আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1521 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حمَّاد، عن محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عُمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، عن جابر بن عبد الله الأنصاري قال: كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاء رجل بمثل بَيضةٍ من ذهب، فقال: يا رسول الله، أصبتُ هذه من مَعدِنٍ، فخُذْها فهي صدقةٌ، ما أملِكُ غيرَها، فأعرَضَ عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أتاه من قِبَل رُكْنِه الأيمن، فقال مثلَ ذلك، فأعرَضَ عنه، ثم أتاه من رُكنِه الأيسر، فأعرَضَ عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أتاه من خَلْفِه، فأخذها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فحَذَفَه بها، فلو أصابته لأوجَعَتْه ولَعَقَرتْه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يأتي أحدُكم بما يَملِكُ فيقول: هذه صدقةٌ، ثم يقعُدُ يَستكِفُّ الناسَ، خيرُ الصَّدقةِ ما كان عن ظَهْرِ غِنًى" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, এমন সময় এক ব্যক্তি ডিমের আকারের এক টুকরা সোনা নিয়ে আসলো। সে বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি এটি একটি খনি থেকে পেয়েছি, আপনি এটি গ্রহণ করুন; এটি সাদাকাহ (দান)। এটি ছাড়া আমার আর কিছুই মালিকানায় নেই। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর সে তাঁর ডান দিক থেকে এসে একই কথা বললো। তিনি তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর সে তাঁর বাম দিক থেকে আসলো, কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর সে তাঁর পিছন দিক থেকে আসলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটি গ্রহণ করলেন এবং (রাগের সাথে) তা তার দিকে ছুঁড়ে মারলেন। যদি তা তাকে আঘাত করত, তবে তাকে কষ্ট দিত এবং জখম করে দিত। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কেউ কেউ তার মালিকানাধীন সবকিছু নিয়ে আসে এবং বলে: 'এটি সাদাকাহ (দান)', তারপর বসে বসে মানুষের কাছে হাত পাতে (ভিক্ষা করে)। উত্তম সাদাকাহ (দান) সেটাই, যা স্বচ্ছলতা ও প্রাচুর্যের পর করা হয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات غير شيخ المصنف، وهو عبد الرحمن بن الحسن، ففيه ضعفٌ لكنه متابع، ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.وأخرجه أبو داود (1673) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 22/ (14531)، وابن حبان (3345) من طريق أبي الزبير عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضل الصدقة عن ظهر غنى، وابدأ بمن تَعُول، واليد العليا خير من اليد السفلى". وإسناده صحيح.وأخرج أحمد 22/ (14273)، ومسلم (997) (41)، وأبو داود (3957)، والنسائي (2338) و (4987) و (4988) و (6203) و (6204) من طريق أبي الزبير عن جابر قال: أعتق رجل من بني عُذْرة عبدًا له عن دُبُر، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ألك مال غيره؟ " فقال: لا، فقال: "من يشتريه مني؟ " فاشتراه نعيم بن عبد الله العدوي بثمان مئة درهم، فجاء بها رسول الله صلى الله عليه وسلم فدفعها إليه، ثم قال: "ابدأ بنفسك فتصدَّق عليها، فإن فضل شيء فلأهلك، فإن فضل عن أهلك شيء فلذي قرابتك، فإن فضل عن ذي قرابتك شيء فهكذا وهكذا"، هذا لفظ مسلم، وبعضهم يزيد فيه على بعض.
1522 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العدل، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحميدي، حدثنا سفيان، عن ابن عَجْلان، عن عياض بن عبد الله بن سعد، سمع أبا سعيدٍ الخُدْريَّ يقول: دخلَ رجلٌ المسجد، فأمر النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يَطْرَحُوا له ثيابًا، فَطَرَحُوا له، فأمر فيها بثوبين، ثم حثَّ على الصدقة فجاء فَطَرَح الثوبين، فصاح به وقال: "خُذْ ثَوبَيكَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক মসজিদে প্রবেশ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিলেন যে তার জন্য কিছু কাপড় রাখা হোক। অতঃপর তারা তার জন্য কাপড় রাখল। অতঃপর তিনি [রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] সেখান থেকে তাকে দুটি কাপড় দিলেন। এরপর তিনি সাদকা করার জন্য উৎসাহিত করলেন। তখন লোকটি এসে সে দুটি কাপড় (যা সে পেয়েছিল) ফেলে দিল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর উচ্চস্বরে বললেন: "তোমার কাপড় দুটি নিয়ে যাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل ابن عجلان: وهو محمد. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير، وسفيان: هو ابن عيينة.وسلف مطولًا برقم (1066)، وسلف تخريجه هناك. ابن سعد، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 12/ (7155)، والبخاري (1426) و (1428) و (5355) و (5356) ومسلم (1042)، وأبو داود (1676)، والترمذي (680)، والنسائي (2325) و (2326) و (2336) و (9165)، وابن حبان (3363) و (4243) من طرق عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أفضل الصدقة ما ترك غنًى، واليد العليا خير من اليد السفلى، وابدأ بمن تعول". هذا لفظ أبي صالح عن أبي هريرة عند البخاري، وبعضهم يختصره.وفي باب جُهد المُقِل عن غير واحد من الصحابة، وذكرناها في "المسند" عند الحديث (8702).قوله: "جهد المقل" قال السندي في حاشيته على "المسند": الجهد - بالضم -: الوُسع والطاقة، أي: ما يحتمله حال القليلِ المال، وقيل: أي: مجهوده، لقلة ماله، وإنما يجوز له الإنفاق إذا قدر على الصبر ولم يكن له عيال، وإلّا فالأفضل ما كان عن ظهر غنى.
1523 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن إبراهيم، حدثنا ابن بُكَير، حدثنا الليث، عن أبي الزُّبير، عن يحيى بن جَعْدَة، عن أبي هريرة أنه قال: يا رسولَ الله، أيُّ الصَّدَقةِ أفضلُ؟ قال: "جُهْدُ المُقِلِّ، وابدأْ بمَن تَعُول" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কোন দান সর্বোত্তম? তিনি বললেন, "অভাবীর সাধ্যমত চেষ্টা এবং যাদের ভরণপোষণের দায়িত্ব তোমার উপর, তাদের থেকে শুরু করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن إبراهيم: هو ابن ملحان، وابن بكير: هو يحيى بن عبد الله بن بكير، والليث: هو ابن سعد، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس.وأخرجه أحمد 14/ (8702)، وأبو داود (1677)، وابن حبان (3346) من طرق عن الليث ابن سعد، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 12/ (7155)، والبخاري (1426) و (1428) و (5355) و (5356) ومسلم (1042)، وأبو داود (1676)، والترمذي (680)، والنسائي (2325) و (2326) و (2336) و (9165)، وابن حبان (3363) و (4243) من طرق عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أفضل الصدقة ما ترك غنًى، واليد العليا خير من اليد السفلى، وابدأ بمن تعول". هذا لفظ أبي صالح عن أبي هريرة عند البخاري، وبعضهم يختصره.وفي باب جُهد المُقِل عن غير واحد من الصحابة، وذكرناها في "المسند" عند الحديث (8702).قوله: "جهد المقل" قال السندي في حاشيته على "المسند": الجهد - بالضم -: الوُسع والطاقة، أي: ما يحتمله حال القليلِ المال، وقيل: أي: مجهوده، لقلة ماله، وإنما يجوز له الإنفاق إذا قدر على الصبر ولم يكن له عيال، وإلّا فالأفضل ما كان عن ظهر غنى.
1524 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار العدلُ، حدثنا أحمد بن محمد بن نَصْر، حدثنا أبو نُعَيم، حدثنا هشام بن سعد، عن زيد بن أسلمَ، عن أبيه، قال: سمعتُ عمر بن الخطاب يقول: أمَرَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومًا أن نتصدَّقَ، فوافَقَ ذلك مالًا عندي، فقلتُ: اليومَ أسبِقُ أبا بكرٍ إن سَبَقتُه يومًا، فجئتُ بنصف مالي، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما أبقيتَ لأهلِكَ؟ " قلت: مِثلَه. قال: وأتى أبو بكرٍ بكُلِّ ما عندَه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما أبقيتَ لأهلِكَ؟ " قال: أبقيتُ لهم اللهَ ورسولَه، فقلت: لا أُسابِقُك إلى شيءٍ أبدًا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দান করতে আদেশ করলেন। ঘটনাক্রমে তখন আমার কাছে কিছু সম্পদ ছিল। আমি মনে মনে বললাম: আজ যদি আমি কোনোদিন আবূ বকরকে ছাড়িয়ে যেতে পারি, তবে আজই ছাড়িয়ে যাব। অতঃপর আমি আমার সম্পদের অর্ধেক নিয়ে এলাম। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি তোমার পরিবারের জন্য কী রেখে এসেছ?" আমি বললাম: তার সমপরিমাণ। বর্ণনাকারী বলেন: আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে যা কিছু ছিল, সবই নিয়ে আসলেন। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি তোমার পরিবারের জন্য কী রেখে এসেছ?" তিনি বললেন: আমি তাদের জন্য আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে রেখে এসেছি। তখন আমি বললাম: আমি কখনো কোনো বিষয়ে আপনার সাথে প্রতিযোগিতা করব না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، هشام بن سعد وإن كان فيه كلام، ذهب أبو داود إلى توثيقه وقال: هو أثبت الناس في زيد بن أسلم، قال الترمذي في حديثه هذا: حسن صحيح، وقال البزار بعد أن أخرجه في "مسنده" (270): لم نر أحدًا توقف عن حديث هشام بن سعد، ولا اعتل عليه بعلة توجب التوقف عن حديثه. وصحَّحه كذلك شيخ الإسلام ابن تيمية في "منهاج السنة" 8/ 499، وابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 414. أبو نُعيم: هو الفضل بن دكين.وأخرجه أبو داود (1678)، والترمذي (3675) من طرق عن أبي نعيم، بهذا الإسناد.
1525 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا علي بن الحسن الهِلَالي، حدثنا محمد بن عَرْعَرة، حدثنا شعبة، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب والحسن، عن سعد بن عُبادة: أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: أيُّ الصَّدقةِ أعجَبُ إليك؟ قال: "سقْيُ الماءِ" [1].تابعه همّام عن قتادة:
সা'দ ইবনে উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, "কোন সাদকা (দান) আপনার নিকট সবচেয়ে বেশি পছন্দনীয়?" তিনি বললেন, "পানি পান করানো (জলদান)।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح من جهة سعيد بن المسيب، فهو وإن لم يدرك سعد بن عبادة، قد قبل جمهور من أهل العلم مراسيله واحتجوا بها. والحسن - وهو ابن أبي الحسن البصري - أيضًا لم يدرك سعدًا، لذلك تعقب الذهبيُّ في "تلخيصه" المصنف إذ صححه على شرط الشيخين، فقال: لا، فإنه غير متصل.وأخرجه أبو داود (1680) عن محمد بن عبد الرحيم، عن محمد بن عرعرة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 37/ (22459) و 39/ (23845)، والنسائي (6460) من طريق حجاج بن محمد المصيصي، عن شعبة، عن قتادة، عن الحسن البصري وحده، به.وأخرجه ابن ماجه (3684)، والنسائي (6458) و (6459)، وابن حبان (3348) من طريق هشام الدستوائي، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب وحده، به.وأخرجه أحمد 37/ (22458) من طريق المبارك بن فضالة، عن الحسن وحده، به.
1526 - أخبرَناه أبو النَّضْر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد ومحمد بن أيوب، قالا: حدثنا محمد بن كَثِير، حدثنا همَّام، عن قتادة، عن سعيد: أنَّ سعدًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: أيُّ الصدقةِ أعجبُ إليك؟ قال: "الماءُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: আপনার নিকট কোন সাদকা (দান) সবচেয়ে পছন্দনীয়? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: পানি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] مرسلٌ صحيح، رجاله ثقات. همام: هو ابن يحيى بن دينار العوذي.وأخرجه أبو داود (1679) عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (1681) عن محمد بن كثير، عن إسرائيل بن يونس السبيعي، عن جده أبي إسحاق السبيعي، عن رجل، عن سعد بن عبادة.
1527 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أَسد بن موسى، حدثنا أبو معاوية، عن محمد بن إسحاق. وأخبرني أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا هنَّاد بن السَّري، حدثنا عَبْدة، عن محمد بن إسحاق، عن بُكَير بن عبد الله بن الأشَجِّ، عن سليمان بن يسار، عن ميمونةَ زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: كانت لي جاريةٌ فأعتقتُها، فدخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبرته، فقال: "آجَرَكِ الله، أَمَا إنَّكِ لو كنتِ أعطيتِها أخوالَكِ كان أعظمَ لأجرِكِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!
মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার একটি দাসী ছিল, অতঃপর আমি তাকে মুক্ত করে দেই। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন। আমি তাঁকে এ বিষয়ে জানালাম। তিনি বললেন, "আল্লাহ তোমাকে পুরস্কৃত করুন। তবে, তুমি যদি তাকে তোমার মামাদের দিয়ে দিতে, তবে তোমার জন্য পুরস্কার আরও বেশি হতো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله غير أن محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - مدلس وقد عنعنه، ثم إنه قد خولف في هذا الإسناد، فرواه عمرو بن الحارث المصري ويزيد أبي حبيب وابن لهيعة وغيرهم عن بكير بن عبد الله بن الأشج عن كريب مولى ابن عباس عن ميمونة، فذكروا كريبًا بدل سليمان بن يسار، وكلاهما ثقة. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وعبدة: هو ابن سليمان الكلابي.وأخرجه أبو داود (1690)، والنسائي (4911) عن هناد بن السري، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2883) من طريق يعلى بن عبيد عن ابن إسحاق. وانظر تخريجه هناك.وأخرجه أحمد 44/ (26822) من طريق ابن لهيعة، والبخاري (2592) من طريق يزيد بن أبي حبيب، والبخاري - تعليقًا - (2594)، ومسلم (999)، والنسائي (4910)، وابن حبان (3343) من طريق عمرو بن الحارث، ثلاثتهم عن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن كريب مولى ابن عباس، عن ميمونة.وأخرجه النسائي (4913) عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحيم، عن أسد بن موسى، عن محمد بن خازم، عن محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ميمونة. وقال النسائي فيما نقله عنه المزي في "التحفة" (18074): هذا الحديث خطأ، لا نعلمه من حديث الزهري.وأخرج النسائي (4912) من طريق شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن عطاء بن يسار، عن ميمونة الهلالية: أنها كانت لها جارية سوداء، فقالت: يا رسول الله، إني أردت أن أعتق هذه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفلا تفدين بها بنت أخيك أو بنت أختك من رعاية الغنم؟ ".
1528 - أخبرنا محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزة، حدثنا قَبِيصة، حدثنا سفيان. وأخبرنا محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كثير، أخبرنا سفيان، عن محمد بن عَجْلان، عن المَقبُري، عن أبي هريرة قال: أَمَرَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بالصدقة، فقال رجل: يا رسول الله، عندي دينار، قال: "تصدَّقْ به على نفسك" قال: عندي آخر، قال: "تصدَّقْ به على وَلَدِك" قال: عندي آخر، قال: "تصدَّقْ به على زَوجِك" - أو قال: "على زوجتك" - قال: عندي آخر، قال: "تصدَّقْ به على خادِمِك" قال: عندي آخر، قال: "أنت أبصَرُ" [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদাকা (দান) করার নির্দেশ দিলেন। তখন এক ব্যক্তি বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে একটি দিনার আছে।’ তিনি বললেন, ‘তা তোমার নিজের জন্য ব্যয় করো।’ সে বলল, ‘আমার কাছে আরো একটি আছে।’ তিনি বললেন, ‘তা তোমার সন্তানের জন্য ব্যয় করো।’ সে বলল, ‘আমার কাছে আরো একটি আছে।’ তিনি বললেন, ‘তা তোমার স্ত্রীর জন্য ব্যয় করো।’ সে বলল, ‘আমার কাছে আরো একটি আছে।’ তিনি বললেন, ‘তা তোমার খাদেমের জন্য ব্যয় করো।’ সে বলল, ‘আমার কাছে আরো একটি আছে।’ তিনি বললেন, ‘তুমিই ভালো জানো।’
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل محمد بن عجلان، فهو صدوق لا بأس به. قبيصة: هو ابن عقبة، وسفيان: هو الثوري، والمقبري: هو سعيد بن أبي سعيد.وأخرجه أبو داود (1691) عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان (4233) من طريق إبراهيم بن بشار، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه أحمد 12/ (7419) و 16/ (10086)، والنسائي (2327) و (9137)، وابن حبان (3337) و (4235) من طرق عن ابن عجلان، به.وأخرج أحمد 16/ (10119) و (10174)، ومسلم (995)، والنسائي (9139) من طريق مزاحم بن زفر، عن مجاهد، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "دينار أنفقته في سبيل الله، ودينار أنفقته في رقبة، ودينار تصدقت به على مسكين، ودينار أنفقته على أهلك، أعظمها أجرًا الذي أنفقته على أهلك". - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - قد وثقه ابن معين والعجلي وابن حبان، وهو تابعي كبير كما قال المصنف، ثم هو متابع، وبقية رجاله ثقات. قبيصة: هو ابن عقبة، ومحمد بن كثير: هو العبدي البصري، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي.وأخرجه أبو داود (1692)، ابن حبان (4240) من طريق محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6495) و (6828)، والنسائي (9132) من طريقين آخرين عن سفيان، به.وأخرجه أحمد (6819) و (6842)، والنسائي (9131) و (9133) من طرق عن أبي إسحاق، به.وسيأتي من طريق معمر عن أبي إسحاق برقم (8736).وله طريق أخرى عن عبد الله بن عمرو يصح بها، أخرجها مسلم (996)، وابن حبان (4241) من طريق طلحة بن مصرِّف، عن خيثمة بن عبد الرحمن قال: كنا جلوسًا مع عبد الله بن عمرو، إذ جاءه قهرمان له فدخل، فقال: أعطيت الرقيق قُوتَهم؟ قال: لا، قال: فانطلِق فأعطهم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كفى بالمرء إثمًا أن يحبس عمَّن يملك قوتَه".
1529 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك ببغداد، حدثنا الحسن بن سلَّام، حدثنا قَبِيصة.وأخبرنا أبو العباس المحبوبي، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كَثير.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا أبو حذيفة؛ قالوا: حدثنا سفيان - وهو الثَّوري - حدثنا أبو إسحاق، عن وَهْب بن جابر الخَيْواني، عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "كفى بالمرءِ إثمًا أن يُضيِّع مَن يَقُوتُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، ووهب بن جابر من كِبار تابعي الكوفة.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ব্যক্তির পাপী হওয়ার জন্য এটুকুই যথেষ্ট যে, সে তার অধীনস্থ যাদের ভরণপোষণ করা তার দায়িত্ব, তাদের অবহেলা করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، وهب بن جابر الخيواني وإن لم يرو عنه غير أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - قد وثقه ابن معين والعجلي وابن حبان، وهو تابعي كبير كما قال المصنف، ثم هو متابع، وبقية رجاله ثقات. قبيصة: هو ابن عقبة، ومحمد بن كثير: هو العبدي البصري، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي.وأخرجه أبو داود (1692)، ابن حبان (4240) من طريق محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6495) و (6828)، والنسائي (9132) من طريقين آخرين عن سفيان، به.وأخرجه أحمد (6819) و (6842)، والنسائي (9131) و (9133) من طرق عن أبي إسحاق، به.وسيأتي من طريق معمر عن أبي إسحاق برقم (8736).وله طريق أخرى عن عبد الله بن عمرو يصح بها، أخرجها مسلم (996)، وابن حبان (4241) من طريق طلحة بن مصرِّف، عن خيثمة بن عبد الرحمن قال: كنا جلوسًا مع عبد الله بن عمرو، إذ جاءه قهرمان له فدخل، فقال: أعطيت الرقيق قُوتَهم؟ قال: لا، قال: فانطلِق فأعطهم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كفى بالمرء إثمًا أن يحبس عمَّن يملك قوتَه".
1530 - أخبرنا مُكرَم بن أحمد القاضي، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا أبو عامر العَقَديُّ وأبو داودَ الطيالسي، قالا: حدثنا شعبة.وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا بِشْر بن عمر ووَهْبُ بن جرير، قالا: حدثنا شعبةُ، عن عمرو بن مُرَّة، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي كثير، عن عبد الله بن عمرو قال: خَطَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "إياكم والشُّحَّ، فإنما هَلَكَ من كان قَبْلكُم بالشُّحِّ، أمَرَهم بالبُخل فبَخِلوا، وأمَرَهم بالقَطِيعة فقَطَعوا، وأمَرَهم بالفُجور ففَجَروا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وأبو كثير الزُّبيدي من كبار التابعين.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "তোমরা লোভ-লালসা (শূহ) থেকে নিজেদেরকে রক্ষা করো। কারণ তোমাদের পূর্ববর্তী লোকেরা কেবল এই লোভ-লালসার কারণেই ধ্বংস হয়েছিল। তা তাদেরকে কৃপণতা করতে নির্দেশ দিয়েছিল, ফলে তারা কৃপণতা করেছিল; এবং তা তাদেরকে আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করতে নির্দেশ দিয়েছিল, ফলে তারা তা ছিন্ন করেছিল; আর তা তাদেরকে পাপাচারে লিপ্ত হতে নির্দেশ দিয়েছিল, ফলে তারা পাপাচারে লিপ্ত হয়েছিল।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله. وقد سلف بأطول مما هنا برقم (26)، وسلف تخريجه والكلام على إسناده هناك.
1531 - أخبرنا الحسن بن حَليم المروَزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، حدثنا حَرْمَلَة بن عمران، أنه سَمِع يزيد بن أبي حَبِيب يحدِّث، أنَّ أبا الخير حدَّثه، أنه سمع عقبةَ بن عامر يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "كلُّ امرئٍ في ظلِّ صدقته حتى يُفصَلَ بين الناس" أو قال: "حتى يُحكَمَ بين الناس".قال يزيد: وكان أبو الخير لا يُخطِئُه يومٌ لا يتصدقُ فيه بشيءٍ ولو كعكةً ولو بَصَلةً [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক ব্যক্তি তার সদকার ছায়াতলে থাকবে যতক্ষণ না মানুষের মাঝে ফায়সালা করা হয়।" অথবা তিনি বলেছেন: "যতক্ষণ না মানুষের মাঝে বিচার করা হয়।"
ইয়াজিদ বলেছেন, আবু আল-খায়ের এমন কোনো দিন অতিবাহিত করতেন না যেদিন তিনি কিছু সদকা করতেন না, যদিও তা একটি রুটির টুকরা অথবা একটি পেঁয়াজও হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، رجاله ثقات. الحسن بن حليم: هو الحسن بن محمد بن حليم الحليمي، نُسب إلى جده، وأبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: وهو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك، وأبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليزني.وأخرجه أحمد 28/ (17333)، وابن حبان (3310) من طريقين عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 29/ (18043) و 38/ (23490) من طريق محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، لم يسمّ الصحابي.
1532 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا النَّضْر بن شُمَيل، عن [أبي] [1] قُرَّة قال: سمعتُ سعيد بن المسيّب يحدِّث عن عمر بن الخطّاب قال: ذُكِر لي أنَّ الأعمال تَباهَى، فتقول الصَّدقةُ: أنا أفضَلُكم [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার কাছে উল্লেখ করা হয়েছে যে, আমলসমূহ পরস্পর গর্ব করে। তখন সাদাকা (দান) বলে, আমি তোমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "أبي" سقطت من النسخ الخطية، وأثبتناها من "إتحاف المهرة" لابن حجر، و"شعب الإيمان" للبيهقي، وسائر مصادر التخريج، وهو أبو قرة الأسدي كما جاء مصرَّحًا به في بعض مصادر التخريج.
[2] إسناده ضعيف لجهالة أبي قرة الأسدي الصيداوي، فقد تفرَّد بالرواية عنه النضر بن شميل، وقال ابن خزيمة: فإني لا أعرف أبا قرة بعدالة ولا جرح.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3058) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (952)، وابن خزيمة (2433)، وأبو علي الصواف في "فوائده" (35) من طريق النضر بن شميل، به. وتحرَّف في مطبوع ابن خزيمة النضر بن شميل إلى: النضر بن إسماعيل، وتحرف فيه كذلك أبو قرة إلى: أبي فروة.
1533 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو بَكْرةَ بكَّار بن قُتَيبة القاضي بمصر، حدثنا صفوان بن عيسى، حدثنا محمد بن عَجْلان، عن زيد بن أسلم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سَبَقَ درهمٌ مئةَ ألف" قالوا: يا رسولَ الله، كيف يَسبِق درهمٌ مئةَ ألف؟ قال: "رجلٌ له درهمانِ فأخذ أحدَهما فتصدَّقَ به، وآخرُ له مالٌ كثيرٌ فأخذ من عُرْضِها مئةَ ألف" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক দিরহাম এক লক্ষ দিরহামকে অতিক্রম করেছে।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! কীভাবে এক দিরহাম এক লক্ষ দিরহামকে অতিক্রম করে? তিনি বললেন: "এক ব্যক্তি, যার কাছে মাত্র দুটি দিরহাম ছিল, সে তার একটি নিয়ে সদকা করেছে। আর অন্য এক ব্যক্তি, যার প্রচুর সম্পদ ছিল, সে তার মধ্য থেকে এক লক্ষ দিরহাম সদকা করেছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي، محمد بن عجلان صدوق لا بأس به، إلّا أنه اختلف عليه في إسناده، فرواه صفوان بن عيسى عنه عن زيد بن أسلم عن أبي صالح ذكوان السَّمان عن أبي هريرة، وخالفه الليث بن سعد - وهو أوثق منه - فرواه عن ابن عجلان عن سعيد المقبري والقعقاع بن حكيم عن أبي هريرة.وأخرجه النسائي (2319)، وابن حبان (3347) من طريقين عن صفوان بن عيسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 14/ (8929) من طريق الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن سعيد المقبري والقعقاع بن حكيم، عن أبي هريرة. ووقع في "مسند أحمد": "سبق درهم درهمين"، والصواب ما في رواية الجماعة: "سبق درهم مئة ألف".قوله: "من عُرْضها" قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد": بضم العين وسكون الراء، أي: جانبها، وظاهر الحديث أنَّ صدقة الفقير أفضل بأضعاف من صدقة الغني، ويؤيده: "أفضل الصدقة جهد المقل". قلنا: وقد سلف برقم (1523).
[2] تعقبه الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 14/ 517 فقال: في صحته نظر، فإنَّ الليث أحفظ من صفوان، وقد رواه عن محمد بن عجلان فقال: عن سعيد المقبري والقعقاع بن حكيم عن أبي هريرة، فاضطرب فيه ابن عجلان، فانحط عن رتبة الصحة.
1534 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك ببغداد، حدثنا علي بن إبراهيم الواسطي، حدثنا يزيد بن هارون ووَهْب بن جرير: قالا: حدثنا شُعْبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، قال: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن منصور، عن رِبْعِيّ بن حِرَاش، عن زيد بن ظَبْيان، عن أبي ذرٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ثلاثةٌ يحبُّهم الله، وثلاثةٌ يُبغِضُهم الله، أما الذين يحبُّهم الله: فرجلٌ أَتى قومًا فسألهم بالله ولم يسألهم بقرابةٍ بينهم وبينه، فتخلَّفَ رجلٌ من أعقابهم، فأعطاه سرًّا لا يَعلمُ بعطيَّتِه إِلَّا اللهُ والذي أعطاه، وقومٌ ساروا ليلتَهم حتى إذا كان النومُ [أحبَّ إليهم مما يُعدَل به] [1] نزلوا فوَضَعُوا رؤوسَهم، فقام رجلٌ [2] يتملَّقُني ويَتلُو آياتي، ورجلٌ كان في سَريَّةٍ فلقي العدوَّ فهُزِموا، فأقبل بصَدْره حتى يُقتَلَ أو يُفتَحَ له، والثلاثةُ الذين يُبغِضُهم الله: الشَّيخ الزاني، والفقير المُخْتال، والغنيُّ الظَّلوم" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ যারর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন প্রকার লোককে আল্লাহ ভালোবাসেন এবং তিন প্রকার লোককে আল্লাহ ঘৃণা করেন। যাদের আল্লাহ ভালোবাসেন, তারা হলো: এক ব্যক্তি, যে এক কাওমের কাছে এলো এবং আল্লাহর নামে তাদের কাছে কিছু চাইল—কিন্তু তাদের সাথে তার কোনো আত্মীয়তার সম্পর্ক ধরে কিছু চাইল না। অতঃপর তাদের শেষ সারি থেকে এক ব্যক্তি সরে গিয়ে গোপনে তাকে দান করল, তার এই দান সম্পর্কে আল্লাহ এবং যে দান করেছে, সে ছাড়া আর কেউ জানতে পারল না। আর এক কাওম, যারা সারারাত সফর করল। এমনকি যখন ঘুম তাদের কাছে অন্য যেকোনো কিছুর চেয়েও অধিক প্রিয় ছিল, তখন তারা থামল এবং তাদের মাথা রাখল (ঘুমিয়ে পড়ল)। কিন্তু তাদের মধ্য থেকে একজন উঠে দাঁড়াল, যে আমার কাছে বিনয়ী নিবেদন করে এবং আমার আয়াতসমূহ তিলাওয়াত করে। আর সেই ব্যক্তি, যে একটি ছোট সামরিক দলে ছিল। তারা শত্রুর মোকাবিলা করল এবং তারা (দলটি) পরাজিত হলো। কিন্তু সে বুক চিতিয়ে এগিয়ে গেল যতক্ষণ না সে শহীদ হয় অথবা তার জন্য বিজয় আসে। আর যে তিন প্রকার লোককে আল্লাহ ঘৃণা করেন, তারা হলো: বৃদ্ধ ব্যভিচারী, অহংকারী দরিদ্র এবং অত্যাচারী ধনী।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين ليس في نسخنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع ومن "مسند أحمد" وسائر مصادر التخريج.
[2] لفظ "رجل" من (ع) وحدها.
1534 [3] - حديث صحيح، زيد بن ظبيان وإن تفرد بالرواية عنه ربعي بن حراش، ولم يوثقه غير ابن حبان، قد توبع، ثم إنه قد صحَّح حديثه هذا الترمذي وابن خزيمة وابن حبان.وقد اختُلف في هذا الإسناد على منصور - وهو ابن المعتمر - فرواه شعبةُ هنا وغيرُه عنه عن ربعي بن حراش عن زيد بن ظبيان عن أبي ذر، وخالفهم سفيان الثوري فرواه عن منصور عن ربعي عن أبي ذر، لم يذكر فيه زيد بن ظبيان، والمحفوظ رواية شعبة ومن تابعه، كما نص عليه الدارقطني في "العلل" (696) و (1103).والحديث في "مسند أحمد" 35/ (21355).وأخرجه الترمذي (2568)، والنسائي (1316) و (2362) و (7099)، وابن حبان (3349) و (4771) من طرق عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث صحيح.وأخرجه الترمذي بإثر الحديث (2568) من طريق النضل بن شميل، عن شعبة، به.وأخرجه ابن حبان (3350) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن منصور، به.أما رواية سفيان الثوري التي أشرنا إليها فقد أخرجها أحمد (21356)، والنسائي (1317) و (7098) من طريقه عن منصور، عن ربعي، عن أبي ذر، دون ذكر زيد بن ظبيان.وسيأتي برقم (2564) من طريق آدم بن أبي إياس عن شعبة.وسيأتي بنحوه من طريق مطرف بن عبد الله بن الشخير عن أبي ذر برقم (2477).
1535 - أخبرنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيُّ بن خُزَيمة، حدثنا محمد بن سعيد الأصبهاني، حدثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن ابن بُرَيدةَ، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما يَخْرُجُ رجلٌ بشيءٍ من الصدقةِ حتى يَفُكَّ عنها لَحْيَيْ سبعينَ شيطانًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ব্যক্তি সাদকা হিসেবে কোনো কিছু প্রদান করে না, যতক্ষণ না সে তার জন্য সত্তর জন শয়তানের চোয়াল (বা বাধা) থেকে মুক্তি লাভ করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، غير أنَّ الأعمش - وهو سليمان بن مهران - لم يسمع هذا الحديث من ابن بريدة - وهو سليمان - فيما يظن أبو معاوية الضرير كما في "مسند أحمد"، وذهب البخاري إلى أنه لم يسمع منه فيما نقله عنه الترمذي كما في "العلل الكبير" 2/ 964.وأخرجه أحمد 38/ (22962) عن أبي معاوية، بهذا الإسناد. وعنده قال أبو معاوية: ولا أُراه سمعه منه.قوله: "لحيي سبعين شيطانًا" اللَّحْيُ: منبِتُ اللِّحْية من الإنسان وغيره، أو العظمان اللذان فيهما الأسنان.
1536 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا عبيد بن شَرِيك البزّار والفَضْل بن محمد بن المسيَّب، قالا: حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن عُبيد الله بن عمر وعَبْد الله بن عمر [1]، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أَمَرَ مِن كل حائطٍ بقِنْوٍ للمسجد [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. وشاهدُه صحيح على شرط مسلم:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) প্রতিটি বাগান থেকে মসজিদের জন্য এক ছড়া (খেজুর) দেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] عبد الله بن عمر، سقط من (ص) و (ب) و (ع)، وهو ثابت في (ز) و"إتحاف المهرة" 9/ 181، ومصادر التخريج.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد قوي، عبد العزيز بن محمد - وهو الدراوردي - وإن كان يُضعَّف في روايته عن عبيد الله بن عمر - وهو العمري - فإنه قويٌّ في غيره، وقد قرن به هنا أخاه عبد الله بن عمر العمري، وهذا الأخير وإن كان ضعيفًا في نفسه، إلّا أنَّ رواية الدراوردي عن كليهما يقوي الإسناد.وأخرجه ابن حبان (3288) من طريق يحيى بن معين، عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث جابر الآتي بعده.وحديث عوف بن مالك الآتي برقم (3163). وحديث البراء بن عازب الآتي برقم (3164).
1537 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العدلُ، حدثنا العباس بن الفضل ومحمد بن أيوب، قالا: حدثنا سَهْل بن بَكَّار، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن عمِّه واسع بن حَبَّان، عن جابر بن عبد الله: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رَخَّص في العَرايا الوَسْقَ والوَسْقين والثلاثةَ والأربعة، وقال: "في جادِّ كلِّ عشرة أوسُقٍ قِنوٌ يُوضَع للمساكينِ في المسجد" [1].
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'আরায়া (বিক্রয়ের) ক্ষেত্রে এক ওয়াসাক, দুই ওয়াসাক, তিন ওয়াসাক এবং চার ওয়াসাক পরিমাণ পর্যন্ত অনুমতি (রুখসাত) প্রদান করেছেন। তিনি আরও বলেছেন: "প্রতি দশ ওয়াসাক ফসল থেকে একটি খেজুরের ছড়া (কাঁদি) তুলে মিসকীনদের জন্য মসজিদে রাখা হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، وقد صرَّح محمد بن إسحاق بالسماع عند أحمد، فانتفت شبهة تدليسه، وقال ابن كثير في "تفسيره": هذا إسناد جيد.وأخرجه أحمد 23/ (14866) و (14868)، وابن حبان (5008) من طريق إبراهيم بن سعد القرشي، وأحمد (14867)، وأبو داود (1662)، وابن حبان (3289) من طريق محمد بن سلمة الحراني، كلاهما عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وفي ترخيصه صلى الله عليه وسلم بالعرايا، روي من طرق عن جابر بن عبد الله، أخرجها أحمد 22 (14358) و 23/ (14876) و (14921) و (15215)، والبخاري (2189) و (2381)، ومسلم (1543) (81) و (82)، وأبو داود (3373) و (3404)، والترمذي (1313)، والنسائي (4592) و (6069) و (6070) و (6097) و (6185).وفي الترخيص في العرايا عن ابن عمر أيضًا سيأتي برقم (8288).قوله: رخص في العرايا، قال ابن الأثير في "النهاية" 3/ 224: قيل: إنه لما نهى عن المزابنة - وهو بيع الثمر في رؤوس النخل بالتمر - رخَّص في جملة المزابنة في العرايا، وهو أنَّ من لا نخل له من ذوي الحاجة يدرك الرطب، ولا نقد بيده يشتري الرطب لعياله، ولا نخل له يطعمهم منه، ويكون قد فَضَل له من قوته تمرٌ، فيجئ إلى صاحب النخل فيقول له: بعني ثمر نخلةٍ أو نخلتين بخَرْصها من التمر، فيعطيه ذلك الفاضلَ من التمر بثمر تلك النخلات ليصيب من رطبها مع الناس، فرخَّص فيه إذا كان دون خمسة أوسق.وقوله: "جادّ عشرة" قال الخطابي: قال إبراهيم الحربي: يريد قدرًا من النخل يُجَدُّ منه عشرة أوسق، وتقديره تقدير مجدود فاعل بمعنى مفعول.وأراد بالقنو: العِذق بما عليه من الرطب والبسر، يعلَّق للمساكين يأكلونه، وهذا من صدقة المعروف دون الصدقة التي هي فرض واجب.
1538 - أخبرني أحمد بن سَهْل بن حَمْدَويهِ الفقيه ببُخارى، حدثنا صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا الليث بن سعد، عن سعيد بن أبي سعيد، عن عبد الرحمن بن بُجَيد، أخي بني حارثة، أنَّ جدَّته حدّثته - وهي أم بُجَيد، وكانت زعمت أنها ممن بايعت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أنها قالت: يا رسول الله، والله إنَّ المسكين لَيَقومُ على بابي، فما أجدُ له شيئًا أُعطِيه إيّاه، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فإن لم تَجِدي شيئًا تُعطيهِ إيَّاه إلَّا ظِلْفًا مُحرَّقًا، فادفَعيهِ إليه في يدِه" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মু বুজাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর শপথ, নিশ্চয়ই দরিদ্র ব্যক্তি আমার দরজায় এসে দাঁড়ায়, কিন্তু তাকে দেওয়ার মতো কোনো কিছুই আমি খুঁজে পাই না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "যদি তুমি তাকে দেওয়ার জন্য একটি পুড়ে যাওয়া ক্ষুর (পশুর পায়ের অংশ) ছাড়া আর কিছুই না পাও, তবে তা-ই তার হাতে তুলে দাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي، عبد الرحمن بن بجيد مختلف في صحبته، وذكر الحافظ في "التقريب" أنَّ له رؤية، وقد روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح الترمذي حديثه هذا. أم بجيد: يقال: اسمها حواء.وأخرجه أحمد 45/ (27149) و (27150)، وأبو داود (1667)، والترمذي (665)، والنسائي (2366)، وابن حبان (3337) من طرق عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وصحَّحه الترمذي.وأخرجه أحمد (27148) و (27151) من طريقين عن سعيد المقبري، به.وأخرج أحمد 45/ (27450)، والنسائي (2357)، وابن حبان (3374) من طريق زيد بن أسلم، وأحمد 27/ (16648)، و 38/ (23233) و 45/ (27152) من طريق منصور بن حيان، كلاهما عن ابن بجيد، عن جدته: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ردُّوا السائل ولو بظِلف محرَّق"، والظِّلف، قال في "القاموس" بالكسر للبقرة والشاة وشِبهها بمنزلة القدم لنا.وقوله صلى الله عليه وسلم: "ظِلفًا محرَّقًا" المقصود به المبالغة، وإلّا فالظلف المحترق لا ينتفع به عادةً. و"جامع معمر" (19522) وسائر مصادر التخريج التي خرجته من طريق معمر، ويقال في اسمه: خالد بن زيد، فهما واحد على الراجح، كما فصلنا ذلك فيما سيأتي برقم (2498).
1539 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، حدثنا عبد الرزاق.وأخبرنا محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن يحيى بن أبي كَثِير، عن زيد بن سلَّام، عن عبد الله بن زيد الأزدي [1]، عن عُقبةَ بن عامر الجُهَني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "غَيْرَتانِ إحداهما يحبُّها الله، والأخرى يُبغِضُها الله، ومَخِيلَتان إحداهما يُحبُّها الله والأخرى يُبغِضُها الله، فالغَيرةُ في الرِّيبة يحبُّها الله، والغَيرة في غير رِيبةٍ يُبغِضُها الله [2]، والمَخِيلةُ إذا تصدَّق الرجلُ يُحبُّها الله، والمَخِيلة من الكِبْر يُبغِضُها الله" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবনে আমের আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুই প্রকারের আত্মমর্যাদাবোধ বা ঈর্ষা (গাইরাত) রয়েছে। এর একটিকে আল্লাহ পছন্দ করেন এবং অপরটিকে তিনি অপছন্দ করেন। আর দুই প্রকারের অহংকার (মাখীলা) রয়েছে। এর একটিকে আল্লাহ পছন্দ করেন এবং অপরটিকে তিনি অপছন্দ করেন। সন্দেহের কারণে যে গাইরাত সৃষ্টি হয়, আল্লাহ তা পছন্দ করেন। আর সন্দেহ ছাড়া যে গাইরাত সৃষ্টি হয়, আল্লাহ তা অপছন্দ করেন। আর কোনো লোক যখন সাদাকাহ করে, তখন যে অহংকার/গর্ব (মাখীলা) প্রকাশ পায়, আল্লাহ তা পছন্দ করেন। আর অহংকারবশত (كبر) যে মাখীলা হয়, আল্লাহ তা অপছন্দ করেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقعت نسبته في نسخ "المستدرك" التي بين أيدينا، وهو خطأ، صوابه: الأزرق، وقد كتب في هامش (ز): لعله الأزرق. وكذا جاءت تسميته بالأزرق في "إتحاف المهرة" 11/ 206، و"جامع معمر" (19522) وسائر مصادر التخريج التي خرجته من طريق معمر، ويقال في اسمه: خالد بن زيد، فهما واحد على الراجح، كما فصلنا ذلك فيما سيأتي برقم (2498).
[2] من قوله: "فالغيرة" إلى هنا سقط من (ز) و (ب) و (ع)، وأُثبتت في هامش (ص) وأشير عليها بعلامة صح. قوله: "استقرضتُ عبدي" أي: استقرضه عبدٌ من عبادي ذو حاجة.
1539 [3] - إسناده حسن إن شاء الله، انظر تعليقنا على الحديث رقم (2498).وأخرجه أحمد 28/ (17398) عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.المخيلة: بمعنى الخُيَلاء، وهو الكبر.والريبة: هي مواضع الشك والتهمة. قوله: "استقرضتُ عبدي" أي: استقرضه عبدٌ من عبادي ذو حاجة.
1540 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه إملاءً ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكرَم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يقول الله عز وجل: استَقرضْتُ عبدي فلم يُقرِضْني، وشَتَمَني عبدي وهو لا يَدرِي، يقول: وادَهْراهْ، وادَهْراهْ، وأنا الدَّهرُ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্ল বলেন: “আমি আমার বান্দার কাছে ঋণ চেয়েছিলাম, কিন্তু সে আমাকে ঋণ দেয়নি। আর আমার বান্দা আমাকে গালি দিয়েছে অথচ সে তা জানে না। সে বলে: ‘হায় যুগ! হায় যুগ!’ অথচ আমিই তো কাল (বা সময়)।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، محمد بن إسحاق - وإن عنعن - قد توبع، وهو حسن الحديث. العلاء بن عبد الرحمن: هو ابن يعقوب الجُهَني مولى الحُرَقة.وأخرجه أحمد 16/ (10578) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7988) عن محمد بن يزيد الواسطي، عن محمد بن إسحاق، به.وقد تابع ابنَ إسحاق عن العلاء على لفظ حديثه هذا: إبراهيم بن طهمان في "مشيخته" (105)، ومحمد بن جعفر بن أبي كثير عند الطبري في "تفسيره" 2/ 13، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 153، وكلاهما ثقة.وسيأتي الحديث من طريق محمد بن مسلمة عن يزيد بن هارون برقم (3858).وسيأتي بنحوه من طريق سعيد بن المسيب عن أبي هريرة برقم (3732) و (3734)، ومن طريق الأعرج عن أبي هريرة برقم (3733). قوله: "استقرضتُ عبدي" أي: استقرضه عبدٌ من عبادي ذو حاجة.