আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1701 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن السَّرِي، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا عبَّاد بن العوَّام، عن هلال بن خبَّاب، حدثنا مجاهد قال: قال لي مولاي عبدُ الله بنُ السائب: كنتُ فيمن بَنَى البيت، فأخذتُ حَجَرًا فسوَّيتُه، فوضعتُه إلى جنب البيت، قال: فكنتُ أعبدُه، فإن كان لَيَكونُ في البيت الشيءُ أبعثُ به إليه، حتى إذا كان يومًا لَبَنٌ طَيِّبٌ فبعثتُ به إليه، فصَبُّوه عليه.وإنَّ قريشًا اختلفوا في الحَجَر حين أرادوا أن يَضَعُوه، حتى كادَ أن يكون بينهم قتالٌ بالسيوف، فقالوا: اجعلوا بينَكم أوّلَ رجلٍ يدخل من الباب، فدخل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا: هذا الأمينُ، وكانوا يُسمُّونَه في الجاهلية الأمينَ، فقالوا: يا محمدُ، قد رَضِينا بك، فدعا بثوبٍ فبَسَطَه، ووَضَعَ الحجرَ فيه، ثم قال لهذا البَطْن ولهذا البَطْن - غير أنه سمى بُطونًا -: "ليأخُذْ كلُّ بطنٍ منكم بناحيةٍ من الثَّوب"، ففَعَلُوا، ثم رَفَعوه، وأخذه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فَوَضَعَه بيده [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرطه:
আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি [আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ইব] বললেন: আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা কাবা ঘর নির্মাণ করেছিল। আমি একটি পাথর নিলাম, সেটিকে মসৃণ করলাম এবং কাবা ঘরের পাশে রাখলাম। তিনি বললেন: আমি সেটির পূজা করতাম। যখন ঘরে কোনো জিনিস থাকত, আমি সেটির কাছে পাঠাতাম। এমনকি একদিন খুব ভালো দুধ ছিল, আমি সেটি তার [পাথরটির] কাছে পাঠালাম, তখন তারা (যারা দুধ নিয়ে গেল) সেটির উপর ঢেলে দিল। যখন কুরাইশরা হাজারে আসওয়াদ (পাথরটি) স্থাপন করতে চাইল, তখন তারা এ নিয়ে মতবিরোধে লিপ্ত হলো, এমনকি তাদের মধ্যে তরবারির মাধ্যমে যুদ্ধ শুরু হওয়ার উপক্রম হয়েছিল। তখন তারা বলল: তোমাদের মধ্যে যে প্রথম এই দরজা দিয়ে প্রবেশ করবে, তাকেই তোমরা সালিশ মানো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন। তারা বলল: ইনি আল-আমীন (বিশ্বস্ত)। জাহিলিয়্যাতের যুগেও তারা তাঁকে আল-আমীন বলে ডাকত। তারা বলল: হে মুহাম্মাদ! আমরা আপনাকে মেনে নিলাম। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কাপড় আনতে বললেন এবং তা বিছালেন। এরপর তিনি পাথরটি তার মধ্যে রাখলেন। তারপর তিনি এই গোত্র এবং ওই গোত্রের কথা বললেন—যদিও তিনি গোত্রগুলোর নামও নিয়েছিলেন—(এবং বললেন): "তোমাদের প্রতিটি গোত্র যেন কাপড়ের এক একটি প্রান্ত ধরে।" তারা তাই করল। এরপর তারা সেটি উপরে ওঠাল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে পাথরটি নিলেন এবং তা স্থাপন করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، رجاله ثقات غير أنَّ هلال بن خباب قد تغيَّر بأخرة، وأخطأ هنا في تسمية الصحابي، فجعله عبد الله بن السائب، وعبد الله بن السائب هذا يصغر عن إدراك بناء الكعبة في الجاهلية، وإنما الذي أدركها هو أبوه السائب، فقد كان شريكًا للنبي صلى الله عليه وسلم قبل البعثة، وعُمِّر إلى أن أدرك خلافة معاوية، كما في "تاريخ الإسلام" للذهبي 2/ 412، وعلى كلٍّ فغاية الأمر أنه اختلاف في اسم الصحابي ولا يضرُّ. مجاهد: هو ابن جبر المكي، وقد كان مولى لآل السائب.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5596)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 1/ 300، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" (113) من طرق عن سعيد بن سليمان الواسطي، بهذا الإسناد. وسقط ذكر مجاهد من مطبوع "معجم الصحابة".وأخرج نحوه أحمد 24 / (15504) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن ثابت بن يزيد الأحول، عن هلال بن خباب، عن مجاهد، عن مولاه أنه حدثه، هكذا أطلق مولاه ولم يسمِّه.
1702 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا سُرَيج بن النُّعمان الجَوهَري، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن سِمَاك بن حرب، عن خالد بن عَرْعَرةَ قال: لما قُتِل عثمان ذُعِر الناسُ في ذلك اليوم ذُعرًا شديدًا، وكان سلُّ السيف فينا عظيمًا، فقعدتُ في بيتي، فعَرَضَتْ لي حاجةٌ في السوق، فخرجتُ، فإذا في ظلِّ القصرِ نَفَرٌ جلوسٌ نحوًا من أربعين رجلًا، وإذا سلسلةٌ معروضةٌ على الباب، فأردتُ أن أدخل، فمَنَعَني البواب، فقال القوم: دَعِ الرجلَ، فدخلتُ، فإذا أشرافُ الناس ووجوهُهم، فجاء رجلٌ جميلٌ في حُلَّةٍ ليس عليه قميصٌ ولا عِمَامةٌ، فقَعَدَ، فإذا عليُّ بن أبي طالب، ثم قال: إنَّ إبراهيم لما أراد بناءَ البيت ضاقَ به ذَرْعًا، فلم يَدْرِ ما يَصنَع، فأرسل الله السَّكينةَ، وهي ريحُ خَجُوجٌ، فانطَوتْ، فجعل يبني عليها كلَّ يوم سافًا [1] ومكةُ شديدةُ الحرّ، فلمَّا بلغ موضعَ الحَجَر، قال لإسماعيل: اذهب فالتمِسْ حَجَرًا فضَعْه هاهنا. فجعل يطوف في الجبال، فجاء جبريلُ بالحَجَر فَوَضَعَه، فجاء إسماعيل فقال: مَن جاء بهذا؟ أو من أين هذا؟ أو من أين أُتي بهذا؟ فقال: جاء به مَن لم يتَّكِلْ على بنائي وبنائِكَ، فَبَنَاه.ثم انهَدَمَ، فَبَنَتْه العَمالقةُ، ثم انهَدَمَ فَبَنَتْه جُرْهُم، ثم انهَدَمَ فَبَنَتْه قريش، فلما أرادوا أن يضعوا الحَجَر تشاجروا في وضعِه، فقالوا: أولُ من يَخرج من هذا الباب فهو يضعُه، فخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من قِبَل باب بني شَيْبَة، فَأَمَرَ بثوبٍ فَبُسِطُ، فَوَضَعَ الحَجَرَ في وَسَطِه، ثم أَمَرَ رجلًا من كلِّ فَخِذٍ من أفخاذ قريشٍ أن يأخذ بناحيةِ الثِّياب، فأخذَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بيدِه فَوَضَعَه [2]. قد اتفَقَ الشيخان على إخراج الحديث الطويل عن أيوب السَّخْتِياني وكَثِير بن كثير عن سعيد بن جُبير عن ابن عباس قصةَ بناءِ الكعبة أولَ ما بناه إبراهيمُ الخليل عليه السلام [3]، وهذا غيرُ ذاك.
খালিদ ইবন আর'আরা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শহীদ করা হলো, তখন সেদিন মানুষ কঠিনভাবে ভীতসন্ত্রস্ত হয়ে পড়েছিল এবং আমাদের মধ্যে তলোয়ারের ব্যবহার ব্যাপক রূপ নিয়েছিল। ফলে আমি আমার ঘরে বসে রইলাম। এরপর বাজারে আমার একটি প্রয়োজন দেখা দিলে আমি বাইরে বের হলাম। হঠাৎ দেখতে পেলাম, কাসরের (মহলের) ছায়ায় প্রায় চল্লিশ জন লোক বসা আছে। আর দরজার সামনে একটি শিকল ঝুলানো। আমি ভেতরে প্রবেশ করতে চাইলে দ্বাররক্ষক আমাকে বাধা দিল। তখন উপস্থিত লোকেরা বলল: লোকটিকে আসতে দাও। আমি প্রবেশ করে দেখলাম, সেখানে গণ্যমান্য ও সম্ভ্রান্ত ব্যক্তিবর্গ উপস্থিত। এরপর সুন্দর পোশাকে সজ্জিত, যার শরীরে কোনো জামা বা পাগড়ি ছিল না, এমন একজন লোক এলেন এবং বসলেন। তিনি ছিলেন আলী ইবন আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। এরপর তিনি বললেন:
নিশ্চয়ই ইবরাহীম (আঃ) যখন কা'বা ঘর নির্মাণ করতে চাইলেন, তখন তিনি সংকটাপন্ন হলেন এবং কী করবেন তা বুঝে উঠতে পারছিলেন না। তখন আল্লাহ 'সাকীনাহ' (প্রশান্তি) প্রেরণ করলেন, যা ছিল একটি প্রবল বাতাস। সেটি গুটিয়ে (নিচু হয়ে) গেল। ইবরাহীম (আঃ) প্রতিদিন তার উপরে এক সারি করে নির্মাণ করতে লাগলেন। মক্কা তখন অত্যন্ত উষ্ণ ছিল। যখন তিনি হাজারে আসওয়াদের স্থানে পৌঁছলেন, তখন ইসমাঈল (আঃ)-কে বললেন: যাও, একটি পাথর খুঁজে আনো এবং এখানে রাখো। ইসমাঈল (আঃ) পাহাড়সমূহে ঘোরাফেরা করতে লাগলেন। তখন জিবরীল (আঃ) পাথরটি নিয়ে আসলেন এবং তা স্থাপন করলেন। ইসমাঈল (আঃ) ফিরে এসে বললেন: কে এটি আনলেন? অথবা এটি কোথা থেকে এলো? অথবা এটি কোথা থেকে আনা হলো? তিনি (ইবরাহীম আঃ) বললেন: এটিকে তিনি এনেছেন যিনি আমার ও তোমার নির্মাণের ওপর নির্ভর করেননি, বরং এটি নির্মাণ করে দিয়েছেন।
অতঃপর তা (কা'বা) ভেঙে গেল। এরপর আমালিকারা এটি নির্মাণ করল। এরপর তা ভেঙে গেল। এরপর জুরহুম গোত্র তা নির্মাণ করল। এরপর তা ভেঙে গেল। এরপর কুরাইশরা তা নির্মাণ করল। যখন তারা (কুরাইশরা) হাজারে আসওয়াদ স্থাপন করতে চাইল, তখন এর স্থাপন নিয়ে তাদের মধ্যে বিতর্ক সৃষ্টি হলো। তারা বলল: যে ব্যক্তি সর্বপ্রথম এই দরজা দিয়ে বের হবে, সে-ই এটি স্থাপন করবে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানু শায়বার দরজা দিয়ে বের হলেন। তিনি একটি কাপড় বিছাতে নির্দেশ দিলেন এবং পাথরটিকে তার মাঝখানে রাখলেন। এরপর কুরাইশের প্রতিটি গোত্রের শাখা থেকে একজন করে লোককে কাপড়ের কিনারা ধরতে নির্দেশ দিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে পাথরটি নিলেন এবং তা স্থাপন করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تصحفت في المطبوع إلى: ساقًا، والسَّاف: هو المدماك من البناء. وأخرج الطبراني في "الأوسط" (6941) من طريق عبد العزيز بن عثمان بن جبلة، عن أبيه، عن شعبة، عن سماك، عن خالد بن عرعرة، عن علي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "السكينة ريح خجوج" هكذا رفعه. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعبة إلّا عثمان بن جبلة، تفرَّد به ولده عنه.وخبر سماك هذا عن خالد بن عرعرة قد نثره المصنف في عدة مواضع من هذا الكتاب، فانظر ما سيأتي برقم (3192) و (3785) و (3931) و (3948).
[2] إسناده حسن من أجل سماك بن حرب وخالد بن عَرْعرة.وأخرجه مطولًا ومختصرًا الطيالسي (115)، والأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 61، والحارث بن أبي أسامة (388 - بغية الباحث)، والطبري في "التفسير" 1/ 551 و 2/ 611، وابن المنذر في "الأوسط" (7504)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 72، وفي "الدلائل" 2/ 56، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 2/ (438) من طريق حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرج قطعة منه مختصرة الطبراني في "الأوسط" (2442) من طريق أبي عمر الضرير، عن حماد بن سلمة، عن داود بن أبي هند، عن سماك بن حرب، به. فزاد داودَ بن أبي هند بين حماد وسماك، وهذا من المزيد في متصل الأسانيد.وأخرجه مطولًا ومختصرًا أيضًا الطيالسي (115)، وابن أبي شيبة 170/ 10 و (14348 - عوامة)، وابن أبي عاصم في "الأوائل" (95)، والطبري في "التفسير" 1/ 551 و 2/ 611، وفي "التاريخ" 1/ 251 و 253، وابن أبي حاتم في "التفسير" 3/ 708، والبيهقي في "الدلائل" 5/ 56، وفي "الشعب" (3704)، وقوام السنة في "دلائل النبوة" (272)، والضياء المقدسي (439) من طرق عن سماك بن حرب، به. وأخرج الطبراني في "الأوسط" (6941) من طريق عبد العزيز بن عثمان بن جبلة، عن أبيه، عن شعبة، عن سماك، عن خالد بن عرعرة، عن علي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "السكينة ريح خجوج" هكذا رفعه. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعبة إلّا عثمان بن جبلة، تفرَّد به ولده عنه.وخبر سماك هذا عن خالد بن عرعرة قد نثره المصنف في عدة مواضع من هذا الكتاب، فانظر ما سيأتي برقم (3192) و (3785) و (3931) و (3948).
1702 [3] - بل قد انفرد بإخراجه البخاري (3364) دون مسلم، وسيأتي في "المستدرك" مختصرًا من طريق عبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، عن كثير بن كثير، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، برقم (4069)، ويأتي تخريجه هناك إن شاء الله. ورواه سفيان بن عيينة، عن عبيد الله بن أبي زياد، عن القاسم، عن عائشة قولها موقوفًا، أخرجه عنه ابن أبي شيبة 4/ 32.وأخرجه عبد الرزاق (8961)، والفاكهي في "أخبار مكة" (332) و (1423) من طريقين - بإسناد حسن - عن عطاء بن أبي رباح، عن عائشة موقوفًا.وانظر "علل الدارقطني" (3882).
1703 - حدثنا بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مكِّيّ بن إبراهيم، حدثنا عبيد الله بن أبي زياد.وحدثنا أبو زكريا العَنْبري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو كُرَيب وسَلْم بن جُنادةَ، قالا: حدثنا وكيع، حدثنا سفيان الثَّوري، حدثنا عبيد الله بن أبي زياد، عن القاسم، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّما جُعِل رميُ الجِمار والطَّواف والسَّعي بين الصَّفَا والمَرْوة لإقامةِ ذِكرِ الله لا لغيرِه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ, কা'বা শরীফ তাওয়াফ এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ (দৌড়ানো) কেবল আল্লাহর স্মরণ (যিকির) প্রতিষ্ঠা করার জন্যই বিধান করা হয়েছে, অন্য কিছুর জন্য নয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، عبيد الله بن أبي زياد - وهو المكي القداح - حسن الحديث في المتابعات والشواهد، ولم يتابع على رفع هذا الحديث، بل قد اختلف عليه في رفعه ووقفِه، ووَقَفَه غيرُه، كما سيأتي. أبو زكريا العنبري: هو يحيى بن محمد بن عبد الله، وأبو كريب: هو محمد بن العلاء، والقاسم: هو ابن محمد بن أبي بكر.وأخرجه أحمد 41 / (25080) عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 40 / (24351) عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه أحمد 41/ (24468) عن محمد بن بكر البرساني، وأبو داود (1888)، والترمذي (902) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن عبيد الله بن أبي زياد، به. وقال الترمذي: حسن صحيح! ورواه سفيان بن عيينة، عن عبيد الله بن أبي زياد، عن القاسم، عن عائشة قولها موقوفًا، أخرجه عنه ابن أبي شيبة 4/ 32.وأخرجه عبد الرزاق (8961)، والفاكهي في "أخبار مكة" (332) و (1423) من طريقين - بإسناد حسن - عن عطاء بن أبي رباح، عن عائشة موقوفًا.وانظر "علل الدارقطني" (3882).
1704 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا محمد بن صالح الهمذاني، حدثنا عبد الصمد بن حسان، حدثنا سفيان الثوري، عن عطاء بن السائب، عن طاووس، عن ابن عباسٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "الطَّوافُ بالبيت صلاةٌ إِلَّا أَنَّ الله قد أحلَّ لكم فيه الكلام، فمَن تكلَّمَ فلا يتكلَّمْ إلَّا بخير" [1].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বায়তুল্লাহর (কা'বা ঘরের) তাওয়াফ সালাত (নামায) স্বরূপ। তবে আল্লাহ তা'আলা তোমাদের জন্য তাতে কথা বলা হালাল করেছেন। অতএব, যে ব্যক্তি কথা বলবে, সে যেন শুধু ভালো কথাই বলে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن صالح - وهو الأشج والمعروف بحمدان الهمذاني - وشيخه عبد الصمد بن حسان، فهما صدوقان، وقد توبعا، وعطاء بن السائب وإن كان قد اختلط فسماع سفيان الثوري منه قبل الاختلاط، لكن قد اختلف في رفعه ووقفه وفي تعيين اسم صحابيه، ورجح الموقوف النسائي والبيهقي وابن الصلاح والمنذري والنووي وابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 130، أما الاختلاف في اسم الصحابي أو إبهامه فلا يضر، وقد بسطنا القول في هذا الحديث في تعليقنا على" شرح مشكل الآثار" للطحاوي (5973).وأخرجه مرفوعًا الترمذي (960) عن قتيبة بن سعيد، عن جرير بن عبد الحميد، عن عطاء بن السائب بهذا الإسناد. وجرير بن عبد الحميد وإن كان سماعه من عطاء بعد الاختلاط، فقد تابعه سفيان الثوري في رواية الحاكم هذه، وسفيان بن عيينة في الحديث التالي بعد هذا، وسماعهما منه قبل الاختلاط. قال الترمذي: وقد روي هذا الحديث عن ابن طاووس وغيره عن طاووس عن ابن عباس موقوفًا، ولا نعرفه مرفوعًا إلّا من حديث عطاء. قلنا: بل قد رواه سعيد بن جبير عن ابن عباس مرفوعًا، فيما سيأتي برقم (3093) وإسناده صحيح.وأخرجه عبد الرزاق (9791) عن جعفر بن سليمان الضبعي، عن عطاء بن السائب، عن طاووس أو عكرمة أو كليهما، عن ابن عباس قوله. هكذا موقوفًا، وجعفر بن سليمان بصري، ورواية البصريين عن عطاء بعد الاختلاط.وأخرج النسائي في "الكبرى" (3931) من طريق إبراهيم بن ميسرة، عن طاووس، عن ابن عباس قال: الطواف بالبيت صلاة، فأقلوا الكلام.وخالف ابنَ ميسرة الحسنُ بنُ مسلم فرفعه وأبهم الصحابي، أخرجه أحمد 24/ (15423) و 27 / (16612) و 38/ (23201)، والنسائي في "الكبرى" (3930) من طريق ابن جريج قال: أخبرني الحسن بن مسلم، عن طاووس، عن رجل أدرك النبي صلى الله عليه وسلم، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنما الطواف صلاة، فإذا طفتم فأقلوا الكلام". قال أحمد بإثره: ولم يرفعه محمد بن بكر. وقال الحافظ ابن حجر في "التلخيص" 1/ 130 - 131: والظاهر أنَّ المبهم فيه هو ابن عباس، وعلى تقدير أن يكون غيره فلا يضر إبهام الصحابة.قلنا: قد جعله حنظلة بن أبي سفيان من حديث ابن عمر موقوفًا عليه، أخرجه من طريقه النسائي في "المجتبى" (2923) عن طاووس، عن ابن عمر قال: أقلوا الكلام في الطواف، فإنما أنتم في الصلاة. قال الدارقطني في "العلل" (3044): وقول من قال: ابن عمر، أشبه.وللشيخ الألباني رحمه الله بحث نفيس في تخريج هذا الحديث والكلام عليه في "إرواء الغليل" (121) فلينظر.وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (3093) و (3095).
1705 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، عن عطاء بن السائب، عن طاووس، عن ابن عباسٍ رَفَعَه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الطَّواف بالبيت مِثلُ الصلاة، إلَّا أنكم تتكلَّمونَ، فمن تكلَّم فلا يتكلَّمْ إلا بخير" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وقد أوقفه جماعة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত করে (মারফূ’রূপে) বর্ণনা করেন যে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় বায়তুল্লাহর তাওয়াফ সালাতের (নামাযের) মতোই, তবে তোমরা (এ সময়) কথা বলো। সুতরাং যে ব্যক্তি কথা বলবে, সে যেন উত্তম কথা ছাড়া অন্য কিছু না বলে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح على خلاف في رفعه ووقفه. أبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، وبشر بن موسى: هو ابن صالح الأسدي، والحميدي: هو أبو بكر عبد الله بن الزبير الأسدي، وسفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه البيهقي 5/ 87 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 90، وفي "الصغرى" (1634) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه تامًّا ومقطعًا الشافعي في "الأم" 3/ 449 - ومن طريقه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (9918) - وعبد الرزاق (8985) و (9149) - ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (10988) - وإسحاق بن راهويه (764)، وابن خزيمة (2740) من طريق سفيان بن عيينة، به. لكن وقع في إسناد الشافعي: عن طاووس فيما أحسب أنه قال: عن ابن عباس، وفي إسناد عبد الرزاق وابن راهويه: عن طاووس أو غيره عن ابن عباس.وأخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 312 عن جده أحمد بن محمد بن الوليد الأزرقي، عن سفيان، عن هشام بن حجير قال: قال ابن عباس: الحجر من البيت. لم يذكر طاووسًا.وله شاهد من حديث عائشة، أخرجه البخاري (1584)، ومسلم (1333)، وفيه أنها سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن الجَدْر: أمنَ البيت هو؟ قال: "نعم" قالت: فما لهم لم يدخلوه في البيت؟ قال: "إنَّ قومك قصَّرت بهم النفقة" الحديث، وهو في "مسند أحمد" 41 / (24616) ولفظه فيه عن عائشة أنها قالت: كنت أحب أن أدخل البيت فأصلي فيه، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي فأدخلني في الحِجر، فقال لي: "صلي في الحجر إذا أردت دخول البيت، فإنما هو قطعة من البيت .. " الحديث.
1706 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، عن هشام بن حُجَير، عن طاووس، عن ابن عباس قال: الحِجْرُ من البيت، لأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم طافَ بالبيت من وَرَائِه، قال الله تبارك وتعالى: {وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ} [الحج: 29] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল-হিজর (হাতিম) বাইতুল্লাহরই অংশ। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর পিছন দিক দিয়ে কা'বার তাওয়াফ করতেন। আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা বলেছেন: "আর তারা যেন প্রাচীন গৃহের (কা'বার) তাওয়াফ করে।" (সূরা আল-হাজ্জ: ২৯)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن شاء الله من أجل هشام بن حجير. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 90، وفي "الصغرى" (1634) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه تامًّا ومقطعًا الشافعي في "الأم" 3/ 449 - ومن طريقه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (9918) - وعبد الرزاق (8985) و (9149) - ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (10988) - وإسحاق بن راهويه (764)، وابن خزيمة (2740) من طريق سفيان بن عيينة، به. لكن وقع في إسناد الشافعي: عن طاووس فيما أحسب أنه قال: عن ابن عباس، وفي إسناد عبد الرزاق وابن راهويه: عن طاووس أو غيره عن ابن عباس.وأخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 1/ 312 عن جده أحمد بن محمد بن الوليد الأزرقي، عن سفيان، عن هشام بن حجير قال: قال ابن عباس: الحجر من البيت. لم يذكر طاووسًا.وله شاهد من حديث عائشة، أخرجه البخاري (1584)، ومسلم (1333)، وفيه أنها سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن الجَدْر: أمنَ البيت هو؟ قال: "نعم" قالت: فما لهم لم يدخلوه في البيت؟ قال: "إنَّ قومك قصَّرت بهم النفقة" الحديث، وهو في "مسند أحمد" 41 / (24616) ولفظه فيه عن عائشة أنها قالت: كنت أحب أن أدخل البيت فأصلي فيه، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي فأدخلني في الحِجر، فقال لي: "صلي في الحجر إذا أردت دخول البيت، فإنما هو قطعة من البيت .. " الحديث.
1707 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا مالك بن إسماعيل، أخبرنا عبد السلام بن حَرْب، عن شُعبة، عن عاصم، عن الشَّعْبي، عن ابن عباس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم شَرِبَ ماءً في الطَّواف [1].هذا حديث غريب [2] صحيح. ولم يُخرجاه يها اللفظ [3].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাওয়াফের সময় পানি পান করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. مالك بن إسماعيل: هو أبو غسان الكوفي، وعاصم هو بن سليمان: الأحول، والشعبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه ابن حبان (3837) عن هارون بن عيسى بن السكين، عن العباس بن محمد الدوري، بهذا الإسناد. "الجوهر النقي": ولا يلزم من قول البيهقي: "غريب" عدم ثبوته، وقد شهد له ما أخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" (14849 - عوامة) فقال: حدثنا يحيى بن يمان، عن سفيان، عن منصور، عن خالد بن سعد، عن أبي مسعود: أنه عليه السلام استسقى وهو يطوف بالبيت، فأتي بذَنوب نبيذ السقاية فشربه.وأخرج عبد الرزاق (9766) عن صاحب له، وابن أبي شيبة (14847) عن علي بن هاشم، كلاهما عن ابن أبي ليلى، عن عكرمة بن خالد، عن رجل من آل وداعة قال: استسقى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يطوف بالبيت … الحديث.
[2] كذا استغربه المصنف، وتبعه على ذلك البيهقي 5/ 86 فقال: هذا غريب بهذا اللفظ، ومن قبلهما ابن خزيمة (2750) فقد قال: فإنَّ في القلب من هذا الإسناد، وأنا خائف أن يكون عبد السلام أو من دونه وهم في هذه اللفظة، أعني قوله في الطواف، وقال ابن التركماني في "الجوهر النقي": ولا يلزم من قول البيهقي: "غريب" عدم ثبوته، وقد شهد له ما أخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" (14849 - عوامة) فقال: حدثنا يحيى بن يمان، عن سفيان، عن منصور، عن خالد بن سعد، عن أبي مسعود: أنه عليه السلام استسقى وهو يطوف بالبيت، فأتي بذَنوب نبيذ السقاية فشربه.وأخرج عبد الرزاق (9766) عن صاحب له، وابن أبي شيبة (14847) عن علي بن هاشم، كلاهما عن ابن أبي ليلى، عن عكرمة بن خالد، عن رجل من آل وداعة قال: استسقى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يطوف بالبيت … الحديث.
1707 [3] - كأنه يشير إلى ما أخرجاه بلفظ آخر: البخاري (1637) و (5617)، ومسلم (2027) من طريق عامر الشعبي، أن ابن عباس حدثه قال: سقيت رسول الله صلى الله عليه وسلم من زمزم، فشرب وهو قائم. زاد مسلم في إحدى رواياته: واستسقى وهو عند البيت. الخِزامة، بالخاء المعجمة المكسورة وتخفيف الزاي: حَلْقة من شعر أو وَبَر، تجعل في الحاجز الذي بين مَنخِرَي البعير، يُشَدُّ فيها الزِّمام ليَسهُل انقياده إذا كان صعبًا. انظر "فتح الباري" لابن حجر 21/ 230.والسَّير: هو ما يُقدُّ من الجلود.
1708 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي، حدثنا محمد بن سعد العَوْفي، حدثنا أبو عاصم، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني سليمان الأحول، أنَّ طاووسًا أخبره: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَرَّ وهو يطوف بالكعبة برجل يقودُ رجلًا بخِزامةٍ في أنفه، فقَطَعَه رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدِه، ثم أمرَهُ أن يقودَه بيدِه، قال: ومرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يطوفُ برجلٍ قد رُبِقَ بسَيْرٍ بيدٍ أو رِجْلٍ أو بخَيطٍ، أو بشيء غير ذلك، فقَطَعَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقال: "قُدْهُ بيَدِك".قال ابن جُريج: أخبرني بهذا أجمَعَ سليمانُ الأحولُ، أنَّ طاووسًا أخبره: أنَّ ابن عباسٍ قال ذلك عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কাবা তাওয়াফ করার সময় এমন এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে অন্য এক ব্যক্তিকে তার নাকে খিজামা (নাক রিং বা রশি) পরিয়ে টেনে নিয়ে যাচ্ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজ হাতে তা কেটে দিলেন। অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যেন সে তাকে তার হাত ধরে নিয়ে যায়। রাবী বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাওয়াফ করার সময় এমন এক ব্যক্তির পাশ দিয়েও যাচ্ছিলেন, যে হাত বা পায়ে চামড়ার ফিতা, দড়ি অথবা অন্য কিছু দিয়ে বাঁধা ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেটি কেটে দিলেন এবং বললেন: "তাকে তোমার হাত দ্বারা পথ দেখাও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن سعد العوفي، وقد توبع أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وابن جريج: هو عبد الملك، وسليمان الأحول: هو ابن أبي مسلم.وأخرجه البخاري (1621) و (6702) عن أبي عاصم النبيل، بهذا الإسناد، مختصرًا: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يطوف بالكعبة بزمام أو غيره، فقطعه.وأخرجه تامًّا ومختصرًا أحمد 5/ (3442) و (3443)، والبخاري (1620) و (6703)، وأبو داود (3302)، والنسائي (4733) و (4734)، وابن حبان (3831) و (3832) من طرق عن ابن جريج، به. الخِزامة، بالخاء المعجمة المكسورة وتخفيف الزاي: حَلْقة من شعر أو وَبَر، تجعل في الحاجز الذي بين مَنخِرَي البعير، يُشَدُّ فيها الزِّمام ليَسهُل انقياده إذا كان صعبًا. انظر "فتح الباري" لابن حجر 21/ 230.والسَّير: هو ما يُقدُّ من الجلود.
1709 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني أسامة بن زيد، عن عطاء بن أبي رباح، حدثه أنه سمع جابرَ بنَ عبد الله يقول: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "كلُّ فِجَاجِ مكّةَ طريقٌ ومَنْحَر" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মক্কার সকল উপত্যকা যাতায়াতের পথ এবং কুরবানীর স্থান।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] أسامة بن زيد - وهو الليثي - وإن كان حسن الحديث في الجملة، إلّا أنَّ عنده مناكير، وقد انفرد بهذا اللفظ عطاء عن عن جابر، وخالف من هو أوثق منه، والمحفوظ من حديث جابر ضمن حديثه الطيل في الحج: "منى كلها منحر"، ليس فيه "كل فجاج مكة طريق ومنحر"، لذلك تركه يحيى القطان لأجل هذا الحديث، كما في "سؤالات الحاكم للدارقطني" (290)، وقال أحمد بن حنبل في "العلل" (4712): تركه يحيى بأخرة لهذا الحديث.وأخرجه أحمد 22 / (14498) عن عثمان بن عمر، وأبو داود (1937) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، وابن ماجه (3048) من طريق وكيع، ثلاثتهم عن أسامة بن زيد، بهذا الإسناد.ولفظه: "كل عرفة موقف، وكل مِنى منحر، وكل المزدلفة موقف، وكل فجاج مكة طريق ومنحر".وأخرج أحمد 22 / (14440)، وأبو داود (1907) و (1909)، والنسائي (4119) من طريق يحيى بن سعيد القطان، ومسلم (1218) (149)، وأبو داود (1908) و (1936) من طريق حفص بن غياث، كلاهما عن جعفر بن محمد بن علي الصادق، عن أبيه محمد بن علي الباقر، عن جابر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "نحرت هاهنا، ومنى كلها منحر، فانحروا في رحالكم، ووقفت هاهنا، وعرفة كلها موقف ووقفت هاهنا وجمع كلها موقف". لفظ مسلم، وهذا إسناد صحيح، وليس فيه كل "فجاج مكة طريق ومنحر".وحديث محمد بن علي الباقر عن جابر له شاهد بإسناد حسن من حديث علي بن أبي طالب، أخرجه أحمد 2 / (652) و (768) و (1348)، وأبو داود (1935)، والترمذي (885)، وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.أما حديث أسامة بن زيد عن عطاء عن جابر فليس له شاهد إلّا حديث أبي هريرة عند أبي داود (2324)، وهو من رواية محمد بن المنكدر عنه، ومحمد بن المنكدر لم يسمع من أبي هريرة، وقد اختلف عليه في رفعه ووقفه كما في "العلل" للدارقطني (1868).وروى القاسم بن عبد الله العمري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر رفعه: " … وكل منى منحر إلّا ما وراء العقبة"، والقاسم هذا متروك، رماه أحمد بالكذب، فلا يعتد بروايته.والفِجاج: جمع فجٌّ، وهو الطريق الواسع.
1710 - حدثنا أبو علي الحافظ، حدثنا محمد بن الحسين بن حفص الخَثْعَمي، حدثنا علي بن سعيد بن مسروق الكِنْدي، حدثنا عيسى بن سَوَادةَ، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن زاذانَ قال: مَرِضَ ابن عباس مرضًا شديدًا، فدعا وَلَدَه فجمعهم، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن حَجَّ من مكةَ ماشيًا حتى يَرجِعَ إلى مكة، كَتَبَ الله له بكلِّ خُطْوةٍ سبعَ مئة حسنةٍ، كلُّ حسنةٍ مثلُ حَسَنات الحَرَم"، قيل: وما حَسَناتُ الحَرَم؟ قال: "بكلِّ حسنةٍ مئةُ ألفِ حَسَنة" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি গুরুতর অসুস্থ হয়ে পড়লে তাঁর সন্তানদের ডাকলেন এবং তাদের একত্রিত করলেন, অতঃপর বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি মক্কা থেকে হেঁটে হজ (আদায় করার উদ্দেশ্যে বের) হবে, এমনকি সে মক্কায় ফিরে আসা পর্যন্ত, আল্লাহ তার প্রতিটি কদমে সাতশ নেকি লিখে দেন। প্রতিটি নেকি হারামের নেকির সমতুল্য।” জিজ্ঞাসা করা হলো: হারামের নেকি কেমন? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “প্রতিটি নেকির মান হলো এক লাখ নেকি।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عيسى بن سوادة - وهو النخعي - قال ابن معين: كذاب، رأيته، وقال أبو حاتم: منكر الحديث ضعيف، روى عن إسماعيل بن أبي خالد عن زاذان عن ابن عباس حديثًا منكرًا. ونقل المنذري في "الترغيب والترهيب" قول البخاري: هو منكر الحديث. وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك" متعقبًا تصحيح المصنف له: ليس بصحيح، أخشى أن يكون كذبًا.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 331 و 10/ 78، وفي "الصغرى" (4083)، وفي "شعب الإيمان" (3695) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال: تفرد به عيسى بن سوادة هذا وهو مجهول.وأخرجه ابن خزيمة (2791) عن علي بن سعيد بن مسروق، به. وقال قبله: إنَّ في القلب من عيسى بن سوادة هذا.وأخرجه البزار (4745)، والدولابي في "الكنى والأسماء" (1185)، والطبراني في "المعجم الكبير" (12606)، وفي "الأوسط" (2675) من طرق عن عيسى بن سوادة به. قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن إسماعيل إلّا عيسى.وقد روي نحوه من طريق سعيد بن جبير عن ابن عباس، رفعه، وفيه: "إنَّ للحاج الراكب بكل خطوة تخطوها راحلته سبعين حسنة، والماشي بكل خطوة يخطوها سبع مئة حسنة"، وفيه محمد بن مسلم الطائفي، وهو وإن كان صدوقًا لكن في حفظه سوء، وقد اضطرب في إسناده وفي متنه، كما أنَّ الرواة عنه كلهم ضعاف، فقد أخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (832)، وأبو يعلى في "مسنده" كما في "المطالب العالية" 6/ 275، والواحدي في "التفسير الوسيط" 3/ 267 من طريق يحيى بن سليم الطائفي، عن محمد بن مسلم الطائفي، عمن أخبره عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ويحيى بن سليم صدوق لكن في حفظه سوء، وقد ضعفه أحمد وغيره، وقد بيَّن الرجل المبهم في رواية الواحدي فقال: وهو إبراهيم بن ميسرة. ومرة قال: إبراهيم بن ميسرة، دون إبهام، كما أخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 7، وأبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 354، والضياء المقدسي في "المختارة" (45) من طريق يحيى بن سليم، عن محمد بن مسلم، عن إبراهيم بن ميسرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس.وتابعه على ذكر إبراهيم بن ميسرة: عبد الله بن محمد بن ربيعة عن محمد بن مسلم، فيما أخرجه من طريقه ابن عدي في "الكامل" 4/ 258، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1037). وعبد الله بن محمد هذا ضعيف جدًّا لا يعتدُّ بمتابعته، قال الذهبي في "الميزان": أحد الضعفاء، أتى عن مالك بمصائب، وقال ابن عدي: عامة حديثه غير محفوظ، وهو ضعيف.ثم رواه محمد بن مسلم الطائفي مرة أخرى فقال: إسماعيل بن أمية، بدلًا من إبراهيم بن ميسرة، فقد أخرجه الطبراني في "الكبير" (12522) من طريق يحيى بن سليم، وابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (326)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (931) و (932) من طريق حجاج بن نصير، كلاهما عن محمد بن مسلم، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. قال ابن الجوزي: هذان حديثان لا يصحان، مدارهما على إسماعيل بن أمية، قال الدارقطني: كان يضع الحديث.ورواه يحيى بن سليم مرة رابعة فجعل إسماعيل بن إبراهيم بدلًا من إبراهيم بن ميسرة وإسماعيل بن أمية، كما أخرجه البزار (5119)، وأبو طاهر السلفي في الجزء الخامس والثلاثين من "المشيخة البغدادية" (20).ورواه مرة خامسة عن محمد بن مسلم عن سعيد بن جبير - دون واسطة - عن ابن عباس، فأرسله، ذكر ذلك ابن أبي حاتم في "العلل" (826).وروي هذا الحديث من وجه آخر عن سعيد بن جبير عن ابن عباس، فقد أخرجه الأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 7 من طريق هارون بن كعب، وأبو الفضل الزهري في "جزء من حديثه" (277) من طريق عبد الرحيم بن زيد بن الحواري، كلاهما عن زيد بن الحواري العمي، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. وهارون بن كعب لم نتبينه ومتابعه عبد الرحيم بن زيد متروك، وأبوه زيد الحواري ضعيف.وهذه طرق لا يزيد بعضها بعضًا إلّا اضطرابًا ووهنًا.وإضافة إلى هذا الاضطراب في السند، حصل أيضًا اضطراب في متنه بما يطول بيانه، وحاصله أنه كله من هؤلاء الضعفاء والمتروكين، هذا فضلًا عن أنه يخالف الأحاديث الصحيحة في حج النبي صلى الله عليه وسلم راكبًا، وأمرِه التي نذرت أن تمشي أن تركب وتكفر عن يمينها، والله تعالى أعلم.
1711 - أخبرنا أحمد بن محمد بن جعفر الجُلُودي، حدثنا محمد بن إسماعيل بن مِهْران، حدثنا محمد بن يوسف، حدثنا أبو قُرَّةَ، عن موسى بن عُقْبة، عن نافع، عن ابن عمرَ قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا كانَ قبلَ التَّرويةِ بيومٍ خَطَبَ الناسَ، فأخبَرَهم بمناسِكِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তারবিয়ার দিনের (৮ যিলহজ) একদিন আগে আসত, তখন তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতেন এবং তাদেরকে তাদের হজের রীতিনীতি (মানাসিক) সম্পর্কে অবহিত করতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن يوسف - وهو الزّيادي - فهو صدوق، وباقي رجاله ثقات.أبو قرة: هو موسى بن طارق اليماني.وأخرجه البيهقي 5/ 111 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2793) من طريق عمرو بن مجمع الكوفي، عن موسى بن عقبة، به.وعمرو بن مجمع ضعيف. والفجر يوم عرفة بمنى.وأخرج ابن ماجه (3004)، والترمذي (879) من طريق إسماعيل بن مسلم، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى الظهر والعصر والمغرب والعشاء والفجر، ثم غدا إلى عرفات. قال الترمذي: وإسماعيل بن مسلم قد تكلموا فيه من قبل حفظه.وفي الباب عن عبد الله بن الزبير، وسيأتي بعد هذا.وعن جابر ضمن حديثه الطويل في الحج، أخرجه مسلم (1218).وعن ابن عمر عند أحمد 10/ (6131)، وابن ماجه (3005).
1712 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا الأسود بن عامر، حدثنا أبو كُدَينةَ يحيى بن المُهلَّب البَجَلي، عن الأعمش، عن الحَكَم، عن مِقْسَم، عن ابن عباس: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم صلَّى خمسَ صلواتٍ بمِنًى [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، رجاله ثقات. الأعمش: هو سليمان بن مهران، والحكم: هو ابن عُتيبة، ومقسم: هو مولى ابن عباس.وأخرجه أحمد 4/ (2700) و (2765) عن الأسود بن عامر، بهذا الإسناد.وأخرج أبو داود (1911) من طريق عمار بن رزيق، والترمذي (880) من طريق عبد الله بن الأجلح، كلاهما عن الأعمش، به إلى ابن عباس قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الظهر يوم التروية، والفجر يوم عرفة بمنى.وأخرج ابن ماجه (3004)، والترمذي (879) من طريق إسماعيل بن مسلم، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى الظهر والعصر والمغرب والعشاء والفجر، ثم غدا إلى عرفات. قال الترمذي: وإسماعيل بن مسلم قد تكلموا فيه من قبل حفظه.وفي الباب عن عبد الله بن الزبير، وسيأتي بعد هذا.وعن جابر ضمن حديثه الطويل في الحج، أخرجه مسلم (1218).وعن ابن عمر عند أحمد 10/ (6131)، وابن ماجه (3005).
1713 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد، عن عبد الله بن الزُّبير قال: من سُنَّةِ الحجِّ أن يُصلِّي الإمامُ الظُّهرَ والعصرَ والمغربَ والعِشاءَ الآخرةَ والصُّبحَ بمنًى، ثم يَغدُوَ إلى عَرَفةَ، فيَقيلَ حيثُ قُضِي له، حتى إذا زالت الشمسُ خَطَبَ الناسَ، ثم صلَّى الظُّهرَ والعصرَ جميعًا، ثم وَقَفَ بعرفاتٍ حتى تَغيبَ الشمسُ، ثم يُفيض فيصلِّي بالمُزدلِفَةِ أو حيثُ قَضَى الله، ثم يقفُ بجَمْعٍ، حتى [إذا] أسفَرَ دَفَعَ قبلَ طُلوع الشمس، فإذا رَمَى الجمرةَ الكُبرى حلَّ له كلُّ شيءٍ حَرُمَ عليه إلَّا النساءَ والطِّيبَ حتى يَزورَ البيت [1].هذا حديث على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হজ্জের সুন্নাত হলো, ইমাম মিনায় যুহর, আসর, মাগরিব, এশা ও ফজরের সালাত আদায় করবেন। এরপর আরাফার দিকে যাবেন এবং তার জন্য যেখানে নির্ধারিত হয়েছে সেখানে বিশ্রাম করবেন। যখন সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে পড়বে, তখন তিনি মানুষদের উদ্দেশ্যে খুতবা দেবেন। এরপর তিনি যুহর ও আসরের সালাত একত্রে আদায় করবেন। অতঃপর তিনি আরাফাতে সূর্যাস্ত পর্যন্ত অবস্থান করবেন। এরপর তিনি রওয়ানা হবেন এবং মুজদালিফায় অথবা আল্লাহ যেখানে নির্ধারণ করেছেন, সেখানে সালাত আদায় করবেন। এরপর তিনি জম' (মুজদালিফা)তে অবস্থান করবেন। এমনকি যখন ফর্সা হবে (আলো ছড়িয়ে পড়বে), তখন তিনি সূর্যোদয়ের আগে রওয়ানা হবেন। এরপর যখন তিনি বড় জামরায় (জামরাতুল আকাবায়) কঙ্কর নিক্ষেপ করবেন, তখন নারীদের সংস্পর্শ ও সুগন্ধি ছাড়া তার জন্য নিষিদ্ধ সকল কিছু হালাল হয়ে যাবে, যতক্ষণ না তিনি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. إبراهيم بن عبد الله: هو السعدي أبو إسحاق التميمي، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري، والقاسم بن محمد: هو ابن أبي بكر الصديق.وأخرجه البيهقي 5/ 122 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (2801) عن محمد بن الوليد، عن يزيد بن هارون، به.وأخرجه تامًا: ابن خزيمة (2800)، والطبراني في "الكبير" (14850)، ومختصرًا: ابن أبي شيبة (14760 - عوامة)، وابن خزيمة (2798)، وابن عبد البر في "الاستذكار" (15801) من طرق عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به.
1714 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا أبو بَكْرةَ بكَّارُ بن قُتيبة القاضي بمصر، حدثنا صفوان بن عيسى، حدثنا الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذُباب، عن مجاهد، عن عبد الله بن سَخْبَرةَ قال: غَدَوتُ مع عبد الله بن مسعودٍ من مِنى إلى عَرَفةَ، وكان عبد الله رجلًا آدمَ له ضَفِيرتانِ، عليه مَسْحةُ أهل البادية، وكان يُلبِّي، فاجتمع عليه غَوْغاءٌ من غَوْغاءِ الناس فقالوا: يا أعرابيُّ، إنَّ هذا ليس بيومِ تلبيةٍ، إنَّما هو التكبير، قال: فعند ذلك التَفَتَ إليَّ فقال: جَهِلَ الناسُ أم نَسُوا؟ والذي بَعَثَ محمدًا صلى الله عليه وسلم بالحق، لقد خرجتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من مِنى إلى عَرَفةَ، فما تَرَكَ التلبيةَ حتى رَمَى الجَمْرةَ، إلَّا أن يَخلِطَها بتكبيرٍ أو تهليلٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল্লাহ ইবনে সাখবারাহ বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মিনা থেকে আরাফার দিকে যাচ্ছিলাম। আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) ছিলেন শ্যামলা বর্ণের এক ব্যক্তি, যার দুটি বেণী ছিল এবং তার মধ্যে বেদুঈনদের (গ্রাম্য লোকের) ছাপ ছিল। তিনি তখন তালবিয়াহ পাঠ করছিলেন। তখন সাধারণ লোকদের একটি দল তার কাছে এসে সমবেত হলো এবং বলল: "হে গ্রাম্য লোক! এটি তালবিয়াহ পাঠের দিন নয়, বরং এটি তাকবীর পাঠের দিন।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি আমার দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন: "লোকেরা কি অজ্ঞ না ভুলে গেছে? সেই সত্তার কসম, যিনি মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনা থেকে আরাফার উদ্দেশ্যে বের হয়েছিলাম, তিনি জামরায় পাথর মারা পর্যন্ত তালবিয়াহ পাঠ ত্যাগ করেননি, তবে এর সাথে তাকবীর বা তাহলীল যুক্ত করা ভিন্ন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده جيد من أجل صفوان بن عيسى وشيخه الحارث بن أبي ذباب. مجاهد: هو ابن جبر المكي.وأخرجه أحمد 7/ (3961) عن صفوان بن عيسى، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 6/ (3549) و 7/ (3976)، ومسلم (1283)، والنسائي (4039) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن قيس النخعي: أنَّ عبد الله لبّى حين أفاض من جمع، فقيل: أعرابيٌّ هذا؟ فقال عبد الله: أنسي الناس أم ضلُّوا؟! سمعت الذي أنزلت عليه سورة البقرة يقول في هذا المكان: "لبيك اللهم لبيك". واللفظ لمسلم.وأخرجه البخاري (1683) مطولًا من طريق عبد الرحمن بن يزيد أيضًا قال: خرجنا مع عبد الله إلى مكة، ثم قدمنا جمعًا … فلم يزل يلبي حتى رمى جمرة العقبة يوم النحر.وأخرج أحمد 6/ (3739) من طريق ثوير بن أبي فاختة، عن أبيه سعيد بن علاقة، عن ابن مسعود قال: لبَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى رمى جمرة العقبة. وثوير بن أبي فاختة ضعيف.وفي الباب عن الفضل بن عباس عند البخاري (1685)، ومسلم (1281).وعن عبد الله بن عباس عند البخاري (1543) و (1686)، ومسلم (1286).وأول الخبر في وصف ابن مسعود سيأتي عند المصنف برقم (5455).آدم: فيه سُمْرة. والضفيرتان: ذؤابتان أو خُصلتان من شَعره.وقوله: "عليه مَسحة أهل البادية" أي: أثرهم.
1715 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا أحمد بن سيّار، حدّثنا محمد بن كَثير، حدّثنا سفيان بن عُيينة، عن زياد بن سعد، عن أبي الزُّبير، عن أبي مَعبَد [1]، عن ابن عباس قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ارفَعوا عن بَطْنِ عُرَنةَ، وارفَعوا عن بَطْنِ مُحسِّر" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وشاهده على شرط الشيخين صحيحٌ، إلَّا أنَّ فيه تقصيرًا في سنده:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা উরানাহ উপত্যকা দ্রুত পার হও এবং মুহাসসির উপত্যকা দ্রুত পার হও।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: أبي سعيد، والصواب ما أثبتنا، وأبو معبد هذا: هو نافذ مولى ابن عباس. وأخرجه البيهقي 5/ 115 من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، عن ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: ارتفعوا عن عرنات … فذكره. فجعله من قول ابن عباس. وعبد الوهاب بن عطاء ربما أخطأ كما قال ابن حجر.وخالف في ذلك يعقوبُ بن عطاء فرفعه، أخرجه الطبراني في "الكبير" (11408)، و"الأوسط" (9496) من طريق محمد بن جعفر، وهو الحنفي اليمامي، عن يعقوب بن عطاء، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كل عرفات موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة، وكل جمع مشعر، وارتفعوا عن بطن محسر". ويعقوب بن عطاء هذا ضعيف، والراوي عنه محمد بن جعفر اليمامي سيئ الحفظ.
[2] حديث صحيح، محمد بن كثير - وهو ابن أبي عطاء المصيصي - وإن كان متكلمًا فيه، فهو يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد توبع، ومن فوقه ثقات. زياد بن سعد: هو ابن عبد الرحمن الخراساني، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرس.وأخرجه أحمد 3/ (1896) عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. ولفظه: "ارفعوا عن بطن محسِّر، وعليكم بمثل حصى الخذْف". وانظر ما سيأتي مطوَّلًا برقم (5280).وفي الباب عن جبير بن مطعم عند أحمد 27/ (16751)، وابن حبان (3854)، وإسناده ضعيف بسبب انقطاعه.وعن جابر بن عبد الله عند ابن ماجه (3012)، وفيه القاسم بن عبد الله العمري، وهو متروك.وبطن عُرَنة، بضم العين وفتح الراء: موضع عند الموقف بعرفات.وبطن مُحسِّر، بضم الميم وفتح الحاء وكسر السين المشددة: وادٍ بين عرفات ومنى. وأخرجه البيهقي 5/ 115 من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، عن ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: ارتفعوا عن عرنات … فذكره. فجعله من قول ابن عباس. وعبد الوهاب بن عطاء ربما أخطأ كما قال ابن حجر.وخالف في ذلك يعقوبُ بن عطاء فرفعه، أخرجه الطبراني في "الكبير" (11408)، و"الأوسط" (9496) من طريق محمد بن جعفر، وهو الحنفي اليمامي، عن يعقوب بن عطاء، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كل عرفات موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة، وكل جمع مشعر، وارتفعوا عن بطن محسر". ويعقوب بن عطاء هذا ضعيف، والراوي عنه محمد بن جعفر اليمامي سيئ الحفظ.
1716 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن ابن جُرَيج، أخبرني عطاء، عن ابن عباس قال: كان يقال: ارتفِعوا عن مُحسِّر، وارتفِعوا عن عُرَنات.أما قوله: العُرَنات، فالوقوفُ بعَرَفةَ: أنْ لا تَقِفوا بعُرَنة، وأما قوله: عن مُحسِّر، فالنزول بجَمْعٍ: أنْ لا يَنزلوا مُحسِّرًا [1].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বলা হতো: তোমরা মুহাস্সির থেকে দূরে থাকো এবং উরানাত (উরানাহ) থেকেও দূরে থাকো। উরানাত (উরানাহ) সম্পর্কে তাঁর বক্তব্য হলো, আরাফাতের অবস্থান সংক্রান্ত। এর অর্থ হলো: তোমরা উরানার মধ্যে অবস্থান করবে না। আর মুহাস্সির সম্পর্কে তাঁর বক্তব্য হলো, জাম' (মুযদালিফা)-তে অবতরণ (অবস্থান) সংক্রান্ত। এর অর্থ হলো: তারা মুহাস্সিরে অবতরণ করবে না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، ويحيى بن سعيد: هو القطان، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه ابن خزيمة (2817) عن عبد الله بن هاشم، عن يحيى بن سعيد بهذا الإسناد. وأخرجه البيهقي 5/ 115 من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، عن ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس قال: ارتفعوا عن عرنات … فذكره. فجعله من قول ابن عباس. وعبد الوهاب بن عطاء ربما أخطأ كما قال ابن حجر.وخالف في ذلك يعقوبُ بن عطاء فرفعه، أخرجه الطبراني في "الكبير" (11408)، و"الأوسط" (9496) من طريق محمد بن جعفر، وهو الحنفي اليمامي، عن يعقوب بن عطاء، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كل عرفات موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة، وكل جمع مشعر، وارتفعوا عن بطن محسر". ويعقوب بن عطاء هذا ضعيف، والراوي عنه محمد بن جعفر اليمامي سيئ الحفظ.
1717 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا علي بن عبد الله، حدثنا سفيان.وحدثني علي بن عيسى - واللفظ له - حدّثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عمر، حدثنا سفيان قال: حفظتُه من عمرو بن دينار، عن عمرو بن عبد الله بن صفوان، عن خاله يزيد بن شَيْبان قال: كنّا وقوفًا من وراء المَوقِف - موقفًا يتباعدُه عمرٌو من الإمام - فأتانا ابنُ مِرْبَع الأنصاريُّ فقال: إنِّي رسولُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إليكم، يقول لكم: "كونوا على مَشَاعرِكم هذه، فإنَّكم على إرْثٍ من إرْثِ إبراهيم" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইয়াযিদ ইবনু শায়বান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মাওকিফের (দাঁড়ানোর স্থানের) পিছনে অবস্থান করছিলাম—যা আমর (রাবী) ইমামের স্থান থেকে দূরে রাখার ব্যবস্থা করতেন। তখন আমাদের কাছে ইবনু মিরবা' আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন: "আমি তোমাদের কাছে আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রেরিত দূত। তিনি তোমাদেরকে বলছেন: 'তোমরা তোমাদের এই মাশা'ইর (পবিত্র নিদর্শনসমূহ)-এর উপরই থাকো, কারণ তোমরা ইবরাহীম (আঃ)-এর মীরাসের (উত্তরাধিকারের) উপরই রয়েছ'।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل عمرو بن عبد الله بن صفوان. علي بن عبد الله: هو ابن المديني، وسفيان: هو ابن عيينة، وابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العدني الحافظ، وابن مربع الأنصاري: هو يزيد بن مربع.وأخرجه أحمد 28/ (17233)، وأبو داود (1919)، وابن ماجه (3011)، والترمذي (883)، والنسائي (3996) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن، لا نعرفه إلّا من حديث ابن عيينة عن عمرو بن دينار.وفي الباب عن علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (562)، وأبي داود (1935)، وابن ماجه (3010)، والترمذي (885)، وإسناده حسن.وعن جبير بن مطعم عند أحمد 27/ (16751)، وابن حبان (3854)، وإسناده ضعيف.
1718 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا رَوْحُ بن عُبادة، حدثنا شُعبة.وأخبرني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا موسى بن الحسن بن عبَّاد، حدثنا عفّان بن مسلِم، حدثنا شعبة قال: سمعتُ عبد الله بن أبي السَّفَر يقول: سمعتُ الشَّعبيَّ يحدِّث عن عُرْوةَ بن مُضَرِّس بن أوس بن حارثةَ بن لام قال: أتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو بجَمْعٍ، فقلت: هل لي من حَجٍّ؟ فقال: "من صلَّى معنا هذه الصلاةَ في هذا المكان، ثم وَقَفَ معنا هذا الموقفَ حتى يُفِيضَ الإمام، [وأفاض] [1] قبلَ ذلك من عَرَفاتٍ ليلًا أو نهارًا، فقد تمَّ حَجُّه وقَضَى تَفَثَه" [2].
উরওয়াহ ইবনে মুদাররিস ইবনে আওস ইবনে হারিসাহ ইবনে লাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলাম যখন তিনি জাম’ (মুযদালিফাহ)-এ ছিলেন। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আমার কি হজ্জ হয়েছে? তিনি বললেন: “যে ব্যক্তি এই স্থানে আমাদের সাথে এই সালাত আদায় করবে, এরপর ইমাম (মিনায়) প্রত্যাবর্তনের আগ পর্যন্ত এই স্থানে আমাদের সাথে অবস্থান করবে, আর এর পূর্বে আরাফাত থেকে দিনে অথবা রাতে (মুযদালিফার দিকে) আগমন করবে, তার হজ্জ অবশ্যই সম্পন্ন হয়েছে এবং সে তার অপরিহার্য কাজ (ইহরাম মুক্ত হওয়ার কাজ) শেষ করেছে।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "وأفاض" سقطت من النسخ الخطية، واستدركناها من "السنن الصغرى" للبيهقي (1753) حيث أخرجه عن المصنِّف من جهة روح بن عبادة، وهي كذلك في "المسند" 30/ (18301) حيث أخرجه عن روح، وفي "تلخيص الذهبي": وكان وقف قبل …
[2] إسناده صحيح. الشعبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه النسائي (4031) من طريق خالد بن الحارث، وابن حبان (3850) من طريق أبي الوليد الطيالسي، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسنادوأخرجه بنحو لفظ الحديث التالي أحمد 26/ (16208) و (16209)، والترمذي (891)، والنسائي (4034)، وابن حبان (3851) من طريق زكريا بن أبي زائدة وداود بن أبي هند، عن الشعبي، به. ولم يذكر أحمد: داود بن أبي هند. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه كذلك النسائي (4032) من طريق أمية بن خالد، عن شعبة، عن سيار أبي الحكم، عن الشعبي، به.وأخرج النسائي (4033) من طريق مطرف بن طريف، عن الشعبي، عن عروة بن مضرس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من أدرك جمعًا مع الإمام والناس حتى يفيضوا فقد أدرك الحج، ومن لم يدرك مع الناس والإمام فلم يدرك".وانظر تالييه.قوله: "قضى تفثه" قال الترمذي: يعني نُسُكه.
1719 - وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق البَصْري بمصر، حدثنا وَهْب بن جَرير، عن شعبة، عن إسماعيل بن أبي خالد.وأخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد المعدِّل بمَرْو - واللفظ له - أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، عن الشَّعبي، عن عُرْوة بن مُضَرِّس الطائي قال: أتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو واقفٌ بجَمْع، فقلت: يا رسول الله، جئتُك من جَبَلَي طيِّئ، وقد أكلَلْتُ مَطِيَّتي وأتعبتُ نفسي، واللهِ ما تركتُ من حَبْلٍ [1] إِلَّا وقفتُ عليه، فهل لي من حجٍّ؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أدرَكَ معنا هذه الصلاةَ وقد أتى عَرَفاتٍ قبلَ ذلك ليلًا أو نهارًا، فقد قَضَى تَفَثَه وحَجَّه" [2].هذا حديث صحيح على شرط كافَّة أئمة الحديث، وهي قاعدة من قواعد الإسلام، وقد أمسك عن إخراجه الشيخان محمدُ بنُ إسماعيل ومسلم بن الحجّاج رضي الله عنهما، على أصلهما أنَّ عُرْوة بن مُضرِّس لم يحدِّث عنه غيرُ عامرٍ الشَّعبي [3]، وقد وجدنا عُروةَ بن الزُّبير بن العوَّام حدَّث عنه:
উরওয়াহ ইবনে মুদাররিস আত-তায়ী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, যখন তিনি জামা' (মুযদালিফাহ) নামক স্থানে দাঁড়িয়ে ছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তায়্যি গোত্রের দুই পাহাড় থেকে আপনার নিকট এসেছি। আমি আমার বাহনকে ক্লান্ত করে দিয়েছি এবং নিজেকেও পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো টিলা বা পথ বাকি রাখিনি যেখানে আমি দাঁড়াইনি। আমার জন্য কি হজ্জ আছে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই (মুযদালিফাহর ফজরের) সালাত লাভ করল এবং এর পূর্বে রাত বা দিনে আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করেছে, সে তার আবশ্যকীয় কাজ সম্পন্ন করল এবং তার হজ্জ সম্পন্ন হলো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تصحفت في المطبوع إلى: جبل، بالجيم، والصواب: حَبْل، بالحاء المهملة وسكون الباء الموحدة، والحَبْل: هو المستطيل من الرمل، قال الترمذي: إذا كان من رمل يقال له: حَبْل، وإذا كان من حجارة يقال له: جَبَل.
[2] إسناده صحيح. أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرجه أحمد 26/ (16208)، وأبو داود (1950)، وابن ماجه (3016)، والترمذي (891)، والنسائي (4034) و (4035)، وابن حبان (3851) من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد، بهذا الإسناد.
1719 [3] - انظر تعليقنا على هذه المسألة عند الحديث رقم (97).
1720 - حدَّثَناه عبد الصَّمد بن علي بن مُكْرَم البزَّاز ببغداد، حدثنا أبو عبد الله أحمد بن عبد الله بن أحمد بن حسان التُّسْتَري بتُسْتَر، حدثنا عبد الوهاب بن فُلَيح المكِّي، حدثنا يوسف بن خالد السَّمْتي البصري، حدثنا هشام بن عُروة، عن أبيه، عن عُروة بن مُضَرِّس الطائي قال: جئتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو بالمَوقِف، فقلت: يا رسول الله، أتيتُ من جَبَلَي طيِّئ، أكلَلْتُ مَطِيَّتي، وأتعبتُ نفسي، والله ما بقي من حَبْلٍ من تلك الحِبال إلَّا وقفتُ عليه، فقال: "مَن أدرَكَ معنا هذه الصلاةَ - يعني صلاةَ الغَداة - وقد أتى عَرَفةَ قبل ذلك ليلًا أو نهارًا، فقد تمَّ حجُّه وقضى تَفَثَه" [1].وقد تابع عروةَ بن المُضرِّس في رواية هذه السُّنة من الصحابة عبدُ الرحمن بن يَعْمَرَ الدُّؤَلي:
উরওয়া ইবনু মুদাররিস আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, যখন তিনি মুযদালিফায় অবস্থান করছিলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তাঈ গোত্রের দুই পাহাড় থেকে এসেছি। আমি আমার সাওয়ারীকে ক্লান্ত করেছি এবং নিজেকে পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! সেই পাহাড়গুলোর এমন কোনো স্থান (বা পথ) বাকি নেই, যেখানে আমি অবস্থান করিনি। অতঃপর তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাতটি—অর্থাৎ ফজরের সালাত—পেল এবং এর পূর্বে রাতে অথবা দিনে আরাফায় পৌঁছেছে, তার হজ পূর্ণ হলো এবং সে তার (প্রয়োজনীয়) কাজ সম্পন্ন করল।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده تالف، يوسف بن خالد السَّمْتي متهم، قال الذهبي في "تلخيص المستدرك": السمتي ليس بثقة، وقال الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" 11/ 161: هذه الرواية لا تسوى شيئًا، فإنَّ يوسف بن خالد قد اتهموه بالوضع، فلا يصلح الاستشهاد به.ولم نقف على هذه الطريق عند غير الحاكم، والله أعلم. وأخرجه أحمد (18774) و (18954)، وأبو داود (1949)، وابن ماجه (3015) و (3015 م)، والترمذي (889)، والنسائي (3997) و (4036) من طرق عن سفيان الثوري، به.وسيأتي برقم (3137) من طريق شعبة، عن بكير بن عطاء، ويأتي تخريجه هناك.