আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1261 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أَسِيد بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان.وأخبرنا إبراهيم بن محمد بن حاتم الزاهد، أخبرنا محمد بن إسحاق الصَّنعاني، حدثنا محمد بن جُعْشُم، عن سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى، عن سفيان، حدثني أبو بكر بن أبي الجَهْم، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى بذِي قَرَدٍ صلاةَ الخوف ركعةً ركعةً ولم يَقضُوا [1].هذا شاهد للحديث الذي قبله، وهو صحيح الإسناد.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যী-কারাদে সালাতুল খাওফ (ভয়ের নামায) এক রাকআত এক রাকআত করে আদায় করেছিলেন এবং তারা (পরবর্তীতে তা) কাযা করেননি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه النسائي (520) و (1934)، وابن حبان (2871) من طريق محمد بن بشار، عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. بأطول ممّا هنا بنحو لفظ الحديث الآتي بعده.وأخرجه مطولًا كذلك أحمد 3/ (2063) و 35/ (21592)، و 38/ (23267) عن وكيع بن الجراح، و 5/ (3364) عن عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وأخرج البخاري (944)، والنسائي (1935) من طريق الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس قال: قام النبي صلى الله عليه وسلم وقام الناس معه، فكبَّر وكبَّروا معه، وركع وركع ناسٌ منهم، ثم سجد وسجدوا معه، ثم قام للثانية، فقام الذين سجدوا وحرسوا إخوانهم، وأتت الطائفة الأخرى فركعوا وسجدوا معه، والناس كلهم في صلاة، ولكن يحرس بعضهم بعضًا.وأخرج أحمد 4/ (2382)، والنسائي (1936) من طريق عكرمة، عن ابن عباس قال: ما كانت صلاة الخوف إلّا كصلاة أحراسكم هؤلاء اليوم خلف أئمتكم، إلّا أنها كانت عُقَبًا، قامت طائفة وهم جميع مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وسجدت معه طائفة … فذكر معنى حديث البخاري.وذو قَرَد: ماء على ليلتين من المدينة، بينها وبين خيبر. "معجم البلدان" 4/ 321. وانظر ما قبله.
1262 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا أبو حذيفة، حدثنا سفيان.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنى، حدثنا مسدَّد، حدثنا يحيى، عن سفيان، عن أبي بكر بن أبي الجَهْم، عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتْبة، عن ابن عباس قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ الخوف بذي قَرَدٍ، فصفَّ خَلفَه صفًّا، وصفًّا موازيَ العدو، فصلَّى معه ركعةً ثم ذهبوا إلى مَصافِّ أولئك، وجاء أولئك إلى مَصافِّ هؤلاء، فصلَّوا مع النبي صلى الله عليه وسلم ركعةً ثم سلَّم عليهم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه الألفاظ.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যূ ক্বারাদ (Dhu Qarad) নামক স্থানে সালাতুল খাওফ (ভয়ের নামাজ) আদায় করেছিলেন। তিনি তাঁর পেছনে এক কাতার এবং শত্রুর দিকে মুখ করে আরেক কাতার দাঁড় করালেন। তিনি (নবী) প্রথম কাতারের সাথে এক রাকআত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তারা (প্রথম কাতার) ঐ (দ্বিতীয়) কাতারের অবস্থানের দিকে চলে গেল এবং ঐ (দ্বিতীয়) কাতার এই (প্রথম) কাতারের অবস্থানে চলে এল। অতঃপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক রাকআত সালাত আদায় করলেন, এরপর তিনি তাদের নিয়ে সালাম ফিরালেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي، وأبو المثنى: هو معاذ بن المثنى. وانظر ما قبله.
1263 - أخبرني أبو عمرو بن أبي جعفر المقرئ، حدثنا عبد الله بن محمد [1]، حدثنا إسحاقُ بن إبراهيم، أخبرنا عقبة بن خالد السَّكُوني، حدثنا موسى بن محمد بن إبراهيم، عن أبيه، عن سَلَمة بن الأكوع: أنه سأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن الصلاة في القوس، فقال: "صَلِّ في القَوس، واطرَحِ القَرَن" [2].هذا حديث صحيح الإسناد [3] إن كان محمد بن إبراهيم التَّيمي سمع من سَلَمة بن الأكوع، ولم يُخرجاه.
সালামাহ ইবনুল আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ধনুকসহ (বা তীরের থলে পরিহিত অবস্থায়) সালাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তখন তিনি বললেন: "ধনুকের সাথে (বা তীরের থলে পরিহিত অবস্থায়) সালাত আদায় করো, তবে চামড়ার কোমরবন্ধ বা কোষটি খুলে রেখে দাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في (ب) إلى: عبيد الله بن موسى.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، موسى بن محمد بن إبراهيم - وهو ابن الحارث التيمي - منكر الحديث، قال يحيى بن معين: ليس بشيء، وقال مرة: لا يكتب حديثه، وقال البخاري: حديثه مناكير، وقال أبو زرعة وغيره: منكر الحديث. قلنا: ثم إنَّ أباه لم يثبت سماعه من سلمة بن الأكوع. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، وعبد الله بن محمد: هو ابن شيرويه النيسابوري راويته.وأخرجه البيهقي 3/ 255 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: موسى بن محمد غير قوي.وأخرجه ابن أبي شيبة 2/ 233، والطبراني في "الكبير" (6277)، وفي "فضل الرمي وتعليمه" (54)، والدارقطني (1486) من طريق عقبة بن خالد السكوني، به.والقَرَن - بالتحريك -: جَعْبة من جلود تشق ويجعل فيها النُّشَّاب.
1263 [3] - تعقبه الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 5/ 577 بقوله: فكيف يصنع في ضعف موسى؟!
1264 - أخبرنا عبد الرحمن بن حمدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس الرازي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، حدثني يزيد بن الهاد، حدثني شُرَحْبيل بن سعد، عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة الخوف قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم وطائفةٌ من خَلْفِه، وطائفةٌ من وراء الطائفة التي خَلْفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم قعودٌ، وجوهُهم كلُّهم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكبَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فكبَّرت الطائفتان، فركع فركعت الطائفةُ التي خَلْفَه، والآخرون قعودٌ، ثم سجد فسجدوا أيضًا، والآخرون قعودٌ، ثم قام فقاموا، ونكَصُوا خَلْفَه حتى كانوا مكانَ أصحابهم قعودًا، وأتت الطائفةُ الأخرى فصلى بهم ركعةً وسجدتين ثم سلَّم، والآخرون قعودٌ، ثم سلَّم، فقامت الطائفتان كلتاهما فصلَّوا لأنفسهم ركعةً وسجدتين، ركعةً وسجدتين [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وقد احتجَّا بجميع رواته غيرَ شُرَحْبيل وهو تابعيٌّ مدنيٌّ غيرُ متّهم [2].
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতুল খাওফ (ভয়ের সময়ের সালাত) সম্পর্কে বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তাঁর পেছনে একটি দল দাঁড়ালো। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে দাঁড়ানো দলটিরও পেছনে আরেক দল বসা ছিল। তাদের সবার মুখ ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর দিলেন এবং উভয় দলই তাকবীর দিল। এরপর তিনি রুকু করলেন এবং তাঁর পেছনের দলটি রুকু করল, আর অপর দলটি তখনো বসা ছিল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং তারাও সিজদা করল, আর অপর দলটি তখনো বসা ছিল। এরপর তিনি যখন দাঁড়ালেন, তারাও (প্রথম দল) দাঁড়ালো এবং তারা পেছনে সরে গিয়ে তাদের সাথীদের বসার স্থানে গিয়ে বসল। অতঃপর অপর দলটি এগিয়ে এলো। তিনি তাদের নিয়ে এক রাকাত ও দুটি সিজদা আদায় করলেন, তখন অপর দলটি বসা ছিল। এরপর তিনি সালাম ফেরালেন। অতঃপর উভয় দলই দাঁড়ালো এবং তারা নিজেরা এক রাকাত ও দুটি সিজদা আদায় করল, এক রাকাত ও দুটি সিজদা আদায় করল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف شرحبيل بن سعد أبي سعد المدني.وأخرجه ابن خزيمة (1351)، وابن المنذر في "الأوسط" (2338)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 318، وابن حبان (2888) من طرق عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.قال الطحاوي: وهذا الحديث عندنا من المحال الذي لا يجوز كونه، لأنَّ فيه أنهم دخلوا في الصلاة وهم قعود، وقد أجمع المسلمون أنَّ رجلًا لو افتتح الصلاة قاعدًا، ثم قام فأتمها قائمًا، ولا عذر له في شيء من ذلك، أنَّ صلاته باطلة، فكان الدخول لا يجوز إلّا على ما يكون عليه الركوع والسجود، فاستحال أن يكون الذين كانوا خلف النبي صلى الله عليه وسلم في الصف الثاني دخلوا في الصلاة وهم قعود، فثبت عن جابر بن عبد الله ما رويناه عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم في غير هذا الحديث. قلنا: وقد اختلف الرواة عن جابر في كيفية صلاة الخوف وعدد ركعاتها لكل من الإمام والمأمومين، انظر تعليقنا على "مسند أحمد" 22/ (14180)، وانظر "شرح السنة" للبغوي 4/ 280 - 286، و"زاد المعاد" 1/ 529 - 532.
[2] تعقبه الذهبي في "التلخيص" بقوله: شرحبيل، قال ابن أبي ذئب: كان متهمًا، وقال الدارقطني: ضعيف.
1265 - حدثنا أبو الحسين أحمد بن عثمان بن يحيى المقرئ ببغداد، حدثنا العباس بن محمد بن حاتم الدُّوري، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني محمد بن جعفر بن الزُّبير، عن عُروة، عن عائشة قالت: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف، قالت: فصَدَعَ رَسولُ الله صلى الله عليه وسلم الناسَ صَدْعَتَين، فصفَّت طائفة وراءَه، وقامت طائفة وِجاهَ العدوّ، قالت: فكبَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وكبَّرت الطائفةُ الذين صفُّوا خلفَه، ثم رَكَع وركعوا، ثم سَجَد وسجدوا، ثم رفع رأسه فرفعوا، ثم مَكَثَ رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا وسجدوا لأنفسهم السجدةَ الثانية، ثم قاموا، ثم نَكَصُوا على أعقابهم يمشون القَهْقَرى حتى قاموا من ورائهم، وأقبلت الطائفةُ الأخرى فصفُّوا خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكبَّروا ثم ركعوا لأنفسهم، ثم سَجَدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم سجدتَه الثانيةَ فسجدوا معه، ثم قامَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في ركعتِه وسجدوا لأنفسهم السجدةَ الثانية، ثم قامتِ الطائفتانِ جميعًا فصفُّوا خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فركع بهم ركعةً فركعوا جميعًا، ثم سجد فسجدوا جميعًا، ثم رفع رأسه ورفعوا معه، كلُّ ذلك من رسول الله صلى الله عليه وسلم سريعًا جدًّا لا يَألُو أن يخفِّف ما استطاع، ثم سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلَّموا، ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد شَرَكَه الناسُ في صلاته كلِّها [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وهو أتمُّ حديثٍ وأشفاهُ في صلاة الخوف.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'সালাতুল খাওফ' (ভয়ের সময়ের নামাজ) আদায় করলেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনকে দুই ভাগে ভাগ করলেন। একদল তাঁর পিছনে কাতারবদ্ধ হলো এবং অন্য দল শত্রুর দিকে মুখ করে দাঁড়িয়ে রইল। তিনি বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর দিলেন এবং তাঁর পিছনে কাতারবদ্ধ দলটি তাকবীর দিল। এরপর তিনি রুকূ করলেন এবং তারা রুকূ করল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং তারা সিজদা করল। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং তারাও মাথা তুলল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপবিষ্ট থাকলেন এবং তারা নিজেদের জন্য দ্বিতীয় সিজদাটি আদায় করল। এরপর তারা দাঁড়াল। এরপর তারা পিছন ফিরে হাঁটা শুরু করল (উল্টো দিকে হেঁটে গেল) এবং অন্য দলের পিছনে গিয়ে দাঁড়াল। এরপর অন্য দলটি এগিয়ে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে কাতারবদ্ধ হলো। তারা তাকবীর দিল এবং নিজেদের জন্য রুকূ করল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দ্বিতীয় সিজদাটি করলেন এবং তারা তাঁর সাথে সিজদা করল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (দ্বিতীয়) রাকাতের জন্য দাঁড়ালেন এবং তারা নিজেদের জন্য দ্বিতীয় সিজদাটি আদায় করল। এরপর উভয় দলই একত্রে উঠে দাঁড়াল এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে কাতারবদ্ধ হলো। তিনি তাদের নিয়ে এক রাকাত রুকূ করলেন এবং তারা সবাই একত্রে রুকূ করল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং তারা সবাই সিজদা করল। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং তারাও তাঁর সাথে মাথা তুলল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে এ কাজগুলো অত্যন্ত দ্রুততার সাথে করা হয়েছিল, তিনি যথাসাধ্য সংক্ষেপ করতে কোনো প্রকার ত্রুটি করেননি। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফেরালেন এবং তারাও সালাম ফেরাল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন, আর লোকেরা তাঁর এই সালাতের প্রত্যেকটি অংশে অংশ নিয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.وأخرجه أحمد 43/ (26354)، وأبو داود (1242)، وابن حبان (2873) من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، بهذا الإسناد.قوله: فصدع رسول الله صلى الله عليه وسلم صدعتين: أصل الصدع: الشق، والمراد ها هنا: قسمهم قسمين. قاله السندي في حاشيته على "المسند". "الثقات" وقال: في روايته بعض المناكير. قلنا: وقد خالف في هذه الرواية من هو أوثق منه وأكثر عددًا كما سيأتي. عبدان الأهوازي اسمه عبد الله بن أحمد بن موسى.وأخرجه البيهقي 3/ 260: عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (1368)، ومن طريقه الدارقطني (1783) عن محمد بن معمر بن ربعى، به.وقد وردت هذه الهيئة لصلاة الخوف في المغرب من كلام أبي داود، فقد قال بإثر الحديث (1248) من "سننه": وبذلك كان يفتي الحسن. ثم قال: وكذلك في المغرب، يكون للإمام ست ركعات وللقوم ثلاثٌ ثلاث. وإلى ذلك أشار البيهقي موهمًا رواية صلاة المغرب، فقال 3/ 260: "وكذلك في المغرب" وجدته في كتابي موصولًا بالحديث، وكأنه من قول الأشعث، وهو في بعض النسخ: قال أبو داود وقد رواه بعض الناس عن أشعث في المغرب مرفوعًا، ولا أظنه إلّا واهمًا في ذلك، انتهى.وقد روى الأشهر والأكثر والأوثق عن الأشعث هذا الحديث وفيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلى بهؤلاء الركعتين وبهؤلاء الركعتين، فكانت للنبي صلى الله عليه وسلم أربعًا، ولهم ركعتين ركعتين. أخرج ذلك أحمد 34/ (20408)، والنسائي (912) و (1956) من طريق يحيى القطان، وأحمد (20497) عن روح بن القاسم، وأبو داود (1248) من طريق معاذ بن معاذ، والنسائي (521) و (1952) من طريق خالد بن الحارث، وابن حبان (2881) من طريق سعيد بن عامر، خمستهم عن أشعث الحمراني، به. ووقع عند أكثرهم: أنه سلَّم بعد الركعتين الأوليين. وعُيِّنت الصلاة في رواية معاذ بن معاذ أنها الظهر.ويقوي رواية الركعتين متابعةُ أبي حمزة الرقاشي لأشعث عليها عند أبي داود الطيالسي (918)، ومن طريقه أخرجها البزار (3659)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 315.
1266 - أخبرني أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا عَبْدان الأهوازي، حدثنا محمد بن مَعمَر بن رِبْعي القيسي، حدثنا عمرو بن خليفة البكراوي، حدثنا أشعث بن عبد الملك الحُمراني، عن الحسن، عن أبي بَكْرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلى بالقوم في الخوف صلاة المغرب ثلاثَ رَكَعَاتٍ ثم انصرف، وجاء الآخرون فصلَّى بهم ثلاثَ ركعات [1]. سمعت أبا عليٍّ الحافظ يقول: هذا حديث غريب أشعث الحُمْراني لم يكتبه إلّا بهذا الإسناد. قال الحاكم وإنه صحيح على شرط الشيخين.
আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভয়ের সময় (সালাতুল খাওফ) লোকদের নিয়ে মাগরিবের সালাত তিন রাকআত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন এবং অন্য লোকেরা এলো, তখন তিনি তাদের নিয়ে (আরও) তিন রাকআত সালাত আদায় করলেন। [১] আমি আবু আলী আল-হাফিজকে বলতে শুনেছি: এটি একটি গারীব (বিরল) হাদীস। আশ‘আছ আল-হুমরানী এটি কেবল এই সনদেই লিপিবদ্ধ করেছেন। হাকিম বলেছেন: এটি বুখারী ও মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات غير عمرو بن خليفة البكراوي، فقد روى عنه اثنان، وذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: في روايته بعض المناكير. قلنا: وقد خالف في هذه الرواية من هو أوثق منه وأكثر عددًا كما سيأتي. عبدان الأهوازي اسمه عبد الله بن أحمد بن موسى.وأخرجه البيهقي 3/ 260: عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (1368)، ومن طريقه الدارقطني (1783) عن محمد بن معمر بن ربعى، به.وقد وردت هذه الهيئة لصلاة الخوف في المغرب من كلام أبي داود، فقد قال بإثر الحديث (1248) من "سننه": وبذلك كان يفتي الحسن. ثم قال: وكذلك في المغرب، يكون للإمام ست ركعات وللقوم ثلاثٌ ثلاث. وإلى ذلك أشار البيهقي موهمًا رواية صلاة المغرب، فقال 3/ 260: "وكذلك في المغرب" وجدته في كتابي موصولًا بالحديث، وكأنه من قول الأشعث، وهو في بعض النسخ: قال أبو داود وقد رواه بعض الناس عن أشعث في المغرب مرفوعًا، ولا أظنه إلّا واهمًا في ذلك، انتهى.وقد روى الأشهر والأكثر والأوثق عن الأشعث هذا الحديث وفيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلى بهؤلاء الركعتين وبهؤلاء الركعتين، فكانت للنبي صلى الله عليه وسلم أربعًا، ولهم ركعتين ركعتين. أخرج ذلك أحمد 34/ (20408)، والنسائي (912) و (1956) من طريق يحيى القطان، وأحمد (20497) عن روح بن القاسم، وأبو داود (1248) من طريق معاذ بن معاذ، والنسائي (521) و (1952) من طريق خالد بن الحارث، وابن حبان (2881) من طريق سعيد بن عامر، خمستهم عن أشعث الحمراني، به. ووقع عند أكثرهم: أنه سلَّم بعد الركعتين الأوليين. وعُيِّنت الصلاة في رواية معاذ بن معاذ أنها الظهر.ويقوي رواية الركعتين متابعةُ أبي حمزة الرقاشي لأشعث عليها عند أبي داود الطيالسي (918)، ومن طريقه أخرجها البزار (3659)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 315.
1267 - أخبرنا أبو محمد عبد العزيز بن عبد الرحمن بن سهل الدَّبَّاس بمكة، حدثنا محمد بن علي بن زيد الصائغ، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا جَرِير بن عبد الحميد، عن منصور، عن مجاهد، عن أبي عيّاش الزُّرَقي قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بعُسْفان وعلى المشركين خالدُ بن الوليد، فصلَّينا الظُّهر، فقال المشركون: لقد أصبنا غِرّةً، لقد أَصبنا غَفْلةً، لو كنا حَمَلْنا عليهم وهم في الصلاة، فنزلت آية القَصْر بين الظهر والعصر، فلما حَضَرَت العصرُ قام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مستقبلَ القبلة والمشركون أمامه، فصفَّ خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم صَفٌّ، وصفَّ بعد ذلك الصفِّ صفٌّ آخر، فرَكَع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ورَكَعوا جميعًا، ثم سجد وسجد الصفُّ الذين يَلُونَه، وقام الآخَرون يَحرسُونهم، فلما صلَّى هؤلاء السجدتين وقاموا سجد الآخَرون الذين كانوا خَلفَهم، ثم تأخر الصفُّ الذي يليه إلى مقام الآخرين، وتقدم الصفُّ الأخير إلى مقام الصفِّ الأول، ثم ركع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وركعوا جميعًا، ثم سجد الصفُّ الذي يليه، وقام الآخَرون يَحرسُونهم، فلما جلس رسولُ الله صلى الله عليه وسلم والصفُّ الذي يليه سَجَدَ الآخرون، ثم جلسوا جميعًا، فسلَّم عليهم جميعًا، فصلَّاها بعُسْفان وصلَّاها يومَ بني سُلَيم [1].هذا حديثٌ صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ আইয়াশ আয-যুরাকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ‘উসফান’ নামক স্থানে ছিলাম এবং মুশরিকদের নেতৃত্বে ছিলেন খালিদ ইবনু ওয়ালীদ। আমরা যুহরের সালাত আদায় করলাম। তখন মুশরিকরা বলল, আমরা একটি সুবর্ণ সুযোগ হারালাম, আমরা একটি গাফলতি করলাম (ভুল করলাম)। যদি আমরা তাদের উপর আক্রমণ করতাম, যখন তারা সালাতে ছিল! (তাদের এই মন্তব্যের প্রেক্ষিতে) যুহর ও আসরের মধ্যখানে ক্বসরের (সালাতের সংক্ষিপ্তকরণের) আয়াত নাযিল হলো। যখন আসরের সময় হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিবলামুখী হয়ে দাঁড়ালেন এবং মুশরিকরা তাঁর সামনে ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে একটি কাতার সারিবদ্ধ হলো এবং সেই কাতারের পেছনে আরেক কাতার সারিবদ্ধ হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রুকূ' করলেন এবং সকলেই রুকূ' করলো। অতঃপর তিনি সিজদা করলেন এবং তাঁর নিকটবর্তী কাতার সিজদা করলো। অন্য কাতার (পিছনের কাতার) তাদেরকে পাহারা দেওয়ার জন্য দাঁড়িয়ে রইল। যখন নিকটবর্তী কাতার দু’টি সিজদা শেষ করে দাঁড়িয়ে গেলো, তখন পিছনের কাতার সিজদা করলো। অতঃপর তাঁর নিকটবর্তী কাতার পিছিয়ে গিয়ে পেছনের কাতারের স্থানে দাঁড়ালো এবং পেছনের কাতার এগিয়ে এসে প্রথম কাতারের স্থানে দাঁড়ালো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রুকূ' করলেন এবং সকলেই রুকূ' করলো। অতঃপর তাঁর নিকটবর্তী কাতার সিজদা করলো এবং অন্য কাতার (পিছনের কাতার) তাদেরকে পাহারা দেওয়ার জন্য দাঁড়িয়ে রইল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর নিকটবর্তী কাতার তাশাহহুদের জন্য বসলেন, তখন অন্য কাতার সিজদা করলো। অতঃপর সকলে একসাথে বসলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকলের প্রতি সালাম ফিরালেন। তিনি এই সালাত ‘উসফানেও আদায় করেছিলেন এবং বানী সুলাইমের যুদ্ধের দিনেও আদায় করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح رجاله ثقات، وقد ثبت سماع مجاهد - وهو ابن جبر المكي - هذا الحديث من أبي عياش الزرقي، خلافًا لما ظنه البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (165).منصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه أبو داود (1236) عن سعيد بن منصور، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 27/ (16580) و (16582)، وابن حبان (2875) من طريق سفيان الثوري، وأحمد (16581)، والنسائي (1950) من طريق شعبة، والنسائي (1951) من طريق عبد العزيز بن عبد الصمد، وابن حبان (2876) من طريق أبي خيثمة زهير بن حرب، أربعتهم عن منصور بن المعتمر، به. وقد وقع تصريح مجاهد بالسماع من أبي عياش في رواية أبي خيثمة عند ابن حبان، وبوَّب ابن حبان عليها ذِكرُ الخبر المدحض قول من زعم أن مجاهدًا لم يسمع هذا الخبر من أبي عياش الزرقي. ورواية أحمد (16582) مختصرة بقول أبي عياش: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف والمشركون بينهم وبين القبلة مرتين، مرة بأرض بني سليم ومرة بعسفان.وعُسْفان بوزن عثمان: بلدة تاريخية عامرة، تقع شمال مكة على ثمانين كيلًا على المحجة إلى المدينة المنورة، وهي مجمع ثلاثة طرق: إلى المدينة ومكة وجدة. انظر "معالم مكة التاريخية والأثرية" ص 188 - 189 لعاتق بن غيث.
1268 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن أحمد بن أنس القُرَشي، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حَيْوة بن شُرَيح، أخبرنا أبو الأسود، أنه سَمِع عروة بن الزُّبير يحدِّث عن مروان بن الحكم، أنه سأل أبا هريرة: هل صلَّيتَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف؟ قال أبو هريرة: نعم، قال مروان: متى؟ فقال أبو هريرة: عامَ غزوة نَجْد؛ قام رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الصلاة، صلاةِ العصر، فقامت معه طائفة، وطائفةٌ أخرى مقابلَ العدوِّ، وظهورُهم إلى القِبلة، فكبَّر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكبَّروا جميعًا، الذين معه والذين مقابلَ العدوِّ، ثم رَكَع رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعةً واحدةً، وركعت الطائفةُ التي خَلفَه، ثم سَجَد فسجدتِ الطائفةُ التي تليه، والآخرونَ قيامٌ مقابلَ العدو، ثم قام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقامت الطائفةُ التي معه وذهبوا إلى العدوِّ فقابلوهم، وأقبلتِ الطائفةُ [التي كانت] [1] مُقابِلي العدو فرَكَعوا وسَجَدوا، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم قائمٌ كما هو، ثم قاموا فرَكَع رسول الله ركعةً أخرى وركعوا معه، وسَجَد وسجدوا معه، ثم أقبلت الطائفةُ التي كانت مُقابِلي العدو فرَكَعوا وسجَدَوا، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم قاعدٌ ومن معه، ثم كان السلامُ، فسلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم وسلَّموا جميعًا، فكان لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم ركعتين [2]، ولكل رجلٍ من الطائفتين ركعةً ركعة [3]. هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.آخر كتاب صلاة الخوف من كتاب الجنائز
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ান ইবনুল হাকাম তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সময়ের সালাত) আদায় করেছেন? আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ। মারওয়ান জিজ্ঞেস করলেন: কখন? আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নাজদের যুদ্ধের বছর।
আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের জন্য দাঁড়ালেন, তা ছিল আসরের সালাত। তখন একদল তাঁর সাথে দাঁড়াল এবং অন্য দলটি শত্রুদের মুখোমুখি হয়ে কিবলার দিকে পিঠ করে দাঁড়াল। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর দিলেন, ফলে তাঁর সাথে যারা ছিল এবং যারা শত্রুদের মুখোমুখি ছিল—সকলেই তাকবীর দিল। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মাত্র রুকু করলেন এবং তাঁর পিছনের দলটি রুকু করল। এরপর তিনি সিজদা করলেন, ফলে তাঁর সাথে থাকা দলটি সিজদা করল। আর অন্য দলটি শত্রুদের মুখোমুখি দাঁড়িয়ে রইল।
এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তাঁর সাথে থাকা দলটি উঠে শত্রুদের দিকে গেল এবং তাদের মুখোমুখি দাঁড়াল। এরপর যে দলটি শত্রুদের মুখোমুখি ছিল, তারা এগিয়ে এসে রুকু ও সিজদা করল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনো আগের মতো দাঁড়িয়ে ছিলেন। এরপর তারা (ঐ প্রথম দলটি) দাঁড়াল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিতীয় রুকু করলেন এবং তারা তাঁর সাথে রুকু করল। তিনি সিজদা করলেন এবং তারা তাঁর সাথে সিজদা করল।
এরপর যে দলটি শত্রুদের মুখোমুখি ছিল, তারা (যারা রুকু সিজদা করেছিল) এগিয়ে এল এবং রুকু ও সিজদা করল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথে যারা ছিল, তারা তখন বসে ছিলেন। এরপর সালাম ফিরানোর পালা এল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফিরালেন এবং সকলে সালাম ফিরাল। এভাবে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য দুই রাকাত হল এবং উভয় দলের প্রত্যেক ব্যক্তির জন্য এক রাকাত করে হল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ليس في النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج. وقال البيهقي بإثره: كذا قال، والصواب: لكل واحد من الطائفتين ركعتين ركعتين … ولعله أراد: ركعة ركعة مع الإمام.وأخرجه أبو داود (1241)، وابن حبان (2878) من طريق عروة بن الزبير عن أبي هريرة، لم يذكر مروان بن الحكم. ورجح الدارقطني في "العلل" (1637) رواية عروة عن مروان عن أبي هريرة. والله أعلم.
[2] في المطبوع: "ركعتان" بالرفع، والمثبت من (ز) و (ص) و "سنن البيهقي" على أنَّ "كان" ناقصة، و"ركعتين" خبرها. وقال البيهقي بإثره: كذا قال، والصواب: لكل واحد من الطائفتين ركعتين ركعتين … ولعله أراد: ركعة ركعة مع الإمام.وأخرجه أبو داود (1241)، وابن حبان (2878) من طريق عروة بن الزبير عن أبي هريرة، لم يذكر مروان بن الحكم. ورجح الدارقطني في "العلل" (1637) رواية عروة عن مروان عن أبي هريرة. والله أعلم.
1268 [3] - إسناده صحيح أبو الأسود هو محمد بن عبد الرحمن بن مؤمل بن الأسود، المعروف بيتيم عروة.وأخرجه أحمد 14/ (8260)، وأبو داود (1240)، والنسائي (1944) من طريق أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. وقرن في روايتي أحمد وأبي داود بحيوة بن شريح عبدَ الله بن لهيعة. وأبهمه النسائي ولم يذكر اسمه.ووقع في روايتي أحمد والنسائي: ولكل رجل من الطائفتين ركعتان ركعتان. وهو ظاهر، ووقع في روايتي المصنف وأبي داود: ولكل رجل من الطائفتين ركعة ركعة. وكذا عند البيهقي 3/ 264، وقال البيهقي بإثره: كذا قال، والصواب: لكل واحد من الطائفتين ركعتين ركعتين … ولعله أراد: ركعة ركعة مع الإمام.وأخرجه أبو داود (1241)، وابن حبان (2878) من طريق عروة بن الزبير عن أبي هريرة، لم يذكر مروان بن الحكم. ورجح الدارقطني في "العلل" (1637) رواية عروة عن مروان عن أبي هريرة. والله أعلم.
1269 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا أبي وشعيبُ بن الليث قالا: أخبرنا الليث بن سعد، عن يزيد بن الهاد، عن هند بنت الحارث، عن أم الفضل أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليهم وعباسٌ عمُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يشتكي، فتمنَّى عباسٌ الموت، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا عمُّ، لا تتمنَّ الموتَ، فإنك إن كنتَ محسِنًا كنتَ تؤخَّرُ تزدادُ إحسانًا إلى إحسانك خيرًا لك، وإن كنتَ مسيئًا فإن تؤخَّرُ تَستعتِبْ من إساءتك خيرًا لك، فلا تتمنَّ الموت" [1].هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتفقا [2] على حديث قيس عن [3] خبَّاب: لولا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا أن نتمنَّى الموتَ لتمنَّيتُه.
উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে প্রবেশ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অসুস্থ ছিলেন (যন্ত্রণা ভোগ করছিলেন)। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যু কামনা করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “হে চাচা, আপনি মৃত্যু কামনা করবেন না। কারণ আপনি যদি নেককার হন, তবে আপনার বিলম্বিত হওয়া আপনার জন্য উত্তম; এর ফলে আপনার নেকির সাথে আরও নেকি বৃদ্ধি পাবে। আর যদি আপনি গুনাহগার হন, তবে আপনার বিলম্বিত হওয়া আপনার জন্য উত্তম; এর ফলে আপনি আপনার মন্দ কাজের জন্য অনুতাপের (ক্ষমা চাওয়ার) সুযোগ পাবেন। সুতরাং আপনি মৃত্যু কামনা করবেন না।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين، رجاله ثقات عن آخرهم غير هند بنت الحارث - وهي الخثعمية امرأة عبد الله بن شداد بن الهاد - فإنه لم يرو عنها غير يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، وهي زوجة ابن ابن عمِّ أبيه، وذكرها ابن حبان في ثقات التابعين 5/ 517. أم الفضل: هي لبابة بنت الحارث الهلالية زوجة العباس.وأخرجه أحمد في "المسند" 44/ (26874) من طريقين عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.قوله: "تستعتب" أي ترجع عن الإساءة وتطلب الرضا.
[2] البخاري (5672)، ومسلم (2681).
1269 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بن، والصواب ما أثبتنا، فالحديث من رواية قيس: وهو ابن أبي حازم، عن خبّاب: وهو ابن الأرت.
1270 - أخبرنا مُكْرَم بن أحمد القاضي، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا أيوب بن سليمان بن بلال، حدثني أبو بكر، عن سليمان بن بلال، قال: قال زيد بن أسلم: قال محمد بن المُنكدِر: سمعت جابر بن عبد الله يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أنبِّئكم بخِيارِكم من شِراركم؟ " قالوا: بلى، قال: "خيارُكم أطوَلُكم أعمارًا، وأحسَنُكم عملًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيحٌ على شرط مسلم:
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি কি তোমাদেরকে তোমাদের উত্তম ও অধমদের বিষয়ে অবহিত করব না?" তাঁরা বললেন: অবশ্যই। তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে উত্তম তারা, যাদের বয়স দীর্ঘ এবং আমল সুন্দর।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، أبو بكر: هو عبد الحميد بن أبي أويس، أخو إسماعيل بن أبي أويس.وأخرجه البيهقي 3/ 371 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد بن حميد (1086) عن عثمان بن عمر، عن عبد الله بن عامر، عن محمد بن المنكدر، به.وأخرجه الطبري في "تهذيب الآثار" (682) (تحقيق علي رضا) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن أخيه أبي بكر، عن سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد الدِّيلي، عن ابن عامر، عن ابن المنكدر، به.وفي الباب عن أبي هريرة، أخرجه أحمد 12/ (7212) بإسناد حسن.وعن عبد الله بن بسر، أخرجه أحمد 29/ (17680)، والترمذي (2329) وحسّنه.
1271 - حدَّثَناه أبو الحسن محمد بن محمد الكاتب، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجّاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سلمة، عن حُميد ويونس وثابت، عن الحسن، عن أبي بَكْرة: أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، أيُّ الناس خيرٌ؟ قال: "مَن طَالَ عمرُه وحَسُن عملُه". قال: فأيُّ الناس شرّ؟ قال: "من طال عمرُه وساءَ عملُه" [1].
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় একজন লোক বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), কোন্ ব্যক্তি শ্রেষ্ঠ?" তিনি বললেন, "ঐ ব্যক্তি, যার জীবন দীর্ঘ হয়েছে এবং যার আমল সুন্দর হয়েছে।" লোকটি বলল, "তাহলে কোন্ ব্যক্তি নিকৃষ্ট?" তিনি বললেন, "ঐ ব্যক্তি, যার জীবন দীর্ঘ হয়েছে এবং যার আমল খারাপ হয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح علي بن عبد العزيز: هو ابن المرزبان أبو الحسن البغوي، وحميد: هو ابن أبي حميد الطويل، ويونس: هو ابن عبيد العبدي، وثابت: هو ابن أسلم البناني، والحسن: هو ابن يسار البصري، وأبو بكرة صحابيه اسمه: نُفيع بن الحارث.وأخرجه أحمد 34/ (20444) و (20481) و (20500) و (20501) من طرق عن حماد بن سلمة عن الثلاثة - فرَّقهم بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 34/ (2045)، والترمذي (2330) من طريق علي بن زيد بن جدعان، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، رفعه. وقال الترمذي: حسن صحيح. قلنا وابن جدعان - وإن كان ليّنًا - يعتبر به في المتابعات والشواهد.
1272 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بنُ محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا المعتمِر.وحدثنا محمد بنُ صالح بن هانئ، حدثنا جعفر بنُ محمد بن سَوَّار، حدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر؛ جميعًا عن حميدٍ، عن أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أرادَ الله بعبدٍ خيرًا استعمَلَه"، قال: فقيل: كيف يَستعملُه؟ قال: "يُوفِّقُه لعملٍ صالحٍ قبل الموت" [1].هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ কোনো বান্দার কল্যাণ চান, তখন তাকে কাজে লাগান।" (রাবী বলেন) জিজ্ঞাসা করা হলো: কীভাবে তাকে কাজে লাগান? তিনি বললেন: "মৃত্যুর পূর্বে তাকে সৎকর্ম করার তাওফীক (সুযোগ) দেন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح المعتمر: هو ابن سليمان، وحميد: هو ابن أبي حميد الطويل.وأخرجه الترمذي (2142) عن علي بن حجر، عن إسماعيل بن جعفر، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث صحيح.وأخرجه أحمد 19/ (12036) و (12214) و 21/ (13408) من طرق عن حميد الطويل، به.
1273 - أخبرَناهُ الحسن بن يعقوب العدلُ، حدثنا يحيى بنُ أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثني معاوية بن صالح، حدثني عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير، عن أبيه، عن عمرو بن الحَمِق قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أحبَّ الله عبدًا عَسَلَه" قال: يا رسول الله، وما عَسَلَه؟ قال: "يُوفِّقُ له عملًا صالحًا بين يدي أجَلِه حتى يرضى عنه جيرانُه" أو قال: "مَن حولَه" [1].
আমর ইবনুল হামিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো বানল্দাকে ভালোবাসেন, তখন তাকে 'আসালাহ' দান করেন।" তিনি (আমর) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'আসালাহ' কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তার মৃত্যুর পূর্বে তাকে একটি নেক আমল করার তাওফীক দান করেন, যার ফলে তার প্রতিবেশীরা তার প্রতি সন্তুষ্ট থাকে" অথবা তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তার আশপাশের লোকেরা (তার প্রতি সন্তুষ্ট থাকে)।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل يحيى بن أبي طالب.وأخرجه أحمد 36/ (21949) عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.قوله: "عَسَلَه" قال ابن قتيبة في "غريب الحديث" 1/ 302: أُراه مأخوذًا من العَسَل، شبَّه العمل الصالح الذي يفتح للعبد حتى يرضى الناسُ عنه، ويطيب ذِكره فيهم بالعسل.وقال الزمخشري في "الفائق" 2/ 429: هو من عَسَلَ الطعام يعْسِلُه: إذا جعل فيه العسل، كأنه شبّه ما رزقه الله تعالى من العمل الصالح الذي طاب به ذِكره بين قومه بالعسل الذي يُجعل في الطعام، فيَحْلَولي به ويطيب.
1274 - أخبرنا أبو عبد الله محمدُ بنُ عبد الله الزاهد، حدثنا أحمد بنُ يونس الضّبِّي، حدثنا مُحاضِر بن المورِّع، حدثنا الأعمش.وأخبرنا علي بنُ عيسى الحِيريّ، حدثنا محمد بن عمرٍو الحَرَشيّ، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا جَرير عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابرٍ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "يُبعَثُ كلُّ عبدٍ على ما مات" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجه البخاري.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক বান্দাকে সে যে অবস্থায় মৃত্যুবরণ করেছে, সেই অবস্থায় পুনরুত্থিত করা হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي سفيان: وهو طلحة بن نافع. جرير: هو ابن عبد الحميد، والأعمش: هو سليمان بن مهران.وأخرجه مسلم (2878) عن قتيبة بن سعيد وعثمان بن أبي شيبة، عن جرير، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان (7313) من طريق وَهْب بن مُنبِّه، عن جابر بن عبد الله. وزاد في روايته: "المؤمن على إيمانه، والمنافق على نفاقه". وإسناده قوي.وأخرجه بنحوه ابن ماجه (4230) من طريق شريك بن عبد الله النَّخَعي، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابرٍ، بلفظ: "يحشر الناس على نِيّاتهم"، وهو بمعناه.وسيأتي الحديث من طريق الأعمش بالأرقام (3729) و (3855) و (8070).وأخرجه أحمد 23/ (14722) وغيره من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر في آخر حديث مطوَّل مرفوع، وزاد فيه ما زاده وهب في حديثه. ورواه ابن جريج عن أبي الزبير عند عبد الرزاق في "مصنفه" (6746) فوقفه على جابر. ووقفه لا يضر، لأنه مرفوع حكمًا، فمثله لا يقال من قِبل الرأي. ابن الهاد، ومحمد بن إبراهيم: هو التيمي، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه أبو داود (3114) عن الحسن بن علي الخلال، عن ابن أبي مريم، بهذا الإسناد.قيل: استعمل أبو سعيد الحديث على ظاهره، وقد تأوله بعض العلماء على خلاف ذلك، فحمله بعضهم على الشهداء، لأنهم الذين أُمروا أن يزمَّلوا في ثيابهم ويدفنوا فيها، فحمله هنا أبو سعيد على العموم، قيل: وحمله بعض أهل العلم على العمل، يعني أنه يبعث على ما مات عليه من عمل صالح أو سيّئ. انظر "معالم السنن" للخطابي 1/ 301، و"فتح الباري" 20/ 331 - 332.
1275 - أخبرنا أبو محمد عبدُ الله بنُ إسحاق بن الخُراساني العدْلُ، حدثنا محمد بن الهيثم القاضي، حدثنا ابن أبي مريم، أخبرنا يحيى بنُ أيوب، عن ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سَلَمة، عن أبي سعيدٍ الخُدْري: أنه لما حَضَرَه الموتُ دعا بثيابٍ جُدُدٍ فَلَبِسَها، ثم قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ الميتَ يُبعَثُ في ثيابِه التي يموتُ فيها" [1]. هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর (মৃত্যুর) সময় উপস্থিত হলো, তখন তিনি নতুন কাপড় চাইলেন এবং তা পরিধান করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে সেই কাপড়ে পুনরুত্থিত করা হবে, যে কাপড়ে সে মারা যায়।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب، وهو الغافقي المصري، وشيخ الحاكم أبي محمد عبد الله بن إسحاق، فقد قال الدارقطني: فيه لين، كما في "تاريخ بغداد" 9/ 414.ابن أبي مريم: هو سعيد بن الحكم بن محمد الجمحي، وابن الهاد: هو يزيد بن عبد الله بن أسامة ابن الهاد، ومحمد بن إبراهيم: هو التيمي، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه أبو داود (3114) عن الحسن بن علي الخلال، عن ابن أبي مريم، بهذا الإسناد.قيل: استعمل أبو سعيد الحديث على ظاهره، وقد تأوله بعض العلماء على خلاف ذلك، فحمله بعضهم على الشهداء، لأنهم الذين أُمروا أن يزمَّلوا في ثيابهم ويدفنوا فيها، فحمله هنا أبو سعيد على العموم، قيل: وحمله بعض أهل العلم على العمل، يعني أنه يبعث على ما مات عليه من عمل صالح أو سيّئ. انظر "معالم السنن" للخطابي 1/ 301، و"فتح الباري" 20/ 331 - 332.
1276 - حدثنا أبو العبّاس محمد بنُ يعقوب، حدثنا بحرُ بن نَصْر، حدثنا عبد الله بنُ وهب، أخبرني أبو هانئ الخَوْلاني، عن عمرو بن مالك الجَنْبيّ، أنه سمع فَضَالة بن عُبيد يحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنه قال: "مَن ماتَ على مَرتَبةٍ من هذه المراتِبِ، بُعثَ عليها يومَ القيامة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এই স্তরগুলোর কোনো একটি স্তরের ওপর মৃত্যুবরণ করবে, কিয়ামতের দিন তাকে সেই স্তরেই পুনরুত্থিত করা হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح: ابن هانئ الخولاني. هو حميد بن هانئ.وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (2303)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (252) والطبراني في "الكبير" 18/ (785)، والبيهقي في "القضاء والقدر" (22) من طرق عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23945)، والطحاوي (253)، والطبراني 18/ (784) من طريق حيوة بن شريح وابن لهيعة، عن أبي هانئ الخولاني، به. وطريق حيوة سيأتي عند الحاكم برقم (2669) ويأتي تخريجه هناك إن شاء الله. إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، بينهما العوام بن حوشب كما سيأتي في التخريج.أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وأبو بردة: هو ابن أبي موسى الأشعري.وأخرجه أبو داود (3091) عن مسدد ومحمد بن عيسى، عن هشيم، عن العوام بن حوشب، عن إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 32/ (19679)، والبخاري (2996) من طريق يزيد بن هارون، عن العوام بن حوشب، عن إبراهيم السكسكي، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
1277 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنّى، حدثنا مسدَّد، حدثنا هُشَيم، عن إبراهيم بن عبد الرحمن السَّكْسَكي، عن أبي بُرْدة، عن أبي موسى الأشعري قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم غيرَ مرةٍ ولا مرتين يقول: "إذا كان العبدُ يعملُ عملًا صالحًا فشَغَلَه عن ذلك مرضٌ أو سفرٌ، كُتِبَ له كصالح ما كان يعملُ وهو صحيحٌ مقيم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه!
আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একবার বা দুইবার নয়, বহুবার বলতে শুনেছি: “যদি কোনো বান্দা নেক আমল করে এবং অসুস্থতা বা সফরের কারণে সে তা করতে অপারগ হয়, তবে সুস্থ ও বাড়িতে অবস্থানকালীন অবস্থায় সে যা আমল করত, তার জন্য অনুরূপ নেক আমলের সওয়াব লেখা হয়।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، رجاله رجال الصحيح، إلّا أنَّ فيه انقطاعًا بين هشيم - وهو ابن بشير - وبين إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، بينهما العوام بن حوشب كما سيأتي في التخريج.أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وأبو بردة: هو ابن أبي موسى الأشعري.وأخرجه أبو داود (3091) عن مسدد ومحمد بن عيسى، عن هشيم، عن العوام بن حوشب، عن إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 32/ (19679)، والبخاري (2996) من طريق يزيد بن هارون، عن العوام بن حوشب، عن إبراهيم السكسكي، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.
1278 - أخبرنا أبو عمرو عثمانُ بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا أحمد بن حيَّان بن مُلاعِب، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق.وحدثنا محمدُ بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سعيد الحسنُ بن عبد الصَّمد [1]، حدثنا عبد العزيز بن يحيى، حدثنا محمد بن سَلَمة، حدثنا محمد بن إسحاق، عن الزُّهري، عن عُرْوة، عن أسامةَ بن زيد قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يعودُ عبدَ الله بن أُبي في مَرَضه الذي مات فيه، فلما دخلَ عليه عَرَفَ فيه الموت قال: "قد كنتُ أنهاك عن حُبِّ يهود فقال: قد أَبغَضَهم أسعد بن زُرَارة، فمَهْ؟! فلمّا مات أتاه ابنُه فقال: يا رسول الله، إنَّ عبد الله بن أُبي قد مات فأعطِني قميصَكَ أُكفِّنْه فيه، فنزع رسول الله صلى الله عليه وسلم قميصَه فأعطاه إياه [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (উসামা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুল্লাহ ইবনে উবাইকে তার মৃত্যুশয্যায় দেখতে বের হলেন, যে রোগে সে মৃত্যুবরণ করেছিল। যখন তিনি তার কাছে প্রবেশ করলেন, তখন বুঝতে পারলেন যে তার মৃত্যু আসন্ন। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে ইহুদিদের প্রতি ভালোবাসা রাখতে নিষেধ করেছিলাম।" সে (আবদুল্লাহ ইবনে উবাই) বলল: "আস'আদ ইবনে যুরারাহ তো তাদের ঘৃণা করত, তাতে কী?" যখন সে মারা গেল, তখন তার ছেলে তাঁর (রাসূলের) কাছে এসে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আবদুল্লাহ ইবনে উবাই মারা গেছেন। আপনি আপনার জামাটি দিন, যাতে আমি তাকে কাফন পরাতে পারি।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জামা খুলে তাকে তা দিয়ে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرفت هذه العبارة في المطبوع إلى: حدثنا محمد بن صالح بن هانئ بن سعيد حدثنا أبو الحسن بن عبد الصمد. والحسن هذا: هو الحسن بن عبد الصمد بن عبد الله بن رزين السُّلمي القُهُندزي، نسبة إلى قهندز نيسابور كما ذكر السمعاني في "الأنساب"، والظاهر من كلامه أنه من بيت علم فيها، وقد روى الحسن هذا عند المصنف وغيره عن جمع وروى عنه جمع، وهو متابع فيما يرويه، فمثله حسن الحديث في أقلّ أحواله. في مختصره "المقتنى" للذهبي (5061)، وسمّاه آخرون كالدارقطني والخطيب البغدادي في "تاريخه" 6/ 389 وغيرهما: أحمد بن ملاعب بن حيان، وهو ثقة حافظ.وأخرجه أبو داود (3094) عن عبد العزيز بن يحيى بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ 21758 من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن محمد بن إسحاق، به. مختصرًا دون قصة ابن عبد الله بن أُبي.وقصة ابن عبد الله بن أُبيّ وقميص النبي صلى الله عليه وسلم و أخرجها البخاري (1296)، ومسلم (2400) من حديث عبد الله بن عمر، والبخاري أيضًا (1270)، ومسلم (2773) من حديث جابر بن عبد الله.
[2] إسناده حسن، محمد بن إسحاق قد صرَّح بالتحديث عند البيهقي في "الدلائل" 5/ 285، وقصة إلباس النبي صلى الله عليه وسلم قميصه لعبد الله بن أُبيّ مخرَّجة في "الصحيحين" من غير هذا الوجه.وقوله هنا في الإسناد الأول: أحمد بن حيان بن ملاعب، هكذا وقع هذا الاسم في "المستدرك"، وكذا سمّاه ابن حبان في "ثقاته" 8/ 47، وشيخ المصنف أبو أحمد الحاكم في كتابه "الكنى" كما في مختصره "المقتنى" للذهبي (5061)، وسمّاه آخرون كالدارقطني والخطيب البغدادي في "تاريخه" 6/ 389 وغيرهما: أحمد بن ملاعب بن حيان، وهو ثقة حافظ.وأخرجه أبو داود (3094) عن عبد العزيز بن يحيى بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ 21758 من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن محمد بن إسحاق، به. مختصرًا دون قصة ابن عبد الله بن أُبي.وقصة ابن عبد الله بن أُبيّ وقميص النبي صلى الله عليه وسلم و أخرجها البخاري (1296)، ومسلم (2400) من حديث عبد الله بن عمر، والبخاري أيضًا (1270)، ومسلم (2773) من حديث جابر بن عبد الله.
1279 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وأبو بكر بن جعفر القَطِيعي، قالا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرَّحمن، عن سفيان، عن محمد بن المُنكَدِر، عن جابرٍ قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يَعودُني ليس براكبِ بغلٍ ولا بِرْذَونٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে আসতেন, কিন্তু তিনি কোনো খচ্চর বা বৃহৎ অশ্বে চড়ে আসতেন না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. عبد الرحمن: هو ابن مهدي، وسفيان: هو الثوري.وهو في "مسند أحمد" 23/ (15011)، وعن أحمد أخرجه أبو داود (3069).وأخرجه البخاري (5664)، ومسلم (1616) (7)، والترمذي (3851)، والنسائي في "الكبرى" (7459) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد - ورواية مسلم مطولة بلفظ: عادني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا مريض ومعه أبو بكر ماشيين، فوجدني قد أُغمي عليَّ، فتوضأ رسول الله، ثم صبَّ عليَّ من وَضوئه، فأفقتُ فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله، كيف أصنع في مالي؟ فلم يردَّ عليَّ شيئًا حتى نزلت آية الميراث.والبِرذون: قال القاضي عياض في "المشارق": البراذين: هي الخيل غير العِرابِ والعتاق.
1280 - حدثني علي بن عيسى، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن الحَكَم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عليٍّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما مِن رجلٍ يعودُ مريضًا مُمسِيًا إلّا خرج معه سَبعونَ ألفَ مَلَكٍ يستغفرون له حتى يُصبحَ، وكان له خريفٌ في الجنة، ومن أتاه مصبحًا خرج معه سبعونَ ألفَ مَلَكٍ يستغفرون له حتى يُمسِي، وكان له خريفٌ في الجنة" [1].هذا إسنادٌ صحيحٌ على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، لأنَّ جماعةً من الرواة أوقفوه عن الحكم بن عُتَيبة ومنصور بن المعتمِر عن ابن أبي ليلى عن عليٍّ من حديث شعبةَ عنهما، وأنا على أصلي في الحُكم لراوي الزيادة.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি সন্ধ্যায় কোনো অসুস্থ রোগীকে দেখতে যায়, তার সাথে সত্তর হাজার ফেরেশতা বের হন যারা সকাল পর্যন্ত তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকেন। আর জান্নাতে তার জন্য একটি ফলবাগান (বা ফল তোলার সময়) নির্ধারিত হয়। আর যে ব্যক্তি সকালে তার কাছে যায়, তার সাথে সত্তর হাজার ফেরেশতা বের হন যারা সন্ধ্যা পর্যন্ত তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকেন। আর জান্নাতে তার জন্য একটি ফলবাগান নির্ধারিত হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وقد اختُلف في رفعه ووقفه، كما هو مبيَّن في التعليق على "مسند أحمد" 2/ (612)، ورجَّح وقفه الدارقطني في "العلل" 3/ 267، ورجَّح الحاكم هنا وأبو داود رفْعَه.أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران، والحكم: هو ابن عُتيبة.وسيأتي الحديث بمعناه عند المصنف برقم (1309) من طريق ابن نمير وأبي كريب، عن أبي معاوية، بهذا الإسناد، وفيه قصة، يأتي تخريجه هناك، وبرقم (1310) من طريق شعبة، عن الحكم، عن عبد الله بن نافع عن علي مرفوعًا، وسنبين الاختلاف على شعبة في رفعه ووقفه هناك إن شاء الله.والخريف: أي: المخروف من ثمرها، فعيل بمعنى مفعول. واختراف الثمر: اجتناؤه.