হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (181)


181 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سنان القزَّاز، حدثنا أبو عاصم، حدثنا زكريا بن إسحاق، عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس: {الذين يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ} [النجم: 32]، قال: هو أن يأتي الرجلُ الفاحشة ثم يتوب منها، قال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهمَّ إِن تَغفِرْ تَغفِرْ جمّا … وأيُّ عبدٍ لك لا ألَمّا" [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وإنما خرَّجا حديث عبد الله بن طاووس عن أبيه عن ابن عباس أنه قال: لم أرَ شيئًا أقربَ باللَّمَم من الذي قال أبو هريرة: "كُتِبَ على ابن آدم حظُّه من الزنى" الحديث [2].والذي عندي أنهما تَرَكا حديثَ عمرو بن دينار للحديث الذي:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সূরা নাজম, আয়াত ৩২-এর ব্যাখ্যায়) {যারা গুরুতর পাপ ও অশ্লীল কাজসমূহ থেকে বিরত থাকে}, এই আয়াতের ব্যাখ্যায় বলেন: এর অর্থ হলো, যখন কোনো ব্যক্তি কোনো অশ্লীল কাজ করে ফেলে, এরপর সে তা থেকে তওবা করে। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! যদি তুমি ক্ষমা করো, তবে তুমি অনেক বেশি ক্ষমা করো। আর তোমার কোন বান্দা এমন আছে যে ভুল (লাম্মা) করে না?"

[হাদীস বিশারদ কর্তৃক অতিরিক্ত মন্তব্য:] এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি বর্ণনা করেননি। বরং তাঁরা উভয়ে আবদুল্লাহ ইবনু তাউস কর্তৃক তাঁর পিতা সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, যেখানে তিনি বলেন: আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছেন ("আদম সন্তানের উপর তার যিনার অংশ লিখে দেওয়া হয়েছে") সেই হাদীসটির চেয়ে লমাম (ক্ষুদ্র পাপ)-এর সাথে ঘনিষ্ঠ আর কিছু আমি দেখিনি। আমার নিকট মনে হয় যে, তাঁরা (শাইখাইন) আমর ইবনু দীনারের হাদীসটি এই হাদীসের কারণে ত্যাগ করেছেন যে: [টেক্সট অসম্পূর্ণ]।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح موقوفًا، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزاز، وقد توبع ومن فوقه ثقات، إلّا أنَّ الحافظ ابن كثير قال في "تفسيره" 7/ 436: في رفعه نظر، وقال الحافظ ابن حجر في "الأمالي الحلبية": سنده صحيح وفي رفعه نكارة، وقال البيهقي في "شعب الإيمان": المحفوظ هو الموقوف؛ وهي الرواية التالية عند المصنف، وهي أصح إسنادًا.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد النبيل، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه الترمذي (3284) عن أحمد بن عثمان النوفلي - وهو ثقة - عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.وقال: حديث حسن صحيح غريب لا نعرفه إلا من حديث زكريا بن إسحاق.وسيأتي برقم (3792) و (7812) من طريق روح بن عبادة عن زكريا بن إسحاق.



[2] أخرجه البخاري برقم (6243) و (6612)، ومسلم برقم (2657)، وسيأتي بنحوه عند المصنف برقم (3794) من طريق أبي صالح السمّان عن أبي هريرة مرفوعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (182)


182 - حدَّثَناه عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعبة.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا عفَّان بن مسلم، حدثنا شُعبة، حدثنا منصور، عن مجاهد، عن ابن عباس، في هذه الآية: {إِلَّا اللَّمَمَ} [النجم: 32] قال: الذي يُلِمُّ بالذَّنْب ثم يَدَعُه، ألم تسمع قول الشاعر:إنْ تَغفر اللهمَّ تَغفِرْ جَما … وأيُّ عبدٍ لك لا ألما [1]وهذا التوقيف لا يُوهِنُ سند الأوَّل، فإنَّ زكريا بن إسحاق حافظ ثقة، وقد حدَّث به روح بن عُبادة عن زكريا، وقد ذكرتُ في شرائط هذا الكتاب إخراج التفاسير عن الصحابة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এই আয়াতের ব্যাখ্যায় {إِلَّا اللَّمَمَ} [সূরা আন-নাজম: ৩২] সম্পর্কে তিনি বলেন: [এই হলো] সে ব্যক্তি, যে গুনাহের কাছাকাছি যায়, অতঃপর তা ছেড়ে দেয়। তুমি কি কবির এই উক্তি শোনোনি?
"হে আল্লাহ! যদি তুমি ক্ষমা করো, তবে তুমি অনেক বেশি ক্ষমা করবে;
তোমার এমন কোন বান্দা আছে যে (গুনাহের কাছে) যায়নি/দোষ করেনি? [১]"
আর এই তাউকীফ (বর্ণনা সমাপ্তি) প্রথম সনদকে দুর্বল করে না। কেননা যাকারিয়্যা ইবনু ইসহাক বিশ্বস্ত হাফিয। রূহ ইবনু উবাদাহ তা যাকারিয়্যা থেকে বর্ণনা করেছেন। আমি এই কিতাবের শর্তাবলীতে সাহাবীদের থেকে বর্ণিত তাফসীরসমূহ উদ্ধৃত করার কথা উল্লেখ করেছি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح من جهة أبي بكر بن إسحاق، وأما عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف في الإسناد الأول فضعيف، وهو موقوف، وهو المحفوظ كما قال البيهقي، وانظر ما قبله.منصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه البيهقي في "السنن" 10/ 185، وشعب الإيمان (6656) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد - واقتصر في "السنن" على طريق آدم بن أبي إياس، وقال بإثره في "الشعب": هذا هو المحفوظ موقوف.والشاعر الذي أشار إليه ابن عباس، قيل: هو أبو خراش الهُذَلي، وقيل: أمية بن أبي الصلت، هكذا في كتب اللغة.واللَّمم: صغائر الذنوب، وقيل: هو مقاربة الذنب من غير مواقعة له. ذهولٌ من الحاكم هنا، ثم عاد وتنبَّه إلى تخريج البخاري له فيما سيأتي بإثر حديث الأعرج عن أبي هريرة برقم (7818).وله شاهد من حديث أبي سعيد الخدري عند ابن حبان (17)، والطبراني في "الأوسط" (808)، وإسناده حسن.وآخر عن أبي أمامة، وهو الحديث الآتي عند المصنف برقم (185).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (183)


183 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا سُريج بن النعمان، حدثنا فُليح بن سليمان، عن هلال بن علي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كلُّ أُمتي يدخل الجنة إلا من أبى" قالوا: ومَن يأبى يا رسول الله؟ قال: "مَن عصاني فقد أبى" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!وله إسناد آخر عن أبي هريرة على شرطهما:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের সকলেই জান্নাতে প্রবেশ করবে, তবে যে অস্বীকার করে সে ব্যতীত।" তাঁরা (সাহাবীগণ) জিজ্ঞাসা করলেন, "হে আল্লাহর রাসূল! কে অস্বীকার করে?" তিনি বললেন, "যে আমার অবাধ্যতা করে, সেই অস্বীকার করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل فُليح بن سليمان. وهو في "مسند أحمد" 14 / (8728)، وقرن فيه بسريج يونس بن محمد المؤدب.وأخرجه البخاري (7280) عن محمد بن سنان العَوَقي، عن فليح بهذا الإسناد. فاستدراكه ذهولٌ من الحاكم هنا، ثم عاد وتنبَّه إلى تخريج البخاري له فيما سيأتي بإثر حديث الأعرج عن أبي هريرة برقم (7818).وله شاهد من حديث أبي سعيد الخدري عند ابن حبان (17)، والطبراني في "الأوسط" (808)، وإسناده حسن.وآخر عن أبي أمامة، وهو الحديث الآتي عند المصنف برقم (185).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (184)


184 - أخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن صالح بن كَيْسان، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لتدخُلُنَّ الجنةَ إِلَّا مَن أَبي وشَرَدَ على الله كشِرَادِ البعير" [1].وله شاهد أيضًا عن أبي أُمامة الباهلي:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে, তবে সেই ব্যক্তি ছাড়া, যে অস্বীকার করে এবং উটের পলায়নের মতো আল্লাহ্‌র কাছ থেকে পালিয়ে যায়।" এর একটি সমর্থক বর্ণনা আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও রয়েছে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. وانفرد به الحاكم من هذا الطريق، ولم نقف عليه فيما بين أيدينا من كتب الإمام أحمد بن حنبل، وسيأتي برقم (7818) من طريق إسماعيل بن أبي أويس عن إبراهيم بن سعد، وهو مما انفرد به أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (185)


185 - أخبرناه أبو بكر بن إسحاق، حدثنا أحمد بن إبراهيم بن ملحان، حدثنا يحيى بن بُكير، حدثني الليث، عن سعيد بن أبي هلال، عن علي بن خالد [1] قال: مرَّ أبو أُمامة الباهلي على خالد بن يزيد بن معاوية، فسأله عن أَليَن كلمةٍ سمعها من رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "كلكم يدخلُ الجنةَ إِلَّا من شَرَدَ على الله شِرَادَ البعير على أهلِه" [2].




আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খালিদ ইবন ইয়াযীদ ইবন মু'আবিয়ার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। সে (খালিদ) তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা সবচেয়ে কোমল কথাটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের প্রত্যেকেই জান্নাতে প্রবেশ করবে, তবে সে ব্যতীত, যে তার মালিকের নিকট থেকে পলায়নকারী উটের ন্যায় আল্লাহ তা‘আলা হতে পলায়ন করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] في (ب): عن أبي خالد، وهو خطأ، ولا تعرف لعلي هذا كُنية.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل علي بن خالد.وأخرجه أحمد 36/ (2226) عن قتيبة بن سعيد، عن ليث -وهو ابن سعد- بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7819) من طريق عمرو بن الحارث عن سعيد بن أبي هلال. ويشهد له ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (186)


186 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدثنا هَوْذة بن خَليفة، حدثنا عَوْف، حدثني محمد بن سيرين وخلاس، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ لله مئة رحمةٍ، قَسَمَ منها رحمةً بين أهل الدنيا فوَسِعَتهم إلى آجالهم، وأخَّرَ تسعة وتسعين لأوليائه، وإنَّ الله عز وجل قابضٌ تلك الرحمة التي قَسَمَها بين أهل الدنيا إلى التسع والتسعين، فكَمَّلَها مئة رحمةٍ لأوليائه يوم القيامة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتَّفقا فيه على حديث الزُّهْري عن حميد بن عبد الرحمن عن أبي هريرة، وسليمان التَّيمي عن أبي عثمان عن سلمان مختصرًا سلمان مختصرًا [2]، ثم خرَّجه مسلم [3] من حديث عبد الملك بن أبي سليمان عن عطاء بن أبي رباح عن أبي هريرة أكمل من الحديثين. وله شاهد على نَسَقِ حديث عوفٍ:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহর রয়েছে একশত রহমত। তিনি এর মধ্যে থেকে একটি রহমত দুনিয়াবাসীদের মধ্যে বণ্টন করেছেন, যা তাদের জীবদ্দশা পর্যন্ত তাদের জন্য যথেষ্ট হয়। আর নিরানব্বইটি তিনি তাঁর ওলিদের (বন্ধুদের) জন্য রেখে দিয়েছেন। আর আল্লাহ তা‘আলা দুনিয়াবাসীদের মধ্যে যে রহমত বণ্টন করেছেন, তা তিনি ওই নিরানব্বইটির সাথে মিলিয়ে নেবেন। ফলে কিয়ামতের দিন তাঁর ওলিদের জন্য তা পূর্ণ একশত রহমত হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي، وخلاس - وهو ابن عمرو - لم يسمع أبا هريرة فهو من جهته منقطع إلا أنه من جهة محمد بن سيرين متصل. عوف: هو ابن أبي جميلة الأعرابي.وأخرجه أحمد 16 / (10670) عن روح بن عبادة ومحمد بن جعفر، عن عوف، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7821) من طريق محمد بن سيرين وحده عن أبي هريرة.وأخرجه بنحوه أحمد 14 / (8415)، ومسلم (2752) (18)، والترمذي (3541) من طريق عبد الرحمن بن يعقوب مولى الحُرّقة، وأحمد 16 / (10810) من طريق أبي صالح السمان، والبخاري (6469) من طريق سعيد المقبري، ثلاثتهم عن أبي هريرة.



[2] وقع للحاكم هنا وهمان: الأول: أنهما لم يخرجاه من حديث الزهري عن حميد بن عبد الرحمن عن أبي هريرة، وإنما أخرجاه من حديث الزهري عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة، البخاري برقم (6000) ومسلم برقم (2752) (17)، وهو من هذا الوجه أيضًا عند ابن حبان برقم (6148). الثاني: أنهما لم يتفقا عليه من حديث سليمان التيمي عن أبي عثمان عن سلمان، وإنما انفرد به مسلم برقم (2753) (20)، وسيأتي عند المصنف برقم (7820) من طريق داود بن أبي هند عن أبي عثمان.



186 [3] - برقم (2752) (19)، وأخرجه أيضًا من هذا الطريق أحمد 15 (9609)، وابن ماجه (2493)، وابن حبان (6147).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (187)


187 - أخبرنا أبو العباس عبد الله بن الحسين القاضي بمرو، حدثنا الحارث ابن أبي أُسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الحجَّاج بن أبي زينب قال: سمعتُ أبا عثمان النَّهْدي يحدِّث عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الله خَلَقَ يوم خلق السماواتِ والأرضَ مئة رحمةٍ، كلُّ رحمةٍ طِبَاقُها طباقُ السماوات والأرض، فقَسَمَ رحمةً بينَ جميع الخلائق، وأخَّرَ تسعةً وتسعين رحمةً لنفسِه، فإذا كان يوم القيامة رَدَّ هذه الرحمةَ، فصار مئةُ رحمةٍ يَرحَمُ بها عبادَه" [1].وله شاهد آخر مُفسَّر عن جُندُب بن عبد الله:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যেদিন আসমান ও যমীন সৃষ্টি করেন, সেদিন তিনি একশত রহমত (দয়া) সৃষ্টি করেছেন। প্রতিটি রহমত আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী স্থান পূর্ণ করে রাখে (বা আসমান ও যমীনের মতো বিশাল)। অতঃপর তিনি এক (মাত্র) রহমতকে সকল সৃষ্টির মধ্যে বণ্টন করে দিয়েছেন এবং নিরানব্বইটি রহমত নিজের জন্য বাকি রেখেছেন। যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন তিনি এই (বণ্টনকৃত) রহমতটিকেও ফিরিয়ে নেবেন। ফলে (মোট) একশত রহমত হয়ে যাবে, যা দ্বারা তিনি তাঁর বান্দাদের প্রতি দয়া করবেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح لكن من حديث سلمان الفارسي، والحجاج بن أبي زينب ليس بذاك القوي وقد خولف في إسناده، وأعلَّه به الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" (19087) فقال: الحجاج ضعيف، وخالفه سليمان التيمي وغيره من الثقات فرووه عن أبي عثمان عن سلمان. قلنا: وسيأتي حديث سلمان عند المصنف برقم (7820). أبو عثمان النهدي: هو عبد الرحمن بن ملّ.وأما حديث أبي هريرة، فقد أخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 3/ 376 - 377، والدولابي في "الكنى والأسماء" (2042)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (332) من طرق عن يزيد ابن هارون، بهذا الإسناد. الجسري كما وقع هنا، فقد نسبه جشميًا أحمدُ بن حنبل في "مسنده" 31/ (18799) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، وتابعه على ذلك علي بن نصر الجهضمي عند أبي داود (4885)، وعبد الوارث بن عبد الصمد عند الدولابي في "الكنى والأسماء" (1443)، كلاهما عن عبد الصمد ابن عبد الوارث، بينما تابع عباسًا الدوريَّ في نسبته جَسْريًا محمود بن غيلان عند الروياني في "مسنده" (957)، ورواية الثلاثة بما فيهم الإمام أحمد بن حنبل، أوثق وأتقن وبخاصة أنَّ عبد الوارث بن عبد الصمد في رواية الدولابي سماه عباسًا، أما الجسري فاسمه حِميري بن بشير، وهو ثقة، وأما الجشمي فقد روى عنه الجُريري -وهو سعيد بن إياس- وقتادة، وذكره ابن حبان في "الثقات" 5/ 259، ولم يؤثر توثيقه عن غيره، ففي حاله جهالة. وقد صحَّ الحديث بغير هذا السِّياق.وسيأتي عند المصنف برقم (7822) من طريق يزيد بن هارون عن الجريري، وقال فيه: عن أبي عبد الله الجسري، ويزيد روايته عن الجريري بعد الاختلاط فلا يُعتبر بها عند المخالفة، والله تعالى أعلم.وشطره الأول له أصل من حديث أبي هريرة عند أحمد (7255) والبخاري (6010) وغيرهما.ولشطره الثاني انظر ما قبله.قوله: "هو أضلُّ" أي: أجهلُ، لأنه لا يقول ما قال ذلك الأعرابي إلا جاهل بالله وسعة رحمته، حيث حجَّر وضيَّق الواسع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (188)


188 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثني أبي، حدثني الجُرَيري، عن أبي عبد الله الجَسْري، حدثنا جُندُب قال: جاء أعرابيٌّ فأناخَ راحلتَه ثم عَقَلَها، فصلى خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما سَلَّمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أتى راحلته فأطلق عِقالَها، ثم رَكِبَها، ثم نادى: اللهمَّ ارحمني ومحمدًا، ولا تُشرِك في رحمتنا أحدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما تقولون، أهو أضَلُّ أم بعيرُه؟ ألم تسمعوا ما قال؟ " قالوا: بلى، فقال: "لقد حَظَرَ رحمةً واسعةً، إِنَّ الله خلق مئةَ رحمةٍ، فَأَنزلَ رحمةً تَعَاطَفُ بها الخلائقُ جِنُّها وإنسُها وبهائمُها، وعنده تسعةٌ وتسعون، تقولون: أهو أضَلُّ أم بعيره؟ " [1].




জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন এসে তার বাহনটিকে বসালো, তারপর সেটিকে বাঁধল। এরপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সালাত আদায় করল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফেরালেন, তখন সে তার বাহনের কাছে গেল এবং এর বাঁধন খুলে দিল। তারপর সে তাতে আরোহণ করল এবং চিৎকার করে বলল: “হে আল্লাহ! আপনি আমাকে ও মুহাম্মাদকে দয়া করুন এবং আমাদের দয়ার মধ্যে অন্য কাউকে অংশীদার করবেন না।” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা কী বলছ, এ ব্যক্তি বেশি পথভ্রষ্ট নাকি তার উট? তোমরা কি শোননি সে কী বলল?” তারা বলল: হ্যাঁ (শুনেছি)। তখন তিনি বললেন: “সে তো এক প্রশস্ত রহমতকে সংকুচিত করে দিয়েছে। নিশ্চয় আল্লাহ একশত রহমত সৃষ্টি করেছেন। তিনি তন্মধ্যে একটি রহমত নাযিল করেছেন, যার দ্বারা জিন, মানব ও চতুষ্পদ প্রাণী—সকলেই পরস্পর দয়া করে থাকে। আর নিরানব্বইটি রহমত তাঁর কাছেই রয়েছে। তোমরা কি বলছ, এ ব্যক্তি বেশি পথভ্রষ্ট নাকি তার উট?”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده فيه لين من أجل أبي عبد الله الراوي عن جندب، وأبو عبد الله هذا: هو الجسمي لا الجسري كما وقع هنا، فقد نسبه جشميًا أحمدُ بن حنبل في "مسنده" 31/ (18799) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، وتابعه على ذلك علي بن نصر الجهضمي عند أبي داود (4885)، وعبد الوارث بن عبد الصمد عند الدولابي في "الكنى والأسماء" (1443)، كلاهما عن عبد الصمد ابن عبد الوارث، بينما تابع عباسًا الدوريَّ في نسبته جَسْريًا محمود بن غيلان عند الروياني في "مسنده" (957)، ورواية الثلاثة بما فيهم الإمام أحمد بن حنبل، أوثق وأتقن وبخاصة أنَّ عبد الوارث بن عبد الصمد في رواية الدولابي سماه عباسًا، أما الجسري فاسمه حِميري بن بشير، وهو ثقة، وأما الجشمي فقد روى عنه الجُريري -وهو سعيد بن إياس- وقتادة، وذكره ابن حبان في "الثقات" 5/ 259، ولم يؤثر توثيقه عن غيره، ففي حاله جهالة. وقد صحَّ الحديث بغير هذا السِّياق.وسيأتي عند المصنف برقم (7822) من طريق يزيد بن هارون عن الجريري، وقال فيه: عن أبي عبد الله الجسري، ويزيد روايته عن الجريري بعد الاختلاط فلا يُعتبر بها عند المخالفة، والله تعالى أعلم.وشطره الأول له أصل من حديث أبي هريرة عند أحمد (7255) والبخاري (6010) وغيرهما.ولشطره الثاني انظر ما قبله.قوله: "هو أضلُّ" أي: أجهلُ، لأنه لا يقول ما قال ذلك الأعرابي إلا جاهل بالله وسعة رحمته، حيث حجَّر وضيَّق الواسع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (189)


189 - أخبرنا أحمد جعفر القَطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعبة، عن عَدِيِّ بن ثابت وعطاءِ بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبّاس؛ رَفَعَه أحدهما إلى النبي صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ جبريل كان يَدُسُّ في فم فِرعَونَ الطينَ مَخافة أن يقول: لا إله إلَّا الله" [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরাঈল (আঃ) ফেরাউনের মুখে কাদা ঢুকিয়ে দিচ্ছিলেন, এই আশঙ্কায় যে সে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলে ফেলবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح موقوفًا على ابن عباس، والراجح أنَّ الذي رفعه منهما هو عدي بن ثابت، وستأتي روايته منفردًا برقم (3342) من طريق النضر بن شميل عن شعبة عنه، وقد نُقل عن شعبة أنه قال فيه: كان رفاعًا. وذكر المصنف في الموضع المشار إليه أن أكثر أصحاب شعبة أوقفوه على ابن عباس. ورواية شعبة عن عطاء بن السائب قبل اختلاطه، فالإسناد صحيح.والحديث في "مسند أحمد" 4/ (2144) و 5 / (3154). وانظر تتمة الكلام عليه هناك.وأخرجه النسائي (1174)، وابن حبان (6215) من طريقين عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.وسيأتي بنحوه برقم (7827) من طريق علي بن زيد عن يوسف بن مهران عن ابن عباس مرفوعًا. وعلي بن زيد -وهو ابن جُدعان- ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (190)


190 - حدثنا أبو عليٍّ الحافظ، أخبرنا عَبْدانُ الأهوازي، حدثنا محمد بن عبد الأعلى، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا شعبة، أخبرني عَدِيُّ بن ثابت وعطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه ذكر: "أَنَّ جبريل جَعَلَ يَدُسُّ في فم فرعونَ الطينَ خَشْية أن يقول: لا إله إلَّا الله، فيرحمه الله"، أو قال: "خشية أن يرحمه الله" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উল্লেখ করেছেন যে, জিবরীল (আঃ) ফিরআউনের মুখে কাদা ভরে দিচ্ছিলেন, এই ভয়ে যে সে যেন ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ না বলে ফেলে, ফলে আল্লাহ তাকে রহম করবেন। অথবা তিনি (রাসূল) বলেছেন: “এই ভয়ে যে আল্লাহ তাকে রহম করবেন।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح موقوفًا كسابقه.وأخرجه الترمذي (3108) عن محمد بن عبد الأعلى بهذا الإسناد. وأشار إلى أن أحد الرجلين - أي عطاء بن السائب وعدي بن ثابت - ذكره عن النبي صلى الله عليه وسلم، أي: مرفوعًا، والذي رفعه هو عدي بن ثابت كما تقدَّم، وقال الترمذي حديث حسن صحيح.وسيأتي برقم (7826) من طريق يحيى بن حكيم عن خالد بن الحارث. شاذّة، فقد انفرد بها محمد بن إسحاق -وهو صدوق حسن الحديث- وخالفه عبد الواحد بن زياد -وهو ثقة- عند أحمد 42 / (25515) فلم يذكرها، وإسناده قوي.وأما حديث ابن إسحاق فهو عند أحمد 40 / (24215)، وصرَّح فيه بسماعه من عبد الواحد ابن حمزة.وأخرجه ابن حبان (7372) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (949) و (7828) و (8942) من طريق ابن إسحاق، وصرَّح عنده في الموضعين الأوَّلَين بالسماع، وانظر (1294) و (1300) و (8943).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (191)


191 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو زُرعة عبد الرحمن بن عمرو الدمشقي، حدثنا أحمد بن خالد الوَهْبي، حدثنا محمد بن إسحاق.وأخبرنا أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الواحد بن حمزة ابن [1] عبد الله بن الزُّبير، عن عبَّاد بن عبد الله بن الزُّبير، عن عائشة قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في بعض صلاته: "اللهم حاسِبني حسابًا يسيرًا"، فلما انصرف قلت: يا رسول الله، ما الحساب اليسيرُ؟ قال: "يُنظَرُ في كتابه ويُتَجاوَزُ عنه، إنه مَن نُوقِشَ الحساب يومئذٍ يا عائشةُ هَلَكَ، وكلُّ ما يصيبُ المؤمنَ يكفِّرُ [2] الله عنه، حتى الشوكةُ تَشُوكُه" [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، إنما اتَّفقا على حديث ابن أبي مُليكة عن عائشة أنَّ رسول الله رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن نُوقِشَ الحِسابَ عُذِّبَ" [4].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর কোনো কোনো সালাতে বলতে শুনেছি: "হে আল্লাহ! আমার হিসাব সহজ করুন।" যখন তিনি (সালাত) শেষ করলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! সহজ হিসাব কী? তিনি বললেন: "তার আমলনামা দেখা হবে এবং তা উপেক্ষা করা হবে (অর্থাৎ মাফ করে দেওয়া হবে)। নিশ্চয়ই, হে আয়িশা! সেদিন যার হিসাব কড়াকড়িভাবে নেওয়া হবে, সে ধ্বংস হবে। আর মু'মিনের যা কিছু বিপদ হয়, আল্লাহ তার দ্বারা (পাপ) মোচন করে দেন, এমনকি যে কাঁটা তাকে বিঁধে, তার বিনিময়েও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف لفظ "بن" في النسخ الخطية إلى: عن. شاذّة، فقد انفرد بها محمد بن إسحاق -وهو صدوق حسن الحديث- وخالفه عبد الواحد بن زياد -وهو ثقة- عند أحمد 42 / (25515) فلم يذكرها، وإسناده قوي.وأما حديث ابن إسحاق فهو عند أحمد 40 / (24215)، وصرَّح فيه بسماعه من عبد الواحد ابن حمزة.وأخرجه ابن حبان (7372) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (949) و (7828) و (8942) من طريق ابن إسحاق، وصرَّح عنده في الموضعين الأوَّلَين بالسماع، وانظر (1294) و (1300) و (8943).



[2] تحرّف في (ب) والمطبوع إلى: يلقي. شاذّة، فقد انفرد بها محمد بن إسحاق -وهو صدوق حسن الحديث- وخالفه عبد الواحد بن زياد -وهو ثقة- عند أحمد 42 / (25515) فلم يذكرها، وإسناده قوي.وأما حديث ابن إسحاق فهو عند أحمد 40 / (24215)، وصرَّح فيه بسماعه من عبد الواحد ابن حمزة.وأخرجه ابن حبان (7372) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (949) و (7828) و (8942) من طريق ابن إسحاق، وصرَّح عنده في الموضعين الأوَّلَين بالسماع، وانظر (1294) و (1300) و (8943).



191 [3] - حديث صحيح دون قصة دعائه صلى الله عليه وسلم في الصلاة بـ "اللهم حاسبني حسابًا يسيرًا" فهي زيادة شاذّة، فقد انفرد بها محمد بن إسحاق -وهو صدوق حسن الحديث- وخالفه عبد الواحد بن زياد -وهو ثقة- عند أحمد 42 / (25515) فلم يذكرها، وإسناده قوي.وأما حديث ابن إسحاق فهو عند أحمد 40 / (24215)، وصرَّح فيه بسماعه من عبد الواحد ابن حمزة.وأخرجه ابن حبان (7372) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (949) و (7828) و (8942) من طريق ابن إسحاق، وصرَّح عنده في الموضعين الأوَّلَين بالسماع، وانظر (1294) و (1300) و (8943).



191 [4] - أخرجه البخاري برقم (103) و (4939) و (6536)، ومسلم برقم (2876) من طرق عن ابن أبي مليكة. وسيأتي بنحوه من طريقه عند المصنف برقم (7891).كما أنهما اتفقا على حديث عروة بن الزبير عن عائشة أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما من مصيبة تصيب المسلم إلا كفَّر الله بها عنه، حتى الشوكة يُشاكها"، أخرجه البخاري برقم (5640)، ومسلم برقم (2572). وأحسن منه في هذا المعنى ما سيأتي برقم (8837) من حديث ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أيُّ المؤمنين أكيسُ؟ فقال: "أكثرهم للموتِ ذكرًا، وأحسنهم له استعدادًا قبل أن ينزل بهم، أولئك من الأكياس". وإسناده حسن.قوله: "من دان نفسه" معناه -كما قال الترمذي-: من حاسب نفسه في الدنيا قبل أن يُحاسب يوم القيامة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (192)


192 - أخبرنا الحسن بن حَلِيم المروَزي، حدثنا أبو الموجِّه، حدثنا عَبْدانُ، حدثنا عبد الله، أخبرنا أبو بكر بن أبي مريم الغسَّاني، عن ضَمْرة بن حبيب، عن شدَّاد بن أَوْس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الكيِّسُ من دان نفسَه وعَمِلَ لما بعد الموت، والعاجزُ من أتبع نفسه هواها، وتمنَّى على الله" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




শাদদাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বুদ্ধিমান সেই ব্যক্তি, যে নিজের নফসের হিসাব নেয় এবং মৃত্যুর পরবর্তী জীবনের জন্য কাজ করে। আর অক্ষম সেই ব্যক্তি, যে নিজের নফসকে তার প্রবৃত্তির অনুসরণ করতে দেয় এবং আল্লাহর কাছে বৃথা আশা পোষণ করে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف لضعف أبي بكر بن أبي مريم، وغالى الذهبي في "تلخيص المستدرك" فوصفه بأنه واهٍ. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعبدان: لقب واسمه عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.وأخرجه أحمد 28 (17123)، والترمذي (2459) من طريقين عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه ابن ماجه (4260)، والترمذي (2459) من طريقين عن أبي بكر بن أبي مريم، به. وسيأتي عند المصنف برقم (7831). وأحسن منه في هذا المعنى ما سيأتي برقم (8837) من حديث ابن عمر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سئل: أيُّ المؤمنين أكيسُ؟ فقال: "أكثرهم للموتِ ذكرًا، وأحسنهم له استعدادًا قبل أن ينزل بهم، أولئك من الأكياس". وإسناده حسن.قوله: "من دان نفسه" معناه -كما قال الترمذي-: من حاسب نفسه في الدنيا قبل أن يُحاسب يوم القيامة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (193)


193 - أخبرنا أبو العباس عبد الله بن الحسين القاضي بمرْو، حدثنا الحارث ابن أبي أسامة، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا محمد بن عبد العزيز بن عبد الرحمن ابن عَوْف، حدثني حَسَن [1] بن عثمان بن عبد الرحمن بن عوف وعبد الرحمن بن حُميد بن عبد الرحمن بن عوف، عن عامر بن سعد، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "المؤمنُ مُكفَّرٌ" [2]. قد اتَّفقا على عبد الرحمن بن حُميد بن عبد الرحمن.وهذا حديث غريب صحيح، ولم يُخرجاه لجهالة محمد بن عبد العزيز الزُّهري هذا.




সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিন ক্ষমাপ্রাপ্ত হয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حسين، مصغرًا، والصواب، حسن، كما في مصادر ترجمته، منها "التاريخ الكبير" للبخاري 2/ 300، و"الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم 13/ 25، و"الثقات" لابن حبان 4/ 123. وهو خطأ، فإنَّ الزهري هي نسبة الحسن نفسه، ووقع فيه أيضًا: سهل بن بكار ثنا الحسن بن عثمان، بإسقاط محمد بن عبد العزيز، وبناءً عليه وهم الشيخ ناصر الدين الألباني رحمه الله في "السلسلة الصحيحة" (2367) فجعل طريق الخطابي متابعًا لطريق الحاكم، وهما في الحقيقة طريق واحد فيهما محمد بن عبد العزيز هذا.قوله: "المؤمن مكفَّر" قال الخطابي: معناه: أنه مرزَّأٌ (أي: مصابٌ) في نفسه وأهله، وأنه لا يزال يُنكَب وتصيبه المكاره فتكون كفارةً لذنوبه.وفسّره الدَّيلمي في "الفردوس" (6550) بأنَّ المؤمن يصطنع المعروف فلا يُشكَر، وبنحوه فسّره الهيثمي في "كشف الأستار عن زوائد البزار" (1907) فقال: يعني: تُكفَر نعمتُه لأنَّ ابن أبي الدنيا ذكر أحاديث مثل هذا في مثل هذا الباب.



[2] إسناده ضعيف جدًا، محمد بن عبد العزيز - وهو ابن عمر بن عبد الرحمن بن عوف الزهري - قال فيه البخاري: منكر الحديث، وقال النسائي: متروك الحديث، وذكره الدارقطني في "الضعفاء والمتروكين"، وليس مجهولًا كما قال الحاكم، بل المجهول جهالة حالٍ هو الحسن ابن عثمان بن عبد الرحمن، ومتابعة عبد الرحمن بن حميد -وهو ثقة- له هنا لا تفيد شيئًا، فإنَّ الراوي عنهما متروك الحديث.وأخرجه البزار في "مسنده" (1129)، والخطابي في "غريب الحديث" 1/ 690 من طريق سهل ابن بكار، عن محمد بن عبد العزيز، عن الحسن بن عثمان، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7832) من طريق محمد بن سعد العوفي عن روح بن عبادة، ليس فيه قوله: "حدثني حسن بن عثمان بن عبد الرحمن بن عوف" فإن صحّ ما في النسخ الخطية، وإلَّا فإنَّ محمد بن سعد العوفي يكون قد أسقطه، فصار عبد الرحمن بن حميد قرينًا لمحمد بن عبد العزيز المتروك ومتابعًا له، والعوفي ليس بذاك القوي، ولا سيما وقد خالف الحارث بن أبي أسامة وهو حافظ ثقة.تنبيه: وقع في "غريب الحديث" للخطابي: عن الحسن بن عثمان عن الزهري، بزيادة "عن" وهو خطأ، فإنَّ الزهري هي نسبة الحسن نفسه، ووقع فيه أيضًا: سهل بن بكار ثنا الحسن بن عثمان، بإسقاط محمد بن عبد العزيز، وبناءً عليه وهم الشيخ ناصر الدين الألباني رحمه الله في "السلسلة الصحيحة" (2367) فجعل طريق الخطابي متابعًا لطريق الحاكم، وهما في الحقيقة طريق واحد فيهما محمد بن عبد العزيز هذا.قوله: "المؤمن مكفَّر" قال الخطابي: معناه: أنه مرزَّأٌ (أي: مصابٌ) في نفسه وأهله، وأنه لا يزال يُنكَب وتصيبه المكاره فتكون كفارةً لذنوبه.وفسّره الدَّيلمي في "الفردوس" (6550) بأنَّ المؤمن يصطنع المعروف فلا يُشكَر، وبنحوه فسّره الهيثمي في "كشف الأستار عن زوائد البزار" (1907) فقال: يعني: تُكفَر نعمتُه لأنَّ ابن أبي الدنيا ذكر أحاديث مثل هذا في مثل هذا الباب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (194)


194 - أخبرنا أبو الحُسين [1] أحمد بن عثمان الأَدَمي ببغداد، حدثنا أبو قِلابةَ، حدثنا حجَّاج بن نُصَير، حدثنا شدَّاد بن سعيد.وأخبرني أبو بكر بن إسحاق الفقيه، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنبَل، حدثنا عُبيد الله بن عمر القواريري، حدثنا حَرَمِيُّ بن عُمَارة، حدثنا شدَّاد بن سعيد أبو طلحة الرَّاسبي، عن غَيْلان بن جرير، عن أبي بُردة، عن أبي موسى قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تُحشَرُ هذه الأُمة على ثلاثة أصناف: صنفٍ يدخلون الجنة بغير حساب، وصنفٍ يُحاسبون حسابًا يسيرًا ثم يدخلون الجنة، وصنفٍ يجيئون على ظُهورهم أمثالُ الجبال الراسياتِ ذنوبًا، فيَسأَلُ الله عنهم -وهو أعلمُ بهم- فيقول: ما هؤلاء؟ فيقولون: هؤلاءِ عَبيدٌ من عبادِك، فيقول: حُطُّوها عنهم واجعَلُوها على اليهود والنصارى، وأدخِلوهم برحمتي الجنة" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح من حديث حَرَميِّ بن عُمارة على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، فأما حجَّاج بن نُصَير فإني قَرَنتُه إلى حَرَمىٍّ لأني عَلَوتُ فيه.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এই উম্মতকে তিন শ্রেণিতে একত্রিত (হাশর) করা হবে: এক শ্রেণি, যারা বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করবে; এবং এক শ্রেণি, যাদের সহজ হিসাব নেওয়া হবে, অতঃপর তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে। আর এক শ্রেণি, যারা তাদের পিঠের উপর সুদৃঢ় পাহাড়ের মতো (বিশাল) গুনাহের বোঝা নিয়ে উপস্থিত হবে। তখন আল্লাহ তাদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করবেন— যদিও তিনি তাদের সম্পর্কে সবচেয়ে ভালো জানেন— তিনি বলবেন: 'এরা কারা?' তখন তারা (ফেরেশতারা) বলবে: 'এরা আপনার বান্দাদের মধ্যে থেকে একদল বান্দা।' তখন তিনি বলবেন: 'তাদের কাছ থেকে এগুলি নামিয়ে রাখো এবং ইহুদি ও খ্রিস্টানদের উপর চাপিয়ে দাও। আর তোমরা আমার রহমতে তাদের জান্নাতে প্রবেশ করাও।'"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تحرَّف في (ص) و (ب) والمطبوع إلى: أبو الحسن. وانظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" 15/ 568. عن شدّاد أبي طلحة الراسبي فيما سيأتي عند المصنف برقم (9009)، لكن تبقى علته في شداد أبي طلحة، فهو - وإن كان موثَّقًا - ربما أخطأ كما قال ابن حبان، وقد خولف في لفظه كما سيأتي، وأعلَّه به البيهقي في "شعب الإيمان" بإثر الحديث (373) وقال: ليس هو ممَّن يُقبل منه ما يخالف فيه.وأخرجه الرُّوياني في "مسنده" (506) عن محمد بن معمر عن الحجاج بن نصير، بهذا الإسناد.وسيأتي عن عند المصنف برقم (7837) من طريقين آخرين عن الحجاج بن نصير.وأما حَرَمِيُّ بن عمارة فقد رواه عن شدادٍ فيما سيأتي برقم (7836) مختصرًا بلفظ: "ليجيئنَّ أقوام من أُمتي بمثل الجبال ذنوبًا، فيغفرها لهم ويضعها على اليهود والنصارى".أخرج حديث حرميٍّ مسلمٌ (2767) (51) عن محمد بن عمرو بن أبي روّاد، عن حرمي بن عمارة، به ـ وزاد فيه بعد قوله: "ويضعها على اليهود والنصارى": فيما أحسب أنا؛ قال أبو رَوْح - وهو حرميٌّ -: لا أدري ممَّن الشكُّ.ولفظ حرميٍّ عن شدّادٍ الراسبي شاذٌ أيضًا، وقال البيهقي معقِّبًا على هذه الرواية بإثر تخريجه له في كتابه "البعث والنشور" (90): إلّا أنَّ اللفظ الذي تفرَّد به شداد أبو طلحة بروايته في هذا الحديث، وهو قوله: "ويضعها على اليهود والنصارى" مع شكٍّ الراوي فيه، لا أراه محفوظًا، والكافر لا يُعاقب بذنب غيره، قال الله عز وجل: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164]، وإنما لفظ الحديث على ما رواه سعيد بن أبي بردة وغيره عن أبي بردة.قلنا: يشير إلى ما أخرجه مسلم (2767) (50) من طريق همام عن قتادة عن عون -وهو ابن عبد الله بن عتبة- وسعيد بن أبي بردة، كلاهما عن أبي بردة بن أبي موسى، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يموت رجلٌ مسلم إلّا أدخل الله مكانه النار يهوديًا أو نصرانيًا".وأخرجه من هذا الطريق أحمد 32 (19485) و (19560)، وابن حبان (630). وهذا إسناد صحيح، ولفظه أصحُّ ما جاء في حديث أبي بردة هذا عن أبيه. وقد تابع عونًا وسعيدًا عليه طلحةُ ابن يحيى عند مسلم (2767) (49)، وهو صدوق حسن الحديث، وغيرُه كما في التعليق على الحديث (19485) من "مسند أحمد"، وزاد طلحة بن يحيى فيه: "فيقول: هذا فَكَاكُك من النار".وقوله: "أدخل الله مكانه النار يهوديًا أو نصرانيًا" قال الإمام النووي في "شرح مسلم": معنى هذا الحديث ما جاء في حديث أبي هريرة: "لكل أحدٍ منزل في الجنة ومنزل في النار" فالمؤمن إذا دخل الجنة خَلَفَه الكافر في النار لاستحقاقه ذلك بكفره، ومعنى "فكاكك النار": أنك كنت معرَّضًا لدخول النار وهذا فكاكك، لأنَّ الله تعالى قدَّر لها عددًا يملؤُها، فإذا دخلها الكفار بكفرهم وذنوبهم، صاروا في معنى الفكاك للمسلمين.وحديث أبي هريرة الذي أشار إليه النووي أخرجه ابن ماجه (4341) بسند صحيح.



[2] ضعيف بهذا اللفظ، وهو لحجّاج بن نصير، وهو ضعيف، وقد تابعه عليه عفان بن مسلم عن شدّاد أبي طلحة الراسبي فيما سيأتي عند المصنف برقم (9009)، لكن تبقى علته في شداد أبي طلحة، فهو - وإن كان موثَّقًا - ربما أخطأ كما قال ابن حبان، وقد خولف في لفظه كما سيأتي، وأعلَّه به البيهقي في "شعب الإيمان" بإثر الحديث (373) وقال: ليس هو ممَّن يُقبل منه ما يخالف فيه.وأخرجه الرُّوياني في "مسنده" (506) عن محمد بن معمر عن الحجاج بن نصير، بهذا الإسناد.وسيأتي عن عند المصنف برقم (7837) من طريقين آخرين عن الحجاج بن نصير.وأما حَرَمِيُّ بن عمارة فقد رواه عن شدادٍ فيما سيأتي برقم (7836) مختصرًا بلفظ: "ليجيئنَّ أقوام من أُمتي بمثل الجبال ذنوبًا، فيغفرها لهم ويضعها على اليهود والنصارى".أخرج حديث حرميٍّ مسلمٌ (2767) (51) عن محمد بن عمرو بن أبي روّاد، عن حرمي بن عمارة، به ـ وزاد فيه بعد قوله: "ويضعها على اليهود والنصارى": فيما أحسب أنا؛ قال أبو رَوْح - وهو حرميٌّ -: لا أدري ممَّن الشكُّ.ولفظ حرميٍّ عن شدّادٍ الراسبي شاذٌ أيضًا، وقال البيهقي معقِّبًا على هذه الرواية بإثر تخريجه له في كتابه "البعث والنشور" (90): إلّا أنَّ اللفظ الذي تفرَّد به شداد أبو طلحة بروايته في هذا الحديث، وهو قوله: "ويضعها على اليهود والنصارى" مع شكٍّ الراوي فيه، لا أراه محفوظًا، والكافر لا يُعاقب بذنب غيره، قال الله عز وجل: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [الأنعام: 164]، وإنما لفظ الحديث على ما رواه سعيد بن أبي بردة وغيره عن أبي بردة.قلنا: يشير إلى ما أخرجه مسلم (2767) (50) من طريق همام عن قتادة عن عون -وهو ابن عبد الله بن عتبة- وسعيد بن أبي بردة، كلاهما عن أبي بردة بن أبي موسى، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يموت رجلٌ مسلم إلّا أدخل الله مكانه النار يهوديًا أو نصرانيًا".وأخرجه من هذا الطريق أحمد 32 (19485) و (19560)، وابن حبان (630). وهذا إسناد صحيح، ولفظه أصحُّ ما جاء في حديث أبي بردة هذا عن أبيه. وقد تابع عونًا وسعيدًا عليه طلحةُ ابن يحيى عند مسلم (2767) (49)، وهو صدوق حسن الحديث، وغيرُه كما في التعليق على الحديث (19485) من "مسند أحمد"، وزاد طلحة بن يحيى فيه: "فيقول: هذا فَكَاكُك من النار".وقوله: "أدخل الله مكانه النار يهوديًا أو نصرانيًا" قال الإمام النووي في "شرح مسلم": معنى هذا الحديث ما جاء في حديث أبي هريرة: "لكل أحدٍ منزل في الجنة ومنزل في النار" فالمؤمن إذا دخل الجنة خَلَفَه الكافر في النار لاستحقاقه ذلك بكفره، ومعنى "فكاكك النار": أنك كنت معرَّضًا لدخول النار وهذا فكاكك، لأنَّ الله تعالى قدَّر لها عددًا يملؤُها، فإذا دخلها الكفار بكفرهم وذنوبهم، صاروا في معنى الفكاك للمسلمين.وحديث أبي هريرة الذي أشار إليه النووي أخرجه ابن ماجه (4341) بسند صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (195)


195 - حدثني علي بن بُندار الزاهد، حدثنا جعفر بن محمد الفريابي، حدثنا محمد بن المثنى الزَّمِنُ، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا حُميد، عن أنس قال: كان صبيٌّ على ظهر الطريق، فمرَّ النبي صلى الله عليه وسلم ومعه ناس، فلما رأت أمُّ الصبي القومَ خَشِيَت أن يُوطأ ابنُها، فسَعَتْ فحَمَلَته، فقالت: ابني ابني، قال القوم: يا رسول الله، ما كانت هذه لتُلقِيَ ابنَها في النار، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ولا اللهُ يُلقي حبيبه في النار" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, (একবার) রাস্তার উপরে একটি শিশু ছিল। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু লোকসহ সেখান দিয়ে যাচ্ছিলেন। যখন শিশুটির মা লোকজনকে দেখলেন, তখন তিনি ভয় পেলেন যে তার ছেলেকে (পা দিয়ে) চাপা দেওয়া হবে। তাই তিনি দ্রুত দৌড়ে এসে তাকে কোলে তুলে নিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমার সন্তান! আমার সন্তান! লোকেরা বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই মহিলা যেমন তার সন্তানকে আগুনে নিক্ষেপ করতে পারে না, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তেমনি আল্লাহও তাঁর প্রিয়জনকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করবেন না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل.وأخرجه أحمد 19 (12018) و (13467) من طريقين عن حميد الطويل، به. وسيأتي برقم (7534). أبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليَزَني.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (6695) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الروياني في "مسنده" (173)، والطبراني في "الكبير" (17 (791)، و"الأوسط" (8689)، و"الدعاء" (1781) من طريقين عن عبد الله بن صالح، به. وسيأتي برقم (7851).وأخرجه الحافظ ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 134 من طريق الطبراني، ثم قال: حديث حسن صحيح. وكذا أورده الهيثمي في "مجمع الزوائد" 10/ 200 وعزاه للطبراني وحسَّن إسناده.ويشهد لمعناه حديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (7800) مستدركًا إياه على الشيخين وصحَّحه على شرطهما، فوهم، فقد أخرجه البخاري برقم (7507) ومسلم برقم (2758) من الطريق ذاته.قوله: "ولا يملُّ الله حتى تملُّوا" قال البغوي في "شرح السنة" 4/ 49: معناه: لا يَمَلُّ الله وإن مللتم، لأنَّ المَلَال (وهو استثقال الشيء ونفور النفس عنه بعد محبته) عليه لا يجوز.وقيل: معناه: إنَّ الله لا يقطع عنكم فضله حتى تملوا سؤاله.وقيل: معناه: لا يترك الله الثواب والجزاء ما لم تملوا من العمل، ومعنى الملال: الترك، وأنَّ من مل شيئًا تركه وأعرض عنه، فكنى بالملال عن الترك، لأنه سبب الترك.وقال الإسماعيلي وجماعة من المحققين: إنما أطلق هذا على جهة المقابلة اللفظية مجازًا.قال القرطبي المحدِّث: ووجه مجازه أنه تعالى لما كان يقطع ثوابه عمن يقطع العمل ملالًا، عبر عن ذلك بالملال من باب تسمية الشيء باسم سببه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (196)


196 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد قال: قُرِئَ على محمد بن الهيثم القاضي وأنا أسمع: حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عُقبة بن عامر الجُهَني: أنَّ رجلًا أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، أحدُنا يُذنِبُ، قال: يُكتَبُ عليه، قال: ثم يستغفر منه ويتوب، قال: "يُغفَرُ له ويُتابُ عليه"، قال: فيعودُ فيُذنب، قال: "يُكتَبُ عليه"، قال: ثم يستغفر منه ويتوب، قال: "يُغفَرُ له ويُتابُ عليه"، قال: فيعودُ فيُذنب، قال: "يُكتب عليه"، قال: ثم يستغفر منه ويتوب، قال: "يُغفَرُ له ويُتابُ عليه [1]، ولا يَمَلُّ الله حتى تَمَلُّوا" [2]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




উকবাহ ইবনু আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: "ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের কেউ কেউ গুনাহ করে ফেলে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা তার বিরুদ্ধে লিপিবদ্ধ করা হয়।" লোকটি বলল: "এরপর সে এর জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করে এবং তাওবা করে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ক্ষমা করা হয় এবং তার তাওবা কবুল করা হয়।" লোকটি বলল: "এরপর সে আবার ফিরে গিয়ে গুনাহ করে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা তার বিরুদ্ধে লিপিবদ্ধ করা হয়।" লোকটি বলল: "এরপর সে আবার ক্ষমা প্রার্থনা করে এবং তাওবা করে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ক্ষমা করা হয় এবং তার তাওবা কবুল করা হয়।" লোকটি বলল: "এরপর সে আবার ফিরে গিয়ে গুনাহ করে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা তার বিরুদ্ধে লিপিবদ্ধ করা হয়।" লোকটি বলল: "এরপর সে আবার ক্ষমা প্রার্থনা করে এবং তাওবা করে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ক্ষমা করা হয় এবং তার তাওবা কবুল করা হয়। আল্লাহ ততক্ষণ পর্যন্ত (ক্ষমা করতে) বিরক্ত হন না, যতক্ষণ না তোমরা (তাওবা করতে করতে) বিরক্ত হয়ে যাও।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] من قوله في الموضع الأول: "قال: فيعود فيذنب" إلى هنا سقط من (ب). أبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليَزَني.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (6695) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الروياني في "مسنده" (173)، والطبراني في "الكبير" (17 (791)، و"الأوسط" (8689)، و"الدعاء" (1781) من طريقين عن عبد الله بن صالح، به. وسيأتي برقم (7851).وأخرجه الحافظ ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 134 من طريق الطبراني، ثم قال: حديث حسن صحيح. وكذا أورده الهيثمي في "مجمع الزوائد" 10/ 200 وعزاه للطبراني وحسَّن إسناده.ويشهد لمعناه حديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (7800) مستدركًا إياه على الشيخين وصحَّحه على شرطهما، فوهم، فقد أخرجه البخاري برقم (7507) ومسلم برقم (2758) من الطريق ذاته.قوله: "ولا يملُّ الله حتى تملُّوا" قال البغوي في "شرح السنة" 4/ 49: معناه: لا يَمَلُّ الله وإن مللتم، لأنَّ المَلَال (وهو استثقال الشيء ونفور النفس عنه بعد محبته) عليه لا يجوز.وقيل: معناه: إنَّ الله لا يقطع عنكم فضله حتى تملوا سؤاله.وقيل: معناه: لا يترك الله الثواب والجزاء ما لم تملوا من العمل، ومعنى الملال: الترك، وأنَّ من مل شيئًا تركه وأعرض عنه، فكنى بالملال عن الترك، لأنه سبب الترك.وقال الإسماعيلي وجماعة من المحققين: إنما أطلق هذا على جهة المقابلة اللفظية مجازًا.قال القرطبي المحدِّث: ووجه مجازه أنه تعالى لما كان يقطع ثوابه عمن يقطع العمل ملالًا، عبر عن ذلك بالملال من باب تسمية الشيء باسم سببه.



[2] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح - وهو كاتب الليث - وقد توبع على معنى حديثه هذا، وقد روى له البخاري في "صحيحه" تعليقًا، ومن فوقه ثقات من رجال الشيخين. أبو الخير: هو مرثد بن عبد الله اليَزَني.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (6695) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الروياني في "مسنده" (173)، والطبراني في "الكبير" (17 (791)، و"الأوسط" (8689)، و"الدعاء" (1781) من طريقين عن عبد الله بن صالح، به. وسيأتي برقم (7851).وأخرجه الحافظ ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 134 من طريق الطبراني، ثم قال: حديث حسن صحيح. وكذا أورده الهيثمي في "مجمع الزوائد" 10/ 200 وعزاه للطبراني وحسَّن إسناده.ويشهد لمعناه حديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (7800) مستدركًا إياه على الشيخين وصحَّحه على شرطهما، فوهم، فقد أخرجه البخاري برقم (7507) ومسلم برقم (2758) من الطريق ذاته.قوله: "ولا يملُّ الله حتى تملُّوا" قال البغوي في "شرح السنة" 4/ 49: معناه: لا يَمَلُّ الله وإن مللتم، لأنَّ المَلَال (وهو استثقال الشيء ونفور النفس عنه بعد محبته) عليه لا يجوز.وقيل: معناه: إنَّ الله لا يقطع عنكم فضله حتى تملوا سؤاله.وقيل: معناه: لا يترك الله الثواب والجزاء ما لم تملوا من العمل، ومعنى الملال: الترك، وأنَّ من مل شيئًا تركه وأعرض عنه، فكنى بالملال عن الترك، لأنه سبب الترك.وقال الإسماعيلي وجماعة من المحققين: إنما أطلق هذا على جهة المقابلة اللفظية مجازًا.قال القرطبي المحدِّث: ووجه مجازه أنه تعالى لما كان يقطع ثوابه عمن يقطع العمل ملالًا، عبر عن ذلك بالملال من باب تسمية الشيء باسم سببه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (197)


197 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا أبو حُذَيفة، حدثنا سفيان.وحدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وكيع، عن سفيان، عن الأعمش، عن أبي الضُّحى، عن مسروق، عن عبد الله قال: الكبائرُ من أول سورة النساء إلى {إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ} [النساء: 31]، من أول السورة إلى ثلاثين آيةً [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وَجَبَ إخراجه على ما شَرَطتُ في تفسير الصحابة.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কাবাইর (কবীরা গুনাহসমূহ) হলো সূরা আন-নিসা-এর শুরু থেকে {যদি তোমরা সেই বড় পাপসমূহ থেকে বিরত থাকো যা থেকে তোমাদের নিষেধ করা হয়েছে...} (আন-নিসা: ৩১) পর্যন্ত—অর্থাৎ সূরার শুরু থেকে ত্রিশটি আয়াত পর্যন্ত।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النَّهدي، وسفيان هو الثوري، وأبو الضحى: هو مسلم بن صُبيح. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 5/ 37 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري 5/ 37، وابن المنذر في "تفسيره" (1666)، والطحاوي في "شرح المشكل" 2/ 354 من طرق عن الأعمش، به.وللأعمش فيه إسناد آخر، فقد أخرجه البزار (1532)، والطبري 5/ 37، والطحاوي 2/ 354، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 933 من طريق الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود. وهو صحيح أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (198)


198 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي إملاء، حدثنا أبو قلابة عبد الملك ابن محمد، حدثنا معاذ بن هانئ حدثنا حرب بن شدَّاد، حدثنا حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن عبد الحميد بن سنان، عن عُبيد بن عُمَير، عن أبيه، أنه حدَّثه -وكانت له صحبة- أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في حَجَّة الوداع: "ألا إِنَّ أولياء الله المصلُّونَ؛ من يقيمُ الصلوات الخمسَ التي كُتبنَ عليه، ويصومُ رمضان، ويحتسبُ صومه يرى أنه عليه حقٌّ، ويعطي زكاة ماله يحتسبُها، ويجتنبُ الكبائر التي نهى الله عنها"، ثم إنَّ رجلًا سأله فقال: يا رسول الله، ما الكبائرُ؟ فقال: "هنَّ [1] تسعٌ: الشِّرك بالله، وقتلُ نفس مؤمنٍ بغير حقٍّ، وفرارٌ يومَ الزَّحْف، وأكلُ مال اليتيم، وأكلُ الرِّبا، وقذفُ المُحصنة، وعقوقُ الوالدين المسلمين، واستحلالُ البيت الحرام قبلتكم أحياءً وأمواتًا" ثم قال: "لا يموتُ رجل لم يَعمَل هؤلاء الكبائر، ويقيمُ الصلاة ويؤتي الزكاة، إلا كان مع النبي صلى الله عليه وسلم في دارٍ أبوابُها مصاريعُ من ذهب" [2]. قد احتجَّا برواة هذا الحديث غيرَ عبد الحميد بن سِنان، فأما عُمَير بن قتادة فإنه صحابيٌّ، وابنه عُبيد متفق على إخراجه والاحتجاج به.




উমায়ের ইবনে কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ্জে বলেছেন:

"সাবধান! নিশ্চয়ই আল্লাহর ওলী (বন্ধুরা) হলো সালাত আদায়কারী; যারা তাদের উপর ফরযকৃত পাঁচ ওয়াক্ত সালাত কায়েম করে, যারা রমযানের রোযা রাখে এবং এই রোযাকে সাওয়াবের নিয়তে পালন করে এবং মনে করে এটি তাদের উপর আবশ্যকীয় হক্ব, যারা তাদের সম্পদের যাকাত সাওয়াবের নিয়তে আদায় করে এবং আল্লাহ যে সকল কবিরাহ (গুরুত্বপূর্ণ) পাপ থেকে নিষেধ করেছেন তা পরিহার করে।"

এরপর এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল, "হে আল্লাহর রাসূল! কবিরাহ গুনাহগুলো কী কী?"

তিনি বললেন: "সেগুলো হলো নয়টি: আল্লাহর সাথে শিরক করা, অন্যায়ভাবে কোনো মুমিনকে হত্যা করা, যুদ্ধের দিনে (যুদ্ধক্ষেত্র থেকে) পলায়ন করা, ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা, সুদ ভক্ষণ করা, সতী নারীকে অপবাদ দেওয়া, মুসলিম মাতা-পিতার অবাধ্য হওয়া এবং তোমাদের জীবিত ও মৃতদের কিবলাহ স্বরূপ হারাম ঘরের (কাবা শরীফের) পবিত্রতাকে হালকা জ্ঞান করা বা হালাল মনে করা।"

এরপর তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি এই কবিরাহ গুনাহগুলো করেনি, সালাত কায়েম করেছে এবং যাকাত দিয়েছে, সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এমন এক গৃহে থাকবে যার দরজাগুলো হবে স্বর্ণের কপাটবিশিষ্ট।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] في النسخ الخطية: هو، والمثبت من "سنن البيهقي" 3/ 408 حيث رواه عن المصنف ومن مصادر التخريج، وهو الجادّة. وأخرجه أبو داود (2875)، والنسائي (3461) من طريقين عن معاذ بن هانئ بهذا الإسناد.وهو عندهما مختصر.وأخرجه بتمامه الطحاوي في "مشكل الآثار" (898)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 931 من طريقين آخرين عن معاذ بن هانئ به -وذكرا فيه الكبيرة التاسعة التي لم تُذكر عند الحاكم: وهي السِّحر.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (7859) من طريق عبد الله بن رجاء عن حرب بن شداد. وفي الباب عن ابن عمر في عدِّ هذه الكبائر التسع، وهو موقوف عليه من قوله، أخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (8)، وإسناده قوي.وانظر في أحاديث الكبائر "شرح مشكل الآثار" للطحاوي 2/ 343 - 356.



[2] إسناده ضعيف لجهالة عبد الحميد بن سنان، وقال البخاري عن حديثه هذا -فيما نقله عنه العقيلي في "الضعفاء" 2/ 531 - : فيه نظر. وأخرجه أبو داود (2875)، والنسائي (3461) من طريقين عن معاذ بن هانئ بهذا الإسناد.وهو عندهما مختصر.وأخرجه بتمامه الطحاوي في "مشكل الآثار" (898)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 931 من طريقين آخرين عن معاذ بن هانئ به -وذكرا فيه الكبيرة التاسعة التي لم تُذكر عند الحاكم: وهي السِّحر.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (7859) من طريق عبد الله بن رجاء عن حرب بن شداد. وفي الباب عن ابن عمر في عدِّ هذه الكبائر التسع، وهو موقوف عليه من قوله، أخرجه البخاري في "الأدب المفرد" (8)، وإسناده قوي.وانظر في أحاديث الكبائر "شرح مشكل الآثار" للطحاوي 2/ 343 - 356.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (199)


199 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا بشر بن حُجْر السَّامِي [1]، حدثنا عبد العزيز بن أبي سَلَمة، عن محمد بن المنكدر قال: التقى عبدُ الله بن عباس وعبد الله بن عمرو بن العاص، فقال له عبد الله بن عباس: أيُّ آيةٍ في كتاب الله أَرجى عندك؟ قال عبد الله بن عمرو: {يَاعِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ} [الزمر:53]، فقال: لكن قول إبراهيم: {رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِ الْمَوْتَى قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى وَلَكِنْ لِيَطْمَئِنَّ قَلْبِي} [البقرة: 260]، هذا لما في الصُّدور ويُوَسوسُ الشيطانُ، فَرَضِيَ اللهُ من قول إبراهيم بقوله: {أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى} [البقرة: 260] [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস ও আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ হয়েছিল। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস তাঁকে বললেন: আল্লাহর কিতাবে আপনার কাছে সবচেয়ে বেশি আশাব্যঞ্জক আয়াত কোনটি? আব্দুল্লাহ ইবনে আমর বললেন: “হে আমার বান্দাগণ, যারা নিজেদের উপর বাড়াবাড়ি করেছ, তোমরা আল্লাহর রহমত থেকে নিরাশ হয়ো না।” [সূরা যুমার: ৫৩] তখন (ইবনে আব্বাস) বললেন: কিন্তু (আমার কাছে অধিক আশাব্যঞ্জক হলো) ইবরাহীম (আঃ)-এর এই উক্তি: “হে আমার প্রতিপালক! আমাকে দেখান, আপনি কীভাবে মৃতকে জীবিত করেন। তিনি বললেন, তুমি কি বিশ্বাস কর না? সে বলল, অবশ্যই করি, তবে যেন আমার অন্তর শান্ত হয়।” [সূরা বাকারা: ২৬০] এটি (অর্থাৎ ইবরাহীম (আঃ)-এর জিজ্ঞাসা) হল এমন বিষয়ের জন্য যা মানুষের অন্তরে থাকে এবং শয়তান কুমন্ত্রণা দেয়। আল্লাহ তা’আলা ইবরাহীম (আঃ)-এর এই উক্তি দ্বারা তাঁর (ইবরাহীমের) প্রশ্ন থেকে সন্তুষ্ট হয়েছেন: “তিনি বললেন, তুমি কি বিশ্বাস কর না? সে বলল, অবশ্যই করি।” [সূরা বাকারা: ২৬০]




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تصحف في النسخ الخطية إلى: الشامي، والصواب ما أثبتنا، نسبةً إلى سامة بن لؤي بن غالب، وبشر هذا عراقيٌّ بصري. طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث، عن عبد العزيز أبي سلمة، به. وقرن أبو عبيد بابن المنكدر صفوان بن سليم، وصفوان لم يسمع منهما أيضًا، وعبد الله بن صالح في حفظه سوء.وأخرجه أبو داود في "الزهد" (303)، والطبري في "تفسيره" 3/ 49 من طريق شعبة، عن زيد بن علي، عن رجل، عن سعيد بن المسيب قال: اتَّعد عبد الله بن عباس وعبد الله بن عمرو أن يجتمعا … فذكر نحوه. وفي إسناده رجل مبهم، وزيد بن علي: أبوه هو زين العابدين علي بن الحسين.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (7863).



[2] رجاله ثقات إلا أن محمد بن المنكدر لم يدرك هذا اللقاء بين ابن عباس وعبد الله بن عمرو، فقد توفي عبد الله بن عمرو وابن المنكدر صغير لم يدرك السماع، وأعلَّه بالانقطاع الذهبي في "تلخيصه". عبد العزيز بن أبي سلمة: هو الماجشُون.وأخرجه أبو عبيد في "فضائل القرآن" ص 276 - 277، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 509 من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث، عن عبد العزيز أبي سلمة، به. وقرن أبو عبيد بابن المنكدر صفوان بن سليم، وصفوان لم يسمع منهما أيضًا، وعبد الله بن صالح في حفظه سوء.وأخرجه أبو داود في "الزهد" (303)، والطبري في "تفسيره" 3/ 49 من طريق شعبة، عن زيد بن علي، عن رجل، عن سعيد بن المسيب قال: اتَّعد عبد الله بن عباس وعبد الله بن عمرو أن يجتمعا … فذكر نحوه. وفي إسناده رجل مبهم، وزيد بن علي: أبوه هو زين العابدين علي بن الحسين.وسيأتي الحديث عند المصنف برقم (7863).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (200)


200 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا أبو النَّضر، حدثنا الليث بن سعد، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن عمرو ابن أبي عمرو، عن المطَّلب، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الرجلَ لَيُدرِكُ بحُسْنِ خُلُقِه، دَرَجاتِ قائم الليل صائم النهار" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وشاهدُه صحيح على شرط مسلم:




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি তার উত্তম চরিত্রের মাধ্যমে রাতে ইবাদতকারী এবং দিনে রোযাদার ব্যক্তির মর্যাদা লাভ করে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنه منقطع، المطلب ـ وهو ابن عبد الله بن حنطب - لم يسمع من عائشة في قول الجمهور. أبو النضر: هو هاشم بن القاسم الخراساني.وأخرجه أحمد 40/ (24355) و 41/ (24595) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، بهذا الإسناد. وقرن أحمد في الموضع الأول بأبي النضر يونس بن محمد المؤدِّب.وأخرجه أحمد 41 / (25013) و 42 / (25537)، وأبو داود (4798)، وابن حبان (480) من طرق عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب، به.ويشهد له حديث أبي هريرة التالي عند المصنف، وإسناده حسن.وآخر من حديث عبد الله بن عمرو عند أحمد 11/ (6648)، وإسناده حسن.وثالث من حديث أبي أمامة الباهلي عند البغوي في "شرح السنة" (3499)، وإسناده ضعيف.