হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1401)


1401 - حدَّثَناه أبو العباس أحمد بن هارون الفقيه إملاءً، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو حذيفة، حدثنا سفيان، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن عبد الرحمن بن بَهْمان، عن عبد الرحمن بن حسَّان بن ثابت، عن أبيه قال: لَعَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زوَّاراتِ القُبور [1].وهذه الأحاديث المرويَّة في النهي عن زيارة القبور منسوخة، والناسخُ لها حديثُ علقمة بن مَرثَد، عن سليمان بن بُرَيدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "قد كنتُ قد نهيتُكم عن زيارة القُبور، ألا فزُورُوها، فقد أَذِنَ الله تعالى لنبيِّهِ صلى الله عليه وسلم في زيارة قبرِ أُمِّه".وهذا الحديث مخرَّج في الكتابين الصحيحين للشيخين رضي الله عنهما [2].




হাসসান ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যারা বেশি বেশি কবর যিয়ারতকারিণী মহিলাদেরকে অভিশাপ দিয়েছেন।

কবরের যিয়ারত সম্পর্কে বর্ণিত এই হাদীসগুলো মানসুখ (রহিত)। এগুলো রহিতকারী (নাসেখ) হলো আলকামা ইবনে মারসাদ, সুলাইমান ইবনে বুরাইদা, তাঁর পিতা (বুরাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) থেকে বর্ণিত নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম। সাবধান! এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। কেননা আল্লাহ তা‘আলা তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর মায়ের কবর যিয়ারত করার অনুমতি দিয়েছেন।" এই হাদীসটি শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) (রাহিমাহুমাল্লাহ)-এর সহীহ গ্রন্থদ্বয়েও বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة حال عبد الرحمن بن بهمان. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي.وأخرجه أحمد 24/ (15657)، وابن ماجه (1474) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.



[2] لم يخرجه البخاري، وإنما أخرجه مسلم فقط برقم (977) و (1975) (37).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1402)


1402 - وقد حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان.وحدثنا أبو العباس، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحكم؛ قالا: أخبرنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني أسامة بن زيد، أنَّ محمد بن يحيى بن حَبّان الأنصاري أخبره، أنَّ واسعَ بنَ حَبَّان حدّثه، أنَّ أبا سعيدٍ الخُدْري حدثه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "نَهيتُكم عن زيارة القُبور فزُوروها، فإنَّ فيها عِبرةً، ونهيتُكم عن النَّبيذ، ألا فانْبِذُوا، ولا أُحِلُّ مُسكِرًا، ونهيتُكم عن لحوم الأضاحيِّ، فكُلُوا وادَّخِروا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, কিন্তু এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। কারণ, এর মধ্যে উপদেশ রয়েছে। আমি তোমাদেরকে নাবীয (নির্দিষ্ট পাত্রে পানীয় প্রস্তুত করা) থেকে নিষেধ করেছিলাম, কিন্তু এখন তোমরা নাবীয প্রস্তুত করো, তবে আমি কোনো নেশাকর জিনিসকে হালাল করি না। আর আমি তোমাদেরকে কুরবানীর গোশত (সংরক্ষণ করতে) নিষেধ করেছিলাম, কিন্তু এখন তোমরা তা খাও এবং সংরক্ষণ করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو اللَّيثي.وأخرجه أحمد 17/ (11329) من طريق عبد الله بن المبارك، عن أسامة بن زيد الليثي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 18/ (11606) و (11627) من طريق عمرو بن ثابت، عن أبي سعيد الخدري.وأخرج قصة الأضاحيّ أحمد 17/ (11176)، والنسائي (4502)، وابن حبان (5926) من طريق زينب بنت كعب بن عجرة، عن أبي سعيد الخدري.وأخرجها أيضًا أحمد 18/ (11543) من طريق أيوب السختياني، والنسائي (4508) من طريق عبد الله بن عون، كلاهما عن محمد بن سيرين، عن أبي سعيد. ويغلب على ظننا أن ابن سيرين لم يسمع أبا سعيد الخدري.فقد رواه يزيد بن إبراهيم التستري - وهو ثقة - عن محمد بن سيرين، عن أبي العلانية، عن أبي سعيد. أخرجه أحمد 45/ (27157). وأبو العلانية وثقه أبو داود والبزار.وانظر ما سيأتي برقم (7759) و (7760).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1403)


1403 - وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني ابن جُرَيج، عن أيوب بن هانئ، عن مسروق بن الأجْدَع، عن عبد الله بن مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنِّي كنتُ نهيتُكم عن زيارة القُبور، وأكلِ لُحومِ الأضاحيِّ فوقَ ثلاثٍ، وعن نَبيذِ الأوعية، ألا فزُورُوا القُبور فإنها تُزهِّد في الدنيا وتُذكِّر الآخرة، وكلوا لحومَ الأضاحيِّ وأَبقُوا ما شِئتُم، فإنما نهيتُكم عنه إذِ الخيرُ قليلٌ، تَوسِعةً على الناس، ألا إنَّ وعاءً لا يُحرِّم شيئًا، فإِنَّ كلَّ مُسكِرٍ حرامٌ" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে, তিন দিনের বেশি কুরবানির গোশত খেতে এবং নির্দিষ্ট পাত্রে তৈরি নবীয পান করতে নিষেধ করেছিলাম। শুনে রাখো! এখন তোমরা কবর যিয়ারত করো, কারণ তা দুনিয়ার প্রতি নির্লিপ্ততা সৃষ্টি করে এবং আখিরাতকে স্মরণ করিয়ে দেয়। আর কুরবানির গোশত খাও এবং যতটুকু ইচ্ছা সংরক্ষণ করো। আমি তোমাদেরকে এগুলি থেকে নিষেধ করেছিলাম যখন কল্যাণ (সম্পদ) কম ছিল, মানুষের উপর প্রশস্ততা সৃষ্টির জন্য (সহযোগিতার জন্য)। শুনে রাখো! কোনো পাত্র কোনো কিছুকে হারাম করে না। নিশ্চয়ই সকল নেশা সৃষ্টিকারী জিনিস হারাম।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - مدلس وقد عنعن، وأيوب بن هانئ ضعفه ابن معين، وقال أبو حاتم: شيخ صالح، وقال الدارقطني: يعتبر به، وذكره ابن حبان في "الثقات". ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه مقطعًا ابن ماجه (1571) و (3388) عن يونس بن عبد الأعلى، وابن حبان (981) من طريق أحمد بن عيسى المصري، كلاهما عن ابن وهب، بهذا الإسناد. وزاد في رواية أحمد ابن عيسى قصة زيارة النبي صلى الله عليه وسلم قبر أمه. وهي الآتية عند المصنف (3331) من طريق بحر بن نصر عن ابن وهب. وانظر تمام شواهده في "المسند".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1404)


1404 - حدثنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن عمرو البزّاز ببغداد، حدثنا محمد بن شاذانَ الجَوهَريُّ، حدثنا زكريا بن عَدِيٍّ، حدثنا سَلَّام بن سُلَيم، عن يحيى الجابر، عن عمرو بن عامر، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نَهيتُكم عن زيارة القُبور فزُورُوها، فإنها تُذكِّركم الموتَ" [1].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, কিন্তু এখন তোমরা কবর যিয়ারত করো। কেননা তা তোমাদেরকে মৃত্যুর কথা স্মরণ করিয়ে দেয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف يحيى الجابر: وهو يحيى بن عبد الله بن الحارث الجابر، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه". زكريا بن عدي: هو التيمي مولاهم، وسلّام بن سُليم: يكنى أبا الأحوص.وأخرجه مطولًا أحمد 21/ (13615) عن عفان بن مسلم، عن أبي الأحوص، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا كذلك أحمد (13487) من طريق ابن إسحاق، عن يحيى الجابر، به. وقرن بعمرو بن عامر عبدَ الوارث مولى أنس بن مالك، وعبد الوارث هذا قال أبو زرعة: منكر الحديث، وقال أبو حاتم: شيخ، وذكره ابن حبان في "الثقات".وسيأتي برقم (1409) و (1410). وانظر تمام شواهده في "المسند".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1405)


1405 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدُّنيا، حدثنا أحمد بن عِمْران الأخْنَسي، حدثنا يحيى بن يَمَان، عن سفيان، عن علقمة بن مَرْثَد، عن سليمان بن بُرَيدة، عن أبيه قال: زار النبيُّ صلى الله عليه وسلم قبرَ أُمِّه في ألفِ مُقنَّعٍ، فلم يُرَ باكيًا أكثرَ من يومِئذٍ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




বুরয়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক হাজার আবৃত (বা বর্ম পরিহিত) লোকের সাথে তাঁর মায়ের কবর যিয়ারত (দর্শন) করলেন। সেদিনকার চেয়ে বেশি ক্রন্দনকারী আর কখনও দেখা যায়নি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بهذا اللفظ، تفرد به يحيى بن يمان - وهو العجلي - عن سفيان - وهو الثوري -، وهو ممن لا يحتمل تفرده، ضعفه أحمد بن حنبل، وقال: ليس بحجة، حدّث عن الثوري بعجائب، وقال يحيى بن معين: ليس بثبت، وقال مرة: أرجو أن يكون صدوقًا، وقال مرة: ليس به بأس، وقال وكيع: ما كان أحد من أصحابنا أحفظ للحديث منه، كان يحفظ في المجلس خمس مئة حديث ثم نسي، وقال وكيع مرة: هذه الأحاديث التي يحدث بها يحيى بن يمان ليست من أحاديث الثوري، وقال ابن عدي: عامة ما يرويه غير محفوظ، وهو في نفسه لا يتعمد الكذب، إلّا أنه يخطئ ويشتبه عليه. انتهى، والراوي عنه وهو أحمد بن عمران الأخنسي ضعيف، قال البخاري - كما في "ميزان الاعتدال" -: يتكلمون فيه، وقال أبو زرعة: كوفي تركوه، وتركه أبو حاتم. قلنا: لكنه قد توبع، تابعه حميد بن الربيع عند ابن عبد البر في "التمهيد" وأبي طاهر المخلص في "المخلصيات"، وأبو سعيد الجعفي عند المصنِّف (4237) والبيهقي في "الشعب"، والقاسم بن أبي شيبة وسليمان الشاذكوني عند ابن عدي في "الكامل"، وكلهم ضعفاء.لكن صحَّ الحديث بغير هذا اللفظ، فقد أخرج الترمذي (1054) من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد النبيل - وهو ثقة حجّة - عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد عن بريدة مرفوعًا: "قد كنت نهيتكم عن زيارة القبور، فقد أذن لمحمد في زيارة قبر أمه، فزوروها فإنها تذكر الآخرة"، قال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرج أحمد 38/ (23016) عن مؤمل بن إسماعيل، عن سفيان الثوري، به، بنحو الحديث الآتي برقم (1407)، وقال فيه: "قد أذن لمحمد في زيارة قبر أمه".وأخرجه كذلك ابن حبان (3168) من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن علقمة بن مرثد، به.وأخرجه كذلك أحمد 38/ (23017) من طريق القاسم بن عبد الرحمن، و (23038) من طريق أبي جناب يحيى بن أبي حية الكلبي، كلاهما عن سليمان بن بريدة عن أبيه رفعه. لفظ القاسم: "إني أتيت قبر أم محمد فسألت ربي الشفاعة فمنعنيها"، ولفظ يحيى: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم غزا غزوة الفتح، فخرج يمشي إلى القبور حتى إذا أتى أدناها جلس إليه كأنه يكلم إنسانًا جالسًا يبكي، قال: فاستقبله عمر بن الخطاب فقال: ما يبكيك جعلني الله فداءك؟ قال: "سألت ربي أن يأذن لي في زيارة قبر أم محمد فأذن لي، فسألته أن يأذن لي فأستغفر لها فأبى". وأبو جناب الكلبي ضعيف.وسيتكرر الحديث من وجه آخر عن يحيى بن يمان برقم (4237).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1406)


1406 - حدثنا أبو عبد الله محمدُ بنُ يعقوب الحافظ وأبو الفَضْل الحسن بن عقوب العَدْل، قالا: حدثنا محمد بن عبد الوهاب الفَرَّاء، أخبرنا يعلى بن عُبَيد، حدثنا أبو مُنَيْن يَزيدُ بن كَيْسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرةَ، قال: زارَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قبر أُمِّه فبكى وأَبكَى مَن حولَه، ثم قال: "استأذنتُ ربِّي أن أَزورَ قبرَها فأذِنَ لي، واستأذنتُه أن أستغفِرَ لها فلم يُؤذَن لي، فزُورُوا القبورَ فإنها تُذكِّر الموت" [1].وهذا الحديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মায়ের কবর যিয়ারত করলেন। তখন তিনি কাঁদলেন এবং তাঁর আশেপাশে যারা ছিল তাদেরও কাঁদালেন। অতঃপর তিনি বললেন: 'আমি আমার রবের কাছে তাঁর কবর যিয়ারত করার অনুমতি চেয়েছিলাম, ফলে তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন। আর আমি তাঁর (মায়ের) জন্য ক্ষমা চাওয়ার অনুমতি চাইলাম, কিন্তু আমাকে অনুমতি দেওয়া হলো না। সুতরাং তোমরা কবর যিয়ারত করো, কারণ তা মৃত্যুকে স্মরণ করিয়ে দেয়।'




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل يزيد بن كيسان. يعلى بن عبيد: هو الطنافسي، وأبو حازم: هو سلمان الأشجعي.وأخرجه ابن حبان (3169) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن يعلى بن عبيد، بهذا الإسناد.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد 15/ (9688)، ومسلم (976) (108)، وأبو داود (3234)، وابن ماجه (1569) و (1572)، والنسائي (2172) من طريق محمد بن عبيد الطنافسي، ومسلم (976) (105) من طريق مروان بن معاوية، كلاهما عن يزيد بن كيسان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1407)


1407 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا أبو شُعيب عبد الله بن الحسن الحَرَّاني، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا زهير، حدثنا زُبَيد، عن مُحارِب بن دِثَار، عن ابن بُريدةَ، عن أبيه قال: كنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قريبًا من ألفِ راكبٍ، فنزل بنا فصلَّى بنا ركعتين، ثم أقبَلَ علينا بوَجهِه وعيناه تَذْرِفان، فقام إليه عمر ففدَّاه بالأم والأب يقول: ما لك يا رسول الله؟ قال: "إنِّي استأذنتُ ربِّي عز وجل في الاستغفار لأُمِّي، فلم يأذَنْ لي، فدَمَعَ عينايَ رحمةً لها، واستأذنتُ ربِّي في زيارتها فأَذِنَ لي، وإنِّي كنتُ قد نَهيتُكم عن زيارةِ القبور فزُورُوها، ولْيزِدْكُم زيارتُها خيرًا" [1].وهذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে প্রায় এক হাজার আরোহী ছিলাম। তিনি আমাদের সাথে অবতরণ করলেন এবং আমাদের নিয়ে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরালেন, আর তাঁর উভয় চোখ থেকে অশ্রু ঝরছিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং নিজ পিতা-মাতার বিনিময়ে কুরবান হওয়ার কথা বলে জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার কী হয়েছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি আমার রবের (আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা) কাছে আমার মায়ের জন্য ক্ষমা চাওয়ার অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাকে অনুমতি দেননি। তাই তাঁর (মায়ের) প্রতি দয়াপরবশ হয়ে আমার চোখ থেকে অশ্রু ঝরেছে। আর আমি আমার রবের কাছে তাঁর কবর যিয়ারতের অনুমতি চেয়েছিলাম, ফলে তিনি আমাকে অনুমতি দিয়েছেন। আমি পূর্বে তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, কিন্তু এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। তোমাদের যিয়ারত যেন তোমাদের কল্যাণকে বাড়িয়ে দেয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. زهير: هو ابن معاوية أبو خيثمة، وزبيد: هو ابن الحارث اليامي، وابن بُريدة: هو عبد الله، صرَّح باسمه ضرار بن مرة عن محارب بن دثار، وهو صنيع المزي في "تحفة الأشراف" (2001)، وقد وهم الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" (2225) فجعله في ترجمة سليمان بن بريدة، والله أعلم. أما أصحاب ابن بريدة فبعضهم قال: عبد الله، وبعضهم قال: سليمان، وبعضهم قال: ابن بريدة، كما سيأتي.وأخرجه تامًّا ومختصرًا مسلم (977) (106)، والنسائي (5143)، وابن حبان (5390) من طرق عن أبي خيثمة زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرجه تامًّا ومقطّعًا أحمد 38/ (22958)، ومسلم (977) (106) و (1975) (37) و (1999) (63)، والنسائي (2170) و (5142)، وابن حبان (5391) و (5400) من طريق أبي سنان ضرار بن مرة، ومسلم (1999) (65)، وأبو داود (3235) و (3698) من طريق معرِّف بن واصل، كلاهما عن محارب بن دثار، به. وقال ضرار بن مرة في حديثه: عبد الله بن بريدة، وقال معرف: ابن بريدة.وأخرجه دون قصة زيارة قبر أمه صلى الله عليه وسلم أحمد (23005)، ومسلم (977) (106) من طريق عطاء الخراساني، وأحمد (23015) من طريق سلمة بن كهيل، والنسائي (2171) من طريق المغيرة بن سبيع، ثلاثتهم عن عبد الله بن بريدة، به.وأخرجه كذلك النسائي (5141) من طريق الزبير بن عدي، عن ابن بريدة، عن أبيه. ذكره هكذا ولم يصرح باسمه، لكن خرجه المزي في "التحفة" في ترجمة عبد الله بن بريدة.وأخرجه تامًّا ومقطعًا أحمد (23016)، ومسلم بإثر (977) (106) وبإثر (1975) (37) وبرقم (1999) (64) من طريق علقمة بن مرثد، وأحمد (23052) من طريق أبي جناب يحيى بن حية الكلبي، كلاهما عن سليمان بن بريدة، عن أبيه. وقد صرَّح علقمة في بعض مواضع مسلم وكذلك أبو جناب باسم سليمان بن بريدة.وانظر ما سلف برقم (1405).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1408)


1408 - حدثنا أبو بكر أحمد [1] بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى معاذُ بن المثنَّى، حدثنا محمد بن مِنْهالٍ الضَّرير، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا بِسْطام بن مُسلِم، عن أبي التَّيَّاح يزيد بن حُمَيد، عن عبد الله بن أبي مُلَيكةَ: أنَّ عائشةَ أقبلَتْ ذات يومٍ من المقابر، فقلتُ لها: يا أُمَّ المؤمنين، من أين أقبلتِ؟ قالت: مِن قبرِ أخي عبدِ الرحمن بن أبي بكر، فقلتُ لها: أليس كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم نَهَى عن زيارة القبور؟ قالت: نعم، كان نَهَى ثم أمَر بزيارتها [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন তিনি কবরস্থান থেকে ফিরছিলেন। (বর্ণনাকারী) আমি তাঁকে বললাম: হে উম্মুল মু'মিনীন, আপনি কোথা থেকে ফিরলেন? তিনি বললেন: আমার ভাই আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকরের কবর থেকে। আমি তাঁকে বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেননি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তিনি নিষেধ করেছিলেন। এরপর তিনি তা যিয়ারত করার অনুমতি (বা নির্দেশ) প্রদান করেছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: محمد، والتصويب من "إتحاف المهرة" (12861)، وانظر ترجمته في "السير" للذهبي 15/ 483.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي 4/ 78 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو يعلى (4871)، وابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 233 من طريق محمد بن المنهال، به.وأخرج ابن ماجه (1570) من طريق روح بن عبادة، عن بسطام بن مسلم، به عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخص في زيارة القبور.قال البيهقي بإثر روايته: تفرد به بسطام بن مسلم البصري. قلنا: لم يتفرد، بل تابعه على معناه ابنُ جريج، فرواه عن ابن أبي مليكة قال: توفي عبد الرحمن بن أبي بكر بالحُبشي على بريد من مكة، فلما حجت عائشة رضي الله عنها أتت قبره فبكت … الحديث، وسيأتي عند المصنف برقم (6126). أبو حذيفة عن إبراهيم بن طهمان عن عمرو بن عامر وعبد الوارث مولى أنس عن أنس، أخرجه البيهقي 4/ 77، فيغلب على الظن أنَّ ذكر يحيى بن عباد في هذا السند وهم من عامر بن يساف، والله أعلم.وانظر ما بعده.قوله: "هُجْرًا" أي: فُحشًا وقبيحًا من القول.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1409)


1409 - حدثنا أبو عليٍّ الحسين بن عليٍّ الحافظ، أخبرنا عَبْدانُ الأَهوازيُّ، حدثنا بِشْر بن معاذ العَقَدي، حدثنا عامر بن يِسَاف، حدثنا إبراهيم بن طَهْمان، عن يحيى بن عبَّاد، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كنتُ نَهيتُكم عن زيارةِ القبور، ألا فزُورُوها، فإنه يُرِقُّ القلبَ، ويُدمِعُ العينَ، ويُذكِّر الآخرة، ولا تقولوا هُجْرًا" [1].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম। এখন তোমরা তা যিয়ারত করো। কারণ তা হৃদয়কে নরম করে, চোখকে অশ্রুসিক্ত করে এবং আখেরাতের কথা স্মরণ করিয়ে দেয়। আর (সেখানে) তোমরা যেন অশ্লীল (বা বাজে) কথা না বলো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عامر بن يساف - وهو عامر بن عبد الله بن يساف اليمامي، كما قرر الذهبي في "الميزان" - قال ابن عدي: منكر الحديث عن الثقات، ثم قال: ومع ضعفه يكتب حديثه، وقال أبو داود: ليس به بأس، رجل صالح، وقال العجلي: يكتب حديثه وفيه ضعف، وقال الدوري عن ابن معين: ليس بشيء، وقال البرقي عن ابن معين: ثقة، وقال أبو حاتم الرازي: هو صالح، وذكره ابن حبان في "الثقات". وقد خالف عامر بن يساف من هو أحسن حالًا منه، وهو أبو حذيفة موسى بن مسعود النهدي، فقد رواه أبو حذيفة عن إبراهيم بن طهمان عن عمرو بن عامر وعبد الوارث مولى أنس عن أنس، أخرجه البيهقي 4/ 77، فيغلب على الظن أنَّ ذكر يحيى بن عباد في هذا السند وهم من عامر بن يساف، والله أعلم.وانظر ما بعده.قوله: "هُجْرًا" أي: فُحشًا وقبيحًا من القول.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1410)


1410 - أخبرَناه أحمد بن عثمان بن يحيى المُقرئ ببغداد، حدثنا سعيد بن عثمان الأهوازي، حدثنا الرَّبيع بن يحيى، حدثنا عبد العزيز بن مسلم، حدثني يحيى بن عبد الله [1] التَّيمي، عن عمرو بن عامر الأنصاري، عن أنس بن مالكٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إنِّي كنتُ نَهيتُكم عن زيارة القُبور، فمن شاءَ أن يَزور قبرًا فَلْيَزُرْه، فإنه يُرِقُ القلبَ، ويُدمِعُ العينَ، ويُذكِّر الآخرة" [2].




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম। এখন থেকে যে ব্যক্তি কবর যিয়ারত করতে চায়, সে যেন যিয়ারত করে। কেননা এটি অন্তরকে নরম করে, চোখকে অশ্রুসিক্ত করে এবং আখিরাতের কথা স্মরণ করিয়ে দেয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ص) وهامش (ز): عبيد الله، وهو خطأ، والصواب ما في أصل (ز)، وهو يحيى الجابر. ابن داود الضبي، عن يعقوب بن إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، عن رجل، عن أبي مسلم الخولاني، عن أبي ذرٍّ. بأطول مما هنا، وذكرا في إسناده رجلًا مبهمًا بين يحيى بن سعيد وبين أبي مسلم، وأسقطا منه عبيدَ بن عمير.قال الحافظ بإثره: هذا حديث غريب … والرجل المبهم في الإسناد ما عرفتُه، وفيه استدراك على الحاكم في استدراكه هذا الحديث، لكن وقع عنده بحذفه فخفيت عليه علّته، مع أنه أخرجه من طريقين إلى موسى بن داود، وزاد عنده بين أبي مسلم وأبي ذرٍّ عبيدَ بنَ عمير، وهذا يؤذن بأنه ما ضبط إسناده، انتهى.



[2] صحيح لغيره، وانظر ما قبله، وما سلف برقم (1404). ابن داود الضبي، عن يعقوب بن إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، عن رجل، عن أبي مسلم الخولاني، عن أبي ذرٍّ. بأطول مما هنا، وذكرا في إسناده رجلًا مبهمًا بين يحيى بن سعيد وبين أبي مسلم، وأسقطا منه عبيدَ بن عمير.قال الحافظ بإثره: هذا حديث غريب … والرجل المبهم في الإسناد ما عرفتُه، وفيه استدراك على الحاكم في استدراكه هذا الحديث، لكن وقع عنده بحذفه فخفيت عليه علّته، مع أنه أخرجه من طريقين إلى موسى بن داود، وزاد عنده بين أبي مسلم وأبي ذرٍّ عبيدَ بنَ عمير، وهذا يؤذن بأنه ما ضبط إسناده، انتهى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1411)


1411 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا موسى بن داود الضَّبِّي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، عن أبي مسلم الخَوْلاني، عن عُبيد بن عُمَير، عن أبي ذرٍّ قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "زُرِ القُبور تَذَكَّرْ بها الآخرة، واغسِل الموتَى، فإنَّ معالجةَ جَسَدٍ خاوٍ موعظةٌ بليغة، وصلِّ على الجنائزِ، لعلَّ ذلك أن يُحزِنَكَ، فإنَّ الحزينَ في ظلِّ الله يَتعرّضُ كلَّ خير" [1]. هذا حديث رواته عن آخرهم ثقات [2]!




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: “কবর যিয়ারত করো, এর দ্বারা তোমার আখিরাতের কথা স্মরণ হবে। আর মৃতদের গোসল করাও, কেননা একটি প্রাণহীন দেহ পরিচালনা করা একটি জোরালো উপদেশ। আর জানাযার সালাত আদায় করো, সম্ভবত এটি তোমাকে দুঃখিত (বা চিন্তিত) করবে। কেননা যে ব্যক্তি (আখিরাতের চিন্তায়) দুঃখিত, সে আল্লাহর ছায়াতলে থাকে এবং সব ধরনের কল্যাণের সম্মুখীন হয়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، كما قال الذهبي، فإن يحيى بن سعيد لم يدرك أبا مسلم الخولاني، بينهما رجل مبهم كما سيأتي، ثم إن متنه منكر كما قال البيهقي.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (8851) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال: هذا متن منكر.وسيأتي عند المصنف برقم (8140) من طريق أحمد بن حازم الغفاري عن موسى بن داود.وأخرجه ابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (470) من طريق إسحاق بن بُهلول، وابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 113 - 114 من طريق علي بن زيد الفرائضي، عن موسى ابن داود الضبي، عن يعقوب بن إبراهيم، عن يحيى بن سعيد، عن رجل، عن أبي مسلم الخولاني، عن أبي ذرٍّ. بأطول مما هنا، وذكرا في إسناده رجلًا مبهمًا بين يحيى بن سعيد وبين أبي مسلم، وأسقطا منه عبيدَ بن عمير.قال الحافظ بإثره: هذا حديث غريب … والرجل المبهم في الإسناد ما عرفتُه، وفيه استدراك على الحاكم في استدراكه هذا الحديث، لكن وقع عنده بحذفه فخفيت عليه علّته، مع أنه أخرجه من طريقين إلى موسى بن داود، وزاد عنده بين أبي مسلم وأبي ذرٍّ عبيدَ بنَ عمير، وهذا يؤذن بأنه ما ضبط إسناده، انتهى.



[2] فيه موسى بن داود الضبي، نقل الحافظ في "أماليه" المذكورة عن أبي حاتم قوله: في حديثه اضطراب، وعن أحمد توثيقه.وفيه يعقوب بن إبراهيم، قال البيهقي: أظنه المدني المجهول، وقال الحافظ ابن حجر: لم أره منسوبًا، وكأنه المدني الذي ذكره ابن عدي وهو مجهول. وقال ابن الملقن: فيه يعقوب بن إبراهيم وهو واهٍ. لكن قال الذهبي في "تلخيصه": يعقوب هو القاضي أبو يوسف، حسن الحديث! وخالفهم الشيخ الألباني رحمه الله في "ضعيفته" (7138) فقال: موسى بن داود الضبي من رجال مسلم، وليس هو الذي ذكره الذهبي في "الضعفاء" وجهَّله، ويعقوب بن إبراهيم: هو الدورقي الحافظ الثقة من رجال الشيخين، ويعقوب بن إبراهيم الذي لا يعرف إنما هو آخر، وهو القاضي الزهري، متقدم على هذا، يروي عن هشام بن عروة، ويحيى بن سعيد: هو القطان، من رجال الشيخين. قلنا: ووجود الرجل المبهم بين يحيى بن سعيد وأبي مسلم يجعل يحيى في طبقة أنزل، وهذا يرجح كونه القطان، والراوي عنه هو يعقوب الدورقي، وعليه يتوجه قول الألباني، والله أعلم. عن الأزدي قوله: تُكلِّم فيه. وقد اختلف في هذا الإسناد على ابن أبي فديك؛ فرواه أبو مصعب الزهري هنا عنه عن سليمان بن داود عن جعفر بن محمد بإسناده إلى الحسين بن علي بن أبي طالب، وخالفه علي بن شعيب - وهو ثقة - فرواه عن ابن أبي فديك، عن سليمان بن داود، عن أبيه، عن جعفر بن محمد، بالإسناد نفسه، فيما سيأتي برقم (4365).ثم إنَّ له علةً أخرى، وهي الاختلاف في وصله وإرساله، فرواه سليمان بن داود كما هنا، أو أبوه كما ذكرنا عن جعفر بن محمد عن أبيه عن أبيه عن أبيه الحسين بن علي: أنَّ فاطمة، هكذا موصولًا، وخالفه ابن عيينة فيما أخرجه عنه عبد الرزاق (6713) عن جعفر بن محمد عن أبيه قال: كانت فاطمة … إلى آخره.وأخرجه ابن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 132 من طريق سعيد بن طريف، عن أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين: أنَّ فاطمة …لذلك أعله البيهقي بالانقطاع حينما أخرجه في "السنن الكبرى" 4/ 78 عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده سواء. وقال البيهقي بإثره: وقد قيل عنه، عن سليمان بن داود، عن أبيه، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، دون ذكر علي بن الحسين عن أبيه فيه، وهو منقطع. وقال الذهبي في "التلخيص" متعقبًا الحاكم: هذا منكر جدًّا، وسليمان ضُعِّف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1412)


1412 - حدثنا أبو حُمَيد أحمد بن محمد بن حامد العَدْل بالطَّابَران، حدثنا تَمِيم بن محمد، حدثنا أبو مُصعَب الزُّهري، حدثني محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك، أخبرني سليمان بن داود، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن أبيه: أنَّ فاطمة بنت النبي صلى الله عليه وسلم كانت تَزورُ قبرَ عمِّها حمزةَ كلَّ جُمعةٍ، فتصلِّي وتبكي عنده [1]. هذا الحديث رواتُه كلُّهم ثقات.وقد استَقصَيتُ في الحثِّ على زيارة القُبور تحرِّيًا للمشاركة في الترغيب، ولِيعلَمَ الشَّحيحُ بدِينِه أنها سُنةٌ مسنونة. وصلى الله على محمدٍ وآله أجمعين.




হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রতি জুমু'আয় তার চাচা হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কবর যিয়ারত করতেন। অতঃপর তিনি সেখানে সালাত আদায় করতেন এবং কাঁদতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، سليمان بن داود: هو ابن قيس الفرّاء، ذكره الذهبي في "الميزان" ونقل عن الأزدي قوله: تُكلِّم فيه. وقد اختلف في هذا الإسناد على ابن أبي فديك؛ فرواه أبو مصعب الزهري هنا عنه عن سليمان بن داود عن جعفر بن محمد بإسناده إلى الحسين بن علي بن أبي طالب، وخالفه علي بن شعيب - وهو ثقة - فرواه عن ابن أبي فديك، عن سليمان بن داود، عن أبيه، عن جعفر بن محمد، بالإسناد نفسه، فيما سيأتي برقم (4365).ثم إنَّ له علةً أخرى، وهي الاختلاف في وصله وإرساله، فرواه سليمان بن داود كما هنا، أو أبوه كما ذكرنا عن جعفر بن محمد عن أبيه عن أبيه عن أبيه الحسين بن علي: أنَّ فاطمة، هكذا موصولًا، وخالفه ابن عيينة فيما أخرجه عنه عبد الرزاق (6713) عن جعفر بن محمد عن أبيه قال: كانت فاطمة … إلى آخره.وأخرجه ابن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 132 من طريق سعيد بن طريف، عن أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين: أنَّ فاطمة …لذلك أعله البيهقي بالانقطاع حينما أخرجه في "السنن الكبرى" 4/ 78 عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده سواء. وقال البيهقي بإثره: وقد قيل عنه، عن سليمان بن داود، عن أبيه، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، دون ذكر علي بن الحسين عن أبيه فيه، وهو منقطع. وقال الذهبي في "التلخيص" متعقبًا الحاكم: هذا منكر جدًّا، وسليمان ضُعِّف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1413)


1413 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسن بن سلَّام، حدثنا يونس بن محمد، حدثنا حَرْب بن ميمون، عن النَّضْر بن أنس، عن أنسٍ، قال: كنتُ قاعدًا مع النبي صلى الله عليه وسلم فمُرَّت بجنازةٍ [1] فقال: "ما هذه الجنازةُ؟ " قالوا: جنازةُ فلانٍ الفُلاني، كان يحبُّ اللهَ ورسولَه، ويَعمَلُ بطاعة الله، ويَسعَى فيها، فقال: "وَجَبَتْ وَجَبَتْ وَجَبَتْ"، ومرَّت بجنازةٍ أخرى، فقال: "ما هذه الجنازةُ؟ " قالوا: جنازةُ فلانٍ الفُلاني، كان يُبغِضُ اللهَ ورسولَه، ويَعملُ بمعصيةِ الله، ويسعى فيها، فقال: "وَجَبَتْ وَجَبَتْ وَجَبَتْ"، قالوا: يا رسولَ الله، قولك في الجنازة والثناءِ عليها، أُثنيَ على الأَوّل خيرٌ وعلى الآخَرِ شَرٌّ، فقلتَ فيها: "وَجَبَتْ وَجَبَتْ وَجَبَتْ"! فقال: "نعم يا أبا بكر، إنَّ للهِ ملائكةً تَنطِقُ على أَلسنةِ بني آدمَ بما في المرءِ من الخيرِ والشَّر" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বসা ছিলাম। তখন একটি জানাযা অতিক্রম করল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এটা কার জানাযা?" তারা বলল: এটা অমুক ব্যক্তির জানাযা। সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসত, আল্লাহর আনুগত্য করত এবং তাতে সচেষ্ট ছিল। তখন তিনি বললেন: "অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল!" এরপর অন্য একটি জানাযা অতিক্রম করল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এটা কার জানাযা?" তারা বলল: এটা অমুক ব্যক্তির জানাযা। সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ঘৃণা করত, আল্লাহর অবাধ্য কাজ করত এবং তাতে সচেষ্ট ছিল। তখন তিনি বললেন: "অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল!" তারা জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহর রাসূল! উভয় জানাযা সম্পর্কে আপনার মন্তব্য কী? প্রথমটির প্রশংসা করা হলো এবং দ্বিতীয়টির নিন্দা করা হলো, অথচ আপনি উভয়টি সম্পর্কেই বললেন: "অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল! অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল!" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, হে আবু বকর! নিশ্চয়ই আল্লাহর এমন ফেরেশতাগণ রয়েছেন, যারা মানুষের মধ্যে বিদ্যমান ভালো-মন্দ অনুযায়ী মানবজাতির জিহ্বা দিয়ে কথা বলিয়ে দেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في (ز) و (ب) هنا، وفي الموضع الثاني ومرَّت بجنازة أخرى، وقد نصَّ البيهقي في "شعب الإيمان" على أنَّ هذه هي رواية الحاكم، ووقع في (ص) و (ع): فمُرَّ بجنازة، ومُرَّ بجنازة أخرى، ووقع عند البيهقي من غير طريق الحاكم: فمَرَّت جنازةٌ، ومَرَّت جنازة أخرى.



[2] إسناده صحيح إن شاء الله، حرب بن ميمون - وهو الأكبر الأنصاري أبو الخطاب - أخرج له مسلم متابعة، ووثقه علي بن المديني وعمرو بن علي الفلاس والخطيب، وقال ابن معين: صالح، وقال الساجي: صدوق، وليّنه أبو زرعة، وباقي رجاله ثقات. يونس بن محمد: هو المؤدِّب.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (8876) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (7308)، وابن أبي شريح الأنصاري في "جزء بِيبَى" (109)، والبيهقي في "الشعب" (8876)، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 7/ (2697) و (2698) من طرق عن يونس بن محمد المؤدب، به.وللحديث أوجه أخرى عن أنس بعضها في "الصحيحين" دون قوله: "إنَّ لله ملائكة … " إلى آخره.فقد أخرج أحمد 20/ (12938) و 21/ (13996)، والبخاري (1367)، ومسلم (949) (60)، والنسائي (2070)، وابن حبان (3023) و (3027) من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس قال: مَرُّوا بجنازة فأثنوا عليها خيرًا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "وجبت"، ثم مرُّوا بأخرى فأثنوا عليها شرًا، فقال: وجبت، فقال عمر بن الخطاب: ما وجبت؟ قال: "هذا أثنيتم عليه خيرًا فوجبت له الجنة، وهو أثنيتم عليه شرًا فوجبت له النار، أنتم شهداء الله في الأرض". هذا لفظ البخاري، ووقع عند مسلم وغيره: "وجبت وجبت وجبت" كررها ثلاثًا، كرواية النضر بن أنس.وأخرجه بنحو رواية عبد العزيز: أحمد 20/ (12939) و 21/ (13572)، والبخاري (2642) ومسلم (949)، وابن ماجه (1491)، وابن حبان (3025) من طريق ثابت بن أسلم، وأحمد 20/ (12837)، والترمذي (1058) من طريق حميد الطويل، كلاهما عن أنس.وفي الباب عن أبي هريرة عند أحمد 12/ (7552) و 16/ (10013)، وأبي داود (3233)، وابن ماجه (1492)، والنسائي (2071)، وابن حبان (3024).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1414)


1414 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا إبراهيم بن إسماعيل العَنْبَري وتَمِيم بن محمد، قالا: حدثنا محمد بن أَسلَم العابد، حدثنا مُؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما من مسلمٍ يموتُ، فيَشهدُ له أربعةٌ من أهل أبياتِ جيرانِه الأَدْنَينَ: أنهم لا يَعلَمون منه إلّا خيرًا، إلا قال الله تبارك وتعالى: قد قَبِلتُ قولَكم - أو قال: شَهادتَكم - وغفرتُ له ما لا تعلمون" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "এমন কোনো মুসলিম নেই যে মারা যায়, আর তার নিকটতম প্রতিবেশীদের বাড়ির চারজন লোক তার পক্ষে এই মর্মে সাক্ষ্য দেয় যে, তারা তার মধ্যে ভালো ছাড়া আর কিছুই দেখেনি (জানে না), তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বলেন: আমি তোমাদের কথা—অথবা তিনি বলেছেন: তোমাদের সাক্ষ্য—কবুল করে নিলাম এবং তাকে ক্ষমা করে দিলাম যা তোমরা জানো না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، فالحديث بهذه السياقة غير محفوظ، تفرد به مؤمل بن إسماعيل، وهو سيئ الحفظ، وخالف الثقات من أصحاب حماد بن سلمة الذين رووه عنه بغير هذا اللفظ، كما سيأتي. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9121) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 21/ (13541)، وابن حبان (3026) من طريق عن مؤمل بن إسماعيل، به.والمحفوظ من حديث حماد بن سلمة ما رواه عفان بن مسلم عند أحمد 21/ (13572)، وأبو الوليد الطيالسي عند عبد بن حميد (1357)، وهدبة بن خالد عند أبي يعلى (3353)، عنه، عن ثابت، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرت عليه جنازة، فأثنوا عليها خيرًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وجبت"، ثم مُرَّ عليه بجنازة أخرى، فأثنوا عليها شرًّا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وجبت"، ثم قال: "أنتم شهداء الله في الأرض".وتابع حمادَ بنَ سلمة على اللفظ المحفوظ حمادُ بنُ زيد عند أحمد 20/ (12939)، والبخاري (2642)، ومسلم (949)، وابن ماجه (1491)، وابن حبان (3025)، وجعفرُ بنُ سليمان عند مسلم (949)، ومعمرٌ عند أحمد 20/ (13039)، وسليمانُ بنُ المغيرة عنده أيضًا (13203)، فرووه عن ثابت عن أنس، بنحوه.ولحديث مؤمل شاهد من حديث أبي هريرة من طريق شيخ من أهل البصرة عنه، عند أحمد 14/ (8989)، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الراوي عن أبي هريرة.وفي الباب عن عمر بن الخطاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيما مسلم شهد له أربعة بخير، أدخله الله الجنة" فقلنا: وثلاثة؟ قال: "وثلاثة"، فقلنا: واثنان؟ قال: "واثنان"، ثم لم نسأله عن الواحد. أخرجه أحمد 1/ (139) و (318)، والبخاري (1368)، والنسائي (2072)، وابن حبان (3028). وليس في هذا الشاهد عبارة "جيرانه الأدنين".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1415)


1415 - أخبرنا أبو العباس قاسم بن قاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا محمد بن موسى بن حاتم، حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، أخبرنا الحسين بن واقد، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرةَ، قال: جاء رجلٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، دُلَّني على عملٍ إذا أنا عَمِلتُ به أُدخِلتُ الجنةَ، قال: "كُنْ مُحسِنًا"، قال: كيف أَعلمُ أنِّي مُحسِنٌ؟ قال: "سَلْ جِيرانَكَ، فإن قالوا: إنك مُحسِن، فأنت مُحسِنٌ، وإن قالوا: إنك مُسيءٌ، فأنت مُسيء" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে এমন একটি কাজের সন্ধান দিন, যা আমি করলে জান্নাতে প্রবেশ করতে পারব। তিনি বললেন: "তুমি 'মুহসিন' (সৎকর্মশীল) হও।" সে বলল: আমি কীভাবে জানব যে আমি মুহসিন? তিনি বললেন: "তোমার প্রতিবেশীদেরকে জিজ্ঞাসা করো। যদি তারা বলে যে তুমি সৎকর্মশীল (মুহসিন), তবে তুমি সৎকর্মশীল। আর যদি তারা বলে যে তুমি মন্দ কর্মশীল (মুসি), তবে তুমি মন্দ কর্মশীল।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن موسى بن حاتم، والحسين بن واقد قوي الحديث، وقد توبعا. الأعمش: هو سليمان بن مهران، وهو أصغر من الحسين بن واقد، فرواية الحسين عنه من رواية الأكابر عن الأصاغر. وأبو صالح: هو ذكوان بن عبد الله السمان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (7925) و (9120) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وزاد في الموضع الأول في أوله: جاء رجل إلى نبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا نبي الله، دلني على عمل إذا عملته دخلت الجنة، ولا تكثر عليَّ، قال: "لا تغضب". وهذه الزيادة أخرجها البخاري مفردةً برقم (6116) من طريق أبي حَصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة.وأخرجه النسائي في "جزء من إملائه" (16)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (871) من طريقين عن علي بن الحسن بن شقيق، به. وزادا في أوله الزيادة المشار إليها آنفًا.أما متابعة الحسين بن واقد، فقد أخرجها الدارقطني في "العلل" (1907) من طريق أبي حمزة السكري - وهو ثقة - عن سليمان الأعمش، به. وزاد في أوله أيضًا الزيادة المذكورة. قال الدارقطني: وهذه الألفاظ لم يأت بها غيرهما - يعني الحسين بن واقد وأبا حمزة السكري - ثم قال: وهذه الألفاظ إنما رواها الأعمش، عن جامع بن شداد، عن كلثوم الخزاعي، عن النبي صلى الله عليه وسلم. انتهى، يعني مرسلًا.وحديث كلثوم الخزاعي المرسل أخرجه ابن ماجه (4222) من طريق أبي معاوية الضرير، عن الأعمش، عن جامع بن شداد، عن كلثوم الخزاعي. ولا نعتقد أنَّ ذلك يُعِلُّ حديث أبي هريرة، سيما وإنَّ الأعمش مكثر، فلا يمنع أن يكون له فيه طريقان، والله أعلم.ويشهد له حديث عبد الله بن مسعود، عند أحمد 6/ (3808)، وابن ماجه (4223)، وابن حبان (525) و (526)، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1416)


1416 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن بن أحمد بن محمد بن عُبيدٍ الأَسَدي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن دِيزِيل، حدثنا آدَم بن أبي إياس، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، حدثنا ثابتٌ البُناني، عن أنس بن مالكٍ قال: قيل: يا رسول الله، مَن أهلُ الجنة؟ قال: "مَن لا يَموتُ حتى تُملأَ أُذُناه مما يُحِبّ"، قيل: مَنْ أهلُ النار يا رسول الله؟ قال: "مَن لا يموتُ حتى تُملأَ أُذُناه مما يَكْره" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! জান্নাতের অধিবাসী কারা? তিনি বললেন: "সে ব্যক্তি, যার উভয় কান তার প্রিয় কথা দ্বারা পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত সে মৃত্যুবরণ করে না।" জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! জাহান্নামের অধিবাসী কারা? তিনি বললেন: "সে ব্যক্তি, যার উভয় কান তার অপছন্দনীয় কথা দ্বারা পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত সে মৃত্যুবরণ করে না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه لِين من أجل عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف - وهو القاضي - وباقي رجاله ثقات، وقد اختلف فيه على حماد بن سلمة، فرواه آدم بن أبي إياس - كما هنا - عنه عن ثابت بن أسلم البُناني عن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم، وخالفه غيره - كما سيأتي - فرووه عن حماد عن ثابت عن أبي الصِّدِّيق الناجي مرسلًا، وصحَّح إرساله أبو حاتم وأبو زرعة الرّازيّان.ورواه سليمان بن المغيرة عن ثابت، واختلف عليه فيه، فرواه أبو ظفر عبد السلام بن مطهّر وعلي بن عبد الحميد عنه عن ثابت عن أنس رفعه، وخالفهما عبد الله بن المبارك فرواه عن سليمان بن المغيرة عن ثابت مرسلًا.وتابع سليمانَ بنَ المغيرة على وصله يوسفُ بنُ عطية الصَّفّار، لكنه متروك.وإليك تفصيل ذلك:فقد أخرجه البيهقي في "الزهد" (815) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 5/ (1646) و (1647) من طريقين عن عبيد الله بن آدم، به.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 93، و"الأوسط" (1269)، والبزار (6940)، والضياء (1722) من طريق أبي ظفر عبد السلام بن مطهّر، والضياء (1721) من طريق علي بن عبد الحميد، كلاهما عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس مرفوعًا.وخالفهما عبد الله بن المبارك، فأخرجه في "الزهد" برواية نعيم بن حماد (214) عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت قال: قيل: يا رسول الله … فذكره مرسلًا. قال أبو زرعة - كما في "العلل" لابن أبي حاتم 5/ 571 - : والوهم من أبي ظفر. انتهى، لكن يعكّر عليه متابعة علي بن عبد الحميد له المذكورة في "المختارة".وقال أبو زرعة وأبو حاتم - كما في "العلل" أيضًا -: هذا عندنا خطأ، رواه حماد بن سلمة عن ثابت عن أبي الصديق الناجي عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، وهو الصحيح. ومرسل أبي الصديق هذا أخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 93، وفي "الأوسط" (1270) عن أبي سلمة موسى بن إسماعيل التبوذكي، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (3354) عن علي بن الجعد، كلاهما عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أبي الصديق الناجي، عن النبي صلى الله عليه وسلم. ووقع تسمية شيخ البخاري في "التاريخ الكبير": سليمان، بدلًا من موسى، وهو تحريف، والله أعلم.وأخرج نحوه، وزاد فيه: الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1174) و (1433)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (6544) من طريق يوسف بن عطية، عن ثابت، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه: "من المؤمن؟ " قالوا: الله ورسوله أعلم … فذكر حديثًا مطولًا. ويوسف بن عطية هذا متروك، قال البيهقي: تفرد به يوسف بن عطية الصفار عن ثابت، وروايته عنه أكثرها مناكير لا يتابع عليه، والله تعالى أعلم.وله شاهد من حديث ابن عباس عند ابن ماجه (4224)، وإسناده حسن إن شاء الله.وآخر من حديث أبي زهير الثقفي عند أحمد 24/ (15439)، وابن ماجه (4221)، وابن حبان (7384)، وإسناده محتمل للتحسين.ويشهد لمعناه حديث أبي ذر عند أحمد 35/ (21380)، ومسلم (2642).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1417)


1417 - أخبرني أبو الحسن أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا أصْبَغ بن الفَرَج المِصري، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أنَّ خارجة بن زيد أخبره، أنَّ أُمَّ العلاء - امرأةً من الأنصار قد بايَعَتْ رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبرته: أنهم اقتَسَموا المهاجرين [1] قُرْعةً، فطارَ لنا عثمانُ بن مَظعُون، فأنزلْناه في أبياتنا، فوَجِعَ وَجَعَه الذي مات فيه، فلما تُوفِّي غُسِّل وكُفِّن في أثوابه، دَخَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا عثمانُ بنَ مظعونٍ، رحمةُ الله عليكَ أبا السائب، فشهادتي عليك لقد أكرَمَكَ الله، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "وما يُدريكِ أنَّ الله أكرَمَه؟ " فقالت: بأبي أنتَ وأمي يا رسول الله، فمَنْ؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أمّا هو فقد جاءَه اليقينُ، فوالله إنِّي لأرجو له الخير، واللهِ ما أَدري وأنا رسولُ الله ماذا يُفعَلُ بي" قالت: فواللهِ ما أُزكِّي بعدَه أحدًا أبدًا [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!.




উম্মুল 'আলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আনসার গোত্রের একজন মহিলা, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইআত করেছিলেন, তিনি তাঁকে (খারিজা ইবনু যায়দকে) জানান যে, তাঁরা (আনসারগণ) মুহাজিরদেরকে লটারির মাধ্যমে ভাগ করে নিয়েছিলেন। তাতে আমাদের ভাগে উসমান ইবনু মায‘ঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসেন। তাই আমরা তাকে আমাদের বাড়িতে আশ্রয় দেই। অতঃপর তিনি সেই রোগে আক্রান্ত হন, যে রোগে তিনি মারা যান। যখন তিনি মারা গেলেন, তখন তাঁকে গোসল দেওয়া হলো এবং তাঁর কাপড়েই কাফন পরানো হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তাঁর ঘরে) প্রবেশ করলেন। আমি (উম্মুল 'আলা) বললাম, হে উসমান ইবনু মায‘ঊন, আপনার প্রতি আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক! হে আবুল সা'য়িব! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ আপনাকে অবশ্যই সম্মানিত করেছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কীভাবে জানলে যে আল্লাহ তাকে সম্মানিত করেছেন?" আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোক! (যদি তিনি সম্মানিত না হন) তাহলে আর কে হবেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাঁর ব্যাপারে, তাঁর কাছে তো নিশ্চিত (মৃত্যু) এসে গেছে। আল্লাহর কসম! আমি তাঁর জন্য কল্যাণ আশা করি। আল্লাহর কসম! আমি আল্লাহর রাসূল হওয়া সত্ত্বেও জানি না যে, আমার সাথে কী করা হবে।" তিনি (উম্মুল 'আলা) বললেন, আল্লাহর কসম! এরপর আমি আর কখনো কারো পবিত্রতার দাবি করি না (অর্থাৎ কারো জন্য জান্নাতের নিশ্চিত সাক্ষ্য দেই না)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: للمهاجرين، والمثبت من مصادر التخريج، وهو أوجه.



[2] إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي، وابن شهاب: هو محمد بن مسلم الزهري. وأخرجه أحمد 45/ (27457)، والبخاري (1243) و (2687) و (3929) و (7003) و (7004) من طرق عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وسيأتي من طريق معمر عن الزهري برقم (3738).وأخرج أحمد 45/ (27459) من طريق سالم أبي النضر، عن خارجة بن زيد، عن أمه قالت: إنَّ عثمان بن مظعون لما قبض، قالت أم خارجة بنت زيد: طبت أبا السائب، فذكره بنحوه. وقد رجَّح الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 8/ 439 أن تكون أمه هي نفسها أم العلاء الأنصارية المذكورة في رواية الزهري عن خارجة، وقال: فلا يلزم من كونه أَبهمها في رواية الزهري أن تكون أخرى، فقد يبهم الإنسان نفسه فضلًا عن أمه.وفي الباب عن ابن عباس سيأتي عند المصنف برقم (4930). وأخرجه أحمد 42/ (25648) عن عبد الرزاق الصنعاني، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق عروة بن الزبير عن عائشة برقم (2007).وفي الباب عن أبي هريرة، سلف برقم (1024).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1418)


1418 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد الصَّنعاني، أخبرنا عبد الرزاق.وحدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني إملاءً، حدثنا أحمد بن نَجْدةَ القُرَشي، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني ابن طاووس، عن أبيه: أنه كان يقول بعد التشهد كلماتٍ كان يُعظِّمهنَّ جدًّا، قلت: في الثَّنتين كلاهما؟ قال: بل في المثنَّى الآخِر بعد التشهد، قلت: ما هو؟ قال: "أعوذُ بالله من عذاب جهنم، وأعوذُ بالله من شَرِّ المسيح الدَّجّال، وأعوذُ بالله من عذاب القبر، وأعوذُ بالله من فتنة المَحْيا والمَمات"، قال: وكان يُعظِّمهنّ.قال ابن جريج: أخبَرَنيهِ عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، في التعوُّذ من عذاب القبر، ولم يُخرجاه.وقد أمليتُ ما صحَّ على شرطهما في هذا الباب ممّا لم يُخرجاه في كتاب الإيمان، ولم أُمْلِ هذا الحديث.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাশাহহুদের পর কিছু বাক্য বলতেন এবং সেগুলোকে তিনি অত্যন্ত গুরুত্ব দিতেন। [তাঁকে (তাউসের পিতাকে) জিজ্ঞেস করা হলো: এই বাক্যগুলো কি উভয় দু’রাকাতে (তাশাহহুদের) পরেই বলতে হবে? তিনি বললেন: না, বরং কেবল শেষ দু’রাকাতে তাশাহহুদের পরে।] সেই বাক্যগুলো হলো: "আ‘ঊযু বিল্লাহি মিন ‘আযাবি জাহান্নাম, ওয়া আ‘ঊযু বিল্লাহি মিন শার্রিল মাসীহিদ্ দাজ্জাল, ওয়া আ‘ঊযু বিল্লাহি মিন ‘আযাবিল ক্বাবর, ওয়া আ‘ঊযু বিল্লাহি মিন ফিতনাতিল মাহ্‌ইয়া ওয়াল মামাত।" (অর্থাৎ: আমি আল্লাহর নিকট জাহান্নামের শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই, আমি আল্লাহর নিকট মাসীহ দাজ্জালের অনিষ্টতা থেকে আশ্রয় চাই, আমি আল্লাহর নিকট কবরের শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই এবং আমি আল্লাহর নিকট জীবন ও মরণের ফিতনা থেকে আশ্রয় চাই।)




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - قد صرَّح بالتحديث من عبد الله بن طاووس هنا، ولذا يُستدرَك على ابن معين في قوله - الذي نقله عنه ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 1/ 245 - : لم يسمع ابن جريج من ابن طاووس إلّا حديثًا في مُحْرمٍ أصاب ذرّاتٍ قال: فيها قبضات من طعام. وأخرجه أحمد 42/ (25648) عن عبد الرزاق الصنعاني، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق عروة بن الزبير عن عائشة برقم (2007).وفي الباب عن أبي هريرة، سلف برقم (1024).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1419)


1419 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا محمد بن عمرو بن عَلْقَمة، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرةَ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ المَيِّتَ يَسمَعُ خَفْقَ نِعَالِهِم إِذا وَلَّوْا مُدبِرِين، فإِن كان مؤمنًا كانت الصلاةُ عند رأسِه، وكان الصَّومُ عن يَمينِه، وكانت الزكاةُ عن يَسارِه، وكان فعلُ الخيرات من الصَّدقة والصَّلاة والصِّلة والمعروفِ والإحسانِ إلى الناس عند رِجلَيه، فيُؤتَى من قِبَلِ رأسِه، فتقول الصلاة: ما قِبَلي مَدخَلٌ، ويُؤتَى مِن عن يمينِه، فيقول الصوم: ما قِبلَي مَدخَل، ويُؤتَى مِن عن يساره، فتقول الزكاة: ما قِبَلي مَدخَل، ويُؤتَى مِن قبل رِجلَيه، فيقول فِعْلُ الخيرات من الصَّدقة والمعروف والصِّلة والإحسانِ إلى الناس: ما قِبَلي مَدخَل.فيقالُ له: اقعُدْ، فيَقعُد، وتُمثَّلُ له الشمسُ وقد دَنَتْ للغُروب، فيقال له: ما تقولُ في هذا الرَّجل الذي كان فيكم وما تَشهدُ به؟ فيقول: دَعُوني أُصلِّي، فيقولون: إنك ستَفعَل، ولكن أخبِرنا عمَّا نسألُك عنه، قال: وعمَّ تسأَلوني؟ فيقولون: أخبِرنا عمَّا نَسألُك عنه، فيقول: دَعُوني أُصلِّي، فيقولون: إنك ستَفعَل، ولكن أخبِرنا عمَّا نَسألُك عنه، قال: وعمَّ تسألوني؟ فيقولون: أخبِرنا ما تقولُ في هذا الرَّجل الذي كان فيكم، وما تَشهدُ به عليه؟ فيقول: أمحمدًا؟ أشهدُ أنه عبدُ الله، وأنه جاء بالحقِّ من عند الله، فيقالُ له: على ذلك حَيِيتَ، وعلى ذلك مِتَّ، وعلى ذلك تُبعَثُ إن شاء الله، ثم يُفتَح له بابٌ من قِبَل النار، فيُقال له: انظُرْ إلى منزلِكَ وإلى ما أعَدَّ الله لكَ لو عَصَيْتَ، فيزدادُ غِبْطةً وسرورًا، ثم يُفتَحُ له بابٌ من قِبَل الجنة، فيقال له: انظُرْ إلى منزلِكَ، وإلى ما أعَدَّ الله لك، فيزدادُ غِبْطةً وسرورًا، وذلك قولُ الله تبارك وتعالى: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ} [إبراهيم: 27] ".قال: وقال أبو الحَكَم، عن أبي هريرة [1]: "فيُقالُ: له ارقُدْ رِقْدةَ العَروس الذي لا يُوقِظُه إلا أَعزُّ أهلِه إليه، أو أَحبُّ أهلِه إليه".ثم رَجَعَ إلى حديث أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، قال: "وإن كان كافرًا أُتِي مِن قِبَل رأسِه، فلا يُوجدُ شيءٌ، ويُؤتَى عن يَمينِه، فلا يُوجدُ شيءٌ، ثم يُؤتَى عن يَسارِه، فلا يُوجدُ شيءٌ، ثم يُؤتَى مِن قِبل رِجلَيه، فلا يُوجدُ شيءٌ، فيقالُ له: اقعُدْ، فيَقعُدُ خائفًا مَرعوبًا، فيقال له: ما تقول في هذا الرَّجل الذي كان فيكم، وماذا تَشهدُ به عليه؟ فيقول: أَيُّ رجل؟ فيقولون: الرَّجل الذي كان فيكم، قال: فلا يَهتدِي له، قال: فيقولون: محمدٌ، فيقول: سمعتُ الناسَ قالوا فقلتُ كما قالوا، فيقولون: على ذلك حَيِيتَ، وعلى ذلك مِتَّ، وعلى ذلك تُبعَثُ إن شاء الله، ثم يُفتَح له بابٌ من قِبَل الجنة، فيقال له: انظُرْ إلى مَنزِلِك، وإلى ما أعدَّ الله لك لو كنتَ أطعتَه، فيزدادُ حسرةً وثُبورًا، قال: ثم يُضيَّقُ عليه قبرُه حتى تختلفَ أضلاعُه، قال: وذلك قولُه تبارك وتعالى: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى} [طه: 124] " [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মৃত ব্যক্তি তার সঙ্গীরা যখন পিঠ ফিরিয়ে চলে যায়, তখন তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায়। যদি সে মু'মিন হয়, তবে সালাত তার মাথার কাছে অবস্থান করে, সিয়াম (রোযা) তার ডানপাশে অবস্থান করে, যাকাত তার বামপাশে অবস্থান করে এবং সাদাকা, সালাত, আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখা, সৎ কাজ এবং মানুষের প্রতি ইহসান (দয়া) সহ সকল ভালো কাজ তার পায়ের কাছে অবস্থান করে।

এরপর তার মাথার দিক থেকে (আযাবের জন্য) আসা হয়, তখন সালাত বলে: 'আমার দিক দিয়ে প্রবেশের সুযোগ নেই।' তারপর তার ডান দিক থেকে আসা হয়, তখন সিয়াম বলে: 'আমার দিক দিয়ে প্রবেশের সুযোগ নেই।' তারপর তার বাম দিক থেকে আসা হয়, তখন যাকাত বলে: 'আমার দিক দিয়ে প্রবেশের সুযোগ নেই।' এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়, তখন সাদাকা, সৎ কাজ, আত্মীয়তার সম্পর্ক এবং মানুষের প্রতি ইহসানসহ সকল ভালো কাজ বলে: 'আমার দিক দিয়ে প্রবেশের সুযোগ নেই।'

তখন তাকে বলা হয়: 'বসো।' সে বসে পড়ে। আর তার সামনে পশ্চিমাকাশে অস্ত যাওয়ার নিকটবর্তী সূর্যকে মূর্ত করা হয়। তাকে জিজ্ঞেস করা হয়: 'তোমাদের মধ্যে যে লোকটি ছিল, তার সম্পর্কে তুমি কী বলতে এবং কী সাক্ষ্য দিতে?' সে বলে: 'আমাকে নামায পড়তে দিন।' তারা বলে: 'তুমি অবশ্যই নামায পড়বে, তবে আমরা যা জিজ্ঞেস করছি সে সম্পর্কে আগে আমাদের খবর দাও।' সে বলে: 'আপনারা আমার কাছে কী জানতে চান?' তারা বলে: 'আমরা যা জানতে চাই সে সম্পর্কে আমাদের খবর দিন।' সে বলে: 'আমাকে নামায পড়তে দিন।' তারা বলে: 'তুমি অবশ্যই নামায পড়বে, তবে আমরা যা জিজ্ঞেস করছি সে সম্পর্কে আগে আমাদের খবর দাও।' সে বলে: 'আপনারা আমার কাছে কী জানতে চান?' তারা বলে: 'আমরা যা জানতে চাই সে সম্পর্কে আমাদের খবর দিন। তোমাদের মধ্যে যে লোকটি ছিল, তার সম্পর্কে তুমি কী বলতে এবং তার উপর কী সাক্ষ্য দিতে?'

সে বলে: 'মুহাম্মাদকে? আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে তিনি আল্লাহর বান্দা এবং তিনি আল্লাহর পক্ষ থেকে সত্য নিয়ে এসেছেন।' তখন তাকে বলা হয়: 'এই বিশ্বাসের উপরই তুমি জীবিত ছিলে, এই বিশ্বাসের উপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে, আর ইনশাআল্লাহ এই বিশ্বাসের উপরই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।' এরপর তার জন্য জাহান্নামের দিক থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: 'তুমি যদি অবাধ্য হতে, তবে আল্লাহ তোমার জন্য যা প্রস্তুত করে রেখেছিলেন, এটি সেই ঠিকানা। এটি দেখো।' তখন তার আনন্দ ও খুশি আরও বেড়ে যায়। এরপর তার জন্য জান্নাতের দিক থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: 'তোমার ঠিকানা এবং আল্লাহ তোমার জন্য যা প্রস্তুত করে রেখেছেন তা দেখো।' তখন তার আনন্দ ও খুশি আরও বেড়ে যায়। আর এ সম্পর্কেই আল্লাহ্ তা'আলার বাণী: “যারা ঈমান এনেছে, আল্লাহ তাদেরকে দুনিয়ার জীবন ও আখিরাতে সুদৃঢ় বাক্যের উপর প্রতিষ্ঠিত রাখবেন। আর আল্লাহ জালিমদেরকে পথভ্রষ্ট করবেন এবং আল্লাহ যা চান তা-ই করেন।” [সূরা ইবরাহীম: ২৭]

বর্ণনাকারী বলেন, আবূ হাকাম, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তাকে বলা হয়: 'নববধূর ঘুমের মতো ঘুমিয়ে পড়ো, যাকে তার পরিবারের সবচেয়ে প্রিয়জন ছাড়া কেউ জাগাবে না।'

এরপর আবূ সালামা কর্তৃক আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসের দিকে ফিরে এসে তিনি বলেন: 'আর যদি সে কাফির হয়, তবে তার মাথার দিক থেকে আসা হয়, সেখানে কিছুই পাওয়া যায় না। তার ডান দিক থেকে আসা হয়, সেখানে কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার বাম দিক থেকে আসা হয়, সেখানে কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়, সেখানে কিছুই পাওয়া যায় না। তখন তাকে বলা হয়: 'বসো।' সে ভীত ও আতঙ্কিত হয়ে বসে পড়ে। তাকে জিজ্ঞেস করা হয়: 'তোমাদের মধ্যে যে লোকটি ছিল, তার সম্পর্কে তুমি কী বলবে এবং কী সাক্ষ্য দেবে?'

সে বলে: 'কোন লোকটি?' তারা বলে: 'তোমাদের মধ্যে যে লোকটি ছিল।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে লোকটিকে চিনতে পারে না। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তারা বলে: 'মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।' সে বলে: 'আমি লোকদেরকে বলতে শুনেছি, তাই আমিও তাদের মতো বলেছি।' তখন তাকে বলা হয়: 'এই অবস্থায়ই তুমি জীবিত ছিলে, এই অবস্থায়ই তোমার মৃত্যু হয়েছে, আর ইনশাআল্লাহ এই অবস্থাতেই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।' এরপর তার জন্য জান্নাতের দিক থেকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: 'এটিই তোমার ঠিকানা এবং আল্লাহ তোমার জন্য যা প্রস্তুত করে রেখেছিলেন, যদি তুমি তাঁর আনুগত্য করতে। এটি দেখো।' তখন তার হতাশা ও বিনাশ আকাঙ্ক্ষা আরও বেড়ে যায়। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তার কবরকে এমনভাবে সংকীর্ণ করে দেওয়া হয় যে তার পাঁজরগুলো স্থানচ্যুত হয়ে যায়। বর্ণনাকারী বলেন: এটিই আল্লাহ্ তা'আলার বাণী: 'নিশ্চয়ই তার জন্য থাকবে সংকীর্ণ জীবন এবং আমি তাকে কিয়ামতের দিন অন্ধ করে উঠাবো।' [সূরা ত্বাহা: ১২৪]"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] القائل هو محمد بن عمرو بن علقمة، وهو موصول بالإسناد الذي قبله. وتكنية الراوي هنا بأبي الحكم، يغلب على ظني أنه وهم من أحد الرواة، أو خطأ من النساخ، صوابه: عمر بن الحكم، وهو ابن ثوبان، كنيته: أبو حفص، كما جاء مصرحًا باسمه في مصادر التخريج كـ "مصنف ابن أبي شيبة" 3/ 384، و"حديث هشام بن عمار" (6)، و"تهذيب الآثار" للطبري 2/ (728)، و"الاعتقاد" ص 220، و"إثبات عذاب القبر" (67) كلاهما للبيهقي، والله أعلم. وأخرجه مرفوعًا ابن حبان (3113) من طريق معتمر بن سليمان، عن محمد بن عمرو بن علقمة، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1071)، وابن حبان (3117) من طريق سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، مرفوعًا. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرجه مختصرًا بقصة سماع الميت قرع النعال: أحمد 15/ (9742)، وابن حبان (3118) من طريق إسماعيل بن عبد الرحمن السُّدي، عن أبيه، عن أبي هريرة. وهذا إسناد ضعيف لجهالة والد السدي، واسمه: عبد الرحمن بن أبي كريمة.وانظر ما بعده.وفي الباب عن أنس بن مالك عند البخاري (1338) و (1374)، ومسلم (2870)، وغيرهما.وعن جابر بن عبد الله عند ابن ماجه (4272)، وابن حبان (3116)، وإسناده حسن.وعن البراء بن عازب، سلف عند المصنف برقم (107)، وإسناده صحيح.



[2] صحيح لغيره، محمد بن عمرو بن علقمة - وهو الليثي - صدوق له أوهام، كما قال الحافظ ابن حجر في "التقريب"، وقد اختلف عليه هنا في رفعه ووقفه، انظر "العلل" للدارقطني (1772). أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن. وأخرجه مرفوعًا ابن حبان (3113) من طريق معتمر بن سليمان، عن محمد بن عمرو بن علقمة، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1071)، وابن حبان (3117) من طريق سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، مرفوعًا. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرجه مختصرًا بقصة سماع الميت قرع النعال: أحمد 15/ (9742)، وابن حبان (3118) من طريق إسماعيل بن عبد الرحمن السُّدي، عن أبيه، عن أبي هريرة. وهذا إسناد ضعيف لجهالة والد السدي، واسمه: عبد الرحمن بن أبي كريمة.وانظر ما بعده.وفي الباب عن أنس بن مالك عند البخاري (1338) و (1374)، ومسلم (2870)، وغيرهما.وعن جابر بن عبد الله عند ابن ماجه (4272)، وابن حبان (3116)، وإسناده حسن.وعن البراء بن عازب، سلف عند المصنف برقم (107)، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1420)


1420 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرةَ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "والذي نَفْسي بيدِه، إنه ليَسْمَعُ خَفْقَ نِعالِهم حين يُوَلُّون عنه"، ثم ذكر الحديث بنحوه، إلّا أنَّ حديث سعيد بن عامر أَتمّ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! নিশ্চয়ই সে (মৃত ব্যক্তি) তাদের জুতার খটখট শব্দ শুনতে পায়, যখন তারা তার কাছ থেকে ফিরে যায়।” এরপর তিনি এর অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেন। তবে সাঈদ ইবনে আমের-এর হাদীসটি অধিক পূর্ণাঙ্গ। [১] এই হাদীসটি ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) উভয়ে এটি সংকলন করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره كسابقه.وأخرجه مرفوعًا أحمد 14/ (8563) عن عفان، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. مختصرًا بقصة سماع الميت قرع النعال. الإسناد.وفي الباب عن أبي سعيد الخدري، سيأتي برقم (3480).