হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1861)


1861 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أحمد بن علي الأبّار، حدثنا هشام بن خالد الأزرق، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا زهير بن محمد، عن منصور بن عبد الرحمن، عن أُمِّه، عن عائشةَ أُمِّ المؤمنين قالت: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا أتاه الأمرُ يَسُرُّه قال: "الحمدُ لله الذي بنِعمتِه تَتِمُّ الصالحاتُ"، وإذا أتاه الأمرُ يَكرَهُه قال: "الحمدُ لله على كلِّ حالٍ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা উম্মুল মুমিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যখন এমন কোনো বিষয় আসত যা তাঁকে আনন্দ দিত, তখন তিনি বলতেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যাঁর অনুগ্রহে নেক কাজসমূহ সম্পন্ন হয়।" আর যখন তাঁর কাছে এমন কোনো বিষয় আসত যা তিনি অপছন্দ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "সর্বাবস্থায় আল্লাহর জন্যই সমস্ত প্রশংসা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف، زهير بن محمد - وهو التميمي - رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، وهذا منها، فالوليد بن مسلم دمشقي. لكن للحديث شواهدُ يحسُن بها إن شاء الله. أم منصور بن عبد الرحمن: هي صفية بنت شيبة بن عثمان القرشية. وأخرجه ابن ماجه (3803) عن هشام بن خالد الأزرق، بهذا الإسناد.وسيأتي معناه برقم (2022) من طريق عيسى بن ميمون عن القاسم بن محمد عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما يمنع أحدكم إذا عرف الإجابة من نفسه، فشفي من مرض، أو قدم من سفر، يقول: الحمد لله الذي بعزته وجلاله تتم الصالحات". وعيسى بن ميمون - وهو مولى القاسم بن محمد بن أبي بكر الصّدّيق - متروك منكر الحديث.وله شاهد من حديث علي بن أبي طالب عند البزار (533)، وأبي الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم" (194)، والبغوي في "شرح السنة" (1380)، وفي سنده من لا يُعرف كما قال ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 655.وآخر عن أبي هريرة سيأتي تخريجه عند حديث عائشة الآتي برقم (2022)، لأنه مثل لفظه.وثالث عن ابن عباس عند الخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 221، وإسناده منقطع.ورابع عن حبيب بن أبي ثابت عن بعض أشياخه عند ابن أبي شيبة في "مصنفه" 10/ 340، وأبي داود في "المراسيل" (532)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (150)، ورجاله ثقات، وحبيبٌ له رواية عن بعض الصحابة، فإن كان الذي حدّثه صحابيٌّ فالإسناد صحيح، وإلا فهو مرسل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1862)


1862 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا محمد بن عيسى بن السَّكَن، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمَير، حدثنا أبي، حدثنا موسى بن سالم [1]، عن عون بن عبد الله بن عُتْبة، عن أبيه، عن النعمان بن بَشِيرٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الذين يَذكُرون مِن جَلالِ الله التحميدَ والتَّسبيحَ والتكبيرَ والتهليلَ، يَتعاطَفْنَ حولَ العرش، لهنَّ دَوِيٌّ كدَوِيِّ النحل، يَقُلنَ [2] لصاحبِهنَّ، [أفلا] يحبُّ [أحدُكم] [3] أن يكون له عندَ الرَّحمن شيءٌ يُذكِّره به" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যারা আল্লাহর মহিমা স্মরণ করে— তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ), তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ), তাকবীর (আল্লাহু আকবার) এবং তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ)-এর মাধ্যমে— সেগুলো আরশের চারপাশে ঘুরে বেড়ায়। মৌমাছির গুঞ্জনের মতো তাদের একটি গুঞ্জন থাকে। তারা তাদের পাঠকারীকে উদ্দেশ্য করে বলে, ‘তোমাদের মধ্যে কেউ কি এটা পছন্দ করে না যে তার জন্য রহমানের (আল্লাহর) কাছে এমন কিছু থাকুক যা তাকে স্মরণ করিয়ে দেয়?’”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا سماه المصنف هنا، وهو إما وهمٌ منه أو ممن فوقه، أو أنه تحريف في بعض الأصول القديمة، صوابه: موسى بن مسلم، وهو الحزامي أبو عيسى الطحان، يعرف بموسى الصغير. ولم يتنبه الذهبي لهذا الوهم، لذلك تعقب المصنفَ في تصحيحه لهذا الحديث فقال: موسى بن سالم قال أبو حاتم: منكر الحديث. وقد جاء كذلك في مصادر التخريج.



[2] كذا في النسخ الخطية، والذي في مصادر التخريج: يذكِّرن، والمعنى واحد، كأنهن يَقُلنَ كلامًا لأجل صاحبهن فيذكِّرن به، والله أعلم. وقد جاء كذلك في مصادر التخريج.



1862 [3] - ما بين معقوفات سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع، إذ لا يستقيم المعنى بدونه، وقد جاء كذلك في مصادر التخريج.



1862 [4] - إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 30/ (18362) عن عبد الله بن نمير، بهذا الإسناد. ووقعت تسمية موسى عنده على الصواب: موسى يعني ابن مسلم الطحان. ووقع عنده في الإسناد شك، ففيه: عن عون بن عبد الله عن أبيه أو عن أخيه عن النعمان بن بشير. وهذا الشك لا يضر في الحكم على الحديث لأنَّ أباه عبد الله وأخاه عبيد الله كلاهما ثقة من رجال الشيخين، والله تعالى أعلم.وسيأتي الحديث برقم (1876).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1863)


1863 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مَهْدي بن رُسْتُم.وحدثنا أبو الحُسين محمد بن أحمد بن تَمِيم القَنْطَري، حدثنا أبو قِلَابة الرَّقاشي [1].وحدثنا أبو بكر بنْ إسحاق الفقيه وأبو عمرو إسماعيل بن نُجَيد السُّلَمي وأبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي وأبو بكر بن بالَوَيهِ، قالوا: حدثنا أبو مسلم؛ قالوا: حدثنا أبو عاصم النَّبيل، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثني صالح بن أبي عَرِيب، عن كَثِير بن مُرَّةَ، عن معاذ بن جبلٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن كان آخرَ كلامِه لا إله إلَّا الله، دَخَلَ الجنة" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله قصةٌ لأبي زُرعةَ الرازي قد ذكرتُها في كتاب "المعرفة". حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شهر رمضان سنة ستٍّ وتسعين وثلاث مئة:




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার শেষ কথা হবে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: حدثنا أبو قلابة حدثنا الرقاشي، وهو خطأ واضح.



[2] حديث صحيح، وهذ إسناد حسن من أجل صالح بن أبي عَريب. أبو قلابة الرقاشي: هو عبد الملك بن محمد، وأبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله الكشي، وأبو عاصم النبيل: هو الضحاك بن مخلد.وسلف برقم (1315).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1864)


1864 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا أبو قِلَابةَ، حدثنا سهل بن حمّاد وحجّاج بن مِنْهال وأبو ظَفَرٍ، قالوا: حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابتٍ وداودَ بن أبي هند، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن قال في يومٍ مئةَ مرة: لا إله إلا الله وحده لا شريكَ له، له الملكُ وله الحمد، وهو على كلِّ شيءٍ قديرٌ، لم يَسبِقْهُ أحدٌ كان قبلَه ولا يُدرِكُه أحدٌ كان بعدَه، إلَّا مَن عمل عملًا أفضلَ من عملِه" [1]. 1864 م - سمعت الأستاذ أبا الوليد القرشي رضي الله عنه يقول: سمعت إبراهيم بن أبي طالبٍ يقول: سمعت إسحاق بن إبراهيم الحنظليَّ يقول: إذا كان الراوي عن عمرو بن شعيب ثقةً، فهو كأيوب عن نافع عن ابن عمر.قال الحاكم: لم أُخرِّج من أول الكتاب إلى هذا الموضع حديثًا لعمرو بن شعيب [2]، وقد ذكرتُ في أول كتاب الدعاء والتسبيح مذهبَ الإمام أبي سعيد عبد الرحمن بن مَهدي في المسامحة في أسانيدِ فضائل الأعمال.




তাঁর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি দিনে একশ'বার বলবে: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই, রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই, আর তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান), তবে তার পূর্বে থাকা কেউই তাকে অতিক্রম করতে পারবে না এবং তার পরে থাকা কেউই তাকে ধরতে পারবে না, তবে সেই ব্যক্তি ছাড়া যে তার আমলের চেয়ে উত্তম কোনো আমল করবে।" [১]

১৮৬৪ ম - আমি উস্তাদ আবুল ওয়ালীদ আল-কুরাশী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: আমি ইবরাহীম ইবনু আবী তালিবকে বলতে শুনেছি, তিনি ইসহাক ইবনু ইবরাহীম আল-হানযালীকে বলতে শুনেছেন যে, যদি আমর ইবনু শুআইব থেকে বর্ণনা করা রাবী বিশ্বস্ত হন, তবে তা আইয়ূব থেকে নাফি', তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনার মতোই (শক্তিশালী)। আল-হাকিম বলেছেন: আমি কিতাবের শুরু থেকে এই স্থান পর্যন্ত আমর ইবনু শুআইবের কোনো হাদীস সংকলন করিনি [২]। আর আমি কিতাবুদ-দু'আ ওয়াত-তাসবীহ-এর শুরুতে ফাযায়িলুল আমলের সনদসমূহে শিথিলতার বিষয়ে ইমাম আবূ সাঈদ আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাযহাবের কথা উল্লেখ করেছি।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن، إلّا أنَّ المحفوظ من رواية عمرو بن شعيب أنَّ من قالها في اليوم مئتي مرة، كما جاء في بعض الروايات عنه، وفي بعضها: مئة مرة حين يصبح ومئة مرة حين يمسي.أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرقاشي، وأبو ظَفَر: هو عبد السلام بن مطهِّر الأزدي، وثابت: هو ابن أسلم البناني.وأخرجه النسائي (10337) من طريق إبراهيم بن يعقوب، عن الحجاج بن منهال وحده، بهذا الإسناد. وفيه: من قال في يوم مئتي مرة … ".وأخرجه أحمد 11/ (6740) عن الحسن بن موسى الأشيب و (7005) عن عفان بن مسلم، كلاهما عن حماد بن سلمة، به. وقالا: "مئتي مرة".وأخرجه النسائي (10336) من طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن داود بن أبي هند وحده، به. وقال أيضًا: "مئتي مرة".وأخرجه النسائي (10335) من طريق شعبة عن الحكم بن عتيبة، و (10588) من طريق الأوزاعي، كلاهما عن عمرو بن شعيب، به. قال الحكم في روايته: "مئة مرة إذا أصبح، ومئة مرة إذا أمسى"، وقال الأوزاعي: "مئة مرة قبل طلوع الشمس، وقبل غروبها".وله شاهد من حديث أبي هريرة، أخرجه البخاري (3293)، ومسلم (2691) ولفظه: "من قال: لا إله إلَّا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، في يوم مئة مرة، كانت له عدل عشر رقاب، وكتبت له مئة حسنة، ومحيت عنه مئة سيئة، وكانت له حرزًا من الشيطان يوم ذلك حتى يمسي، ولم يأت أحد بأفضل مما جاء به إلّا أحد عمل أكثر من ذلك".



[2] تعقب ابنُ الملقن في "مختصر تلخيص الذهبي" (126) المصنِّفَ في قوله هذا، فقال: هذا عجيب من الحاكم، فإنه أخرج له في أول الصلاة (726) حديث: "مروا الصبيان بالصلاة لسبع … " الحديث، والعجب من الذهبي كيف أقرّه على ذلك. قلنا: بل العجب من ابن الملقن، فإنه لم يتنبه أنَّ الحاكم لم يخرج هذا الحديث محتجًا به، وإنما أورده في الشواهد، بل قد أعله بعدم سماع شعيب والد عمرو من جدّه عبد الله، وقد تكلمنا على هذه العلة هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1865)


1865 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا إسماعيل بن عيَّاش، عن راشد بن داود، عن يعلى بن شدّاد قال: حدثني أبي شدّادُ بن أوس، وعبادةُ بن الصامت حاضرٌ يصدِّقُه، قال: إِنا لَعِندَ رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ قال: "هل فيكم غَريبٌ؟ " - يعني أهلَ الكتاب - قلنا: لا يا رسول الله، فأمر بغَلْقِ الباب، فقال: "ارفَعوا أيدِيَكُم فقولوا: لا إله إلَّا الله" فرفعنا أيدِيَنا ساعةً، ثم وَضَعَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يدَه ثم قال: "الحمدُ لله، اللهم إنَّك بَعَثْتَني بهذه الكلمة، وأمرتَني بها، ووعدتَني عليها الجنةَ، إنك لا تُخْلِفُ الميعاد" ثم قال: "أبشِروا، فإنَّ الله قد غَفَرَ لكم" [1].قال الحاكم: حالُ إسماعيل بن عياش يَقرُب من الحديث قبلَ هذا، فإنه أحد أئمة أهل الشام، وقد نُسِبَ إلى سُوء الحفظ، وأنا على شَرْطي في أمثاله.




শাদ্দাদ ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আর উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে উপস্থিত ছিলেন এবং তিনি তাঁর কথা সমর্থন করছিলেন। তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। এমন সময় তিনি বললেন, "তোমাদের মধ্যে কি কোনো অপরিচিত ব্যক্তি আছে?" – অর্থাৎ, আহলে কিতাবদের (ইহুদি বা খ্রিস্টান) কথা বোঝাতে চাইলেন। আমরা বললাম, "না, ইয়া রাসূলাল্লাহ!" অতঃপর তিনি দরজা বন্ধ করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "তোমরা তোমাদের হাত উঠাও এবং বলো, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'।" আমরা কিছুক্ষণ আমাদের হাত তুলে রাখলাম। তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত নামালেন। এরপর তিনি বললেন, "আলহামদু লিল্লাহ (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর)। হে আল্লাহ, আপনি আমাকে এই কালেমা দিয়ে পাঠিয়েছেন, এর আদেশ দিয়েছেন এবং এর বিনিময়ে আমাকে জান্নাতের প্রতিশ্রুতি দিয়েছেন। নিশ্চয়ই আপনি ওয়াদা ভঙ্গ করেন না।" অতঃপর তিনি বললেন, "তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো, কারণ আল্লাহ তোমাদের ক্ষমা করে দিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف راشد بن داود - وهو الصنعاني الدمشقي - فإنَّ له مناكير. قال الذهبي في "تلخيصه". راشد ضعَّفه الدارقطني وغيره، ووثقه دحيم.وأخرجه أحمد 28/ (17121) عن أبي اليمان الحكم بن نافع، عن إسماعيل بن عياش، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1866)


1866 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا الحسن بن عطية، حدثنا محمد بن طلحة بن مُصرِّف، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن عَوْسَجة، عن البراء بن عازب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن قال: لا إله إلَّا الله، وحدَه لا شريكَ له، له الملكُ وله الحمدُ، وهو على كلِّ شيءٍ قديرٌ، عشرَ مِرارٍ، فهو كعَتَاقِ نَسَمة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "যে ব্যক্তি দশবার বলবে: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু, ওয়া হুয়া ‘আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই; তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই; রাজত্ব তাঁরই এবং সমস্ত প্রশংসা তাঁরই, আর তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান), তবে তা একটি গোলাম আযাদ করার সমতুল্য হবে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، إلَّا أنَّ محمد بن طلحة بن مصرف لم يسمع من أبيه كما سيأتي بيانه برقم (2144)، لكنه قد توبع. الحسن بن عطية: هو ابن نجيح القرشي، قال الذهبي في "التلخيص": الحسن ضعفه الأزدي. انتهى، وكذا قال الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب"، لكن قال: فأظنه اشتبه عليه بالذي قبله.وأخرجه أحمد 30/ (18516) عن عفان بن مسلم، عن محمد بن طلحة، بهذا الإسناد. لكن ليس فيه التكرار عشر مرار، وهو عند أحمد ضمن حديث مطوَّل.وأخرجه أحمد (18518) و (18704) من طريق شعبة بن الحجاج، والنسائي (9876) من طريق منصور بن المعتمر، وابن حبان (850) من طريق زبيد الإيامي، ثلاثتهم عن طلحة بن مصرف، به. رواية شعبة مطولة.وأخرجه أحمد (18531) من طريق قنان بن عبد الله النهمي، عن عبد الرحمن بن عوسجة، به وزاد فيه: "أو منح منحة، أو أهدى رقاقًا كان كعتق رقبة". وقال: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 35/ (21320) و (21429) و (21529)، ومسلم (2731) (84) و (85) من طرق عن سعيد بن إياس الجريري، به.وأخرجه النسائي (10591) من طريق عبد الله بن المختار، عن سعيد الجريري، عن أبي عبد الله الجسري، عن أبي ذر. لم يذكر عبد الله بن الصامت. قال الدارقطني في "العلل" (1107) بعد ذكر طريق عبد الله بن المختار هذه: والصواب قول ابن علية ومن تابعه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1867)


1867 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي، حدثنا إسماعيل ابن عُلَية، حدثنا سعيد بن إياس الجُرَيري، عن أبي عبد الله الجَسْري - حيٌّ من عَنَزَة - عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذرٍّ قال: قلت: يا رسولَ الله، بأبي وأُمِّي، أيُّ الكلام أحبُّ إلى الله؟ قال: "ما اصْطَفاهُ الله لملائكتِه: سبحانَ ربِّي، وبحمدِه سبحانَ ربِّي وبحمدِه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোক, আল্লাহর কাছে সবচেয়ে প্রিয় কালাম (কথা) কোনটি? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যা আল্লাহ তাঁর ফেরেশতাদের জন্য মনোনীত করেছেন: 'সুবহানা রাব্বি ওয়া বিহামদিহি, সুবহানা রাব্বি ওয়া বিহামদিহি'।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو عبد الله الجَسْري: هو حِميَري - اسم بلفظ النسبة - بن بشير.وأخرجه الترمذي (3593) عن أحمد بن إبراهيم الدورقي، عن إسماعيل ابن علية، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 35/ (21320) و (21429) و (21529)، ومسلم (2731) (84) و (85) من طرق عن سعيد بن إياس الجريري، به.وأخرجه النسائي (10591) من طريق عبد الله بن المختار، عن سعيد الجريري، عن أبي عبد الله الجسري، عن أبي ذر. لم يذكر عبد الله بن الصامت. قال الدارقطني في "العلل" (1107) بعد ذكر طريق عبد الله بن المختار هذه: والصواب قول ابن علية ومن تابعه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1868)


1868 - حدثنا جعفر بن محمد بن نُصَير الخُلْدي، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجّاج بن مِنْهال، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن الحجّاج الصَّوّاف، عن أبي الزُّبير، عن جابر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من قال: سُبحانَ الله العظيم، غُرِسَتْ له نَخلةٌ في الجنة" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "যে ব্যক্তি 'সুবহানাল্লাহিল আযীম' (মহান আল্লাহ পবিত্র) বলে, তার জন্য জান্নাতে একটি খেজুর গাছ রোপণ করা হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. حجاج الصواف: هو ابن أبي عثمان، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي.وأخرجه النسائي (10594) من طريق مسلم بن إبراهيم، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (3465)، وابن حبان (827) من طريق مؤمل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن أبي الزبير، عن جابر. لم يذكر فيه حجاج الصواف، ومؤمل بن إسماعيل هذا سيئ الحفظ، وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرجه الترمذي (3464)، وابن حبان (826) من طريق روح بن عبادة، عن حجاج الصواف، به. قال الترمذي: حديث حسن غريب لا نعرفه إلّا من حديث أبي الزبير عن جابر.وسيأتي الحديث من طريق موسى بن إسماعيل بن حماد بن سلمة برقم (1909).وفي باب غراس الجنة عن أبي هريرة، وسيأتي برقم (1908).وعن معاذ بن أنس عند أحمد 24/ (15645). وانظر تمام شواهده فيما سيأتي من حديث أبي هريرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1869)


1869 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز وزياد بن الخليل التُّستَريُّ ومحمد بن أيوب البَجَليُّ ومحمد بن شاذانَ الجَوْهَريُّ ومحمد بن إبراهيم العَبْديُّ، قالوا: حدثنا عبيد الله بن محمد القُرَشي التَّيميُّ، حدثنا عبد الرحمن بن حمّاد، حدثنا حفص بن سليمان، حدثنا طلحة بن يحيى بن طلحة، عن أبيه، عن طلحة بن عُبيد الله قال: سألتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن تفسير سبحانَ الله، قال: "هو تَنْزيهُ اللهِ عن كلِّ سُوءٍ" [1]. هذا حديثٌ صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে 'সুবহানাল্লাহ'-এর ব্যাখ্যা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটা হলো আল্লাহকে সকল প্রকার মন্দ থেকে পবিত্র ঘোষণা করা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، حفص بن سليمان متروك الحديث، وعبد الرحمن بن حماد - وهو ابن عمران ابن موسى بن طلحة بن عبيد الله الطلحي - منكر الحديث كما قال أبو حاتم، وقال ابن حبان في "المجروحين" 2/ 60: يروي عن طلحة بن يحيى بنسخة موضوعة، فلست أدري أوضعها أو قُلبت عليه، وأيما كان من ذلك فهو ساقط الاحتجاج به. انتهى، لذلك تعقَّب الذهبيُّ المصنِّفَ في تصحيحه لهذا الإسناد، فقال: بل لم يصح؛ فإنَّ طلحة منكر الحديث، قاله البخاري، وحفص بن سليمان واهي الحديث، وعبد الرحمن قال أبو حاتم: منكر الحديث.وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (59) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الشاشي في "مسنده" (10) عن محمد بن علي بن الوراق، والطبري في "التفسير" 11/ 90 عن علي بن عيسى البزار، والطبراني في "الدعاء" (1751)، والبيهقي (59)، والخطيب في "الكفاية" ص 226 من طريق علي بن عبد العزيز، ثلاثتهم عن عبيد الله بن محمد القرشي، به.وأخرجه البزار (950) عن محمد بن المثنى، وابن حبان في "المجروحين" 2/ 60، والخطيب في "الكفاية" ص 225 - 226 من طريق الفضل بن الحباب، كلاهما عن عبيد الله بن محمد القرشي، عن عبد الرحمن بن حماد الطلحي، عن طلحة بن يحيى، به. فأسقطا من الإسناد حفص بن سلمان.وقد رواه موسى بن طلحة، واختلف عليه فيه، فروي عنه عن أبيه طلحة عن النبي صلى الله عليه وسلم، وروي عنه عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم، وروي عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، قال الدارقطني في "العلل": والمرسل أصح.قلنا: أخرجه الطبري في "التفسير" 11/ 90، والطبراني في "الدعاء" (1752) من طريق سليمان بن أيوب بن سليمان بن عيسى بن موسى بن طلحة بن عبيد الله، عن أبيه، عن جده موسى بن طلحة، عن أبيه طلحة بن عبيد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذه نسخة في بعض رواتها جهالة وفيها بعض المناكير، ومع ذلك قال يعقوب بن شيبة كما في "التحفة" للمزي (5004): أحاديثها عندي صحاح!وقد اختُلف فيه على موسى بن طلحة في وصله وإرساله:فقد رواه عثمان بن موهب، عن موسى بن طلحة، واختلف عليه فيه: فأخرجه الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (1810) من طريق سهل بن عثمان الوشاء، عن أبي أسامة، عن سفيان الثوري، عن عثمان بن عبد الله بن موهب، عن موسى بن طلحة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وسهل بن عثمان الوشاء هو العسكري، وهو ثقة، لكن خالفه غيره من الثقات:منهم نصرُ بن عبد الرحمن الأَودِي، عند الطبري في "التفسير" 11/ 90، ومحمد بن علي بن مُحرِز عند أبي جعفر النحاس في "إعراب القرآن" 1/ 194، فروياه عن أبي أسامة، عن سفيان الثوري، عن عثمان بن عبد الله بن موهب، عن موسى بن طلحة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا.وتابعهما عبدُ الرحمن بنُ مهدي، عند الطبري 11/ 90 والفضلُ بنُ دُكين، عند الطبراني في "الدعاء" (1753)، ومحمد بن يوسف الفريابي، عند البيهقي في "الأسماء والصفات" (58)، ثلاثتهم عن الثوري، عن عثمان، عن موسى مرسلًا.وتابع الثوريَّ على إرساله أيضًا قيسُ بنُ الربيع، فقد أخرجه من طريقه الطبراني في "الدعاء" (1754) عن عثمان، عن موسى مرسلًا. قال الطبراني بإثره: لم يُجاوز به عثمانُ بن عبد الله بن مَوهب موسى بنَ طلحة.وخالفهما (يعني الثوريَّ وقيسَ بنَ الربيع) أبو شيبة إبراهيم بن عثمان، كما سيأتي برقم (1871) من طريقه عن عثمان بن عبد الله بن موهب، عن موسى بن طلحة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من قال: سبحان الله، والحمد لله، لا إله إلّا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلَّا بالله، قال الله: أسلم عبدي واستسلم"، وعند غير الحاكم بأطول مما هنا، وفيه: "سبحان الله - وفي رواية: والتسبيح - تنزيه الله من كل سوء". قلنا: أبو شيبة متروك الحديث، فلا يُعتَدُّ بمخالفته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1870)


1870 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا وهب بن جَرير وسعيد بن عامر، قالا: حدثنا شعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدّثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، قال: سمعتُ أبا عُبيدةَ يحدِّث عن أبيه قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يُكثِرُ أن يقول: "سُبحانَكَ اللهمَّ وبحمدِك، اللهمَّ اغفِرْ لي"، فلما نزلت: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ}، قال: "سُبحانَكَ اللهم، اللهمَّ اغفِرْ لي، إنك أنت التَّوّاب" [1].هذا إسناد صحيح إن كان أبو عُبيدةَ بن عبد الله بن مسعود سمع من أبيه، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রায়শই বলতেন: "সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, আল্লাহুম্মাগফির লি" (হে আল্লাহ! আপনার প্রশংসা সহকারে আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করছি। হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন)। অতঃপর যখন {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসলো...) নাযিল হলো, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুবহানাকা আল্লাহুম্মা, আল্লাহুম্মাগফির লি, ইন্নাকা আনতাত তাওয়াব" (হে আল্লাহ! আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করছি। হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন। নিশ্চয়ই আপনিই তওবা কবুলকারী)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أنه منقطع، فأبو عبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع منه أبيه. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي. وهو في "مسند أحمد" 6/ (3719).وأخرجه أحمد أيضًا 7/ (3891) عن عفان، عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 6/ (3683) و (3745) و (4140) و (4352) و (4356) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي، به.وسيأتي من طريق النضر بن شميل عن شعبة برقم (4027).وله شاهد من حديث عائشة عند البخاري (4967) و (4968)، ومسلم (484). شرحبيل سليمان بن عبد الرحمن عن الوليد بن مسلم، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1871)


1871 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عُبيد بن عبد الواحد حدثنا هشام بن عمّار، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا إبراهيم بن عثمان، [عن عثمان] [1] بن عبد الله بن مَوْهَب، عن موسى بن طلحة بن عُبيد الله، عن أبي هريرة، أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن قال: سُبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إله إلَّا الله، والله أكبر، ولا حولَ ولا قوّةَ إلَّا بالله، قال الله: أسلَمَ عبدي واستَسلَمَ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি ‘সুবহানাল্লাহ, ওয়াল হামদুলিল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, ওয়াল্লাহু আকবার, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ’ বলে, আল্লাহ তখন বলেন: আমার বান্দা ইসলাম গ্রহণ করেছে (বা আমার কাছে আত্মসমর্পণ করেছে) এবং সম্পূর্ণভাবে বশ্যতা স্বীকার করেছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] ما بين معقوفين سقط من نسخنا الخطية و"إتحاف المهرة"، ولا بد منه، وقد جاء على الصواب في مصادر التخريج، وإبراهيم بن عثمان هذا: هو ابن خواستي العبسي مولاهم، أبو شيبة الكوفي، وشيخه: هو عثمان بن عبد الله بن موهب. شرحبيل سليمان بن عبد الرحمن عن الوليد بن مسلم، به.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، أبو شيبة إبراهيم بن عثمان متروك الحديث.وأخرجه بأطول مما هنا الطبراني في "الأوسط" (6745) عن محمد بن أبي زرعة، عن هشام بن عمار، بهذا الإسناد. ولفظه: "من قال: سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلَّا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلّا بالله، ضم عليهن ملكٌ جناحه، فلا يرجعن بشيء حتى يبلغ بهن العرش، ولا يمر على شيء إلَّا صلى عليهن وعلى قائلهن، والتسبيح تنزيه الله عن كل سوء، ومن قال: لا حول ولا قوة إلّا بالله العلي العظيم، قال الله: أسلم عبدي واستسلم".وأخرجه بنحو لفظ الطبراني أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 150 - 151 من طريق ابن بنت شرحبيل سليمان بن عبد الرحمن عن الوليد بن مسلم، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1872)


1872 - أخبرنا حمزة بن العباس العَقَبي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا قُرَادٌ أبو نُوح، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، عن حَبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباسٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أولُ من يُدعَى إلى الجنة، الذين يَحْمَدون الله في السَّرّاء والضَّرّاء" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সর্বপ্রথম যাদেরকে জান্নাতে ডাকা হবে, তারা হলো ঐ সকল লোক যারা সুখে-দুঃখে সর্বাবস্থায় আল্লাহর প্রশংসা করে।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف مرفوعًا، عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، كان قد اختلط، وذكر ابن حجر أن من سمع منه ببغداد فبعد الاختلاط، والراوي عنه هنا قراد أبو نوح - وهو عبد الرحمن بن غزوان الخزاعي - بغدادي، وحبيب بن أبي ثابت مدلس وقد عنعن، والمحفوظ بالإسناد الصحيح أنه من قول سعيد بن جبير كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (4063)، وفي "الدعوات" (136)، وفي "الآداب" بإثر الحديث (715) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصبر والثواب عليه" (109)، والبزار (5028) عن محمد بن عبد الله، عن قراد عبد الرحمن بن غزوان، به.وأخرجه الخرائطي في "فضيلة الشكر" (33) من طريق حجاج بن محمد الأعور، عن عبد الرحمن المسعودي، به. وحجّاج أيضًا سكن بغداد وكان قد اختلط بها في آخر عمره.وتابع المسعوديَّ قيسُ بن الربيع وشعبةُ بن الحجاج، لكن بطريقين ضعيفين إليهما:أما الأول، فقد أخرجه الطبراني في "الكبير" (12345)، وفي "الأوسط" (3033)، وفي الصغير (288)، وفي "الدعاء" (1768)، وأبو نعيم في "الحلية" 5/ 69، وفي "صفة الجنة" (82)، والبيهقي في "الشعب" (4064) و (4166)، وفي "الآداب" (715)، من طريق عاصم بن علي الواسطي، عن قيس بن الربيع، عن حبيب بن أبي ثابت، به. وقيس بن الربيع هذا فيه ضعف، والراوي عنه عاصم بن علي لا بأس به، لكن له ما ينكر.وأما الثاني، فأخرجه الطبراني في "الصغير" بإثر الحديث (288)، والبيهقي في "الشعب" (4167)، وفي "الدعوات" (135)، وفي "الآداب" بإثر الحديث (715)، والبغوي في "شرح السنة" (1270)، وابن فاخر في "موجبات الجنة" (370)، وابن حجر العسقلاني في "الأمالي المطلقة" ص 23 - 24 من طريق نصر بن حماد الوراق، عن شعبة، عن حبيب بن أبي ثابت، به. وهذه متابعة ضعيفة جدًّا، فنصر بن حماد ضعيف جدًّا، كذبه بعضهم. قال الحافظ ابن حجر: هذا حديث غريب، تفرد به نصر بن حماد وهو ضعيف، لكن أخرجه ابن أبي شيبة والحاكم من طريق المسعودي عن حبيب بن أبي ثابت … والمسعودي صدوق إلّا أنه اختلط، فالحديث على هذا حسن إن لم يكن نصر بن حماد انقلب عليه، وكان عنده: عن المسعودي، فصار عن شعبة.قلنا: قد وقفنا على متابعة لنصر بن حماد، أخرجها الماليني في "الأربعين في شيوخ الصوفية" (40) عن أبي علي محمد بن الحسين بن حمزة الصوفي، عن أبي الحسن علي بن أحمد الفقيه، عن محمد بن الفضيل الزاهد، عن سعيد بن عامر، عن شعبة، عن حبيب بن أبي ثابت، به.وسعيد بن عامر ثقة، والراوي عنه محمد بن الفضيل صدوق، إلّا أننا ما عرفنا من دونه.وقد روي هذا الحديث من طريقين أحدهما صحيح عن حبيب بن أبي ثابت عن سعيد بن جبير من قوله، أخرجه ابن المبارك في "الزهد" (206) عن مسعر بن كدام وابن أبي شيبة 14/ 134 عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن عيسى بن المختار، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، كلاهما (مسعر وابن أبي ليلى) عن حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير قوله. وابن أبي ليلى، وإن كان سيئ الحفظ، فقد تابعه مسعر وهو ثقة ثبت، وطريقه هذا أصح طرق هذا الحديث، فلعله هو الصواب، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1873)


1873 - حدثنا أبو الوليد حسان بن محمد الفقيه، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا يحيى بن حَبيب بن عَرَبي، أخبرنا موسى بن إبراهيم بن كَثير الأنصاري المَدَني قال: سمعتُ طلحة بن خِرَاشٍ يقول: سمعتُ جابر بن عبد الله يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أفضلُ الذِّكر لا إله إلَّا الله، وأفضلُ الدُّعاء الحمدُ لله" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “সর্বশ্রেষ্ঠ যিকির হলো, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ এবং সর্বশ্রেষ্ঠ দু’আ হলো, ‘আলহামদু লিল্লাহ’।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل موسى بن إبراهيم وشيخِه طلحة بن خراش.وأخرجه الترمذي (3383)، والنسائي (10599)، وابن حبان (846) من طريق يحيى بن حبيب، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن غريب لا نعرفه إلّا من حديث موسى بن إبراهيم.وانظر ما سلف برقم (1855).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1874)


1874 - حدثنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق العدل ببغداد، حدثنا عبد العزيز ابن معاوية القرشي، حدثنا عبد الله بن بكرٍ السَّهْمي، حدثنا حاتم بن أبي صَغِيرة، عن أبي بَلْج، عن عمرو بن مَيمون أنه أخبره، أنه سمع عبد الله بن عمرٍو يقول: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما على الأرض رجلٌ يقول: لا إله إلَّا الله، والله أكبر، وسبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا حولَ ولا قوّةَ إلَّا بالله، إلا كُفِّرت عنه ذُنوبُه، وإن كانت أكثرَ من زَبَد البحر" [1].رواه شعبة عن أبي بلج يحيى بن أبي سليم فأَوقفه:




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “পৃথিবীতে এমন কোনো ব্যক্তি নেই, যে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, আল্লাহু আকবার, সুবহানাল্লাহি, আলহামদুলিল্লাহি, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আল্লাহ মহান, আল্লাহ পবিত্র, সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, আর আল্লাহর সাহায্য ছাড়া কোনো শক্তি বা ক্ষমতা নেই) বলবে, তবে তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও তা সমুদ্রের ফেনা থেকেও বেশি হয়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل أبي بَلْج - وهو يحيى بن أبي سليم، ويقال: ابن سليم - لكن خالف حاتمَ بنَ أبي صغيرة شعبةُ بنُ الحجاج فرواه عن أبي بلج بهذا الإسناد موقوفًا، كما في الرواية التالية، وهو الراجح لحفظ شعبة وإمامته، والله أعلم.وأخرجه أحمد 11/ (6479) و (6973)، والترمذي (3460) من طريق عبد الله بن بكر السهمي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرجه أحمد (6959)، والترمذي (3460 م)، والنسائي (9875) و (10589) من طرق عن حاتم بن أبي صغيرة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1875)


1875 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة.وأخبرنا أحمد بن محمد العَفْصي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي بَلْج، عن عمرو بن ميمون، عن عبد الله بن عمرٍو أنه قال: مَن قال: لا إله إلَّا الله، والله أكبر، والحمدُ لله، وسبحانَ الله كثيرًا، ولا حولَ ولا قوَّةَ إلا بالله، كُفِّرتْ خطاياهُ وإن كانت أكثرَ من زَبَدِ البحر [1]. حديث حاتم بن أبي صَغِيرةَ صحيحٌ على شرط مسلم، فإنَّ الزِّيادة من مثله مقبولة.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, আল্লাহু আকবার, ওয়াল হামদু লিল্লাহি, ওয়া সুবহানাল্লাহি কাছীরান, ওয়া লা হাওলা ওয়া লা কুওয়্যাতা ইল্লা বিল্লাহ’ বলবে, তার পাপরাশি ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও তা সমুদ্রের ফেনা হতেও বেশি হয়।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل أبي بلج، وقد سلف الكلام عليه في الذي قبله.وأخرجه الترمذي بإثر الحديث (3460)، والنسائي (9874) عن محمد بن بشار، عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.ورواه أبو النعمان الحكم بن عبد الله عن شعبة فخالف في لفظه، أخرجه النسائي (9873) من طريقه عن شعبة، به بلفظ: من قال: لا إله إلَّا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، كفرت عنه ذنوبه وإن كانت مثل زبد البحر. وهذا لفظ شاذ، فأبو النعمان وإن كان ثقة، فله أوهام، ولعلَّ هذا من أوهامه، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1876)


1876 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن أبي عيسى موسى بن عيسى الصَّغير [1]، حدثني عَوْن بن عبد الله بن عُتْبة، عن أبيه قال: سمعتُ النُّعمان بن بَشِيرٍ يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ مِن جَلال اللهِ مما تَذْكُرونَ، التَّسبيحَ والتَّحميدَ والتَّهليلَ، إنَّهنَّ لَيَتَعَطَّفْنَ حولَ العرش لهنَّ دَوِيٌّ كدَوِيِّ النحل، يُذَكَّرنَ بصاحبِهنَّ، أفلا يُحِبُّ أحدُكم أن يكونَ له عندَ الله من يُذكِّرُه به؟ " [2].هذا حديث على شرط مسلم، فقد احتَجَّ بموسى القارئ، وهو ابن عيسى هذا!




নু'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর যে মহিমা/প্রশংসা বর্ণনা করো, তার মধ্যে তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ), তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ) এবং তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) অন্যতম। নিশ্চয়ই এগুলি আরশের চারপাশে ঘিরে থাকে। সেগুলোর গুঞ্জন হয় মৌমাছির গুঞ্জনের মতো, তারা তাদের পাঠকের কথা স্মরণ করিয়ে দেয়। তোমাদের মধ্যে এমন কেউ কি নেই, যে পছন্দ করবে যে আল্লাহর কাছে তার এমন কেউ থাকুক যে তার (নেক আমলের) কথা স্মরণ করিয়ে দেয়?"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذا سماه المصنف هنا، وهو وهمٌ منه رحمه الله، فقد ذهب وهمه إلى الذي احتجَّ به مسلم، وهو موسى بن عيسى القارئ الخياط، وهذا لا يقال له: الصغير، والصواب أنه أبو عيسى موسى بن مسلم الكوفي الطحان المعروف بموسى الصغير، وكأنَّ المصنف قد خلط بينهما فعدهما واحدًا، وقد سلف الحديث من طريق موسى بن مسلم هذا برقم (1862)، ووهم المصنف في تسميته أيضًا هناك، فسماه مسلم بن سالم.



[2] إسناده صحيح. مسدد: هو ابن مسرهد، ويحيى بن سعيد: هو القطان.وأخرجه أحمد 30/ (18388). وأخرجه ابن ماجه (3809) عن أبي بشكر بن بكر بن خلف، كلاهما (أحمد وأبو بشر) عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. لكن وقع عندهما: عون بن عبد الله عن أبيه أو عن أخيه، على الشك.وسلف الحديث برقم (1862)، وذكرنا هناك أنَّ هذا الشك لا يضر لأنَّ كليهما ثقة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1877)


1877 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدنيا، حدثني أبو علي أحمد بن إبراهيم المَوْصِلي، حدثنا خَلَف بن خليفة، عن حفص ابنِ أخي أنسٍ، عن أنس بن مالك قال: كنّا مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم في حَلْقَةٍ، ورجلٌ قائمٌ يصلِّي، فلما رَكَعَ وسجد، تشهَّد ودعا، فقال في دُعائِه: اللهمَّ إنِّي أسألُك بأنَّ لك الحمدَ، لا إله إلَّا أنتَ، بديعُ السماوات والأرض، يا ذا الجَلال والإكرام، يا حيُّ يا قَيُّوم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لقد دعا باسمِ الله الأعظم، الذي إذا دُعِيَ به أجاب، وإذا سُئِلَ به أَعطَى" [1].هذا حديث صحيحٌ على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وقد روي من وجهٍ آخر عن أنس بن مالك:




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি মজলিসে ছিলাম। এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিল। যখন সে রুকু ও সিজদা করল, তখন সে তাশাহহুদ পাঠ করল ও দু'আ করল। সে তার দু'আয় বলল: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট প্রার্থনা করি। কারণ সমস্ত প্রশংসা আপনার জন্য, আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই, আপনি আসমান ও যমীনের স্রষ্টা, হে মহিমা ও সম্মানের অধিকারী, হে চিরঞ্জীব, হে সবকিছুর ধারক ও নিয়ন্ত্রক (কাইয়ুম)।" তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে তো আল্লাহর ইসমে আযম (মহান নাম) দ্বারা দু'আ করেছে, যার দ্বারা দু'আ করলে আল্লাহ সাড়া দেন এবং যার মাধ্যমে চাওয়া হলে তিনি দান করেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل خلف بن خليفة. حفص ابن أخي أنس: قيل: هو حفص بن عبد الله بن أبي طلحة، وقيل: حفص بن عبيد الله بن أبي طلحة، وقيل: حفص بن عمر بن عبيد الله بن أبي طلحة، وقيل: حفص بن محمد بن عبد الله بن أبي طلحة، كما في ترجمته في "تهذيب الكمال" 7/ 80.وأخرجه أحمد 20/ (12611) و 21/ (13570)، وأبو داود (1495)، والنسائي (1224) و (7654)، وابن حبان (893) من طرق عن خلف بن خليفة، بهذا الإسناد. ووقعت تسمية حفص عند أحمد: حفص بن عمر، وفي الموضع الثاني عند النسائي: حفص بن عبد الله. وقال ابن حبان بإثره: حفص هذا: هو حفص بن عبد الله بن أبي طلحة أخو إسحاق ابن أخي أنس لأمه.وأخرجه أحمد 19/ (14205)، وابن ماجه (3858) من طريق أبي خزيمة، عن أنس بن سيرين، عن أنس بن مالك. وهذا إسناد ضعيف من أجل أبي خزيمة - وهو يوسف بن ميمون الصباغ - فقد صرَّح وكيع باسمه عند ابن حبان في "المجروحين" 3/ 133 فقال: حدثنا يوسف أبو خزيمة عن أنس بن سيرين.وأخرجه الترمذي (3544) من طريق سعيد بن زربي، عن عاصم الأحول وثابت، عن أنس.قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه. قلنا: وسعيد بن زربي هذا ضعيف. وأخرجه أحمد 21/ (13798) من طريق عبد العزيز بن مسلم، عن إبراهيم بن عبيد، بهذا الإسناد. وقد سمَّى الرجل المبهم في الحديث أبا عياش زيد بن صامت الزرقي. ولفظه عنده: "لقد دعا الله باسمه الأعظم الذي … ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1878)


1878 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سُليمان، حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني عِياض بن عبد الله الفِهْري، عن إبراهيم بن عُبيد، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع رجلًا يقول: اللهمَّ إِنِّي أسألك بأنَّ لك الحمد، لا إله إلَّا أنت، المَنَّانُ، بديعُ السماوات والأرض، ذو الجَلال والإكرام، أسألُك الجنةَ، وأعوذُ بك من النار، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لقد كادَ يدعو اللهَ باسمِه الذي إذا دُعيَ به أجابَ، وإذا سُئِل به أَعطَى" [1].




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন লোককে বলতে শুনলেন: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই, কারণ সমস্ত প্রশংসা তোমারই জন্য, তুমি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই। তুমি অনুগ্রহকারী, আকাশমণ্ডল ও পৃথিবীর সৃষ্টিকর্তা, মর্যাদা ও সম্মানের অধিকারী। আমি তোমার কাছে জান্নাত চাই এবং জাহান্নামের আগুন থেকে তোমার কাছে আশ্রয় চাই।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে তো প্রায় আল্লাহর সেই নামের মাধ্যমে ডেকে ফেলেছে, যে নামের মাধ্যমে ডাকলে তিনি সাড়া দেন এবং সে নামের মাধ্যমে কিছু চাইলে তিনি তা দান করেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح كسابقه، وهذا إسناد فيه ضعف من أجل عياض بن عبد الله الفهري، وقد توبع، وإبراهيم بن عبيد - وهو ابن رفاعة - صدوق. الربيع بن سليمان: هو المرادي. وأخرجه أحمد 21/ (13798) من طريق عبد العزيز بن مسلم، عن إبراهيم بن عبيد، بهذا الإسناد. وقد سمَّى الرجل المبهم في الحديث أبا عياش زيد بن صامت الزرقي. ولفظه عنده: "لقد دعا الله باسمه الأعظم الذي … ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1879)


1879 - حدثنا أحمد بن كامل بن خلف القاضي، حدثنا أحمد بن عُبيد الله النَّرْسي، حدثنا محمد بن سابق، حدثنا مالك بن مِغْوَل.وحدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا محمد بن عبد الله بن سليمان، حدثنا سعيد بن عمرو الأشْعَثي، حدثنا وكيع بن الجرّاح، حدثنا مالك بن مِغْول، عن عبد الله بن بُرَيدةَ الأسْلَمي، عن أبيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سمع رجلًا يقول: اللهمَّ إنِّي أسألُك بأنك أنتَ الله لا إله إلَّا أنتَ، الأحدُ الصَّمدُ، الذي لم يَلِدْ ولم يُولَدْ، ولم يكن له كفوًا أَحد، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "لقد سألتَ اللهَ باسمِه الأعظمِ، الذي إذا سُئِل به أَعطَى، وإذا دُعِي به أجاب" [1]. هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرط مسلم:




বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একজন ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন: “হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই, কারণ তুমিই আল্লাহ—তুমি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। তুমি একক, চিরস্থায়ী (নিষ্কাম), যিনি জন্ম দেননি এবং জন্ম নেননি, আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই।” তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি অবশ্যই আল্লাহকে তাঁর সেই মহান (আ'জম) নামের মাধ্যমে চেয়েছ, যে নামের মাধ্যমে চাওয়া হলে তিনি দান করেন এবং যে নামে তাঁর কাছে দু'আ করা হলে তিনি কবুল করেন (বা উত্তর দেন)।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 38/ (23041)، وابن ماجه (3857) من طريق وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا ومطولًا وفيه قصة أحمد (22952) عن عثمان بن عمر، وأحمد أيضًا (22965)، وأبو داود (1493)، والنسائي (7619)، وابن حبان (891) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وأبو داود (1494)، والترمذي (3475)، والنسائي (11652)، وابن حبان (892) من طريق زيد بن الحباب، ثلاثتهم عن مالك بن مغول، به.وذكر زيد بن الحباب بإثر الحديث عند الترمذي والنسائي أنه رواه أيضًا عن زهير بن معاوية عن أبي إسحاق السبيعي عن مالك بن مغول به، ثم رواه عن سفيان الثوري عن مالك بن مغول. وكذا ذكر عند ابن حبان لكنه لم يذكر روايته عن سفيان.وسيأتي بعده من طريق شريك القاضي عن أبي إسحاق، وقد اضطرب شريك فيه.وسلف برقم (999) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، عن أبيه، عن حسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة عن حنظلة بن علي، عن محجن بن الأدرع، قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم المسجد، فإذا برجل قد صلَّى صلاته وهو يتشهد، ويقول: اللهم أني أسألك يا الله الواحد الصمد، الذي لم يلد ولم يولد ولم يكن له كفوًا أحد، أن تغفر ذنوبي، إنك أنت الغفور الرحيم، فقال: "قد غُفر له، قد غُفر له". فجعله من حديث محجن، قال أبو حاتم كما في "العلل" لابنه (2082): حديث عبد الوارث أشبه. قلنا: وقد ذكرنا في التعليق على "سنن أبي داود" (985) أنه لا وجه لترجيح إحدى الروايتين على الأخرى، حيث إنَّ ألفاظهما متباينة، فلا يوجد ما يمنع أن تكونا قصتين، وأن يكون ابن بريدة رواهما جميعًا، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1880)


1880 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدُّنيا، حدثنا الحسن بن الصبّاح، حدثنا الأسْوَد بن عامر، أخبرنا شَرِيك، عن أبي إسحاق، عن ابن بُرَيدةَ، عن أبيه: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم سمع رجلًا يقول: اللهمَّ إنِّي أسألُك بأنَّك أحدٌ صَمَدٌ، لم يَلِدْ ولم يُولَدْ، ولم يكن لك كُفُوًا أَحد، فقال: "لقد سألَ الله باسمِهِ الأعظم - أو الأكبر - الذي إذا دُعِي به أجابَ، وإذا سُئِل به أَعطَى" [1].




বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন, সে বলছে: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করছি এই উসিলায় যে, আপনিই সেই একক (আহাদ), যিনি স্বয়ংসম্পূর্ণ (সামাদ), যিনি জন্ম দেননি এবং যাঁকে জন্ম দেওয়াও হয়নি, আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই।" তখন তিনি বললেন: "এই ব্যক্তি আল্লাহকে তাঁর সেই ইসমে আ'যম (সর্বশ্রেষ্ঠ নাম) — অথবা আল-আকবার (মহত্তম নাম) — দ্বারা ডেকেছে, যার দ্বারা ডাকলে তিনি সাড়া দেন এবং যা দ্বারা প্রার্থনা করলে তিনি দান করেন।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف، فقد اضطرب فيه شريك - وهو ابن عبد الله القاضي - فقد رواه هنا عن أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السبيعي - عن ابن بريدة، ورواه مرة عن أبي إسحاق ومالك بن مغول عن ابن بريدة، كما أخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (173) عن أبي أمية محمد بن إبراهيم بن مسلم عن أسود بن عامر عن شريك به، ورواه مرة عن أبي إسحاق عن مالك بن مغول عن ابن بريدة، كما ذكر الخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 447، وهذا هو المحفوظ من حديث أبي إسحاق، فقد رواه زيد بن الحباب عن زهير بن معاوية عن أبي إسحاق عن مالك بن مغول عن ابن بريدة، كما سلف في تخريج الحديث الذي قبله. لذلك قال الترمذي بإثر الحديث (3475): وروى شريك هذا الحديث عن أبي إسحاق عن ابن بريدة عن أبيه، وإنما أخذه أبو إسحاق عن مالك بن مغول. وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 273 و 14/ 32 عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (119) من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، به.ووقع في المطبوع منه: سعيد بن أبي أيوب والحسن بن ثوبان، بالعطف، وهو خطأ، إنما هو سعيد بن أبي أيوب عن الحسن بن ثوبان.