আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1501 - وأخبرَناه أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد، حدثنا شعبة، عن إبراهيم الهَجَري، عن أبي الأحوَص، عن عبد الله قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "الأيدي ثلاثةٌ: يدُ الله العُلْيا، ويدُ المُعطِي التي تَلِيها، ويدُ السائل السُّفلى إلى يوم القيامة، فاستَعِفَّ عن السُّؤال ما استطعتَ" [1].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হাত তিনটি: আল্লাহর হাত সবার উপরে, এরপর দাতার হাত যা সেটির নিচে, আর যাঞ্ছনাকারীর হাত কিয়ামত পর্যন্ত নিচে থাকবে। সুতরাং, তুমি যতদূর সম্ভব যাঞ্চা করা থেকে বিরত থাকো।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره كسابقه. محمد: هو ابن جعفر الملقب بغُندَر.وأخرجه الطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" (71)، وابن خزيمة في "صحيحه" (2435)، وفي "التوحيد" 1/ 157، والبغوي (1618) من طريقين عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.
1502 - أخبرَنيهِ أبو عمرو إسماعيل بن نُجَيد، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يحيى بن المغيرة، حدثنا جَرِير، عن إبراهيم بن مسلم الهَجَري، فذكره بنحوه، وقال فيه: "فاستعِفُّوا عن السؤال ما استَطعتُم" [1].
ইব্রাহীম ইবনু মুসলিম আল-হাজারী থেকে বর্ণিত, তিনি এর অনুরূপ বর্ণনা করেন এবং এতে বলেন: "সুতরাং, তোমরা তোমাদের সামর্থ্য অনুযায়ী চাওয়া থেকে বিরত থাকো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره كسابقيه. جرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه ابن خزيمة في "الصحيح" (2435)، وفي "التوحيد" 1/ 156 - 157 عن يوسف بن موسى، عن جرير، بهذا الإسناد. بعض أصحابه: قد نزل في الذهب والفضة ما نزل، فلو أنا علمنا أيُّ المال خير اتخذناه، فقال: "أفضله لسانًا ذاكرًا، وقلبًا شاكرًا، وزوجةً مؤمنةً تُعينه على إيمانه"، وفي سنده انقطاع، وحسنه الترمذي (3094).وفي معنى قوله صلى الله عليه وسلم: "ألا أخبرك بخير … " حديث عبد الله بن عمرو عند مسلم (1467) بلفظ: "الدنيا متاع، وخير متاع الدنيا المرأة الصالحة".وحديث أبي هريرة عند النسائي (5324): "خير النساء التي تسره إذا نظر، وتطيعه إذا أمر … " الحديث.
1503 - أخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا علي بن عبد الله بن المَدِيني، حدثنا يحيى بن يَعلَى المُحارِبي، حدثنا أبي، حدثنا غَيْلان بن جامع، عن جعفر بن إياس، عن مجاهد، عن ابن عباسٍ، قال: لما نزلت هذه الآية: {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ} [التوبة: 34] كَبُر ذلك على المسلمين، فقال عمر: أنا أُفرِّجُ عنكم، فانطَلَقَ فقال: يا نبيَّ الله، إنه كَبُر على أصحابك هذه الآية، فقال: "إنَّ الله لم يَفرِضِ الزكاةَ إلَّا ليُطيِّبَ ما بقيَ من أموالكم، وإنَّما فَرَضَ المواريثَ - وذكر كلمة - لتكون لمن بَعدَكم" قال: فكبَّر عمر، ثم قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أُخبِرُكَ بخيرِ ما يُكنَزُ: المرأةُ الصَّالحة؛ إذا نَظَرَ إليها سَرَّتْه، وإذا أَمرَها أطاعَتْه، وإذا غاب عنها حَفِظَتْه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في صَفَر سنة ستٍّ وتسعين وثلاث مئة:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "আর যারা স্বর্ণ ও রৌপ্য জমা করে রাখে..." [সূরা আত-তাওবাহ: ৩৪], তখন মুসলমানদের কাছে তা খুবই কঠিন মনে হলো। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের পক্ষ থেকে এর সমাধান দেব। অতঃপর তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে) গেলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর নবী! আপনার সাহাবীদের কাছে এই আয়াতটি (এর মর্ম) কঠিন মনে হচ্ছে। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ যাকাতকে শুধুমাত্র এ জন্যই ফরজ করেছেন, যাতে তোমাদের অবশিষ্ট সম্পদ পবিত্র হয়। আর তিনি তো উত্তরাধিকার (মীরাস) ফরজ করেছেন — [এবং তিনি একটি শব্দ উল্লেখ করলেন]— যাতে তা তোমাদের পরবর্তী প্রজন্মের জন্য থাকে।" তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকবীর দিলেন (আল্লাহু আকবার বললেন)। এরপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে এমন শ্রেষ্ঠ গুপ্তধন সম্পর্কে জানাব না, যা সঞ্চয় করে রাখা যায়? তা হলো নেককার নারী; যখন স্বামী তার দিকে তাকায়, সে তাকে আনন্দিত করে, যখন সে তাকে আদেশ করে, সে তার আনুগত্য করে, এবং যখন স্বামী তার থেকে অনুপস্থিত থাকে, তখন সে তার (নিজের সম্মান, স্বামীর সম্পদ ও অধিকারের) হিফাজত করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ بين غيلان وجعفرٍ عثمان أبا اليقظان، كما سيأتي عند المصنف برقم (3320)، وهو ضعيف. يعلى المحاربي: هو ابن الحارث بن حرب.وأخرجه أبو داود (1664) عن عثمان بن أبي شيبة، عن يحيى بن يعلى، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 38/ (23101) من طريق شعبة، عن سلم بن عطية قال: سمعت عبد الله بن أبي الهذيل قال: حدثني صاحب لي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "تبًّا للذهب والفضة"، قال: فحدثني صاحبي: أنه انطلق مع عمر بن الخطاب فقال: يا رسول الله، قولك: "تبًّا للذهب والفضة" ماذا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لسانًا ذاكرًا، وقلبًا شاكرًا، وزوجةً تُعين على الآخرة". وسلم فيه لِين، ويتحسن لغيره.فإنه يشهد له بهذا اللفظ حديث ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عند أحمد 37/ (22392)، قال: لما أُنزلت {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ} قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، فقال بعض أصحابه: قد نزل في الذهب والفضة ما نزل، فلو أنا علمنا أيُّ المال خير اتخذناه، فقال: "أفضله لسانًا ذاكرًا، وقلبًا شاكرًا، وزوجةً مؤمنةً تُعينه على إيمانه"، وفي سنده انقطاع، وحسنه الترمذي (3094).وفي معنى قوله صلى الله عليه وسلم: "ألا أخبرك بخير … " حديث عبد الله بن عمرو عند مسلم (1467) بلفظ: "الدنيا متاع، وخير متاع الدنيا المرأة الصالحة".وحديث أبي هريرة عند النسائي (5324): "خير النساء التي تسره إذا نظر، وتطيعه إذا أمر … " الحديث.
1504 - أخبرني أبو الحسن أحمد بن محمد بن إسماعيل بن مِهْران الإسماعيلي، حدثنا أبي، حدثنا محمود بن خالد الدِّمشقي، حدثنا مروان بن محمد الدِّمشقي، حدثنا يزيد بن مسلم الخَوْلاني [1] - وكان شيخَ صدقٍ، وكان عبد الله بن وَهْبٍ يحدِّث عنه - حدثنا سَيَّار بن عبد الرحمن الصَّدَفي، عن عِكرِمة، عن ابن عباس قال: فَرَضَ رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاةَ الفِطر طُهرةً للصِّيام [2] من اللَّغو والرَّفَث، وطُعْمةً للمساكين، مَن أدّاها قبلَ الصلاة، فهي زكاةٌ مقبولة، ومن أدّاها بعد الصلاة، فهي صدقةٌ من الصَّدقات [3]. هذا حديثٌ صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাতুল ফিতর ফরয করেছেন—রোযাকে অনর্থক ও অশ্লীল কথা থেকে পবিত্র করার জন্য এবং মিসকীনদের খাদ্যের জন্য। যে ব্যক্তি তা (ফিতরা) ঈদের সালাতের পূর্বে আদায় করে, তা কবুলযোগ্য যাকাত। আর যে ব্যক্তি তা সালাতের পরে আদায় করে, তা সাধারণ সাদাকাসমূহের মধ্যে একটি সাদাকাহ।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقعت تسميته عند الحاكم رحمه الله، وهو خطأ، صوابه أبو يزيد الخولاني، أشار إلى ذلك البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 162 - 163، ثم قال: ذكره أبو أحمد الحافظ في "الكنى" ولم يعرف اسمه. عبد الله بن عبد الرحمن السمرقندي.وأخرجه ابن ماجه (1827) عن عبد الله بن أحمد بن بشير وأحمد بن الأزهر، عن مروان بن محمد، به. ووقعت تسمية الخولاني عندهما وفي سائر مصادر التخريج أبا يزيد الخولاني.اللغو: هو تكلُّم الإنسان بالمُطَّرَح من القول، وما لا يعني.والرفث، نقل ابن الأثير عن الأزهري قوله: هي كلمة جامعة لكل ما يريده الرجل من المرأة.
[2] في (ص) و (ع): للصائم، والمثبت من (ز) و (ب)، ويؤيده أنها كذلك في "سنن البيهقي" في روايته عن المصنِّف نفسه بهذا الإسناد. عبد الله بن عبد الرحمن السمرقندي.وأخرجه ابن ماجه (1827) عن عبد الله بن أحمد بن بشير وأحمد بن الأزهر، عن مروان بن محمد، به. ووقعت تسمية الخولاني عندهما وفي سائر مصادر التخريج أبا يزيد الخولاني.اللغو: هو تكلُّم الإنسان بالمُطَّرَح من القول، وما لا يعني.والرفث، نقل ابن الأثير عن الأزهري قوله: هي كلمة جامعة لكل ما يريده الرجل من المرأة.
1504 [3] - إسناده حسن، أبو يزيد الخولاني وشيخه سيار بن عبد الرحمن صدوقان. وقال الدارقطني في "سننه" بعد أن رواه (2067): ليس في رواته مجروح.وأخرجه أبو داود (1609) عن محمود بن خالد الدمشقي، بهذا الإسناد. وقرن بمحمود بن خالد: عبد الله بن عبد الرحمن السمرقندي.وأخرجه ابن ماجه (1827) عن عبد الله بن أحمد بن بشير وأحمد بن الأزهر، عن مروان بن محمد، به. ووقعت تسمية الخولاني عندهما وفي سائر مصادر التخريج أبا يزيد الخولاني.اللغو: هو تكلُّم الإنسان بالمُطَّرَح من القول، وما لا يعني.والرفث، نقل ابن الأثير عن الأزهري قوله: هي كلمة جامعة لكل ما يريده الرجل من المرأة.
1505 - أخبرنا بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيْرفي، حدثنا عبد الصمد بن الفضل البَلْخي، حدثنا مَكِّي بن إبراهيم، حدثنا عبد العزيز بن أبي رَوَّاد، عن نافع، عن ابن عمر قال: كان الناسُ يُخرِجون صدقةَ الفِطْر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم صاعًا من شَعير، أو صاعًا من تمر، أو سُلْتٍ، أو زَبيب [1].هذا حديث [2] صحيحٌ، عبد العزيز بن أبي رَوَّاد ثقةٌ عابد، واسم أبي رَوّاد: أيمن، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে মানুষ সাদাকাতুল ফিতর বাবদ এক সা’ যব, অথবা এক সা’ খেজুর, অথবা সুল্ত (এক প্রকার খাদ্যশস্য), অথবা কিশমিশ বের করত।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، إلّا أنَّ أن ذِكْر السلت والزبيب في هذه الرواية وهمٌ، فقد تفرد عبد العزيز بن أبي رواد بذكرهما دون أصحاب نافع، كما نبه على ذلك مسلم في "التمييز" (92)، وابن عبد البر في "التمهيد" 14/ 317 - 318. لكن تابع عبدَ العزيز بنَ أبي روّاد موسى بنُ عقبة عند ابن خزيمة (2416) على ذكر السلت دون الزبيب.وأخرجه أبو داود (1614)، والنسائي (2307) من طريق حسين بن علي الجعفي، عن زائدة بن قدامة، عن عبد العزيز بن أبي روّاد، بهذا الإسناد. زاد أبو داود في آخره: قال عبد الله: فلما كان عمر وكثرت الحنطة جعل عمر نصف صاع حنطة مكان صاع من تلك الأشياء.قال ابن عبد البر في "التمهيد" معقبًا على هذه الزيادة: وابن عيينة يقول: فلما كان معاوية، وقول ابن عيينة عندي أولى، والله أعلم، لأنه أحفظ وأثبت من ابن أبي رواد.وانظر ما بعده.
[2] لفظ "حديث" من (ع) وحدها.
1506 - حدثنا علي بن عيسى الحِيْريّ، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب وعبد الله بن محمد، قالا: حدثنا محمد بن عبد الأعلى، حدثنا المُعتمِر بن سليمان، عن أبيه، عن نافع، عن ابن عمر، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول حين فَرَضَ صدقة الفِطر: "صاعًا من تمرٍ، أو صاعًا من شَعِير"، وكان لا يُخرج إلَّا التَّمر [1].هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين ولم يُخرجا فيه: إلَّا التّمر.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফিতরের সাদকা (ফিতরা) ফরয করার সময় বলতে শুনেছি: "এক সা’ খেজুর অথবা এক সা’ যব।" আর তিনি (ইবনু উমর) শুধুমাত্র খেজুরই বের করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. عبد الله بن محمد: هو ابن عبد الرحمن بن شيرويه، ومحمد بن عبد الأعلى: هو الصنعاني، وسليمان والد المعتمر: هو ابن طرخان التيمي.وأخرجه ابن خزيمة (2392) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، بهذا الإسناد.وأخرج نحوه بزيادة ونقصان أحمد 10/ (5942)، والبخاري (1503) و (1504) و (1507)، ومسلم (984)، وأبو داود (1611) و (1612)، وابن ماجه (1825) و (1826)، والنسائي (2291 - 2295)، وابن حبان (3300 - 3304) من طرق عن نافع، به.وانظر تمام تخريجه وتفصيل طرقه في التعليق على "المسند" 8/ (4486).وسيأتي من طريق عبيد الله بن عمر عن نافع برقم (1511)، ومن طريق كثير بن فرقد عن نافع برقم (1508)، ويأتي تخريجهما هناك. عنهما البخاري فقال: حديث سلمة بن كهيل أشبه عندي، إلّا أنَّ هذا خلاف ما يروى عن النبي صلى الله عليه وسلم في زكاة الفطر، قال ابن عمر: فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر.
1507 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدثنا جعفر بن محمد الثَّعْلبي، حدثنا وكيع، حدثنا سفيان، عن سَلَمةَ بن كُهَيل، عن القاسم بن مُخَيمِرة، عن أبي عمَّار الهَمْداني، عن قيس بن سعدٍ قال: أَمَرَنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بصَدَقةِ الفطر قبل أن تنزلَ الزكاة، فلمّا نزلت الزكاةُ لم يأمرنا ولم يَنْهَنا، ونحن نفعلُه [1]. هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
কায়স ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে যাকাত অবতীর্ণ হওয়ার পূর্বে সাদাকাতুল ফিতর আদায়ের নির্দেশ দিয়েছিলেন। অতঃপর যখন যাকাত অবতীর্ণ হলো, তখন তিনি আমাদেরকে এর (আদায়ের) নির্দেশও দেননি এবং নিষেধও করেননি। আর আমরা তা করে চলেছি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، إلّا أنَّ البخاري أعله بأنه خلاف ما يروى عن النبي صلى الله عليه وسلم من فرضية زكاة الفطر، كما سيأتي. سفيان: هو الثوري، وأبو عمار الهمداني: اسمه عريب بن حميد، وقيس بن سعد: هو ابن عبادة الأنصاري الخزرجي رضي الله عنه.وأخرجه أحمد 39/ (23843)، والنسائي (2298) من طريق وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23840)، وابن ماجه (1828) من طريقين عن سفيان الثوري، به.وأخرج النسائي (2297) و (2855) من طريق الحكم بن عتيبة، عن القاسم بن مخيمرة، عن عمرو بن شرحبيل - وكنيته أبو ميسرة - عن قيس بن سعد بن عبادة قال: كنا نصوم عاشوراء، ونؤدي صدقة الفطر، فلما نزل رمضان ونزلت الزكاة، لم نؤمر به ولم نُنْهَ عنه، وكنا نفعله.وأورد الترمذي في "العلل الكبير" (205) حديثي سلمة بن كهيل والحكم بن عتيبة، وسأل عنهما البخاري فقال: حديث سلمة بن كهيل أشبه عندي، إلّا أنَّ هذا خلاف ما يروى عن النبي صلى الله عليه وسلم في زكاة الفطر، قال ابن عمر: فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر.
1508 - أخبرنا جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي، حدثنا أحمد بن محمد بن الحجاج بن رِشْدين الفِهْري [1] بمصر، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، عن كَثِير بن فَرْقَد، عن نافع، عن ابن عمر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "زكاةُ الفِطْر فرضٌ على كلِّ مسلم حرٍّ وعبدٍ، ذكرٍ وأنثى من المسلمين، صاعٌ من تمرٍ أو صاعٌ من شعيرٍ" [2]. هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وإنما جعلتُه بإزاء حديث أبي عمّار، فإنه على الاستحباب، وهذا على الوجوب.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ফিতরের যাকাত প্রত্যেক মুসলমানের—স্বাধীন ও দাস, মুসলিম পুরুষ ও নারীর উপর ফরয; এক সা' খেজুর অথবা এক সা' যব (শস্য)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقعت نسبته هنا في النسخ الخطية، وكذا في "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 162 حيث روى هذا الحديث عن المصنف، فالظاهر أنه تحريف قديم، فقد وقعت نسبته في مصادر ترجمته وغيرها من كتب التخريج: المَهري، وقد أورده السمعاني في "الأنساب" 12/ 499 في المهري، وكذا ابن الأثير في "اللباب" 3/ 275 وقال: بفتح الميم وسكون الهاء وفي آخرها الراء، نسبة إلى مهرة بن حيدان بن عمرو بن الحاف بن قضاعة، قبيلة كبيرة ينسب إليها أبو الحجاج رشدين بن سعد المهري من أهل مصر.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين، وقد توبع. الليث: هو ابن سعد.وأخرجه البيهقي 4/ 162 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (2074) عن محمد بن إسماعيل الفارسي، عن ابن رشدين، به.وأخرجه الدارقطني (2074) من طريق أبي علاثة محمد بن عمرو بن خالد، والبيهقي 4/ 162 من طريق عبيد بن عبد الواحد بن شريك، كلاهما عن يحيى بن بكير، به. وأبو علاثة وعبيد لا بأس بهما.وأخرج البخاري (1507)، ومسلم (984) (15)، وابن ماجه (1825)، والنسائي (11658)، وابن حبان (3300) من طرق عن الليث بن سعد، عن نافع، أنَّ عبد الله بن عمر قال: أمر النبي صلى الله عليه وسلم بزكاة الفطر صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير، قال عبد الله رضي الله عنه: فجعل الناس عَدْلَه مدَّين من حنطة. لم يذكروا فيه كثير بن فرقد.وانظر ما سلف برقم (1506)، وما سيأتي برقم (1511).
1509 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن علي الوَرَّاق - ولقبه حَمْدان - حدثنا داودُ بن شَبِيب، حدثنا يحيى بن عبَّاد - وكان من خيار الناس - حدثنا ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أَمَر صارخًا ببطن مكةَ ينادي: "إنَّ صدقةَ الفِطْر حقٌّ واجبٌ على كلِّ مسلمٍ صغيرٍ أو كبيرٍ، ذكرٍ أو أنثى، حُرٍّ أو مملوك، حاضرٍ أو بادٍ، صاعٌ من شعيرٍ أو تمرٍ" [1]. هذا حديثٌ صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه الألفاظ [2].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কার মধ্যভাগে একজন আহ্বানকারীকে নির্দেশ দিলেন যেন সে ঘোষণা করে: "নিশ্চয়ই সাদাকাতুল ফিতর প্রত্যেক মুসলমানের উপর এক অনিবার্য হক (বাধ্যতামূলক অধিকার), সে ছোট হোক বা বড়, পুরুষ হোক বা নারী, স্বাধীন হোক বা গোলাম, স্থায়ী বাসিন্দা হোক বা মুসাফির (মরুচারী)—এক সা' যব অথবা খেজুর।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد ضعيف، يحيى بن عباد - وهو السعدي - ليَّنه الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (659)، وقد خولف يحيى في إسناده كما سيأتي. ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه البيهقي 4/ 172 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (2084) عن ابن مخلد، عن حمدان، به.وأخرجه بهذه الزيادة البزار (5187)، والعقيلي في "الضعفاء" (1983)، والدارقطني (2084) من طرق عن داود بن شبيب، به. قال البزار: وقد روي أكثر كلام هذا الحديث من غير وجه إلّا "حاضر أو باد" فإنَّ هذا اللفظ لا يروى عن النبي صلى الله عليه وسلم إلّا من هذا الوجه.وخالف يحيى بنَ عباد فيه علي بن صالح أبو الحسن المكي، وهو أحسن حالًا منه، فرواه عند العقيلي في "الضعفاء" (1984)، والدارقطني (2083)، والبيهقي 4/ 173 عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو بن العاص. ورواية ابن جريج عن عمرو بن شعيب منقطعة، فإنه لم يسمع منه فيما قاله البخاري.ورواه عن ابن جريج أيضًا عبدُ الرزاق عند العقيلي بإثر (1983)، والدارقطني (2081)، وعبدُ الوهاب بن عطاء الخفاف عند الدارقطني (2082)، كلاهما عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا. قال العقيلي: وحديث عبد الرزاق أَولى.وأخرج أحمد 5/ (3291)، وأبو داود (1622)، والنسائي (1815) و (2299) و (2306) من طريق حميد الطويل، عن الحسن البصري قال: خطب ابن عباس وهو أمير البصرة في آخر الشهر فقال: أخرجوا زكاة صوكم، فنظر الناس بعضهم إلى بعض، فقال: مَن ها هنا من أهل المدينة؟ قوموا فعلموا إخوانكم، فإنهم لا يعلمون أنَّ هذه الزكاة فرضها رسول الله صلى الله عليه وسلم على كل ذكر وأنثى … فذكر نحوه دون قوله: "حاضر أو باد". وهذا إسناد -على ثقة رجاله - منقطع، فإنَّ الحسن البصري لم يسمع من ابن عباس، كما قال غير واحد من أهل العلم.وأخرج الدارقطني (2087) من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن عبد الحميد بن عمران، عن ابن أبي أنس، عن أبيه، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن ابن عباس، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه أمر بزكاة الفطر، صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير، أو مدَّين من قمح، على كل حاضر وبادٍ، صغير وكبير، حر وعبد. وهذا إسناد ضعيف جدًّا، فيه الواقدي وهو متروك.وأخرج الدارقطني (2119) من طريق سلَّام الطويل، عن زيد العمي، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صدقة الفطر على كل صغير وكبير، ذكر وأنثى، يهودي أو نصراني، حر أو مملوك، نصف صاع من بر، أو صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير". وقال الدارقطني بإثره: سلَّام الطويل متروك الحديث، ولم يسنده غيره.وروى الحديث هشام بن حسان عن محمد بن سيرين عن ابن عباس، واختلف عليه فيه في رفعه ووقفه، فقد أخرج الدارقطني (2091) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن ابن عباس قال: أُمرنا أن نعطي صدقة رمضان عن الصغير والكبير والحر والمملوك، صاعًا من طعام، من أدّى بُرًّا قُبل منه، ومن أدى شعيرًا قبل منه، ومن أدى زبيبًا قبل منه، ومن أدى سُلتًا قبل منه. قال: وأحسبه قال: ومن أدى دقيقًا قبل منه، ومن أدى سَويقًا قبل منه.وخالفه مخلد بن الحسين الأزدي، فرواه عن هشام، عن ابن سيرين، عن ابن عباس، موقوفًا قال: ذكر في صدقة الفطر فقال: صاع من بر، أو صاع من تمر، أو صاع من شعير، أو صاع من سلت. أخرجه النسائي (2300). وعلى كلٍّ فرواية محمد بن سيرين عن ابن عباس منقطعة، كما قال علي بن المديني في "العلل" له ص 60، ونقل هناك عن شعبة قوله: أحاديث محمد بن سيرين عن ابن عباس إنما سمعها محمد عن عكرمة، لقيه أيام المختار.وقد صحَّ موقوفًا من وجه آخر عن ابن عباس، أخرجه النسائي (2301) عن قتيبة بن سعيد، عن حماد بن زيد، عن أيوب السختياني، عن أبي رجاء العطاردي، قال: سمعت ابن عباس يخطب على منبركم - يعني منبر البصر - يقول: صدقة الفطر صاع من طعام.
[2] تعقب الذهبي المصنفَ في تصحيحه فقال: بل خبر منكر جدًّا، قال العقيلي: يحيى بن عباد عن ابن جريج حديثه يدل على الكذب، وقال الدارقطني: ضعيف. قلنا: لا يبلغ يحيى في الضعف هذه المرتبة التي أنزله إياها العقيلي، فإن الأحاديث التي ساقها له وتكلم عليه من أجلها إنما الحطُّ فيها على من دون يحيى، وأما هو فأعدل الأقوال فيه أنه ليِّن كما قال الحافظ ابن حجر، والله أعلم.
1510 - حدثني محمد بن يعقوب بن إسحاق القاضي، حدثني أبي، حدثنا أبو يوسف يعقوب بن إسحاق القُلُوسي، حدثنا بكر بن الأسود، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، عن سفيان بن الحسين، عن الزُّهْري، عن سعيد بن المسيّب، عن أبي هريرة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم حَضَّ على صَدَقةِ رمضان، على كلِّ إنسانٍ صاعًا من تمرٍ، أو صاعًا من شَعيرٍ، أو صاعًا من قمح [1].هذا حديث صحيح.وله شاهدٌ صحيح:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের সদাকাহর প্রতি উদ্বুদ্ধ করেছেন (এবং নির্ধারণ করেছেন) প্রত্যেক ব্যক্তির উপর এক সা' খেজুর, অথবা এক সা' যব, অথবা এক সা' গম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "أو صاعًا من قمح"، وهذا إسناد ضعيف؛ سفيان بن الحسين على ثقته فإن الأكثر على تضعيفه في الزهري، وبكر بن الأسود قال الدارقطني: ليس بالقوي، وقال أبو حاتم: صدوق، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك": بكر ليس بحجة.وقد اختلف في وصله وإرساله، ورجح الدارقطني المرسل، وذكر أنَّ بكر بن الأسود قد وهم في لفظه أيضًا فقال: "صاعًا من قمح"، وخالفه غيره فقال: "على كل نفس مدّان من قمح". قال الدارقطني: وهو المحفوظ عن الزهري. انظر "العلل" له (1665).وأخرجه الدارقطني في "السنن" (2090) عن الحسين بن إسماعيل ومحمد بن مخلد، عن أبي يوسف يعقوب بن إسحاق القلوسي، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 13/ (7724) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، عن الأعرج، عن أبي هريرة في زكاة الفطر: على كل حر وعبد، ذكر أو أنثى، صغير أو كبير، فقير أو غني، صاع من تمر، أو نصف صاع من قمح. ذكره هكذا موقوفًا، وفيه نصف صاع من قمح. ثم قال معمر بإثره: وبلغني أن الزهري كان يرويه إلى النبي صلى الله عليه وسلم. قلنا: يعني مرفوعًا، ولكنَّ رفْعَهُ ضعيف لأنه بلاغ، والله أعلم.ويشهد لبعضه ما صح من أحاديث هذا الباب.
1511 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا محمد بن عبد الله بن سليمان بنُ الحَضرَمي، حدثنا زكريا بن يحيى بن صَبِيح. وأخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أحمد بن الخَزّاز [1]، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم التَّرْجُماني [2]؛ قالا: حدثنا سعيد بن عبد الرحمن الجُمَحي، حدثنا عُبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فَرَضَ زكاةَ الفِطر صاعًا من تمرٍ، أو صاعًا من بُرٍّ، على كلِّ حرٍّ أو عبدٍ، ذكرٍ أو أنثى، من المسلمين [3].
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের মধ্য থেকে প্রত্যেক স্বাধীন ও গোলাম, পুরুষ ও নারীর ওপর ফিতরের যাকাত হিসেবে এক সা' খেজুর অথবা এক সা' গম ফরয করেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] هو أحمد بن علي الخزاز، كما في "سنن البيهقي" 4/ 166.
[2] في النسخ الخطية: الترجمان، والمثبت من سائر مصادر ترجمته، وهو إسماعيل بن إبراهيم بن بسام البغدادي، أبو إبراهيم التَّرجُماني، من أبناء خراسان.
1511 [3] - صحيح دون قوله: "صاعًا من بُر"، وإسماعيل بن إبراهيم الترجماني قال ابن معين والنسائي وغيرهما: لا بأس به، وقال أبو حاتم: شيخ، ووثقه ابن قانع وابن حبان، وقد خالفه سليمان بن داود الهاشمي - وهو ثقة جليل - فرواه عن سعيد بن عبد الرحمن الجمحي ولم يذكر البر، وسعيد الجمحي هذا مختلف فيه؛ وثقه بعضهم، ولينه آخرون، وقال بعضهم: ليس به بأس. قلنا: وقد رواه غيره عن عبيد الله بن عمر في "الصحيحين" وغيرهما، لم يذكر البر، ولم يذكر فيه: "من المسلمين"، كما سيأتي.وأخرجه البيهقي 4/ 166 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: وذكر البر فيه ليس بمحفوظ.وأخرجه أحمد 9/ (5339) و 10/ (6214) عن سليمان بن داود الهاشمي، عن سعيد بن عبد الرحمن الجمحي، به. وذكر فيه: "صاعًا من شعير" بدلًا من البر.وأخرج أحمد 9/ (5174)، والبخاري (1512)، ومسلم (984) (13)، وأبو داود (1613)، والنسائي (2296) من ست طرق عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال: فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم صدقة الفطر صاعًا من شعير، أو صاعًا من تمر، على الصغير والكبير والحر والمملوك. فذكروا جميعًا الشعير بدلًا من البر، ولم يذكر أحد منهم زيادة: "من المسلمين".قال أبو داود: رواه سعيد الجمحي عن عبيد الله عن نافع، قال فيه: من المسلمين، والمشهور عن عبيد الله ليس فيه: من المسلمين.وانظر ما سلف برقم (1508).
1512 - حدثنا أحمد بن إسحاق بن إبراهيم الصَّيدلانيُّ العدلُ إملاءً، حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدثنا أبو عبد الله أحمد بن حنبل، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيّة، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن عبد الله بن عَدِيّ [1] بن حَكِيم بن حِزَام، عن عِياض بن عبد الله بن سعد بن أبي سَرْح قال: قال أبو سعيد - وذُكِر عنده صدقةُ الفطر فقال -: لا أُخرجُ إلَّا ما كنت أُخرجُه على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم: صاعًا من تمرٍ، أو صاعًا من حِنطةٍ، أو صاعًا من شعيرٍ، أو صاعًا من أَقِطٍ. فقال له رجلٌ من القوم: أو مُدَّين من قمح؟ فقال: لا، تلك قيمةُ معاوية، لا أَقبلُها ولا أعملُ بها [2]. هذه الأسانيدُ التي قدَّمتُ ذِكرَها في ذكر صاع البُرِّ كلُّها صحيحة [3]، وأشهرها حديث أبي مَعْشَر عن نافع عن ابن عمر الذي عَلَونا فيه [4]، لكني تركتُه إذ ليس من شرط الكتاب.وقد روي عن علي بن أبي طالب:
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর কাছে সাদাকাতুল ফিতর সম্পর্কে আলোচনা করা হলো, তিনি বললেন: আমি শুধু তাই বের করব, যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে বের করতাম: এক সা‘ খেজুর, অথবা এক সা‘ গম, অথবা এক সা‘ যব, অথবা এক সা‘ পনির (আকিত্ব)। তখন কওমের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি তাঁকে বলল: অথবা দুই মুদ্দ গম? তিনি বললেন: না, এটা মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মূল্য (নির্ধারণ), আমি তা গ্রহণ করি না এবং এর উপর আমলও করি না। সাঁ (সা') পরিমাণ গম (বুর্র)-এর উল্লেখ প্রসঙ্গে আমি পূর্বে যে সনদগুলি পেশ করেছি, তার সবগুলিই সহীহ। আর এর মধ্যে সবচেয়ে প্রসিদ্ধ হলো আবূ মা'শার থেকে বর্ণিত নাফি‘ সূত্রে ইবনু উমারের হাদীসটি, যা আমরা উচ্চ সনদসহ বর্ণনা করেছি, কিন্তু আমি সেটি ছেড়ে দিয়েছি কারণ এটি কিতাবের শর্তে (অন্তর্ভুক্ত) নয়। আর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে:
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] هكذا وقع في النسخ الخطية التي بين أيدينا، وهو خطأ قديم، نبه إلى ذلك ابن عبد الهادي في "التنقيح" 3/ 111، والصواب في اسمه: عبد الله بن عبد الله بن عثمان بن حكيم بن حزام، كما في جميع مصادر ترجمته ومصادر التخريج. تمر، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من أقط، لا نخرج غيره.وأخرجه بنحوه دون ذكر الحنطة أحمد 17/ (11182) و 18/ (11932) و (11933)، ومسلم (985) (18)، وأبو داود (1616)، وابن ماجه (1829)، والنسائي (2304) و (2308)، وابن حبان (3305) من طريق داود بن قيس، وأحمد 18/ (11698)، والبخاري (1505) و (1506) و (1508) و (1510)، ومسلم (985) (17)، والترمذي (673)، والنسائي (2303) من طريق زيد بن أسلم، ومسلم (985) (19) من طريق إسماعيل بن أمية، ومسلم (985) (20)، والنسائي (2302) من طريق الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذباب، أربعتهم عن عياض بن عبد الله، به. وبعضهم يزيد فيه على بعض، وبعضهم ذكر قصة معاوية وبعضهم لم يذكرها.ورواه أيضًا محمد بن عجلان عن عياض بن عبد الله، واختلف عليه فيه، فقد رواه عن ابن عجلان حاتمُ بنُ إسماعيل عند مسلم (985) (21)، ويحيى القطان عند أبي داود (1618)، وابن حبان (3307)، كرواية الآخرين لم يذكرا فيه الحنطة.ورواه سفيان بن عيينة عن ابن عجلان عند أبي داود (1618)، والنسائي (2305)، فشكَّ فيه سفيان، فقال: دقيق أو سلت، قال النسائي: لا أعلم أحدًا قال في هذا الحديث دقيقًا غير ابن عيينة. وذكر أبو داود عن حامد بن يحيى قال في قول سفيان: "أو دقيق" فأنكروا عليه، فتركه. ثم قال أبو داود: فهذه الزيادة وهم من ابن عيينة.
[2] حديث صحيح دون ذكر الصاع من حنطة، فذِكرُه هنا وهمٌ أو خطأ، كما قال أبو داود وابن خزيمة وغيرهما، وهذا إسناد حسن، عبد الله بن عبد الله بن عثمان بن حكيم روى عن جمعٌ، وأخرج حديثه هذا أبو داود والنسائي، ومحمد بن إسحاق صرَّح بالتحديث عند ابن حبان، فانتفت شبهة تدليسه.وأخرجه ابن حبان (3306) من طريق يعقوب بن إبراهيم الدورقي، عن إسماعيل ابن علية، بهذا الإسناد. مثل رواية الحاكم هذه سواء، وذكر فيها: أو صاع حنطة.وأخرجه أبو داود (1617) عن مسدد، عن إسماعيل ابن علية، به، ليس فيه ذكر الحنطة. وقال في ذكر الحنطة: ليس بمحفوظ.وقال ابن خزيمة بإثر الحديث (2419) بعد أن رواه من طريق يعقوب بن إبراهيم عن ابن علية: ذكر الحنطة في خبر أبي سعيد، ولا أدري ممن الوهم، قوله: وقال رجل من القوم: أو مدَّين من قمح؟ إلى آخر الخبر، دالٌّ على أنَّ ذكر الحنطة في أول القصة خطأ أو وهمٌ، إذ لو كان أبو سعيد قد أعلمهم أنهم كانوا يخرجون على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم صاع حنطة لما كان لقول الرجل: "أو مدين من قمح" معنًى. قلنا: ويغلب على ظننا أنَّ الوهم فيه من محمد بن إسحاق، كما ذهب إلى ذلك ابن التركماني، فقد قال في "الجوهر النقي" 4/ 166: قد تفرد ابن إسحاق بذكر الحنطة في هذا الحديث، والحفاظ يتوقَّون ما ينفرد به.وأخرج النسائي (2309) من طريق يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الله بن عبد الله بن عثمان، أنَّ عياض بن عبد الله حدثه، أنَّ أبا سعيد الخدري قال: كنا نخرج على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من أقط، لا نخرج غيره.وأخرجه بنحوه دون ذكر الحنطة أحمد 17/ (11182) و 18/ (11932) و (11933)، ومسلم (985) (18)، وأبو داود (1616)، وابن ماجه (1829)، والنسائي (2304) و (2308)، وابن حبان (3305) من طريق داود بن قيس، وأحمد 18/ (11698)، والبخاري (1505) و (1506) و (1508) و (1510)، ومسلم (985) (17)، والترمذي (673)، والنسائي (2303) من طريق زيد بن أسلم، ومسلم (985) (19) من طريق إسماعيل بن أمية، ومسلم (985) (20)، والنسائي (2302) من طريق الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذباب، أربعتهم عن عياض بن عبد الله، به. وبعضهم يزيد فيه على بعض، وبعضهم ذكر قصة معاوية وبعضهم لم يذكرها.ورواه أيضًا محمد بن عجلان عن عياض بن عبد الله، واختلف عليه فيه، فقد رواه عن ابن عجلان حاتمُ بنُ إسماعيل عند مسلم (985) (21)، ويحيى القطان عند أبي داود (1618)، وابن حبان (3307)، كرواية الآخرين لم يذكرا فيه الحنطة.ورواه سفيان بن عيينة عن ابن عجلان عند أبي داود (1618)، والنسائي (2305)، فشكَّ فيه سفيان، فقال: دقيق أو سلت، قال النسائي: لا أعلم أحدًا قال في هذا الحديث دقيقًا غير ابن عيينة. وذكر أبو داود عن حامد بن يحيى قال في قول سفيان: "أو دقيق" فأنكروا عليه، فتركه. ثم قال أبو داود: فهذه الزيادة وهم من ابن عيينة.
1512 [3] - نقل الحافظ ابن حجر في "الفتح" 5/ 227 - 228 عن ابن المنذر قوله: لا نعلم في القمح خبرًا ثابتًا عن النبي صلى الله عليه وسلم يُعتمد عليه، ولم يكن البُرُّ بالمدينة ذلك الوقت إلّا الشيء اليسير منه، فلما كثر في زمن الصحابة رأوا أنَّ نصف صاع منه يقوم مقام صاع من شعير، وهم الأئمة، فغير جائز أن يُعدَل عن قولهم إلّا إلى قول مثلهم. ثم أسند عن عثمان وعلي وأبي هريرة وجابر وابن عباس وابن الزبير وأمه أسماء بنت أبي بكر بأسانيد صحيحة: أنهم رأوا أنَّ في زكاة الفطر نصف صاع من قمح. هذا اليوم". وقال الحاكم بإثره: هذا حديث رواه جماعة من أئمة الحديث عن نافع، فلم يذكروا صاع القمح فيه، إلّا حديث عن سعيد بن عبد الرحمن الجمحي يتفرد به عن عبيد الله بن عمر عن نافع. قلنا: والراوي عن أبي معشر، وهو نصر بن حماد بن عجلان الوراق، ضعيف، قال أبو زرعة: لا يكتب حديثه، وقال الذهبي: حافظ متهم.وقد روي نحوه من وجهين آخرين عن أبي معشر ليس فيهما ذكر الصاع من حنطة، فقد أخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (2362) عن أبي نعيم الفضل بن دكين - وهو ثقة ثبت - عن أبي معشر عن نافع عن ابن عمر قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر صاعًا من شعير أو صاعًا من تمر، فجعل الناس عدل الشعير مدين من حنطة.وأخرج نحوه البيهقي 4/ 175 من طريق أبي الربيع الزهراني - وهو ثقة أيضًا - عن أبي معشر، به، لم يذكر فيه صاع الحنطة.
1512 [4] - أبو معشر - واسمه: نجيح بن عبد الرحمن السندي - ضعيف، وحديثه هذا أخرجه المصنف في "معرفة علوم الحديث" ص 131 من طريق نصر بن حماد، عن أبي معشر، عن نافع، عن ابن عمر قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نخرج صدقة الفطر عن كل صغير وكبير، حرٍّ أو عبدٍ، صاعًا من تمر، أو صاعًا من زبيب، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من قمح، وكان يأمرنا أن نخرجها قبل الصلاة، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقسمها قبل أن ننصرف من المصلى، ويقول: "أغنوهم عن طواف هذا اليوم". وقال الحاكم بإثره: هذا حديث رواه جماعة من أئمة الحديث عن نافع، فلم يذكروا صاع القمح فيه، إلّا حديث عن سعيد بن عبد الرحمن الجمحي يتفرد به عن عبيد الله بن عمر عن نافع. قلنا: والراوي عن أبي معشر، وهو نصر بن حماد بن عجلان الوراق، ضعيف، قال أبو زرعة: لا يكتب حديثه، وقال الذهبي: حافظ متهم.وقد روي نحوه من وجهين آخرين عن أبي معشر ليس فيهما ذكر الصاع من حنطة، فقد أخرجه ابن زنجويه في "الأموال" (2362) عن أبي نعيم الفضل بن دكين - وهو ثقة ثبت - عن أبي معشر عن نافع عن ابن عمر قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم زكاة الفطر صاعًا من شعير أو صاعًا من تمر، فجعل الناس عدل الشعير مدين من حنطة.وأخرج نحوه البيهقي 4/ 175 من طريق أبي الربيع الزهراني - وهو ثقة أيضًا - عن أبي معشر، به، لم يذكر فيه صاع الحنطة.
1513 - حدَّثَناه أبو الفضل محمد بن إبراهيم المُزكِّي، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا الحسن بن الصَّبّاح، حدثنا أبو بكر بن عيَّاش، عن أبي إسحاق الهَمْداني، عن الحارث، عن عليِّ بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه قال في صدقة الفِطر: "عن كلِّ صغيرٍ وكبيرٍ، حُرٍّ أو عبدٍ، صاعٌ من بُرٍّ، أو صاعٌ من تمر" [1]. هكذا أسنَدَه عن علي، ووَقَفه غيره:
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাদাকাতুল ফিতর সম্পর্কে বলেছেন: “প্রত্যেক ছোট ও বড়, স্বাধীন অথবা গোলামের পক্ষ থেকে এক সা' গম অথবা এক সা' খেজুর (দিতে হবে)।” [১] এভাবে তিনি এটিকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্র থেকে সনদ করেছেন (নবী পর্যন্ত উঠিয়েছেন), আর অন্যরা এটিকে মাওকূফ (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) করেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا دون قوله: "صاع من بُرٍّ"، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث، وهو ابن عبد الله الأعور الهمداني، وقد اختلف في رفعه ووقفه، وصحَّح الدارقطني والبيهقي وقفه، وروي من غير وجه عن عليٍّ موقوفًا وفيه: نصف صاع من بر، كما سيأتي في التخريج. أبو إسحاق الهمداني: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وأبو بكر بن عياش ثقة إلّا أنه لما كبر ساء حفظه، كما قال الحافظ ابن حجر، وقال أبو حاتم: هو وشريك في الحفظ سواء.وأخرجه الدارقطني (2113) عن محمد بن عبد الله بن غيلان، عن الحسن بن الصباح، بهذا الإسناد. وذكره مرفوعًا، لكن وقع فيه: "نصف صاع من بر". وقال بإثره: كذا حدثناه مرفوعًا. يعني محمد بن عبد الله بن غيلان، وقال في "العلل" (343): وَهِمَ في رفعه. وتعقبه الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 11/ 314 بقوله: فالظاهر أنَّ الوهم فيه من أبي بكر بن عياش.ثم أخرجه الدارقطني بإثره برقم (2114) عن عبد الله بن أحمد المارستاني، عن الحسن بن الصباح البزار، به. موقوفًا، وقال بإثره: وهو الصواب.وأخرج الدارقطني (2068) من طريق علي بن عمر بن علي بن الحسين، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن أبيه، عن علي مرفوعًا: "هي على كل مسلم صغير أو كبير، حر أو عبد، صاعًا من تمر أو شعير أو أقط". قال ابن دقيق العيد في "الإمام" كما في "نصب الراية" للزيلعي 2/ 411: وفي إسناده بعض من يحتاج إلى معرفة حاله.وأخرج البيهقي 4/ 161 من طريق حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين، عن أبيه أبي جعفر الباقر، عن علي بن أبي طالب: فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم على كل صغير أو كبير .. فذكره مرفوعًا، ولم يذكر فيه البُرّ. إلّا أنه منقطع كما قال البيهقي.وسيأتي بعده من وجه آخر عن أبي إسحاق موقوفًا.
1514 - أخبرني أبو الحسن محمد بن عبد الله العُمَري، حدثنا محمد بن إسحاق، أخبرنا محمد بن عُزَيز الأَيْلي، حدثنا سلامة بن رَوْح، عن عُقَيل بن خالد، عن أبي إسحاق الهَمْداني، عن الحارث: أنه سَمِع علي بن أبي طالب يأمرُ بزكاة الفِطر فيقول: صاعٌ من تمرٍ، أو صاعٌ من شعيرٍ، أو صاعٌ من حِنْطةٍ أو سُلْتٍ أو زَبِيب [1]. وقد روي أيضًا بإسناد يُخرَّج مثلُه في الشواهد عن زيد بن ثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم:
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (আল-হারিস) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ফিতরের যাকাত প্রদানের নির্দেশ দিতে শুনেছেন। তিনি বলতেন: এক সা’ পরিমাণ খেজুর, অথবা এক সা’ পরিমাণ যব, অথবা এক সা’ পরিমাণ গম, সূলত (এক প্রকার যব), অথবা কিশমিশ। এই বর্ণনাটি যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে শাহীদ (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবেও অন্য সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا دون قوله: "أو صاع من حنطة"، كسابقه، الحارث - وهو الأعور - ضعيف، وقد خالفه غيره عن عليٍّ فقالوا: نصف صاع من بر، ثم إنَّ هذا إسناد منقطع، عقيل بن خالد لم يسمع من أبي إسحاق، بينهما في هذا الحديث عتبة بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، كما في رواية غير المصنف.وأخرجه البيهقي 4/ 166 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: لم يذكر أبو عبد الله في إسناده عتبةَ بن عبد الله، وروي ذلك مرفوعًا، والموقوف أصح.وأخرجه الدارقطني (2112) - ومن طريقه البيهقي 4/ 166 - عن أبي بكر النيسابوري، عن محمد بن عزيز، به. وزاد في الإسناد عتبة بن عبد الله بن عتبة بن مسعود بين عقيل وبين أبي إسحاق.وأخرج عبد الرزاق (5773) - ومن طريقه الدارقطني (2127)، والبيهقي 4/ 161 - ، وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 172 عن وكيع، وابن زنجويه في "الأموال" (2375) عن محمد بن سنان، ثلاثتهم (عبد الرزاق ووكيع وابن سنان) عن سفيان الثوري، عن عبد الأعلى بن عامر، عن أبي عبد الرحمن السلمي عن عليٍّ قال: على من جرت عليه نفقتك نصف صاع من بر أو صاع من تمر. زاد محمد بن سنان: وإن كان نصرانيًا. وعبد الأعلى بن عامر صدوق يهم، وقال بعضهم: لين الحديث. قال البيهقي: وهذا موقوف، وعبد الأعلى غير قوي، إلّا أنه إذا انضم إلى ما قبله قويا فيما اجتمعا فيه.وأخرج عبد الرزاق (16077) عن وكيع، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن سلمة، عن علي - موقوفًا أيضًا - قال: صاع من شعير، أو نصف صاع من قمح. وعبد الله بن سلمة هذا حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وابن أبي ليلى صدوق سيئ الحفظ.
1515 - حدَّثَناه أبو الوليد الفقيه، حدثنا محمد بن نُعَيم، حدثنا عبَّاد بن الوليد الغُبَري، حدثنا عبّاد بن زكريا، حدثنا سليمان بن أرقَم، عن الزُّهري، عن قَبِيصةَ بن ذُؤيب، عن زيد بن ثابت قال: خَطَبَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "مَن كان عندَه طعامٌ فليتصدَّقْ بصاعٍ من بُرٍّ، أو صاعٍ من شعيرٍ، أو صاعٍ من تمرٍ، أو صاعٍ من دقيقٍ، أو صاعٍ من زَبيب، أو صاعٍ من سُلْت" [1].
যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "যার কাছে খাদ্যদ্রব্য আছে, সে যেন এক সা’ গম, অথবা এক সা’ যব, অথবা এক সা’ খেজুর, অথবা এক সা’ আটা, অথবা এক সা’ কিসমিস, অথবা এক সা’ সুলত (এক প্রকার শস্য) সদকা করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، سليمان بن أرقم مجمع على ضعفه، وعبَّاد بن زكريا - وهو الصُّرَيمي - مجهول لا يُعرف، قال الدارقطني: لم يروه بهذا الإسناد وهذه الألفاظ غير سليمان بن أرقم، وهو متروك الحديث. أبو الوليد الفقيه: هو حسان بن محمد.وأخرجه الدارقطني (2117) عن أحمد بن العباس البغوي، عن عباد بن الوليد، بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي 4/ 170 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2401)، والطبراني في "الكبير" 24/ (219) من طريق سلامة بن روح، عن عقيل بن خالد، به.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 43، والطبراني 24/ (218) من طريق يحيى بن أيوب، عن هشام بن عروة، به. وفيه: بالمد أو بالصاع الذي يتبايعون به.وأخرج ابن أبي شيبة 3/ 176 عن عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن أبيه أو عن فاطمة، عن أسماء قالت: بالمد والصاع الذي يمتارون به.وأخرج أحمد 44/ (26936) و (26995) من طريق محمد بن عبد الله بن نوفل، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر قالت: كنا نؤدي زكاة الفطر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم مدَّين من قمح، بالمد الذي تقتاتون به.
1516 - أخبرني أبو نصر محمد بن محمد بن حامد التِّرمذي، حدثنا محمد بن حِبَال الصَّغاني [1]، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، عن عُقَيل، عن هشام بن عُرْوة بن الزُّبير، عن أبيه، عن أمه أسماء بنت أبي بكر، أنها حدَّثته: أنهم كانوا يُخرِجون زكاة الفطر في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمُدِّ الذي يَقتاتُ به أهلُ البيت، أو الصاعِ الذي يَقتاتُون به، يَفعلُ ذلك أهلُ المدينة كلُّهم [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وهي الحُجَّة لمناظرة مالك وأبي يوسف.
আসমা বিনত আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে জানিয়েছেন যে, তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সাদাকাতুল ফিতর (ফিতরার যাকাত) বের করতেন এক মুদ্দ (পরিমাণ) দ্বারা, যা পরিবারের লোকেরা প্রধান খাদ্য হিসেবে গ্রহণ করত, অথবা এক সা' দ্বারা, যা তারা খাবার হিসেবে গ্রহণ করত। মদীনার সমস্ত অধিবাসীই এমনটি করত।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في (ز) و (ب) إلى: الصنعاني. وأخرجه البيهقي 4/ 170 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2401)، والطبراني في "الكبير" 24/ (219) من طريق سلامة بن روح، عن عقيل بن خالد، به.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 43، والطبراني 24/ (218) من طريق يحيى بن أيوب، عن هشام بن عروة، به. وفيه: بالمد أو بالصاع الذي يتبايعون به.وأخرج ابن أبي شيبة 3/ 176 عن عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن أبيه أو عن فاطمة، عن أسماء قالت: بالمد والصاع الذي يمتارون به.وأخرج أحمد 44/ (26936) و (26995) من طريق محمد بن عبد الله بن نوفل، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر قالت: كنا نؤدي زكاة الفطر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم مدَّين من قمح، بالمد الذي تقتاتون به.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، محمد بن حِبَال روى عنه جمع، ولم نقع فيه على جرح ولا تعديل، وقد توبع، وباقي رجاله ثقات. يحيى بن بكير: هو يحيى بن عبد الله بن بكير، نُسب إلى جده، والليث: هو ابن سعد، وعُقيل - مصغرًا -: هو ابن خالد بن عَقِيل - مكبرًا. وأخرجه البيهقي 4/ 170 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2401)، والطبراني في "الكبير" 24/ (219) من طريق سلامة بن روح، عن عقيل بن خالد، به.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 43، والطبراني 24/ (218) من طريق يحيى بن أيوب، عن هشام بن عروة، به. وفيه: بالمد أو بالصاع الذي يتبايعون به.وأخرج ابن أبي شيبة 3/ 176 عن عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن أبيه أو عن فاطمة، عن أسماء قالت: بالمد والصاع الذي يمتارون به.وأخرج أحمد 44/ (26936) و (26995) من طريق محمد بن عبد الله بن نوفل، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر قالت: كنا نؤدي زكاة الفطر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم مدَّين من قمح، بالمد الذي تقتاتون به.
1517 - أخبرني أبو عمرو محمد بن جعفر بن محمد العَدْل، حدثنا يحيى بن محمد بن البَختَري، حدثنا عبيد الله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شعبة، عن عاصم، عن أبي العاليَة، عن ثَوْبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن تَكفَّلَ لي أن لا يَسألَ الناسَ شيئًا فأتكفَّلَ له بالجنة؟ " فقال ثوبان: أنا، فكان لا يَسألُ الناس شيئًا [1].هذا حديث صحيح على شرط [مسلم] [2] ولم يُخرجاه.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কে আমাকে এই নিশ্চয়তা দেবে যে, সে মানুষের কাছে কোনো কিছু চাইবে না? তাহলে আমি তার জন্য জান্নাতের জিম্মাদার হব।" ছাওবান বললেন, 'আমি।' অতঃপর তিনি (ছাওবান) আর মানুষের কাছে কিছু চাইতেন না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. معاذ: هو ابن معاذ العنبري، وعاصم: هو ابن سليمان الأحول، وأبو العالية: هو رُفيع بن مهران الرياحي.وأخرجه أبو داود (1643) عن عبيد الله بن معاذ، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 37/ (22374) عن محمد بن جعفر غندر، عن شعبة، به.وأخرجه أحمد (22366) من طريق شريك بن عبد الله النخعي، عن عاصم الأحول، به.وأخرجه أحمد (22385) و (22405) و (22423) و (22424)، وابن ماجه (1837)، والنسائي (2382) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن معاوية، عن ثوبان، به. (2510): على شرطهما.
[2] مكانها بياض في النسخ الخطية، وأثبتناها من "تلخيص الذهبي"، وفي "إتحاف المهرة" (2510): على شرطهما.
1518 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا سَهْل بن مِهْران البغدادي، حدثنا عبد الله بن بَكْر السَّهْمي، حدثنا مبارك بن فَضَالة، عن ثابت البُناني، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عبد الرحمن بن أبي بكر، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "هل منكم أحدٌ أطعمَ اليومَ مسكينًا؟ " فقال أبو بكر: دخلتُ المسجد، فإذا أنا بسائلٍ يَسألُ، فوجدتُ كِسرةَ الخُبز في يَدِ عبد الرحمن، فأخذتُها فدفعتُها إليه [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান বিন আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি এমন কেউ আছে যে আজ কোনো মিসকীনকে খাবার খাইয়েছে?" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম, আর তখনই দেখলাম একজন ভিক্ষুক ভিক্ষা করছে। আমি আব্দুর রহমানের হাতে এক টুকরা রুটি পেলাম। আমি সেটি নিয়ে তাকে (ভিক্ষুককে) দিয়ে দিলাম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل مبارك بن فضالة.وأخرجه أبو داود (1670) عن بشر بن آدم، عن عبد الله بن بكر السهمي، بهذا الإسناد.وله شاهد من حديث أبي هريرة عند مسلم (1028).
1519 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا الأحوَص بن جَوَّاب، عن عمّار بن رُزَيق، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عمر قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "من سألكم بالله فأَعطُوه، ومن استعاذَكُم بالله فأعِيذُوه، ومن دَعاكُم فأجِيبُوه، ومن أَهدَى إليكم فكافِئُوه، فإن لم تَجِدوا ما تُكافئونَه، فادْعُوا له حتى تَرَونَ أن قد كافأْتُموه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين؛ فقد تابع عمَّارَ بن رُزَيق على إقامة هذا الإسناد: أبو عَوَانة وجَرِير بن عبد الحميد وعبد العزيز بن مُسلِم القَسْمَلي عن الأعمش.أما حديث أبي عَوانة:1519/ 1 - فأخبرَناه أبو العباس المحبوبي، حدثنا محمد بن عيسى الطَّرَسُوسي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا أبو عَوَانة [2].وأما حديث جرير:1519/ 2 - فحدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا زهير بن حَرْب، حدثنا جَرِير [3].وأما حديث عبد العزيز بن مسلم:1519/ 3 - فحدَّثَناه محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيُّ بن خُزَيمة، حدثنا مُعلَّى بن أَسَد، حدثنا عبد العزيز بن مسلم [4].هذه الأسانيد المُتفَقُ على صحتها لا تُعلَّل بحديث محمد بن أبي عُبيدة بن مَعْن، عن أبيه، عن الأعمش، عن إبراهيم التَّيمي، عن مجاهد [5].وعند الأعمش فيه إسنادٌ آخر صحيحٌ على شرطهما:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তোমাদের কাছে আল্লাহর ওয়াস্তে (আল্লাহর নামে) কিছু চায়, তোমরা তাকে তা দাও। আর যে ব্যক্তি তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে আশ্রয় চায়, তোমরা তাকে আশ্রয় দাও। আর যে ব্যক্তি তোমাদের দাওয়াত দেয়, তোমরা তার ডাকে সাড়া দাও। আর যে ব্যক্তি তোমাদেরকে কোনো উপহার দেয়, তোমরা তাকে প্রতিদান দাও। যদি তোমরা এমন কিছু খুঁজে না পাও যার মাধ্যমে তোমরা তাকে প্রতিদান দিতে পারো, তাহলে তার জন্য এমনভাবে দু’আ করো, যেন তোমরা মনে করো যে তোমরা তাকে প্রতিদান দিয়ে দিয়েছ।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل الأحوص بن جَوَّاب وشيخه عمار بن رُزَيق، وهما متابَعان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3260) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 9/ (5703) من طريق ليث بن أبي سليم، عن مجاهد، به.
[2] إسناده صحيح. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري.وأخرجه أحمد 9/ (5365) و 10/ (6106)، وأبو داود (5109)، والنسائي (2359) من طرق عن أبي عوانة، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق سريج بن النعمان عن أبي عوانة برقم (2400).
1519 [3] - إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه أبو داود (1672) و (5109)، وابن حبان (3408) من طريق عثمان بن أبي شيبة، عن جرير، بهذا الإسناد.
1519 [4] - إسناده صحيح.وأخرجه ابن أبي شريح في "الأحاديث المئة الشريحية" (41) من طريق بشر بن موسى، عن أبي زكريا، عن عبد العزيز بن مسلم، بهذا الإسناد.
1519 [5] - أخرجه من هذه الطريق ابن حبان (3375) و (3409)، وإسناده صحيح.
1520 - أخبرَناه عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا الأَسود بن عامر شاذانُ، حدثنا أبو بكر بن عيّاش، عن الأعمش، عن أبي حازم، عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن سَألكم بالله فأَعطُوه، ومن استعاذَكُم بالله فأعِيذُوه، ومن دعاكم فأجِيبُوه" [1].هذا إسناد صحيح، فقد صحَّ عند الأعمش الإسنادان جميعًا على شرط الشيخين، ونحن على أصلنا في قَبول الزِّيادات من الثقات في الأسانيد والمتون.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে কিছু চায়, তোমরা তাকে দাও। আর যে ব্যক্তি তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে আশ্রয় প্রার্থনা করে, তোমরা তাকে আশ্রয় দাও। আর যে তোমাদের দাওয়াত দেয়, তোমরা তাতে সাড়া দাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختلف فيه على أبي بكر بن بن عياش، فقد رواه عنه الأسود بن عامر - عند المصنف هنا - عن الأعمش، عن أبي حازم، عن أبي هريرة. وتابع الحارثَ بنَ أبي أسامة في روايته عن الأسود بهذا الإسناد: أحمدُ بن حنبل في "المسند" 16/ (10651).وأخرجه أحمد مرةً أخرى 9/ (5703) عن أسود بن عامر، عن أبي بكر بن عياش، عن ليث بن أبي سلم، عن مجاهد، عن ابن عمر. وليث بن أبي سليم ضعيف.وتابع الأسودَ بنَ عامر في إسناد ليث هذا: ثابت بن محمد الشيباني - وهو صدوق يخطئ - عن أبي بكر بن عياش، به، أخرجه الطبري في مسند عمر "تهذيب الآثار" (106) و (112).وقال الدارقطني في "العلل" (2212): وهذه الألفاظ إنما تعرف عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عمر. رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الصدقة عن ظهر غنى، وابدأ بمن تَعُول، واليد العليا خير من اليد السفلى". وإسناده صحيح.وأخرج أحمد 22/ (14273)، ومسلم (997) (41)، وأبو داود (3957)، والنسائي (2338) و (4987) و (4988) و (6203) و (6204) من طريق أبي الزبير عن جابر قال: أعتق رجل من بني عُذْرة عبدًا له عن دُبُر، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ألك مال غيره؟ " فقال: لا، فقال: "من يشتريه مني؟ " فاشتراه نعيم بن عبد الله العدوي بثمان مئة درهم، فجاء بها رسول الله صلى الله عليه وسلم فدفعها إليه، ثم قال: "ابدأ بنفسك فتصدَّق عليها، فإن فضل شيء فلأهلك، فإن فضل عن أهلك شيء فلذي قرابتك، فإن فضل عن ذي قرابتك شيء فهكذا وهكذا"، هذا لفظ مسلم، وبعضهم يزيد فيه على بعض.