আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1481 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا حماد بن زيد، عن يحيى بن سعيد، عن بُشَير بن يسار، عن سَهْل بن أبي حَثْمة: أنَّ عمر بن الخطاب بَعَثَه على خَرْصِ التمر، وقال: إذا أتيتَ أرضًا فاخْرُصْها ودَعْ لهم قَدْرَ ما يأكلون [1].
সাহল ইবনু আবি হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে খেজুরের ফল আন্দাজ করার (খর্ষ) দায়িত্বে প্রেরণ করেন। আর তিনি বললেন: যখন তুমি কোনো ভূমিতে যাও, তখন তুমি তার আন্দাজ করো এবং তাদের জন্য ততটুকু ছেড়ে দাও যতটুকু তারা খায়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، إلّا أنَّ حماد بن زيد في روايته عن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - مقال، قال عبد الرحمن بن مهدي - كما في "الجرح والتعديل" 3/ 138 لابن أبي حاتم -: ما رأيت أحدًا لم يكتب الحديث أحفظ من حماد بن زيد، لم يكن عنده كتاب إلّا جزء ليحيى بن سعيد، وكان يخلِّط فيه. قلنا: وقد خالف هنا جمعًا من الثقات الذين رووه مرسلًا إلى عمر، وفي رواياتهم أنَّ الذي بعثه عمر هو أبو حثمة وليس ابنه سهلًا، كما سيأتي في التخريج.وأخرجه البيهقي 4/ 124 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 237 من طريق خلف بن هشام، عن حماد بن زيد، به.وأخرج أبو عبيد في "الأموال" (1449) - ومن طريقه ابن حزم في "المحلى" 5/ 159 - عن هشيم بن بشير ويزيد بن هارون، وابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 283 عن أنس بن عياض ويزيد بن هارون، وابن أبي شيبة 3/ 194 عن أبي خالد الأحمر، والبيهقي في "الكبرى" 4/ 124، وفي "المعرفة" (8188) من طريق سليمان بن بلال، خمستهم عن يحيى بن سعيد، عن بُشير بن يسار: أنَّ عمر بن الخطاب كان يبعث أبا حثمة خارصًا … الحديث.وهذا هو الصواب - والله أعلم - فسهل بن أبي حثمة توفي النبي صلى الله عليه وسلم وعمره ثماني سنوات، وعيَّن بعضهم مولده سنة ثلاث من الهجرة، أما الذي كان يبعثه النبي صلى الله عليه وسلم وعمرُ بن الخطاب هو أبوه أبو حثمة. انظر ترجمة سهل في "تهذيب الكمال" و"تهذيب التهذيب".وأخرج عبد الرزاق (7221) عن سفيان الثوري، عن يحيى بن سعيد، عن بشير بن يسار: أنَّ عمر بن الخطاب كان يقول للخرّاص: دع لهم قدر ما يقع، وقدر ما يأكلون. لم يذكر فيه اسم المبعوث.وأخرج عبد الرزاق أيضًا (7222) عن معمر، عن يحيى بن سعيد: أنَّ عمر بن الخطاب، فذكر نحوه، ولم يذكر بشير بن يسار.وأخرج الطحاوي في "معاني الآثار" 2/ 40 من طريق أبي بكر بن عياش، عن يحيى بن سعيد، عن بشير بن يسار، عن سعيد بن المسيب، قال: بعث عمر بن الخطاب سهل بن أبي حثمة يخرص على الناس … الحديث، وأبو بكر بن عياش له أغلاط، وقد تفرد هنا بذكر سعيد بن المسيب، وخالف الثقات إلّا حماد بن زيد في تسمية الصحابي المبعوث سهل بن أبي حثمة.وأخرج أبو عبيد (1450) - ومن طريقه ابن حزم 5/ 160 - عن يزيد بن هارون، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبان، أنَّ أبا ميمون أخبره عن سهل بن أبي حثمة: أنَّ مروان بعثه خارصًا للنخل، فخرص مال سعد بن أبي وقاص سبع مئة وسق … وأبو ميمون هذا مجهول.
1482 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا شُعبة، عن قتادة، عن أبي عمر الغُدَاني، عن أبي هريرة: أنه مَرَّ عليه رجلٌ من بني عامر، فقيل: هذا من أكثر الناس مالًا، فدعاه أبو هريرةَ فسأله عن ذلك، فقال: نَعَم، لي مئةٌ حمراءُ، ولي منةٌ أَدْماءُ، ولي كذا وكذا من الغَنَم، فقال أبو هريرة: إياكَ وأَخفافَ الإبل، إياكَ وأظلافَ الغَنَم؛ إنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما مِن رجلٍ يكون له إبلٌ لا يؤدِّي حقَّها في نَجْدَتِها ورِسْلِها - قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ونَجْدتُها ورِسْلُها: عُسْرُها ويُسْرُها - إلّا بَرَزَ له بقاعٍ قَرقَرٍ، فجاءته كأَغذِّ [1] ما تكون وأَسَرِّهِ وأسمَنِه أو أعظمِه [2] - شعبةُ شَكَّ - فتَطَؤُه بأخفافِها وتَنطِحُه بقرونها، كلَّما جازت عليه أُخراها أُعيدتْ عليه أُولاها، في يومٍ كان مقدارُه خمسين ألفَ سنة، حتى يُقضَى بين الناس فيُرى سَبيلَه.وما من عبدٍ يكون له بقرٌ لا يُؤدِّي حقَّها في نَجْدَتِها ورِسْلِها - قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: ونَجْدَتها ورِسْلُها، عُسْرُها ويُسْرُها - إلّا بَرَزَ له بِقاعٍ قَرْقَرٍ كأغَذِّ ما تكونُ وأسرِّه واسمَنِه وأعظَمِه، فتطؤُه بأظلافها، وتَنْطِحُه بقُرونِها، كلما جازَتْ عليه أُولاها أُعيدَتْ عليه أُخراها، في يومٍ كان مِقدارُه خمسينَ ألفَ سنة، حتى يُقضَى بين الناس، فيُرَى سبيلَه".فقال له العباس: وما حقُّ الإبل يا أبا هريرة؟ قال: تُعطي الكريمةَ، وتَمنحُ الغَزيرةَ، وتُفقِرُ الظَّهرَ، وتُطرِقُ الفَحْل، وتَسقِي اللَّبَن [3]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما خرَّج مسلم بعض هذه الألفاظ من حديث سُهيل عن أبيه عن أبي هريرة [4].وأبو عمر الغُدَاني يقال: إنه يحيى بن عُبيد البَهْراني، فإن كان كذلك، فقد احتجَّ به مسلم.ولا أعلم أحدًا حدَّث به عن شعبة غيرَ يزيد بن هارون، ولم نكتبه عاليًا إلّا عن أبي العباس المحبوبي.1482 م - إنما حدَّثَناه أبو زكريا العَنْبري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا عَبْدَةُ بن عبد الله الخُزَاعي.وحدثنا أبو عليٍّ الحافظ، حدثنا أبو عبد الرحمن النَّسائي، حدثنا محمد بن عليّ بن سَهْل؛ قالا: حدثنا يزيد بن هارون، نحوه.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একবার বনি 'আমির গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। তখন বলা হলো: এই ব্যক্তি মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি ধন-সম্পদের মালিক। আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ডাকলেন এবং এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। সে বলল: হ্যাঁ, আমার একশো 'হামরা' (লাল উট), একশো 'আদমা' (ধূসর-সাদা উট) এবং এত এত মেষ-বকরি রয়েছে। তখন আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি সাবধান থেকো উটের ক্ষুর এবং বকরির খুর (এর হক আদায় না করা) সম্পর্কে।
আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "যে কোনো ব্যক্তির উট থাকবে এবং সে তার হক আদায় করবে না – তার কঠিন ও সহজ সময়ে – রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘নাজদাহ এবং রিসল’ মানে হলো, তার কঠিন সময় ও সহজ সময় – ক্বিয়ামতের দিন একটি সমতল ও উন্মুক্ত স্থানে তাকে দাঁড় করানো হবে। তারপর তার উটগুলো এমন অবস্থায় আসবে যে তারা হবে সর্বোচ্চ তাজা, দ্রুতগামী, সবচেয়ে মোটা ও সর্ববৃহৎ (শু’বাহ সন্দেহ প্রকাশ করেছেন)। এরপর সেই উটগুলো তাকে তাদের ক্ষুর দ্বারা মাড়াতে থাকবে এবং শিং দ্বারা গুঁতো দিতে থাকবে। যখনই শেষ উটটি তাকে অতিক্রম করবে, তখনই প্রথম উটটি আবার তার কাছে ফিরে আসবে। এটি সেই দিনে ঘটবে যার পরিমাণ পঞ্চাশ হাজার বছর, যতক্ষণ না মানুষের বিচার শেষ হয় এবং সে তার গন্তব্য দেখতে পায়।
আর যে কোনো বান্দার গরু (বা গবাদিপশু) থাকবে এবং সে তার কঠিন ও সহজ সময়ে সেগুলোর হক আদায় করবে না – রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘নাজদাহ এবং রিসল’ মানে হলো, তার কঠিন সময় ও সহজ সময় – ক্বিয়ামতের দিন একটি সমতল ও উন্মুক্ত স্থানে তাকে দাঁড় করানো হবে। তারপর সেই পশুগুলো সর্বোচ্চ তাজা, দ্রুতগামী, সবচেয়ে মোটা ও সর্ববৃহৎ অবস্থায় আসবে। এরপর সেই পশুগুলো তাকে তাদের খুর দ্বারা মাড়াতে থাকবে এবং শিং দ্বারা গুঁতো দিতে থাকবে। যখনই প্রথম পশুটি তাকে অতিক্রম করবে, তখনই শেষ পশুটি আবার তার কাছে ফিরে আসবে। এটি সেই দিনে ঘটবে যার পরিমাণ পঞ্চাশ হাজার বছর, যতক্ষণ না মানুষের বিচার শেষ হয় এবং সে তার গন্তব্য দেখতে পায়।"
তখন আব্বাস তাঁকে (আবূ হুরাইরাকে) বললেন: হে আবূ হুরাইরা! উটের হক কী? তিনি বললেন: (উটের হক হলো) তুমি উত্তমটিকে (যাকাত হিসেবে) দেবে, অধিক দুধ প্রদানকারী উষ্ট্রীকে ধার দেবে, (সাওয়ারির জন্য) পিঠ ব্যবহার করতে দেবে, প্রজননের জন্য উটের পাল দিতে দেবে এবং (পথিককে) দুধ পান করাবে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في المطبوع إلى: كعدد. وهي غير منقوطة في أصولنا الخطية، إلّا أنَّ مصادر التخريج وكتب الغريب اتفقت على روايتها بالغين والذال المعجمتين، قال السندي في حاشيته على "سنن النسائي": بغين معجمة وذال معجمة مشددة، أي: أسرع وأنشط. وكذا قال ابن الأثير في "النهاية" (غذذ) وقال: أغَذَّ يُغِذُّ إغذاذًا: إذا أسرع في السَّير. حديث أبي صالح عن أبي هريرة المشار إليه قريبًا.وأخرجه بنحوه وبمعناه مطولًا ومختصرًا أحمد 13/ (7563) و 14/ (8977) و (8978)، ومسلم (987)، وأبو داود (1658) و (1659)، وابن حبان (3253) من طريق أبي صالح السمان، وأحمد 16/ (10352) من طريق خِلاس بن عمرو الهَجَري، والبخاري (1402)، والنسائي (2240) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وابن حبان (3254) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب، أربعتهم عن أبي هريرة.وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (988) وغيره.قوله: حمراء، أكثر ما يقع هذا الاسم على الإبل، والإبل الحمر أعزّ أموال العرب. قاله النسفي في "طلبة الطلبة" مادة (حمر).وقوله: أدماء، قال ابن الأثير في "النهاية": الأُدْمة في الإبل: البياض مع سواد المقلتين، بعيرٌ آدَم: بيِّن الأُدْمة، وناقة أَدْماء.نجدتها ورِسْلها: قال ابن الأثير: النجدة: الشدة، والرِّسل بالكسر: الهِينة والتأني.القاع: المكان الواسع.القرقر - بفتح القافين -: المكان المستوي.وأَسرِّه، كذا وقعت هنا مهملة في أصولنا الخطية، قال في "النهاية": أي: كأسمن ما كانت وأوفره، من سِرِّ كل شيء وهو لبُّه ومخُّه، وقيل: هو من السرور، لأنها إذا سمنت سرَّت الناظر إليها. انتهى، ووقع في "مسند أحمد" وغيره من مصادر التخريج: وآشره، بالمد والشين المعجمة، وقال ابن الأثير في معناها: أبطره وأنشطه.فيُرى سبيله: قال القاضي عياض في "المشارق" 2/ 364: بنصب سبيله على المفعول الثاني، والمفعول الأول مضمر، أي: فيُرى هو سبيلَه. وقال النووي في "شرح مسلم" 7/ 65: ضبطناه بضم الياء وفتحها، وبرفع لام سبيله ونصبها. وتعقبه الحافظ العراقي في "طرح التثريب" 4/ 10 بقوله: الوجهان في رفع لام سبيله ونصبها إنما يجيئان مع ضم الياء، فأما مع فتح الياء فيتعين نصب اللام، والله أعلم.الكريمة: هي الخالية من العيوب، وذلك في الصدقة.الغزيرة: هي كثيرة اللبن.تفقر الظهر: تعيره للحمل والركوب، والظهر: الدابةتطرق الفحل: الطَّرْق: ماء الفحل، أي: تعيره من أجل اللقاح.
[2] في النسخ الخطية: وأعظمه، وقوله: "شعبة شك" من (ص) و (ب) فقط. حديث أبي صالح عن أبي هريرة المشار إليه قريبًا.وأخرجه بنحوه وبمعناه مطولًا ومختصرًا أحمد 13/ (7563) و 14/ (8977) و (8978)، ومسلم (987)، وأبو داود (1658) و (1659)، وابن حبان (3253) من طريق أبي صالح السمان، وأحمد 16/ (10352) من طريق خِلاس بن عمرو الهَجَري، والبخاري (1402)، والنسائي (2240) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وابن حبان (3254) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب، أربعتهم عن أبي هريرة.وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (988) وغيره.قوله: حمراء، أكثر ما يقع هذا الاسم على الإبل، والإبل الحمر أعزّ أموال العرب. قاله النسفي في "طلبة الطلبة" مادة (حمر).وقوله: أدماء، قال ابن الأثير في "النهاية": الأُدْمة في الإبل: البياض مع سواد المقلتين، بعيرٌ آدَم: بيِّن الأُدْمة، وناقة أَدْماء.نجدتها ورِسْلها: قال ابن الأثير: النجدة: الشدة، والرِّسل بالكسر: الهِينة والتأني.القاع: المكان الواسع.القرقر - بفتح القافين -: المكان المستوي.وأَسرِّه، كذا وقعت هنا مهملة في أصولنا الخطية، قال في "النهاية": أي: كأسمن ما كانت وأوفره، من سِرِّ كل شيء وهو لبُّه ومخُّه، وقيل: هو من السرور، لأنها إذا سمنت سرَّت الناظر إليها. انتهى، ووقع في "مسند أحمد" وغيره من مصادر التخريج: وآشره، بالمد والشين المعجمة، وقال ابن الأثير في معناها: أبطره وأنشطه.فيُرى سبيله: قال القاضي عياض في "المشارق" 2/ 364: بنصب سبيله على المفعول الثاني، والمفعول الأول مضمر، أي: فيُرى هو سبيلَه. وقال النووي في "شرح مسلم" 7/ 65: ضبطناه بضم الياء وفتحها، وبرفع لام سبيله ونصبها. وتعقبه الحافظ العراقي في "طرح التثريب" 4/ 10 بقوله: الوجهان في رفع لام سبيله ونصبها إنما يجيئان مع ضم الياء، فأما مع فتح الياء فيتعين نصب اللام، والله أعلم.الكريمة: هي الخالية من العيوب، وذلك في الصدقة.الغزيرة: هي كثيرة اللبن.تفقر الظهر: تعيره للحمل والركوب، والظهر: الدابةتطرق الفحل: الطَّرْق: ماء الفحل، أي: تعيره من أجل اللقاح.
1482 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين، أبو عمر - ويقال: أبو عمرو - الغُداني، تابعيٌّ تفرد بالرواية عنه قتادة بن دعامة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم يذكره أحد بجرح، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه أحمد 16/ (10351)، وأبو داود (1660) من طريق يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. ولم يذكر أبو داود لفظه، وإنما أحال على لفظ حديث أبي صالح عن أبي هريرة، الآتي تخريجه بعد قليل، وذكر قول أبي هريرة الذي في آخر الحديث: تعطي الكريمة … إلى آخره.وأخرجه بطوله أحمد 16/ (10350)، والنسائي (2234) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، به. وزاد أحمد في روايته ذكر صاحب الغنم.وأخرجه أحمد 14/ (8979) من طريق همام، عن قتادة، به. ولم يسق لفظه وإنما أحال على حديث أبي صالح عن أبي هريرة المشار إليه قريبًا.وأخرجه بنحوه وبمعناه مطولًا ومختصرًا أحمد 13/ (7563) و 14/ (8977) و (8978)، ومسلم (987)، وأبو داود (1658) و (1659)، وابن حبان (3253) من طريق أبي صالح السمان، وأحمد 16/ (10352) من طريق خِلاس بن عمرو الهَجَري، والبخاري (1402)، والنسائي (2240) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وابن حبان (3254) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب، أربعتهم عن أبي هريرة.وله شاهد من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (988) وغيره.قوله: حمراء، أكثر ما يقع هذا الاسم على الإبل، والإبل الحمر أعزّ أموال العرب. قاله النسفي في "طلبة الطلبة" مادة (حمر).وقوله: أدماء، قال ابن الأثير في "النهاية": الأُدْمة في الإبل: البياض مع سواد المقلتين، بعيرٌ آدَم: بيِّن الأُدْمة، وناقة أَدْماء.نجدتها ورِسْلها: قال ابن الأثير: النجدة: الشدة، والرِّسل بالكسر: الهِينة والتأني.القاع: المكان الواسع.القرقر - بفتح القافين -: المكان المستوي.وأَسرِّه، كذا وقعت هنا مهملة في أصولنا الخطية، قال في "النهاية": أي: كأسمن ما كانت وأوفره، من سِرِّ كل شيء وهو لبُّه ومخُّه، وقيل: هو من السرور، لأنها إذا سمنت سرَّت الناظر إليها. انتهى، ووقع في "مسند أحمد" وغيره من مصادر التخريج: وآشره، بالمد والشين المعجمة، وقال ابن الأثير في معناها: أبطره وأنشطه.فيُرى سبيله: قال القاضي عياض في "المشارق" 2/ 364: بنصب سبيله على المفعول الثاني، والمفعول الأول مضمر، أي: فيُرى هو سبيلَه. وقال النووي في "شرح مسلم" 7/ 65: ضبطناه بضم الياء وفتحها، وبرفع لام سبيله ونصبها. وتعقبه الحافظ العراقي في "طرح التثريب" 4/ 10 بقوله: الوجهان في رفع لام سبيله ونصبها إنما يجيئان مع ضم الياء، فأما مع فتح الياء فيتعين نصب اللام، والله أعلم.الكريمة: هي الخالية من العيوب، وذلك في الصدقة.الغزيرة: هي كثيرة اللبن.تفقر الظهر: تعيره للحمل والركوب، والظهر: الدابةتطرق الفحل: الطَّرْق: ماء الفحل، أي: تعيره من أجل اللقاح.
1482 [4] - أخرجه مسلم برقم (987)، كما سلف تخريجه قريبًا. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 152 و 6/ 148، وفي "المعرفة" (1212) و (8357) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقد جاء في "المعرفة" مختصرًا: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ من معادن القبلية الصدقة.وأخرجه تامًا ومختصرًا أبو عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (679) و (713)، وابن زنجويه في "الأموال" (1012) و (1069)، وابن شبة في "تاريخ المدينة "1/ 150، وابن الجارود في "المنتقى" (371)، وابن خزيمة (2323) من طريق نعيم بن حماد، به. قال ابن خزيمة: إنَّ في القلب من اتصال هذا الإسناد.وأخرج يحيى بن آدم في "الخراج" (294)، ومن طريقه البيهقي في "الكبرى" 6/ 149 عن يونس، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم - مرسلًا - قال: جاء بلال بن الحارث المزني إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستقطعه أرضًا … فذكر نحوه.وأخرج البيهقي 6/ 149 من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن رجل من أهل المدينة قال: قطع النبي صلى الله عليه وسلم العقيق رجلًا واحدًا، فلما كان عمر كثر عليه فأعطاه بعضه وقطع سائره الناس. ويغلب على الظن أنَّ الرجل المدني صحابي، لأنَّ طاووسًا جل روايته عن الصحابة، والله أعلم.وأخرج أبو داود (3061) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن غير واحد: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أقطع بلال بن الحارث المزني معادن القبلية، وهي من ناحية الفُرُع، فتلك المعادن لا يؤخذ منها إلّا الزكاة إلى اليوم. وهذا مرسل كما قال المنذري في "مختصر السنن".وانظر ما سيأتي برقم (6324).قوله: المعادن القَبَلية، قال ابن الأثير: القَبَلية: منسوبة على قَبَل - بفتح القاف والباء - وهي ناحية من ساحل البحر، بينها وبين المدينة خمسة أيام، وقيل: هي من ناحية الفُرع، وهو موضع بين نخلة والمدينة، هذا هو المحفوظ في الحديث.وقوله: أقطَعَ، قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد": من أقطعه الإمام أرضًا: إذا أعطاه أرضًا، وهو يكون تمليكًا وغيره.والعقيق: وادٍ من أودية المدينة، مَسيلٌ للماء.
1483 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد بن المسيّب، حدثنا نُعَيم بن حماد، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن رَبيعَة بن أبي عبد الرحمن، عن الحارث بن بلال بن الحارث، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أَخَذَ في المَعادن القَبَلِيَّةِ الصَّدقةَ، وأنه أقطَعَ بلالَ بن الحارث العَقِيقَ أجمَعَ، فلمَّا كان عمرُ قال لبلال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُقطِعْكَ لتَحْتَجِرَه عن الناس، لم يُقطِعْكَ إلّا لتعمَلَ. قال: فأقطَعَ عمرُ بن الخطاب للناس العَقِيقَ [1]. قد احتجَّ البخاري بنُعَيم بن حماد، ومسلمٌ بالدَّراوَرْدي، وهذا حديث صحيح ولم يُخرجاه.
বিলাল ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ক্বাবালিয়াহ অঞ্চলের খনিগুলো থেকে সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করতেন। আর নিশ্চয় তিনি বিলাল ইবনুল হারিসকে গোটা আল-আকীক উপত্যকাটি জায়গির হিসেবে প্রদান করেছিলেন। অতঃপর যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ আসল, তিনি বিলালকে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাকে এই কারণে জায়গির দেননি যে তুমি তা লোকদের থেকে আটকে রাখবে, বরং তিনি তোমাকে কেবল কাজ করার জন্যই জায়গির দিয়েছিলেন। তিনি (বিলাল) বলেন, অতঃপর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আকীক উপত্যকাটি (অন্য) লোকদের মধ্যে জায়গির হিসাবে বণ্টন করে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في إسناده لِين، الحارث بن بلال تفرد بالرواية عنه ربيعة بن أبي عبد الرحمن، وقال فيه ابن القطان في "بيان الوهم" 3/ 468: الحارث بن بلال هذا لا يعرف حاله، وقال أحمد بن حنبل عن حديث بلال بن الحارث هذا: لا أقول به، وليس إسناده بالمعروف، ولم يروه إلّا الدراوردي وحده.قلنا: إلّا أنَّ لقصة إقطاع النبي صلى الله عليه وسلم بلال بن الحارث شاهدًا من حديث عمرو بن عوف وابن عباس، أخرجه أحمد 5/ (2785) و (2786) وأبو داود (3062) و (3063) بإسناد ضعيف، يعضد قصة الإقطاع دون زكاة المعادن، وانظر بسط الكلام على الحديث في التعليق على "سنن أبي داود" (3061). وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 152 و 6/ 148، وفي "المعرفة" (1212) و (8357) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقد جاء في "المعرفة" مختصرًا: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ من معادن القبلية الصدقة.وأخرجه تامًا ومختصرًا أبو عبيد القاسم بن سلام في "الأموال" (679) و (713)، وابن زنجويه في "الأموال" (1012) و (1069)، وابن شبة في "تاريخ المدينة "1/ 150، وابن الجارود في "المنتقى" (371)، وابن خزيمة (2323) من طريق نعيم بن حماد، به. قال ابن خزيمة: إنَّ في القلب من اتصال هذا الإسناد.وأخرج يحيى بن آدم في "الخراج" (294)، ومن طريقه البيهقي في "الكبرى" 6/ 149 عن يونس، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم - مرسلًا - قال: جاء بلال بن الحارث المزني إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستقطعه أرضًا … فذكر نحوه.وأخرج البيهقي 6/ 149 من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن رجل من أهل المدينة قال: قطع النبي صلى الله عليه وسلم العقيق رجلًا واحدًا، فلما كان عمر كثر عليه فأعطاه بعضه وقطع سائره الناس. ويغلب على الظن أنَّ الرجل المدني صحابي، لأنَّ طاووسًا جل روايته عن الصحابة، والله أعلم.وأخرج أبو داود (3061) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن غير واحد: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أقطع بلال بن الحارث المزني معادن القبلية، وهي من ناحية الفُرُع، فتلك المعادن لا يؤخذ منها إلّا الزكاة إلى اليوم. وهذا مرسل كما قال المنذري في "مختصر السنن".وانظر ما سيأتي برقم (6324).قوله: المعادن القَبَلية، قال ابن الأثير: القَبَلية: منسوبة على قَبَل - بفتح القاف والباء - وهي ناحية من ساحل البحر، بينها وبين المدينة خمسة أيام، وقيل: هي من ناحية الفُرع، وهو موضع بين نخلة والمدينة، هذا هو المحفوظ في الحديث.وقوله: أقطَعَ، قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد": من أقطعه الإمام أرضًا: إذا أعطاه أرضًا، وهو يكون تمليكًا وغيره.والعقيق: وادٍ من أودية المدينة، مَسيلٌ للماء.
1484 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن بن مَيمُون، حدثنا عفّان بن مُسلِم، حدثنا شُعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن الحَكَم، عن ابن أبي رافع، عن أبي رافع: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بَعَثَ رجلًا من بني مَخزُوم على الصَّدقة، فقال لأبي رافع: اصحَبْني كَيْما تُصيبَ منها، فقال: لا، حتى آتيَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فانطَلَقَ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فسأله، فقال: "إنَّ الصَّدقةَ لا تَحِلُّ لنا، وإنَّ مَواليَ القوم من أنفُسِهم" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তিকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের দায়িত্বে প্রেরণ করেন। সে আবূ রাফি'কে বলল: তুমি আমার সাথে যাও, তাহলে তুমিও তা থেকে কিছু লাভ করতে পারবে। তিনি (আবূ রাফি') বললেন: না, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাওয়া পর্যন্ত (তা করব না)। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সাদাকা (যাকাত) আমাদের জন্য হালাল নয়। আর কোনো গোত্রের মাওলা (মুক্ত দাস) তাদের নিজেদেরই অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. الحكم: هو ابن عُتيبة الكِندي، وابن أبي رافع: اسمه عبيد الله، وهو كاتب علي بن أبي طالب، وأبو رافع: هو مولى النبي صلى الله عليه وسلم، واسمه أسلم.وهو في "مسند أحمد" 39/ (23872). وقرن أحمد هناك بمحمد بن جعفر: بهزَ بن أسد العمِّي.وأخرجه الترمذي (657) عن محمد بن المثنى، عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 45/ (27182)، وأبو داود (1650)، والنسائي (2404)، وابن حبان (3293) من طريقين عن شعبة، به.وأخرجه بنحوه أحمد 39/ (23863) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن الحكم بن عتيبة، به. وسمَّى الرجل صاحب القصة مع أبي رافع: الأرقمَ الزهري، أو ابن أبي الأرقم.وأخرجه النسائي (2405) من طريق حمزة الزيات، عن الحكم بن عتيبة، عن بعض أصحابه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أرقم بن أبي أرقم ساعيًا على الصدقة … فذكر نحوه. وأخرجه أحمد 28/ (17354) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (17294)، وأبو داود (2937) من طريق محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، به.وفي الباب عن رويفع بن ثابت عند أحمد 28/ (17001)، ولفظه مرفوعًا: "إنَّ صاحب المكس في النار"، وإسناده قابل للتحسين.والمَكس: قال ابن الأثير: الضريبة التي يأخذها الماكس، وهو العَشَّار. وقال السندي في حاشيته على "المسند": والعَشَّار: هو الذي يأخذ من المسلمين عُشر أموالهم في الزكاة، ولعلَّ المعنى: لا يستحق الدخول ابتداءً.وقال البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 16: المكس: هو النقصان، فإذا كان العامل في الصدقات ينتقص من حقوق المساكين ولا يعطيهم إياها بالتمام، فهو حينئذٍ صاحب مكس يُخاف عليه الإثم والعقوبة، والله أعلم.
1485 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حَبيب، عن عبد الرحمن بن شُمَاسة، عن عُقْبة بن عامر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يَدخُلُ صاحبُ مَكْسٍ الجنةَ". قال يزيد بن هارون: يعني العَشَّار [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উক্ববাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "অবৈধ কর বা শুল্ক আদায়কারী (সাহিবু মাকস) জান্নাতে প্রবেশ করবে না।" ইয়াযীদ ইবন হারূন বলেন, এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো (অবৈধ) শুল্ক বা কর আদায়কারী ('আশশার)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن. وأخرجه أحمد 28/ (17354) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (17294)، وأبو داود (2937) من طريق محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، به.وفي الباب عن رويفع بن ثابت عند أحمد 28/ (17001)، ولفظه مرفوعًا: "إنَّ صاحب المكس في النار"، وإسناده قابل للتحسين.والمَكس: قال ابن الأثير: الضريبة التي يأخذها الماكس، وهو العَشَّار. وقال السندي في حاشيته على "المسند": والعَشَّار: هو الذي يأخذ من المسلمين عُشر أموالهم في الزكاة، ولعلَّ المعنى: لا يستحق الدخول ابتداءً.وقال البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 16: المكس: هو النقصان، فإذا كان العامل في الصدقات ينتقص من حقوق المساكين ولا يعطيهم إياها بالتمام، فهو حينئذٍ صاحب مكس يُخاف عليه الإثم والعقوبة، والله أعلم.
1486 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا عمرو بن خالد الحَرَّاني، حدثنا عبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، عن زيد [1] بن أبي أُنيسة، عن القاسم بن عوف الشَّيباني، عن علي بن الحسين، قال: حدثتنا أمُّ سلمة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بينما هو في بيتها، وعنده رجالٌ من أصحابه يَتحدَّثون، إذ جاء رجلٌ فقال: يا رسول الله، كم صدقةُ كذا وكذا من التمر؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كذا وكذا" فقال الرجل: إنَّ فلانًا تعدّى عليَّ فأخذ منِّي كذا وكذا، فازداد صاعًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فكيف إذا سَعَى عليكم مَن يَتعدَّى عليكم أشدَّ من هذا التّعدِّي؟ " فخاض الناسُ وبَهَرَ الحديثُ، حتى قال رجلٌ منهم: يا رسولَ الله، إن كان رجلًا غائبًا عنك في إبلِه وماشيتِه وزَرْعِه، فأدَّى زكاةَ مالِه فتُعُدِّيَ عليه الحقَّ، فكيف يَصنَعُ وهو غائب؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أدّى زكاةَ مالِه طيِّبَ النفسِ بها، يريدُ به وَجْهَ الله والدارَ الآخرة، لم يُغيِّب شيئًا من ماله، وأقام الصلاةَ، وأدّى الزكاةَ، فتُعُدِّي عليه الحقِّ، فأَخَذ سلاحَه فقاتَلَ فقُتل، فهو شهيد" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين. ولم يُخرجاه.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘরে ছিলেন এবং তাঁর কাছে সাহাবিদের মধ্য থেকে কয়েকজন লোক বসে আলোচনা করছিলেন। এমন সময় এক ব্যক্তি এসে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! নির্দিষ্ট পরিমাণ খেজুরের যাকাত কত? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এত এত (নির্দিষ্ট পরিমাণ)।" লোকটি বলল, অমুক আমার প্রতি বাড়াবাড়ি করে এই পরিমাণ (যাকাত) নিয়েছে, যা এক সা’ বেশি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তখন তোমাদের অবস্থা কেমন হবে, যখন এমন লোক তোমাদের ওপর কর্তৃত্ব করবে, যারা এর চাইতেও জঘন্যভাবে বাড়াবাড়ি করবে?" ফলে লোকেরা আলোচনায় মশগুল হয়ে পড়ল এবং কথা খুব গুরুত্ব পেল। এমনকি তাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বলল, হে আল্লাহর রাসূল! যদি কোনো ব্যক্তি আপনার থেকে দূরে তার উট, গবাদি পশু ও ফসলের কাছে অনুপস্থিত থাকে এবং সে তার মালের যাকাত আদায় করে দেয়, কিন্তু তার ওপর জুলুম করা হয় (এবং তার প্রাপ্যর চেয়ে বেশি নেওয়া হয়), তখন সে অনুপস্থিত অবস্থায় কী করবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি সন্তুষ্টচিত্তে তার মালের যাকাত আদায় করল, এর মাধ্যমে আল্লাহর সন্তুষ্টি ও পরকালের সফলতা কামনা করল, সে তার সম্পদের কিছুই গোপন করল না, সালাত প্রতিষ্ঠা করল এবং যাকাত আদায় করল, কিন্তু এরপরও যদি তার ওপর জুলুম করা হয় (অধিকারের চেয়ে বেশি চাওয়া হয়), আর সে তার অস্ত্র হাতে তুলে নিল এবং যুদ্ধ করল, ফলে সে নিহত হলো— তবে সে শহীদ।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يزيد.
[2] إسناده حسن إن شاء الله من أجل القاسم بن عوف الشيباني. علي بن الحسين: هو ابن علي بن أبي طالب زينُ العابدين.وأخرجه أحمد 44/ (26574)، وابن حبان (3193) من طريقين عن عبيد الله بن عمرو الرقي، بهذا الإسناد. رواية أحمد مختصرة.قال ابن حبان: معنى هذا الخبر: إذا تُعدِّي على المرء في أخذ صدقته، أو ما يشبه هذه الحالة، وكان معه من المسلمين الذين يواطئونه على ذلك، وفيهم كفاية، بعد أن لا يكون قصدهم الدنيا، ولا شيئًا منها، دون إلقاء المرء نفسه إلى التهلكة، إذ المصطفى صلى الله عليه وسلم قال لأبي ذر: "اسمع وأطع ولو عبدًا حبشيًا مجدَّعًا"، وقال صلى الله عليه وسلم: "من حمل السلاح فليس منا". ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي في روايته عن المصنف: "فليلبسوا كساءين" بإسقاط لفظة اللباس.
1487 - أخبرنا أبو إسحاق بن فراس الفقيه بمكة، حدثنا بكر بن سَهْل الدِّمْياطي، حدثنا شعيب بن يحيى التُّجِيبي، حدثنا الليث بن سعد، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه: أنه لمَّا كان عامُ الرَّمادة، وأجْدَبَتِ الأرض، كَتَبَ عمر بنُ الخطاب إلى عمرو بن العاص: مِن عبد الله عمرَ أميرِ المؤمنين إلى العاصي ابن العاص، لعَمْري [1] ما تُبالي إذا سَمِنْتَ ومَن قِبَلَكَ أن أَعْجَفَ ومَن قِبَلي، ويا غَوْثاه، فكتب عمرو: السلام، أما بعدُ: لبَّيك لبَّيك، أتتك عِيرٌ أولُها عندك وآخرُها عندي، مع أني أرجو أن أجد سبيلًا أن أحمِلَ في البحر، فلمَّا قَدِمَ أولُ عِيرٍ دعا الزُّبيرَ فقال: اخرُجْ في أول هذه العِير، فاستقبِلْ بها نجدًا [2]، فاحمِلْ إليَّ كلَّ أهل بيتٍ قَدَرتَ أن تَحمِلَهم إليَّ، ومَن لم تستطع حَمْلَه فمُرْ لكلِّ أهل بيتٍ ببعيرٍ بما عليه، ومُرْهُم فليَلْبَسوا اللِّباسَ كِساءَيْنِ [3]، وليَنحَروا البعيرَ فيَجْمُلوا شَحْمَه، وليُقدِّدوا لحمَه، وليَحتَذُوا جِلدَه، ثم ليأخُذُوا كُبَّةً من قَدِيدٍ وكُبَّةً من شَحْمٍ وحَفْنَةً من دقيق فيَطبُخوا [4]، وليأكُلوا حتى يأتيهم الله برِزْق، فأَبى الزُّبير أن يَخرُج، فقال: أما والله لا تجدُ مثلَها حتى تخرج من الدنيا، ثم دعا آخَرَ أظنُّه طلحة، فأبى، ثم دعا أبا عُبيدةَ بن الجرَّاح، فخَرَج في ذلك، فلمَّا رَجَعَ بَعَثَ إليه بألف دينار، فقال أبو عبيدة: إني لم أعمَلْ لك يا ابنَ الخطاب، إنما عَمِلتُ لله، ولستُ آخُذُ في ذلك شيئًا، فقال عمر: قد أعطانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في أشياءَ بَعَثَنا فيها فكَرِهْنا، فأَبى ذلك علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فاقبَلْها أيها الرجل، فاستَعِنْ بها على دُنياكَ، فقَبِلَها أبو عبيدةَ بن الجرَّاح [5].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আসলম থেকে বর্ণিত, যখন রামাদার বছর (মহাদুর্ভিক্ষের বছর) এলো এবং জমিন শুষ্ক ও অনাবৃষ্টিতে আক্রান্ত হলো, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমর ইবনুল আসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে লিখলেন:
"আল্লাহর বান্দা, মুমিনদের নেতা উমরের পক্ষ থেকে আসীর পুত্র আসের (আমর ইবনুল আস) প্রতি। আমার জীবনের কসম! তোমরা এবং তোমাদের কাছে যারা আছে, তারা যখন মোটা তাজা হবে, তখন তোমরা আমার ও আমার নিকটস্থদের রুগ্নতা নিয়ে পরোয়া করো না! হায়! সাহায্য!"
আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন লিখলেন: "আসসালামু আলাইকুম। অতঃপর, আমি হাজির, আমি হাজির! আপনার কাছে এমন এক কাফেলা আসছে যার প্রথম অংশ আপনার কাছে এবং শেষ অংশ আমার কাছে। এর সাথে আমি আশা করি, সমুদ্রে (জাহাজে) করেও শস্য পাঠানোর একটি পথ খুঁজে পাব।"
যখন প্রথম কাফেলা এলো, তিনি (উমর) যুবাইরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ডাকলেন এবং বললেন: "এই কাফেলার প্রথম অংশ নিয়ে বের হও এবং তা নিয়ে নাজদের দিকে যাও। তুমি প্রত্যেকটি পরিবারকে যা তোমার পক্ষে সম্ভব, আমার কাছে বহন করে নিয়ে এসো। আর যাদের বহন করে আনতে সক্ষম না হও, তাদের প্রত্যেক পরিবারের জন্য একটি করে উট তার উপরে যা আছে (বোঝাই করা আছে) তা সহ আদেশ করো। আর তাদের আদেশ করো, যেন তারা দুই টুকরো চাদর পোশাক হিসেবে পরিধান করে, এবং উটটি যেন নহর (জবাই) করে, তার চর্বি যেন গলিয়ে নেয়, তার গোশত যেন শুকিয়ে নেয়, আর তার চামড়া যেন জুতা হিসেবে ব্যবহার করে। এরপর তারা এক টুকরো শুকনো গোশত, এক টুকরো চর্বি এবং এক মুঠো আটা নিয়ে রান্না করবে এবং খাবে, যতক্ষণ না আল্লাহ তাদের জন্য জীবিকার ব্যবস্থা করেন।"
কিন্তু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেতে অস্বীকার করলেন। তখন তিনি (উমর) বললেন: "আল্লাহর কসম! তুমি দুনিয়া থেকে বিদায় না নেওয়া পর্যন্ত এর মতো (সাওয়াব) আর পাবে না।"
এরপর তিনি অন্য একজনকে ডাকলেন, আমার মনে হয় তিনি ছিলেন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনিও অস্বীকার করলেন। এরপর তিনি আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ডাকলেন। তিনি এই (কাজের) জন্য বের হলেন।
যখন তিনি ফিরে আসলেন, তখন তিনি (উমর) তাঁর কাছে এক হাজার দিনার পাঠালেন। তখন আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে ইবনুল খাত্তাব! আমি আপনার জন্য কাজ করিনি, আমি আল্লাহর জন্যই কাজ করেছি। আর আমি এর জন্য কিছু গ্রহণ করব না।"
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে কিছু কাজের বিনিময়ে দিয়েছেন, যা করার জন্য তিনি আমাদের পাঠিয়েছিলেন, আর আমরা তা নিতে অপছন্দ করেছিলাম। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা নিতে আমাদের মানা করেননি। অতএব, হে ব্যক্তি! এটি গ্রহণ করুন এবং আপনার দুনিয়ার কাজে এটি ব্যবহার করুন।" তখন আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা গ্রহণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في (ز) و (ص) و (ع) إلى: العمري، وفي هامش (ز): "لعلَّها أخبرني العمري"، ووقع في (ب) و"تلخيص الذهبي": أخبرني العمري، وكله خطأ، والتصويب من "إتحاف المهرة" 2/ 87 و"سنن البيهقي" في روايته هذا الحديث عن المصنِّف نفسه، ومن "صحيح ابن خزيمة". ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي في روايته عن المصنف: "فليلبسوا كساءين" بإسقاط لفظة اللباس.
[2] تحرف في نسخنا الخطية إلى: غدًا، والتصويب من مصدري التخريج. ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي في روايته عن المصنف: "فليلبسوا كساءين" بإسقاط لفظة اللباس.
1487 [3] - تحرف في (ز) و (ب) إلى: فليلبسوا الناس كماتين، وسقطت لفظة "كساءين" من (ص) و (ع) ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي في روايته عن المصنف: "فليلبسوا كساءين" بإسقاط لفظة اللباس.
1487 [4] - في (ص) و (ع): فيطحنوا، والمثبت من (ز). هو ابن الحُصيب الأسلمي.وأخرجه أبو داود (2943) عن أبي طالب زيد بن أخزم، عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.والغلول: الخيانة في أموال الغنائم وغيرها.
1487 [5] - إسناده حسن إن شاء الله، هشام بن سعد وإن كان مختلفًا فيه، فقد جعله أبو داود السجستاني من أثبت الناس في زيد بن أسلم، وبكر بن سهل الدمياطي فيه ضعف، لكنه قد توبع. وقد قوى هذا الإسناد الذهبي في "مختصر سنن البيهقي". أسلم والد زيد: هو القرشي العدوي المدني، مولى عمر بن الخطاب.وأخرجه البيهقي 6/ 355 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2367) عن أبي زهير عبد المجيد بن إبراهيم المصري، عن شعيب بن يحيى التجيبي، به.وأخرجه البيهقي 6/ 354 عن عبد الله بن صالح، عن الليث بن سعد، به.يَجمُلوا: يُذيبوا. يقدِّدوا لحمه: يملّحوه ويجفّفوه. والكُبَّة: الشيء المجتمع من الطعام وغيره. هو ابن الحُصيب الأسلمي.وأخرجه أبو داود (2943) عن أبي طالب زيد بن أخزم، عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.والغلول: الخيانة في أموال الغنائم وغيرها.
1488 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك ببغداد، حدثنا أحمد بن حيَّان بن مُلاعِب، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، عن حسين المُعلِّم، عن عبد الله بن بُريدةَ، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من استَعمَلْناه على عَمَلٍ فرَزَقْناه رِزقًا، فما أخَذَ بعد ذلك فهو غُلول" [1]. هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: আমরা যাকে কোনো কাজে নিয়োগ দেই এবং তাকে জীবিকা (পারিশ্রমিক) প্রদান করি, এরপরও সে যা কিছু গ্রহণ করে, তা হবে খেয়ানত (আত্মসাৎ)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وحسين المعلم: هو ابن ذكوان، وبريدة: هو ابن الحُصيب الأسلمي.وأخرجه أبو داود (2943) عن أبي طالب زيد بن أخزم، عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.والغلول: الخيانة في أموال الغنائم وغيرها.
1489 - أخبرني أبو النَّضْر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا الحسين بن إدريسَ الأنصاريُّ، حدثنا محمد بن عبد الله بن عمّار المَوْصِلي، حدثنا المُعافَى بن عِمْران، عن الأوزاعي، حدثنا الحارث بن يزيد، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير، عن المُستورِد بن شدَّاد قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "من كان لنا عاملًا فليكتسِبْ زوجةً، وإن لم يكن له خادمٌ فليكتسِبْ خادمًا، ومن لم يكن له مَسكنٌ فليكتسِبْ مسكنًا".قال [1]: وأُخبِرتُ أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن اتخذ غيرَ ذلك فهو غالٌّ أو سارق" [2]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
মুসতাওরিদ ইবনু শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আমাদের পক্ষ থেকে কর্মচারী বা কর্মকর্তা নিযুক্ত হবে, সে যেন একজন স্ত্রী গ্রহণ করে। আর যদি তার খাদেম (ভৃত্য) না থাকে, তবে সে যেন খাদেমও গ্রহণ করে। আর যদি তার বাসস্থান না থাকে, তবে সে যেন বাসস্থানও গ্রহণ করে।" তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: আমাকে আরও জানানো হয়েছে যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এর অতিরিক্ত গ্রহণ করবে, সে আত্মসাৎকারী অথবা চোর।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] جاء في "صحيح ابن خزيمة" بإثر الحديث (2370): قال أبو بكر يعني المعافى: وأُخبرتُ أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من اتخذ غير ذلك فهو غالٌّ أو سارق". لكن لم يذكر أحد ممن ترجم للمعافى أنه يكنى أبا بكر، ووقع عند الطبراني في "الكبير" 20/ (725) أنَّ أبا بكر رضي الله عنه قال للنبي صلى الله عليه وسلم: أكثرتَ يا رسول الله، فردَّ عليه النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "من أصاب بعد ذلك فهو غالٌّ". ووقع في "سنن أبي داود" بإثر (2945): قال: قال أبو بكر: أُخبرت أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من اتخذ غير ذلك فهو غالٌّ أو سارق". ولا شكَّ أنَّ هذا الاختلاف هو وهم من بعض الرواة، لكن بالتوفيق بين الروايات يحتمل أنَّ القائل: وأُخبرتُ … إلى آخره: هو المعافى بن عمران، وأنَّ قول النبي صلى الله عليه وسلم: "من اتخذ … " إلى آخره، هو جواب لأبي بكر الصديق حين قال: أكثرت يا رسول الله. فهو على هذا معضلٌ، والله تعالى أعلم. ابن يزيد، عن عبد الرحمن بن جبير، عن المستورد بن شداد، رفعه. وقرن بالموضع الأول والثالث بالحارث بن يزيد: عبد الله بن هبيرة. وقد جاء عنده في جميع مواضعه قول النبي صلى الله عليه وسلم في آخره: "من اتخذ … " إلى آخره موصولًا بالحديث. وابن لهيعة سيئ الحفظ.وأخرجه كذلك 29/ (18019) من طريق ابن لهيعة، عن عبد الله بن هبيرة وحده - لم يذكر الحارث - عن عبد الرحمن بن جبير، به.وأخرجه أبو داود (2945) عن موسى بن مروان الرقي، عن المعافى، عن الأوزاعي، عن الحارث بن يزيد، عن جبير بن نفير، عن المستورد بن شداد، فذكره. وذكر جبير بن نفير هذا خطأ، صوابه عبد الرحمن بن جبير، كما ذكر المزي في "التحفة" 8/ 377 - 378، والآفة فيه من موسى بن مروان، والله أعلم.وانظر تمام تخريجه وذكر وشواهده في تعليقنا على "المسند" (18015).
[2] إسناد الشطر الأول منه صحيح، غير أنَّ تسمية عبد الرحمن بن جبير بن نفير هنا خطأ، صوابه: عبد الرحمن بن جبير، دون ذكر "ابن نفير"، لأنَّ الحارث بن يزيد مصريٌّ، وهو يروي عن عبد الرحمن بن جبير المصري، وليس له رواية عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير وهو شامي، وقد جزم الحافظ ابن حجر في "النكت الظراف" 8/ 377 أنَّ عبد الرحمن بن جبير هذا هو المصري. ولم يرد ذكر "ابن نفير" في مصادر التخريج إلّا في بعض روايات الطبراني، والله أعلم.وأخرجه أحمد 19/ (18015) و (18017) و (18018) من طريق ابن لهيعة، عن الحارث ابن يزيد، عن عبد الرحمن بن جبير، عن المستورد بن شداد، رفعه. وقرن بالموضع الأول والثالث بالحارث بن يزيد: عبد الله بن هبيرة. وقد جاء عنده في جميع مواضعه قول النبي صلى الله عليه وسلم في آخره: "من اتخذ … " إلى آخره موصولًا بالحديث. وابن لهيعة سيئ الحفظ.وأخرجه كذلك 29/ (18019) من طريق ابن لهيعة، عن عبد الله بن هبيرة وحده - لم يذكر الحارث - عن عبد الرحمن بن جبير، به.وأخرجه أبو داود (2945) عن موسى بن مروان الرقي، عن المعافى، عن الأوزاعي، عن الحارث بن يزيد، عن جبير بن نفير، عن المستورد بن شداد، فذكره. وذكر جبير بن نفير هذا خطأ، صوابه عبد الرحمن بن جبير، كما ذكر المزي في "التحفة" 8/ 377 - 378، والآفة فيه من موسى بن مروان، والله أعلم.وانظر تمام تخريجه وذكر وشواهده في تعليقنا على "المسند" (18015).
1490 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو زُرْعة عبد الرحمن بن عمرو الدِّمشقي، حدثنا أحمد بن خالد الوَهْبي، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود [1] بن لَبِيد، عن رافع بن خَدِيجٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "العاملُ على الصَّدَقة بالحقِّ كالغازي في سبيل الله حتى يَرجِعَ إلى بيتِه" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
রাফি' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ন্যায়সঙ্গতভাবে সাদকা (যাকাত) সংগ্রহ করার দায়িত্বে থাকা ব্যক্তি আল্লাহর পথে জিহাদকারীর মতো, যতক্ষণ না সে তার বাড়িতে ফিরে আসে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد. وأخرجه أحمد 25/ (15826) عن يعلى بن عبيد، عن محمد بن إسحاق، عن رافع بن خديج. وهو مُعضَل.
[2] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - وقد صرَّح بالتحديث عند أحمد في "المسند" فانتفت شبهة تدليسه.وأخرجه الترمذي (645) عن محمد بن إسماعيل البخاري، عن أحمد بن خالد الوهبي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (17285)، وأبو داود (645)، وابن ماجه (1809) من طرق عن محمد بن إسحاق، به.وأخرجه الترمذي (645) من طريق يزيد بن عياض، عن عاصم بن عمر بن قتادة، به. قال الترمذي: حديث رافع بن خديج حديث حسن، ويزيد بن عياض ضعيف عند أهل الحديث، وحديث محمد بن إسحاق أصح. قلنا: العمدة فيه على ابن إسحاق، أما يزيد بن عياض فهو متهم. وأخرجه أحمد 25/ (15826) عن يعلى بن عبيد، عن محمد بن إسحاق، عن رافع بن خديج. وهو مُعضَل.
1491 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنعاني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الصَّنْعاني، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزهري.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيديُّ، حدثنا سفيان، عن الزُّهري، عن حُمَيد بن عبد الرحمن، عن أُمِّه أُمُّ كلثوم بنت عُقبة - قال سفيان: وكانت قد صلَّتْ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم القِبلَتَين - قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضلُ الصَّدقة على ذي الرَّحِمِ الكاشِح" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح:
উম্মু কুলসুম বিনত উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (সুফিয়ান [একজন রাবী] বলেছেন: তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উভয় ক্বিবলার দিকে মুখ করে সালাত আদায় করেছিলেন), তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সর্বোত্তম সাদাকা হলো সেই আত্মীয়ের প্রতি করা, যে শত্রুতা পোষণ করে।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده من جهة معمر - وهو ابن راشد - صحيح، أما من جهة سفيان - وهو ابن عيينة - فمنقطع، فقد صرَّح سفيان كما في "مسند الحميدي" بعدم سماع هذا الحديث من الزهري.الحميدي: هو أبو بكر عبد الله بن الزبير بن عيسى، وحميد بن عبد الرحمن: هو ابن عوف القرشي الزهري.وهو في "مسند الحميدي" (330)، وفيه: عن سفيان قال: أخبَروني عن الزهري، بهذا الإسناد.وبإثره قال سفيان: ولم أسمعه من الزهري.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 27 عن أبي عبد الله الحاكم، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه البيهقي أيضًا في "شعب الإيمان" (3154)، وفي "الآداب" (9) عن الحاكم، بالإسناد الأول.وأخرجه كذلك في "معرفة السنن والآثار" (13378) عن الحاكم، بالإسناد الثاني.وأخرجه الجصاص في "أحكام القرآن" 2/ 336 عن عبد الباقي بن قانع، عن بشر بن موسى، به.وأخرجه ابن خزيمة (2386)، والطبراني في "الكبير" 25/ (204)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (1282) من طرق عن سفيان بن عيينة، به.ورواه سفيان بن حسين، عن الزهري، عن أيوب بن بشير الأنصاري، عن حكيم بن حزام: أنَّ رجلًا سأل النبي صلى الله عليه وسلم .. فذكره، أخرجه أحمد في "المسند" 24/ (15320)، وسفيان بن حسين الواسطي ضعيف في روايته عن الزهري.ورواه حجاج بن أرطاة عن الزهري، عن حكيم بن بشير، عن أبي أيوب الأنصاري، رفعه. وحجاج بن أرطاة قيل: لم يسمع من الزهري.قال الدارقطني في "العلل" (4064): وكلاهما غير محفوظ. يعني حديثي حكيم وأبي أيوب. والكاشح، قال في "النهاية": العدوّ الذي يضمر عداوته ويطوي عليها كشحه، أي: باطنه. والكشح: الخصر، أو الذي يطوي عنك كشحه ولا يألفك.
1492 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب إملاءً، حدثنا الحسن بن مُكرَم البزَّاز، حدثنا عثمان بن عمر، أخبرنا ابن عون، عن حفصة بنت سيرين، عن أم الرّائح بنت صُلَيع، عن سلمان بن عامر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الصدقةَ على المسكين صدقةٌ، وإنها على ذي الرَّحِم اثنتان؛ إنها صدقةٌ وصِلَة" [1].
সালমান ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই মিসকিনের উপর (ব্যয় করা) সাদাকা একটি সাদাকা মাত্র, আর তা আত্মীয়ের উপর (ব্যয় করা হলে) দুটি (সাওয়াব): এটা সাদাকা এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা (সিলাহ)।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين، أم الرائح بنت صُلَيع - واسمها: الرباب - فهي وإن تفردت بالرواية عنها حفصة بنت سيرين، تابعية، وروايتها هنا عن عمها، وقد وثقها ابن حبان. عثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي، وابن عون: هو عبد الله بن عون بن أرطبان، وسلمان بن عامر: هو الضبي، وهو عم أم الرائح.وأخرجه أحمد 26/ (16227) و (16235) و 29/ (17872) و (17883)، وابن ماجه (1844)، والنسائي (2374)، وابن حبان (3344) من طرق عن ابن عون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16226) و 29/ (17873)، والترمذي (658) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، وأحمد (16232) عن عبد الرزاق، عن هشام بن حسان، كلاهما (عاصم وهشام) عن حفصة بنت سيرين، به. وزادا فيه قوله صلى الله عليه وسلم: "إذا أفطر أحدكم فليفطر على تمر، فإن لم يجد فليفطر على ماء فإنه طهور" وزاد أحمد في رواياته أيضًا قوله صلى الله عليه وسلم: "مع الغلام عقيقته، فأهريقوا عنه دمًا، وأميطوا عنه الأذى". وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه أحمد 26/ (16233) و 29/ (17884) عن يزيد بن هارون، و (16234) و (17870) عن يحيى بن سعيد القطان، كلاهما عن هشام بن حسان، عن حفصة بنت سيرين، عن سلمان بن عامر. ليس فيه الرباب أم الرائح.ويشهد له حديث زينب امرأة عبد الله بن مسعود، أخرجه البخاري (1466)، ومسلم (1000)، وفيه: "لها أجران: أجر القرابة وأجر الصدقة".
1493 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سليمان المَوصِلي، حدثنا علي بن حرب، حدثنا سفيان.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - أخبرنا بشرُ بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن منصور، عن أبي حازم، عن أبي هريرةَ، يَبلُغُ به: "لا تَحِلُّ الصدقةُ لِغنيٍّ ولا لذي مِرَّةٍ سَوِيٍّ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.شاهدُه حديث عبد الله بن عمرو:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উদ্ধৃতি দিয়ে তিনি বলেন:) “সদকা (যাকাত) কোনো ধনী ব্যক্তির জন্য হালাল নয়, আর না কোনো শক্তিশালী ও সুস্থ-সবল ব্যক্তির জন্য।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد فيه اختلاف سيأتي بيانه. علي بن حرب: هو الطائي، وسفيان: هو ابن عيينة، وأبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، والحميدي: هو عبد الله بن الزبير، ومنصور: هو ابن المعتمر، وأبو حازم: هو سلمان الأشجعي.وهو في "حديث سفيان بن عيينة" برواية علي بن حرب الطائي (38).وتابع عليَّ بن حرب والحميديَّ عن سفيان في رفعه جمعٌ، فقد أخرجه البزار (9725) عن محمد بن الوليد القرشي، والطبري في مسند عبد الرحمن بن عوف من "تهذيب الآثار" (749) عن صالح بن مسمار المروزي، وابن خزيمة (2387) عن عبد الجبار بن العلاء، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (1268) و (3077) عن محمد بن ميمون المكي، أربعتهم عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد مرفوعًا. وفي رواية صالح بن مسمار: قال ابن عيينة: أظنه منصورًا عن أبي حازم عن أبي هريرة.وخالفهم غيرهم فرووه عن سفيان وقد شكَّ في رفعه، كما أخرجه سعدان بن نصر في "جزئه" (96) - ومن طريقه أخرجه البيهقي 7/ 13 - 14 - وأخرجه أبو يعلى (6199) عن محمد بن عباد، كلاهما (سعدان ومحمد بن عباد) عن سفيان، عن منصور، عن أبي حازم، عن أبي هريرة. قيل لسفيان: هو عن النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: لعله. وفي رواية سعدان: قال سفيان: أظنه عن منصور.ورواه حصين بن عبد الرحمن السلمي عن أبي حازم الأشجعي، واختلف عليه فيه، فقد أخرجه الطبراني في "الأوسط" (7859)، والقضاعي في "مسند الشهاب" (885) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي عنه، عن أبي حازم، عن أبي هريرة مرفوعًا.وخالفه هشيم بن بشير عند الطبري في "تهذيب الآثار" (748)، وأبو يوسف - كما ذكر الجصاص في "أحكام القرآن" 4/ 333 - فروياه عن حصين، عن أبي حازم، عن أبي هريرة موقوفًا.وقد أعلّ البزار رواية سفيان بن عيينة عن منصور عن أبي حازم عن أبي هريرة، وقال: الصواب حديث إسرائيل عن منصور عن سالم عن أبي هريرة، وقد تابع إسرائيل على روايته أبو حَصين فرواه عن سالم عن أبي هريرة.قلنا: أما حديث إسرائيل فقد أخرجه البزار (9627)، والدارقطني في "السنن" (1989)، وأما حديث أبي حصين عن سالم - وهو ابن أبي الجعد - فقد أخرجه أحمد 14/ (8908) و 15/ (9061)، وابن ماجه (1839)، والنسائي (2389)، وابن حبان (3290) من طريق أبي بكر بن عياش، عنه مرفوعًا.وانظر "علل الدارقطني" (2209).وفي الباب عن عبد الله بن عمرو بن العاص سيأتي بعد هذا، وعن غير واحد من الصحابة ذكرناها عند حديث عبد الله بن عمرو في "مسند أحمد" 11/ (6530).
1494 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كثير، حدثنا سفيان، عن سعد بن إبراهيم.وحدثنا أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا أبو بكر بن أبي العَوَّام، حدثنا أبي، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن أبيه.وأخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن رَيْحان بن يزيد، عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تحلُّ الصَّدقةُ لِغنيٍّ، ولا لِذِي مِرَّةٍ قويّ". هكذا قال الثوري وشعبة، وفي حديث إبراهيم بن سعد: "سَوِيّ" [1].
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধনী ব্যক্তির জন্য সাদাকা (যাকাত) হালাল নয়, আর না কোনো শক্তিশালী কর্মক্ষম ব্যক্তির জন্য।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي ريحان بن يزيد - وهو العامري - وثقه ابن معين وابن حبان، وجاء في ترجمته في "التاريخ الكبير" 3/ 329: وكان أعرابيَّ صِدْقٍ.سعد بن إبراهيم: هو ابن عبد الرحمن بن عوف الزهري.وأخرجه أحمد 11/ (6530) و (6798)، والترمذي (652) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن، وقد روى شعبة عن سعد بن إبراهيم هذا الحديث بهذا الإسناد، ولم يرفعه.وأخرجه أبو داود (1634) عن عباد بن موسى الأنباري، عن إبراهيم بن سعد، به.
1495 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن عليِّ بن عفَّان العامرِي، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا سفيان بن سعيد، عن حَكِيم بن جُبَير، عن محمد بن عبد الرحمن بن يزيد، عن أبيه، عن عبد الله قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن سَألَ وله ما يُغْنيهِ جاءَ يومَ القيامة خُمُوشٌ - أو خُدُوشٌ أو كُدُوحٌ - في وَجْهِه"، فقيل: يا رسول الله، وما الغِنَى؟ قال: "خَمسونَ دِرهمًا أو قيمتُها من الذَّهب" [1]. قال يحيى بن آدم: فقال عبد الله بن عثمان لسفيان: حِفْظي أنَّ شُعبة كان لا يروي عن حَكِيم بن جُبَير، قال سفيان: فقد حدثنا زُبَيد عن محمد بن عبد الرحمن بن يزيد.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি [অন্যের কাছে] প্রার্থনা করে, অথচ তার নিকট এমন সম্পদ আছে যা তাকে অভাবমুক্ত করতে পারে, সে কিয়ামতের দিন এমন অবস্থায় আসবে যে, তার চেহারায় থাকবে আঁচড়ের দাগ – অথবা আঘাতের চিহ্ন কিংবা কালশিরা।” তখন জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! অভাবমুক্তির মানদণ্ড (গিনা) কী? তিনি বললেন: “পঞ্চাশ দিরহাম বা তার সমমূল্যের সোনা।” ইয়াহইয়া ইবনে আদম বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে উসমান সুফিয়ানের নিকট বললেন: আমার স্মৃতিতে আছে যে, শু'বা হাকিম ইবনে জুবাইর থেকে বর্ণনা করতেন না। সুফিয়ান বললেন: তবে তো আমাদের নিকটও জুবাইদ, মুহাম্মাদ ইবনে আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযিদ থেকে বর্ণনা করেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، حكيم بن جبير لم ير يحيى القطان بحديثه بأسًا، كما رواه الترمذي بإثر (155) عن علي بن المديني عنه، وقال أبو زرعة: محلُّه الصدق. قلنا: إنما تكلَّم فيه شعبة لأجل هذا الحديث، كما قال يحيى القطان، وهذا الحديث قد حسَّنه الترمذي ووافقه ابن العربي في "العارضة" 3/ 148، وقال الذهبي في "معجم شيوخه" 2/ 86: صالح الإسناد. وقد ذكر سفيان الثوري كما عند المصنف هنا بإثر هذا الحديث: أنه قد تابعه زبيد بن الحارث اليامي، وكذا عند أبي داود وابن ماجه والنسائي، وهو ثقة. لكن قد ضعَّف حكيمًا هذا جمهورُ أهل الحديث، كأحمد وابن معين وابن مهدي والنسائي وغيرهم، وأفرط الجوزجاني فقال عنه: كذاب. فأعدل الأقوال فيه أنه ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد، ولحديثه هذا ما يشهد له كما سيأتي بيانه.وأخرجه أبو داود (1626) عن الحسن بن علي بن عفان، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (1840)، والترمذي (651)، والنسائي (2384) من طرق عن يحيى بن آدم، به.وأخرجه أحمد 6/ (3675) و 7/ (4207) من طريق وكيع، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه الترمذي (650) من طريق شريك، عن حكيم بن جبير، به. وقال: حديث ابن مسعود حديث حسن، وقد تكلم شعبة في حكيم بن جبير من أجل هذا الحديث.وأخرج نحوه أحمد 7/ (4440) عن نصر بن باب، عن حجاج بن أرطاة، عن إبراهيم النخعي، عن الأسود بن يزيد النخعي، عن ابن مسعود. وهذا إسناد ضعيف لضعف نصر بن باب، وتدليس وعنعنة حجاج بن أرطاة.وللحديث شواهد ذكرناها في "المسند" عند الحديث رقم (3675).قوله: "خموش" قال في "النهاية": يعني خدوشًا، يقال: خمشت المرأة وجهها تَخمِشُه خَمْشًا وخُموشًا.والخُدُوش: جمع خَدْش، وخَدْشُ الجلد: قَشْرُه بعودٍ أو نحوه.والكُدُوح: بمعنى الخُدُوش. وكلُّ أثرٍ من خَدْشٍ أو عَضٍّ فهو كَدْح.
1496 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحَسَن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تَحِلُّ الصَّدقةُ لغنيٍّ إلَّا لخمسةٍ: لِغازٍ في سبيل الله، أو لعاملٍ عليها، أو لغارمٍ، أو لرجلٍ اشتراها بمالِه، أو لرجلٍ كان له جارٌ مسكينٌ، فتُصُدِّق على المسكين، فأَهدَى المسكينُ للغنيِّ" [1].هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين ولم يُخرجاه لإرسال مالك بن أنس إياه عن زيد بن أسلم [2].
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচ প্রকার লোক ব্যতীত ধনীর জন্য সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করা বৈধ নয়: আল্লাহর রাস্তায় জিহাদকারী, অথবা সাদাকা আদায়ের কাজে নিযুক্ত কর্মচারী, অথবা ঋণগ্রস্ত ব্যক্তি, অথবা যে ব্যক্তি তা নিজের সম্পদ দিয়ে (গরীবের কাছ থেকে) ক্রয় করেছে, অথবা এমন ব্যক্তি যার একজন দরিদ্র প্রতিবেশী আছে, আর সেই দরিদ্রকে সাদাকা দেওয়া হয়েছে এবং সেই দরিদ্র ব্যক্তি তা ধনীকে উপহার হিসেবে দিয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات، إلا أنه قد اختلف في وصله وإرساله كما سيأتي. أبو بكر بن إسحاق الفقيه: اسمه أحمد، وإبراهيم بن موسى: هو ابن يزيد الرازي.وأخرجه أحمد 18/ (11538)، وأبو داود (1636)، وابن ماجه (1841) من طريق عبد الرزاق الصنعاني، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 17/ (11268)، وأبو داود (1637) من طريق عطية بن سعد العوفي، عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تحل الصدقة لغني، إلّا في سبيل الله، أو ابن السبيل، أو جار فقير يتصدق عليه، فيهدي لك أو يدعوك". وعطية العوفي ضعيف.وانظر ما بعده. قالا: لو كان عطاءً لم يُكْنِ عنه.
[2] وقد تابع مالكًا على إرساله سفيانُ بن عيينة عند ابن عبد البر في "التمهيد" 5/ 96. أما معمر بن راشد فقد تابعه على وصله: سفيان الثوري عند عبد الرزاق (7152)، والدارقطني في "السنن" (1997)، وفي "العلل" (2279)، والبيهقي 7/ 15، ولا شكَّ أنَّ معمرًا والثوري حافظان، فيكون عطاء قد أرسله مرة ووصله أخرى، وصحَّح وصله البزار في "مسنده" كما في "نصب الراية" 4/ 378، ورجَّح الإرسال الدارقطني في "العلل"، وأبو حاتم كما في "العلل" لابنه (642).وقد أعلَّ أبو حاتم وأبو زرعة رواية الثوري بما علّقه أبو داود بإثر الحديث (1636) عن الثوري، عن زيد بن أسلم، قال: حدثني الثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم. فسألهما ابن أبي حاتم: أليس الثبت هو عطاء؟ قالا: لو كان عطاءً لم يُكْنِ عنه.
1497 - أخبرَناه أبو بكر بن أبي نَصْر المروَزيّ، حدثنا أحمد بن عيسى، حدثنا القَعْنبي فيما قَرأَ على مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَحِلُّ الصَّدقةُ لغنيٍّ إلَّا لخمسةٍ"، فذكر الحديث [1].هذا من شَرْطي في خطبة الكتاب أنه صحيح، فقد يُرسِلُ مالك في الحديث ويَصِلُه أو [يُسنِده] [2] ثقةٌ، والقولُ فيه قولُ الثقة الذي يَصِلُه ويُسنِده.
আতা ইবনু ইয়াসার থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "ধনী ব্যক্তির জন্য সাদাকা (যাকাত) হালাল নয়, তবে পাঁচ প্রকার লোকের জন্য (হালাল)।" অতঃপর তিনি (বর্ণনাকারী) অবশিষ্ট হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وقد رجحنا قبلُ أنَّ عطاء بن يسار ربما أسنده مرة وأرسله أخرى، ولا تعلُّ إحداهما الأخرى. وعلى فرض إرساله فإنه يتقوى ويعتضد بعمل الأئمة، والله أعلم.أحمد بن عيسى: هو أحمد بن محمد بن عيسى البرتي، نسب إلى جده، والقعنبي: هو عبد الله بن مسلمة.وأخرجه أبو داود (1635) عن عبد الله بن مسلمة القعنبي، بهذا الإسناد. (2326) من طرق عن بشير بن سلمان، به. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب. ووقع في رواية أحمد (4219): قال عبد الله بن أحمد: قال أبي - يعني في سيار أبي حمزة - وهو الصواب، وسيار أبو الحكم لم يحدث عن طارق بن شهاب بشيء.قوله: "بموتٍ آجل"، كذا في نسخنا الخطية، ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 196 في روايته عن المصنف: "بموت عاجل أو غنى عاجل"، وكذا في "سنن أبي داود"، ووقع في بعض الروايات: "بموت عاجل أو غنى آجل" ورجح الطِّيبي الأخير، وقال: هو أصح دراية، لقوله تعالى: {إِنْ يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}.وعلى كلٍّ فالمعنى: أن يموت قريبٌ له فيرثه، وقيل: معناه: أن يميته الله فيستغني عن المال، والله أعلم. انظر "مرقاة المفاتيح" لعلي القاري 4/ 1316، و"فيض القدير" للمناوي 6/ 66.
[2] ما بين معقوفين ليس في النسخ الخطية، وآخر كلام المصنف يدل عليه. (2326) من طرق عن بشير بن سلمان، به. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب. ووقع في رواية أحمد (4219): قال عبد الله بن أحمد: قال أبي - يعني في سيار أبي حمزة - وهو الصواب، وسيار أبو الحكم لم يحدث عن طارق بن شهاب بشيء.قوله: "بموتٍ آجل"، كذا في نسخنا الخطية، ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 196 في روايته عن المصنف: "بموت عاجل أو غنى عاجل"، وكذا في "سنن أبي داود"، ووقع في بعض الروايات: "بموت عاجل أو غنى آجل" ورجح الطِّيبي الأخير، وقال: هو أصح دراية، لقوله تعالى: {إِنْ يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}.وعلى كلٍّ فالمعنى: أن يموت قريبٌ له فيرثه، وقيل: معناه: أن يميته الله فيستغني عن المال، والله أعلم. انظر "مرقاة المفاتيح" لعلي القاري 4/ 1316، و"فيض القدير" للمناوي 6/ 66.
1498 - أخبرنا الحسن بن حَلِيم المروَزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا بَشِير بن سَلْمان، عن سَيّار، عن طارق، عن ابن مسعودٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أصابتْه فاقةٌ فأنزَلَها بالناس، لم تُسَدَّ فاقتُه، ومَن أنزَلَها بالله، أوْشَكَ الله له بالغِنَى؛ إما بموتٍ آجِلٍ، أو غِنًى عاجِلٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি অভাবগ্রস্ত হয় এবং সে তার অভাব মানুষের কাছে পেশ করে, তার অভাব মোচন হয় না। আর যে ব্যক্তি তার অভাব আল্লাহর কাছে পেশ করে, আল্লাহ অতি সত্বর তার জন্য সচ্ছলতার ব্যবস্থা করে দেন; হয়তো দেরীতে আগত মৃত্যুর মাধ্যমে, অথবা তাৎক্ষণিক সম্পদ লাভের মাধ্যমে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، سيَّار - وهو أبو حمزة - روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد وهم بعضهم فسماه: سيَّارًا أبا الحكم، قال الدارقطني في "العلل" (762): وقولهم: سيّار أبو الحكم وهمٌ، وإنما هو سيار أبو حمزة الكوفي، وسيّار أبو الحكم لم يسمع من طارق بن شهاب شيئًا، ولم يروِ عنه.أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك، وطارق: هو ابن شهاب.وأخرجه أبو داود (1645) عن عبد الملك بن حبيب أبي مروان، عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وفيه: سيار أبو حمزة، على الصواب.وأخرجه أحمد 6/ (3696) و (3869) و 7/ (4219)، وأبو داود (1645)، والترمذي (2326) من طرق عن بشير بن سلمان، به. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب. ووقع في رواية أحمد (4219): قال عبد الله بن أحمد: قال أبي - يعني في سيار أبي حمزة - وهو الصواب، وسيار أبو الحكم لم يحدث عن طارق بن شهاب بشيء.قوله: "بموتٍ آجل"، كذا في نسخنا الخطية، ووقع في "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 196 في روايته عن المصنف: "بموت عاجل أو غنى عاجل"، وكذا في "سنن أبي داود"، ووقع في بعض الروايات: "بموت عاجل أو غنى آجل" ورجح الطِّيبي الأخير، وقال: هو أصح دراية، لقوله تعالى: {إِنْ يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ}.وعلى كلٍّ فالمعنى: أن يموت قريبٌ له فيرثه، وقيل: معناه: أن يميته الله فيستغني عن المال، والله أعلم. انظر "مرقاة المفاتيح" لعلي القاري 4/ 1316، و"فيض القدير" للمناوي 6/ 66.
1499 - أخبرنا أحمد بن جعفرٍ القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عَبِيدة بن حُمَيد العَمِّي، حدثني أبو الزَّعْراء، عن أبي الأحوَص، عن أبيه مالك بن نَضْلةَ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الأَيدي ثلاثةٌ: فيَدُ الله العُليا، ويدُ المُعطِي التي تَليها، ويدُ السائل السُّفلى، فأعطِ الفَضْل ولا تَعجِزْ عن نفسِك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدُه الحديث المحفوظ المشهور عن عبد الله بن مسعود:
মালিক ইবনে নাদ্বলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হাত তিনটি। এর মধ্যে আল্লাহর হাত সর্বশ্রেষ্ঠ, এরপরের হাত হলো দানকারীর হাত এবং সবচেয়ে নিচের হাত হলো যাচনাকারীর হাত। সুতরাং, (তোমার অতিরিক্ত) সম্পদ দান করো এবং নিজের প্রয়োজন মেটাতে নিজেকে অক্ষম করো না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو الزعراء: هو عمرو بن عمرو - ويقال: ابن عامر - بن مالك، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك بن نضلة.وهو في "مسند أحمد" 25/ (15890) و 28/ (17232)، وعن أحمد أخرجه أبو داود (1649).وأخرجه ابن حبان (3362) من طريق الحسن بن محمد بن الصباح، عن عبيدة بن حميد، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث ابن مسعود الآتي بعده.وحديث عبد الله بن عمر عند البخاري (1429)، ومسلم (1033).قوله: "ولا تعجز عن نفسك" أي: لا تعجز عن رد نفسك إذا منعتك عن الإعطاء.
1500 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا حُمَيد بن عيّاش الرَّمْلي، حدثنا مؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا شعبة، عن إبراهيم بن مسلم الهَجَري، قال: سمعتُ أبا الأحوَص يحدِّث عن عبد الله بن مسعود: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الأَيدي ثلاثةٌ"؛ سَقَطَ عليَّ تمامُ الحديث [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “হাত তিন প্রকার।” হাদীসের পূর্ণাংশ আমার থেকে বাদ পড়ে গেছে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، مؤمل - وإن كان سيئ الحفظ - متابع، وإبراهيم بن مسلم الهجري لين الحديث، كان رفاعًا كما قال الإمام أحمد؛ يعني كان يرفع الموقوفات. قلنا: وقد اختلف عليه في رفعه ووقفه، فقد رواه عنه القاسم بن مالك عند أحمد 7/ (4261)، وعبد العزيز بن مسلم عند الشاشي (719)، وعلي بن عاصم عند البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 198، وفي "الشعب" (3231)، وإبراهيم بن طهمان عنده في "الشعب" (3230)، وفي "الأسماء والصفات" (700)، رووه عنه مرفوعًا، وخالفهم جعفر بن عون فرواه عنه موقوفًا من كلام ابن مسعود، ذكر ذلك البيهقي في "السنن".ورواه مرفوعًا أيضًا جرير بن عبد الحميد عن إبراهيم بن طهمان، فيما سيأتي بعد هذا الحديث.ورواه شعبة عن إبراهيم الهجري، واختلف عليه أيضًا في رفعه ووقفه، فرواه مؤمل بن إسماعيل هنا في هذا الحديث، ومحمد بن جعفر فيما سيأتي بعده، وعمرو بن حكام عند الشاشي (718)، ثلاثتهم عن شعبة مرفوعًا، وخالفهم أبو داود الطيالسي فرواه كما في "مسنده" (310) عن شعبة موقوفًا. وقال بإثره: غير شعبة يرفعه. قلنا: بل رفعه شعبة نفسه كما سبق.وانظر تالييه.ويشهد له حديث مالك بن نضلة السالف قبله، وإسناده صحيح.وانظر تتمة شواهده في "المسند" 7/ (4261).