হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1441)


1441 - أخبرنا أبو علي محمد بن عليٍّ الواعظ ببُخارى، حدثنا علي بن عبد الله بن مُبشِّرٍ الواسطي، حدثنا أحمد بن سِنَان، حدثنا عبد الرحمن بن مَهْدي، حدثنا سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن طلحة بن عبد الله بن عَوف، قال: صلَّى ابنُ عباسٍ على جنازةٍ، فقرأ بفاتحة الكتاب، فقلتُ له، فقال: إنَّه من السُّنة، أو من تَمَامِ السُّنة [1]. هذا حديث صحيح على شرطهما، ولم يُخرجاه!




আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি এক জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং তাতে কিতাবের প্রারম্ভিকা (সূরা ফাতিহা) পাঠ করলেন। (রাবী তালহা বলেন) আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: নিশ্চয়ই এটা সুন্নাহর অংশ, অথবা সুন্নাহর পরিপূর্ণতার অন্তর্ভুক্ত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة. وأخرجه الترمذي (1027) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (1335)، وأبو داود (3198) من طريق محمد بن كثير، عن سفيان بن عيينة، به فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وانظر ما سلف برقم (1340).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1442)


1442 - حدثنا أبو علي الحسين بن عليٍّ الحافظ، حدثنا أبو العباس أحمد بن محمد الهَمْداني، حدثنا أبو شَيْبة إبراهيم بن عبد الله، حدثنا خالد بن مَخلَد، حدثنا سليمان بن بلال، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عِكْرمة، عن ابن عباس قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ليس عليكم في غَسْلِ ميِّتِكم غُسْلٌ إذا غَسَّلتُموه، فإنَّ ميِّتَكم ليس بنَجِسٍ، فَحَسْبُكم أن تَغْسِلوا أيديَكم" [1].هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط البخاري، ولم يُخرجاه. وفيه رَفْضٌ لحديثٍ مختلَفٍ فيه على محمد بن عمرٍو بأسانيد: "مَن غسَّلَ ميتًا فليغتسل" [2]. ‌‌أول كتاب الزكاة




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যখন তোমাদের মৃত ব্যক্তিকে গোসল করাও, তখন তোমাদের জন্য (নিজেরা) গোসল করা আবশ্যক নয়, কেননা তোমাদের মৃত ব্যক্তি অপবিত্র (নাজিস) নয়। তোমাদের জন্য তোমাদের হাত ধোয়াই যথেষ্ট।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، وخالد بن مخلد - وهو القطواني -: له مناكير، وقد خالف الثقات، فقد رواه هنا عن سليمان بن بلال مرفوعًا، ورووه عن سليمان موقوفًا، وهو الصواب كما سيأتي.وأخرجه البيهقي 1/ 306 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد، مرفوعًا. وقال بإثره: هذا ضعيف، والحمل فيه على أبي شيبة كما أظن. قلنا: وأبو شيبة، وهو إبراهيم بن أبي بكر بن أبي شيبة، أقوى وأوثق من خالد بن مخلد، فالحملُ فيه على خالد أولى من الحمل عليه، والله أعلم.وأخرجه مرفوعًا كذلك: ابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (38) و (304)، والدارقطني (1839) عن أحمد بن محمد بن سعيد الهمداني، به.وخالف خالدًا في رفعه: أبو سلمة منصور بن سلمة عند ابن شاهين (39) و (305)، والبيهقي 1/ 306، ومعلَّى بن منصور عند البيهقي 1/ 306، وعبد الله بن وهب عند البيهقي 3/ 398، فرووه - وهم ثقات - عن سليمان بن بلال، به موقوفًا علي ابن عباس.ويؤيد وقفه ما رواه عبد الرزاق (6101) عن ابن جريج، عن عطاءٍ قال: سئل ابن عباس: أعلى من غسل ميتًا غسل؟ قال: لا، قد إذًا نجَّسوا صاحبهم، ولكن وضوءٌ.وانظر ما سلف برقم (1438).



[2] تعقبه الذهبي في "تلخيص المستدرك" قائلًا: بل نعمل بهما فيستحب الغسل. قلنا: وحديث "من غسل ميتًا فليغتسل" أخرجه أحمد 13/ (7689)، وأبو داود (3161)، وابن ماجه (1463)، والترمذي (993)، وابن حبان (1161) من حديث أبي هريرة مرفوعًا، ورجاله ثقات إلّا أنه اختلف في رفعه ووقفه أيضًا. انظر لزامًا تعليقنا على "مسند أحمد" (7689).قال الترمذي: وقد اختلف أهل العلم في الذي يغسل الميت، فقال بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم: إذا غسل ميتًا فعليه الغسل، وقال بعضهم: عليه الوضوء، وقال مالك: أستحب الغسل من غسل الميت ولا أرى ذلك واجبًا، وهكذا قال الشافعي، وقال أحمد: أرجو أنه لا يجب عليه الغسل، وإنما الوضوء فأقل ما قيل فيه، وقال إسحاق: لا بد من الوضوء. وقد روي عن عبد الله بن المبارك أنه قال: لا يغتسل ولا يتوضأ من غسل الميت.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1443)


1443 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنَان القَزَّاز، حدثنا عمرٌو بن عاصم الكِلَابي، حدثنا عِمْران بن داوَرَ [1] القَطَّان، حدثنا مَعمَر بن راشد، عن الزُّهري، عن أنس بن مالكٍ، قال: لما تُوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ارتَدَّتِ العرب، فقال عمر بن الخطّاب: يا أبا بكر، أتريدُ أن تُقاتِلَ العرب؟ قال: فقال أبو بكر: إنَّما قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أُمِرتُ أن أقاتلَ الناس حتى يَشْهَدُوا أن لا إله إلّا الله، وأنِّي رسول الله، ويُقِيمُوا الصلاة، ويُؤتُوا الزكاة"، والله لو مَنَعوني عَنَاقًا مما كانوا يُعطُونَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، لأُقاتِلنَّهم عليه. قال عمر: فلمَّا رأيتُ رأيَ أبي بكرٍ قد شُرِحَ عليه، عَلِمتُ أنه الحقّ [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، غير أنَّ الشيخين لم يُخرجا عِمْرانَ القَطَّان، وليس لهما حُجَّة في تركه، فإنه مستقيم الحديث.وشاهدُه حديث أبي العَنْبَس ولم يُخرجاه:




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তখন আরবরা মুরতাদ (ইসলাম ত্যাগ) হয়ে গেল। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আবূ বকর! আপনি কি আরবদের সাথে যুদ্ধ করতে চান? তিনি (আবূ বকর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল, আর তারা সালাত (নামাজ) প্রতিষ্ঠা করে ও যাকাত আদায় করে।" আল্লাহর শপথ! তারা যদি একটি বকরীর বাচ্চা (ছানাক) দিতেও অস্বীকার করে যা তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিত, তবুও আমি অবশ্যই এর জন্য তাদের সাথে যুদ্ধ করব। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই মতকে স্পষ্টরূপে বুঝতে পারলাম, তখন আমি জানতে পারলাম যে এটাই সত্য।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: داود. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أُمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلّا الله، فإذا قالوها، وصلوا صلاتنا، واستقبلوا قبلتنا، وذبحوا ذبيحتنا، فقد حرمت علينا دماؤهم وأموالهم إلّا بحقها، وحسابهم على الله"، أخرجه أحمد 20/ (13056) و 21/ (13348)، والبخاري (392)، وأبو داود (2641)، والترمذي (2608)، والنسائي (4314) و (4315)، وابن حبان (5895).وفي الباب عن جابر بن عبد الله، سيأتي عند المصنف برقم (3970).وعن غير واحد من الصحابة، انظر تعليقنا على "مسند أحمد" (8163).والعَناق: هي الأنثى من ولد المعز ما لم تتم سنة.



[2] حديث صحيح، لكن من حديث أبي هريرة، عمران بن داور القطان لا تحتمل مخالفته، وقد خالفه هنا عبد الرزاق فرواه (6916) - وعنه أحمد في "المسند" 1/ (335) - عن معمر، عن الزهري، عن عبيد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة. وتابع معمرًا جمعٌ في روايته عن الزهري، عن عبيد الله، عن أبي هريرة، فقد أخرجه أحمد 1/ (67) و (117) و (335)، والبخاري (1399) و (1400) و (1456) و (1457) و (6924) و (6925) و (7284) و (7285)، ومسلم (20)، وأبو داود (1556)، والترمذي (2607)، والنسائي (2235) و (3418) و (3419) و (3421) و (4284) و (4285)، وابن حبان (216) و (217) من طرق عن الزهري، عن عبيد الله، عن أبي هريرة.أما حديث الزهري عن أنس، فقد أخرجه النسائي (3417) و (4287) عن محمد بن بشار، عن عمرو بن عاصم، بهذا الإسناد. وقال بإثر (4287): عمران القطان ليس بالقوي في الحديث، وهذا الحديث خطأ، والصواب حديث الزهري عن عبيد الله عن أبي هريرة. وبنحوه أعله أبو حاتم وأبو زرعة كما في "علل" ابن أبي حاتم 5/ 225 (1937)، وحمل أبو زرعة الوهم على عمران القطان. وانظر "علل الدارقطني" (3).قلنا: ولعل الوهم دخل علي عمران بسبب حديثٍ رواه حميد الطويل عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أُمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلّا الله، فإذا قالوها، وصلوا صلاتنا، واستقبلوا قبلتنا، وذبحوا ذبيحتنا، فقد حرمت علينا دماؤهم وأموالهم إلّا بحقها، وحسابهم على الله"، أخرجه أحمد 20/ (13056) و 21/ (13348)، والبخاري (392)، وأبو داود (2641)، والترمذي (2608)، والنسائي (4314) و (4315)، وابن حبان (5895).وفي الباب عن جابر بن عبد الله، سيأتي عند المصنف برقم (3970).وعن غير واحد من الصحابة، انظر تعليقنا على "مسند أحمد" (8163).والعَناق: هي الأنثى من ولد المعز ما لم تتم سنة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1444)


1444 - أخبرَناه أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا الهَيثَم بن خالد، حدثنا أبو نُعَيم، حدثنا أبو العَنْبَس سعيد بن كَثِير، حدثني أَبي، عن أبي هريرةَ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أُمرتُ أن أقاتلَ الناس حتى يَشهَدوا أن لا إله إلّا الله، ويُقيمُوا الصَّلاة، ويُؤتُوا الزَّكاة، ثم حُرِّمت عليَّ دماؤُهم وأموالُهم وحِسابُهم [1] على الله عز وجل" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন মানুষের সাথে লড়াই করি, যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, এবং সালাত প্রতিষ্ঠা করে আর যাকাত আদায় করে। তারপর তাদের রক্ত ও সম্পদ আমার জন্য হারাম হয়ে গেল। আর তাদের (অন্তরের) হিসাব-নিকাশ আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার উপর ন্যস্ত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز): حسابهم، بدون واو، وصحَّح عليها، والمثبت من (ص) و"السنن الكبرى" للبيهقي 8/ 177، وسائر مصادر التخريج. للمزي، و"ميزان الاعتدال" للذهبي.وقد وهم المصنِّف رحمه الله حين سمّاه بإثر هذا الحديث: عامر بن شبيب العقيلي، فليس في الرواة من عُرِف بهذا الاسم، ورجح الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" أن يكون شبيب تصحيفًا من شقيق، لأنَّ ابن حبان ذكره في "الثقات"، فقال: عامر بن عبد الله العقيلي، وأبوه عبد الله بن شقيق. قلنا: ولم يتابع أحدٌ ابن حبان على ذكر اسم جد عامر، والله أعلم.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل والد أبي العنبس، وهو كثير بن عبيد مولى أبي بكر الصديق، فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو نعيم: هو الفضل بن دكين.وأخرجه أحمد 14/ (8544) عن عفان، عن عبد الواحد بن زياد، عن سعيد بن كثير، بهذا الإسناد. للمزي، و"ميزان الاعتدال" للذهبي.وقد وهم المصنِّف رحمه الله حين سمّاه بإثر هذا الحديث: عامر بن شبيب العقيلي، فليس في الرواة من عُرِف بهذا الاسم، ورجح الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" أن يكون شبيب تصحيفًا من شقيق، لأنَّ ابن حبان ذكره في "الثقات"، فقال: عامر بن عبد الله العقيلي، وأبوه عبد الله بن شقيق. قلنا: ولم يتابع أحدٌ ابن حبان على ذكر اسم جد عامر، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1445)


1445 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العدل، حدثنا أبو المُثنَّى العَنْبري، حدثنا علي بن عبد الله المَدِيني، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن يحيى بن أبي كَثِير، وحدثني عامرُ العُقَيلي [1]، أنَّ أباه أخبره، أنه سمع أبا هريرةَ يقول: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "عُرِضَ عليَّ أولُ ثلاثةٍ يَدخُلون الجنة، وأولُ ثلاثةٍ يَدخُلون النار، فأمّا أولُ ثلاثةٍ يدخلونَ الجنةَ: فالشهيدُ، وعبدٌ مملوكٌ أحسَنَ عِبادةَ ربِّه ونَصَحَ لسيِّده، وعَفِيفٌ مُتعفِّفٌ ذو عِيالٍ، وأما أولُ ثلاثةٍ يدخلونَ النار: فأميرٌ مُسلَّط، وذو ثَرُوةٍ من مالٍ لا يؤدِّي حقَّ الله في ماله، وفقيرٌ فَجُور" [2].عامر بن شَبيب العُقَيلي شيخٌ من أهل المدينة مستقيم الحديث. وهذا أصلٌ في هذا الباب تفرَّد به عنه يحيى بن أبي كَثِير، ولم يُخرجاه. وشاهده حديث الأعمش عن عبد الله بن مُرَّة:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার সামনে প্রথম সেই তিন ব্যক্তিকে উপস্থাপন করা হয়েছে যারা জান্নাতে প্রবেশ করবে এবং প্রথম সেই তিন ব্যক্তিকে উপস্থাপন করা হয়েছে যারা জাহান্নামে প্রবেশ করবে। যারা প্রথম জান্নাতে প্রবেশ করবে, তারা হলো: শহীদ; এমন ক্রীতদাস যে তার রবের ইবাদত উত্তম রূপে করে এবং তার মনিবের প্রতি বিশ্বস্ত (হিতাকাঙ্ক্ষী) থাকে; এবং এমন পবিত্রতা অবলম্বনকারী ব্যক্তি যার পরিবার রয়েছে (কিন্তু সে কারো কাছে হাত পাতে না)। আর যারা প্রথম জাহান্নামে প্রবেশ করবে, তারা হলো: ক্ষমতাধর শাসক; সম্পদশালী ব্যক্তি যে তার সম্পদের ব্যাপারে আল্লাহর হক আদায় করে না; এবং পাপাচারে লিপ্ত দরিদ্র ব্যক্তি।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في المطبوع: عامر بن شبيب العقيلي، وهو خطأ، وهذا الراوي هو عامر بن عقبة العقيلي، ويقال: ابن عبد الله، تفرد بالرواية عنه يحيى بن أبي كثير، انظر ترجمته في "تهذيب الكمال" للمزي، و"ميزان الاعتدال" للذهبي.وقد وهم المصنِّف رحمه الله حين سمّاه بإثر هذا الحديث: عامر بن شبيب العقيلي، فليس في الرواة من عُرِف بهذا الاسم، ورجح الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" أن يكون شبيب تصحيفًا من شقيق، لأنَّ ابن حبان ذكره في "الثقات"، فقال: عامر بن عبد الله العقيلي، وأبوه عبد الله بن شقيق. قلنا: ولم يتابع أحدٌ ابن حبان على ذكر اسم جد عامر، والله أعلم.



[2] إسناده ضعيف لجهالة عامر العقيلي، فقد تقدم أنه تفرد بالرواية عنه يحيى بن أبي كثير، ولم يوثقه غير ابن حبان، وقال الذهبي: لا يعرف، وكذا أبوه لا يعرف. أبو المثنى العنبري: هو معاذ بن المثنى، وهشام والد معاذ: هو ابن أبي عبد الله الدستوائي.وأخرجه ابن حبان (4656) من طريق إسحاق بن إبراهيم، عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه مقطَّعًا ابن حبان أيضًا (3412) و (7248) و (7481) من طريق محمد بن المثنى، عن معاذ بن هشام، به.وأخرجه بشطريه أحمد 15/ (9492) عن إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن علية - عن هشام الدستوائي، به.وأخرجه أحمد 16/ (10205)، والترمذي (1642) من طريق علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، به. واقتصر الترمذي على الشطر الأول فقط، وقال: حديث حسن.قوله: "عفيف" أي: عن تعاطي ما لا يحل، "متعفِّف" أي: عن سؤال الناس.و"أمير مسلَّط" أي: على رعيته بالجور والعسف.و"فقير فجور" بالجيم، كذا وقع في (ز) و (ب) و (ع) وبعض المصادر، وأُهملت في (ص)، وفي "تلخيص المستدرك" للذهبي ومعظم مصادر التخريج: "فخور" بالخاء المعجمة، والمعنى: أنه كثير الفخر، أي: ادِّعاء العِظَم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1446)


1446 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني عمرو بن محمد النَّاقِد، حدثنا يحيى بن عيسى الرَّمْلي، عن الأعمش، عن عبد الله بن مُرَّة، عن مسروقٍ، قال: قال [1] عبدُ الله: آكلُ الربا، ومُوكِلُه، وشاهداهُ إذا عَلِماهُ، والواشِمةُ والمُوتَشِمةُ، ولاوِي الصَّدقةِ، والمرتدُّ أعرابيًّا بعد الهجرة، مَلعُونُون [2] على لسانِ محمدٍ صلى الله عليه وسلم يومَ القيامة [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بيحيى بن عيسى الرَّمْلي، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সুদ আহারকারী, সুদ প্রদানকারী, এর (সুদের) দুই সাক্ষী—যদি তারা এ সম্পর্কে অবগত থাকে—ট্যাটু অঙ্কনকারী (মহিলা), ট্যাটু গ্রহণকারী (মহিলা), সাদকা (বা যাকাত) দিতে টালবাহানাকারী এবং হিজরতের পরে বেদুঈন হয়ে মুরতাদ হয়ে যাওয়া ব্যক্তি—এরা সকলেই কিয়ামতের দিন মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জবানীতে অভিশপ্ত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في الطبعة الهندية إلى: "ما" ليصبح المعنى: ما عَبَدَ اللهَ آكلُ … ! وتبعتها على هذا التحريف كثير من طبعات "المستدرك". وموكله.وأخرج أحمد 7/ (4283)، والنسائي (5511) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، وأحمد (4284) عن أسود بن عامر، و (4403) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، عن أبي قيس عبد الرحمن بن ثروان، عن الهزيل بن شرحبيل الأودي، عن ابن مسعود قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم الواشمة والمتوشمة، والواصلة والموصولة، والمُحِل والمحلَّل له، وآكل الربا وموكله. وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن ثروان.وأخرج أحمد 6/ (3725) و (3737) و (3809) و 7/ (4327)، وأبو داود (3333)، والترمذي (1206)، وابن ماجه (2277)، وابن حبان (5025) من طرق عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وشاهديه وكاتبه. قال الترمذي: حديث حسن صحيح.وفي الباب عن أبي جحيفة عند البخاري (5347): لعن النبي صلى الله عليه وسلم الواشمة والمستوشمة، وآكل الربا وموكله، ونهى عن ثمن الكلب، وكسب البغي، ولَعَنَ المصورين.وعن جابر بن عبد الله عند مسلم (1598): لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وكاتبه وشاهديه، وقال: هم سواء.قوله: "لاوي الصدقة" اسم فاعل من لواه، أي: صَرَفه، والمراد: مانع الصدقة. قاله السندي في حاشيته على "سنن النسائي".



[2] في النسخ الخطية: ملعون، والمثبت من "السنن الكبرى" للبيهقي حيث رواه من طريق المصنف بإسناده ومتنه، ومن سائر مصادر التخريج. وموكله.وأخرج أحمد 7/ (4283)، والنسائي (5511) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، وأحمد (4284) عن أسود بن عامر، و (4403) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، عن أبي قيس عبد الرحمن بن ثروان، عن الهزيل بن شرحبيل الأودي، عن ابن مسعود قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم الواشمة والمتوشمة، والواصلة والموصولة، والمُحِل والمحلَّل له، وآكل الربا وموكله. وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن ثروان.وأخرج أحمد 6/ (3725) و (3737) و (3809) و 7/ (4327)، وأبو داود (3333)، والترمذي (1206)، وابن ماجه (2277)، وابن حبان (5025) من طرق عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وشاهديه وكاتبه. قال الترمذي: حديث حسن صحيح.وفي الباب عن أبي جحيفة عند البخاري (5347): لعن النبي صلى الله عليه وسلم الواشمة والمستوشمة، وآكل الربا وموكله، ونهى عن ثمن الكلب، وكسب البغي، ولَعَنَ المصورين.وعن جابر بن عبد الله عند مسلم (1598): لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وكاتبه وشاهديه، وقال: هم سواء.قوله: "لاوي الصدقة" اسم فاعل من لواه، أي: صَرَفه، والمراد: مانع الصدقة. قاله السندي في حاشيته على "سنن النسائي".



1446 [3] - ضعيف بهذه السياقة، يحيى بن عيسى الرملي وإن وثقه العجلي، وأحسن أحمد الثناء عليه، فقد قال النسائي: ليس بالقوي، وقال ابن معين مرة: ليس بشيء، وقال مرة: لا يكتب حديثه، وقال مرة: ضعيف، وقال ابن عدي: عامة ما يرويه لا يتابع عليه، وقد لخص ابن حجر هذه الأقوال بقوله: صدوق يخطئ ورمي بالتشيع. قلنا: وقد تفرَّد برواية هذا الحديث عن الأعمش عن عبد الله بن مرة عن مسروق عن ابن مسعود، وخالفه جمهور أصحاب الأعمش الثقات فرووه عن الأعمش عن عبد الله بن مرة عن الحارث بن عبد الله الأعور عن ابن مسعود، والحارث الأعور ضعيف. وانظر: "العلل" للدارقطني (692).أما حديث مسروق عن ابن مسعود فقد أخرجه البيهقي 9/ 19 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: تفرد به يحيى بن عيسى هكذا.وأخرجه ابن خزيمة (2250) عن علي بن سهل الرملي، عن يحيى بن عيسى الرملي، به.وأما حديث الحارث الأعور فقد أخرجه أحمد 6/ (3881)، وابن حبان (3252) من طريق سفيان الثوري، وأحمد 7/ (4428)، والنسائي (5512) و (8666) و (9333) من طريق شعبة، وأحمد 7/ (4090) عن يحيى بن سعيد القطان ووكيع، أربعتهم (الثوري وشعبة والقطان ووكيع) عن الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن الحارث الأعور، عن ابن مسعود، بمتنه سواء.وقد صحَّ بعضه من أوجه أخرى عن عبد الله بن مسعود:فقد أخرج مسلم (1597) من طريق علقمة، عن ابن مسعود قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله.وأخرج أحمد 7/ (4283)، والنسائي (5511) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، وأحمد (4284) عن أسود بن عامر، و (4403) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، عن أبي قيس عبد الرحمن بن ثروان، عن الهزيل بن شرحبيل الأودي، عن ابن مسعود قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم الواشمة والمتوشمة، والواصلة والموصولة، والمُحِل والمحلَّل له، وآكل الربا وموكله. وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن ثروان.وأخرج أحمد 6/ (3725) و (3737) و (3809) و 7/ (4327)، وأبو داود (3333)، والترمذي (1206)، وابن ماجه (2277)، وابن حبان (5025) من طرق عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وشاهديه وكاتبه. قال الترمذي: حديث حسن صحيح.وفي الباب عن أبي جحيفة عند البخاري (5347): لعن النبي صلى الله عليه وسلم الواشمة والمستوشمة، وآكل الربا وموكله، ونهى عن ثمن الكلب، وكسب البغي، ولَعَنَ المصورين.وعن جابر بن عبد الله عند مسلم (1598): لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم آكل الربا وموكله وكاتبه وشاهديه، وقال: هم سواء.قوله: "لاوي الصدقة" اسم فاعل من لواه، أي: صَرَفه، والمراد: مانع الصدقة. قاله السندي في حاشيته على "سنن النسائي".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1447)


1447 - أخبرني دَعْلَج بن أحمد السِّجْزِي ببغداد، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا عبد الله بن رجاء، حدثنا سعيد بن سَلَمة بن أبي الحُسام، حدثنا عِمْران بن أبي أَنَس، عن مالك بن أَوْس بن الحَدَثان، عن أبي ذرٍّ: أَنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "في الإبلِ صَدَقتُها، وفي الغَنَم صَدَقتُها، وفي البقر صَدَقتُها، وفي البَزِّ صَدَقتُه، ومَن رَفَعَ دنانيرَ أو دراهمَ أو تِبْرًا أو فضةً لا يُعِدُّها لغَريمٍ، ولا يُنفِقُها في سبيلِ الله، فهو كَنزٌ يُكوَى به يومَ القيامة" [1]. تابعه ابن جُرَيج عن عِمْران بن أبي أَنَس:




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উটের উপর তার যাকাত রয়েছে, ছাগল/ভেড়ার উপর তার যাকাত রয়েছে, গরুর উপর তার যাকাত রয়েছে এবং কাপড়ের (বা বিক্রয়ের জন্য প্রস্তুত পণ্যের) উপর তার যাকাত রয়েছে। আর যে ব্যক্তি দীনার, দিরহাম, স্বর্ণপিণ্ড কিংবা রৌপ্য সংগ্রহ করে রাখে এবং তা পাওনাদারের জন্য প্রস্তুত না রাখে, আর আল্লাহর পথেও খরচ না করে, তবে তা সেই ধনভান্ডার, যার দ্বারা কিয়ামতের দিন তাকে দাগানো হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ضعيف، وهذا إسناد ظاهره السلامة، إلّا أنَّ الصواب أنَّ سعيد بن سلمة بن أبي الحسام لم يروه عن عمران، بينهما موسى بن عبيدة الرَّبَذي، وهو ضعيف، فقد أخرجه الدارقطني في "السنن" (1933) - ومن طريقه البيهقي 4/ 147 - عن دعلج السجزي، عن هشام بن علي، عن عبد الله بن رجاء - وهو الغُداني - عن سعيد بن سلمة، عن موسى بن عبيدة، عن عمران بن أبي أنس، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي أيضًا 4/ 147 من طريق أحمد بن عبيد الصفار، عن عبد الله بن رجاء، عن سعيد بن سلمة، عن موسى بن عبيدة، عن عمران، به. ثم عطَفَ عليه ما أخرجه من طريق أبي عبد الله الحاكم نفسه عن دعلج، عن هشام بن علي، به. ولم يذكر البيهقي تتمة إسناده، وإنما اكتفى بما ذكرنا، مما يدل على أنه مثل إسناد أحمد بن عبيد الصفار سواء.ومما يرجح أنَّ سقوط موسى بن عبيدة من هذا الإسناد ليس بسبب النساخ، وإنما هو ذهول من المصنف نفسه: أنه صححه على شرط الشيخين على ظاهر الإسناد، فلو تنبّه لوجود موسى لما صحَّحه، لأنه قد روى لموسى بن عبيدة كما سيأتي في "المستدرك" (2944) ولم يصحح حديثه، بل أشار إلى ضعفه.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 213، وابن زنجويه في "الأموال" (1356)، وابن شبَّة في "تاريخ المدينة" ص 1033 - 1034، وابن أبي عاصم في "الجهاد" (85) و (86)، والبزار (3895)، والدارقطني (1932)، والبيهقي 4/ 147، وابن الجوزي في "التحقيق في مسائل الخلاف" (944) من طرق عن موسى بن عبيدة الربذي، عن عمران بن أبي أنس، به.قوله: "وفي البَزِّ صدقته" وقع في نسخة (ص): "البُرّ" بالباء الموحدة والراء المهملة، وأُهملت في (ز)، لكن جاءت مقيدة في "سنن الدارقطني" بالزاي، ونقله عنه البيهقي في "سننه"، وأدرج هذا الحديث تحت عنوان: باب زكاة التجارة. وقال النووي في "المجموع 6/ 47: هو بفتح الباء وبالزاي، هكذا رواه جميع الرواة، وصرَّح بالزاي الدارقطني والبيهقي. وقال في "تهذيب الأسماء واللغات" ص 536: هو بفتح الباء وبالزاي، وهذا وإن كان ظاهرًا لا يحتاج إلى تقييد، فإنما قيدته لأنني بلغني أنَّ بعض الكتّاب صحَّفه بالبُرّ بضم الباء وبالراء. قلنا: ومعنى البز: الثياب التي هي أمتعة البزاز.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1448)


1448 - أخبرناه أبو قُتيبةَ سَلْم بن الفَضْل الأَدَمي بمكة، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا زهير بن حَرْب، حدثنا محمد بن بَكْر، عن ابن جُرَيج، عن عِمْران بن أبي أَنس، عن مالك بن أوس بن الحَدَثان، عن أبي ذرٍّ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "في الإبل صَدَقتُها، وفي الغنم صَدَقتُها، وفي البَزِّ صَدَقتُه" [1].كلا الإسنادين صحيحان [2] على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উটসমূহের উপর তার সদকা রয়েছে, ছাগলসমূহের উপর তার সদকা রয়েছে এবং বাণিজ্যিক পণ্যের উপর তার সদকা রয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - مدلس وقد عنعنه، بل صرَّح بأنه لم يسمعه من عمران عند أحمد في "المسند" 35/ (21557)، وكذلك قال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير": ابن جريج لم يسمع من عمران بن أبي أنس، يقول: حُدِّثتُ عن عمران بن أبي أنس. وقال الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 14/ 181: فكأن ابن جريج دلَّسه عن موسى بن عبيدة، فالحديث حديثه، ومداره عليه، وهو ضعيف.وأخرجه أحمد 35/ (21557)، وأخرجه الترمذي في "العلل الكبير" (171) عن يحيى بن موسى، كلاهما (أحمد ويحيى) عن محمد بن بكر البرساني، بهذا الإسناد. وقد صرَّح ابن جريج عند أحمد أنه بلغه عنه.



[2] في النسخ الخطية: صحيحين، وهو خطأ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1449)


1449 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سُليمان، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني سليمان بن بلال، عن شَرِيك بن عبد الله بن أبي نَمِر، عن عطاء بن يَسَار، عن معاذ بن جَبَل: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بَعَثَه إلى اليمن، فقال: "خُذِ الحَبَّ من الحَبِّ، والشَّاةَ من الغَنَم، والبَعيرَ من الإبل، والبقرةَ من البَقَر" [1].هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين إن صَحَّ سماعُ عطاء بن يسار من معاذ بن جبل، فإنِّي لا أُتقِنُه [2].




মুআয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ইয়ামানে প্রেরণ করেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "শস্যের যাকাত শস্য থেকেই গ্রহণ করো, ছাগলের যাকাত ছাগল থেকেই গ্রহণ করো, উটের যাকাত উট থেকেই গ্রহণ করো এবং গরুর যাকাত গরু থেকেই গ্রহণ করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ عطاء بن يسار لم يدرك معاذ بن جبل، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه أبو داود (1599) عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (1814) عن عمرو بن سواد المصري، عن عبد الله بن وهب، به.وروي من غير وجه عن معاذ بن جبل قال: بعثه النبي صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، فأمره أن يأخذ من كل ثلاثين من البقر تَبيعًا أو تبيعةً، ومن كل أربعين مسنّةً، ومن كل حالمٍ دينارًا أو عدله معافرَ. انظر "مسند أحمد" 36/ (22013) و (22037) و (22084).



[2] كذا في (ب)، وأُهملت في (ز)، وفي (ص): "لا أنفيه"، وكلاهما له وجه، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1450)


1450 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد بن أبي عَرُوبة.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنَّى، حدثنا محمد بن المِنْهال، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا سعيد، عن قَتَادةَ، عن سالم بن أبي الجَعْد الغَطَفاني، عن مَعْدان بن أبي طلحة اليَعمَري، عن ثَوْبان قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن تَرَكَ بعدَه كَنزًا، مُثِّل له يومَ القيامة شُجاعًا أقرَعَ له زَبِيبتان، يَتْبَعُ فَاهُ، فيقول: وَيلَكَ ما لكَ؟ فيقول: أنا كنزُك الذي تَركتَه بعدَك، فلا يزال يَتبعُه حتى يُلْقِمَه يدَه فيَقْضَمُها، ثم يُتبِعُه سائرَ جسدِه" [1].هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرطه أيضًا:




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার পিছনে সম্পদ (ধনভান্ডার) রেখে যায়, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য টাক মাথাওয়ালা বিষাক্ত সাপের রূপ ধারণ করবে, যার দু'টি কালো ফোঁটা (বা কালো দাগ) থাকবে। সাপটি তার মুখমণ্ডল অনুসরণ করবে এবং বলবে: তোমার সর্বনাশ হোক! তোমার কী হয়েছে? সে (সাপটি) বলবে: আমিই তোমার সেই ধনভান্ডার যা তুমি তোমার পরে রেখে গিয়েছিলে। সাপটি তাকে অনুসরণ করতে থাকবে যতক্ষণ না সে তার হাত তার (সাপের) মুখে ঢুকিয়ে দেবে এবং সে তা চিবিয়ে খাবে। এরপর সে তার বাকি শরীর অনুসরণ করবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو المثنى: هو معاذ بن معاذ، وثوبان: هو مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم.وأخرجه ابن حبان (3257) من طريق أمية بن بسطام، عن يزيد بن زريع، بهذا الإسناد. ورواه عبد الله بن دينار عن أبي صالح، واختلف عليه فيه:فقد أخرجه أحمد 14/ (8661)، والبخاري (1403) و (4565)، والنسائي (2273) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبيه، عن أبي صالح، به مرفوعًا.وخالفه مالك الإمام، فأخرجه في "الموطأ" 1/ 256 عن عبد الله بن دينار، عن أبي صالح، عن أبي هريرة موقوفًا. قال الدارقطني في "العلل" (1946): والموقوف أشبه بالصواب!وقد روي هذا الحديث مرفوعًا من أوجه عن أبي هريرة:فقد أخرجه أحمد 13/ (8185)، والبخاري (6957) من طريق همام، وأحمد 16/ (10855)، والبخاري (1402) و (4659)، والنسائي (2240) و (11152) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وأحمد 16/ (10344) من طريق الحسن البصري، وابن ماجه (1786)، وابن حبان (3254) و (3261) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي، أربعتهم عن أبي هريرة، مرفوعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1451)


1451 - أخبرَناه أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو صالح وابنُ بُكَير، قالا: حدثنا الليث، عن ابن عَجْلان، عن القَعْقاع بن حَكِيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يكون كنزُ أحدِكم يومَ القيامةِ شُجاعًا أقرَعَ ذا زَبِيبَتَين، يَتبَعُ صاحبَه، وهو يتعوَّذُ منه، فلا يَزالُ يَتبَعُه وهو يَفِرُّ منه حتى يُلقِمَه إصبَعَه" [1]. قد اتّفقَ الشيخان على إخراج حديث ابن مسعود وابن عُمَر في هذا الباب على سبيل الاختصار، في التغليظ المانع من الزكاة، غيرَ أنهما لم يخرجا حديث أبي هريرة وثَوْبان [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কিয়ামতের দিন তোমাদের কারো কারো সম্পদ একটি টাকমাথা, দুই গ্রন্থিযুক্ত বিষধর সাপে পরিণত হবে। সেটি তার মালিককে অনুসরণ করতে থাকবে, আর মালিক তা থেকে (আল্লাহর কাছে) আশ্রয় চাইতে থাকবে। সাপটি তাকে অনুসরণ করতে থাকবে এবং মালিকটি পালাতে থাকবে, অবশেষে সে (মালিক) তার আঙ্গুল সাপের মুখে ঢুকিয়ে দেবে।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل ابن عجلان: واسمه محمد وقد توبع. أبو صالح الراوي عن الليث: هو عبد الله بن صالح كاتب الليث، ومتابعه ابن بكير: هو يحيى بن عبد الله بن بكير، والليث: هو ابن سعد، وأبو صالح الراوي عن أبي هريرة: هو ذكوان السمان.وأخرجه أحمد 14/ (8933)، والنسائي (11153)، وابن حبان (3258) من طريقين عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وتابع القعقاعَ بن حكيم على رفعه عاصمُ بنُ أبي النجود عند أحمد 13/ (7756)، فرواه عن أبي صالح، به. ورواه عبد الله بن دينار عن أبي صالح، واختلف عليه فيه:فقد أخرجه أحمد 14/ (8661)، والبخاري (1403) و (4565)، والنسائي (2273) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبيه، عن أبي صالح، به مرفوعًا.وخالفه مالك الإمام، فأخرجه في "الموطأ" 1/ 256 عن عبد الله بن دينار، عن أبي صالح، عن أبي هريرة موقوفًا. قال الدارقطني في "العلل" (1946): والموقوف أشبه بالصواب!وقد روي هذا الحديث مرفوعًا من أوجه عن أبي هريرة:فقد أخرجه أحمد 13/ (8185)، والبخاري (6957) من طريق همام، وأحمد 16/ (10855)، والبخاري (1402) و (4659)، والنسائي (2240) و (11152) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وأحمد 16/ (10344) من طريق الحسن البصري، وابن ماجه (1786)، وابن حبان (3254) و (3261) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي، أربعتهم عن أبي هريرة، مرفوعًا.



[2] أما حديث ثوبان فنعم، وأما حديث أبي هريرة فقد سلف أنه قد أخرجه البخاري من أوجه عن أبي هريرة، وأما ابن مسعود وابن عمر فلم يتفق على إخراجهما الشيخان، بل لم يخرجهما أيٌّ منهما، فحديث ابن مسعود أخرجه أحمد 6/ (3577)، وابن ماجه (1784)، والترمذي (3012)، والنسائي (2233) و (11018) مرفوعًا، وإسناده صحيح، وسيأتي موقوفًا في "المستدرك" برقم (3207).وأما حديث ابن عمر فقد أخرجه أحمد 10/ (5729) و (6209) و (6448)، والنسائي (2272)، وإسناده صحيح.وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد الله، أخرجه أحمد 22/ (14442)، ومسلم (988)، والنسائي (2246)، وابن حبان (3255).وانظر تتمة أحاديث الباب في التعليق على حديث ابن مسعود في "المسند" (3577)









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1452)


1452 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْرُ بن نَصْر الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني معاوية بن صالح، عن أبي يحيى سُلَيم بن عامر الكَلَاعي، قال: سمعتُ أبا أُمامةَ يقول: قام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فينا في حَجَّةِ الوداع وهو على ناقتِه الجَدْعاء، قد جَعَلَ رِجلَيه في غَرْزَي الرِّكاب، يَتَطاوَل ليُسمِعَ الناس، فقال: "ألا تَسْمَعُون صوتي؟ "، فقال رجلٌ من طوائف الناس: فما تَعهَدُ إلينا؟ فقال: "اعبُدوا ربَّكم، وصَلُّوا خَمْسَكم، وصُومُوا شهرَكم، وأدُّوا زكاةَ أموالِكم، وأَطِيعُوا ذا أَمرِكم، تدخُلُوا جنَّةَ ربِّكم".قال: قلتُ: يا أبا أمامة، فمِثلُ مَن أنتَ يومئذٍ؟ قال: أنا يا ابنَ أخي يومئذٍ ابنُ ثلاثين سنةً، أُزاحِمُ البعيرَ أُزَحزِحُه قُربًا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديثٌ صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় আমাদের মাঝে দাঁড়িয়েছিলেন। তিনি তাঁর 'জাদআ' নামক উটনীর উপর ছিলেন। তিনি রিকাবের ফাঁকে তার উভয় পা রেখেছিলেন এবং লোকেদের শোনানোর জন্য শরীর উঁচু করে দিচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা কি আমার আওয়াজ শুনতে পাচ্ছো না?" তখন জনতার মধ্য থেকে একজন লোক জিজ্ঞাসা করল: আপনি আমাদের কাছে কী অঙ্গীকার নিচ্ছেন? তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের রবের ইবাদত করো, তোমাদের পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করো, তোমাদের মাসের (রমযানের) সিয়াম পালন করো, তোমাদের সম্পদের যাকাত দাও এবং তোমাদের শাসকের আনুগত্য করো—তাহলে তোমরা তোমাদের রবের জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে।" (বর্ণনাকারী সুলাইম ইবনু আমির বলেন:) আমি জিজ্ঞাসা করলাম, হে আবু উমামা! সেদিন আপনার বয়স কত ছিল? তিনি বললেন: হে আমার ভাতিজা! সেদিন আমার বয়স ত্রিশ বছর ছিল। আমি উটকে ধাক্কা দিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটবর্তী হওয়ার চেষ্টা করছিলাম।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وسيأتي من طريق زيد بن الحباب عن معاوية بن صالح برقم (1759)، ويأتي تخريجه من هذه الطريق هناك.وسلف من طريق سعيد بن أبي مريم عن معاوية بن صالح برقم (19). وقال الأزهري كما في "شرح القاموس" مادة (سخب): السِّخاب عند العرب: كُلُّ قلادةٍ، كانت ذات جوهر أو لم تكن. قلنا: وعليه يتوجه أنَّ السِّخاب الذي في يد عائشة من وَرِق، على أنه وقع في رواية أبي داود وغيره: "فتخات من ورق" بمعنى خواتيم، ولا إشكال فيها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1453)


1453 - أخبرنا عبد الرحمن بن حمدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا عمرو بن الرَّبِيع بن طارق، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثنا عُبيد الله بن أبي جعفر، أنَّ محمد بن عمرو بن عطاء أخبره، عن عبد الله بن شداد بن الهاد قال: دخلنا على عائشةَ زوجِ النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: دَخَلَ عليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فرأى في يدي سِخابًا من وَرِقٍ، فقال: "ما هذا يا عائشةُ؟ " فقلت: صَنَعتُهنَّ أتزيَّنُ لك فيهنَّ يا رسول الله، فقال: "أتؤدِّين زكاتَهنَّ؟ " فقلتُ: لا، أو ما شاء الله من ذلك، قال: "هي حَسْبُكِ من النار" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং আমার হাতে রূপার গয়না দেখতে পেলেন। তিনি বললেন, “হে আয়েশা, এগুলো কী?” আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনার জন্য সাজসজ্জা করার উদ্দেশ্যে আমি এগুলো তৈরি করেছি। তিনি বললেন, “তুমি কি এর যাকাত আদায় করো?” আমি বললাম, না, অথবা আল্লাহ যা ইচ্ছা করেন (তা-ই)। তিনি বললেন, “এগুলোই তোমার জন্য জাহান্নামের পক্ষ থেকে যথেষ্ট।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، يحيى بن أيوب صدوق حسن الحديث.وأخرجه أبو داود (1565) عن أبي حاتم الرازي، بهذا الإسناد.قولها: سخابًا من وَرِق، قال النووي في "شرح مسلم" 15/ 193: السِّخاب بكسر السين المهملة وبالخاء المعجمة، جمعُه سُخُب، وهو قلادة من القرنفل والمسك والعود ونحوها من أخلاط الطيب، يُعمَل على هيئة السُّبحة ويُجعَل قلادة للصبيان والجواري. وقيل: هو خيط فيه خرز، سُمي سخابًا لصوت خرزه عند حركته. وقال الأزهري كما في "شرح القاموس" مادة (سخب): السِّخاب عند العرب: كُلُّ قلادةٍ، كانت ذات جوهر أو لم تكن. قلنا: وعليه يتوجه أنَّ السِّخاب الذي في يد عائشة من وَرِق، على أنه وقع في رواية أبي داود وغيره: "فتخات من ورق" بمعنى خواتيم، ولا إشكال فيها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1454)


1454 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عُتْبةَ أحمدُ بن الفَرَج، حدثنا عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار، حدثنا محمد بن مُهاجِر، عن ثابت بن عَجْلان، حدثنا عطاء، عن أُم سَلَمة: أنها كانت تَلبَس أَوْضاحًا من ذهب، فسألَتْ عن ذلك النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقالت: أكَنزٌ هو؟ فقال: "إذا أدَّيتِ زكاتَه، فليسَ بكَنْز" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি স্বর্ণের অলংকার পরিধান করতেন। তিনি এ সম্পর্কে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলেন এবং বললেন, এটা কি কানয (নিষিদ্ধ সঞ্চিত ধন)? তিনি বললেন, "যদি তুমি এর যাকাত আদায় কর, তবে তা কানয নয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، أبو عتبة أحمد بن الفرج الحمصي حديثه حسن في المتابعات والشواهد وقد توبع، ومن فوقه ثقات إلّا أنَّ عطاء - وهو ابن أبي رباح - لم يسمع من أم سلمة فيما قاله علي بن المديني، ومع ذلك فقد صحَّحه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" (2535)، وجوَّد إسناده الحافظ العراقي في "شرح الترمذي" فيما نقله عنه الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 5/ 27. محمد بن مهاجر: هو الأنصاري الشامي.وأخرجه أبو داود (1564) من طريق عتاب بن بشير، عن ثابت بن عجلان، بهذا الإسناد. بلفظ: "ما بلغ أن تؤدَّى زكاتُه فزُكِّي، فليس بكنز".ويشهد له حديث ابن عمر عند البخاري (1404)، وابن ماجه (1787). وحديثا جابر بن عبد الله وأبي هريرة الآتيان بعده. لكن حيث روياه موقوفًا.أما المرفوع كرواية المصنِّف فقد أخرجه البيهقي 4/ 84 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: هكذا رواه ابن وهب بهذا الإسناد مرفوعًا، وكذلك رواه يونس بن عبد الأعلى عن ابن وهب، ورواه عيسى بن مثرود عن ابن وهب من قول أبي الزبير.قلنا: ورواية يونس بن عبد الأعلى عن ابن وهب المرفوعة، أخرجها ابن خزيمة في "صحيحه" (2258) و (2470)، وابن المقرئ في "معجمه" (44)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 6/ 288، وابن عساكر في "معجمه" (1389).وأخرجه مرفوعًا أيضًا الطبراني في "المعجم الأوسط" (1579) من طريق عمر بن أيوب، عن المغيرة بن زياد، عن أبي الزبير، عن جابر، رفعه. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن مغيرة إلّا عمر، تفرد به محمد بن عمار. قلنا: يعني عن عمر بن أيوب، أما المغيرة بن زياد فله أوهام كما قال الحافظ في "التقريب"، وقال الإمام أحمد: منكر الحديث.وأما الموقوف فقد أخرجه عبد الرزاق (7145). وأخرجه البيهقي 4/ 84 من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، كلاهما (عبد الرزاق وأبو عاصم) عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابرًا يقول … فذكره موقوفًا. قال البيهقي: وهذا أصح.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 114 عن أبي داود الطيالسي، عن هشام الدستوائي، عن أبي الزبير، عن جابر، موقوفًا.وانظر "العلل" لابن أبي حاتم 2/ 624 برقم (647)، و"البدر المنير" لابن الملقن 5/ 480. وأخرج أبو داود في "المراسيل" (130)، ومن طريقه البيهقي 4/ 84 عن محمد بن الصباح بن سفيان، عن هشيم بن بشير، عن عذافر البصري، عن الحسن البصري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من أدّى زكاة ماله فقد أدى الحق الذي عليه، ومن زاد فهو أفضل". وهذا مرسل، وعذافر البصري ليس له سوى هذا الحديث، وهو مستور الحال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1455)


1455 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الحسن بن المُهاجِر، حدثنا هارون بن سعيد الأَيْلي، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبير، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أدّيتَ زكاةَ مالِكَ، فقد أذهبتَ عنكَ شرَّه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وشاهده صحيحٌ من حديث المِصْريِّين:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তুমি তোমার মালের যাকাত আদায় করে নাও, তখন তুমি তোমার থেকে এর অনিষ্ট দূর করে দাও।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، رجاله ثقات، لكن اختلف في رفعه ووقفه، ورجَّح وقفه أبو زرعة - كما في "علل ابن أبي حاتم" (647) - والبيهقي وابن الملقن. وقد صرَّح بالتحديث ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - وأبو الزبير - وهو محمد بن مسلم بن تدرس - عند عبد الرزاق والبيهقي، لكن حيث روياه موقوفًا.أما المرفوع كرواية المصنِّف فقد أخرجه البيهقي 4/ 84 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: هكذا رواه ابن وهب بهذا الإسناد مرفوعًا، وكذلك رواه يونس بن عبد الأعلى عن ابن وهب، ورواه عيسى بن مثرود عن ابن وهب من قول أبي الزبير.قلنا: ورواية يونس بن عبد الأعلى عن ابن وهب المرفوعة، أخرجها ابن خزيمة في "صحيحه" (2258) و (2470)، وابن المقرئ في "معجمه" (44)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 6/ 288، وابن عساكر في "معجمه" (1389).وأخرجه مرفوعًا أيضًا الطبراني في "المعجم الأوسط" (1579) من طريق عمر بن أيوب، عن المغيرة بن زياد، عن أبي الزبير، عن جابر، رفعه. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن مغيرة إلّا عمر، تفرد به محمد بن عمار. قلنا: يعني عن عمر بن أيوب، أما المغيرة بن زياد فله أوهام كما قال الحافظ في "التقريب"، وقال الإمام أحمد: منكر الحديث.وأما الموقوف فقد أخرجه عبد الرزاق (7145). وأخرجه البيهقي 4/ 84 من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، كلاهما (عبد الرزاق وأبو عاصم) عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابرًا يقول … فذكره موقوفًا. قال البيهقي: وهذا أصح.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 114 عن أبي داود الطيالسي، عن هشام الدستوائي، عن أبي الزبير، عن جابر، موقوفًا.وانظر "العلل" لابن أبي حاتم 2/ 624 برقم (647)، و"البدر المنير" لابن الملقن 5/ 480. وأخرج أبو داود في "المراسيل" (130)، ومن طريقه البيهقي 4/ 84 عن محمد بن الصباح بن سفيان، عن هشيم بن بشير، عن عذافر البصري، عن الحسن البصري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من أدّى زكاة ماله فقد أدى الحق الذي عليه، ومن زاد فهو أفضل". وهذا مرسل، وعذافر البصري ليس له سوى هذا الحديث، وهو مستور الحال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1456)


1456 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا ابن وَهْب، عن عمرو بن الحارث، عن دَرَّاجٍ أبي السَّمْح، عن ابن حُجَيرةَ الأكبرِ الخَوْلاني، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا أدَّيتَ الزكاةَ فقد قَضَيتَ ما عليكَ، ومَن جَمَعَ مالًا حرامًا ثم تصدَّق به، لم يكن له فيه أجرٌ، وكان إصْرُه عليه" [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি যাকাত আদায় করলে, তখন তোমার উপর যা ফরয ছিল তা তুমি পূর্ণ করে দিলে। আর যে ব্যক্তি অবৈধ (হারাম) পন্থায় সম্পদ উপার্জন করে অতঃপর তা সাদকা করে দেয়, তাতে তার জন্য কোনো সওয়াব (প্রতিদান) থাকে না, বরং তার পাপের বোঝা তার উপরই থাকে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل درّاج أبي السمح ففيه ضعف ويعتبر به في المتابعات والشواهد. ابن وهب: هو عبد الله، وابن حجيرة الأكبر: هو عبد الرحمن.وأخرجه الترمذي (618)، وابن حبان (3216) و (3367) من طريقين عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. واقتصر الترمذي على الشطر الأول، واقتصر ابن حبان في الموضع الثاني على الشطر الثاني. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرج الشطر الأول ابن ماجه (1788) من طريق موسى بن أعين، عن عمرو بن الحارث، به. وذكرنا شواهده هناك.وفي معنى الشطر الثاني عن ابن عباس مرفوعًا: "لا يُغبَطَنَّ جامعُ المالِ من غير حِلِّه، فإنه إن تَصدَّق لم يُقبَل منه، وما بقي كان زادَه إلى النار"، وسيأتي برقم (2166)، وإسناده ضعيف جدًّا.ونحوه عن ابن مسعود عند أحمد 6/ (3672)، وإسناده ضعيف.وعن أبي الطفيل عند الطبراني كما في "مجمع الزوائد" 10/ 292 - 293، قال الهيثمي: وفيه محمد بن أبان الجعفي وهو ضعيف.ومن مرسل القاسم بن مُخيمِرة: "ومن اكتسب مالًا من مأثم، فوصل به رحمًا أو تصدق به أو أنفقه في سبيل الله، جمع ذلك جمعًا، فقُذف به في جهنم". أخرجه أبو إسحاق الفزاري في "السير" (498)، وأبو داود في "المراسيل" (131)، وهو مرسل محتمِل للتحسين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1457)


1457 - أخبرنا أبو النَّضْر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيدٍ الدَّارِمي.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ العدلُ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، وهشام بن عليٍّ، قالوا: حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، قال: أخذتُ من ثُمَامة بن عبد الله بن أنس كتابًا زَعَمَ أنَّ أبا بكرٍ كَتَبَه لأنسٍ، وعليه خاتَمُ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين بَعثَه مُصَدِّقًا، وكتبه له، فإذا فيه:هذه فريضةُ الصَّدَقةِ التي فَرَضَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين التي أمَرَ اللهُ بها نبيَّه صلى الله عليه وسلم فمن سُئِلها على وَجْهِها فليُعْطِها، ومن سُئِل فوقَها [1] فلا يُعطِه. فيما دونَ خَمسٍ وعشرين من الإبل الغنمُ؛ وفي كلِّ ذَوْدٍ شاةٌ، فإذا بَلَغَتْ خمسًا وعشرين ففيها ابنةُ مَخَاضٍ إلى أن تبلُغَ خمسًا وثلاثين، فإن لم يكن فيها ابنةُ مَخَاضٍ فابنُ لَبُونٍ ذكرٌ، فإذا بلغتْ ستًّا وثلاثين ففيها ابنةُ لَبُونٍ إلى خمسٍ وأربعين، فإذا بلغت ستًّا وأربعين ففيها حِقَّةٌ طَرُوقَةُ الفَحْل إلى ستين، فإذا بلغتْ إحدى وستين ففيها جَذَعةٌ إلى خمس وسبعين، فإذا بلغتْ ستًّا وسبعين ففيها ابنتا لَبُونٍ إلى تسعين، فإذا بلغتْ إحدى وتسعين ففيها حِقَّتانِ طَرُوقتا الفَحْلِ إلى عشرين ومئة، فإذا زادتْ على عشرين ومئة ففي كلِّ أربعينَ ابنةُ لبونٍ وفي كلِّ خمسين حِقَّةٌ.فإذا تبايَنَ أسنانُ الإبل في فرائض الصَّدقات، فمَن بلغتْ عنده صدقةُ الجَذَعة وليست عنده جَذَعةٌ، وعنده حِقَّةٌ فإنها تُقبَلُ منه، وأن يَجعَلَ معها شاتين إن استَيْسَرَتا له، أو عشرين درهمًا، ومَن بلغتْ عنده صدقةُ الحِقَّة وليست عنده حِقَّة وعنده جَذَعةٌ فإنها تُقبَلُ منه، ويُعطيهِ المصَدِّقُ عشرين درهمًا أو شاتين، ومَن بلغتْ عنده صدقةُ بنتِ لبونٍ وليست عنده إلّا حِقَّةٌ فإنها تُقبَلُ منه، ويُعطيهِ المصَدِّق عشرين درهمًا أو شاتين، ومن بلغتْ عنده صدقةُ بنتِ لبونٍ وليس عنده إلّا ابنةُ مَخَاضٍ فإنها تُقبَلُ منه وشاتين أو عشرين درهمًا، ومن بلغتْ عنده صدقةُ بنتِ مَخاضٍ وليس عنده إلّا ابنُ لَبونٍ ذكرٌ فإنه يُقبَل [2] منه وليس معه شيءٌ، ومن لم يكن عنده إلّا أربعٌ فليس فيها شيءٌ إلّا أن يشاء ربُّها.وفي سائِمةِ الغَنَم إذا كانت أربعينَ ففيها شاةٌ إلى عشرين ومئة، فإذا زادت على عشرين ومئة ففيها شاتانِ إلى أن تَبلُغ مئتين، فإذا زادت على المئتين ففيها ثلاثُ شِياهٍ إلى أن تَبلُغ ثلاثَ مئة، فإذا زادت على ثلاث مئة ففي كلِّ مئةٍ شاةٌ.ولا تُؤخَذُ فِي الصَّدقةِ هَرِمةٌ ولا ذاتُ عَوَارٍ من الغَنَم، ولا تَيْسُ الغَنَم إلّا أن يشاء المصَّدِّق.ولا يُجمَعُ بين متفرِّقٍ ولا يُفرَّقُ بين مُجتَمِعٍ خشيةَ الصدقة، وما كانا من خَليطَين فإنَّهما يتراجعانِ بينهما بالسَّوِيَّة، فإن لم تَبلُغْ سائمةُ الرجلِ أربعينَ فليس فيها شيءٌ إلّا أن يشاء ربُّها.وفي الرِّقَةِ رُبعُ العُشْر، فإن لم يكن المالُ إلّا تسعين ومئةً فليس فيها شيءٌ إلّا أن يشاء ربُّها [3]. هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه هكذا، إنما تفرَّد بإخراجه البخاري من وجهٍ عَلَا فيه عن الأنصاري عن ثُمامةَ بن عبد الله، وحديث حماد بن سلمة أصحُّ وأشفَى وأتمُّ من حديث الأنصاري.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এটি সাদাকার সেই ফরয বিধান, যা আল্লাহ তাআলা তাঁর নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ করেছেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের ওপর ফরয করেছেন। অতএব, যার কাছে যথাযথভাবে এটি চাওয়া হয়, সে যেন তা প্রদান করে। আর যার কাছে এর অতিরিক্ত চাওয়া হয়, সে যেন তা প্রদান না করে।

পঁচিশটির কম উটের জন্য (সাদাকা হলো) ছাগল। প্রতি পাঁচটি উটের জন্য একটি ছাগল। যখন তা পঁচিশটি হয়, তখন তাতে পঁয়ত্রিশটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত এক বছর বয়সী উষ্ট্রী (বিনতে মাখাদ)। যদি তার কাছে বিনতে মাখাদ না থাকে, তবে একটি পুরুষ ইবনে লাবুন (দুই বছরের বেশি বয়সী উট)। যখন তা ছত্রিশটি হয়, তখন তাতে পঁয়তাল্লিশটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত একটি বিনতে লাবুন (দুই বছরের বেশি বয়সী উষ্ট্রী)। যখন তা ছেচল্লিশটি হয়, তখন তাতে ষাটটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত একটি হিক্কাহ (তিন বছরের বেশি বয়সী উষ্ট্রী, যা প্রজননের উপযুক্ত)। যখন তা একষট্টিটি হয়, তখন তাতে পঁচাত্তরটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত একটি জাযআহ (চার বছরের বেশি বয়সী উষ্ট্রী)। যখন তা ছিয়াত্তরটি হয়, তখন তাতে নব্বইটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত দুটি বিনতে লাবুন। যখন তা একানব্বইটি হয়, তখন তাতে একশত বিশটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত দুটি হিক্কাহ (যা প্রজননের উপযুক্ত)। আর যখন তা একশত বিশটির বেশি হয়, তখন প্রতি চল্লিশটির জন্য একটি বিনতে লাবুন এবং প্রতি পঞ্চাশটির জন্য একটি হিক্কাহ।

যখন সাদাকার জন্য নির্ধারিত উটের বয়স ভিন্ন হয়:

যার ওপর জাযআহ (পাঁচ বছরের উষ্ট্রী) সাদাকা ফরয হয়েছে কিন্তু তার কাছে জাযআহ নেই, তার কাছে হিক্কাহ (চার বছরের উষ্ট্রী) থাকলে তা গ্রহণ করা হবে, তবে তাকে এর সাথে দুটি ছাগল অথবা বিশ দিরহাম দিতে হবে, যদি তা তার জন্য সহজলভ্য হয়।

আর যার ওপর হিক্কাহ ফরয হয়েছে কিন্তু তার কাছে হিক্কাহ নেই, আর তার কাছে জাযআহ আছে, তবে তা তার থেকে গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত সংগ্রাহক তাকে বিশ দিরহাম বা দুটি ছাগল ফেরত দেবে।

আর যার ওপর বিনতে লাবুন ফরয হয়েছে কিন্তু তার কাছে শুধু হিক্কাহ আছে, তবে তা তার থেকে গ্রহণ করা হবে এবং যাকাত সংগ্রাহক তাকে বিশ দিরহাম বা দুটি ছাগল ফেরত দেবে।

আর যার ওপর বিনতে লাবুন ফরয হয়েছে কিন্তু তার কাছে শুধু বিনতে মাখাদ আছে, তবে তা তার থেকে গ্রহণ করা হবে এবং (তাকে অতিরিক্ত দিতে হবে) দুটি ছাগল অথবা বিশ দিরহাম।

আর যার ওপর বিনতে মাখাদ ফরয হয়েছে কিন্তু তার কাছে শুধু ইবনে লাবুন (পুরুষ উট) আছে, তবে তা তার থেকে গ্রহণ করা হবে এবং এর সাথে তাকে কিছুই দিতে হবে না।

আর যার কাছে চারটির কম উট আছে, তার ওপর কিছু নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।

চারণভূমিতে বিচরণকারী চল্লিশটি ছাগলের ক্ষেত্রে একটি ছাগল (সাদাকা দিতে হবে) একশত বিশটি পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত। যখন তা একশত বিশটির বেশি হয়, তখন দুইশত পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত দুটি ছাগল। যখন তা দুইশতের বেশি হয়, তখন তিনশত পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত তিনটি ছাগল। যখন তা তিনশতের বেশি হয়, তখন প্রতি একশততে একটি করে ছাগল।

ছাগলের সাদাকায় বুড়ো (বৃদ্ধ) বা ত্রুটিযুক্ত ছাগল নেওয়া হবে না এবং মেষ (পাঁঠা) নেওয়া হবে না, যদি না যাকাত সংগ্রাহক নিজে চায়।

সাদাকার ভয়ে বিচ্ছিন্ন সম্পদ একত্রিত করা যাবে না এবং একত্রিত সম্পদ বিচ্ছিন্ন করা যাবে না। আর যে সম্পদ দুজন অংশীদারের মধ্যে মিশ্রিত থাকবে, তারা সমতার ভিত্তিতে নিজেদের মধ্যে ফেরত নেবে। যদি কোনো ব্যক্তির চারণভূমিতে বিচরণকারী ছাগলের সংখ্যা চল্লিশটি না পৌঁছায়, তবে তার ওপর কিছুই নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।

রূপার ক্ষেত্রে এক-দশমাংশের চার ভাগের এক ভাগ (চল্লিশ ভাগের এক ভাগ)। আর যদি সম্পদ একশত নব্বই (দিরহাম) না হয়, তবে তাতে কিছু নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظ "فوقها" سقط من نسخنا الخطية، واستدركناه من "تلخيص الذهبي"، وهو ثابت في النسخة المحمودية من "المستدرك" كما في طبعة الميمان.



[2] في (ز) و (ب) و (ع): "فإنها تقبل منه وليس معها شيء" والمثبت من (ص) و"تلخيص الذهبي"، وهو الوجه.



1457 [3] - إسناده صحيح. أبو النضر الفقيه: هو محمد بن محمد بن يوسف، وموسى بن إسماعيل: هو أبو سلمة التبوذكي.وأخرجه أبو داود (1567) عن موسى بن إسماعيل التبوذكي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 1/ (72)، والنسائي (2239) و (2247) من طريقين عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه بنحوه البخاري (1454)، وابن ماجه (1800)، وابن حبان (3266) من طريق محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصاري، عن أبيه، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، به. ومحمد بن عبد الله الأنصاري صدوق حسن الحديث.ومن هذا الطريق نفسه قطّعه البخاري بالأرقام (1448) و (1450) و (1451) و (1453) و (1455) و (2487) و (3106) و (5878) و (6955).وانظر ما بعده.قوله: "ذَوْد": قال ابن الأثير: الذَّود من الإبل: ما بين الثنتين إلى التسع، وقيل: ما بين الثلاث إلى العشر. واللفظة مؤنثة لا واحد لها كالنَّعَم.وابن المخاض، وابنة المخاض: ما دخل في السنة الثانية.وابن اللبون، وابنة اللبون، قال: هما من الإبل ما أتى عليه سنتان ودخل في الثالثة، فصارت أمّه لبونًا، أي: ذات لبن.والحِقَّة من الإبل، قال: هو ما دخل في السنة الرابعة إلى آخرها، وسمي بذلك لأنه استحق الركوب والتحميل.طَروقة الفحل، قال: أي يعلو الفحلُ مثلَها في سنِّها.والجَذَعة من الإبل: هي التي لها أربع سنين، ودخلت في الخامسة.وقوله: هَرِمَة، قال الحافظ في "الفتح" 5/ 125: بفتح الهاء وكسر الراء: الكبيرة التي سقطت أسنانها.ذات عَوَار، قال: بفتح العين المهملة وبضمها، أي: مَعيبة، وقيل: بالفتح: العيب، وبالضم: العَوَر.وقوله: "ولا تيس الغنم إلّا أن يشاء المصدِّق" قال - يعني الحافظ 5/ 125 - : اختُلف في ضبطه، فالأكثر على أنه بالتشديد، والمراد: المالك، وهذا اختيار أبي عبيد، وتقدير الحديث: لا تؤخذ هرمة ولا ذات عيب أصلًا، ولا يؤخذ التيس - وهو فحل الغنم - إلّا برضا المالك لكونه يحتاج إليه، ففي أخذه بغير اختياره إضرارٌ به، والله أعلم، وعلى هذا فالاستثناء مختص بالثالث. ومنهم من ضبطه بتخفيف الصاد: وهو الساعي، وكأنه يشير بذلك إلى التفويض إليه في اجتهاده، لكونه يجري مجرى الوكيل، فلا يتصرف بغير المصلحة، فيتقيد بما تقتضيه القواعد، وهذا قول الشافعي.قوله: "الرِّقَة" قال ابن الأثير في "النهاية" (رقه): يعني الفضة والدراهم المضروبة منها، وأصل اللفظة: الوَرِق، وهي الدراهم المضروبة خاصة، فحذفت الواو وعُوِّض منها الهاء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1458)


1458 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا أحمد بن سَلَمة وإبراهيم بن أبي طالب، قالا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا النَّضْر بن شُمَيل، حدثنا حمَّاد بن سلمة، قال: أخذْنا هذا الكتاب من ثُمامةَ بن عبد الله بن أنس، يُحدِّثُه عن أنس بن مالك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ذكر الحديث بنحوٍ من حديث موسى بن إسماعيل عن حماد بطوله [1].ولهذه الألفاظ شاهدٌ من حديث الزُّهري عن سالم عن أبيه:




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (হাম্মাদ ইবনে সালামা বলেছেন:) আমরা এই কিতাবটি থুমামাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আনাস থেকে গ্রহণ করেছি, যিনি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি (গ্রন্থকার) হাদীসটি মূসা ইবনে ইসমাঈল কর্তৃক হাম্মাদ থেকে বর্ণিত পূর্ণাঙ্গ হাদীসের অনুরূপ উল্লেখ করেন। [১] আর এই শব্দগুলোর সমর্থনে যুহরী কর্তৃক সালিম থেকে তাঁর পিতা (ইবনে উমার) সূত্রে বর্ণিত হাদীসের একটি শাহেদ (সমর্থক প্রমাণ) রয়েছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن سلمة: هو ابن عبد الله أبو الفضل النيسابوري، وإسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه. وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1459)


1459 - أخبرَناه أبو بكر محمد بن المؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفيلي، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، عن سفيان بن حسين، عن الزُّهري، عن سالم، عن أبيه قال: كَتَبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابَ الصدقة، فلم يُخرِجْه إلى عُمَّاله حتى قُبِض، فقَرَنَه بسيفه، فعَمِل به أبو بكر حتى قُبِض، ثم عَمِل به عمرُ حتى قُبِض، فكان فيه: في خمس من الإبل شاةٌ، وفي عشَرةٍ شاتان، وفي خمسَ عَشْرةَ ثلاثُ شِياه، وفي عشرين أربعُ شِياه، وفي خمسٍ وعشرين بنتُ مَخَاض إلى خَمسٍ وثلاثين، فإذا زادت واحدةً ففيها بنتُ لَبونٍ إلى خمسٍ وأربعين، فإذا زادت واحدةً ففيها حِقَّة إلى ستين، فإذا زادت واحدةً ففيها جَذَعة إلى خمسٍ وسبعين، فإذا زادت واحدةً ففيها بنتا لَبونٍ إلى تسعين، فإذا زادت واحدةً ففيها حِقَّتان إلى عشرين ومئة، فإن كانت الإبلُ أكثرَ من ذلك ففي كلِّ خمسين حِقَّةٌ، وفي كلِّ أربعين بنتُ لَبون.وفي الغنم في كلِّ أربعين شاةً شاةٌ إلى عشرين ومئة، فإذا زادت واحدةً فشاتان إلى مئتين، فإذا زادت واحدةً على المئتين ففيها ثلاثُ شِياه إلى ثلاث مئة، فإن كانت الغنم أكثرَ من ذلك ففي كل مئة شاةٍ شاةٌ، وليس فيها شيءٌ حتى تَبلُغَ المئةَ.ولا يُفرَّق بين مُجتَمِع، ولا يُجمَع بين متفرِّقٍ مخافةَ الصدقة، وما كان من خَليطَينِ فإنهما يتراجعان بالسَّوِيّة.ولا يُؤخَذ في الصدقة هَرِمةٌ ولا ذاتُ عيبٍ.قال الزهري: إذا جاء المصَدِّقُ قُسِمت الشاءُ أثلاثًا: ثلثًا شِرارٌ، وثلثًا خِيارٌ، وثلثًا وَسَطٌ [1]، فيأخذُ المصَدِّقُ من الوسط. ولم يَذكُر الزهريُّ البقر [2]. هذا حديث كبيرٌ في هذا الباب، يشهد بكثرة الأحكام التي في حديث ثُمامة عن أنس، إلّا أنَّ الشيخين لم يخرجا لسفيان بن حسين الواسطي في الكتابين، وسفيان ابن حسين أحد أئمة الحديث، وثَّقه يحيى بن معين، ودخل خُرَاسان مع يزيد بن المهلَّب، ودخل نيسابورَ، سمع منه جماعةٌ من مشايخنا القَهَنْدَزِيُّون، مثل مُبشِّر بن عبد الله بن رَزِين وأخيه عمر بن عبد الله وغيرهما، ويُصحِّحه على شرط الشيخين حديثُ عبد الله بن المبارك عن يونس بن يزيد عن الزُّهري، وإن كان فيه أدنى إرسالٍ فإنه شاهدٌ صحيح لحديث سفيان بن حسين:




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাদাকার (যাকাতের) কিতাব লিখেছিলেন, কিন্তু তাঁর ওফাতের পূর্ব পর্যন্ত তা তাঁর কর্মচারীদের নিকট পাঠাননি। তিনি এটিকে তাঁর তলোয়ারের সাথে সংযুক্ত করে রেখেছিলেন। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ওফাত পর্যন্ত সেই অনুযায়ী আমল করেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ওফাত পর্যন্ত সেই অনুযায়ী আমল করেন। সেই কিতাবে ছিল:

পাঁচটি উটের জন্য একটি ছাগল, দশটির জন্য দুটি ছাগল, পনেরোটির জন্য তিনটি ছাগল, বিশটির জন্য চারটি ছাগল। পঁচিশ থেকে পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত একটি বিন্তে মাখাদ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী)। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছত্রিশ হয়), তখন পঁয়তাল্লিশ পর্যন্ত একটি বিন্তে লাবুন (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটনী)। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছেচল্লিশ হয়), তখন ষাট পর্যন্ত একটি হিক্কাহ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া উটনী)। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ একষট্টি হয়), তখন পঁচাত্তর পর্যন্ত একটি জাযাআহ (চার বছর পূর্ণ হওয়া উটনী)। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছিয়াত্তর হয়), তখন নব্বই পর্যন্ত দুটি বিন্তে লাবুন। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ একানব্বই হয়), তখন একশ বিশ পর্যন্ত দুটি হিক্কাহ।

যদি উটের সংখ্যা এর চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি পঞ্চাশের জন্য একটি হিক্কাহ এবং প্রতি চল্লিশের জন্য একটি বিন্তে লাবুন।

আর ছাগলের (বা ভেড়ার) ক্ষেত্রে, প্রতি চল্লিশটি ছাগলের জন্য একটি ছাগল, একশ বিশটি পর্যন্ত। যখন একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ একশ একুশ হয়), তখন দুইশ পর্যন্ত দুটি ছাগল। যখন দুইশর চেয়ে একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ দুইশ এক হয়), তখন তিনশ পর্যন্ত তিনটি ছাগল। যদি ছাগলের সংখ্যা এর চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি একশ ছাগলের জন্য একটি ছাগল। আর একশতে না পৌঁছা পর্যন্ত তাতে কোনো যাকাত নেই।

সাদাকা (যাকাত) ভয়ের কারণে একত্রিত পশুকে বিভক্ত করা যাবে না এবং বিভক্ত পশুকে একত্রিত করা যাবে না। আর যে সব সম্পদ দুই শরিকের মধ্যে মিশ্রিত থাকবে, তারা (যাকাত দেওয়ার পর) সমানভাবে নিজেদের মধ্যে তা ভাগ করে নিবে।

সাদাকাতে (যাকাত হিসেবে) বুড়ো (অতি বয়স্ক) বা ত্রুটিযুক্ত পশু নেওয়া যাবে না।

যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যখন যাকাত আদায়কারী আসে, তখন ছাগলকে তিন ভাগে ভাগ করা হবে: এক তৃতীয়াংশ নিকৃষ্ট, এক তৃতীয়াংশ উত্তম এবং এক তৃতীয়াংশ মাঝারি। যাকাত আদায়কারী মাঝারি অংশ থেকে গ্রহণ করবেন। আর যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) গরুর যাকাতের কথা উল্লেখ করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في (ز) و (ب) بنصب "ثلثًا" ورفع ما بعدها في الكلمات الثلاث، وهو الموافق لما في "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 88 بروايته عن المصنف، وفي (ص) و (ع) بنصب الجميع، وكلاهما له وجه في العربية. إلى قوله: "وفي خمس وعشرين ابنة مخاض"، ثم قال الإمام أحمد بإثره فيما رواه عنه ابنه عبد الله: ثم أصابتني عِلَّةٌ في مجلس عباد بن العوام، فكتبت تمام الحديث، فأحسبني لم أفهم بعضه، فشككتُ في بقية الحديث، فتركتُه.وأخرجه أحمد (4634)، وأبو داود (1569) من طريق محمد بن يزيد الواسطي، عن سفيان بن حسين، به.وأخرجه ابن ماجه (1798) و (1805) من طريق سليمان بن كثير، عن الزهري، به. وذكر سليمان في روايته أنَّ الزهري قال: أقرأني سالم كتابًا .. إلى آخره. وسليمان بن كثير في روايته عن الزهري كلام أيضًا، إلّا أنه وسفيان بن حسين يقوي أحدهما الآخر.وأخرجه بأخصر مما هنا: ابن ماجه (1807) من طريق يزيد بن عبد الرحمن، عن أبي هند، عن نافع، عن ابن عمر. لم يذكر زكاة الإبل. وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي هند.ويشهد للحديث ما صحَّ من أحاديث هذا الباب فيما سلف قبله وفيما سيأتي بعده.ونقل البيهقي في "السنن" 4/ 88 عن الترمذي أنه قال في "العلل": سألت محمد بن إسماعيل عن هذا الحديث فقال: أرجو أن يكون محفوظًا، وسفيان بن حسين صدوق.



[2] حديث صحيح، رجاله ثقات إلا أن سفيان بن حسين في روايته عن الزهري كلام، وقد توبع. سالم: هو ابن عبد الله بن عمر بن الخطاب.وأخرجه أبو داود (1568) عن عبد الله بن محمد النفيلي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 8/ (4632)، والترمذي (621) من طريق عباد بن العوام، به. قال الترمذي: هذا حديث حسن، والعمل على هذا عند عامة الفقهاء. واقتصر أحمد على أول الحديث فقط إلى قوله: "وفي خمس وعشرين ابنة مخاض"، ثم قال الإمام أحمد بإثره فيما رواه عنه ابنه عبد الله: ثم أصابتني عِلَّةٌ في مجلس عباد بن العوام، فكتبت تمام الحديث، فأحسبني لم أفهم بعضه، فشككتُ في بقية الحديث، فتركتُه.وأخرجه أحمد (4634)، وأبو داود (1569) من طريق محمد بن يزيد الواسطي، عن سفيان بن حسين، به.وأخرجه ابن ماجه (1798) و (1805) من طريق سليمان بن كثير، عن الزهري، به. وذكر سليمان في روايته أنَّ الزهري قال: أقرأني سالم كتابًا .. إلى آخره. وسليمان بن كثير في روايته عن الزهري كلام أيضًا، إلّا أنه وسفيان بن حسين يقوي أحدهما الآخر.وأخرجه بأخصر مما هنا: ابن ماجه (1807) من طريق يزيد بن عبد الرحمن، عن أبي هند، عن نافع، عن ابن عمر. لم يذكر زكاة الإبل. وهذا إسناد ضعيف لجهالة أبي هند.ويشهد للحديث ما صحَّ من أحاديث هذا الباب فيما سلف قبله وفيما سيأتي بعده.ونقل البيهقي في "السنن" 4/ 88 عن الترمذي أنه قال في "العلل": سألت محمد بن إسماعيل عن هذا الحديث فقال: أرجو أن يكون محفوظًا، وسفيان بن حسين صدوق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1460)


1460 - أخبرَناه أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي وأبو بكر محمد بن أحمد المزكِّي المَروَزِيَّان بمَرْو، قالا: أخبرنا أبو المُوجِّه محمد بن عمرو، أخبرنا عَبْدانُ بن عثمان، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرني يونس بن يزيد.وحدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا عبد الله بن محمد بن أسماء، حدثنا عبد الله بن المبارك، عن يونس، عن ابن شِهابٍ قال: هذه نسخةُ كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم التي كَتَبَ الصدقةَ، وهو عند آل عمر بن الخطاب.قال ابن شهاب: أقرأَنيها سالمُ بن عبد الله بن عمر فوَعَيتُها على وجهها، وهي التي انتَسَخَ عمرُ بن عبد العزيز من عبدِ الله بن عبد الله بن عمر وسالمِ بن عبد الله حين أُمِّر على المدينة، فأمر عُمَّاله بالعمل بها [وكتب بها إلى الوليد بن عبد الملك، فأمر الوليدُ عمَّاله بالعمل بها] [1] ثم لم تَزَلْ في الخلفاء يأمرون بذلك بعدَه، ثم أَمَر بها هشامٌ فنَسَخها إلى كلِّ عامل من المسلمين، وأَمَرهم بالعمل بما فيها ولا يتعدَّونها، وهذا كتابٌ تفسيره: لا يوجد [2] في شيءٍ من الإبل الصدقةُ حتى تَبْلُغَ خمسَ ذَوْدٍ، فإذا بلغت خمسًا ففيها شاةٌ حتى تبلغ عشرًا، فإذا بلغت عشرًا ففيها شاتان حتى تبلغ خمسَ عشْرةَ، فإذا بلغت خمسَ عشْرةَ ففيها ثلاثُ شِياهٍ حتى تبلغ عشرين، فإذا بلغت عشرين ففيها [3] أربع شياهٍ حتى تبلغ خمسًا وعشرين، فإذا بلغت خمسًا وعشرين أَفرَضَتْ، فكان فيها فَريضةٌ بنتُ مَخاضٍ، فإن لم يوجد بنتُ مخاضٍ فابن لَبُونٍ ذكرٌ حتى تبلغ خمسًا وثلاثين، فإذا بلغت ستًّا وثلاثين ففيها بنتُ لَبون حتى تبلغ خمسًا وأربعين، فإذا كانت ستًّا وأربعين ففيها حِقَّةٌ طَرُوقةُ الجَمل حتى تبلغ ستين، فإذا كانت إحدى وستين ففيها جَذَعةٌ حتى تبلغ خمسًا وسبعين، فإذا بلغت ستًّا وسبعين ففيها بنتا لَبونٍ [4] حتى تبلغ تسعين، فإذا كانت إحدى وتسعين ففيها حِقَّتان طَرُوقتا الجمل حتى تبلغ عشرين ومئة، فإذا كانت إحدى وعشرين ومئة ففيها ثلاثُ بناتِ لَبونٍ حتى تبلغ تسعًا وعشرين ومئة، فإذا كانت ثلاثين ومئة ففيها حِقَّةٌ وبنتا لبونٍ [5] حتى تبلغ تسعًا وثلاثين ومئة، فإذا كانت أربعينَ ومئة ففيها حِقَّتانِ وبنتُ لبونٍ حتى تبلغ تسعًا وأربعين ومئة، فإذا كانت خمسين ومئة ففيها ثلاثُ حِقاقٍ حتى تبلغ تسعًا وخمسين ومئة، فإذا بلغت ستين ومئة ففيها أربعُ بناتِ لبون حتى تبلغ تسعًا وستين ومئة، فإذا كانت سبعين ومئة ففيها حِقَّة وثلاثُ بناتِ لبونٍ حتى تبلغ تسعًا وسبعين ومئة، فإذا كانت ثمانين ومئة ففيها حِقَّتان وبنتا لبونٍ [حتى تبلغ تسعًا وثمانين ومئة] [6]، فإذا كانت تسعين ومئة ففيها ثلاثُ حِقاقٍ وبنتُ [-4] لبونٍ حتى تبلغ تسعًا وتسعين ومئة، فإذا كانت مئتين ففيها أربعُ حِقاقٍ أو خمسُ بناتِ لبونٍ، أيُّ السِّنَّينِ [وُجدت] [-4] فيها أُخِذَت على عِدَّة ما كَتبْنا في هذا الكتاب، ثم كلُّ شيءٍ من الإبل على ذلك يُؤخَذ على نحو ما كتبنا في هذا الكتاب.ولا يُؤخَذ من الغنم صدقةٌ حتى تبلغ أربعين شاةً، فإذا بلغت أربعين شاةً ففيها شاةٌ حتى تبلغ عشرين ومئة، فإذا كانت إحدى وعشرين ومئة ففيها شاتان حتى تبلغ مئتين، فإذا كانت شاةً ومئتين ففيها ثلاث شياهٍ حتى تبلغ ثلاث مئة، فإذا زادت على ثلاث مئة شاةٍ فليس فيها إلّا ثلاثُ شياءٍ حتى تبلغ أربعَ مئة شاةٍ، فإذا بلغت أربع مئة شاةٍ ففيها أربع شياهٍ حتى تبلغ خمس مئة شاةٍ، فإذا بلغت خمس مئة ففيها خمس شِياهٍ حتى تبلغ ست مئة شاةٍ، فإذا بلغت ست مئة شاةٍ ففيها ستُّ شياهٍ، فإذا بلغت سبعَ مئةٍ ففيها سبع شياهٍ حتى تبلغ ثمان مئة شاةٍ، فإذا بلغت ثمانَ مئة شاةٍ ففيها ثمانُ شياهٍ حتى تبلغ تسع مئة شاةٍ، فإذا بلغت تسع مئة شاةٍ ففيها تسع شياهٍ حتى تبلغ ألفَ شاةٍ، فإذا بلغت ألفَ شاة ففيها عَشْرُ شِياهٍ، ثم في كلِّ ما زادت مئةَ شاةٍ شاةٌ [-4].ومما يشهد لهذا الحديث بالصِّحة:




ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এটি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সেই পত্রের অনুলিপি, যা তিনি সাদাকাহ (যাকাত) সম্পর্কে লিখেছিলেন। এটি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের কাছে সংরক্ষিত ছিল।

ইবনে শিহাব (রহ.) বলেন: সালিম ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উমর আমাকে এটি পড়ে শুনিয়েছিলেন, ফলে আমি তা পুরোপুরি মুখস্থ করে নিয়েছিলাম। যখন উমর ইবনে আব্দুল আযীয (রহ.) মদীনার দায়িত্বশীল নিযুক্ত হলেন, তখন তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উমর এবং সালিম ইবনে আব্দুল্লাহর কাছ থেকে এই অনুলিপিটি প্রস্তুত করান। তিনি তাঁর কর্মচারীদের এটি অনুযায়ী কাজ করার নির্দেশ দেন। [এবং তিনি আল-ওয়ালিদ ইবনে আব্দুল মালিকের কাছে এটি লিখে পাঠান, ফলে ওয়ালিদও তাঁর কর্মচারীদের এটি অনুযায়ী কাজ করার নির্দেশ দেন।] অতঃপর তাঁর পরবর্তী খলীফাগণও সর্বদা এটি অনুযায়ী নির্দেশ দিতেন। এরপর হিশামও এটি নকল করিয়ে মুসলিমদের প্রতিটি গভর্নরের কাছে পাঠান এবং তাদের নির্দেশ দেন যেন তারা এটি অনুযায়ী কাজ করে এবং তা লংঘন না করে।

এই পত্রের ব্যাখ্যা হলো:

পাঁচটি উট না হওয়া পর্যন্ত কোনো উটের ওপর যাকাত প্রযোজ্য হবে না। যখন উটের সংখ্যা পাঁচ হবে, তখন তাতে একটি ছাগল যাকাত হিসেবে দিতে হবে, যতক্ষণ না তা দশটিতে পৌঁছায়। যখন তা দশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পনেরোটিতে পৌঁছায়। যখন তা পনেরোটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা বিশটিতে পৌঁছায়। যখন তা বিশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে চারটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁচিশটিতে পৌঁছায়। যখন তা পঁচিশটিতে পৌঁছাবে, তখন ফারিদা (নির্দিষ্ট বয়সের উট) ওয়াজিব হবে। তখন তাতে একটি 'বিনতে মাখাদ' (এক বছর পূর্ণ করে দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উটনী) যাকাত হিসেবে দিতে হবে। যদি 'বিনতে মাখাদ' পাওয়া না যায়, তবে একটি পুরুষ 'ইবনু লাবুন' (দুই বছর পূর্ণ করে তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উট) দিতে হবে, যতক্ষণ না সংখ্যা পঁয়ত্রিশে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা ছত্রিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি 'বিনতে লাবুন' (দুই বছর পূর্ণ করে তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁয়তাল্লিশে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা ছেচল্লিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি 'হিক্কাহ' (তিন বছর পূর্ণ করে চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে, যা গর্ভধারণে সক্ষম, যতক্ষণ না তা ষাটটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একষট্টিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি 'জাযআহ' (চার বছর পূর্ণ করে পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁচাত্তরটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা ছিয়াত্তরে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা নব্বইটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একানব্বইটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি 'হিক্কাহ' দিতে হবে, যা গর্ভধারণে সক্ষম, যতক্ষণ না তা একশ’ বিশটিতে পৌঁছায়।

যখন সংখ্যা একশ’ একুশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ উনত্রিশটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ ত্রিশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি 'হিক্কাহ' এবং দুটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ ঊনচল্লিশটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ চল্লিশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি 'হিক্কাহ' এবং একটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ ঊনপঞ্চাশটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ পঞ্চাশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি 'হিক্কাহ' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ ঊনষাটটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ ষাটটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে চারটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ ঊনসত্তরটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ সত্তুরটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি 'হিক্কাহ' এবং তিনটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ ঊনআশিতিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ আশিটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি 'হিক্কাহ' এবং দুটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, [যতক্ষণ না তা একশ’ ঊননব্বইটিতে পৌঁছায়]। যখন সংখ্যা একশ’ নব্বইটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি 'হিক্কাহ' এবং একটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ নিরানব্বইটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা দু’শতে পৌঁছাবে, তখন তাতে চারটি 'হিক্কাহ' অথবা পাঁচটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে। এই কিতাবে আমরা যে সংখ্যা লিখেছি, তদনুযায়ী যে বয়সের উট পাওয়া যাবে, সেটাই যাকাত হিসেবে গ্রহণ করা হবে। এরপর যত উটই হোক না কেন, এই কিতাবে লিখিত নিয়ম অনুযায়ীই যাকাত নেওয়া হবে।

চল্লিশটি ছাগল না হওয়া পর্যন্ত ছাগলের ওপর যাকাত নেওয়া হবে না। যখন তা চল্লিশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশ’ বিশটিতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা একশ’ একুশটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা দু’শতে পৌঁছায়। যখন সংখ্যা দু’শ একটিতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা তিনশ’তে পৌঁছায়। যখন তা তিনশ’ ছাগল ছাড়িয়ে যাবে, তখন চারশ’ ছাগল না হওয়া পর্যন্ত কেবল তিনটি ছাগলই (যাকাত) থাকবে। যখন তা চারশ’ ছাগলে পৌঁছাবে, তখন তাতে চারটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পাঁচশ’ ছাগলে পৌঁছায়। যখন তা পাঁচশ’তে পৌঁছাবে, তখন তাতে পাঁচটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা ছয়শ’ ছাগলে পৌঁছায়। যখন তা ছয়শ’ ছাগলে পৌঁছাবে, তখন তাতে ছয়টি ছাগল দিতে হবে। যখন তা সাতশ’তে পৌঁছাবে, তখন তাতে সাতটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা আটশ’ ছাগলে পৌঁছায়। যখন তা আটশ’ ছাগলে পৌঁছাবে, তখন তাতে আটটি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা নয়শ’ ছাগলে পৌঁছায়। যখন তা নয়শ’ ছাগলে পৌঁছাবে, তখন তাতে নয়টি ছাগল দিতে হবে, যতক্ষণ না তা এক হাজার ছাগলে পৌঁছায়। যখন তা এক হাজার ছাগলে পৌঁছাবে, তখন তাতে দশটি ছাগল দিতে হবে। এরপর প্রতি একশ’ ছাগল বৃদ্ধির জন্য একটি করে ছাগল দিতে হবে।

এই হাদীসের বিশুদ্ধতার সাক্ষ্য হিসেবে আরো বর্ণিত আছে:




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين معقوفين سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي" ومن "السنن الكبرى" للبيهقي 7/ 90 حيث أخرجه عن المصنف بإسناده ومتنه.



[2] في "التلخيص": يؤخذ، وكذا في النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وكلاهما صحيح.



1460 [3] - من قوله: "ثلاث شياه" إلى هنا سقط من (ز) و (ب) والمطبوع، واستدركناه من (ص) و (ع) و"سنن البيهقي".



1460 [4] - في (ز) و (ب): بنت لبون، وهو خطأ، والتصويب من (ص) و (ع) ومصادر التخريج.



1460 [5] - وقع بدل قوله: "حقة وبنتا لبون" في نسخنا الخطية: "ثلاث بنات لبون" وهو خطأ، لعله سبق قلم من النساخ، والصواب ما أثبتنا من "سنن البيهقي" وسائر مصادر التخريج.



1460 [6] - ما بين معقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من "التلخيص" والبيهقي وسائر مصادر التخريج.



1460 [-4] - بدل قوله: "وبنت" وقع في (ز) و (ب): وثلاث بنات، والمثبت من (ص) و (ع) والبيهقي ومصادر التخريج.



1460 [-4] - لفظة "وجدت" لم ترد في النسخ الخطية.



1460 [-4] - رجاله ثقات، وهو وإن كان فيه أدنى إرسال كما قال المصنِّف، إلّا أنه في حكم الموصول، فابن شهاب - وهو محمد بن مسلم الزهري - يقول: أقرأنيها سالم بن عبد الله بن عمر، قلنا: وسالم بن عبد الله بن عمر هل هو إلّا من آل عمر بن الخطاب، وهل أخذ الكتاب إلّا عن أبيه عبد الله بن عمر، ويوضح ذلك الرواية الموصولة السالفة قبله، وهذا يقوي الرواية الموصولة تلك، وليس علةً لها، خلافًا لما ذهب إليه الحافظ ابن حجر رحمه الله في "تغليق التعليق" 3/ 17.عبدان بن عثمان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة العتكي، وعبدان لقبه، وأبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، وأبو المثنى: هو معاذ بن المثنى.وأخرجه أبو داود (1570) عن محمد بن العلاء، عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.