আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1461 - ما حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق وحَبِيب بن [أبي] [1] حَبِيب، عن عمرو بن هَرِم [2]، أنَّ أبا الرِّجال محمد بن عبد الرحمن الأنصاري حدَّثه: أنَّ عمر بن عبد العزيز حين استُخلِف أَرسَل إلى المدينة يلتمس عهدَ النبي صلى الله عليه وسلم في الصدقات، فوَجَدَ عند آل عمرو بن حزم كتابَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم إلى عمرو بن حَزْم في الصَّدقات، ووَجَدَ عند آل عمر بن الخطاب كتابَ عمرَ إلى عُمّاله في الصَّدقات، بمثلِ كتاب النبيِّ صلى الله عليه وسلم إلى عمرو بن حَزْم، فأَمَرَ عمرُ بن عبد العزيز عمَّالَه على الصَّدقات أن يأخذوا بما في ذَينِكَ الكتابين، فكان فيهما: صدقةُ الإبل ما زادت على التسعين واحدةً ففيها حِقَّتان إلى عشرين ومئة، فإذا زادت على العشرين ومئة واحدةً ففيها ثلاثُ بنات لبونٍ حتى تبلغ تسعًا وعشرين ومئة، فإذا كانت الإبلُ أكثرَ من ذلك فليس في ما لا يبلُغُ العشرةَ منها شيءٌ حتى تبلُغَ العشرة [3].وأما كتابُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم لعَمْرو بن حَزْم فإنَّ إسناده من شرط هذا الكتاب، ولذلك ذكرتُ السِّياقةَ بطولها.
আবু আর-রিজাল মুহাম্মাদ ইবন আবদির রাহমান আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, যখন উমর ইবন আব্দুল আযীয (রাহঃ) খলীফা হলেন, তখন তিনি সাদাকাত (যাকাত) সংক্রান্ত বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দলিলপত্র অনুসন্ধানের জন্য মদীনায় লোক পাঠালেন। তিনি আমর ইবন হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের নিকট সাদাকাত বিষয়ে আমর ইবন হাযমকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লেখা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পত্র পেলেন। এবং তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের নিকট সাদাকাত বিষয়ে তাঁর কর্মচারীদের কাছে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর লেখা পত্র পেলেন, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক আমর ইবন হাযমকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লেখা পত্রের অনুরূপ ছিল।
অতঃপর উমর ইবন আব্দুল আযীয (রাহঃ) তাঁর সাদাকাত সংগ্রহকারী কর্মচারীদেরকে সেই দুটি কিতাবে যা রয়েছে, তা অনুযায়ী গ্রহণ করতে নির্দেশ দিলেন। সেই দুই কিতাবে ছিল: উটের যাকাতের বিধান হলো, যখন উটের সংখ্যা একানব্বই থেকে একশো বিশ পর্যন্ত বৃদ্ধি পাবে, তখন তাতে দুটি হিক্কাহ (তিন বছর বয়সী মাদী উট) দিতে হবে। আর যখন একশো বিশটির বেশি হবে, তখন একশো ঊনত্রিশটি পর্যন্ত তাতে তিনটি বিন্তু লাবুন (দুই বছর বয়সী মাদী উট) দিতে হবে। আর যদি উটের সংখ্যা এর চেয়েও বেশি হয়, তবে প্রতি দশটিতে পৌঁছানোর আগে অতিরিক্ত দশটির কমে কোনো যাকাত নেই, যতক্ষণ না তা দশটি হয়।
আর আমর ইবন হাযমকে লেখা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পত্রটির ইসনাদ (বর্ণনা সূত্র) এই কিতাবের শর্ত পূরণ করে, তাই আমি পূর্ণ বর্ণনাটি এখানে উল্লেখ করলাম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] سقط من النسخ الخطية. وهو حبيب بن أبي حبيب الجرمي، وأبو حبيب اسمه: يزيد.
[2] تحرف في النسخ إلى: هارون، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الصواب.
1461 [3] - إسناده - مع إرساله - صحيح، فهو مرسل في حكم المسند، ويقال فيه كما قيل في الذي قبله، فعمر بن عبد العزيز وجد كتابي رسول الله صلى الله عليه وسلم وعمر بن الخطاب، فهو وِجادة، وطريقه من طرق التحمل الدالة على الاتصال في عرف علماء المصطلح.وأخرجه البيهقي 4/ 92 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أبو عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (934) و (947)، والطحاوي في "أحكام القرآن" (616)، وفي "معاني الآثار" 4/ 473، والدارقطني (1987)، والبيهقي 4/ 91 من طريق يزيد بن هارون، عن حبيب بن أبي حبيب وحده، به. لم يذكروا فيه محمد بن إسحاق بن يسار. وانظر ما بعده.
1462 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعيُّ ببغداد، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني أَبي، عن عبد الله بن أبي بكر ومحمد ابنَي أبي بكر بن عَمرو بن حَزْم، عن أبيهما، عن جدِّهما، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ للكتابِ الذي كَتَبه رسول الله صلى الله عليه وسلم لعَمرِو بن حَزْم: فإذا بَلَغَ قيمةُ الذهب مئتي درهمٍ، ففي كلِّ أربعينَ درهمًا درهمٌ [1]. هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، وهو دليلٌ على الكتاب المشروح المفسَّر:
আমর ইবনু হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট যে পত্র লিখেছিলেন, তাতে (বর্ণিত ছিল): যখন স্বর্ণের মূল্য দুইশত দিরহামে পৌঁছাবে, তখন প্রতি চল্লিশ দিরহামে এক দিরহাম (যাকাত দিতে হবে)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] أصل الكتاب صحيح، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإن كان المراد بجدهما: عمرَو بن حزم، فهو منقطع، لأنَّ أبا بكر بن محمد لم يدرك جده عَمْرًا، وإن كان المراد به: محمدَ بن عمرو بن حزم، فهو مرسل. أبو أويس: اسمه عبد الله بن عبد الله بن أويس.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (1683) عن ابن أبي أويس، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أبي سعيد الخدري مرفوعًا: "ليس فيما دون خمس أواقٍ صدقة" أخرجه البخاري (1405)، ومسلم (979)، وهو في "مسند أحمد" 17/ (11030). والأواق: جمع أُوقية، وهي أربعون درهمًا، والدرهم يساوي 2،975 غم.وحديث أبي هريرة مثل حديث أبي سعيد عند أحمد 15/ (9221)، وإسناده صحيح. وانظر ما بعده.
1463 - أخبرَناه أبو نصر أحمد بن سَهْلٍ الفقيه ببُخاري، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، حدثنا الحَكَم بن موسى.وحدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم بن سعيد العَبْدي، حدثنا أبو صالح الحَكَم بن موسى القَنْطَري، حدثنا يحيى بن حمزة، عن سليمان بن داود، عن الزُّهري، عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن أبيه، عن جدِّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه كَتَبَ إلى أهل اليمن بكتابٍ فيه الفرائضُ والسننُ والدِّيَاتُ، وبعث [به] [1] مع عمرو بن حزم فقُرِئت على أهل اليمن، وهذه نُسختُها:"بسم الله الرحمن الرحيم، من محمدٍ النبيِّ إلى شُرَحْبيل بن عبد كُلَالٍ والحارث بن عبد كُلَال ونُعَيم بن كُلَال قَيْلِ ذي رُعَينٍ ومَعافِرَ وهَمْدان، أما بعد: فقد رَجَعَ رسولُكم وأَعطَيتُم من المغانم خُمُسَ الله، وما كَتَبَ الله على المؤمنين من العُشْر في العَقَار، ما سَقَتِ السماءُ، أو كان سَيْحًا، أو كان بعلًا، ففيه العُشْر إذا بلغت خمسةَ أوسُقٍ، وما سُقي بالرِّشاء والدَّاليَةِ، ففيه نصفُ العُشْر إذا بلغ خمسةَ أوسقٍ.وفي كل خَمْسٍ من الإبل سائمةٍ شاةٌ إلى أن تبلغ أربعًا وعشرين، فإذا زادت واحدةً على أربعٍ وعشرين ففيها ابنة مَخَاض، فإن لم توجد ابنةُ مخاضٍ فابنُ لبونٍ ذكرٌ إلى أن تبلغ خمسًا وثلاثين، فإذا زادت على خمسةٍ وثلاثين واحدةً ففيها ابنة لبونٍ إلى أن تبلغ خمسةً وأربعين، فإن زادت واحدةً على خمسةٍ وأربعين ففيها حِقَّةٌ طَرُوقةُ الفحل إلى أن تبلغ ستين، فإن زادت على ستين واحدةً ففيها جَذَعة إلى أن تبلغ خمسةً وسبعين، فإن زادت على خمسةٍ وسبعين واحدةً ففيها ابنتا [2] لَبونٍ إلى أن تبلغ تسعينَ، فإن زادت واحدةً على تسعين ففيها حِقَّتان طَرُوقتا الجَمَل إلى أن تبلغ عشرين ومئة، فما زادت على عشرين ومئة ففي كلِّ أربعينَ ابنةُ لبونٍ، وفي كل خمسين حِقَّةٌ طَروقَةُ الجمل.وفي كلِّ ثلاثين باقورةً تَبيعٌ جَذَعٌ أو جَذَعةٌ، وفي كل أربعين باقورةً بقرةٌ.وفي كلِّ أربعين شاةً سائمةً شاةٌ إلى أن تبلغ عشرين ومئة، فإن زادت على العشرين ومئة واحدةً ففيها شاتان إلى أن تبلغ مئتين، فإن زادت واحدةً ففيها ثلاث شياهٍ إلى أن تبلغ ثلاث مئة، فإن زادت فما زاد ففي كلِّ مئة شاةٍ شاةٌ.ولا يُؤخَذُ في الصدقة هَرِمةٌ ولا عَجْفاءُ، ولا ذاتُ عَوَارٍ، ولا تيسُ الغنم إلّا أن يشاء المصَّدِّق.ولا يُجمَع بين متفرِّق، ولا يفرَّق بين مجتَمِعٍ خِيفةَ الصدقة.وما أُخذَ من الخليطَين فإنهما يتراجعان بينهما بالسَّوِيَّة.وفي كلِّ خمسٍ أواقٍ من الوَرِق خمسةُ دراهم، وما زاد ففي كلِّ أربعين [درهمًا درهم، وليس فيما دون خمسِ أواقٍ شيءٌ، وفي كل أربعين] [3] دينارًا دينار.إنَّ الصَّدقة لا تَحِلُّ لمحمدٍ، ولا لأهل بيتِ محمد، إنما هي الزكاةُ تُزكَّى بها أنفسُهُم، ولفقراءِ المؤمنين، وفي سبيل الله، وابنِ السَّبيل.وليس في رَقيقٍ ولا مزرعةٍ ولا عُمَّالِها شيءٌ إذا كانت تؤدَّى صدقتُها من العُشر، وأنه ليس في عبدٍ مسلمٍ ولا في فرسِه شيءٌ".قال: وكان في الكتاب: "إنَّ أكبر الكبائر عند الله يومَ القيامة إشراكٌ بالله، وقتلُ النَّفس المؤمنِ بغير حقٍّ، والفِرارُ في سبيل الله يومَ الزَّحف، وعقوقُ الوالدين، ورميُ المُحصَنة، وتعلُّم السِّحر، وأكلُ الربا، وأكلُ مال اليتيم. وإنَّ العُمرةَ الحجُّ الأصغر، ولا يَمَسُّ القرآنَ إلّا طاهر، ولا طلاقَ قبل إملاكٍ، ولا عَتَاقَ حتى يَبتاع، ولا يُصلِّيَنَّ أَحدٌ منكم في ثوبٍ واحدٍ وشِقُّه بادٍ، ولا يُصلينَّ أحدٌ منكم عاقصٌ شَعرَه، ولا يُصلينَّ أحدٌ منكم في ثوبٍ واحدٍ ليس على مَنكِبِه شيء".وكان في الكتاب: "إنَّ من اعتَبَطَ مؤمنًا قتلًا عن بيِّنةٍ فإنه قَوَدٌ، إلَّا أن يَرضَى أولياءُ المقتول، وإنَّ في النَّفْس الدِّيةَ مئةً من الإبل، وفي الأنف الذي أُوعِبَ جَدْعُه الديةُ، وفي اللسان الديةُ، وفي الشَّفَتين الديةُ، وفي البَيضَتَين الديةُ، وفي الذَّكَر الديةُ، وفي الصُّلْب الديةُ، وفي العَينين الديةُ، وفي الرِّجْل الواحدة نصفُ الدية، وفي المأمومة ثلثُ الدية، وفي الجائِفَة ثلثُ الدية، وفي المُنقِّلة خمسَ عشرةَ من الإبل، وفي كل إِصبَعٍ من الأصابع من اليد والرِّجل عشرٌ من الإبل، وفي السِّنِّ خمسٌ من الإبل، وفي المُوضِحةِ خمسٌ من الإبل، وأنَّ الرَّجل يُقتَل بالمرأة، وعلى أهل الذهب ألفُ دينار" [4]. هذا حديث كبيرٌ مفسَّر في هذا الباب، يشهدُ له أمير المؤمنين عمر بن عبد العزيز، وإمامُ العلماءِ في عصره محمدُ بن مسلم الزُّهري بالصِّحة، كما تقدم ذكري له.وسليمان بن داود الدِّمشقي الخَوْلاني معروف بالزُّهري، وإن كان يحيى بن مَعينٍ غَمَزَه فقد عدَّله غيرُه.1463 م - كما أخبرَنيهِ أبو أحمد الحسين بن علي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي حاتم، قال: سمعتُ أبي، وسُئِل عن حديث عمرو بن حزمٍ في كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي كَتَبَه له في الصدقات، فقال: سليمان بن داود الخَوْلاني عندنا ممن لا بأسَ به.قال أبو محمد بن أبي حاتم: وسمعتُ أبا زُرعة يقول ذلك [5].قال الحاكم: قد بذلتُ ما أدّى إليه الاجتهادُ في إخراج هذه الأحاديث المفسَّرة الملخَّصة في الزَّكَوات، ولا يستغني هذا الكتاب عن شرحها، واستدللتُ على صحتها بالأسانيد الصحيحة عن الخلفاء والتابعين بقَبولها واستعمالها بما فيه غُنْيةٌ لمن تأمَّلها، وقد كان إمامُنا شعبةُ يقول في حديث عُقْبة بن عامر الجُهَني في الوضوء: لَأنْ يَصِحَّ لي مثلُ هذا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أحبَّ إليَّ من نفسي ومالي وأهلي. وذاك حديث في صلاة التطوع، فكيف بهذه السُّنن التي هي قواعدُ الإسلام، والله الموفِّق وهو حَسْبي ونعم الوكيل.
আমর ইবনে হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইয়ামানবাসীদের উদ্দেশ্যে একটি পত্র লিখেছিলেন, যার মধ্যে ফারائض, সুন্নাত এবং দিয়াতের (রক্তপণ) বিধান ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমর ইবনে হাযমকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সেই পত্রটি পাঠিয়েছিলেন। পত্রটি ইয়ামানবাসীদের সামনে পাঠ করা হয়েছিল। আর এটি হলো সেই পত্রের অনুলিপি:
"বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময় দয়ালু আল্লাহর নামে)। আল্লাহর নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে শুরাহবিল ইবনে আব্দ কুলাল, হারিস ইবনে আব্দ কুলাল এবং নুআইম ইবনে কুলাল— যি রুআঈন, মা'আফির ও হামদান গোত্রের ক্বাইল (প্রধানদের) প্রতি।
অতঃপর: তোমাদের রাসূল ফিরে এসেছেন এবং তোমরা গনীমতের সম্পদের আল্লাহর প্রাপ্য পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করেছো। আর আল্লাহ্ মুমিনদের উপর স্থাবর সম্পত্তির (আক্বার) উশর (দশমাংশ) ফরয করেছেন। যে শস্য বা ফল আকাশ অথবা প্রবাহিত স্রোত (সায়হান) অথবা বা'ল (সেচ ছাড়া বৃষ্টির পানিতে জন্মানো) দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে উশর (দশ ভাগের এক ভাগ) ওয়াজিব হবে যদি তা পাঁচ ওয়াসাক্ব পরিমাণ হয়। আর যা রশি (ডোল) ও ডালিয়া (সেচের যন্ত্র) দ্বারা সিক্ত করা হয়, তাতে অর্ধ-উশর (বিশ ভাগের এক ভাগ) ওয়াজিব হবে যদি তা পাঁচ ওয়াসাক্ব পরিমাণ হয়।
বিচরণশীল উটের প্রতি পাঁচে একটি করে বকরী (যাকাত দিতে হবে) যতক্ষণ না তা চব্বিশে পৌঁছায়। যদি চব্বিশের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে ‘বিনতে মাখাদ’ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে। যদি ‘বিনতে মাখাদ’ না পাওয়া যায়, তবে একটি পুরুষ ‘ইবনু লাবুন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটের বাচ্চা) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁয়ত্রিশে পৌঁছায়। যদি পঁয়ত্রিশের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে ‘বিনতে লাবুন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁয়তাল্লিশে পৌঁছায়। যদি পঁয়তাল্লিশের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে ‘হিক্কাহ’ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া এবং প্রজননক্ষম পুরুষ উটের জন্য উপযুক্ত উটনী) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা ষাটে পৌঁছায়। যদি ষাটের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে ‘জাযআহ’ (চার বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে, যতক্ষণ না তা পঁচাত্তরে পৌঁছায়। যদি পঁচাত্তরের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে দুটি ‘বিনতে লাবুন’ দিতে হবে, যতক্ষণ না তা নব্বইয়ে পৌঁছায়। যদি নব্বইয়ের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে দুটি ‘হিক্কাহ’ দিতে হবে, যতক্ষণ না তা একশো বিশে পৌঁছায়। একশো বিশের চেয়ে যা বেশি হবে, তাতে প্রতি চল্লিশে একটি ‘বিনতে লাবুন’ এবং প্রতি পঞ্চাশে একটি ‘হিক্কাহ’ দিতে হবে।
প্রতি ত্রিশটি গরুতে একটি ‘তাবী’ বা ‘জাযা’ (এক বা দুই বছর বয়স্ক বাছুর) এবং প্রতি চল্লিশটি গরুতে একটি গাভী দিতে হবে।
প্রতি চল্লিশটি বিচরণশীল বকরীতে একটি বকরী (যাকাত দিতে হবে) যতক্ষণ না তা একশো বিশে পৌঁছায়। যদি একশো বিশের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে দুটি বকরী দিতে হবে, যতক্ষণ না তা দুইশোতে পৌঁছায়। যদি দুইশোর চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে তিনটি বকরী দিতে হবে, যতক্ষণ না তা তিনশোতে পৌঁছায়। যদি এর চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি একশোতে একটি বকরী দিতে হবে।
যাকাতের জন্য বৃদ্ধ, দুর্বল, রোগাক্রান্ত এবং পালের পাঁঠা নেওয়া যাবে না, যদি না যাকাত সংগ্রহকারী নিজেই তা চায়। যাকাতের ভয়ে বিচ্ছিন্ন সম্পদ একত্রিত করা যাবে না এবং একত্রিত সম্পদকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না। আর যারা যৌথ মালিকানাধীন (খালিতাইন), তাদের থেকে যাকাত নেওয়া হলে তারা একে অপরের কাছ থেকে সমানভাবে ফেরত নেবে।
প্রতি পাঁচ উকিয়া রৌপ্যে পাঁচটি দিরহাম যাকাত দিতে হবে। এর চেয়ে যা বেশি হবে, তাতে প্রতি চল্লিশ দিরহামে একটি দিরহাম দিতে হবে। পাঁচ উকিয়ার কমে কোনো যাকাত নেই। আর প্রতি চল্লিশ দিনারে একটি দিনার যাকাত দিতে হবে।
নিশ্চয়ই সাদাকাহ (যাকাত) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবার-পরিজনের জন্য হালাল নয়। এটি কেবল যাকাত, যার মাধ্যমে তাদের নফসকে পবিত্র করা হয়। আর তা মুমিনদের ফকীরদের জন্য, আল্লাহর রাস্তায় এবং মুসাফিরদের জন্য।
দাস, কৃষি জমি এবং তার শ্রমিকদের উপর কোনো যাকাত নেই, যদি না তাদের উশর বা সাদাকাহ আদায় করা হয়। কোনো মুসলিম দাস বা তার ঘোড়ার উপরও কোনো যাকাত নেই।"
তিনি বলেন: আর সেই কিতাবে আরও ছিল:
"ক্বিয়ামতের দিন আল্লাহর নিকট সর্ববৃহৎ কবিরা গুনাহ হলো— আল্লাহর সাথে শিরক করা, অন্যায়ভাবে মুমিনকে হত্যা করা, যুদ্ধের ময়দানে জিহাদের দিন (শত্রুদের দলবদ্ধ হওয়ার সময়) পলায়ন করা, পিতামাতার অবাধ্যতা, সতী নারীর উপর অপবাদ দেওয়া (ক্বযফ), জাদু শিক্ষা করা, সুদ খাওয়া এবং ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা।
আর উমরাহ হলো ছোট হজ্জ। পবিত্র ব্যক্তি ছাড়া কেউ কুরআন স্পর্শ করবে না। মালিকানায় না আসা পর্যন্ত তালাক কার্যকর হয় না। খরিদ না করা পর্যন্ত দাস মুক্তি কার্যকর হয় না। তোমাদের কেউ যেন এক কাপড়ে সালাত আদায় না করে এমতাবস্থায় যে তার গোপনাঙ্গ (শরীরের অংশ) খোলা থাকে। তোমাদের কেউ যেন চুল বেঁধে সালাত আদায় না করে। তোমাদের কেউ যেন এমন এক কাপড়ে সালাত আদায় না করে, যার দ্বারা তার কাঁধের উপর কিছু ঢাকা নেই।"
আর সেই কিতাবে আরও ছিল:
"যদি কেউ কোনো মুমিনকে সুস্পষ্ট সাক্ষ্যের ভিত্তিতে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করে, তবে তার বদলে কিসাস (প্রতিশোধমূলক মৃত্যুদণ্ড) কার্যকর হবে, যদি না নিহতের অভিভাবকগণ সন্তুষ্ট হন। প্রাণের বিনিময়ে দিয়াত হলো একশো উট। আর যে নাক সম্পূর্ণরূপে কেটে ফেলা হয়েছে, তার দিয়াত হলো পূর্ণ দিয়াত। জিহ্বার দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। দুই ঠোঁটের দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। দুই অন্ডকোষের দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। পুরুষাঙ্গের দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। মেরুদন্ডের (সল্ব) দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। দুই চোখের দিয়াত পূর্ণ দিয়াত। এক পায়ের দিয়াত অর্ধ-দিয়াত। ‘মামূমাহ’ (যা মাথার চামড়া ভেদ করে মগজের ঝিল্লি পর্যন্ত পৌঁছে যায়) এর জন্য এক তৃতীয়াংশ দিয়াত। ‘জাইফাহ’ (পেট বা পিঠে গভীর আঘাত) এর জন্য এক তৃতীয়াংশ দিয়াত। ‘মুনাক্কিলাহ’ (যা হাড্ডি স্থানচ্যুত করে) এর জন্য পনেরটি উট। হাত বা পায়ের প্রতিটি আঙ্গুলের জন্য দশটি করে উট। দাঁতের জন্য পাঁচটি উট। ‘মূদিহা’ (যা আঘাতের ফলে হাড্ডি প্রকাশ করে) এর জন্য পাঁচটি উট। আর নারীর বদলে পুরুষকে হত্যা করা হবে। স্বর্ণ ব্যবহারকারীদের জন্য (দিয়াত) এক হাজার দিনার।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] أثبتناه من "سنن البيهقي" 1/ 87 - 88 من روايته عن المصنِّف، ومن سائر مصادر التخريج. ومن "صحيح ابن حبان".
[2] في نسخنا الخطية: ابنة، وهو خطأ، والتصويب من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان ومن "صحيح ابن حبان".
1463 [3] - مكان ما بين المعقوفين بياض في النسخ الخطية، واستدركناه من "تلخيص الذهبي" و"صحيح ابن حبان" و"سنن البيهقي" 4/ 89.
1463 [4] - أصل الكتاب صحيح، كما أسلفنا في الحديث الذي قبله، وهذا إسناد ضعيف؛ سليمان بن داود وَهِمَ في تسميته هكذا الحكمُ بن موسى، والصواب أنه سليمان بن أرقم، كما قال أبو داود في "المراسيل" والنسائي وأبو زرعة وأبو الحسن الهروي وأبو حاتم والذهبي وغيرهم، وهو متفق على ضعفه.لكن لمُعظَمِه شواهد صحيحة، ولبعضه شواهد مرسلة تقويه، انظر تفصيلها في التعليق على "صحيح ابن حبان" برقم (6559)، فقد أخرجه بطوله من طريق الحكم بن موسى، بهذا الإسناد.ومن طريق الحكم بن موسى بالإسناد نفسه أخرجه مختصرًا النسائي (7029).قوله: "العقار"، قال ابن الأثير في "النهاية": أي: الضيعة والنخل والأرض ونحو ذلك."سيحًا": السَّيْح: ما سقي بالماء الجاري."بعلًا": البعل: ما ينبت في أرض يقربُ ماؤها، فرسخت عروقها في الماء، واستغنت عن ماء السماء والأمطار وغيرها."خمسة أوسق" جمع وَسْق، والوَسْق: ستون صاعًا، والصاع: خمسة أرطال وثلث، والمجموع ثلاث مئة صاع، وهي ألف وست مئة رطل بغدادي، والرطل مئة وثمانية وعشرون درهمًا وأربعة أسباع. وهو بالرطل الدمشقي المقدر بست مئة درهم: ثلاث مئة رطل واثنان وأربعون رطلًا وستة أسباع رطل، وهي تعادل 655 كغم تقريبًا.والسائمة: الراعية، عكس المعلوفة.والباقورة: هي البقرة بلغة اليمن.والعجفاء: واحدة العِجَاف، وهي المهزولة من الغنم وغيرها.وقوله: "عاقص شعره": العَقْص: هو ليُّ الشعر وإدخال أطرافه في أصوله."اعتبط مؤمنًا قتلًا" أي: قتله بلا جناية كانت منه ولا جريرة توجب قتله.والقَوَد: القصاص وقتل القاتل بدل القتيل."أُوعِبَ" ويروى: "استُوعِبَ" أي: قُطِع جميعه.والمأمومة: هي الشجَّة التي بلغت أم الراس، وهي الجلدة التي تجمع الدماغ.والجائفة: هي أن يضرب ظهره أو بطنه أو صدره، فتنفذ إلى جوفه.والمنقِّلة: هي التي تخرج منها صغار العظام، وتنتقل عن أماكنها. وقيل: التي تكسر العظم. والمُوضِحة: هي الشجة التي تكشف العظم.
1463 [5] - بل سليمان هذا إنما هو سليمان بن أرقم، وقد وهم فيه الحكم بن موسى فسماه: سليمان بن داود، كما حققنا ذلك قبل قليل، والله أعلم.
1464 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكرَم، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا بَهْز بن حَكِيم.وأخبرنا أحمد بن سلمان، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى، حدثنا أبو مَعْمَر، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، حدثنا بَهز بن حَكِيم، عن أبيه، عن جده، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "في كلِّ إبلٍ سائمةٍ في كلِّ أربعينَ ابنةُ لَبُونٍ، لا تُفرَّق إبلٌ عن حسابها، من أعطاها مُؤتجرًا فله أجرُها، ومن مَنَعَها فإنّا آخِذُوها وشَطْرَ إبلِه، عَزْمةً من عَزَمات ربِّنا، لا يُحِلُّ لآلِ محمدٍ منها شيء" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على ما قدَّمنا ذِكرَه في صحيح هذه الصحيفة، ولم يُخرجاه.
মু'আবিয়া ইবনে হায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "প্রতিটি বিচরণকারী উটের (যাকাত) মধ্যে, প্রতি চল্লিশটি উটে একটি 'ইবনাতে লাবূন' (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে। যাকাতের হিসাব থেকে উটকে পৃথক করা যাবে না। যে ব্যক্তি সওয়াবের আশায় তা (যাকাত) দেবে, সে তার প্রতিদান পাবে। আর যে তা দিতে অস্বীকার করবে, আমরা তা (যাকাত) গ্রহণ করব এবং তার উটের অর্ধেকও (শাস্তিস্বরূপ) নিয়ে নেব। এটি আমাদের রবের পক্ষ থেকে একটি সুনিশ্চিত বিধান। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য এর (যাকাতের) কোনো কিছুই হালাল নয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، بهز بن حكيم وأبوه صدوقان. أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو المقعد.وأخرجه أحمد 13/ (20016) و (20038) و (20041) من طرق عن بهز بن حكيم، بهذا الإسناد. وقد رواه أبو معاوية، واختلف عليه فيه:فرواه أحمد بن عبد الجبار هنا عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ.ورواه عبد الله بن محمد النفيلي عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن معاذ، لم يذكر مسروقًا، أخرجه عن النفيلي أبو داود (1576) و (3038).وتابع أبا معاوية على هذا الإسناد - يعني دون ذكر مسروق - محمدُ بنُ إسحاق، فرواه عن الأعمش، عن أبي وائل، عن معاذ، أخرجه النسائي (2245).ورواه عبد الله بن محمد النفيلي مرة أخرى عند أبي داود (1577) و (2039)، وعثمانُ بن أبي شيبة ومحمد بن المثنى عنده أيضًا (1577)، وأحمد بنُ حرب عند النسائي (2244)، فرووه عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن مسروق، عن معاذ. فذكروا فيه مسروقًا، لكنهم ذكروا إبراهيم بدلًا من أبي وائل.ورواه يعلى بن عبيد، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن معاذ، لم يذكر مسروقًا، أخرجه النسائي (2243).وأخرجه أحمد 36/ (22037) و (22129)، والنسائي (2281) من طريق عاصم بن بهدلة، عن أبي وائل، عن معاذ. لم يذكر مسروقًا.وتابع أبا معاوية في رواية أحمد بن عبد الجبار عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ: سفيانُ الثوري ويحيى بن عيسى الرملي ومفضل بن مهلهل ويعلى بن عبيد، أخرجه من طرقهم أحمد (22013)، وأبو داود (1578)، وابن ماجه (1803)، والترمذي (623)، والنسائي (2242) و (2243)، عن الأعمش، بهذا الإسناد.والتبيع: ما دخل في السنة الثانية.والمسنة: ما دخلت في الثالثة.والحالم: البالغ، أي: يؤخذ منه في الجزية دينار.وعدله، بفتح العين، وجُوِّز الكسر: ما يساوي قيمة الشيء.ومعافر: برود تنسج في اليمن.
1465 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ بن جبل: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بَعَثَه إلى اليمن، وأمرَه أن يأخذ من البقر من كلِّ ثلاثينَ بقرةً تَبيعًا، ومن كل أربعينَ بقرةً مُسِنَّةً، ومن كلِّ حالِمٍ دينارًا أو عَدْلَه ثوبَ مَعَافِرَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ইয়ামেনে প্রেরণ করেছিলেন এবং তাঁকে আদেশ দিয়েছিলেন যে, তিনি যেন গরুর যাকাত হিসেবে প্রতি ত্রিশটি গরুর বিনিময়ে একটি 'তাবী' (দ্বিতীয় বছরে পদার্পণ করা বাছুর) গ্রহণ করেন, আর প্রতি চল্লিশটি গরুর বিনিময়ে একটি 'মুসিন্নাহ' (তৃতীয় বছরে পদার্পণ করা বাছুর) গ্রহণ করেন এবং প্রত্যেক বালেগ (প্রাপ্তবয়স্ক) পুরুষ থেকে এক দীনার অথবা তার সমমূল্যের মাআফির (নামক ইয়েমেনি) কাপড় গ্রহণ করেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العطاردي - وقد توبع، وقد اختلف في هذا الإسناد كما سيأتي، ولا يضر هذا الخلاف، فمدار الحديث كله على الثقات. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو وائل: هو شقيق بن سلمة، ومسروق: هو ابن الأجدع. وقد رواه أبو معاوية، واختلف عليه فيه:فرواه أحمد بن عبد الجبار هنا عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ.ورواه عبد الله بن محمد النفيلي عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن معاذ، لم يذكر مسروقًا، أخرجه عن النفيلي أبو داود (1576) و (3038).وتابع أبا معاوية على هذا الإسناد - يعني دون ذكر مسروق - محمدُ بنُ إسحاق، فرواه عن الأعمش، عن أبي وائل، عن معاذ، أخرجه النسائي (2245).ورواه عبد الله بن محمد النفيلي مرة أخرى عند أبي داود (1577) و (2039)، وعثمانُ بن أبي شيبة ومحمد بن المثنى عنده أيضًا (1577)، وأحمد بنُ حرب عند النسائي (2244)، فرووه عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن مسروق، عن معاذ. فذكروا فيه مسروقًا، لكنهم ذكروا إبراهيم بدلًا من أبي وائل.ورواه يعلى بن عبيد، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن معاذ، لم يذكر مسروقًا، أخرجه النسائي (2243).وأخرجه أحمد 36/ (22037) و (22129)، والنسائي (2281) من طريق عاصم بن بهدلة، عن أبي وائل، عن معاذ. لم يذكر مسروقًا.وتابع أبا معاوية في رواية أحمد بن عبد الجبار عنه، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ: سفيانُ الثوري ويحيى بن عيسى الرملي ومفضل بن مهلهل ويعلى بن عبيد، أخرجه من طرقهم أحمد (22013)، وأبو داود (1578)، وابن ماجه (1803)، والترمذي (623)، والنسائي (2242) و (2243)، عن الأعمش، بهذا الإسناد.والتبيع: ما دخل في السنة الثانية.والمسنة: ما دخلت في الثالثة.والحالم: البالغ، أي: يؤخذ منه في الجزية دينار.وعدله، بفتح العين، وجُوِّز الكسر: ما يساوي قيمة الشيء.ومعافر: برود تنسج في اليمن.
1466 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، حدثنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، حدثني هشام بن سعد، عن عباس بن عبد الله بن مَعبَد بن عباس، عن عاصم بن عمر بن قَتادة الأنصاري، عن قيس بن سعد بن عُبادة الأنصاري: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بَعَثَه ساعيًا، فقال أبوه: لا تَخرُجْ حتى تُحدِثَ برسول الله صلى الله عليه وسلم عهدًا، فلما أراد الخروج أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا قَيسُ، لا تأتي يومَ القيامة على رَقَبَتك بعيرٌ له رُغاءٌ، أو بقرةٌ لها خُوَارٌ، أو شاةٌ لها يُعَار، ولا تكن كأبي رُغَال" فقال سعد: وما أبو رُغال؟ قال: "مُصَدِّقٌ بعثَه صالحٌ، فوجد رجلًا بالطائف في غُنَيمةٍ قريبةٍ من المئة شِصَاصٍ إلّا شاةً واحدة، وابنٌ صغيرٌ لا أُمَّ له، فلَبَنُ تلك الشاة عِيشتُه، فقال صاحب الغنم: من أنت؟ فقال: أنا رسولُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فرحَّب وقال: هذه غَنَمي، فخُذْ أيَّما أحببتَ، فنظر إلى الشاة اللَّبون فقال: هذه، فقال الرجل: هذا الغلامُ كما ترى ليس له طعامٌ ولا شرابٌ غيرُها، فقال: إن كنتَ تحبُّ اللبن فأنا أحبُّه، فقال: خذ شاتين مكانها، فأَبى، فلم يزل يزيدُه ويبذلُ حتى بَذَلَ له خمسَ شياه شِصاصٍ مكانَها، فأَبى عليه، فلمّا رأى ذلك عَمَدَ إلى قوسه فرَمَاه فقتله، فقال: ما ينبغي لأحدٍ أن يأتي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بهذا الخبر أحدٌ قبلي، فأتى صاحبُ الغنم صالح النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال صالح: اللهم العَنْ أبا رُغالٍ، اللهم العَنْ أبا رُغال"، فقال سعد بن عُبادة: يا رسول الله، اعفُ قيسًا من السِّعاية [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ مختصرٌ على شرط الشيخين:
কায়েস ইবনে সা'দ ইবনে উবাদাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (কায়েসকে) যাকাত সংগ্রাহক হিসেবে প্রেরণ করলেন। তখন তাঁর পিতা (সা’দ ইবনে উবাদাহ) বললেন: তুমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সাক্ষাৎ না করে (দায়িত্বের বিষয়ে নিশ্চিত না হয়ে) বের হবে না। অতঃপর যখন তিনি বের হতে চাইলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "হে কায়েস! কিয়ামতের দিন তুমি এমন অবস্থায় আসবে না যে, তোমার ঘাড়ে উট রয়েছে যা শব্দ করছে (রুগ্বা), অথবা গরু রয়েছে যা হাম্বা ডাকছে (খুওয়ার), অথবা বকরী রয়েছে যা ম্যাঁ ম্যাঁ করছে (ইউ'আর)। আর তুমি আবু রুগালের মতো হয়ো না।"
তখন সা’দ (ইবনে উবাদাহ) বললেন: আবু রুগাল কে?
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে ছিল একজন সংগ্রাহক যাকে সালিহ (নামক ব্যক্তি) পাঠিয়েছিলেন। সে তায়েফে এমন এক ব্যক্তির সন্ধান পেল যার প্রায় একশোটির মতো বকরী ছিল, যার মধ্যে মাত্র একটি ছাড়া বাকিগুলো দুধ দিত না। তার একটি ছোট পুত্র ছিল যার মা ছিল না, আর সেই বকরীর দুধই ছিল তার জীবিকা। তখন বকরীর মালিক জিজ্ঞেস করল: আপনি কে? সে বলল: আমি আল্লাহর রাসূলের সংগ্রাহক। লোকটি তাকে স্বাগত জানাল এবং বলল: এই যে আমার বকরী, আপনার যা পছন্দ হয় তা নিয়ে নিন। সে (আবু রুগাল) তখন দুধেল বকরীটির দিকে তাকিয়ে বলল: এটি। লোকটি বলল: এই বালকটির (আমার ছেলে) যেমনটি আপনি দেখছেন, এটি ছাড়া তার অন্য কোনো খাবার বা পানীয় নেই। (আবু রুগাল) বলল: যদি তুমি দুধ ভালোবাসো, তবে আমিও তা ভালোবাসি। লোকটি বলল: এর পরিবর্তে আপনি দুটি বকরী নিন। কিন্তু সে অস্বীকার করল। লোকটি এরপর তাকে বাড়াতে থাকল এবং দিতে চাইল, এমনকি এর বদলে পাঁচটি দুধবিহীন বকরীও দিতে চাইল, কিন্তু সে তা প্রত্যাখ্যান করল। যখন সে (আবু রুগাল) দেখল যে লোকটি মানছে না, তখন সে তার ধনুক হাতে নিল এবং তাকে তীর মেরে হত্যা করল। (হত্যার পর) সে বলল: আমার আগে আর কারো উচিত হবে না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এই খবর পৌঁছানো। অতঃপর সেই বকরীর মালিক সালিহ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন এবং তাঁকে জানালেন। তখন সালিহ বললেন: হে আল্লাহ! আপনি আবু রুগালকে অভিশাপ দিন। হে আল্লাহ! আপনি আবু রুগালকে অভিশাপ দিন।"
তখন সা'দ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কায়েসকে যাকাত সংগ্রাহকের দায়িত্ব থেকে অব্যাহতি দিন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، قال الذهبي في "تلخيص المستدرك": عاصم لم يدرك قيسًا. الليث: هو ابن سعد.وأخرجه البيهقي 4/ 157 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2272) عن محمد بن عمر بن تمام المصري، عن يحيى بن بكير، به.وأخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (1553) عن عبد الله بن صالح، عن الليث، عن هشام بن سعد، عن عباس بن عبد الله، عن عاصم بن عمر قال: بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم … فذكره.والرُّغاء: صوت الإبل، والخُوار: صوت البقر، واليُعار: صوت المعز.وقوله: "شِصاص" بكسر السين، جمع شَصُوص: وهي قليلة اللبن.
1467 - أخبرَناه أبو بكر محمد بن داود بن سليمان، حدثنا علي بن الحسين بن الجُنَيد، حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُموي، حدثنا أبي، عن يحيى بن سعيد، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثَ سعدَ بن عُبادة مصَدِّقًا، فقال: "يا سعدُ، إياك أن تجيءَ يوم القيامة ببَعيرٍ تحملُه له رُغاء" قال: لا آخُذُه، ولا أجيءُ به، فعَفَاه [1].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রাহক হিসেবে প্রেরণ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে সা'দ, তুমি অবশ্যই সাবধান থাকবে যেন ক্বিয়ামতের দিন এমন উট নিয়ে না আসো, যা তোমার বহন করা অবস্থায় উচ্চস্বরে ডাকতে থাকবে (চিৎকার করতে থাকবে)।" তিনি (সা'দ) বললেন: আমি ওটা নেব না এবং ওটা নিয়ে উপস্থিত হব না। ফলে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (সেই দায়িত্ব থেকে) অব্যাহতি দিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. نافع: هو مولى ابن عمر، والراوي عنه يحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وأخرجه ابن حبان (3270) عن أبي يعلى الموصلي، عن سعيد بن يحيى الأموي، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 37/ (22461) من طريق حميد بن هلال، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن عبادة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له: "قم على صدقة بني فلان، وانظر لا تأتي يوم القيامة ببَكْر تحمله على عاتقك، أو على كاهلك، له رغاء يوم القيامة"، قال: يا رسول الله، اصرفها عني، فصرفها عنه.
1468 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن يحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن سعد بن زُرَارة، عن عُمَارة بن عمرو بن حَزْم، عن أُبي بن كعبٍ قال: بَعَثَني النبيُّ صلى الله عليه وسلم مصَدِّقًا، فمررتُ برجل، فجَمَع لي ماله، لم أجِدْ عليه فيها إلّا ابنةَ مَخاضٍ، فقلت له: أَدِّ ابنةَ مخاضٍ، فإنها صدقتُك، فقال: ذاك ما لا لَبَنَ فيه ولا ظهرَ، ولكن هذه ناقةٌ عظيمةٌ سمينةٌ فخذها، فقلت له: ما أنا بآخِذٍ ما لم أُؤمَرْ به، وهذا رسول الله صلى الله عليه وسلم منكَ قريب، فإن أحببتَ أن تأتيَه فتَعرِضَ عليه ما عرضتَ عليَّ، فافعل، فإن قَبِلَه منك قبلتُه، وإن ردَّه عليك رددتُه، قال: فإني فاعل.قال: فخَرَجَ معي وخَرَجَ بالناقة التي عَرَضَ عليَّ، حتى قَدِمْنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا نبيَّ الله، أتاني رسولُك ليأخذَ من صَدَقةِ مالي، وايمُ اللهِ ما قام في مالي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ولا رسولُه قطُّ قبلَه، فجَمعتُ له مالي، فزعم أنَّ ما عَليَّ فيه ابنةُ مخاضٍ، وذلك ما لا لَبَنَ فيه ولا ظهرَ، وقد عرضتُ عليه ناقةً عظيمةً ليأخذها فأَبى عَليَّ، وها هي ذِه قد جئتُك بها يا رسول الله، خُذْها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ذلك الذي عليك، فإن تطوعتَ بخيرٍ أجَرَكَ الله فيه، وقَبِلْناه منك"، قال: فها هي ذِه يا رسول الله، قد جئتُك بها فخذها، قال: فأمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، بقَبْضِها، ودعا في مالِه بالبَرَكة [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহকারী হিসেবে প্রেরণ করলেন। আমি এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে গেলাম, সে তার সকল সম্পদ আমার সামনে একত্রিত করল। আমি তার উপর (যাকাত হিসেবে) কেবল ‘ইবনাতু মাখাদ’ (এক বছর পূর্ণ হয়েছে এমন উটনী) পেলাম। আমি তাকে বললাম: ‘ইবনাতু মাখাদ’ দিয়ে দাও, কেননা এটাই তোমার যাকাত। সে বলল: এটা তো এমন যা দুধ দেয় না এবং যার পিঠে আরোহণও করা যায় না। বরং এই যে একটি বিরাট, মোটা উটনী, এটা আপনি নিয়ে নিন। আমি তাকে বললাম: আমাকে যা নির্দেশ দেওয়া হয়নি, আমি তা গ্রহণ করতে পারি না। আর আপনার থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুব দূরে নন। আপনি যদি চান যে তাঁর কাছে গিয়ে আপনি যা আমার কাছে পেশ করলেন, তা পেশ করতে পারেন। আপনি তাই করুন। যদি তিনি আপনার থেকে এটি গ্রহণ করেন, তবে আমিও গ্রহণ করব, আর যদি তিনি তা ফিরিয়ে দেন, তবে আমিও ফিরিয়ে দেব। লোকটি বলল: আমি তাই করব।
অতঃপর লোকটি আমার সাথে বের হলো এবং সে উটনীটিও নিল যা সে আমার কাছে পেশ করেছিল, অবশেষে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত হলাম। লোকটি বলল: হে আল্লাহর নবী! আপনার দূত আমার সম্পদের যাকাত নিতে এসেছিল। আল্লাহর শপথ! এর আগে কখনো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বা তাঁর কোনো দূত আমার সম্পদের ব্যাপারে দাঁড়াননি। আমি তার জন্য আমার সম্পদ একত্র করলাম। সে দাবি করল যে এর উপর আমার উপর ‘ইবনাতু মাখাদ’ ওয়াজিব হয়েছে। এটা এমন যা দুধ দেয় না বা যার পিঠে আরোহণও করা যায় না। আর আমি তাকে একটি বিরাট উটনী গ্রহণ করার জন্য পেশ করেছিলাম, কিন্তু সে অস্বীকার করেছে। এই যে সেটি, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি আপনার কাছে নিয়ে এসেছি, আপনি এটা গ্রহণ করুন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার উপর যা ওয়াজিব, তা হলো সেটাই (ইবনাতু মাখাদ)। তবে তুমি যদি স্বেচ্ছায় অতিরিক্ত ভালো কিছু দিতে চাও, আল্লাহ তোমাকে এর প্রতিদান দেবেন, এবং আমরা তা তোমার থেকে গ্রহণ করব।" লোকটি বলল: এই যে, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি এটা নিয়ে এসেছি, আপনি গ্রহণ করুন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটি গ্রহণ করার নির্দেশ দিলেন এবং লোকটির সম্পদে বরকতের জন্য দু’আ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق. يعقوب بن إبراهيم: هو ابن سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف. وهو في "مسند أحمد" 35/ (21279).وأخرجه أبو داود (1583) عن محمد بن منصور، عن يعقوب بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" (21280)، وابن حبان (3269) من طريقين عن محمد بن إسحاق، به. وبنحو لفظ ابن ماجه هذا صحَّ الحديث من وجه آخر عن جابر، فقد أخرجه مسلم (980) من طريق عبد الله بن وهب، عن عياض بن عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر.
1469 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا سعيد [1] بن سليمان، حدثنا محمد بن مُسلِم، حدثنا عمرو بن دينار، قال: سمعتُ جابر بن عبد الله قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لا صَدَقةَ في الرِّقَةِ حتى تَبلُغَ مئتي درهمٍ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وشاهدُه بالشرح حديثُ عاصم بن ضَمْرة:
জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রূপার মধ্যে কোনো সাদকা (যাকাত) নেই, যতক্ষণ না তা দু'শ দিরহামে পৌঁছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في (ز) و (ص) إلى: سعد. وسعيد بن سليمان هذا: هو الضبي. وبنحو لفظ ابن ماجه هذا صحَّ الحديث من وجه آخر عن جابر، فقد أخرجه مسلم (980) من طريق عبد الله بن وهب، عن عياض بن عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر.
[2] صحيح بغير هذه السياقة، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإنَّ عمرو بن دينار لم يسمعه من جابر كما قال ابن خزيمة، ومحمد بن مسلم - وهو الطائفي - صدوق لكن في حفظه سوء، وقد أسقط الواسطة بين عمرو وجابر، كما سيأتي بيانه عند الحديث رقم (1476).وأخرجه البيهقي 4/ 134 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 35، وابن عبد البر في "التمهيد" 13/ 116 - 117 و 20/ 136 من طريقين عن محمد بن مسلم الطائفي، به. قال ابن عبد البر: انفرد به محمد بن مسلم من بين أصحاب عمرو بن دينار، وما انفرد به فليس بالقوي.وأخرج أحمد 22/ (14162) عن عبد الرزاق، وابن ماجه (1794) من طريق وكيع، كلاهما عن محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس فيما دون خمس ذَوْد صدقة، وليس فيما دون خمس أواق صدقة، وليس فيما دون خمسة أوساق صدقة"، لفظ ابن ماجه. وبنحو لفظ ابن ماجه هذا صحَّ الحديث من وجه آخر عن جابر، فقد أخرجه مسلم (980) من طريق عبد الله بن وهب، عن عياض بن عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر.
1470 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا أبو عَوَانة، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضَمْرة، عن عليٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ليس في تِسعينَ ومئة شيءٌ، فإذا بَلَغَتْ مئتين ففيها خَمسةُ دراهم" [1].
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, "একশো নব্বই (দিরহামে) কোনো যাকাত নেই। কিন্তু যখন তা দুইশোতে পৌঁছবে, তখন তাতে পাঁচটি দিরহাম (যাকাত) দিতে হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل عاصم بن ضمرة. أبو عوانة: هو الوضاح عن عبد الله اليشكري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه أحمد 2/ (711)، وأبو داود (1574)، والترمذي (620) من طرق عن أبي عوانة، به.وأخرجه بنحوه أحمد (913)، وأبو داود (1572) و (1573)، وابن ماجه (1790)، والنسائي (2268) و (2269) من طرق عن أبي إسحاق، به. روايتا أبي داود مطولتان، وقرن فيهما بعاصم بن ضمرة الحارثَ الأعور، وهو ضعيف. أبو قلابة: هو عبد الملك الرَّقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه النسائي (2250) من طريق زيد بن يزيد بن أبي الزرقاء، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.قوله: "بفصيل مخلول" أي: مهزول، وهو الذي جُعِل على أنفه خِلَال لئلا يَرضَع أمَّه فتهزل. والفصيل: ولد الناقة إذا فُصل عنها، والخِلال: عود يُغرَز في أنفه.
1471 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن يونس الضَّبِّي.وأخبرنا محمد بن أحمد بن تَمِيم القَنْطَري ببغداد، حدثنا أبو قِلَابة؛ قالا: حدثنا أبو عاصم، عن سفيان، عن عاصم بن كُلَيب، عن أبيه، عن وائل بن حُجْر، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه بَعَثَ إلى رجلٍ، فبَعَثَ إليه بفَصِيلٍ مَخْلولٍ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "جاءه مُصَدِّقُ الله، ومُصَدِّقُ رسوله، فبَعَثَ بفَصيلٍ مَخلولٍ، اللهم لا تباركْ له فيه ولا في إبلِهِ"، فبلغ ذلك الرجلَ، فبَعَثَ إليه بناقةٍ من حُسْنها وجمالها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بَلَغَ فلانًا ما قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فبَعَثَ بناقةٍ من حُسْنها، اللهم بارِكْ فيه وفي إبلِه" [1]. هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ওয়ায়েল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির কাছে (যাকাত সংগ্রাহক) পাঠালেন। লোকটি তাকে (যাকাত হিসেবে) রুগ্ন দুর্বল একটি উটশাবক পাঠাল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার কাছে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের যাকাত সংগ্রাহক এসেছিল, আর সে পাঠাল একটি রুগ্ন দুর্বল উটশাবক! হে আল্লাহ! এতে ও তার উটপালে কোনো বরকত দিও না।" এ কথাটি সেই লোকটির কাছে পৌঁছালে, সে তার কাছে উত্তম ও সুন্দর একটি উটনী পাঠাল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অমুকের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা পৌঁছেছে, তাই সে একটি সুন্দর উটনী পাঠিয়েছে। হে আল্লাহ! এতে ও তার উটপালে বরকত দাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي، عاصم بن كليب وأبوه كُليب - وهو ابن شهاب الجرمي - صدوقان لا بأس بهما. أبو قلابة: هو عبد الملك الرَّقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وسفيان: هو الثوري.وأخرجه النسائي (2250) من طريق زيد بن يزيد بن أبي الزرقاء، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.قوله: "بفصيل مخلول" أي: مهزول، وهو الذي جُعِل على أنفه خِلَال لئلا يَرضَع أمَّه فتهزل. والفصيل: ولد الناقة إذا فُصل عنها، والخِلال: عود يُغرَز في أنفه.
1472 - أخبرنا محمد بن موسى الصَّيدَلاني، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المُثنَّى، حدثنا عبد الرحمن بن مَهْدي، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مُضَرِّب قال: جاء ناسٌ من أهل الشام إلى عمر، فقالوا: إنا قد أصَبْنا أموالًا؛ خيلًا ورقيقًا، نحبُّ أن يكون لنا فيها زكاةٌ وطُهورٌ، قال: ما فَعَلَه صاحباي قَبْلي فأفعَلُه، فاستشار عمرُ عليًّا في جماعةٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال عليٌّ: هو حَسَنٌ إن لم يكن جِزيةً يُؤخَذون بها راتبةً [1].هذا حديث صحيح الإسناد، إلّا أنَّ الشيخين لم يُخرجا عن حارثة، وإنما ذكرتُه في هذا الموضع للمُحْدَثات الراتبة التي فُرِضَتْ في ............... [2].
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সিরিয়ার (শাম) কিছু লোক তাঁর কাছে এসে বললো: আমরা সম্পদ অর্জন করেছি—ঘোড়া ও দাস। আমরা চাই এতে আমাদের জন্য যাকাত ও পবিত্রতা (তৃপ্তি) থাকুক। তিনি (উমর) বললেন: আমার পূর্বের দুই সাথী (আবু বকর ও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা করেননি, আমি তা করব না। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একদল সাহাবীর উপস্থিতিতে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে পরামর্শ করলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি উত্তম হবে, যদি না তা নিয়মিতভাবে আদায় করার জন্য জিযিয়া (কর) হিসেবে ধরে নেওয়া হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه أحمد 1/ (82) عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (218) من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق، به.
[2] وقع هنا بياض في النسخ الخطية.
1473 - أخبرنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا جعفر بن أحمد بن سِنَان، حدثنا أحمد بن سِنَان، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا سفيان، عن عمرو بن عثمان، عن موسى بن طلحة قال: عندنا كتابُ معاذ بن جَبَل عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم: أنه إنَّما أخَذَ الصدقة من الحِنْطة والشَّعير والزَّبيب والتَّمر [1]. هذا حديث قد احتُجَّ بجميع رواته، ولم يُخرجاه، وموسى بن طلحة تابعيٌّ كبير لم يُنكَر له أنه يُدرِك أيام معاذ [2].
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। মূসা ইবনু ত্বালহা বলেন, আমাদের নিকট নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে মু‘আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর লিখিত দলীল আছে, যে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল গম, যব, কিশমিশ এবং খেজুর থেকেই সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করতেন। এই হাদীসের সকল বর্ণনাকারী দ্বারাই দলীল গ্রহণ করা হয়, তবে তাঁরা উভয়ে (বুখারী ও মুসলিম) এটি তাঁদের কিতাবে অন্তর্ভুক্ত করেননি। আর মূসা ইবনু ত্বালহা একজন বড় তাবেঈ, এবং এটি অস্বীকার করা হয়নি যে তিনি মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ পেয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، موسى بن طلحة وإن لم يلق معاذًا إلّا أنه نقله عن كتابه، وهي وِجادة صحيحة مقبولة عند أهل العلم. سفيان: هو الثوري، وعمرو بن عثمان: هو ابن مَوهَب.وأخرجه أحمد 36/ (21989) عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده.
[2] نقل ابن عبد الهادي في "المحرر" (573) قول أبي زرعة متعقبًا به الحاكم: موسى بن طلحة بن عبيد الله عن عمر مرسلًا، ثم قال ابن عبد الهادي: ومعاذ توفي في خلافة عمر، فرواية موسى عنه أولى بالإرسال، وقد قيل: إنَّ موسى ولد في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وسماه، ولم يثبت. وانظر لزامًا تعليقنا على الحديث رقم (21989) من "مسند أحمد".
1474 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا عُمَير بن مِرْداس، حدثنا عبد الله بن نافع الصائغ، حدثني إسحاق بن يحيى بن طلحة، بن عبيد الله، عن عمِّه موسى بن طلحة، عن معاذ بن جبل، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "فيما سَقَتِ السماءُ والبَعْلُ والسَّيلُ العُشْرُ، وفيما سُقِي بالنَّضْح نصفُ العُشْر".وإنما يكون ذلك في التَّمر والحِنْطة والحُبوب، وأما القِثَّاء والبِطِّيخُ والرُّمَّان والقَضْبُ، فقد عفا عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ بإسناد صحيح:
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “বৃষ্টির পানিতে, খাল-নদী বা ঝরনার জলে এবং বন্যার পানিতে সিক্ত ভূমিতে উৎপন্ন ফসলে এক-দশমাংশ (উশর) ওয়াজিব। আর যা সেচের মাধ্যমে সিক্ত হয়, তাতে অর্ধ-দশমাংশ (নিসফু'ল উশর) ওয়াজিব।” আর তা কেবল খেজুর, গম ও শস্যদানার ক্ষেত্রেই প্রযোজ্য হবে। কিন্তু শসা, তরমুজ, ডালিম এবং কাঁচা শাকসবজির ক্ষেত্রে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (উশর) ক্ষমা করে দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الله بن نافع وإسحاق بن يحيى.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 129، وفي "السنن الصغرى" (1186) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (1915)، والبيهقي 4/ 129 من طريق يحيى بن المغيرة، عن ابن نافع، به.وأخرج الدارقطني (1916 - 1919) من طرق عن موسى بن طلحة، عن معاذ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ليس في الخضراوات زكاة"، وفي بعض هذه الطرق محمد بن نصر بن حماد، وهو كذاب، وفي بعضها الحسن بن عمارة وهو ضعيف.وأخرج الدارقطني مرسلًا (1920) من طريق عطاء بن السائب، عن موسى بن طلحة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن يؤخذ من الخضراوات صدقة.وأخرج الترمذي (638) من طريق الحسن بن عُمارة، عن محمد بن عبد الرحمن بن عبيد، عن عيسى بن طلحة، عن معاذ: أنه كتب إلى النبي صلى الله عليه وسلم يسأله عن الخضراوات، وهي البُقول، فقال: "ليس فيها شيء". قال الترمذي: إسناد هذا الحديث ليس بصحيح، وليس يصحُّ في هذا الباب عن النبي صلى الله عليه وسلم شيء. ثم قال: والعمل على هذا عند أهل العلم؛ أن ليس في الخضراوات صدقة. ثم قال: والحسن هو ابن عمارة، وهو ضعيف عند أهل الحديث، ضعفه شعبة وغيره، وتركه عبد الله بن المبارك. وانظر لزامًا تعليقنا على الحديث رقم (21989) من "مسند أحمد".
1475 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه وأبو بكر بن أبي نصر المَرْوَزِيُّ، قالا: حدثنا محمد بن غالب، حدثنا أبو حذيفة، حدثنا سفيان، عن طلحة بن يحيى، عن أبي بُرْدةَ، عن أبي موسى ومعاذِ بنِ جبل، حين بَعَثَهما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن يعلِّمانِ الناسَ أمرَ دِينِهم: "لا تأخذوا الصَّدقةَ إلّا من هذه الأربعة: الشَّعير، والحِنْطة، والزَّبيب، والتَّمر" [1].
আবু মূসা ও মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদের দুজনকে ইয়ামানে প্রেরণ করলেন মানুষকে তাদের দীনের বিধান শিক্ষা দেওয়ার জন্য, (তখন তাঁদেরকে বললেন): "তোমরা সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করবে না, তবে কেবল এই চারটি জিনিস থেকে: যব, গম, কিশমিশ এবং খেজুর।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي حذيفة موسى بن مسعود وطلحة بن يحيى التيمي. سفيان: هو الثوري، وأبو بردة: هو ابن أبي موسى الأشعري.وأخرجه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (8190) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. إلّا أنه لم يذكر فيه أبا بكر بن أبي نصر المروزي.وأخرجه الدارقطني (1921)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 125 من طريقين عن أبي حذيفة النهدي، به.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 4/ 125، وفي "المعرفة" (8191) من طريق عبيد الله الأشجعي، عن سفيان، به.وأخرجه البيهقي 4/ 125 من طريق وكيع، عن طلحة بن يحيى، عن أبي بردة، عن أبي موسى وحده.وانظر الحديثين قبله. وأخرجه ابن خزيمة (2304)، وأبو الحسن الخِلعي في "الخلعيات" (591) من طريق منصور بن زيد الموصلي، عن محمد بن مسلم، به.وأخرج الطحاوي في "المشكل" (1483) عن يزيد بن سنان وفهد بن سليمان، عن سعيد بن أبي مريم، عن محمد بن مسلم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا صدقة في شيء من الزرع أو النخل أو الكرْم حتى تكون خمسة أوسق، ولا في الوَرِق حتى يبلغ مئتي درهم".وأخرج عبد الرزاق (7250)، ومن طريقه ابن خزيمة (2306) عن ابن جريج، قال: أخبرني عمرو بن دينار، قال: سمعت غير واحد عن جابر بن عبد الله أنه قال: ليس فيما دون خمسة أواق صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من الحب صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من الحلو صدقة.قال أبو بكر بن خزيمة: هذا هو الصحيح، لا رواية محمد بن مسلم الطائفي، وابن جريج أحفظ من عدد مثل محمد بن مسلم. وقال: يعني بالحلو: التمر.
1476 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد بن المسيّب، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا محمد بن مُسلم، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ليس على الرَّجُل المسلمِ زكاةً في كَرْمِه، ولا في زَرْعِه، إذا كان أقلَّ من خمسةِ أوسُقٍ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিম ব্যক্তির তার আঙ্গুর ক্ষেতে বা তার শস্যে কোনো যাকাত নেই, যখন তা পাঁচ ওয়াসাকের চেয়ে কম হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، وقد سلف الكلام عليه عند الحديث برقم (1476).وأخرجه البيهقي 4/ 128 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن خزيمة (2304)، وأبو الحسن الخِلعي في "الخلعيات" (591) من طريق منصور بن زيد الموصلي، عن محمد بن مسلم، به.وأخرج الطحاوي في "المشكل" (1483) عن يزيد بن سنان وفهد بن سليمان، عن سعيد بن أبي مريم، عن محمد بن مسلم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا صدقة في شيء من الزرع أو النخل أو الكرْم حتى تكون خمسة أوسق، ولا في الوَرِق حتى يبلغ مئتي درهم".وأخرج عبد الرزاق (7250)، ومن طريقه ابن خزيمة (2306) عن ابن جريج، قال: أخبرني عمرو بن دينار، قال: سمعت غير واحد عن جابر بن عبد الله أنه قال: ليس فيما دون خمسة أواق صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من الحب صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من الحلو صدقة.قال أبو بكر بن خزيمة: هذا هو الصحيح، لا رواية محمد بن مسلم الطائفي، وابن جريج أحفظ من عدد مثل محمد بن مسلم. وقال: يعني بالحلو: التمر.
1477 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العدلُ، حدثنا أبو المُثنَّى ومحمد بن أيوب، قالا: حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي، حدثنا سليمان بن كثير، عن الزُّهري، عن أبي أُمامةَ بن سهل بن حُنيف، عن أبيه: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم نهى عن لَونَينِ من التمر: الجُعْرُورِ، ولونِ الحُبَيْق، قال: وكان ناسٌ يَتَيَمَّمُون شرَّ ثمارِهم فيُخرِجونَها في الصدقة، فنُهُوا عن لَونَينِ من التَّمر، فنزلت: {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} [البقرة: 267] [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وقد تابعه سفيان بن حسين ومحمد بن أبي حَفْصة عن الزهري.فأما حديث سفيان بن حسين:
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই প্রকারের খেজুর (সদকা দিতে) নিষেধ করেছেন: জু'রূর এবং হুবাইক। তিনি (রাবী) বলেন, কিছু লোক তাদের ফলের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট ফল বেছে নিত এবং তা সাদকা হিসেবে বের করত। তখন তাদেরকে (সদকার জন্য) এই দুই প্রকার খেজুর থেকে নিষেধ করা হয়েছিল, আর তখনই নাযিল হয়েছিল: "তোমরা (দান করার জন্য) তার নিকৃষ্ট অংশ বেছে নিও না।" (সূরা আল-বাকারা: ২৬৭)
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، سليمان بن كثير - وإن ضُعِّف في حديثه عن الزهري - قد توبع. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى.وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 376، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 201، وابن أبي حاتم في "التفسير" 2/ 528، والطبراني في "الكبير" (5566)، والدارقطني (2040)، والبيهقي 4/ 136، وابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 84 من طرق عن أبي الوليد الطيالسي، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريقين آخرين عن أبي الوليد الطيالسي برقم (3162).وانظر ما بعده. والجُعْرور: قال ابن الأثير في "النهاية": ضربٌ من الدَّقَل يحمل رطبًا صغارًا لا خير فيه.ولون الحُبَيق: قال: هو نوع من أنواع التمر رديء منسوب إلى ابن حُبَيق، وهو اسم رجل.يتيممون: أي: يتعمدون ويقصدون.
1478 - فأخبرَناه جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا سعيد بن سليمان، حدثنا عبَّاد بن العَوَّام، عن سفيان بن الحسين، عن الزُّهري، عن أبي أُمامة بن سَهْل، عن أبيه قال: أَمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بصَدَقةٍ، فجاء رجلٌ من هذا السُّخَّل بكَبائِسَ - فقال سفيان: يعني: الشِّيص - فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن جاء بهذا؟ " وكان لا يجيءُ أحدٌ بشيءٍ إلّا نُسِب إلى الذي جَلَبَه، فنزلت: {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ}، قال: ونهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الجُعْرُور ولونِ الحُبَيق أن يُؤخَذَا في الصدقة.قال الزُّهري: لونانِ من تمرِ الصَّدقة [1].وأما حديث محمد بن أبي حَفْصة:
সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদাকা (দান) প্রদানের নির্দেশ দিলেন। অতঃপর [নির্দিষ্ট] এই সুকখাল (অঞ্চল) থেকে এক ব্যক্তি নিকৃষ্ট মানের খেজুর (কাবায়িস) নিয়ে আসলো। সুফিয়ান (বর্ণনাকারী) বললেন: এর দ্বারা (শি'ইস) অর্থাৎ অতি নিকৃষ্ট খেজুর বোঝানো হয়েছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে এটা নিয়ে এসেছে?" যখনই কেউ কোনো কিছু নিয়ে আসত, তখন তার আনীত বস্তুর সাথে তাকে সম্পর্কিত করা হতো। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: "আর তোমরা নিকৃষ্ট বস্তুর দিকে লক্ষ্য করো না, যা তোমরা (আল্লাহর পথে) ব্যয় করবে।" তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জু'রূর এবং হুবাইক প্রকারের খেজুর সাদাকা হিসেবে গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন। যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এগুলো সাদাকার জন্য নির্ধারিত দুই ধরনের খেজুর।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات، وسفيان بن حسين - وإن كان في روايته عن الزهري كلام - متابع، كما سبق.وأخرجه أبو داود (1607) عن محمد بن يحيى بن فارس، عن سعيد بن سليمان، بهذا الإسناد. مختصرًا بلفظ: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الجعرور ولون الحُبيق أن يؤخذا في الصدقة. قال الزهري: لونين من تمر المدينة.وسيأتي من طريقين آخرين عن سعيد بن سليمان برقم (3161).قوله: السُّخَّل: بضم السين وتشديد الخاء، ويقال بالحاء المهملة، فسَّره سفيان هنا بالشِّيص، قال في "النهاية": يقال: سَخَّلَتِ النخلةُ: إذا حملت شِيصًا. والشِّيص: هو التمر الذي لا يشتد نواه ويقوى، وقد لا يكون له نوًى أصلًا.والكبائس: قال: هي جمع كِباسة، وهو العِذْق التام بشماريخه ورطبه.
1479 - فأخبرَناه الحسن بن حَلِيم المَروَزي، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله بن المبارك، عن محمد بن أبي حَفْصة، عن الزُّهري، عن أبي أُمامةَ بن سَهْل بن حُنَيف، عن أبيه قال: كان أناسٌ يَتلاوَمُون شِرارَ ثِمارِهم، فأنزل الله عز وجل: {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ وَلَسْتُمْ بِآخِذِيهِ إِلَّا أَنْ تُغْمِضُوا فِيهِ}، قال: فنهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن لونين: عن الجُعْرور وعن لونِ حُبَيق [1].
সাহল ইবনু হুনায়েফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিছু লোক (দানের জন্য) তাদের ফলসমূহের মধ্যে খারাপগুলি বাছাই করত। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এই আয়াত নাযিল করলেন: "তোমরা (দানের জন্য) এর নিকৃষ্ট অংশ বাছাই করো না, যা তোমরা নিজেরা গ্রহণ করতে রাজি নও— যদি না তোমরা (দোষত্রুটি) উপেক্ষা করো।" তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই প্রকার ফল (সাদকা দিতে) নিষেধ করলেন: জু'রূর এবং হুবাইক নামের ফল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن أبي حفصة، وقد توبع كما في سابقيه.الحسن بن حليم: هو الحسن بن محمد بن حليم، نسب إلى جده، وأبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبدان لقبه.وأخرجه يحيى بن آدم في "الخراج" (435)، وابن خزيمة (2311)، وابن زنجويه في "الأموال" (1943) من طرق عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 226 عن أبي أسامة حماد بن أسامة، عن محمد بن أبي حفصة، به.يتلاومون: أي: ينتظرون ويتلبثون، مأخوذ من التلوُّم بمعنى الانتظار والتلبُّث. ومعناه هنا: أنهم ينتظرون حصول الثمار الرديئة عندهم ليقدموها صدقة مالهم. وأخرجه أحمد 24/ (15713) و 26/ (16093)، وأبو داود (1605)، والترمذي (643)، والنسائي (2282)، وابن حبان (3280) من طرق عن شعبة، به. وليس عندهم شك شعبة.قال الترمذي: وفي الباب عن عائشة وعتاب بن أسيد وابن عباس، ثم قال: والعمل على حديث سهل بن أبي حثمة عند أكثر أهل العلم في الخَرْص، وبحديث سهل بن أبي حثمة يقول أحمد وإسحاق.ثم قال: والخرصُ إذا أدركتِ الثمارُ من الرُّطب والعنب مما فيه الزكاة، بعث السلطان خارصًا فخرص عليهم، والخَرْصُ أن يَنظُر من يُبصِر ذلك فيقول: يخرج من هذا من الزبيب كذا، ومن التمر كذا وكذا، فيحصي عليهم، ويَنظرُ مبلغَ العُشر من ذلك، فيُثبِت عليهم، ثم يخلِّي بينهم وبين الثمار، فيصنعون ما أحبوا، فإذا أدركتِ الثمارُ أُخذ منهم العُشر، هكذا فسَّره بعض أهل العلم، وبهذا يقول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق.وقال ابن حبان: لهذا الخبر معنيان: أحدهما: أن يُترَك الثلث أو الربع من العُشر. والثاني: أن يُترَك ذلك من نفس التمر قبل أن يُعشَّر إذا كان ذلك حائطًا كبيرًا يحتمله.
1480 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا وَهْب بن جَرِير، حدثنا شُعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى وعبد الرحمن، قالا: حدثنا شعبة، قال: سمعت خُبَيب بن عبد الرحمن يحدِّث عن عبد الرحمن بن مسعود بن نِيَار، عن سهل بن أبي حَثْمة؛ قال: أتانا ونحن في السُّوق فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا خَرَصْتُم فَخُذُوا ودَعُوا الثلث، فإن لم تأخُذُوا أو تَدَعُوا الثلث - شَكَّ شعبةُ في الثلث - فدَعُوا الرُّبع" [1]. قال الحاكم: أنا جمعتُ بين يحيى وعبد الرحمن، وليس في حديث وَهْب بن جرير شَكُّ شعبة.هذا حديث صحيح الإسناد.وله شاهدٌ بإسنادٍ متفق على صحته: أنَّ عمر بن الخطاب أَمرَ به.
সহল ইবনু আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন বাজারে ছিলাম, তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে আসলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা (ফলের পরিমাণ) আন্দাজ করবে (যাকাতের জন্য), তখন তা নাও এবং এক-তৃতীয়াংশ বাদ দিয়ে দাও। কিন্তু যদি তোমরা এক-তৃতীয়াংশ নাও বা ছেড়ে দাও — (এক-তৃতীয়াংশের ব্যাপারে শু'বাহ সন্দেহ করেছেন) — তবে তোমরা এক-চতুর্থাংশ বাদ দিয়ে দাও।" আল-হাকিম বলেছেন: আমি ইয়াহইয়া ও আব্দুর রহমানের বর্ণনা একত্রিত করেছি। ওয়াহব ইবনু জারীর-এর বর্ণনায় শু'বাহের সন্দেহটি নেই। এই হাদীসটির সনদ সহীহ। এর পক্ষে একটি শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে যার সহীহ হওয়ার ব্যাপারে সকলে ঐকমত্য পোষণ করেছেন, আর তা হলো: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই নির্দেশ দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين، عبد الرحمن بن مسعود بن نيار تابعيٌّ، تفرد بالرواية عنه خبيب بن عبد الرحمن، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم يجرحه أحد. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وعبد الرحمن: هو ابن مهدي.وهو في "مسند أحمد" 26/ (16094) عن يحيى القطان وحده، بهذا الإسناد.ومن طريق يحيى أيضًا أخرجه النسائي (2282). وأخرجه أحمد 24/ (15713) و 26/ (16093)، وأبو داود (1605)، والترمذي (643)، والنسائي (2282)، وابن حبان (3280) من طرق عن شعبة، به. وليس عندهم شك شعبة.قال الترمذي: وفي الباب عن عائشة وعتاب بن أسيد وابن عباس، ثم قال: والعمل على حديث سهل بن أبي حثمة عند أكثر أهل العلم في الخَرْص، وبحديث سهل بن أبي حثمة يقول أحمد وإسحاق.ثم قال: والخرصُ إذا أدركتِ الثمارُ من الرُّطب والعنب مما فيه الزكاة، بعث السلطان خارصًا فخرص عليهم، والخَرْصُ أن يَنظُر من يُبصِر ذلك فيقول: يخرج من هذا من الزبيب كذا، ومن التمر كذا وكذا، فيحصي عليهم، ويَنظرُ مبلغَ العُشر من ذلك، فيُثبِت عليهم، ثم يخلِّي بينهم وبين الثمار، فيصنعون ما أحبوا، فإذا أدركتِ الثمارُ أُخذ منهم العُشر، هكذا فسَّره بعض أهل العلم، وبهذا يقول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق.وقال ابن حبان: لهذا الخبر معنيان: أحدهما: أن يُترَك الثلث أو الربع من العُشر. والثاني: أن يُترَك ذلك من نفس التمر قبل أن يُعشَّر إذا كان ذلك حائطًا كبيرًا يحتمله.