হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1801)


1801 - أخبرنا أبو سهل أحمد بن محمد بن زياد النَّحْوي ببغداد، حدثنا الحسن بن سلَّام، حدثنا أبو بكر عُبيد الله [1] بن عبد المجيد الحَنَفي، حدثنا عبد الله بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سَعَى ثلاثةَ أطوافٍ ومشى أربعةً حين قَدِمَ بالحج والعمرة حين كان اعتَمَر.وقال ابن عمر: اعتَمَرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل حجَّتِه مرتين أو ثلاثًا ولم يحجَّ غيرها، إحدى عُمرتَيهِ في رمضان [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হজ্জ ও উমরার উদ্দেশ্যে (মক্কায়) আগমন করেন, তখন তিনি (তাওয়াফের সময়) তিন চক্কর দ্রুত হেঁটেছিলেন (রমল করেছিলেন) এবং চার চক্কর স্বাভাবিকভাবে হেঁটেছিলেন, যখন তিনি উমরাহ করেছিলেন। ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হজ্জের পূর্বে দুই বা তিনবার উমরাহ করেছিলেন এবং তিনি তা ছাড়া অন্য কোনো হজ্জ করেননি। তাঁর উমরাহগুলোর মধ্যে একটি ছিল রমাদান মাসে।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا وقعت تسميته في أصولنا الخطية، وفي "إتحاف المهرة" (10706)، وهو خطأ صوابه عبد الكبير بن عبد المجيد، فهو الذي كنيته أبو بكر ويروي عن عبد الله بن نافع، أما عُبيد الله بن عبد المجيد فهو أخو عبد الكبير ويكنى أبا علي، ويغلب على ظننا أنه وهم أو سبق قلم من المصنف نفسه، فقد سماه هكذا أبا بكر عبيد الله بن عبد المجيد في موضعين آخرين من "المستدرك" برقم (7473) و (8437). وأخرجه بمعنى الشطر الأول أحمد 8/ (4618) و (4844) و 9/ (5444) و 10/ (5737) و (5760)، والبخاري (1617) و (1644)، ومسلم (1261) (230) و (1262) (233) و (234)، وأبو داود (1891)، وابن ماجه (2950)، والنسائي (3924) من طريق عبيد الله بن عمر العمري، وأحمد 9/ (4983) و (5238) و 10/ (5943) و (6047) و (6433) و (6463) من طريق عبد الله بن عمر العمري، وأحمد 10/ (6081)، والبخاري (1604) من طريق فليح بن سليمان، والبخاري (1616)، ومسلم (1261) (231)، وأبو داود (1893)، والنسائي (3921) من طريق موسى بن عقبة، والنسائي (3923) من طريق كثير بن فرقد، خمستهم عن نافع، به.وأخرجه - يعني بنحو الشطر الأول - أحمد 10/ (6247)، والبخاري (1603)، ومسلم (1261) (232)، والنسائي (3925) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، عن ابن عمر.



[2] الشطر الأول منه صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن نافع، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه"، وقد توبع على الشطر الأول، أما الثاني فلم يتابع عليه. نافع والد عبد الله: هو المدني مولى عبد الله بن عمر. وأخرجه بمعنى الشطر الأول أحمد 8/ (4618) و (4844) و 9/ (5444) و 10/ (5737) و (5760)، والبخاري (1617) و (1644)، ومسلم (1261) (230) و (1262) (233) و (234)، وأبو داود (1891)، وابن ماجه (2950)، والنسائي (3924) من طريق عبيد الله بن عمر العمري، وأحمد 9/ (4983) و (5238) و 10/ (5943) و (6047) و (6433) و (6463) من طريق عبد الله بن عمر العمري، وأحمد 10/ (6081)، والبخاري (1604) من طريق فليح بن سليمان، والبخاري (1616)، ومسلم (1261) (231)، وأبو داود (1893)، والنسائي (3921) من طريق موسى بن عقبة، والنسائي (3923) من طريق كثير بن فرقد، خمستهم عن نافع، به.وأخرجه - يعني بنحو الشطر الأول - أحمد 10/ (6247)، والبخاري (1603)، ومسلم (1261) (232)، والنسائي (3925) من طريق سالم بن عبد الله بن عمر، عن ابن عمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1802)


1802 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا محمد بن عمرو، حدثنا يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشةَ قالت: خرَجْنا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم على أنواعٍ ثلاثٍ، فمنَّا مَن أهلَّ بحَجّةٍ وعُمرة، ومنّا من أهلَّ بحجٍّ مفرَد، ومنّا من أهلَّ بعُمرة، فمَن كان أهلَّ بحجٍّ وعمرةٍ فلم يَحِلَّ من شيءٍ مما حَرُمَ عليه حتى قضى مناسكَ الحج، ومن أهلَّ بحجٍّ مفرَد لم يَحِلَّ من شيءٍ حتى يقضيَ مناسكَ الحجّ، ومَن أهلَّ بعُمرةٍ فطاف بالبيت وبالصّفا والمَرْوةِ حلَّ ثم استَقبَل الحجَّ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তিন প্রকারের হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ হজ্জ ও উমরার জন্য ইহরাম বাঁধলেন, কেউ কেউ কেবল একক হজ্জের (হজ্জে ইফরাদ) জন্য ইহরাম বাঁধলেন, আর কেউ কেউ শুধু উমরার জন্য ইহরাম বাঁধলেন। যারা হজ্জ ও উমরার জন্য ইহরাম বেঁধেছিল, তারা হজ্জের সকল আনুষ্ঠানিকতা সম্পন্ন না করা পর্যন্ত তাদের জন্য যা কিছু হারাম ছিল, তা থেকে হালাল হয়নি। আর যারা কেবল একক হজ্জের জন্য ইহরাম বেঁধেছিল, তারাও হজ্জের আনুষ্ঠানিকতা সম্পন্ন না করা পর্যন্ত কোনো কিছু থেকে হালাল হয়নি। আর যারা উমরার জন্য ইহরাম বেঁধেছিল, তারা বায়তুল্লাহর তাওয়াফ ও সাফা-মারওয়ার সাঈ করার পর হালাল হয়ে গিয়েছিল এবং তারপর হজ্জের জন্য অপেক্ষা করেছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة بن وقاص الليثي. عامر بن سعيد: هو الضُّبعي.وأخرجه أحمد 42/ (25096)، وابن ماجه (3075) من طريقين عن محمد بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 40/ (24076) و (24093)، والبخاري (319) و (1562) و (4408)، ومسلم (1211)، وأبو داود (1779) و (1780)، والنسائي (3683) من طريق عروة بن الزبير، عن عائشة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1803)


1803 - حدثنا أبو أحمد الحسين بن علي التَّميمي، حدثنا الإمام أبو بكر محمد بن إسحاق بن خُزَيمة، حدثني محمد بن العلاء بن كُرَيب، وأنا سألتُه، حدثنا خلَّاد بن يزيد الجُعْفي، حدثني زهير بن معاوية الجُعْفي، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه: أنَّ عائشة كانت تحملُ ماءَ زمزمَ، وتُخبِرُ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعلُه [1].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তিনি যমযমের পানি বহন করে আনতেন এবং বলতেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)ও তা করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل خلاد بن يزيد الجُعْفي، فقد روى عنه جماعةٌ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ووثقه الذهبي في "تلخيصه" عند الحديث الآتي برقم (2009)، وقال ابن حجر في "التقريب": صدوق ربما وهم. وحسَّن الترمذيُّ حديثَه هذا، وصحَّح له ابنُ خزيمة حديثًا آخر، على أن لحديثه هذا شواهد بمعناه.وأخرجه الترمذي (963) عن أبي كريب محمد بن العلاء، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلّا من هذا الوجه.ويشهد له حديثُ جابر بن عبد الله عند الفاكهي في "أخبار مكة" (1125)، والبيهقي 5/ 202، ولفظه: أرسل النبيُّ صلى الله عليه وسلم وهو بالمدينة قبلَ أن تُفتح مكة إلى سهيل بن عمرو: أن أهدِ لنا من ماء زمزم، ولا تَترُك. قال: فبعث إليه بمزادتين. هذا لفظ البيهقي، وإسناده عنده حسنٌ.وحديثُ ابن عباس عند الطبراني في "الكبير" (11491)، وفي "الأوسط" (5796)، والبيهقي 5/ 202، بمثل حديث جابر، وهو حسن في الشواهد.ومرسلُ عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين بمثل حديثهما أيضًا عند عبد الرزاق (9127)، وابن سعد في "الطبقات" 6/ 124، والأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 50 و 51، والفاكهي في "أخبار مكة" (1088) و (1089)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 73/ 56، ورجاله ثقات.وقال تقي الدين الفاسيّ في "شفاء الغرام بأخبار البلد الحرام" 1/ 342: أما نقلُ ماء زمزم فإنه يجوز باتفاق المذاهب الأربعة، بل هو مستحبٌّ عند المالكية والشافعية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1804)


1804 - أخبرَناه أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثني أبو كُرَيب، حدثنا خلَّاد بن يزيد الجُعْفي، عن زهير بن معاوية، عن هشام بن عُرْوة، فذكره [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




১৮০৪ - আমাদের খবর দিয়েছেন আবূ বকর ইবনু বালওয়াইহ, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবদুল্লাহ ইবনু আহমাদ ইবনু হাম্বল, আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আমার পিতা, আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ কুরাইব, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন খাল্লাদ ইবনু ইয়াযীদ আল-জু'ফী, তিনি যুহায়র ইবনু মু'আবিয়া থেকে, তিনি হিশাম ইবনু 'উরওয়াহ থেকে, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন [১]।
এই হাদীসটির সনদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن كسابقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1805)


1805 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا عمرو بن ميمون بن مِهْران، حدثنا أبو حاضرٍ عثمان بن حاضرٍ قال: سمعتُ ابن عباس يقول: إنَّ أهل الحُدَيبيَةِ أُمِروا بإبدال الهَدْي في العام الذي دخلوا فيه مكة، فأبدَلوا، وعزَّتِ الإبلُ، فرُخِّصَ لهم فيمن لا يجدُ بَدَنةً في اشتِراءِ بقرة [1].رواه محمد بن إسحاق بن يسار عن عمرو بن ميمون مفسَّرًا ملخَّصًا:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় হুদায়বিয়াহর লোকদেরকে সেই বছর তাদের কুরবানীর পশু (হাদী) পরিবর্তন করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল, যে বছর তারা মক্কায় প্রবেশ করেছিল। অতঃপর তারা পরিবর্তন করল। আর উট দুষ্প্রাপ্য হয়ে গিয়েছিল। তাই, তাদের মধ্যে যারা উট (বদানা) পায়নি, তাদেরকে একটি গরু ক্রয় করার অনুমতি দেওয়া হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل عثمان بن حاضر. سعيد بن مسعود: هو ابن عبد الرحمن المروزي.وأخرجه ابن ماجه (3134) من طريق أبي بكر بن عياش، عن عمرو بن ميمون، بهذا الإسناد.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (2864) مطولًا ضمن قصة بنحو الرواية الآتية بعده عن محمد بن عبد الملك الواسطي، عن يزيد بن هارون، عن عمرو بن ميمون، به. وكان أبي قد أهمه ذلك … إلى آخره.وقول عمرو هذا أخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 319 - 320 ضمن هذا الحديث من طريق يونس بن بكير عن ابن إسحاق، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1806)


1806 - أخبرَناه أبو بكر محمد بن المُؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا النُّفَيلي، حدثنا محمد بن سَلَمة، عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن ميمون بن مِهْران قال: سمعتُ أبا حاضر الحِمْيَري يحدِّث أبي ميمونَ بن مِهْران قال: خرجتُ معتمرًا عامَ حاصَرَ أهلُ الشام ابنَ الزبير بمكة، وبَعَثَ معي رجالٌ من قومي بهديٍ، فلما انتهينا إلى أهل الشام مَنَعُونا أن ندخل الحرم، فنحرتُ الهدي مكاني وأحللتُ، ثم رجعتُ، فلما كان من العام المُقبِل خرجتُ لأقضيَ عُمرتي، فأتيتُ ابن عباس فسألته، فقال: أبدِلِ الهديَ، فإنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أَمَرَ أصحابه أن يُبدِلوا الهديَ الذي نَحَروا عام الحديبية في عُمْرة القضاء.قال عمرو: وكان أبي قد أهمَّه ذلك، يقول: لا أدري هل أبدلَ أصحابُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم الهديَ الذي نحروا بالحديبية في عمرة القضاء، أم لا، حتى حدَّثه أبو حاضر [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وأبو حاضر شيخٌ من أهل اليمن مقبولٌ صدوق.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: মাইমূন ইবনু মিহরান বলেন: আমি উমরাহ করার উদ্দেশ্যে বের হলাম সেই বছর, যখন সিরিয়াবাসী মক্কায় ইবনু যুবাইরকে অবরোধ করেছিল। আমার গোত্রের লোকেরা আমার সাথে কুরবানীর পশু পাঠিয়েছিল। যখন আমরা সিরিয়াবাসীদের কাছে পৌঁছলাম, তারা আমাদের হারামের অভ্যন্তরে প্রবেশ করতে বাধা দিল। তখন আমি সেখানেই আমার কুরবানীর পশু যবেহ করলাম এবং ইহরাম মুক্ত হলাম, অতঃপর ফিরে আসলাম। যখন পরবর্তী বছর আসলো, আমি আমার উমরাহ কাযা করার জন্য বের হলাম। আমি (ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বললেন: "কুরবানীর পশু বদল করে দাও। কেননা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যে, তারা হুদায়বিয়ার বছরে যে কুরবানীর পশু যবেহ করেছিল, কাযা উমরাহর সময় তা বদল (প্রতিস্থাপন) করবে।" আমর (ইবনু মাইমূন) বলেন: এই বিষয়টি নিয়ে আমার পিতা চিন্তিত ছিলেন। তিনি বলতেন: আমি জানি না, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ কাযা উমরাহর সময় হুদায়বিয়াতে যবেহ করা কুরবানীর পশু বদল করেছিলেন কি না, যতক্ষণ না আবূ হাযির তাঁকে এই বর্ণনাটি শোনালেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - وقد صرَّح بالتحديث عند البيهقي في "الدلائل" فانتفت شبهة تدليسه، وقد توبع. النفيلي: هو عبد الله بن محمد، ومحمد بن سلمة: هو الباهلي.وأخرجه أبو داود (1864) عن النفيلي، بهذا الإسناد. إلّا أنه لم يذكر قول عمرٍو في آخره: وكان أبي قد أهمه ذلك … إلى آخره.وقول عمرو هذا أخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 319 - 320 ضمن هذا الحديث من طريق يونس بن بكير عن ابن إسحاق، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1807)


1807 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن عليٍّ الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزة، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا زهير، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباسٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لِمكَّةَ: "ما أطيَبَكِ من بلدةٍ، وأحبَّكِ إليَّ، ولولا أنَّ قومَكِ أَخرَجوني ما سكنتُ غيرَكِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কাকে লক্ষ্য করে বললেন: "তুমি কতই না উত্তম শহর এবং আমার কাছে তুমি কতই না প্রিয়। যদি তোমার লোকেরা আমাকে বের করে না দিত, তবে আমি তোমাকে ছাড়া অন্য কোথাও বসবাস করতাম না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده قوي من أجل عبد الله بن عثمان بن خثيم. أبو نعيم: هو الفضل بن دكين، وزهير: هو ابن معاوية.وأخرجه الترمذي (3926)، وابن حبان (3709) من طريق الفضيل بن سليمان، عن عبد الله بن عثمان بن خثيم، بهذا الإسناد. وقَرَن الفضيل بسعيد بن جبير أبا الطفيل عامر بن واثلة، وقال الترمذي: حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه. وأخرجه أحمد 8/ (4740) عن يعلى بن عبيد الطيالسي، عن محمد بن إسحاق، به.وأخرج أحمد 8/ (4868) عن يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر ضمن حديث ما يُنهى عنه المحرم، وقال في آخره: وسمعته ينهى النساء عن القفاز والنقاب، وما مسَّ الورس والزعفران من الثياب.وبنحو رواية يزيد أخرجه أحمد 10/ (6003)، والبخاري (1838)، وأبو داود (1825)، والترمذي (833)، والنسائي (3639) و (5847) من طريث الليث بن سعد، والنسائي (3647) من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن نافع، به. لكن قال في حق النساء: "ولا تنتقب المرأة المحرمة ولا تلبس القفازين". وقال الترمذي: حسن صحيح، والعمل عليه عند أهل العلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1808)


1808 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب، حدثني أبي، عن ابن إسحاق، حدثني نافع مولى عبد الله بن عمر، حدثني عبد الله بن عمر، أنه سَمِع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول؛ يَنهَى النِّساءَ في إحرامِهِنَّ عن القُفَّازين والنِّقاب، وما مَسَّ الوَرْسُ والزَّعفرانُ من الثياب، ولْتَلْبَس بعد ذاك ما أحبَّت من ألوان الثياب من مُعصفَرٍ أو خَزٍّ أو حُلِيٍّ، أو سَرَاويلَ، أو قَميصٍ، أو خُفٍّ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন যে, তিনি ইহরাম অবস্থায় মহিলাদেরকে হাতমোজা (কুফফাযাইন) এবং মুখমণ্ডল আবৃতকারী নেকাব পরিধান করতে নিষেধ করেছেন, এবং এমন পোশাক পরিধান করতে নিষেধ করেছেন যাতে ওয়ার্স (Wars) এবং জাফরান ব্যবহার করা হয়েছে। এরপর সে তার পছন্দের যেকোনো রঙের পোশাক পরিধান করতে পারে, যেমন: কুসুম ফুলে রং করা পোশাক, অথবা রেশমি কাপড়, অথবা অলংকার, অথবা পায়জামা, অথবা জামা, অথবা জুতো/মোজা।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد من أجل ابن إسحاق: وهو محمد بن إسحاق بن يسار.يعقوب: هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري.وأخرجه أبو داود (1827) عن أحمد بن حنبل، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 8/ (4740) عن يعلى بن عبيد الطيالسي، عن محمد بن إسحاق، به.وأخرج أحمد 8/ (4868) عن يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر ضمن حديث ما يُنهى عنه المحرم، وقال في آخره: وسمعته ينهى النساء عن القفاز والنقاب، وما مسَّ الورس والزعفران من الثياب.وبنحو رواية يزيد أخرجه أحمد 10/ (6003)، والبخاري (1838)، وأبو داود (1825)، والترمذي (833)، والنسائي (3639) و (5847) من طريث الليث بن سعد، والنسائي (3647) من طريق موسى بن عقبة، كلاهما عن نافع، به. لكن قال في حق النساء: "ولا تنتقب المرأة المحرمة ولا تلبس القفازين". وقال الترمذي: حسن صحيح، والعمل عليه عند أهل العلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1809)


1809 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا بِشْر بن المُفضَّل، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، عن أبيه، عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص، عن أبيه سعدٍ: أنه كان يَخرُج من المدينة فيجدُ الحاطبَ من الحُطَّاب معه شجرٌ [1] رَطْبٌ قد عَضَدَه من بعض شَجَر المدينة، فيأخذُ سَلَبَه، فيكلِّمُه فيه - وقال بِشْر: فيُكلَّم فيه - فيقول: لا أدَعُ غَنيمةً غنَّمَنِيها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأنا من أكثر الناس مالًا [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনা থেকে বের হতেন। তখন তিনি কাঠুরিয়াদের মধ্য থেকে কাউকে পেতেন যার সাথে থাকত তাজা গাছ, যা সে মদীনার কিছু গাছ থেকে কেটেছে। তিনি তখন তার মালামাল (কেটে আনা গাছ/কাঠ) কেড়ে নিতেন। এরপর এ বিষয়ে তাঁর সাথে কথা বলা হতো— বিশর বলেন, তাঁর জন্য সুপারিশ করা হতো। তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যে গনীমত (সম্পদ) দিয়েছেন, আমি তা ছেড়ে দিতে পারি না— অথচ আমি (বর্তমানে) মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সম্পদের অধিকারী।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز) و (ص): شجرة. وأخرج أبو داود (2038) من طريق صالح مولى التوأمة عن مولىً لسعد: أنَّ سعدًا وجد عبيدًا من عبيد المدينة يقطعون من شجر المدينة، فأخذ متاعهم وقال - يعني لمواليهم -: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى أن يُقطَع من شجر المدينة شيء، وقال: "من قطع منه شيئًا فلمن أخذه سَلَبُه".وانظر ما بعده.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن إسحاق - وهو ابن عبد الله بن الحارث القرشي المدني - وقد توبع. أبو بكر بن إسحاق: اسمه أحمد، وأبو المثنى: هو معاذ بن المثنى.وأخرجه البزار (1126)، والبيهقي 5/ 199 من طريقين عن بشر بن المفضل، بهذا الإسناد.ووقع في مسند البزار تسمية والد عبد الرحمن بن إسحاق: إسحاق بن سالم، وهو خطأ قديم، صوابه كما قال البيهقي بإثره: أبوه إسحاق بن الحارث القرشي.وأخرج أحمد 3/ (1460)، وأبو داود (2037) من طريق سليمان بن أبي عبد الله قال: رأيت سعد بن أبي وقاص أخذ رجلًا يصيد في حرم المدينة الذي حرم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فسلبه ثيابه، فجاء مواليه فكلموه فيه، فقال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حرَّم هذا الحرم، وقال: "من أخذ أحدًا يصيد فيه فليسلبه ثيابه"، فلا أردُّ عليكم طُعمةً أطعمنيها رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن إن شئتم دفعت إليكم ثمنه. وأخرج أبو داود (2038) من طريق صالح مولى التوأمة عن مولىً لسعد: أنَّ سعدًا وجد عبيدًا من عبيد المدينة يقطعون من شجر المدينة، فأخذ متاعهم وقال - يعني لمواليهم -: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى أن يُقطَع من شجر المدينة شيء، وقال: "من قطع منه شيئًا فلمن أخذه سَلَبُه".وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1810)


1810 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن عتَّاب العَبْدي ببغداد، حدثنا عبد الرحمن بن مرزوق أبو عوف البُزُوري، حدثنا خالد بن مَخْلَد القَطَواني، حدثنا عبد الله بن جعفر المَخْرَميّ، حدثنا إسماعيل بن محمد، عن عامر بن سعد: أنَّ سعدًا ركب إلى قصرِه بالعَقِيق فوجد عبدًا يقطع شجرًا فاستَلَبَه، فلما رَجَعَ جَاءَه أهلُ العبد يسألونه أن يَرُدَّ عليهم ما أَخذ من عبدهم، قال: مَعَاذَ اللهِ أَن أَرُدَّ شيئًا نَفَّلَنِيه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلم يَرُدَّ إليهم شيئًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আকীক উপত্যকায় অবস্থিত তাঁর প্রাসাদের দিকে আরোহণ করলেন। সেখানে তিনি একজন দাসকে গাছ কাটতে দেখতে পেলেন। তিনি তার কাছ থেকে (কাটার সরঞ্জাম) ছিনিয়ে নিলেন। যখন তিনি ফিরে এলেন, তখন সেই দাসের মালিকেরা এসে তার কাছে অনুরোধ করলো যেন তিনি তাদের দাসের কাছ থেকে যা কিছু নিয়েছেন, তা ফিরিয়ে দেন। তিনি বললেন: আল্লাহ্‌র পানাহ! আমি এমন কিছু ফিরিয়ে দেব, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নফল (বিশেষ পুরস্কার) হিসেবে দান করেছেন! সুতরাং তিনি তাদের কাছে কিছুই ফিরিয়ে দিলেন না।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل خالد بن مخلد القطواني، وقد توبع. إسماعيل بن محمد: هو ابن سعد بن أبي وقاص.وأخرجه أحمد 3/ (1443)، ومسلم (1364) من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو العقدي، عن عبد الله بن جعفر، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 17/ (11178) و 18/ (11864)، والترمذي (323)، وابن حبان (1626) من طرق عن أنيس بن أبي يحيى، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وسيأتي موقوفًا برقم (3324)، ومرفوعًا برقم (3325)، ويأتي الكلام عليه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1811)


1811 - أخبرنا أبو النضر الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا يحيى بن صالح الوُحاظيّ، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثنا أُنيس بن أبي يحيى، حدثني أبي، قال: سمعتُ أبا سعيدٍ الخُدْريَّ: أنَّ رجلًا من بني عمرو بن عوف ورجلًا من بني خُدْرة اختلفا - أو امتَرَيا - في المسجد الذي أُسِّس على التقوى، فقال العَوْفي: هو مسجد قُباءٍ، وقال الخُدْري: هو مسجدُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأَتَيا النبيَّ صلى الله عليه وسلم فسألاه، فقال: "هو مسجدي هذا، وفي ذلك خيرٌ كثير" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وأُنيس بن أبي يحيى بخلاف أخيه إبراهيم [2].




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনি আমর ইবনু আওফ গোত্রের একজন লোক এবং বনি খুদরা গোত্রের একজন লোক সেই মসজিদ নিয়ে মতভেদ করলেন (বা বিতর্ক করলেন) যা তাকওয়ার ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত। আওফী গোত্রের লোকটি বললো: সেটি হলো মসজিদে কুবা। আর খুদরী গোত্রের লোকটি বললো: সেটি হলো রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদ। তখন তারা দু'জন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞেস করলো। তিনি বললেন: "এটি হলো আমার এই মসজিদ। আর এর মধ্যে রয়েছে প্রচুর কল্যাণ।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي يحيى والد أُنيس: وهو الأسلمي، واسمه سمعان. أبو النضر: اسمه محمد بن محمد بن يوسف، وعبد العزيز بن محمد هو الدراوردي. وأخرجه أحمد 17/ (11178) و 18/ (11864)، والترمذي (323)، وابن حبان (1626) من طرق عن أنيس بن أبي يحيى، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وسيأتي موقوفًا برقم (3324)، ومرفوعًا برقم (3325)، ويأتي الكلام عليه هناك.



[2] كذا قال المصنف رحمه الله، والصواب أنَّ إبراهيم ليس أخا أُنيس، وإنما ابن أخيه محمد، وأبو يحيى جدُّه، فهو إبراهيم بن محمد بن أبي يحيى، وهو متروك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1812)


1812 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامِرِي، حدثنا أبو أسامة، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثنا أبو الأبْرَد موسى بن سُلَيم مولى بني خَطْمة [1]، أنه سَمِعَ أُسَيدَ بن ظُهَيرٍ الأنصاريَّ - وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يحدِّث، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "صلاةٌ في مسجد قُباءٍ كعُمْرة" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إِلَّا أَنَّ أَبا الأبْرَد مجهول.




উসাইদ ইবনু যুহাইর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: "কুবায় মসজিদে এক সালাত (নামায) একটি উমরার (সওয়াবের) সমতুল্য।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: قطبة، وصوبناه من مصادر التخريج وكتب التراجم، وقد انفرد المصنف هنا بتسميته موسى بن سليم، خلافًا لشيخه أبي أحمد الحاكم الذي ذكره في "الكنى" فيمن لا يعرف اسمه، وكذلك ابن أبي حاتم وابن حبان، وسماه الترمذي: زيادًا، كما في "جامعه" بإثر الحديث (324)، وتبعه على ذلك المزي في "تهذيب الكمال"، وتعقبه الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" بقوله: وهو وهم، وكأنه اشتبه عليه بأبي الأبرد الحارثي، فإنَّ اسمه زياد كما قال ابن معين وأبو أحمد الحاكم وأبو بشر الدولابي وغيرهم، والمعروف أنَّ أبا الأبرد لا يعرف اسمه.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين، فإنَّ أبا الأبرد - وإن لم يرو عنه غير واحد، ولم يؤثر توثيقه عن أحد - فهو تابعي، والراوي عنه من الثقات، ولحديثه هذا شواهد. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه ابن ماجه (1411)، والترمذي (324) من طرق عن أبي أسامة بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أبي أمامة سهل بن حنيف، سيأتي برقم (4325) بإسناد قوي.وحديث ابن عمر عند ابن حبان (1627)، وإسناده حسن.وحديث أبي سعيد الخدري عند ابن سعد في "الطبقات" 1/ 210.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1813)


1813 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا محمد بن مِهْران الجَمّال، حدثنا جَرير، عن يحيى بن سعيد، عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُكثِرُ الاختلافَ إلى قُباءٍ ماشيًا وراكبًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেঁটে এবং আরোহণ করে (সওয়ার হয়ে) কুবায় ঘন ঘন আসা-যাওয়া করতেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أحمد بن سلمة: هو ابن عبد الله النيسابوري، وجرير: هو ابن عبد الحميد، ويحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وأخرجه أحمد 8/ (4846) عن يزيد بن هارون، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 9/ (5218) و (5329) و (5522) و (5403) و 10/ (5860)، والبخاري (1193) و (7326)، ومسلم (1399) (518 - 522)، والنسائي (779)، وابن حبان (1618) و (1629) و (1630) و (1632) من طرق عن عبد الله بن دينار، به وزاد بعضهم: كلَّ سبت، وزاد بعضهم في آخره: وكان عبد الله رضي الله عنه يفعله.وأخرجه أحمد 8/ (4485) و 9/ (5199) و (5219) و (5330) و 10/ (5774) و (6432)، والبخاري (1191) و (1194)، ومسلم (1399) (515 - 517)، وأبو داود (2040)، وابن حبان (1628) من طريق نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1814)


1814 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي.وأخبرني أبو بكر بن أبي نصر المُزكِّي بمَرْو، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى، قالا: حدثنا القَعْنبي فيما قَرأَ على مالك.وأخبرني أبو يحيى السَّمَرقَنْدي، حدثنا محمد بن نَصْر [1].وأخبرنا يحيى بن منصور، حدثنا محمد بن عبد السلام؛ قالا: حدثنا يحيى بن يحيى قال: قرأتُ على مالك، عن علقمة بن أبي علقمة، عن أُمه، عن عائشة سَمِعتُها تقول: قام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فلَبِسَ ثيابه ثم خرج، فأمرتُ جاريتي بَرِيرةَ أَن تَتْبعَه فتنظرَ أين يذهب، فتَبِعَتْه حتى جاء البَقِيع، فوقف في أدناهُ ما شاء الله أن يقفَ، ثم انصَرَف راجعًا، فَسَبَقَتْه بَرِيرةُ، قالت عائشة: فأخبَرَتْني، قالت: فلم أذكرْ شيئًا من ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أصبحتُ، فذكرتُ ذلك له، فقال صلى الله عليه وسلم: "إِنِّي بُعِثْتُ إلى أهل البَقِيع لأُصلِّيَ عليهم" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠে দাঁড়ালেন, অতঃপর তাঁর কাপড় পরিধান করলেন এবং বেরিয়ে গেলেন। আমি আমার দাসী বারীরাকে নির্দেশ দিলাম যেন সে তাঁর অনুসরণ করে এবং দেখে তিনি কোথায় যান। বারীরা তাঁর অনুসরণ করল এবং দেখল যে তিনি বাকী' (কবরস্থান) এলেন। তিনি এর শেষ প্রান্তে এসে দাঁড়ালেন, আল্লাহ যতটুকু চাইলেন তিনি ততটুকু দাঁড়ালেন। এরপর তিনি ফিরে আসছিলেন। বারীরা তাঁর আগেই ফিরে এলো। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর সে (বারীরা) আমাকে জানালো। তিনি (আয়েশা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সকাল না হওয়া পর্যন্ত এ বিষয়ে কিছুই উল্লেখ করিনি। অতঃপর আমি তাঁকে তা জানালাম। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আমাকে বাকী'র অধিবাসীদের জন্য দু'আ করার (সালাত আদায় করার) জন্য পাঠানো হয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: نصير. وهو محمد بن نصر المروزي أبو عبد الله.



[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل أم علقمة - واسمها مرجانة - فهي تابعية لم يرو عنها غير اثنين ولم يؤثر توثيقها عن غير ابن حبان والعجلي. القعنبي: هو عبد الله بن مَسلمة، وأبو يحيى السمرقندي: اسمه أحمد بن محمد، ومحمد بن عبد السلام: هو ابن بشار أبو عبد الله النيسابوري، ويحيى بن يحيى: هو النيسابوري.وأخرجه النسائي (2176) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، وابن حبان (3748) من طريق أحمد بن أبي بكر، كلاهما عن مالك بن أنس، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 41/ (24612) من طريق عبد العزيز الدراوردي، عن علقمة بن أبي علقمة، به.وأخرج نحو هذه القصة بأطول منها أحمد 43/ (25855)، ومسلم (974) (103)، والنسائي (2175) و (8861) من طريق محمد بن قيس بن مخرمة، عن عائشة، إلّا أنَّ فيها أنَّ الذي تبع النبيَّ صلى الله عليه وسلم هي عائشة نفسها وليس بريرة، وفيه قول جبريل للنبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ ربك يأمرك أن تأتي أهل البقيع فتستغفر لهم" فقالت عائشة: قلت: كيف أقول لهم يا رسول الله؟ قال: "قولي: السلام على أهل الديار من المؤمنين والمسلمين، ويرحم الله المستقدمين منا والمستأخرين، وإنا إن شاء الله بكم للاحقون". نقله عنه ابن علان في "الفتوحات الربانية" 5/ 172. زائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه أحمد 4/ (2311) و (2727)، وابن حبان (2716) من طريق أبي الأحوص، عن سماك بن حرب، بهذا الإسناد. ضمن حديث ما يقول إذا أراد السفر، وإذا أراد الرجوع، وفي آخره قال: وإذا دخل أهله قال: "توبًا توبًا، لربنا أوبًا، لا يغادر علينا حوبًا".قوله: "توبًا" قال النووي في "الأذكار": سؤال للتوبة، وهو منصوب إما على تقدير: تب علينا، وإما على تقدير: أسألك توبًا، و"أوبًا" بمعناه من آبَ: إذا رجع، ومعنى: "لا يغادر": لا يترك، و"حوبًا": إثمًا، وهو بفتح الحاء وضمها لغتان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1815)


1815 - حدثنا عبد الصمد بن علي البزّاز إملاءً ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا يعقوب بن إسحاق الحَضْرمي، حدثنا زائدة، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عِكْرمة، عن ابن عباسٍ قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا قَدِمَ من سفرٍ فرأَى أهلَه قال: "أَوْبًا أوْبًا، إلى ربِّنا تَوْبًا [1] لا يغادرُ علينا حَوْبًا" [2]. هذا حديث صحيح بين الشيخين، لأنَّ البخاري تفرَّد بالاحتجاج بعكرمة، ومسلم بسِمَاك بن حرب، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সফর থেকে ফিরে এসে তাঁর পরিবারকে দেখতেন, তখন তিনি বলতেন: "আমরা ফিরে এলাম, আমরা ফিরে এলাম। আমাদের রবের কাছে তওবা করছি, যিনি যেন আমাদের ওপর কোনো গুনাহ বাকি না রাখেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرفت هذه اللفظة في (ز) و"تلخيص الذهبي" إلى: حوبًا، وسقطت من (ص) و (ع)، وأثبتناها من (ب)، ووقع في "الدعوات الكبير" للبيهقي (479) حيث رواه من طريق المصنف بهذا الإسناد: توبًا أوبًا، وإلى ربنا أوبًا، لا يغادر علينا حوبًا". نقله عنه ابن علان في "الفتوحات الربانية" 5/ 172. زائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه أحمد 4/ (2311) و (2727)، وابن حبان (2716) من طريق أبي الأحوص، عن سماك بن حرب، بهذا الإسناد. ضمن حديث ما يقول إذا أراد السفر، وإذا أراد الرجوع، وفي آخره قال: وإذا دخل أهله قال: "توبًا توبًا، لربنا أوبًا، لا يغادر علينا حوبًا".قوله: "توبًا" قال النووي في "الأذكار": سؤال للتوبة، وهو منصوب إما على تقدير: تب علينا، وإما على تقدير: أسألك توبًا، و"أوبًا" بمعناه من آبَ: إذا رجع، ومعنى: "لا يغادر": لا يترك، و"حوبًا": إثمًا، وهو بفتح الحاء وضمها لغتان.



[2] إسناده حسن إن شاء الله، وحسَّن هذا الحديث الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" فيما نقله عنه ابن علان في "الفتوحات الربانية" 5/ 172. زائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه أحمد 4/ (2311) و (2727)، وابن حبان (2716) من طريق أبي الأحوص، عن سماك بن حرب، بهذا الإسناد. ضمن حديث ما يقول إذا أراد السفر، وإذا أراد الرجوع، وفي آخره قال: وإذا دخل أهله قال: "توبًا توبًا، لربنا أوبًا، لا يغادر علينا حوبًا".قوله: "توبًا" قال النووي في "الأذكار": سؤال للتوبة، وهو منصوب إما على تقدير: تب علينا، وإما على تقدير: أسألك توبًا، و"أوبًا" بمعناه من آبَ: إذا رجع، ومعنى: "لا يغادر": لا يترك، و"حوبًا": إثمًا، وهو بفتح الحاء وضمها لغتان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1816)


1816 - أخبرنا محمد بن أحمد بن حاتم المُزكِّي بمَرْو، حدثنا عبد الله بن رَوْح المَدائني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو عن أبيه، عن جدِّه، عن عائشة أُم المؤمنين قالت: أَقبَلْنا من مكة في حجٍّ أو عُمرةٍ، وأُسَيدُ بنُ حُضَير يَسِير بين يَدَيْ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فتلقَّانا غلمانٌ من الأنصار كانوا يَتلَقَّون أهاليَهم إذا قَدِموا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা হজ অথবা উমরাহ থেকে মক্কা থেকে ফিরছিলাম। উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে সামনে হেঁটে যাচ্ছিলেন। এমন সময় আনসারদের কিছু বালক আমাদের সাথে সাক্ষাৎ করল, যারা সাধারণত তাদের পরিবার-পরিজন ফিরে এলে তাদের অভ্যর্থনা করত।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده فيه لِينٌ من أجل عمرو بن علقمة بن وقّاص الليثي والد محمد، فإنه لم يرو عنه غير ابنه محمد، ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقد خولف في لفظ حديثه هذا كما سيأتي بيانه عند رواية المصنف المطولة الآتية برقم (4991) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن يزيد بن هارون.وأخرجه البيهقي 5/ 260 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وسيأتي بأطول مما هنا ضمن قصة برقم (4991) و (5347).وفي الباب عن عبد الله بن جعفر عند أحمد 13/ (1743)، ومسلم (2428)، وغيرهما، وفيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قدم من سفر تُلُقِّي بصبيان أهل بيته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1817)


1817 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثنا أبو فَرْوة الرُّهَاوي، عن عُرْوة بن رُوَيم اللَّخْمي قال: سمعتُ أبا ثَعْلبة الخُشَنيَّ يقول: قَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من غَزاةٍ له، فدخل المسجد فصلَّى فيه ركعتين - وكان يُعجبُه إذا قَدِمَ من سفر أن يَدخُلَ المسجد فيصلِّيَ فيه ركعتين [1] ثم يَخرج - فأتى فاطمةَ فبدأ بها فاستَقبَلَته، فجعلَت تُقبِّل وجهَه وعينَيه، فقال لها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما يُبكيكِ [2]؟ " قالت: يا رسولَ الله، أراك قد شَحَبَ لونُك، فقال لها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "يا فاطمةُ، إنَّ الله عز وجل بَعَثَ أباكِ بأمرٍ لم يَبْقَ على ظهر الأرض بيتُ مَدَرٍ ولا شَعرٍ إلَّا أدخلَ الله به عزًّا أو ذلًّا، حتى يَبلُغ حيثُ بَلَغَ الليلُ [3] " [4].هذا حديث رواته مُجمَعٌ عليهم بأنهم ثقات، إلَّا أبا فروةَ يزيدَ بنَ سِنان. وله شاهدٌ من حديث إبراهيم بن قُعَيْس:




আবূ সা'লাবা আল-খুশানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক যুদ্ধ থেকে ফিরে এসে মসজিদে প্রবেশ করলেন এবং তাতে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। তাঁর অভ্যাস ছিল, তিনি যখনই কোনো সফর থেকে ফিরতেন, তখনই মসজিদে প্রবেশ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, তারপর বের হতেন। এরপর তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এবং তাঁর সাথে শুরু করলেন (দেখা করা)। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে অভ্যর্থনা জানালেন এবং তাঁর মুখমণ্ডল ও চোখে চুমু দিতে লাগলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমার কিসের জন্য কান্না আসছে?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি দেখতে পাচ্ছি আপনার চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে ফাতিমা! আল্লাহ তা‘আলা তোমার পিতাকে এমন এক গুরুত্বপূর্ণ কাজের জন্য প্রেরণ করেছেন যে, পৃথিবী পৃষ্ঠে মাটির তৈরি ঘর বা পশমের তাঁবু এমন একটিও অবশিষ্ট থাকবে না, যেখানে আল্লাহ এর দ্বারা সম্মান বা অপমান প্রবেশ করাবেন না, যতদূর রাত পৌঁছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] من قوله: وكان يعجبه .. " إلى هنا لم يرد في (ص) و (ع)، ووقع فيهما: ثم خرج" بصيغة الماضي.



[2] تحرف في النسخ الخطية إلى: ما معك، والتصويب من مصادر التخريج.



1817 [3] - في النسخ الخطية حيث يبلغ حيث الليل، ولا وجه له.



1817 [4] - إسناده ضعيف لضعف أبي فروة الرهاوي - واسمه يزيد بن سنان - وقد اضطرب في تعيين شيخه، إذ روي عنه مرة أنه عروة بن رويم - كما هنا - ومرة أخرى روي عنه أنه عقبة بن يريم، وذكرهما مرة جميعًا فقال: عن عروة بن رويم عن عقبة بن يريم - كما سيأتي بيانه في التعليق على الحديث رقم (4790) - وعروةُ بنُ رويم لا بأس به، لكن عقبة بن يريم مجهول، وقال البخاري في "تاريخه الكبير" 6/ 436: في صحة خبره نظر. وقد جزم البخاري بسماع عروة بن رويم من أبي ثعلبة، وأما ابن أبي حاتم وابن عمار الموصلي فجزما بأنه لم يسمع منه، وأنَّ روايته عنه مرسلة.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 230 من طريق أبي بكر الحيري، عن أبي العباس محمد بن يعقوب الأصم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن خزيمة في الحج كما في "إتحاف المهرة" (17411) - ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 2/ 30 و 6/ 123 - من طريق محمد بن أبان، به.وأخرجه بحشل في "تاريخ واسط" ص 55 من طريق علي بن مسهر، وابن خزيمة في الحج (إتحاف - 17411)، والطبراني في "الكبير" 22/ (596) من طريق جعفر بن زياد الأحمر، كلاهما عن أبي فروة يزيد بن سنان، به. ورواية علي بن مسهر مختصرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1818)


1818 - حدَّثَناه أبو الحسين أحمد بن عثمان الأَدَمي المقرئ ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا يحيى بن حمَّاد، حدثنا أبو عَوَانة، حدثنا العلاء بن المسيّب، عن إبراهيم بن قُعَيس، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا خَرَجَ في غَزَاةٍ، كان آخرُ عَهدِه بفاطمة، وإذا رَجَعَ من غَزَاةٍ، كان أولُ عهدِه بفاطمة؛ ثم ذَكَرَ باقيَ الحديث بغير هذا اللفظ [1].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো যুদ্ধে (গাযওয়ায়) বের হতেন, তখন তাঁর সর্বশেষ সাক্ষাত হতো ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে, আর যখন কোনো যুদ্ধ থেকে ফিরে আসতেন, তখন তাঁর প্রথম সাক্ষাত হতো ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে; অতঃপর তিনি এই শব্দ ছাড়া অবশিষ্ট হাদীসটি বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه لين من أجل إبراهيم بن قُعَيس - وهو إبراهيم بن إسماعيل المدني، ويقال: إبراهيم قُعيس - فقد ضعفه أبو حاتم الرازي، وقال يعقوب بن سفيان: هو عندي منكر الحديث، وقال المصنف نفسه في "سؤالات السجزي" له (202): حدّث بأحاديث يسيرة ما فيها حديثٌ إلّا وقد وهم في إسناده ومتنه.قلنا: لكن ذكره ابن حبان في "الثقات" وصحَّح حديثَه هذا، وترجم له البخاري في "تاريخه الكبير" ولم يجرحه كما قال الحافظ ابن حجر في "اللسان"، وكأنَّ الحافظ مال إلى تحسين أمره، ولهذا حسَّن له حديثًا في "الأمالي المطلقة" ص 221. وقد توبع على شطره الثاني، وله ما يشهد له بتمامه.وسيأتي برقم (4792) و (4793).وأخرج أحمد 8/ (4727)، وأبو داود (4149)، وابن حبان (6353) من طريق فُضيل بن غزوان، عن نافع، عن ابن عمر، في قصة دخوله صلى الله عليه وسلم على فاطمة، قال فيها: وقَلّما كان يدخل إلّا بدأ بها. وإسناده صحيح.ويشهد له بتمامه حديث ثوبان الذي أخرجه أحمد 37/ (22363)، وأبو داود (4213) وغيرهما. وراويه عن ثوبان فيه جهالة، لكن روايته تصلح للشواهد إن شاء الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1819)


1819 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يحيى بن المغيرة، حدثنا جَرِير، عن عطاء بن السائب، عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير، عن أبيه: أنَّ ابن عمر كان يُزاحِم على الرُّكْنين، فقلت: يا أبا عبد الرحمن، إنَّكَ تُزاحِم على الركنين زِحامًا ما رأيتُ أحدًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يُزاحِم عليه! قال: إنْ أَفعلْ فإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ مَسْحَهُما كفَّارةٌ للخَطَايا"، [وسمعتُه يقول: "مَن طافَ بهذا البيت سُبوعًا فأحصاهُ، كان كعِتْقِ رَقَبة"] [1]، وسمعته يقول: "لا يَضَعُ قدمًا ولا يَرفَعُ أخرى إلَّا حَطَّ اللهُ عنه بها خَطيئةً، وكَتَبَ له بها حسنةً" [2]. هذا حديث صحيح على ما بيّنتُه من حال عطاء بن السائب، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (কাবা শরীফের) দুই রুকন (ইয়ামানি ও হাজারে আসওয়াদ) স্পর্শ করার সময় ভিড় করতেন। তাই আমি বললাম: হে আবু আব্দুর রহমান, আপনি তো এমনভাবে দুই রুকনে ভিড় করছেন, যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের কাউকেই করতে দেখিনি! তিনি বললেন: আমি যদি এমন করি, তবে তা এজন্য যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই সে দুটি (রুকন) স্পর্শ করা গুনাহসমূহের কাফ্ফারা (মোচনকারী)।” [এবং আমি তাঁকে (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে) আরও বলতে শুনেছি:] “যে ব্যক্তি এই ঘরের সাতবার তাওয়াফ সম্পন্ন করল এবং তা সঠিকভাবে হিসাব করল, সে যেন একজন দাস মুক্ত করল।” এবং আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: “সে (তাওয়াফকারী) একটি কদম ফেলার সময় অথবা অপর কদমটি তোলার সময় এমন হয় না যে, আল্লাহ তার মাধ্যমে তার একটি গুনাহ ক্ষমা না করেন এবং তার জন্য একটি নেকি লিখে না দেন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين المعقوفين لم يرد في نسخنا الخطية، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي"، وهو ثابت في رواية جرير - وهو ابن عبد الحميد - عن عطاء بن السائب في مصادر التخريج. وسلف عند المصنف برقم (1694) من طريق نافع عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا طاف بالبيت مسح - أو قال: استلم - الحجر والركن في كل طواف.وفي الباب عن المنكدر بن عبد الله، سيأتي برقم (6038).سُبوعًا: أي: سبع مرات.فأحصاه من الإحصاء، أي: استوفاه وأتمه.



[2] إسناده صحيح، جرير بن عبد الحميد وإن كانت روايته عن عطاء بن السائب بعد الاختلاط قد توبع ممَّن روى عنه قبل الاختلاط وبعده، وقد صرَّح عبد الله بن عبيد بسماعه من أبيه عند أحمد (4462).وأخرجه الترمذي (959) عن قتيبة بن سعيد، وابن حبان (3697) من طريق أبي خيثمة زهير بن حرب، كلاهما عن جرير، بهذا الإسناد. ورواية أبي خيثمة مختصرة بالثلث الأخير من الحديث. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه أحمد 8/ (4462) عن هشيم بن بشير، و 9/ (5701) من طريق همام بن يحيى العوذي، كلاهما عن عطاء بن السائب، به. ولم يذكر همام الثلث الأخير منه. وهشيم وهمام كلاهما روى عن عطاء بعد الاختلاط.وأخرجه مختصرًا بالثلث الأول أحمد 8/ (4585) عن سفيان بن عيينة، وأحمد 9/ (5621)، وابن حبان (3698) من طريق سفيان الثوري، وقرن أحمد بالثوري معمرَ بنَ راشد، ثلاثتهم عن عطاء، به. والسفيانان قد رويا عن عطاء قبل اختلاطه، أما معمر فبعده.وأخرج النسائي (3916) و (3937) من طريق حماد بن زيد - وهو ممن روى عن عطاء قبل الاختلاط - عن عطاء، عن عبد الله بن عبيد بن عمير: أنَّ رجلًا قال: يا أبا عبد الرحمن، ما أراك تستلم إلّا هذين الركنين، قال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ مسحهما يحط الخطيئة"، زاد في الموضع الثاني: وسمعته يقول: "من طاف سبعًا فهو كعدل رقبة". والرجل المبهم هنا هو عبيد بن عمير والد عبد الله كما جاء مصرحًا به في سائر الروايات.وأخرج ابن ماجه (2956) من طريق العلاء بن المسيب، عن عطاء - وهو ابن أبي رباح - عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من طاف بالبيت وصلى ركعتين كان كعتق رقبة".وأخرج أحمد 10/ (6395)، والبخاري (1611)، والترمذي (861)، والنسائي في "المجتبى" (2946) من طريق الزبير بن عربي، قال: سأل رجلٌ ابنَ عمر عن استلام الحجر، فقال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يستلمه ويُقبِّله. قال: قلت: أرأيتَ إن غُلبتُ؟ قال: اجعل (أرأيت) باليمن، رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يستلمه ويُقبِّله. وسلف عند المصنف برقم (1694) من طريق نافع عن ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا طاف بالبيت مسح - أو قال: استلم - الحجر والركن في كل طواف.وفي الباب عن المنكدر بن عبد الله، سيأتي برقم (6038).سُبوعًا: أي: سبع مرات.فأحصاه من الإحصاء، أي: استوفاه وأتمه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1820)


1820 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا أبو المُثنَّى العَنْبريُّ، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا ابن أبي عَديِّ، عن محمد بن إسحاق، حدثنا أبو عُبيدةَ بن عبد الله بن زَمْعة، عن أبيه وعن أُمه زينب بنت أبي سلمة، يحدِّثانه عن أُم سلمة - يحدِّثانه بذلك جميعًا عنها - قالت: كانت ليلتي التي يَصيرُ إليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فدخل عليَّ وهبُ بن زَمْعة ومعه رجلٌ من آل أبي أُمية مُتقمِّصَين، فقال النبي صلى الله عليه وسلم لوهب: "هل أفَضْتَ أبا عبد الله؟ " قال: لا والله يا رسولَ الله، قال: "انزِعْ عنك القَمِيصَ". قال: فنَزَعَه من رأسه، ونَزَعَ صاحبُه قميصَه من رأسه، قالوا: ولِمَ يا رسول الله؟ قال: "إنَّ هذا قد رُخِّصَ لكم إذا رَمَيتُم الجَمْرةَ أن تحِلُّوا من كل ما حُرِمْتُم منه إلَّا النساء، فإذا أَمسيتُم قبل أن تَطُوفوا بهذا البيت صِرتُم حُرُمًا كهيئتِكم قبل أن تَرمُوا الجَمْرة حتى تَطُوفوا" [1]. قال أبو عُبيدة [2]: وحدَّثَتني أمُّ قيس [3]. ‌‌كتاب الدعاء والتسبيح والتكبير والتهليل والذكر




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এটা ছিল আমার রাত, যেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে আসতেন। তখন ওয়াহব ইবনু যামআ আমার কাছে এলেন। তার সাথে আবূ উমাইয়ার গোত্রের একজন লোকও ছিলেন। তারা উভয়েই জামা পরা ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওয়াহবকে বললেন, "হে আবূ আব্দুল্লাহ, তুমি কি (তাওয়াফ আল-ইফাযার জন্য) বের হয়েছ?" তিনি বললেন, আল্লাহর কসম না, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার জামা খুলে ফেলো।" তিনি (ওয়াহব) মাথা থেকে তা খুলে ফেললেন এবং তার সঙ্গীও মাথা থেকে তার জামা খুলে ফেললেন। তারা জিজ্ঞেস করলেন, হে আল্লাহর রাসূল, কেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যখন তোমরা জামরায় কংকর নিক্ষেপ করেছো, তখন নারীদের ছাড়া (অর্থাৎ দাম্পত্য সম্পর্ক ছাড়া) অন্য সব নিষিদ্ধ কাজ তোমাদের জন্য হালাল করে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং, তোমরা যদি এই ঘরের তাওয়াফ করার আগে সন্ধ্যা করো, তবে তোমরা ইহরাম অবস্থায় ফিরে আসবে—তোমাদের সেই পূর্বের অবস্থায়, যখন তোমরা জামরায় কংকর নিক্ষেপ করোনি, যতক্ষণ না তোমরা তাওয়াফ করো।" আবূ উবাইদা বলেন, উম্মু কায়েসও আমাকে এই হাদীস বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة لم يذكره أحد بجرح أو تعديل، وأخرج له مسلم حديثًا واحدًا متابعةً، وقال الحافظ في "التقريب": مقبول. وقد اضطرب في هذا الحديث كما بيناه في "مسند أحمد" 44/ (26530).أبو المثنى العنبري: هو معاذ بن المثنى، وابن أبي عدي: هو محمد بن إبراهيم السلمي مولاهم.وأخرجه أبو داود (1999) عن يحيى بن معين بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 44/ (26530) - وعنه أبو داود (1999) - عن ابن أبي عدي، به.وأخرجه أحمد (26587) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، عن ابن إسحاق، به. وفي آخره: قال أبو عبيدة: أوَلا يَشدُّ لك هذا من الأثر إفاضةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم من يومه ذلك قبل أن يمسي؟وأخرجه أحمد (26588) من طريق خالد مولى الزبير بن نوفل، عن زينب ابنة أبي سلمة، عن أمها أم سلمة. وخالد مولى الزبير بن نوفل مجهول.



[2] يعني بالإسناد السابق.



1820 [3] - كذا وقع في النسخ التي بين أيدينا من "المستدرك" دون ذكر حديث أم قيس، ولعله سقط من إحدى النسخ القديمة، أو أنَّ المصنف نفسه بيَّض له ليكتبه لاحقًا ثم فاته، والله تعالى أعلم، وإلّا فقد روى البيهقي هذا الحديث 5/ 137 عن المصنِّف نفسه بهذا الإسناد، وفيه: قال أبو عبيدة: وحدثتني أم قيس بنت محصن - وكانت جارةً لهم - قالت: خرج من عندي عكاشة بن محصن في نفر من بني أسد متقمِّصين، عشية يوم النحر، ثم رجعوا إليَّ عِشاءً وقمصهم على أيديهم يحملونها. قالت: فقلت: أيْ عكاشة، ما لكم خرجتم متقمصين ثم رجعتم وقمصكم على أيديكم تحملونها؟ فقال: خيرٌ يا أم قيس، كان هذا يومًا رَخَّص لنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لنا فيه إذا نحن رمينا الجمرة حللنا من كل ما حرمنا منه إلّا ما كان من النساء حتى نطوف بالبيت، فإذا أمسينا ولم نطف جعلنا قمصنا على أيدينا.وهو في "مسند أحمد" (26531).