হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (141)


141 - فحدَّثَني عليُّ بن عيسى، حدثنا مُسدَّد بن قَطَنٍ، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا محمد بن بشْر، حدثنا محمد بن عمرو، حدثني أبي، عن أبيه علقمة بن وَقَّاص قال: مرَّ به رجلٌ له شَرَفٌ وهو بسوق المدينة فسلَّمَ عليه، فقال له علقمةُ: يا فلانُ، إنَّ لك رَحِمًا ولك حقًّا، وإني رأيتُك تدخلُ على هؤلاء الأمراء فتتكلَّم عندهم بما شاء الله أن تَكلَّمَ، وإني سمعتُ بلال بن الحارث المُزَني صاحبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ أحدكم ليتكلَّم بالكلمة من رِضْوانِ الله، ما يظنُّ أن تبلُغ ما بَلَغَت، فيكتبُ الله له بها رضوانه إلى يوم يلقاهُ، وإنَّ أحدكم ليتكلَّمُ بالكلمة من سَخَطِ الله، ما يظنُّ أن تَبلُغَ ما بَلَغَت، فيكتبُ الله عليه بها سَخَطَه إلى يوم يلقاه".قال علقمة: وَيحَكَ، فانظُر ماذا تقول، وماذا تكلَّمُ به، فرُبَّ كلامٍ مَنَعَني ما سمعتُه من بلال بن الحارث [1].قصَّر مالك بن أنس برواية هذا الحديث عن محمد بن عمرو، ولم يَذكُر علقمة ابن وقَّاص.




বিলাল ইবনুল হারিস আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (রাবী) আলকামা ইবনু ওয়াক্কাস বলেন: মাদীনার বাজারে সম্মানিত এক ব্যক্তি তাঁর পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন। আলকামা তাঁকে সালাম দিলেন। অতঃপর আলকামা তাঁকে বললেন, হে অমুক, আপনার সাথে আমার আত্মীয়তার সম্পর্ক আছে এবং আপনার একটি হকও (অধিকার) আছে। আমি আপনাকে দেখেছি আপনি এই আমিরদের (শাসকদের) কাছে প্রবেশ করেন এবং আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী তাদের সামনে কথা বলেন। আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী বিলাল ইবনুল হারিস আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের কেউ কেউ আল্লাহর সন্তুষ্টির এমন কথা বলে, যা কোথায় গিয়ে পৌঁছাবে, তা সে ধারণাও করে না। অথচ আল্লাহ এর বিনিময়ে তার জন্য কিয়ামতের দিন পর্যন্ত তাঁর সন্তুষ্টি লিখে দেন। আর তোমাদের কেউ কেউ আল্লাহর অসন্তুষ্টির এমন কথা বলে, যা কোথায় গিয়ে পৌঁছাবে, তা সে ধারণাও করে না। অথচ আল্লাহ এর বিনিময়ে তার জন্য কিয়ামতের দিন পর্যন্ত তাঁর অসন্তুষ্টি লিখে দেন।" আলকামা বললেন: তোমার দুর্ভাগ্য! অতএব তুমি কী বলছো এবং কী নিয়ে কথা বলছো, তা লক্ষ করো। কেননা বিলাল ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে আমি যা শুনেছি, তার কারণে বহু কথা (বলা) থেকে আমি বিরত থেকেছি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد كما سبق عند الحديث (137).وأخرجه ابن ماجه (3969) عن أبي بكر بن أبي شيبة -أخي عثمان- عن محمد بن بشر، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (142)


142 - أخبرني أبو بكر بن أبي نصر الداربردي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسي القاضي.وأخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة [1] العنزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارِمي؛ قالا: حدثنا القَعنبي فيما قَرأَ على مالك. وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا ابن أبي أُويس، حدثني مالك، عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبيه، عن بلال بن الحارث المُزَنِي، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الرجل ليتكلَّم بالكلمة من رِضْوانِ الله ما كان يظنُّ أَن تَبْلُغَ ما بَلَغَت، فيكتبُ الله له بها رضوانه إلى يوم يلقاهُ، وإنَّ الرجل ليتكلَّمُ بالكلمة من سَخَطِ الله ما كان يظنُّ أن تبلُغ ما بَلَغَت، فيكتبُ الله له بها سَخَطَه إلى يوم يلقاه" [2].قال الحاكم: هذا لا يُوهِنُ الإجماع الذي قدَّمنا ذكره، بل يزيده تأكيدًا بمتابعٍ مثل مالك، إلّا أنَّ القول فيه ما قالوه بالزِّيادة في إقامة إسناده.




বিলাল ইবনুল হারিস আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টিমূলক এমন কোনো কথা বলে যা সে কল্পনাও করেনি যে তার পরিণতি এতদূর পৌঁছবে, তখন আল্লাহ এর বিনিময়ে তার জন্য তাঁর সাক্ষাৎ লাভের দিন পর্যন্ত সন্তুষ্টি লিখে দেন। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি আল্লাহর অসন্তোষমূলক এমন কোনো কথা বলে যা সে কল্পনাও করেনি যে তার পরিণতি এতদূর পৌঁছবে, তখন আল্লাহ এর বিনিময়ে তার জন্য তাঁর সাক্ষাৎ লাভের দিন পর্যন্ত অসন্তোষ লিখে দেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في المطبوع إلى: مسلمة، بزيادة ميم في أوله.



[2] صحيح لغيره كسابقه، وهذا إسناد منقطع بين عمرو بن علقمة وبلال بن الحارث، وذكر علقمة بينهما أصح كما قال البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 107 وغيره.وهو في "موطأ مالك" -برواية يحيى الليثي- 2/ 985، وأخرجه النسائي في الرقائق من "سننه" كما في "التحفة" (2028) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك، بهذا الإسناد.وتابع مالكًا في هذا الانقطاع محمدُ بن عجلان عند النسائي أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (143)


143 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّورِيُّ، حدثنا أبو عاصم.وأخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكرَم البزَّاز ومحمد بن مسلمة الواسطي قالا: حدثنا يزيد بن هارون؛ قالا: حدثنا بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدِّه قال: سمعتُ نبي الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ويلٌ للذي يُحدِّث فيَكذِبُ ويُضحِكُ به القوم، ويلٌ له، ويلٌ له" [1]. هذا حديث رواه سفيان بن سعيد والحمَّادان وعبد الوارث بن سعيد وإسرائيل ابن يونس وغيرُهم من الأئمة عن بَهْز بن حكيم، ولا أعلمُ خلافًا بين أكثر أئمة أهل النَّقْل في عَدَالة بهز بن حكيم، وأنه يُجمَع حديثه، وقد ذكره البخاريُّ في "الجامع الصحيح" [2]، وهذا الحديث شاهد لحديث بلال بن الحارث المُزَنِي الذي قدَّمْنا ذكرَه. وقد روى سعيدُ بن إياس الجُرَيري عن حَكِيم بن معاوية، وروى عن أبي التَّيّاح الضُّبَعِي عن معاوية بن حَيْدةَ.




মু'আবিয়াহ ইবনু হায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ধ্বংস তার জন্য, যে কথা বলার সময় মিথ্যা বলে, যাতে সে লোকদের হাসাতে পারে। ধ্বংস তার জন্য, ধ্বংস তার জন্য।" এই হাদীসটি সুফিয়ান ইবনু সাঈদ, দুই হাম্মাদ, আব্দুল ওয়ারিস ইবনু সাঈদ, ইসরাঈল ইবনু ইউনুস এবং অন্যান্য ইমামগণ বাহয ইবনু হাকীম সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আমি হাদীস বর্ণনাকারীদের (আহলুন নাকল) বেশিরভাগ ইমামের মধ্যে বাহয ইবনু হাকীম-এর বিশ্বস্ততা নিয়ে কোনো মতপার্থক্য জানি না এবং তার হাদীস সংগৃহীত হয়। আর এটি ইমাম বুখারী "আল-জামি আস-সহীহ"-এ উল্লেখ করেছেন। এই হাদীসটি বিলাল ইবনুল হারিস আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের সমর্থন, যা আমরা পূর্বে উল্লেখ করেছি। আর সাঈদ ইবনু ইয়াস আল-জুরায়রী হাকীম ইবনু মু'আবিয়াহ থেকে বর্ণনা করেছেন এবং আবু তাইয়াহ আদ-দুবায়ী মু'আবিয়াহ ইবনু হায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه. أبو عاصم: هو الضحاك مخلد.وأخرجه أحمد 33 / (20055) و (20073) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33 / (20021) و (20046)، وأبو داود (4990)، والترمذي (2315)، والنسائي (11061) و (11591) من طرق -غير الطرق التي ذكرها المصنف- عن بهز بن حكيم، به. وقال الترمذي: حديث حسن.



[2] ذكره في كتاب الغسل في باب من اغتسل عريانًا وحده، بين يدي الحديث (278)، قال: وقال بهز عن أبيه عن جدِّه عن النبي صلى الله عليه وسلم: "الله أحقُّ أن يُستحيا منه من الناس". وخالف أيضًا عبدُ الله بن بشر فرواه عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر، وهو الطريق التالي عند المصنف، وعبد الله بن بشر لا بأس به لكن فيه كلام يؤخر روايته في المخالفة فلا يعتبر بها بخاصة في الأعمش والزهري، وقد قال الحاكم في "سؤالات السِّجزي له" (115): يحدِّث عن الأعمش بمناكير. ثم غفل فأخرج له في هذا الكتاب "المستدرك" هذا الحديث.إذًا فالقول قول الثلاثة الأُول، في أنَّ الحديث من رواية الأعمش عن أبي صالح، مع الخلاف على اسم الصحابي الذي روى عنه أبو صالح، ولا يضر ذلك، وقد توقف الدارقطني في الترجيح هذه الروايات المختلفة فقال: والله أعلم بالصواب.وحديث أبي بكر بن عياش أخرجه أحمد 17 / (11004) و (11123)، وابن حبان (3412) و (3414) من طرق عنه، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (144)


144 - حدثنا عليُّ بن حَمْشاذَ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق والعباس بن الفضل قالا: حدثنا أحمد بن يونس.وأخبرني أحمد بن محمد العنزي - واللفظ له - حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد قال: قال عمرُ: يا رسول الله، سمعتُ فلانًا يَذكُر ويُثْني خيرًا، زَعَمَ أَنك أعطيته دينارين، قال: "لكن فلانٌ ما يقول ذلك، ولقد أصابَ منِّي ما بين مئة إلى عَشَرة" قال: ثم قال: "وإنَّ أحدكم لَيَخْرُجُ من عندي بمسألته مُتأَبَّطَها - قال أحمد: أو نحوه - وما هي إلا نارٌ" قال: فقال عمر: يا رسول الله، فلِمَ تُعطيهم؟ قال: "ما أَصنَعُ؟ يسألوني ويأبى الله لى البخل" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه بهذه السِّياقة [2].وقد رواه عبد الله بن بشر الرَّقِّي عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر:




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি অমুককে বলতে শুনলাম যে সে আপনার প্রশংসা করছে এবং ভালো বলছে। সে দাবি করেছে যে আপনি তাকে দু’টি দীনার দিয়েছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কিন্তু অমুক তা বলে না। সে আমার কাছ থেকে একশত থেকে দশ-এর মধ্যবর্তী (কোনো পরিমাণ) লাভ করেছে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরপর বললেন, "তোমাদের কেউ কেউ আমার কাছ থেকে তার চাওয়া বস্তুটি বগলে চেপে ধরে বের হয় – (আহমদ বলেন, বা এর কাছাকাছি কিছু) – অথচ তা তার জন্য আগুন ছাড়া আর কিছুই নয়।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তাহলে আপনি কেন তাদের দেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি কী করতে পারি? তারা আমার কাছে চায়, আর আল্লাহ্ আমার জন্য কৃপণতা পছন্দ করেন না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح مع أنه قد اختُلف فيه على الأعمش، فقد رواه عنه أبو بكر بن عياش وأبو معاوية وحِبّان بن علي العنزي - وهو ضعيف - عن أبي صالح السمان، إلّا أنَّ ابن عياش جعله من حديث أبي صالح عن أبي سعيد، وأبا معاوية جعله من حديثه عن أبي هريرة، وحبان بن علي جعله من حديثه عن جابر بن عبد الله، كما في "العلل" للدارقطني (141)، والخلاف في الصحابي لا يضر.وخالف جريرُ بنُ عبد الحميد فرواه عن الأعمش عن عطية بن سعد العوفي عن أبي سعيد، أخرجه من هذا الطريق أحمد 17 / (11124)، وعطية العوفي ضعيف. وخالف أيضًا عبدُ الله بن بشر فرواه عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر، وهو الطريق التالي عند المصنف، وعبد الله بن بشر لا بأس به لكن فيه كلام يؤخر روايته في المخالفة فلا يعتبر بها بخاصة في الأعمش والزهري، وقد قال الحاكم في "سؤالات السِّجزي له" (115): يحدِّث عن الأعمش بمناكير. ثم غفل فأخرج له في هذا الكتاب "المستدرك" هذا الحديث.إذًا فالقول قول الثلاثة الأُول، في أنَّ الحديث من رواية الأعمش عن أبي صالح، مع الخلاف على اسم الصحابي الذي روى عنه أبو صالح، ولا يضر ذلك، وقد توقف الدارقطني في الترجيح هذه الروايات المختلفة فقال: والله أعلم بالصواب.وحديث أبي بكر بن عياش أخرجه أحمد 17 / (11004) و (11123)، وابن حبان (3412) و (3414) من طرق عنه، بهذا الإسناد.



[2] لعله يشير إلى ما أخرجه مسلم (1056) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن سلمان بن ربيعة قال: قال عمر بن الخطاب رضي الله عنه: قَسَمَ رسول الله صلى الله عليه وسلم قَسْمًا، فقلت: والله يا رسول الله لغيرُ هؤلاء كان أحقَّ به منهم، قال: "إنهم خيَّروني أن يسألوني بالفُحش أو يبخّلوني، فلستُ بباخلٍ". وأبو سفيان: هو طلحة بن نافع الواسطي، وجابر: هو ابن عبد الله رضي الله عنهما.وأخرجه البزار (235) عن نهار بن عثمان، عن معمر بن سليمان، بهذا الإسناد - وتحرَّف فيه معمَّر إلى: معتمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (145)


145 - حدَّثَناه أبو الفضل محمد بن إبراهيم المزكِّي، حدثنا الحسين بن محمد ابن زياد القَبَّاني، حدثنا داود بن رُشيد، حدثنا مُعمَّر [1] بن سليمان، عن عبد الله بن بشر، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، عن عمر قال: دَخَلَ رجلان على رسول الله صلى الله عليه وسلم فسألاهُ في شيءٍ، فدعا لهما بدينارين، فإذا هما يُثنيان خيرًا، فقال: "لكن فلانٌ ما يقول ذلك، ولقد أعطيتُه ما بين عشرةٍ إلى مئة فما يقول ذلك، فَإِنَّ أحدكم ليخرُجُ بصدقتِه من عندي متأبِّطَها، وإنما هي له نارٌ" فقلت: يا رسول الله، كيف تُعطيه وقد علمت أنه له نار؟ قال: "فما أصنَعُ؟ يَأْبَوْنَ إِلَّا أَنْ يسألوني، ويأبى الله لي البخل" [2]. أما معمَّر بن سليمان الرَّقِّي فلم يخرجاه، وقد خرَّج مسلم عن عبد الله بن بشر الرَّقِّى [3]، إلّا أنَّ هذا الحديث ليس بعِلَّةٍ لحديث الأعمش عن أبي صالح، فإنه شاهد له بإسناد آخر.




উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, দুজন লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করে কোনো বিষয়ে তাঁর কাছে সাহায্য চাইল। তখন তিনি তাদের দুজনকে দুটি স্বর্ণমুদ্রা (দিনার) দিলেন। এতে তারা দুজনেই তাঁর প্রশংসা করতে লাগল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কিন্তু অমুক ব্যক্তি এমন বলে না। অথচ আমি তাকে দশ থেকে একশো স্বর্ণমুদ্রার মধ্যবর্তী পরিমাণ দিয়েছি, তারপরও সে এমন বলে না। তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ আমার কাছ থেকে তার সাদাকা কাঁধের নিচে নিয়ে চলে যায়, অথচ তা তার জন্য আগুন।" আমি (উমার) বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কীভাবে তাকে দান করেন, যখন আপনি জানেন যে তা তার জন্য আগুন হবে?" তিনি বললেন, "আমি কী করতে পারি? তারা আমার কাছে না চেয়ে থাকতে চায় না, আর আল্লাহ আমার জন্য কৃপণতা অপছন্দ করেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في المطبوع في الموضعين إلى: معتمر. وأبو سفيان: هو طلحة بن نافع الواسطي، وجابر: هو ابن عبد الله رضي الله عنهما.وأخرجه البزار (235) عن نهار بن عثمان، عن معمر بن سليمان، بهذا الإسناد - وتحرَّف فيه معمَّر إلى: معتمر.



[2] حديث صحيح، وانظر الكلام عليه في الحديث السابق. الأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو سفيان: هو طلحة بن نافع الواسطي، وجابر: هو ابن عبد الله رضي الله عنهما.وأخرجه البزار (235) عن نهار بن عثمان، عن معمر بن سليمان، بهذا الإسناد - وتحرَّف فيه معمَّر إلى: معتمر.



145 [3] - هذا ذهولٌ، فإن مسلمًا لم يخرج له شيئًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (146)


146 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب من أصل كتابه، حدثنا محمد بن سنان القَزَّاز، حدثنا أبو عامر العَقَدي، حدثنا كَثير بن زيد قال: سمعتُ سالمًا يحدِّث عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا ينبغي للمُؤمن أن يكون لعَّانًا" [1].




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মু’মিনের উচিত নয় যে সে যেন বেশি অভিশাপকারী হয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزاز، وقد توبع، ومن فوقه ثقات غير كثير بن زيد فإنه صدوق حسن الحديث. أبو عامر العقدي: هو عبد الملك بن عمرو القيسي.وأخرجه الترمذي (2019) عن بُندار. وهو محمد بن بشار - عن أبي عامر العقدي، بهذا الإسناد.وقال: حديث حسن. وانظر ما بعده.وفي الباب عن عبد الله بن مسعود، سلف عند المصنف برقم (29) بلفظ: "ليس المؤمن بالطعّان ولا اللعَّان .. ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (147)


147 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكرَم البزَّاز، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا كثير بن زيد، عن سالم، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا ينبغي لمسلم أن يكونَ لعَانًا". قال سالمٌ: وما سمعتُ ابن عمر لَعَنَ شيئًا قطُّ" [1]. هذا حديث أسنده جماعةٌ من الأئمة عن كثير بن زيد، ثم أوقَفَه عنه حمَّادُ بن زيد وحده [2]، فأما الشيخان فإنهما لم يخرجا عن كثير بن زيد، وهو شيخٌ من أهل المدينة من أسلم كنيتُه أبو محمد، لا أعرفه يُجرَحُ في الرواية، وإنما تركاه لقلَّة حديثه، والله أعلم.ولهذا الحديث شواهدُ بألفاظ مختلفة، عن أبي هريرة وأبي الدَّرداء وسَمُرةَ بن جُندُب يَصِحُّ بمثلها الحديثُ على شرط الشيخين.فأما حديث أبي هريرة:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো মুসলিমের জন্য এটা শোভনীয় নয় যে সে অভিশাপদাতা (বা লানতকারী) হবে।” সালিম বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কখনো কোনো কিছুর উপর লানত করতে (অভিশাপ দিতে) শুনিনি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن من أجل كثير بن زيد.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4792) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الروياني في "مسنده" (1445) عن محمد بن إسحاق - وهو الصاغاني - عن عثمان بن عمر، به. وانظر ما قبله.



[2] أخرج رواية حماد هذه الطبراني في "المعجم الكبير" (13063)، ولفظه: ليس المؤمن بطعّان ولا لعّان. ورواية الوقف هذه شاذَّة لمخالفتها رواية الأكثرين عن كثير بن زيد مرفوعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (148)


148 - فأخبرناه أبو النَّضْر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارِمي وصالح بن محمد بن حبيب الحافظ قالا: حدثنا سعيد ابن سليمان الواسطي، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش، عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يجتمعُ أن تكونوا لعَّانِينَ صِدِّيقِينَ" [1].تابعه إسرائيلُ بن يونس عن أبي حصين:




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এটা হতে পারে না যে তোমরা একই সাথে অভিশাপকারী (লা'নতকারী) এবং সিদ্দীক (অতিশয় সত্যবাদী) হবে।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي بكر بن عياش. أبو حصين: هو عثمان بن عاصم، وأبو صالح: هو ذكوان السمّان.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (490)، والطبراني في "الأوسط" (5495)، وفي "الدعاء" (2080) من طريق إبراهيم بن إسحاق الصيني، عن قيس بن الربيع، عن أبي حصين، بهذا الإسناد. وإبراهيم الصيني متروك، وقيس فيه ضعف لكن يعتبر به.وأخرجه أحمد 14/ (8447) و (8782)، ومسلم (2597) من طريق العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة مرفوعًا بلفظ: "لا ينبغي لصدِّيق أن يكون لعّانًا". وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (149)


149 - حدثنا علي بن حَمْشَاذ العَدْل، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا عبد الله ابن رَجَاءٍ [1]، حدثنا إسرائيل، عن أبي حَصِين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يجتمعُ [2] أن تكونوا العَّانينَ صِدِّيقين" [3].وأما حديث أبي الدَّرداء:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমরা অভাবী (বা অন্যের মুখাপেক্ষী) এবং চরম সত্যনিষ্ঠ (সিদ্দীক) - এই দুটি একসঙ্গে হতে পারবে না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] في المطبوع: علي بن عبد الله بن رجاء، بزيادة "علي بن" وهو خطأ. لفسقهم. والثالث: لا يُرزقون الشهادة، وهي القتل في سبيل الله.



[2] في النسخ الخطية لا "تجتمعوا"، والمثبت من المطبوع، وهو الجادَّة. لفسقهم. والثالث: لا يُرزقون الشهادة، وهي القتل في سبيل الله.



149 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد الله بن رجاء - وهو الغُداني - وقد خالفه عبيد الله بن موسى عند الخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (19)، فرواه عن إسرائيل موقوفًا على أبي هريرة، والمحفوظ في حديث أبي هريرة الرفعُ كما في الحديث السابق.وهشام بن علي السدوسي، هكذا يقع منسوبًا في الغالب عند المصنف إلى القبيلة، وأحيانًا ينسبه إلى بلده سيراف، وهي مدينة في محافظة بوشهر الإيرانية على ساحل الخليج العربي، تبعد عن البصرة في العراق - وهي المدينة التي نزلها هشام بن علي وسكنها - ما يقرب من 400 كم. وهشام هذا وثّقه الدارقطني كما في "سؤالات الحاكم له" (237)، وذكره ابن حبان في "الثقات" 9/ 234، وانظر "تاريخ الإسلام" 6/ 843. لفسقهم. والثالث: لا يُرزقون الشهادة، وهي القتل في سبيل الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (150)


150 - فحدَّثَناه أبو بكر بن عبد الله، أخبرنا الحسن بن سفيان، حدثنا محمد بن عبد الله بن عمَّار، حدثنا المُعافى بن عِمْران، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلَمَ وأبي حازم، عن أم الدَّرداء قالت: سمعتُ أبا الدرداء يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يكون اللعَّانون شهداءَ ولا شفعاء" [1]. وقد خرَّجه مسلم بهذا اللفظ.وأما حديث سمُرةَ بن جندُب:




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যারা বেশি বেশি অভিশাপ দেয়, তারা (কিয়ামতের দিন) সাক্ষীও হতে পারবে না এবং সুপারিশকারীও হতে পারবে না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هشام بن سعد، وقد توبع. أبو حازم: هو سلمة ابن دينار.وأخرجه مسلم (2598) (86)، وأبو داود (4907) من طريقين عن هشام بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 45 / (27529)، ومسلم (2598) (85) من طريق معمر، ومسلم أيضًا، وابن حبان (5746) من طريق حفص بن ميسرة، كلاهما عن زيد بن أسلم وحده، عن أم الدرداء، به. قال النووي في "شرح مسلم": معناه: لا يشفعون يوم القيامة حين يشفع المؤمنون في إخوانهم الذين استوجبوا النار.وقوله: "ولا شهداء" فيه ثلاثة أقوال: أصحُّها وأشهرها: لا يكونون شهداء يوم القيامة على الأُمم بتبليغ رسلهم إليهم الرسالات. والثاني: لا يكونون شهداء في الدنيا، أي: لا تُقبل شهادتهم لفسقهم. والثالث: لا يُرزقون الشهادة، وهي القتل في سبيل الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (151)


151 - فحدَّثناه علي بن حَمْشَاذَ وعبد الله بن محمد الصَّيدلاني قالا: حدثنا محمد بن أيوب، حدثنا مُسلم بن إبراهيم، حدثنا، هشام، حدثنا قتادة، عن الحسن، عن سَمُرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَلاعَنُوا بِلَعْنةِ الله، ولا بغضب الله، ولا بالنَّارِ" [1].هذه الأحاديث التي خرَّجتُها في هذا الباب بألفاظها المختلفة كلُّها صحيحة الإسناد.




সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা একে অপরকে আল্লাহর লা'নত (অভিশাপ) দ্বারা, আল্লাহর গযব (ক্রোধ) দ্বারা, অথবা জাহান্নামের ভয় দেখিয়ে অভিশাপ দিও না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح، وسماع الحسن - وهو البصري - من سمرة صحيح، هكذا قال علي بن المديني وغيره فيما نقله الترمذي في "جامعه" (1237)، ومن جملة من صحَّح سماعَه البخاريُّ والمصنف فيما يأتي برقم (792)، وقال الحافظ الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 184: ثبت سماعُ الحسن من سمرة ولقيَه بلا ريبٍ، وقال في "تاريخ الإسلام" 2/ 502: سماعه منه ثابت، فالصحيح لزومُ الاحتجاج بروايته عنه، ولا عبرة بقول من قال من الأئمة: لم يسمع الحسن من سمرة، لأن عندهم علمًا زائدًا على ما عندهم من نفي سماعه منه. انتهى، وذهب جماعة إلى أنَّ رواية الحسن عن سمرة كتاب، قال العلائي في "جامع التحصيل": وذلك لا يقتضي الانقطاع. وانظر بيان اختلاف أهل العلم في هذه المسألة عند الزيلعي في "نصب الراية" 1/ 88 - 90.وأخرجه أبو داود (4906) عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1976) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن هشام الدَّستوائي، به.وأخرجه أحمد 33/ (20175) من طريق همّام بن يحيى، عن قتادة به.قوله: "ولا بالنار" أي: أن يقول: أدخلك الله النار، أو النار مثواك، ونحوه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (152)


152 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا الحسن بن سفيان الشَّيباني، حدثنا محمد سَلَمة المُرادي، حدثنا حجَّاج بن سليمان بن القُمْريِّ -ومات قبل ابن وهب - حدثنا أبو غسان المدني، عن أبي حازم، عن سهل بن سعدٍ الساعدي، أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ الله كريمٌ يحبُّ الكرم، ويحبُّ معالي الأخلاق ويكره سَفْسافَها" [1].




সাহল ইবনু সা'দ আস-সা'ইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা মহান দাতা (কারীম), তিনি দানশীলতা পছন্দ করেন, তিনি মহৎ চরিত্র পছন্দ করেন এবং নিকৃষ্ট (হীন) চরিত্র অপছন্দ করেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث حسن، وفي إسناده لينٌ من جهة حجاج بن سليمان -وهو الرُّعيني المصري- وإن تساهل المصنف فيما يأتي فقال: ثقة مأمون! وذكره ابن حبان في "الثقات" أيضًا، وقال ابن عدي: يحدث عن الليث وابن لهيعة أحاديث منكرة وإذا روى حجاج هذا عن غير ابن لهيعة فهو مستقيم إن شاء الله تعالى، أما أبو زُرعة الرازي فقال: منكر الحديث، وقال ابن يونس المصري في "تاريخه": في حديثه خطأ ومناكير. قلنا: لكن الحديث بطرقه وشاهده المذكور لاحقًا من حديث جابر حسنٌ إن شاء الله، وقد اختُلف فيه على أبي حازم - وهو سلمة بن دينار - كما سيأتي في الحديث التالي. أبو غسان المدني: هو محمد بن بن مطرِّف. وتابعه على روايته من حديث أبي حازم عن طلحة بن كريز مرسلًا: سفيانُ الثوري في الحديث التالي عند المصنف، وعبدُ العزيز بن أبي حازم عند ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (7)، كلاهما عن أبي حازم به. وهو الراجح، والله تعالى أعلم.وتابع أبا حازم في روايته إياه عن طلحة بن كَريزِ مرسلًا سليمانُ بنُ سُحَيم، أخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 9/ 100، وهناد في "الزهد" (828)، والشاشي في "مسنده" (20)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (628) من طريق حجّاج بن أرطاة، عن سليمان بن سحيم، عن طلحة بن عبيد الله بن كريز، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، وفي أوله: "إنَّ الله جوادٌ يحب الجُود". وأخطأ الشاشي فظنَّ طلحة هذا هو الصحابي طلحة بن عبيد الله التَّيمي فأدخله في مسنده، والصواب أنه آخر من التابعين.وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله مرفوعًا، أخرجه البزار (1967 - كشف الأستار)، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (10)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2004)، والطبراني في "الأوسط" (6906)، وسنده حسن.وله شواهد أخرى، أحدها من حديث الحسين بن علي عند ابن عدي في "الكامل" 3/ 6، والطبراني في "الكبير" (2894)، وآخر من حديث سعد بن أبي وقاص عند ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (8)، وثالث من حديث ابن عباس عند أبي نعيم في "الحلية" 5/ 28، وأسانيدها واهية لا تصلح للتقوية.والسَّفساف: الأمر الحقير والرديء من كل شيء، وهو ضدُّ المعالي والمكارم، وأصله ما يطير من غبار الدقيق إذا نُخِل، والتراب إذا أُثير. قاله ابن الأثير في "النهاية" (سفسف).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (153)


153 - حدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العنبري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبدي.وحدثنا أحمد بن بن محمد بن سَلَمة، حدثنا عثمان بن سعيد؛ قالا: حدثنا أحمد ابن يونس، حدثنا فُضَيل بن عيَاض، حدثنا الصنعاني محمد بن ثَوْر، عن مَعمَر، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله كريمٌ يحبُّ الكرم ومعالي الأخلاق، ويُبغِضُ سَفْسافَها" [1]. هذا حديث صحيح الإسنادين جميعًا ولم يُخرجاه، وحجَّاج بن قُمْريٍّ شيخٌ من أهل مصر ثقةٌ مأمونٌ، ولعلَّهما أعرضا عن إخراجه بأنَّ الثوريَّ أعضَلَه.




সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা মহামহিম (উদার), তিনি উদারতা ও মহৎ চরিত্র পছন্দ করেন এবং তিনি নিম্নমানের (তুচ্ছ) চরিত্র ঘৃণা করেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث حسن، ورجال إسناده ثقات، لكن اختلف فيه كما سيأتي.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (6)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (2)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 1/ 269، والطبراني في "الكبير" (5928)، و"الأوسط" (2940)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 255، والبيهقي في "الآداب" (187)، و"الأسماء والصفات" (88)، و"شعب الإيمان" (7646) من طرق عن أحمد بن عبد الله بن يونس، بهذا الإسناد.وتابع معمرًا على هذه الرواية أبو غسان المدني كما في الحديث السابق.وخالف عبدُ الرزاق محمد بن ثَوْر فرواه عن معمر عن أبي حازم عن أبي حازم عن طلحة بن عبيد الله بن كريز عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (20150)، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه البيهقي في "السنن" 10/ 191، و"الشعب" (7648)، و"الأسماء والصفات" (89)، والبغوي في "شرح السنة" (3503). وتابعه على روايته من حديث أبي حازم عن طلحة بن كريز مرسلًا: سفيانُ الثوري في الحديث التالي عند المصنف، وعبدُ العزيز بن أبي حازم عند ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (7)، كلاهما عن أبي حازم به. وهو الراجح، والله تعالى أعلم.وتابع أبا حازم في روايته إياه عن طلحة بن كَريزِ مرسلًا سليمانُ بنُ سُحَيم، أخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 9/ 100، وهناد في "الزهد" (828)، والشاشي في "مسنده" (20)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (628) من طريق حجّاج بن أرطاة، عن سليمان بن سحيم، عن طلحة بن عبيد الله بن كريز، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، وفي أوله: "إنَّ الله جوادٌ يحب الجُود". وأخطأ الشاشي فظنَّ طلحة هذا هو الصحابي طلحة بن عبيد الله التَّيمي فأدخله في مسنده، والصواب أنه آخر من التابعين.وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله مرفوعًا، أخرجه البزار (1967 - كشف الأستار)، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (10)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2004)، والطبراني في "الأوسط" (6906)، وسنده حسن.وله شواهد أخرى، أحدها من حديث الحسين بن علي عند ابن عدي في "الكامل" 3/ 6، والطبراني في "الكبير" (2894)، وآخر من حديث سعد بن أبي وقاص عند ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (8)، وثالث من حديث ابن عباس عند أبي نعيم في "الحلية" 5/ 28، وأسانيدها واهية لا تصلح للتقوية.والسَّفساف: الأمر الحقير والرديء من كل شيء، وهو ضدُّ المعالي والمكارم، وأصله ما يطير من غبار الدقيق إذا نُخِل، والتراب إذا أُثير. قاله ابن الأثير في "النهاية" (سفسف).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (154)


154 - كما أخبرَناه الحسن بن حَلِيم المروَزي، حدثنا أبو الموجِّه، حدثنا عَبْدانُ، حدثنا عبد الله، عن سفيان قال: سمعتُ أبا حازم، عن طلحة بن عبيد الله [1] بن كريز الخُزاعي، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله كريمٌ يحبُّ الكرم ومعالي الأمور، ويُبغِضُ - أو قال: يَكرَه - سَفْسافَها" [2]. وهذا لا يُوهِنُ حديث سهل بن سعد على ما قدَّمتُ ذِكرَه من قَبُول الزّيادات من الثقات، والله أعلم.




তলহা ইবনে উবাইদুল্লাহ ইবনে কুরাইয আল-খুযাঈ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা কারীম (পরম দাতা)। তিনি বদান্যতা এবং মহৎ বিষয়াদি ভালোবাসেন, আর তিনি তুচ্ছ বিষয়াদি অপছন্দ করেন"—অথবা তিনি বলেছেন: "ঘৃণা করেন"। আর এটি সহল ইবনে সা’দ-এর হাদীসকে দুর্বল করে না, যেমনটি আমি নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের পক্ষ থেকে অতিরিক্ত সংযোজন গ্রহণ সম্পর্কে পূর্বে উল্লেখ করেছি। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عبد، والذي في مصادر ترجمة طلحة باتفاق: عُبيد الله، مصغرًا. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرج طرفًا منه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 347 عن بشر -وهو ابن محمد المروزي- عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام عليه في الحديث السابق.



[2] حديث حسن، وهذا إسناد مرسل، طلحة بن عبيد الله بن كَرِيز تابعيٌّ ثقة، ومن دونَه ثقات. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرج طرفًا منه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 347 عن بشر -وهو ابن محمد المروزي- عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام عليه في الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (155)


155 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن أيوب، حدثنا أبو الرَّبيع الزَّهْراني وأحمد بن إبراهيم قالا: حدثنا حماد بن زيد، عن الصَّقْعَب بن زهير.وحدثني محمد بن صالح بن هانئ - واللفظ له - حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو قُدَامة، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي قال: سمعتُ الصَّقعَب بن زهير يحدِّث عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله بن عمرو قال: أتى النبيَّ- صلى الله عليه وسلم أعرابيٌّ عليه جُبَّة من طَيَالسةٍ مكفوفةٍ بالدِّيباج - أو مزرورة بالديباج [1] - فقال: إنَّ صاحبَكم هذا يريد يرفعُ كلَّ راعٍ وابنِ راعٍ، ويضعُ كلَّ فارسٍ وابن فارسٍ، فقام النبي صلى الله عليه وسلم مُغْضَبًا، فأخذ بمَجامِعِ ثوبه فاجتَذَبَه وقال: "ألا أَرى عليك ثيابَ مَن لا يَعقِلُ" ثم رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلس فقال: "إنَّ نوحًا لما حَضَرَته الوفاةُ دعا ابنَيهِ فقال: إني قاصٌّ عليكما الوصيةَ، آمرُكما باثنين وأنهاكما عن اثنين: أنهاكما عن الشِّرك والكِبْر، وآمرُكما بلا إله إلا الله، فإنَّ السماواتِ والأرضَ وما فيهما لو وُضِعَت في كِفَّة الميزان، ووُضِعَت لا إله إلا الله في الكِفَّة الأخرى، كانت أرجحَ منهما، ولو أنَّ السماواتِ والأرضَ وما فيهما كانت حَلْقَةً فَوُضِعَت لا إله إلّا الله عليهما، لقَصَمَتهُما، وآمركما بسبحانَ الله وبحمدِه، فإنها صلاةُ كلِّ شيء، وبها يُرزَقُ كلُّ شيء" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجا للصَّعَب بن زهير، فإنه ثقةٌ قليل الحديث.155 م - سمعت أبا الحسن علي بن محمد بن عمر يقول: سمعت عبد الرحمن ابن أبي حاتم يقول: سألت أبا زُرْعة عن الصَّقْعب بن زهير، فقال: ثقة، وهو أخو العلاء بن زهير.وهذا من الجنس الذي نقول: إنَّ الثقة إذا وَصَلَه، لم يَضُرَّه إرسالُ غيره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তার পরনে ছিল একটি জুব্বা, যা তয়ালিসা (এক ধরণের সবুজ ডোরাকাটা বস্ত্র) দ্বারা তৈরি এবং তাতে রেশমের পাড় লাগানো ছিল—অথবা রেশমের বোতাম লাগানো ছিল। সে বলল: "নিশ্চয়ই আপনাদের এই সঙ্গী (মুহাম্মদ) চান যে তিনি সকল রাখাল ও রাখালের পুত্রদেরকে উঁচু করে দেবেন এবং সকল অশ্বারোহী (সৈনিক) ও অশ্বারোহীর পুত্রদেরকে নিচে নামিয়ে দেবেন।"

তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত অবস্থায় উঠে দাঁড়ালেন, অতঃপর তিনি লোকটির কাপড়ের প্রান্ত ধরে সজোরে টান দিলেন এবং বললেন: "আমি কি তোমার গায়ে এমন ব্যক্তির পোশাক দেখছি না যার কোনো বোধ নেই?" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে এসে বসলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই নূহ (আঃ)-এর যখন মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তিনি তাঁর দুই পুত্রকে ডেকে বললেন: 'আমি তোমাদেরকে উপদেশ দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে দুটি বিষয়ের আদেশ করছি এবং দুটি বিষয় থেকে নিষেধ করছি। আমি তোমাদেরকে শিরক এবং অহংকার (কিবর) থেকে নিষেধ করছি। আর আমি তোমাদেরকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'-এর আদেশ করছি। কারণ, আসমানসমূহ ও জমিন এবং এতদুভয়ের মধ্যে যা কিছু আছে, যদি তা দাঁড়িপাল্লার এক পাল্লায় রাখা হয় এবং 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' অন্য পাল্লায় রাখা হয়, তবে এটি তাদের চেয়ে বেশি ভারী হবে। আর যদি আসমানসমূহ ও জমিন এবং তাদের মধ্যস্থিত সবকিছু যদি একটি গোলাকার কড়ার (হালকা) মতো হয় এবং তার উপর 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' স্থাপন করা হয়, তবে তা সেটিকে ভেঙে চুরমার করে দেবে। আর আমি তোমাদেরকে 'সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি'-এর আদেশ করছি। কারণ, এটি হলো সবকিছুর সালাত (তাসবীহ বা ইবাদত) এবং এর দ্বারাই সবকিছুর রিযক প্রদান করা হয়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] قوله: "أو مزرورة بالديباج" سقط من المطبوع. وأخرجه أحمد أيضًا 11/ (7101) عن وهب بن جرير، بإسناده.الطيالسة: جمعُ الطَّيلسان، وهو نوع من الأكسية. والديباج: ضرب من الثياب منسوج من الحرير.



[2] إسناده صحيح. أبو الربيع الزهراني: هو سليمان بن داود العَتَكي، وأبو قدامة: هو عبيد الله بن سعيد السرخسي.وأخرجه أحمد 11/ (6583) عن سليمان بن حرب، عن حماد بن زيد، بإسناده. وأخرجه أحمد أيضًا 11/ (7101) عن وهب بن جرير، بإسناده.الطيالسة: جمعُ الطَّيلسان، وهو نوع من الأكسية. والديباج: ضرب من الثياب منسوج من الحرير.



156 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (156)


156 - فقد أخبرني علي بن عيسى الحِيرِي، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيانُ، عن ابن عجلان، عن زيد بن أسلم قال: قال رجل للنبي صلى الله عليه وسلم: ما رأيتُ رجلًا أعطى لراعي غنمٍ من محمدٍ، ثم ذكره بنحوٍ منه.




যায়দ ইবনু আসলাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেয়ে কোনো মেষপালককে অধিক দানশীল আর কাউকে দেখিনি। এরপর তিনি (রাবী) অনুরূপভাবে বর্ণনা করলেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (157)


157 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدلُ، حدثنا أحمد بن محمد بن عاصم الرازيُّ، حدثنا ابن نُمَير ويحيى بن أيوب وأبو موسى الأنصاري ومنصور بن أبي مُزاحِم ومحمد بن الصَّبّاح قالوا: حدثنا أبو بكر بن عيَّاش.وأخبرني عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا الحسن ابن محمد الطَّنافسي [1]، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش.وحدثنا علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا شُجَاع بن مخلد وإسماعيل بن سالم قالا: حدثنا أبو بكر، عن أبي حصين ـ وفي حديث إسماعيل بن سالم: حدثنا أبو حصين - عن أبي بُرْدةَ قال: كنت جالسًا عند عبيد الله بن زياد فأُتي برؤوس الخوارج، كلما جاء رأسٌ قلت: إلى النار، فقال لي عبد الله بن يزيد الأنصاري: أوَلا تَعلَمُ يا ابنَ أخي أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ عَذَابَ هذه الأُمَّةِ جُعِلَ فِي دنياها" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولا أعلم له عِلَّة، ولم يُخرجاه.وله شاهد صحيح:




আবূ বুরদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উবাইদুল্লাহ ইবনে যিয়াদের নিকট বসা ছিলাম। অতঃপর খারেজীদের কিছু মস্তক আনা হলো। যখনই একটি মাথা আনা হতো, আমি বলতাম: জাহান্নামের দিকে যাও। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াযীদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: হে আমার ভাতিজা, তুমি কি জানো না যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই এই উম্মতের শাস্তি দুনিয়াতেই নির্ধারণ করা হয়েছে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرّف في المطبوع إلى: الطيالسي.



[2] حديث ضعيف لاضطرابه - وليس كما قال المصنف: لا أعلم له علة- فقد اختُلف فيه على أبي بردة اختلافًا كثيرًا في الإسناد والمتن كما أشار إلى ذلك الإمام البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 38 - 40، ومن ضمن الاختلاف في المتن قوله: "إنَّ أمتي أمة مرحومة، ليس عليها في الآخرة حساب ولا عذاب .. " وهو الآتي عند المصنف برقم (7841) و (8577)، وأعلَّه البخاري في "تاريخه" وقال: والخبر عن النبي صلى الله عليه وسلم في الشفاعة وأنَّ قومًا يعذَّبون ثم يخرجون أكثر وأبين وأشهر. وانظر التعليق على الحديث (19678) من "مسند أحمد".ابن نمير: هو محمد بن عبد الله بن نمير، وأبو موسى الأنصاري: هو إسحاق بن موسى الأنصاري الخطمي، وأبو حصين: هو عثمان بن عاصم بن حُصين.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9341) عن أبي عبد الله الحاكم، عن علي بن عيسى، بإسناده.وأخرجه البخاري في "تاريخه" 1/ 38، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 361، والبغوي في "معجم الصحابة" (1623)، والطحاوي في "شرح المشكل" (268)، وأبو نعيم الأصبهاني في "تاريخ أصبهان" 1/ 66، والحلية 8/ 308، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1000)، والبيهقي في "الشعب" (9361)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 334 - 335 من طرق عن أبي بكر بن عياش، به.وسيأتي من طريق أبي بكر بن عياش أيضًا برقم (7842)، وبرقم (7841) من حديث رباح بن الحارث عن أبي بردة عن رجل من الأنصار عن أبيه، وله صحبة، وبرقم (8577) من حديث سعيد بن أبي بردة عن أبيه عن أبي موسى الأشعري.وفي الباب عن أنس بن مالك عند ابن ماجه (4292)، وسنده ضعيف جدًا.وعن أبي هريرة موقوفًا عند إسحاق بن راهويه في "مسنده - قسم أبي هريرة" (227)، وأبي يعلى (6204) بلفظ: إنَّ هذه الأمة أمة مرحومة، لا عذاب عليها إلَّا ما عذَّبت هي أنفسها، قيل: وكيف تعذب أنفسها؟ قال: أما كان يوم النهروان عذابًا؟ أما كان يوم الجمل عذابًا؟ أما كان يوم صفين عذابًا؟ وسنده صحيح، وليس فيه ذكر للآخرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (158)


158 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ، حدثنا موسى بن هارون والحسن بن سفيان قالا: حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا يحيى بن زكريا [1] بن إبراهيم بن سُوَيد النَّخَعي - وكان ثقةً - عن الحسن بن الحَكَم النَّخَعي، عن أبي بُردة قال: سمعتُ عبد الله بن يزيد يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "عذابُ أُمتي في دُنياها" [2].




আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমার উম্মতের শাস্তি তাদের দুনিয়াতেই।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرّف لفظ "بن" في النسخ الخطية والمطبوع إلى: عن، فصارا راويين، وليس كذلك، ويحيى ابن زكريا بن إبراهيم ترجمه غير واحد منهم ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 145 وذكر أنه روى عن الحسن بن الحكم وروى عنه عثمان بن أبي شيبة، وقال: سألت أبي عنه فقال: ليس به بأس، صالح الحديث.



[2] حديث مضطرب كسابقه.وأخرجه ابن حبان في ترجمة الحسن بن الحكم النخعي من "المجروحين" 1/ 233، والطبراني في "الأوسط" (7164)، و"الصغير" (893) من طريقين عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (159)


159 - حدثنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيْرفي بمَرُو، حدثنا أبو قلابة الرَّقاشي، حدثنا أزهَرُ بن سعد، حدثنا حاتم بن أبي صغيرة، عن أبي بلج، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه قال: ذُكِرَ الطاعونُ عند أبي موسى الأشعريِّ، فقال أبو موسى: سألنا عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "وَخْزُ إخوانكم - أو قال [1]: أعدائكم - من الجنِّ، وهو لكم شهادةٌ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وهكذا رواه أبو عَوَانة عن أبي بَلْج:




আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্লেগ (তাউন) সম্পর্কে আলোচনা করা হলো। তখন আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি হলো তোমাদের জিন ভাইদের - অথবা তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের জিন শত্রুদের - খোঁচা (আঘাত)। আর এটি তোমাদের জন্য শাহাদাত (শহীদের মর্যাদা)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] قوله: "أو قال" ليس في نسخنا الخطية، وأشار في حاشية (ص) إلى وجوده في نسخة.



[2] إسناده حسن. أبو قلابة الرقاشي: هو عبد الملك بن محمد البصري الضرير، وأبو بلج: هو يحيى بن أبي سليم.وأخرجه الروياني في "مسنده" (514) عن نصر بن علي، عن أزهر بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (3901) من طريق ابن أبي عدي، عن حاتم بن أبي صغيرة، به. وانظر ما بعده.وأخرج نحوه أحمد 32/ (19528) و (19743) من طريق زياد بن علاقة، عن رجل، عن أبي موسى. وجاء الرجل مسمّى عنده في (19744) بأسامة بن شريك.وله طرق أخرى عن أبي موسى تقوِّيه، ولذلك ذهب الحافظ ابن حجر في "الفتح" 17/ 511 - 512 إلى تصحيحه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (160)


160 - أخبرنيه أبو الطاهر عبد الله بن محمد الدِّهْقان، حدثنا أبو بكر بن رجاء ابن السِّنْدي، حدثنا عباس بن عبد العظيم العَنبَري ومحمد بن أبي عتَّاب قالا: حدثنا يحيى بن حمَّاد، حدثنا أبو عَوَانة، عن أبي بَلْج، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه عبد الله بن قيس، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن كسابقه من أجل أبي بلج. أبو بكر بن رجاء: هو محمد بن محمد بن رجاء الإسفراييني الحافظ، وأبو عوانة: هو وضَّاح اليَشْكُري.وأخرجه أحمد 32 / (19708) عن بكر بن عيسى، عن أبي عوانة، بهذا الإسناد.