আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1381 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصنعاني بمكة، حدثنا علي بن المبارك، حدثنا إسماعيل بن عبد الكريم الصنعاني أبو هشام، حدثنا إبراهيم بن عَقِيل بن مَعْقِل بن مُنبِّه، عن أبيه عَقِيل، عن وَهْب بن مُنبِّه قال: هذا ما سألتُ عنه جابرَ بنَ عبد الله الأنصاري، فأخبَرَني: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم خَطَبَ يومًا فَذَكَرَ رجلًا من أصحابه قُبِضَ فكُفِّن في كَفَنٍ غيرِ طائل، وقُبِرَ ليلًا، فَزَجَرَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يُقبَرَ الرجلُ بالليل ولا يُصلَّى عليه، إلَّا أن يُضطَرَّ إنسانٌ إلى ذلك، وقال: "إذا وَلِيَ أحدُكم أخاه فليُحَسِّنْ كَفَنَه" [1].
জাবের ইবনে আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিচ্ছিলেন। তখন তিনি তাঁর সাহাবীদের মধ্য হতে এমন একজনের কথা উল্লেখ করলেন, যার মৃত্যু হয়েছিল এবং তাকে অপ্রতুল (নিকৃষ্ট) কাফন দেওয়া হয়েছিল এবং তাকে রাতেই দাফন করা হয়েছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা কারো উপর জানাযার সালাত আদায় না করে এবং দাফন না করার বিষয়ে কঠোরভাবে নিষেধ করলেন, তবে যদি কেউ এমন করতে বাধ্য হয় (তাহলে ভিন্ন কথা)। আর তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন তার ভাইয়ের (দাফনের) দায়িত্ব নেয়, তখন সে যেন তার কাফনকে উত্তম করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، على بن المبارك - وهو الصنعاني - روى عنه غير واحد، له ترجمة في "تاريخ الإسلام "للذهبي" 6/ 784، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، وقد توبع. وإسماعيل بن عبد الكريم ثقة، وثقه يحيى بن معين وابن حبان، وقال النسائي: ليس به بأس.وأخرجه أبو داود (3150)، وابن حبان (3034) من طريق الحسن بن الصبّاح، عن إسماعيل بن عبد الكريم، بهذا الإسناد. إلّا أنَّ رواية أبي داود مختصرة ولفظها: "إذا توفي أحدكم فوجد شيئًا فليكفن في ثوب حبرة". وأخرجه الترمذي (1049) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، يكرهون أن يُرفع القبر فوق الأرض. ثم قال: قال الشافعي: أكره أن يُرفع القبر إلّا بقدر ما يُعرف أنه قبر لكيلا يوطأ ولا يُجلَس عليه.
1382 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا معاذ بن نَجْدةَ القُرَشي، حدثنا خلَّاد بن يحيى، حدثنا سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن - وهو ابن مَهدي - عن سفيان، عن حَبِيب بن أبي ثابت [عن أبي وائل] [1]: أنَّ عليًّا قال لأبي هَيّاج: أَبعثُكَ على ما بَعثَني عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: أن لا تَدَعَ تمثالًا إلَّا طَمَستَه، ولا قبرًا مُشرِفًا إلّا سَوَّيتَه [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه [3]، وأظنُّه لخلافٍ فيه عن الثَّوري، فإنه قال مَرّةً: عن أبي وائل عن أبي الهَيَّاج، وقد صحَّ سماعُ أبي وائلٍ من عليٍّ.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবুল হাইয়াজকে বললেন: আমি তোমাকে সেই কাজের জন্য পাঠাচ্ছি, যার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে পাঠিয়েছিলেন; তা হলো: তুমি যেন কোনো প্রতিমা বা ভাস্কর্য না রেখে সেটিকে নিশ্চিহ্ন করে দাও এবং কোনো উঁচু কবর না রেখে সেটিকে ভূমি বরাবর করে দাও।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين معقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من "مسند أحمد" و"إتحاف المهرة" 11/ 357، واشار الدارقطني في "العلل" (494) إلى أن عبد الرحمن بن مهدي ذكر في روايته أبا وائل، ناهيك عن أنَّ قول المصنِّف نفسه بإثر هذا الحديث يدل على وجود أبي وائل في السند. وأخرجه الترمذي (1049) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، يكرهون أن يُرفع القبر فوق الأرض. ثم قال: قال الشافعي: أكره أن يُرفع القبر إلّا بقدر ما يُعرف أنه قبر لكيلا يوطأ ولا يُجلَس عليه.
[2] إسناده صحيح، وقد اختلف فيه على سفيان - وهو الثوري - فرواه بعضهم كما هنا عنه عن حبيب عن أبي وائل - وهو شقيق بن سلمة - أنَّ عليًّا قال لأبي هياج، وقال بعضهم: عن حبيب عن أبي وائل عن أبي الهياج قال: قال لي علي، كما في الرواية التالية، لكن أشار المصنف إلى صحة سماع أبي وائل من علي بن أبي طالب. وانظر "العلل الكبير" للترمذي (258)، و"علل الدارقطني" (494). أبو هيّاج: اسمه حَيان بن الحُصين.وهو في "مسند أحمد" 2/ (1064). وأخرجه الترمذي (1049) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، يكرهون أن يُرفع القبر فوق الأرض. ثم قال: قال الشافعي: أكره أن يُرفع القبر إلّا بقدر ما يُعرف أنه قبر لكيلا يوطأ ولا يُجلَس عليه.
1382 [3] - بل أخرجه مسلم كما سيأتي في الحديث التالي.
1383 - أخبرنا أبو حفص عمر بن أحمد الجُمَحي بمكة، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا محمد بن سعيد بن الأصبهاني.وأخبرني عبد الله بن محمد بن موسى، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة؛ قالا: حدثنا وكيع، حدثنا سفيان، عن حَبِيب بن أبي ثابت، عن أبي وائل، عن أبي الهَيّاج قال: قال لي عليّ: ألا أَبعثُكَ على ما بَعَثَني عليه النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث بنحوه [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আবূ হাইয়াজকে) বললেন: আমি কি তোমাকে সেই কাজের জন্য পাঠাবো না, যার জন্য নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে পাঠিয়েছিলেন? অতঃপর তিনি অনুরূপ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح كالذي قبله.وأخرجه مسلم (969) عن ابن أبي شيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (741) و (1064)، ومسلم (969) من طريق وكيع، به.وأخرجه مسلم (969)، والنسائي (2169) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وأبو داود (3218) عن محمد بن كثير، كلاهما عن سفيان الثوري، به. زاد يحيى القطان: "ولا صورة إلّا طمستها".
1384 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر الخَوْلاني، قال: قُرئ على عبد الله بن وَهْب: أخبرك محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك المدني، عن عمرو بن هانئ، عن القاسم بن محمد قال: دخلتُ على عائشةَ فقلت: يا أُمّاه، اكشِفي لي عن قبر النبيِّ صلى الله عليه وسلم وصاحبَيه، فكشفَتْ لي عن ثلاثةِ قبور لا مُشرِفةٍ ولا لاطِئةٍ، مبطوحةٍ ببَطحاءِ العَرْصةِ الحمراء، فرأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم مقدَّمًا، وأبا بكرٍ رأسُه بين كَتِفَي النبيِّ صلى الله عليه وسلم، وعمرَ رأسُه عند رِجْلَي النبيِّ صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ (রহ.) বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে বললাম, হে আম্মাজান! আমার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর দুই সঙ্গীর কবর উন্মোচন করে দিন। তিনি তখন আমার জন্য তিনটি কবর উন্মোচন করে দিলেন, যা খুব উঁচুও ছিল না আবার মাটির সাথে মিশে যাওয়াও ছিল না। কবরগুলো লাল পাথরের নুড়ি দ্বারা ঢাকা ছিল। এরপর আমি দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্মুখে শায়িত, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুই কাঁধের মাঝখানে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুই পায়ের কাছে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، عمرو بن هانئ - وهو عمرو بن عثمان بن هانئ، نُسب هنا إلى جده - روى عنه ثلاثة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 4/ 171: كأنه صدوق، وقد صحَّح حديثه هذا النووي في "المجموع" 5/ 296، وابن الملقن في "البدر المنير" 5/ 319. القاسم بن محمد: هو ابن أبي بكر الصديق.وأخرجه أبو داود (3220) عن أحمد بن صالح، عن ابن أبي فديك، بهذا الإسناد. مختصرًا إلى قوله: ببطحاء العرصة الحمراء.وأخرجه تامًّا البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 3، وفي "الدلائل" 7/ 263 عن أبي عبد الله الحاكم، به.وأخرجه تامًّا أيضًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 192، وأبو يعلى (4571)، والطبري في "تاريخه" 3/ 422 - 423، والآجري في "الشريعة" (1867) و (1868) من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، به.وانظر ما سيأتي برقم (4570).قوله: "لا مشرفة" أي: غير مرتفعة غاية الارتفاع."ولا لاطئة" بالهمز والياء، أي: غير مستوية على وجه الأرض."مبطوحة" أي: مُلقَى فيها البطحاء، وهي الحصى الصِّغار."ببطحاء" البطحاء: هي الحصى الصغارو"العرصة": هي كل موضع واسع لا بناء فيه، جمعها: عَرَصات.وبطحاء العرصة: أي: رمل العرصة. وأخرجه تامًّا ومقطعًا مسلم (970) (94)، وأبو داود (3226)، والنسائي (2165)، وابن حبان (3163) من طرق عن حفص بن غياث، بهذا الإسناد. وقرن في روايتي أبي داود والنسائي بأبي الزبير: سليمانَ بن موسى، لكن رواية سليمان بن موسى عن جابر منقطعة، فهو لم يسمع منه. ومن طريق سليمان بن موسى أخرجه ابن ماجه (1563) عن عبد الله بن سعيد، عن حفص بن غياث، عن ابن جريج، عنه، عن جابر: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكتب على القبر شيء. لم يذكر فيه أبا الزبير مقرونًا بسليمان.وأخرجه أحمد 22/ (14148) و 23/ (14647)، ومسلم (970) (94)، وأبو داود (3225)، والترمذي (1052)، وابن حبان (3165) من طرق عن ابن جريج، عن أبي الزبير، به. قال الترمذي: حديث حسن صحيح … وقد رخص بعض أهل العلم منهم الحسن البصري في تطيين القبور، وقال الشافعي: لا بأس أن يطين القبر. قلنا: وبعضهم لم يذكر فيه الكتابة، منهم مسلم كما سيشير المصنف.وأخرج أحمد 22/ (14565)، ومسلم (970) (95)، وابن ماجه (1562)، والنسائي (2167)، وابن حبان (3162) من طريق أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن أبي الزبير، عن جابر قال: نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن تقصيص القبور. وقال بعضهم: تجصيص القبور، وكلاهما بمعنى.وأخرج أحمد 22/ (15289) من طريق نصر بن راشد، عمن حدثه عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تجصص القبور، أو يبنى عليها.ولكل فقرة من الحديث شواهد، ذكرناها في تعليقنا على "المسند" (14148).وانظر ما بعده.
1385 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا محمد بن عبد الله بن سليمان الحضرمي، حدثنا سَلْم بن جُنادة بن سَلْم القُرَشي، حدثنا حفص بن غِيَاث النَّخَعي، حدثنا ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يُبنَى على القبر، أو يُجَصَّص، أو يُقعَد عليه، ونهى أن يُكتَب عليه [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، وقد خرَّج بإسناده غيرَ الكتابة، فإنها لفظة صحيحة غريبة.وكذلك رواه أبو معاوية عن ابن جُرَيج:
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যেন কবরের উপর নির্মাণ করা না হয়, অথবা চুনকাম করা না হয়, অথবা তার উপর বসা না হয়, এবং তিনি নিষেধ করেছেন যেন এর উপর কিছু লেখা না হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - وأبو الزبير - وهو محمد بن مسلم بن تدرس - صرّحا بالتحديث عند أحمد ومسلم وغيرهما فانتفت شبهة تدليسهما، وأبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، شيخ المصنف، وإن كان أقل رتبةً من رتبة الصحيح، متابع. وأخرجه تامًّا ومقطعًا مسلم (970) (94)، وأبو داود (3226)، والنسائي (2165)، وابن حبان (3163) من طرق عن حفص بن غياث، بهذا الإسناد. وقرن في روايتي أبي داود والنسائي بأبي الزبير: سليمانَ بن موسى، لكن رواية سليمان بن موسى عن جابر منقطعة، فهو لم يسمع منه. ومن طريق سليمان بن موسى أخرجه ابن ماجه (1563) عن عبد الله بن سعيد، عن حفص بن غياث، عن ابن جريج، عنه، عن جابر: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكتب على القبر شيء. لم يذكر فيه أبا الزبير مقرونًا بسليمان.وأخرجه أحمد 22/ (14148) و 23/ (14647)، ومسلم (970) (94)، وأبو داود (3225)، والترمذي (1052)، وابن حبان (3165) من طرق عن ابن جريج، عن أبي الزبير، به. قال الترمذي: حديث حسن صحيح … وقد رخص بعض أهل العلم منهم الحسن البصري في تطيين القبور، وقال الشافعي: لا بأس أن يطين القبر. قلنا: وبعضهم لم يذكر فيه الكتابة، منهم مسلم كما سيشير المصنف.وأخرج أحمد 22/ (14565)، ومسلم (970) (95)، وابن ماجه (1562)، والنسائي (2167)، وابن حبان (3162) من طريق أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن أبي الزبير، عن جابر قال: نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن تقصيص القبور. وقال بعضهم: تجصيص القبور، وكلاهما بمعنى.وأخرج أحمد 22/ (15289) من طريق نصر بن راشد، عمن حدثه عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تجصص القبور، أو يبنى عليها.ولكل فقرة من الحديث شواهد، ذكرناها في تعليقنا على "المسند" (14148).وانظر ما بعده.
1386 - حدَّثَناه أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا محمد بن عبد الرحمن السَّامي، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا أبو معاوية، عن ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبير، عن جابرٍ قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن تَجصِيص القبور، والكتابِ فيها، والبناءِ عليها، والجلوسِ عليها [1]. هذه الأسانيد صحيحةٌ وليس العملُ عليها، فإنَّ أئمّة المسلمين من الشرق إلى الغرب مكتوبٌ على قبورهم، وهو عملٌ أَخذ به الخَلَفُ عن السَّلف [2].
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবর চুনকাম করতে, তার উপর লিখতে, তার উপর দালান নির্মাণ করতে এবং তার উপর বসতে নিষেধ করেছেন। [১]। এই সনদগুলো সহীহ, কিন্তু এর উপর আমল করা হয় না। কারণ পূর্ব থেকে পশ্চিম পর্যন্ত মুসলিম ইমামদের কবরের উপর লেখা হয়েছে, আর এই কাজ পূর্ববর্তীদের কাছ থেকে পরবর্তীগণ গ্রহণ করেছেন [২]।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح كسابقه. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير. وأخرجه ابن حبان (3164) من طريق إسحاق بن إبراهيم، عن أبي معاوية، بهذا الإسناد.
[2] تعقبه الذهبي في "التلخيص" بقوله: ما قلتَ طائلًا، ولا نعلم صحابيًا فعل ذلك، وإنما هو شيء أحدثه بعض التابعين فمن بعدهم، ولم يبلغهم النهي. ذكرنا قبل قليل، أما الصحابي: فهو الصنابح بن الأعسر، الذي يروي عنه قيس بن أبي حازم، قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 3/ 447 في ترجمة الصنابح بن الأعسر في التفريق بينهما: فحيث جاءت الرواية عن قيس بن أبي حازم عنه فهو ابن الأعسر وهو الصحابي، وحديثه موصول، وحيث جاءت الرواية عن غير قيس عنه فهو الصنابحي وهو التابعي، وحديثه مرسل. انتهى، وقد بسطنا الكلام في تحقيق هذه المسألة في تعليقنا على "المسند".
1387 - أخبرنا عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا بن أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا وكيع، عن الصَّلْت بن بَهْرام، عن الحارث بن وَهْب، عن الصُّنَابحيِّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تزال أُمتي - أو هذه الأمة - في مُسْكةٍ من دِينِها ما لم يَكِلُوا الجنائزَ إلى أهلها" [1].هذا حديث صحيح الإسناد إن كان الصُّنابِحي هذا عبدَ الله، فإن كان عبدَ الرحمن بن عُسَيلة الصُّنابِحي [2] فإنه يُختَلف في سماعه من النبيِّ صلى الله عليه وسلم، ولم يُخرجاه [3].
সুনাবিহী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মত—অথবা এই উম্মত—ততদিন পর্যন্ত তাদের দীনের ওপর দৃঢ়তা বজায় রাখবে (বা সংরক্ষিত থাকবে), যতদিন না তারা জানাযার (দায়িত্ব) তার অযোগ্যদের হাতে সোপর্দ করবে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لجهالة الحارث بن وهب، فقد تفرد بالرواية عنه الصلت بن بهرام، ولم يؤثر توثيقه عن أحد. والصُّنابحي - وهو أبو عبد الله عبد الرحمن بن عُسَيلة - ليس له صحبة على الراجح، فقد قدم المدينة بعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم بخمسة أيام، كما بسطنا القول في ترجمته أولَ مسنده في تعليقنا على "مسند الإمام أحمد" 31/ 409 - 411، فلينظر لزامًا.وأخرجه بأطول مما هنا أحمد 31/ (19067) عن عبد الله بن نمير، عن الصلت بن بهرام - وتحرف في نسخ المسند إلى: الصلت بن العوام - بهذا الإسناد، عن الصنابحي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لن تزال أمتي في مُسْكة ما لم يعملوا بثلاث: ما لم يؤخروا المغرب بانتظار الإظلام مضاهاة اليهود، وما لم يؤخروا الفجر إمحاق النجوم مضاهاة النصرانية، وما لم يكلوا الجنائز إلى أهلها".قوله: "مُسْكة" بضم فسكون، أي: قوة وثبات على الدين."ما لم يكلوا" بالتخفيف، أي: ما لم يتركوا إعانة أهل الجنازة. قاله السندي في حاشيته على "المسند". ذكرنا قبل قليل، أما الصحابي: فهو الصنابح بن الأعسر، الذي يروي عنه قيس بن أبي حازم، قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 3/ 447 في ترجمة الصنابح بن الأعسر في التفريق بينهما: فحيث جاءت الرواية عن قيس بن أبي حازم عنه فهو ابن الأعسر وهو الصحابي، وحديثه موصول، وحيث جاءت الرواية عن غير قيس عنه فهو الصنابحي وهو التابعي، وحديثه مرسل. انتهى، وقد بسطنا الكلام في تحقيق هذه المسألة في تعليقنا على "المسند".
[2] تحرف في النسخ الخطية إلى: الصحابي. ذكرنا قبل قليل، أما الصحابي: فهو الصنابح بن الأعسر، الذي يروي عنه قيس بن أبي حازم، قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 3/ 447 في ترجمة الصنابح بن الأعسر في التفريق بينهما: فحيث جاءت الرواية عن قيس بن أبي حازم عنه فهو ابن الأعسر وهو الصحابي، وحديثه موصول، وحيث جاءت الرواية عن غير قيس عنه فهو الصنابحي وهو التابعي، وحديثه مرسل. انتهى، وقد بسطنا الكلام في تحقيق هذه المسألة في تعليقنا على "المسند".
1387 [3] - هكذا جعل المصنِّف عبد الله الصنابحي رجلًا آخر صحابيًا، والصواب أنهما واحد، وأن كنيته أبو عبد الله، واسمه: عبد الرحمن بن عسيلة الصنابحي، وهو تابعي، وروايته مرسلة كما ذكرنا قبل قليل، أما الصحابي: فهو الصنابح بن الأعسر، الذي يروي عنه قيس بن أبي حازم، قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 3/ 447 في ترجمة الصنابح بن الأعسر في التفريق بينهما: فحيث جاءت الرواية عن قيس بن أبي حازم عنه فهو ابن الأعسر وهو الصحابي، وحديثه موصول، وحيث جاءت الرواية عن غير قيس عنه فهو الصنابحي وهو التابعي، وحديثه مرسل. انتهى، وقد بسطنا الكلام في تحقيق هذه المسألة في تعليقنا على "المسند".
1388 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا هشام بن يوسف الصَّنْعاني، حدثنا عبد الله بن بَحِير، عن هانئ مولى عثمان قال: سمعتُ عثمان بنَ عفان يقول: مرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بجنازةٍ عند قبرٍ وصاحبُه يُدفَن، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استغفِروا لأخيكم وسَلُو الله له التثبيتَ، فإنه الآنَ يُسأَل" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবরের পাশে একটি জানাযার (মৃতদেহের) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন তার সাথীকে দাফন করা হচ্ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করো এবং তার জন্য দৃঢ়তা (স্থিরতা) কামনা করো। কারণ, এই মুহূর্তে তাকে জিজ্ঞাসাবাদ করা হচ্ছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل هانئ مولى عثمان وعبد الله بن بحير، وقول الذهبي في "التلخيص": ابن بحير ليس بالعمدة ومنهم من يقويه، وهانئ روى عنه جماعة ولا ذكر له في الكتب الستة؛ متعقَّب بكون ابن بحير هذا روى عنه جماعة، وأثنى عليه هشام بن يوسف فقال: كان يتقن ما سمع، ونص على توثيقه ابن حبان في "المجروحين" 2/ 25، وذكره أيضًا في "الثقات"، وهو غير أبي وائل القاص الصنعاني على الصحيح، وإن كان المزي جعلهما في "تهذيبه" واحدًا، وأبو وائل هذا لا يعرف اسمه، وقد فرق بينهما البخاري وابن أبي حاتم، وهذا لم يرو سوى حديث مرفوع في الغضب من الشيطان، وروى أيضًا موقوفات، وأما قوله في هانئ فذهول منه، فقد أخرج له أصحاب "السنن" غير النسائي.وأخرجه أبو داود (3221) عن إبراهيم بن موسى الرازي، عن هشام بن يوسف، بهذا الإسناد.وقال أبو داود بإثره: بَحيرٌ: ابن رَيْسان.
1389 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا هشام بن يوسف الصَّنعاني، حدثنا عبد الله بن بَحِير قال: سمعتُ هانئًا مولى عثمان بن عفان يقول: كان عثمان بن عفان إذا وَقَفَ على قبرٍ بَكَى حتى يَبُلَّ لحيتَه، فيقال له: قد تَذكُرُ الجنةَ والنارَ فلا تبكي، وتبكي من هذا؟ فيقول: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ القبرَ أولُ منازل الآخرة، فإن نَجَا منه فما بعدَه أيسَرُ منه، وإن لم يَنْجُ منه فما بعدَه أشدُّ منه"، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما رأيتُ منظرًا إلّا والقبرُ أفظَعُ منه" [1].
উসমান ইবন আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন কোনো কবরের পাশে দাঁড়াতেন, তখন এত কাঁদতেন যে তাঁর দাড়ি ভিজে যেত। তখন তাঁকে বলা হতো: আপনি জান্নাত ও জাহান্নামের কথা স্মরণ করেন, কিন্তু কাঁদেন না। অথচ এর (কবরের) কারণে কাঁদেন? তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় কবর হলো আখিরাতের প্রথম মনযিল (অবস্থানস্থল)। যদি কেউ তা থেকে নাজাত (মুক্তি) পায়, তবে এরপরের ধাপগুলো তার জন্য সহজ হবে। আর যদি সে তা থেকে নাজাত না পায়, তবে এরপরের ধাপগুলো তার জন্য আরও কঠিন হবে।" আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আরও বলেছেন: "আমি এমন কোনো দৃশ্য দেখিনি, যা কবরের দৃশ্যের চেয়ে অধিক ভয়াবহ নয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كسابقه.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1318) و (1326)، والبغوي في "شرح السنة" (1523) من طريقين عن إبراهيم بن موسى، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (8141) من طريق يحيى بن معين عن هشام بن يوسف. فذكره. وفي هذا الإسناد علتان إضافيتان، وهما: عدم ذكر والد إسماعيل بن أبي أويس، فلا ندري هل سقط من المطبوع أم أنَّ الرواية هكذا؟ والعلة الأخرى: فيه رواية عمر بن عبد الله عن جده يعلى بن مرة، ولم يسمع منه فيما قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه (988). وما نظن محقق "الآحاد والمثاني" حفظه الله إلّا وقد وهم عندما أقحم عبارة (عن أبيه) بين عمر بن عبد الله وبين يعلى، مع أنها ليست في أصل الكتاب، والله أعلم.
1390 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا العباس بن الفَضْل الأسفاطي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني أبي، حدثنا المفضَّل بن محمد الضَّبِّي، عن عمر بن يَعلَى بن مُرَّة، عن أبيه، قال: سافرتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم غيرَ مرَّةٍ، فما رأيتُه مَرَّ بجيفةِ إنسانٍ إِلَّا أَمَرَ بدَفنِه، لا يَسألُ أمسلمٌ هو أم كافرٌ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইয়া'লা ইবনু মুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একাধিকবার সফর করেছি, কিন্তু আমি তাঁকে এমন দেখিনি যে তিনি কোনো মানুষের লাশের পাশ দিয়ে অতিক্রম করেছেন, আর তিনি তা দাফন করার নির্দেশ দেননি। তিনি জিজ্ঞাসা করতেন না যে, সে মুসলিম নাকি কাফির।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بمَرَّة، عمر بن يعلى بن مرة - وهو عمر بن عبد الله بن يعلى بن مرة - مجمع على ضعفه كما قال الذهبي في "التلخيص"، وكذلك أبوه ضعفه غير واحد كما في "ميزان الاعتدال"، وقال البخاري: فيه نظر، والمفضل بن محمد الضبي - وهو الكوفي، كما صرَّح به في "سنن الدارقطني" - ذكره الذهبي في "الميزان" ونقل قول الخطيب فيه: كان أخباريًا علامة موثقًا، وقول أبي حاتم الرازي: متروك القراءة والحديث، وقول أبي حاتم السجستاني: هو ثقة في الأشعار غير ثقة في الحروف. وإسماعيل بن أبي أويس وأبوه فيهما مقال، ثم إنَّ إسناد الحاكم هنا منقطع، فعبد الله بن يعلى بن مرة والد عمر، تابعيٌّ لم يدرك النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما يرويه عن أبيه يعلى بن مرة، فقد جاء موصولًا من وجه آخر عن إسماعيل بن أبي أويس كما سيأتي في التخريج، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 3/ 386 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (4203)، ومن طريقه البيهقي 3/ 386 من طريق عبد الله بن شبيب، عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن المفضل، عن عمر بن عبد الله بن يعلى، عن أبيه قال: سمعت يعلى بن مرة … فذكره موصولًا.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1568) عن يعقوب بن حميد، عن إسماعيل بن أبي أويس، عن المفضل، عن عمر بن عبد الله بن يعلى بن مرة قال: سمعت يعلى بن مرة … فذكره. وفي هذا الإسناد علتان إضافيتان، وهما: عدم ذكر والد إسماعيل بن أبي أويس، فلا ندري هل سقط من المطبوع أم أنَّ الرواية هكذا؟ والعلة الأخرى: فيه رواية عمر بن عبد الله عن جده يعلى بن مرة، ولم يسمع منه فيما قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه (988). وما نظن محقق "الآحاد والمثاني" حفظه الله إلّا وقد وهم عندما أقحم عبارة (عن أبيه) بين عمر بن عبد الله وبين يعلى، مع أنها ليست في أصل الكتاب، والله أعلم.
1391 - أخبرنا أبو أحمد حمزة بن العباس بن الفَضْل بن الحارث العَقَبي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا أبو داود سليمان بن داود الطيالسي، حدثنا عمران بن داوَرَ [1] القَطَّان، عن قتادة، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لكلِّ إنسانٍ ثلاثةُ أخِلّاء: أما خليلٌ فيقول: ما أنفقتَ فلَكَ، وما أمسكْتَ فليس لك، وذاك مالُه، وأما خليلٌ فيقول: أنا معكَ فإذا أتيتَ باب المَلِكِ تركتُكَ ورجعتُ، فذاك أهلُه وحَشَمُه، وأما خليلٌ فيقول: أنا معكَ حيثُ دخلتَ وحيث خرجتَ، فذاك عملُه، فيقول: إن كنتَ لَأَهونَ الثلاثةِ عليَّ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه هكذا بتمامه، لانحرافهما عن عمران القطان، وليس بالمجروح الذي يُترَك حديثُه، وقد اتفقا على حديث سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن أنس: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "إذا ماتَ الميتُ تَبِعَه ثلاثة" [3].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক মানুষের তিনজন অন্তরঙ্গ বন্ধু (খলীল) রয়েছে। প্রথম বন্ধুটি বলে: তুমি যা খরচ করেছ, তা তোমার জন্য; আর যা তুমি জমা রেখেছ, তা তোমার নয়। আর তা হলো তার সম্পদ (ধন-সম্পত্তি)। দ্বিতীয় বন্ধুটি বলে: আমি তোমার সাথে আছি, কিন্তু যখন তুমি বাদশাহের (মৃত্যুর) দরজায় পৌঁছবে, তখন আমি তোমাকে ছেড়ে ফিরে আসব। আর তারা হলো তার পরিবার-পরিজন ও সেবকরা। আর তৃতীয় বন্ধুটি বলে: তুমি যেখানেই প্রবেশ করবে এবং যেখান থেকেই বের হবে, আমি তোমার সাথেই থাকব। আর তা হলো তার আমল (কর্ম)। (তখন মানুষ তার আমলকে) বলবে: তুমিই তো আমার কাছে তিনজনের মধ্যে সবচেয়ে কম গুরুত্বপূর্ণ ছিলে!"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: داود.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عمران بن داور القطان.وأخرجه ابن حبان (3108) من طريق زيد بن أخزم، عن أبي داود الطيالسي، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (252).
1391 [3] - أخرجه البخاري (6514)، ومسلم (2960).
1392 - أخبرني أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الحافظ بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا أبو سَلَمة التَّبوذَكي موسى بنُ إسماعيل، حدثنا حمّاد ابن سَلَمة، عن سِمَاك بن حَرْب، عن النُّعمان بن بَشِير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَثَلُ الرَّجُل ومَثَلُ الموت كمَثَل رجلٍ له ثلاثةُ خِلّان، فقال أحدُهم: هذا مالي فخُذْ منه ما شئتَ، وقال الآخر: أنا معَكَ حياتَك فإذا مِتَّ تركتُكَ، وقال الآخر: أنا معَكَ أدخُلُ وأخرُجُ معك إن مِتَّ وإن حَيِيتَ، فأما الذي قال: خُذْ منه ما شئتَ ودَعْ ما شئتَ، فإنه مالُه، وأما الآخَر عَشِيرتُه، وأما الآخَر فهو عملُه" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ ও মৃত্যুর উপমা হল এমন একজন লোকের মতো, যার তিনজন ঘনিষ্ঠ বন্ধু ছিল। তাদের একজন বলল: এটি আমার সম্পদ, তুমি তা থেকে যা ইচ্ছা নাও। আর অন্যজন বলল: আমি তোমার জীবনকাল পর্যন্ত তোমার সাথে আছি, কিন্তু যখন তুমি মারা যাবে, তখন আমি তোমাকে ছেড়ে যাব। আর তৃতীয়জন বলল: আমি তোমার সাথে আছি, তুমি জীবিত থাকো বা মারা যাও, আমি তোমার সাথে প্রবেশ করব এবং তোমার সাথে বের হব। অতঃপর যে বন্ধু বলল: তুমি যা ইচ্ছা নাও এবং যা ইচ্ছা ছেড়ে দাও, তা হলো তার সম্পদ (মাল)। আর অপরজন হলো তার পরিবার-পরিজন (বা আত্মীয়-স্বজন)। আর শেষজন হলো তার আমল (কর্ম)।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل سماك بن حرب. إبراهيم بن الحسين: هو ابن ديزيل، وهو ثقة حافظ، لكن خالفه أبو داود السجستاني، فرواه في "الزهد" (397) عن أبي سلمة التبوذكي، بهذا الإسناد، فوقفه.وانظر ما سلف برقم (253).
1393 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثنا جعفر بن خالد بن سارةَ المخزومي، أخبرني أبي - وكان صديقًا لعبد الله بن جعفر - أنه سَمِعَ عبد الله بن جعفر قال: لما نُعيَ جعفرٌ، قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "اصنَعوا لآلِ جعفرٍ طعامًا، فقد أتاهم أمرٌ يَشغَلُهم" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وجعفر بن خالد بن سارةَ من أكابر مشايخ قريش، وهو كما قال شعبة: اكتُبوا عن الأشراف فإنهم لا يَكذِبون، وقد رَوَى غيرَ هذا الحديث مفسَّرًا:
আবদুল্লাহ ইবনে জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন জা'ফরের (শাহাদাতের) খবর এলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা জা'ফরের পরিবারের জন্য খাবার তৈরি করো। কারণ এমন এক ঘটনা তাদের কাছে এসেছে যা তাদেরকে ব্যস্ত (অন্যমনস্ক বা অক্ষম) করে দিয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل خالد بن سارة المخزومي، فقد روى عنه ابنه جعفر وعطاء بن أبي رباح، وهما ثقتان، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وحسّن له الترمذي حديثه هذا، وقال الذهبي في "الميزان" في ترجمته: يكفيه أنه روى عنه أيضًا عطاء. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير، وسفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه أحمد 3/ (1751)، وأبو داود (3132)، وابن ماجه (1610)، والترمذي (998) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن.
1394 - أخبرَناه أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَمِيم الحَنْظَلي ببغداد، حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقاشي، حدثنا أبو عاصم، أخبرني جعفر بن خالد بن سارة - وقد حدثنا ابنُ جُرَيج عنه - قال: حدثني أبي، أنَّ عبد الله بن جعفر قال: لو رأَيتَني وقُتَمَ وعُبيدَ الله بن العباس نلعبُ، إذ مَرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على دابةٍ فقال: "احمِلوا هذا إليَّ" فجَعَلَني أمامه، ثم قال لقُثَمَ: "احملوا هذا إليَّ" فَجَعَلَه وراءَه، ما استَحيَى من عمِّه العباس أن حَمَلَ قُثَمَ وتركَ عُبيدَ الله، ثم مَسَحَ برأسي ثلاثًا، فلما مَسَحَ قال: "اللهمَّ اخلُفْ جعفرًا في ولدِه" قلت لعبد الله بن جعفر: ما فَعَلَ قُثَمُ؟ قال: استُشهِد، قلتُ لعبد الله: الله ورسولُه كان أعلمَ بخِيَرِه، قال: أَجل [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে জা’ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি তুমি দেখতে, আমি, কুসাম এবং উবাইদুল্লাহ ইবনে আব্বাস খেলা করছিলাম, এমন সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি বাহনের ওপর চড়ে আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "একে আমার কাছে নিয়ে এসো।" অতঃপর তিনি আমাকে তাঁর সামনে বসালেন। এরপর তিনি কুসামকে বললেন: "একে আমার কাছে নিয়ে এসো।" অতঃপর তিনি তাকে তাঁর পিছনে বসালেন। তিনি তাঁর চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে উবাইদুল্লাহকে রেখে কুসামকে [বাহনে] নেওয়ায় সংকোচ বোধ করেননি। এরপর তিনি আমার মাথায় তিনবার হাত বুলিয়ে দিলেন। যখন তিনি হাত বুলিয়ে দিলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! জা’ফরের জন্য তার সন্তানদের মধ্যে উত্তম স্থলাভিষিক্ত তৈরি করুন।"
[রাবী বলেন,] আমি আব্দুল্লাহ ইবনে জা’ফরকে জিজ্ঞেস করলাম: কুসামের কী হয়েছিল? তিনি বললেন: সে শহীদ হয়েছে। আমি আব্দুল্লাহকে বললাম: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই কল্যাণকর বিষয়ে সবচেয়ে বেশি অবগত ছিলেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل خالد بن سارة المخزومي. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه النسائي (10838) و (10845) من طريقين عن أبي عاصم، عن ابن جريج، عن جعفر بن خالد، بهذا الإسناد. وسيأتي بعده مختصرًا، وبرقم (6553).
1395 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، أنَّ رَوْح بن عُبادةَ حدثهم، أخبرنا ابن جُريج، أخبرني جعفر بن خالد، عن أبيه، عن عبد الله بن جعفرٍ، قال: مَسَح رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بيدِه على رأسي - قال: أظنُّه قال: ثلاثًا - كلما مَسَحَ قال: "اللهمَّ اخلُفْ جعفرًا في ولدِه" [1].قد أتى جعفر بنُ خالد بسُنَّتين عزيزتين، إحداهما: مَسْحُ رأس اليتيم، والأخرى: تفقُّد أهل المُصيبة بما يَتقوَّتون ليلتَهم، وفَّقنا الله لاستعمالِه عنه.
আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দিয়ে আমার মাথায় স্পর্শ করলেন (হাত বুলিয়ে দিলেন)। (বর্ণনাকারী) বলেন, আমার ধারণা, তিনি তিনবার (হাত বুলিয়েছিলেন)। যখনই তিনি স্পর্শ করতেন, তখনই বলতেন: "হে আল্লাহ! জাফরের সন্তানদের মধ্যে (তার উত্তম স্থলাভিষিক্ত) কাউকে দান করুন।" [১] জাফর ইবনে খালিদ এই হাদীসের মাধ্যমে দুটি গুরুত্বপূর্ণ সুন্নাত নিয়ে এসেছেন। প্রথমটি হলো: ইয়াতিমের মাথায় হাত বুলিয়ে দেওয়া, আর দ্বিতীয়টি হলো: মুসিবতগ্রস্ত (বিপদগ্রস্ত) পরিবারের খোঁজ নেওয়া যেন তারা তাদের রাতের খাবার খেতে পারে। আল্লাহ্ আমাদেরকে তাঁর থেকে প্রাপ্ত এ সুন্নাতগুলো আমল করার তাওফীক দিন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كسابقه.وأخرجه أحمد 3/ (1760) عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد. بلفظ الحديث السابق.
1396 - أخبرنا أبو سَهْل أحمد بن محمد بن عبد الله النَّحْوي، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا أبو عاصم، حدثنا الأسْوَد بن شَيْبان، حدثنا خالد بن سُمَير، حدثني بشير بن نَهِيك، حدثني بَشيرُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وكان اسمُه في الجاهلية زَحْم بن مَعبَد، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما اسمُك؟ " قال: زَحْم بن مَعبَد فقال: "أنت بَشِير" فكان اسمَه - قال: بينا أنا أُماشي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "يا ابنَ الخَصاصِيَة، ما أصبحتَ تَنقِمُ على الله؟ تُماشي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم"، فقلت: ما أَنقِمُ على الله شيئًا، كلَّ خيرٍ فَعَلَ بيَ [1] الله، فأَتى على قُبورٍ من المشركين فقال: "لقد سُبِق هؤلاءِ بخيرٍ كثير" ثلاث مرارٍ، ثم أَتى على قُبورِ المسلمين فقال: "لقد أدركَ هؤلاءِ خيرًا كثيرًا" ثلاث مراتٍ، فبينما هو يمشي إذ حانت منه نظرةٌ، فإذا هو برجلٍ يمشي بين القبور عليه نَعلانِ، فقال: "يا صاحبَ السِّبْتِيَّتينِ، وَيحَكَ أَلْقِ سِبْتِيَّتَيكَ"، فنظر فلما عَرَفَ الرجلُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، خَلَعَ نَعلَيه فرمى بهما [2].
বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জাহিলিয়্যাতের যুগে তাঁর নাম ছিল যাহম ইবনু মা'বাদ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, "তোমার নাম কী?" তিনি বললেন, যাহম ইবনু মা'বাদ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি বাশীর (সুসংবাদদাতা)।" এরপর তাঁর নাম বাশীর হয়ে যায়। তিনি (বাশীর) বলেন, একবার আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হেঁটে যাচ্ছিলাম। তিনি বললেন, "হে ইবনুুল খাসাসিয়্যাহ! তুমি আল্লাহর কাছে কীসের অভিযোগ করছ? তুমি তো আল্লাহর রাসূলের সাথে হাঁটছ।" আমি বললাম, আমি আল্লাহর কাছে কোনো কিছুর অভিযোগ করি না। আল্লাহ আমার জন্য সব ভালো কিছুই করেছেন। এরপর তিনি মুশরিকদের কিছু কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, "এরা অনেক কল্যাণ লাভ থেকে বঞ্চিত হয়েছে" – এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন। এরপর তিনি মুসলিমদের কিছু কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, "এরা অনেক কল্যাণ লাভ করেছে" – এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হাঁটছিলেন, তখন হঠাৎ তাঁর দৃষ্টি গেল। তিনি দেখলেন, এক ব্যক্তি কবরের মধ্য দিয়ে জুতা পরা অবস্থায় হাঁটছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ওহে সিবতীয়্যাহ্ (চামড়ার) জুতার অধিকারী! তোমার জন্য দুর্ভোগ। তোমার জুতা দুটি ফেলে দাও।" লোকটি তাকাল। যখন সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চিনতে পারল, তখন সে জুতা খুলে ছুঁড়ে ফেলে দিল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: نبي. والتصويب من "سنن البيهقي" 4/ 80 حيث رواه عن المصنف.
[2] إسناده صحيح. أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرَّقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل.وأخرجه أحمد 34/ (20787) و (20788)، وأبو داود (3230)، وابن حبان (3170) من طرق عن الأسود بن شيبان، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده.قوله: "السبتيتين" بكسر السين: قال ابن الأثير في "النهاية": السِّبْت: جلود البقر المدبوغة بالقَرَظ يتخذ منها النعال، سُميت بذلك لأنَّ شعرها قد سُبت عنها، أي: حُلِقَ وأُزيل، وقيل: لأنها انسبتت بالدباغ، أي: لانت.وفي سبب أمرِه صلى الله عليه وسلم بخلع سبتيته يقول ابن حبان بإثر حديثه: يشبه أن تكون تلك من جلد ميتة لم تُدبغ، فكره صلى الله عليه وسلم لبس جلد الميتة، وفي قوله صلى الله عليه وسلم: "إنه ليَسمع خفق نعالهم إذا ولَّوا عنه" دليلٌ على إباحة دخول المقابر بالنعال.وقال الخطابي: يشبه أن يكون إنما كره ذلك لما فيها من الخُيَلاء، وذلك أنَّ نعال السِّبت من لباس أهل الترفُّه والتنعُّم … فأحب صلى الله عليه وسلم أن يكون دخوله المقابر على زي التواضع ولباس أهل الخشوع.وقال ابن الأثير في "النهاية": وإنما أمره بالخلع احترامًا للمقابر، لأنه كان يمشي بينها، وقيل: لأنها كان بها قذر، أو لاختياله في مشيه.
1397 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا إسماعيل بن قُتَيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا وَكِيع، عن الأَسْوَد بن شَيْبان، عن خالد بن سُمَير، عن بَشِيرِ بن نَهِيك، عن بَشيرِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يَمشِي في نَعلَين بين القُبور فقال: "يا صاحب السِّبْتِيَّتينِ أَلْقِهِما" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه؛ في النوع الذي لا يَشتهِرُ الصحابيُّ إلّا بتابعيَّين [2].
বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে দেখতে পেলেন যে কবরের মাঝে দুটি জুতো পরে হেঁটে যাচ্ছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "হে নরম চামড়ার জুতো পরিধানকারী! তুমি জুতো দুটি খুলে ফেলো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن يحيى: هو ابن بكر النيسابوري.وأخرجه أحمد 34/ (20784) و 36/ (21953)، وابن ماجه (1568)، والنسائي (2186) من طريق وكيع، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو داود (3123)، وابن حبان (3177) من طريق المفضل بن فضالة، عن ربيعة بن سيف، بهذا الإسناد. ووقع في رواية أبي داود: قال: أظنه عرفها، وفي سائر مصادر التخريج: لا نظنه عرفها، أو نحوها بالنفي. ولم يذكر أبو داود أيضًا قوله: "ما رأيتِ الجنة حتى يرى جد أبيك" وإنما قال: فذكر تشديدًا في ذلك.وانظر ما بعده.قوله بإثره: والكدى: المقابر، هذا قول ربيعة، كما جاء مصرحًا به عند أبي داود وابن حبان.
[2] تقدم تعقيبنا على كلامه هذا عند الحديث رقم (97). وأخرجه أبو داود (3123)، وابن حبان (3177) من طريق المفضل بن فضالة، عن ربيعة بن سيف، بهذا الإسناد. ووقع في رواية أبي داود: قال: أظنه عرفها، وفي سائر مصادر التخريج: لا نظنه عرفها، أو نحوها بالنفي. ولم يذكر أبو داود أيضًا قوله: "ما رأيتِ الجنة حتى يرى جد أبيك" وإنما قال: فذكر تشديدًا في ذلك.وانظر ما بعده.قوله بإثره: والكدى: المقابر، هذا قول ربيعة، كما جاء مصرحًا به عند أبي داود وابن حبان.
1398 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا نافع بن يزيد، أخبرني رَبيعةُ بن سَيف، حدثني أبو عبد الرحمن الحُبُليّ، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قَبَرْنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا، فلما رَجَعنا وحاذَينا بابَه إذا هو بامرأةٍ لا نَظنُّه عَرَفَها، فقال: "يا فاطمةُ، من أين جِئْتِ؟ " قالت: جئتُ من أهل الميِّت، رَحَّمتُ إليهم ميِّتَهم وعزَّيتُهم، قال: "فلعلَّكِ بَلَغْتِ معهم الكُدَى؟ " قالت: مَعاذَ الله أن أبلُغَ معهم الكُدَى، وقد سمعتُك تَذكرُ فيه ما تَذكُر، قال: "لو بَلَغْتِ معهم الكُدَى ما رأيتِ الجنةَ حتى يَرَى جَدُّ أبيكِ". والكُدَى: المقابر [1]. رواه حَيْوَةُ بن شُرَيح الحَضْرمي عن ربيعةَ بن سيف:
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক ব্যক্তিকে দাফন করলাম। যখন আমরা ফিরে আসছিলাম এবং তাঁর (রাসূলের) দরজার কাছে পৌঁছালাম, তখন সেখানে এক মহিলাকে দেখলাম, আমাদের মনে হচ্ছিল না যে তিনি তাকে চিনতে পেরেছেন। তখন তিনি বললেন: "হে ফাতিমা, তুমি কোথা থেকে এসেছো?" তিনি বললেন: আমি মৃত ব্যক্তির পরিবার থেকে এসেছি। আমি তাদের মৃত ব্যক্তির জন্য রহমতের (দোয়া) করেছি এবং তাদের সান্ত্বনা দিয়েছি। তিনি বললেন: "সম্ভবত তুমি তাদের সাথে 'কুদা' (কবরস্থান) পর্যন্ত পৌঁছেছিলে?" তিনি বললেন: আল্লাহর আশ্রয় চাচ্ছি তাদের সাথে 'কুদা' পর্যন্ত পৌঁছা থেকে। আমি আপনাকে এ বিষয়ে যা বলতে শুনেছি, তা আমি শুনেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি তাদের সাথে 'কুদা' পর্যন্ত পৌঁছাতে, তবে তুমি জান্নাত দেখতে পেতে না, যতক্ষণ না তোমার পিতার দাদা (জান্নাত) দেখত।" আর 'কুদা' অর্থ: কবরস্থান।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، ربيعة بن سيف - وهو ابن ماتع المعافري - قال البخاري وابن يونس: عنده مناكير، وقال البخاري أيضًا في "الأوسط": روى أحاديث لا يتابع عليها. وضعفه الأزدي عندما روى له هذا الحديث فيما ذكره الذهبي في "الميزان"، وضعفه النسائي في "المجتبى" (1880)، وفي قول آخر له: لا بأس به، وقال الدارقطني: صالح، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال: كان يخطئ كثيرًا، وقال ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 617 - 618: هو عندي حسن لا ضعيف، وتعقبه الذهبي في "الرد على ابن القطان" ص 62: ما أشبه أن يكون حديثه موضوعًا؛ يعني حديثه هذا. أبو عبد الرحمن الحبلي: هو عبد الله بن يزيد المعافري. وأخرجه أبو داود (3123)، وابن حبان (3177) من طريق المفضل بن فضالة، عن ربيعة بن سيف، بهذا الإسناد. ووقع في رواية أبي داود: قال: أظنه عرفها، وفي سائر مصادر التخريج: لا نظنه عرفها، أو نحوها بالنفي. ولم يذكر أبو داود أيضًا قوله: "ما رأيتِ الجنة حتى يرى جد أبيك" وإنما قال: فذكر تشديدًا في ذلك.وانظر ما بعده.قوله بإثره: والكدى: المقابر، هذا قول ربيعة، كما جاء مصرحًا به عند أبي داود وابن حبان.
1399 - أخبرَناه بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيْرفي، حدثنا عبد الصمد بن الفَضْل البَلْخي، حدثنا عبد الله بن يزيد المُقرئ، حدثنا حَيْوَةُ، أخبرني رَبيعةُ بن سَيفٍ المَعافِري، عن أبي عبد الرحمن الحُبُليّ، عن عبد الله بن عمرو: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أبصَرَ امرأةً منصرِفةً من جنازةٍ، فسألها: "من أينَ جِئتِ؟ " فقالت: من تَعزيةِ أهل هذا الميِّت، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "واللهِ لو بَلَغتِ معهم الكُدَى ما رأيتِ الجنةَ حتى يراها جَدُّ أبيكِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক মহিলাকে দেখলেন, যিনি একটি জানাজা থেকে ফিরছিলেন। অতঃপর তিনি তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কোথা থেকে এসেছ?" সে বলল: এই মৃত ব্যক্তির পরিবারকে সান্ত্বনা দিতে (তা'যিয়াত জানাতে)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আল্লাহর কসম! যদি তুমি তাদের সঙ্গে কবরস্থান পর্যন্ত যেতে, তবে তোমার প্রপিতামহের প্রপিতামহ জান্নাত না দেখা পর্যন্ত তুমি জান্নাত দেখতে পাবে না।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف كسابقه.وأخرجه النسائي (2019) من طريق عبيد الله بن فضالة، عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6574). وأخرجه النسائي (2019) عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، كلاهما (أحمد ومحمد) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن سعيد بن أبي أيوب، عن ربيعة بن سيف، به.
1400 - أخبرني أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو الوليد ومسلم بن إبراهيم، قالا: حدثنا شُعبة.وحدثنا أبو بكر محمد بن أحمد [1] بن بالَوَيه، حدثنا أبو المُثنَّى العَنْبري، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا يحيى بن سعيد ومحمد بن جعفر، قالا: حدثنا شعبة، عن محمد بن جُحَادة، عن أبي صالح، عن ابن عباس قال: لَعَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زائراتِ القُبور والمتَّخِذِين عليها المساجدَ والسُّرُج [2].قال الحاكم: أبو صالح هذا ليس بالسَّمَّان المحتجِّ به، إنما هو باذانُ، ولم يَحتجَّ به الشيخان، لكنه حديثٌ متداوَلٌ فيما بين الأئمة، ووجدتُ له متابعًا من حديث سفيان الثوري في متن الحديث فخرَّجته:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবর যিয়ারতকারিণীদের, এবং যারা কবরের উপর মসজিদ তৈরি করে ও বাতি স্থাপন করে, তাদের লা'নত (অভিশাপ) করেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] انقلب هذا الاسم في النسخ الخطية إلى: أحمد بن محمد، وهو خطأ، وقد جاء على الصواب في عشرات المواضع من "المستدرك".
[2] حسن لغيره دون ذكر السُّرُج، وهذا إسناد ضعيف لضعف أبي صالح: واسمه باذان، كما قال المصنِّف، وهو مولى أم هانئ، خلافًا لما قال ابن حبان. أبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطيالسي، ومسلم بن إبراهيم: هو الأزدي الفراهيدي، أبو المثنى العنبري: هو معاذ بن المثنى، ويحيى بن سعيد: هو القطان.وأخرجه أحمد 3/ (2030) عن يحيى بن سعيد القطان وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 4/ (2603) و 5/ (3118) عن محمد بن جعفر وحده، به.وأخرجه أحمد 5/ (2984) و (3118)، وأبو داود (3236) من طرق عن شعبة بن الحجاج، به.وأخرجه ابن ماجه (1575)، والترمذي (320)، والنسائي (2181)، وابن حبان (3179) و (3180) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن محمد بن جحادة، به. وقال الترمذي: حديث حسن.ويشهد له حديث حسان بن ثابت الآتي بعده، وانظر تتمة شواهده في تعليقنا على "سنن أبي داود". ولفقه الحديث انظر لزامًا تعليقنا على الحديث (2603) من "المسند".