হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1341)


1341 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الرَّبيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، حدثنا إبراهيم بن أبي يحيى، حدثنا عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابرٍ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكبِّر على جنائزِنا أربعًا، ويقرأُ بفاتحة الكتاب في التكبيرة الأُولى [1].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের জানাযার নামাজে চারবার তাকবীর বলতেন এবং প্রথম তাকবীরে ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) পড়তেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، إبراهيم بن أبي يحيى - وهو إبراهيم بن محمد بن أبي يحيى الأسلمي - متروك، لا يصلح للاحتجاج ولا للاستشهاد.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 39 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "الأم" للشافعي 2/ 607، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "الحلية" 9/ 159، والبيهقي في "المعرفة" (7600). 3/ 527: لا يوصله عن أبي هريرة إلّا غير متقن، والصحيح مرسل. وانظر "العلل" للدارقطني (1794) و (3650).وقال البخاري - فيما نقله عنه البيهقي 4/ 42 - : وحديث أبي سلمة عن أبي هريرة وعائشة وأبي قتادة في هذا الباب غير محفوظ، وأصح شيء في هذا الباب حديث عوف بن مالك. يعني ما أخرجه مسلم في "صحيحه" (963) عنه قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على جنازة، فحفظت من دعائه وهو يقول: "اللهم اغفر له وارحمه، وعافه واعف عنه، وأكرم نزله، ووسع مدخله، واغسله بالماء والثلج والبرد، ونقِّه من خطاياه كما ينقى الثوب الأبيض من الدنس، وأبدله دارًا خيرًا من داره، وأهلًا خيرًا من أهله وزوجًا خيرًا من زوجه، وأدخله الجنة، وأعِذه من عذاب القبر، أو من عذاب النار".وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1342)


1342 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا الحسن بن علي بن شَبِيب المَعمَري، حدثنا الحَكَم بن موسى، حدثنا هِقْل بن زياد، عن الأوزاعي، حدثني يحيى بن أبي كَثير، حدثني أبو سَلَمة، عن أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا صلَّى على جنازةٍ قال: "اللهمَّ اغفِرْ لحيِّنا وميِّتنا، وشاهدِنا وغائبِنا، وصغيرِنا وكبيرِنا، وذَكَرِنا وأُنثانا، اللهمَّ من أحييتَه منّا فأحْيِه على الإسلام، ومن تَوفَّيتَه منا فتوفَّه على الإيمان" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!وله شاهد صحيح على شرط مسلم [2]:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো জানাযার সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাদের জীবিতদের, মৃতদের, উপস্থিতদের, অনুপস্থিতদের, ছোটদের, বড়দের, পুরুষদের এবং মহিলাদের ক্ষমা করে দাও। হে আল্লাহ! আমাদের মধ্যে যাকে তুমি জীবিত রাখবে, তাকে ইসলামের উপর জীবিত রাখো এবং যাকে মৃত্যু দেবে, তাকে ঈমানের সাথে মৃত্যু দিও।" [এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা এটি বর্ণনা করেননি। আর মুসলিমের শর্তানুযায়ী এর একটি সহীহ সমর্থক বর্ণনাও বিদ্যমান।]




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، إلّا أنه اختلف في إسناده اختلافًا شديدًا، وصلًا وإرسالًا، ورفعًا ووقفًا، وروي مرة من حديث أبي هريرة، ومرة من حديث عائشة كما يأتي في الذي بعده، ومرة من حديث أبي قتادة مرفوعًا، ومرة من حديث عبد الله بن سلام موقوفًا، ومرة من حديث أبي إبراهيم الأشهلي عن أبيه، وقد بينا تفصيل ذلك في تعليقنا على "المسند" 14/ (8809).الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرج حديث أبي هريرة هذا الموصول: الترمذي (1024) عن علي بن حجر، عن هقل بن زياد بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (3201)، والنسائي (10852)، وابن حبان (3070) من طرق عن الأوزاعي، به.وأخرجه أحمد 14/ (8809) من طريق أيوب بن عتبة، عن يحيى بن أبي كثير، به. وأيوب هذا ضعيف.وأخرجه ابن ماجه (1498)، والنسائي (10853) من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، به. ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.وأخرجه البيهقي 4/ 41 من طريق الوليد بن مزيد وبشر بن بكر، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة مرسلًا. وصحح أبو حاتم المرسل كما في "العلل" لابنه 3/ 517، وقال 3/ 527: لا يوصله عن أبي هريرة إلّا غير متقن، والصحيح مرسل. وانظر "العلل" للدارقطني (1794) و (3650).وقال البخاري - فيما نقله عنه البيهقي 4/ 42 - : وحديث أبي سلمة عن أبي هريرة وعائشة وأبي قتادة في هذا الباب غير محفوظ، وأصح شيء في هذا الباب حديث عوف بن مالك. يعني ما أخرجه مسلم في "صحيحه" (963) عنه قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على جنازة، فحفظت من دعائه وهو يقول: "اللهم اغفر له وارحمه، وعافه واعف عنه، وأكرم نزله، ووسع مدخله، واغسله بالماء والثلج والبرد، ونقِّه من خطاياه كما ينقى الثوب الأبيض من الدنس، وأبدله دارًا خيرًا من داره، وأهلًا خيرًا من أهله وزوجًا خيرًا من زوجه، وأدخله الجنة، وأعِذه من عذاب القبر، أو من عذاب النار".وانظر ما بعده.



[2] بل هو معلول كالذي قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1343)


1343 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القَزَّاز، حدثنا عمر بن يونُس بن القاسم اليَمَامي، حدثنا عكرمة بن عمَّار، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سَلَمة بن عبد الرحمن، قال: سألتُ عائشةَ أُمّ المؤمنين: كيف كانت صلاةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على الميِّت؟ قالت: كان يقول: "اللهمَّ اغفِرْ لحيِّنا وميِّتِنا، وذَكَرِنا وأُنثانا، وشاهدِنا وغائبِنا وصغيرِنا وكبيرِنا، اللهمَّ من أحيَيْتَه منَّا فأحْيِه على الإسلام، ومَن توفَّيْتَه فتوفَّه على الإيمان" [1].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান বলেন: আমি উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযার সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: “হে আল্লাহ! আমাদের জীবিত ও মৃতদেরকে, পুরুষ ও নারীদেরকে, উপস্থিত ও অনুপস্থিতদেরকে, এবং আমাদের ছোট ও বড়দেরকে ক্ষমা করুন। হে আল্লাহ! আমাদের মধ্যে আপনি যাকে জীবিত রাখবেন, তাকে ইসলামের উপর জীবিত রাখুন। আর যাকে মৃত্যু দেবেন, তাকে ঈমানের উপর মৃত্যু দিন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، عكرمة بن عمار ضعفه الأئمة في روايته عن يحيى بن أبي كثير لاضطرابه فيها، وهذا منها، ومحمد بن سنان القزاز مختلف فيه إلّا أنه متابع هنا. وقد اختلف في هذا الإسناد اختلافًا كبيرًا كالذي قبله.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (972)، والنسائي (10851) من طرق عن عمر بن يونس اليمامي، بهذا الإسناد. قال الترمذي بإثر الحديث (1024): حديث عكرمة بن عمار غير محفوظ، وعكرمة ربما يهم في حديث يحيى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1344)


1344 - حدثنا أبو محمد عبد العزيز بن عبد الرحمن الخَلَّال بمكة، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق الكاتب، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزَامي، حدثنا الحسين بن زيد بن علي بن الحسين بن علي، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن عبد الله بن رُكَانة بن المطَّلِب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام للجنازةِ ليُصلِّيَ عليها قال: "اللهمَّ عبدُك وابنُ أَمَتِك، احتاجَ إلى رَحمتِك، وأنت غنيٌ عن عذابِه، إن كان مُحسنًا فزِدْ في إحسانِه، وإن كان مُسيئًا فتجاوَزْ عنه" [1]. هذا إسناد صحيح، ويزيد بن رُكَانة وأبوه رُكانةُ بن عبد يزيد صحابيان من بني المطَّلب بن عبد مناف، ولم يُخرجاه.




ইয়াযীদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু রুকানাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো জানাযার সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়াতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! (এই মৃত ব্যক্তি) আপনার বান্দা এবং আপনার দাসীর পুত্র। সে আপনার রহমতের মুখাপেক্ষী, আর আপনি তাকে শাস্তি দেওয়া থেকে অমুখাপেক্ষী। যদি সে সৎকর্মশীল হয়ে থাকে, তবে তার সৎকর্মসমূহ বৃদ্ধি করে দিন। আর যদি সে গুনাহগার হয়ে থাকে, তবে তাকে ক্ষমা করে দিন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده فيه لين، الحسين بن زيد بن علي ضعفه ابن معين وابن المديني وأبو حاتم، ووثقه الدارقطني، وقال ابن حجر في "التقريب": صدوق ربما أخطأ، وعبد الرحمن بن إسحاق الكاتب لم نتبينه، ولم نقف له على ترجمة، ولم يرو عنه غير عبد العزيز بن عبد الرحمن الدباس، وقد كناه المصنف في "معرفة علوم الحديث" ص 169: أبا محمد، ونسبه كما في "معرفة السنن والآثار" (2750): المزني، ولكنه مع هذا متابع. جعفر بن محمد: هو ابن علي ابن الحسين بن علي بن أبي طالب، وأبو محمد: هو أبو جعفر الباقر. وقد سمَّى المصنِّف صحابيه هنا: يزيد بن عبد الله بن ركانة، وهو وهم منه رحمه الله، صوابه: يزيد بن ركانة بن عبد يزيد بن المطلب، كذا في مصادر ترجمته ومصادر التخريج وكذا سماه المصنِّف نفسه بإثر هذا الحديث. وبسبب هذا الوهم فقد وهم أيضًا الحافظ ابن حجر فذكره بهذا الاسم في "الإصابة" 6/ 717 (9456) وقال: ذكره بعضهم في الصحابة لحديث أرسله، أخرجه البيهقي في "الدعوات" … فذكر هذا الحديث.وأخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (630) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (444)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 222 - 223، والطبراني في "الكبير" 22/ (647)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2616) من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب وابن قانع 3/ 223 من طريق أبي مصعب الزهري، واسمه: أحمد بن أبي بكر، كلاهما عن الحسين بن زيد بن علي، به. وسأل ابن أبي حاتم في "العلل" (472) أباه عن حديث أبي مصعب الزهري هذا، فقال: هذا حديث منكر لا أصل له.قلنا: بل له شاهد صحيح موقوف على أبي هريرة يدل على أنَّ له أصلًا، أخرجه مالك في "الموطأ" 1/ 228 عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، أنه سأل أبا هريرة: كيف تصلي على الجنازة؟ فقال أبو هريرة أنا لعَمْرُ الله أخبرك، أتبعها من أهلها، فإذا وُضعت كبَّرَتُ وحمدتُ الله وصليتُ على نبيه، ثم أقول: اللهم إنه عبدك وابنُ عبدك وابن أمتك، كان يشهد أن لا إله إلّا أنت، وأن محمدًا عبدك ورسولك، وأنت أعلم به، اللهم إن كان محسنًا فزد في إحسانه، وإن كان كان مسيئًا فتجاوز عن سيئاته، اللهم لا تحرمنا أجره، ولا تفتنّا بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1345)


1345 - أخبرنا أبو النضر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا موسى بن يعقوب الزَّمْعي، حدثني شُرَحْبيل بن سعد قال: حضرتُ عبدَ الله بن عباس صلَّى بنا على جنازة بالأبواء، فكبَّر، ثم اقتَرأَ بأُم القرآن رافعًا صوته بها، ثم صلَّى على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال: اللهمَّ عبدُك وابنُ عبدك، وابنُ أَمتَك، يشهدُ أن لا إله إلّا أنت، وحدَكَ لا شَريك لك، ويشهدُ أنَّ محمدًا عبدُك ورسولُك، أَصبح فقيرًا إلى رحمتك، وأصبحتَ غنيًا عن عذابِه، تَخلَّى من الدنيا وأهلِها، إن كان زاكيًا فزَكِّه، وإن كان مخطئًا فاغفرْ له، اللهمَّ لا تَحرِمنا أجرَه، ولا تُضلَّنا بعده، ثم كبَّر ثلاثَ تكبيرات، ثم انصرَفَ، فقال: يا أيها الناس، إنِّي لم أقرأ علنًا إلّا لتَعْلَموا أنها السُّنة [1].لم يَحتجَّ الشيخان بشُرَحْبيل بن سعد، وهو من تابِعِي أهل المدينة، وإنما أخرجتُ هذا الحديث شاهدًا للأحاديث التي قدَّمنا، فإنها مختصرةٌ مجمَلة، وهذا حديث مفسَّر.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শুরাহবিল ইবনে সা'দ বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে উপস্থিত ছিলাম। তিনি আমাদেরকে নিয়ে আবওয়া নামক স্থানে একটি জানাজার সালাত আদায় করলেন। তিনি তাকবীর দিলেন, অতঃপর উচ্চস্বরে উম্মুল কুরআন (সূরাহ আল-ফাতিহা) পাঠ করলেন। এরপর তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর সালাত (দরুদ) পাঠ করলেন। এরপর বললেন: "হে আল্লাহ! আপনার বান্দা, আপনার বান্দার পুত্র এবং আপনার বান্দীর পুত্র (এই মৃত ব্যক্তি)। সে সাক্ষ্য দিচ্ছে যে, আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আপনি একক, আপনার কোনো শরীক নেই। আর সে সাক্ষ্য দিচ্ছে যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার বান্দা ও আপনার রাসূল। সে আপনার রহমতের মুখাপেক্ষী হয়ে গেছে, আর আপনি তার শাস্তির প্রয়োজন থেকে মুক্ত। সে দুনিয়া ও তার অধিবাসীদের থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। যদি সে পবিত্র হয়ে থাকে, তবে তাকে আরও পবিত্র করুন, আর যদি সে ভুল করে থাকে তবে তাকে ক্ষমা করে দিন। হে আল্লাহ! আপনি আমাদেরকে তার পুরস্কার থেকে বঞ্চিত করবেন না এবং তার পরে আমাদেরকে পথভ্রষ্ট করবেন না।" এরপর তিনি আরো তিনটি তাকবীর দিলেন, অতঃপর সালাত শেষ করলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি প্রকাশ্যে (উচ্চস্বরে) তিলাওয়াত করিনি, শুধু এজন্য যেন তোমরা জানতে পারো যে, এটাই (জানাজার) সুন্নাত।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف شرحبيل بن سعد، وموسى بن يعقوب الزَّمْعي فيه لين، وقد انفردا به بهذه السياقة. أبو النضر الفقيه: هو محمد بن محمد بن يوسف.وأخرجه البيهقي 4/ 42 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1346)


1346 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا محمد بن مَندَهْ، حدثنا بكر بن بَكَّار.وأخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس.وحدثنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر؛ قالوا: حدثنا شُعبة، عن إبراهيم الهَجَري، عن عبد الله بن أبي أوفَى، قال: تُوفِّيتْ بنتٌ له، فتَبِعها على بغلةٍ يمشي خلفَ الجنازة، ونساءٌ يَرْثِينَها، فقال: يَرثِينَ أو لا يَرثينَ، فإنَّ رسول الله له نهى عن المَرَاثي، ولْتُفِضْ إحداكنَّ من عَبْرَتِها ما شاءَت. ثم صلَّى عليها، فكبَّر عليها أربعًا، ثم قام بعد الرابعة قَدْرَ ما بينَ التكبيرتين يستغفرُ لها ويدعو، وقال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَصنَعُ هكذا [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، وإبراهيم بن مُسْلم الهَجَري لم يُنقَم عليه بحُجَّة.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তাঁর এক কন্যা মারা গেলেন। তিনি তখন একটি খচ্চরের উপর আরোহণ করে জানাযার পেছনে পেছনে হাঁটছিলেন, আর কিছু মহিলা তার জন্য বিলাপ করছিল। তিনি বললেন: তারা বিলাপ করুক বা না করুক, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিলাপ করতে নিষেধ করেছেন। তবে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার চোখ থেকে যত খুশি অশ্রু প্রবাহিত করতে পারে। এরপর তিনি তার জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং তাতে চার তাকবীর দিলেন। এরপর তিনি চতুর্থ তাকবীরের পর দুই তাকবীরের মধ্যবর্তী সময়ের পরিমাণ দাঁড়িয়ে থাকলেন, তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করলেন এবং দু’আ করলেন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটিই করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف إبراهيم الهجري: وهو إبراهيم بن مسلم الهجري. وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه". والتكبير على الجنازة أربعًا صحَّ من طريق آخر.وأخرجه أحمد 31/ (19140) عن حسين بن محمد، عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 32/ (19417)، وابن ماجه (1503) من طريقين عن إبراهيم الهجري، به.وسيأتي مختصرًا برقم (1428) من طريق إبراهيم الهجري، عن عبد الله بن أبي أوفى قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن المراثي.وأخرج الطبراني في "الصغير" (268)، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 333، والبيهقي 4/ 35 من طريق السري بن يحيى، عن قبيصة بن عقبة، عن الحسن بن صالح، عن أبي يعفور، عن عبد الله بن أبي أوفى: أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على جنازة فكبر عليها أربعًا. وإسناده حسن.والتكبير على الجنازة أربع تكبيرات ثابت من حديث أبي هريرة عند البخاري (1318)، وسيأتي برقم (1348).ومن حديث جابر، عند البخاري (1334)، ومسلم (952).ومن حديث ابن عباس عند البخاري (1319)، ومسلم (954).وانظر تعليقنا على "مسند أحمد" 12/ (7147).قوله: يرثين، قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد" من رثى الميت: إذا عدَّ محاسنه.ولتُفِض قال: من الإفاضة، يريد أن البكاء بلا صياح جائز.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1347)


1347 - أخبرنا إسماعيل بن أحمد التاجر، حدثنا محمد بن الحسين العَسْقَلاني، حدثنا حَرْمَلة بن يحيى، حدثنا ابن وَهْب أخبرني يونس، عن ابن شِهاب، قال: أخبرني أبو أُمامة بن سَهْل بن حُنَيف - وكان من كُبَراء الأنصار وعلمائِهم وأبناءِ الذين شهدوا بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبره رجالٌ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة على الجنازة: أن يُكبِّر الإمام، ثم يُصلِّيَ على النبي صلى الله عليه وسلم ويُخلِصَ الصلاةَ في التكبيرات الثلاث، ثم يُسلِّمَ تسليمًا خفيًا حين ينصرف، والسُّنة أن يفعل مَن وراءَه مثلَ ما فعل إمامُه.قال الزُّهري: حدثني بذلك أبو أمامة وابنُ المسيّب يَسمَع، فلم يُنكِر ذلك عليه.قال ابن شهاب: فذكرتُ الذي أخبرني أبو أُمامة من السُّنة في الصلاة على الميت لمحمد بن سُوَيد، قال: وأنا سمعتُ الضَّحَّاك بن قيس يحدِّث عن حَبِيب بن مَسْلَمة في صلاةٍ صلّاها على الميت مثلَ الذي حدَّثَنا أبو أمامة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وليس في التَّسليمة الواحدة على الجنازة أصحُّ منه.وشاهده حديث أبي العَنْبَس سعيدِ بن كَثِير:




আবূ উমামাহ বিন সাহল বিন হুনাইফ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীগণের মধ্য থেকে কয়েকজন ব্যক্তি জানাযার সালাত সম্পর্কে তাঁকে (আবূ উমামাহকে) অবহিত করেছেন যে, ইমাম তাকবীর বলবেন, তারপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের উপর দরূদ পড়বেন এবং বাকি তিন তাকবীরের মাঝেও সালাতের (দো‘আর) একনিষ্ঠতা বজায় রাখবেন। এরপর সালাম ফিরানোর সময় চুপে চুপে সালাম ফিরিয়ে সালাত শেষ করবেন। সুন্নাত হলো— তাঁর (ইমামের) পেছনের লোকেরাও তাঁর (ইমামের) মতোই কাজ করবে।

যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আবূ উমামাহ আমাকে এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, আর ইবনু মুসায়্যাব (রাহিমাহুল্লাহ) তা শুনছিলেন এবং তিনি তাতে কোনো আপত্তি করেননি। ইবনু শিহাব (যুহরী) বলেন: আবূ উমামাহ মৃত ব্যক্তির সালাত (জানাযা) সম্পর্কে যে সুন্নাত আমাকে বর্ণনা করেছেন, আমি তা মুহাম্মাদ ইবনু সুওয়াইদকে উল্লেখ করলাম। তিনি (মুহাম্মাদ ইবনু সুওয়াইদ) বললেন: আমি দাহহাক ইবনু কাইসকে হাবীব ইবনু মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি, তিনি জানাযার যে সালাত আদায় করেছিলেন, তা আবূ উমামাহ আমাদের কাছে যা বর্ণনা করেছেন তারই অনুরূপ ছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، حرملة بن يحيى تكلم فيه بعضهم، إلا أنه أعلم الناس في ابن وهب، ويونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري، وأبو أمامة بن سهل بن حنيف مختلف في صحبته، والراجح أنه أدرك النبي صلى الله عليه وسلم وليس له سماع منه صلى الله عليه وسلم. انظر "نتائج الأفكار" لابن حجر 4/ 380، و "جلاء الأفهام" لابن القيم ص 110.وأخرجه البيهقي 4/ 39 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 500، والطبراني في "مسند الشاميين" (3000) من طريق شعيب بن أبي حمزة. عن الزهري، به.وأخرجه الشافعي في "الأم" 2/ 608 - ومن طريقه البيهقي في "الكبرى" 4/ 39، وفي "الصغرى" (1080) و (1081)، وفي "معرفة السنن والآثار" (7601) و (7602) عن مطرف بن مازن، عن معمر، وأخرجه النسائي (2127) و (2128) من طريق الليث بن سعد، كلاهما عن الزهري، به. إلّا أنَّ مطرفًا جعل الإسناد الثاني من حديث الضحاك بن قيس، لم يذكر فيه حبيب بن مسلمة، أما الليث فجعل الإسناد الأول من حديث أبي أمامة بن سهل، لم يذكر فيه رجلًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرج حديث أبي أمامة وحده ابن المنذر في "الأوسط" (3158) عن ابن عبد الحكم، عن ابن وهب، به إلى رجال من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه يسلِّم تسليمًا خفيًّا حين ينصرف، والسنة أن يفعل مَن وراءه ما فعل إمامُه. وأخرج حديث أبي أمامة وحده أيضًا، لكن دون ذكر رجلٍ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: عبد الرزاق (6428) - ومن طريقه ابن الجارود (540)، وابن المنذر (3137) وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 296 عن عبد الأعلى، كلاهما (عبد الرزاق وعبد الأعلى) عن معمر، عن الزهري، به.قوله: ويُخلِص الصلاةَ في التكبيرات الثلاث، أي: يُخلِص بالدعاء للميت في هذه التكبيرات، وهي بقية التكبيرات الأربع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1348)


1348 - حدَّثَناه أبو بكر بن أبي دارِم، الحافظ، حدثنا عبد الله بن غنَّام بن حفص بن غِيَاث حدثني أبي، عن أبيه، عن أبي العَنْبَس، عن أبيه، عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى على جنازةٍ، فكبر عليها أربعًا، وسلَّم تسليمةً [1]. التّسليمةُ الواحدة على الجنازة قد صحَّت الروايةُ فيه عن علي بن أبي طالب، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عباس، وجابر بن عبد الله، وعبد الله بن أبي أوْفَى، وأبي هريرةَ: أنهم كانوا يُسلمون على الجنازة تسليمةً واحدة [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি জানাযার সালাত আদায় করলেন, তাতে তিনি চারটি তাকবীর দিলেন এবং একটি সালাম ফেরালেন। জানাযার সালাতে এক সালামের বিষয়টি আলী ইবন আবী তালিব, আবদুল্লাহ ইবন উমার, আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস, জাবির ইবন আবদুল্লাহ, আবদুল্লাহ ইবন আবী আওফা এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বিশুদ্ধ সনদে বর্ণিত হয়েছে যে, তাঁরা জানাযায় এক সালাম দিতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف مرفوعًا، غنام بن حفص مجهول الحال، وأبو بكر بن أبي دارم متكلم فيه، لكن تابع غنامًا إبراهيمُ بنُ إسماعيل بن بشير على رفعه إلّا أنَّه قد خالفهما أبو بكر وعثمان ابنا أبي شيبة فروياه عن حفص بن غياث فوقفاه على أبي هريرة، وصحَّح الدارقطني وقفَه.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 43، وفي "الصغرى" (1088) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني في "السنن" (1817) و (1842)، وأبو طاهر المخلّص في "المخلصيات" (1228) و (1569) من طريق إبراهيم بن إسماعيل بن بشير، عن حفص بن غياث به.وأما الموقوف فقد أخرجه ابن أبي شيبة 3/ 308، ومن طريقه ابن المنذر في "الأوسط" (3155) عن حفص بن غياث، عن أبي العنبس، عن أبيه أنه قال: صليت خلف أبي هريرة على جنازة، فكبَّر عليها أربعًا، وسلَّم عن يمينه تسليمة.ورواه أيضًا عثمان بن أبي شيبة عن حفص موقوفًا على أبي هريرة، كما في "العلل" للدارقطني (2188)، قال الدارقطني: وهو الصواب.أما التكبير على الجنازة أربعًا دون ذكر التسليم، فقد صحَّ من حديث سعيد بن المسيب عن أبي هريرة مرفوعًا، أخرجه أحمد 12/ (7147)، والبخاري (1318)، ومسلم (951)، وأبو داود (3204)، وابن ماجه (1534)، والترمذي (1022)، والنسائي، (2109)، ولفظه عند البخاري: أبي هريرة قال: نَعَى النبيُّ صلى الله عليه وسلم إلى أصحابه النجاشيَّ، ثم تقدم فصفوا خلفه، فكبر أربعًا.



[2] انظر "مصنف عبد الرزاق" (6444) و (6450)، و"مصنف ابن أبي شيبة" 3/ 307 و 308، و"الأوسط" لابن المنذر (3150 - 3159).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1349)


1349 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد.وأخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المثنَّى ومحمد بن بشار وعُبيد الله بن سعيد؛ قالوا: حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا المثنَّى بن سعيد، عن قتادة، عن عبد الله بن بُريدَة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "المؤمنُ يموتُ بعَرَق الجَبِين" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুমিন কপাল ঘেমে মৃত্যুবরণ করে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات، غير أن قتادة لا يُعرف له سماع من عبد الله بن بريدة، فيما قاله البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 12، لكنه قد توبع. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى، ومسدد: هو ابن مسرهد وبريدة: هو ابن الحصيب.وأخرجه الترمذي (982)، والنسائي (1967) عن محمد بن بشار، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن، وقد قال بعض أهل العلم: لا نعرف لقتادة سماعًا من عبد الله بن بريدة.وأخرجه ابن حبان (3011) عن أبي خليفة الفضل بن الحُباب، عن مسدد، به.وأخرجه أحمد 38/ (22964) و (23047) عن يحيى بن سعيد القطان، به.وأخرجه أحمد (23022) و (23047) من طريقين آخرين عن المثنى بن سعيد، به.وأخرجه النسائي (1968) من طريق كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن بريدة، به. وإسناده قوي.وانظر أحاديث الباب في "مسند أحمد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1350)


1350 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك، حدثنا الحسن بن سلَّام، حدثنا قَبِيصة بن عُقبة، حدثنا سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن، عن سفيان، عن عاصم بن عُبيد الله، عن القاسم بن محمد، عن عائشة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قبَّل عثمانَ بن مَظْعون وهو ميت وهو يبكي، قال: وعيناه تُهْراقانِ [1].هذا حديث مُتداوَلٌ بين الأئمة إلّا أنَّ الشيخين لم يحتجّا بعاصم بن عُبيد الله، وشاهدُه الصحيح المعروف حديث عبد الله بن عباس، وجابر بن عبد الله، وعائشة: أنَّ أبا بكرٍ الصدِّيق قبَّل النبيَّ صلى الله عليه وسلم وهو ميتٌ [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উসমান ইবনু মায'ঊনকে চুম্বন করলেন যখন তিনি মৃত ছিলেন এবং তিনি কাঁদছিলেন। রাবী বলেন, আর তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের) চোখ থেকে অশ্রু ঝরছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث قابل للتحسين، وهذا إسناد ضعيف لضعف عاصم بن عبيد الله - وهو ابن عاصم بن عمر بن الخطاب - لكن روي ما يشهد له كما سيأتي. عبد الرحمن: هو ابن مهدي، وسفيان: هو ابن سعيد الثوري.وهو في "مسند أحمد" 42/ (25712) عن عبد الرحمن بن مهدي.وأخرجه الترمذي (989) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 40/ (24165) و (24286) و 42/ (25712)، وأبو داود (3163)، وابن ماجه (1456) من طرق عن سفيان الثوري، به.وسيأتي ذكر تقبيله صلى الله عليه وسلم عثمانَ بن مظعون برقم (4929) من طريق معاوية بن هشام عن سفيان الثوري.ويشهد لذلك حديث عائشة بنت قُدامة بن مظعون عند الطبراني 24/ (855)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (4918)، وفي إسناده لِين.ويشهد لبكائه صلى الله عليه وسلم عليه حديث ابن عباس عند الطبراني في "الكبير" (10826)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 105، وفي "معرفة الصحابة" (4921)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" (1879) ص 552، ورجاله عند الطبراني ثقات.لكن قد صحَّ تقبيل أبي بكر للنبي صلى الله عليه وسلم وهو ميت كما سيشير إليه المصنف.



[2] حديث ابن عباس وعائشة أخرجه البخاري (4455) و (5709)، وابن ماجه (1457)، والنسائي (1979) و (7074)، وابن حبان (3029).وحديث جابر بن عبد الله أخرجه الطيالسي (1818)، وفيه صالح بن أبي الأخضر، وهو ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1351)


1351 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب حدثنا محمد بن سِنَان القزَّاز، حدثنا أبو داود الطيالسي، حدثنا شُعبة.وحدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا أبو عمر الحَوْضي ومسلم بن إبراهيم، قالا: حدثنا شعبة.وأخبرنا أبو علي الحافظ، حدثنا علي بن العباس البَجَلي، حدثنا أبو كُرَيب، حدثنا وكيع، عن شعبة، عن خُلَيد بن جعفر، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أطيبُ الطِّيبِ المِسْكُ" [1].تابعه المستمِرُّ بن الرَّيّان عن أبي نَضْرة:




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সর্বশ্রেষ্ঠ সুগন্ধি হলো মিসক (কস্তুরী)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن غالب: هو ابن حرب أبو جعفر الضبي، وأبو عمر الحوضي: هو حفص بن عمر بن الحارث، ومسلم بن إبراهيم: هو الأزدي الفراهيدي، وأبو علي الحافظ: هو الحسين بن علي، وأبو كريب: هو محمد بن العلاء، وخليل بن جعفر: هو ابن طريف الحنفي، وأبو نضرة: هو المنذر بن مالك بن قِطْعة.وأخرجه الترمذي (991)، والنسائي (2043) عن محمود بن غيلان، عن أبي داود الطيالسي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 17/ (11269) و 18/ (11439)، والترمذي (992)، وابن حبان (1378) من طرق عن وكيع بن الجراح، به.وأخرجه أحمد 18/ (11646) و (11832)، ومسلم (2252) (18) و (19)، والترمذي (991)، والنسائي (2043) و (9352) و (9353) من طرق عن شعبة، به. وأورده بعضهم ضمن قصة لامرأة من بني إسرائيل.وانظر ما بعده. و (5592) من طرق عن المستمر بن الريان، بهذا الإسناد. وأورده بعضهم ضمن قصة المرأة من بني إسرائيل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1352)


1352 - أخبرَناه عبد الصمد بن علي البزَّاز ببغداد، حدثنا حامد بن سَهْل، حدثنا أبو مَعمَر، حدثنا عبد الوارث عن المُستمِرِّ بن الرَّيّان، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد الخُدْرِي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سُئِل عن المِسْك، فقال: "هو أطيَبُ طِيبِكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، فإنَّ خُلَيدَ بن جعفر والمُستَمِرَّ بن الرَّيّانِ عِدادُهما في الثِّقات، ولم يُخرجا عنهما.وله شاهدٌ عن علي بن أبي طالب، وإليه ذهب أحمد بن حنبل:




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিসক (কস্তুরী) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "এটা তোমাদের সুগন্ধির মধ্যে শ্রেষ্ঠ সুগন্ধি।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو المنقري، وعبد الوارث هو ابن سعيد.وأخرجه أحمد 17/ (11311) و (11364) و 18/ (11426) و (11590) و (11646)، ومسلم (2252) (19)، وأبو داود (3158)، والنسائي (2044) و (9353)، وابن حبان (5591) و (5592) من طرق عن المستمر بن الريان، بهذا الإسناد. وأورده بعضهم ضمن قصة المرأة من بني إسرائيل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1353)


1353 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أيوب، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا حُمَيد بن عبد الرحمن الرُّؤَاسي، حدثنا الحسن بن صالح، عن هارون بن سعد، عن أبي وائل قال: كان عند عليٍّ مِسكٌ، فأوصَى أن يُحنَّط به. قال: وقال علي وهو فَضْلُ حَنوط رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কাছে মিশক (কস্তুরী) ছিল। তিনি ওসিয়ত করলেন যেন তা দিয়ে তাঁকে হানূত (কাফনের সুগন্ধি) করা হয়। তিনি (আলী) বললেন, এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হানূতের অতিরিক্ত অংশ ছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل هارون بن سعيد - وهو العجلي - فهو صدوق، وباقي رجاله ثقات، وحسَّن إسناده النووي في "خلاصة الأحكام" 2/ 955، لكن قد اختلف فيه على حميد بن عبد الرحمن الرؤاسي، فقد رواه كما هنا إبراهيم بن موسى - وهو ابن يزيد بن زاذان الرازي، وهو ثقة حافظ - عنه عن الحسن بن صالح - وهو ابن حي - عن هارون بن سعد - وهو العجلي - عن أبي وائل - وهو شقيق بن سلمة - قال: كان عند عليٍّ … فذكره، وخالفه غيره فرووه عن حميد، عن الحسن بن صالح، عن هارون بن سعد قال: كان عند علي، لم يذكروا فيه أبا، وائل، كما سيأتي. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 405، وفي "الصغرى" (1044)، وفي "دلائل النبوة" 7/ 249 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 251. وأخرجه عبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (943)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" 4/ 370، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 563 من طريق إسحاق بن إبراهيم - وهو ابن راهويه - والبيهقي في "الدلائل" 7/ 249 من طريق يعقوب بن إبراهيم الدورقي، ثلاثتهم (ابن سعد، وابن راهويه، والدورقي) عن حميد، عن الحسن، عن هارون قال: كان عند عليٍّ … لم يذكروا فيه أبا وائل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1354)


1354 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا أبو معاوية.وحدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيبة، حدثنا أبو معاوية، حدثنا أبو بُرْدة، عن عَلْقَمة بن مَرْثَد، عن ابن بُرَيدة، عن أبيه قال: لما أَخَذوا في غَسْل رسول الله صلى الله عليه وسلم، ناداهم مُنادٍ من الدَّاخل: لا تَنزِعُوا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قَميصَه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.وأبو بُرْدةَ هذا: هو بُريدُ بن عبد الله بن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري، محتجٌّ به في "الصحيحين" [2].




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তারা আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে গোসল করাতে শুরু করলেন, তখন ভেতর থেকে একজন আহ্বানকারী তাদের ডেকে বললেন: তোমরা আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর শরীর থেকে তাঁর জামাটি খুলো না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي بردة: وهو عمرو بن يزيد على الراجح. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير وابن بريدة: هو سليمان، وأبوه هو بريدة بن الحصيب الأسلمي رضي الله عنه.وانظر ما سلف برقم (1322). وأخرجه أيضًا البيهقي في "الكبرى" 3/ 388، وفي "الدلائل" 7/ 253 من طريقين عن مسدد، بهذا الإسناد، مثله.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (463)، والبزار (519) من طريقين عن عبد الواحد بن زياد، به واقتصر ابن أبي عاصم في روايته على الشطر الثاني من الحديث، والبزار على الشطر الأول منه.ورواه حماد بن زيد كما سيأتي برقم (4445)، وصفوان بن عيسى كما عند ابن ماجه (1467)، كلاهما عن معمر، عن الزهري عن سعيد بن المسيب، عن علي بن أبي طالب قال: لما غُسل النبي صلى الله عليه وسلم … فذكراه مقتصرين على الشطر الأول.وخالفهما عبد الرزاق وعبد الله بن المبارك وعبد الأعلى، فرووه عن معمر، عن الزهري عن ابن المسيب قال: التمس عليٌّ من النبي صلى الله عليه وسلم ما يلتمس من الميت فلم يجده، فقال: بأبي أنت وأمي، طبت حيًّا وميّتًا. فرووه هكذا مرسلًا.أما رواية عبد الرزاق فهي في "مصنفه" (6094).وأما رواية ابن المبارك فقد أخرجها ابن أبي شيبة 3/ 246 و 14/ 558، وأبو داود في "المراسيل" (415)، والضياء في "الأحاديث المختارة" 2/ (476). وقرن ابن أبي شيبة بابن المبارك عبدَ الأعلى بن عبد الأعلى.وأخرج الشطر الثاني مرسلًا أيضًا ابن أبي شيبة 14/ 556 عن عبد الأعلى، عن معمر، به.ورواه سليمان بن أرقم عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن علي موصولًا.وخالفه صالح بن كيسان والأوزاعي، فروياه عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا. كما في "العلل" للدارقطني (371)، وقال الدارقطني: والمرسل أصح. وكذلك قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: 3/ 519، وزاد وحديث عبد الواحد خطأ.وله شاهد من حديث ابن عباس بإسناد ضعيف عند أحمد 4/ (2357)، وابن ماجه (1628).وذكرنا في التعليق عليهما بقية شواهده.



[2] هذا وهم من المصنف رحمه الله، بل أبو بردة هذا: هو عمرو بن يزيد، وهو ضعيف، كما بيّنا ذلك في تعليقنا على الرواية السالفة برقم (1322). وأخرجه أيضًا البيهقي في "الكبرى" 3/ 388، وفي "الدلائل" 7/ 253 من طريقين عن مسدد، بهذا الإسناد، مثله.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (463)، والبزار (519) من طريقين عن عبد الواحد بن زياد، به واقتصر ابن أبي عاصم في روايته على الشطر الثاني من الحديث، والبزار على الشطر الأول منه.ورواه حماد بن زيد كما سيأتي برقم (4445)، وصفوان بن عيسى كما عند ابن ماجه (1467)، كلاهما عن معمر، عن الزهري عن سعيد بن المسيب، عن علي بن أبي طالب قال: لما غُسل النبي صلى الله عليه وسلم … فذكراه مقتصرين على الشطر الأول.وخالفهما عبد الرزاق وعبد الله بن المبارك وعبد الأعلى، فرووه عن معمر، عن الزهري عن ابن المسيب قال: التمس عليٌّ من النبي صلى الله عليه وسلم ما يلتمس من الميت فلم يجده، فقال: بأبي أنت وأمي، طبت حيًّا وميّتًا. فرووه هكذا مرسلًا.أما رواية عبد الرزاق فهي في "مصنفه" (6094).وأما رواية ابن المبارك فقد أخرجها ابن أبي شيبة 3/ 246 و 14/ 558، وأبو داود في "المراسيل" (415)، والضياء في "الأحاديث المختارة" 2/ (476). وقرن ابن أبي شيبة بابن المبارك عبدَ الأعلى بن عبد الأعلى.وأخرج الشطر الثاني مرسلًا أيضًا ابن أبي شيبة 14/ 556 عن عبد الأعلى، عن معمر، به.ورواه سليمان بن أرقم عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن علي موصولًا.وخالفه صالح بن كيسان والأوزاعي، فروياه عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا. كما في "العلل" للدارقطني (371)، وقال الدارقطني: والمرسل أصح. وكذلك قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: 3/ 519، وزاد وحديث عبد الواحد خطأ.وله شاهد من حديث ابن عباس بإسناد ضعيف عند أحمد 4/ (2357)، وابن ماجه (1628).وذكرنا في التعليق عليهما بقية شواهده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1355)


1355 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا مَعمَر، عن الزُّهري، عن سعيد بن المسيّب قال: قال عليُّ بن أبي طالب: غسلتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذهبتُ أنظُرُ ما يكون من الميِّت فلم أرَ شيئًا، وكان طيِّبًا صلى الله عليه وآله وسلم حيًّا وميتًا.وَلِيَ دَفْنَه وإجنانَه دون الناس أربعةٌ: عليٌّ، والعباسُ، والفضلُ، وصالحٌ مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولُحِدَ لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم لَحْدًا، ونُصِبَ عليه اللَّبِنَ نصبًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجا منه غيرَ اللَّحد [2].




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গোসল দিলাম। আমি দেখতে গিয়েছিলাম, সাধারণত মৃত ব্যক্তির শরীর থেকে যা বের হয় (যেমন দুর্গন্ধ বা নিঃসরণ), কিন্তু আমি কিছুই দেখিনি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত ও মৃত উভয় অবস্থাতেই পবিত্র (সুগন্ধিযুক্ত) ছিলেন। সাধারণ মানুষ বাদে মোট চারজন তাঁর দাফন ও কবরে রাখার দায়িত্ব নেন: আলী, আব্বাস, ফাদল এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত দাস সালিহ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লাহদ (পাশ থেকে খনন করা কবর) করা হয়েছিল এবং তার উপর কাঁচা ইট স্থাপন করা হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات غير أنه قد اختُلف في وصله وإرساله، وصحَّح إرساله أبو حاتم والدارقطني، وعلى ثبوت إرساله فهو من مرسل سعيد بن المسيب، ومراسيله من أقوى المراسيل.وقد رواه الزهري، واختلف عليه فيه:فرواه معمر - وهو ابن راشد عنه واختلف عليه فيه:فرواه عبد الواحد بن زياد - كما عند المصنف هنا، وعن المصنف أخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 53، وفي "دلائل النبوة" 7/ 234 - 244 عن معمر عن الزهري، عن سعيد بن المسيب قال: قال علي بن أبي طالب … فذكره. وأخرجه أيضًا البيهقي في "الكبرى" 3/ 388، وفي "الدلائل" 7/ 253 من طريقين عن مسدد، بهذا الإسناد، مثله.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (463)، والبزار (519) من طريقين عن عبد الواحد بن زياد، به واقتصر ابن أبي عاصم في روايته على الشطر الثاني من الحديث، والبزار على الشطر الأول منه.ورواه حماد بن زيد كما سيأتي برقم (4445)، وصفوان بن عيسى كما عند ابن ماجه (1467)، كلاهما عن معمر، عن الزهري عن سعيد بن المسيب، عن علي بن أبي طالب قال: لما غُسل النبي صلى الله عليه وسلم … فذكراه مقتصرين على الشطر الأول.وخالفهما عبد الرزاق وعبد الله بن المبارك وعبد الأعلى، فرووه عن معمر، عن الزهري عن ابن المسيب قال: التمس عليٌّ من النبي صلى الله عليه وسلم ما يلتمس من الميت فلم يجده، فقال: بأبي أنت وأمي، طبت حيًّا وميّتًا. فرووه هكذا مرسلًا.أما رواية عبد الرزاق فهي في "مصنفه" (6094).وأما رواية ابن المبارك فقد أخرجها ابن أبي شيبة 3/ 246 و 14/ 558، وأبو داود في "المراسيل" (415)، والضياء في "الأحاديث المختارة" 2/ (476). وقرن ابن أبي شيبة بابن المبارك عبدَ الأعلى بن عبد الأعلى.وأخرج الشطر الثاني مرسلًا أيضًا ابن أبي شيبة 14/ 556 عن عبد الأعلى، عن معمر، به.ورواه سليمان بن أرقم عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن علي موصولًا.وخالفه صالح بن كيسان والأوزاعي، فروياه عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا. كما في "العلل" للدارقطني (371)، وقال الدارقطني: والمرسل أصح. وكذلك قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: 3/ 519، وزاد وحديث عبد الواحد خطأ.وله شاهد من حديث ابن عباس بإسناد ضعيف عند أحمد 4/ (2357)، وابن ماجه (1628).وذكرنا في التعليق عليهما بقية شواهده.



[2] أخرج مسلم (966) من حديث سعد بن أبي وقاص أنه قال في مرضه الذي هلك فيه: الحَدوا لي لحدًا، وانصِبوا عليَّ اللبِن نصبًا، كما صُنع برسول الله صلى الله عليه وسلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1356)


1356 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن محمد بن إسحاق الخُزاعي بمكة، حدثنا عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرّة، حدثنا عبد الله بن يزيد المُقرئُ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، عن شُرَحْبيل بن شَرِيكَ المَعافِري، عن عُلَيِّ بن رباح اللَّخْمي، عن أبي رافع قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من غَسّل ميّتًا فكَتَم عليه، غُفِر له أربعين مرةً، ومن كفَّن ميتًا، كَسَاه الله من سُندسِ وإسْتَبرقِ الجنة، ومن حَفَر لميتٍ قبرًا وأَجنَّه فيه، أُجريَ له من الأجر كأجرِ مَسْكَنٍ سَكَّنه إلى يوم القيامة" [1].هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মৃতকে গোসল করাবে এবং তার দোষ গোপন করবে, তাকে চল্লিশবার ক্ষমা করা হবে। আর যে ব্যক্তি কোনো মৃতকে কাফন পরাবে, আল্লাহ তাকে জান্নাতের পাতলা রেশম (সুনদুস) ও মোটা রেশম (ইসতাবরাক) দ্বারা পরিহিত করবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো মৃতের জন্য কবর খনন করবে এবং তাকে তাতে দাফন করবে, কিয়ামত দিবস পর্যন্ত তাকে এমন সওয়াব দেওয়া হবে, যেন সে তাকে একটি ঘরে থাকতে দিয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده جيد من أجل شرحبيل بن شريك المعافري.وانظر ما سلف برقم (1323).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1357)


1357 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون حدثنا محمد بن إسحاق.وأخبرنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا محمد بن محمد بن رجاء بن السِّنْدي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيّة، عن محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حَبِيب، عن مَرْثَد بن عبد الله اليَزَني، عن مالك بن هُبَيرة - وكانت له صحبة - قال: كان إذا أُتي بجنازةٍ ليُصلِّي عليها، فتقالَّ أهلَها، جزّأَهم صفوفًا ثلاثة، فصلَّى بهم عليها، ويقول: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما صَفَّ صفوفٌ ثلاثةٌ من المسلمين على جنازةٍ، إلَّا أَوجَبَته". هذا لفظ حديث ابن عُلَيّة، وفي حديث المحبوبي: "إلّا غُفِر له" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




মালিক বিন হুবাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন তাঁর কাছে কোনো জানাজা আনা হতো এবং তিনি এর উপর সালাত আদায়ের জন্য অংশগ্রহণকারীদের সংখ্যা কম দেখতেন, তখন তিনি তাদেরকে তিনটি কাতারে বিভক্ত করে তাদের সাথে জানাজার সালাত আদায় করতেন। আর তিনি বলতেন: নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলমানের জানাজার ওপর যদি তিন কাতার সালাত আদায় করে, তবে তা (জান্নাত) তার জন্য অপরিহার্য হয়ে যায়।" (ইবনে উলাইয়্যার বর্ণনায় এই শব্দ রয়েছে। মাহবুবীর বর্ণনায় রয়েছে: "তবে তাকে মাফ করে দেওয়া হয়।")




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، فقد صرَّح محمد بن إسحاق بالتحديث عند الروياني في "مسنده" (1537)، وحسنه الترمذي والنووي وابن حجر.وأخرجه أحمد 27/ (16724)، وأبو داود (3166)، وابن ماجه (1490)، والترمذي (1028) من طرق عن ابن إسحاق، بهذا الإسناد قال الترمذي بعد أن حسنه: هكذا رواه غير واحد عن محمد بن إسحاق، وروى إبراهيم بن سعد عن محمد بن إسحاق هذا الحديث وأدخل بين مرثد ومالك بن هبيرة رجلًا، ورواية هؤلاء أصح عندنا.تنبيه: لم نكن قد وقعنا على تصريح ابن إسحاق بالتحديث خلال عملنا في "مسند أحمد" فحُكم على إسناده بالضَّعف لذلك، فليستدرك من هنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1358)


1358 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا محمد بن سعيد الأصبهاني، حدثنا شَرِيك، عن عبد الله بن عيسى بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عبد الله بن جَبْر [1]، عن أنس بن مالكٍ، قال: كان غلامٌ يهوديٌّ يَخدُمُ النبي صلى الله عليه وسلم، فمَرِض فعاده، وقال: "قل: أشهدُ أن لا إله إلّا الله وأنكَ رسول الله" فنظر الغلامُ إلى أبيه فقال: قل ما يقولُ لك محمد. قال: فلمَّا مات، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صَلُّوا على أخيكُم" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন ইহুদি বালক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করত। সে অসুস্থ হয়ে পড়লে তিনি তাকে দেখতে গেলেন এবং বললেন: "বলো, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং তুমি আল্লাহর রাসূল।" তখন বালকটি তার পিতার দিকে তাকাল। পিতা বললেন: "মুহাম্মদ যা বলছেন, তুমি তাই বলো।" অতঃপর যখন সে মারা গেল, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য সালাত (জানাজা) আদায় করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في (ص) و (ب) و (ع) إلى: جبير، وهو في (ز) على الصواب. وهو عبد الله بن عبد الله بن جبر بن عَتيك الأنصاري، فهو المعروف بالرواية عن أنس بن مالك. بهذا الإسناد. لم يذكر ابن ماجه في الموضع الأول قوله: "الطفل يصلى عليه" واقتصر في الموضع الثاني عليه.وانظر ما بعده، وما سلف برقم (1329).



[2] حديث صحيح دون قصة الأمر بالصلاة على الغلام اليهودي، فقد تفرد بها شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - وفي حفظه سوء، وقد روي من وجه آخر صحيح عن أنس من دون هذا الحرف كما سيأتي.وأخرجه أحمد 21/ (13736)، والنسائي (7458) من طريقين عن شريك، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق شريك مرة أخرى برقم (7982).وأما الوجه الآخر عن أنس، فقد أخرجه أحمد 20/ (12792)، والبخاري (1356) و (5657)، وأبو داود (3095)، والنسائي (8534)، وابن حبان (2960) و (4884) من طريق حماد بن زيد، عن ثابت بن أسلم البناني، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث، وفي آخره قال النبي صلى الله عليه وسلم: "الحمد لله الذي أنقذه من النار"؛ ولم يذكر فيه صلاة. بهذا الإسناد. لم يذكر ابن ماجه في الموضع الأول قوله: "الطفل يصلى عليه" واقتصر في الموضع الثاني عليه.وانظر ما بعده، وما سلف برقم (1329).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1359)


1359 - أخبرنا أحمد بن سَلْمان بن الحسن الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا سعيد بن عبيد الله بن جُبَير بن حَيَّة، حدثني عمِّي زياد بن جُبَير بن حيَّة، حدثني أبي جُبَير بن حيَّة الثقفي، أنه سَمِع المغيرة بن شعبةَ يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الراكبُ خلفَ الجنازةِ، والماشي قريبًا منها، والطفل يُصلَّى عليه [1]. رواه يونس بن عُبيد عن زياد بن جُبَير:




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আরোহী জানাযার পেছনে থাকবে, হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি জানাযার কাছাকাছি থাকবে, এবং শিশুর উপরও জানাযার সালাত আদায় করা হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، على خِلاف في رفعه ووقفه.وأخرجه أحمد 30/ (18207)، وابن ماجه (1481) و (1507) من طريق روح بن عبادة: بهذا الإسناد. لم يذكر ابن ماجه في الموضع الأول قوله: "الطفل يصلى عليه" واقتصر في الموضع الثاني عليه.وانظر ما بعده، وما سلف برقم (1329).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1360)


1360 - أخبرَناه علي بن حمشاذَ العَدْل، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن بشار، حدثنا أبو همَّام محمد بن الزِّبْرِقان، حدثنا يونس بن عُبيد، عن زياد بن جُبَير بن حيَّة، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة - قال يونس: وحدثني بعضُ أهله أنه رَفَعَه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال: الراكبُ يَسيرُ خلفَ الجنازةِ، والماشي عن يَمينِها وشِمالِها قريبًا [1]، والسِّقْط يُصلَّى عليه ويُدعَى لوالديه بالعافيةِ والرَّحمة [2].قال إبراهيم بن أبي طالب في عَقِب هذا الحديث: قولُ [3] يُونُس بن عُبيد: "وحدثني بعضُ أهله أنه رَفَعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم" روايةٌ ليونُسَ بن عُبيد عن سعيد بن عُبيدِ الله بن جُبير بن حَيَّة.هذا حديث صحيح على شرط البخاري، فقد احتجَّ في "الصحيح" بحديث المعتمِر، عن سعيد بن عُبيد الله، عن زياد بن جُبَير، عن جُبَير بن حيَّة، عن المغيرة، الحديث الطويل [4].وشاهد هذه الأحاديث حديثُ إسماعيل بن مُسلِم المكي عن أبي الزُّبير:




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আরোহী ব্যক্তি জানাজার পেছনে পেছনে চলবে। আর পদব্রজে গমনকারী ব্যক্তি জানাজার ডান ও বাম পাশে কাছাকাছি চলবে। আর (অপূর্ণাঙ্গ) ভ্রূণের ওপর জানাজার সালাত আদায় করা হবে এবং তার বাবা-মায়ের জন্য নিরাপত্তা (সুস্থতা) ও রহমতের দোয়া করা হবে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: قريبان، والمثبت من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج.



[2] حديث صحيح كسابقه.وأخرجه أحمد 30/ (18181) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، وأبو داود (3180) من طريق خالد بن عبيد الله الواسطي، كلاهما عن يونس بن عبيد، بهذا الإسناد. قال يونس - عند أحمد -: وأهل زياد يذكرون النبي صلى الله عليه وسلم، وأما أنا فلا أحفظه.



1360 [3] - في النسخ الخطية: قال، والمثبت من "سنن البيهقي" وهو أوجه.



1360 [4] - أخرجه البخاري (3159).