হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1361)


1361 - أخبرَناه عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا إسماعيل المكِّي، عن أبي الزُّبير، عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا استَهَلَّ الصبيُّ وُرِّثَ وصُلِّيَ عليه" [1]. الشيخان لم يحتجَّا بإسماعيل بن مسلم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি শিশু জন্মগ্রহণের সময় কান্নাকাটি করে (বা জীবিত থাকার স্পষ্ট প্রমাণ দেয়), তবে সে মীরাসের অধিকারী হবে এবং তার জানাযার সালাত আদায় করা হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف إسماعيل بن مسلم المكي، وقد اختلف في رفعه ووقفه، ورجح وقفَه الترمذي والنسائي والدارقطني. أبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس المكي.وأخرجه الترمذي (1032) من طريق محمد بن يزيد الواسطي، عن إسماعيل بن مسلم المكي، بهذا الإسناد. وقال: وقد ذهب بعض أهل العلم إلى هذا، قالوا: لا يصلَّى على الطفل حتى يستهل، وهو قول سفيان الثوري والشافعي.وأخرجه ابن ماجه (1508) و (2750) من طريق الربيع بن بدر، والبيهقي 4/ 8 من طريق الأوزاعي، كلاهما عن أبي الزبير، به. والربيع بن بدر هذا متروك، وفي الطريق إلى الأوزاعي بقية بن الوليد وفيه مقال.وسيأتي عند المصنف من طريق المغيرة بن مسلم (8220)، ومن طريق سفيان الثوري (8221)، كلاهما عن أبي الزبير، عن جابر مرفوعًا.وأخرجه موقوفًا ابن أبي شيبة 3/ 319 و 11/ 382، والدارمي (3168)، والبيهقي 4/ 8 من طريق أشعث بن سوّار، عن أبي الزبير، عن جابر قوله.وأخرج ابن ماجه (2751) من طريق مروان بن محمد الطاطري، عن سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن جابر والمسور بن مخرمة مرفوعًا: "لا يرث الصبي حتى يستهل صارخًا". ورجاله ثقات، إلا أن الدارقطني أعلّه في كتابه "العلل" (3246) فوهّم فيه مروان بن محمد ثم قال: الصحيح عن سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن جابر والمسور وسعيد بن المسيب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال … مرسلًا. كذا قال، ولم يبيّن رجاله إلى سليمان! ولم نقف على ما قاله مسندًا، لكن أخرج ابن أبي شيبة 3/ 319 خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب في المولود، قال: لا يورَّث حتى يستهلّ. وخالد ليس بذاك القوي.وأخرج عبد الرزاق (6608) - ومن طريقه النسائي (6325) - عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول في المنفوس: يَرِثُ إِذا سُمِع صوتُه.وأخرجه موقوفًا أيضًا الدارمي (3172)، والبيهقي 4/ 8 من طريق محمد بن إسحاق، عن عطاء، عن جابر. وأشار الدارقطني في "العلل" (3271) إلى أن المثنى بن الصباح خالف ابنَ إسحاق فرواه عن عطاء مرفوعًا، والمثنى ضعيف.قال الترمذي بإثر الحديث (1032): هذا حديث قد اضطرب الناس فيه، فرواه بعضهم عن أبي الزبير عن جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعًا، وروى أشعث بن سوار وغير واحد عن أبي الزبير عن جابر موقوفًا، وروى محمد بن إسحاق عن عطاء بن أبي رباح عن جابر موقوفًا، وكأن هذا أصح من الحديث المرفوع.ويشهد للصلاة على الصبي حديث المغيرة السالف قبله.وروى ابن الأعرابي في "معجمه" (514) عن محمد بن سليمان بن هشام اليشكري عن عَبيدة بن حميد وعلي بن عاصم، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة مرفوعًا: "إذا استهل المولود ورث وصلي عليه". واليشكري ضعيف جدًّا.ويشهد لتوريث الصبي إذا استهل حديث أبي هريرة عند أبي داود (2920)، وإسناده حسن.وفي الباب عن ابن عباس موقوفًا عند الدارمي (3169)، وإسناده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1362)


1362 - حدثنا أحمد بن إسحاق بن أيوب الفقيه، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثنا يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حَبّان، عن أبي عَمْرةَ، عن زيد بن خالد الجُهَنيِّ قال: كنّا مع النبي صلى الله عليه وسلم بخَيبَر، فمات رجلٌ منّا من أشجَعَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صَلُّوا عليه"، فذهبنا ننظُرُ، فوجدنا خَرَزًا من خَرَزِ يهودَ، ما يُساوي دِرهَمَين [1]. رواه الناس عن يحيى بن سعيد. أبو عَمْرةَ هذا: رجلٌ من جُهَينةَ معروفٌ بالصِّدق، ولم يُخرجاه.




যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা খায়বারে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তখন আশজা' গোত্রের আমাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি মারা গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার উপর জানাযার সালাত আদায় করো।" এরপর আমরা দেখতে গেলাম এবং ইয়াহূদীদের কিছু পুঁতি/মালা পেলাম, যার মূল্য দুই দিরহামের সমানও ছিল না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، أبو عمرة ذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح حديثه ابن الجارود وابن حبان، وأبو نعيم في "الحلية" 8/ 262، والجورقاني في "الأباطيل والصحاح"، وقال ابن عساكر في "معجمه": حديث حسن. الحميدي: اسمه عبد الله بن الزبير، وسفيان: هو ابن عيينة، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وأخرجه أحمد 28/ (17031)، وابن ماجه (2848) من طرق، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق يحيى بن سعيد القطان وبشر بن المفضل عن يحيى بن سعيد الأنصاري برقم (2614) ويأتي تخريجه هناك.وفي الباب عن أبي هريرة عند البخاري (6707)، ومسلم (115)، وسيأتي برقم (4395). وعن عبد الله بن عمرو بن العاص عند البخاري (3074).وعن عمر بن الخطاب عند مسلم (114).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1363)


1363 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الأصبهاني، حدثنا أحمد بن مِهْران بن خالد الأصبهاني، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا إسرائيل، عن سِمَاك بن حَرْب، عن جابر بن سَمُرة قال: مات رجلٌ على عهد النبي صلى الله عليه وسلم فأتاه رجلٌ، فقال: مات فلان، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "لم يَمُتْ"، ثم أتاه الثانيةَ، فقال: مات فلان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لم يَمُتْ"، ثم أتاه الثالثةَ، فقال: مات فلان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كيف مات؟ " قال: نَحَرَ نفسَه بمِشْقَصٍ كان معه، فلم يُصلِّ عليه النبيُّ صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি মারা গেল। তখন একজন লোক তাঁর (নবীর) কাছে এসে বলল: অমুক ব্যক্তি মারা গেছে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "সে মরেনি।" এরপর সে দ্বিতীয়বার তাঁর কাছে এসে বলল: অমুক ব্যক্তি মারা গেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মরেনি।" এরপর সে তৃতীয়বার তাঁর কাছে এসে বলল: অমুক ব্যক্তি মারা গেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে কীভাবে মারা গেল?" সে বলল: সে নিজের কাছে থাকা একটি তীক্ষ্ণ ফলা দ্বারা নিজেকে হত্যা করেছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জানাযার সালাত আদায় করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل سماك بن حرب وأحمد بن مهران الأصبهاني. إسرائيل: هو ابن يونس السبيعي.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد 34/ (20816) و (20910) و (20977)، والترمذي (1068) من طرق عن إسرائيل بن يونس، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: هذا حديث حسن.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أيضًا أحمد (20848) و (20858)، ومسلم (978)، وأبو داود (3185)، وابن ماجه (1526)، والنسائي (2102)، وابن حبان (3093) و (3095) من طرق عن سماك بن حرب، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منهوالمِشْقص: هو نصل السهم إذا كان طويلًا وليس بالعريض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1364)


1364 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سُلَيمان المُرَاديّ، حدثنا أَسَدُ بن موسى.وأخبرنا جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي ببغداد، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا سليمان بن داود الهاشمي؛ قالا: حدثنا إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن عبد الله بن أبي قتادةَ، عن أبيه أبي قتادةَ قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا دُعِي إلى جنازةٍ سأل عنها، فإن أُثني عليها خيرٌ صلَّى عليها، وإن أُثني عليها غيرُ ذلك قال لأهلها: "شأنَكم بها"، ولم يُصلِّ عليها [1].هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখন কোনো জানাযার জন্য ডাকা হত, তখন তিনি সেটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতেন। যদি তার (মৃত ব্যক্তির) ভালো প্রশংসা করা হত, তবে তিনি তার জানাযার সালাত আদায় করতেন। আর যদি এর বিপরীত (খারাপ) প্রশংসা করা হত, তবে তিনি তার পরিবারবর্গকে বলতেন: "তোমরা এটিকে নিয়ে যা করার করো," এবং তিনি তার জানাযার সালাত আদায় করতেন না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. إبراهيم بن سعد: هو ابن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه أحمد 37/ (22555) و (22556)، وابن حبان (3057) من طريقين عن إبراهيم بن سعد، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1365)


1365 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب بن يوسف الحافظ إملاءً، حدثنا أبو أحمد محمد بن عبد الوهاب العَبْدي، حدثنا أبو الحسين سُرَيج بن النُّعمان الجَوْهَري، حدثنا فُلَيح بن سليمان، عن سعيد بن عُبيد بن السَّبَّاق، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قد كنَّا مَقْدَمَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم إذا حُضِر منّا الميتُ، آذنَّا النبيَّ صلى الله عليه وسلم فَحَضَرَه واستغفَرَ له، حتى إذا قُبِض انصرَفَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم ومن معه حتى يُدفَن، وربما طالَ حَبْسُ ذلك على نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم، فلما خَشِينا مشقَّةَ ذلك عليه قال بعضُ القوم لبعض: لو كنا لا نُؤذِنُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم بأحدٍ حتى يُقبَضَ، فإذا قُبِضَ آذنّاه، فلم يكن عليه في ذلك مشقَّةٌ ولا حبسٌ، ففعلنا ذلك، وكنا نُؤذِنُه بالميت بعد أن يموت، فيأتيهِ فيصلِّي عليه، فربما انصَرَفَ، وربما مَكَثَ حتى يُدفَنَ الميت، فكنا على ذلك حِينًا، ثم قلنا: لو لم نُشخِصِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وحملنا جنازتَنا إليه حتى يصلِّيَ عليه عند بيته، لكان ذلك أرفَقَ به، ففعلنا، فكان ذلك الأمرُ إلى اليوم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وقد أمليتُه فيما مضى مختصرًا.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মদিনায়) আগমনের সময়কালে ছিলাম। যখন আমাদের মধ্যে কেউ মৃত্যুমুখে পতিত হতেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সংবাদ দিতাম। তিনি সেখানে উপস্থিত হতেন এবং তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন। এরপর যখন (মৃত ব্যক্তিকে) উঠানো হতো/মৃত্যু ঘটতো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীরা দাফন সম্পন্ন না হওয়া পর্যন্ত ফিরতেন না। কখনও কখনও এর কারণে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য দীর্ঘ সময় অপেক্ষা করা আবশ্যক হয়ে যেত। যখন আমরা তাঁর জন্য এই কষ্টকে ভয় পেলাম, তখন কিছু লোক অন্যদের বলল: "যদি আমরা কাউকে মারা না যাওয়া পর্যন্ত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর না দিতাম, বরং সে মারা যাওয়ার পরে তাঁকে খবর দিতাম, তাহলে তাঁর জন্য কোনো কষ্ট বা দীর্ঘ অপেক্ষার দরকার হতো না।" আমরা তাই করলাম। আমরা মৃত ব্যক্তির মারা যাওয়ার পর তাঁকে খবর দিতাম, তখন তিনি আসতেন এবং তার জানাজার সালাত আদায় করতেন। কখনও কখনও তিনি (সালাতের পর) চলে যেতেন, আবার কখনও কখনও মৃত ব্যক্তিকে দাফন করা পর্যন্ত অপেক্ষা করতেন। আমরা কিছুদিন এইভাবেই চলতে থাকলাম। এরপর আমরা বললাম: "যদি আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (তাঁর স্থান থেকে) বের হতে না দেই এবং আমাদের জানাজাটিই তাঁর কাছে নিয়ে যাই, যাতে তিনি তাঁর ঘরের কাছেই সালাত আদায় করতে পারেন, তবে এটি তাঁর জন্য আরও আরামদায়ক হবে।" আমরা তাই করলাম। আর সেই পদ্ধতি আজও পর্যন্ত প্রচলিত আছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات غير فليح بن سليمان، ففيه كلام يحطه عن رتبة الصحيح. وانظر ما سلف برقم (1338).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1366)


1366 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الحسن بن مُهاجِر، حدثنا أبو الطّاهر وهارون بن سعيد، قالا: حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن عُمَارة بن غَزِيَّة، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أبيه: أنَّ أبا طلحةَ دعا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم إلى عُمير بن أبي طلحة، حين تُوفِّي، فأتاهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فصلَّى عليه في منزلهم، فتقدَّم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وكان أبو طلحة وراءَه وأمُّ سُليم وراءَ أبي طلحة، ولم يكن معهم غيرُهم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وسُنَّةٌ غريبةٌ في إباحة صلاة النساء على الجنائز، ولم يُخرجاه.




আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উমাইর ইবনু আবী তালহার [জানাজার জন্য] আহ্বান জানালেন, যখন সে মারা গিয়েছিল। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এলেন এবং তাদের বাড়িতেই তার জানাযার সালাত আদায় করলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইমাম হিসেবে সামনে দাঁড়ালেন, আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন তাঁর পেছনে, আর উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে। আর তারা ছাড়া সেখানে অন্য কেউ ছিল না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده إلى عبد الله بن أبي طلحة صحيح، إلّا أنَّ عبد الله هذا لم يدرك هذه القصة، والغالب أنه رواها عن أحدٍ من أهل بيته، فهم أصحاب القصة، وبذلك يكون قد أرسله عن صحابيٍّ، ولا يضر ذلك في صحة الحديث، والله أعلم. أبو الطاهر: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله بن السرح المصري.وأخرجه البيهقي 4/ 30 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 508، والطبراني في "المعجم الكبير" (4727) من طريقين عن عبد الله بن وهب، به.وله شاهد من حديث أنس بن مالك، أخرجه أحمد 20/ (13270) من طريق عبد الله بن عمر العمري، عن أم يحيى قالت: سمعت أنس بن مالك يقول: مات ابن لأبي طلحة، فصلى عليه النبي صلى الله عليه وسلم، فقام أبو طلحة خلف النبي صلى الله عليه وسلم، وأم سليم خلف أبي طلحة، كأنهم عرف ديك، وأشار بيده. وإسناده ضعيف لضعف عبد الله العمري وجهالة أم يحيى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1367)


1367 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق بن إبراهيم العدلُ ببغداد، حدثنا عبد الله بن رَوْح المَدائني، حدثنا عثمان بن عمر.وأخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوْح بن عُبادة، قالا: حدثنا أسامة بن زيد، عن الزُّهري، عن أنسٍ، قال: لما كان يومُ أُحدٍ، مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بحمزةَ بنِ عبد المطلب وقد جُدِعَ ومُثِّلَ [به] [1]، فقال: "لولا أن تَجِدَ صفيّةُ تركتُه حتى يَحشُرَه الله من بُطون الطير والسِّباع"، فكفَّنه في نَمِرةٍ إذا خُمِّر رأسُه بَدَتْ رِجْلاه، وإذا خُمِّرت رجلاه بَدَا رأسُه، فخَمَّر رأسَه، ولم يُصلِّ على أحدٍ من الشهداء غيرِه، وقال: "أنا شاهدٌ عليكم اليومَ"، وكان يَجمَع الثلاثةَ والاثنين في قبرٍ واحدٍ، ويَسألُ: "أيُّهم أكثر قرآنًا؟ " فيقدِّمُه في اللَّحْد، وكَفَّن الرَّجُلين والثلاثةَ في الثوب الواحد [2].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন উহুদের দিন এলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তাঁর নাক, কান কেটে ফেলা হয়েছিল এবং অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "যদি সাফিয়্যা (আমার ফুফু) কষ্ট না পেত, তাহলে আমি তাঁকে এমন অবস্থায় রেখে দিতাম যাতে আল্লাহ তাঁকে পাখি ও বন্য জন্তুর পেট থেকে একত্রিত করে উঠান।" অতঃপর তিনি তাঁকে একটি চাদরে কাফন দিলেন, যা দিয়ে মাথা ঢাকলে পা বেরিয়ে যেত, আর পা ঢাকলে মাথা বেরিয়ে যেত। তাই তিনি তাঁর মাথা ঢেকে দিলেন। এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া অন্য কোনো শহীদদের উপর সালাত (জানাযা) আদায় করেননি। এবং তিনি বললেন, "আমি আজ তোমাদের উপর সাক্ষী।" তিনি তিনজনকে বা দুজনকে এক কবরে একত্রিত করতেন এবং জিজ্ঞেস করতেন: "তাদের মধ্যে কে কুরআন সম্পর্কে বেশি জ্ঞানী ছিল?" অতঃপর তিনি তাঁকে লাহদ-এ (কবরের পার্শ্বস্থ স্থান) আগে রাখতেন। আর তিনি দুই বা তিনজন ব্যক্তিকে এক কাপড়ে কাফন দিতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "به" سقطت من نسخنا الخطية، واستدركناها من "تلخيص الذهبي" و"سنن البيهقي" حيث رواه من طريق المصنف.



[2] صحيح لغيره دون قوله: "ولم يصل على أحد من الشهداء غيره"، فقد قال الدارقطني في "سننه" بإثر الحديث (4205): لم يقل هذا اللفظ غير عثمان بن عمر، وليست بمحفوظة. انتهى، قلنا: وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن غلط فيه أسامة بن زيد - وهو الليثي - إذ جعله عن الزهري عن أنس، كما جزم به البخاري فيما سأله عنه الترمذي في "علله الكبير" (252)، وقال الترمذي في "سننه" (1016) والبزار (6347): لا نعلم أحدًا ذكره عن الزهري عن أنس غير أسامة بن زيد.على أنَّ الدارقطني قال في "العلل (2585): يشبه أن يكون حديث أسامة بن زيد محفوظًا. قلنا: الظاهر أنَّ قول البخاري هو الأصح، لتفرُّد أسامة بن زيد به، ولأنه وقع في نص الحديث وهمٌ يدل على عدم ضبطه له، وهو أن بعضهم يذكر عنه الصلاة على حمزة ونفي الصلاة على غيره، كما وقع عند المصنف هنا، وبعضهم يذكر عنه نفي الصلاة على الشهداء دون استثناء أحد.وأخرجه مختصرًا أبو داود (3137) عن عباس العنبري، عن عثمان بن عمر، بهذا الإسناد عن أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم مَرَّ بحمزة وقد مُثِّلَ به، ولم يصلِّ على أحد من الشهداء غيره.وأخرجه تامًّا أحمد 19/ (12300) عن صفوان بن عيسى وزيد بن الحباب، وأبو داود (3136)، والترمذي (1016) من طريق أبي صفوان عبد الله بن عيسى المرواني وزيد بن الحباب، ثلاثتهم عن أسامة بن زيد الليثي، به. لكن وقع في روايتي أحمد والترمذي: "لم يصلِّ عليهم"، ولم يستثن حمزة منهم، أما في رواية أبي داود فلم يذكر قصة الصلاة أصلًا. وقال الترمذي: حديث أنس حديث غريب، لا نعرفه من حديث أنس إلّا من هذا الوجه.وسيأتي مقطعًا فيما بعده وبرقم (2590) و (4948). وأخرجه أبو داود (3135) عن أحمد بن صالح وسليمان بن داود المهري، عن ابن وهب، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1368)


1368 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني أسامة بن زيد اللَّيثي، أنَّ ابن شهاب حدَّثه، أنَّ أنس بن مالك حدَّثه: أنَّ شهداء أُحدٍ لم يُغَسَّلوا، ودُفِنوا بدِمائِهم، ولم يُصلَّ عليهم [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، قد أخرج البخاريُّ وحده [2] حديث الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لم يصلِّ عليهم، ليس فيه هذه الألفاظ المجموعة التي تفرَّدَ بها أسامة بن زيد الليثي عن الزهري، قد اتفقا جميعًا [3] على إخراج حديث الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حَبيب، عن أبي الخَير، عن عُقْبة بن عامر الجُهَني: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم صلَّى على قتلى أُحدٍ صلاتَه على الميِّت، فالله أعلم.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً، في شوَّال سنةَ خَمْسٍ وتسعين وثلاث مئة:




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উহুদের শহীদদের গোসল দেওয়া হয়নি। তাদের রক্তসহ দাফন করা হয়েছিল এবং তাদের উপর জানাযার সালাত আদায় করা হয়নি। এই হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি। বুখারী একা যুহরী থেকে, তিনি আবদুর রহমান ইবনে কা'ব ইবনে মালিক থেকে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একটি হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের উপর জানাযা পড়েননি। কিন্তু এতে এই সমষ্টিগত শব্দগুলো নেই যা যুহরী থেকে উসামা ইবনে যায়িদ আল-লাইসী একাই বর্ণনা করেছেন। তারা (বুখারী ও মুসলিম) দু'জনই লায়স ইবনে সা'দ থেকে, তিনি ইয়াযিদ ইবনে আবি হাবিব থেকে, তিনি আবুল খায়ের থেকে, তিনি উক্ববাহ ইবনে আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সংকলনে একমত হয়েছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের নিহতদের উপর মৃতের জানাযার মতো সালাত আদায় করেছিলেন। আর আল্লাহই ভালো জানেন। হাকিম আবু আবদুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনে আবদুল্লাহ আল-হাফিজ ৩৯৫ হিজরী সালের শাওয়াল মাসে শ্রুতি লিখন আকারে আমাদের নিকট হাদীসটি বর্ণনা করেছেন:




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره كسابقه. ابن وهب: هو عبد الله. وأخرجه أبو داود (3135) عن أحمد بن صالح وسليمان بن داود المهري، عن ابن وهب، بهذا الإسناد.



[2] برقم (1343). وأخرجه أحمد 9/ (5233) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 8/ (4812) و 9/ (4990) و (5370)، وأبو داود (3213)، والنسائي (10860)، وابن حبان (3110) من طرق عن همام، به.وأخرجه ابن ماجه (1550)، والترمذي (1046) من طريقين ضعيفين عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه.وأخرج ابن ماجه (1553) عن هشام بن عمار، عن حماد بن عبد الرحمن الكلبي، عن إدريس بن صبيح الأودي، عن سعيد بن المسيب قال: حضرتُ ابن عمر في جنازة، فلما وضعها في اللحد قال: باسم الله، وفي سبيل الله، وعلى ملة رسول الله، فلما أخذ في تسوية اللَّبن على اللحد قال: اللهم أجِرْها من الشيطان ومن عذاب القبر، اللهم جافِ الأرض عن جنبيها، وصَعِّد روحها، ولقِّها منك رضوانًا، قلت: يا ابن عمر، أشيءٌ سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أم قلته برأيك؟ قال: إني إذًا لقادر على القول، بل شيء سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد ضعيف، حماد الكلبي ضعيف، وشيخه إدريس مجهول.وانظر ما بعده.



1368 [3] - البخاري (1344)، ومسلم (2296). وأخرجه أحمد 9/ (5233) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 8/ (4812) و 9/ (4990) و (5370)، وأبو داود (3213)، والنسائي (10860)، وابن حبان (3110) من طرق عن همام، به.وأخرجه ابن ماجه (1550)، والترمذي (1046) من طريقين ضعيفين عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه.وأخرج ابن ماجه (1553) عن هشام بن عمار، عن حماد بن عبد الرحمن الكلبي، عن إدريس بن صبيح الأودي، عن سعيد بن المسيب قال: حضرتُ ابن عمر في جنازة، فلما وضعها في اللحد قال: باسم الله، وفي سبيل الله، وعلى ملة رسول الله، فلما أخذ في تسوية اللَّبن على اللحد قال: اللهم أجِرْها من الشيطان ومن عذاب القبر، اللهم جافِ الأرض عن جنبيها، وصَعِّد روحها، ولقِّها منك رضوانًا، قلت: يا ابن عمر، أشيءٌ سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أم قلته برأيك؟ قال: إني إذًا لقادر على القول، بل شيء سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد ضعيف، حماد الكلبي ضعيف، وشيخه إدريس مجهول.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1369)


1369 - حدثني علي بن حَمْشَاذَ العدل، حدثنا هشام بن عليٍّ السَّدوسي، حدثنا عبد الله بن رجاء، حدثنا همَّام.وحدثني علي بن حَمْشاذ قال: وحدثنا موسى بن هارون، حدثنا زهير بن حرب، حدثنا وَكيع، حدثنا همَّام، عن قتادة، عن أبي الصَّدِّيق الناجيّ، عن ابن عمر قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا وَضَعتُم موتاكم في قُبورِهم فقولوا: باسم الله، وعلى سُنَّة رسول الله" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وهمَّام بن يحيى ثَبْتٌ مأمونٌ، إذا أسنَدَ مثلَ هذا الحديث لا يُعلَّل بأحدٍ إذا أوقَفَه، وقد أوقَفَه شعبةُ:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা তোমাদের মৃতদের তাদের কবরে রাখবে, তখন তোমরা বলো: আল্লাহর নামে এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতের উপর (ভিত্তি করে)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، وقد خالف همامًا شعبةُ فرواه موقوفًا كما في الرواية التالية، ورجح الدارقطني في "العلل" (2838) وقفه، وذلك على عادته في ترجيح الوقف أو الإرسال، لكن هنا لا يضر كونه روي موقوفًا، فإنَّ همام بن يحيى ثقة حافظ، كما أشار إلى ذلك المصنف بإثر هذا الحديث، ثم إنه قد اختلف فيه على شعبة نفسه، فرواه بعضهم عنه موقوفًا، ورواه بعضهم عنه مرفوعًا كما سيأتي.عبد الله بن رجاء: هو الغُداني، وأبو الصديق الناجي: اسمه بكر بن عمرو، وقيل: ابن قيس. وأخرجه أحمد 9/ (5233) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 8/ (4812) و 9/ (4990) و (5370)، وأبو داود (3213)، والنسائي (10860)، وابن حبان (3110) من طرق عن همام، به.وأخرجه ابن ماجه (1550)، والترمذي (1046) من طريقين ضعيفين عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر. وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه.وأخرج ابن ماجه (1553) عن هشام بن عمار، عن حماد بن عبد الرحمن الكلبي، عن إدريس بن صبيح الأودي، عن سعيد بن المسيب قال: حضرتُ ابن عمر في جنازة، فلما وضعها في اللحد قال: باسم الله، وفي سبيل الله، وعلى ملة رسول الله، فلما أخذ في تسوية اللَّبن على اللحد قال: اللهم أجِرْها من الشيطان ومن عذاب القبر، اللهم جافِ الأرض عن جنبيها، وصَعِّد روحها، ولقِّها منك رضوانًا، قلت: يا ابن عمر، أشيءٌ سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أم قلته برأيك؟ قال: إني إذًا لقادر على القول، بل شيء سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد ضعيف، حماد الكلبي ضعيف، وشيخه إدريس مجهول.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1370)


1370 - أخبرَناه عبد الرحمن بن الحَسَن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة.وأخبرني الحسين بن علي، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا بُنْدار، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن أبي الصَّدِّيق الناجي، عن ابن عمر: أنه كان إذا وَضَعَ الميِّتَ في قبرِه قال: باسم الله، وعلى سُنَّة رسول الله [1]. حديث البَيَاضي - وهو مشهورٌ في الصحابة - شاهدٌ لحديث همَّام عن قتادة مسندًا:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন মৃত ব্যক্তিকে তার কবরে রাখতেন, তখন বলতেন: "বিসমিল্লাহি, ওয়া আলা সুন্নাতি রাসূলিল্লাহ" (আল্লাহর নামে, এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতের উপর)। আল-বায়াদি-এর হাদীসটি – যা সাহাবীদের মাঝে মশহুর – হুম্মাম কর্তৃক ক্বাতাদাহ সূত্রে মারফূ’ (মুসনাদ) বর্ণিত হাদীসের সমর্থক।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، على خلاف في رفعه ووقفه، فقد رواه همام بن يحيى عن قتادة فرفعه، كما في الرواية السابقة، ورواه شعبة واختلف عليه، فرواه آدم بن أبي إياس ومحمد بن جعفر عنه كما هو هنا في هذه الرواية فوقفاه، وتابعهما على وقفه عبد الله بن المبارك عن شعبة عند النسائي (10861)، وخالفهم أبو داود الطيالسي، كما عند ابن حبان (319)، فرواه عن شعبة بإسناده فرفعه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1371)


1371 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا سعيد بن أبي مريم وابنُ بُكَير، قالا: حدثنا الليث بن سعد، حدثني ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن أبي حازم مولى الغِفَارِيِّين قال: حدَّثني البَيَاضيُّ، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "الميتُ إذا وُضِع في قَبرِه فليقُل الذين يَضَعُونَه حين يُوضَعُ في اللَّحْد: باسم الله، وبالله، وعلى مِلَّةِ رسول الله" [1].




আল-বায়াদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মৃত ব্যক্তিকে যখন তার কবরে রাখা হয়, তখন যারা তাকে লাহ্দে (পার্শ্বগর্তে) রাখে, তারা যেন বলে: “বিসমিল্লাহ, ওয়া বিল্লাহ, ওয়া আলা মিল্লাতি রাসূলিল্লাহ” (আল্লাহর নামে, আল্লাহর সাহায্যে এবং আল্লাহর রাসূলের ধর্মানুসারে)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو حازم مولى الغفاريين مختلف في صحبته، والظاهر أنه لا صحبة له، فقد أخرج له أبو داود حديثًا في "المراسيل"، وقد اختلف على محمد بن إبراهيم التيمي في اسمه، فقيل: هو مولى الغفاريين كما في هذه الرواية، وقيل: التمار، كما في "مسند أحمد" 31/ (19022) في حديث الجهر بالقرآن، وقيل: مولى بني بياضة، وقيل: مولى الأنصار، روى له البخاري في "خلق أفعال العباد" والنسائي، ووثقه أبو داود وابن عبد البر، وباقي رجاله ثقات.أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل: هو ابن يوسف السلمي، وابن بكير: هو يحيى بن عبد الله بن بكير، وابن الهاد: هو يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، والبياضي - صحابي الحديث - قيل: اسمه عبد الله بن جابر، وقيل: فروة بن عمرو.وأخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (635) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9425) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الآجري في "الشريعة" (1850) من طريق سليمان بن داود الشاذكوني، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 213 - 214، وفي "تعزية المسلم" له (90) من طريق محمد بن يحيى بن أبي عمر، كلاهما عن عبد العزيز الدراوردي، به. وسليمان بن داود هذا متروك.وخالفهم محمد بن الحسن بن زَبالة، فرواه عن عبد العزيز الدراوردي عن أُنيس بن يحيى قال: لقي رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا. أخرجه ابن النجار في "الدرة الثمينة في أخبار المدينة" ص 145، لكن هذه المخالفة لا عبرة بها لأنَّ محمد بن الحسن بن زبالة هذا متروك، وكذبه بعضهم.وأخرجه موصولًا البزار (842 - كشف الأستار) من طريق عبد الله بن جعفر بن نجيح، عن أبيه، عن أُنيس بن أبي يحيى، به. قال البزار: لا نعلمه عن أبي سعيد إلّا بهذا الإسناد، وأُنيس وأبوه صالحان. قلنا: وفي إسناده عبد الله بن جعفر ضعيف، وأبوه مجهول.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (304) عن عمر بن أبي عمر العبدي، عن سعيد بن أبي مريم، عن عبد العزيز الدراوردي، عن أُنيس، عن أبيه، عن أبي هريرة. فجعله من مسند أبي هريرة، وهو خطأ، الآفة فيه عمر بن أبي عمر العبدي، فهو متروك وكذبه بعضهم.وفي الباب عن ابن عمر عند الطبراني في "الكبير" (14022)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 200، وإسناده ضعيف جدًّا.وعن عبد الله بن سوّار معضَلًا جدًّا، أخرجه القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (528)، ولا يصح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1372)


1372 - أخبرنا أبو النَّضر الفقيه وأحمد بن محمد العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارِمي، حدثنا يحيى بن صالح الوُحَاظي، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثني أُنَيس بن أبي يحيى مولى الأسْلَمَيِّين، عن أبيه، عن أبي سعيد الخُدريِّ قال: مَرَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بجنازةٍ عند قبرٍ فقال: "قبْرُ مَن هذا؟ " فقالوا: فلانٌ الحَبَشِيُّ يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا إله إلّا الله، لا إله إلّا الله، سِيقَ من أرضِه وسمائِه إلى تُربتِه التي منها خُلِق" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وأُنيس بن أبي يحيى الأَسلَمي هو عمُّ إبراهيم بن أبي يحيى، وأُنَيس ثقة معتمَد، ولهذا الحديث شواهدُ، وأكثرها صحيحة، فمنها:




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবরের কাছে একটি জানাযার (লাশের) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এই কবরটি কার?" লোকেরা বলল: "হে আল্লাহর রাসূল, এটা অমুক হাবশীর (আবিসিনিয়ার অধিবাসী) কবর।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। তাকে তার জমিন ও আকাশ থেকে এমন মাটিতে হাঁকিয়ে আনা হয়েছে, যে মাটি থেকে সে সৃষ্ট হয়েছিল।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] غريب، وظاهر إسناده الحُسن من أجل أبي يحيى الأسلمي - واسمه: سمعان - والد أُنيس، وعبدِ العزيز بن محمد - وهو الدراوردي - إلا أن الدراوردي تفرَّد به، وقد أنكر عليه الإمام أحمد بعض أحاديثه، من جهة أنه قد يرفع حديثًا موقوفًا أو يصلُ رواية مرسلة. وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9425) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الآجري في "الشريعة" (1850) من طريق سليمان بن داود الشاذكوني، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 213 - 214، وفي "تعزية المسلم" له (90) من طريق محمد بن يحيى بن أبي عمر، كلاهما عن عبد العزيز الدراوردي، به. وسليمان بن داود هذا متروك.وخالفهم محمد بن الحسن بن زَبالة، فرواه عن عبد العزيز الدراوردي عن أُنيس بن يحيى قال: لقي رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا. أخرجه ابن النجار في "الدرة الثمينة في أخبار المدينة" ص 145، لكن هذه المخالفة لا عبرة بها لأنَّ محمد بن الحسن بن زبالة هذا متروك، وكذبه بعضهم.وأخرجه موصولًا البزار (842 - كشف الأستار) من طريق عبد الله بن جعفر بن نجيح، عن أبيه، عن أُنيس بن أبي يحيى، به. قال البزار: لا نعلمه عن أبي سعيد إلّا بهذا الإسناد، وأُنيس وأبوه صالحان. قلنا: وفي إسناده عبد الله بن جعفر ضعيف، وأبوه مجهول.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (304) عن عمر بن أبي عمر العبدي، عن سعيد بن أبي مريم، عن عبد العزيز الدراوردي، عن أُنيس، عن أبيه، عن أبي هريرة. فجعله من مسند أبي هريرة، وهو خطأ، الآفة فيه عمر بن أبي عمر العبدي، فهو متروك وكذبه بعضهم.وفي الباب عن ابن عمر عند الطبراني في "الكبير" (14022)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 200، وإسناده ضعيف جدًّا.وعن عبد الله بن سوّار معضَلًا جدًّا، أخرجه القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" (528)، ولا يصح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1373)


1373 - ما حدَّثَناه أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسين بن بشار الخَيّاط، حدثنا إسحاق بن يوسف الأزرق، حدثنا داود بن أبي هند، عن الحسن، عن جُنْدُب بن سفيان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أراد الله قبْضَ عبدٍ بأرضٍ، جَعَلَ له فيها - أو بها - حاجةً" [1]. ومنها:




জুনদুব ইবনে সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো ভূমিতে কোনো বান্দার রূহ কব্জ করার ইচ্ছা করেন, তখন সেই ভূমিতে তার জন্য কোনো প্রয়োজন (বা কাজ) সৃষ্টি করে দেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، غير أن فيه عنعنة الحسن - وهو ابن أبي الحسن البصري - وهو لم يصح له سماع من جندب كما قال أبو حاتم في "مراسيل" ابنه (138).جندب بن سفيان صحابيه: هو جندب بن عبد الله بن سفيان البجلي، نُسب إلى جده.وله شواهد صحيحة، انظر الأحاديث التالية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1374)


1374 - ما أخبرني علي بن العباس الإسكندراني العدل بمكة، حدثنا أبو جعفر أحمد بن عبد الواحد الحِمْصي، حدثنا كَثِير بن عُبيد المَذْحِجي، حدثنا محمد بن خالد الوَهْبي، حدثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن عبد الله بن مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا كانت مَنِيَّةُ أحدِكم بأرضٍ، أُتيحَتْ له الحاجة فيَقْصِدُ إليها، فيكونُ أقصى أثرٍ منه، فتُقبَضُ رُوحُه فيها، فتقولُ الأرض يوم القيامة: ربِّ هذا ما استَودَعْتَني" [1].ومنها:




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো মৃত্যু কোনো এক ভূমিতে (নির্ধারিত) হয়, তখন তার জন্য সেখানে কোনো প্রয়োজন সহজলভ্য করে দেওয়া হয় এবং সে সেই উদ্দেশ্যে যাত্রা করে। আর সেটাই হয় তার জীবনের শেষ পদক্ষেপ, ফলে সেখানেই তার রূহ কবজ করা হয়। অতঃপর কিয়ামতের দিন ভূমি বলবে: হে আমার রব! এ তো সেই ব্যক্তি যাকে আপনি আমার কাছে আমানত রেখেছিলেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهو مكرر (124).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1375)


1375 - ما حدَّثَناه أبو العباس قاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا محمد بن موسى الباشاني، حدثنا علي بن الحسن [1] بن شَقِيق، حدثنا أبو حمزة السُّكَّري، عن أبي إسحاق، عن مَطَر بن عُكامِس العَبْديِّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما جُعِل أجَلُ رجلٍ في أرضٍ، إلّا جُعِلتْ له فيها حاجةٌ" [2].ومنها:




মত্বার ইবনে উকামিস আল-আবদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো মানুষের মৃত্যু যদি কোনো ভূমিতে (স্থানে) নির্ধারিত হয়, তবে সেই ভূমিতেই তার জন্য কোনো প্রয়োজনও (পূরণ করার) ব্যবস্থা করা হয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحسين.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن موسى الباشاني - وهو محمد بن موسى بن حاتم - والحديث مكرر ما سلف برقم (127).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1376)


1376 - ما حدَّثَناه أبو علي الحافظ غيرَ مرةٍ، أخبرنا الحسين بن نَهَار العسكري، حدثنا زيد بن الحَرِيش، حدثنا عِمْران بن عُيَينة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشَّعبي، عن عُروة بن مُضَرِّس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أرادَ الله قَبْضَ عبدٍ بأرضٍ، جَعَلَ له إليها حاجةً" [1].




উরওয়াহ ইবনে মুদার্রিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ কোনো বান্দার কোনো নির্দিষ্ট স্থানে মৃত্যু ঘটাতে চান, তখন তিনি তার জন্য সেই স্থানে (যাওয়ার) কোনো প্রয়োজন সৃষ্টি করে দেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد ضعيف، الحسين بن نهار العسكري، كذا وقعت تسميته هنا، ولم نتبيَّنه، وسماه في "شعب الإيمان" (9424) من طريق المصنف: الحسين بن نبهان العسكري، وفي "إتحاف المهرة 11/ 163: الحسين بن هانئ، وكل هذه التسميات لم نجد لها ذكرًا فيما بين أيدينا من مصادر، إلّا ما وقع في "تهذيب الكمال": الحسين بن نبهان العسكري، ذكره فيمن روى عن محمد بن زياد الزيادي 25/ 216، وفيمن روى عن محمد بن سعيد بن غالب البغدادي 25/ 275. وزيد بن الحَرِيش، قال ابن القطان: مجهول الحال، كما في "لسان الميزان" 3/ 550، وعمران بن عيينة صاحب أوهام. وقد خالف فيه عمرانُ ثقاتِ أصحاب إسماعيل بن أبي خالد الذين رووه عنه عن قيس بن أبي خازم عن عبد الله بن مسعود، كما سلف قبله بحديثين (1374)، وانظر ما سلف برقم (122) وما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1377)


1377 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الحميد أبو جعفر الحارثي، حدثنا إسحاق بن منصور السَّلُولي، حدثنا محمد بن مُسلِم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن جابر: أنَّ رجلًا كان يَرفَع صوتَه بالذِّكر، فقال رجل: لو أنَّ هذا خَفَضَ من صوتِه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فإنَّه أوّاهٌ". قال: فمات، فرأى رجلٌ نارًا في قبره، فأتاه، فإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فيه وهو يقول: "هَلُمُّوا صاحِبَكم"، فإذا هو الرجلُ الذي كان يَرفَع صوته بالذِّكْر [1].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় এক ব্যক্তি উচ্চস্বরে যিকির (আল্লাহর স্মরণ) করত। তখন এক ব্যক্তি বলল: যদি এই লোকটি তার কণ্ঠস্বর কিছুটা নিচু করত! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই সে 'আওওয়াহ' (আল্লাহর প্রতি অতিশয় বিনয়ী ও প্রত্যাবর্তনকারী)।" (বর্ণনাকারী) বললেন: এরপর সে মারা গেল। এক ব্যক্তি তার কবরে আগুন দেখতে পেল। সে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে) এল, তখন দেখতে পেল যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেখানে (কবরে) আছেন এবং তিনি বলছেন: "তোমরা তোমাদের সাথীকে আমার কাছে নিয়ে আসো।" তখন দেখা গেল, সে-ই সেই ব্যক্তি যে উচ্চস্বরে যিকির করত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن مسلم الطائفي.وسيأتي من وجهين آخرين عن محمد بن مسلم الطائفي فيما بعده، وبرقم (3358).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1378)


1378 - أخبرَناه علي بن عيسى، حدثنا محمد بن عمرو الحَرَشي، حدثنا إبراهيم بن نَصْر، حدثنا أبو أحمد الزُّبَيري، حدثنا محمد بن مُسلِم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله قال: رأيتُ نارًا في المقابر، فأَتيتُهم فإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في القبر وهو يقول: "ناوِلُوني صاحِبَكم" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. وله شاهد بإسنادٍ مُعضَل:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি কবরস্থানে আগুন দেখতে পেলাম। তাই আমি তাদের কাছে গেলাম। তখন দেখলাম আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মধ্যে (উপস্থিত) আছেন আর তিনি বলছেন, "তোমরা তোমাদের সাথীকে আমার হাতে তুলে দাও।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كالذي قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1379)


1379 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني، حدثني أبي، حدثني أبي [1]، حدثنا وكيع، عن شعبة.وأخبرني الحسين بن علي، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا بُنْدار، حدثنا محمد، حدثنا شعبة، عن أبي يونس - وهو حاتم بن أبي صَغِيرة - قال: سمعتُ رجلًا كان بمكة، وكان رُوميًّا - وفي حديث شعبة: اسمه: وقَّاص - يحدِّث عن أبي ذرٍّ، قال: كان رجلٌ يطوف بالبيت وهو يقول في دُعائِه: أَوَّهُ أَوَّهُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّهُ لأَوّاه"، قال أبو ذر: فخرجتُ ذات ليلةٍ فإذا النبيُّ صلى الله عليه وسلم في المقابر يَدفِنُ ذلك الرجلَ ومعه المِصْباح [2].




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি কাবা ঘর তাওয়াফ করছিল আর সে তার দো'আয় বলছিল: 'আউওয়াহ, আউওয়াহ।' তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই সে একজন 'আউওয়াহ' (অতিশয় আল্লাহমুখী বিনয়ী)।" আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি এক রাতে বের হলাম, তখন দেখি যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কবরস্থানে সেই লোকটিকে দাফন করছেন এবং তাঁর সাথে একটি প্রদীপ ছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] قوله: "حدثني أبي" المرة الثانية سقط من (ب). ومحمد والد علي: هو محمد بن محمد بن عقبة بن الوليد أبو جعفر الشيباني، شيخ الكوفة، وهو لا يدرك وكيعًا، فقد ولد سنة 220 هـ كما في "تاريخ الإسلام" 7/ 149، وتوفي وكيع سنة 197 هـ.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الرجل الرومي الذي يحدِّث عن أبي ذر، ولا ندري ما وجه وصف المصنِّف له بالإعضال إلا إن أراد هذا الإبهام! محمد بن إسحاق: هو ابن خزيمة، وبندار: هو محمد بن بشار، وشيخه محمد: هو ابن جعفر غندر.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 346، وأبو يعلى كما في "المطالب العالية" (822)، والطبري في "تفسيره" 11/ 50 - 51، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 6/ 1895 من طرق عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرج الطبري 11/ 50 عن محمد بن جعفر، عند شعبة، عن أبي يونس القشيري، عن قاصٍّ كان بمكة: أنَّ رجلًا كان في الطواف، فجعل يقول: أوه، قال: فشكا أبو ذر إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "دعه، إنه أوَّاه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1380)


1380 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي.وأخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا إسحاق بن إبراهيم ومحمد بن رافع؛ قالوا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني أبو الزُّبير، أنه سَمِعَ جابر بن عبد الله يحدِّث: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم خَطَبَ يومًا، فذَكَر رجلًا من أصحابه قُبِضَ وكُفِّن في كَفَنٍ غيرِ طائلٍ وقُبِرَ [1] ليلًا، فَزَجَرَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يُقبَر الرجلُ بالليل حتى يُصلَّى عليه، إلا أن يُضطَرَّ إنسانٌ إلى ذلك، وقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "إذا كفَّنَ أحدُكم أخاه فليُحَسِّنْ كَفَنَه" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد من حديث وَهْب بن مُنبِّه عن جابر:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবা দিলেন। তখন তিনি তাঁর এক সাহাবীর কথা উল্লেখ করলেন, যিনি ইন্তেকাল করেছেন এবং তাকে নিম্নমানের কাফন পরানো হয়েছিল এবং রাতেই তাকে দাফন করা হয়েছিল। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে দাফন করতে বারণ করলেন যতক্ষণ না তার জানাজার সালাত আদায় করা হয়, তবে যদি কোনো ব্যক্তির জন্য এটি একান্তই বাধ্যগত হয়। এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমাদের কেউ তার ভাইকে কাফন পরায়, তখন সে যেন উত্তমভাবে তার কাফন পরায়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في (ز) و (ص) إلى: وقبض.



[2] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرس.وهو في "مسند أحمد" 22/ (14145)، وعنه أخرجه أبو داود (3148).وأخرجه مسلم (943)، والنسائي (2033) و (2152)، وابن حبان (3103) من طريق حجاج بن محمد المصيصي الأعور، عن ابن جريج، به.وأخرج قصة الأمر بتحسين الكفن مختصرة أحمد (14524) و (14601) و (14766) و (14993) و (15087) من طرق عن أبي الزبير، به.وأخرج أحمد (14146) عن محمد بن بكر، عن ابن جريج قال: قال سليمان بن موسى: سُئل جابر .. فذكر نحوه. وهذا إسناد منقطع، سليمان بن موسى لم يسمع من جابر.وأخرج ابن ماجه (1521) من طريق إبراهيم بن يزيد المكي، عن أبي الزبير، به: "لا تدفنوا موتاكم بالليل إلّا أن تضطروا"، وإبراهيم بن يزيد المكي متروك.وانظر ما بعده.قوله: "حتى يصلَّى عليه" ضبطها النووي في "شرح مسلم" 7/ 11 بفتح اللام بالبناء للمفعول، والمراد: حتى يصلي عليه جماعة المسلمين، وضبطها ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 705 بكسر اللام بالبناء للفاعل، والمراد: حتى يصلي عليه النبي صلى الله عليه وسلم.