হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1721)


1721 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان بن عُيينة، حدثنا سفيان بن سعيدٍ الثَّوري.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، عن سفيان، عن بُكَير بن عطاء، عن عبد الرحمن بن يَعمَر قال: أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم بعَرَفةَ، وأتاه ناسٌ من أهل نجدٍ وهو بعَرفةَ، فسألوه، فأمَرَ مناديًا فنادى: "الحجُّ عَرَفةُ، الحجُّ عَرَفةُ، ومن جاء ليلةَ جَمْعٍ قبل طلوع الفجر فقد أدرَكَ، أيامُ مِنى ثلاثةٌ، من تعجَّل في يومينِ فلا إثمَ عليه، ومن تأخَّر فلا إثمَ عليه"، وأردَفَ رجلًا فنادى [1].




আব্দুর রহমান বিন ইয়া'মার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আরাফার ময়দানে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। নজদবাসীদের কিছু লোকও তাঁর নিকট আসলো, যখন তিনি আরাফাতে ছিলেন। তারা তাঁকে জিজ্ঞেস করলো। অতঃপর তিনি একজন ঘোষককে নির্দেশ দিলেন। সে ঘোষণা করলো: "হজ্ব হল আরাফা (আরাফাতে অবস্থান)। হজ্ব হল আরাফা (আরাফাতে অবস্থান)। আর যে ব্যক্তি জম' (মুযদালিফা)-এর রাতে ফজরের আগে আসবে, সে (হজ্ব) লাভ করলো (অর্থাৎ তার হজ্ব আদায় হয়ে গেল)। মিনায় অবস্থানের দিনগুলো তিনটি। যে ব্যক্তি দুই দিনে ত্বরা করবে, তার উপর কোনো পাপ নেই। আর যে ব্যক্তি বিলম্ব করবে (তিন দিন থাকবে), তার উপরও কোনো পাপ নেই।" এবং তিনি একজন ব্যক্তিকে পিছনে বসালেন (আরোহণে), সে ঘোষণা দিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو بكر بن إسحاق اسمه: أحمد، والحميدي: هو عبد الله بن الزبير الأسدي.وأخرجه الترمذي (890) و (2975)، والنسائي (3998)، وابن حبان (3892) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن صحيح. ثم قال: قال ابن أبي عمر - يعني شيخ الترمذي فيه -: قال سفيان بن عيينة: وهذا أجود حديث رواه سفيان الثوري. وقال ابن حبان: قال ابن عيينة: فقلت لسفيان الثوري: ليس عندكم بالكوفة حديث أشرف ولا أحسن من هذا.وأخرجه الترمذي (889) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، به. وأخرجه أحمد (18774) و (18954)، وأبو داود (1949)، وابن ماجه (3015) و (3015 م)، والترمذي (889)، والنسائي (3997) و (4036) من طرق عن سفيان الثوري، به.وسيأتي برقم (3137) من طريق شعبة، عن بكير بن عطاء، ويأتي تخريجه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1722)


1722 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن محمد القَبّاني، حدثنا نصر بن علي الجَهْضَمي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثني أبي، عن محمد بن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عثمان بن أبي سليمان، عن عمِّه نافع بن جُبير، عن أبيه جُبير بن مُطعِمٍ، قال: كانت قريشٌ إنما تَدفَعُ من المزدلِفة ويقولون: نحن الحُمْسُ فلا نَخرجُ من الحَرَم، وقد تَرَكوا الموقفَ على عرفة، قال: فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجاهلية يقفُ مع الناس بعَرفةَ على جَمَلٍ له، ثم يُصبح مع قومه بالمزدلِفة فيَقفُ معهم يَدفَع إذا دَفَعوا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জুবাইর ইবনে মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশরা কেবল মুযদালিফা থেকেই (মীনার দিকে) প্রত্যাবর্তন করত এবং তারা বলত: ‘আমরা হলাম আল-হুমস (পবিত্র স্থানের অধিবাসী), তাই আমরা হারামের (পবিত্র সীমানার) বাইরে যাই না।’ অথচ তারা আরাফাতের অবস্থান পরিত্যাগ করেছিল। তিনি (জুবাইর) বলেন: অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে জাহিলিয়াতের (ইসলাম পূর্ব) যুগে দেখি যে, তিনি মানুষের সাথে আরাফাতে তাঁর একটি উটের উপর অবস্থান করছেন। এরপর তিনি মুযদালিফাতে তাঁর কওমের সাথে সকাল করতেন এবং তাদের সাথে অবস্থান করতেন; যখন তারা প্রত্যাবর্তন করত তখন তিনিও প্রত্যাবর্তন করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - وقد صرَّح بالتحديث فانتفت شبهة تدليسه. وهب بن جرير: هو ابن حازم.وأخرجه ابن خزيمة (2843) عن نصر بن علي الجهضمي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1578) من طريق محمد بن يحيى القُطعي، عن وهب بن جرير، به.وسيأتي بنحوه برقم (1792) و (1793). عبد الله، ويونس بن يوسف: هو ابن حِماس الليثي.وأخرجه مسلم (1348)، وابن ماجه (3014)، والنسائي (3982) من طرق عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي هريرة سيأتي برقم (1726).وبنحو حديث أبي هريرة: حديث عبد الله بن عمرو عند أحمد 11/ (7089) مرفوعًا: "إِنَّ الله عز وجل يباهي ملائكته عشية عرفة بأهل عرفة، فيقول: انظروا إلى عبادي أتوني شعثًا غبرًا". وإسناده لا بأس به.وعن جابر بن عبد الله عند ابن حبان (3853)، وإسناده لا بأس به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1723)


1723 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مُنقِذ الخَوْلاني، حدثنا ابن وَهْب، عن مَخْرَمة بن بُكَير، عن أبيه قال: سمعتُ يونسَ بن يوسف يحدِّث عن سعيد بن المسيّب، عن عائشةَ زوجِ النبيّ صلى الله عليه وسلم، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما مِن يومٍ أكثرَ مِن أن يُعتِقَ اللهُ فيه عبدًا من النار من يومِ عَرَفةَ، وإنَّه ليَدْنو ثم يُباهي الملائكةَ فيقول: ما أرادَ هؤلاءِ؟ " [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আরাফার দিনের চেয়ে এমন কোনো দিন নেই, যেদিন আল্লাহ্ তা’আলা এত অধিক সংখ্যক বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ্) নিকটবর্তী হন, অতঃপর ফেরেশতাদের সামনে গর্ব করে (প্রশংসা করে) বলেন: এরা কী চায়?"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد قوي من أجل مخرمة بن بكير - وهو ابن عبد الله بن الأشج - فإنَّ روايته عن أبيه وجادة، لكن هذا لا يضعف روايته بل قد احتجَّ بها مسلم. ابن وهب: هو عبد الله، ويونس بن يوسف: هو ابن حِماس الليثي.وأخرجه مسلم (1348)، وابن ماجه (3014)، والنسائي (3982) من طرق عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وفي الباب عن أبي هريرة سيأتي برقم (1726).وبنحو حديث أبي هريرة: حديث عبد الله بن عمرو عند أحمد 11/ (7089) مرفوعًا: "إِنَّ الله عز وجل يباهي ملائكته عشية عرفة بأهل عرفة، فيقول: انظروا إلى عبادي أتوني شعثًا غبرًا". وإسناده لا بأس به.وعن جابر بن عبد الله عند ابن حبان (3853)، وإسناده لا بأس به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1724)


1724 - أخبرنا إسحاق بن محمد بن خالد الهاشمي بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزةَ الغِفَاري، حدثنا خالد بن مَخْلَد القَطَواني.وأخبرني أبو سعيد عبد الرحمن بن أحمد المؤذِّن، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا علي بن مسلم، حدثنا خالد بن مَخْلَد، حدثنا علي بن مُسهِر [1]، عن مَيسَرَةَ بن حبيب، عن المِنهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبير قال: كنا مع ابن عباسٍ بعَرفةَ فقال لي: يا سعيد، ما لي لا أسمعُ الناسَ يُلَبُّون؟ فقلت: يخافون من معاويةَ، قال: فخرج ابنُ عباس من فُسطاطِه فقال: لبَّيكَ اللهمَّ لبَّيك، فإنهم قد تَرَكوا السُّنةَ من بُغض عليٍّ رضي الله عنه [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবাইর (রাহ.) বলেন: আমরা আরাফাতের ময়দানে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তখন তিনি আমাকে বললেন, হে সাঈদ! কী ব্যাপার, আমি লোকদেরকে তালবিয়া (লাব্বাইক) পাঠ করতে শুনছি না কেন? আমি বললাম: তারা মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর (শাসনযন্ত্রের) ভয়ে ভীত। তিনি (ইবনে আব্বাস) তখন তাঁর তাঁবু থেকে বের হয়ে এসে উচ্চস্বরে বললেন: লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইক (আমি উপস্থিত, হে আল্লাহ, আমি উপস্থিত)। কারণ তারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি বিদ্বেষের কারণে এই সুন্নাত বর্জন করেছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في النسخ الخطية: علي بن مسهر، وهو خطأ صوابه: علي بن صالح، كما في "صحيح ابن خزيمة" (2830)، وقد رواه غير واحد أيضًا خالد بن مخلد، عن علي بن صالح، عن ميسرة بن حبيب، كما عند النسائي (3979)، والبيهقي 5/ 113. ولعلَّ منشأ هذا الخطأ من إحدى النسخ القديمة لـ "المستدرك" أو أنه سبق قلم من المصنِّف نفسه، والله أعلم. قلنا: وهذا الخبر من تشيعه، وقد انفرد به، وإلّا فما علاقة ترك التلبية ببغض عليٍّ أو حبه؟! وخصوصًا أنَّ مسألة التلبية بعرفة مسألة اجتهادية فيها خلاف قديم بين الصحابة، وقد توسع في ذكر مذاهب الصحابة في ذلك الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 223 - 227، وابن عبد البر في "التمهيد" 13/ 75 وما بعدها.وأخرجه النسائي (3979) عن أحمد بن عثمان بن حكيم الأودي، عن خالد بن مخلد، عن علي بن صالح، عن ميسرة بن حبيب، بهذا الإسناد.



[2] خبر منكر، خالد بن مخلد القطواني حسن الحديث ما لم يخالف أو يأتي بما ينكر، فقد قال أبو داود: صدوق يتشيع، وقال ابن سعد: كان منكر الحديث في التشيع مفرطًا، وقال الجوزجاني: كان شتامًا معلنًا بسوء مذهبه، وقال صالح جزرة - فيما نقله عنه الحاكم في "تاريخ نيسابور" -: ثقة في الحديث إلّا أنه كان متهمًا بالغلوّ. قلنا: وهذا الخبر من تشيعه، وقد انفرد به، وإلّا فما علاقة ترك التلبية ببغض عليٍّ أو حبه؟! وخصوصًا أنَّ مسألة التلبية بعرفة مسألة اجتهادية فيها خلاف قديم بين الصحابة، وقد توسع في ذكر مذاهب الصحابة في ذلك الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 223 - 227، وابن عبد البر في "التمهيد" 13/ 75 وما بعدها.وأخرجه النسائي (3979) عن أحمد بن عثمان بن حكيم الأودي، عن خالد بن مخلد، عن علي بن صالح، عن ميسرة بن حبيب، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1725)


1725 - حدثني أبو سعيد بن أبي بكر بن أبي عثمان، حدثنا الهَيثم بن خَلَف الدُّوري، حدثنا جميل بن الحسن الجَهْضَمي، حدثنا محبوب بن الحسن، حدثنا داود بن أبي هند، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وَقَفَ بعرفاتٍ، فلمّا قال: "لبَّيك اللهمَّ لبَّيك" قال: "إنّما الخيرُ خيرُ الآخرة" [1].قد احتجَّ البخاريُّ بعِكرمة، واحتجَّ مسلم بداود، وهذا الحديث صحيح لم يُخرجاه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করছিলেন। যখন তিনি ‘লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইক’ বললেন, তখন তিনি ইরশাদ করলেন: "নিশ্চয়ই কল্যাণ হলো আখিরাতের কল্যাণ।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ليِّن، جميل بن الحسن وشيخه محبوب بن الحسن - واسمه محمد، ومحبوب لقبه - فيهما لين، وقد انفردا فلم يتابعا على قوله: "إنما الخير خير الآخرة" إلّا فيما رواه الشافعي في "الأم" 3/ 391 - ومن طريقه البيهقي 5/ 45 و 7/ 48 - من مرسل مجاهد أنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُظهر من التلبية: "لبيك اللهم لبيك، لبيك لا شريك لك لبيك، إن الحمد والنعمة لك والملك، لا شريك لك" قال: حتى إذا كان ذات والناس يُصرَفون عنه كأنه أعجبه ما هو فيه فزاد فيها: "لبيك إنَّ العيش عيش الآخرة"، قال ابن جُريج: وحسبت أنَّ ذلك يوم عرفة.قلنا: ولعله بهذا الشاهد قد صحَّح ابن الجارود وابن خزيمة حديث ابن عباس هذا، وحسَّن إسناده الهيثمي في "المجمع" 3/ 223، وقال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار": رواته موثقون، وجميل فيه مقال ولا بأس به في المتابعات.وأخرجه ابن الجارود في "المنتقى" (470)، وابن خزيمة (2831) ومن طريقه البيهقي 5/ 45.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5419) - ومن طريقه الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 5/ 233 - عن محمد بن هارون الأنصاري، ثلاثتهم (ابن الجارود، وابن خزيمة، ومحمد بن هارون) عن جميل بن الحسن الجهضمي، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1726)


1726 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أحمد بن محمد بن نَصْر، حدثنا أبو نُعيم الفضل بن دُكَين، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن مجاهد، عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله يُباهي بأهل عَرَفاتٍ أهلَ السماء، فيقول لهم: انظُرُوا إلى عبادي، جاؤوني شُعْثًا غُبْرًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আরাফাতের অধিবাসীদের নিয়ে আসমানবাসীদের (ফেরেশতাদের) কাছে গর্ব (বা প্রশংসা) করেন। অতঃপর তিনি তাদের বলেন: তোমরা আমার বান্দাদের দিকে তাকাও, তারা এলোমেলো চুল এবং ধুলোমলিন অবস্থায় আমার কাছে এসেছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق.وأخرج أحمد 13/ (8047)، وابن حبان (3852) من طرق عن يونس بن أبي إسحاق، بهذا الإسناد.قال أبو نعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 3/ 306 بعد أن أخرجه من حديث أبي هريرة: هذا حديث صحيح من حديث سعيد بن المسيب عن عائشة، غريب من حديث مجاهد عن أبي هريرة، ولا أعلم له راويًا إلّا يونس بن أبي إسحاق.قلنا: حديث سعيد بن المسيب عن عائشة أخرجه مسلم (1348).وفي الباب أيضًا عن عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (7089)، وإسناده قوي لا بأس به.وعن جابر بن عبد الله عند ابن حبان (3853)، وإسناده قوي.قوله: "شُعثًا غُبرًا" جمع أشعث أغبر، وهو مفرّق الشعر ومغبرُّه. وسيأتي أوله برقم (6679) من طريق الحجاج بن أرطاة عن الحكم.وأخرجه أحمد 36/ (21756) و (21803)، والنسائي (4000) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، عن أسامة.وأخرجه بنحوه مطولًا ومختصرًا أحمد (21760) من طريق عروة بن الزبير، و (21761) من طريق كريب، و (21793) من طريق عامر الشعبي، و (21812) و (21834) من طريق مجاهد، أربعتهم عن أسامة بن زيد.وأخرجه بنحوه أحمد 4/ (2427) عن مؤمل بن إسماعيل، وأبو داود (1920) عن محمد بن كثير، كلاهما عن سفيان الثوري بإسناد الحاكم إلى ابن عباس، فجعله من مسند ابن عباس.وأخرجه أحمد كذلك من حديث ابن عباس 4/ (2507) من طريق جرير بن عبد الحميد، وأبو داود (1920) من طريق عَبيدة بن حميد الكوفي، كلاهما عن الأعمش، به.وأخرجه أحمد أيضًا 4/ (2099) و (2264) و 5/ (3309) من طريق المسعودي، عن الحكم، به.وسيأتي حديث ابن عباس عند المصنف برقم (5281) من طريقي طاووس وسعيد بن جبير عنه، وسيأتي تخريجه من باقي الطرق عن ابن عباس هناك إن شاء الله.وفي الباب عن الفضل بن عباس، سيأتي برقم (5280).وعن علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (562)، وأبي داود (1922)، والترمذي (1922).وانظر الحديث التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1727)


1727 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامِري، حدثنا معاوية بن هشام، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن الحَكَم، عن مِقْسَم، عن ابن عباس، عن أسامة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أردَفَه حين أفاضَ من عَرفةَ، فأفاض بالسَّكِينة، وقال: "أيُّها الناسُ، عليكم بالسَّكِينة" وقال: "ليس البِرُّ بإيجافِ الخيلِ والإبل"، فما رأيتُ ناقتَه رافعةً يدَها حتى أتَى مِنى [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তনের সময় তাঁকে (উসামাকে) নিজের পিছনে সওয়ারী করে নিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অত্যন্ত ধীরস্থিরতা ও প্রশান্তির সাথে প্রত্যাবর্তন করছিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা অবশ্যই ধীরস্থিরতা অবলম্বন কর।" তিনি আরও বললেন: "দ্রুত ঘোড়া ও উট চালনা করে পুণ্য লাভ করা যায় না।" সুতরাং (উসামা বলেন,) আমি মিনায় পৌঁছা পর্যন্ত তাঁর উটকে তার সামনের পা দ্রুত সরাতে দেখিনি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل معاوية بن هشام، وقد توبع. سفيان: هو الثوري، والأعمش: هو سليمان بن مهران، والحكم: هو ابن عتيبة، ومقسم: هو مولى ابن عباس.وأخرجه ابن خزيمة (2844) عن محمد بن الحسن بن إبراهيم بن الحسين، عن معاوية بن هشام، بهذا الإسناد. وسيأتي أوله برقم (6679) من طريق الحجاج بن أرطاة عن الحكم.وأخرجه أحمد 36/ (21756) و (21803)، والنسائي (4000) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، عن أسامة.وأخرجه بنحوه مطولًا ومختصرًا أحمد (21760) من طريق عروة بن الزبير، و (21761) من طريق كريب، و (21793) من طريق عامر الشعبي، و (21812) و (21834) من طريق مجاهد، أربعتهم عن أسامة بن زيد.وأخرجه بنحوه أحمد 4/ (2427) عن مؤمل بن إسماعيل، وأبو داود (1920) عن محمد بن كثير، كلاهما عن سفيان الثوري بإسناد الحاكم إلى ابن عباس، فجعله من مسند ابن عباس.وأخرجه أحمد كذلك من حديث ابن عباس 4/ (2507) من طريق جرير بن عبد الحميد، وأبو داود (1920) من طريق عَبيدة بن حميد الكوفي، كلاهما عن الأعمش، به.وأخرجه أحمد أيضًا 4/ (2099) و (2264) و 5/ (3309) من طريق المسعودي، عن الحكم، به.وسيأتي حديث ابن عباس عند المصنف برقم (5281) من طريقي طاووس وسعيد بن جبير عنه، وسيأتي تخريجه من باقي الطرق عن ابن عباس هناك إن شاء الله.وفي الباب عن الفضل بن عباس، سيأتي برقم (5280).وعن علي بن أبي طالب عند أحمد 2/ (562)، وأبي داود (1922)، والترمذي (1922).وانظر الحديث التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1728)


1728 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بنُ عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو النُّعمان محمد بن الفضل، حدثنا حمّاد بن زيد، عن كَثِير بن شِنْظِير، عن عطاء، عن ابن عباس قال: إنَّما كان بَدْءُ الإيضاع من أهل البادية؛ كانوا يَقِفُون حافَتَي الناسِ قد علَّقوا [1] القِعابَ والعِصِيَّ، فإذا أفاضُوا تَقَعقَعوا، فَأَنفَرَتْ بالناس، فلقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن ذِفْرَى [2] ناقتِه لَيَمَسُّ حارِكَها [3]، وهو يقول: "يا أيُّها الناسُ، عليكم بالسَّكِينة" [4].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দ্রুততার সাথে চলাচলের সূচনা মূলত বেদুঈনদের (মরুবাসীদের) পক্ষ থেকেই হয়েছিল। তারা লোকজনের দু’পাশে তাদের পাত্র ও লাঠি ঝুলিয়ে দাঁড়িয়ে থাকত। যখন মানুষেরা রওনা হতো, তখন তারা শব্দ করত, ফলে এটি লোকজনের পশুপালকে দ্রুত ছুটিয়ে দিত। আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তাঁর উষ্ট্রীর কানের গোড়া তার কাঁধের জোড়া স্পর্শ করছিল, আর তিনি বলছিলেন: "হে মানুষেরা, তোমরা ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] عبارة "قد علَّقوا" سقطت من (ص) و (ع). البيهقي التي رواها عن المصنف، وهو الموافق لسائر مصادر التخريج.



[2] في النسخ الخطية: ظفرى، والمثبت من "سنن البيهقي" 5/ 126 حيث رواه عن المصنِّف بإسناده هذا، وهو الصواب، وهو الموافق لما في مصادر التخريج عدا ابن خزيمة. البيهقي التي رواها عن المصنف، وهو الموافق لسائر مصادر التخريج.



1728 [3] - في النسخ الخطية: "لا يمس الأرض حاركها" ولا يستقيم المعنى، والمثبت من رواية البيهقي التي رواها عن المصنف، وهو الموافق لسائر مصادر التخريج.



1728 [4] - إسناده حسن، كثير بن شنظير فيه كلام يحطه عن رتبة الصحيح، وباقي رجاله ثقات.عطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أحمد 4/ (2193) عن يونس بن محمد، عن حماد بن زيد، بهذا الإسناد. وفيه: ولقد رُئي رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن ذفرى ناقته … بلفظ المبني للمجهول، وهو الصواب، فإنَّ ابن عباس إنما روى ذلك عن أسامة بن زيد كما وقع في رواية قيس بن سعد عن عطاء عند أحمد 36/ (21756) و (21803)، والنسائي (4000)، وانظر ما قبله.قوله: "الإيضاع": حمل البعير ونحوه على الإسراع في السير عند الإفاضة.والقِعاب: جمع قَعْب، وهو القدح الضخم الغليظ من الخشب."تقعقعوا" أي: ضرب بعضهم بعضًا، فكان منها صوت وصخب ينفر منه الناس."ذفرى ناقته": أصل أذنها.والحارك: أعلى الكاهل.ولا يعارض إسراعه صلى الله عليه وسلم في وادي محسِّر، فقد كان يسرع فيه، أما الإيضاع الذي فعلته الأعراب ولم يكن من فعله صلى الله عليه وسلم، إنما هو عند الإفاضة من عرفات، انظر توجيه ذلك في "زاد المعاد" 2/ 309.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1729)


1729 - أخبرنا جعفر بن محمد [1] بن نُصَير الخوّاص، حدثنا الحارث بن محمد التَّميمي، حدثنا أبو النَّضر هاشم بن القاسم، حدثنا عَوف بن أبي جَميلة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا عَوف، عن زياد بن الحُصَين، حدثنا أبو العاليَة، قال: قال لي ابنُ عباس: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم غَداةَ العَقَبة: "هاتِ الْقُطْ لي [2] حَصَيَاتٍ من حَصَى الخَذْف"، فلمّا وُضِعنَ في يده قال: "بأمثال هؤلاءِ، بأمثال هؤلاء، وإياكم والغُلوَّ في الدِّين؛ فإنَّما هَلَكَ مَن كان قبلَكم بالغُلوِّ في الدِّين" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আকাবার (জামারাতের) দিনের সকালে আমাকে বললেন: "যাও, আমার জন্য কঙ্কর নিক্ষেপের উপযোগী কিছু ছোট কঙ্কর সংগ্রহ করে আনো।" যখন সেগুলো তাঁর হাতে রাখা হলো, তিনি বললেন: "এরকম! এরকম! (এগুলোর মতোই যথেষ্ট)। আর তোমরা দ্বীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি (সীমা অতিক্রম) করা থেকে অবশ্যই বেঁচে থাকো। কারণ, তোমাদের পূর্ববর্তী জাতিরা দ্বীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করার কারণেই ধ্বংস হয়ে গিয়েছিল।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ب) والمطبوع: أحمد بن جعفر بن محمد، وهو خطأ.



[2] وقع هنا في النسخ الخطية: "هات القعيهات القط لي"، ولا معنى لها، وضبَّب عليها في (ز)، والذي يظهر أنَّ عبارة "هات القط" مكررة مرتين في إحدى النسخ القديمة المنقول عنها، فتحرَّفت كلمتا "القط هات" فيها إلى: القعيهات، والله أعلم.



1729 [3] - إسناده صحيح. الحارث بن محمد التميمي: هو ابن أبي أسامة الحافظ، ومحمد بن جعفر: هو المعروف بغندر، وزياد بن الحصين: هو ابن قيس الحنظلي، وأبو العالية: هو الربيع بن مهران الرِّياحي.وابن عباس صاحب هذا الحديث كان عوف بن أبي جميلة لا يدري هل هو عبد الله أو الفضل، فيما ذكر يحيى القطان عنه عند أحمد (3248) وابن خزيمة (2868).وقد رواه جمهرة أصحاب عوف عنه على الإطلاق دون تقييد، كما عند أحمد 3/ (1851) و 5/ (3248)، وابن ماجه (3029)، والنسائي (4049) و (4051)، وابن حبان (3871)، وغيرهم.وخالف جعفرُ بن سليمان الضبعي عند الطبراني في "الكبير" 18/ (742) و"الأوسط" (2189) والبيهقي 5/ 127 فرواه عن عوف، عن زياد، عن أبي العالية قال: سمعت ابن عباس يقول: حدثني الفضل بن عباس قال: قال لي رسول الله. وصوّب هذه الرواية الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 2/ 263، لأن الفضل هو الذي كان مع النبي صلى الله عليه وسلم حينئذٍ، كما سيأتي في الحديث رقم (5280). وأبو العالية تابعي كبير أسلم في خلافة أبي بكر الصديق، فسماعه من الفضل محتمل جدًّا.وفي باب النهي عن الغلو في الدين عن بريدة الأسلمي، سلف برقم (1190) وذكرنا شواهده هناك. وأخرجه أحمد 24/ (15410) و (15411) و (15412) و (15413) و (15415)، وابن ماجه (3035)، والترمذي (903)، والنسائي (4053) من طرق عن أيمن بن نابل، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وسيأتي برقم (8758).قال السندي في حاشيته على مسند أحمد": قوله: "ولا إليكَ" اسم فعل بمعنى: ابتعِد وتنحَّ، أي: لم يكن ثَمَّ شيءٌ من هذه الأمور التي تُفعل الآن بين أيدي الأمراء، فهي محدَثة ومكروهة كسائر المحدَثات، وفيه بيان تواضعه صلى الله عليه وسلم، أنه لم يكن على صفة الأمراء اليوم، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1730)


1730 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا النضر بن شُمَيل.وحدثنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمَّاك، حدثنا عبد الرحمن بن منصور، حدثنا يحيى بن سعيد القطّان.وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو علي الحَنَفي وأبو عاصم النَّبيل، قالوا: حدثنا أيمن بن نابِلٍ قال: سمعتُ قُدامةَ بن عبد الله بن عمّار الكِلَابيَّ يقول: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يرمي الجَمْرةَ يومَ النَّحر على ناقةٍ صَهباءَ، لا ضَرْبَ ولا طَرْدَ، ولا إليكَ إليكَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




কুদামা ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আম্মার আল-কিলাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কুরবানীর দিন একটি লালচে-ধূসর উষ্ট্রীর পিঠে আরোহণ করা অবস্থায় জামরাহতে কঙ্কর নিক্ষেপ করতে দেখেছি। সেখানে কাউকে আঘাত করা, কিংবা ধাক্কা মেরে সরিয়ে দেওয়া, অথবা ‘এদিকে এসো, এদিকে এসো’ (বলে ভিড় সামলানোর জন্য ডাকাডাকি) ছিল না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل أيمن بن نابل. أبو عاصم النبيل: هو الضحاك بن مخلد. وأخرجه أحمد 24/ (15410) و (15411) و (15412) و (15413) و (15415)، وابن ماجه (3035)، والترمذي (903)، والنسائي (4053) من طرق عن أيمن بن نابل، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وسيأتي برقم (8758).قال السندي في حاشيته على مسند أحمد": قوله: "ولا إليكَ" اسم فعل بمعنى: ابتعِد وتنحَّ، أي: لم يكن ثَمَّ شيءٌ من هذه الأمور التي تُفعل الآن بين أيدي الأمراء، فهي محدَثة ومكروهة كسائر المحدَثات، وفيه بيان تواضعه صلى الله عليه وسلم، أنه لم يكن على صفة الأمراء اليوم، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1731)


1731 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن أنسٍ القُرَشي، حدثنا حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طَهْمان، حدثنا الحسن بن عُبيد الله، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن ابن عباسٍ رفَعَه، قال: "لما أتى إبراهيمُ خليلُ الله المناسكَ عَرَضَ له الشيطانُ عند جَمْرةِ العَقَبة، فرماه بسَبعِ حَصَياتٍ حتى ساخَ في الأرض [ثم عَرَضَ له عند الجَمرة الثانية، فرماه بسَبْع حَصَياتٍ حتى ساخ في الأرض، ثم عَرَضَ له عند الجَمرة الثالثة، فرماه بسَبع حَصَياتٍ حتى ساخ في الأرض] [1] ".قال ابن عباس: الشيطانَ تَرجُمون، وملَّةَ أبيكم تتَّبعون [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহর বন্ধু ইবরাহীম (আঃ) (হজ্জের) আনুষ্ঠানিকতা পালনের জন্য আসলেন, তখন শয়তান জামরাতুল আকাবার কাছে তাঁর সামনে হাজির হলো। তিনি তাকে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে মাটির নিচে দেবে গেল। এরপর সে দ্বিতীয় জামরার কাছে তাঁর সামনে এল। তিনি তাকে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে মাটির নিচে দেবে গেল। অতঃপর সে তৃতীয় জামরার কাছে তাঁর সামনে এল। তিনি তাকে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে মাটির নিচে দেবে গেল। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তোমরা শয়তানকেই পাথর মারছো এবং তোমরা তোমাদের পিতা (ইবরাহীম আঃ)-এর ধর্মাদর্শ অনুসরণ করছো।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وأثبتناه من "تلخيص المستدرك" للذهبي، ومن "السنن الكبرى" 5/ 153، و"شعب الإيمان" (3784) كلاهما للبيهقي حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه. بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 4/ (2707) ضمن حديث طويل من طريق أبي عاصم الغنوي، عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن ابن عباس.وانظر ما سيأتي برقم (1773) من طريق عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير عن ابن عباس.



[2] إسناده صحيح إن كان الحسن بن عبيد الله هو الكوفي النخعي، فلم نقع على تصريح بأنه هو، لكن يغلب على الظن أنه هو لأنه المشهور في هذه الطبقة، والله أعلم، وباقي رجاله ثقات، فمحمد بن أحمد بن أنس القرشي قد وثقه محمد بن صالح بن هانئ كما في "تاريخ الإسلام" للذهبي 6/ 594، والخطيب في "المتفق والمفترق" 3/ 1819، وحفص بن عبد الله - وهو ابن راشد السَّلَمي - ثبتٌ في إبراهيم بن طهمان لملازمته له، كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 9/ 485.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 153، وفي "الشعب" (3784) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 4/ (2707) ضمن حديث طويل من طريق أبي عاصم الغنوي، عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن ابن عباس.وانظر ما سيأتي برقم (1773) من طريق عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1732)


1732 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهري، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن إبراهيم بن مُهاجِر، عن يوسف بن ماهَكَ، عن أمه مُسَيكة، عن عائشةَ قالت: قيل: يا رسولَ الله، ألا نَبْني لك بمِنًى بناءً يُظِلُّك؟ قال: "لا، مِنًى مُناخُ مَن سَبَق" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জিজ্ঞাসা করা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! মিনার মধ্যে আমরা কি আপনার জন্য এমন কোনো স্থাপনা তৈরি করব না, যা আপনাকে ছায়া দেবে?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, মিনা হলো তার আবাসস্থল, যে আগে আসে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، إبراهيم بن مهاجر ضعيف يعتبر به في المتابعات، ولم يتابع، ومسيكة تفرَّد بالرواية عنها ابنها يوسف ولم يؤثر توثيقها عن أحد، فهي مجهولة الحال. عبيد الله بن موسى: هو ابن أبي المختار، وإسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي.وأخرجه أحمد 42/ (25541) و (25718)، وأبو داود (2019)، وابن ماجه (3006) و (3007)، والترمذي (8801) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب. سعد، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق قال: حدثني من لا أتّهم عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس. قلنا: لكن ابن إسحاق قد توبع.وأخرجه أحمد 4/ (2362) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، وأبو داود (1749) من طريق محمد بن سلمة ويزيد بن زريع، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.ووقع في رواية يزيد بن زريع: برة من ذهب.وأخرجه أحمد 4/ (2466) من طريق جرير بن حازم، عن ابن أبي نجيح، به. قال البيهقي 5/ 230: وهذا إسناد صحيح، إلّا أنهم يرون أنَّ جرير بن حازم أخذه من محمد بن إسحاق ثم دلّسه، فإن بُيِّن فيه سماع جرير من ابن أبي نجيح صار الحديث صحيحًا، والله أعلم.وسيأتي الحديث بنحوه برقم (4430) من طريق سفيان الثوري، يرويه عن الحكم بن عتيبة عن ابن أبي ليلى عن مقسم عن ابن عباس، ويرويه أيضًا عن جعفر بن محمد عن أبيه عن جابر.قوله: "بُرة من فضة" قال ابن الأثير في "النهاية": البُرَة: حلقة تجعل في لحم الأنف، وربما كانت من شعر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1733)


1733 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثنا محمد بن إسحاق.وحدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا عيّاش بن الوليد الرَّقّام، حدثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي نَجِيح، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: أَهدَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عامَ الحُدَيبية في هداياهُ جَمَلًا لأبي جَهْل، في رأسه بُرَةٌ من فضَّة، لِيَغيظَ المشركين بذلك [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে তাঁর কুরবানীর পশুগুলোর (হাদায়া) মধ্যে আবূ জাহলের জন্য একটি উট উৎসর্গ করেছিলেন। সেটির মাথায় রূপার একটি নথ পরানো ছিল, যাতে তিনি এর মাধ্যমে মুশরিকদেরকে ক্রোধান্বিত করতে পারেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن، رغم تصريح ابن إسحاق هنا بالتحديث، فقد نقل المصنف نفسه في "معرفة علوم الحديث" ص 107 عن علي بن المديني أنه قال: حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق قال: حدثني من لا أتّهم عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس. قلنا: لكن ابن إسحاق قد توبع.وأخرجه أحمد 4/ (2362) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، وأبو داود (1749) من طريق محمد بن سلمة ويزيد بن زريع، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.ووقع في رواية يزيد بن زريع: برة من ذهب.وأخرجه أحمد 4/ (2466) من طريق جرير بن حازم، عن ابن أبي نجيح، به. قال البيهقي 5/ 230: وهذا إسناد صحيح، إلّا أنهم يرون أنَّ جرير بن حازم أخذه من محمد بن إسحاق ثم دلّسه، فإن بُيِّن فيه سماع جرير من ابن أبي نجيح صار الحديث صحيحًا، والله أعلم.وسيأتي الحديث بنحوه برقم (4430) من طريق سفيان الثوري، يرويه عن الحكم بن عتيبة عن ابن أبي ليلى عن مقسم عن ابن عباس، ويرويه أيضًا عن جعفر بن محمد عن أبيه عن جابر.قوله: "بُرة من فضة" قال ابن الأثير في "النهاية": البُرَة: حلقة تجعل في لحم الأنف، وربما كانت من شعر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1734)


1734 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثنا محمد بن إسحاق.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعيُّ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثني أبي، عن ابن إسحاق، حدثني يزيد بن أبي حَبِيب المِصْري، عن خالد بن أبي عِمْران، عن أبي عيّاش، عن جابر بن عبد الله الأنصاري: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ذَبَحَ يومَ العيد كَبشَين، ثم قال حين وَجَّهَهما: " {إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ} [الأنعام: 79]، {إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (162) لَا شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ} [الأنعام: 162، 163]، باسمِ الله، واللهُ أكبرُ، اللهمَّ منكَ ولكَ عن محمدٍ وأُمّتِه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন দুটি মেষ যবেহ করলেন। অতঃপর যখন সে দুটিকে (যবেহের জন্য) প্রস্তুত করলেন, তখন বললেন:

"{إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ} [আল-আন'আম: ৭৯]। আমি একনিষ্ঠভাবে তাঁরই দিকে আমার মুখ ফিরালাম, যিনি আসমানসমূহ ও জমিন সৃষ্টি করেছেন এবং আমি মুশরিকদের অন্তর্ভুক্ত নই। {إِنَّ صَلَاتِي وَنُسُكِي وَمَحْيَايَ وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (162) لَا شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُسْلِمِينَ} [আল-আন'আম: ১৬২-১৬৩]। নিশ্চয়ই আমার সালাত, আমার কুরবানি, আমার জীবন ও আমার মরণ সৃষ্টিকুলের রব আল্লাহ্‌রই জন্য। তাঁর কোনো অংশীদার নেই। আর আমাকে এর নির্দেশই দেওয়া হয়েছে এবং আমি মুসলমানদের মধ্যে প্রথম।

[অতঃপর বললেন] আল্লাহ্‌র নামে, আল্লাহ্‌ সর্বশ্রেষ্ঠ। হে আল্লাহ! এটা আপনার পক্ষ থেকে এবং আপনারই জন্য, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর উম্মতের পক্ষ থেকে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين، أبو عياش - وهو ابن النعمان المعافري المصري - روى عنه ثلاثة، ولم يؤثر توثيقه عن أحد، لكن صحَّح حديثه هذا ابن خزيمة والمصنِّف. يعقوب بن إبراهيم: هو ابن سعد الزهري.وهو في "مسند أحمد" 23/ (15022).وأخرجه ابن خزيمة (2899) من طريق يعقوب بن إبراهيم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارمي (1989)، والطحاوي 4/ 177، والبيهقي 9/ 287 من طريق أحمد بن خالد، وأبو داود (2795)، والبيهقي 9/ 287 من طريق عيسى بن يونس، وابن ماجه (3121) من طريق إسماعيل بن عياش، والمزي في ترجمة أبي عياش من "تهذيب الكمال" 34/ 163 - 164 من طريق يزيد بن زريع، أربعتهم عن محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي عياش، به. بإسقاط خالد بن أبي عمران.وتفرَّد عيسى بنُ يونس من بين أصحاب ابن إسحاق الخمسة بزيادة "مَوجِيَّين" (يعني مخصيَّين)، وهي زيادة شاذَّة. وقد جاءت هذه الزيادة أيضًا في حديث عبد الله بن محمد بن عقيل فيما سيأتي برقم (7738)، وإسناده ضعيف لاضطرابه.وسيأتي حديث جابر من طريق آخر عند المصنف برقم (7744) بدون ذكر الآيات.وفي باب أضحيّة النبي صلى الله عليه وسلم عنه وعن أمّته، انظر أحاديث حذيفة بن أَسيد وعائشة - أو أبي هريرة - وأبي سعيد وأبي رافع الآتية عند المصنف على التوالي بالأرقام (6665) و (7738) و (7740) و (7745)، وليس في شيء منها ذكر الآيات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1735)


1735 - أخبرنا أبو علي الحسين بن عليٍّ الحافظ، أخبرنا أبو عبد الرحمن أحمد بن شعيب الفقيه بمصر، حدثنا محمد [بن عبد الله بن ميمون الإسكندراني، حدثنا الوليد بن مُسلِم، حدثنا الأوزاعي، حدثني يحيى] [1] بن أبي كثير، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: ذَبَحَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم عمَّنِ اعتَمَرَ من نسائِه في حَجَّة الوداع بقرةً بينَهنَّ [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বিদায় হজ্জের সময় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর যেসব স্ত্রী উমরাহ করেছিলেন, তাদের পক্ষ থেকে একটি গরু কুরবানি করেন এবং তিনি তা তাদের সকলের মাঝে বণ্টন করে দেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من "السنن الكبرى" للبيهقي 4/ 354 حيث رواه عن المصنِّف بهذا الإسناد، وأورده الذهبي في "تلخيص المستدرك" وبدأ فيه من الوليد بن مسلم. السَّفر، ويوسف ذاهب الحديث. قلنا: ويرد عليه بأنَّ الوليد قد صرَّح بالتحديث عن الأوزاعي هنا، كما صرَّح بسماع الأوزاعي من يحيى بن أبي كثير، فانتفت شبهة تدليسه، لذلك قال البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 354: فإن كان قوله: حدثنا الأوزاعي، محفوظًا صار الحديث جيدًا. وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 12/ 136: حديث أبي هريرة هذا صحيح ثابت. قلنا: ومع هذا فإنَّ الوليد بن مسلم قد توبع عند ابن حبان كما سيأتي.الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه أبو داود (1751)، والنسائي (4114) عن عمرو بن عثمان، وقرن أبو داود بعمرٍو محمدَ بنَ مهران، وابنُ ماجه (3177) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، ثلاثتهم عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وقد صرَّح الوليد بالتحديث عن الأوزاعي أيضًا عند ابن ماجه.وأخرجه ابن حبان (4008) من طريق هشام بن عمار، عن إسماعيل بن عبد الله بن سماعة، عن الأوزاعي، به. وهشام وإن لم يكن بذاك، يعتبر حديثه في المتابعات، وتقوى بذلك رواية الوليد.وله شاهد من حديث جابر عند مسلم (1319) (357): أنه صلى الله عليه وسلم نحر عن نسائه بقرة في حجته.وآخر عن عائشة عند أحمد 43/ (26109)، وأبي داود (1750)، وابن ماجه (3135)، والنسائي (4112) و (4113) و (4116).وانظر "فتح الباري" لابن حجر 5/ 574 - 575.



[2] حديث صحيح، وقد ضعَّفه البخاري كما في "العلل الكبير" للترمذي (228) حيث قال - يعني البخاري -: إنَّ الوليد بن مسلم لم يقل فيه: حدثنا الأوزاعي، وأراه أخذه عن يوسف بن السَّفر، ويوسف ذاهب الحديث. قلنا: ويرد عليه بأنَّ الوليد قد صرَّح بالتحديث عن الأوزاعي هنا، كما صرَّح بسماع الأوزاعي من يحيى بن أبي كثير، فانتفت شبهة تدليسه، لذلك قال البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 354: فإن كان قوله: حدثنا الأوزاعي، محفوظًا صار الحديث جيدًا. وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 12/ 136: حديث أبي هريرة هذا صحيح ثابت. قلنا: ومع هذا فإنَّ الوليد بن مسلم قد توبع عند ابن حبان كما سيأتي.الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن.وأخرجه أبو داود (1751)، والنسائي (4114) عن عمرو بن عثمان، وقرن أبو داود بعمرٍو محمدَ بنَ مهران، وابنُ ماجه (3177) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، ثلاثتهم عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. وقد صرَّح الوليد بالتحديث عن الأوزاعي أيضًا عند ابن ماجه.وأخرجه ابن حبان (4008) من طريق هشام بن عمار، عن إسماعيل بن عبد الله بن سماعة، عن الأوزاعي، به. وهشام وإن لم يكن بذاك، يعتبر حديثه في المتابعات، وتقوى بذلك رواية الوليد.وله شاهد من حديث جابر عند مسلم (1319) (357): أنه صلى الله عليه وسلم نحر عن نسائه بقرة في حجته.وآخر عن عائشة عند أحمد 43/ (26109)، وأبي داود (1750)، وابن ماجه (3135)، والنسائي (4112) و (4113) و (4116).وانظر "فتح الباري" لابن حجر 5/ 574 - 575.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1736)


1736 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا هارون بن سليمان الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا شعبة.وأخبرنا مُكرَم بن أحمد القاضي ببغداد، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا يزيد بن هارون وزيد بن الحُبَاب، عن شعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، وحدثنا يحيى بن سعيد، وحدثنا أبو داود؛ قالوا: حدثنا شعبة - وهذا لفظُ حديث أبي العباس - قال: سمعتُ سليمان بنَ عبد الرحمن يقول: سمعتُ عُبيدَ بن فَيْروزَ يقول: قلت للبراء: حدِّثْني عمَّا كَرِهَ أو نَهَى عنه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من الأضاحيِّ، قال: فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم هكذا بيدِه - ويدي أقصرُ من يدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أربعٌ لا يُجْزِئنَ في الأضاحيِّ: العَوْراءُ البيِّنُ عَوَرُها، والمريضةُ البيِّنُ مَرَضُها، والعَرْجاءُ البيِّنُ عَرَجُها، والكَسِيرُ التي لا تُنْقي". قال: فإنِّي أكرَهُ أن يكون نَقْصٌ في الأُذُن والقَرْن، قال: فما كَرِهتَ فَدَعْهُ ولا تُحرِّمه على غيرك [1]. هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه لعلّة [2] روايات سليمان بن عبد الرحمن، وقد أظهر عليُّ بن المَديني فضائلَه وإتقانَه.ولهذا الحديث شواهد متفرقة بأسانيد صحيحة ولم يخرجوها، فمنها:




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাইদ ইবনু ফাইরূয বলেন: আমি বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, কুরবানীর পশুর মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা অপছন্দ করতেন বা নিষেধ করেছেন, সে সম্পর্কে আমাকে বলুন। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দ্বারা এভাবে ইশারা করলেন—আর আমার হাত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতের চেয়ে ছোট—(তিনি বললেন): "চার প্রকার পশু কুরবানীর জন্য সঙ্গত নয়: (১) স্পষ্ট কানা, (২) যার রোগ স্পষ্ট এমন রুগ্ন পশু, (৩) যার খোঁড়া হওয়া স্পষ্ট এমন খোঁড়া পশু, এবং (৪) দুর্বল ও শীর্ণ পশু যার হাড়ের মজ্জা শুকিয়ে গেছে।" (রাবী উবাইদ বলেন) আমি বললাম: আমি কানে বা শিংয়ে ত্রুটিযুক্ত হওয়াও অপছন্দ করি। তিনি (বারা') বললেন: তুমি যা অপছন্দ কর তা ছেড়ে দাও, কিন্তু তা অন্যের জন্য হারাম করো না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن جعفر: هو الملقب بغُندَر، ويحيى بن سعيد: هو القطان، وأبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي، والثلاثة الراوي عنهم هنا هو أحمد بن حنبل.وهو في "مسند أحمد" 30/ (18542) عن يحيى بن سعيد القطان وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (3144)، والنسائي (4444) عن محمد بن بشار، عن يحيى بن سعيد ومحمد بن جعفر وعبد الرحمن بن مهدي وأبي داود الطيالسي، به. وقَرَن بهم أبا الوليد الطيالسي وابن أبي عدي.وأخرجه أحمد (18510) و (18543) و (18667)، وأبو داود (2802)، والترمذي (1497)، والنسائي (4443)، وابن حبان (5922) من طرق عن شعبة، به. قال الترمذي: حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلّا من حديث عبيد بن فيروز عن البراء، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم.وأخرجه النسائي (4445)، وابن حبان (5919) و (5921) من طريقي عمرو بن الحارث والليث بن سعد، كلاهما عن سليمان بن عبد الرحمن، به.ورواه مالك بن أنس عن عمرو بن الحارث، عن عبيد بن فيروز، به. أسقط منه سليمان بن عبد الرحمن، أخرجه من طريق مالك: أحمد (18675)، وانظر الكلام على إسناده هذا هناك.وأخرجه الترمذي (1497) من طريق محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سليمان ابن عبد الرحمن، به.ورواه الأوزاعيُّ عن عبد الله بن عامر الأسلمي عن يزيد بن أبي حبيب عن البراء فيما سيأتي برقم (7717)، وعبد الله ضعيف وقد أعضله بين يزيد والبراء.وانظر تفصيل الكلام على إسناد الحديث وعلى ما وقع فيه من اختلاف في "المسند" (18510).وسيأتي الحديث بنحوه من طريق أبي سلمة عن البراء برقم (7718).قوله: "ويدي أقصر من يد رسول الله صلى الله عليه وسلم" قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: هو أشار بيده صلى الله عليه وسلم، كما أُشير أنا بيدي، لكن يدي أقصر من يده.والكسير، قال: فُسِّر بالمنكسرة الرِّجل التي لا تقدر على المشي، فعيل بمعنى مفعول، وفي رواية الترمذي بدلها: "العجفاء" وهي المهزولة، وهذه الرواية أظهر معنًى. لا تُنْقِي: من أَنقَى: إذا صار ذا نِقْي، أي: مخ، فالمعنى: التي ما بقي لها مخ من غاية العجف.



[2] في (ب): لقلة. روى عنه الكوفيون كأبي إسحاق السبيعي وابنه يونس، وزاد ابن حجر عاصمَ بن أبي النجود، والله تعالى أعلم.وعليه يكون صاحبنا هو السدوسي الذي تفرد بالرواية عنه قتادة، وكان يُثْني عليه خيرًا، وعدَّه ابنُ المديني مجهولًا، لأنه لم يرو عنه غير قتادة.وأما المخالفة، فالثابت عن علي رضي الله عنه أنه كان يقول بعدم كراهية مكسورة القرن كما سيأتي عند المصنف برقم (1739).وأما هذا الحديث فهو في "مسند أحمد" 2/ (1066) عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (1157) عن حجاج بن محمد المصيصي، والنسائي (4451) من طريق سفيان بن حبيب، كلاهما عن شعبة، به.وأخرجه أحمد (633)، وأبو داود (2805) و (2806) من طريق هشام الدستوائي، وأحمد (791) من طريق همام بن يحيى، كلاهما عن قتادة، به.وسيأتي من طريق شعبة وسعيد بن أبي عروبة عن قتادة برقم (7720)، ويأتي تخريجه هناك.وأخرج أحمد (864) من طريق جابر الجعفي، عن عبد الله بن نجي، عن علي، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُضحَّى بعضباء القرن والأذن. وإسناده ضعيف ومنقطع، لكن صح مرفوعًا استشرافُ العين والأذن كما في الحديث التالي.وعضباء القرن: هي مكسورة القرن، قال ابن الأثير في "النهاية": وقد يكون العَضَب في الأذن أيضًا، إلّا أنه في القرن أكثر. وقال ابن قدامة في "المغني" 5/ 462: العضباء: ما ذهب نصف أذنها أو قرنها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1737)


1737 - ما حدَّثَناه عليُّ بن حَمْشاذَ العدل وعبدُ الله بن الحسين القاضي، قالا: حدثنا الحارث بن أبي أُسامة، حدثنا رَوْحُ بن عُبادة.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا عفان.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي؛ قالوا: حدثنا شعبة، عن قتادةَ قال: سمعتُ جُرَيَّ بن كُلَيب النَّهْدي يحدِّث عن عليٍّ: أنَّ نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم نَهَى أن يُضحَّى بأعْضَبِ القُرونِ والأُذُن.قال قتادة: فذكرتُ ذلك لسعيد بن المسيّب فقال: العَضَبُ: النِّصفُ فما فوقَ ذلك [1]. ومنها:




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিং বা কানের অর্ধেক বা তার বেশি কাটা (আদাব) পশু দ্বারা কুরবানী করতে নিষেধ করেছেন। কাতাদা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি সাঈদ ইবনু মুসাইয়্যাবকে (রাহিমাহুল্লাহ) এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: ‘আদাব’ (দোষযুক্ত) হলো অর্ধেক বা তার বেশি কাটা/ভাঙ্গা।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف للتفرُّد والمخالفة، فقد تفرَّد به جري بن كليب، وبهذا الاسم اثنان نسب الأول كما هنا نهديًّا، والثاني سدوسيًّا، وقد اضطرب فيهما النُّقّاد، فجعلهما واحدًا البخاريُّ في "التاريخ الكبير" 2/ 244، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 2/ 536، وابن حبان في "الثقات" 4/ 117، وفرَّق بينهما أبو داود فقال: جري بن كليب صاحب قتادة سدوسي بصري لم يرو عنه غير قتادة، وجري بن كليب كوفي روى عنه أبو إسحاق السبيعي، وتبعه المزي في "تهذيب الكمال" وابن حجر في "تهذيبه" وابن الملقن في "البدر المنير" 9/ 294.ومنشأ الخلاف هو اضطراب رواة هذا الحديث عن قتادة في تسميته، فقد رواه عنه شعبة وسعيد بن أبي عروبة، فقالا مرةً: جري بن كليب السدوسي، وقالا مرة: عن جري بن كليب رجل من قوم قتادة (وهو سدوسي)، وقالا مرة: جري بن كليب النهدي. لكن رواه عن قتادة أيضًا همام بن يحيى (عند أحمد: 791) وهشام الدستوائي (عند المخلِّص: 721)، فنسباه سدوسيًّا، فيكون من نسبه سدوسيًا أكثر وأشهر، فيترجح كونه سدوسيًّا، وأن من نسبه نهديًّا فقد وهم، فالسدوسي بصري تفرد بالرواية عنه قتادة، كما قال علي بن المديني وأبو داود، والثاني كوفي روى عنه الكوفيون كأبي إسحاق السبيعي وابنه يونس، وزاد ابن حجر عاصمَ بن أبي النجود، والله تعالى أعلم.وعليه يكون صاحبنا هو السدوسي الذي تفرد بالرواية عنه قتادة، وكان يُثْني عليه خيرًا، وعدَّه ابنُ المديني مجهولًا، لأنه لم يرو عنه غير قتادة.وأما المخالفة، فالثابت عن علي رضي الله عنه أنه كان يقول بعدم كراهية مكسورة القرن كما سيأتي عند المصنف برقم (1739).وأما هذا الحديث فهو في "مسند أحمد" 2/ (1066) عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (1157) عن حجاج بن محمد المصيصي، والنسائي (4451) من طريق سفيان بن حبيب، كلاهما عن شعبة، به.وأخرجه أحمد (633)، وأبو داود (2805) و (2806) من طريق هشام الدستوائي، وأحمد (791) من طريق همام بن يحيى، كلاهما عن قتادة، به.وسيأتي من طريق شعبة وسعيد بن أبي عروبة عن قتادة برقم (7720)، ويأتي تخريجه هناك.وأخرج أحمد (864) من طريق جابر الجعفي، عن عبد الله بن نجي، عن علي، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُضحَّى بعضباء القرن والأذن. وإسناده ضعيف ومنقطع، لكن صح مرفوعًا استشرافُ العين والأذن كما في الحديث التالي.وعضباء القرن: هي مكسورة القرن، قال ابن الأثير في "النهاية": وقد يكون العَضَب في الأذن أيضًا، إلّا أنه في القرن أكثر. وقال ابن قدامة في "المغني" 5/ 462: العضباء: ما ذهب نصف أذنها أو قرنها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1738)


1738 - ما حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبيد الله بن أبي داود المُنادي، حدثنا وهب بن جَرير وأبو النَّضر، قالا: حدثنا شعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، أنَّ سَلَمةَ بن كُهَيل أخبره، قال: سمعتُ حُجَيَّةَ بنَ عَديٍّ الكِنْدِي يقول: سمعتُ عليًّا يقول: أَمَرَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أَن نَستَشرِفَ العينَ والأُذُنَ [1]. ومنها:




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমরা (কুরবানির পশুর) চোখ ও কান ভালোভাবে পরীক্ষা করি। এবং এর অন্তর্ভুক্ত:




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل حجية بن عدي الكندي. أبو النضر: هو هاشم بن القاسم.وهو في "مسند أحمد" 2/ (1022) و (1309) عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد - لكنه مطول كلفظ الحديث الآتي بعده.وأخرجه أحمد (826) و (1021)، والنسائي (4450) من طرق عن شعبة، به. وروايتا أحمد مطولتان كذلك.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" (1106) من طريق أبي إسحاق، عن هبيرة بن يَريم، عن علي. وإسناده حسن.وسيأتي من طريق حجية بأطول مما هنا بالأرقام (1739) و (7724) و (7725) و (7726).قوله: "نستشرف العين والأذن"، قال ابن الأثير في "النهاية": أي: نتأمل سلامتهما من آفةٍ تكون بهما، وقيل: من الشُّرفة، وهي خيار المال، أي: أُمرنا أن نتخيرها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1739)


1739 - ما حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبيد الله المُنادِي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي، عن أبي إسحاق الهَمْداني، عن سَلَمة بن كُهَيل، عن حُجَيّةَ بن عَدِيٍّ: أنَّ رجلًا سأل عليًّا عن البقرة، فقال: عن سبعةٍ. قال: القَرْن؟ [1] قال: العَرَج؟ قال: إذا بَلَغَت المناسكَ، قال: وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أَمَرَنا أن نَستشرِفَ العينَ والأُذُن [2].ومنها:




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি তাঁকে গরুর (কুরবানী) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি বললেন: (তা) সাত জনের পক্ষ থেকে। লোকটি জিজ্ঞেস করল: শিং (ভাঙা)? (পরে আবার জিজ্ঞেস করল): খোঁড়া (ল্যাংড়া)? তিনি (আলী) বললেন: যখন তা মানাসিক (কুরবানীস্থল) পর্যন্ত পৌঁছতে পারে (তখন তা বৈধ)। তিনি (আলী) আরও বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে চোখ ও কান (এর ত্রুটি) উত্তমরূপে পরীক্ষা করার নির্দেশ দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في نسخنا الخطية و"تلخيص المستدرك"، والذي يظهر أنَّ هنا سقطًا، فقد رواه ابن خزيمة (2915)، والبزار (754)، والمحاملي في "أماليه" (204) من طريق وهب بن جرير، وعندهم: فقال: القرن؟ فقال: لا يضرك، قال: العرج … إلى آخره.



[2] إسناده حسن كسابقه. جرير والد وهب: هو ابن حازم، وأبو إسحاق الهمداني: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه أحمد 2/ (734) و (1312)، والترمذي (1503) من طرق عن سلمة بن كهيل، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.قوله: "إذا بلغت المناسك" جمع منسك بكسر السين وفتحها: وهو المذبح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1740)


1740 - ما حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى التِّنِّيسي، حدثنا عمرو بن أبي سَلَمة، حدثنا صَدَقة بن عبد الله الدمشقي، عن ثَوْر بن يزيد، عن أبي حُمَيد الرُّعَينيِّ قال: كنّا جُلوسًا إلى عُتبةَ بن عبدٍ السُّلَمي، فأقبل يزيدُ ذو مِصْرٍ المُقْرائي فقال لعُتبة: يا أبا الوليد، إنّا خرجنا آنفًا في التِمَاسِ جَدْيِ نُسُكٍ، فلم نَكَدْ نجدُ شيئًا يُنْقِى غيرَ أنِّي وجدتُ ثَرْماءَ سمينةً، فقال عتبة: فلوما جئتَنا بها، فقال: اللهم غُفْرًا، أتجوزُ عنكَ ولا تجوز عنِّي؟ قال: نعم، قال: إنَّك تشُكُّ ولا أَشكُّ، قال: ثم أخرج عتبةُ يدَه فقال: إنَّما نَهَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن خمسٍ: عن المُؤصَلَة والمُصْفَرَة والبَخْقاء والكَسْراء والمُشَيِّعة.قال: والمُؤصَلَةُ: المستأصَلَة قَرْنُها، والمُصْفَرَة: المستأصَلَة أُذُنها [1]، والبَخْقاء: البيِّنُ عَوَرُها [2]، والمُشيِّعة [3]: المهزولة أو المريضة التي لا تَتْبعُ الغنمَ [4].




উতবা ইবনে আবদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাবী] আবু হুমাইদ আর-রু‘আইনী বলেন: আমরা উতবা ইবনে আবদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় ইয়াযীদ যূ মিসর আল-মুক্বরায়ী আসলেন এবং উতবাকে বললেন: ‘হে আবুল ওয়ালীদ! আমরা এইমাত্র কুরবানীর জন্য একটি ছাগল খুঁজতে বের হয়েছিলাম, কিন্তু উত্তম কিছু খুঁজে পাচ্ছিলাম না। তবে আমি একটি মোটা 'ছারমা' পেলাম।’ উতবা বললেন: ‘তাহলে সেটি আমাদের কাছে নিয়ে আসোনি কেন?’ ইয়াযীদ বললেন: ‘আল্লাহ ক্ষমা করুন! এটি কি আপনার জন্য বৈধ কিন্তু আমার জন্য নয়?’ তিনি বললেন: ‘হ্যাঁ।’ ইয়াযীদ বললেন: ‘আপনি সন্দেহ পোষণ করেন, কিন্তু আমি করি না।’ অতঃপর উতবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাত বের করে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল পাঁচটি প্রাণী দিয়ে কুরবানী করতে নিষেধ করেছেন: আল-মু’আস্-সালাহ (المؤصَلَة), আল-মুস্-ফাররাহ (المُصْفَرَة), আল-বাখ্বকা’ (البَخْقاء), আল-কাসরা’ (الكَسْراء) এবং আল-মুশাইয়্যি’আহ (المُشَيِّعة)। [তিনি] বলেন: আল-মু’আস্-সালাহ হলো— যার শিং গোড়া থেকে উপড়ে ফেলা হয়েছে। আল-মুস্-ফাররাহ হলো— যার কান গোড়া থেকে উপড়ে ফেলা হয়েছে। আল-বাখ্বকা’ হলো— যার অন্ধত্ব স্পষ্ট। আর আল-মুশাইয়্যি’আহ হলো— দুর্বল বা অসুস্থ প্রাণী, যা পালের সাথে চলতে পারে না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] قال الخطابي: وأُراها سميت مُصْفَرة لأنَّ صِمَاخَيها قد صَفِرا من الأذنين، أي: خَلَوا، يقال: صَفِر الوعاءُ: إذا خلا. فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل.وقد اختلف فيه على هشام بن عروة، فرواه بعضهم عن هشام عن أبيه مرسلًا، ورواه آخرون - كما هنا - عن هشام عن أبيه عن عائشة، ورواه البعض عن هشام عن أبيه عن زينب عن أم سلمة، وصحَّح الدارقطني في العلل (3822) المرسل، لكن قال ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" 1/ 339: ولعلَّ هذا غير قادح، إذ قد يكون عن هشام عن أبيه من الطريقين. وقال في "البداية والنهاية" 7/ 597: وهو إسناد جيد قوي رجاله ثقات.وصحَّح إسناده أيضًا بالإضافة إلى المصنف: البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 133، والحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" وفي "الدراية" 2/ 24، وابن الملقن في "الدر المنير" 6/ 250.وأخرجه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، عن ابن أبي فديك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام على إسناده هناك.وانظر حديث هشام بن عروة عن أبيه عن زينب بنت أبي سلمة عن أم سلمة، في "مسند أحمد" 44/ (26492).



[2] أي: قد بُخِقَت عينها. فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل.وقد اختلف فيه على هشام بن عروة، فرواه بعضهم عن هشام عن أبيه مرسلًا، ورواه آخرون - كما هنا - عن هشام عن أبيه عن عائشة، ورواه البعض عن هشام عن أبيه عن زينب عن أم سلمة، وصحَّح الدارقطني في العلل (3822) المرسل، لكن قال ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" 1/ 339: ولعلَّ هذا غير قادح، إذ قد يكون عن هشام عن أبيه من الطريقين. وقال في "البداية والنهاية" 7/ 597: وهو إسناد جيد قوي رجاله ثقات.وصحَّح إسناده أيضًا بالإضافة إلى المصنف: البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 133، والحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" وفي "الدراية" 2/ 24، وابن الملقن في "الدر المنير" 6/ 250.وأخرجه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، عن ابن أبي فديك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام على إسناده هناك.وانظر حديث هشام بن عروة عن أبيه عن زينب بنت أبي سلمة عن أم سلمة، في "مسند أحمد" 44/ (26492).



1740 [3] - المشيّعة بكسر الياء المشددة، قال الخطابي في "غريب الحديث": أي التي لا تزال تتبع الغنم عَجَفًا، يريد أنها لا تلحق الغنم، فهي أبدًا تشيِّعها، أي تكون من وراء القطيع. انتهى، وقال ابن الأثير في "النهاية": وإن فتحتها - يعني الياء - فلأنها تحتاج إلى من يُشيِّعُها: أي يسوقها لتأخرها عن الغنم. فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل.وقد اختلف فيه على هشام بن عروة، فرواه بعضهم عن هشام عن أبيه مرسلًا، ورواه آخرون - كما هنا - عن هشام عن أبيه عن عائشة، ورواه البعض عن هشام عن أبيه عن زينب عن أم سلمة، وصحَّح الدارقطني في العلل (3822) المرسل، لكن قال ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" 1/ 339: ولعلَّ هذا غير قادح، إذ قد يكون عن هشام عن أبيه من الطريقين. وقال في "البداية والنهاية" 7/ 597: وهو إسناد جيد قوي رجاله ثقات.وصحَّح إسناده أيضًا بالإضافة إلى المصنف: البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 133، والحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" وفي "الدراية" 2/ 24، وابن الملقن في "الدر المنير" 6/ 250.وأخرجه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، عن ابن أبي فديك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام على إسناده هناك.وانظر حديث هشام بن عروة عن أبيه عن زينب بنت أبي سلمة عن أم سلمة، في "مسند أحمد" 44/ (26492).



1740 [4] - إسناده ضعيف، صدقة بن عبد الله ضعيف، وأبو حميد الرعيني ويزيد ذو مصر مجهولان.وسيأتي عند المصنف برقم (7727) من طريق عيسى بن يونس عن ثور بن يزيد.ويأتي تخريجه هناك. فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن أبي فديك: هو محمد بن إسماعيل.وقد اختلف فيه على هشام بن عروة، فرواه بعضهم عن هشام عن أبيه مرسلًا، ورواه آخرون - كما هنا - عن هشام عن أبيه عن عائشة، ورواه البعض عن هشام عن أبيه عن زينب عن أم سلمة، وصحَّح الدارقطني في العلل (3822) المرسل، لكن قال ابن كثير في "تخريج أحاديث التنبيه" 1/ 339: ولعلَّ هذا غير قادح، إذ قد يكون عن هشام عن أبيه من الطريقين. وقال في "البداية والنهاية" 7/ 597: وهو إسناد جيد قوي رجاله ثقات.وصحَّح إسناده أيضًا بالإضافة إلى المصنف: البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 133، والحافظ ابن حجر في "بلوغ المرام" وفي "الدراية" 2/ 24، وابن الملقن في "الدر المنير" 6/ 250.وأخرجه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، عن ابن أبي فديك، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه والكلام على إسناده هناك.وانظر حديث هشام بن عروة عن أبيه عن زينب بنت أبي سلمة عن أم سلمة، في "مسند أحمد" 44/ (26492).