হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1661)


1661 - حدثني علي بن عيسى، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شَيبة، حدثنا أبو خالدٍ الأحمر، عن ابن جُرَيج، عن عمر بن عطاء، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: لا صَرُورة في الإسلام" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "ইসলামে কোনো 'সরুরাহ' নেই।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، عمر بن عطاء - وهو ابن وزَّار، ويقال: وزَّارة - ضعيف، وليس هو ابن أبي الخُوار كما ظنه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1282).أبو خالد الأحمر: هو سليمان بن حيان وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أبو داود (1729) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه فيه.وتابع أبا خالد الأحمر محمدُ بنُ بكر البرساني على هذا الإسناد، وسيأتي عند المصنف برقم (2706).وخالف روح بن عبادة فرواه عن ابن جريج، عن عمر بن عطاء وغيره، عن عكرمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، ولفظه: "لا صرورة في الحج". أخرجه أحمد 5/ (3113 م).والصَّرُورة في هذا الحديث: هو التبتل وترك النكاح، كما قال أبو عبيد في "غريب الحديث" 3/ 98، قال: والذي تعرفه العامة من الصرورة أنه إذا لم يحج قط، وقد علمنا أنَّ ذلك يسمى بهذا الاسم، إلّا أنه ليس واحدٌ منهما يدافع الآخر، والأول أحسنهما وأعرفُهما وأعربُهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1662)


1662 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثّنى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا أبو معاوية محمد بن خازم عن الحسن بن عمرو الفُقَيمي، عن أبي صفوان، عن ابن عباسٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا صَرُورة في الإسلام".هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইসলামে ‘সরূরা’ নেই।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] هذا الحديث ثابت في نسخنا الخطية كلها بهذا الإسناد والمتن إلا أن الحافظ ابن حجر لم يذكره في "إتحاف المهرة"، ولم نجد أحدًا أخرج هذا الحديث بهذا الإسناد البتة، والراجح أنه سبق نظر من أحد النساخ قديمًا، حيث ركّب متن حديث عكرمة عن ابن عباس الذي قبل هذا على إسناد الحديث الذي بعده، وهو حديث أبي صفوان عن ابن عباس في التعجيل بالحج، والله تعالى أعلم. وأخرجه أحمد 3 / (1833) و (1834) و 5 / (2973) و (3340)، وابن ماجه (2883) من طريق أبي إسرائيل إسماعيل بن خليفة العبسي، عن فضيل بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس أو عن الفضل بن عباس أو عن أحدهما عن صاحبه عن النبي صلى الله عليه وسلم. وزاد فيه: "فإنه قد تضل الضالة، ويمرض المريض، وتكون الحاجة". ووقع عند ابن ماجه وأحد مواضع أحمد: عن ابن عباس عن الفضل، وفي الموضع الأخير لأحمد: عن ابن عباس والفضل. وهذا الاضطراب الحطُّ فيه على أبي إسرائيل، فهو ضعيف بسبب سوء حفظه، والله أعلم.وأخرج أحمد 5 / (2867) من طريق أبي إسرائيل هذا، عن فضيل، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس (بدون شك) عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تعجلوا إلى الحج - يعني الفريضة فإنَّ أحدكم لا يدري ما يعرض له".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1663)


1663 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبر أبو المُثنّى، حدثنا مُسدّد، حدثنا أبو معاوية محمد بن خازم، عن الحسن بن عمرو الفُقَيمي، عن أبي صفوان، عن ابن عباس، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أرادَ الحجَّ فليتَعجَّل" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وأبو صفوان هذا سمَّاه غيره: مِهْران مولى لقريش، ولا يُعرَف بالجَرح.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি হজ্জ করার ইচ্ছা করে, সে যেন তাড়াতাড়ি করে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد محتمل للتحسين، أبو صفوان - وهو الكوفي، واسمه مهران - وإن تفرد بالرواية عنه الحسن بن عمرو الفقيمي فهو تابعي وذكره ابن حبان في "الثقات"، وروى له حديثه هذا أبو داود في "سننه"، ولا يُعرف بجرح كما ذكر المصنف بإثر هذا الحديث، ثم إنه قد توبع.أبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، وأبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري.وأخرجه أبو داود (1732) عن مسدد، بهذا الإسناد. وقد أُقحم في مطبوعات "سنن أبي داود" الأعمش بين أبي معاوية والحسن بن عمرو، وكذلك جاء في طبعتنا من "السنن" بناءً على وروده في بعض النسخ الخطية لـ "السنن" ومنها نسخة بخط الحافظ ابن حجر، وهو خطأ من بعض النساخ يقينًا، إذ لم يرد في النسخ القديمة كنسخة ابن داسه وغيرها، ولا في النسخة التي اعتمدها ابن القطان الفاسي، حيث أورد إسناد أبي داود في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 273 دون ذكر الأعمش، ولا في نسخة الحافظ المزي التي اعتمدها في "تحفة الأشراف"، وقد روى الحديثَ غيرُ واحد عن أبي معاوية، لم يذكر واحد منهم الأعمش، فالصواب حذفُه، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 3 / (1973) عن أبي معاوية الضرير، به. وانظر تخريج طرقه عن أبي معاوية هناك.وأخرجه أحمد أيضًا 3/ (1974) عن عبد الرحمن بن الحسن المحاربي، عن الحسن بن عمرو، به. وأخرجه أحمد 3 / (1833) و (1834) و 5 / (2973) و (3340)، وابن ماجه (2883) من طريق أبي إسرائيل إسماعيل بن خليفة العبسي، عن فضيل بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس أو عن الفضل بن عباس أو عن أحدهما عن صاحبه عن النبي صلى الله عليه وسلم. وزاد فيه: "فإنه قد تضل الضالة، ويمرض المريض، وتكون الحاجة". ووقع عند ابن ماجه وأحد مواضع أحمد: عن ابن عباس عن الفضل، وفي الموضع الأخير لأحمد: عن ابن عباس والفضل. وهذا الاضطراب الحطُّ فيه على أبي إسرائيل، فهو ضعيف بسبب سوء حفظه، والله أعلم.وأخرج أحمد 5 / (2867) من طريق أبي إسرائيل هذا، عن فضيل، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس (بدون شك) عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تعجلوا إلى الحج - يعني الفريضة فإنَّ أحدكم لا يدري ما يعرض له".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1664)


1664 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا حُصَين بن عمر الأحْمَسي، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم التَّيمي، عن الحارث بن سُوَيد قال: سمعت عليًّا يقول: "حُجُّوا قبل أن لا تَحُجُّوا، فكأني أنظُرُ إلى حَبَشيٍّ أصمَعَ أَفدَعَ، بيده مِعوَلٌ يَهْدِمُها حَجَرًا حَجَرًا"، فقلت له: شيءٌ تقولُه برأيك، أو سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: لا والذي فَلَقَ الحبَّة وبَرَأَ النَّسمة، ولكني سمعتُه من نبيكم صلى الله عليه وسلم [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "তোমরা হজ্জ করো, এর আগে যে তোমরা হজ্জ করতে পারবে না। কেননা, আমি যেন একজন সরু কান ও বেঁকে যাওয়া পায়ের হাবশিকে দেখছি, যার হাতে রয়েছে একটি কোদাল, আর সে পাথরকে পাথর দ্বারা ভেঙে ফেলছে।" তখন আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: এটি কি আপনি আপনার নিজের পক্ষ থেকে বলছেন, নাকি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছেন? তিনি বললেন: না, সেই সত্তার কসম, যিনি বীজ বিদীর্ণ করেছেন এবং প্রাণ সৃষ্টি করেছেন! বরং আমি তা তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده تالف، تفرد به حصين بن عمر الأحمسي، وهو متروك متَّهم بالكذب، قال الذهبي في "تلخيصه": حصين متهم ويحيى الحماني ليس بعمدة، انتهى علي بن عبد العزيز: هو أبو الحسن البغوي، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وإبراهيم التيمي: هو ابن يزيد بن شريك.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (755)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" (351 - بغية الباحث) - ومن طريقه المستغفري في "دلائل النبوة" (295) - وأبو نعيم في "الحلية" 131/ 4، والبيهقي 4/ 340 من طريق يحيى بن عبد الحميد الحماني، بهذا الإسناد. قال أبو نعيم: هذا حديث غريب من حديث الحارث بن إبراهيم، لم يروه عن الأعمش إلا حصين بن عمر.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 396 من طريق جبارة، عن حصين بن عمر، به. وجبارة هذا: هو ابن المغلس، وهو متروك أيضًا. وله شاهد لا يفرح به من حديث أبي هريرة، أخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (809)، والعقيلي في "الضعفاء" (1698)، والدراقطني في "سننه" (2795)، وأبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 77، والبيهقي 4/ 341، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (926) من طريق محمد بن أبي محمد، عن أبيه، عن أبي هريرة رفعه: "حجوا قبل أن لا تحجوا" قالوا: وما شأن الحج يا رسول الله؟ قال: "تقعد أعرابها على أذناب شِعابها، ولا يصل إلى الحج أحد"، قال العقيلي: محمد بن أبي محمد مجهول النقل، ولا يعرف هذا الحديث إلّا به، ولا يتابع عليه، ولا يصح في هذا شيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1665)


1665 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المُثنّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا العلاء بن المسيَّب، حدثنا أبو أُمامة التَّيمي، قال: كنتُ رجلًا أُكْرِي في هذا الوجه، وكان أناسٌ يقولون لي: إنه ليس لك حجٌّ، فلقيتُ ابن عمر، فقلت: يا أبا عبد الرحمن، إنِّي رجلٌ أُكْرِي في هذا الوجه، وإنَّ أُناسًا يقولون لي: إنَّه ليس لك حجٌّ، فقال: ألست تُحْرمُ وتُلبِّي وتَطوفُ وتُفيضُ من عرفاتٍ وتَرمي الجِمار؟ قال: قلتُ: بلى، قال: فإنَّ لك حجًّا؛ جاء رجلٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله عن مثلِ ما سألتَني عنه، فسكتَ عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم يُجِبْه، حتى نزلت هذه الآية: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} [البقرة: 198]، فأرسلَ إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقرأَ هذه الآيةَ عليه، وقال: "لك حجٌّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আবূ উমামা আত-তাইমী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এমন একজন লোক ছিলাম যে এই পথে (হজ্জের উদ্দেশ্যে) ভাড়া খাটাতাম। কিছু লোক আমাকে বলতো, তোমার জন্য হজ্জ নেই। অতঃপর আমি ইবনু উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং বললাম, হে আবূ আব্দুর রহমান! আমি এমন একজন লোক যে এই পথে ভাড়া খাটাই, আর কিছু লোক আমাকে বলে যে আমার জন্য হজ্জ নেই। তিনি বললেন, তুমি কি ইহরাম করো না, তালবিয়া পাঠ করো না, ত্বাওয়াফ করো না, আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করো না এবং জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ করো না? তিনি (আবূ উমামা) বললেন, আমি বললাম, হ্যাঁ (করি)। তিনি বললেন, তাহলে তোমার জন্য হজ্জ রয়েছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একজন লোক এসেছিল এবং তুমি আমাকে যা জিজ্ঞেস করেছ সেও ঠিক একই বিষয়ে জিজ্ঞেস করেছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার থেকে নীরব রইলেন এবং তাকে কোনো উত্তর দিলেন না, যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তোমাদের প্রতিপালকের পক্ষ থেকে অনুগ্রহ তালাশ করায় তোমাদের কোনো পাপ নেই} [সূরা বাকারা: ১৯৮]। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার কাছে লোক পাঠালেন এবং তাকে এই আয়াতটি পাঠ করে শোনালেন এবং বললেন, "তোমার জন্য হজ্জ রয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، أبو أمامة التيمي وثقه ابن معين، وقال أبو زرعة" لا بأس به، وروى عنه شعبة. أبو بكر بن إسحاق: هو أحمد وأبو المثنى هو معاذ بن المثنى العنبري.وأخرجه أبو داود (1733) عن مسدد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 10/ (6435) من طريق سفيان الثوري، عن العلاء بن المسيب به، إلّا أنه لم يسم أبا أمامة، بل قال: رجل من بني تيم.وأخرجه أحمد (6434) من طريق الحسن بن عمرو الفقيمي، عن أبي أمامة التيمي، به.قوله: أُكْرِي، أي: أؤاجر الإبل ونحوها للحج.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1666)


1666 - حدثنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذئب، عن عطاء بن أبي رباح، عن عُبيد بن عُمَير، عن ابن عباس: أنَّ الناس في أول الحج كانوا يَتَبَايعون بمِنًى وعرفةَ وسوقِ ذي المَجَاز ومواسمِ الحجِّ، فخافوا البيعَ وهم حُرُم، فأنزل الله تبارك وتعالى: (لا جُناحَ عليكم [1] أن تَبتَغُوا فَضْلًا من ربكُم) في مواسمِ الحجِّ، قال [2]: فحدثني عُبيد بن عُمير أنه كان يقرؤُها في المصحف [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই হজ্জের শুরুতে লোকেরা মিনা, আরাফাহ, যুল-মাজায বাজার এবং অন্যান্য হজ্জের মৌসুমে (ব্যবসায়িক) লেনদেন করত। এরপর তারা ইহরাম অবস্থায় ব্যবসা করতে ভয় পেল। তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা’আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "তোমাদের প্রতিপালকের অনুগ্রহ সন্ধান করায় তোমাদের কোন পাপ নেই।" (সূরা আল-বাকারা ২:১৯৮)। এটি হজ্জের মৌসুমসমূহে (ব্যবসার ক্ষেত্রে প্রযোজ্য)। তিনি বললেন: উবাইদ ইবনু উমায়র আমাকে বলেছেন যে, তিনি মুসহাফে (কুরআনের কপিতে) এভাবেই আয়াতটি পাঠ করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا الرواية هنا في نسخنا الخطية، وكذا في نسخ كتاب "المصاحف" لابن أبي داود (192)، والمطبوع من كتاب "الانتصار" 1/ 351 للباقلاني، و"جامع الأصول" لابن الأثير (498)، و "البرهان" 1/ 337 للزركشي، وبعض النسخ الخطية ل "فتح الباري" 5/ 658 لابن حجر، إحداها مقابلة على نسخة بخط الحافظ ابن حجر. ووقع لفظ الآية في الموضعين الآتيين في "المستدرك" (1791) و (3132)، ومطبوعات مصادر التخريج على الصواب كالتلاوة "ليس عليكم جناح"، ويغلب على ظننا أن قراءة "لا جناح عليكم "خطأ من أحد الرواة، وليست هي قراءة ابن عباس، والله تعالى أعلم. سقوط ذكر عطاء بن أبي رباح من إسناد روايته، وقد خالف ابن أبي فديك ثلاثة من حفاظ أصحاب ابن أبي ذئب، وهم آدم بن أبي إياس كما في رواية "المستدرك" هذه، وأبو بكر الحنفي و حماد بن مسعدة وستأتي روايتاهما في "المستدرك" أيضًا كما سبق، فذكروا جميعهم عطاء بن أبي رباح، بل جاء في آخر الخبر في رواية آدم هذه ورواية حماد بن مسعدة الآتية ما نصه: قال: فحدثني عبيد بن عمير، دون تقييد القائل، فقال مغلطاي في "إكمال تهذيب الكمال" 9/ 98: هذا كالتصريح بأنَّ قائل ذلك هو عطاء بغير شك ولا مرية. قلنا: وبهذا يتبين أن المحفوظ في حديث ابن أبي ذئب أنه عن عطاء بن أبي رباح بن عبيد بن عمير الليثي، قال ابن عساكر في "الأطراف" كما في "تحفة الأشراف" للمزي 5 / (5872): فأما عبيد بن عمير مولي ابن عباس فغير مشهور. قلنا: بل لم يرد له ذكر في غير هذا الخبر على التوهُّم، ولم يذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 28، ولا ابن أبي خيثمة في "تاريخه الكبير" في السفر الثالث منه (2419) ولا غيرهما في أولاد عمير مولي ابن عباس غير عبد الله بن عمير الذي خرَّج له مسلم وابن ماجه، فلا ندري ما هو مستند أحمد بن صالح المصري فيما قاله، وتبعه عليه غيره؟ والله تعالى أعلم بالصواب.تنبيه: لم نتنبه لهذه النكتة في تخريجنا لـ "سنن أبي داود" فضعفنا الإسناد هناك على أن عبيد بن عمير هو مولى ابن عباس المجهول، فيستدرك من هنا.وقد روي معنى هذا الحديث من وجهين آخرين عن ابن عباس، فقد أخرج البخاري (1770) و (2050) و (2098) و (4519)، وابن حبان (3894) من طريق عمرو بن دينار عن ابن عباس قال: كان ذو المجاز وعكاظ متجر الناس في الجاهلية، فلما جاء الإسلام كأنهم كرهوا ذلك، حتى نزلت: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} في مواسم الحج.وأخرج أبو داود (1731) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: قرأ هذه الآية: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} قال: كانوا لا يتجرون بمنًى، فأُمروا بالتجارة إذا أفاضوا من عرفات. ويزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي ضعيف.وسوق ذي المجاز، بفتح الميم وتخفيف الجيم، قال الأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 191: هو سوق لهذيل عن يمين الموقف من عرفة على فرسخ منه.



[2] القائل: هو عطاء بن أبي رباح. سقوط ذكر عطاء بن أبي رباح من إسناد روايته، وقد خالف ابن أبي فديك ثلاثة من حفاظ أصحاب ابن أبي ذئب، وهم آدم بن أبي إياس كما في رواية "المستدرك" هذه، وأبو بكر الحنفي و حماد بن مسعدة وستأتي روايتاهما في "المستدرك" أيضًا كما سبق، فذكروا جميعهم عطاء بن أبي رباح، بل جاء في آخر الخبر في رواية آدم هذه ورواية حماد بن مسعدة الآتية ما نصه: قال: فحدثني عبيد بن عمير، دون تقييد القائل، فقال مغلطاي في "إكمال تهذيب الكمال" 9/ 98: هذا كالتصريح بأنَّ قائل ذلك هو عطاء بغير شك ولا مرية. قلنا: وبهذا يتبين أن المحفوظ في حديث ابن أبي ذئب أنه عن عطاء بن أبي رباح بن عبيد بن عمير الليثي، قال ابن عساكر في "الأطراف" كما في "تحفة الأشراف" للمزي 5 / (5872): فأما عبيد بن عمير مولي ابن عباس فغير مشهور. قلنا: بل لم يرد له ذكر في غير هذا الخبر على التوهُّم، ولم يذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 28، ولا ابن أبي خيثمة في "تاريخه الكبير" في السفر الثالث منه (2419) ولا غيرهما في أولاد عمير مولي ابن عباس غير عبد الله بن عمير الذي خرَّج له مسلم وابن ماجه، فلا ندري ما هو مستند أحمد بن صالح المصري فيما قاله، وتبعه عليه غيره؟ والله تعالى أعلم بالصواب.تنبيه: لم نتنبه لهذه النكتة في تخريجنا لـ "سنن أبي داود" فضعفنا الإسناد هناك على أن عبيد بن عمير هو مولى ابن عباس المجهول، فيستدرك من هنا.وقد روي معنى هذا الحديث من وجهين آخرين عن ابن عباس، فقد أخرج البخاري (1770) و (2050) و (2098) و (4519)، وابن حبان (3894) من طريق عمرو بن دينار عن ابن عباس قال: كان ذو المجاز وعكاظ متجر الناس في الجاهلية، فلما جاء الإسلام كأنهم كرهوا ذلك، حتى نزلت: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} في مواسم الحج.وأخرج أبو داود (1731) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: قرأ هذه الآية: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} قال: كانوا لا يتجرون بمنًى، فأُمروا بالتجارة إذا أفاضوا من عرفات. ويزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي ضعيف.وسوق ذي المجاز، بفتح الميم وتخفيف الجيم، قال الأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 191: هو سوق لهذيل عن يمين الموقف من عرفة على فرسخ منه.



1666 [3] - إسناده صحيح، رجاله ثقات. إبراهيم بن الحسين: هو ابن ديزيل، وابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة، وعبيد بن عمير: هو ابن قتادة الليثي على الصحيح، كما سيأتي تفصيله تاليًا إن شاء الله.وسيأتي الحديث برقم (1791) من طريق أبي بكر الحنفي، وبرقم (3132) من طريق حماد بن مسعدة، كلاهما عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. ويأتي تخريجه من هاتين الطريقين في موضعهما.وأخرجه أبو داود (1735) عن أحمد بن صالح المصري، عن ابن أبي فديك - وهو محمد بن إسماعيل بن مسلم - عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن عباس، فذكره. لم يذكر في الإسناد عطاء بن أبي رباح، لذلك جاء فيه: قال أحمد بن صالح كلامًا معناه: أنه مولى ابن عباس.قلنا: كذا قال أحمد بن صالح بأنَّ عُبيد بن عمير هذا هو مولى ابن عباس، واعتمد على قوله هذا كلٌّ من ابن أبي داود في "المصاحف" (193)، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" 3/ 1585، ورجحه المزي في "تهذيب الكمال" 19 / (227)، ويؤكِّد ظنهم هذا أنه قد وقع في آخر الخبر عند ابن أبي داود في "المصاحف": قال ابن أبي ذئب: فحدثني عبيد بن عمير؛ يعني أنَّ ابن أبي ذئب صرح بتحديث عبيد بن عمير له، وابن أبي ذئب لم يدرك عبيد بن عمير الليثي، فيتعين أن يكون عبيد بن عمير هذا هو غير الليثي، لذلك قال أحمد بن صالح: هو مولى ابن عباس. قلنا: وهو وهمٌ منهم رحمهم الله، مبني على خطأ صريح في رواية ابن أبي فديك من سقوط ذكر عطاء بن أبي رباح من إسناد روايته، وقد خالف ابن أبي فديك ثلاثة من حفاظ أصحاب ابن أبي ذئب، وهم آدم بن أبي إياس كما في رواية "المستدرك" هذه، وأبو بكر الحنفي و حماد بن مسعدة وستأتي روايتاهما في "المستدرك" أيضًا كما سبق، فذكروا جميعهم عطاء بن أبي رباح، بل جاء في آخر الخبر في رواية آدم هذه ورواية حماد بن مسعدة الآتية ما نصه: قال: فحدثني عبيد بن عمير، دون تقييد القائل، فقال مغلطاي في "إكمال تهذيب الكمال" 9/ 98: هذا كالتصريح بأنَّ قائل ذلك هو عطاء بغير شك ولا مرية. قلنا: وبهذا يتبين أن المحفوظ في حديث ابن أبي ذئب أنه عن عطاء بن أبي رباح بن عبيد بن عمير الليثي، قال ابن عساكر في "الأطراف" كما في "تحفة الأشراف" للمزي 5 / (5872): فأما عبيد بن عمير مولي ابن عباس فغير مشهور. قلنا: بل لم يرد له ذكر في غير هذا الخبر على التوهُّم، ولم يذكر ابن سعد في "الطبقات" 7/ 28، ولا ابن أبي خيثمة في "تاريخه الكبير" في السفر الثالث منه (2419) ولا غيرهما في أولاد عمير مولي ابن عباس غير عبد الله بن عمير الذي خرَّج له مسلم وابن ماجه، فلا ندري ما هو مستند أحمد بن صالح المصري فيما قاله، وتبعه عليه غيره؟ والله تعالى أعلم بالصواب.تنبيه: لم نتنبه لهذه النكتة في تخريجنا لـ "سنن أبي داود" فضعفنا الإسناد هناك على أن عبيد بن عمير هو مولى ابن عباس المجهول، فيستدرك من هنا.وقد روي معنى هذا الحديث من وجهين آخرين عن ابن عباس، فقد أخرج البخاري (1770) و (2050) و (2098) و (4519)، وابن حبان (3894) من طريق عمرو بن دينار عن ابن عباس قال: كان ذو المجاز وعكاظ متجر الناس في الجاهلية، فلما جاء الإسلام كأنهم كرهوا ذلك، حتى نزلت: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} في مواسم الحج.وأخرج أبو داود (1731) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: قرأ هذه الآية: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} قال: كانوا لا يتجرون بمنًى، فأُمروا بالتجارة إذا أفاضوا من عرفات. ويزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي ضعيف.وسوق ذي المجاز، بفتح الميم وتخفيف الجيم، قال الأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 191: هو سوق لهذيل عن يمين الموقف من عرفة على فرسخ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1667)


1667 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا أحمد بن إسحاق الحضرمي، حدثنا وُهَيب، حدثنا موسى بن عُقبة، حدثني نافعٌ وسالم: أن ابن عمر كان إذا مَرَّ بذِي الحُلَيفة بات بها حتى يُصبحَ، ويخبرُ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعلُ ذلك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন যুল-হুলাইফা অতিক্রম করতেন, তখন তিনি ভোর হওয়া পর্যন্ত সেখানে রাত যাপন করতেন এবং তিনি জানাতেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটিই করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وهيب: هو ابن خالد، ونافع: هو مولى ابن عمر، وسالم: هو ابن عبد الله بن عمر.وأخرجه أبو يعلى (5461)، وابن خزيمة (2615) من طريقين عن أحمد بن إسحاق الحضرمي، بهذا الإسناد.وأخرج معناه أحمد 9/ (5594) عن موسى بن طارق، عن موسى بن عقبة، عن نافع وحده: أنَّ ابن عمر كان إذا صدر من الحج أو العمر، أناخ بالبطحاء التي بذي الحليفة، وحدَّث أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يعرِّس بها حتى يصلي صلاة الصبح.وبنحو حديث أحمد أخرجه البخاري (1767)، ومسلم (1345) (432) من طريق أنس بن عياض، عن موسى بن عقبة، عن نافع وحده: كان ابن عمر إذا صدر عن الحج أو العمرة، أناخ بالبطحاء التي بذي الحليفة التي كان النبي صلى الله عليه وسلم ينيخ بها. هكذا بصورة الموقوف.وأخرج البخاري (484) و (491)، ومسلم (1259) (228) من طريق أنس بن عياض، عن موسى بن عقبة، عن نافع وحده: أنَّ ابن عمر أخبره أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينزل بذي الحليفة حين يعتمر، وفي حجته حين حج … وفيه: فإذا ظهر من بطن وادٍ أناخ بالبطحاء التي على شفير الوادي الشرقية، فعرّس حتى يصبح … الحديث، هذا لفظ البخاري، ولفظ مسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينزل بذي طوى، ويبيت حتى يصلي الصبح حين يقدم مكة.وبنحو لفظ مسلم أخرجه أحمد (9 / (5600)، والنسائي (3831) من طريقين آخرين عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا أيضًا.وأخرجه بعبارات بعضها متفق وبعضها مختلف، إلّا أنَّ جميعها في المعنى نفسه: أحمد 8/ (4628) و (4819) و 10/ (5756) و (5922) و (6004)، والبخاري (1532) و (1533) و (1573) و (1574) و (1769) و (1799)، ومسلم (1259) (226) و (1345) (430) و (431)، وأبو داود (1865) و (2012) و (2031) و (2044)، وابن ماجه (3069)، والترمذي (921)، والنسائي (3627) و (4231) من طرق عن نافع، عن ابن عمر.وأخرج مسلم (1188)، والنسائي (3625) من طريق عبيد الله بن عبد الله بن عمر، عن ابن عمر قال: بات رسول الله صلى الله عليه وسلم بذي الحليفة مبدأه، وصلَّى في مسجدها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1668)


1668 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب إملاءً، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني عبد العزيز بن عبد الله بن أبي سَلَمة، أنَّ عبد الله بن الفضل حدَّثه عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرةَ قال: كان من تَلبيةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لبيك إلهَ الحَقِّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তালবিয়ার মধ্যে এটিও ছিল: "লাব্বাইকা ইলাহাল হাক্কি" (আমি হাযির, হে সত্য মা'বূদ)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 14 / (8497) و (8629) و 16 / (10171)، وابن ماجه (2920)، والنسائي (3718)، وابن حبان (3800) من طرق عن عبد العزيز بن عبد الله الماجشون، بهذا الإسناد.قال النسائي: لا أعلم أحدًا أسند هذا الحديث غير عبد الله بن الفضل، وعبد الله بن الفضل ثقة، خالفه إسماعيل بن أمية. قلنا: رواية إسماعيل بن أمية هذه أوردها ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار" 5/ 481، وعزاها إلى "جامع" عبد الرزاق، يرويه عن معمر، عن إسماعيل بن أمية، عن عبد الرحمن الأعرج قال: بلغني أنه كان من إهلال النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا. ولم نجد هذه الرواية في "مصنف عبد الرزاق" ولا في "جامع معمر"، وهي لا تُعِلُّ روايةَ عبد الله بن الفضل فهو ثقة، وزيادته مقبولة، والله أعلم.وخالف الرواة عن عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون يزيدُ بنُ هارون، فقد أخرجه أبو حاتم - كما في "العلل" لابنه 3/ 219 (812) - عن محمد بن إسماعيل البختري، عن يزيد بن هارون، عن عبد العزيز بن الماجشون، عن عبد الله بن الفضل، عن الأعرج، عن أبي سلمة - وهو ابن عبد الرحمن بن عوف - عن أبي هريرة، رفعه، فزاد أبا سلمة بين الأعرج وأبي هريرة، ويزيد بن هارون وإن كان ثقة إلّا أنَّ زيادته هذه شاذة لمخالفته جمعًا من أصحاب ابن الماجشون، والله أعلم. وأخرجه أبو داود (1748) عن عبيد الله بن عمر القواريري، بهذا الإسناد.والغِسْل: بكسر الغين المعجمة وسكون السين المهملة، كذا ضُبطت في أصولنا الخطية، قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 5/ 280: ضبطناه في روايتنا في "سنن أبي داود" بالمهملتين يعني بالعَسَل، وهو معروف - ونقل عن ابن الصلاح قوله: يحتمل أنه بفتح المهملتين، ويحتمل أنه بكسر المعجمة وسكون المهملة: وهو ما يُغسَل به الرأس من خَطْميٍّ أو غيره. قلنا: والخطمي بكسر الخاء المعجمة وفتحها وسكون الطاء المهملة - وقيل: بل بفتح الخاء وجهًا واحدًا -: هو ضرب من النبات يُغسَل به الرأس.قال ابن عبد البر في "الاستذكار" 13/ (18295): التلبيد سنّة الخلق، وذلك أنه من لبَّد رأسه بالخطمي وما أشبهه مما يمنع وصول التراب إلى أصول الشعر وقاية لنفسه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1669)


1669 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا عُبيد الله بن عمر القَوَارِيري، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا محمد بن إسحاق، عن نافع عن ابن عمر: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم لَبَّدَ رأسَه بالغِسْل [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه، إنما اتفقا على حديث سالم عن ابن عمر: أَنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يُهِلُّ مُلبِّدًا [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোসলের মাধ্যমে তাঁর মাথা 'তালবিদ' (আঠালো) করতেন।

(ইমাম হাকিম বলেন:) এই হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা (বুখারী ও মুসলিম) এটি বর্ণনা করেননি। তবে তাঁরা উভয়েই সালিম কর্তৃক ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত এই হাদীসটির ব্যাপারে একমত হয়েছেন যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'তালবিদ' (চুল আঠালো করা) অবস্থায় ইহরাম বাঁধতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن لولا عنعنة محمد بن إسحاق، فلم نقع له على تصريح بالسماع لهذا الحديث من نافع مولى ابن عمر، لكن يشهد له الحديث المتفق عليه من طريق سالم عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لو ما كان يهلُّ ملبِّدًا، كما سيشير إليه المصنف بعده، لذلك جوَّد إسناده الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 7/ 429. عبد الأعلى: هو ابن عبد الأعلى السامي. وأخرجه أبو داود (1748) عن عبيد الله بن عمر القواريري، بهذا الإسناد.والغِسْل: بكسر الغين المعجمة وسكون السين المهملة، كذا ضُبطت في أصولنا الخطية، قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 5/ 280: ضبطناه في روايتنا في "سنن أبي داود" بالمهملتين يعني بالعَسَل، وهو معروف - ونقل عن ابن الصلاح قوله: يحتمل أنه بفتح المهملتين، ويحتمل أنه بكسر المعجمة وسكون المهملة: وهو ما يُغسَل به الرأس من خَطْميٍّ أو غيره. قلنا: والخطمي بكسر الخاء المعجمة وفتحها وسكون الطاء المهملة - وقيل: بل بفتح الخاء وجهًا واحدًا -: هو ضرب من النبات يُغسَل به الرأس.قال ابن عبد البر في "الاستذكار" 13/ (18295): التلبيد سنّة الخلق، وذلك أنه من لبَّد رأسه بالخطمي وما أشبهه مما يمنع وصول التراب إلى أصول الشعر وقاية لنفسه.



[2] أخرجه البخاري (1540)، ومسلم (1184). والعج: التلبية، والثج: نحر البُدن.وسيأتي بعده من طريق عبد الله بن أبي لبيد، عن المطلب بن عبد الله بن حنطب، عن خلاد بن السائب، عن زيد بن خالد الجهني، فجعله من مسند زيد بن خالد الجهني، وقد صحَّح المصنف هنا الإسنادين جميعًا، وكذلك ابن حبان، فقد قال: سمع هذا الخبر خلاد بن السائب من أبيه، ومن زيد بن خالد الجهني، ولفظاهما مختلفان، وهما طريقان محفوظان. ورجَّح الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 602/ 15 رواية المطلب عن خلاد عن زيد الجهني، أما الإمام البخاري فقد رجَّح رواية عبد الملك عن خلاد عن أبيه، كما في "العلل الكبير" للترمذي 1/ 377، وتابعه على ذلك الترمذي في "جامعه" فقال في حديث زيد بن خالد: لا يصح، والصحيح هو: خلاد بن السائب عن أبيه. قلنا: وغاية ما فيه أنه اختلاف في اسم الصحابي، ولا يؤثر ذلك في صحة الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1670)


1670 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عبد الملك بن أبي بكر بن الحارث بن هشام، عن خَلّاد بن السائب، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: "أتاني جبريلُ فقال: مُرْ أصحابَك أن يَرفَعوا أصواتَهم بالإهلال والتَّلبية" [1]. وقد قيل: عن خَلّاد بن السائب عن زيد بن خالد الجُهَني:




সাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেন, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে জিবরাঈল (আঃ) এসেছিলেন এবং বললেন: আপনি আপনার সাহাবীদেরকে নির্দেশ দিন যেন তারা ইহলাল (আল্লাহর একত্বের ঘোষণা) ও তালবিয়া (লাব্বাইক ধ্বনি)-এর মাধ্যমে তাদের কণ্ঠস্বর উচ্চ করেন।" [১]
আবার বলা হয়েছে: (এটি) খাল্লাদ ইবনুস সায়িব থেকে যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير القرشي الأسدي، وسفيان: هو ابن عيينة، وعبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمد بن عمرو بن حزم، وصحابيه هو: السائب بن خلاد بن سويد الأنصاري.وأخرجه أحمد 27/ (16557/ 1) و (16569)، وابن ماجه (2922)، والترمذي (829)، والنسائي (3719)، وابن حبان (3802) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد (16567)، وأبو داود (1814) من طريق مالك بن أنس، وأحمد (16568) من طريق ابن جريج، كلاهما عن عبد الله بن أبي بكر، به.وأخرج أحمد (16566) من طريق محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي لبيد، عن المطلب بن عبد الله بن حنطب، عن السائب بن خلاد: أن جبريل أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: كن عجّاجًا ثجّاجًا. والعج: التلبية، والثج: نحر البُدن.وسيأتي بعده من طريق عبد الله بن أبي لبيد، عن المطلب بن عبد الله بن حنطب، عن خلاد بن السائب، عن زيد بن خالد الجهني، فجعله من مسند زيد بن خالد الجهني، وقد صحَّح المصنف هنا الإسنادين جميعًا، وكذلك ابن حبان، فقد قال: سمع هذا الخبر خلاد بن السائب من أبيه، ومن زيد بن خالد الجهني، ولفظاهما مختلفان، وهما طريقان محفوظان. ورجَّح الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 602/ 15 رواية المطلب عن خلاد عن زيد الجهني، أما الإمام البخاري فقد رجَّح رواية عبد الملك عن خلاد عن أبيه، كما في "العلل الكبير" للترمذي 1/ 377، وتابعه على ذلك الترمذي في "جامعه" فقال في حديث زيد بن خالد: لا يصح، والصحيح هو: خلاد بن السائب عن أبيه. قلنا: وغاية ما فيه أنه اختلاف في اسم الصحابي، ولا يؤثر ذلك في صحة الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1671)


1671 - أخبرَناه عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيبة، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن عبد الله بن أبي لَبيد، عن المُطَّلب بن عبد الله بن حَنْطَب، عن خَلَّاد بن السائب، عن زيد بن خالد الجُهَنيِّ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "جاءني جبريلُ فقال: يا محمد، مُرْ أصحابَك فليرفَعوا صِياحَهم بالتَّلبية، فإنها شِعارُ الحج" [1].وقيل: عن المطَّلب بن عبد الله بن حَنْطب عن أبي هريرة:




যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার নিকট জিবরীল (আঃ) এসেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: হে মুহাম্মাদ, আপনি আপনার সাহাবীগণকে নির্দেশ দিন যেন তারা উচ্চস্বরে তালবিয়া পাঠ করে, কেননা এটিই হলো হজ্জের নিদর্শন (প্রতীক)।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح سفيان: هو ابن سعيد الثوري.وأخرجه أحمد 36/ (21678)، وابن ماجه (2923)، وابن حبان (3803) من طريق وكيع، بهذا الإسناد. وقد وهم فيه فجعله من حديث أبي هريرة، والصواب أنه من حديث عبد الله بن أبي لبيد عن المطلب عن خلاد بن السائب عن زيد بن خالد الجهني، كما في الرواية التي قبل هذه. ثم إنه لا يصح تصريح المطلب بن عبد الله بسماعه من أبي هريرة، إذ لا يُعرف له سماع منه كما ذكر البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 292، وذكر أبو حاتم الرازي كما في "المراسيل" (780)، "والعلل" (243) - كلاهما لابنه - أنَّ المطلب بن عبد الله عن أبي هريرة مرسل. وانظر "تحفة التحصيل" ص 307.والحديث أخرجه أحمد 14/ (8314) عن روح بن عباد، عن أسامة بن زيد، عن عبد الله بن أبي لبيد وحده، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1672)


1672 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أنبأ ابن وَهْب، أخبرني أسامة بن زيد، أنَّ محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان وعبدَ الله بنَ أبي لَبِيد، أخبراه عن المطَّلب بن عبد الله بن حَنْطَب قال: سمعت أبا هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: " أمرني جبريلُ برفع الصَّوت بالإهلال، فإنَّه من شعائر الحج" [1]. هذه الأسانيد كلُّها صحيحة، وليس يُعلِّل واحدٌ منها الآخر، فإنَّ السلف رضي الله عنهم كان يجتمع عندهم الأسانيد لمتنٍ واحدٍ كما يجتمع عندنا الآن، ولم يخرج الشيخان هذا الحديث.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জিবরীল (আঃ) আমাকে উচ্চস্বরে তালবিয়া (ইহরাম ঘোষণার শব্দ) পাঠ করার নির্দেশ দিয়েছেন, কারণ তা হজ্জের নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত।" [১]। এই সকল সনদই সহীহ এবং এদের মধ্যে একটিও অন্যটিকে দুর্বল করে না। কেননা সলফে সালেহীন (আল্লাহ্ তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হোন) তাদের কাছে একটি মতনের জন্য একাধিক সনদ একত্রিত করতেন, যেমনটা এখন আমাদের কাছে একত্রিত হয়। শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এই হাদীসটি বর্ণনা করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، لكن من غير حديث أبي هريرة، أسامة بن زيد - وهو الليثي - عنده مناكير، وقد وهم فيه فجعله من حديث أبي هريرة، والصواب أنه من حديث عبد الله بن أبي لبيد عن المطلب عن خلاد بن السائب عن زيد بن خالد الجهني، كما في الرواية التي قبل هذه. ثم إنه لا يصح تصريح المطلب بن عبد الله بسماعه من أبي هريرة، إذ لا يُعرف له سماع منه كما ذكر البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 292، وذكر أبو حاتم الرازي كما في "المراسيل" (780)، "والعلل" (243) - كلاهما لابنه - أنَّ المطلب بن عبد الله عن أبي هريرة مرسل. وانظر "تحفة التحصيل" ص 307.والحديث أخرجه أحمد 14/ (8314) عن روح بن عباد، عن أسامة بن زيد، عن عبد الله بن أبي لبيد وحده، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1673)


1673 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن حمزة، حدثني محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك، أخبرنا الضَّحّاك بن عثمان، عن محمد بن بن المُنكَدِر، عن عبد الرحمن بن يَرْبُوع، عن أبي بكرٍ الصِّدِّيق: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم سُئِل: أيُّ العملِ أفضل؟ قال: "العَجُّ والثَّجُّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. قال أبو عُبيد: العَجُّ: رفع الصوت بالتلبية، والثّجُ: نحر البُدْن ليثُجَّ الدم من المَنْحَر.




আবু বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো: সর্বোত্তম আমল (কাজ) কোনটি? তিনি বললেন: “আজ্জু ওয়াত্থাজ্জু।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإنَّ محمد بن المنكدر لم يسمع من عبد الرحمن بن يربوع، كما قال الترمذي. الفضل جد إسماعيل: هو ابن محمد بن المسيب الشعراني، وإبراهيم ابن حمزة: هو ابن محمد بن حمزة بن مصعب الزبيري.وأخرجه ابن ماجه (2924)، والترمذي (827) من طرق عن ابن أبي فديك بهذا الإسناد.وقال الترمذي: غريب لا نعرفه إلّا من حديث ابن أبي فديك عن الضَّحاك بن عثمان، ومحمد بن المنكدر لم يسمع من عبد الرحمن بن يربوع.وله شاهد بإسناد حسن من حديث عبد الله بن مسعود، أخرجه أبو يوسف القاضي في "الآثار" (459)، وأبو يعلى (5086).وآخر من حديث ابن عمر، أخرجه ابن ماجه (2896)، والترمذي (2998)، وفيه إبراهيم بن يزيد الخُوزي، متروك، وبعضهم اتهمه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1674)


1674 - حدثني أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا الحسين بن إدريس الأنصاري، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا عَبيدة بن حُميد، حدثني عُمارة بن غَزِيّة، عن أبي حازم، عن سَهْل بن سعدٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما من مُلَبٍّ يُلبِّي إلَّا لَبّى ما عن يَمينه وعن شِمالِه من شجرٍ وحَجَرٍ حتى تنقطعَ الأرضُ من هاهنا وهاهنا، عن يَمينِه وعن شِمالِه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তিই তালবিয়া পাঠ করে, তার ডান ও বামে অবস্থিত গাছপালা এবং পাথরসমূহও তালবিয়া পাঠ করে, যতক্ষণ না এদিক ও ওদিক, তার ডান ও বামে পৃথিবী (মাটি) বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو حازم: هو سلمة بن دينار.وأخرجه الترمذي بإثر الحديث (828) عن الحسن بن محمد الزعفراني وعبد الرحمن بن الأسود، عن عبيدة بن حميد بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2921)، والترمذي (828) من طريق إسماعيل بن عياش، عن عمارة بن غزية، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1675)


1675 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثني يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني خُصَيف بن عبد الرحمن الجَزَري، عن سعيد بن جُبير قال: قلتُ لعبد الله بن عباس: يا أبا العباس عَجِبتُ لاختلاف أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في إهلالِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم حين أَوجَبَ، فقال: إنِّي لأعلمُ الناسِ بذلك، إِنَّهَا إِنَّما كانت من رسول الله صلى الله عليه وسلم حَجةٌ واحدة، فمن هناك اختَلَفوا، خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حاجًّا، فلمّا صلَّى في مسجده بذي الحُلَيفة ركعتيه أوجَبَه في مَجلِسه، فأهلَّ بالحجِّ حين فَرَغَ من ركعتيه، فسمع ذلك منه أقوامٌ فحَفِظَه [1] عنه، ثم ركب، فلمّا استَقلَّت به ناقتُه أهلَّ، وأدرَكَ ذلك منه أقوامٌ، وذلك أنَّ الناس كانوا يأتون أرسالًا، فسَمِعوه حين استقلَّت به ناقتُه يُهِلُّ، فقالوا: إنما أهلَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين استقلَّت به ناقتُه، ثم مَضَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما عَلَا على شَرَفِ البَيْداء أهلَّ، وأدرَكَ ذلك منه أقوامٌ، فقالوا: إنما أهلَّ حين عَلَا على شَرَفِ البيداء، وايمُ الله، لقد أوجَبَ في مُصلّاه، وأهلَّ حين استقلَّت به ناقتُه وأهلَّ حين عَلَا شَرَفَ البَيْداء.قال سعيد بن جُبير: فمَن أخذ بقول ابن عباس، أهلَّ في مُصلّاه إِذا فَرَغَ من ركعتيه [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم مفسَّر في الباب، ولم يخُرجاه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في جُمادى الآخرة سنة سَتِّ وتسعين وثلاث مئة:




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবায়ের বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, হে আবুল আব্বাস! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইহরাম বাঁধলেন, তখন তাঁর তালবিয়া পাঠের স্থান নিয়ে সাহাবীগণের মতপার্থক্য দেখে আমি আশ্চর্য হলাম।

তিনি বললেন: আমি এ বিষয়ে সকলের চেয়ে বেশি অবগত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে এটি ছিল মাত্র একটি হজ। তাই সেখানে মতপার্থক্য সৃষ্টি হয়েছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হলেন। অতঃপর যখন তিনি যুল-হুলাইফায় তাঁর মসজিদে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন, তিনি তাঁর বসার স্থানেই ইহরামের নিয়ত করলেন। অতঃপর দুই রাকাত শেষ করার সাথে সাথেই তিনি হজ্জের তালবিয়া পাঠ করলেন। তখন কিছু লোক তাঁর কাছ থেকে এটি শুনল এবং তা স্মরণ রাখল। এরপর তিনি আরোহণ করলেন। যখন তাঁর উটনী তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়ালো, তখন তিনি তালবিয়া পাঠ করলেন। কিছু লোক এই বিষয়টি ধরতে পারল। এর কারণ হলো, লোকেরা (বিভিন্ন সময়) আসতে শুরু করেছিল। তারা তাঁকে তাঁর উটনী সোজা হয়ে দাঁড়ানোর সময় তালবিয়া পাঠ করতে শুনল। তাই তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটনী সোজা হয়ে দাঁড়ানোর পরেই কেবল তালবিয়া পাঠ করেছেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চললেন। যখন তিনি বায়দা (আল-বায়দা)-এর উঁচু স্থানে আরোহণ করলেন, তখন তালবিয়া পাঠ করলেন। কিছু লোক এই বিষয়টিও বুঝতে পারল। তারা বলল: তিনি বায়দার উঁচু স্থানে আরোহণ করার পরেই কেবল তালবিয়া পাঠ করেছেন। আল্লাহর কসম! তিনি নিশ্চয়ই তাঁর সালাতের স্থানে ইহরামের নিয়ত করেছিলেন, এবং তাঁর উটনী সোজা হয়ে দাঁড়ানোর সময় তালবিয়া পাঠ করেছিলেন, আর বায়দার উঁচু স্থানে আরোহণ করার সময়ও তালবিয়া পাঠ করেছিলেন।

সাঈদ ইবনে জুবায়ের বললেন: সুতরাং যে ব্যক্তি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা গ্রহণ করবে, সে তার সালাতের স্থানে দুই রাকাত শেষ করার সাথে সাথেই তালবিয়া পাঠ করবে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في نسخنا الخطية، أما في "مسند أحمد": فحفظوا، وفي "سنن أبي داود" و"سنن البيهقي": فحفظته.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين، ابن إسحاق - وهو محمد - صرَّح بالتحديث، وخصيف بن عبد الرحمن الجزري - وإن كان في حفظه شيء - مختلف فيه، وحديثه يصلح للمتابعات، وباقي رجاله ثقات. وهو في "مسند أحمد" 4/ (2358).وأخرجه أبو داود (1770) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد الزهري، بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (1655). والفُزْع - بضم الفاء وسكون الواو، ويقال بضمها -: موضع بأعالي المدينة واسع، فيه مساجد للنبي صلى الله عليه وسلم و منابر وقرى كثيرة. "انظر مشارق الأنوار"2/ 167 للقاضي عياض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1676)


1676 - أخبرنا أبو عمرو عثمانُ بن أحمد بن عبد الله بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا علي بن إبراهيم الواسطي، حدثنا وَهْب بن جَرِير، حدثنا أبي، قال: سمعتُ محمد بن إسحاق يحدِّث عن أبي الزِّناد، عن عائشةَ بنت سعد بن أبي وقاصٍ قالت: قال سعد بنُ أبي وقّاص: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أخَذَ طريقَ الفُرْع أهلَّ إذا استقلَّت به راحلتُه [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ‘আল-ফুর’ রাস্তা ধরতেন, তখন তাঁর সওয়ারী তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়ালে তিনি তালবিয়া পাঠ করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، محمد بن إسحاق لم يصرِّح بسماعه من أبي الزناد - وهو عبد الله بن ذكوان - وقال الدارقطني فيما نقله عنه ابن طاهر في "أطراف الغرائب" 1/ 341: تفرَّد به محمد بن إسحاق عن أبي الزناد وقال ابن كثير في البداية والنهاية 7/ 439: فيه غرابة ونكارة.وأخرجه أبو داود (1775) عن محمد بن بشار، عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد. وزاد فيه: فإذا أخذ طريق أحد أهلَّ إذا أشرف على جبل البيداء. والفُزْع - بضم الفاء وسكون الواو، ويقال بضمها -: موضع بأعالي المدينة واسع، فيه مساجد للنبي صلى الله عليه وسلم و منابر وقرى كثيرة. "انظر مشارق الأنوار"2/ 167 للقاضي عياض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1677)


1677 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا الحسين بن الحسن المُهاجري، حدثنا هارون بن سعيد الأَيْلي، حدثنا ابن وَهْب، أخبرني يعقوب بن عبد الرحمن الزُّهري ويحيى بن عبد الله بن سالم، أن عَمْرًا مولى المُطَّلب أخبرهما عن المُطَّلب بن عبد الله بن حَنْطب، عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "لَحمُ صَيدِ البَرِّ لكم حلالٌ، وأنتم حُرُم ما لم تَصِيدُوه أو يُصاد [1] لكم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যখন ইহরাম অবস্থায় থাকো, তখন স্থলভাগের শিকারের মাংস তোমাদের জন্য হালাল, যতক্ষণ না তোমরা তা শিকার করেছো অথবা তোমাদের জন্য তা শিকার করা হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا الرواية هنا "يصاد" وكذلك هي في بعض المصادر، وفي مواضع أخرى من "المستدرك" وكذا في مصادر أخرى: "يصد" على الأصل في العطف على المجزوم، أما رواية "يصاد" فهي جائزة على لغةٍ، بل قال السندي في حاشية النسائي: الوجه نصب "يصاد" على أنَّ "أو" بمعنى: إلّا أن، وحينئذٍ فلا إشكال. عن جابر برقم (1769).وفي الباب عن أبي قتادة عند أحمد 37/ (22526)، وإسناده صحيح.وعن رجل من بهز عند أحمد 25/ (15744).وعن طلحة بن عبد الله عند أحمد أيضًا 3 / (1383)، وفي تلك المواضع من "المسند" تمام تخريج هذه الشواهد.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن صحَّ سماع المطلب بن عبد الله بن حنطب من جابر ابن عبد الله، فقد قال أبو حاتم كما في "الجرح والتعديل" لابنه 8/ 359: يشبه أن يكون أدركه، وفي "المراسيل" لابنه أيضًا (785) قال: لم يسمع من جابر. قلنا: وعمرو مولى المطلب - وهو ابن أبي عمرو - صدوق لا بأس به، وقد اختلف عليه في هذا الحديث، فرواه بعضهم عنه عن المطلب عن جابر، كما هنا، ورواه بعضهم عنه عن رجل من الأنصار عن جابر، كما سيأتي برقم (1768)، وقال آخرون: عنه عن رجل ثقة من بني سلمة، وقال بعضهم: عنه عن المطلب عن أبي مو موسى، وقد فصلنا تخريج ذلك في "مسند أحمد" 23/ (14894).أخرجه أحمد (14894)، وأبو داود (1851)، والترمذي (846)، والنسائي (3796)، وابن حبان (3971) من طريقين عن يعقوب بن عبد الرحمن وحده، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث جابر مفسَّر، والمطلب لا نعرف له سماعًا من جابر. ثم قال: قال الشافعي: هذا أحسن حديث روي في هذا الباب وأقيَس.وسيأتي الحديث في "المستدرك" من طريق ابن وهب برقم (1766)، ومن طريق مالك بن أنس عن عمرو مولى المطلب برقم (1767)، ومن طريق سليمان بن بلال عن عمرو مولى المطلب برقم (1768)، ومن طريق عبد العزيز الدراوردي عن عمرو مولى المطلب عن رجل من الأنصار عن جابر برقم (1769).وفي الباب عن أبي قتادة عند أحمد 37/ (22526)، وإسناده صحيح.وعن رجل من بهز عند أحمد 25/ (15744).وعن طلحة بن عبد الله عند أحمد أيضًا 3 / (1383)، وفي تلك المواضع من "المسند" تمام تخريج هذه الشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1678)


1678 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن محمد، حدثنا إسحاق بن عيسى بن الطَّباع، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن ابن عباسٍ أنه قال: يا زيدُ بنَ أرقمَ، هل عَلِمتَ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أُهدِيَ له بَيضاتُ نعامٍ وهو حرامٌ فردَّهُنَّ؟ قال: نعم [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবন আব্বাস) যায়দ ইবন আরকামকে বললেন, "হে যায়দ ইবন আরকাম! আপনি কি জানেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন, তখন তাঁকে উটপাখির ডিম উপহার দেওয়া হয়েছিল এবং তিনি সেগুলো ফিরিয়ে দিয়েছিলেন?" তিনি (যায়দ) বললেন, "হ্যাঁ।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. الحارث بن محمد: هو ابن أبي أسامة، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أحمد 32/ (19294) و (19311)، وأبو داود (1850)، والنسائي (3789)، وابن حبان (3968) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. لكن وقع عندهم: "عضو صيد" بدلًا من "بيضات نعام".وأخرج أحمد (19271) و (19341)، ومسلم (1195)، والنسائي (3790) من طريق طاووس، عن ابن عباس قال: قدم زيد بن أرقم فقال له عبد الله بن عباس يستذكره: كيف أخبرتني عن لحم صيد أهدي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو حرام؟ قال: أهدي له عضوٌ من لحم صيد فردّه، فقال: "إنا لا نأكله؛ إنا حرم".وأخرج أحمد 26/ (16422)، والبخاري (1825) و (2596)، ومسلم (1193)، وابن ماجه (3090)، والترمذي (849)، والنسائي (3787) و (3788)، وابن حبان (3967) و (3969) من حديث عبد الله بن عباس، عن الصعب بن جثّامة: أنه أهدى لرسول الله صلى الله عليه وسلم حمارًا وحشيًا وهو بالأبواء - أو بوَدَّان - فردَّه عليه، فلما رأى ما في وجهه قال: "إنا لم نرده عليك إلّا أنّا حُرُم". واللفظ للبخاري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1679)


1679 - أخبرنا أبو عبد الرحمن محمد بن عبد الله التاجر، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا ابن جُرَيج، أخبرني عبد الله بن عُبيد بن عُمَير، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمّارٍ قال: لقيتُ جابرَ بنَ عبد الله فسألتُه عن الضَّبُع، أنأكلُها؟ فقال: نعم، قلتُ: أصيدٌ هي؟ قال: نعم، قلت: أسمعتَه من رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد لخّصَه جَرِير بن حازم عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير:




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবন আব্দুল্লাহ ইবন আবী আম্মার বলেন: আমি জাবির ইবন আব্দুল্লাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে দেখা করে হাইনা (ضبُع) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, আমরা কি এটি খাব? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমি বললাম: এটি কি শিকার (সাইদ)? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমি বললাম: আপনি কি এটি রাসূলুল্লাহ সালল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছ থেকে শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. ابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أحمد 22/ (14425) و (14449)، والترمذي (851) و (1791)، والنسائي (3805) و (4816)، وابن حبان (3965) من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح، وقال البخاري - كما في "العلل الكبير" للترمذي (551) -: هو حديث صحيح.وأخرجه أحمد 22 / (14165)، وابن ماجه (3236) من طريق إسماعيل بن أمية، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، به. وانظر ما بعده.قال الإمام البغوي في "شرح السنة" 7/ 271: اختلف أهل العلم في إباحة لحم الضبع، فروي عن سعد بن أبي وقاص أنه كان يأكل الضَّبع، وروي عن ابن عباس إباحة لحم الضبع، وهو قول عطاء، وإليه ذهب الشافعي وأحمد وإسحاق وأبو ثور، وكرهه جماعة، يروى ذلك عن سعيد بن المسيب، وبه قال ابن المبارك ومالك والثوري وأصحاب الرأي، واحتجوا بأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن أكل كل ذي ناب من السباع، وهذا عند الآخرين عامٌّ خصه حديث جابر.وانظر "شرح مشكل الآثار" للطحاوي 9/ 92 وما بعدها، و "نصب الراية" للزيلعي 4/ 193 - 194.تنبيه: وقع اضطراب في الطبعة الهندية القديمة للمستدرك، نتج عنه تداخل بين هذا الحديث وبين الذي بعده، وتبعها في هذا التخليط سائر الطبعات التي اعتمَدَت عليها! ووقع على الصواب في نسخنا الخطية. ابن راهويه، ووكيع: هو ابن الجراح.وأخرجه ابن ماجه (3085) عن علي بن محمد، عن وكيع بهذا الإسناد.وأخرج أبو داود (3801) عن محمد بن عبد الله الخزاعي، وابن حبان (3964) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن جرير بن حازم، به إلى جابر بن عبد الله قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع فقال: "هي صيد وفيها كبش". لفظ ابن المبارك، ولفظ الخزاعي: قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع فقال: "هو صيد، ويُجعل فيه كبش إذا صاده المحرم".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1680)


1680 - أخبرَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وكيع، عن جَرِير بن حازم، عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير، عن عبد الرحمن بن أبي عمَّار، عن جابر بن عبد الله قال: جَعَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في الضَّبُع يُصيبُه المُحرِمُ كَبْشًا نجديًّا، وجَعَلَه من الصَّيد [1].




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় শিকার করা হায়নার (ক্ষতিপূরণ হিসেবে) একটি নজদী মেষ নির্ধারণ করেছেন এবং তিনি হায়নাকে শিকারযোগ্য প্রাণীর অন্তর্ভুক্ত করেছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن عبد السلام: هو النيسابوري الوراق، وإسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، ووكيع: هو ابن الجراح.وأخرجه ابن ماجه (3085) عن علي بن محمد، عن وكيع بهذا الإسناد.وأخرج أبو داود (3801) عن محمد بن عبد الله الخزاعي، وابن حبان (3964) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن جرير بن حازم، به إلى جابر بن عبد الله قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع فقال: "هي صيد وفيها كبش". لفظ ابن المبارك، ولفظ الخزاعي: قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضبع فقال: "هو صيد، ويُجعل فيه كبش إذا صاده المحرم".