হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1761)


1761 - أخبرنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن هشام بن حسان، عن أنس بن سِيرين، عن أنس بن مالكٍ أنه قال: لما رَمَى رسول الله صلى الله عليه وسلم الجَمْرةَ ونَحَر هَدْيَه، ناوَلَ الحالقَ شِقَّهُ الأَيمنَ فحَلَقَه، ثم ناوَلَهُ الشِّقَّ الأيسَرَ فحَلَقَه، ثم ناوَلَهُ أبا طلحةَ وأَمره أن يَقْسِمَه بين الناس [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলেন এবং তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করলেন, তখন তিনি নাপিতকে তাঁর মাথার ডান পাশ দিলেন এবং সে তা কামিয়ে দিল। এরপর তিনি তাকে বাম পাশ দিলেন এবং সে তা কামিয়ে দিল। এরপর তিনি (চুলগুলো) আবূ তালহাকে দিলেন এবং তাকে নির্দেশ দিলেন যেন তা মানুষের মাঝে বিতরণ করে দেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، إلّا أنَّ ذكر أنس بن سيرين في هذا الإسناد وهمٌ، والمحفوظ أنه من رواية محمد بن سيرين وليس أنسًا، وذلك لأمور:الأول: أنَّ الحديث مخرَّج في "مسند الحميدي" نفسه (1254)، وهو برواية بشر بن موسى أيضًا، ويرويه عن بشر أبو علي الصواف الموصوف بأنه كان من أهل التحرز، وقد قال فيه: محمد بن سيرين.الأمر الثاني: أنه قد رواه عن الحميدي اثنان من الثقات، وهما: محمد بن إسماعيل أبو إسماعيل الترمذي عند أبي عوانة (3230)، وحاتم بن ميمون عند ابن المنذر في "الأوسط" (586)، فقالا فيه: محمد بن سيرين، لكن أبا إسماعيل قال: ابن سيرين، وإذا أُطلق فإنما يراد به محمدًا.الأمر الثالث: أنَّ البيهقي رواه في "السنن الكبرى" 5/ 134 عن أبي عبد الله الحاكم نفسه عن علي بن محمد بن سختويه عن بشر بن موسى عن الحميدي بهذا الإسناد، وقال فيه: ابن سيرين. قلنا: يعني محمدًا كما هو مشهور.الأمر الرابع: أنه قد رواه عن سفيان - وهو ابن عيينة - جمعٌ غير الحميدي، كما رواه عن هشام ابن حسان جمعٌ غير سفيان، وكلهم قال: محمد بن سيرين، وبعضهم: ابن سيرين.أما ما رواه البيهقي في "السنن الكبرى" 2/ 427 عن الحسين بن محمد الروذباري عن محمد بن بكر عن أبي داود عن محمد بن العلاء عن حفص عن هشام عن أنس بن سيرين عن أنس بن مالك، فذكر الحديث، فذِكر أنس بن سيرين هنا خطأ من النساخ جزمًا، وذلك لأمرين:الأول: أنَّ البيهقي قال بإثره: رواه مسلم في "الصحيح" عن محمد بن العلاء أبي كريب، وأخرجه البخاري من وجه آخر عن ابن سيرين. قلنا: وروايتا "الصحيحين" اللتان أشار إليهما البيهقي إنما هما من محمد بن سيرين، مما يعني أنَّ رواية البيهقي عن محمد بن سيرين، وليس عن أنس بن سيرين، ومما يؤيد ذلك ما في الأمر الثاني: وهو أنَّ البيهقي أخرجه مرة أخرى في "دلائل النبوة" 5/ 441 بإسناده ومتنه، وفيه هنالك: عن ابن سيرين.وعلى أية حال فكلاهما ثقة، ولا يضر ذلك في صحة الحديث.وأخرجه أحمد 19/ (12092)، ومسلم (1305) (326)، وأبو داود (1982)، والترمذي (912)، والنسائي (4102)، وابن حبان (3879) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 20/ (13164) و (13242) و 21/ (13685)، ومسلم (1305) (323 - 325) وأبو داود (1981)، والنسائي (4087)، وابن حبان (1371) من طرق عن هشام بن حسان، به.وقرن أحمد (13685) بهشام بن حسان أيوبَ السختياني.وأخرج البخاري (171) من طريق ابن عون عن محمد بن سيرين عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما حلق رأسه كان أبو طلحة أول من أخذ من شعره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1762)


1762 - أخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة، حدثنا عثمان بن سعيدٍ الدارمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا أبان بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كثير، أنَّ أبا سَلَمة حدّثه، أنَّ محمد بن عبد الله بن زيد حدّثه: أنَّ أباه شَهِدَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عند المَنْحَر هو ورجلٌ من الأنصار، فحَلَقَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رأسَه في ثوبِه، فأعطاه فقَسَمَ منه على رجالٍ، وقلَّم أظفارَه فأعطاه صاحبَه. قالوا: فإنه عندنا مخضوبٌ بالحِنّاء والكَتَم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তাঁর পিতা [অর্থাৎ আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)] এবং আনসারদের একজন ব্যক্তি কুরবানীর স্থানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে উপস্থিত থাকতে দেখেছেন। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর মাথা মুণ্ডন করলেন এবং চুলগুলো তাঁর (সাহাবীর) কাপড়ের মধ্যে নিলেন। তারপর তিনি তা তাঁকে দিলেন এবং তিনি তা থেকে কিছু সংখ্যক লোকের মাঝে ভাগ করে দিলেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নখ কাটলেন এবং তা তাঁর সাথীকে দিলেন। বর্ণনাকারীরা বলেন: নিশ্চয়ই সেই (নখগুলো) আমাদের নিকট মেহেদি ও কাতামের রং-এ রঞ্জিত অবস্থায় আছে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. موسى بن إسماعيل: هو التبوذكي، وأبان بن يزيد: هو العطار، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن، وصحابيه عبد الله بن زيد: هو ابن عبد ربه.وأخرجه أحمد 26/ (16474) و (16475) من طريقين عن أبان بن يزيد، بهذ الإسناد.والكَتَم، بالتحريك: نبات يخلط مع الوَسْمة للخِضاب. ورفعه عبد الرزاق: أخبرنا عبيد الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1763)


1763 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذانَ، حدثنا محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أفاضَ يومَ النَّحر، ثم رَجَعَ فصلَّى الظُّهرَ بمِنًى، قال نافع: وكان ابنُ عمر يُفيضُ يومَ النَّحر، ثم يَرجعُ فيصلِّي الظُّهرَ بمِنًى، ويَذكُر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم فَعَلَه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন (তাওয়াফের জন্য মক্কায়) গমন করেন, এরপর ফিরে এসে মিনায় যোহরের সালাত আদায় করেন। নাফি' বলেন: আর ইবনু উমরও কুরবানীর দিন (তাওয়াফের জন্য) মক্কায় গমন করতেন, এরপর ফিরে এসে মিনায় যোহরের সালাত আদায় করতেন এবং উল্লেখ করতেন যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটিই করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه مسلم (1308) عن محمد بن رافع، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 8/ (4898)، وأبو داود (1998)، والنسائي (4154)، وابن حبان (3882) و (3883) و (3885) من طرق عن عبد الرزاق، به.وأخرجه البخاري (1732) من طريق سفيان، عن عبيد الله بن عمر، به، موقوفًا. وقال عقبه: ورفعه عبد الرزاق: أخبرنا عبيد الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1764)


1764 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نصرٍ، قال: قُرئ على عبد الله بن وهب، أخبرك ابنُ جُريج، عن عطاء، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يَرْمُلُ في السَّبْع الذي أفاض فيه. وقال عطاء: لا رَمَلَ فيه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই সাত চক্করের তাওয়াফে রমল (দ্রুত গতিতে হাঁটা) করেননি, যা তিনি সমাপ্ত করেছিলেন। আর আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: এতে (এই তাওয়াফে) রমল নেই।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (2001)، وابن ماجه (3060)، والنسائي (4156) من طرق عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.والرمل - بفتحتين -: الهرولة، قال في "النهاية": وهو أن يهزَّ منكبيه ولا يسرع. وجعل يستلم الحجر بمحجنه، ثم أتى السقاية بعدما فرغ، وبنو عمه ينزعون منها، فقال: "ناوِلوني" فرفع له الدلو فشرب، ثم قال: "لولا أنَّ الناس يتخذونه نسكًا ويغلبونكم عليه، لنزعت معكم" الحديث.وأخرج أحمد 5/ (3527) من طريق مجاهد عن ابن عباس أنه قال: جاء النبي صلى الله عليه وسلم إلى زمزم، فنزعنا له دلوًا فشرب، ثم مجَّ فيها، ثم أفرغناها في زمزم، ثم قال: "لولا أن تُغلبوا عليها لنزعت بيدي".وفي الباب عن علي عند أحمد 2/ (562)، والترمذي (885) وقال: حسن صحيح.وعن جابر بن عبد الله عند مسلم (1218)، وأبي داود (1905)، وابن ماجه (3074)، والنسائي (4153).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1765)


1765 - أخبرني أبو يحيى أحمد بن محمد السَّمَرْقَندي، حدثنا أبو عبد الله محمد بن نَصْر الإمام، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا خالد بن عبد الله، عن خالدٍ الحذَّاء، عن عكرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى السِّقاية فاستسقَى، فقال العباس: يا فضلُ، اذهب إلى أمِّك فأْتِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بشرابٍ من عندها، فقال: "اسقنِي"، فقال: يا رسولَ الله، إنَّهم يجعلون أيديَهم فيه، فقال: "اسقِني"، فشرب منه، ثم أتى زمزمَ وهم يَستَقُون ويعملون فيها، فقال: "اعمَلُوا فإنكم على عملٍ صالحٍ"، ثم قال: "لولا أن تُغلَبوا لنزلتُ حتى أَضَعَ الحَبْلَ على هذه"؛ يعني: عاتقَه، وأشار إلى عاتقِه [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه!




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিকায়াহ-এর (পানি পানের স্থান) নিকট এলেন এবং পানি চাইলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'হে ফাদল! তোমার মায়ের কাছে যাও এবং সেখান থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য পানীয় নিয়ে এসো।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমাকে পান করাও।" তিনি (আব্বাস) বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! লোকজন এর মধ্যে তাদের হাত ঢুকিয়ে দিয়েছে।' তিনি (আবার) বললেন, "আমাকে পান করাও।" অতঃপর তিনি তা থেকে পান করলেন। এরপর তিনি যমযমের কাছে গেলেন। সে সময় লোকজন সেখান থেকে পানি তুলছিল এবং কাজ করছিল। তিনি বললেন, "তোমরা কাজ করতে থাকো, কারণ তোমরা একটি নেক কাজের উপর আছো।" এরপর তিনি বললেন, "যদি তোমাদের উপর কর্তৃত্বের ভয় না থাকত, তবে আমি (কূপের) নিচে নেমে আসতাম এবং রশিটা এর উপর রাখতাম।" – অর্থাৎ, তিনি তাঁর কাঁধের দিকে ইশারা করে তাঁর কাঁধ বোঝালেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن يحيى: هو النيسابوري، وخالد بن عبد الله: هو الواسطي، وخالد الحذاء: هو ابن مهران.وأخرجه البخاري (1635)، وابن حبان (5392) من طريقين عن خالد بن عبد الله الواسطي، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه بنحوه أحمد 3/ (1841) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عكرمة، به.وأخرج أحمد 4/ (2227) من طريق مقسم عن ابن عباس قال: طاف رسول الله صلى الله عليه وسلم بالبيت، وجعل يستلم الحجر بمحجنه، ثم أتى السقاية بعدما فرغ، وبنو عمه ينزعون منها، فقال: "ناوِلوني" فرفع له الدلو فشرب، ثم قال: "لولا أنَّ الناس يتخذونه نسكًا ويغلبونكم عليه، لنزعت معكم" الحديث.وأخرج أحمد 5/ (3527) من طريق مجاهد عن ابن عباس أنه قال: جاء النبي صلى الله عليه وسلم إلى زمزم، فنزعنا له دلوًا فشرب، ثم مجَّ فيها، ثم أفرغناها في زمزم، ثم قال: "لولا أن تُغلبوا عليها لنزعت بيدي".وفي الباب عن علي عند أحمد 2/ (562)، والترمذي (885) وقال: حسن صحيح.وعن جابر بن عبد الله عند مسلم (1218)، وأبي داود (1905)، وابن ماجه (3074)، والنسائي (4153).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1766)


1766 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر قال: قُرئ على ابن وهبٍ قال: حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن ويحيى بن عبد الله بن سالم، أنَّ عمرو بن أبي عمرٍو مولى المُطَّلب أخبرهما عن المُطَّلب بن عبد الله بن حَنْطَب، عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لحمُ صيدِ البَرِّ لكم حلالٌ وأنتم حُرُم، ما لم تَصِيدُوه أو يُصادَ [1] لكم" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وهكذا رُويَ عن مالك بن أنس وسليمانَ بن بلال عن عمرٍو متصلًا مسندًا:أما حديث مالك:




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ইহরাম অবস্থায় থাকা সত্ত্বেও তোমাদের জন্য স্থলভাগের শিকারের গোশত হালাল, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা তা শিকার করো অথবা তোমাদের জন্য তা শিকার করা হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا الرواية هنا "يصاد" وهو جائز على لغةٍ، أو على أن "أو" بمعنى: "إلَّا أنَّ" وحينئذٍ فلا إشكال.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عمرو مولى المطلب، إن صحَّ سماع المطلب بن عبد الله من جابر، كما سلف بيانه برقم (1677).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1767)


1767 - فأخبرَناه الحسن بن محمد الإسفرايِني، حدثني خالي، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ بمصر، حدثنا محمد بن سليمان بن أبي داود، حدثنا مالك بن أنس، عن عمرو بن أبي عمرو، عن المُطّلِب بن عبد الله بن حَنطَب، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه [1].وأما حديث سليمان بن بلال:




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আর সুলাইমান ইবনু বিলালের হাদীস প্রসঙ্গে:




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره كسابقه. خال الحسن بن محمد: هو أبو عوانة الإسفرايني الحافظ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1768)


1768 - فحدَّثَناه أبو الحسن إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جدِّي حدثنا سعيد بن كَثِير بن عُفَير، حدثنا سليمان بن بلال، عن عمرو بن أبي عمرو، عن المُطَّلب بن عبد الله بن حَنْطَب، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "صيدُ البَرِّ لكم حلالٌ ما لم تَصِيدُوه أو يُصادَ لكم" [1].




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: স্থলের শিকার তোমাদের জন্য হালাল, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরাই তা শিকার করো অথবা তোমাদের জন্য শিকার করা হয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره. كسابقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1769)


1769 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا عبد العزيز بن محمد، عن عمرو بن أبي عمرو، عن رجل من الأنصار، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه [1].هذا حديث لا يعلِّلُ حديث مالك وسليمان بن بلال ويعقوب الإسكَندَراني، فإنهم وَصَلُوه وهم ثقات.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে। এই হাদীসটি মালিক, সুলাইমান ইবনু বিলাল এবং ইয়াকুব ইসকান্দারানীর হাদীসের ত্রুটি দেখায় না, কারণ তারা এটিকে (সনদ) মুত্তাসিল করেছেন এবং তারা সকলেই বিশ্বস্ত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الراوي عن جابر، وقد سلف الكلام في الاختلاف فيه برقم (1677). عبد العزيز بن محمد: هو الدراوردي.وهو في "الأم" للشافعي 3/ 537 - 538، لكن وقع عنده: عن رجل من بني سلمة. وبنو سَلِمة هم من الأنصار.وأخرجه أحمد 23/ (15158) عن أبي سلمة الخزاعي، عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (15185) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عمرو بن أبي عمرو، عن رجل ثقة من بني سلمة، عن جابر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1770)


1770 - حدثنا عمرو بن محمد بن منصور العدل، حدثنا إبراهيم بن محمد الصَّيدلاني، حدثنا إسحاق ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا زكريا بن إسحاق، عن سليمان الأحْوَل، أنه سمع طاووسًا يحدِّث عن ابن عباسٍ قال: كان الناسُ يَنفِرُون من مِنى إلى وُجوهِهِم، فأمَرَهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يكون آخرُ عهدِهِم بالبيت، ورَخَّصَ للحائض [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা মিনা থেকে বিভিন্ন দিকে (তাদের গন্তব্যের দিকে) ফিরে যেত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নির্দেশ দিলেন যেন বায়তুল্লাহর সাথে তাদের শেষ সাক্ষাৎ হয়। আর তিনি ঋতুমতী মহিলাদের জন্য অবকাশ (ছাড়) দিলেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. إسحاق: هو ابن راهويه، وسليمان الأحول: هو ابن أبي مسلم المكي.وأخرجه أحمد 3/ (1936)، ومسلم (1327)، وأبو داود (2002)، وابن ماجه (3070)، والنسائي (4170)، وابن حبان (3897) من طريق سفيان بن عيينة، عن سليمان الأحول، بهذا الإسناد.وأخرج البخاري (329) و (1755) و (1760)، ومسلم (1328) (381)، والنسائي (4186)، وابن حبان (3898) من طريق عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: رُخِّص للحائض أن تنفر إذا حاضت. واللفظ للبخاري، وفي لفظ آخر له عن ابن عباس قال: أُمر الناس أن يكون آخر عهدهم بالبيت، إلّا أنه خُفِّف عن الحائض.وأخرج أحمد 3/ (1990) و 5/ (3256)، ومسلم (1328) (381)، والنسائي (4187) من طريق الحسن بن مسلم، عن طاووس قال: كنت مع ابن عباس إذ قال زيد بن ثابت: تفتي أن تصدر الحائض قبل أن يكون آخر عهدها بالبيت؟! فقال له ابن عباس: إمّا لا، فَسَلْ فلانة الأنصارية، هل أمرها بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: فرجع زيد بن ثابت إلى ابن عباس يضحك وهو يقول: ما أراك إلّا قد صدقت.وأخرج أحمد 5/ (35051) من طريق عمرو بن دينار: أنَّ ابن عباس كان يذكر أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم رخَّص للحائض أن تصدر قبل أن تطوف إذا كانت قد طافت الإفاضة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1771)


1771 - أخبرني يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أبو عمرو أحمد بن المبارك المُستَمْلي، حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُمَوي، حدثنا أبي، حدثنا يزيد بن سِنَان [عن زَيد بن أبي أُنَيسة] [1] عن عمرو بن مُرَّة، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخُدْري، عن أبيه أبي سعيدٍ قال: قلنا: يا رسولَ الله، هذه الأحجارُ التي نَرمِي بها تُحمَلُ فنَحسِبُ أنها تَنقَعِرُ، قال: "إنَّه ما تُقُبِّلَ منها يُرفَع، ولولا ذلك لرأيتَها مثلَ الجبال" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، ويزيد بن سنان ليس بالمتروك.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই যে পাথরগুলো আমরা নিক্ষেপ করি, তা বহন করে নিয়ে যাওয়া হয়, কিন্তু আমরা মনে করি যে সেগুলো মাটিতে পড়ে আছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এগুলোর মধ্য থেকে যা কবুল হয়, তা তুলে নেওয়া হয়। যদি তা না হতো, তবে তোমরা সেগুলোকে পাহাড়ের মতো দেখতে পেতে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين معقوفين سقط من نسخ "المستدرك"، والمحفوظ أنَّ هذا الحديث من رواية يزيد بن سنان، عن زيد بن أبي أنيسة، عن عمرو بن مرة، هكذا رواه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 128 عن الحاكم نفسه بهذا الإسناد، وهو ثابت في رواية سعيد بن يحيى الأموي كما في مصادر التخريج، والله أعلم.



[2] الصحيح موقوفًا، وهذا إسناد ضعيف لضعف يزيد بن سنان، وهو أبو فروة الرهاوي، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1750) عن أحمد بن محمد بن أبي موسى الأنطاكي، والدارقطني (2789) عن الحسين بن إسماعيل، كلاهما عن سعيد بن يحيى بن سعيد الأموي، بهذا الإسناد. ووقع عندهما ذكر زيد بن أبي أنيسة بين سعيد وعمرو.وأخرج ابن أبي شيبة 4/ 32، والأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 177، والبيهقي 5/ 128 من طريق سفيان بن عيينة، عن سليمان بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن أبي نُعم، عن أبي سعيد الخدري قال: ما تُقُبِّل من حصى الجمار رُفع. هكذا موقوفًا، وهذا إسناد صحيح.وفي الباب عن ابن عباس موقوفًا عند ابن أبي شيبة 4/ 32، والأزرقي 2/ 177، والبيهقي 5/ 128.وعن سعيد بن جبير موقوفًا أيضًا عند الأزرقي 2/ 177.وعن عبد الله بن عمر موقوفًا عند الأزرقي 2/ 177، والفاكهي في "أخبار مكة" (2659).وأخرج حديث ابن عمر أبو نعيم في "دلائل النبوة" مرفوعًا، كما في "نصب الراية" للزيلعي 3/ 79، وضعَّفه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 128. "السفر قطعة من العذاب، يمنع أحدكم طعامه وشرابه ونومه، فإذا قضى نهمته فليُعَجِّل إلى أهله". أخرجه البخاري (1804) و (3001) و (5429)، ومسلم (1927).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1772)


1772 - حدثنا أبو الطيِّب محمد بن أحمد الذُّهْلي، حدثنا جعفر بن أحمد بن نصر الحافظ، حدثنا أبو مروان محمد بن عثمان العثماني، حدثنا أبو ضَمْرةَ اللَّيثي، عن هشام بن عُرْوة، عن عُرْوة، عن عائشة، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا قَضَى أحدُكم حَجَّه فليُعَجِّلِ الرِّحلةَ إلى أهلِه، فإنَّه أعظمُ لأجْرِه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার হজ্ব সম্পন্ন করে, তখন সে যেন তার পরিবারের কাছে দ্রুত ফিরে যায়, কারণ এটি তার প্রতিদানের জন্য অধিক বড়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي، رجاله ثقات، ومحمد بن عثمان العثماني وإن كان فيه كلام من حيث النكارة في حديثه فيما يرويه عن أبيه، فقد بيَّن الذهبي في "الميزان" أنَّ نكارتها من قبل أبيه، فخرج من عهدتها، وقد وثقه أبو حاتم وصالح جزرة، وقال البخاري: كان صدوقًا وهو خير من أبيه وأبوه عنده عجائب. أبو ضمرة الليثي: هو أنس بن عياض.وأخرجه البيهقي 5/ 259 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدارقطني (2790) من طريق إبراهيم بن محمد بن العتيق، عن أبي مروان العثماني، به.وفي باب الحث على تعجيل المسافر بشكل عام الرجوع إلى الأهل، عن أبي هريرة رفعه: "السفر قطعة من العذاب، يمنع أحدكم طعامه وشرابه ونومه، فإذا قضى نهمته فليُعَجِّل إلى أهله". أخرجه البخاري (1804) و (3001) و (5429)، ومسلم (1927).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1773)


1773 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبار.وأخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيّاري، حدثنا عبد الله بن علي الغَزَّال؛ قالا: حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، حدثنا أبو حمزة، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباسٍ قال: جاء جبريلُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فَذَهَبَ به ليُرِيَه المناسكَ، فانفَرَجَ له ثَبِيرٌ، فدخل منًى، فأراه الجِمَار، ثم أراه جَمْعًا، ثم أراه عرفاتٍ، فنَبَعَ الشيطانُ للنبيِّ صلى الله عليه وسلم عند الجَمْرة، فرَمَى بسَبع حَصَياتٍ حتى ساخ، ثم نَبَغَ له في الجَمْرة الثانية، فرماه بسَبع حَصَياتٍ حتى ساخ، ثم نَبَغَ له في جَمْرة العَقَبة، فرماه بسَبع حَصَياتٍ حتى ساخَ فذهب [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জিবরাঈল (আঃ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, অতঃপর তাঁকে নিয়ে গেলেন যেন তাঁকে হজ্জের বিধানাবলী (মানাসিক) দেখাতে পারেন। তখন তাঁর জন্য সাবি'র পাহাড় সরে গেল। তিনি মিনায় প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে জামরাগুলো দেখালেন। এরপর তাঁকে জাম' (মুজদালিফা) দেখালেন, অতঃপর তাঁকে আরাফাত দেখালেন। তখন জামরার নিকট শয়তান নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে আত্মপ্রকাশ করল। অতঃপর তিনি তাকে সাতটি ছোট কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে (শয়তান) মাটির সাথে মিশে গেল। এরপর সে তাঁর সামনে দ্বিতীয় জামরার নিকট আত্মপ্রকাশ করল। তিনি তাকে সাতটি ছোট কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে মাটির সাথে মিশে গেল। এরপর সে তাঁর সামনে জামরাতুল আকাবার নিকট আত্মপ্রকাশ করল। তিনি তাকে সাতটি ছোট কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে মাটির সাথে মিশে গেল এবং চলে গেল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لتفرد عطاء بن السائب به، وكان قد اختلط بأخرة، ولم يَذكُر أحدٌ أنَّ أبا حمزة - وهو محمد بن ميمون السُّكري - قد روى عنه قبل الاختلاط، بل إنَّ ابن القطان الفاسي قد ذكر أبا حمزة السكري هذا فيمن اختلط، كما في ترجمته من "تهذيب التهذيب"، ثم إنَّ عطاء قد اضطرب فيه، فذكر هنا أنَّ صاحب القصة هو نبيُّنا محمد صلى الله عليه وسلم، وذكر مرةً أخرى فيما رواه عنه حماد بن سلمة - وهو ممن روى عنه قبل الاختلاط وبعده - أنَّ صاحب القصة هو إبراهيم عليه السلام، كما عند أحمد 5/ (2794). أما عبد الله الغَزَّال - فهو وإن كان مجهولًا - قد توبع.وأخرجه البيهقي 5/ 153 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقال بإثره: تفرد به هكذا عطاء بن السائب.وأخرجه ابن خزيمة (2967) عن أحمد بن سعيد الدارمي، عن علي بن الحسن بن شقيق، به.وانظر ما سلف برقم (1731).وثَبير، بفتح فكسر: جبل بين مكة ومنى، وهو على يمين الداخل منها إلى مكة، ويسميه أهل مكة اليوم جبل الرَّخم.وساخ: أي: تسفَّل في الأرض.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1774)


1774 - حدثنا أبو سعيد محمد بن جعفر الخَصِيب الصُّوفي، حدثنا أبو جعفر محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدثنا العلاء بن عمرو الحنفي ومحمد بن العلاء الهَمْداني، قالا: حدثنا حُمَيد [بن] الخُوَار، حدثنا ابن جُرَيج، عن عطاءٍ، قال: لا أَرمي حتى تَزِيغَ الشمسُ، إنَّ جابر بن عبد الله قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَرمي يومَ النَّحْر قبلَ الزَّوال، فأما بعدَ ذلك فعندَ الزَّوالِ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আত্বা বলেন, সূর্য হেলে না যাওয়া পর্যন্ত আমি (পাথর) নিক্ষেপ করব না। নিশ্চয়ই জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন সূর্য ঢলে যাওয়ার আগেই (পাথর) নিক্ষেপ করতেন। কিন্তু এরপর (অন্যান্য দিনগুলোতে) সূর্য ঢলে যাওয়ার সময় তিনি নিক্ষেপ করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف حميد بن الخوار، وقد تفرد في هذا الإسناد بذكر عطاء - وهو ابن أبي رباح - فخالف بذلك الثقات من أصحاب ابن جريج الذين قالوا: عن ابن جريج عن أبي الزبير عن جابر، لذلك قال ابن خزيمة (2969): هذا حديث غريب إن كان ابن خوار حفظ عطاءً في هذا الإسناد.وأخرجه أحمد 22/ (14354)، ومسلم (1299)، والنسائي (4055)، وابن حبان (3886) من طريق عبد الله بن إدريس، وأحمد 22/ (14435)، وأبو داود (1971) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وأحمد 23/ (15291) من طريق حماد بن سلمة، ومسلم (1299)، والترمذي (894) من طريق عيسى بن يونس، ومسلم (1299) من طريق أبي خالد الأحمر، وابن ماجه (3053) من طريق عبد الله بن وهب، ستتهم عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر.وأخرجه أحمد 23/ (14671) من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر. فانتفت شبهة تدليسه. عبد الرحمن بن القاسم: هو ابن محمد بن أبي بكر الصديق.وأخرجه أحمد 41/ (24592)، وأبو داود (1973) من طريق سليمان بن حيان أبي خالد الأحمر، وابن حبان (3868) من طريق يحيى بن سعيد الأموي، كلاهما عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1775)


1775 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو زُرعة عبد الرحمن بن عمرٍو الدِّمشقي، حدثنا أحمد بن خالد الوَهْبي، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشةَ قالت: أفاضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من آخرِ يومِه حين صلَّى الظُّهر، ثم رَجَعَ فَمَكَثَ بمنًى لياليَ أيامِ التَّشريق يرمي الجَمْرةَ إذا زالت الشمسُ؛ كلَّ جمرةٍ بسبعِ حَصَياتٍ، يكبِّرُ مع كلِّ حصاةٍ، ويقف عند الأُولى وعند الثانية، فيُطيلُ القيامَ ويتضرَّعُ، ثم يرمي الثالثةَ ولا يقفُ عندها [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শেষ দিনে যোহরের সালাত আদায় করার পর (আরাফাত/মুযদালিফাহ থেকে) প্রত্যাবর্তন করলেন। অতঃপর তিনি প্রত্যাবর্তন করে আইয়ামে তাশরীকের রাতগুলো মিনায় অবস্থান করলেন। তিনি সূর্য ঢলে যাওয়ার পর জামরাগুলোতে কংকর নিক্ষেপ করতেন; প্রত্যেক জামরাতে সাতটি করে কংকর। প্রতিটি কংকর নিক্ষেপের সময় তিনি তাকবীর বলতেন। তিনি প্রথম ও দ্বিতীয় জামরার নিকট দাঁড়াতেন এবং দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে বিনয়াবনতভাবে দু'আ করতেন। অতঃপর তিনি তৃতীয় জামরাতে কংকর নিক্ষেপ করতেন এবং সেখানে দাঁড়াতেন না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - وقد صرَّح بالتحديث عند ابن حبان فانتفت شبهة تدليسه. عبد الرحمن بن القاسم: هو ابن محمد بن أبي بكر الصديق.وأخرجه أحمد 41/ (24592)، وأبو داود (1973) من طريق سليمان بن حيان أبي خالد الأحمر، وابن حبان (3868) من طريق يحيى بن سعيد الأموي، كلاهما عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1776)


1776 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا يونس بن يزيد، عن الزُّهري: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان إذا رَمَى الجَمْرة التي تلي مسجدَ مِنًى يرميها بسَبعِ حَصَياتٍ، يكبِّر كلَّما رَمَى بحصاةٍ، ثم تقدَّم أمامَها فوقفَ مُستقبِلَ البيتِ رافعًا يديه يدعو، وكان يُطيلُ الوقوف، ثم يأتي الجَمْرَة الثانية فيَرميها بسَبعِ حَصَياتٍ يُكبِّر كلَّما رمى بحصاةٍ، ثم يَنحدِر ذاتَ اليَسار مما يلي الوادي، فيقف مُستقبِلَ القِبلةِ رافعًا يديه، ثم يأتي الجَمْرةَ التي عند العَقَبة فيرميها بسَبعِ حَصَياتٍ يُكبِّر عند كلِّ حصاةٍ، ثم ينصرفُ ولا يقومُ عندها.قال الزُّهري: سمعتُ سالمَ بن عبد الله يحدِّث بمِثلِ هذا عن أبيه عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم. قال: وكان ابنُ عمر يفعلُه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিনায় মসজিদের নিকটবর্তী জামরায় যখন কঙ্কর নিক্ষেপ করতেন, তখন তাতে সাতটি কঙ্কর মারতেন। প্রতিটি কঙ্কর নিক্ষেপের সময় তিনি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলতেন। এরপর তিনি সেটির সামনে এগিয়ে যেতেন এবং কাবার দিকে মুখ করে হাত তুলে দাঁড়িয়ে দোয়া করতেন। তিনি সেখানে দীর্ঘ সময় অবস্থান করতেন। অতঃপর তিনি দ্বিতীয় জামরায় এসে তাতে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করতেন এবং প্রতিটি কঙ্কর নিক্ষেপের সময় তাকবীর বলতেন। এরপর তিনি উপত্যকার দিক দিয়ে বাম দিকে নেমে যেতেন এবং কিবলার দিকে মুখ করে হাত তুলে দাঁড়িয়ে দোয়া করতেন। অতঃপর তিনি আকাবার নিকটবর্তী জামরায় এসে তাতে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করতেন এবং প্রতিটি কঙ্করের সময় তাকবীর বলতেন। এরপর তিনি ফিরে যেতেন এবং সেখানে (দোয়া করার জন্য) অবস্থান করতেন না।

যুহরি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি সালিম ইবনু আবদুল্লাহকে তার পিতা (আবদুল্লাহ ইবনু উমর) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সম্পর্কে অনুরূপ বর্ণনা করতে শুনেছি। তিনি (সালিম) বলেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও অনুরূপ করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن يحيى: هو الذهلي، وعثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي، ويونس بن يزيد: هو الأيلي، والزهري: هو محمد بن مسلم بن شهاب.وعلَّقه البخاري (1753) فقال: وقال محمد: حدثنا عثمان بن عمر … فذكره بهذا الإسناد.هكذا أهمل محمدًا شيخه، وقد اختُلف في تسميته، فقيل: هو محمد بن بشار، وقيل: محمد بن المثنى، وقيل: محمد بن يحيى الذهلي، ورواية الحاكم هذه ترجح أنه الذهلي، والله أعلم.وأخرجه أحمد 10/ (6404). وأخرجه النسائي (4075) عن العباس بن عبد العظيم العنبري، كلاهما (أحمد والعباس) عن عثمان بن عمر، به.وأخرجه البخاري (1751) و (1752)، وابن ماجه (3032)، وابن حبان (3887) من طريقين عن يونس بن يزيد، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1777)


1777 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن عبد الوهاب بن حَبِيب، حدثنا خالد بن مَخْلَد، حدثنا مالك بن أنس.وأخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا عبد الله بن مَسْلَمة، عن مالك، عن عبد الله بن أبي بكر.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن أبي البَدَّاح بن عَدِيٍّ، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخَّص للرِّعاء أن يَرمُوا يومًا ويَدَعُوا يومًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাখালদেরকে একদিন (জমরাতে) পাথর মারতে এবং একদিন (পাথর মারা) ছেড়ে দিতে অনুমতি দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، إلّا أنَّ المحفوظ في هذا الحديث لفظ رواية مالك التالية برقم (1779)، وهذا لفظ رواية سفيان - وهو ابن عيينة - فقد قال يحيى بن معين فيما نقله عنه المصنف (5883): وكان سفيان إذا حدثنا بهذا الحديث قال: ذهب عليَّ في هذا الحديث شيء. لذلك قال يحيى في حديث سفيان هذا: وهذا خطأ إنما هو كما قال مالك. قلنا: لكن تابع سفيان على هذا اللفظ روحُ بن القاسم كما في الرواية التالية، والله تعالى أعلم. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير بن عيسى، وعبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمد بن عمرو بن حزم، وصحابيه: هو عاصم بن عدي، كما ذكر المصنِّف بإثر الحديث الذي بعده.وأخرجه أحمد 39/ (23774)، وأبو داود (1976)، والترمذي (954)، والنسائي (460)، وابن حبان (3888) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. وقرن أبو داود بعبد الله بن أبي بكر أخاه محمدًا. وقال الترمذي: رواية مالك أصح.وأخرجه ابن ماجه (3036) عن ابن أبي شيبة، عن سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أخيه عبد الملك بن أبي بكر، عن أبي البداح، عن أبيه.وأخرجه بنحوه أحمد 39/ (23777) من طريق ابن جريج، عن محمد بن أبي بكر بن محمد بن عمرو، عن أبيه، عن أبي البداح، عن أبيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1778)


1778 - حدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم البُوشَنْجي، حدثنا أُميّة بن بِسْطامَ، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا رَوْح بن القاسم، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن أبي البَدّاح بن عَدِي، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رَخَّصَ للرِّعاءِ أن يَرمُوا الحِمارَ يومًا ويَدَعُوا يومًا [1].أبو البَدّاح: هو ابن عاصم بن عَدِيّ، وهو مشهور في التابعين، وعاصمُ بن عَدِيّ مشهور في الصحابة، وهو صاحب اللِّعان، فمَن قال: عن أبي البداح بن عدي، فإنه نسبه إلى جدِّه.وبصحة ما ذكرتُه:




আসিম ইবনে আদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাখালদেরকে (জমরাতে) একদিন কংকর নিক্ষেপ করার এবং একদিন না করার (বিরতি দেওয়ার) অনুমতি দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، إلّا أنَّ المحفوظ لفظ رواية مالك بن أنس الآتية بعده، كما سبق.وأخرجه ابن خزيمة (2978) من طريق إسماعيل ابن علية، عن روح بن القاسم، بهذا الإسناد. في تأخير رمي الجمار فيما نُرى - والله أعلم -: أنهم يرمون يوم النحر، فإذا مضى اليوم الذي يلي يوم النحر رموا من الغد، وذلك يوم النفر الأول، فيرمون لليوم الذي مضى، ثم يرمون ليومهم ذلك، لأنه لا يقضي أحد شيئًا حتى يجب عليه، فإذا وجب عليه ومضى كان القضاء بعد ذلك، فإذا بدا لهم النفر فقد فرغوا، وإن أقاموا إلى الغد رموا مع الناس يوم النفر الآخر ونفروا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1779)


1779 - حدَّثني أبو علي الحسن بن علي بن داود المصري بمكة، حدثنا أحمد بن محمد بن جَرير، حدثنا الحارث بن مِسْكين، حدثنا عبد الرحمن بن القاسم، حدثني مالك، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن أبيه، أنَّ ابنَ عاصم بن عَدِيٍّ أخبره عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رَخَّص لرِعاءِ الإبل في البَيتوتةِ يَرمُون يومَ النَّحر، ثم يَرمُون الغَدَ، أو من بعدِ الغَدِ ليومين، ثم يَرمُون يومَ النَّفْر [1].




আসিম ইবনে আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উট চারণকারীদের জন্য (মিনায় রাত্রি যাপন না করার) অনুমতি দিয়েছেন যে, তারা যেন কুরবানীর দিন (১০ যিলহজ্ব) কঙ্কর নিক্ষেপ করে, অতঃপর তারা যেন পরের দিন এবং তার পরের দিনের (১১ ও ১২ যিলহজ্বের) কঙ্করগুলো দুই দিনের জন্য (একত্রিত করে) নিক্ষেপ করে। এরপর তারা যেন নাফরের দিন (মক্কা প্রত্যাবর্তনের দিন) কঙ্কর নিক্ষেপ করে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن محمد بن جرير: هو أحمد بن محمد بن يحيى بن جرير، أبو علي الهمْداني المصري، ذكره الذهبي في "تاريخ الإسلام" وابن قطلوبغا في "الثقات ممن لم يقع في الكتب الستة" ونقل عن ابن يونس قوله: كان فهمًا ثقة.وأخرجه أحمد 39/ (23775)، وابن ماجه (3037)، والنسائي (4164) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، وأبو داود (1975) من طريق عبد الله بن مسلمة القعنبي وعبد الله بن وهب، والنسائي (4061) من طريق يحيى القطان، أربعتهم عن مالك بن أنس، بهذا الإسناد. وطريق القعنبي سبقت قريبًا، وطريق ابن وهب ستأتي برقم (5882).وأخرج أحمد 39/ (23776)، والترمذي (955)، وابن ماجه (3037) من طريق عبد الرزاق، عن مالك، به إلى عاصم بن عدي قال: أرخصَ رسول الله صلى الله عليه وسلم لرعاء الإبل في البيتوتة أن يرموا يوم النحر، ثم يجمعوا رمي يومين بعد النحر فيرمونه في أحدهما. قال مالك: ظننت أنه في الآخر منهما، ثم يرمون يوم النفر. قال الترمذي: حديث حسن صحيح، وهو أصح من حديث ابن عيينة عن عبد الله بن أبي بكر.قال مالك في "الموطأ" 1/ 409: تفسير الحديث الذي أرخص فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم لرعاء الإبل في تأخير رمي الجمار فيما نُرى - والله أعلم -: أنهم يرمون يوم النحر، فإذا مضى اليوم الذي يلي يوم النحر رموا من الغد، وذلك يوم النفر الأول، فيرمون لليوم الذي مضى، ثم يرمون ليومهم ذلك، لأنه لا يقضي أحد شيئًا حتى يجب عليه، فإذا وجب عليه ومضى كان القضاء بعد ذلك، فإذا بدا لهم النفر فقد فرغوا، وإن أقاموا إلى الغد رموا مع الناس يوم النفر الآخر ونفروا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1780)


1780 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا بشر بن موسى، حدثنا الحسن بن موسى الأشْيَب، حدثنا زهير، عن أبي إسحاق، عن عَوْن بن أبي جُحَيفة، عن أبيه قال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم صلَّى بالأبْطَحِ صلاةَ العصر ركعتَين [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি আবতাহ নামক স্থানে আসরের সালাত দুই রাকাত আদায় করেছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلَّا أنَّ المحفوظ فيه عن أبي إسحاق أنه من روايته عن أبي جحيفة بلا واسطة.وأخرجه أحمد 31/ (18753) عن الحسن بن موسى الأشيب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (18747) من طريق أبي بكر بن عياش، و (18752) من طريق يونس بن أبي إسحاق، و (18750) و (18755) من طريق إسرائيل بن يونس، ثلاثتهم عن أبي إسحاق، عن أبي جحيفة. لم يذكروا عون بن أبي جحيفة.وأخرجه أحمد (18743) و (18746) و (18749) و (18762)، والبخاري (376) و (495) و (3566) و (5786)، ومسلم (503)، وأبو داود (688)، والنسائي (4189)، وابن حبان (2382) و (4394) من طرق عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه.وأخرجه أحمد (18744) و (18757) و (18767)، والبخاري (187) و (501) و (3553)، ومسلم (503) (252)، والنسائي (341) من طريق الحكم بن عتيبة، عن أبي جحيفة.وفي الباب عن حارثة بن وهب عند مسلم (696).