আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1781 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى بن زيد بن عبد الجبار بن مالك التَّنُوخي بتِنِّيس، حدثنا عمرو بن أبي سَلَمة التِّنِّيسي، حدثنا زهير بن محمد المكي، عن موسى بن عُقْبة، عن سالم بن عبد الله: أنَّ عائشة كانت تقول: عجبًا للمَرْءِ المسلم إذ دَخَلَ الكعبة حتى يَرفَعَ بصَرَه قِبَلَ السقف، يَدَعُ ذلك إجلالًا لله وإعظامًا، دخل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الكعبةَ ما خلَّفَ بصَرُه موضعَ سُجودِه حتى خَرَجَ منها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: আমি বিস্মিত হই সেই মুসলিম ব্যক্তির জন্য, যে কা'বায় প্রবেশ করে ছাদের দিকে দৃষ্টি উত্তোলন করে। আল্লাহর প্রতি সম্মান ও মহত্ব প্রদর্শনের জন্য তার তা পরিহার করা উচিত। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কা'বায় প্রবেশ করেছিলেন, তখন বের হওয়ার আগ পর্যন্ত তাঁর দৃষ্টি সিজদার স্থান থেকে সরেনি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، فرواية عمرو بن أبي سلمة عن زهير بن محمد غير مستقيمة، قال أحمد بن حنبل: روى عن زهير أحاديث بواطيل، كأنه سمعها من صدقة بن عبد الله فغلط، فقلبها عن زهير. قلنا: ثم أنَّ الراوي عن عمرو بن أبي سلمة، وهو أحمد بن عيسى التنوخي، ضعيف، ولم يتابع. لذلك قال أبو حاتم في هذا الحديث كما في "العلل" لابنه (895): هو حديث منكر.وأخرجه البيهقي 5/ 158 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة (3012) عن أحمد بن عيسى التنوخي، به.
1782 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران بن خالد، حدثنا عبيد الله بن موسى، حدثنا إسماعيل بن عبد الملك، عن ابن أبي مُلَيكة، عن عائشة قالت: خَرَجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم من عندي وهو قَريرُ العين، طيِّبُ النفس، ثم رَجَعَ إليَّ وهو حزين، فقلتُ: يا رسولَ الله، خرجتَ من عندي وأنتَ كذا وكذا، قال: "إنِّي دخلتُ الكعبةَ ووَدِدْتُ أنِّي لم أكن فعلتُه، إني أخافُ أن أكونَ قد أتعبتُ أُمتي من بَعدي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট থেকে চোখ জুড়ানো ও প্রফুল্লচিত্ত অবস্থায় বের হলেন। অতঃপর তিনি যখন আমার নিকট ফিরে এলেন, তখন তিনি ছিলেন বিষণ্ণ। তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি তো আমার নিকট থেকে এমন এমন (প্রফুল্ল) অবস্থায় বের হয়েছিলেন। তিনি বললেন: "আমি কা'বায় প্রবেশ করেছিলাম, আর আমি চাইতাম যদি আমি তা না করতাম। আমি ভয় পাচ্ছি যে আমি হয়তো আমার পরে আমার উম্মতকে কষ্টের মধ্যে ফেলে দেব।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف إسماعيل بن عبد الملك: وهو ابن أبي الصُّفير الأسدي. ابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله.وأخرجه أحمد 41/ (25056)، وابن ماجه (3064)، والترمذي (873) من طريق وكيع، وأبو داود (2029) من طريق عبد الله بن داود، كلاهما عن إسماعيل بن عبد الملك، بهذا الإسناد.وروي بنحوه من وجه آخر لا يفرح به عن عائشة، أخرجه أحمد 42/ (25197) من طريق جابر بن يزيد الجعفي عن عرفجة عنها. وجابر الجعفي هذا لا يصلح في المتابعات، والله أعلم.
1783 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن بكر، حدثنا ابن جُرَيج قال: قلتُ لعطاء: أسمعتَ ابنَ عباس يقول: إنما أُمِرتم بالطواف ولم تُؤمَروا بدخوله؟ قال: لم يكن ينهانا عن دُخولِه، ولكن سمعتُه يقول: أخبَرَني أسامة بن زيد: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم دَخَلَ البيت، فلما خَرَجَ ركع ركعتين في قُبُل البيت، وقال: "هذه القِبلةُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا!
ইবনু জুরাইজ (রাহিমাহুল্লাহ) আত্বাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি ইবনু আব্বাসকে বলতে শুনেছেন যে, 'তোমাদেরকে কেবল তাওয়াফ করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, এর (কা‘বা ঘরের) ভেতরে প্রবেশ করার নির্দেশ দেওয়া হয়নি?' তিনি (আত্বা) বললেন: তিনি আমাদেরকে তাতে প্রবেশ করতে নিষেধ করেননি। তবে আমি তাঁকে (ইবনু আব্বাসকে) বলতে শুনেছি যে, উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন: নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা‘বা ঘরে প্রবেশ করেন। অতঃপর যখন তিনি বের হলেন, তখন কা‘বার সম্মুখে দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: "এটাই কিবলা।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. محمد بن بكر: هو البُرساني، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه مسلم (1330) من طريقين عن محمد بن بكر، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 36/ (21754) و (21809)، والبخاري (398)، والنسائي (3886) من طريق عبد الرزاق، وأحمد (21809) عن روح بن عبادة، وابن حبان (3208) من طريق الضحاك بن مخلد، ثلاثتهم عن ابن جريج، به.وأخرج النسائي في "الكبرى" (3878) من طريق عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي رواد، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، عن أسامة بن زيد قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم الكعبة، فسبّح في نواحيها وكبّر ولم يصلِّ، ثم خرج فصلى خلف المقام ركعتين، ثم قال: "هذه القبلة". كذا وقع هذا الإسناد في نسخنا الخطية من "الكبرى" بذكر ابن عباس بين عطاء وأسامة، ولم يرد ذكره في "المجتبى" (2909) ولا في "تحفة الأشراف" (110)، ونصَّ المزي على عدم وجودها في رواية عبد المجيد بن أبي رواد، والله أعلم.وأخرجه بنحوه مطولًا ومختصرًا أحمد (21822) و (21823) و (21830)، والنسائي (3883) و (3884) من طرق عن عبد الملك بن أبي سليمان العرزمي، عن عطاء، عن أسامة بن زيد، لم يذكر ابن عباس.
1784 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا جَرير بن حازمٍ قال: سمعتُ يزيد بن رُومانَ يحدِّث عن عبد الله بن الزُبير قال: قالت عائشة: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا عائشةُ، لولا أنَّ قومَكِ حديثُ عهدٍ بجاهليةٍ، لهَدَمْتُ البيت حتَّى أُدخِل فيه ما أَخرَجوا منه في الحِجْر، فإنهم عَجَزوا عن نفقتِه، وجعلتُ لها بابَين: بابًا شرقيًّا، وبابًا غربيًّا، وألصَقْتُه بالأرض، ولَوَضعتُه على أساسِ إبراهيم". قال: فكان الذي دعا ابنَ الزُّبير على هَدْمِه وبنائِه.قال يزيد بن رُومان: فشهدتُ ابنَ الزُّبير حين هَدَمَه، فاستخرَجَ أساسَ البيت كأسْنِمة البُخْت متلاحكةً [1]، قال جَرير: فقلتُ ليزيدَ بن رُومان - فأنا يومئذٍ أطوفُ معه -: أَرِني ما أَخرَجوا من الحِجْر منه، قال: أُرِيكَه الآن، فلما انتهى إليه قال: هذا الموضعُ.قال أبي [2]: فحَزَرتُه نحوًا من ستة أذرُع [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, “হে আয়িশা! যদি তোমার কওম (লোকেরা) জাহিলিয়াতের যুগ থেকে (ইসলামে) নতুন না হতো, তবে আমি কা‘বাকে ভেঙ্গে ফেলতাম যাতে আমি এর মধ্যে হিজর (হাতিম)-এর সেই অংশটি প্রবেশ করিয়ে দিতে পারতাম, যা তারা (কুরাইশরা নির্মাণকালে) বাদ দিয়েছিল। কারণ তারা (অর্থের) স্বল্পতার কারণে সেটা করতে পারেনি। আমি এর দুটি দরজা তৈরি করতাম: একটি পূর্ব দিকে এবং অন্যটি পশ্চিম দিকে। এবং আমি এটিকে (ভিত্তি পর্যন্ত) মাটির সাথে মিশিয়ে দিতাম এবং ইবরাহীমের ভিত্তির উপর স্থাপন করতাম।” বর্ণনাকারী বলেন, এটিই ছিল ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কা‘বা ঘর ভেঙে আবার নির্মাণ করতে উৎসাহিত করার কারণ। ইয়াযীদ ইবনু রুমান বলেন: আমি ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কা‘বা ঘর ভাঙার সময় দেখেছি। তিনি বাইতুল্লাহর মূল ভিত্তি বের করেছিলেন, যা ছিল জমাটবদ্ধ উটের পিঠের কুঁজের মতো। জারীর (বর্ণনাকারী) বলেন: আমি ইয়াযীদ ইবনু রুমানকে বললাম—আমি তখন তাঁর সাথে তাওয়াফ করছিলাম—যে অংশটিকে তারা হিজর (হাতিম) থেকে বাদ দিয়েছিল, সেটি আমাকে দেখান। তিনি বললেন, “আমি তোমাকে এখনই দেখাচ্ছি।” যখন তিনি সেই স্থানে পৌঁছালেন, তখন বললেন, “এই সেই স্থান।” (একজন বর্ণনাকারী) বলেন, আমি সেটিকে প্রায় ছয় হাত অনুমান করেছিলাম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] المتلاحكة: هي المتلائمة والمتداخلة، كما في "لسان العرب" مادة (لحك).
[2] القائل "قال أبي": هو وهب بن جرير، فقد روى هذا الحديث عن أبيه كما عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (551)، وابن خزيمة في "صحيحه" (3020)، وابن حبان (3816)، فالذي يظهر أنه دخل على المصنف لفظ حديث يزيد بن هارون بحديث وهب بن جرير، والله أعلم.
1784 [3] - إسناده صحيح.وأخرجه ابن حبان (3816) من طريق وهب بن جرير، عن جرير بن حازم، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه مطولًا ومختصرًا أحمد 42/ (25463) و (25466)، ومسلم (1333) (401)، وابن حبان (3818) من طريق سعيد بن ميناء، والنسائي (3879) من طريق عطاء، كلاهما عن ابن الزبير، به.وخالف الحارثَ بنَ أبي أسامة جمعٌ، فرووه عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد، لكنهم جعلوه من طريق عروة بن الزبير عن عائشة، بدلًا من عبد الله، فقد أخرجه أحمد 43/ (26029)، وأخرجه البخاري (1586) عن بيان بن عمرو، والنسائي (3872) عن عبد الرحمن بن محمد الطرسوسي، ثلاثتهم (أحمد وبيان وعبد الرحمن) عن يزيد بن هارون، عن جرير، عن يزيد بن رومان، عن عروة بن الزبير، عن عائشة.وذكر ابن خزيمة (3021)، والبيهقي 5/ 90 أنَّ يزيد بن رومان ربما سمع الخبر من عبد الله وعروة جميعًا. والذي ذهب إليه ابن حجر في "الفتح" 5/ 368 أنَّ رواية الجماعة أوضح، فهي أصح. وصحَّح الدارقطني في "العلل" 15/ 6 (3802) رواية من قال: عبد الله بن الزبير.وأخرجه أحمد 40/ (24297)، والبخاري (1585)، ومسلم (1333) (398)، والنسائي (3871) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة.وروي الحديث من غير وجه عن عائشة، انظر تخريجنا لـ "مسند أحمد" (24297).
1785 - أخبرنا أبو يحيى أحمد بن محمد السَّمَرقَنْدي، حدثنا أبو عبد الله محمد بن نصر، حدثنا يحيى بن يحيى وعليُّ بن خَشْرَم، قالا: حدثنا عيسى بن يونس، عن ابن جُريج، أخبَرَني موسى بن عُقْبة، عن نافع، أنَّ ابن عمر أخبره: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم حَلَقَ رأسه في حَجَّة الوداع.قال: فكان الناسُ يَحلِقُون في الحجِّ، ثم يَعتَمِرون عند النَّفْر ويقول: بما يُحلَق هذا؟ فنقول: أَمرِرِ المُوسَى على رأسك [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে তাঁর মাথা মুণ্ডন করেছিলেন। তিনি (ইবন উমর) বলেন: লোকজন হজ্জে তাদের মাথা মুণ্ডন করত, এরপর (মক্কা থেকে) প্রস্থানের পর উমরাহ করত। আর তিনি (ইবন উমর) বলতেন: এটি কী দিয়ে মুণ্ডন করা হবে? তখন আমরা বলতাম: আপনার মাথার ওপর ক্ষুর চালিয়ে দিন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن يحيى: هو النيسابوري، وابن جريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أحمد 9/ (5614)، والبخاري (4411) من طريق محمد بن بكر، عن ابن جريج، به. دون قوله: فكان الناس يحلقون في الحج … إلى آخره، والقائل لذلك هو ابن جريج، تفرد به عيسى بن يونس عنه.وأخرجه بنحوه - بدون هذه الزيادة - البخاري (4410) من طريق أبي ضمرة، ومسلم (1304)، وأبو داود (1980) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن الإسكندراني، ومسلم (1304) من طريق حاتم بن إسماعيل، ثلاثتهم عن موسى بن عقبة، به.وأخرجه أحمد 8/ (4890)، والبخاري (1726) و (1729)، والترمذي (913)، والنسائي (4099) من طرق عن نافع، به.وأخرجه أحمد (4889) و (5623)، والنسائي (4100) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه. (3729) من طرق عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأوردوه جميعًا بأطول مما هنا ضمن قصة عائشة وحيضها في الحج. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 22/ (14322)، ومسلم (1213)، والنسائي (4217) من طريقين عن أبي الزبير، به.وأخرجه النسائي (4217) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن جابر.وفي الباب عن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق سيأتي برقم (6130).
1786 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا ابن بُكَير، حدثني الليث، أنَّ أبا الزُّبير أخبره عن جابر بن عبد الله: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أعمَرَ عائشةَ من التَّنعيم في ذي الحِجّة ليلةَ الحَصْبة [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসবাহের রাতে যুল-হিজ্জাহ মাসে তানঈম থেকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উমরাহ করিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، وابن بكير: هو يحيى بن عبد الله بن بكير، والليث: هو ابن سعد، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تَدرُس.وأخرجه أحمد 23/ (15244)، ومسلم (1213) (136)، وأبو داود (1785)، والنسائي (3729) من طرق عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. وأوردوه جميعًا بأطول مما هنا ضمن قصة عائشة وحيضها في الحج. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 22/ (14322)، ومسلم (1213)، والنسائي (4217) من طريقين عن أبي الزبير، به.وأخرجه النسائي (4217) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن جابر.وفي الباب عن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق سيأتي برقم (6130).
1787 - أخبرني إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العدل، حدثنا السَّرِيُّ بن خُزيمة، حدثنا عثمان بن الهيثم، حدثنا عوف بن أبي جَمِيلة، عن محمد بن سِيرِين، عن أبي هريرة: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أتاه رجلٌ فقال: إنَّ أبي شيخٌ كبيرٌ أدرك الإسلام ولم يَحُجَّ، ولا يَستَمسِكُ على الراحلة، وإن شَدَدتُه بالحبل على الراحلة خَشِيتُ أن أقتله، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "احجُجْ عن أبيك" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه الألفاظ.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এক ব্যক্তি এসে বলল: আমার পিতা অতিশয় বৃদ্ধ, যিনি ইসলাম লাভ করেছেন কিন্তু হজ করেননি। তিনি সওয়ারীর উপর স্থির থাকতে পারেন না। আর যদি আমি তাকে রশি দিয়ে সওয়ারীর উপর বেঁধে দেই, তবে আমি আশঙ্কা করি যে আমি তাকে হত্যা করে ফেলব। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার পিতার পক্ষ থেকে তুমি হজ করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح لكن من حديث ابن عباس كما سيأتي، وقد وهمَ عثمان بن الهيثم فيه - وهو ليس بالحافظ - فرواه على هذا الوجه من حديث أبي هريرة، وتابعه يحيى بن أبي الحجاج عن عوف بن أبي جميلة عند ابن خزيمة في "صحيحه" (3038) وابن عدي في "الكامل" 7/ 221، ويحيى هذا ليّن الحديث وقد اضطرب فيه، فرواه عندهما مرة أخرى عن عوف عن الحسن البصري مرسلًا، فسقط الاحتجاج بروايته.وذكر الدارقطني في "العلل" 10/ 44 (1844) أنَّ الأشبه بالصواب هو رواية هشام بن حسان عن ابن سيرين عن يحيى بن أبي إسحاق عن سليمان بن يسار عن ابن عباس. وهذه الرواية أخرجها النسائي (3609) و (5914) إلا أنه سمّى ابنَ عباس الفضلَ وليس عبدَ الله، وسليمان بن يسار لم يسمع من الفضل، والصواب أن بينهما عبد الله بن عباس كما وقع في رواية الزهري عن سليمان عند أحمد 3/ (1818) و (1822) والبخاري (1853) ومسلم (1335) وغيرهم.واسم الرجل السائل هو حصين بن عوف الخثعمي كما قرر ذلك الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 6/ 184 بناءً على ما تحصل عنده من مجموع روايات الحديث، وذكر أنَّ قصة الخثعمي هذا غير قصة أبي رَزِين - الآتية بعد هذا الحديث - وقال: وهذه قصة أخرى، ومن وحّد بينها وبين حديث الخثعمي، فقد أبعَدَ وتكلّف.
1788 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة.وأخبرنا أبو عمرو محمد بن جعفر العَدْل، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن صُدْران، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا شعبة، سمعتُ النعمان بن سالم يقول: سمعتُ عمرَو بن أَوس يحدِّث عن أبي رَزِين أنه قال: يا رسولَ الله، إنَّ أبي شيخٌ كبير لا يستطيع الحَجَّ والعُمرة ولا الظَّعَن، قال: "حُجَّ عن أبيكَ واعتَمِر" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ রাযীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমার পিতা অতিশয় বৃদ্ধ, তিনি হজ, উমরাহ এবং সফরও করতে সক্ষম নন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ ও উমরাহ করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، عبد الرحمن بن الحسن القاضي شيخ المصنف - وإن كان فيه ضعف - متابع عند المصنف وغيره. إبراهيم بن الحسين: هو ابن دِيزيل، وأبو رَزِين: اسمه لقيط بن صَبِرة، ويقال: لقيط بن عامر.وأخرجه النسائي (3587) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، عن خالد بن الحارث، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 26/ (16184) و (16185) و (16190) و (16199) و (16203)، وأبو داود (1810)، وابن ماجه (2906)، والترمذي (930) والنسائي (3603)، وابن حبان (3991) من طرق عن شعبة، به. "المحرر" (663)، وهو مقتضى كلام ابن دقيق العيد في "الإلمام" 1/ 367، واستغرب رفعه الخطيب البغدادي، وعلته تفرد محمد بن المنهال عن يزيد بن زريع عن شعبة في رفعه، ووقَفه سائر أصحاب شعبة عنه، ورواه غير واحد غير شعبة عن الأعمش فوقفوه، كما وقفه غير واحد ممن رواه عن ابن عباس. أما متابعة عفان - وهو ابن مسلم الصفار - وأبي الوليد - وهو الطيالسي - ومحمد بن كثير فقد أجاب عنها البيهقي في "الخلافيات" كما في "مختصره" 3/ 224 فقال: وأظنُّ أنَّ شيخنا - يعني الحاكم - حمل حديث عفان وغيره على حديث يزيد، فهذا الحديث إنما رواه أصحاب شعبة عنه موقوفًا، سوى ابن زريع، فإنَّ محمد بن المنهال ينفرد برفعه عنه، والله أعلم.قلنا: وأما متابعة الحارث بن سريج الخوارزمي لمحمد بن منهال في روايته لهذا الحديث عن يزيد بن زريع مرفوعًا، فيما أخرجه أبو بكر الإسماعيلي في "حديث سليمان الأعمش" كما في "نصب الراية" للزيلعي 3/ 6 - 7 نقلًا عن "الإمام" لابن دقيق العيد، وفيما أخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 196 - 197، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 101 من طريق الحارث بن سريج هذا عن يزيد بن زريع، بهذا الإسناد مرفوعًا، فهذه المتابعة لا تقوي رواية محمد بن المنهال، لأنَّ ابن عدي أورد رواية الحارث وأعلها به، فقال: وهذا الحديث معروف بمحمد بن المنهال الضرير عن يزيد بن زريع، وأظن أنَّ الحارث بن سريج هذا سرقه منه، وهذا الحديث لا أعلم يرويه عن يزيد بن زريع غيرهما، ورواه ابن أبي عدي وجماعة معه عن شعبة موقوفًا.أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وأبو ظبيان هو حصين بن جندب الجنبي.وأخرجه ابن خزيمة (3050)، والطبراني في "الأوسط" (2731)، وأحمد بن جعفر القطيعي في "جزء الألف دينار" (145) - ومن طريقه الضياء في "المختارة" 9/ (537) - والبيهقي في "الكبرى" 4/ 325 و 5/ 179، وفي "الصغرى" (1479)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 101 من طرق عن محمد بن المنهال، بهذا الإسناد. زاد بعضهم: "وأيما عبدٍ حجَّ ثم عتق فعليه أن يحج حجة أخرى". قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعبة مرفوعًا إلّا يزيد، تفرد به محمد بن المنهال. وقال البيهقي: كذا رواه يزيد بن زريع عن شعبة مرفوعًا، ورواه غيره عن شعبة موقوفًا، والموقوف أصح. وقال الخطيب: لم يرفعه إلّا يزيد بن زريع عن شعبة، وهو غريب.وأخرجه ابن خزيمة بإثر الحديث (3050) من طريق أبي عدي، والبيهقي 4/ 325 من طريق عبد الوهاب بن عطاء، كلاهما عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عن ابن عباس موقوفًا.قال ابن خزيمة بإثره: هذا علمي هو الصحيح بلا شك.وأخرج ابن أبي شيبة (15105 - عوامة) عن أبي معاوية، عن الأعمش. عن أبي ظبيان، عن ابن عباس قال: احفظوا عني - ولا تقولوا: قال ابن عباس - أيما عبد حج به أهله ثم أعتق … الحديث. قال ابن عبد الهادي في "المحرر" (663): هذا شبه المرفوع.قلنا: لكن خالف أبا معاوية سفيانُ الثوري فرواه عن الأعمش عن أبي ظبيان عن ابن عباس موقوفًا، فيما قال البيهقي في "السنن الصغرى" (1479)، وفي "الكبرى" 5/ 179، ثم قال: هو الصواب. قلنا: ورواية الثوري هذه لم نقف عليها عند غيره.وقد روي من غير وجه عن ابن عباس موقوفًا أيضًا، فقد أخرجه سعيد بن أبي عروبة في "المناسك" (11) عن قتادة، والشافعي في "الأم" 3/ 275 - 276 و 451 - 452، والطحاوي 2/ 257، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 156 و 178 وفي "المعرفة" (10263) من طريق أبي السفر الهمداني، والطحاوي 2/ 257 من طريق يونس بن عبيد، ثلاثتهم عن ابن عباس موقوفًا.ورجَّح صحة رفعه الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 2/ 220 برواية ابن أبي شيبة السالف ذكرها، واعتبر بعضهم أنَّ رفع محمد بن منهال له - وهو ثقة حافظ - إنما هو زيادة ثقة، وهي مقبولة، والله تعالى أعلم.
1789 - حدثنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا عفّان، حدثنا شعبة.وأخبرنا إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّي، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا أبو الوليد ومحمد بن كثير، قالا: حدثنا شعبة.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا أبو المثنَّى، حدثنا محمد بن المِنهال، حدثنا يزيد بن زُرَيع، حدثنا شعبة، عن الأعمش، عن أبي ظَبْيان، عن ابن عباسٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا حَجَّ الصبيُّ فهي له حَجَّةٌ حتَّى يَعقِل، وإذا عَقَلَ فعليه حَجَّةٌ أُخرى، وإذا حَجَّ الأعرابيُّ فهي له حَجَّةٌ، فإذا هاجَرَ فعليه حَجَّةٌ أُخرى" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি কোনো শিশু হজ্জ করে, তবে তার জ্ঞান বুদ্ধি হওয়া পর্যন্ত সেটা তার জন্য হজ্জ হিসেবে গণ্য হবে। যখন সে জ্ঞান-বুদ্ধি সম্পন্ন হবে, তখন তার উপর অন্য একটি হজ্জ (ফরয) হবে। আর যদি কোনো বেদুইন (আরব যাযাবর) হজ্জ করে, তবে তা তার জন্য হজ্জ হিসেবে গণ্য হবে। আর যখন সে হিজরত করে (শহরের কাছাকাছি) বসবাস করবে, তখন তার উপর অন্য একটি হজ্জ (ফরয) হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، فقد صحَّح وقفه ابن خزيمة وابن عدي والبيهقي وابن عبد الهادي في "المحرر" (663)، وهو مقتضى كلام ابن دقيق العيد في "الإلمام" 1/ 367، واستغرب رفعه الخطيب البغدادي، وعلته تفرد محمد بن المنهال عن يزيد بن زريع عن شعبة في رفعه، ووقَفه سائر أصحاب شعبة عنه، ورواه غير واحد غير شعبة عن الأعمش فوقفوه، كما وقفه غير واحد ممن رواه عن ابن عباس. أما متابعة عفان - وهو ابن مسلم الصفار - وأبي الوليد - وهو الطيالسي - ومحمد بن كثير فقد أجاب عنها البيهقي في "الخلافيات" كما في "مختصره" 3/ 224 فقال: وأظنُّ أنَّ شيخنا - يعني الحاكم - حمل حديث عفان وغيره على حديث يزيد، فهذا الحديث إنما رواه أصحاب شعبة عنه موقوفًا، سوى ابن زريع، فإنَّ محمد بن المنهال ينفرد برفعه عنه، والله أعلم.قلنا: وأما متابعة الحارث بن سريج الخوارزمي لمحمد بن منهال في روايته لهذا الحديث عن يزيد بن زريع مرفوعًا، فيما أخرجه أبو بكر الإسماعيلي في "حديث سليمان الأعمش" كما في "نصب الراية" للزيلعي 3/ 6 - 7 نقلًا عن "الإمام" لابن دقيق العيد، وفيما أخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 196 - 197، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 101 من طريق الحارث بن سريج هذا عن يزيد بن زريع، بهذا الإسناد مرفوعًا، فهذه المتابعة لا تقوي رواية محمد بن المنهال، لأنَّ ابن عدي أورد رواية الحارث وأعلها به، فقال: وهذا الحديث معروف بمحمد بن المنهال الضرير عن يزيد بن زريع، وأظن أنَّ الحارث بن سريج هذا سرقه منه، وهذا الحديث لا أعلم يرويه عن يزيد بن زريع غيرهما، ورواه ابن أبي عدي وجماعة معه عن شعبة موقوفًا.أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وأبو ظبيان هو حصين بن جندب الجنبي.وأخرجه ابن خزيمة (3050)، والطبراني في "الأوسط" (2731)، وأحمد بن جعفر القطيعي في "جزء الألف دينار" (145) - ومن طريقه الضياء في "المختارة" 9/ (537) - والبيهقي في "الكبرى" 4/ 325 و 5/ 179، وفي "الصغرى" (1479)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 101 من طرق عن محمد بن المنهال، بهذا الإسناد. زاد بعضهم: "وأيما عبدٍ حجَّ ثم عتق فعليه أن يحج حجة أخرى". قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن شعبة مرفوعًا إلّا يزيد، تفرد به محمد بن المنهال. وقال البيهقي: كذا رواه يزيد بن زريع عن شعبة مرفوعًا، ورواه غيره عن شعبة موقوفًا، والموقوف أصح. وقال الخطيب: لم يرفعه إلّا يزيد بن زريع عن شعبة، وهو غريب.وأخرجه ابن خزيمة بإثر الحديث (3050) من طريق أبي عدي، والبيهقي 4/ 325 من طريق عبد الوهاب بن عطاء، كلاهما عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عن ابن عباس موقوفًا.قال ابن خزيمة بإثره: هذا علمي هو الصحيح بلا شك.وأخرج ابن أبي شيبة (15105 - عوامة) عن أبي معاوية، عن الأعمش. عن أبي ظبيان، عن ابن عباس قال: احفظوا عني - ولا تقولوا: قال ابن عباس - أيما عبد حج به أهله ثم أعتق … الحديث. قال ابن عبد الهادي في "المحرر" (663): هذا شبه المرفوع.قلنا: لكن خالف أبا معاوية سفيانُ الثوري فرواه عن الأعمش عن أبي ظبيان عن ابن عباس موقوفًا، فيما قال البيهقي في "السنن الصغرى" (1479)، وفي "الكبرى" 5/ 179، ثم قال: هو الصواب. قلنا: ورواية الثوري هذه لم نقف عليها عند غيره.وقد روي من غير وجه عن ابن عباس موقوفًا أيضًا، فقد أخرجه سعيد بن أبي عروبة في "المناسك" (11) عن قتادة، والشافعي في "الأم" 3/ 275 - 276 و 451 - 452، والطحاوي 2/ 257، والبيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 156 و 178 وفي "المعرفة" (10263) من طريق أبي السفر الهمداني، والطحاوي 2/ 257 من طريق يونس بن عبيد، ثلاثتهم عن ابن عباس موقوفًا.ورجَّح صحة رفعه الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 2/ 220 برواية ابن أبي شيبة السالف ذكرها، واعتبر بعضهم أنَّ رفع محمد بن منهال له - وهو ثقة حافظ - إنما هو زيادة ثقة، وهي مقبولة، والله تعالى أعلم.
1790 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة، حدثنا علي بن المبارك الصَّنعاني، حدثنا زيد بن المبارك الصَّنعاني، حدثنا مَعْمَر بن راشد الصَّنعاني، عن عبد الكريم الجَزَري، عن سعيد بن جُبَير قال: أتى رجلٌ ابنَ عباس فقال: إني آجَرْتُ نفسي من قوم، فتركتُ لهم بعض أجري ليُخَلُّوا بيني وبين المناسك، فهل يُجزئ ذلك عنِّي؟ فقال ابن عباس: هذا من الذين قال الله عز وجل: {أُولَئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِمَّا كَسَبُوا وَاللَّهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ} [البقرة: 202] [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন, জনৈক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বললেন: "আমি একটি গোত্রের কাছে নিজেকে ভাড়া (শ্রম) দিয়েছিলাম। কিন্তু তারা যেন আমাকে ইবাদত পালনে সুযোগ দেয়, এই শর্তে আমি আমার পারিশ্রমিকের কিছু অংশ তাদের জন্য ছেড়ে দিয়েছি। এটা কি আমার জন্য যথেষ্ট হবে (বা আমার আমল কবুল হবে)?" ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "সে তাদেরই অন্তর্ভুক্ত যাদের সম্পর্কে আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন: {أُولَئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِمَّا كَسَبُوا وَاللَّهُ سَرِيعُ الْحِسَابِ} (অর্থাৎ: ‘তাদের কৃতকর্মের ফল রয়েছে এবং আল্লাহ দ্রুত হিসাব গ্রহণকারী।’ [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২০২])।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل زيد بن المبارك وعلي بن المبارك الصنعانيين، وقد توبعا. عبد الكريم الجزري: هو ابن مالك.وأخرجه عبد الرزاق في "التفسير" 1/ 80، ومن طريقه ابن خزيمة (3053) عن معمر بن راشد، بهذا الإسناد.وأخرجه مسدد كما في "المطالب العالية" (1149)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 333، وفي "معرفة السنن والآثار" (9173) و (9174) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس.وسيأتي الحديث من طريق مسلم البطين عن سعيد بن جبير عن ابن عباس برقم (3136).
1791 - أخبرنا حمزة بن العباس العَقَبي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا أبو بكر الحَنَفي، حدثنا ابن أبي ذِئب، عن عطاء، عن عُبيد بن عُمير، عن ابن عباس: أنَّ الناس كانوا في أوّل الحج يتبايعون بمِنًى وعَرَفةَ وسوق ذي المَجَاز ومواسم الحج، فخافوا البيعَ وهم حُرُم، فأنزل الله عز وجل: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} [البقرة: 198] في مَوَاسم الحَجّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শুরুর দিকে হজ্জের সময় লোকেরা মিনা, আরাফাহ, যুল-মাজায বাজার এবং হজ্জের অন্যান্য মৌসুমে বেচাকেনা করত। অতঃপর তারা ইহরাম অবস্থায় বেচাকেনা করতে ভয় পেল। তখন মহান আল্লাহ তা‘আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "তোমাদের প্রতিপালকের অনুগ্রহ সন্ধান করায় তোমাদের কোনো পাপ নেই।" (সূরাহ বাক্বারাহ: ১৯৮) - এটা হজ্জের মৌসুম সম্পর্কে নাযিল হয়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو بكر الحنفي: هو عبد الكبير بن عبد المجيد، وابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة، وعطاء: هو ابن أبي رباح. وانظر ما سلف برقم (1666).
1792 - أخبرنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثنا محمد بن إسحاق.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا عبد الله بن الحسن الحَرّاني، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا محمد بن سَلَمة، عن ابن إسحاق، حدثنا عبد الله بن أبي بَكْر بن محمد بن عمرو بن حَزْم الأنصاري، عن عثمان بن أبي سليمان بن جُبَير بن مُطْعِم، عن عمِّه نافع بن جُبَير، عن أبيه جُبَير بن مُطْعِم قال: لقد رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قبلَ أن يُنزَل عليه، وإنَّه لَوَاقفٌ على بعيرٍ له بعرفاتٍ مع الناس يَدْفَعُ معهم منها، وما ذاكَ إلَّا توفيقٌ من الله عز وجل له [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
জুবায়র ইবনে মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নবুওয়াত নাযিল হওয়ার পূর্বে আরাফাতের ময়দানে লোকেদের সাথে তাঁর উটের উপর দাঁড়িয়ে থাকতে দেখেছি এবং তিনি তাদের সাথে (আরাফাত) ত্যাগ করছিলেন। আর এটি মহামহিম আল্লাহর পক্ষ থেকে তাঁর জন্য একটি বিশেষ তাওফীক (পথনির্দেশ) ছাড়া আর কিছুই ছিল না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق. محمد بن سلمة: هو الباهلي الحراني.وأخرجه أحمد 27/ (16757) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، عن ابن إسحاق، بهذا الإسناد.وسلف بنحوه برقم (1722)، وانظر ما بعده.
1793 - أخبرني أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن بَكْر [1]، أخبرنا ابن جُرَيح، أخبرني أبي، عن جُبَير بن مُطْعَم قال: أضلَلْتُ جَمَلًا لي يومَ عرفة، فانطلقتُ إلى عرفةَ أبتغيه، فإذا أنا بمحمدٍ صلى الله عليه وسلم واقفٌ مع الناس بعَرفةَ على بعيرِهِ عشيَّةَ عرفة، وذلك بعدما أُنزِلَ عليه [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما اتَّفقا على حديث ابن عُيينة عن عمرو بن دينار عن محمد بن جُبير عن أبيه، الحديث في ذكر الحُمْس [3]، وأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقفُ بعرفة بثَنِيّة مكة.
জুবাইর ইবনে মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আরাফার দিনে আমার একটি উট হারিয়ে গিয়েছিল। আমি সেটির সন্ধানে আরাফার দিকে গেলাম। হঠাৎ আমি দেখলাম, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফার সন্ধ্যায় তাঁর উটের ওপর আরোহণ করে মানুষের সাথে আরাফাতে দাঁড়িয়ে আছেন। আর এটা ছিল তাঁর ওপর (ঐশীবাণী) অবতীর্ণ হওয়ার পরে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في (ص) و (ب) و (ع) إلى: محمد بن بكير، وفي المطبوع إلى: محمد بن زكريا بن بكير، والمثبت من (ز) وهو الصواب، فهو محمد بن بكر البرساني.
[2] إسناده ضعيف لضعف عبد العزيز بن جريج والد ابن جريج: وهو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه ابن خزيمة (3059) عن محمد بن معمر، عن محمد بن بكر، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 27/ (16776) عن محمد بن بكر قال أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني عن جبير بن مطعم … فذكره، كذا بإسقاط أبيه.قوله: "بعدما أُنزل عليه"، يعارضه الحديث السالف قبله بإسناد حسن وفيه: قبل أن يُنزَل عليه.وقد روي الحديث في "الصحيحين" وغيرهما بغير هذه السياقة كما أشار المصنف بإثر هذا الحديث، فقد أخرج أحمد 27/ (16737)، والبخاري (1664)، ومسلم (1220)، والنسائي (3995)، وابن حبان (3849) من طريق محمد بن جبير بن مطعم عن أبيه قال: أضللت بعيرًا لي، فذهبت أطلبه يوم عرفة، فرأيت النبي صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفة، فقلت: هذا والله من الحُمْس، فما شأنه ها هنا؟ لفظ البخاري.
1793 [3] - تحرف في النسخ الخطية إلى: الجرس، وصوابه: الحُمْس، كما جاء في الرواية، والحُمس: هم قريش، فقد كانت قريش تقف بمزدلفة، وسائر العرب يقفون بعرفة، وكان صلى الله عليه وسلم بتأييد الله تعالى إياه موفقًا للصواب، فوقف بعرفة.
1794 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا شعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن إبراهيم بن مُهاجر، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، قال: أَرسَل مروانُ إلى أم مَعْقِل يسألها عن هذا الحديث، فحدَّثَتْ أنَّ زوجها جعل بَكْرًا في سبيل الله، وأنها أرادت العُمرةَ فسألتْ زوجَها البَكْرَ، فأَبى عليها، فأتت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فذَكَرَت ذلك له، فأمره النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يُعطيَها، وقال: "إنَّ الحج والعُمرة لَمِنْ سبيل الله، وإِنَّ عُمرةً في رمضان تَعدِلُ حَجَّةً" أو "تُجزِئُ بحَجَّةٍ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উম্মু মা'কিল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ান (ইবনুল হাকাম) এই হাদীসটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করার জন্য তাঁর কাছে লোক পাঠিয়েছিলেন। তখন তিনি বর্ণনা করেন যে, তাঁর স্বামী একটি উট আল্লাহর রাস্তায় (দানের জন্য) নির্ধারণ করেছিলেন। আর তিনি (উম্মু মা'কিল) উমরাহ করার ইচ্ছা করলেন এবং তাঁর স্বামীর কাছে সেই উটটি চাইলেন। কিন্তু তাঁর স্বামী তাঁকে দিতে অস্বীকার করলেন। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে বিষয়টি জানালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্বামীকে তাঁকে (উটটি) দিয়ে দিতে নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই হজ ও উমরাহ আল্লাহর রাস্তার (ইবাদতের) অন্তর্ভুক্ত। আর রমজান মাসে একটি উমরাহ একটি হজের সমতুল্য," অথবা (তিনি বললেন,) "একটি হজের সওয়াব আদায় করে দেয়।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف إبراهيم بن مهاجر، ولم يتابع على هذا السياق، وقد اختلف عليه في هذا الإسناد، ورواه غيره واختلف فيه اختلافًا كبيرًا، فضعف بسبب اضطرابه، وقد فصلنا القول في ذلك في تعليقنا على "مسند أحمد" 45/ (27106)، وانظر "علل الدارقطني" (3179).وهو في "مسند أحمد" (27286)، وقرن هناك بمحمد بن جعفرٍ الحجاجَ بن محمد المصيصي الأعور.وأخرجه أحمد (27107)، وأبو داود (1988) من طريق أبي عوانة، عن إبراهيم بن مهاجر، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، أخبرني رسول مروان الذي أرسل إلى أم معقل قال: قالت … فذكره.وأخرجه أحمد (27287) من طريق محمد بن أبي إسماعيل، عن إبراهيم بن مهاجر، عن أبي بكر بن عبد الله، عن معقل بن أم معقل: أنَّ أمه أتت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت … فذكر معناه.
1795 - أخبرنا علي بن حَمْشاذ العدلُ، حدثنا هشام بن علي، حدثنا أبو النُّعمان عارِمٌ، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، حدثني الحجاج بن أبي عثمان، حدثني يحيى بن أبي كثير، أنَّ عِكْرِمة مولى ابن عباس حدثه، قال: حدثني الحجّاج بن عمرو الأنصاري، أنه سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كُسِرَ أو عَرَجَ فقد حلَّ، وعليه حَجّةٌ أخرى". قال: فحدثتُ ابن عباس وأبا هريرةَ فقالا: صَدَق [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وقيل: عن عكرمة، عن عبد الله بن رافع مولى أم سلمة، عن الحجاج بن عمرو:
হাজ্জাজ ইবনে আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: “যে ব্যক্তি (ইহরাম অবস্থায়) আঘাতপ্রাপ্ত হয় বা ল্যাংড়া হয়ে যায়, সে (ইহরাম থেকে) মুক্ত হয়ে যাবে। তবে তার উপর (পরবর্তী বছর) আরেকটি হজ্জ আদায় করা বাধ্যতামূলক হবে।”
তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, আমি এই হাদিসটি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট বর্ণনা করলে তাঁরা উভয়েই বললেন: সে সত্য বলেছে।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو النعمان: هو محمد بن الفضل السدوسي، وعارم لقبه. وسلف برقم (1743).
1796 - أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن يحيى بن أبي كَثير، عن عِكْرمة، عن عبد الله بن رافع مولى أم سلمة، قال: سألتُ الحجاج بن عمرو الأنصاري عن حَبْسِ المسلم، فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كُسِرَ أو عَرَجَ فقد حلَّ، وعليه الحجُّ من قابلٍ". قال عكرمة: فحدثتُ ابن عباس وأبا هريرةَ، فقالا: صَدَقَ الحجّاج [1].
আল-হাজ্জাজ ইবন আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবন রাফি‘ মাওলা উম্মু সালামা বলেন, আমি আল-হাজ্জাজ ইবন আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মুসলিম ব্যক্তির (হজ থেকে) বাধাপ্রাপ্ত হওয়া সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি (অসুস্থতা বা আঘাতের কারণে) অঙ্গভঙ্গ হলো অথবা খোঁড়া হয়ে গেল, সে হালাল হয়ে গেল (ইহরাম থেকে মুক্ত হলো)। তবে তার উপর আগামী বছর হজ্জ করা আবশ্যক।” ইকরিমা বলেন, আমি (এই হাদীসটি) ইবন আব্বাস ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট জানালে তারা দুজনই বললেন: হাজ্জাজ সত্য বলেছেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (1863)، وابن ماجه (3078)، والترمذي (940 م) من طرق عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وأخرجه الواحدي في "أسباب النزول" (100)، والحازمي في "الاعتبار" ص 150 من طريق أبي الشيخ عبد الله بن محمد بن حيان الأصبهاني، عن أبي يحيى الرازي، عن سهل بن عثمان، عن عبيدة بن حميد، عن سليمان الأعمش، به موصولًا أيضًا.ورواه أبو الشيخ مرةً فأرسله، فقد أخرجه في "تفسيره" كما في "إتحاف المهرة" (2786) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5762) - عن أبي يحيى الرازي، عن سهل بن عثمان، عن عبيدة، عن الأعمش، عن أبي سفيان مرسلًا.ورواه هناد بن السري عن عبيدة فأرسله أيضًا، فقد أخرجه بقيّ بن مخلد كما في "إتحاف المهرة" (2786) - ومن طريقه ابن بَشكُوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 737 - 738 - عن هناد، عن عبيدة، عن الأعمش، عن أبي سفيان مرسلًا.ولقصة قطبة هذه أصل من حديث جابر عند أحمد 22/ (14607) من رواية ابن لهيعة عن أبي الزبير عن جابر.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 6/ 50 - 52.وفي الباب عن البراء بن عازب عند البخاري (1803)، ومسلم (3026).قوله: "إني أحمس" من الحُمْس، وهم قريش وما ولدت، قال ذلك عروة بن الزبير كما عند البخاري (1665)، ومسلم (1219) (152).
1797 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو الجوَّاب، حدثنا عمار بن رُزَيق، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر بن عبد الله قال: كانت قريشٌ يُدْعَونَ الحُمْسَ، وكانوا يَدخُلون من الأبواب في الإحرام، وكانت الأنصارُ وسائر العرب لا يَدخُلون من الأبواب في الإحرام، فبينما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في بستانٍ، فخرج من بابه، وخرج معه قُطْبةُ بن عامرٍ الأنصاري، فقالوا: يا رسولَ الله، إنَّ قُطبة بن عامر رجلٌ فاجر، وإنه خرج معك من الباب، فقال: "ما حَمَلَكَ على ذلك؟ " قال: رأيتُك فعلتَ، ففعلتُ كما فعلتَ، فقال: "إِنِّي أحمَسُ"، قال: إِنَّ دِيني دِينُك، فأنزل الله عز وجل: {وَلَيْسَ الْبِرُّ بِأَنْ تَأْتُوا الْبُيُوتَ مِنْ ظُهُورِهَا وَلَكِنَّ الْبِرَّ مَنِ اتَّقَى وَأْتُوا الْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَابِهَا} [البقرة: 189] [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه الزيادة.
জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইশদের 'আল-হুমস' (অর্থাৎ ধর্মীয় বিষয়ে কঠোর) বলা হতো। তারা ইহরাম অবস্থায় দরজা দিয়ে প্রবেশ করতো। কিন্তু আনসারগণ ও আরবের অন্যান্যরা ইহরাম অবস্থায় দরজা দিয়ে প্রবেশ করতো না। একদা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একটি বাগানে ছিলেন। তিনি তার দরজা দিয়ে বের হলেন, আর তার সাথে কুতবাহ ইবনু আমির আল-আনসারীও বের হলেন। তখন লোকেরা বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! কুতবাহ ইবনু আমির একজন পাপাচারী (ফাজের) লোক, আর সে আপনার সাথে দরজা দিয়ে বের হলো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমাকে এই কাজ করতে কিসে উদ্বুদ্ধ করলো?” সে বললো: আমি আপনাকে তা করতে দেখলাম, তাই আপনি যা করলেন আমিও তাই করলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি তো আহমাস (আল-হুমসের অন্তর্ভুক্ত)।” সে বললো: আমার দীন আপনার দীনই। অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: “আর তোমাদের পেছনের দিক দিয়ে ঘরে প্রবেশ করাতে কোনো পুণ্য নেই; বরং পুণ্যবান তো সেই যে তাকওয়া অবলম্বন করে এবং তোমরা ঘরসমূহে তার দরজা দিয়েই প্রবেশ কর।” (সূরা বাকারা: ১৮৯)
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي، لكن اختلف في وصله وإرساله، فقد رواه عمار بن رزيق هنا عن الأعمش عن أبي سفيان - وهو طلحة بن نافع - عن جابر بن عبد الله، فذكره هكذا موصولًا، ورواه عَبيدة بن حميد عن الأعمش به، واختلف عليه في وصله وإرساله كما سيأتي. أبو الجوَّاب: هو الأحوص بن جواب.وأخرجه ابن خزيمة في الحج كما في "إتحاف المهرة" 3/ 185 (2786) عن العباس بن عبد العظيم، وابن أبي حاتم في "التفسير" 1/ 323 عن أحمد بن منصور الرمادي، كلاهما عن أبي الجواب، بهذا الإسناد. وأخرجه الواحدي في "أسباب النزول" (100)، والحازمي في "الاعتبار" ص 150 من طريق أبي الشيخ عبد الله بن محمد بن حيان الأصبهاني، عن أبي يحيى الرازي، عن سهل بن عثمان، عن عبيدة بن حميد، عن سليمان الأعمش، به موصولًا أيضًا.ورواه أبو الشيخ مرةً فأرسله، فقد أخرجه في "تفسيره" كما في "إتحاف المهرة" (2786) - وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5762) - عن أبي يحيى الرازي، عن سهل بن عثمان، عن عبيدة، عن الأعمش، عن أبي سفيان مرسلًا.ورواه هناد بن السري عن عبيدة فأرسله أيضًا، فقد أخرجه بقيّ بن مخلد كما في "إتحاف المهرة" (2786) - ومن طريقه ابن بَشكُوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 737 - 738 - عن هناد، عن عبيدة، عن الأعمش، عن أبي سفيان مرسلًا.ولقصة قطبة هذه أصل من حديث جابر عند أحمد 22/ (14607) من رواية ابن لهيعة عن أبي الزبير عن جابر.وانظر "فتح الباري" لابن حجر 6/ 50 - 52.وفي الباب عن البراء بن عازب عند البخاري (1803)، ومسلم (3026).قوله: "إني أحمس" من الحُمْس، وهم قريش وما ولدت، قال ذلك عروة بن الزبير كما عند البخاري (1665)، ومسلم (1219) (152).
1798 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا أيوب بن سُوَيد، حدثنا الأوزاعي، عن محمد بن المُنكَدِر، عن جابرٍ قال: سُئِلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: ما بِرُّ الحَجِّ؟ قال: "إطعامُ الطّعام، وطِيبُ الكلام" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، لأنهما لم يحتجّا بأيوب بن سُوَيد، لكنه حديثٌ له شواهدُ كثيرة.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: হজ্জের পুণ্য কী? তিনি বললেন: "খাবার খাওয়ানো এবং উত্তম কথা বলা।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف لضعف أيوب بن سويد، وقد توبع، لكن اختلف فيه على الأوزاعي - وهو عبد الرحمن بن عمرو - في وصله وإرساله، والراجح أنه مرسل من حديث الأوزاعي عن ابن المنكدر، موصول من حديث غيره عن ابن المنكدر، كما سيأتي بيانه.وأخرجه البيهقي 5/ 262 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو البركات النيسابوري في "الأربعين حديثًا من الصحاح العوالي" (21) من طريق عبد الرحمن بن محمد السراج، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، به.وأخرجه ابن خزيمة في الحج كما في "إتحاف المهرة" (3714)، وأبو طاهر المخلص في "المخلصيات" (308)، وابن أبي الفوارس في الجزء الأول من "الفوائد المنتقاة" (282)، وأبو عثمان البحيري في الثاني من "فوائده" (63) من طريق محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، به.وأخرجه ابن خزيمة في الحج (إتحاف - 3714)، وأبو العباس الأصم في "فوائده" (333) ضمن مجموع فيه مصنفاته، والطبراني في "الأوسط" (6618)، وفي "مكارم الأخلاق" (168)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 364 من طرق عن أيوب بن سويد، به.وتابع أيوبَ بنَ سويد على وصله محمدُ بنُ مصعب القرقساني، أخرجه من طريقه عن الأوزاعي بهذا الإسناد موصولًا: أبو نعيم في "الحلية" 6/ 146، وأبو علي الوخشي في الخامس من "الوخشيات" (174)، ومحمد بن مصعب هذا فيه ضعف لكن يعتبر به في المتابعات والشواهد.وخالفهما الوليد بن مسلم القرشي - وهو ثقة - فرواه عن الأوزاعي عن ابن المنكدر مرسلًا، لم يذكر فيه جابرًا، أخرجه من طريقه ابن دحيم في "فوائده" (139) - ومن طريق ابن دحيم أخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 364، ومن طريق ابن عدي أخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 5/ 262 - وفيه قال: حدثنا الأوزاعي، حدثني محمد بن المنكدر: أنَّ رجلًا قال … فذكره، فيكون الوليد قد صرَّح بالتحديث في كل طبقات السند، فانتفت شبهة تدليسه. وهذا يرجح أنَّ رواية الأوزاعي مرسلة، فلا يقوى أيوب بن سويد ومحمد بن مصعب وهما ضعيفان أمام الوليد بن مسلم، والله أعلم.لكن قد روي الحديث موصولًا من غير وجه عن محمد بن المنكدر، فقد وصله عنه طلحة بن عمرو الحضرمي ومحمد بن ثابت البناني وسفيان بن حسين:أما طلحة بن عمرو فقد أخرجه من طريقه الطيالسي (1824)، ومن طريق الطيالسي أخرجه عبد بن حميد (1091)، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (141)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 156. إلّا أنَّ طلحة بن عمرو هذا متروك الحديث ولا يصلح للمتابعات.وأما محمد بن ثابت فقد أخرجه من طريقه أحمد 22/ (14482) و (14582)، وأبو جعفر البختري في المجلس الثاني من "أماليه" (28) ضمن مجموع فيه مصنفاته، وأبو الحسن السكري في "مشيخته" (33)، وإسماعيل الصفار في التاسع من "حديث ابن منده" (29)، والبيهقي في "الشعب" (3824)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1074). ومحمد بن ثابت هذا جاء التصريح في رواية إسماعيل الصفار أنه البناني، وهو ضعيف، وقد اضطرب في روايته هذه، فقد وقع في بعض الطرق عنه قوله: "وإفشاء السلام" بدلًا من قوله: "وطيب الكلام".وأما سفيان بن حسين - وهو ثقة - فقد رواه عن محمد بن المنكدر موصولًا، وصحَّ الإسناد إليه، فقد أخرجه ابن أبي الدنيا في "مداراة الناس" (112) عن يحيى بن محمد بن السكن، عن حبان ابن هلال، عن أبي محصن حصين بن نمير، والبيهقي في "الشعب" (3825) من طريق أبي العباس محمد بن يعقوب الأصم، عن العباس بن محمد الدوري، عن عباد بن العوام، كلاهما عن سفيان بن حسين، عن محمد بن المنكدر، به. وهذان الإسنادان قويان مجتمعَين، ليس فيهما ضعيف لا يحتج به، ولولا مرسل الوليد بن مسلم لصح الحديث بهما.وروي الحديث من وجه آخر عن جابر، فقد أخرجه العقيلي في "الضعفاء" (201)، والطبراني في "الأوسط" (8405) من طريق بشر بن المنذر، عن محمد بن مسلم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن جابر. وهذا إسناد ضعيف لضعف بشر بن المنذر، والله أعلم.تنبيه: كنا قد ضعفنا الحديث في "المسند" 22/ (14482) بسبب عدم وقوعنا على طريق سفيان بن حسين التي تقوى بها الحديث، فيستدرك من هنا.
1799 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الوارث بن سعيد العَنْبَري، عن عامرٍ الأحول، عن بكر بن عبد الله المُزَني، عن ابن عباس قال: أرادَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الحجَّ، فقالت امرأةٌ لزوجها: حُجَّ بي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما عندي ما أُحِجُّكِ عليه، قالت: فحُجَّ بي على ناضِحِك، فقال: ذاك نَعتَقِبُه أنا وولدُك، قالت: فحُجَّ بي على جَمَلِك فلان، قال: ذلك حَبِيسٌ في سبيل الله، قالت: فبِعْ ثَمَرَ رَفِّكَ [1]، قال: ذاك قُوْتِي وقُوتُكِ، قال: فلما رَجَعَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم من مكة، أرسلَتْ إليه زوجَها، فقالت: أَقرئْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم منِّي السلام وسَلْه: ما يَعدِلُ حَجَّةً معك؟ فأتى زوجُها النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ الله، إِنَّ امرأتي تُقرِئُك السلامَ ورحمةَ الله، وإنها سألَتني أن أحُجَّ بها معك، فقلتُ لها: ليس عندي، قالت: فحُجَّ بي على جملك فلان، فقلت لها: ذلك حَبِيسٌ في سبيل الله، قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "أمَا إِنَّكَ لو كنتَ حَجَجْتَ بها، كان في سبيل الله"، قال: فَضَحِكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم تعجُّبًا من حِرْصِها على الحج، قال: وإنها أمرَتْني أن أسألك: ما يَعدِلُ حَجَّةً معك؟ قال: "أقرِئْها منِّي السلامَ ورحمةَ الله، وأخبِرْها أنها تَعدِلُ حَجّةً معي عُمرةٌ في رمضان" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شعبان سنة ستٍّ وتسعين:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্ব করার ইচ্ছা করলেন। তখন এক মহিলা তার স্বামীকে বলল: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাকেও হজ্ব করান। স্বামী বলল: আমার কাছে এমন কিছু নেই যার উপর চড়িয়ে তোমাকে হজ্ব করাব। মহিলা বলল: তবে আপনার পানি বহনকারী উটের পিঠে আমাকে হজ্ব করান। সে বলল: ওটা তো আমি ও আমার সন্তানেরা পালাক্রমে ব্যবহার করি। সে বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে আমাকে হজ্ব করান। সে বলল: ওটা তো আল্লাহর রাস্তায় ওয়াক্ফ করা (হাবিস)। সে বলল: তবে আপনার [ঘরের] মাচার ফলগুলো বিক্রি করে দিন। সে বলল: ওটা তো আমার ও তোমার খোরাক।
বর্ণনাকারী বলেন, এরপর যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা থেকে ফিরে এলেন, তখন মহিলাটি তার স্বামীকে তাঁর নিকট পাঠাল এবং বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমার পক্ষ থেকে সালাম জানাবেন এবং জিজ্ঞেস করবেন: তাঁর সাথে করা একটি হজ্বের সমতুল্য কিসে হবে?
তখন তার স্বামী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্ত্রী আপনাকে সালাম ও আল্লাহর রহমত জানিয়েছেন, আর তিনি আমাকে তার সাথে আপনার সাথে হজ্ব করার জন্য অনুরোধ করেছিলেন। আমি তাকে বললাম, আমার কাছে (উপযুক্ত কিছু) নেই। সে বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে আমাকে হজ্ব করান। আমি তাকে বললাম: ওটা আল্লাহর রাস্তায় ওয়াক্ফ করা হয়েছে।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "শুনে রাখো, তুমি যদি তাকে নিয়ে হজ্ব করতে, তবে সেটাও আল্লাহর রাস্তাতেই হতো।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (মহিলার) হজ্বের তীব্র আকাঙ্ক্ষা দেখে অবাক হয়ে হাসলেন।
তিনি বললেন: আর সে আমাকে আদেশ দিয়েছে যেন আমি আপনাকে জিজ্ঞেস করি: আপনার সাথে করা একটি হজ্বের সমতুল্য কিসে হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার পক্ষ থেকে তাকে সালাম ও আল্লাহর রহমত জানাও, আর তাকে খবর দাও যে, রমজান মাসে একটি ওমরাহ্ আমার সাথে করা একটি হজ্বের সমতুল্য।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا في (ز)، وفي (ص): فبع تمرك، وفي (ع): فبع تمرتك، وفي "النهاية" في مادة (رفف) كما في (ز): فبع ثمر رفك، وقال في شرحه: الرَّف بالفتح: خشب يُرفع عن الأرض إلى جنب الجدار، يوقى به ما يوضع عليه، وجمعه: رُفوف ورِفاف.
[2] إسناده حسن من أجل عامر - وهو ابن عبد الواحد - الأحول.وأخرجه أبو داود (1990) عن مسدد، بهذا الإسناد.وأخرجه بغير هذه السياقة أحمد 3/ (2025)، والبخاري (1782) و (1863)، ومسلم (1256) من طريق عطاء عن ابن عباس قال: لما رجع النبي صلى الله عليه وسلم من حجته قال لأم سنان الأنصارية: "ما منعك من الحج؟ " قالت: أبو فلان - تعني زوجها - كان له ناضحان، حَجَّ على أحدهما، والآخر يسقي أرضًا لنا، قال: "فإنَّ عمرة في رمضان تقضي حجةً" أو "حجةً معي". هكذا ورد اسم الصحابية في "الصحيحين" أنها أم سنان، وهي غير أم معقل السالف حديثها بإسناد ضعيف برقم (1794).وقد ورد الحديث بنحو حديث بكر بن عبد الله المزني عن ابن عباس، من حديث أبي طليق، وفيه أنَّ المرأة التي سألت زوجها هي امرأة أبي طليق، وإسناده صحيح، أخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2710)، والبزار (1151 - كشف الأستار)، والدولابي في "الكنى والأسماء" 1/ 120، والطبراني في "الكبير" 22/ (816)، وابن الأثير في "أسد الغابة" 6/ 182 - 183، وابن حجر في "الإصابة" 7/ 232 - 233 وزاد نسبته إلى ابن أبي شيبة وابن السكن وابن منده، وقال: إسناده جيد. وإن لم يرو عنها غير اثنين، فهي تابعية وقد وثقها ابن حبان والعجلي، وقد توبعت على معنى الحديث. الربيع بن سليمان: هو المرادي صاحب الشافعي، وابن أبي الزناد: هو عبد الرحمن بن عبد الله بن ذكوان.وأخرجه أحمد 41/ (24615) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن علقمة بن أبي علقمة، بهذا الإسناد. وزاد في آخره: وأفرد رسول الله صلى الله عليه وسلم الحج ولم يعتمر. وانظر علّة هذه الزيادة في التعليق على "المسند".وقد ورد معنى هذا الحديث دون هذه الزيادة بإسناد صحيح من حديث هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة، ضمن حديث الحج، وفيه قول النبي صلى الله عليه وسلم: "من أحب منكم أن يهل بالحج فليهل، ومن أحب أن يهل بعمرة فليهل" الحديث، أخرجه أحمد 42/ (25587)، والبخاري (317) و (1783) و (1786)، ومسلم (1211) (15) و (16)، وأبو داود (1778)، وابن ماجه (3000)، والنسائي (3683)، وابن حبان (3792) و (3942).
1800 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن عَلْقَمة بن أبي عَلْقَمة، عن أمِّه، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمَرَ الناسَ عامَ حجَّةِ الوداع، فقال: "مَن أحبَّ أن يَرجِعَ بعُمرةٍ قبل الحجِّ فلْيَفعَلْ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের বছর লোকদের নির্দেশ দিয়েছিলেন এবং বলেছিলেন: "যে ব্যক্তি হজ্জের পূর্বে উমরাহ্ করে (ইহরাম থেকে) মুক্ত হতে পছন্দ করে, সে যেন তা করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين، أم علقمة بن أبي علقمة - واسمها مرجانة. وإن لم يرو عنها غير اثنين، فهي تابعية وقد وثقها ابن حبان والعجلي، وقد توبعت على معنى الحديث. الربيع بن سليمان: هو المرادي صاحب الشافعي، وابن أبي الزناد: هو عبد الرحمن بن عبد الله بن ذكوان.وأخرجه أحمد 41/ (24615) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن علقمة بن أبي علقمة، بهذا الإسناد. وزاد في آخره: وأفرد رسول الله صلى الله عليه وسلم الحج ولم يعتمر. وانظر علّة هذه الزيادة في التعليق على "المسند".وقد ورد معنى هذا الحديث دون هذه الزيادة بإسناد صحيح من حديث هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة، ضمن حديث الحج، وفيه قول النبي صلى الله عليه وسلم: "من أحب منكم أن يهل بالحج فليهل، ومن أحب أن يهل بعمرة فليهل" الحديث، أخرجه أحمد 42/ (25587)، والبخاري (317) و (1783) و (1786)، ومسلم (1211) (15) و (16)، وأبو داود (1778)، وابن ماجه (3000)، والنسائي (3683)، وابن حبان (3792) و (3942).