثه إلّا فيما وافق الثقات. انظر ترجمته في "تهذيب الكمال".قلنا: ومثل هذا لا يحتمل تفرده، وقد تفرَّد هنا بهذه الألفاظ، والله أعلم.
1253 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا السَّرِي بن خُزيمة، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا وُهَيب، عن أيوب، عن أبي قِلَابة، عن قَبِيصةَ الهِلالي قال: كَسَفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرج فَزِعًا يجرُّ ثوبه، وأنا معه يومئذٍ بالمدينة، فصلى ركعتين، فأطال فيهما القيام، ثم انصرف وانجَلَت، فقال: "إنما هذه الآياتُ يخوِّف الله بها، فإذا رأيتُموها - يعني - فصلُّوا كأحدَثِ صلاةٍ صلَّيتُموها من المكتوبة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، والذي عندي أنهما علَّلاه بحديث رَيْحان بن سعيد، عن عبَّاد بن منصور، عن أيوب، عن أبي قِلابة، عن هلال بن عامر، عن قَبِيصة، وحديثٌ يرويه موسى بن إسماعيل عن وُهَيب لا يعلِّله حديثُ ريحان وعبّاد [2].
ক্বাবীসাহ আল-হিলালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভীত সন্ত্রস্ত অবস্থায় তাঁর কাপড় টানতে টানতে বেরিয়ে এলেন। আমি সেই দিন মদিনায় তাঁর সাথেই ছিলাম। অতঃপর তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন এবং তাতে দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন এবং (সূর্য) উজ্জ্বল হয়ে গেল (গ্রহণ কেটে গেল)। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই সকল নিদর্শন আল্লাহ তা'আলা ভয় দেখানোর জন্য পাঠান। যখন তোমরা এগুলো দেখতে পাও—তখন তোমরা এমনভাবে সালাত আদায় করো, যেমনভাবে তোমরা তোমাদের সর্বশেষ ফরয সালাত আদায় করেছ।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، أبو قلابة - وهو عبد الله بن زيد الجَرمي - لم يسمع هذا الحديث من قبيصة، ذكر ذلك البيهقي في "السنن" 3/ 334، بينهما هلال بن عامر - وقيل: عمرو - كما في رواية أبي داود (1186)، وهلال بن عامر هذا لا يُعرف كما قال الذهبي في "الميزان"، ثم إنَّ في إسناده اضطرابًا، فقد روي الحديث من طريق أيوب - وهو ابن أبي تميمة - عن أبي قلابة عن النعمان بن بشير، كما سلف برقم (1250)، وقد بيَّنا علله هناك. وُهَيب: هو ابن خالد، وصحابيه قبيصة الهلالي: هو قبيصة بن المخارق أبو بشر.وأخرجه أبو داود (1185) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 34/ (20607) عن عبد الوهاب الثقفي، والنسائي (1884) من طريق عبيد الله بن الوازع، كلاهما عن أيوب، به. وجعله عبد الوهاب مرّةً من حديث النعمان بن بشير كما سلف عند حديثه.وأخرجه بنحوه النسائي (1885) عن محمد بن المثنى، عن معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن أبي قلابة، عن قبيصة. وفيه: أنه صلَّى ركعتين ركعتين.
[2] حديث ريحان بن سعيد عن عباد بن منصور، أخرجه أبو داود (1186) كما سلفت الإشارة إليه قبل قليل، وعباد بن منصور فيه ضعف. وقد بيَّنا أنَّ هذه ليست العلة الوحيدة، بل هناك اضطراب وشذوذ أيضًا، والله أعلم. وقال البخاري: حديث عائشة رضي الله عنها أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم جهر بالقراءة في صلاة الكسوف، أصح عندي من حديث سمرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أسرّ القراءة فيها. حكاه عنه الترمذي كما في "سنن البيهقي" 3/ 336، وقد بسطنا الكلام في ذلك في تعليقنا على "سنن أبي داود".الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب.وأخرجه مختصرًا كلفظ رواية المصنف: أبو داود (1188) عن العباس بن الوليد بن مزيد، بهذا الإسناد.وأخرج مسلم (901) (4)، والنسائي (1871) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، به إلى عائشة: أنَّ الشمس خسفت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبعث مناديًا: "الصلاة جامعة"، فاجتمعوا، وتقدم فكبر، وصلَّى أربع ركعات في ركعتين وأربع سجدات. هكذا لم يذكر فيه الجهر بالقراءة.وأخرجه مختصرًا كرواية المصنف هنا، ومطولًا مشتملًا عليها: أحمد 40/ (24365) و 41/ (24473)، والبخاري (1065)، ومسلم (901) (5)، والترمذي (563)، والنسائي (1892) و (1893) و (1894)، وابن حبان (2849) و (2850) من طرق عن الزهري، به.وأخرج الحديث بطوله، لكن دون ذكر الجهر بالقراءة: أحمد 41/ (24571) و 42/ (25351)، والبخاري (1046) و (1047) و (1058) و (1212) و (3203)، ومسلم (901) (3)، وأبو داود (1180)، وابن ماجه (1263)، والترمذي (561)، والنسائي (1870) و (1897)، وابن حبان (2841) و (2842) من طرق أيضًا عن الزهري، به.وانظر ما قبله، وما سلف برقم (1249).
1254 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا الحسن بن أحمد بن الليث الرازي، حدثنا عُبيد الله بن سعد، حدثنا عمِّي، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني هشام بن عُرْوة. وعبدُ الله بن أبي سَلَمة، عن سليمان بن يسار؛ كلٌّ قد حدَّثَني عن عُرْوة، عن عائشة قالت: كَسَفَت الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّى بالناس، قالت: فحَزَرْتُ قراءته فرأيتُ أنه قرأ سورة البقرة ثم سجد سجدتين، ثم قام فأطال القراءةَ، فحَزَرْتُ قراءته فرأيتُ أنه قرأ سورة آل عمران [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، إنما اتفقا على حديث الزهري وهشام عن عروة بلفظ آخر [2].
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে (সময়ে) সূর্য গ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি (আয়েশা) বলেন: আমি তাঁর কিরাআত (কুরআন পাঠ) অনুমান করে দেখলাম যে তিনি সূরা আল-বাক্বারাহ পাঠ করলেন, অতঃপর তিনি দুটি সিজদা করলেন। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘ কিরাআত করলেন। আমি তাঁর কিরাআত অনুমান করে দেখলাম যে তিনি সূরা আলে ইমরান পাঠ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرَّح بالتحديث فانتفت شبهة تدليسه. ولابن إسحاق في هذا الإسناد شيخان، فهو يرويه مرة عن هشام عن عروة عن عائشة، ويرويه مرة عن عبد الله بن أبي سلمة عن سليمان بن يسار عن عروة عن عائشة.عبيد الله بن سعد: هو ابن إبراهيم بن سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، وعمُّه: هو يعقوب بن إبراهيم.وأخرجه أبو داود (1187) عن عبيد الله بن سعد، بهذا الإسناد. وقال البخاري: حديث عائشة رضي الله عنها أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم جهر بالقراءة في صلاة الكسوف، أصح عندي من حديث سمرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أسرّ القراءة فيها. حكاه عنه الترمذي كما في "سنن البيهقي" 3/ 336، وقد بسطنا الكلام في ذلك في تعليقنا على "سنن أبي داود".الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب.وأخرجه مختصرًا كلفظ رواية المصنف: أبو داود (1188) عن العباس بن الوليد بن مزيد، بهذا الإسناد.وأخرج مسلم (901) (4)، والنسائي (1871) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، به إلى عائشة: أنَّ الشمس خسفت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبعث مناديًا: "الصلاة جامعة"، فاجتمعوا، وتقدم فكبر، وصلَّى أربع ركعات في ركعتين وأربع سجدات. هكذا لم يذكر فيه الجهر بالقراءة.وأخرجه مختصرًا كرواية المصنف هنا، ومطولًا مشتملًا عليها: أحمد 40/ (24365) و 41/ (24473)، والبخاري (1065)، ومسلم (901) (5)، والترمذي (563)، والنسائي (1892) و (1893) و (1894)، وابن حبان (2849) و (2850) من طرق عن الزهري، به.وأخرج الحديث بطوله، لكن دون ذكر الجهر بالقراءة: أحمد 41/ (24571) و 42/ (25351)، والبخاري (1046) و (1047) و (1058) و (1212) و (3203)، ومسلم (901) (3)، وأبو داود (1180)، وابن ماجه (1263)، والترمذي (561)، والنسائي (1870) و (1897)، وابن حبان (2841) و (2842) من طرق أيضًا عن الزهري، به.وانظر ما قبله، وما سلف برقم (1249).
[2] حديث الزهري عن عروة هو الآتي بعده، وحديث هشام عن عروة سلف برقم (1249). وقال البخاري: حديث عائشة رضي الله عنها أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم جهر بالقراءة في صلاة الكسوف، أصح عندي من حديث سمرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أسرّ القراءة فيها. حكاه عنه الترمذي كما في "سنن البيهقي" 3/ 336، وقد بسطنا الكلام في ذلك في تعليقنا على "سنن أبي داود".الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب.وأخرجه مختصرًا كلفظ رواية المصنف: أبو داود (1188) عن العباس بن الوليد بن مزيد، بهذا الإسناد.وأخرج مسلم (901) (4)، والنسائي (1871) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، به إلى عائشة: أنَّ الشمس خسفت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبعث مناديًا: "الصلاة جامعة"، فاجتمعوا، وتقدم فكبر، وصلَّى أربع ركعات في ركعتين وأربع سجدات. هكذا لم يذكر فيه الجهر بالقراءة.وأخرجه مختصرًا كرواية المصنف هنا، ومطولًا مشتملًا عليها: أحمد 40/ (24365) و 41/ (24473)، والبخاري (1065)، ومسلم (901) (5)، والترمذي (563)، والنسائي (1892) و (1893) و (1894)، وابن حبان (2849) و (2850) من طرق عن الزهري، به.وأخرج الحديث بطوله، لكن دون ذكر الجهر بالقراءة: أحمد 41/ (24571) و 42/ (25351)، والبخاري (1046) و (1047) و (1058) و (1212) و (3203)، ومسلم (901) (3)، وأبو داود (1180)، وابن ماجه (1263)، والترمذي (561)، والنسائي (1870) و (1897)، وابن حبان (2841) و (2842) من طرق أيضًا عن الزهري، به.وانظر ما قبله، وما سلف برقم (1249).
1255 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن الوليد بن مَزْيَد، حدثني أبي، حدثنا الأوزاعي، أخبرني الزُّهري، أخبرني عُرْوة بن الزُّبير، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ قراءةً طويلةً يَجهَر بها في صلاةِ الكسوف [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا [2].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্যগ্রহণ/চন্দ্রগ্রহণের সালাতে (সালাতুল কুসূফ) দীর্ঘ কিরাআত পড়তেন এবং তিনি তা উচ্চস্বরে পাঠ করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، وقد أعلَّه بعضهم بعلل لا تنتهض، ولا يُعلُّ بمثلها حديث أخرجه الشيخان، وقال البخاري: حديث عائشة رضي الله عنها أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم جهر بالقراءة في صلاة الكسوف، أصح عندي من حديث سمرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أسرّ القراءة فيها. حكاه عنه الترمذي كما في "سنن البيهقي" 3/ 336، وقد بسطنا الكلام في ذلك في تعليقنا على "سنن أبي داود".الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب.وأخرجه مختصرًا كلفظ رواية المصنف: أبو داود (1188) عن العباس بن الوليد بن مزيد، بهذا الإسناد.وأخرج مسلم (901) (4)، والنسائي (1871) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، به إلى عائشة: أنَّ الشمس خسفت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبعث مناديًا: "الصلاة جامعة"، فاجتمعوا، وتقدم فكبر، وصلَّى أربع ركعات في ركعتين وأربع سجدات. هكذا لم يذكر فيه الجهر بالقراءة.وأخرجه مختصرًا كرواية المصنف هنا، ومطولًا مشتملًا عليها: أحمد 40/ (24365) و 41/ (24473)، والبخاري (1065)، ومسلم (901) (5)، والترمذي (563)، والنسائي (1892) و (1893) و (1894)، وابن حبان (2849) و (2850) من طرق عن الزهري، به.وأخرج الحديث بطوله، لكن دون ذكر الجهر بالقراءة: أحمد 41/ (24571) و 42/ (25351)، والبخاري (1046) و (1047) و (1058) و (1212) و (3203)، ومسلم (901) (3)، وأبو داود (1180)، وابن ماجه (1263)، والترمذي (561)، والنسائي (1870) و (1897)، وابن حبان (2841) و (2842) من طرق أيضًا عن الزهري، به.وانظر ما قبله، وما سلف برقم (1249).
[2] لفظه عندهما: جهر النبي صلى الله عليه وسلم في صلاة الخسوف بقراءته … ابن عباد، روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، انظر ترجمته في "تهذيب الكمال" للمزي، وليس هو النضر بن أنس بن مالك كما زعم المصنف، فلم يذكر أحد في الرواة عنه ابنه عبيد الله، لذلك استغرب الذهبي في "تلخيصه" من قول الحاكم: إنه عبيد الله بن النضر بن أنس بن مالك، فقال: إنه يقول لأبيه: يا أبا حمزة!محمد بن أبي صفوان: هو محمد بن عثمان بن أبي صفوان.وأخرجه أبو داود (1196) عن محمد بن عمرو بن جبلة بن أبي رواد، عن حرمي بن عمارة، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (1034)، وابن حبان (664) من طريق حميد الطويل، عن أنس بن مالك: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا هبّت الريح عُرف ذلك في وجهه.
1256 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدلُ، حدثنا عُبيد بن محمد الحافظ، حدثنا محمد بن أبي صفوان، حدثنا حَرَميُّ بن عُمَارة، عن عُبيد الله بن النَّضْر، حدثني أبي، قال: كانت ظُلْمةٌ على عهد أنس بن مالك، قال: فأتيتُ أنس بن مالك فقلت: يا أبا حمزة، هل كان يُصيبُكم مثلُ هذا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: مَعَاذَ الله، إن كان الرِّيح لَيَشتدُّ فنُبادِرُ إلى المسجد مخافةَ القيامة [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وعُبيد الله هذا: هو ابن النَّضْر بن أنس بن مالك، وقد احتَجّا بالنَّضر.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যামানায় একবার তীব্র অন্ধকার নেমে এসেছিল। (রাবী বলেন,) আমি আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম, "হে আবু হামযা! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগেও কি আপনারা এমন পরিস্থিতির সম্মুখীন হতেন?" তিনি বললেন, "আল্লাহর আশ্রয়! (না, এমন হতো না)। যখন বাতাস তীব্র আকার ধারণ করত, তখন আমরা কিয়ামতের ভয়ে দ্রুত মসজিদের দিকে ছুটে যেতাম।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قابل للتحسين، النضر والد عبيد الله: هو ابن عبد الله بن مطر القيسي، من ولد قيس ابن عباد، روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، انظر ترجمته في "تهذيب الكمال" للمزي، وليس هو النضر بن أنس بن مالك كما زعم المصنف، فلم يذكر أحد في الرواة عنه ابنه عبيد الله، لذلك استغرب الذهبي في "تلخيصه" من قول الحاكم: إنه عبيد الله بن النضر بن أنس بن مالك، فقال: إنه يقول لأبيه: يا أبا حمزة!محمد بن أبي صفوان: هو محمد بن عثمان بن أبي صفوان.وأخرجه أبو داود (1196) عن محمد بن عمرو بن جبلة بن أبي رواد، عن حرمي بن عمارة، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (1034)، وابن حبان (664) من طريق حميد الطويل، عن أنس بن مالك: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا هبّت الريح عُرف ذلك في وجهه.
1257 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا الحسين بن إدريس الأنصاري، حدثنا محمود بن غَيْلان، حدثنا وكيع، حدثنا سفيان، عن الأسْوَد بن قيس، عن ثَعلَبة بن عبَّاد، عن سَمُرة بن جُندُب قال: صلَّى بنا النبي صلى الله عليه وسلم في كُسوفٍ لا نَسمَعُ له صوتًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সূর্যগ্রহণের সালাত (নামায) আদায় করেন, কিন্তু আমরা তাঁর [তিলাওয়াতের] কোনো শব্দ শুনতে পাইনি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه ضعف لجهالة ثعلبة بن عبّاد، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه". سفيان: هو الثوري.وأخرجه الترمذي (562) عن محمود بن غيلان، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح، وقد ذهب بعض أهل العلم إلى هذا، وهو قول الشافعي.وأخرجه أحمد 33/ (20160)، وابن ماجه (1264)، وابن حبان (2851) من طريق وكيع، به.وأخرجه النسائي (1895) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، عن سفيان الثوري، به.ويشهد له حديث ابن عباس عند أحمد في "المسند" 4/ (2674) وإسناده حسن.وانظر الكلام على مسألة الجهر والإسرار في صلاة الكسوف في تعليقنا على "المسند" (2677) و"سنن ابن ماجه" (1264).
1258 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه وأبو بكر بن بالَوَيهِ الجَلَّاب، قالا: حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: خَسَفَت الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "إنَّ الشمس والقمر آيتان من آيات الله لا يَنخسِفان لموت أحدٍ ولا لحياته، فإذا رأيتموهما فتصدَّقوا وصلُّوا وكبِّروا وادْعُوا الله" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলি কারো মৃত্যু বা কারো জন্মের কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না। সুতরাং যখন তোমরা এ দুটিকে (গ্রহণগ্রস্ত) দেখবে, তখন তোমরা সাদাকা করো, সালাত আদায় করো, তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলো এবং আল্লাহর কাছে দোয়া করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، معاوية بن عمرو: هو الأزدي، وزائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه مختصرًا كرواية المصنف أبو داود (1191) من طريق مالك بن أنس، عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد.وهو قطعة من حديث الكسوف الطويل، سلف تخريجه عند الحديث رقم (1249) بما يغني عن إعادته هنا. تصلون، أو: بمثل صلاتكم. انظر تمام تخريجه والكلام عليه في "المسند".قال ابن حبان: قول أبي بكرة: فصلَّى بهم ركعتين نحو ما تصلون، أراد به: تصلون صلاة الكسوف ركعتين في أربع ركعات وأربع سجدات. وقال مرة: أراد: مثل صلاتكم في الكسوف.
1259 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا يوسف بن يعقوب، حدثنا محمد بن أبي بكر، حدثنا خالد بن الحارث، عن أشعث، عن الحسن، عن أبي بَكْرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى ركعتين بمِثلِ صلاتِكم هذه في كسوف الشمس والقمر [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وصلى الله على محمد وآله أجمعين من كتاب صلاة الخوف
আবূ বকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্যগ্রহণ ও চন্দ্রগ্রহণের সময় তোমাদের এই (সাধারণ) সালাতের মতোই দুই রাকাত সালাত আদায় করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وحسّنه الذهبي في "تلخيصه"، والحسن - وهو ابن أبي الحسن البصري - صرَّح بسماعه من أبي بكرة فيما علَّقه البخاري بإثر الحديث (1048). محمد بن أبي بكر: هو المقدَّمي، وأشعث: هو ابن عبد الملك الحُمراني.وأخرجه هكذا مختصرًا نحو رواية المصنف النسائي (1890) عن إسماعيل بن مسعود، عن خالد بن الحارث، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك ابن حبان (2837) من طريق النضر بن شميل، عن أشعث، به.وأخرج النسائي (505) و (1902)، وابن حبان (2835) من طريق يونس بن عبيد، عن الحسن، عن أبي بكرة قال: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم فكسفت الشمس، فقام صلى الله عليه وسلم عجلانًا إلى المسجد، فجرَّ إزاره أو ثوبه، وثاب إليه الناس، فصلَّى ركعتين نحو ما تصلون، ثم جُلِّي عنها، فقال صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الشمس والقمر آيتان من آيات الله يخوف بهما عباده، وإنهما لا ينكسفان لموت أحد من الناس" وكان ابنه توفي "فإذا رأيتم منها شيئًا فصلوا حتى يكشف ما بكم" لفظ ابن حبان، والموضع الأول عند النسائي مختصر.وأخرجه بنحو ذلك مطولًا أحمد 34/ (20390)، والبخاري (1040) لم يذكرا فيه: نحو ما تصلون، أو: بمثل صلاتكم. انظر تمام تخريجه والكلام عليه في "المسند".قال ابن حبان: قول أبي بكرة: فصلَّى بهم ركعتين نحو ما تصلون، أراد به: تصلون صلاة الكسوف ركعتين في أربع ركعات وأربع سجدات. وقال مرة: أراد: مثل صلاتكم في الكسوف.
1260 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أَسِيد بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي - واللفظ له - حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبي، حدثنا يحيى بن سعيد، عن سفيان، حدثني الأشعث بن سُلَيم، عن الأسود بن هلال، عن ثعلبة بن زَهْدَم قال: كنا مع سعيد بن العاص بطَبَرِسْتان فقال: أيُّكم صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ الخوف؟ فقال حذيفة: أنا، فقام حذيفةُ فصفَّ الناسَ خَلْفَه، وصفًّا موازيَ العدو، فصلى بالذين خَلْفَه ركعةً، ثم انصرف هؤلاء مكانَ هؤلاء، وجاء أولئك فصلى بهم ركعةً ولم يَقضُوا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه هكذا.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ছা'লাবা ইবনু যাহদাম বলেন: আমরা তাবারিস্তানে সাঈদ ইবনুল আসের সাথে ছিলাম। তিনি (সাঈদ) বললেন: তোমাদের মধ্যে কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সালাত) আদায় করেছে? তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। এরপর হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন এবং লোকদেরকে তাঁর পিছনে কাতারবদ্ধ করলেন। একটি কাতার শত্রুদের সমান্তরালে দাঁড়ালো। অতঃপর তিনি তাঁর পিছনের লোকদেরকে নিয়ে এক রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর এই কাতার ওয়ালারা ঐ কাতার ওয়ালাদের স্থানে চলে গেলেন এবং ঐ কাতার ওয়ালারা (যারা শত্রুর মুখোমুখি ছিল) এসে গেলেন। তিনি তাদের নিয়েও এক রাকাত সালাত আদায় করলেন। তারা (পরবর্তীতে আর কোনো সালাত) কাযা করেনি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو القطان، وسفيان: هو الثوري، والأشعث بن سليم: هو الأشعث بن أبي الشعثاء.وأخرجه أبو داود (1246)، والنسائي (1931)، وابن حبان (1452) و (2425) من طرق عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 38/ (23268)، والنسائي (1930) من طريق وكيع، وأحمد 38/ (23389) عن عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وله طرق أخرى عن حذيفة استوفيا تخريجها في "المسند".