আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1421 - حدثنا أبو بكر بن سَلْمان الفقيه، حدثنا أبو داود سليمان بن الأشعث، حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، في قوله - جلَّ وعزَّ -: {مَعِيشَةً ضَنْكًا} [طه: 124] قال: عذابُ القبر [1].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী, {مَعِيشَةً ضَنْكًا - এক সংকীর্ণ জীবন} [সূরা ত্বাহা: ১২৪] সম্পর্কে তিনি বলেন: (এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো) কবরের আযাব।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو الليثي. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه ابن حبان (3119) عن أبي خليفة الفضل بن الحباب، عن أبي الوليد الطيالسي، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي سعيد الخدري، سيأتي برقم (3480).
1422 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إبراهيم الفقيه الإسماعيلي، حدثنا أبو جعفر محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدثنا هارون بن إسحاق الهَمْداني، حدثنا عَبْدةُ بن سليمان، عن هشام بن عُروة، عن وَهْب بن كَيْسان، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي هريرة قال: خرج النبيُّ صلى الله عليه وسلم على جنازةٍ ومعه عمر بن الخطاب، فسَمِعَ نساءً يَبكِينَ، فزَبَرَهنَّ عمرُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عمرُ، دَعْهنَّ، فإنَّ العينَ دامعةٌ، والنفْسَ مُصابةٌ، والعهدَ حديث [1] " [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি জানাযার সাথে বের হলেন, আর তাঁর সাথে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তখন তিনি মহিলাদেরকে কাঁদতে শুনলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের ধমক দিলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উমর, তাদেরকে ছেড়ে দাও। কারণ, চোখ অশ্রুপূর্ণ, মন শোকাভিভূত, এবং বিচ্ছেদটি সাম্প্রতিক।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ص) و (ب): قريب، والمثبت من (ز) و (ع)، وكتب فوقها في (ز) بخط مغاير: قريب، دون الإشارة بعلامة تصحيح، واختلفت مصادر التخريج، فأكثرها فيه: حديث، وفي بعضها: قريب، والله أعلم.
[2] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ محمد بن عمرو بن عطاء لم يسمعه من أبي هريرة، بينهما سلمة بن الأزرق، كما سيأتي، ورجح الدارقطني في "العلل" (2097) رواية من ذكر سلمة بن الأزرق، وسلمة هذا مجهول، ليس له سوى هذا الحديث عن أبي هريرة، ولم يرو عنه سوى محمد بن عمرو بن عطاء، وقال ابن القطان: لا يعرف حاله، ولا أعرف أحدًا من المصنفين في كتب الرجال ذكره. وقال الذهبي في "الميزان": لا يعرف حديثه.وأخرجه أحمد 15/ (9731)، وابن ماجه (1587) من طريق وكيع بن الجراح، عن هشام بن عروة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7691) و 14/ (8401) و 15/ (9293)، وابن ماجه (1587 م)، وابن حبان (3157) من طرق عن هشام بن عروة، عن وهب بن كيسان، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن سلمة بن الأزرق، عن أبي هريرة. بذكر سلمة بن الأزرق، وذكر في بعض الروايات قصة لعبد الله بن عمر بن الخطاب.وأخرجه أحمد 10/ (5889)، والنسائي (1998) من طريق محمد بن عمرو بن حلحلة، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن سلمة بن الأزرق، عن أبي هريرة.وفي إباحة البكاء على الميت انظر حديث أنس بن مالك عند البخاري (1303)، ومسلم (2315)، وحديث ابن عمر عند البخاري أيضًا (1304)، ومسلم (924).
1423 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك، حدثنا الحسن بن مُكرَم، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا أسامة بن زيد، حدثني الزُّهري، عن أنس بن مالك قال: لما رَجَعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من أُحُد، سَمِعَ نساءَ الأنصار يَبكِين، فقال: "لكنَّ حمزةَ لا بَوَاكيَ له"، فبَلَغ ذلك نساءَ الأنصار، فبَكَين لحمزة، فنام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ثم استيقظ وهُنَّ يَبكِين، فقال: "يا وَيحَهُنَّ، ما زِلْنَ يَبكِينَ منذُ اليومِ، فَلْيَبكِينَ [1]، ولا يَبكِين على هالكٍ بعد اليوم" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وهو أشهرُ حديث بالمدينة، فإنَّ نساء المدينة لا يَندُبنَ موتاهُنَّ حتى يَندُبنَ حمزةَ، وإلى يومنا هذا.وقد اتفق الشيخان على إخراج حديث أيوب السَّخْتِياني عن عبد الله بن أبي مُلَيكة؛ مناظرةِ عبد الله بن عمر وعبد الله بن عباس في البكاء على الميِّت، ورُجوعِهما فيه إلى أم المؤمنين عائشة، وقولِها: والله ما قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: إِنَّ الميتَ يُعذَّب ببُكاء أحدٍ، ولكنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الكافر يَزيدُه عند الله بكاءُ أهله عليه عذابًا"، وإنَّ الله هو أَضحَكَ وأبكى، ولا تَزِرُ وازِرةٌ وِزْرَ أخرى [3].
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদ থেকে ফিরলেন, তিনি আনসার নারীদের কাঁদতে শুনলেন। তখন তিনি বললেন: "কিন্তু হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য কাঁদার কেউ নেই।" এই খবর আনসার নারীদের কাছে পৌঁছালে তারা হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য কাঁদতে শুরু করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমিয়ে পড়লেন। যখন তিনি জাগলেন, তখনও তারা কাঁদছিলেন। তখন তিনি বললেন: "হায় তাদের কী হয়েছে! তারা তো আজ সকাল থেকেই কেঁদেই চলেছে। তারা (আজ) কাঁদতে পারে, কিন্তু আজকের পর থেকে কেউ যেন কোনো মৃত ব্যক্তির জন্য না কাঁদে।"
এই হাদীসটি ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ, যদিও তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি। এটি মদীনার প্রসিদ্ধতম হাদীসগুলোর মধ্যে একটি। কারণ মদীনার নারীরা তাদের মৃতদের জন্য বিলাপ করে না যতক্ষণ না তারা হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য বিলাপ করে, যা আজও পর্যন্ত প্রচলিত। তবে (ইমাম) বুখারী ও মুসলিম উভয়েই আইয়ুব আস-সাখতিয়ানী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সংকলন করেছেন; যা মৃত ব্যক্তির জন্য ক্রন্দন নিয়ে আবদুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিতর্কের সাথে সম্পর্কিত। তাঁরা উভয়েই এ বিষয়ে উম্মুল মুমিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শরণাপন্ন হয়েছিলেন এবং তিনি বলেছিলেন: "আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও বলেননি যে, মৃত ব্যক্তিকে কারো কান্নার কারণে শাস্তি দেওয়া হয়, বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'নিশ্চয়ই কাফির ব্যক্তির জন্য তার পরিবারের ক্রন্দন আল্লাহর কাছে তার আযাবকে বাড়িয়ে দেয়।' আর আল্লাহই তো হাসালেন এবং কাঁদান, এবং কোনো বহনকারী অন্যের বোঝা বহন করবে না।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في (ز) و (ص) و (ع): يبكين، وكذا هو في بعض مصادر التخريج، وفي (ب) و"السنن الكبرى" للبيهقي: فليسكتن.
[2] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو الليثي.ورواه أسامة بن زيد مرةً عن نافع عن ابن عمر، وسيأتي برقم (4944) و (4952).أما حديث الزهري عن أنس، فقد أخرجه البيهقي 4/ 70 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (6346)، وأبو يعلى (3576) و (3610)، والضياء في "المختارة" 7/ (2611) من طريق روح بن عبادة، عن أسامة بن زيد الليثي، به.
1423 [3] - حديث أيوب عن ابن أبي مليكة انفرد بإخراجه مسلم (928)، أما البخاري فقد أخرجه برقم (1286 - 1288) من حديث ابن جريج عن ابن أبي مليكة.
1424 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن داود، حدثنا أبو أسامة، حدثني حماد بن زيد.وأخبرنا دَعلَجُ بن أحمد السِّجْزِي، حدثنا بشرٌ بن موسى، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا أبو أسامة حمَّادُ بن أسامة، حدثنا حمَّاد بن زيد، عن ثابت، عن أنس، قال: قالت فاطمة: يا أنسُ، أطابت أنفُسُكم أن تَحثُوا الترابَ على رسول الله صلى الله عليه وسلم؟! قال: وقالت فاطمة: يا أبَتاه، أجابَ ربًّا دعاه، يا أبَتاه، مِن ربِّه ما أدناه، يا أبَتاه، جَنَّةُ الفِردَوس مأواه، يا أبَتاه، إلى جبريلَ أنْعاه.زاد سعيد بن منصور في حديثه عن أبي أسامة، قال: سمعتُ حمّاد بن زيدٍ يقول: رأيتُ ثابتَ البُنانيَّ حين حدثنا بهذا الحديث بَكَى، حتى رأيت أضلاعَه تضطرب [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন, ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আনাস, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের উপর মাটি নিক্ষেপ করতে তোমাদের মন কি সায় দিলো (স্বস্তি পেল)? তিনি আরও বলেন, ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওহ! আমার আব্বা, তিনি সেই রবের ডাকে সাড়া দিয়েছেন যিনি তাঁকে ডেকেছেন। ওহ! আমার আব্বা, তিনি তাঁর রবের কত নিকটবর্তী হয়েছেন! ওহ! আমার আব্বা, জান্নাতুল ফিরদাউস তাঁর আশ্রয়স্থল! ওহ! আমার আব্বা, আমি জিবরাঈলের কাছে তাঁর (চলে যাওয়ার) খবর জানাচ্ছি। সাঈদ ইবনু মানসুর আবু উসামা থেকে তাঁর হাদীসে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: আমি হাম্মাদ ইবনু যায়িদকে বলতে শুনেছি: আমি সাবিত আল-বুনানীকে দেখেছি, যখন তিনি আমাদের নিকট এই হাদীসটি বর্ণনা করছিলেন, তখন তিনি এমনভাবে কাঁদছিলেন যে আমি তার পাঁজর কাঁপতে দেখেছি। এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি বর্ণনা করেননি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه ابن ماجه (1630) عن علي بن محمد، عن أبي أسامة حماد بن أسامة، بهذا الإسناد.وزاد بإثره قول حماد بن زيد الذي أشار إليه المصنف.وأخرجه دون هذه الزيادة أحمد 20/ (13117) عن يزيد بن هارون، والبخاري (4462) عن سليمان بن حرب، وابن حبان (6622) من طريق إسماعيل بن يونس، ثلاثتهم عن حماد بن زيد، به. ولم يذكروا جميعهم الزيادة التي زادها سعيد بن منصور وعلي بن محمد في حديثهما عن أبي أسامة، وزاد سليمان بن حرب وإسماعيل بن يونس في أوله: لما ثقل النبي صلى الله عليه وسلم جعل يتغشّاه، فقالت فاطمة عليها السلام: واكربَ أباه، فقال لها: "ليس على أبيك كرب بعد اليوم".وسيأتي برقم (4444).
1425 - أخبرني أزهر بن أحمد المُنادِي ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد الصَّائغ، حدثنا عفَّان بن مُسلِم وأبو الوليد، قالا: حدثنا شعبة.وحدثنا محمد بن موسى الصَّيدلاني، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المثنى ومحمد بن بشار، قالا: حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، سمعتُ قتادةَ يحدِّث عن مُطرِّف بن عبد الله بن الشَّخِّير، عن حَكِيم بن قيس بن عاصم، عن أبيه: أنه أوصاهم عند موته فقال: إذا أنا مِتُّ فلا تَنُوحُوا عليَّ، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُنَحْ عليه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقيس بن عاصم المِنْقَري سيِّدُ بني تَميم، وليس له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مسندٌ غيرُ هذا الحرف، فإنه أملى وصيّتَه: لا تَنُوحُوا عليَّ، فإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن النَّوح [2].وشاهد هذا الحديث حديثُ الحسن البصري عن قيس بن عاصم في ذكر وصيَّتِه بطولها.وله شاهدٌ عن أبي هريرة:
কায়েস ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (কায়েস ইবনে আসিম) মৃত্যুর সময় তাঁর পরিবারকে অসিয়ত করে বললেন: আমি যখন মারা যাবো, তখন তোমরা আমার জন্য বিলাপ (নওহা) করো না। কেননা, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য বিলাপ করা হয়নি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، حكيم بن قيس بن عاصم قيل: إنه ولد على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، وأبوه صحابي، وروى عنه تابعي كبير ثقة، وهو مطرف بن عبد الله بن الشخير، وحسبُك به، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وذكره ابن منده وأبو نعيم في الصحابة، وقال أبو نعيم: قيل: إنه ولد في زمن النبي صلى الله عليه وسلم: قلنا: ولا عبرة حينئذٍ بقول ابن القطان: مجهول الحال.وأخرجه أحمد 34/ (20612) عن حجاج الأعور ومحمد بن جعفر، بهذا الإسناد.وسيأتي مطولًا ضمن قصة وصية قيس بن عاصم برقم (6710). دون ذكر الكنية، إلا أن محققه - عفا الله عنا وعنه - أثبت الخطأ ركونًا إلى نسخ "المستدرك". ولم يتنبه لهذا الخطأ محققو طبعة دار الميمان!
[2] كذا قال، وقد روي عنه غير هذا الحرف، فقد أخرج أحمد 34/ (20613) وابن حبان (4369) من طريق شعبة بن التوأم عنه مرفوعًا: "لا حلف في الإسلام"، وأخرج ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 348 والطبراني 18/ (868) من طريق خليفة بن حصين: أن قيس بن عاصم قال للنبي صلى الله عليه وسلم: إني وأدتُ في الجاهلية اثنتي عشرة أو ثلاث عشرة بنتًا، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "أعتق عن كل واحدة منهن نسمة". دون ذكر الكنية، إلا أن محققه - عفا الله عنا وعنه - أثبت الخطأ ركونًا إلى نسخ "المستدرك". ولم يتنبه لهذا الخطأ محققو طبعة دار الميمان!
1426 - أخبرَناه [أبو] إسحاق إبراهيم بن إسماعيل القارئ [1]، حدثنا السَّرِيُّ ابن خُزَيمة، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرةَ قال: لما مات إبراهيمُ ابنُ رسول الله صلى الله عليه وسلم صاح أسامةُ بن زيدٍ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس هذا منّي، وليس بصائحٍ حقٌّ، القلبُ يَحزَنُ، والعينُ تَدمَعُ، ولا نُغضِبُ الربَّ" [2].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পুত্র ইবরাহীম মৃত্যুবরণ করলেন, তখন উসামা ইবনু যায়িদ উচ্চস্বরে কেঁদে উঠলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এটা আমার পক্ষ থেকে নয়, আর যে উচ্চস্বরে ক্রন্দনকারী (বিলাপকারী), সে সত্যের ওপর প্রতিষ্ঠিত নয়। অন্তর ব্যথিত হয়, চোখ অশ্রু ঝরায়, কিন্তু আমরা প্রভুর অসন্তোষ জন্মাই না।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: إسحاق بن إبراهيم بن إسماعيل القارئ، وهو خطأ، صوابه ما أثبتنا، فهو إبراهيم بن إسماعيل، ويكنى أبا إسحاق، وقد روى عنه المصنف في غير موضع من هذا الكتاب، وانظر ترجمته في "تاريخ الإسلام" للذهبي 7/ 714 وفي رسمي (الخشاوري) و (القارئ) من "الأنساب" للسمعاني. وقد جاءت تسميته على الصواب في أصل "إتحاف المهرة" 16/ 197 دون ذكر الكنية، إلا أن محققه - عفا الله عنا وعنه - أثبت الخطأ ركونًا إلى نسخ "المستدرك". ولم يتنبه لهذا الخطأ محققو طبعة دار الميمان!
[2] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي. موسى بن إسماعيل: هو أبو سلمة التَّبوذَكي، وأبو سلمة الراوي عن أبي هريرة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه ابن حبان (3160) من طريق هدبة بن خالد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.ولفظه عنده: "ليس هذا منا، ليس لصارخ حظٌّ، القلبُ يحزنُ، والعين تدمعُ، ولا نقول ما يُغضِب الرب".
1427 - حدَّثَناه أبو إسحاق المزكِّي إملاءً، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا عُقْبة بن سِنَان البَصريُّ، حدثنا عثمان بن عثمان الغَطَفاني، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، قال: قال أبو هريرة: إذا أنا مِتُّ فلا تَنُوحوا عليَّ، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُنَحْ عليه [1].هذه الزيادة عن أبي هريرة غريبةٌ جدًّا، إلّا أن عثمان الغَطَفانيَّ ليس من شرط كتابنا هذا [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: যখন আমি মারা যাব, তখন তোমরা আমার উপর বিলাপ (নওহা) করো না। কারণ, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উপরও বিলাপ করা হয়নি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل عثمان الغطفاني ومحمد بن عمرو: وهو ابن علقمة. أبو إسحاق المزكي: هو إبراهيم بن محمد بن يحيى، ومحمد بن إسحاق: هو ابن خُزيمة.وأخرجه بأطول مما هنا ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 382 من طريق يحيى بن محمد بن صاعد، عن عقبة بن سنان، بهذا الإسناد.
[2] العجب من أبي عبد الله الحاكم رحمه الله في قوله هذا، فإنه قد جعل من شرط كتابه هذا من هو دون عثمان الغطفاني رتبةً وضبطًا.
1428 - حدثنا أبو الفضل محمد بن أحمد الحاكم الوزير إملاءً، حدثنا حماد بن أحمد القاضي ومحمد بن حَمْدَوَيهِ السِّنْجي، قالا: حدثنا علي بن حُجْر، حدثنا شَرِيك وعليُّ بن مُسْهِر، قالا: حدثنا أبو إسحاق الهَجَري، عن عبد الله بن أبي أَوفى، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَنْهَى عن المَرَاثي [1].إبراهيم بن مسلم الهَجَري ليس بالمتروك، إلّا أنَّ الشيخين لم يحتجَّا به.وهذا الحديث شاهدٌ لما تقدَّمَه، وهو غريبٌ صحيح، فإن مسلمًا قد احتجَّ بشَرِيك بن عبد الله.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শোকগাথা (শোকসূচক কবিতা) আবৃত্তি করতে নিষেধ করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي إسحاق إبراهيم بن مسلم الهجري.وأخرجه ابن ماجه (1592) من طريق سفيان بن عيينة، عن إبراهيم الهجري، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (1346).المراثي: النَّدب والنياحة على الميت. وقد توبع. أبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو، وأبو سلَّام: هو ممطور الحبشي، وزيد بن سلَّام: هو ابن أبي سلام، حفيد ممطور.وأخرجه أحمد 37/ (22904) عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22903) و (22912)، ومسلم (934)، وابن حبان (3143) من طريق أبان بن يزيد العطار، عن يحيى بن أبي كثير، به.وخالف أبانَ العطار وعليَّ بنَ المبارك معمرٌ، فقد أخرجه ابن ماجه (1581) من طريق عبد الرزاق عنه، عن يحيى بن أبي كثير، عن ابن معانق أو أبي معانق، عن أبي مالك الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "النياحة من أمر الجاهلية، وإنَّ النائحة إذا ماتت ولم تتب قطع الله لها ثيابًا من قطران ودرعًا من لهب النار". وابن معانق أو أبو معانق - واسمه عبد الله - قال فيه الدارقطني: لا شيء مجهول. ووثقه العجلي وابن حبان، لذلك قال الدارقطني في "العلل" (1183): حديث أبي سلام أشبه بالصواب.وفي الباب عن ابن عباس عند البخاري (3850).وعن أبي هريرة عند أحمد في "المسند" 12/ (7560).وعن غير واحد من الصحابة، انظر: "مجمع الزوائد" 3/ 12 - 13.السرابيل: جمع سربال، وهو القميص، وكذا الدروع.
1429 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القَزَّاز، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلَّام، عن أبي سَلَّام قال: قال أبو مالكٍ الأشعريُّ: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ في أُمّتي أربعًا [1] من أَمْر الجاهلية ليسوا بتارِكيهِنَّ: الفَخْرُ في الأحساب، والطَّعْنُ في الأنساب، والاستسقاءُ بالنُّجوم، والنِّياحةُ على الميت، فإنَّ النائحة إن لم تَتُبْ قبل أن تموت، فإنها تقومُ يومَ القيامة عليها سَرَابيلُ من قَطِرانٍ، ثم يُغلَى عليهِنَّ دُروعٌ من لَهَبِ النار" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرج مسلمٌ حديث أبان بن يزيد [3] عن يحيى بن أبي كَثِير، وهو مختصَرٌ، ولم يُخرجاه بالزيادات التي في حديث علي بن المبارك، وهو من شرطهما [4].
আবু মালিক আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমার উম্মতের মধ্যে জাহিলিয়াতের চারটি বিষয় রয়েছে, যা তারা ত্যাগ করবে না: বংশমর্যাদা নিয়ে গর্ব করা, বংশের প্রতি অপবাদ দেওয়া, নক্ষত্রের মাধ্যমে বৃষ্টি কামনা করা এবং মৃতের জন্য উচ্চস্বরে বিলাপ করা। নিশ্চয়ই যে বিলাপকারী নারী মৃত্যুর আগে তাওবা না করে, কিয়ামতের দিন তাকে এমন পোশাকে দাঁড় করানো হবে যা আলকাতরার তৈরি হবে, অতঃপর সেই পোশাকে আগুনের লেলিহান শিখার বর্ম চাপিয়ে দেওয়া হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] جاء هذا الحرف في النسخ الخطية: "أربع"، بحذف ألف النصب، مع أن حقه النصب لكونه اسم "إن"، وذلك جائز على لغة ربيعة وغَنْم في الوقوف على المنصوب المنوّن بالسكون؛ فيكون منصوبًا في اللفظ إلا أنه يكتب بلا ألف. انظر "شواهد التوضيح" لابن مالك ص 37، و"شرح المفصل" لابن يعيش 9/ 69 - 70. ويجوز أن يكون المكتوب بلا ألف منصوبًا غير منون على نية الإضافة، كأنه قال: أربع خصال، وقد ذكر ابن مالك في "شواهد التوضيح" ص 39 - 40 نظائر لذلك عند العرب. ويجوز كذلك أن يكون وجه الرفع بأن يكون اسم "إن" محذوفًا، أو هو ضمير الشأن، أي: إنه، وتكون الجملة في موضع رفع خبر "إن"، كما ذكر أبو البقاء العُكبَري في "إعراب ما يُشكل من ألفاظ الحديث" ص 120. وما أثبتناه هو اللغة العالية الفصيحة. وقد توبع. أبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو، وأبو سلَّام: هو ممطور الحبشي، وزيد بن سلَّام: هو ابن أبي سلام، حفيد ممطور.وأخرجه أحمد 37/ (22904) عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22903) و (22912)، ومسلم (934)، وابن حبان (3143) من طريق أبان بن يزيد العطار، عن يحيى بن أبي كثير، به.وخالف أبانَ العطار وعليَّ بنَ المبارك معمرٌ، فقد أخرجه ابن ماجه (1581) من طريق عبد الرزاق عنه، عن يحيى بن أبي كثير، عن ابن معانق أو أبي معانق، عن أبي مالك الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "النياحة من أمر الجاهلية، وإنَّ النائحة إذا ماتت ولم تتب قطع الله لها ثيابًا من قطران ودرعًا من لهب النار". وابن معانق أو أبو معانق - واسمه عبد الله - قال فيه الدارقطني: لا شيء مجهول. ووثقه العجلي وابن حبان، لذلك قال الدارقطني في "العلل" (1183): حديث أبي سلام أشبه بالصواب.وفي الباب عن ابن عباس عند البخاري (3850).وعن أبي هريرة عند أحمد في "المسند" 12/ (7560).وعن غير واحد من الصحابة، انظر: "مجمع الزوائد" 3/ 12 - 13.السرابيل: جمع سربال، وهو القميص، وكذا الدروع.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزاز، وقد توبع. أبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو، وأبو سلَّام: هو ممطور الحبشي، وزيد بن سلَّام: هو ابن أبي سلام، حفيد ممطور.وأخرجه أحمد 37/ (22904) عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22903) و (22912)، ومسلم (934)، وابن حبان (3143) من طريق أبان بن يزيد العطار، عن يحيى بن أبي كثير، به.وخالف أبانَ العطار وعليَّ بنَ المبارك معمرٌ، فقد أخرجه ابن ماجه (1581) من طريق عبد الرزاق عنه، عن يحيى بن أبي كثير، عن ابن معانق أو أبي معانق، عن أبي مالك الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "النياحة من أمر الجاهلية، وإنَّ النائحة إذا ماتت ولم تتب قطع الله لها ثيابًا من قطران ودرعًا من لهب النار". وابن معانق أو أبو معانق - واسمه عبد الله - قال فيه الدارقطني: لا شيء مجهول. ووثقه العجلي وابن حبان، لذلك قال الدارقطني في "العلل" (1183): حديث أبي سلام أشبه بالصواب.وفي الباب عن ابن عباس عند البخاري (3850).وعن أبي هريرة عند أحمد في "المسند" 12/ (7560).وعن غير واحد من الصحابة، انظر: "مجمع الزوائد" 3/ 12 - 13.السرابيل: جمع سربال، وهو القميص، وكذا الدروع.
1429 [3] - تحرف في النسخ الخطية إلى: زيد. وهو أبان بن يزيد العطار. 14/ 46، و"تاريخ الإسلام" 6/ 923.
1429 [4] - بل هو في "صحيح مسلم" مثل ما في الحاكم سواء، لكن وقع عنده: "ودرع من جرب" بدل قوله: "ثم يغلى عليهن دروع من لهب النار". 14/ 46، و"تاريخ الإسلام" 6/ 923.
1430 - أخبرنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حدثنا جعفر بن محمد بن الحسين [1]، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا أبو معاوية، حدثنا عاصم بن سليمان، عن حَفْصة بنت سِيرين، عن أُم عَطيَّة قالت: لما نزلَتْ: {إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ} إلى قوله: {وَلَا يَعْصِينَكَ} [الممتحنة: 12]، كانت منه النِّياحةُ، فقلت: يا رسول الله، إلّا آلَ فلان، فإنهم كانوا أسعَدُوني في الجاهلية، فلا بدَّ لي من أن أُسعِدَهم، فقال: "إلّا آلَ فلان" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যখন মুমিন নারীরা আপনার কাছে আনুগত্যের শপথ করার জন্য আসবে..." আল্লাহর এই বাণী পর্যন্ত: "...এবং তারা আপনাকে কোনো বিষয়ে অমান্য করবে না" [সূরা মুমতাহিনা: ১২], তখন সেই শপথের শর্তগুলোর মধ্যে নিয়াহাহ (বিলাপ করা) না করার শর্তটিও ছিল। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! অমুক পরিবার ছাড়া, কারণ জাহিলিয়্যাতের যুগে তারা আমাকে (বিলাপের মাধ্যমে) সাহায্য করেছিল, তাই আমারও উচিত তাদের সাহায্য করা। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অমুক পরিবার ছাড়া।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: الحسن، والتصويب من "إتحاف المهرة" 18/ 97، وقد تكرر على الصواب في غير موضع من "المستدرك"، وهو محمد بن جعفر بن الحسين النيسابوري، المعروف بالترك، وهو من كبار أصحاب يحيى بن يحيى. انظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" 14/ 46، و"تاريخ الإسلام" 6/ 923.
[2] إسناده صحيح، لكن انفرد عاصم بن سليمان - وهو الأحول - بالتصريح بإذنه صلى الله عليه وسلم لها بالنياحة، وبقوله: "إلّا آل فلان"، وبذلك أعله البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 62 فقال: كذلك رواه عاصم بن سليمان الأحول عن حفصة بنت سيرين، ولا أدري هل حفظ ما روى من الإذن في الإسعاد أم لا، فقد رواه أيوب السختياني، وهو أحفظ منه، على ما ذكرنا - وسيأتي بيانه في التخريج - ورواه هشام بن حسان عن حفصة، فلم يذكر شيئًا من ذلك.يحيى بن يحيى: هو النيسابوري، وأبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير.وأخرجه أحمد 34/ (20796)، ومسلم (936) (33)، والنسائي (11523)، وابن حبان (3145) من طريق أبي معاوية الضرير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 45/ (27037) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن عاصم الأحول، به. وفيه: فقالت امرأة من الأنصار: إنَّ آل فلان أسعدوني في الجاهلية، وفيهم مأتم، فلا أبايعك حتى أُسعدهم لما أسعدوني، فقالت: فكأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وافقها على ذلك، فذهبت فأسعدتهم، ثم رجعت فبايعت النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه البخاري (4892) و (7215) من طريق أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن حفصة بنت سيرين، به. لكن فيه: فقبضت امرأة يدها، فقالت: أسعدتني فلانة، أريد أن أجزيها، فما قال لها النبي صلى الله عليه وسلم شيئًا، فانطلقت ورجعت، فبايعها. وزاد في الموضع الثاني: فما وَفَت امرأة إلّا أم سليم، وأم العلاء، وابنة أبي سبرة امرأة معاذ، أو ابنة أبي سبرة وامرأة معاذ.فرواية أيوب عن حفصة هذه ليس فيها التصريح بالإذن بالإسعاد، ثم إنها أخرت البيعة إلى ما بعد ذلك.وأخرج أحمد 34/ (20791) و (20798) و 45/ (27305)، ومسلم (936) (31) من طريق هشام بن حسان، عن حفصة بنت سيرين، عن أم عطية قالت: أخذ علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم في البيعة ألا تَنُحْنَ، فما وفت منهن غير خمس، منهن أم سليم. ولم يذكر بعضهم أم سليم، وزاد في الموضع الثاني عند أحمد: ولا نحدِّث من الرجال إلّا محرمًا، وهي زيادة ضعيفة، تفرد بها غسان ابن الربيع، وهو ممن لا يحتمل تفرده.وأخرجه البخاري (1306)، ومسلم (936) (31)، والنسائي (7755) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية قالت: أخذ علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم عند البيعة أن لا ننوح، فما وفت منا امرأة غير خمس نسوة. وذكرتهن.ورواه سفيان بن عيينة، عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية، وفيه: لما أردت أن أبايع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قلت: يا رسول الله، إني امرأة أسعدتني في الجاهلية، فأذهب فأسعدها، ثم أجيئك فأبايعك، قال: "اذهبي" فذهبت فساعدتها، ثم جئت فبايعت النبي صلى الله عليه وسلم. أخرجه النسائي (7754).وخالف سفيانَ هشامُ بنُ حسان وحبيبُ بنُ الشهيد فروياه عن محمد بن سيرين عن أم عطية، ليس فيه الإذن بالإسعاد، بل فيه: فقبضت يدها، وقبض رسول الله صلى الله عليه وسلم يده، فلم يبايعها. أخرجه أحمد 45/ (27308).ويؤيد عدم الإذن في الإسعاد، ما جاء في حديث أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ على النساء حين بايعهن أن لا يَنُحْنَ، فقلن: يا رسول الله، إنَّ نساءً أسعدننا في الجاهلية، أفنسعدهن؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا إسعاد في الإسلام". أخرجه أحمد 20/ (12658) و (13032)، والنسائي (1991) - واللفظ له - وابن حبان (3146)، وإسناده صحيح.وانظر تتمة أحاديث الباب عند الحديث رقم (20796) من "مسند أحمد".
1431 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا سعيد بن عثمان التَّنُوخي، حدثنا بِشْر بن بكر، عن الأوزاعي، حدثني إسماعيل بن عبيد الله، قال: حدثتني كَرِيمةُ المُزَنيَّة، قالت: سمعتُ أبا هريرة وهو في بيت أُم الدَّرداء يقول: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ثلاثةٌ من الكفر بالله: شَقُّ الجَيب، والنِّياحةُ، والطَّعْنُ فِي النَّسَب" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিনটি কাজ আল্লাহর প্রতি কুফরির অংশ: (বিপদে) জামার কলার বা বুক ছিঁড়ে ফেলা, উচ্চস্বরে বিলাপ করা এবং বংশের নিন্দা করা বা বংশে আঘাত হানা।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف سعيد بن عثمان التنوخي، لكنه قد توبع، وكريمة المزنية - وهي بنت الحسحاس - ذكرها ابن حبان في "الثقات"، وكانت من صواحب أبي الدرداء، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه ابن حبان (1465) من طريق يونس بن عبد الأعلى، عن بشر بن بكر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان (3161) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، عن الأوزاعي، به. وقد روي نحوه من غير وجه عن أبي هريرة، فقد:أخرج أحمد 14/ (8905) و 15/ (9690) و 16/ (10434)، ومسلم (67)، وابن حبان (3142) من طريق أبي صالح، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "ثنتان في الناس هما بهم كفر: الطعن في النسب، والنياحة على الميت". ولفظه عند ابن حبان: "أربع من الجاهلية، لن يدعها الناس: النياحة، والتعاير، أو التعاير في الأنساب، ومُطِرنا بنوء كذا وكذا، والعدوى جرب البعير في مئة بعير، فمن أعلى الأول؟ ".وأخرجه بنحو لفظ رواية أبي صالح هذه: أحمد 13/ (7908) و 15/ (9365) و (9872) و (9878) و 16/ (10809) و (10871)، والترمذي (1001) من طريق أبي الربيع المدني، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرج أحمد 12/ (7560) و 15/ (9574)، وابن حبان (3141) من طريق سعيد المقبري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "ثلاث من عمل الجاهلية لا يتركهن أهل الإسلام: النياحة، والاستسقاء بالأنواء، ودعوى الجاهلية يا آل فلان، يا آل فلان". لفظ أحمد (7560)، ووقع عند ابن حبان: "والتعاير" بدل: "دعوى الجاهلية … " إلى آخره. ولفظ أحمد في الموضع الثاني: "شعبتان من أمر الجاهلية لا يتركهما الناس أبدًا: النياحة، والطعن في النسب".وفي الباب عن غير واحد من الصحابة، انظر تعليقنا على ابن حبان (1465) و (3141).
1432 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا خَلّاد بن يحيى، حدثنا بَشِير بن مُهاجِر.وحدثنا بُكَير بن محمد بن الحدَّاد الصُّوفي بمكة، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا واصل بن عبد الأعلى، حدثنا محمد بن فُضَيل، حدثنا بَشِير بن مُهاجِر، عن عبد الله بن بُرَيدةَ، عن أبيه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يتعهَّد الأنصارَ ويَعُودُهم، ويَسأَل عنهم، فبَلَغَه عن امرأةٍ من الأنصار مات ابنُها وليس لها غيرُه، وأنها جَزِعَتْ عليه جَزَعًا شديدًا، فأَتى النبيُّ صلى الله عليه وسلم فَأَمَرها بتقوى الله وبالصَّبر، فقالت: يا رسولَ الله، إنِّي امرأةٌ رَقُوبٌ لا أَلِدُ ولم يكن لي غيرُه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الرَّقُوبُ الذي يبقى ولدُها"، ثم قال: "ما مِن امرِئٍ أو امرأةٍ مسلمةٍ يموتُ لها ثلاثةُ أولادٍ، إلّا أدخَلَهُم اللهُ بهم الجنةَ"، فقال عمر: يا رسولَ الله، بأبي وأمي، واثنان؟ قال: "واثنانِ" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بذِكر الرَّقُوب.
বুরয়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের খোঁজখবর নিতেন, তাদের দেখতে যেতেন এবং তাদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতেন। অতঃপর তাঁর কাছে সংবাদ পৌঁছাল যে আনসারদের মধ্যে এক মহিলার একমাত্র পুত্র মারা গেছে এবং সে তাতে ভীষণভাবে অস্থির হয়ে পড়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কাছে আসলেন এবং তাকে আল্লাহকে ভয় করার ও ধৈর্য ধারণ করার আদেশ দিলেন। মহিলাটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো রুকূব (নিঃসন্তান) মহিলা, আমার কোনো সন্তান হয় না, আর এই সন্তানটি ছাড়া আমার আর কেউ ছিল না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "রুকূব (আসলে দুর্ভাগ্যবান) তো সে, যার সন্তান জীবিত থাকে।" এরপর তিনি বললেন: "এমন কোনো মুসলিম পুরুষ বা নারী নেই যার তিনটি সন্তান মারা যায়, আর আল্লাহ এর বিনিময়ে তাদের জান্নাতে প্রবেশ করান না।" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক, আর যদি দুইজন হয়? তিনি বললেন: "যদি দুইজন হয় (তবুও জান্নাতে প্রবেশ করাবে)।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل بشير بن مهاجر.وأخرجه البزار (4401)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9301) من طريق جعفر بن عون، عن بشير بن مهاجر، بهذا الإسناد.وله شاهد من حديث أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12535)، والبخاري (1248).وآخر من حديث أبي هريرة عند أحمد 12/ (7265)، والبخاري (1251)، ومسلم (2632).وعن ابن مسعود عند أحمد 7/ (3995)، وابن ماجه (1606)، والترمذي (1061).وعن أبي سعيد الخدري، عند أحمد 17/ (11296)، والبخاري (101)، ومسلم (2633).وعن غير واحد من الصحابة، انظر "المسند" (3554).ويشهد لقوله: "الرقوب الذي يبقى ولدها" حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 6/ (3626)، ومسلم (2608).قال الإمام النووي في "شرح مسلم": أصل الرَّقوب في كلام العرب: الذي لا يعيش له ولد، ومعنى الحديث: أنكم تعتقدون أن الرقوبَ المحزونَ هو المصابُ بموت أولاده، وليس هو كذلك شرعًا، بل هو من لم يمت أحدٌ من أولاده في حياته فيحتسبه، فيُكتَب له ثواب مصيبته به وثواب صبره عليه، ويكون له فَرَطًا وسلفًا. وهو في "مسند أحمد" 33/ (20366)، وقرن بمحمد بن جعفر يزيدَ بن هارون.وأخرجه أحمد أيضًا 24/ (15595) و 33/ (20365)، والنسائي (2009)، وابن حبان (2947) من طريقين عن شعبة، بهذا الإسناد.
1433 - حدثنا أبو الصَّقْر أحمد بن الفَضْل الكاتب بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعبة، سمعت معاوية بن قُرَّة.وحدثنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن معاوية بن قُرَّة، يحدِّث عن أبيه: أنَّ رجلًا كان يأتي النبيَّ صلى الله عليه وسلم ومعه ابنٌ له، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "أتحبُّه؟ " فقال: أَحبَّك الله كما أُحبُّه، ففَقَدَه النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما فَعَلَ فلان؟ " قالوا: مات ابنُه، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "أما يَسرُّك أن لا تأتيَ بابًا من أبواب الجنة إلّا وَجَدْتَه يَنتظِرُك؟ " فقال رجل: أَلَه خاصّةً أو لِكُلِّنا؟ قال: "بل لِكُلِّكُم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، لمَا قدَّمتُ الذِّكر من تفرُّد التابعي الواحد بالرواية عن الصحابي [2].
কুররা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার ছেলেকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসতেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি তাকে ভালোবাসো?" সে বলল: আমি তাকে যেমন ভালোবাসি, আল্লাহ আপনাকে তেমনি ভালোবাসুন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (ছেলেটিকে) দেখতে পেলেন না। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কী করেছে?" লোকেরা বলল: তার ছেলে মারা গেছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি চাও না যে তুমি যখনই জান্নাতের কোনো দরজায় আসবে, তখনই তাকে তোমার জন্য অপেক্ষা করতে দেখবে?" এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল: এটা কি শুধু তার জন্যই, নাকি আমাদের সকলের জন্য? তিনি বললেন: "বরং তোমাদের সকলের জন্য।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 33/ (20366)، وقرن بمحمد بن جعفر يزيدَ بن هارون.وأخرجه أحمد أيضًا 24/ (15595) و 33/ (20365)، والنسائي (2009)، وابن حبان (2947) من طريقين عن شعبة، بهذا الإسناد.
[2] تقدم تعقيبنا على كلامه هذا عند الحديث رقم (97). المؤمنين يكفلهم إبراهيم في الجنة"، ولم يذكر فيه سارة، وسيأتي في "المستدرك" برقم (3439).وكذلك ما أخرجه البخاري في "صحيحه" (1386) في حديث سمرة بن جندب الطويل، وفيه: "والشيخ في أصل الشجرة إبراهيم عليه السلام، والصبيان حوله فأولاد الناس"، وفي رواية برقم (7047): "وأما الرجل الطويل الذي في الروضة فإنه إبراهيم صلى الله عليه وسلم، وأما الوِلدان الذين حوله فكل مولود مات على الفطرة".
1434 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا حميد بن عيَّاش الرَّمْلي، حدثنا مُؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا سفيان، عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أولادُ المؤمنينَ في جَبَلٍ في الجنة، يَكْفُلُهم إبراهيم وسارةُ حتى يَرُدَّهم إلى آبائِهم يومَ القيامة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মু'মিনদের অপ্রাপ্তবয়স্ক সন্তানরা জান্নাতের একটি পর্বতে থাকবে। ইবরাহীম ও সারা তাদের প্রতিপালন করবেন, যে পর্যন্ত না কিয়ামত দিবসে তাদের পিতামাতার কাছে ফিরিয়ে দেওয়া হয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد إلى أبي هريرة، من أجل مؤمَّل بن إسماعيل، وقد توبع، لكن قد اختُلف في رفعه ووقفه كما سيأتي. سفيان: هو الثوري، وأبو حازم: هو سلمان الأشجعي.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (210) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 263، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (925) و (1251)، وأبو منصور الديلمي - كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (379) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 69/ 189 من طرق عن مؤمَّل بن إسماعيل، به.ورواه وكيع عن سفيان، واختُلف عليه في رفعه ووقفه، فقد رواه محمد بن عبد الله بن سليمان عنه، عن سفيان به، مرفوعًا. أخرجه البيهقي في "القضاء والقدر" (634).وخالف محمدًا أبو بكر بن أبي شيبة، فأخرجه في "مصنفه" 3/ 379 عن وكيع، عن سفيان، عن ابن الأصبهاني، عن أبي حازم، عن أبي هريرة من قوله.ووقفه أيضًا عن سفيان يحيى بن سعيد القطان، فقد أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 69/ 190 من طريق مسدد، عن يحيى القطان، عن سفيان، به موقوفًا.وقد رجح الدارقطني وقفه كما في "العلل" له (2211)، حيث قال: والموقوف أشبه.قلنا: لكن مثل هذا الحديث له حكم المرفوع، فمثله لا يقال بالرأي، ويؤيد ذلك ما رواه أحمد 14/ (8324)، وابن حبان (7446) من وجه آخر عن أبي هريرة بإسناد حسن مرفوعًا: "ذراري المؤمنين يكفلهم إبراهيم في الجنة"، ولم يذكر فيه سارة، وسيأتي في "المستدرك" برقم (3439).وكذلك ما أخرجه البخاري في "صحيحه" (1386) في حديث سمرة بن جندب الطويل، وفيه: "والشيخ في أصل الشجرة إبراهيم عليه السلام، والصبيان حوله فأولاد الناس"، وفي رواية برقم (7047): "وأما الرجل الطويل الذي في الروضة فإنه إبراهيم صلى الله عليه وسلم، وأما الوِلدان الذين حوله فكل مولود مات على الفطرة".
1435 - حدثنا أبو بكر محمد بن داود بن سليمان، حدثنا عبد الله بن محمد بن ناجية، حدثنا رجاء بن محمد العُذْري، حدثنا عمرو بن محمد بن أبي رَزِين، حدثنا شعبة، عن مِسعَر، عن زياد بن عِلَاقة، عن عمِّه: أنَّ المغيرة بن شعبة سبَّ عليَّ بن أبي طالب، فقام إليه زيدُ بنُ أرقمَ، فقال: يا مُغيرةُ، ألم تعلم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن سبِّ الأموات، فلِمَ تسُبُّ عليًّا وقد مات؟ [1]هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه هكذا، إنما اتفقا على حديث الأعمش عن مجاهد عن عائشة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَسبُّوا الأمواتَ، فإنَّهم قد أَفضَوْا إلى ما قدَّموا" [2].
যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আল-মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গালি দিয়েছিলেন। তখন যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে দাঁড়ালেন এবং বললেন, হে মুগীরাহ! আপনি কি জানেন না যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃতদের গালি দিতে নিষেধ করেছেন? তাহলে আপনি আলীকে কেন গালি দিচ্ছেন, অথচ তিনি ইন্তিকাল করেছেন?
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل عمرو بن محمد بن أبي رزين، وباقي رجاله ثقات. مسعر: هو ابن كدام، وعم زياد بن علاقة: هو قطبة بن مالك، وله صحبة.وأخرجه أحمد 32/ (19288) عن محمد بن بشر، و (19315) عن وكيع، كلاهما عن مسعر، عن الحجاج بن أيوب مولى بني ثعلبة، عن قطبة بن مالك عمّ زياد بن علاقة.ورواية مسعر للحديث وقع فيها اضطراب، وقد أشار إلى الوهم فيها الدارقطني في "العلل" (1249)، والمحفوظ في الحديث أنه من رواية زياد بن علاقة عن المغيرة:فقد أخرج أحمد 30/ (18208) و (18209)، والترمذي (1982)، وابن حبان (3022) من طرق عن سفيان الثوري، عن زياد بن علاقة، عن المغيرة بن شعبة، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن سب الأموات. وفي رواية عن المغيرة بن شعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تسبوا الأموات فتؤذوا الأحياء". فجعله من مسند المغيرة بن شعبة.وأخرجه كهذا اللفظ الأخير أحمد (18210) عن عبد الرحمن، عن سفيان، عن زياد بن علاقة، قال: سمعت رجلًا عند المغيرة بن شعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. قلنا: والظاهر هذا الرجل المبهم هو زيد بن أرقم، والله أعلم.
[2] لم يتفقا على حديث عائشة هذا، وإنما أخرجه البخاري فقط برقم (1393) و (6516)، وهو في "مسند أحمد" 42/ (25470).
1436 - أخبرنا علي بن أحمد بن قُرْقُوب التَّمَّار بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا أبو اليَمَان، أخبرني شعيب بن أبي حمزة، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، حدثني نَوفَلُ بن مُسَاحِق، عن سعيد بن زيد، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لا تُؤذُوا مسلمًا بشَتْمِ كافر" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সাঈদ ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কোনো কাফিরকে গালি দিয়ে কোনো মুসলিমকে কষ্ট দিও না।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. إبراهيم بن الحسين: هو ابن ديزيل، وأبو اليمان: هو الحكم بن نافع.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 75، وفي "شعب الإيمان" (6253) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ضمن حديثٍ ابنُ قانع في "معجم الصحابة" 1/ 260 عن إبراهيم بن الهيثم البلدي، عن أبي اليمان، به.
1437 - أخبرنا أبو بكر محمد بن جعفر المزكِّي، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو كُرَيب [حدثنا معاوية بن هشام، عن عِمْران بن أنس المكّي، عن عطاءٍ، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم] [1]: "اذكُرُوا مَحاسِنَ موتاكُم، وكُفُّوا عن مَساوئِهم" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وهذه الأحاديث وجدتُها في الباب بعد نقل كتاب الجنائز، وسبيلُها أن تكون مخرَّجةً في مواضعها قبلَ هذا.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের মৃতদের ভালো গুণগুলো উল্লেখ করো এবং তাদের মন্দ গুণগুলো বলা থেকে বিরত থাকো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين المعقوفين بياض في النسخ الخطية، وأثبتناه من "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 75 و"شعب الإيمان" له (6252)، فقد رواه عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده ومتنه. لكن وقع في مطبوع "السنن الكبرى": عمران بن أبي أنس، وهو خطأ، صوابه: عمران بن أنس، وقد جاء على الصواب في مطبوع "الشعب"، فعمران بن أبي أنس مدني مصري، أما عمران بن أنس فهو مكي، وهو يروي عن عطاء، ويروي عنه معاوية بن هشام، قال الترمذي بعد إخراجه هذا الحديث بعينه: وعمران بن أبي أنس مصريٌّ أقدم وأثبت من عمران بن أنس المكي. قلنا: وعمران بن أنس المكي يكنى أبا أنس، أما عمران بن أبي أنس المدني فيكنى أبا شعيب، أفاده ابن عبد البر في "التمهيد" 17/ 237. وانظر "التاريخ الكبير" للبخاري 6/ 423، و"الثقات" لابن حبان 7/ 240، و"غنية الملتمس إيضاح الملتبس" للخطيب البغدادي ص 322 - 323.
[2] إسناده ضعيف لضعف عمران بن أنس المكي. أبو كريب: هو محمد بن العلاء، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (4900)، والترمذي (1019)، وابن حبان (3020) من طريق أبي كريب محمد بن العلاء، بهذا الإسناد. قال الترمذي: هذا حديث غريب، سمعت محمدًا يقول: عمران بن أنس المكي منكر الحديث.قلنا: لكن صحَّ النهي عن سب الأموات، فانظر أحاديث الباب السالفة قبله. في "الأوسط" (2910) عن سفيان بن عيينة، به.وعلّقه البخاري في "صحيحه" - كتاب الجنائز: باب غسل الميت ووضوئه بالماء والسدر - بين يدي الحديث (1253) عن ابن عباس موقوفًا. وقال الحافظ ابن حجر في "تغليق التعليق" 2/ 461: والذي يتبادر إلى ذهني أنَّ الموقوف أصح.وأخرج ابن أبي شيبة في "المصنف" أيضًا 3/ 267 من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن ابن عباس قال: لا تنجّسوا ميتكم؛ يعني: ليس عليه غسل.وأخرج عبد الرزاق (6101) عن ابن جريج، عن عطاء قال: سُئل ابن عباس: أعَلى مَن غسَّل ميتًا غُسْلٌ؟ قال: لا، إذن نجَّسوا صاحبهم، ولكن وضوءٌ. وانظر ما سيأتي برقم (1442).قوله: "لا تُنجِّسوا موتاكم" قال ابن حجر في "الفتح" 4/ 547: أي: لا تقولوا: إنهم نجس.
1438 - أخبرنا إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العدل، حدثنا أبو مُسلِم المسيَّبُ بن زُهير البغدادي، حدثنا أبو بكرٍ وعثمانُ ابنا أبي شَيْبة، قالا: حدثنا سفيان بن عُيينةَ، عن عمرو بن دِينار، عن عطاء بن أبي رَبَاح، عن ابن عباس قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لا تُنجِّسوا موتاكُم، فإنَّ المُسلِمَ لا يَنجَسُ حَيًّا أو مَيْتًا" [1]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের মৃতদের অপবিত্র করো না, কারণ মুসলিম জীবিত বা মৃত কোনো অবস্থাতেই অপবিত্র হয় না।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، رجاله ثقات عن آخرهم غير المسيب بن زهير فلم يؤثر فيه جرح أو تعديل، لكن روى عنه جمع من حفّاظ نيسابور، وهو في الغالب متابع في رواياته، فهو حسن الحديث إن شاء الله، إلا أنه قد خولف في رفع هذا الخبر، خالفه بقيّ بن مخلد - وكفاك به - في روايته عن أبي بكر بن أبي شيبة في "المصنف" 3/ 267 فوقفه، وهو المحفوظ.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 1/ 306، وفي "المعرفة" (7367) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد مرفوعًا. وقال بإثره: وهكذا روي من وجه آخر غريب عن ابن عيينة، والمعروف موقوف.وهذا الوجه الذي أشار إليه هو ما أخرجه الدارقطني في "سننه" (1811) - ومن طريقه ابن الجوزي في "التحقيق في مسائل الخلاف" (855)، والضياء في "المختارة" 11/ (245) - من طريق عبد الرحمن بن يحيى المخزومي، عن سفيان بن عيينة، به. قال ابن الجوزي بإثره: عبد الرحمن بن يحيى فيه ضعف.ورواه موقوفًا سعيد بن منصور في "سننه" - كما في "فتح الباري" 4/ 547 - ومن طريقه ابن المنذر في "الأوسط" (2910) عن سفيان بن عيينة، به.وعلّقه البخاري في "صحيحه" - كتاب الجنائز: باب غسل الميت ووضوئه بالماء والسدر - بين يدي الحديث (1253) عن ابن عباس موقوفًا. وقال الحافظ ابن حجر في "تغليق التعليق" 2/ 461: والذي يتبادر إلى ذهني أنَّ الموقوف أصح.وأخرج ابن أبي شيبة في "المصنف" أيضًا 3/ 267 من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن ابن عباس قال: لا تنجّسوا ميتكم؛ يعني: ليس عليه غسل.وأخرج عبد الرزاق (6101) عن ابن جريج، عن عطاء قال: سُئل ابن عباس: أعَلى مَن غسَّل ميتًا غُسْلٌ؟ قال: لا، إذن نجَّسوا صاحبهم، ولكن وضوءٌ. وانظر ما سيأتي برقم (1442).قوله: "لا تُنجِّسوا موتاكم" قال ابن حجر في "الفتح" 4/ 547: أي: لا تقولوا: إنهم نجس.
1439 - أخبرنا أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدثنا أبو الوليد محمد بن أحمد بن بُرْدٍ الأنطاكي، حدثنا الهَيثَم بن جَمِيل، حدثنا مُبارَك بن فَضَالة، عن الحسن، عن أنس قال: كبَّرتِ الملائكةُ على آدمَ أربعًا، وكبَّر أبو بكرٍ على النبيِّ صلى الله عليه وسلم أربعًا، وكبَّر عمرُ على أبي بكرٍ أربعًا، وكبَّر صُهيبٌ على عمرَ أربعًا، وكبَّر الحسنُ بن عليٍّ على عليٍّ أربعًا، وكبَّر الحسينُ على الحسنِ أربعًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، والمُبارَك بن فَضَالة من الزُّهد والعلم بحيثُ لا يُجرَح مثلُه، إلّا أنَّ الشيخين لم يخرجاه لِسوءِ حفظِه.ولهذا الحديث شاهد:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফেরেশতাগণ আদম (আঃ)-এর জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন, আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন, আর সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন, আর হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন, আর হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، وفي متنه نكارة، مبارك بن فضالة مختلف فيه، وقد كان يدلس ويسوِّي كما لخص بالقول فيه الحافظ ابن حجر، وهو هنا قد عنعن، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك": مبارك ليس بالحجة. وقال ابن حجر في "التلخيص الحبير" 2/ 120 - 121: وفيه موضعان منكران، أحدهما: أنَّ أبا بكر كبَّر على النبي، وهو يشعر بأنَّ أبا بكر أمَّ الناس في ذلك، والمشهور أنهم صلوا على النبي صلى الله عليه وسلم أفرادًا، والثاني: أنَّ الحسين كبَّر على الحسن، والمعروف أنَّ الذي أمَّ في الصلاة عليه سعيد بن العاص. قلنا: أما الثاني فنَعَم، وأما الأول فيرد على الحافظ أنه ليس بالضرورة أن يفهم منه أنَّ أبا بكر أمَّ الناس، فيجوز أن يكون صلَّى عليه فردًا وكبَّر أربعًا، وعلى كلٍّ فيبقى الإسناد ضعيفًا، والله أعلم. الحسن: هو ابن أبي الحسن البصري.وأخرجه الدارقطني (1816) من طريق محمد بن الوليد القلانسي، عن الهيثم بن جميل، بهذا الإسناد. وقال بإثره: محمد بن الوليد هذا ضعيف.
1440 - أخبرَناه أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا خُنَيس بن بكر بن خُنَيس، حدثنا الفُرات بن السائب الجَزَري، عن مَيمُون بن مِهْران، عن عبد الله بن عباسٍ قال: آخرُ ما كبَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على الجنائزِ أربعًا، وكبَّر عمرُ على أبي بكرٍ أربعًا، وكبَّر عبدُ الله بن عمر على عمر أربعًا، وكبَّر الحسنُ بن عليٍّ على عليٍّ أربعًا، وكبَّر الحسينُ بن عليٍّ على الحسنِ أربعًا، وكبَّرتِ الملائكةُ على آدمَ أربعًا [1].لستُ ممن يَخفَى عليه أنَّ الفُرات بن السائب ليس من شَرْط هذا الكتاب، وإنما أخرجتُه شاهدًا.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শেষবার জানাজার উপর চার তাকবীর দিয়েছিলেন। আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাজায় চার তাকবীর দিয়েছিলেন, আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাজায় চার তাকবীর দিয়েছিলেন, হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাজায় চার তাকবীর দিয়েছিলেন, হুসাইন ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাজায় চার তাকবীর দিয়েছিলেন, এবং ফিরিশতাগণ আদম (আঃ)-এর জানাজায় চার তাকবীর দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، الفرات بن السائب متروك الحديث كما قال الدارقطني، وقال ابن معين: ليس بشيء، وقال ابن حبان: كان ممن يروي الموضوعات عن الأثبات، لا تجوز الرواية عنه، وقال البخاري: منكر الحديث. وقد تابعه من هو أسوأ حالًا منه فلا يُفرح بمتابعته كما سيأتي.وأخرجه الدارقطني (1818) - ومن طريقه الحازمي في "الناسخ والمنسوخ" ص 124 - من طريق أحمد بن الوليد الفحام ويحيى بن زيد الفزاري، عن خنيس بن بكر، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 4/ 96 من طريق محمد بن زياد، عن ميمون بن مهران، به. لكن متابعة محمد بن زياد هذا لا يُفرَح بها، فقد قال ابن القيسراني في "تذكرة الحفاظ" (621): محمد بن زياد الجريري الحنفي يضع الحديث. وأخرجه الترمذي (1027) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (1335)، وأبو داود (3198) من طريق محمد بن كثير، عن سفيان بن عيينة، به فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وانظر ما سلف برقم (1340).