আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1581 - كما حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى البِرْتي، حدثنا أبو مَعمَر، حدثنا عبد الوارث، عن أيوب، عن عِكرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتَجَمَ وهو صائم [1]. فاسمع الآن كلامَ إمام أهل الحديث في عصره بلا مدافَعَة على هذا الحديث، لتستدلَّ به على أرشد الصواب.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিয়াম অবস্থায় শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (রক্তমোক্ষণ করেছিলেন)। সুতরাং, এখন তুমি এই হাদীস সম্পর্কে তাঁর সময়ের অপ্রতিদ্বন্দ্বী হাদীস বিশারদ ইমামের বক্তব্য শোনো, যাতে তুমি এর মাধ্যমে সঠিক পথের সর্বাধিক সঠিক দিকনির্দেশনা লাভ করতে পারো।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو المنقري، وعبد الوارث: هو ابن سعيد العنبري، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وعكرمة: هو مولى ابن عباس.وأخرجه البخاري (1939) و (5694)، وأبو داود (2372)، وابن حبان (3531) من طريق أبي معمر، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (775)، والنسائي (3204) عن بشر بن هلال البصري، عن عبد الوارث، به.لكن وقع في رواية الترمذي: احتجم وهو محرِم صائم. وقال الترمذي بإثره: حسن صحيح.وأخرجه البخاري (1938)، والنسائي (3205) من طريق وهيب بن خالد، والنسائي (3206) من طريق حماد بن زيد، كلاهما عن أيوب السختياني، به. وفيه: احتجم وهو محرم، واحتجم وهو صائم. واقتصر النسائي في الموضع الأول مع الصيام.وأخرجه النسائي (3202) من طريق الحسن بن زيد، و (3203) من طريق هشام بن حسان، كلاهما عن عكرمة، به. ولفظ رواية هشام: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم احتجم بمكان يقال له: لَحْي جمل وهو صائم.وأخرجه النسائي (3207) من طريق حماد بن زيد، و (3208) من طريق معمر، و (3209) من طريق إسماعيل ابن علية، ثلاثتهم عن أيوب السختياني، و (3210) من طريق جعفر بن ربيعة، كلاهما (أيوب وجعفر) عن عكرمة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا.وأخرج أحمد 3/ (1849)، وأبو داود (2373)، وابن ماجه (1682) و (3081)، والترمذي (777)، والنسائي (3212) و (3213) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن مقسم، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتجم وهو صائم محرم. وهذا إسناد ضعيف، قال النسائي: يزيد بن أبي زياد لا يحتج بحديثه.وأخرجه أحمد 4/ (2186) و (2536) و (2594) و (3211)، والنسائي (3211) و (3214) من طريق شعبة، عن الحكم بن عتيبة، والنسائي (3215) من طريق خصيف بن عبد الرحمن، كلاهما عن مقسم، عن ابن عباس، رفعه. وقع إحدى روايات الحكم عند النسائي (3214) وفي رواية خصيف: احتجم وهو صائم محرم. قال النسائي: الحكم لم يسمعه من مقسم. قلنا: وخصيف سيئ الحفظ وقد خلط بأخرة.وأخرجه الترمذي (776)، والنسائي (3218) من طريق محمد بن عبد الله الأنصاري، عن حبيب ابن الشهيد، عن ميمون بن مهران، عن ابن عباس، رفعه. وقع في رواية النسائي: احتجم وهو محرم صائم. قال النسائي: هذا منكر، لا نعلم أحدًا رواه عن حبيب غير الأنصاري، ولعله أراد: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم تزوج ميمونة.وأخرجه النسائي (3216) من طريق قبيصة بن عقبة، عن سفيان الثوري، عن حماد بن أبي سليمان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، رفعه. قال النسائي: هذا خطأ، لا نعلم أحدًا رواه عن سفيان غير قبيصة، وقبيصة كثير الخطأ.وأخرجه النسائي (3217) من طريق أبي هاشم الرماني، عن حماد بن أبي سليمان مرسلًا.وانظر ما سيأتي برقم (1682) و (8442).
1582 - سمعتُ أبا بكر بن جعفر المزكِّي يقول: سمعتُ أبا بكر محمدَ بن إسحاق بن خُزيمةَ يقول: قد ثبتت الأخبار عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "أفطَرَ الحاجِمُ والمحجوم"، فقال بعضُ من خالَفَنا في هذه المسألة: إنَّ الحِجامة لا تُفطِّر الصائم، واحتجَّ بأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم احتَجَم وهو صائمٌ مُحرِم، وهذا الخبر غير دالٍّ على أنَّ الحجامة لا تُفطِّر الصائم، لأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم إنما احتَجَم وهو صائمٌ محرمٌ في سفرٍ لا في حَضَر، لأنه لم يكن قطُّ مُحرِمًا مقيمًا ببلده، إنما كان مُحرِمًا وهو مسافر، والمسافر [1] وإن كان ناويًا للصوم وقد مضى عليه بعضُ النهار وهو صائمٌ [2] الأكلُ والشربُ، وإن كان الأكلُ والشربُ يفطِّرانه، لا كما توهَّم بعضُ العلماء أنَّ المسافر إذا دَخَلَ في الصوم لم يكن له أن يُفطِر إلى أن يُتمَّ صومَه ذلك اليومَ الذي دَخَلَ فيه، فإذا كان له أن يأكلَ ويشربَ وقد دخل في الصَّوم ونواهُ ومضى بعضُ النهار وهو صائمٌ، جاز له أن يَحتجِم وهو مسافرٌ في بعض نهار الصوم، وإن كانت الحِجامة تفطِّره.
আবূ বাকর ইবনু জা‘ফর আল-মুযাক্কী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবূ বাকর মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক ইবনু খুযাইমাহকে বলতে শুনেছি: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই মর্মে একাধিক বর্ণনা প্রমাণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: "যে শিঙ্গা লাগায় (রক্ত বের করে) এবং যাকে শিঙ্গা লাগানো হয়, তাদের উভয়ের রোযা ভেঙে যায়।" কিন্তু যারা এই মাসআলায় আমাদের বিরোধী, তাদের কেউ কেউ বলেছেন যে, শিঙ্গা লাগানো রোযাদারের রোযা নষ্ট করে না। তারা এই মর্মে যুক্তি দেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় রোযা রেখে শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন। কিন্তু এই বর্ণনাটি একথা প্রমাণ করে না যে শিঙ্গা লাগালে রোযা ভাঙে না। কারণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইহরাম অবস্থায় রোযা রেখে শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন, তখন তিনি সফরে ছিলেন, মুকিম (স্থায়ীভাবে অবস্থানকারী) ছিলেন না। তিনি কখনওই স্বদেশে অবস্থানরত অবস্থায় ইহরাম বাঁধেননি, বরং তিনি মুসাফির (সফরকারী) অবস্থায় ইহরাম বাঁধতেন। মুসাফিরের জন্য রোযা রাখার নিয়ত করা সত্ত্বেও, এবং দিনের কিছুটা অংশ রোযা অবস্থায় কেটে যাওয়ার পরেও, পানাহার করা (রোযা ভেঙে ফেলা) জায়িয। যদিও পানাহার রোযাকে ভঙ্গ করে দেয়, যেমনটি কতিপয় আলিম ধারণা করেন যে, মুসাফির একবার রোযা শুরু করলে সেই দিনটি পূর্ণ করা পর্যন্ত তার জন্য রোযা ভাঙার অনুমতি থাকে না। অতএব, যখন তার জন্য রোযার নিয়ত করার পর এবং দিনের কিছু অংশ রোযা অবস্থায় কাটানোর পর পানাহার করা (রোযা ভেঙে দেওয়া) জায়িয, তখন তার জন্য রোযার দিনের কিছু অংশে সফররত অবস্থায় শিঙ্গা লাগানোও জায়িয ছিল, যদিও শিঙ্গা লাগানো রোযা ভঙ্গ করে দেয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في نسخنا الخطية وفي "صحيح ابن خزيمة"، ولعلَّ الصواب: "وللمسافر" فبذلك يستقيم الكلام، والله أعلم. فهو متابع، لكن قد اختُلف في رفعه ووقفه كما سيأتي. أبو الوليد الفقيه: اسمه حسان بن محمد، وأبو علي الحافظ: اسمه الحسين بن علي، وأبو يعلى: هو أحمد بن علي بن المثنى الحافظ صاحب "المسند"، وأبو رافع: هو نفيع الصائغ.وأخرجه النسائي (3195) عن الحسن بن إسحاق، عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد. وقال النسائي: هذا خطأ، وقد وقفه حفص.ثم أخرجه النسائي (3196) من طريق حفص بن عبد الرحمن البلخي، عن سعيد بن أبي عروبة، به إلى أبي موسى موقوفًا، لم يرفعه.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3200) من طريق شعبة، عن قتادة، عن بكر بن عبد الله، به.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3201) من طريق حميد الطويل، عن بكر بن عبد الله، عن أبي العالية، عن أبي موسى.لكن سأل ابن أبي حاتم أبا زرعة: موقوف أو مرفوع؟ قال: فسكت. كما في "العلل" 3/ 50 (682).وأخرجه النسائي (3199) من طريق حفص، عن سعيد بن أبي عروبة، عن أبي مالك، عن ابن بريدة قال: دخلت على أبي موسى وهو يحتجم … فذكره مرفوعًا. قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: ولا أعرف من البصريين أحدًا كنيته أبو مالك من القدماء، إلّا عبيد الله بن الأخنس.وأخرجه مرفوعًا أيضًا النسائي (3197) من طريق عبد الأعلى، و (3198) من طريق سعيد بن عامر، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن بعض أصحابنا - قال سعيد بن عامر: عن صاحب له - عن ابن بريدة عن أبي موسى.قال أبو زرعة وأبو حاتم كما في "العلل" 3/ 49 و 50: كأن حديث أبي رافع أشبه.قلنا: وانظر "تنقيح التحقيق" لابن عبد الهاد" 3/ 269 - 271.
[2] تحرف في المطبوع إلى: مباح. فهو متابع، لكن قد اختُلف في رفعه ووقفه كما سيأتي. أبو الوليد الفقيه: اسمه حسان بن محمد، وأبو علي الحافظ: اسمه الحسين بن علي، وأبو يعلى: هو أحمد بن علي بن المثنى الحافظ صاحب "المسند"، وأبو رافع: هو نفيع الصائغ.وأخرجه النسائي (3195) عن الحسن بن إسحاق، عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد. وقال النسائي: هذا خطأ، وقد وقفه حفص.ثم أخرجه النسائي (3196) من طريق حفص بن عبد الرحمن البلخي، عن سعيد بن أبي عروبة، به إلى أبي موسى موقوفًا، لم يرفعه.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3200) من طريق شعبة، عن قتادة، عن بكر بن عبد الله، به.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3201) من طريق حميد الطويل، عن بكر بن عبد الله، عن أبي العالية، عن أبي موسى.لكن سأل ابن أبي حاتم أبا زرعة: موقوف أو مرفوع؟ قال: فسكت. كما في "العلل" 3/ 50 (682).وأخرجه النسائي (3199) من طريق حفص، عن سعيد بن أبي عروبة، عن أبي مالك، عن ابن بريدة قال: دخلت على أبي موسى وهو يحتجم … فذكره مرفوعًا. قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: ولا أعرف من البصريين أحدًا كنيته أبو مالك من القدماء، إلّا عبيد الله بن الأخنس.وأخرجه مرفوعًا أيضًا النسائي (3197) من طريق عبد الأعلى، و (3198) من طريق سعيد بن عامر، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن بعض أصحابنا - قال سعيد بن عامر: عن صاحب له - عن ابن بريدة عن أبي موسى.قال أبو زرعة وأبو حاتم كما في "العلل" 3/ 49 و 50: كأن حديث أبي رافع أشبه.قلنا: وانظر "تنقيح التحقيق" لابن عبد الهاد" 3/ 269 - 271.
1583 - حدثنا أحمد بن كامل القاضي، حدثنا محمد بن سعد العَوْفي، حدثنا رَوْح بن عُبادةَ.وحدثنا علي بن عيسى، حدثنا أحمد بن النَّضْر بن عبد الوهاب.وحدثنا أبو الوليد الفقيه، حدثنا الحسن بن سفيان.وأخبرني أبو عليٍّ الحافظ، أخبرنا أبو يعلى؛ قالوا: حدثنا أبو خَيثَمة زُهير بن حرب، حدثنا رَوْح بن عُبادةَ، عن سعيد بن أبي عَرُوبةَ، عن مَطَر الورَّاق، عن بكر بن عبد الله المُزَني، عن أبي رافع قال: دخَلْنا على أبي موسى وهو يَحتجِمُ بعد المغرب، فقلت: ألا احتَجَمتَ نهارًا؟ فقال: تأمرُني أن أُهريقَ دمي وأنا صائم؟! سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أفطَرَ الحاجمُ والمحجوم" [1]. 1583/ 1 - سمعتُ أبا عليٍّ الحافظ يقول: قلتُ لعَبْدان الأهوازيِّ: صحَّ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم احتَجَم وهو صائم؟ فقال: سمعتُ عباس العَنْبريَّ يقول: سمعتُ عليَّ بن المَدِيني يقول: قد صحَّ حديثُ أبي رافع عن أبي موسى، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال: "أفطَرَ الحاجمُ والمحجوم" [2].هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.وفي الباب عن جماعة من الصحابة بأسانيد مستقيمة مما يطول شرحُه في هذا الموضع.1583/ 2 - سمعت أبا الحسن أحمد بن محمد العَنَزي يقول: سمعتُ عثمان بنَ سعيد الدارميّ يقول: قد صحَّ عندي حديث "أفطَرَ الحاجم والمحجوم" لحديث ثَوْبانَ وشدّادِ بن أوس، وأقول به، وسمعتُ أحمد بن حنبل يقول به، ويَذكُر أنه صحَّ عنده حديثُ ثوبان وشداد.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ রাফি’ বলেন: আমরা আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তখন তিনি মাগরিবের (নামাজের) পর রক্তমোক্ষণ (হিজামা) করাচ্ছিলেন। আমি বললাম, আপনি দিনের বেলায় রক্তমোক্ষণ করালেন না কেন? তিনি বললেন, তুমি কি আমাকে এমন নির্দেশ দিচ্ছো যে আমি আমার রক্ত বের করে দেই অথচ আমি রোযাদার?! আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "যে রক্তমোক্ষণ করে (শিঙ্গা লাগায়) এবং যাকে রক্তমোক্ষণ করানো হয় (যার শিঙ্গা লাগানো হয়), উভয়েরই রোযা ভেঙ্গে যায়।"
আবূ আলী আল-হাফিযকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন, আমি আবদান আল-আহওয়াযীকে জিজ্ঞেস করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোযা অবস্থায় রক্তমোক্ষণ (হিজামা) করিয়েছিলেন—এ কথা কি সহীহ? তিনি বললেন, আমি আব্বাস আল-আম্বারীকে বলতে শুনেছি, তিনি আলী ইবনুল মাদীনীকে বলতে শুনেছেন: আবূ রাফি’ সূত্রে আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি সহীহ যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে রক্তমোক্ষণ করে এবং যাকে রক্তমোক্ষণ করানো হয়, উভয়েরই রোযা ভেঙ্গে যায়।"
এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি নিজ নিজ গ্রন্থে সংকলন করেননি। এই বিষয়ে সাহাবীগণের একদল থেকে একাধিক সরল ও সঠিক সূত্রে বর্ণিত হাদীস রয়েছে, যার ব্যাখ্যা এখানে দীর্ঘ করা হবে।
আবূল হাসান আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-আনাযীকে বলতে শুনেছি, তিনি উসমান ইবনু সাঈদ আদ-দারিমীকে বলতে শুনেছেন: সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও শাদ্দাদ ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের কারণে আমার কাছে "যে রক্তমোক্ষণ করে এবং যাকে করানো হয় উভয়েরই রোযা ভেঙ্গে যায়" হাদীসটি সহীহ প্রমাণিত। আমি এই মতই পোষণ করি। আমি আহমাদ ইবনু হাম্বলকেও এই মত পোষণ করতে শুনেছি। তিনি উল্লেখ করেছেন যে সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস তাঁর কাছেও সহীহ প্রমাণিত।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل مطر بن طهمان الوراق، وأما محمد بن سعد العوفي - وإن لينه بعضهم - فهو متابع، لكن قد اختُلف في رفعه ووقفه كما سيأتي. أبو الوليد الفقيه: اسمه حسان بن محمد، وأبو علي الحافظ: اسمه الحسين بن علي، وأبو يعلى: هو أحمد بن علي بن المثنى الحافظ صاحب "المسند"، وأبو رافع: هو نفيع الصائغ.وأخرجه النسائي (3195) عن الحسن بن إسحاق، عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد. وقال النسائي: هذا خطأ، وقد وقفه حفص.ثم أخرجه النسائي (3196) من طريق حفص بن عبد الرحمن البلخي، عن سعيد بن أبي عروبة، به إلى أبي موسى موقوفًا، لم يرفعه.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3200) من طريق شعبة، عن قتادة، عن بكر بن عبد الله، به.وأخرجه موقوفًا أيضًا (3201) من طريق حميد الطويل، عن بكر بن عبد الله، عن أبي العالية، عن أبي موسى.لكن سأل ابن أبي حاتم أبا زرعة: موقوف أو مرفوع؟ قال: فسكت. كما في "العلل" 3/ 50 (682).وأخرجه النسائي (3199) من طريق حفص، عن سعيد بن أبي عروبة، عن أبي مالك، عن ابن بريدة قال: دخلت على أبي موسى وهو يحتجم … فذكره مرفوعًا. قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه: ولا أعرف من البصريين أحدًا كنيته أبو مالك من القدماء، إلّا عبيد الله بن الأخنس.وأخرجه مرفوعًا أيضًا النسائي (3197) من طريق عبد الأعلى، و (3198) من طريق سعيد بن عامر، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن بعض أصحابنا - قال سعيد بن عامر: عن صاحب له - عن ابن بريدة عن أبي موسى.قال أبو زرعة وأبو حاتم كما في "العلل" 3/ 49 و 50: كأن حديث أبي رافع أشبه.قلنا: وانظر "تنقيح التحقيق" لابن عبد الهاد" 3/ 269 - 271.
[2] أثر علي بن المديني هذا رواه ابن خزيمة (1964) عن عباس - وهو ابن عبد العظيم - العنبري.
1584 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر بن سابِق الخَوْلاني، حدثنا بِشْر بن بكر، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن سُلَيم بن عامر أبي يحيى الكَلَاعي، قال: حدثني أبو أُمامةَ الباهلي قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "بَيْنا أنا نائمٌ إذ أتاني رجلان، فأخذا بضَبْعيَّ فأتَيا بي جبلًا وَعْرًا، فقالا لي: اصعَدْ، فقلت: إني لا أُطيقه، فقالا: إنا سنُسهِّلُه لك، فصَعَّدْتُ، حتى إذا كنتُ في سواء الجبل إذا أنا بأصواتٍ شديدةٍ، فقلتُ: ما هذه الأصوات؟ قالوا: هذا عُواءُ أهل النار، ثم انطُلِقَ بي، فإذا أنا بقومٍ مُعلَّقين بعَرَاقيبهم، مُشقَّقةٍ أشداقُهم، تسيلُ أشداقُهم دمًا، قال: قلتُ: من هؤلاء؟ قال: هؤلاء الذين يُفطِرون قبل تَحِلَّة صومِهم" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলাম, এমন সময় দুজন লোক আমার কাছে আসল। তারা আমার দু’বাহু ধরে আমাকে একটি কঠিন (দুর্গম) পর্বতের কাছে নিয়ে গেল। এরপর তারা আমাকে বলল: আরোহণ করুন। আমি বললাম: আমি এতে সক্ষম নই। তারা বলল: আমরা আপনার জন্য সহজ করে দেব। অতঃপর আমি আরোহণ করলাম। আমি যখন পাহাড়ের সমতলে পৌঁছালাম, তখন প্রচণ্ড আওয়াজ শুনতে পেলাম। আমি বললাম: এই আওয়াজ কিসের? তারা বলল: এটা জাহান্নামবাসীদের আর্তনাদ। এরপর আমাকে সামনে নিয়ে যাওয়া হলো। সেখানে আমি এমন একদল লোককে দেখতে পেলাম, যাদেরকে তাদের গোড়ালির রগগুলোতে ঝুলিয়ে রাখা হয়েছে, তাদের গাল চিরে দেওয়া হয়েছে এবং তাদের গাল থেকে রক্ত ঝরছে। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: এরা কারা? তারা বলল: এরা হলো সেই সমস্ত লোক, যারা রোযা পূর্ণ হওয়ার পূর্বেই (অবৈধভাবে) তা ভেঙ্গে ফেলত।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. بشر بن بكر: هو التِّنِّيسي.وأخرجه النسائي (3273) من طريق الوليد بن مسلم، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2883)، وذكرنا غريب ألفاظه هناك. ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه ابن حبان (3521) من طريق إبراهيم بن محمد بن مرزوق، عن محمد بن عبد الله الأنصاري، بهذا الإسناد.وأخرج النسائي (3264) من طريق علي بن بكار، عن محمد بن عمرو، به عن أبي هريرة رفعه، في الرجل يأكل في شهر رمضان ناسيًا، قال: "الله أطعمه وسقاه". قال النسائي: هذا حديث منكر من حديث محمد بن عمرو.وأخرج أحمد 15/ (9136)، والبخاري (6669)، وابن ماجه (1673)، والترمذي (722) من طريق خِلاس بن عمرو ومحمد بن سيرين، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "من أكل ناسيًا وهو صائم فليتم صومه، فإنما أطعمه الله وسقاه". وهذا لفظ البخاري.وأخرجه كذلك أحمد 15/ (9489) و 16/ (10369) و (10393) و (10665)، والبخاري (1933)، ومسلم (1155)، وأبو داود (2398)، والنسائي (3262) و (3263)، وابن حبان (3519) و (3520) و (3522) من طريق محمد بن سيرين وحده، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد 16/ (10348) من طريق أبي رافع، عن أبي هريرة.
1585 - أخبرني أبو عبد الرحمن محمد بن عبد الله التاجر، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أفطَرَ في رمضانَ ناسيًا، فلا قَضاءَ عليه ولا كفَّارةَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি রমযানে ভুলবশতঃ রোযা ভাঙে, তার উপর কোনো কাযা (প্রতিবিধান) নেই এবং কোনো কাফ্ফারাও নেই।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة بن وقاص الليثي. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه ابن حبان (3521) من طريق إبراهيم بن محمد بن مرزوق، عن محمد بن عبد الله الأنصاري، بهذا الإسناد.وأخرج النسائي (3264) من طريق علي بن بكار، عن محمد بن عمرو، به عن أبي هريرة رفعه، في الرجل يأكل في شهر رمضان ناسيًا، قال: "الله أطعمه وسقاه". قال النسائي: هذا حديث منكر من حديث محمد بن عمرو.وأخرج أحمد 15/ (9136)، والبخاري (6669)، وابن ماجه (1673)، والترمذي (722) من طريق خِلاس بن عمرو ومحمد بن سيرين، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "من أكل ناسيًا وهو صائم فليتم صومه، فإنما أطعمه الله وسقاه". وهذا لفظ البخاري.وأخرجه كذلك أحمد 15/ (9489) و 16/ (10369) و (10393) و (10665)، والبخاري (1933)، ومسلم (1155)، وأبو داود (2398)، والنسائي (3262) و (3263)، وابن حبان (3519) و (3520) و (3522) من طريق محمد بن سيرين وحده، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد 16/ (10348) من طريق أبي رافع، عن أبي هريرة.
1586 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا موسى بن إسحاق بن موسى الخَطْمي [1]، حدثنا أبي، حدثنا أنس بن عِيَاض عن الحارث بن عبد الرحمن، عن عمِّه، عن أبي هريرةَ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ليسَ الصِّيامُ من الأكل والشرب، إنما الصيامُ من اللَّغْو والرَّفَث، فإن سابَّكَ أحدٌ أو جَهِلَ عليك فقل: إنِّي صائم، إنِّي صائم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রোযা কেবল পানাহার থেকে বিরত থাকার নাম নয়। নিশ্চয় রোযা হলো অনর্থক কথা এবং অশ্লীলতা থেকে বিরত থাকার নাম। যদি কেউ তোমাকে গালি দেয় বা তোমার সাথে মূর্খতাপূর্ণ আচরণ করে, তবে তুমি বলো: আমি রোযাদার, আমি রোযাদার।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: الحنظلي، والتصويب من "إتحاف المهرة" 5/ 136. و 16/ (9998)، والبخاري (1894)، ومسلم (1151) (160)، وأبو داود (2363)، والنسائي (3239) و (3240) و (3256)، وابن حبان (3416) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وأحمد 13/ (7693)، والبخاري (1904)، ومسلم (1151) (163)، وابن ماجه (1691)، والنسائي (3241) و (3242) من طريق أبي صالح ذكوان السمان، والترمذي (764)، والنسائي (3244)، وابن حبان (3484) من طريق سعيد بن المسيب، وأحمد 15/ (9532)، والنسائي (3246)، وابن حبان (3483) من طريق عجلان مولى المشمعل، وابن حبان (3416) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي، و (3482) من طريق أبي حازم، ستتهم عن أبي هريرة، ولفظه - وهو للبخاري -: "إذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصخب، فإنَّ سابَّه أحد أو قاتله فليقل: إني امرؤ صائم".وأخرج أحمد 15/ (9839) و 16/ (10562)، والبخاري (1903) و (6057)، وأبو داود (2362)، وابن ماجه (1689)، والترمذي (707)، والنسائي (3233) و (6234)، وابن حبان (3480) من طريق أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة رفعه: "من لم يدع قول الزور والعمل به، فليس لله حاجة في أن يدع طعامه وشرابه".
[2] صحيح دون قوله: "ليس الصيام من الأكل والشرب"، فقد تفرد به الحارث بن عبد الرحمن - وهو ابن أبي ذباب - عن عمه، وهذا الأخير قد سماه ابن حبان: عبد الله بن المغيرة بن أبي ذباب، وذكره في "الثقات"، ولا يعرف حاله.وأخرجه ابن حبان (3479) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن الحارث بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد.وقد روي الحديث بنحوه وفي معناه من غير وجه عن أبي هريرة، فقد أخرجه أحمد 12/ (7340) و 16/ (9998)، والبخاري (1894)، ومسلم (1151) (160)، وأبو داود (2363)، والنسائي (3239) و (3240) و (3256)، وابن حبان (3416) من طريق عبد الرحمن الأعرج، وأحمد 13/ (7693)، والبخاري (1904)، ومسلم (1151) (163)، وابن ماجه (1691)، والنسائي (3241) و (3242) من طريق أبي صالح ذكوان السمان، والترمذي (764)، والنسائي (3244)، وابن حبان (3484) من طريق سعيد بن المسيب، وأحمد 15/ (9532)، والنسائي (3246)، وابن حبان (3483) من طريق عجلان مولى المشمعل، وابن حبان (3416) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي، و (3482) من طريق أبي حازم، ستتهم عن أبي هريرة، ولفظه - وهو للبخاري -: "إذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصخب، فإنَّ سابَّه أحد أو قاتله فليقل: إني امرؤ صائم".وأخرج أحمد 15/ (9839) و 16/ (10562)، والبخاري (1903) و (6057)، وأبو داود (2362)، وابن ماجه (1689)، والترمذي (707)، والنسائي (3233) و (6234)، وابن حبان (3480) من طريق أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة رفعه: "من لم يدع قول الزور والعمل به، فليس لله حاجة في أن يدع طعامه وشرابه".
1587 - أخبرنا أبو بكر بن أبي نصر المروَزي، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا قُتيبة بن سعيد البَلْخي، حدثنا إسماعيل بن جعفر، حدثنا عمرو بن أبي عمرو، عن أبي سعيد المَقبُري، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رُبَّ صائمٍ حَظُّه من صيامِه الجُوعُ، ورُبَّ قائمٍ حَظُّه من قيامِه السَّهَر" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অনেক রোজাদার এমন আছে যাদের রোজা পালনের ভাগ্যে জুটে শুধু ক্ষুধা। আর অনেক রাত জাগরণকারী এমন আছে যাদের রাত জাগরণের ভাগ্যে জুটে শুধু নির্ঘুমতা।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده جيد، عمرو بن أبي عمرو - وهو المدني مولى المطَّلب - وإن روى عن الشيخان، فيه كلام يحطه عن رتبة الصحيح، وباقي رجال الإسناد ثقات.وأخرجه أحمد 14/ (8856) عن سليمان بن داود الهاشمي، عن إسماعيل بن جعفر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان (3481) من طريق عبد العزيز بن محمد، عن عمرو بن أبي عمرو، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة.وأخرجه النسائي (3236) من طريق حبان بن موسى، عن عبد الله بن المبارك، عن أسامة بن زيد الليثي، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد 15/ (9685) عن أبي خالد الأحمر.وأخرجه ابن ماجه (1690) عن عمرو بن رافع، والنسائي (3237) من طريق يحيى بن آدم، كلاهما عن عبد الله بن المبارك، كلاهما (أبو خالد الأحمر وابن المبارك) عن أسامة بن زيد الليثي، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة.وأخرجه النسائي (3238) و (3319) من طريق سويد بن نصر، عن ابن المبارك، عن أسامة بن زيد، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة قوله، موقوفًا.وأخرج أحمد 15/ (9839) و 16/ (10562)، والبخاري (1903) و (6057)، وأبو داود (2362)، وابن ماجه (1989)، والترمذي (707) والنسائي (3235) من طرق - من ضمنها طريق عبد الله بن المبارك - عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من لم يدع قول الزور والعمل به والجهل، فليس لله حاجة أن يدع طعامه وشرابه".وأخرجه كذلك ابن حبان (3480) من طريق عبد الله بن المبارك، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم.وانظر "علل الدارقطني" (2073).وأخرجه كذلك بلفظ "من لم يدع قول الزور … " النسائي (3232) من طريق يونس بن يحيى بن نباتة، عن ابن أبي ذئب، عن ابن شهاب، عن عبد الله بن ثعلبة بن صُعير، عن أبي هريرة، رفعه. وقال النسائي بإثره: هذا حديث منكر، ولا أعلم أحدًا روى هذا الحديث عن الزهري غير ابن أبي ذئب إن كان يونس بن يحيى يحفظه عنه.
1588 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب بهَمَذان، حدثنا أبو حاتم وإبراهيم بن نصر الرّازيّان، قالا: حدثنا أبو الوليد الطيالسي، حدثنا الليث بن سعد، عن بُكَير بن عبد الله بن الأشَجّ، عن عبد الملك بن سعيد بن سُوَيد الأنصاري، عن جابر بن عبد الله، عن عمر بن الخطاب أنه قال: هَشِشْتُ يومًا فقبَّلتُ وأنا صائم، فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقلت: صَنعتُ اليوم أمرًا عظيمًا فقبلتُ وأنا صائم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أرأيتَ لو تَمَضْمَضْتَ ماءً وأنت صائمٌ؟ " قال: فقلت: لا بأسَ بذلك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ففيمَ؟ " [1]. حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন আমার মনে কামভাব সৃষ্টি হলো, তাই আমি রোজা অবস্থায় (স্ত্রীকে) চুম্বন করে ফেললাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললাম, আমি আজ একটি বিরাট কাজ করে ফেলেছি—আমি রোজা অবস্থায় চুম্বন করেছি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তুমি রোজা অবস্থায় কুলি করলে কেমন হতো?" তিনি (উমর) বললেন, আমি বললাম, এতে তো কোনো সমস্যা নেই। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তাহলে এতে কিসের সমস্যা?"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، إلَّا أنَّ الإمام أحمد قد ضعفه وقال: هذا ريح، ليس من هذا شيء، فيما نقله عنه ابن قدامة في "المغني" 4/ 361، وابن عبد الهادي في "التنقيح" 3/ 235، وقال النسائي: حديث منكر. وأخرجه ابن حبان (3544) عن الفضل بن الحباب الجمحي، عن أبي الوليد هشام بن عبد الملك الطيالسي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 1/ (138) و (372)، وأبو داود (2385)، والنسائي (3036) من طرق عن الليث بن سعد، به.قال النسائي: هذا حديث منكر، وبكير مأمون، وعبد الملك بن سعيد رواه عنه غير واحد، ولا ندري ممن هذا؟! قلنا: ووجه استنكار الإمامين أحمد والنسائي لهذا الحديث مع أنَّ رجاله ثقات، ما قاله ابن عبد الهادي في "التنقيح" 3/ 236 من أنَّ الثابت عن عمر خلافه، قال: روى عبد الرزاق (7406) عن معمر، عن الزهري، عن ابن المسيب: أنَّ عمر بن الخطاب كان ينهى عن القبلة للصائم، فقيل له: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقبل وهو صائم، فقال: من ذا له من الحفظ والعصمة ما لرسول الله صلى الله عليه وسلم؟!وخبر عمر هذا أخرجه أيضًا إسحاق بن راهويه (663) من طريق الزبيدي، عن الزهري، به.وأخرجه مختصرًا ابن أبي شيبة 3/ 61، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 88 من طريق ابن أبي ذئب، عن الزهري، به.لكن مال ابن عبد البر إلى إعمال النصَّين جميعًا، فقد قال في "التمهيد" 5/ 112 - 113: لا أرى معنى حديث ابن المسيب في هذا الباب عن عمر إلّا تنزُّهًا واحتياطًا منه، لأنه قد روي فيه عن عمر حديث مرفوع، ولا يجوز أن يكون عند عمر حديث ويخالفه إلى غيره. ثم روى ابن عبد البر حديث الليث بن سعد عن بكير بن عبد الله، فذكره بإسناده والله تعالى أعلم.قوله: هششتُ، بكسر الشين الأولى وفتحها، من قوله: هَشَّ لهذا الأمر يَهَشُّ ويَهِشُّ هشاشةً، إذا فرح به واستبشر، وارتاح له وخَفَّ. "النهاية" لابن الأثير.
1589 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى [1]، حدثنا مُسدَّد، حدثنا خالد بن عبد الله، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يزالُ الدِّينُ ظاهرًا ما عَجَّل الناسُ الفِطرَ، لأنَّ اليهود والنصارى يُؤخِّرون" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যতদিন মানুষ দ্রুত ইফতার করবে, ততদিন দীন সুস্পষ্ট থাকবে। কারণ ইহুদি ও খ্রিস্টানরা (ইফতার) বিলম্ব করে থাকে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] وقعت تسميته في (ز) و (ص) و (ب): محمد بن يحيى بن محمد وفي (ع): محمد بن محمد، وهو خطأ، صوَّبناه من "إتحاف المهرة" 16/ 122، وهو يحيى بن محمد بن يحيى الذهلي.
[2] صحيح لغيره دون قوله: "لأنَّ اليهود والنصارى يؤخرون"، وهذا إسناد حسن، محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - صدوق حسن الحديث. خالد بن عبد الله: هو الطحان، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه أبو داود (2353) عن وهب بن نعيم، عن خالد بن عبد الله، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 15/ (9810)، وابن ماجه (1698)، والنسائي (3299)، وابن حبان (3503) و (3509) من طرق عن محمد بن عمرو، به.وفي الباب عن سهل بن سعد في "الصحيحين"، وسيأتي برقم (1600).وعن عائشة عند أحمد 40/ (24212)، ومسلم (1099)، وغيرهما.وعن أبي هريرة عند أحمد 12/ (7241)، وابن حبان (3507) و (3508).وعن أنس بن مالك عند ابن حبان (3504) و (3505).وعن أبي ذر عند أحمد 35/ (21507)، وإسناده ضعيف.
1590 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا شُعبة، عن عبد العزيز بن صهيب، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن وَجَدَ تمرًا فليُفطِرْ عليه، ومن لا فليُفطِرْ على الماء، فإنه طَهور" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে খেজুর পাবে, সে যেন তা দিয়ে ইফতার করে, আর যে পাবে না, সে যেন পানি দিয়ে ইফতার করে, কারণ তা (পানি) পবিত্রকারী।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح من فعل النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا إسناد أخطأ فيه سعيد بن عامر الضُّبعي، فقد قال البخاري كما في "العلل الكبير" للترمذي (195): حديث سعيد بن عامر وهم. وقال الترمذي في "سننه": لا نعلم أحدًا رواه عن شعبة مثل هذا غير سعيد بن عامر، وهو حديث غير محفوظ، ولا نعلم له أصلًا من حديث عبد العزيز بن صهيب عن أنس … ثم قال: والصحيح ما روى سفيان الثوري وابن عيينة وغير واحد عن عاصم الأحول، عن حفصة بنت سيرين، عن الرباب، عن سلمان بن عامر. ونحو ذلك قال النسائي، وحديث سلمان بن عامر هو الآتي بعد هذا. لكن ثبت الإفطار على التمر أو على الماء عند عدمه من فعله صلى الله عليه وسلم من حديث أنس، كما سيأتي برقم (1592).وأخرجه الترمذي (694)، والنسائي (3303) و (6679) عن محمد بن عمر المقدَّمي، عن سعيد بن عامر، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
1591 - أخبرني إبراهيم بن إسماعيل القارئ، حدثنا عثمان بن سعيد الدَّارمي، حدثنا قيس بن حفص الدَّارمي، حدثنا عبد الواحد بن زياد، عن عاصم الأحول، عن حَفْصة بنت سِيرين، عن الرَّباب، عن عمِّها سلمان بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا كان أحدُكم صائمًا فليُفطِرْ على التَّمر، فإن لم يَجِدِ التمرَ فعلى الماءِ، فإنَّ الماء طَهور" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرط مسلم:
সালমান ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি রোযা রাখে, সে যেন খেজুর দ্বারা ইফতার করে। যদি সে খেজুর না পায়, তবে যেন পানি দ্বারা ইফতার করে। কেননা পানি পবিত্রকারী।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح من فعل النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا إسناد محتمل للتحسين، فإنَّ الرباب - وهي أم الرائح بنت صُليع - قد ذكرها ابن حبان في "الثقات" وتفردت بالرواية عنها حفصة بنت سيرين، فهي في عداد المجهولين، إلّا أنها تابعية وتروي عن عمها وقد قال الترمذي في حديث الرباب هذا: حسن صحيح، وقال مرة: حديث حسن.وأخرجه أبو داود (2355) عن مسدد، عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16226) و 29/ (17873)، والترمذي (658)، والنسائي (3306) و (6675) من طريق سفيان بن عيينة، وأحمد 26/ (16228) و 29/ (17874)، والترمذي (695) من طريق سفيان الثوري، وأحمد 26/ (16231) و (16237) و 29/ (17876) و (17880)، والترمذي (695) من طريق أبي معاوية الضرير، وابن ماجه (1699) من طريق محمد بن فضيل، والنسائي (3305) من طريق حماد بن زيد، خمستهم عن عاصم الأحول، به. ووقع في رواية ابن عيينة عند الترمذي والنسائي دون أحمد: "إذا أفطر أحدكم فليفطر على تمر، فإنه بركة … " الحديث، قال النسائي: هذا الحرف "فإنه بركة" لا نعلم أحدًا ذكره غير ابن عيينة، ولا أحسبه بمحفوظ، وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وروى الحديث أيضًا هشام بن حسان، واختلف عليه فيه، فرواه مرة عن عاصم الأحول كباقي أصحاب عاصم مرفوعًا، أخرجه أحمد 26/ (16242) و 29/ (17870) عن محمد بن جعفر، والنسائي (3311) من طريق حماد بن مسعدة، و (3312) من طريق يوسف بن يعقوب، ثلاثتهم عن هشام، عن عاصم، به مرفوعًا.ورواه مرة عن حفصةَ دون ذكر عاصم الأحول بينه وبينها، واختلف عليه هنا أيضًا في رفعه ووقفه، فقد أخرجه أحمد 26/ (16232) و 29/ (17877)، وابن حبان (3515) من طريق عبد الرزاق، والنسائي (3307) من طريق إسماعيل ابن علية، و (3308) من طريق قران بن تمام، و (3309) من طريق خالد الحذاء، أربعتهم عن هشام، عن حفصة، به مرفوعًا.وأخرجه أحمد 26/ (16225) و 29/ (17870) عن محمد بن جعفر، والنسائي (3310) و (6676) من طريق حماد بن مسعدة، و (3312) من طريق يوسف بن يعقوب، ثلاثتهم عن هشام، عن حفصة، عن الرباب، عن سلمان بن عامر قوله، فذكره موقوفًا.وقد بيَّن الخطيب البغدادي في "الفصل" 1/ 591 أنَّ المرفوع لم يسمعه هشام من حفصة بنت سيرين، وإنما سمعه من عاصم الأحول عنها، وأنَّ الرفع مدرج في حديث الذين رووه عن هشام عن حفصة.وروى الحديث مرفوعًا أيضًا شعبة، لكن أسقط من إسناده الرباب، كما أخرجه أحمد 26/ (16242) و 29/ (17887)، والنسائي (3301) و (6677) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، عن عاصم الأحول. وأخرجه النسائي (3302)، وابن حبان (3514) من طريق سعيد بن عامر، عن شعبة، عن خالد الحذاء. وأخرجه النسائي (3300) و (6678) من طريق أبي قتيبة، عن شعبة، عن هشام بن حسان، ثلاثتهم (عاصم وخالد وهشام) عن حفصة بنت سيرين، عن سلمان بن عامر مرفوعًا.
1592 - أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، حدثنا جعفر بن سليمان، أخبرني ثابت البُنَاني، أنه سمع أنس بن مالك يقول: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُفطِرُ على رُطَباتٍ قبل أن يصلِّي، فإن لم يكن رُطَباتٌ فعلى تَمَراتٍ، فإن لم يكن تَمَراتٌ حَسَا حَسَواتٍ من ماء [1].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায়ের পূর্বে কয়েকটি তাজা খেজুর (রুতাবাত) দ্বারা ইফতার করতেন। যদি তাজা খেজুর না থাকত, তবে কয়েকটি শুকনা খেজুর (তামারাত) দ্বারা ইফতার করতেন। যদি শুকনা খেজুরও না থাকত, তবে কয়েক ঢোক পানি পান করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل جعفر بن سليمان الضبعي.وهو في "مسند أحمد" 20/ (12676)، وعنه أخرجه أبو داود (2356).وأخرجه الترمذي (696) عن محمد بن رافع، عن عبد الرزاق، به. وقال: حسن غريب.وأخرج النسائي (3304) من طريق بُريد بن أبي مريم، عن أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يبدأ إذا أفطر بالتمر. ورجاله ثقات.
1593 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا زكريا بن يحيى بن أبَان، حدثنا محمد بن عبد العزيز الواسطي، حدثنا شعيب بن إسحاق، حدثنا سعيد بن أبي عَرُوبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان لا يُصلِّي المغرب حتى يُفطِرَ ولو على شَرْبةٍ من ماء [1].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাত আদায় করতেন না, যতক্ষণ না তিনি ইফতার করতেন, যদিও তা এক ঢোঁক পানি দিয়ে (পান করে) হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن عبد العزيز الواسطي، وقد توبع.محمد بن إسحاق الإمام: هو ابن خزيمة. والحديث في "صحيحه" برقم (2063).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (8793)، وابن الأعرابي في "معجمه" (2233)، والبيهقي في "السنن" 4/ 239 من طرق عن محمد بن عبد العزيز الرملي الواسطي، به.وأخرجه ابن خزيمة (2063)، والبزار (7127)، والعقيلي في "الضعفاء" (1470)، والبيهقي في "الشعب" (3616) من طريق القاسم بن غصن، عن سعيد بن أبي عروبة، به. والقاسم ضعيف لكن يعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه ابن حبان (3504) و (3505) من طريق ابن أبي شيبة، عن حسين بن علي الجعفي، عن زائدة بن قدامة، عن حميد بن أبي حميد الطويل، عن أنس قال: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قط صلى المغرب حتى يفطر ولو على شربة ماء. وهذا إسناد صحيح.
1594 - حدثنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيْرفي بمَرْو من أصل كتابه، حدثنا عبد الصمد بن الفضل وإسحاق بن الهَيّاج، قالا: حدثنا محمد بن نُعَيم السَّعْدي، حدثنا مالك بن أنس، عن سُمَيٍّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرةَ قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بالعَرْج يَصُبُّ على رأسه الماءَ من الحَرِّ وهو صائم [1].هذا حديث له أصل في "الموطأ"، فإن كان محمد بن نُعَيم السَّعْدي حَفِظَه هكذا فإنه صحيح على شرط الشيخين.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি আল-আরজ নামক স্থানে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি সাওম (রোযা) পালনরত অবস্থায় গরমের কারণে তাঁর মাথায় পানি ঢালছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذ إسناد ضعيف لجهالة حال محمد بن نعيم السعدي، وقد أخطأ في إسناده، فقد قال الحافظ ابن حجر في "اللسان" 2/ 80 في ترجمة إسحاق بن الهياج البلخي: ذكر الدارقطني من هذا الوجه عن محمد بن نعيم عن مالك عن أبي صالح عن أبي هريرة: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يصب الماء على رأسه بالعرج وهو صائم. وقال: وهم فيه في موضعين، وهو في "الموطأ" 1/ 294 عن مالك عن سُمَي عن أبي بكر بن عبد الرحمن عن بعض الصحابة، غير مسمى. انتهى، وهو الحديث الآتي بعده، فلينظر.
1595 - فقد أخبرَناه أبو بكر بن أبي نَصْر المَرْوزي، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى، حدثنا القَعْنبي، فيما قرأَ على مالك، عن سُمَيٍّ مولى أبي بكر، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أمَرَ الناس في سَفَرِه بالفطر عامَ الفتح، وقال: "تقوَّوا لِعدوِّكم"، وصام رسول الله صلى الله عليه وسلم.قال أبو بكر بن عبد الرحمن: وقال الذي حدَّثني: لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعَرْج يَصبُّ على رأسه الماءَ وهو صائمٌ من العَطَش، أو قال: من الحَرِّ [1].
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি দেখেছি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর সফরে থাকা অবস্থায় লোকজনকে ইফতার (রোজা ভাঙা) করার নির্দেশ দেন এবং বলেন: "তোমরা তোমাদের শত্রুর মোকাবিলা করার জন্য শক্তি সঞ্চয় করো।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেও রোযা রেখেছিলেন।
আবূ বকর ইবনু আব্দুর রহমান বলেন: আর যিনি আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল-আ'রজে (স্থানের নাম) পিপাসার কারণে—অথবা তিনি বলেছেন: গরমের কারণে—তাঁর মাথা মুবারকে পানি ঢালতে দেখেছি, অথচ তিনি রোযা অবস্থায় ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. القعنبي: هو عبد الله بن مسلمة بن قعنب.وأخرجه أبو داود (2365) عن عبد الله بن مسلمة القعنبي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 25/ (15903) و 27/ (16601) و (16602) و 38/ (23190) و (23191) و (23223) و (23467) و 39/ (23649)، والنسائي (3017) من طرق عن مالك بن أنس، به.والعَرْج: بفتح فسكون، قرية جامعة من عمل الفُرْع جنوب المدينة على بعد (113) كم تقريبًا. وفي الباب عن جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14193)، ومسلم (1115).وعن عبد الله بن عمر عند ابن ماجه (1665)، وابن حبان (3548).
1596 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميديّ، حدثنا سفيان، قال: سمعتُ الزُّهريّ يقول: أخبرني صفوان بن عبد الله بن صفوان، عن أم الدرداء [1]، عن كعب بن عاصم الأشعري، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ليس من البرِّ الصيامُ في السَّفر" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد اتفق الشيخان على حديث حمزة بن عمرو الأسْلَمي، فأخرجاه من حديث هشام بن عُرْوة عن أبيه عن عائشة: أنَّ حمزة … [3].وله رواية مفسَّرة من حديث أولاد حمزةَ بن عمرٍو، ولم يُخرجاه:
কা'ব ইবনে আসিম আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সফরে রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز) و (ص): أبي الدرداء، وهو خطأ، والمثبت من (ع)، وسقط من (ب). وفي الباب عن جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14193)، ومسلم (1115).وعن عبد الله بن عمر عند ابن ماجه (1665)، وابن حبان (3548).
[2] إسناده صحيح. أبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، والحميدي: هو عبد الله بن الزبير بن عيسى، وسفيان: هو ابن عيينة، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب، وأم الدرداء: هي الصغرى، واسمها هجيمة - وقيل: جهيمة - بنت حيي.وأخرجه أحمد 39/ (23681)، وابن ماجه (1664)، والنسائي (2575) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23679) و (23680) من طريقين عن الزهري، به.وأخرجه النسائي (2576) من طريق محمد بن كثير، عن الأوزاعي، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا. ثم قال النسائي: هذا الحديث خطأ، ولا نعلم أحدًا تابع محمد بن كثير على هذا الإسناد، والله أعلم، والصواب الذي قبله. وفي الباب عن جابر بن عبد الله عند أحمد 22/ (14193)، ومسلم (1115).وعن عبد الله بن عمر عند ابن ماجه (1665)، وابن حبان (3548).
1596 [3] - أخرجه البخاري (1942) و (1943)، ومسلم (1121) (103 - 106)، وهو في "مسند أحمد" 40/ (24196). وعروة أيضًا إنما سمعه من أبي مراوح عن حمزة، كما أخرجه مسلم (1121) (107)، والنسائي (2623)، وابن حبان (3567) من طريق عروة بن الزبير، عن أبي مراوح، عن حمزة بن عمرو.وأخرجه النسائي (2619) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، و (2620) و (2621) من طريق حنظلة بن علي، كلاهما عن حمزة بن عمرو.وأخرجه النسائي (2616) من طريق سليمان بن يسار: أنَّ حمزة بن عمرو قال: يا رسول الله … فذكره مرسلًا.وقد روت عائشة الحديث: أنَّ حمزة بن عمرو سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم .. أخرجه من حديثها أحمد 40/ (24196)، والبخاري (1942) و (1943)، ومسلم (1121) (103 - 106)، وأبو داود (2402)، والنسائي (2627) و (2628) و (2629)، وابن حبان (3560).
1597 - أخبرَناه أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا أبو شعيب عبد الله بن الحسن الحَرَّاني، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا محمد بن عبد المجيد المَدِيني، قال: سمعت حمزة بن محمد بن حمزة بن عمرو الأسْلَمي يَذكُر أنَّ أباه أخبره، عن جدِّه حمزة بن عمرو قال: قلتُ: يا رسول الله، إنِّي صاحب ظَهْرٍ أُعالِجُه، أُسافر عليه وأَكْرِيهِ، وإنه ربما صادَفَني هذا الشهرُ - يعني شهرَ رمضان - وأنا أجدُ القُوَّة، وأنا شابٌّ، وأجِدُني أن أصومَ يا رسول الله أهونُ عليَّ من أن أُؤخِّرَه فيكونَ دَينًا، أفأصومُ يا رسول الله أعظمُ لأجري أو أُفطِر؟ قال: "أيَّ ذلك شئتَ يا حمزة" [1].
হামযাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি বাহনের মালিক, আমি তা দেখাশোনা করি, তাতে সফর করি এবং ভাড়া দিই। আর অনেক সময় এই মাস – অর্থাৎ রমযান মাস – আমার (সফরকালীন) সময়ে এসে যায়। অথচ আমি শক্তি অনুভব করি এবং আমি যুবক। হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমার কাছে রোযা বিলম্বিত করে তা ঋণ হিসেবে রাখার চেয়ে রোযা রাখা সহজ মনে হয়। হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি কি রোযা রাখলে আমার সাওয়াব বেশি হবে, নাকি ইফতার (রোযা ভঙ্গ) করব? তিনি বললেন, "হে হামযাহ! তুমি এর মধ্যে যা চাও, তাই করতে পারো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة محمد بن عبد المجيد المديني وشيخه حمزة بن محمد بن حمزة، لكن روي الحديث من وجوه أخرى.وأخرجه أبو داود (2403) عن عبد الله بن محمد النفيلي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 25/ (16037)، والنسائي (2614) و (2615) و (2617) و (2618) و (2620) من طريق سليمان بن يسار، عن حمزة بن عمرو الأسلمي.وهذا إسناد منقطع، فإنَّ سليمان بن يسار لم يسمعه من حمزة، بينهما أبو مراوح الغفاري، فقد أخرجه النسائي نفسه (2622) من طريق سليمان بن يسار، عن أبي مراوح، عن حمزة بن عمرو الأسلمي. وأبو مراوح ثقة.وأخرجه النسائي (2624) من طريق عروة بن الزبير، عن حمزة بن عمرو. وعروة أيضًا إنما سمعه من أبي مراوح عن حمزة، كما أخرجه مسلم (1121) (107)، والنسائي (2623)، وابن حبان (3567) من طريق عروة بن الزبير، عن أبي مراوح، عن حمزة بن عمرو.وأخرجه النسائي (2619) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، و (2620) و (2621) من طريق حنظلة بن علي، كلاهما عن حمزة بن عمرو.وأخرجه النسائي (2616) من طريق سليمان بن يسار: أنَّ حمزة بن عمرو قال: يا رسول الله … فذكره مرسلًا.وقد روت عائشة الحديث: أنَّ حمزة بن عمرو سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم .. أخرجه من حديثها أحمد 40/ (24196)، والبخاري (1942) و (1943)، ومسلم (1121) (103 - 106)، وأبو داود (2402)، والنسائي (2627) و (2628) و (2629)، وابن حبان (3560).
1598 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن أبي الزُّبير، عن جابر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سافَرَ في رمضان، فاشتدَّ الصوم على رجل من أصحابه، فجعلت راحلتُه تَهِيمُ به تحت الشجرة، فأُخبِر النبيُّ صلى الله عليه وسلم بأمرِه، فأَمَرَه أن يُفطِر، ثم دعا النبيُّ صلى الله عليه وسلم بإناءٍ فوَضَعَه على يده، ثم شَرِبَ والناسُ ينظرون [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে সফরে গেলেন। তাঁর একজন সাহাবীর উপর রোযা খুব কঠিন হয়ে পড়ল, ফলে তার বাহন (উট) তাকে নিয়ে গাছের নিচে দিকভ্রান্ত হতে শুরু করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার অবস্থা জানানো হলো। তিনি তাকে রোযা ভেঙে ফেলার নির্দেশ দিলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি পাত্র চাইলেন এবং তা তাঁর হাতের উপর রাখলেন, অতঃপর তিনি পান করলেন, আর লোকেরা দেখছিল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو الزبير - وهو محمد بن مسلم بن تدرس - صرح بالسماع عند أحمد وغيره.وأخرجه ابن حبان (3565) من طريق عبد الأعلى بن حماد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 22/ (14529) من طريق زكريا بن إسحاق، و (14530) من طريق إبراهيم بن طهمان، كلاهما عن أبي الزبير، به.وأخرج أحمد 22/ (14508) من طريق حسين بن واقد، عن أبي الزبير قال: سمعت جابرًا يقول: مرَّ النبي صلى الله عليه وسلم برجل يقلِّب ظهرَه لبطن، فسأل عنه، فقالوا: صائم يا نبي الله، فدعاه، وأمره أن يفطر فقال: "أما يكفيك في سبيل الله، ومع رسول الله، حتى تصوم! "وأخرج أحمد 22/ (14193) و (14410) و (14426) و 23/ (15282)، والبخاري (1946)، ومسلم (1115)، وأبو داود (2407)، والنسائي (2582)، وابن حبان (3552) من طريق محمد بن عمر بن الحسن بن علي بن أبي طالب، عن جابر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فرأى زحامًا ورجلًا قد ظُلِّل عليه، فقال: "ما هذا؟ " قالوا: صائم، فقال: "ليس من البر الصوم في السفر"، واللفظ للبخاري.وأخرج نحوه النسائي (2577) و (2578)، وابن حبان (2553) و (3554) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن زرارة، عن جابر.وأخرج مسلم (1114)، والترمذي (710)، والنسائي (2583)، وابن حبان (2706) و (3549) و (3550) من طريق محمد بن علي الباقر، عن جابر بن عبد الله: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج عام الفتح إلى مكة في رمضان، فصام، حتى بلغ كُراع الغَميم، فصام الناس - وفي رواية: فقيل له: إنَّ الناس قد شقَّ عليهم الصيام، وإنما ينظرون فيما فعلت - ثم دعا بقدح من ماء فرفعه، حتى نظر الناس إليه، ثم شرب، فقيل له بعد ذلك: إنَّ بعض الناس قد صام، فقال: "أولئك العصاة، أولئك العصاة"، واللفظ لمسلم.وانظر شواهده وتمام تخريجه في تعليقنا على "المسند" 22/ (14193).
1599 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامِري، حدثنا أبو داود عمر بن سعد، حدثنا سفيان الثَّوري، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: كنّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمَرِّ الظَّهْران، فأُتي بطعام، فقال لأبي بكر وعمر: "ادنُوا فَكُلَا"، فقالا: إنّا صائمان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اعملوا لصاحِبَيكم، ارحَلُوا لصاحِبَيكم! ادنُوَا فكُلا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাররুজ জাহরানে ছিলাম। অতঃপর খাবার আনা হলো। তিনি আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমরা কাছে আসো এবং খাও।" তারা দুজন বললেন: "আমরা তো রোযাদার।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের দুই সঙ্গীর জন্য কাজ করো, তোমাদের দুই সঙ্গীর জন্য কষ্ট লাঘব করো! কাছে আসো এবং খাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، لكن اختُلف في وصله وإرساله، وصحَّح النسائي والدارقطني المرسل.الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه أحمد 14/ (8436)، والنسائي (2584)، وابن حبان (3557) من طريق أبي داود عمر بن سعد الحفري، بهذا الإسناد. وقال النسائي بإثره: هذا خطأ، لا نعلم أحدًا تابع أبا داود على هذه الرواية، والصواب مرسل.ثم أخرجه - يعني النسائي - (2585) من طريق محمد بن شعيب، و (2586) من طريق الوليد بن مسلم، كلاهما عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة مرسلًا.وأخرجه أيضًا (2587) من طريق علي بن المبارك، عن يحيى، عن أبي سلمة مرسلًا.وانظر "علل" الدارقطني (1762).مرّ الظهران: وادٍ من أودية الحجاز، يأخذ مياه النخلتين فيمر شمال مكة على بعد 22 كم، ويصب في البحر جنوب جدة بقرابة 20 كم، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم نزله في توجهه لفتح مكة.وقوله: "ارحلوا لصاحبيكم" أي: شدوا الرَّحل لهما على البعير. قال ابن حبان: يريد به: كأني بكما وقد احتجتما إلى الناس من الضعف إلى أن تقولوا: ارحلوا لصاحبيكما، اعملوا لصاحبيكما.
1600 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا عَبْدان الأهوازيّ، حدثنا محمد بن أبي صفوان الثَّقَفي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا سفيان، عن أبي حازم، عن سَهْل بن سعدٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تزالُ أُمتي على سُنّتي ما لم تنتظرْ بفِطْرها النُّجومَ"، وكان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا كان صائمًا أمَرَ رجلًا، فأَوفَى على نَشَزٍ، فإذا قال: قد غابتِ الشمسُ، أفطَرَ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما خرَّجا بهذا الإسناد للثَّوري: "لا يزالُ الناس بخير ما عجَّلوا الفطرَ"، فقط [2].
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মত তত দিন পর্যন্ত আমার সুন্নাতের ওপর বহাল থাকবে, যত দিন তারা ইফতার করার জন্য তারকারাজির উদয়ের অপেক্ষা না করবে।" আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রোযাদার থাকতেন, তখন তিনি একজন লোককে আদেশ করতেন, সে যেন উঁচু কোনো স্থানে উঠে যায়। অতঃপর যখন সে বলত, সূর্য ডুবে গেছে, তখন তিনি ইফতার করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، رجاله ثقات، إلَّا أنَّ ابن خزيمة قال بعد أن أخرجه في "صحيحه" (2061): هكذا حدثنا به ابن أبي صفوان، وأهاب أن يكون الكلام الأخير عن غير سهل بن سعد، لعله من كلام الثوري أو من قول أبي حازم، فأُدرج في الحديث.سفيان: هو الثوري، وأبو حازم: هو سلمة بن دينار.وأخرجه ابن حبان (3510) عن ابن خزيمة، عن محمد بن أبي صفوان، بهذا الإسناد.وقد روي الحديث بلفظ آخر كما سيشير المصنف إليه بعد هذا الحديث.وانظر حديث أبي هريرة السالف برقم (1589).والنَّشَز - بفتحتين، وقد تسكن الشين -: المرتفع من الأرض. ليس فيها سفيان الثوري عن أبي حازم، به.
[2] أما مسلم فنعم، وأما البخاري فقد أخرجه من غير طريق الثوري.فقد أخرجه أحمد 37/ (22846)، ومسلم (1098)، والترمذي (699) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، بهذا الإسناد. باللفظ الذي أشار إليه المصنف.وأخرجه أحمد (22827) عن عبد الرزاق، و (22846) عن إسحاق بن يوسف الأزرق، كلاهما عن سفيان الثوري، به.وأخرجه أحمد (22804) و (22859) و (22870)، والبخاري (1957)، ومسلم (198)، وابن ماجه (1697)، والترمذي (699)، والنسائي (3298)، وابن حبان (3502) و (3506) من طرق ليس فيها سفيان الثوري عن أبي حازم، به.